रवीन्द्रनाथ टैगोर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
रवीन्द्रनाथ टैगोर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 7 सितंबर 2016

मार्क्स-हेगेल के परे जाओगे तो रवीन्द्र को पाओगे

         रवीन्द्रनाथ टैगोर को अपना बनाने के चक्कर में आप यदि उनको मार्क्सवादी बनाएंगे तो दिक्कत होगी।हजारी प्रसाद द्विवेदी ने रवीन्द्र को रवीन्द्र रहने दिया।रवीन्द्र के विचार और अनुभूतियां खांटीं भारतीय हैं।रवीन्द्र की मूल भावभूमि है मानवीय अनुभूति।उसे आप मार्क्स,हेगेल,कांट,देरिदा के जरिए नहीं पा सकते।यही वह प्रस्थान बिंदु हैं जहां से आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने रवीन्द्रनाथ टैगोर से रस प्राप्त किया
।रवीन्द्र का विश्वदृष्टिकोण प्रमुख है।हम य़दि वह ग्रहण करते हैं तो शायद वे हमारे लिए आज भी प्रासंगिक हैं।इन दिनों प्रगति पर बहुत बहस है।रवीन्द्रनाथ टैगोर के लिए इसका क्या अर्थ है ॽ
साहित्य और समाज के प्रसंग में ´प्रगति´ का सवाल बेहद महत्वपूर्ण है।इसकी तरह-तरह की परिभाषाएं हो रही हैं।आज प्रगति का मतलब है सड़क,बिजली और पानी।लेकिन रवीन्द्रनाथ के जमाने में प्रगति का अर्थ था ´महान् परिवर्तनों की ओर अग्रसर होना´।एक जमाने में साम्यवाद की ओर अग्रसर होने को प्रगति कहा गया। इस दृष्टिकोण से अलगाते हुए रवीन्द्रनाथ के लिए प्रगति का अर्थ है ´नूतन दृष्टिकोण´।रवीन्द्रनाथ ने सामाजिक उत्पीड़न और रूढ़िवादिता के खिलाफ जमकर लिखा है, इस तरह की रचनाओं का प्रगति की धारणा से कोई संबंध नहीं है।सुशोभन सरकार के अनुसार ´सच तो यह है रवीन्द्रनाथ टैगोर का किसी आमूल परिवर्तनवादी कार्यक्रम में; किसी प्रशासनिक संस्था अथवा तंत्र में कोई निश्चित विश्वास न था।´

सुशोभन सरकार के अनुसार ´अंततःहम यही कहेंगे कि टैगोर की दार्शनिक आस्था उस विचार से मेल नहीं खाती जिसे हम आज ´प्रगति´कहते हैं।उनमें केवल भौतिकवाद विरोधी दार्शनिक आदर्शवाद ही नहीं पाया जाता बल्कि उनके चिंतन का सार-तत्व व्यक्तित्व में विश्वास करने में निहित है।उन्होंने मानव के सर्वतोमुखी विकास के आदर्शों की खोज की।उनकी ´दृष्टि´में ´´मनुष्य का धर्म´´स्वतःधर्म का आधार है। उनके अनुसार व्यक्तित्व का विकास ही सभ्यता का तात्पर्य है,जो आज की औद्योगिक प्रवृत्ति से आच्छन्न है।आज मशीन की उपासना के पीछे हमारा विषाद तथा थकावट भरी पड़ी है।कदाचित यही भाव´रक्त करवी´ के प्रतीक के रूप में निहित है।कवि ने व्यक्तित्व की धारणा में प्रगति को अंतर्निहित माना है।किंतु आज के युग में विशाल जनसमूह को ध्यान में रखते हुए व्यक्तिगत विकास की कल्पना अप्रासंगिक है।अतएव व्यक्तित्व को लक्ष्य बनाकर सामाजिक सुधार का विचार संशयपूर्ण हो जाता है।व्यक्तिगत विकास को वास्तविक मूर्त रूप देने के पूर्व हमें अपने सामाजिक ढांचे को बदलना होगा।´

यह सच है टैगोर ने बंगला भाषा,साहित्य,काव्यशैली और जनमानस पर अपनी रचनाओं के जरिए व्यापक प्रभाव डाला।नए परिवर्तनों को जन्म दिया।इसी प्रसंग में यह सवाल उठा कि टैगोर के लेखन से किसतरह की संस्कृति प्रभावित हुई और किस तरह की संस्कृति ने जन्म लिया ॽ इस प्रसंग में सबसे पहले हमें इस सवाल पर विचार करना होगा कि बुर्जुआ संस्कृति का टैगोर युगीन परिदृश्य किस तरह का था ॽटैगोर ने जिन नए परिवर्तनों को जन्म दिया वे परिवर्तन किस तरह के थे ॽ उस जमाने में बुर्जुआ संस्कृति भयाक्रांत थी।भविष्य के भय से त्रस्त थी।इसके कारण बुर्जुआ संस्कृति में अपंग भाव था।टैगोर ने इस अपंग और भयाक्रांत भावबोध के खिलाफ निडर होकर लिखा,वे पूर्व धारणाओं से टकराने से डरते नहीं थे,भविष्य कों लेकर भी संशय में नहीं थे।दूसरा संस्कृति के संकुचित दायरों को उन्होंने हमेशा तोड़ा।उन दिनों बुर्जुआजी संस्कृति रह-रहकर सीमित दायरों की ओर लौट रही थी।एक खास किस्म का संकीर्णतावाद व्यक्त हो रहा था,टैगोर ने इसे खुली चुनौती दी।यह चुनौती भाषा,शैली और सौंदर्यानुभूति के स्तर पर दी गयी।

टैगोर ने ´रूस के पत्र´में बुर्जुआ व्यवस्था और संस्कृति के ह्रासशील पहलुओं की चर्चा करते हुए लिखा है ´आधुनिक राजनीति की प्रेरणा-शक्ति वीर्याभिमान नहीं,धन का लोभ है-यह तत्त्व हमें ध्यान में रखना ही होगा।´टैगोर ने पूंजीवाद को ´वैश्ययुग´ की संज्ञा दी है और इसकी आदिम भूमिका को ´दस्युवृत्ति´ कहा। यह भी लिखा ´आज के युग में लोभ-प्रवृत्ति ने समाज को आलोड़ित करके उसके सारे बन्धन शिथिल और विच्छिन्न कर दिए हैं।´ टैगोर को रूस इसलिए अच्छा लगा क्योंकि वहां के समाज ने लोभ का तिरस्कार किया।उन्होंने लिखा ´रूस में जब मैंने लोभ को तिरस्कृत देखा,मुझे इतना आनन्द हुआ जितना शायद किसी अन्य देश के निवासी को न होता।लेकिन मूल तथ्य को भुलाया नहीं जा सकता;केवल भारत में ही नहीं,समस्त पृथ्वी पर जहाँ भी विपत्तियों का जाल फैलाया गया वहाँ लोभ की ही प्रेरणा ने काम किया है-लोभ के साथ संशय रहे हैं,और लोभ के पीछे अस्त्र-सज्जा रही है,मिथ्या ,निष्ठुर राजनीति रही है।´



