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शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

एमिल दुर्खीम की महान कृति आत्महत्या का हिन्दी में प्रकाशन

   विख्यात फ्रांसीसी समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम के चार बड़े कामों में से केवल लि सुइसाइड अनुवाद के लिए बचा है। दि एलिमेंटरी फार्म ऑफ दि रिलिजियस लाइफ पहली बार 1915 में अंग्रेजी में छपी; दि डिविजन ऑफ लेबर इन सोसाइटी 1933 में और दि रूल्स ऑफ सोशियोलोजिकल मैथड 1938 में। लि सुइसाइड को पहली बार छपे पचास वर्ष से अधिक हो गए हैं लेकिन समाजशास्त्रीय, सांख्यिकीय और मनोवैज्ञानिक क्षेत्रों में इसके प्रति दिलचस्पी किसी पुराने काम के प्रति दिलचस्पी से कहीं अधिक है। सामाजिक विचारधारा की दृष्टि से इसका ऐतिहासिक महत्व ही अंग्रेजी पाठक संसार में इसे ले जाने का पर्याप्त कारण बन जाता है। समाजशास्त्र में यह पुस्तक मील का पत्थर है और फ्रांस में शैक्षिक समाजशास्त्र की आधारशिला रखने वाले और उसे सुदृढ़ करने वाले और फ्रांस के बाहर दुनिया को प्रभावित करने वाले व्यक्ति को समझने के लिए अपरिहार्य है। इसे देखते हुए इसका बहुत पहले अनुवाद हो जाना चाहिए था।
आज हमारी सांख्यिकीय सामग्री अधिक परिष्कृत और व्यापक है और दुर्खीम के मुकाबले हमारा सामाजिक मनोवैज्ञानिक तंत्र बेहतर स्थापित है, लेकिन आत्महत्या पर उनका काम विषय को आंकड़ों, तकनीकों और संचित ज्ञान के साथ पकड़ने की दृष्टि से आज भी एक आदर्श है। उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में जब दुर्खीम अपने काम में शामिल अन्वेषण कर रहे थे उस समय इस या अन्य किसी विषय के बारे में सांख्यिकीय सूचना के भंडार (सरकारी या निजी) बहुत कम, अपर्याप्त या खस्ता हालत में थे। अपनी स्वाभाविक ऊर्जा और कुछ छात्रों की, विशेषकर मार्सेल मॉस की मदद से दुर्खीम ने सामान्य समस्या और इसकी आंतरिक तफसील से जुड़े सवालों का उत्तर खोजने के लिए उपलब्ध आंकड़ों को फिर से संजोया। उस समय सांख्यिकीय तकनीक बहुत कम विकसित थी। अपनी लेखन-यात्रा में दुर्खीम को नए तकनीकों का अन्वेषण करना पड़ा। सांख्यिकीय तकनीकों के गाल्टन और पियरसन जैसे अन्वेषकों को छोड़कर सामान्य सह-संबंधों के तत्वों की किसी को जानकारी नहीं थी। बहु और आंशिक सह-संबंध की भी यही स्थिति थी। इसके बावजूद दुर्खीम ने प्रणाली विज्ञानिक अध्यवसाय और अनुमिति द्वारा आंकड़ों की शृंखलाओं में संबंध स्थापित किया।
दुर्खीम द्वारा बनाई गई तालिकाओं को अनुवाद में यथावत रख दिया गया है। सांख्यिकीय प्रस्तुतीकरण के मौजूदा मानकों के अनुसार उन्हें तब्दील करने का कोईप्रयास नहीं किया गया है। इस तरह से उनका अपना ऐतिहासिक मूल्य और अपनी विशेषता है। उनको अलंकृत करने से उस वातावरण का पता नहीं चलता जिसमें उन्हें आवश्यकतानुसार तैयार करना पड़ा। हालांकि हाल के आंकड़े उपलब्ध हैं, लेकिन अपने आंकड़ों के जरिए दुर्खीम जो सूचना देना चाहते थे वह आज भी समाजशास्त्रियों और सांख्यिकीविद के लिए दिलचस्पी का विषय है। वास्तव में (आत्महत्या पर सैनिक जीवन के प्रभाव के बारे में) एक तालिका को एक सर्वोत्तम पत्रिका में आत्महत्या पर हाल ही के एक निबंध में यथावत ले लिया गया।1
