निराला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
निराला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 8 अगस्त 2016

मनोहरा देवी प्रेरक थीं निराला की

हिन्दी में सूर्यकान्त त्रिपाठी ´निराला´ पर जब भी बातें होती हैं तो उनकी पत्नी की भूमिका का कभी जिक्र नहीं होता। सच यह है निराला को हिन्दीसेवा के लिए प्रेरित उनकी पत्नी ने किया।निराला की ´कुल्लीभाट´रचना बेहद दिलचस्प है।रामविलास शर्मा ने ´निराला की साहित्य साधना´में बहुत ही रोचक ढ़ंग से समूचे प्रसंग को उद्घाटित किया है।निराला की पत्नी के कथासूत्र को ´कुल्लीभाट´ में देखें तो चीजों को बेहतर ढ़ंग से समझ सकते हैं।मनोहरा देवी की समझ में निराला उस समय हिन्दी के पूरे गँवार थे, ´बिलकुल ठोस मूर्ख´।हिन्दी को लेकर पति-पत्नी की बातचीत इस प्रकार हुई है-

पति-तुम हिन्दी- हिन्दी करती हो ,हिन्दी में क्या है ॽ

पत्नी-जब तुम्हें आती ही नहीं,तब कुछ नहीं है।

पति-मुझे हिन्दी नहीं आती ॽ

पत्नी-वह तो तुम्हारी ज़बान बतलाती है।बैसवाड़ी बोल लेते हो,तुलसीकृत रामायण पढ़ी है,बस तुम खड़ीबोली का तुम क्या जानते हो ॽ

संवाद के बाद पूरी बात बतलाते हुए निराला ने लिखा है कि उनकी पत्नी ने खड़ीबोली के बहुत-से महारथियों के नाम गिना दिये।पर मनोहरादेवी ने भजन गाया तो तुलसीदास का।उस समय मनोहरादेवी की उम्र 13-14साल रही होगी। उपरोक्त संवाद में यह देखें कि निरालाकी पत्नी की कितनी विकसित चेतना थी कि वह खड़ीबोली हिन्दी के पक्ष में बोल रही थीं,लेकिन उस समय निराला के पास वह चेतना नहीं थी।उनकी पत्नी गांव में रहते हुए भी खड़ीबोली हिन्दी के नए कवियों से वाकिफ थीं,निराला नहीं।निराला ने जब अपनी पत्नी से यह सवाल किया कि हिन्दी में क्या है ॽ तो वे नहीं जानते थे कि उनको सटीक उत्तर भी मिलेगा।यह संवाद जिस समय हो रहा था निराला 16साल के रहे होंगे।निराला का मुँह बंद करने के लिए मनोहरादेवी ने उसी समय निराला को खड़ीबोली हिन्दी के दो गीत गाकर सुनाए। यह उस समय गांव में रहने वाली 13-14 साल की लड़की की चेतना थी।निराला के अनुसार जो दो गीत सुनाए वे हैं-

पहला- अगर है चाह मिलने की तो हरदम लौ लगाता जा।

दूसरा- सासुजी का छोकड़ा ,मेरी ठोड़ी पर रख दिया हाथ।

बहुत गम खा गई नहीं चाँटे लगाती दो-चार।।



रामविलास शर्मा ने इस समूचे प्रसंग पर लिखा है ´निराला को जिस बात ने प्रभावित किया,वह था मनोहरा देवी का मधुर कण्ठ-स्वर।श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन-सुनकर पहलीबार निराला के ज्ञान नेत्र खुले;उन्हें संगीत के साथ काव्य के अमित प्रकाश का ज्ञान हुआ।यह भजन निराला जीवन भर गाते रहे; इससे अधिक उनके हृदय को प्रभावित करनेवाला दूसरा गीत संसार में न था।मनोहरा देवी गढ़ाकोला में रामायण पढ़ा करती थीं।निराला के चाचा दरवाजे पर बैठे सुनते थे। मनोहरा देवी ने निराला का परिचय खड़ीबोली से नहीं,तुलसीदास से कराया।तुलसीदास को ज्ञान मिला,पत्नी के उपदेश से;निराला को हिन्दीसेवा के लिए प्रवृत्त किया मनोहरादेवी ने !´

दुख ही जीवन की कथा रही

       मेरे लिए सुख की बात यह है सारी जिन्दगी दुखों ने पीछा नहीं छोड़ा।अनंत दुख और अनंत आनंद का गजब खेल है जीवन ।मैं निराला की लिखी कविता ´सरोज स्मृति´पढ़ रहा था और बार –बार सोच रहा था,हिन्दी के किसी और कवि ने बेटी के दुखों पर निराला जैसी कविता बाद में क्यों नहीं लिखी ॽ रामविलास शर्मा ने निराला के अनेक किस्म के दुखों का विस्तार से जिक्र किया है लेकिन उस दुख में छिपे सर्जनात्मक पक्ष की उपेक्षा की है,इसी प्रसंग में मुझे वे लोग भी याद आ रहे हैं जो दुखों से परेशान रहते हैं और अपनी व्यथा आए दिन साझा करते रहते हैं।

