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मंगलवार, 7 सितंबर 2010

फेसबुक पर 7 सितम्बर की हड़ताल



     आज मजदूरों के विभिन्न संगठनों ने मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर मंहगाई और दूसरी समस्याओं को लेकर राष्ट्रीय हड़ताल की। विभिन्न कल-कारखानों और औद्योगिक क्षेत्रों में यह हड़ताल बेहद सफल रही है। मैंने फेसबुक के जरिए जानने कोशिश की थी कि विभिन्न इलाकों में हड़ताल कैसी रही और इस कुछ दोस्तों ने जो प्रतिक्रिया भेजी है वह देखने लायक है इससे हड़ताल का अंदाजा लगेगा साथ ही दोस्त कैसे देख रहे हैं इसका भी अंदाजा लगेगा। 
   उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों और मजदूरों तथा कर्मचारियों के फेडरेशनों बीएमएस, एचएमएस, सीटू, एआईयूटीयूसी, टीयूसीसी, एआईसीसीटीयूयूटीयूसी तथा एलपीएफ ने गत जुलाई को नयी दिल्ली में मजदूरों की दूसरी अखिल भारतीय कन्वेन्शन का आयोजन किया था। केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों और मजदूरों तथा कर्मचारियों के फेडरेशनों के प्रतिनिधि गत जुलाई को मजदूरों की दूसरी राष्ट्रीय कन्वेंशन में एकत्रित हुए और उन पांच साझा मांगों पर संयुक्त कार्रवाई के कार्यक्रम की समीक्षा की। देश की सामाजिक , आर्थिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों पर गहन विचार-विमर्श किया गया। 
      पिछले अधिवेशन में लिए गए निर्णय जिसमें विरोध दिवस, प्रदर्शन, धरना, सत्याग्रह, जेल भरो आंदोलन जिसमें लगभग 10 लाख से ज्यादा मजदूरों ने भाग लिया था, की भी समीक्षा करते हुए इन कार्यवाहियों के बाद पैदा हुई स्थितियों पर विचार करते हुए 7 सितम्बर 2010 को राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान करते हुए सर्वसम्मति से निम्नलिखित घोषणा पत्र पारित किया।
      महंगाई पर  खासतौर से खाद्य कीमतों में बढ़ोत्तरी पर अंकुश लगाने के लिए प्रभावी कदम उठाने की ट्रेड यूनियनों की मांग के बावजूद खाद्य कीमतें बढ़कर 17 फीसदी तक पहुंच गयी हैं। तथा मुद्रास्फीति बढ़कर दो अंकों में पहुंच गयी है और सरकार मेहनतकश अवाम की भारी तकलीफों को कम करने के मामले में पूरी तरह उदासीन बनी हुई है। 
    श्रम कानून तथा ट्रेड यूनियन अधिकारों के निर्बाध उल्लंघन पर ट्रेड यूनियनों द्वारा चिंता व्यक्त किए जाने के बावजूद स्थिति हर दिन गंभीर तथा दमनकारी बनती जा रही है। रोजगार हानि, अर्द्ध रोजगार असहनीय जीवन स्थितियों, बढ़ते काम के घंटों, अंधाधुंध ठेकाकरण, अस्थायीकरण तथा आउटसोर्सिंग के खिलाफ ट्रेड यूनियनों के विरोध के बावजूद मेहनतकश अवाम की जीवन स्थितियों में गिरावट तथा अमानवीय शोषण को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा।
     मुनाफे वाले सार्वजनिक क्षेत्र के विनिवेश के खिलाफ ट्रेड यूनियनों के विरोध के बावजूद कोल इंडिया लि., बीएसएनएल, सेल, एनएलसी, हिन्दुस्तान कॉपर, एनडीएमसी आदि में ताजा विनिवेश को लागू किया जा रहा है और अंधाधुंध विनिवेश की हानिकर नीति बेरोकटोक जारी है। ट्रेड यूनियनों के यह मांग करने के बावजूद असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए बिना किसी पाबंदी के सार्वभौम सर्वसमावेशी सामाजिक सुरक्षा कवरेज की खातिर एक भारी कल्याण फंड की स्थापना की जाए, फंड आबंटन मामूली बना हुआ है और प्रतिबंधात्मक प्रावधान जारी है। 
     कन्वेन्शन चिंता के साथ यह नोट करता हैकि न सिर्फ ट्रेड यूनियनों के विरोधों की अनदेखी की जा रही है बल्कि उस नीति को भी जोरशोर से लागू किया जा रहा है जिससे खाद्यान्नों की कीमत बढ़ी हैं। इनमें ताजातरीन है पेट्रोलियम कीमतों को नियंत्रण मुक्त करके उन्हें अंतर्राष्ट्रीय बाजार से जोडऩा जिसके चलते मिट्टी के तेल, रसोई गैस, डीजल तथा पेट्रोल की कीमतों में भारी इजाफा हुआ है। इसलिए यह कन्वेशन 7 सितम्बर 2010 को अखिल भारतीय आम हड़ताल के लिए आव्हान करने का संकल्प लेता है। कन्वेन्शन संबद्धताओं के आर-पार देश के पूरे मेहनतकश अवाम का आह्वान करता है कि देशव्यापी आम हड़ताल को पूरी तरह सफल बनाने के लिए और संघर्ष को और सघन बनाने के लिए नंवबर / दिसम्बर 2010 को संसद पर मजदूरों के जबर्दस्त प्रदर्शन की तैयारी के लिए लामबंद करें। इस संदर्भ में ही    मैंने फेसबुक पर लिखा था - भारत में आज केन्द्रीय मजदूर संगठनों के आह्वान पर राष्ट्रीय हड़ताल चल रही है। मेरे शहर कोलकाता और समूचे प्रांत में इस हड़ताल ने आम हड़ताल की शक्ल ले ली है। यह मजदूर संगठनों की मंहगाई के विरोध की गई जायज हड़ताल है। आपके शहर और प्रांत में यह हड़ताल कैसी रही कृपया बताएं
   इसके जबाब में दोस्तों ने बताया-