अपने ऐतिहासिक और प्रणाली वैज्ञानिक अभिप्राय के अलावा लि सुइसाइड का महत्व अपनी विषयवस्तु और उसे पकड़ने के समाजशास्त्रीय ढंग में भी निहित है। दुर्खीम यह स्थापित करना चाहते हैं कि जो बात हमें अत्यधिक वैयक्तिक और व्यक्तिगत तत्व लगती है वास्तव में उसके बीज सामाजिक ढांचे और समाज पर उसके प्रभाव में निहित होते हैं। मनोविकृति विज्ञान पर क्रांतिकारी निष्कर्ष और समकालीन सांख्यिकीविदों के श्रेष्ठ आंकड़े भी इस समस्या को पूरी तरह से पकड़ नहीं पाए हैं। हम परिचय में इस बारे में अधिक विस्तार से बात करेंगे।
ऐसे भी लोग हैं जो सामाजिक कारण-कार्य संबंध के क्षेत्र में अब भी लि सुइसाइड को सर्वोत्कृष्ट नहीं तो उत्कृष्ट रचना मानते हैं। साथ ही ज्ञान के समाजशास्त्र के रूप में जाने जाने वाले क्षेत्र में दुर्खीम ने अहंभाव परार्थता और एनोमी में अनुस्यूत सामूहिक चेतना अवस्थाओं के साथ विचार-व्यवस्थाओं को संबध्द करने का जो प्रयास इस पुस्तक में किया है वह कम महत्वपूर्ण नहीं है।
अंत में लि सुइसाइड सामाजिक व्याख्या के दुर्खीम के बुनियादी सिध्दांतों को मूर्त रूप में दरशाती है। उनके सामाजिक यथार्थवाद, जो समाज को उसके हिस्सों के योग से कहीं अधिक बड़ा मानता है, और उससे जुड़ी सामूहिक प्रतिरूप और सामूहिक चेतना की अवधारणा को यहां एक विशेष समस्या क्षेत्र पर लागू किया गया है और इसके बहुत अच्छे परिणाम निकले हैं। क्योंकि दुर्खीम ने न केवल प्रणालीवैज्ञानिक और स्वत: शोध प्रणाली सिध्दांत तैयार किए (विशेष रूप से दि रूल्स ऑफ सोशियोलोजिकल मेथड) बल्कि काफी बड़े क्षेत्र में अनुसंधान द्वारा उनकी परख भी की। वह कभी इस बात से इनकार नहीं करते कि उनके काम में कुछ जोड़ना, संशोधन करना और हमारे ज्ञान में इजाफा करना जरूरी होगा क्योंकि वह वैज्ञानिक प्रयास को एक सामूहिक काम मानते थे जिसके निष्कर्ष एक पीढ़ी द्वारा दूसरी पीढ़ी को सौंपे जाते हैं और इस प्रक्रिया द्वारा उनमें सुधार लाया जाता है।
यह अनुवाद दुर्खीम की मृत्यु के तरह वर्ष बाद और 1897 में पहले संस्करण के तैंतीस वर्ष बाद 1930 में प्रकाशित संस्करण से किया गया है। इस संस्करण का पर्यवेक्षण मार्सेल मॉस ने किया। यहां अपने संक्षिप्त परिचय में प्रोफेसर मॉस ने बताया कि पुनर्मुद्रण विधि के कारण मुद्रण और संपादन संबंधी कुछ गलतियों को दूर करना संभव नहीं था। डॉ जॉन ए. स्पॉल्डिंग की मदद से मैंने पाठय और सांख्यिकीय पड़ताल द्वारा जहां पता लग सका है और उन्हें दूर करने का प्रयास किया है।
यहां अनुवाद के पाठ के लिए मैं पूरी जिम्मेदारी लेता हूं। डॉ. स्पॉल्डिंग और मैंने पहले मसौदे पर काम किया। उसके बाद हम दोनों ने दूसरे मसौदे पर काम किया। लेकिन अंतिम परिवर्तन अकेले मैंने किए हैं।
मेरे एक छात्र श्री जेरोम एच. कोलनिक ने टंकित प्रति और प्रूफरीडिंग में मेरी मदद की है। उन्होंने केवल रुटीन काम नहीं किया है और उनके बहुत से सुझाव मेरे लिए बहुत मूल्यवान सिध्द हुए हैं।
