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शुक्रवार, 13 मार्च 2015

बलात्कार को भूलो और माफ़ करो के नज़रिए से न देखो !



आज अख़बार से पता चला कि कोलकाता के पार्कस्ट्रीट बलात्कार कांड की पीड़िता की मृत्यु हो गयी , अफ़सोस है कि अपराधी मस्त हैं और पीड़िता चल बसी। यह न्याय और राज्य सरकार दोनों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए कि बलात्कार तो बर्बरता है, औरत पर सामाजिक हमला है। वह कोई 
सामान्य घटना नहीं ।यह शारीरिक हिंसा है, बलात्कार इससे भी जघन्य शारीरिक -मानसिक हिंसाचार के साथ सामाजिक हत्या है।  
   सामान्य हिंसाचार जैसे चांटा मारने का प्रतिकार हो सकता है, बदले में चांटा मार सकते हैं,या सहन करके रह सकते हैं। चांटा मारना सामान्य उत्पीड़न है। फिर भी हिंसा है।निंदनीय है।सामान्य हिंसा या अपमान को एक अवधि के बाद औरत भूल सकती है ,लेकिन बलात्कार तो स्त्री की सामाजिक हत्या है। बलात्कार के बाद औरत मर जाती है। उसका मन , तन और सामाजिक परिवेश नष्ट हो जाता है। 
   हम याद करें द्रौपदी के अपमान को जिसके कारण उसने पांडवों से कह दिया था कि जाओ पहले मेरा अपमान करने वालों का वध करके आओ। मैं फिर में केश बाँधूँगी ।स्त्री का अपमान वह छोटे रुप में हो या बलात्कार जैसे बर्बर रुप में हो , उसे"भूलो और माफ़ करो ", के नज़रिए से नहीं देखना चाहिए। 
      बलात्कार बर्बरता है यह सभ्यता के सभी  मानकों का उल्लंघन है। बलात्कार कभी सामान्य रुप में घटित नहीं होता . वह स्त्री की योनि,मन और सामाजिक ज़िंदगी को हमेशा के लिए नष्ट कर देता । बलात्कार पीड़िता स्वयं तो पीडित होती ही है उसका परिवार भी पीडित होता है, यातनाएँ झेलता है। बलात्कारी को कभी न तो लिंग में कष्ट होता है , न मन में तकलीफ़ होती और न सामाजिकतौर पर उसकी कोई क्षति होती है। 
     हमारे समाज का पुंसवादी ढाँचा , नेतागण और मीडिया का पुंसवादी परिवेश हमेशा बलात्कारी के पक्ष में खडा रहता है। मीडिया में आएदिन औरतों पर हमलों को महिमामंडित किया जाता है, बलात्कार को जायज़ ठहराते हुए फ़िल्में और सीरियल बड़ी संख्या में आते रहते हैं। यहाँ तक कि हमारे तमाम स्वनाम धन्य बडे कलाकार ऐसी फ़िल्मों में अभिनय भी करते हैं। अख़बारों में बलात्कारियों के पक्ष में अनेक पत्रकारगण आएदिन माहौल बनाते रहते हैं। 
               बलात्कार औरत पर बर्बर हमला है,अक्षम्य सामाजिक अपराध है। बलात्कारी का एकमात्र इलाज है कि उसे हमेशा के लिए जेल में बंद रखा जाय और दंड स्वरुप नपुंसक बनाया जाय। बलात्कार सामान्य अपराध नहीं है। बलात्कारी के प्रति कठोर बनें और बलात्कार की पीड़िता के साथ सामाजिक एकजुटता प्रदर्शित करें । 

मंगलवार, 17 जून 2014

औरत को थाने नहीं महिला संगठन चाहिए


      औरतों के साथ बलात्कार और हिंसाचार थमने का नाम नहीं ले रहा। पहले कहा गया सख्त कानून बनाओ,निर्भया कांड के बाद कानून सख्त बन गया। अब बदायूं कांड के बाद के कह रहे हैं सख्त सरकार बनाओ,वह भी बन जाएगी, धैर्य रखो, लेकिन पहले यह तो सोचो भाजपा की सख्त-ताकतवर सरकार मध्यप्रदेश में है और दिल्ली में भी है, लेकिन बलात्कार और हिंसाचार थम नहीं रहे हैं।बलात्कारी न तो कानून से डर रहे हैं और न सख्त सरकारों से। वे इतने निडर क्यों हैं ?