बुर्जुआ व्यवस्था का चरमोत्कर्ष तानाशाही में अभिव्यक्त हुआ है,इस प्रवृत्ति की आलोचना करते हुए टैगोर ने लिखा ´डिक्टेटरशिप का प्रश्न भी उठता है।मैं व्यक्तिगत रूप से किसी भी विषय में नेताशाही पसन्द नहीं करता।क्षति या दंड का भय दिखाकर या भाषा-भंगिमा –व्यवहार से अपनी जिद व्यक्त करके मत-प्रचार का मार्ग प्रश्स्त करने की चेष्टा मैं अपने कर्मक्षेत्र में कभी नहीं कर सकता।इसमें सन्देह नहीं कि एक-नायकत्व में बहुत-सी विपत्तियाँ हैं।उसकी एकरूपता और नित्यता अनिश्चित होती है; चालकों और चलितों की इच्छा में योग-साधन न होने से क्रान्ति की संभावना सदा बनी रहती है।इसके अलावा किसी दूसरे से चलाए जाने का अभ्यास चित्त और चरित्र को दुर्बल बनाता है।एकनायकत्व जहाँ भी हो-शास्त्र में,गुरू में,या राष्ट्र-नेता में,उससे मनुष्यत्व की हानि होती है।´

रविवार, 9 मई 2010

महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जयन्ती पर विशेष- अकुंठ मानव का खुला आसमान-2- अरुण माहेश्वरी