दि सिटी कॉलेज, न्यूयॉर्क    जॉर्ज सिंपसन
1 नवंबर 1950
  ( एमिल दुर्खीम-आत्महत्या,अनुवादक-रामकिशन गुप्ता,ग्रंथ शिल्पी,बी-7 सरस्वती कॉम्प्लेक्स,सुभाष चौक,लक्ष्मी नगर,दिल्ली-110092)

शुक्रवार, 18 जून 2010

फासीवाद के प्रधान लक्षण -2- लालबहादुर वर्मा

नस्लवाद : जर्मनी में खास तौर पर यहूदियों को निशाना बनाया गया। उन्हें शोषक और राष्ट्रविरोधीयहां तक कि प्रथम विश्वयुध्द में जर्मनी की पराजय के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया गया। वे हर क्षेत्र में अपनी जनसंख्या के अनुपात में बहुत अधिक सफल और समृध्द थे। इसलिए सामान्यर् ईर्ष्या-द्वेष के लक्ष्य थे। इसलिए उन्हें दमन और प्रताड़ना का शिकार बनाया गया और ईष्यालु जनसंख्या का समर्थन मिला ही। हिटलर ने अपनी आत्मकथा में इस मुद्दे पर विशेष जोर दिया था। अब वह इसे सुनियोजित ढंग से कार्यान्वित करता गया। यहूदियों के विस्थापन को अन्य जर्मनों के संस्थापन से जोड़ दिया गया। ईर्ष्या और घृणा पर आधारित षडयंत्रात्मक राजनीति जब एक पूरे समाज को मनोरोग की तरह ग्रसती चली गई तो विस्थापन और उत्पीड़न विध्वंस तक पहुंचा दिया गया और जर्मनी और विजित क्षेत्रों जैसे पोलैंड में बाकायदा 'आउसविट्ज' जैसे कुख्यात 'यातना कैंप' बनाए गए जहां यहूदियों पर घातक प्रयोग किए जाते, उनसे कठिन श्रम करावाया जाता और अंत में उन्हें भट्ठियों में झोंक दिया जाता। यह महाविध्वंस (॥शद्यशष्ड्डह्वह्यह्ल) मानव-कृत बर्बरता का चरम बिंदु है। यहूदियों के पलायन और विनाश से व्यवसाय, नौकरियों और संस्थाओं में गैर-यहूदी जर्मनों को विशेषकर मध्यवर्गीय जर्मनों को, तात्कालिक लाभ मिला। यह निश्चित ही पर्याप्त उत्प्रेरणा थी।
नस्लवाद भारत में अस्पृश्यता, दक्षिण अफ्रीका में 'अपारथाइड' (रंगभेद), अमरीका में अश्वेत-उत्पीड़न आदि के रूप में सारे संसार में कई-कई रूपों में मौजूद रहा है पर इतनी सुनियोजित-संगठित राजनीतिक हथकंडे के रूप में जर्मनी में नात्सीवाद ने इसका ही इस्तेमाल किया था। इसका सबसे तरनाक और त्रासद आयाम यह था कि इतने जघन्य अपराध को समाज का मौन समर्थन ही नहीं प्राय: प्रोत्साहन मिला। इस संक्रामक रोग से मानवता अब तक नहीं उबर पाई है और इसका आक्रमण विविध रूपों में होता ही रहता है। भारतीय समाज तो इसके लिए सबसे ऊर्वर जमीन साबित होता रहा है।
प्रचार-प्रदर्शन प्रभावी राजनीतिक उपकरण : फासीवाद ने मिथ्या प्रचार और भ्रामक प्रदर्शनों का अभूतपूर्व इस्तेमाल किया और तब से ऐसा प्रचार-प्रदर्शन राजनीतिक संगठनों का प्रिय हथकंडा बन गया है। वैसे तो समाज को मुट्ठी में रने के लिए इतिहास के प्रारंभिक काल से ही शासकों ने प्रदर्शन और प्रतीकों का भरपूर इस्तेमाल किया है। सिंहासन, शासन-दंड, विशेष वस्त्राभूषण, विशेष भव्य आयोजन का इस्तेमाल आदिम काल से आज के गणतंत्र दिवस के परेडों तक होता ही रहा है। पर फासीवाद ने विज्ञान और मनोविज्ञान का इस काम के लिए अप्रत्याशित और अभूतपूर्व इस्तेमाल किया। हिटलर के प्रचार तंत्र गोएबल्स ने मिथ्या को मिथकीय और गाथात्मक गरिमा प्रदान कर दी। उसका कथन मुहावरा बन गया कि अगर झूठ को सौ बार दोहराया जाए तो वह सत्य बन जाता है।