Subhash Rai08 सितंबर 2010 को 04:32 बजे
Jagdishwar jee, Agra mandal men bhee hadtal ka vyaapak asar raha. sadakon par aavajaahee kam rahee, sarkaree daftar soone rahe.

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Niranjan Shrotriya- September 8, 2010 at 6:41am
जगदीश्वर भाई! दुखद है की मध्य प्रदेश में अब ट्रेड यूनियन्स का वह प्रभाव अब नहीं रहा! केवल बॅंक्स में छुटपुट असर दिखा! कुल मिलाकर हड़ताल निष्प्रभावी ही रही
Kishan Kaljayee - wrote:
"Delhi me bhi mujhe band ka koee khas asar nahi dikha.Lekin yah hadtal jaruri mudde par thi."

Divik Ramesh commented -
"दिल्ली महानगर ही नहीं देश की राजधानी हॆ । फिर भी काफ़ी अचर रहा हॆ । मुझे १९७३-७४ के दिन याद आ गये । महगाई के विरोध में ही मॆने भी धारा १४४ तोड़ी थी ऒर भूपेश गुप्त जॆसे बड़े नेताओं के साथ जेल (तिहाड़ जेल) में भी रहा था । शायद अध्यापक होने के नाते नॊकरी नहीं गई ।"
Ashish Tripathi - yahan banaras men to kuch ka pata hi nahin chal raha hai...

Asrar Khan -
"Delhi samet NCR mein hadtal kafee had tak kamyaab rahi ..Trade unions ne jamkar akta dikhai  jise dekhkar aissa laga ki vartmaan sarkar se log keval asantust hi nahin  valki sarkar se logon ka vishvaas uth gaya hai... mujhe lagta hai ki hamara desh bahut bade asantosh ki taraf badh raha hai."
ent you a message.
           
Jitendra Srivastava-  08 सितंबर 2010 को 08:52 बजे
dilli men vasa hee hai jaisa aksar hota hai.
Abdul wrote:
"yes com this is Indian Historic movment, long live All india UTUC ..........."
and Ajay Kamath like this.
Tapan Dasgupta -All Central Trade Union called an all India industrial stike agaist price rise, contract system, rights of the unorganised workers, privatisation etc., which got tremendous support and has been a great sucess. In Vadodara thousands of workers took out a rally from Mandvi - a historic central place of Vadodara to Collector Office and submitted a memorundum to him.
message.
           