      सवाल उठता है कि आखिर यह पीराली क्या बला है? अगर हम इसकी तह में जाए तो भारतीय समाज में जातियों के उद्भव और विकास के अपने एक बेहद रोचक और उतने ही यातनापूर्ण आख्यान के सूत्रों को भी पकड़ पायेंगे। किसका किससे मेल होने अथवा कौन सा पेशा अपना लेने पर जातिगत पैमाने पर कौन क्या होता रहा है, इसकी सचमुच अपने आप में एक अनोखी दास्तान है। लेकिन जातियों के विभाजन की यह निरंतर प्रक्रिया ही वर्ण व्यवस्था के अंदर की किंचित गतिशीलता का भी एक प्रमुख कारण रही है। पीरालीभी, कहते हैं, ऐसे ही एक खास प्रकार के मेलजोल और वहिष्कारनिष्काशन का परिणाम था। इसमें बहुत कुछ समाज के पंडे बने ब्राह्मणों की मनमर्जी का परिणाम भी रहा है। खास तौर पर यवनों के संपर्क में आने के कारण कुछ परिवारों को समाज के इन पंडों ने सम्मान का स्थान दिया, तो इसी कारण से कुछ को पूरी तरह से समाज से वहिष्कृत करके पतित करार दिया। पीरालीभी ऐसे ही पतित ब्राह्मणों में एक थे। पीराली ब्राह्मण की उत्प​त्‍ति‍ के बारे में कहा जाता है कि तुर्कों के शासन के दिनों में खान जहां अली नामका एक व्यक्ति दक्षिण बंगाल के सुंदरीवन (आज के बांग्लादेश के खुलना के सुंदरवन) में उपनिवेश कायम करने की सनद लेकर आया था और इसी सनद पर उसे चेंगुटिया परगना की जमींदारी मिली। इन खान जहां के पास ताहेर नामका एक व्यक्ति आया जो पहले ब्राण था, लेकिन एक मुसलमान महिला के प्रेम में पड़के इस्लाम धर्म को कबूल कर लिया था। वह नवद्वीप के निकट के पिरलिया अथवा पिरल्या गांव का निवासी था। पिरल्या गांव का निवासी होने के नाते लोग उसे पिरल्या खां कह कर पुकारने लगे। ताहेर कार्यपटु और दक्ष व्यक्ति था, इसीलिये खान जहां ने उसे दीवान बना कर जसहोर बुला लिया था। इसी ताहेर के यहां उपरोक्त दक्षिणानाथ के दो बेटे कामदेव और जयदेव प्रमुख कर्मचारी के पद पर नियुक्त हुए।
कहते हैं कि एक दिन रोजा के समय ताहेर उर्फ‍ पीरअली एक नींबू की सुगंध ले रहा था। उसी समय कामदेव ने मजाक में कहा कि शास्त्रों के अनुसार गंध लेना आधे भोजन के समान है। इसीलिये आपका रोजा टूट गया है। ताहेर मुसलमान होने पर भी ब्राह्मण की संतान था। वह कामदेव के मजाक को फौरन समझ गया, लेकिन उसने विरोध में एक शब्द भी नहीं कहा। इसके बाद एक दिन उसने एक मजलिस बुलाई जिसमें ब्राह्मणों सहित तमाम जाति के लोगों को आमंत्रित किया था। इस जलसे में चारों ओर से मुगलाई खाने की गंध फैली हुई थी, जिसे हिंदू सहन नहीं कर पारहे थे। कई लोग कपड़े से नाक को ढक कर बाहर निकल गये। लेकिन चालाक पीरअली ने कामदेव और जयदेव को पकड़ लिया और कहा कि सुगंध से यदि आधा भोजन हो जाता है तो निश्चित तौर पर गोमांस की गंध लेकर तुमने अपनी जाति गंवा दी है। इन दोनों भाइयों ने भागने की कोशिश की, लेकिन पीरअली के लोगों ने उन्हें दबोच कर उनके मूंह में उस प्रतिबंधित मांस को ठूस दिया और इसप्रकार, वे दोनों ही जातिच्युत होगये। इसके बाद से ही कामदेव को कमाल खान और जयदेव को जमाल खान के नाम से जाना जाने लगा। पीरअली ने दोनों को जागीर भी दिलवा दी। पीरअली की उस महफिल में और भी जो लोग उपस्थित थे, उनके दुश्मनों ने उन्हें पीरालीघोषित करके समाज से निकाल दिया। उनमें से भी जिनके पास रुपयों की ताकत थी, वे तो समाज के पंडों की कृपा से फिर से जाति में वापस आगये, और जो किसी भी वजह से इन पंडों को खुश नहीं कर पायें वे पीरालीबन कर समाज से वहिष्‍कृत रहे।
कामदेव, जयदेव के दो अन्य भाई रतिदेव और शुकदेव रायचौधुरी अपने दक्षिणडीही के घर में रहते थे। रतिदेव ने समाज के अत्याचारों से दुखी होकर गांव छोड़ दिया। शुकदेव को भी भारी कष्ट उठाने पड़े। नाना छलचतुराई से शुकदेव ने अपनी बेटी और भतीजी का ब्याह किया। बेटी का विवाह एक श्रेष्ठ श्रोत्रिय जाति के नौजवान, पीठाभोग के जमींदार जगन्नाथ कुशारी से किया और भतीजी का विवाह फुलिया के एक मुखुटी से कर दिया। एक पतित ब्राह्मण परिवार में विवाह करने के कारण जगन्नाथ को उसके कुटुंब और जाति से वहिष्‍कृत कर दिया गया और वह पीठाभोग के बजाय दक्षिणडीही में अपने ससुराल में रहने लगा। शुकदेव ने अपने जंवाई को पूरी इज्जत बख्शी और आज के बारोपाड़ा नरेन्द्रपुर गांव के उार में उारपाड़ा नामका एक गांव उसे दान में दे दिया। इसप्रकार शुकदेव की भतीजी और बेटी के विवाह से ब्राणों की पीरालीशाखा चल पड़ी।
कहा जा सकता है कि बंगाल के ठाकुर परिवार के आदिपुरुष ये जगन्नाथ कुशारी महाशय ही थे जो अपने ब्याह के चलते पीराली समाज में शामिल होगये थे। जगन्नाथ के दूसरे बेटे पुरुषोत्‍तम से ठाकुर वंश की परंपरा चली। पुरुषोत्‍तम के पोते रामानंद के दो बेटे महेश्वर और शुकदेव के समय से यह ठाकुर परिवार कोलिकाता निवासी होगया।
इस बारे में कहानी यह है कि जाति के कारण झेल रहे अपमान की वजह से ही महेश्वर और शुकदेव अपने गांव बारोपाड़ा से निकल कर कोलिकाता गांव के दक्षिण में गोविंदपुर में आकर बस गये। तब तक अंग्रेजों को गोविंदपुर, सुतानाटी और कोलिकाता नामक तीन गांवों की सनद मिल चुकी थी। अंग्रेजों के वाणिज्यिक जहाज इसी गोविंदपुर की गंगा में ही आकर लगा करते थे।  उन दिनों कोलिकाता और सूतानाटी में सेठ बसाक नामके एक प्रसिद्ध व्यापारी हुआ करते थे। अंग्रेज कप्तानों के इन जहाजों से मालअसबाब की ढुलाईलदाई और खानेपीने की व्यवस्था का काम पंचानन कुशारी किया करते थे। इन सभी मेहनत के कामों में स्थानीय हिंदू समाज की तथाकथित निम्न जातियों के लोग उनके लिये काम करते थे। ये लोग एक ब्राह्मण भले आदमी को उसके नाम से पुकारने में हिचकते थे, इसीलिये वे पंचानन को ठाकुर मोशायकह कर पुकारने लगे। इसीसे जहाज के कप्तान उसे पंचानन ठाकुर के नाम से जानने लगे। अपने कागजातों में उन्होंने उसके नाम के साथ Tagore, Tagoure लिखना शुरू कर दिया और इसप्रकार कुशारीपदवी का स्थान ठाकुरपदवी ने ले लिया।