फासिस्टों ने प्रदर्शनों और जनसभाओं में तामझाम, गाजे-बाजे-ग्लैमर का आकर्षक और प्रभावी प्रयोग करना शुरू किया। नाटकीय वक्तृता में हिटलर बेजोड़ साबित हुआ। शक्ति-प्रदर्शन के लिए, झंडों-पताकों, बाजे-गाजे, मार्च-परेड आदि के साथ विरोधियों, संभावित-विरोधियों और शत्रुओं की पिटाई से हत्या तक का बेहिचक प्रयोग होने लगा। प्रदर्शन की ऐसी तकनीकों की तात्कालिक प्रभाविता ने जनता को आकर्षित और लामबंद करने में ऐसी सफलता प्राप्त की कि अब तो सभी राजनीतिक और धार्मिक संगठन इन फासीवादी उपकराणों का ¹ुलेआम इस्तेमाल करने लगे हैं।
अवसरवादी विचारधारा : फासीवादी व्यवहार तो काफी गोचर और उजागर हो गया है पर यही ढोल में पोल फासीवादी सिध्दांत और विचारधारा पर भी लागू होता है। रोजे बूर्दरों ने तो दो टूक कहा है कि फासीवाद की कोई विचारधारा नहीं थी। हर जगह अवसरवादिता व्याप्त थी।
उदाहरण के लिए कम्युनिज्म पर सबसे बड़ा हमला फासीवाद ने ही किया है पर उसके बहुत से उपकरणों और लाक्षणिकताओं का मुसोलिनी और हिटलर ने बाकायदा और भरपूर इस्तेमाल किया। समाजवाद में समानता पर जोर को अपने अनुयायियों की भ्रामक और भावनात्मक समानता को प्रतिपादित करने में किया गया। कभी-कभी धनिकों और पूंजीवाद की विलासिता और आत्मकेंद्रिता की आलोचना भी की जाती। वर्ग संघर्ष और द्वंद्वात्मकता को नकारने के लिए सभी को महत्वपूर्ण करार दिया गया हालांकि जर्मन मेहनतकश का भी पूर्ववत शोषण-उत्पीड़न-दमन जारी रहा।
राष्ट्रवाद एकांतिक धारणा हैएकोऽहं द्वितीयो नास्ति। फासीवाद में तो एकदम अभिनव प्रयोग किया गया जिसमें दो भिन्न श्रेणियों का एक भ्रामक मिश्रण राष्ट्रीय समाजवाद तैयार किया गया। हिटलर ने अपनी पार्टी का नाम 'नेशनल सोशलिस्ट' पार्टी र¹ा जिसका लोकप्रिय नाम नात्सी पार्टी प्रचारित हुआ। इसमें एक निहित अंतर्विरोध थासमाज राष्ट्रवादी और राष्ट्रवाद समाजवादी हो ही नहीं सकता।
फासीवादी संस्कृति : फासीवाद ने एक संस्कृति का प्रतिपादन और प्रचार प्रसार किया जिसमें सारत: एक पिछड़ापन और अपरिपक्वता निहित थी। उसकी प्रकृति पितृसत्तावादी और सर्वसत्तावादी थी। उसमें नकारात्मकता और निषेध पर अधिक बल था। सकारात्मकता और सृजनशीलता उसके लिए मानो विजातीय थे। तभी तो फासीवाद ने कोई सच्चा विचारक, साहित्यकार और कलाकार नहीं पैदा
किया जिसका कोई स्थायी महत्व हो। आज भी फासीवादियों और कट्टरपंथियों की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि उसके पास सर्जक नहीं है। वह सर्जकों की नहीं विध्वंसकों की ही लामबंदी कर पाता है। फासीवाद में श्रेष्ठता पर इतना बल है कि सामान्यता हेय मानी जाती है। नारी और सामान्य जन फासीवाद में उपेक्षित ही नहीं तिरस्कृत होते हैंभले ही उनका 'मां' और 'गृहलक्ष्मी' और राष्ट्रभक्त के रूप में मिथ्या और भ्रामक गौरवान्वयन किया जाता हो। कुछ बड़े लोगों ने विभिन्न कारणों से फासीवाद का पल्ला पकड़ा भी तो उनका पराभव और पतन ही हुआ जैसे विख्यात अंग्रेजी के कवि एजरा पाउंड का।