Shri Krishna Sharma- 07 September 2010 at 17:34
दिल्ली के मजदूरों की स्थिति दूसरे राज्यों के मजदूरों से ज्यादा खराब है। कभी किसी बहाने तो कभी किसी वजह से , उन्हें एक जगह पर रहने तक
नहीं दिया जाता है इसलिए वे हक की लडाई तक में पीछे रह जाते हैं। एक तो कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी, ऊपर से घनी बरसात ने मजदूरों को बिखेर कर रखा है। इस वजह से यहाँ उतना प्रभाव दिखाई नहीं दिया जितना आप वहाँ बता रहे हैं।
     
Pankaj Chaturvedi- 08 September 2010 at 09:42
delhi is the capital and i saw little bit effect on auto rickshaw, except life was normal
Anupam Ojha - "Mumbai me atyant safal rahi ye hadataal !"

Vineet Kumar- 
सॉरी सर,अभी आपका मैसेज देख पाया। दिन में फर्स्ट हाफ में थोड़ा असर दिखा लेकिन शाम के वक्त सीपी में तो सारी दूकानें खुली दिखी। काफी-चहल पहल भी। मयूर विहार में रहता हूं,वहां कोई असर नहीं दिखा।
ent you a message.
     
Meethesh Nirmohi-  samanya rukh hee raha.

Sudha Tiwari - "चंडीगढ़ में बंद का असर मिला- जुला रहा.बैंक वगैरह बंद थे,स्कूल सारे खुले रहे और सड़क पर निजी वाहन ही चल रहे थे,बस- ऑटो वालो ने बंद का साथ  पूरी तरह से दिया जबकि   टैक्सी वालों ने आंशिक रूप से ."


Satyanand Nirupam -
dilli mein kuchh pata nahin chal paya, jahan tak main dekh paya...

Ajay Saklani - जगदीश्वर जी, मैं दिल्ली में रहता हूँ और यहाँ हड़ताल के लिए कोई जगह नहीं है| जंतर मंतर में जो लोग आन्दोलन करते हैं वो वहां आन्दोलनकारियों की भीड़ में खो जाते हैं| रोजाना वहां जा पाना नहीं हो पता है और समाचार वाले तो सर्कार और पूंजीपतियों के गुलाम हैं| तो असर कैसा है उसे जान पाना थोड़ा मुश्किल है| गरीबों को इस आन्दोलन के बारे में या तो पता नहीं है क्योंकि वो अपने जीने के लिए दो पैसे कमाने में व्यस्त हैं और अमीर इसे तमाशा समझते हैं| कौन जी रहा है और कौन मर रहा है इस से अमीरों को कुछ लेना देना नहीं है| उन्हें तो बस हराम की कमाई पसंद है| 
कुछ आन्दोलन ऐसे भी हैं जिन्हें समझ पाना बहुत मुश्किल है| उन आंदोलनों में बैठे ज़्यादातर लोग यह भी नहीं जानते की वो यहाँ क्यों बैठे हैं क्योंकि उन्हें राजनीति के तहत किसी राजनीतिक दल के स्वार्थ के लिए उपयोग किया जा रहा है| 