पंचानन ठाकुर के दो बेटे हुए जयराम और रामसंतोष तथा शुकदेव के एक बेटा, कृष्णचंद्र। अंग्रेज व्यापारियों से तीनों ने थोड़ी अंग्रेजी सीखी। इसके अलावा उन दिनों फ्रेंच भाषा का भी अच्छाखासा चलन था। 1742 में कोलिकाता की पैमाईश का काम शुरू हुआ और जयराम तथा रामसंतोष अमीन के पद पर नियुक्त होगये। इसी कारण से खुलना में इनका पैतृक निवास अमीन का निवासके नाम से प्रसिद्ध है। उसी समय कंपनी ने फोर्ट विलियमके निर्माण का काम शुरू किया था। सरकार के जिस विभाग को निर्माण का यह काम सौंपा गया था, जयराम उस विभाग से जुड़े हुए थे। फोर्ट विलियमकी इस इमारत को बनाने में तब बेशुमार पैसा खर्च हुआ था और इसके पूरा होने में भी अनुमान से काफी ज्यादा समय लगा था। कहते है कि उन दिनों कंपनी के अधिकारियों से लेकर साधारण गुमाश्ते तक में ईमानदारी नामकी कोई चीज नहीं हुआ करती थी और फोर्ट विलियमकी इमारत को बनाने में चीफ इंजीनियर से लेकर सरदार मिस़्त्री तक सबने काफी धन कमाया था। जयराम ने इस काम में क्या कमाया इसके बारे में कोई पक्की जानकारी न होने पर भी यह सच है कि उन्होंने उसी काल में धनसाय (आज के धर्मतल्ला, शहीद मीनार) में मकान बनाया, जमीनें खरीदी और फोर्ट विलियम्स के पास ही गंगा के तट पर एक बगान बाड़ी बनायी। वे जब मरे तब धनसंप​िा के लिहाज से काफी अच्छे थे। जयराम ठाकुर के तीन बेटे थे नीलमणि, दर्पनारायण और गोविंदराम। उन्होंने अपने बड़े बेटे आनंदीराम को त्याग दिया था, जिसके दो बेटे थे।
कोलिकाता पर जब सिराजुद्दौल्ला ने हमला किया तब जयराम ने अपनी चल संप​िा, सोने के गहनों आदि को फोर्ट विलियम्स में जमा करा दिया था। उस हमले में धनसाय के घर को भी कोई नुकसान नहीं पंहुचा था। 1756 में जयराम की मृत्यु के थोड़े दिनों बाद ही नीलमणि आदि ने अपने पूर्वजों की धनसाय की संप​त्‍ति‍ को 5 हजार रुपयों में बेच दिया। 1757 में पलाशी की लड़ाई के बाद मीरजाफर अलि खां बंगाल सूबे के नवाब बने और सिराजुद्दौल्ला के हमले से हुई शहर की तबाही के मुआवजे के तौर पर उन्होंने ब्रिटिश कम्पनी को भारी रकम अदा की। उसी कोष में से ड्रेक साहब ने जयराम अमीन के बेटों को छ: हजार रुपये दिलवा दिये। जयराम के बेटों के पास इससे कुल 13 हजार रुपये की नगद संप​त्‍ति‍ होगयी। 1764 में इन्हीं बेटों ने कोलिकाता गांव के पाथुरियाघाटा क्षेत्र में जमीन खरीद कर अपना घर बनाया और 13 हजार रुपयों से कंपनी के कागजात खरीद कर अपने गृहदेवता श्रीश्री राधाकांत जीओ के नाम से एक धर्मादा खाता तैयार कर दिया। इन रुपयों पर मिलने वाले ब्याज से देवपूजा के खर्च की व्यवस्था होती थी। 
नीलमणि और दर्पनारायण अपने पाथुरियाघाट के आवास के दिनों में साहबों के दीवान बन गये। बड़े भाई दर्पनारायण तो घर पर रह कर पुरखों की संप​त्‍ति‍ को सम्हाले हुए थे। छोटा भाई नीलमणि कमाई के लिये कलकत्‍ते के बाहर निकल गया। उसने पहले एक जिला अदालत में अधीनस्थ अमले के रूप में काम किया और धीरेधीरे सेरिस्तदार के पद तक चला गया। उन दिनों कोई भी देशी आदमी सरकार में इससे बड़े पद की उम्मीद नहीं कर सकता था। इसके अलावा, तब धन होने मात्र से समाज में मान नहीं मिलता था। कोलिकाता में पैसेवालों को बाबूकहा जाता था। कुलीनों की जमात में जगह तभी मिलती थी जब किसीके पास जमींदारी हो। नीलमणि ने सेरिस्तदार के पद पर रहते हुए जो कमाई की उसीसे ठाकुर परिवार में वस्तुत: जमींदारी का श्रीगणेश किया। उनकी अगली पीढ़ी के राममणि ने भी उड़ीसा में थोड़ी जमींदारी खरीदी; फिर उनके भाई राम वल्लभ ने उसमें और संप​त्‍ति‍ जोड़ी। लेकिन जिसे वास्तव में जमींदार का ओहदा कहते है, वह सम्मान नीलमणि के पोते, द्वारकानाथ को ही मिला।
बहरहाल, पाथुरियाघाट का संयुक्त परिवार एकदिन टूट गया। इसके मूल में संप​त्‍ति‍ का मसला था। नीलमणि बाहर से हर महीने अपने बड़े भाई को अपनी बचत से रुपये भेजा करता था। लेकिन जब वह सरकारी सेवा से निवृत्‍त्त हुआ, तब इन्हीं रुपयों के हिसाब को लेकर दोनों भाइयों के बीच मनमुटाव होगया। बाद में समझौता हुआ तो नीलमणि एक लाख रुपया नगद लेकर पाथुरियाघाट का मकान और धर्मादे की संप​ति‍ छोड़ अपने छोटे भाई से अलग होगये। नीलमणि ने जोड़ाबगान के कर ब्राण वैष्णवचरण सेठ से जोड़ासांकू में घर बनाने के लिये एक बीघा जमीन ली और सन् 1784 के जून महीने से उनका परिवार वहीं जाकर रहने लगा। कहा जाता है कि चूंकि नीलमणि खुद पक्के ब्राण थे, इसीलिये वैष्णव सेठ ने उन्हें बहुत मामूली कीमत पर जोड़ासांकू की जमीन दे दी थी। वैष्णव सेठ किस प्रकार के ब्राण थे, यह अकेले इस तथ्य से जाना जा सकता है कि वे कलको में शुद्ध गंगा जल के संरक्षक माने जाते थे और उसके सबसे बड़े निर्यातकर्ता थे। कलको से बाहर जहां गंगा जल नहीं मिलता था, वहां गंगा जल से भरे उन्हीं घड़ों को शुद्ध माना जाता था, जिन पर वैष्णव सेठ की मोहर लगी होती थी। बहरहाल, रवीन्द्रनाथ ठाकुर को जिस जोड़ासांकू के ठाकुर परिवार से जोड़कर हम देखते हैं, उस परिवार की परंपरा इसी जोड़ासांकू के मकान से शुरू हुई थी। अर्थात, जयराम ठाकुर के दूसरे बेटे नीलमणि ठाकुर को जोड़ासांकू के ठाकुर परिवार का आदिपुरुष, उत्स कहा जा सकता है।
नीलमणि के तीन बेटे और एक बेटी थी : रामलोचन, राममणि, रामवल्लभ, और कमलमणि। नीलमणि की अपनी सामाजिक और आर्थिक प्रतिष्ठा के चलते उन्होंने अपनी बेटी का विवाह तो एक आस्थावान हिंदू परिवार में कर दिया लेकिन बेटों की शादी पीराली समाज में ही करनी पड़ी।
नीलमणि के बाद ठाकुर परिवार के मुखिया बने रामलोचन। उनकी अपनी कोई संतान न होने के कारण उन्होंने अपने भाई राममणि के बेटे द्वारकानाथ को गोद ले लिया। राममणि ने दो शादियां की थी। पहली पत्नी मेनका देवी से राधानाथ, जावी देवी, रासविलासी और द्वारकानाथ पैदा हुए तथा दूसरी पत्नी दुर्गामणि से रमानाथ और सरस्वती देवी का जन्म हुआ। रामलोचन अपने जमाने के एक संभ्रांत भद्रजन थे। प्रभातकुमार मुखोपाध्याय के शब्दों में अपनी वेशभूषा के ढंग, सांध्यभ्रमण, संगीत प्रेम आदि तत्कालीन कुलीनों के लक्षण उनमें दिखाई देते थे।

कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जयन्ती पर विशेष- दीन-हीन मनुष्य का सम्मान पद है धर्म -1-

(महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर)
  (हम रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जयन्ती को नया जमाना पर पूरे साल मनाएंगे। इस साल हिन्दी के भी कई महान लेखकों के जन्म शताब्दी समारोह पूरे साल चलेंगे। हम लगातार साहित्य की महान विभूतियों को स्मरण करते हुए अपने सामयिक युग , उनके साहित्य और विचारों का नया मूल्यांकन करने की कोशिश करेंगे। आज यहां इस लेख में रवीन्द्रनाथ टैगोर के विचारों की रोशनी में धर्म का मूल्यांकन कर रहे हैं। 
    एक अन्य लेख सरला माहेश्वरी का दे रहे हैं जिसमें रवीन्द्रनाथ टैगोर को समग्र परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित किया गया है। तीसरा लेख अरुण माहेश्वरी ने लिखा है जिसमें सिलसिलेबार ढ़ंग से रवीन्द्रनाथ टैगोर के व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रियाओं का विस्तार से सामयिक समस्याओं के संदर्भ में विश्लेषण किया गया है। )
       हिंदी के बुद्धि‍जीवि‍यों में धर्म 'इस्‍तेमाल करो और फेंको' से ज्‍यादा महत्‍व नहीं रखता। अधि‍क से अधि‍क वे इसके साथ उपयोगि‍तावादी संबंध बनाते हैं। धर्म इस्‍तेमाल की चीज नहीं है। धर्म मनुष्‍यत्‍व की आत्‍मा है। मानवता का चरम है। जि‍स तरह मनुष्‍य के अधि‍कार हैं ,लेखक के भी अधि‍कार हैं,वैसे ही धर्म के भी अधि‍कार हैं।धर्म और कलाएं मनुष्‍य के लि‍ए हैं। मनुष्‍य के बाहर इनका कोई अस्‍ति‍त्‍व नहीं है।
      एक जगह कथाकार उदयप्रकाश ने सही रेखांकि‍त कि‍या है कि‍ हमने धर्म की इकहरी और उपयोगितावादी भूमि‍का पर ही ज्‍यादातर समय ध्‍यान केन्‍द्रि‍त कि‍या है। धर्म के मर्म को कभी समझने का प्रयास ही नहीं कि‍या। धर्म का उपयोगि‍तावाद कब से जीवन में आया यह ठीक ठीक बताना संभव नहीं है। धर्म का स्‍थान उपयोगि‍ता में नहीं मनुष्‍यत्‍व में है।‍
     उदयप्रकाश ने लि‍खा है '' सचमुच धर्मकहते ही हम स्वयं को उस प्रदूषित अवधारणा के बीचों-बीच पाते हैं, जिसे हमारे समय और निकट अतीत की राजनीति, सत्ता, पूंजी और मीडिया ने चौतरफा पैदा किया है।''         
      धर्म पर कोई भी बहस उपयोगि‍तावादी फ्रेमवर्क में नहीं की जा सकती। यह बहस का सीमि‍त दायरा है। धर्म को जब तक मनुष्‍य के अन्‍मर्ग्रथि‍त हि‍स्‍से के रूप में नहीं देखेंगे, मनुष्‍यत्‍व के नि‍र्माण के प्रकल्‍प के रूप में नहीं देखेंगे, धर्मवि‍ज्ञान के नजरि‍ए से नहीं देखेंगे,एक सर्जक के हृदय की नजर से जब तक नहीं देखेंगे तब तक धर्म के मर्म को पकडना संभव नहीं है।
      रवीन्‍द्रनाथ टैगोर आधुनि‍क धर्मनि‍रपेक्ष लेखक थे। अनेक मामलों में उनकी समझ अपने युग के सभी वि‍चारकों ,आलोचकों ,रचनाकारों और कला मनीषि‍यों के वि‍चारों की सीमाओं को भेदती हुई मनुष्‍यत्‍व के मर्म तक गयी है। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर का जि‍क्र इसलि‍ए भी जरूरी है कि‍ उन्‍होंने एक परंपरा भी बनायी थी,जि‍से हिंदी वाले दूसरी परंपरा कहते हैं।
       इस परंपरा में धर्म के बारे में रवीन्‍द्रनाथ के जो वि‍चार हैं,वे हम सभी लेखकों, बुद्धि‍जीवि‍यों,राजनीति‍ज्ञों आदि‍ के लि‍ए जानना बेहद जरूरी हैं। मैं अभी तक समझ नहीं पाया कि‍ रवीन्‍द्रनाथ के धर्म संबंधी वि‍चारों का हिंदी लेखकों पर प्रभाव क्‍यों नहीं पड़ा,जो रवीन्‍द्र परंपरा के हिंदी में उत्‍तराधि‍कारी हैं ,उन पर इस परंपरा का हजारीप्रसाद द्वि‍वेदी के बाद असर क्‍यों नहीं पड़ा ?
     रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने एक व्‍याख्‍यान ब्रह्मसमाज में 26 जनवरी 1912 को दि‍या था,इस व्‍याख्‍यान का शीर्षक था 'धर्म का अधि‍कार' प्रत्‍येक भारतीय को यह लेख पढना चाहि‍ए। धर्मनि‍रपेक्ष हिंदी लेखकों खासकर प्रगति‍शीलों को तो जरूर पढना चाहि‍ए।
     रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने लि‍खा है '' जि‍न महापुरूषों की वाणी आज तक पृथ्‍वी पर अमर है उन्‍होंने कभी दूसरों के मन को खुश करते हुए अपनी बात कहना नहीं चाहा।वे जानते थे कि‍ मनुष्‍य अपने मन से कहीं बड़ा है- मनुष्‍य अपने को जो समझता है वहीं उसकी समाप्‍ति‍ नहीं है। इसीलि‍ए महापुरूषों ने अपना दूत सीधे मनुष्‍यत्‍व के राज-दरबार में भेजा; बाहरी दरवाजे के चौकीदार को मीठी बातों से प्रसन्‍न करके अपने काम का मूल्‍य नष्‍ट नहीं कि‍या।''
       धर्म के खि‍लाफ बोलना बहुत आसान है। धर्म के उपयोगी रूपों की हि‍मायत में पोंगापंथि‍यों,पंडि‍तों,महंतों आदि‍ की तरह बोलना और भी आसान है। लेकि‍न धर्म को मनुष्‍यत्‍व के नि‍र्माण के उपकरण के रूप में व्‍याख्‍यायि‍त करना बेहद मुश्‍कि‍ल काम है।
     जि‍न लोगों ने धर्म की आलोचना की ,धर्म का शोषण कि‍या उन सभी के वि‍चारों का समाज में आज क्‍या स्‍थान है ? इस तरह के लोग सैंकडों सालों से धर्म के बारे में लि‍ख रहे हैं। उनके वि‍चार आज कहीं पर भी प्रभाव छोडते नजर नहीं आते।
