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रविवार, 28 अक्टूबर 2012

सिंगूरग्रंथि और ममता की चौदह घंटे की चुप्पी


सिंगूर–माकपा-मीडिया-पूंजीपतिग्रंथि ने पश्चिम बंगाल को पंगु बना दिया है। कमोबेश सभी दल इसकी गिरफ्त में हैं। राज्य के विकास और सांस्कृतिक उन्नयन के लिए जरूरी है कि इन चारों ग्रंथियों से राज्य को निकाला जाय। दुर्भाग्य की बात यह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इनमें कैद हैं। ममता के मार्ग में पग-पग पर ये ग्रंथियां बाधा बनकर खड़ी हुई हैं। राज्य के मुखिया के नाते उनका इन चारों ग्रंथियों से मुक्त होकर प्रशासन चलाना बेहद जरूरी है। 

पश्चिम बंगाल का दुर्भाग्य है कि पहले वामशासन बुर्जुआग्रंथि से ग्रस्त था और उन तमाम चीजों को रोक रहा था जिनका पूंजीपतिवर्ग से संबंध है। ममता के शासन में आने पर यह लग रहा था कि राज्य प्रशासन को राजनीतिक ग्रंथियों से मुक्ति मिलेगी। लेकिन अब तक का अनुभव बताता है कि राज्य प्रशासन पहले से चली आ रही बुर्जुआग्रंथि से अभी तक मुक्त नहीं हुआ है,उलटे प्रशासन में सिंगूर-माकपा-मीडियाग्रंथि ने वायरस की तरह प्रसार कर लिया है।

प्रशासन में ग्रंथियां पूर्वाग्रह पैदा करती हैं और सहज-त्वरित फैसले से रोकती हैं। ममता को यदि सही मायने में राज्य के प्रभावशाली मुखिया की भूमिका अदा करनी है तो उसे इन चारों ग्रंथियों से मुक्त होना होगा। ग्रंथियां एकाकी मन और राजनीतिकदल को नकारात्मक दिशा में सक्रिय रखती हैं। ग्रंथियां हाइपर एक्टिव रखती हैं। ममता से लेकर माकपा तक सबमें यह हाइपर सक्रियता सहज ही देखी जा सकती है।

हाल ही ममता की सिंगूर -मीडियाग्रंथि का नया रूप सामने आया है जो निश्चित रूप से चिंता की बात है। बांग्ला के प्रसिद्ध साहित्यकार सुनील गंगोपाध्याय का 23 अक्टूबर को जब आकस्मिक निधन हुआ तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को शोक व्यक्त करने में चौदह घंटे से ज्यादा समय लगा। वैसे निजी तौर पर वे इसके लिए स्वतंत्र हैं कि वे कब शोक व्यक्त करें या शोक व्यक्त न करें,लेकिन एक मुख्यमंत्री के नाते उनके पास यह स्वतंत्रता नहीं है।

राजनीतिक हलकों में ममता बनर्जी को स्वतःस्फूर्त्त प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले राजनेता के रूप में जाना जाता है। लेकिन सुनील गंगोपाध्याय की मृत्यु पर मुख्यमंत्री के शोकसंदेश का चौदह घंटे तक न आना स्वयं में चिन्ता की बात है,साथ ही यह राज्य प्रशासन की मनोदशा की भी अभिव्यक्ति है। चौदह घंटे बाद अचानक फेसबुक पर ममता ने शोकसंदेश पोस्ट किया।