बुधवार, 16 जून 2010

मजदूरों का असम्मानजनक जीवन

( प्रोफेसर यू जियान आंग)
        चीन में इन दिनों मजदूरवर्ग हडताल पर है। देश के विभिन्न इलाकों की विभिन्न फैक्ट्रियों से हड़ताल की खबरें आ रही हैं। मजदूरों के हड़ताल पर जाने से सारा देश डरा हुआ है। लोगों का मानना है मजदूरों का इस तरह सड़कों पर आंदोलन करते हुए निकलना सामाजिक अशांति पैदा कर सकता है।
      हाल ही में आल चाईना फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियन ने एक बयान में कहा है कि वह मजदूरों के कानूनी अधिकारों के संरक्षण और सदभावपूर्ण संबंधों के निर्माण के लिए प्रयास जारी रखेगा। यूनियन का मानना है कि चीन के मजदूर ज्यादा सम्मानजनक अवस्था में जीते रहे हैं। सामाजिक स्थिरता के लिए मजदूरों के सम्मान की रक्षा करना जरूरी है। यूनियन के इस बयान में पहली बात गलत है कि चीन में मजदूरवर्ग सम्मानजनक ढ़ंग से जीवनयापन करता रहा है। हकीकत यह है कि मजदूरों के पास न्यूनतम सामाजिक-राजनीतिक सुरक्षा नहीं है। जीवनशैली बेहद कष्टमय है। काम के क्षेत्र और रहने के क्षेत्र में अनेक विषमताएं हैं।
     इस बयान में पहलीबार मजदूरों के सम्मान के साथ सामाजिक अस्थिरता को जोड़कर देखा गया है। पहलीबार यह बात चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चलने वाले संगठन ने मानी है कि मजदूरवर्ग के सम्मान को बढ़ाने का एकमात्र उपाय है उसके राजनीतिक अधिकारों में बढ़ोतरी। मजदूर के सम्मानजनक जीवन के अभाव में सामाजिक शांति बनाए रखना संभव नहीं होगा। चीन की यूनियन के इस बयान को चीन की समाजविज्ञान अकादमी के रूरल डवलपमेंट इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रोफेसर यू जियान आंग ने अपने लेख में उद्धृत किया है।
   यूनियन के बयान में कहा गया है कि चीन में ऐतिहासिक ,सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन घट रहे हैं। सरकारी कारखानों में रिस्ट्रक्चरिंग हो रही है। निजी क्षेत्र विकसित हो रहा है। अनेक स्थानीय सरकारें स्थानीय नीतियां बना रही हैं। इनमें मजदूरों के अधिकारों को पूंजी निवेश के नाम पर तिलांजलि दे दी गयी है। फलतः मजदूरों के अधिकार हाशिए पर चले गए हैं।
     यूनियन के बयान के आधार पर प्रोफेसर साहब ने भी यह माना है कि अनेक कारखाने भाड़े पर चल रहे हैं। ठेके पर ताजिंदगी मजदूरों को बेहद कम मजदूरी पर रख लिया गया है। यह काम सामूहिक हितों की रक्षा के नाम पर किया जा रहा है। अनेक कारखाने सरकारी कारखानों की री-स्ट्रक्चरिंग से निकले हैं।  इन कारखानों को मजदूरों की लूट दुकान भी कह सकते हैं। इन कारखानों में मजदूरों के पास न्यूनतम अधिकार हैं।
    प्रोफेसर यू जियान आंग ने लिखा है कुछ कारखानों में मजदूर भयानक खराब अवस्था में रह रहे हैं। कमरतोड़ मेहनत के बाद भी उन्हें सही पगार नहीं मिलती। वे इतनी कम मजदूरी में काम करते हैं कि ठीक से गुजारा तक नहीं कर पाते। उत्पादन की जगह मजदूर रोबोट बना दिए गए हैं। इन मजदूरों को किसी भी किस्म का सम्मान प्राप्त नहीं है। यू जियान आंग ने लिखा है मजदूरों को अपने राजनीतिक अधिकारों, आर्थिक हितों और सम्मान की रक्षा के लिए हर स्तर पर संघर्ष करना चाहिए और सभी किस्म के तरीके अपनाने चाहिए।  अनेक सरकारी अधिकारी यह मानते हैं कि मजदूरों के अधिकारों के नाम पर हो रही घटनाओं से सामाजिक अस्थिरता पैदा हो रही है।
     विश्व विख्यात राजनीतिविज्ञानी सेमुअल पी. हंटिंगटन ने ‘पोलिटिकल आर्डर इन चेंजिंग सोसायटी’  में लिखा है कि आरंभिक औद्योगिक समाजों में मजदूरों की हड़ताल और सामाजिक अन्तर्विरोधों का प्रधान कारण था कि जो लोग शक्तिशाली थे,सत्ता में थे,वे मजदूरों के अधिकारों को नहीं मानते थे अथवा कानूनी तौर पर मजदूर यूनियन के अस्तित्व को नहीं मानते थे। ये अधिकार तब ही माने गए जब 19वीं सदी के सामाजिक संघर्षों ने इन्हें स्थापित कर दिया। उस समय अनेक सरकारें मजदूर संघों की वैधता पर ही सवालिया निशान लगाती थीं।  जितना मजदूरों की यूनियनों को अस्वीकार किया गया उतना ही मजदूर संगठन रेडीकल होते चले गए।
    जो लोग सत्ता में थे वे मजदूर संघों को अपने लिए चुनौती मानते थे। यह वह मनोदशा थी जिसके कारण मजदूरों ने मौजूदा व्यवस्था को चुनौती दी। बीसवीं शताब्दी में आकर औद्योगिक समाजों के अन्तर्ग्रथित हिस्से के रूप में मजदूर संघों को इज्जत की नजर से देखा गया। विकसित पूंजीवादी मुल्कों में संगठित मजदूर आन्दोलन है। जबकि अविकसित देशों में मजदूर संघ सीमित संख्या में हैं। आज मजदूरों के राष्ट्रीय फेडरेशन होना सम्मान का बात मानी जाती है। चीन में अशांति को खत्म करना है तो मजदूरों को हक देना होगा।          