औरतों के साथ हिंसाचार कानून और सरकार बदलने मात्र से नहीं थमेगा। औरतों को संगठित होकर लंबे संघर्ष के लिए कमर कसनी होगी। औरत की सुरक्षा का मामला मात्र जेण्डर प्रश्न नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सवाल है।पितृसत्ता के वर्चस्व के सभी रुपों के खिलाफ संघर्ष का मामला है। यह औरत के स्वभाव को बदलने का मामला भी है।

औरतों की लड़ाई कानूनी लडाई नहीं है और नहीं यह सरकार पाने की लडाई है ,वह सामाजिक परिवर्तन की लडाई है ,इसमें जब तक औरतें सड़कों पर नहीं निकलेंगी और निरंतर जागरुकता का प्रदर्शन नहीं करेंगी, तब तक स्थितियां बदलने से रहीं । इन दिनों पुंस हिंसाचार का जो तूफान समाज में चल रहा है उसमें इजाफा ही होगा।

आयरनी यह है कि औरतों के ऊपर हो रहे हिंसाचार के खिलाफ औरतें अभी तक सड़कों पर निकलने को तैयार नहीं हैं। कहीं पर भी हजारों-लाखों औरतों के जुलूस नजर नहीं आ रहे। स्थिति इतनी भयावह है कि पीड़िता को देखकर भी हम अनदेखा कर रहे हैं। पुरुषों के लिए बलात्कार एक खबर होकर रह गयी, वहीं औरतों के लिए जुल्म। हमें इन दोनों के दायरे से निकलकर औरत को संघर्ष की प्रक्रिया में लाना होगा। औरत संघर्ष करेगी तो हिंसाचार थमेगा। हमें औरत को संघर्ष करने के लिए प्रेरित करना होगा। हमें औरतों को सामाजिक हलचलों से दूर रखने की मनोदशा बदलनी होगी। औरतों को भी अ-राजनीतिक होकर जीने की आदत और अभ्यासों को त्यागना होगा। औरत को अ-राजनीतिक बनाने में पुंस समाज को लाभ रहा है।

औरत अ-राजनीतिक न बने हमें उसके उपाय खोजने होंगे। औरतों में सामाजिक-राजनीतिक जागरुकता पैदा करने के उपायों पर विचार करना होगा और यह काम औरतों के बिना संभव नहीं है। पहली कड़ी के तौर पर औरतों को अखबार पढ़ने, टीवी न्यूज देखने और राजनीतिक खबरों में दिलचस्पी लेने की आदत डालनी होगी।

औरत को सीरियल संस्कृति और मनोरंजन संस्कृति के बंद परकोटे से बाहर निकलना होगा। मनोरंजन की कैद में बंद औरत अपनी रक्षा नहीं कर सकती। यह वह औरत है जो सामाजिक -राजनीतिक भूमिका से संयास ले चुकी है।

यह सच है कि औरतें रुटिन कामों को सालों-साल करती रहती हैं और घरों में बैठे हुए बोर होती रहती हैं, लेकिन इससे भी बड़ा सच यह है कि सीरियल या मनोरंजन प्रोडक्टों का रुटिन आस्वादन और भी ज्यादा बोर करता है। उनका अहर्निश आस्वादन हमें बोर और सामाजिक तौर पर निष्क्रिय बनाता है।

औरत सामाजिक तौर पर निष्क्रिय न बने इसके लिए औरतों को यह जानना होगा कि वे जिसे आनंद या मनोरंजन समझ रही हैं वह तो उनकी बोरियत बढ़ाने वाला संसाधन है। औरत को मनोरंजन की नकली भूख को खत्म करने के लिए मनोरंजन के असली और कारगर रुपों को अपनाना होगा।