सवाल उठता है मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुनील गंगोपाध्याय के घर जाकर शोक व्यक्त क्यों नहीं किया ? किसी संदेशवाहक के जरिए तत्काल शोकसंदेश उनके घर क्यों नहीं भेजा ? ममता इतने समय तक क्या कर रही थीं ? वे किसी राजनीतिक काम में व्यस्त थीं ? किसी प्रशासनिक काम में घिरी हुई थीं ? उनको किसी सलाहकार ने मना किया कि शोकसंदेश मत दो या ममता ने स्वयं ही इतना समय लिया ? ममता को इन सवालों का जबाव देना होगा। सच यह है कि ममता न तो किसी राजनीतिक काम में व्यस्त थीं और न किसी उधेडबुन में घिरी थीं।बल्कि ममता अपने ही मन में सिंगूर -मीडियाग्रंथि के आधार पर सुनील गंगोपाध्याय की मौत को देख रही थीं। उनके लिए सुनील ‘अपने’ नहीं ‘उनके’ (माकपा) लेखक थे। सच यह है सुनील गंगोपाध्याय सामान्य लेखक नहीं थे,उनको बांग्ला साहित्य के साथ बांग्ला जाति की पहचान के रूप में सारे देश में प्रतिष्ठा हासिल थी। उन्होंने 200 से ज्यादा किताबें लिखी हैं। राज्य में बांग्ला भाषा आंदोलन के प्रतिष्ठाताओं में से एक थे। उनका मानना था आम बंगाली अपनी भाषा में पढ़े ,लिखे और दैनंदिन जीवन में उसका व्यवहार करे। वे बांग्ला में अंग्रेजी शब्दों के व्यवहार के विरोधी नहीं थे। उनका मानना था कि भाषा के चालू शब्द मिलते हों तो अंग्रेजी के शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए। सुनील गंगोपाध्याय ने जो सामाजिक-राजनीतिक स्वीकृति अर्जित की थी वह कम लेखकों को नसीब होती है। वे सबके चहेते थे। वे राज्य में नेताओं पर अंकुश का काम करते थे। उन्होंने सत्ता की निरंकुशता की हमेशा तीखी आलोचना की। वे ममता बनर्जी की नीतियों के कटु आलोचक भी थे,सिंगूर आंदोलन के समय उन्होंने वाम सरकार का साथ दिया था और ममता के आंदोलन की आलोचना की थी। ममता की सारी मुश्किलें इसी सिंगूर ग्रंथि से जुड़ी हैं।इस सिंगूरग्रंथि के कारण ही ममता को शोक व्यक्त करने में चौदह घंटे लगे। ममता का 14 घंटे तक चुप रहना,बाद में फेसबुक पर संदेश देना, ममता का उनके घर जाकर तत्काल दुख व्यक्त न करना और अंत में अपनी इज्जत बचाने के लिए अंतिमयात्रा में शामिल होना, बताता है कि ममता का राजनीतिक भावबोध निरंतर राज्य को पीछे ले जा रहा है।

बांग्ला टीवी चैनलों ने सुनील गंगोपाध्याय की मौत पर ममता की चुप्पी का अहर्निश प्रचार करके ममता को मजबूर किया कि वे बयान दें। वे मजबूर हुईं और उनका फेसबुक पर चौदह घंटे बाद बयान आया, कोई प्रेस रिलीज जारी न करके, शोकसंदेश को किसी के हाथों लेखक के घर न पहुँचाकर उन्होंने चुपके से फेसबुक पर पोस्ट करके अपने कर्म की इतिश्री समझ ली। लेकिन टीवी चैनल ,खासकर एबीपी आनंद टीवी चैनल शांत नहीं बैठा उसके दबाब के कारण ही ममता को सुनील गंगोपाध्याय की अंतिमयात्रा में शामिल होने के लिए मजबूर होना पड़ा।