      जि‍नके लि‍ए धर्म मर चुका था, धर्म पोंगापंथ था,जनता के लि‍ए अफीम था। वे भी गुमनामी में जा चुके हैं। धर्म अभी भी सीना ताने खड़ा है। राज्‍य का धर्मनि‍र्मूल करने के लि‍ए जि‍न्‍होंने इस्‍तेमाल कि‍या आज वे कहां हैं ? धर्म कहां है ? इसे सहज ही अपनी आंखों से देख सकते हैं। धर्म के उपदेश असाध्‍य प्रतीत होते हैं। लेकि‍न सच्‍चा मनुष्‍य वही है जो असाध्‍य की साधना करता है। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर लि‍खा है '' स्‍वल्‍पमप्‍यस्‍य धर्मस्‍य त्रायते महतो भयात्'' अर्थात् अल्‍प-मात्र धर्म महाभय से रक्षा कर सकता है।
       हिंदी में लेखकों के लीक से भि‍न्‍न वि‍चारों को, महान वि‍चारों को हमने कभी सम्‍मान की नजर से नहीं देखा। हिंदी लेखक बनि‍ए की गणि‍त लगाकर लि‍खता है,वह सच बोलते हुए हि‍चकता है । उसने लंबे समय से सच बोलना बंद कर दि‍या है। हिंदी लेखक ने सच बोलना जब से बंद कि‍या है । तब से हिंदी में वि‍चारों की कंगाली आ गयी है।
       हिंदी लेखक लि‍खता खूब है कि‍ लेकि‍न मायावी संसार पर लि‍खता है। सत्‍य पर नहीं लि‍खता। यही वजह है कि‍ वह अंत में 'तू-तू मैं -मैं' करने लगता है। दुश्‍मनी ठान लेता है। इस प्रक्रि‍या में वह सोचता है महान हो गया ,लेकि‍न होता एकदम उल्‍टा है हिंदी लेखक महान होने की बजाय ओछा होता चला गया है। एक दूसरे को नीचा दि‍खाना, नुकसान पहुंचाना, फतवे जारी करना,सृजन नहीं है। यह तो वि‍ध्‍वंस है। मनुष्‍यत्‍व से पतन है।
     भारतीय मार्क्‍सवादी जानते हैं मार्क्‍सवाद के वि‍कास के लि‍ए जि‍स एकांत साधना और ज्ञान के उच्‍चधरातल की जरूरत है वह उनके पास नहीं है। मार्क्‍सवाद सेमीनार और संगठनों की शाखाओ में पैदा नहीं हुआ था। महापुरूषों के वि‍चार अन्‍तरसाधना से पैदा होते हैं बाह्य साधना से पैदा नहीं होते।
     जब भी कोई वि‍चार,शास्‍त्र,दर्शन,राजनीति‍क दर्शन,राजनीति‍क एक्‍शन ,साहि‍त्‍य आदि‍ में भेद का शास्‍त्र बन जाता है तो वह अपने को बौना बना लेता है। मार्क्‍सवाद को हमने एक-दूसरे को बौना दि‍खाने के अस्‍त्र के रूप में इस्‍तेमाल कि‍या और स्‍वयं बौने बनते चले गए।
    भारत में धर्म के वि‍चारकों ने भेद के सभी कि‍स्‍म के रूपों की मुखालफत की है। उन्‍होंने सत्‍य को छोटा करके नहीं देखा है। सत्‍य को दैनंन्‍दि‍न प्रयोजनों से दूर रखकर चर्चा की है। सत्‍य को हमारे हिंदी आलोचकों और अध्‍यापकों ने प्रयोजन के खूंटे से बांध दि‍या है। सत्‍य को हमने समझा नहीं है सत्‍य के साथ हमने समझौते कि‍ए हैं। सत्‍य के साथ समझौतों का ही दुष्‍परि‍णाम है कि‍ आज हम डरपोक और आत्‍मवि‍श्‍वासवि‍हीन हो गए हैं। हमारी आत्‍मा को कोई लल्‍लू-पंजू वि‍चारक,आलोचकलेखकराजनेता अपहृत कर लेता है।
     धर्म के बारे में हमारी कभी भी सही समझ नहीं रही है। हमने पूजा-पाठ को ही धर्म मान लि‍या है। धर्म के आलोचकों ने इसी को धर्म मानकर इस पर वैचारि‍क हमला बोला है। भारत के धर्मनि‍रपेक्ष और मार्क्‍सवादी वि‍मर्श की यह सीमा है। धर्म पर मार्क्‍सवादि‍यों ने प्रयोजन के दायरे के परे जाकर कभी वि‍चार ही नहीं कि‍या। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने लि‍खा है '' जो मनुष्‍य ब्रह्म को न जानकर केवल जप-तप में समय काटता है, 'अन्‍तवदेवास्‍य तद्भवति '- उसका सारा जप-तप नष्‍ट हो जाता है।''
    रवीन्द्रनाथ टैगोर पर महात्मा बुद्ध का गहरा असर था।  गौतम बुद्ध की समस्‍त साधना का मूलाधार है सत्‍य की खोज। सत्‍य को पाने की आकांक्षा का ही सुपरि‍णाम है कि‍ आज मानव सभ्‍यता इतने ऊंचे धरातल तक अपने को वि‍कसि‍त कर पायी है। सत्‍य की खोज ही वह बिंदु है जहां पर लेखक भी मनुष्‍यत्‍व के वि‍कास में अपना महत्‍वपूर्ण योगदान करता है। लेखक के पास सत्‍य न हो तो लेखक नहीं बन सकता। मनुष्‍यता की कुंजी सत्‍य के पास है अन्‍य कि‍सी के पास नहीं है।
     रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने लि‍खा है '' धर्म में ही मनुष्‍य का श्रेष्‍ठ परि‍चय मि‍लता है। धर्म का मनुष्‍य पर जि‍स मात्रा में अधि‍कार होता है उसी के अनुसार मनुष्‍य अपने आपको पहचानता है। सम्‍भव है कोई व्‍यक्‍ति‍ राजपुत्र होने पर भी अपने आपको भूल जाय। लेकि‍न देश के लोगों की ओर से बार-बार ताकीद की जानी चाहि‍ए। उसके पैतृक गौरव की याद दि‍लाना आवश्‍यक है ; उसे लज्‍जि‍त करना,यहां तक कि उसे दण्‍ड देना भी आवश्‍यक हो सकता है।लेकि‍न उसे मूर्ख कहकर समस्‍या को आसान करने की कोशि‍श वृथा है। यदि‍ वह मूर्ख की तरह व्‍यवहार करे तो भी सत्‍य को उसके सामने स्‍थि‍र करके रखना है। इसी तरह धर्म मनुष्‍य से कहता है: 'तुम अमृत के पुत्र हो,यही सत्‍य है'।‍ धर्म मनुष्‍य को कि‍सी तरह राह भूलने नहीं देता कि‍ 'मनुष्‍य' शब्‍द से कि‍तनी बड़ी -बड़ी बातों का बोध होता है। यही धर्म का प्रधान कार्य है।''
     रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने यह भी लि‍खा , '' शरीर के लि‍ए जैसे मस्‍ति‍ष्‍क है वैसे ही मानव समाज के लि‍ए धर्म है।धर्म का आदर्श ही मानव-प्रकृति‍ को अन्‍दर -अन्‍दर से सारी वि‍कृति‍यों के वि‍रूद्ध लडाई करने के लि‍ए प्रवृत्‍त करता रहता है।''
   जो लोग आए दि‍न धर्म की आलोचना करते हैं,उन्‍हें ध्‍यान में रखकर रवीन्‍द्रनाथ ने लि‍खा था '' हि‍साब-कि‍ताब करके धर्म को छोटा नहीं बनाया जा सकता , कोई उसे कि‍सी परि‍माण में माने या न माने, उसी को एकमात्र 'मानवीय' बताकर पूर्ण रूप से सामने रखना होगा।''

महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जयन्ती पर विशेष- अकुंठ मानव का खुला आसमान-1- अरुण माहेश्वरी



(महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर)
19वीं सदी के बंगाल के किसी महापुरुष की जिंदगी में झांके और उसके कुलगोत्र का जिक्र न हो, यह कैसे संभव है? इसकी वजह यह नहीं कि किसी भी हिंदू धर्मावलंबी महापुरुष का जीवन चरित उसके कुलगोत्र की गहराइयों में जाए बिना नहीं समझा जा सकता है। यहां हमारा जोर 19वीं सदी, अर्थात भारत में अंग्रेजी राज के स्थिर होने की सदी, पर है ।
वर्ण व्यवस्था तो हिंदुओं में हजारों सालों से चली आ रही है। जाति विभाजन की निरंतर प्रक्रिया से उसके अंदर की गतिशीलता को भी इधर के इतिहासकारों ने पहचाना हैं। लेकिन दिलचस्प है इस प्राचीन व्यवस्था में अंग्रेजी शासन के योग का फल। प्राचीन पश्चिमी समाज में भले ही वर्ण  व्यवस्था की तरह की कोई चिरंतर व्यवस्था न रही हो, लेकिन 19वीं सदी के आधुनिक काल में पश्चिम का शासक वर्ग एक खास प्रकार के जातिवाद (नस्लवाद) के सिद्धांत पर प्रयोग कर रहा था। विभिन्न समुदाय के लोगों की चमड़ी और आंख की पुतली के रंग, उनके ललाट और मस्तक के माप आदि के कथित वैज्ञानिक तौर तरीकों से इस सिद्धांत का ईजाद किया था और उसी के जरिये समाज तथा शासन के क्रमविन्यास में विधि ने किसके लिये कौन सी जगह तय की है, इसे अनंत काल के लिये स्थिर कर देने का उन्होंने बीड़ा उठाया था। वे नस्ल (जाति)( Race) को इतिहास की कुंजी मानते थे।