फासीवाद ने नैतिकता और सौंदर्यबोध की अपनी ही धारणा प्रस्तुत की जो कुछ शीर्ष-शासक के हितपोषी होने के कारण सर्वजन को कौन कहे बहुजन हिताय भी नहीं हो सकती थी। नेता में ऐहिक ईश्वरस्थ आरोपित होने के कारण कुछ बेहद सतही और छिछला था और है और उसका वास्तव में कल्याणकारी या शुभकारी प्रभाव पड़ ही नहीं सकता।
मानव इतिहास में तो भी विचार और संस्थाएं विकसित हुए हैं बाद में वे कितने ही नकारात्मक सिध्द हुए हों, उनका देश-काल विशेष में कोई न कोई योगदान रहा ही है। यहां तक कि धर्म और ईश्वर के आलोचक भी मानेंगे कि एक समय में उनकी मानव समाज को आगे बढ़ाने में एक निश्चित भूमिका थी। परंतु फासीवाद ने ऐसे विचारों और संस्थाओं को जन्म दिया जो हमेशा ही सारत: नकारात्मक ही रहे। कोई बजिद हो या फासीवाद में सकारात्मकता ढूंढ़ने के लिए और कहे कि फासीवाद देश समाज को अनुशासित करता है (जैसे आपातकाल में भारत हुआ था?), उत्पादन बढ़ जाता है, देश की उपलब्धियां बढ़ जाती हैं और उसकी शक्ति का सम्मान बढ़ता है, तो इसका एक ही जवाब हो सकता हैपागलपन में भी यह सकारात्मक है कि पागल व्यक्ति बहुत शक्तिशाली हो जाता है। पर क्या ऐसी शक्ति, बेफिक्री और मस्ती वांछनीय कही जा सकती है?
फासीवाद की उपर्युक्त लाक्षणिकताएं एक साथ सत्तासीन होने पर उजागर हो गई थीं। परंतु वास्तविकता यह है कि इटली, जर्मनी, स्पेन और जापान में सत्ताच्युत होने के पहले, और बाद में भी, सारे संसार में व्यक्तियों, संगठनों और राज्यों में इनमें से कुछ फासीवादी प्रवृत्तियां और लाक्षणिकताएं परिलक्षित होती रही हैं।
    उदाहरण के लिए हम भारत के आधुनिक इतिहास पर विहंगम दृष्टि भी डालें तो उन्नीसवीं सदी के नवजागरण के दौरान और बीसवीं सदी में भी ऐसे विचारों और संस्थाओं का प्रादुर्भाव हुआ जो एक जाति या धर्म को श्रेष्ठकभी-कभी सर्वश्रेष्ठ मान कर ही अपना ताना-बाना बुनते रहे हैं। वे इतिहास को तोड़-मोड़ कर भी अपनी बात को ही सही साबित करते रहे हैं। वे एक ऐसा अतीत प्रस्तुत करते हैं जिसमें उनकी श्रेष्ठता चरितार्थ थी और एक भविष्य की कल्पना करते हैं जब फिर ऐसा होगा। ऐसी परिकल्पित सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के नाम पर वे तात्कालिक रूप से अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते हैं। इसका राजनीतिक लाभ भी उठाया जाता रहा है। एक परिकल्पित साध्य के लिए कोई भी साधन उपयुक्त करार दिया जाता रहा है।