ममता के ये सारे एक्शन एक ही तथ्य बयां करते हैं कि ममता पर बांग्ला चैनलों का तेज दबाव है और वे मजबूर होकर वे सब काम कर रही हैं जो उनको पसंद नहीं हैं। उल्लेखनीय है 21 से 24 अक्टूबर तक बांग्ला के सभी समाचारपत्र बंद थे।राज्य में ऐसा कभी नहीं हुआ। हॉकरों ने वस्तुतःहड़ताल कर दी या उनसे हड़ताल करा दी गयी। किसी भी राज्य में वेबजह 4दिन तक अखबार बंद रहने की यह विरल घटना है। इसके पीछे कौन लोग हैं उनका पर्दाफाश किया जाना चाहिए। राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह प्रेस की आजादी को सुनिश्चित बनाए। लेकिन हॉकरों की 4दिन की हड़ताल(जिसे वे पूजा की छुट्टी कह रहे हैं) ने ममता सरकार के मीडियाविरोधी रवैय्ये को एकसिरे उजागर कर दिया है। ममता सभी किस्म की हड़तालों पर बोलती रही हैं लेकिन प्रेस में जबरिया करायी गयी इस चार दिन व्यापी हड़ताल पर वे चुप रहीं। हो सकता है ममता के सलाहकार मानते हों कि कम से कम चार तक दीदी को मानसिक शांति दी जाय।लेकिन मीडियाशांत नहीं था। सुनील गंगोपाध्याय की मौत ने समूचे मीडिया को उद्वेलित रखा साथ ही ममता को भी।




