कहना न होगा कि इस देश में ब्रिटिश शासन के पैर जमाने के साथ ही अंग्रेजों की इसी वैज्ञानिकखुराफात के प्रयोग ने इस समाज पर कम रंग नहीं दिखाया। भारत में 1901 की जनगणना का आयुक्त राबर्ट रिस्ले कहता है,  जाति भावना ... इस सचाई पर आधारित है कि उसे वैज्ञानिक विधि से परखा जा सकता है; कि उससे किसी भी जाति को संचालित करने वाले सिद्धांत की आपूर्ति होती है; कि यह शासन के सर्वाधिक आधुनिक विकास को आकार देने के लिये गल्प अथवा परंपरा के रूप में कायम रहती है; और अंत में उसका प्रभाव उसके द्वारा समर्थित खास स्थिति को तुलनात्मक शुद्धता के साथ संरक्षित रखता है।
(...race sentiment...rests upon a foundation of facts that can be verified by scientific methods; that it supplied the motive principle of caste; that it continues, in the form of fiction or tradition, to shape the most modern developments of the system; and, finally, that its influence has tended to preserve in comparative purity the types which it favours. )
जाहिर है कि अंग्रेजों ने भारत की वर्ण व्यवस्था को यहां नस्ली शुद्धता को चिरंतर बनाये रखने के पहले से बनेबनाये एक मुकम्मल ढांचे के रूप में देखा और यहां अपनी शासन व्यवस्था के विकास लिये इसका भरपूर प्रयोग करने का निर्णय लिया। उनकी इसी दृष्टि ने भारत में 1871 का जरायमपेशा जातियों का कानून बना कर कुछ तबको को हमेशा के लिये दागी घोषित कर दिया। और यही वह नजरिया था जिसके चलते 1891 की पहली मदु‍र्म शुमारी में सिर्फ जातियों की गणना नहीं बल्कि उनकी परिभाषा और व्याख्या को भी शामिल किया गया। कहना न होगा कि जातियों की इन उद्देश्यपूर्ण पहचान की कोशिशों ने भारतीय समाज में ऐसा गुल खिलाया कि यहां के विभिन्न समुदायों में जनगणना के खातों में अपनी जाति को अपने खास ढंग से परिभाषितव्याख्यायित कराने की होड़ सी लग गयी। समझदारों को यह जानते देर नहीं लगी कि इसीसे यह तय होना है कि आने वाले दिनों में अंग्रेजी शासन की पूरी व्यवस्था में कौन सा समुदाय किस पायदान पर खड़ा होगा; शासन की रेवडि़यों के बंटवारे में किसके कितना हाथ लगेगा। और इसप्रकार, भारतीय वर्णव्यवस्था इस नये पश्चिमी नस्लवादी सिद्धांत से जुड़ कर एक अलग प्रकार की जाति चेतना के उद्भव का कारण बनी।
      आज हम जिस जातिवाद से अपने को जकड़ा हुआ पाते हैं, उसके बहुत कुछ को भारत में अंग्रेजी शासन की देन कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। 19वीं सदी के पहले के इतिहास में जो ब्राण विरले ही कहीं बलशाली, वैभवशाली दिखाई देते हैं; सदा राजकृपा के मुखापेक्षी और उसीके बल पर यदाकदा भौतिक दुनिया में भी किंचित महत्व पाते रहे हैं, वे अंग्रेजों की जातिगणनामें दखल देकर आदमी के आत्मिक जगत के पूर्ण अधिकारी बन गये। और, इसप्रकार नई शासन व्यवस्था से उनका अपना एक खास रिश्ता बना, वे भी अंग्रेजों के कानून के शासनके एक प्रमुख स्तंभ बन गये। अंग्रेजों के संपर्क से बने बंगाल के नवजागरण के तमाम मनीषियों के जीवन में गहराई से उतरिये, ऐसी बहुतसी बातें साफ दिखाई देने लगेगी।
        लुब्बेलुबाब यह कि 19वीं सदी के ब्रिटिश राज में हिंदू समाज की जातिअस्मिता का बोध एक नयी ऊंचाई पर था। ऐसे काल में किसी के गोत्रकुल की क्या कीमत रही होगी, सहज ही समझा जा सकता है।
      इसके अलावा रवीन्द्रनाथ के पूर्वजों का इतिहास जानने की एक और दूसरी महत्वपूर्ण वजह है। इस अध्ययन के जरिये रवीन्द्रनाथ के संपूर्ण व्यक्तित्व की पड़ताल के आधार पर उन पर कोई निश्चित राय बनाने के पहले ही एक बात आसानी से कही जा सकती है कि रवीन्द्रनाथ कहीं से ऐसे इंसान नहीं थे जिनमें एक गुलाम देश के नागरिक की किसी भी प्रकार की कुंठा का लेश मात्र मौजूद हो। स्वतंत्रता उनकी कामना नहीं, उनकी नैसर्गिकता थी। तुलसीदास लिखते है: मति अकुंठ हरि भगति अखंडी। एक अकुंठ, अखंड और संपूर्ण मानवता को समर्पित रवीन्द्रनाथ के समान विराट वैभवशाली व्यक्तित्व का भारत की तरह के गरीब और गुलाम देश में कैसे निर्माण हुआ, यह किसी के लिये भी विस्मय का विषय हो सकता है।
       रवीन्द्रनाथ के इसी व्यक्तित्व के संधान के क्रम में आइये सबसे पहले हम क्यों न रवींद्रनाथ के गोत्रकुल और उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि पर नजर डाले। संभव है इससे उस विशाल, वैभवशाली जीवन की तहों में प्रवेश के भी कुछ जरूरी सूत्र मिल जाए।
रवीन्द्रनाथ के कुलगोत्र की तलाश में हम उन आख्यानों अथवा किंवदंतियों के विस्तार में नहीं जायेंगे जो बंग क्षेत्र में ब्राह्मणों के आगमन के बारे में कही जाती है। इस पूरे संदर्भ में यहां रवीन्द्रनाथ के जीवनीकार प्रभात कुमार मुखोपाध्याय द्वारा प्रणीत चार खंडों में प्रकाशित रवीन्द्र जीवनी के संबंधित अंश में कही गयी बातों का उल्लेख करना ही काफी होगा। उनके अनुसार 11वीं सदी में किसी समय आदिशूर के राज्य में कान्यकुब्ज से शांडिल्य गोत्र के क्षितिश, वत्स्य गोत्र के सुधानिधि, सवर्ण गोत्र के सौभरि, भारद्वाज गोत्र के मेधातिथि और कश्यप गोत्र के बीतराग नामक पंचब्राह्मण महायान बौद्धधर्म के विचित्र विचारों में डूबे बंगदेश में ब्राह्मण धर्म को स्थापित करने के लिये आये थे। ये बंगदेश सिर्फ‍ आये भर थे, लेकिन यहां किसी प्रकार के यज्ञ अथवा दूसरे कामकाज नहीं किये थे। कहते हैं कि इन्हीं के पंचपुत्र भनारायण वेदाध्ययी के बेटे श्री हर्ष और दक्ष से बंगदेश में ब्राण कुल का उद्भव हुआ। 
       दक्ष की चौदह संतानों में से एक, धीर को आदिशूर के बेटे भूशूर से बंगाल में निवास के लिये गुड़ नामक एक गांव मिला था। आज यह गांव पश्चिम बंगाल के मुर्शीदाबाद जिले में है। गुड़ गांव के निवासी होने के नाते वे धीरगुड़ीअथवा धीरगुड़के नाम से जाने जाने लगे। इन्हीं की सातवीं पीढ़ी के रघुपति आचार्य ने वयस्क होने के उपरांत संन्यास ले लिया और दंडीबन गये; कहते हैं कि उन्हें काशीवास के काल में दंडी समाज ने कनकदंड भेंट किया था। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि कनकदांड़गांव में जाकर बस जाने के कारण परवर्ती दिनों में रघुपति के वंशजों को कनकदंडी गुड़कहा जाने लगा। इसी कनकदंडी गुड़की एक शाखा का यवनों (मुसलमानों) से संपर्क होने के कारण उन्हें पीराली दोष से दूषित माना गया और इसप्रकार वे ब्राह्मण समाज में पतित समझे जाने लगे।
        रघुपति आचार्य की चौथी पीढ़ी के जयकृष्ण ब्रचारी को ही शायद राय की उपाधि मिली थी। जयकृष्ण के दो बेटे थे नागर और दक्षिणानाथ। दक्षिणानाथ के चार बेटे थे कामदेव, जयदेव, रतिदेव और शुकदेव। इन्हीं कामदेव भाइयों का मुसलमानों से संपर्क हुआ और वे पीराली होगये। इस समय तक बंगाल में तुर्कों का शासन होगया था और दक्षिणानाथ को राजदरबार से रायचौधुरीकी उपाधि मिली थी। कामदेव बंधु आज के बांग्ला देश के जसहोर जिले के चेंगुटिया परगना के जमींदार थे। जाहिर है कि नाना कारणों से हिंदुओं के विभिन्न समुदाय विजेता शासकों के संपर्क में आये। और यवनों के साथ इस प्रकार से संपर्क में आये अनेक परिवारों को तब हिंदू समाज से अलग कर दिया गया था। सेरखानी, पिराली, श्रीमंथानी, आदि समुदायों का उद्भव इसी प्रकार हुआ।
                                          क्रमशः


विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...