औरतें अ-राजनीति के दायरे के बाहर आएं इसके लिए जरुरी है कि वे अपनी पहल पर लोकतांत्रिक महिला संगठनों की शाखाएं अपने मुहल्ले में खोलें और नए सिरे से सामाजिक सवालों पर मिलने-जुलने और काम करने का सिस्टम तैयार करें। आज स्थिति यह है कि भारत के अघिकांश मुहल्लों में महिला संगठन नहीं हैं। महिला संगठनों के बिना महिलाओं को नहीं बचा सकते।



महिलाओं को हर इलाके में थाने नहीं महिला संगठनों की जरुरत है। महिलाओं के इस तरह के संगठनों की जरुरत है जो निरंतर महिलाओं के सवालों पर सोचें और महिलाओं को सक्रिय-शिक्षित करें। महिलाएं सक्रिय-शिक्षित और संगठित बनेंगी तब ही हिंसाचार रुकेगा।

मंगलवार, 3 जून 2014

बलात्कार के प्रतिवाद और नागरिक औरत की तलाश में

    
 
  मीडिया में बलात्कार की ख़बरों का सुर्खियों में आना और नेताओं का बलात्कार को लेकर हाय हाय करना रोज़मर्रा का नाटक है। 
   बलात्कार कोई मीडिया इवेंट नहीं है। बलात्कार के यथार्थ चित्र मीडिया के क़िस्सों और बाइट्स से भी ज़्यादा भयानक हैं। बलात्कार हमारे समाज और लोकतंत्र की प्रकृति को समझने का प्रस्थान बिंदु है। यह हमारे लोकतंत्र के समस्त दावों को खोखला साबित करता है ।
    लेनिन कहा करते थे यदि किसी समाज की हक़ीक़त जानना है तो पता करो औरत की दशा क्या है ? हमलोग जब भी लोकतंत्र की बातें करते हैं तो सतही मसलों को केन्द्र में रखकर बातें करते हैं। औरत को केन्द्र में रखकर बातें नहीं करते। औरत हमारी सृष्टि की धुरी है।
   अभी लोकसभा चुनावों के परिणामों की स्याही सूखी नहीं है । हम अपने अंदर झाँकने के लिए तैयार नहीं हैं। लोकसभा चुनाव में हमने औरतों के सवालों पर बातें तक नहीं कीं।
    मोदी से लेकर शोहदों तक सभी ने जितने भाषण दिए उनमें  औरत का मसला ठीक से उठाया ही नहीं गया। जब भी औरत का मसला उठा तो अपने को श्रेष्ठ और दूसरे को हेयऔर निकम्मा सिद्ध करने के लिहाज़ से उठाया गया। औरत को भी क़ानून -व्यवस्था का मसला बना दिया गया। सरकार को  निकम्मा घोषित करने का औज़ार बना दिया गया और वोट जुगाड़ करने की मशीन में तब्दील कर दिया गया। कभी किसी भी दल ने औरतों के सवालों पर बुनियादी ढंग से बातें नहीं कीं।
   स्थिति इतनी बदतर है कि आज भी हम बदायूँ की घटना को यूपी सरकार को गिराने या बदनाम करने के लक्ष्य से आगे देखने को तैयार नहीं हैं। हम यह जानने और समझने को तैयार नहीं हैं कि हमारा देश 'बलात्कारियों का देश 'कैसे हो गया? क्यों हमारे देश में औरत को ही पग-पग पर लांछन, उत्पीड़न और बलात्कार का सामना करना पड़ता है? वे कौन सी ताक़तें और जीवन मूल्य हैं जो औरत पर हो रहे अत्याचारों की तह तक हमें जाने नहीं देते ? 
          बलात्कार की जड़ें हमारे समाज में हैं। समाज की मूल्य संरचना में हैं। औरत को मातहत मानने या दोयमदर्जे का नागरिक मानने की मानसिकता में हैं। वास्तविकता यह है कि हमने अपने देश में लोकतंत्र का कम और वोटतंत्र का ज़्यादा विकास किया है। हमने नागरिकचेतना और आधुनिकभावबोध पैदा करने की बजाय उपभोक्ताबोध पैदा करने पर ज़ोर दिया है। औरत को समाज में नागरिक नहीं माना यहाँ तक कि पुरुष को भी नागरिक नहीं माना। हमारा समाज अभी तक नागरिक समाज बना ही नहीं है। 