रविवार, 24 जुलाई 2011

हिन्दी बुर्जुआ के सांस्कृतिक खेल


     हिन्दी बुर्जुआ का हिन्दीभाषा और साहित्य से तीन-तेरह का संबंध है। इसमें आत्मत्याग की भावना कम है। उसमें दौलत,शानो-शौकत  और सामाजिक हैसियत का अहंकार है। वह प्रत्येक काम के लिए दूसरों पर निर्भर है।दूसरों के अनुकरण में गर्व महसूस करता है। दूसरों के अनुग्रह को सम्मान समझता है।वाक्चातुर्य से भाव-विह्वल हो जाता है। दूसरों की आँखों में धूल झोंकने की इसे आदत है।यही इसकी राजनीति का मूलाधार भी है। स्वभाव से हृदयहीन,क्षुद्र,दंभी और निजभाषा और संस्कृति से रहित है। हिन्दी बुर्जुआ का व्यक्तित्व बेहद जटिल और संश्लिष्ट है। उसमें सरलता का अभाव है। हिन्दी बुर्जुआ की बुद्धि बाल की खाल निकालने में सक्षम है लेकिन बड़ी-बड़ी गांठों को सुलझा नहीं सकती। इस वर्ग में आलस्यमय शांतिप्रियता और स्वार्थमय निष्ठुरता कूट कूटकर भरी है। इसमें दयावृत्ति और चारित्र्य-बल नहीं है।
बुर्जुआवर्ग ने हिन्दीभाषी समाज को ग्राम्य पांडित्य और ग्राम्य बर्बरता से मुक्ति दिलाने का काम नहीं किया। फलतः हिन्दीभाषी समाज में भद्रसमाज के निर्माण की प्रक्रिया काफी धीमी गति से चल रही है। हिन्दीसमाज में ग्रामीण आचार-व्यवहार की संकीर्णताएं बनी हुई हैं। इन संकीर्णताओं की ओट में हिन्दी में 'लोक' का बड़ा महिमामंडन हुआ है। धर्म के प्रति विलक्षण प्रेम है। वह धर्म और मासकल्चर पर जितनी आसानी से खर्च करता है उतनी आसानी से सामाजिक जीवन के विकास कार्यों और संस्कृति पर खर्च नहीं करता। धर्म और मासकल्चर का उसने इस तरह प्रचार किया है कि आम आदमी धर्म और मासकल्चर के कमरे में बंद होकर रह गया है।
     हिन्दीभाषी समाज में विचारहीन नियमों का घेरा है। इसे हिन्दीबुर्जुआ ने कभी चुनौती नहीं दी। धर्मगत भेदबुद्धि के बारे में सवाल नहीं उठाए। इसके कारण हिन्दीसमाज में जातिभेद और धर्मभेद आज भी बुनियादी समस्या बने हुए हैं। धर्मभेद ने साम्प्रदायिकता को हवा दी और जातिभेद ने जातिप्रथा को पुख्ता बनाया। इन दोनों भेदों को उसने कभी चुनौती नहीं दी। इसके विपरीत इन दोनों भेदों को विभिन्न तरीकों से ढंकने की कोशिश की है। मजेदार बात यह है  हिन्दीबुर्जुआ ने अबुद्धि की प्रशंसा की है । उसका महिमामंडन किया और बुद्धि और बुद्धिजीवियों को हिकारत की नजर से देखा। व्यावसायिक पेशेवरज्ञान को महत्व दिया। साहित्य-कला-संस्कृति और इनसे जुड़े पेशेवर लोगों की उपेक्षा की। बुद्धि के स्थान पर सामाजिक हैसियत को प्रतिष्ठित किया। बुद्धि के स्थान पर सामाजिक हैसियत की प्रतिष्ठा की। फलतःस्वाधीनचेतना का विकास बाधित हुआ। परनिर्भरता बढ़ी है। इसके कारण हिन्दीभाषी समाज में कूपमण्डूकता,धर्म,अन्ध संस्कारों, जड़प्रथाओं, गुरू,ज्योतिषी, पंडित, पुजारी आदि की साख बढ़ी। देववाणी,अलौकिक शक्तियां और अंध आज्ञाकारिता का तेजी से प्रसार हुआ।
       हिन्दीमन आस्था में विश्वास करता है बुद्धि में नहीं। हमारी शिक्षाप्रणाली  ने इसे कभी चुनौती नहीं दी गयी। शिक्षित होने के बाबजूद हमारे मन में कुसंस्कार ,पोंगापंथ और भेद-बुद्धि बनी रहती है। हिन्दी में जो शिक्षित हैं उनमें एक बड़ा वर्ग है जो शिक्षा के बाबजूद अंधविश्वासों की हिमायत करता है। वे कुतर्कों के आधार पर अपनी सड़ी-गली मान्यताओं को बचाए रखने में ज्ञानी महसूस करते हैं। वे बुद्धि पर कम और कुबुद्धि पर ज्यादा विश्वास करते हैं। लेकिन हिन्दी में एक छोटा सा समुदाय ऐसा भी है जो बुर्जुआजी के इन नकरात्मक लक्षणों से मुक्त है।  इसे प्रगतिशील हिन्दी बुर्जुआवर्ग कह सकते हैं। इस समुदाय के लोगों ने बड़े पैमाने पर शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में पैसा लगाया है। इसमें विज्ञानचेतना भी है। संस्कृतिप्रेम भी है।