बुधवार, 28 अप्रैल 2010

भारत बंदः विकासदर का सर्जक मनमोहन सिंह या मजदूरवर्ग ?

      कल मंहगाई के सवाल पर भारतबंद था। यह भारत बंद मंहगाई और अन्य समस्याओं पर जनता के गुस्से का इज़हार है। यह संघर्षशील जनता की हाल के समय में सबसे सार्थक कार्रवाई भी है। जिस समय बंद चल रहा था उसी समय संसद में मंहगाई और दूसरी समस्याओं पर विपक्ष  के बजट कटौती प्रस्तावों पर मतदान हो रहा था और शाम को चैनलों पर बंद और बजट प्रस्तावों पर विपक्ष की हार का चैनल वाले सरकारी भोंपू की तरह प्रचार कर रहे थे। चैनलों की इस निर्लज्ज हरकत की जितनी निंदा की जाए कम है।
     असल में संसद में सरकार जीती और जनता में सरकार हार गयी । मंहगाई आदि समस्याओं पर इतना व्यापक जनाक्रोश हाल के वर्षों में नजर नहीं आया। हमें सोचना चाहिए संसद महान है या जनता महान है ? जनता को मंहगाई के अंधकूप में डालने का जनादेश कांग्रेस को नहीं मिला था। जो सरकार जनादेश के बाहर चली जाए उसे शासन करने का राजनीतिक अधिकार नहीं है।
    एकबार संसद के बारे में कवि धूमिल ने लिखा था मेरी संसद तेली की वह घानी है जिसमें आधा तेल आधा पानी है।
      हमें इस सवाल पर सोचना चाहिए कि कारपोरेट मीडिया को मजदूरवर्ग नापसंद क्यों है ? क्या मजदूरवर्ग और उनके हितैषी संगठनों की राष्ट्र निर्माण में कोई भूमिका नहीं है ? क्या 7-8 या 9 प्रतिशत की विकासदर मनमोहन-सोनिया -प्रणव जैसे नेताओ के श्रम का परिणाम है या मजदूरवर्ग की मेहनत का परिणाम है ? कारपोरेट उत्पादन के लिए किसे श्रेय दें मालिक को या मजदूर को ? चैनलों के बेवकूफ एंकरों से लेकर टॉक शो में शामिल होने वाले भाड़े के कारपोरेट विचारक-राजनीतिज्ञ सिर्फ एक सवाल का जबाव दें देश की उत्पादक शक्ति मजदूर हैं या मनमोहन सिंह ?
    भारत बंद के कवरेज पर चैनलों और खासकर कारपोरेट मीडिया का मजदूरवर्ग के प्रति, बंद के प्रति घृणास्पद रवैय्या देखने लायक था। यह सच है कि बंद को व्यापक सफलता मिली और इसमें वामदलों और मजदूर संगठनों की केन्द्रीय भूमिका थी। यह 13राजनीतिक दलों के द्वारा आयोजित बंद था। कारपोरेट मीडिया ने बंद करने वालों को जनता का विरोधी करार दिया है। बंगला में चर्चित नाम है ‘कर्मनाशा दिन’,इसका खूब प्रचार किया गया।
      कुछ कारपोरेट पैरोकार यह भी तर्क दे रहे थे कि बंद से क्या मंहगाई कम हो जाएगी ? बंद से दैनिक मजदूरों का नुकसान हुआ है। देश को आर्थिक नुकसान हुआ है। असल में इस तरह के तर्क उपयोगितावादी राजनीतिक दर्शन के गर्भ से निकले हैं। यह फिनोमिना अमरीकी विचारकों के द्वारा निर्मित उपयोगितावादी दर्शन की देन है। इसके अनुसार वही करो जो उपयोगी हो। वही पढ़ो जो उपयोगी हो। जिससे काम बने उसे दोस्त बनाओ। उपयोगी नहीं तो बेकार है। येनकेन प्रकारेण काम बनाओ।  इस तरह के चिंतन का कारपोरेट मीडिया विज्ञापनों से लेकर समाचारों तक अहर्निश प्रचार चल रहा है।यह मूलतः निहित स्वार्थी असामाजिक दर्शन है।