संसार में आए हैं तो दुख तो हैं,हम सबके पास दुख हैं।संसार की दुखों के बिना कल्पना संभव नहीं है। सृष्टि को रहना है,विकास करना है तो दुख रहेंगे।दुखों को सकारात्मक दिशा में मोड़ने की कला विकसित करने की जरूरत है।दुख के बिना जीवन अपूर्ण है,नीरस है।

रवीन्द्रनाथ की बात मानें तो दुख तो ´रस´है।दुख रहते हैं तो अपूर्णता का एहसास बना रहता है और यही एहसास हमें सर्जनात्मक शक्ति देता है।सिर्फ संतोष और सुख रहे तो जीवन बहुत ही नीरस हो जाता है। हम बार - बार यह महसूस करते हैं हमारे पास यह नहीं है,वह नहीं है, यह अभाव और अपूर्णता ही है जो हमको बल देती है,संघर्षशील चेतना पैदा करती है.जिसने दुख नहीं देखा,दुख को महसूस नहीं किया वह सत्य को अर्जित नहीं कर सकता।दुख तो मनुष्य की सबसे बड़ी दौलत है,इसलिए दुखों से डरना नहीं चाहिए,कुंठा में नहीं जाना चाहिए,दुखों का सामना करना चाहिए।

मैंने अपने जीवन में सबसे ज्यादा सेवा की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की और पश्चिम बंगाल में उनके कॉमरेडों ने उनके राज्य नेतृत्व ने अकारण मुझे सबसे ज्यादा सताया,मेरी अकल्पनीय क्षति की,मेरे अनेक मित्र-सहकर्मी-रिश्तेदार हैं जिनको मैंने कभी एक गाली तक नहीं दी,लेकिन वे सारी जिन्दगी मेरे खिलाफ निंदा अभियान में लगे रहे, अनेक करीबी नाते-रिश्तेदार हैं जो निरंतर विषवमन करने में लगे रहते हैं,ये वे लोग हैं जिनकी मैंने तन-मन-धन सब तरह से मदद की।बदले में मैंने कभी कोई मदद नहीं मांगी,लेकिन ये सभी लोग विभिन्न रूपो में दुख पहुंचाते रहे,मैंने वे दुख महसूस किए,झेले,क्षति उठायी,लेकिन कभी कुंठा और निराशा को पास फटकने नहीं दिया। अनेक लोग हैं जो अभी भी दुष्टता और असभ्यता से बाज नहीं आते।लेकिन मैंने उनको कभी कोई गाली नहीं दी।

मैं मानता हूं दुख को देखो,जानो,महसूस करो और उसे सुख में बदलो।यही वह चीज है जिसने मुझे दुखों में रहते हुए निरंतर लिखने,संवाद करने के लिए असीमित ऊर्जा दी।ये कलकत्ते के लोग दुख न देते तो मैं इतनी किताबें नहीं लिख पाता।मैं उस समय ज्यादा लिखता हूँ जब लोग कलकत्ते के लोग दुख देते हैं। मेरी किताबों के पीछे दुखों की सर्जनात्मक भूमिका है,इसी अर्थ में मुझे रवीद्रनाथ की यह बात सही लगती है कि दुख ही आनंद है।

टैगोर ने लिखा है ´मानव के इस दुःख में केवल आँसुओं का मृदुल वाष्प ही नहीं,हृद का प्रखर तेज भी है।विश्व में तेजःपदार्थ हैं।मानव-चित्त में दुख हैं।वही प्रकाश है,गति है,ताप है।वही टेढ़े-मेढ़े रास्तों से घूम-फिरकर समाज में नित्य-नूतन कर्मलोक और सौन्दर्य-लोक का निर्माण करता है।कहीं खुलकर तो कहीं छिपकर,दुःख के ताप ने ही मानव-संसार की वायु को धावमान रखा है।´



´इस दुःख को हम क्षुद्र नहीं समझेंगे।मस्तक उठाकर,सीना तानकर इसे स्वीकार करेंगे।इसकी शक्ति से हम भस्म नहीं होंगे,बल्कि अपने-आपको और कठिन रूप में गढ़ेंगे। दुःख की सहायता से अपने-आपको ऊपर उठाने के बदले यदि हम उसमें डूब जायें तो यह दुःख का अपमान होगा।जिसका भार सहने से जीवन सार्थक होता है उसीको आत्म-हत्या का साधन समझना दुःख-देवता के सामने अपराधी होना है। अस्तित्व की प्रतिष्ठा को समझने का दुःख के सिवा दूसरा मार्ग नहीं है।दुःख ही जगत् के पदार्थों का मूल्य है,जो कुछ आदमी ने रचा है दुःख की सहायता से रचा है।जिसे हमने दुःख से नहीं पाया वह हमारा अपना नहीं है।त्याग के द्वारा,दान तपस्या दुःख के द्वारा ही गम्भीर आत्मबोध सम्भव है-सुख या आराम के द्वारा नहीं। दुःख के अतिरिक्त किसी उपाय से हम अपना आन्तरिक सामर्थ्य नहीं जान सकते। ´