     कुछ बुर्जुआ परिवार ऐसे भी हैं जिन्होंने साहित्य,कला,संस्कृति,प्रेस आदि में पूंजी निवेश किया है। इस तरह के निवेश के जरिए एक तरफ कला आकांक्षाओं की पूर्ति हुई है । सांस्कृतिक इमेज बनी है। लेकिन समग्रता में देखें तो हिन्दीबुर्जुआ ने हिन्दीभाषी राज्यों में संस्कृति,सांस्कृतिक धरोहरों, सांस्कृतिक रूपों,संगीत आदि के विकास पर कोई खास ध्यान नहीं दिया। हिन्दीबुर्जुआ ने शिक्षा में विज्ञान, प्रबंधन, इंजीनियरिंग आदि क्षेत्रों में व्यापक पैमाने पर पैसा खर्च किया है। लेकिन समाजविज्ञान ,भाषाओं की उच्चशिक्षा और शोध पर कोई खास ध्यान नहीं दिया। हिन्दीभाषी इलाकों में दो विश्वविद्यालय है ,एक है वनस्थली विद्यापीठ और दूसरा है सागर विश्वविद्यालय । ये दो विश्वविद्यालय हिन्दीभाषी बुर्जुआजी ने स्थापित किए थे। इसके अलावा विभिन्न राज्यों में अनेक कॉलेज हैं जो हिन्दीबुर्जुआ की मदद से चलते हैं। साहित्य में ज्ञानपीठ और भारतीय भाषा परिषद की साहित्य के आयोजनों में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन साहित्य,कला,संस्कृति के संरक्षण,अनुसंधान आदि के बुनियादी कार्यों में आज भी हिन्दीभाषी बुर्जुआवर्ग की कोई दिलचस्पी नहीं है।
    हिन्दी बुर्जुआवर्ग की आरंभ से ही प्रेस में दिलचस्पी थी और हिन्दी का शक्तिशाली प्रेस और कालान्तर में टीवी मीडिया बनाने में उसने गहरी दिलचस्पी ली । हिन्दी प्रेस के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समाचार समूहों का उसने निर्माण किया। इसमें तेजी से तरक्की की । हिन्दीप्रेस में सक्रिय हिन्दीबुर्जुआ ने ओपिनियन मेकर का काम किया है। उसने लोकतांत्रिक आंदोलन के साथ विभिन्न समयों पर गहरा संबंध भी बनाया है।
     हिन्दीप्रेस की ताकतवर इमेज ने हिन्दी को शक्तिशाली बनाया है। जनप्रिय बनाया है। हाल के बीस सालों में हिन्दीप्रेस में पेशेवरशैली का तेजी से विकास हुआ है। जो मीडिया घराने बहुभाषी प्रेस चलाते हैं वहां पर एक हिन्दीप्रेस के प्रति भेदभाव दिखता है। एक्सप्रेस ग्रुप से लेकर टाइम्स ग्रुप तक इस भेदभाव को साफ देखा जा सकता है। लेकिन  हिन्दीबुर्जुआ का जो वर्ग सिर्फ हिन्दीप्रेस चला रहा है उसने अभूतपूर्व विकास किया है। हिन्दीप्रेस की सामग्री,रूपसज्जा से लेकर काम करने वालों की पेशेवर क्षमता में भी गुणात्मक परिवर्तन आया है। यही वजह है आज हिन्दीप्रेस का भारतीय प्रेस में सर्वोच्च स्थान है।
     हिन्दी बुर्जुआ की सफलता का एक और बड़ा क्षेत्र है जहां उसने छोटी पूंजी और आवारा पूंजी के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर हिन्दी सिनेमा उद्योग का निर्माण किया। विगत 10 सालों में देश के बड़े पूंजीपति घरानों और बैंकों ने सिनेमाजगत की ओर रूख किया है। लेकिन इससे पहले सिनेमा उद्योग में बड़े पैमाने पर आवारा पूंजी और मझोले किस्म के हिन्दीभाषी पूंजीपतियों की पूंजी लगी थी और कलाकारों में अधिकांश हिन्दीभाषी मध्यवर्ग और निम्नमध्यवर्ग के कलाकारों,गीतकारों,लेखकों ,संगीतकारों, तकनीशियनों आदि का योगदान रहा है। हाल के नव्य-उदारतावादी दौर में सिनेमा और टीवी उद्योग की ओर हिन्दीबुर्जुआ की स्पीड बढ़ी है। हॉलीवुड का भारत में प्रवाह रोकने में हिन्दीसिनेमा की बड़ी भूमिका रही है। यह एक तरह का हिन्दी बुर्जुआ का सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के खिलाफ प्रतिरोध भी है। 
       उल्लेखनीय है संचार तकनीक के द्वारा निर्मित वातावरण स्वभावत: ग्लोबल-लोकल होता है। दूसरी बात यह कि भारतीय सिनेमा का मूलाधार है वैविध्य और बहुलतावाद। जबकि हॉलीवुड सिनेमा की धुरी है इकसारता। भारतीय सिनेमा में संस्कृति और लोकसंस्कृति के तत्वों का फिल्म के कथानक के निर्माण में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। जबकि हॉलीवुड सिनेमा के कथानक की धुरी है मासकल्चर। हॉलीवुड सिनेमा विश्वव्यापी अमरीकी ग्लोबल कल्चर के प्रचारक-प्रसारक की अग्रणी भूमिका रही है। जबकि भारतीय सिनेमा में पापुलरकल्चर के व्यापक प्रयोग मिलते हैं।