    फिलहाल हम मीडिया के द्वारा बंद और मजदूरवर्ग के प्रति व्यक्त नजरिए पर गंभीरता से विचार करें।  
     टेलीविजन का मजदूरवर्ग के साथ गहरा अंतर्विरोध है। टेलीविजन की प्रकृति अ-जनतांत्रिक है। जबकि मजदूरवर्ग की प्रकृति जनतांत्रिक है। मजदूरों के मसले अमूमन खबर नहीं बनते। खबर तब ही बनते हैं जब मजदूरवर्ग हड़ताल पर जाता है। मजदूरवर्ग की खबरें सामान्य खबर की कोटि में नहीं आतीं। ये वर्ग विशेष की खबरें हैं। टेलीविजन हमेशा इस वर्ग की खबरों को सामान्य खबर की कोटि में रखकर पेश करता है।    
      टेलीविजन के लिए मजदूरवर्ग की हड़ताल और आम जनता के बीच अंतर्विरोध है। जबकि अवधारणात्मक और सामाजिक तौर पर मजदूरवर्ग के संघर्षों का आम जनता के हितों के साथ अंतर्विरोध नहीं है और न टकराहट है। किंतु ज्योंही मजदूरवर्ग हड़ताल पर जाता है अथवा अपने हकों की लड़ाई शुरू करता है उसका समूचे समाज के साथ अंतर्विरोध दिखाने पर टेलीविजन जोर देने लगता है। टेलीविजन यह भूल जाता है कि जिस तरह जनतंत्र में नागरिकों के हक होते हैं, जिम्मेदारियां होती हैं,उसी तरह मजदूरवर्ग के भी हक होते हैं,जिम्मेदारियां होती हैं।
      जिस तरह नागरिकों को अपने सामान्य जीवनयापन की अनुकूल परिस्थितियों की जरूरत होती है, उसी तरह मजदूरवर्ग को भी सामान्य नागरिक परिवेश, आवश्यक सुविधाएं और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण की जरूरत होती है।
    टेलीविजन प्रस्तुतियों में मजदूरवर्ग की हड़ताल हो या सामान्य राजनीतिक कार्रवाई हो आदि सभी मामलों में टेलीविजन पूर्वाग्रह से काम लेता है।जब तक हड़ताल की संभावना नहीं होती तब तक मजदूरवर्ग को टेलीविजन पर्दे पर आने नहीं दिया जाता।   
     टेलीविजन जब हड़ताल की खबर का प्रसारण करता है तो पहला संदेश यह देता है कि यूनियनवाले आर्थिक स्थिति बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यूनियन के नेता की छवि हड़ताली नेता के रूप में पेश की जाती है। आम तौर पर हड़ताल की खबर को विकास विरोधी खबर के तौर पर पेश किया जाता है। उन तत्वों,संगठनों आदि पर बल होता है जो हड़ताल विरोधी होते हैं। उनके बयानों को बगैर किसी प्रमाण के पेश किया जाता है। इसके विपरीत मजदूरों के प्रामाणिक बयानों और तथ्यों को छिपाया जाता है। हड़ताल के मुद्दों को तमाम किस्म की आत्म- सेंसरशिप और कारपोरेट सेंसरशिप से गुजरना होता है। उन्हें चलताऊ ढ़ंग से पेश किया जाता है।
     आम तौर पर मजदूरों के बारे में टेलीविजन में मजदूर विरोधी लोग ज्यादा बोलते नजर आते हैं। टेलीविजन कैसे मजदूर विरोधी मानसिकता का प्रदर्शन करता है इसका आदर्श नमूना है टेलीविजन पर आने वाली व्यापारिक खबरें। इन खबरों में जब कभी यह बताया जाता है कि फलां-फलां कंपनी ने इस तिमाही या साल में मुनाफा कमाया तो इसका श्रेय मालिक को दिया जाता है न कि मजदूरों को।