शनिवार, 20 जुलाई 2013

जनसत्ता के निराला पर प्रतिक्रियावादी हमले


 हाल ही में जनसत्ता अखबार में शंकरशरण का लेख छपा है जिसमें सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' को हिन्दुत्ववादी सिद्ध करने का आधारहीन प्रयास किया गया है। इस लेख में निराला को समग्रता में देखने की कोशिश ही नहीं की गयी है। साथ ही इस लेख में निरर्थक प्रगतिवाद पर हमला बोला गया है। अप्रासंगिकता को आलोचना में दीमक कहते हैं।
--
जनसत्ता जैसे अखबार की प्रगतिशीलता विरोधी मुहिम जारी है और उसमें कविताओं के साथ आलोचना कम कु-समीक्षा ज्यादा लिखी जा रही है।हाल ही में शंकर शरण जैसे लेखक ने अपने लेख में निराला की प्रसिद्ध कविता तुलसीदास का गलत मूल्यांकन किया है।
असल में उसी कविता में निराला ने कविता लिखने का मकसद भी लिखा है। निराला ने लिखा है- "करना होगा यह तिमिर पार। देखना सत्य का मिहिर द्वार।"
यह कविता हिन्दुत्ववादी नजरिए को अभिव्यंजित करने वाली कविता नहीं है। बल्कि इसका लक्ष्य भिन्न है।
इस कविता का मूल लक्ष्य है सांस्कृतिक अंधकार को पार करके सत्य को पाना। साम्प्रदायिक नजरिए का सत्य के सत्य बैर है। शंकरशरण जैसे लेखक इस मूल बात को पकड़ने में असमर्थ रहे हैं। कविता किसके लिए लिखी गयी है यह बात कविता में निराला ने स्वयं लिखी है । सवाल यह है शंकरशरण यह लेख क्यों इनदिनों मोदी को महान बनाने की मुहिम के हिस्से के तौर पर इस तरह के लेख छापकर जनसत्ता अखबार जाने-अनजाने मोदी की जनसंपर्ककला का शिकार बन गया। निराला का हिन्दुत्व से कोई संबंध नहीं है। निराला विचार और कर्म दोनों में साम्प्रदायिकता विरोधी थे।
--
शंकर शरण जैसे लेखक को यह भी जानना चाहिए कि साम्प्रदायिक समस्या पर निराला आखिरकार क्या सोचते थे। निराला ने लिखा है- "हिंदू और मुसलमानों की समस्या इस देश की पराधीनता की सबसे बड़ी समस्या है।"
शंकरशरण जैसे लेखकों का इस समस्या के प्रति रूख क्या है ,यह बात भी जाननी दिलचस्प है। वे निराला में से मनवांछित यथार्थ खोज रहे हैं। इस तरह के लेखन को निराला मानसिक दु्र्बलता मानते थे।
--
शंकर शरण जैसे लेखकों को ध्यान में रखकर ही निराला ने लिखा था- "हमारे देश में धार्मिक कट्टरता ही प्रबल है। इसका परिणाम यह होता है कि कट्टरता का जड़त्व मस्तिष्क का विकास नहीं होने देता।अपने अनुकूल न होने पर धार्मिक तत्व झूठे जान पड़ते हैं।यह आत्मानुकूल तत्ववृत्ति बहुत बड़ी मानसिक दुर्बलता है। इसके कारण सभी रेखाओं से मन-शक्ति का विकास नहीं हो पाता। प्रहार करने वाली पशुवृत्ति बनी रहती है।मनुष्य सब देशों के साहित्य,समाज,राजनीति और धर्म का महत्व समझ नहीं पाता।प्रगति एक हद तक बंधी रहती है। "
-

निराला ने लिखा था- " हिंदुओं की संकीर्णता के कारण ही मुसलमान इस देश में संकीर्ण हो रहे हैं। "

रविवार, 20 मार्च 2011

खेलूँगी कभी न होली-निराला




खेलूँगी कभी न होली
उससे जो नहीं हमजोली।

यह आँख नहीं कुछ बोली,
यह हुई श्याम की तोली,
ऐसी भी रही ठठोली,
गाढ़े रेशम की चोली-