    हिन्दीबुर्जुआ की सांस्कृतिक शक्ति ही है कि हॉलीवुड सिनेमा आज तक हिन्दी के मुंबई फिल्म उद्योग को अपदस्थ नहीं कर पाया है। इसने खिचड़ी फिल्मी संस्कृति का निर्माण किया है। स्वायत्त भारतीय फैंटेसी का व्यापक प्रचार-प्रसार किया है। हिन्दी फिल्मी फैंटेसी के चार प्रमुख क्षेत्र हैं, प्रेम, परिवार -समुदाय, राष्ट्र और गरीब। इसमें भाषायी सहिष्णुता है । इसके कारण यह सहज ही भाषायी -सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण कर जाता है।  
        हिन्दी सिनेमा मूलत: समग्रता में ‘महा- आख्यान’ नहीं बनाता। वह ऐसा कोई कथानक नहीं बनाता जो सब कुछ अपने अंदर समेटे हो। इसमें संस्कृति,इतिहास, व्यक्तित्व,अभिनय और कथानक की इकसार अवस्था नहीं मिलती। इससे राष्ट्रीय विविधता को रुपायित करने और बनाए रखने में मदद मिली है। इस बिखरे फिल्मी संसार में सेतु का काम किया है पापुलरकल्चर ने (मासकल्चर नहीं) । पापुलरकल्चर के सेतु से गुजरने के कारण ही मुम्बईया सिनेमा की ‘फ्रेगमेंटरी ’और संवादमूलक प्रकृति है। यह सांस्कृतिक विमर्शों को पैदा करता है।
    हिन्दी का मूलाधार है आनंद। इसके तीन मुख्य तत्व हैं, ये हैं, संस्कार, गाने और संगीत। ये तीनों ही तत्व मिश्रित संस्कृति का रसायन तैयार करते हैं। मिश्रित संस्कृति का संचार करने के कारण ही हिन्दी की फिल्में किसी भी विकसित और अविकसित पूंजीवादी मुल्क से लेकर समाजवादी देशों तक में कई बार वर्ष की सर्वोच्च 10 या 20 फिल्मों में स्थान बनाती रही हैं। सांस्कृतिक बहुलतावाद की जैसी सेवा हिन्दी सिनेमा ने की है वैसी सेवा हॉलीवुड ने नहीं की है। यही वजह है कि बॉलीवुड का हिन्दी सिनेमा शीतयुद्ध के समय में हॉलीवुड के सामने चट्टान की तरह अड़ा रहा। पूरे शीतयुद्ध के दौरान हॉलीवुड सिनेमा ने दुनिया के अधिकांश देशों के सिनेमा उद्योग को बर्बाद कर दिया। किंतु भारत में उसे पैर जमाने में सफलता नहीं मिली।   
     द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर में भारत का एक बड़ा फिनोमिना है आप्रवासी भारतीय। इसमें विविध किस्म के भारतीय हैं और ये अमेरिका से दक्षिण अफ्रीका,मारीशस से कैरिबियन देशों ,मध्यपूर्व के देशों से लेकर समूचे यूरोप तक फैले हैं। इनमें भारत की जातीय-सांस्कृतिक विविधता साफ नजर आती है। हम यह भी कह सकते है कि भारतीय संस्कृति का इन लोगों के कारण विश्वव्यापी प्रसार हुआ है। यही वह बुनियादी कारक है जिसके कारण हिन्दी फिल्मों में आप्रवासी एशियाई संस्कृति की व्यापक अभिव्यक्ति होती रही है। आप्रवासियों का अपनी संस्कृति से प्रेम ही है जो ‘प्राचीन भारत’ से जोड़े रखता है। इस कार्य में भारत की फैंटेसी,संस्कार,यथार्थ,गाने आदि का व्यापक इस्तेमाल किया जाता है।
    उल्लेखनीय है आप्रवासी भारतीय दोहरे दबाब में हैं,एक तरफ वे अपने काम की जगह पर आए दिन भेदभाव के शिकार होते रहते हैं और दूसरी ओर प्राचीन भारत की उम्मीदें उन्हें घेरे रहती हैं। यही वजह है  आप्रवासी भारतीय भारत  में बनी फिल्में खूब देखते हैं, यह काम वे आजादी के पहले से कर रहे हैं। हाल के वर्षों में ग्लोबल भारतीय सिनेमा में वितरण, माइग्रेसन और स्थानीयतावाद का प्रवेश हुआ है। भारतीय सिनेमा सांस्कृतिक समूहों को सम्बोधित करता है। वह जिस तरह देश में देखा जाता है वैसे ही विदेश में भी देखा जाता है। देशी-विदेशी दर्शकों को आकर्षित करने में जिस तत्व का सबसे बड़ा रोल है वह है‘भारतीयता’, इस ‘भारतीयता’ का आधार राजनीतिक न होकर सांस्कृतिक है। हिन्दी बुर्जुआ का यह सकारात्मक पक्ष है कि उसने देशज कलारूपों और देशज भाषाओं जैसे मैथिली-भोजपुरी के सिनेमा का व्यापकरूप में विकास किया। इसके अलावा ऑडियो इण्डस्ट्री का भी विकास किया। इसके कारण हिन्दी संस्कृति के संचार और प्रसार को व्यापक आधार मिला।
     




























शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

हिन्दीभाषी पूंजीपति का हिन्दीभाषा से अलगाव क्यों ?





     हमारे मित्र विमलेश त्रिपाठी युवा कवि हैं और मेरे छात्र भी रहे हैं। वे आए दिन मेरी खबर सुध ले लेते हैं। उनसे चैट के जरिए आज जो बात हुई उसमें अचानक कई विचारणीय समस्याएं अचानक सामने आ खड़ी हुईं। मैं यहां वह बातचीत रख रहा हूँ आप लोग भी इन समस्याओं पर सोचें।- विमलेश ने रोमन हिन्दी में कहा है और मैंने देवनागरी में। 
- good morning sir
- कहिए
कैसे हैं

 kaise hain sir?
main thik hun....thora busy tha idhar kuchh kaamon men....

 एकदम ठीक,
क्या कर रहे हो इन दिनों ,
खूब लिख रहे हो यह अच्छी बात है

nahin sir khub kahan likh raha hun....
aapne ko bachana hai to likhna padega...bas utna hi likh raha hun

 कुछ सामयिक विषयों पर आसपास के हिन्दी-अहिन्दीभाषियों की समस्याओं और जिंदगी पर भी लिखो
पश्चिम बंगाल के बारे में लोग कम जानते हैं
jee 
कम से कम सप्ताह में एक पन्ना जरूर लिखो
jee aapka sujhav dhyan me rakhunga 
मुझे बेहद तकलीफ होती है, यहां के हिन्दीभाषियों को देखकर
jee, ye to hai... ajib log hain....

 मैंने अभिव्यक्तिविहीन हिन्दीभाषी ,वह भी शिक्षित यहीं पर देखे हैं । तुम लोगों की जिम्मेदारी है जो अभिव्यक्त करना नहीं जानते हैं,उनको वाणी दो ।
   jee, sahi kah rahe hain aap
देखो मैंने मीडिया और आलोचना में वह क्षेत्र चुना जिसे हिन्दी वाले नहीं जानते थे,कोलकाता को गंभीर किताबों के लिए नहीं जानते थे। मैंने यहीं रहकर काम किया और हिन्दी वालों की सेवा की। यह हमारी-तुम्हारी जिम्मेदारी है।
jee, aapne to aapne field me bahut kaam kiya hai, aur achha kaam kiya hai 

 एकबार तुम अपना समय गद्य को दो, यहां के यथार्थ पर लिखो, समस्याओं पर लिखो,बेहद जरूरी है। यहां के हिन्दी लेखकों ने पश्चिम बंगाल पर बहुत ही कम लिखा है। 
jee

  यहां के हिन्दी वाले बुद्धिजीवी 1857,भारतेन्दु,नवजागरण,छायावाद पर निरर्थक लिखते रहे हैं। बंगाल पर न लिखना कायरता है। स्थानीय यथार्थ से बेरूखी के कारण हिन्दी के लोगों को यहां और बाहर गंभीरता से नहीं लिया जाता।
ye bhi sahi hai.... aaj ki samsyaon per bhi likhna chhayvad aur anya cheejon se jyada jaroori hai

अर्थहीन प्रायोजनों और लेखन ने बंगाल के हिन्दी वालों को हाशिए पर पहुँचा दिया है।डेढ़ करोड़ के रीब हिन्दीभाषी हैं यहां लेकिन .... पहचान नहीं है । वे पढ़े लिखे हैं, लेकिन उनमें बुद्धिजीवी के गुण नहीं हैं।
hmm, aapas me khincha-tani hai, kamane-khane wali pravriti jyada hai...