    हम लिंग समाज में जी रहे हैं। ' ये औरत है वो मर्द है' की मानसिकता में जी रहे हैं। औरत-मर्द के संबंधों के आधार पर ही एक- दूसरे के बारे में सोचते हैं।हमने अपने संबंधों को नागरिक संबंधों में रुपान्तरित नहीं किया है। आज भी औरतें सबसे ज़्यादा शारीरिक हिंसा की शिकार क्यों हैं? क्योंकि औरत को शरीर या योनि से ज़्यादा हमारा समाज सोचने को तैयार नहीं है। 
    औरत  या योनि देह नहीं नागरिक है। जीवंत मनुष्य है। औरत का समूचा विमर्श अभी भी माँ , बेटी, बहन के सम्बोधनों से बन रहा है। हम औरत को इन सम्बोधनों और इनसे जुड़े सामाजिक संबंधों से परे जाकर देखने को तैयार नहीं हैं। औरत को जब तक हम इन संबंधों में देखेंगे तब तक औरत पर हमले जारी रहेंगे। औरत की अवस्था और भी बदतर होगी। 
     भारत में नया भारत तब बनेगा जब हम नागरिक के रुप में औरत- मर्द को देखेंगे । लिंगाधारित असमान संबंधों को हमने कभी बुनियादी तौर पर बदलने की मुहिम नहीं चलायी। औरत को लिंगाधारित संबंधों के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने से औरत की मातहत की सामाजिक दशा में बदलाव नहीं आएगा। औरत इस परिप्रेक्ष्य में हमेशा पुरुष संदर्भ से ही परिभाषित होती रही है। 
    औरत को माँ,बहन, बेटी के रुप में देखने का अर्थ है उसे पुरुष संदर्भ में देखना। नागरिक के रुप में औरत को देखा जाय इसकी पहली सीढ़ी है कि हम औरत को 'व्यक्ति' के रुप में देना आरंभ करें और क्रमश : 'व्यक्ति'रुप में उसकी सत्ता,महत्ता और अधिकारों को परिभाषित करें। 
        औरत को व्यक्ति के रुप में न देख पाने के कारण ही हम उसे मनुष्य के रुप में भी नहीं देख पाते। वह हमारी चेतना में लिंग होती है या माँ -बहन-बेटी होती है ,इसके अलावा उसकी कोई अवस्था नहीं होती।
      औरतों पर बढ़ रहे शारीरिक हमलों और बलात्कार की घटनाओं का एक अन्य कारण है मर्दानगी का नग्न प्रदर्शन और उसके श्रेष्ठत्व पर ज़ोर। मर्दानगी को हमारे मीडिया से लेकर राजनीति, संस्कृति से लेकर शिक्षा तक, धर्म से लेकर न्याय तक सबने महिमामंडित किया है।मर्दानगी को अपरिहार्य मान लिया गया है। मर्दानगी का हमारे यहाँ जो विकल्प औरतों की महिमा के नाम पर सुझाया जाता है वह भी मर्दानगी के ही लक्षणों को पुष्ट करता है। मर्दानगी का अहर्निश प्रचार- प्रसार हमारे मनोजगत को संचालित करता रहता है। यह हमें स्वाभाविक लगने लगा है।
    सामाजिक विकास के लिए मर्दानगी का महिमामंडन या फिर परंपरागत भावबोध का महिमामंडन इस तरह किया जाता है कि हम स्वतंत्र रुप में औरत की व्यक्ति और नागरिक के रुप में स्थिति को परिभाषित ही नहीं कर पाते। औरत को नागरिक के रुप में हम अभी तक अपने मन में बिठा नहीं पाए हैं। यह हमारे लोकतंत्र की अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी है।