अपने से अपनी धो लो,
अपना घूँघट तुम खोलो,
अपनी ही बातें बोलो,
मैं बसी परायी टोली।

जिनसे होगा कुछ नाता,
उनसे रह लेगा माथा,
उनसे हैं जोडू-जाँता,
मैं मोल दूसरे मोली



ख़ून की होली जो खेली- निराला

युवकजनों की है जान ;
    खू़न की होली जो खेली।
पाया है लोगों में मान,
   ख़ून की होली जो खेली।
रँग गये जैसे पलाश;
   कुसुम किंशुक के,सुहाये,
कोकनद के पाये प्राण,
    ख़ून की होली जो खेली।
निकले क्या कोंपल लाल,
     फाग की आग लगी है,
फागुन की टेढ़ी तान,
     ख़ून की होली जो खेली।
खुल गयी गीतों की रात,
      किरन उतरी है प्रात की ;-
हाथ कुसुम-वरदान,
   ख़ून की होली जो खेली।
आयी सुवेश बहार,
   आम-लीची की मंजरी;
कटहल की अरघान,
    ख़ून की होली जो खेली।
विकच हुए कचनार,
    हार पड़े अमलतास के ;
पाटल-होठों मुसकान,
    ख़ून की होली जो खेली।
( यह कविता ने निराला ने 1946 के स्वाधीनता संग्राम में विद्यार्थियों के देशप्रेम पर लिखी थी और यह गया से प्रकाशित साप्ताहिक 'उषा ' के होलिकांक में मार्च 1946 में प्रकाशित हुई)





होली पर विशेष - मार दी तुझे पिचकारी- निराला



 मार दी तुझे पिचकारी,
कौन री,रँगी छबि येरी ?

   फूल -सी देह,-द्युति सारी,
   हल्की तूल-सी सँवारी,
   रेणुओं -मली सुकुमारी,
   कौन री, रँगी छबि वारी ?

मुसका दी,आभा ला दी,
उर-उर में गूँज उठा दी,

  फिर रही लाज की मारी,
  मौन री रँगी छबि प्यारी।
( यह कविता इंदौर से प्रकाशित मासिक पत्रिका 'वीणा' के जून 1935 अंक में 'होली' शीर्षक से छपी थी)

होली पर विशेष- नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे - सूर्यकान्त त्रिपाठी ' निराला'



 नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे,खेली होली !
जागी रात सेज प्रिय पति सँग रति सनेह-रँग घोली,
दीपित दीप ,कंज छवि मंजु-मंजु हँस खोली-
                मली मुख-चुम्बन-रोली।

प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गयी चोली,
एक-वसन रह गयी मन्द हँस अधर -दशन अनबोली-
                      कली -सी काँटे की तोली।

मधु-ऋतु-रात,मधुर अधरों की पी मधु सुध-बुध खोली,
खुले अलक,मुँद गये पलक-दल,श्रम-सुख की हद हो ली-
                          बनी रति की छवि भोली।

बीती रात सुखद बातों में प्रात पवन प्रिय डोली,
उठी सँभाल बाल,मुख-लट,पट,दीप बुझा,हँस बोली
                      रही यह एक ठठोली।
(सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की यह कविता 'जागरण' ,पाक्षिक,काशी,22मार्च 1932 को होली शीर्षक से छपी थी )


मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

'निराला' ,सरस्वती,बसंत और नए की तलाश

                                           (महाकवि स्व.सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला')
आज खुशी के कई मौके हैं। महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्मदिन है, बसन्तपंचमी है और आज ही सरस्वती पूजा भी है। यह दिन कई अर्थ में महत्वपूर्ण है। यह नए के आह्वान का दिन है। हमारे समाज में नए के प्रति जो डर है,शंका है,संशय है,झिझक है उसको दूर भगाने का दिन है बसन्तपंचमी,यह नए के स्वागत का दिन है। आज के दिन हमारे परिवारों में सरस्वती पूजा होती है और शिक्षा,संस्कृति और सभ्यता के नए रूपों के आगमन की कामना की जाती है। निराला ने 'वर दे वीणावादिनी वरदे 'शीर्षक से बड़ी ही सुंदर कविता माँ सरस्वती पर लिखी है। आनंद लें-
    वर दे ,वीणावादिनी कर दे !
    प्रिय स्वतन्त्र-रव अमृत-मन्त्र नव
                भारत में भर दे !
    काट अन्ध -उर के बन्धन-स्तर
    बहा जननि ,ज्योतिर्मय निर्झर;
    कलुष -भेद-तम हर प्रकाश भर
            जगमग जग कर दे !

       नव गति,नव लय,ताल-छन्द नव,
   नवल कण्ठ ,नव जलद-मन्द्र रव;
   नव नभ के नव विहग-वृन्द को
             नव पर,नव स्वर दे !
  

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...