सेठ हैं हिन्दीभाषी ,लेकिन सभ्यता के विकास की बजाय पूंजीभोगी का काम कर कर रहे हैं। खाना कमाना सबके लिए जरूरी है लेकिन बुद्धिजीवियों ,शिक्षितों का जो काम है वह भी तो करना चाहिए।

विमलेश त्रिपाठी- अवश्य। 
जगदीश्वर- हिन्दी भाषी बुद्धिजीवियों ने पश्चिम बंगाल पर कभी गंभीरता से काम क्यों नहीं किया, जबकि हिन्दी का उदय यहीं पर हुआ था
विमलेश- सही

जगदीश्वर- मजेदार बात यह है कि वे यहां के मजदूरों में 75 प्रतिशत से ज्यादा हैं लेकिन एक भी मजदूरनेता हिन्दीभाषी नहीं हुआ जिसे दुनिया जानती हो।
कोलकाता में 50 फीसदी हिन्दीभाषी हैं लेकिन उनकी कोई राजनीतिक पहचान नहीं है। वे मात्र इसके या उसके दुमछल्ले होकर रह गए हैं।इसके कारण छोटे किस्म के दलालों ने समूचा माहौल कब्जे में ले लिया है।
sachmuch ye to bahut badi chinta ka vishay hai....

यहां के व्यापार जगत में हिन्दीभाषियों का वर्चस्व है लेकिन उनका कोई राजनीतिक महत्व नहीं है।हिन्दीभाषी पूंजीपति ने कभी हिन्दी से अपने को नहीं जोडा।
aapne kaafi chintan kiya hai is vishay per....
हिन्दीभाषी पूंजीपति का हिन्दीभाषा के साथ जिस तरह अलगाव है वैसे अंग्रेज पूंजीपति का अंग्रेजी से नहीं है।

यहूदी जाति के पूंजीपति अपनी भाषा और संस्कृति के बुद्धिजीवियों का सम्मान करते हैं और बढ़ावा देते हैं लेकिन हिन्दीभाषी पूंजीपति नहीं देता।बंगाली बुर्जुआ ने बांघ्ला के बुद्धिजीवियों को मान-सम्मान दिया है।
ye bhi ek sach hai...

 हिन्दी भाषी पूंजीपति का अपनी भाषा से अलगाव और हिन्दी भाषी बुद्धिजीवी का उसका क्रीतदास बने रहना चिन्ता की चीज है।
hmm ,sachmuch ye chinta ka vishay hai, lekin samadhan kya hai....hum kis trah aage badhen?

पहला कदम है-सामयिक यथार्थ की निर्मम समीक्षा और गहरी समझ पैदा की जाए,उसका ज्यादा से ज्यादा प्रचार किया जाए।
jee

दूसरा कदम है राजनीति से साहित्य तक उन तमाम चीजों के खिलाफ लिखा जाए जो हिन्दी की पहचान नहीं बनने देते। जैसे चाटुकारिता की बजाय सम्मान से बोलना और क्रिटिकली लिखना।
jee
तीसरा कदम-हिन्दी भाषी पूंजीपतिवर्ग ,उच्चमध्यवर्ग-मध्यवर्ग का हिन्दी से अलगाव कम करने के लिए चौतरफा प्रयास किया जाए। स्वार्थहीन मित्रता पर जोर दिया जाए। दबाब बनाने के लिए संगठन भी बनाए जाएं जो आधुनिक क्लब संस्कृति ,मंच जैसे हों।

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