    आज हिन्दुस्तान की ज्यादातर मुनाफा कमाने वाली कंपनियां मजदूरों के श्रम के कारण मुनाफे पर चल रही हैं। किंतु कोई कंपनी जब मुनाफा कमाती है तो टेलीविजन पर्दे पर मालिक या मुख्य प्रबंधक की छवि दिखाई देती है कंपनी के मजदूर नेता की छवि दिखाई नहीं देती।
    मजदूरों के जीवन में सालों-साल जो कुछ भी घटता है उसकी ओर टेलीविजन कभी ध्यान नहीं देता। किंतु हड़ताल पर तुरंत ध्यान देता है। हड़ताल के पहले मजदूर किस तरह की मुसीबतों का सामना करते रहे हैं,उनके घरों में किस तरह की मुश्किलों से परिवारीजनों को गुजरना पड़ा है। बच्चे समय पर स्कूल जा पाते हैं या नहीं। मजदूरों की औरतों को किस तरह की मुश्किलों से दो-चार होना पडता है। मजदूर परिवार को दो जून की रोटी मिल रही है या नही ? ये सारी चिन्ताएं टेलीविजन की नहीं है।
      टेलीविजन कैमरा मजदूर बस्तियों में प्रवेश ही नहीं करता। कभी यह जानने की कोशिश नहीं की जाती कि आखिरकार मजदूर कैसे रहते हैं ? मलिन बस्तियों में कैमरा जाएगा,वेश्यालयों और वेश्या बस्तियों में टेलीविजन वाले जाएंगे किंतु मजदूर बस्तियों में नहीं जाएंगे । इसका प्रधान कारण यह है कि मजदूर परजीवी नहीं है। वह उत्पादक शक्ति है। समाज को पैदा करके देता है। कैमरे में यदि उत्पादक शक्तियों का संसार उजड़ा हुआ नजर आएगा इससे मीडिया के उस प्रचार की पोल खुल जाएगी कि मजदूरों को बहुत वेतन मिलता है। सामान्य तौर पर पूंजीपतिवर्ग की छोटी सी समस्या भी खबर बन जाती है किंतु मजदूरों के बड़े-बड़े हादसे भी खबर नहीं बन पाते।
    सामान्य तौर पर धनियों की बस्ती में  कोई चोरी की घटना हो जाती है तो मुख्य खबर बन जाती है किंतु मजदूरों की बस्तियों, मलिन बस्तियों में गुंड़े सनसनाते घूमते रहते हैं। उत्पीड़न करते रहते हैं।किंतु खबर नहीं बन पाती। सवाल उठता है कि मजदूर रैली या प्रदर्शन या धरना या हड़ताल क्यों करते हैं ? क्या  वे काम चोर हैं ? क्या उनके कारण पूंजीपति के मुनाफों में कमी आई है ?जी नहीं।
   मजदूर हड़ताल या रैली तब निकालते हैं जब प्रशासन उनकी तकलीफों की तरफ ध्यान नहीं देता। यहां तक कि उनकी शिकायतों को भी कोई नहीं सुनता। मजदूर शौकिया तौर पर हड़ताल या रैली के अस्त्र का इस्तेमाल नहीं करते। बल्कि मजबूरी में,अपनी बातों को प्रशासन तक प्रभावशाली रूप में पहुँचाने के लिए ऐसा करते हैं। ये उनकी अभिव्यक्ति के रूप हैं।
    टेलीविजन अपनी अभिव्यक्ति पर किसी भी किस्म का हमला बर्दाश्त नहीं कर सकता किंतु समाज के कमजोर तबकों खासकर उत्पादक शक्तियों की अभिव्यक्ति के रूपों के खिलाफ माहौल बनाने में सबसे आगे रहता है। यही मीडिया का अधिनायकत्व है।इससे जनतंत्र का विकास बाधित होता है।
    

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