     हमने लोकतंत्र में नागरिक की पहचान को अर्जित नहीं किया और न उसके लिए कोई आंतरिक और सामाजिक संघर्ष ही चलाया। हमने मान लिया कि हम नागरिक हैं और हमारा समाज लोकतांत्रिक है। 
     लोकतंत्र या नागरिकबोध प्रदत्त नहीं होता, वह संवैधानिक घोषणाओं के साथ ही हमें नहीं मिल जाता बल्कि उसके लिए सचेत रुप में सामाजिकस्तर पर संघर्ष चलाने की ज़रुरत है। इस काम को हमारे यहाँ अभी तक किसी ने नहीं किया। 
      हमने औरत को शिक्षित बनाया, नया उत्पादक बनाया लेकिन औरत और समाज में नागरिकबोध पैदा नहीं किया। औरत के ऊपरी उपकरण बदले लेकिन उसकी आंतरिक संरचनाएँ पुरानी बनी रहीं। हमें कमाऊ औरत चाहिए लेकिन नए मूल्यबोधवाली नागरिकबोध से युक्त औरत नहीं चाहिए । यही वह बिंदु है जहाँ से औरत के हकों और उसके शरीर पर बराबर हमले हो रहे हैं। 
       औरत को हम क़ानून -व्यवस्था का मसला न मानें। औरतें क़ानून भंजक नहीं हैं।लेकिन औरतें हमारे क़ानूनी मशीनरी की शिकार जरुर हैं। हमारी सारी क़ानूनी मशीनरी और समाज पूरी तरह से औरत को शक की नज़र से देखता है।
    औरतें सुरक्षित रहें इसके लिए ज़रुरी है कि हम उन पर विश्वास करना सीखें । औरत पर शक करना उसका अपमान है। औरत पर शक के कारण ही यह मानसिकता बनी है कि औरत तो पापिन होती है। नागिन होती है। औरत को हमने न तो समाज में सम्मान से देखा और नहीं घर में सम्मान और विश्वास की नज़र से देखा। इसके अलावा औरत के अंदर पुंसवादी मूल्यों और विश्वासों को भी बिठाया गया है। आज वास्तविकता यह है कि औरत का साथ देने को औरत ही तैयार नहीं होती। 
     औरत आज जितनी अकेली और असहाय है उतनी असहाय और कमज़ोर वह पहले कभी नहीं थी। हम औरत को पूँजीवादी उत्पादन संबंधों के परिप्रेक्ष्य में नए सिरे से परिभाषित करें तो चीज़ें ज़्यादा साफ़ नज़र आएँगी। 
    औरत के दो शत्रु हैं । पहला शत्रु है पूँजीवाद और दूसरा शत्रु हैं पितृसत्ता। औरत को मुक्ति हासिल करने के लिए पुंसवाद के ख़िलाफ़ समझौताहीन संघर्ष चलाना होगा। औरत इस संघर्ष में सफलता हासिल करें इसके लिए ज़रुरी है पुरुष भी उसका साथ दें। 
   औरत को संरक्षण के लिए क़ानून चाहिए लेकिन पुंसवादी नज़रिए से रहित। भाई ,पिता,बेटा चाहिए लेकिन पुंसवाद के बिना। औरत को हम औरत रहने दें उसे पुंसवादी साँचे में न ढालें। औरत को पुंसवादी साँचे में ढालने और पुंसवादी नज़रिए से देखने के कारण ही औरत आज सबसे ज़्यादा असहाय और हिंसा की शिकार है।
    हम सब एकजुट होकर पुंसवादी विचारधारा और पुंसवादी मूल्यों का हर स्तर पर विरोध करें। पुंसवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष घर के अंदर और हमारे दिलोदिमाग़ के अंदर चलाने की ज़रुरत है। 
      

सोमवार, 13 सितंबर 2010

सामूहिक बलात्कार है वेश्यावृत्ति


        मैं कोलकाता में रहता हूँ और इस महानगर मे वेश्यावृत्ति बड़े पैंमाने पर होती है। शहर में अनेक बड़े अड्डे हैं। कोलकाता वेश्यावृत्ति को इंडोर और आउटडोर दोनों ही स्थानों में सहज ही देख सकते हैं। वेश्याएं यह जानती हैं कि देह-व्यापार का धंधा देह शोषण है। औरत का इस धंधे में बहुस्तरीय शोषण होता है। यह धंधा छत के नीचे बंद कमरे में चले या खुले में धंधेवाली को पुलिस को पैसा देना पड़ता है।

आश्चर्य इस बात का है कि इस शहर में बड़े पैमाने पर लोकतांत्रिकचेतना है। वाम और गैर-वाम दोनों ही किस्म की विचारधाराओं का यह बड़ा केन्द्र है। इसके बावजूद वेश्यावृत्ति का इतना व्यापक कारोबार कैसे चल रहा है ? मैं इसे किसी भी तर्क से समझने में असमर्थ हूँ। अनेक इलाकों में तो शाम को गलियों और पार्क वगैरह में आना-जाना संभव नहीं होता। कभी-कभार पुलिस वाले डंडा फटकारते भी दिखते हैं लेकिन पुलिस के जाते ही सब कुछ पहले की तरह चलने लगता है। यह बात यहां के सारे बुद्धिजीवी, राजनीतिक लोग और प्रशासन के लोग जानते हैं। लेकिन कोई रास्ता नहीं दिखता कि इस धंधे को कैसे रोका जाए ?

मैं अचम्भित भी हूँ कि जो लोग रैनेसां से लेकर वाम तक,ममता से लेकर महाश्वेता देवी तक का आए दिन जय-जयकार करते रहते हैं उनमें से किसी ने भी इस धंधे के खिलाफ किसी भी किस्म की कार्रवाई करने,वेश्याओं के पुनर्वास, इलाज, उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई आदि के सवालों पर कभी सार्वजनिक बहस नहीं चलायी। बल्कि समय-समय पर वेश्याओं के संगठनों के द्वारा प्रदर्शन आदि जरूर निकलते हैं और उनमें इस धंधे को कानूनी जामा पहनाने की मांग एक-दो दिन जरूर उठती है। बाद में फिर सब कुछ धंधे में खो जाता है। कुछ लोग यह मानते हैं कि इन औरतों को कानूनन अधिकार दे दिया जाना चाहिए क्योंकि वे बंद घरों में ही तो धंधा कर रही हैं। यह किसी को दिखाई थोड़े ही दे रहा है। सार्वजनिक स्थानों पर धंधा करने से बेहतर है इन वेश्याओं को घर के अंदर धंधे का कानूनी अधिकार दे दिया जाय।

यह एक कॉमन तथ्य है कि इस धंधे में औरतें स्वेच्छा से नहीं आतीं बल्कि वे दलालों के द्वारा लाई जाती हैं। दलाल ही हैं जो गरीबी,अभाव, भुखमरी,दंगा प्रभावित,हिंसा प्रभावित इलाकों में गिद्ध की तरह मंडराते रहते हैं। इन इलाकों में उन्हें धंधे के लिए आसानी से लड़कियां कम से कम दाम में मिल जाती हैं।

वेश्यावृत्ति एक तरह से ‘भुगतान बलात्कार’ या ‘स्वैच्छिक गुलामी’ है। वेश्यागामी मर्द वेश्या को बलात्कार करने के लिए भुगतान करता है। प्रसिद्ध स्त्रीवादी आंद्रिया दोर्किन के अनुसार ‘‘वेश्यावृत्ति: क्या है? यह पुरुष द्वारा मैथुनक्रिया के लिए स्त्री शरीर का उपयोग है। वह रुपया खर्च करता है और जो चाहे करता है। जैसे ही आप इससे दूर होते है, वेश्यावृत्ति से अलग दूसरी दुनिया, विचारों की दुनिया में चले जाते है सचाई बदल जाती है। आप अच्छा महसूस करते हैं; आप अच्छे समय में होते हैं; आपको ज्यादा मज़ा आता है; यहाँ विवेचन करने के लिए बहुत कुछ है, किंतु आप वाद-विवाद विचारों पर करते हैं वेश्यावृत्ति पर नही। वेश्यावृत्ति विचार नहीं है। यह मुख है, जननांग है, मलाशय है जिसका एक पुरुष के नहीं बल्कि अनेकानेक पुरूषों के लिंग, कभी-कभी हाथों, कभी वस्तुओं द्वारा भेदन किया जाता है। यही इसका मूल वीभत्स स्वरूप है।’’

ऐसे भी नैतिकतावादी हैं जो कहेंगे कि विश्वविद्यालय प्रोफेसर होकर वेश्यावृत्ति के बारे में चर्चाएं कर रहा है। खासकर कोलकाता में तो कमाल के लोग हैं। वे ज्योंही इस विषय को देखेंगे तुरंत निंदा अभियान आरंभ कर देंगे। इसी तरह के संदर्भ को ध्यान में रखकर आंद्रिया ने लिखा ‘‘अकादमिक विभागों की आधारभूत धारणा ही वेश्यावृत्ति में फँसी महिलाओं के जीवन की सच्चाइयों से दूर छिटकी हुई है। अकादमिक जीवन की प्रस्तावना/तथ्य इस विचार पर ही आधारित है कि हमारा कल है, भविष्य है और आनेवाला कल है और यह आगामी अनवरत है, या कोई भी अध्ययन के समय निष्क्रिय बर्फीले निर्जीव के अंदर से निकल सकता है, या यहाँ विचारों का ऐसा विमर्श संभव है एवं ऐसा स्वाधीन वर्ष भी जहाँ आप बिना किसी भय के असहमत हो सकते हैं। प्रस्तुत तथ्य पढ़नेवालों तथा पढ़ानेवालों पर हमेशा लागू होते हैं। ये वस्तुत: उन औरतों के जीवन के प्रतिकूल हैं जो या तो वेश्यावृत्ति में हैं या थीं।’’

‘‘यदि आप वेश्यावृत्ति में हैं तो आपके मस्तिष्क में कोई कल नही होता क्योंकि कल बहुत दूर होता है। आप नहीं मान सकते कि आप केवल एक क्षण से दूसरे क्षण ही जीएंगें। आप ऐसा नही मान सकते और आप ऐसा नहीं मानते। यदि मानते है तो आप मूर्ख हैं, और वेश्यावृत्ति के संसार में मूर्ख होना घायल होना है, मृत होना है।’’

       सब जानते हैं कि वेश्यावृत्ति के धंधे में हिंसा चरम पर रहती है। इससे औरत को शारीरिक और मानसिक रूप से गंभीर क्षति पहुँचती है। वह संवेदना के धरातल पर पूरी तरह बर्बाद हो जाती है। इन औरतों की दलालों के द्वारा इस कदर दिमागी धुलाई की जाती है कि वे अपने धंधे के बारे में सार्वजनिक तौर पर पत्रकारों या समुदाय के नेताओं से बातें करने से परहेज करती हैं। यह एक सर्वस्वीकृत तथ्य है कि धंधेवाली घर में धंधा करे या अड्डे या सार्वजनिक स्थान पर उसे बार-बार शारीरिक हमलों और हिंसाचार का शिकार होना पड़ता है।

आंद्रिया ने लिखा है ‘‘यदि मैं आप से कहूँ कि आप अपने शरीर के बारे में सोचें-तो ऐसा करते हुए आपको पोर्नोग्राफरों द्वारा निर्मित नीरस, निष्क्रिय, मृत मुखों, जननांगों एवं गुदा के दर्शन होंगे। मैं चाहती हूँ कि आप अपने शरीर के इस उपयोग को लेकर ठोस और गंभीर चितंन करें। यह दृश्य कितना कामुक है? कितना आनंददायक है? जो व्यक्ति वेश्यावृत्ति और पोर्नोग्राफी की प्रतिरक्षा करते है वे वस्तुत: आप में उसी आलोड़न, सनसनी, रोमांच को देखना चाहते है ताकि आप हमेशा स्त्री में कुछ घुसेड़ा हुआ या चिपका हुआ ही कल्पित करें। मैं चाहती हूँ कि आप उसके शरीर के कोमल तंतुओं को महसूस करें जिनका अब तक दुरुपयोग होता रहा है। मैं चाहती हूँ कि आप इस अहसास को महसूस करें कि कैसा लगता है जब यह बार-बार यह घटित होता है: क्योंकि यही वेश्यावृत्ति है।
इसलिए वेश्यावृत्ति में फँसी स्त्री या वेश्यावृत्ति में रह चुकी स्त्री के नजरिए से स्थान भिन्नता, फिर चाहे वह प्लाज़ा होटल हो या कोई घटिया स्थान, का कोई अर्थ नहीं होता। ये बेमेल तथ्यों पर आधारित असंगत धारणाएँ हैं। आपके अनुसार ज़ाहिरा तौर पर परिस्थितियों का बड़ा महत्व होता हैं। जीन नहीं, कारण कि हम मुख, जननांग और मलाशय की बात कर रहे हैं। वेश्यावृत्ति को परिस्थितियाँ न तो बदल सकती हैं न ही न्यून कर सकती हैं। ’’

एक फिनोमिना यह भी देखा गया है कि इस धंधे में खाते-पीते घरों की लड़कियां भी तेजी से आ रही हैं। ये वे लड़कियां है जो धंधा करके जल्दी से मोटी रकम कमाना चाहती हैं। शानोशौकत की जिंदगी जीना चाहती हैं। गरीब घरों की लड़कियां अभाव और गरीबी के कारण आ रही हैं। लेकिन खाते-पीते मध्यवर्गीय परिवारों की लड़कियां ड्रग एडिक्शन, पॉकेटमनी की तलाश और बालशोषण की शिकार होने के कारण इस धंधे में आ रही है।  
       आंद्रिया ने लिखा है ‘‘वेश्यावृत्ति अपनेआप में ही स्त्री देह का दुरुपयोग है। हममें से जो ऐसा कहते है, उन पर अति-साधारण सोच या सामान्य विचारों से युक्त होने के आरोप लगाए जाते हैं। लेकिन सचमुच वेश्यावृत्ति अपने आप में सरल, साधारण है। और यदि आपके पास सहज, सामान्य दिमाग नहीं है तो आप इसे कभी समझ नहीं सकते।
      आप जितने जटिल, पेचीदा होते जाते है, उतना ही आप सत्य से दूर होते जाएँगे- आप अधिक सुरक्षित होते जाएँगे, ज्यादा खुश होंगे, वेश्यावृत्ति पर बात करते हुए आप बहुत आनंदित होंगे। वेश्यावृत्ति में कोई भी स्त्री सम्पूर्ण,  स्वस्थ नही होती। स्त्री-देह का जिस प्रकार वेश्यावृत्ति में इस्तेमाल होता है उस प्रकार किसी भी मानव-शरीर का उपयोग करना असंभव है। इसके बावजूद वेश्यावृत्ति के अंत में, या मध्य में, या आरम्भ के निकट ही पूरे मनुष्य शरीर को प्राप्त करना भी असंभव है। यह असंभव ही है। और बाद में स्त्री भी कभी पूर्ण नही हो पाती, खुद से ही वंचित हो जाती है। वेश्यावृत्ति में दुरुपयोग व दुर्व्यवहार झेलती औरत के पास कुछ विकल्प होते है।    
          आपने ऐसी साहसी महिलाओं को भी देखा होगा जो महत्वपूर्ण चुनाव करती हैं: वे जो जानती हैं उसका इस्तेमाल करती हैं, जो कुछ जानती हैं उसे आप तक संप्रेषित करने का प्रयास भी करती हैं। फिर भी हर कोई परिपूर्णता से वंचित रह जाता है, अधूरा, अपर्याप्त रह जाता है। क्योंकि जब हमला आपके भीतर हो रहा हो, क्रूरता आपकी त्वचा के अंदर हो रही हो, तो आपका बहुत कुछ छिन जाता है। हम अपने दर्द को एक-दूसरे तक संप्रेषित करने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। इसकी वकालत करते हैं, इसके सटीक सम्प्रेषण के लिए सादृश्य निर्मित करते हैं। मेरे अनुसार वेश्यावृत्ति की तुलना सिर्फ सामूहिक बलात्कार से की जा सकती है। ’’

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