फासीवाद संकीर्ण निहित स्वार्थों को बहुत सूट करता है और कभी-कभी सत्ता पाने या उसे बनाए र¹ने का एक मात्र तरीका बन जाता है। भारतीय उपमहाद्वीप में पाकिस्तान और बांग्लादेश में तो विकृतियों की बाढ़ आती रहती है पर दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र घोषित कर इतराने वालों में सर्वोपरि जवाहरलाल नेहरू की बेटी ने ही केवल अपनी सत्ता बचाने के लिए देश पर आपातकाल थोप दिया था। फासीवाद का सबसे उजागर रूप 'इंदिरा भारत है और भारत इंदिरा' के नारे के साथ प्रतिपादित कर दिया गया थाऔर इस श्रेष्ठता को समाज के श्रेष्ठ कहे जाने वाले बहुत से बुध्दिजीवियों-साहित्यकारों-कलाकारों-वामपंथियों की भी सहभागिता और मौन समर्थन प्राप्त थी। यह प्रवृत्ति बाद में भी जारी रही है। सभी पार्टियों ने सत्ता में आने पर कोई न कोई फासीवादी कानून पास किए हैं और विरोधियों का दमन किया है।
फासीवादी तरीके क्रामवेल और चैंबरलेन के इंगलैंड, थिओडोर रूजवेल्ट और बुश के अमरीका, पेटै और द गाल के फ्रांस, स्तालिन के रूस, पोलपोत के कंबोडिया और इजराइल और भारत की सभी सरकारों द्वारा अपनाए जाते रहे हैं। फासीवाद के उसी रूप को मानक नहीं मानना चाहिए जिसे मुसोलिनी और हिटलर ने अपनाया था।
रोजे बूर्दरों की किताब की ¹ास बात यह है कि उसमें फासीवाद की मूल प्रवृत्ति और प्रकृति को चिह्नित करने के साथ-साथ उसके सिध्दांत और व्यवहार में अलग-अलग देशों में आई भिन्नता पर भी गौर किया है। इससे हमें दिशा मिलती है कि हम अपने देश-काल की फासीवादी व्यवहारों की पहचान कर सकें। इटली, जर्मनी और स्पेन में क्रमश: फासीवाद, नात्सीवाद और फालांजवाद भिन्न स्थितियों में विकसित और सत्तासीन हुआ और इसलिए उनकी अपनी विशिष्टताओं को चिह्नित किया गया है।
फासीवाद का सबसे उत्कट-बर्बर-विध्वंसक रूप जर्मनी में उजागर हुआ। इसका कारण यह था कि यूरोप में सबसे संभावना संपन्न क्षेत्र होते हुए भी जर्मनी एक देश नहीं था। सोलहवीं सदी में ही मार्टिन लूथर ने रोमन कैथोलिक चर्च के विरुध्द धर्म सुधार के साथ-साथ पवित्र रोमन साम्राज्य के विरुध्द राष्ट्रवाद का भी आह्वान किया था। पर वहां आंतरिक विभाजन और कलह और बाहरी हस्तक्षेप के कारण राष्ट्रीय एकीकरण संभव नहीं हो पा रहा था। जो यथार्थ में संभव नहीं हो पा रहा था वह विचारों और आदर्शों में प्रतिपादित हो रहा था। नीत्शे द्वारा प्रतिपादित सुपरमैन की धारणा जर्मन सामूहिक अवचेतन में एक वांछित प्रतीक और लालच के रूप में स्थापित हो गया था। फ्रांसीसी क्रांति के विचारों का जर्मनी में व्यापक स्वागत हुआ था पर जब नेपोलियन ने सारे जर्मन क्षेत्र को रौंद डाला तो प्रतिकार में प्रशा में पुनरुत्थान हुआ और जर्मन एकीकरण संभव लगने लगा था। पर 1848 की क्रांतियों के दमन ने जर्मन क्षेत्र में जनवादी शक्तियों को हताश कर दिया पर प्रशा के पूंजीवादी विकास ने ऊपर से राष्ट्रीय एकीकरण हासिल करना शुरू किया। प्रशा के चांसलर बिस्मार्क के नेतृत्व में तीन युध्दों के बाद जर्मनी एकीकृत हुआ पर जर्मन श्रेष्ठता को स्थापित और जारी र¹ने के लिए अपनाई गई उसकी षडयंत्रात्मक नीति ने यूरोप में शीतयुध्द शुरू कर दिया था। एकीकरण के बाद 30 वर्षों में वह प्रगति कर लेने के बाद, जिसे इंगलैंड और फ्रांस ने 300 वर्षों में हासिल किया था, जर्मनी ने विश्व रणनीति (ङ्खद्गद्यद्य-श्चशद्यद्बह्लद्बष्) शुरू कर दी थी जो प्रथम विश्वयुध्द तक ले गई।
ब्रिटेन ने आह्वान किया कि इस विश्वयुध्द को 'युध्दों का अंत' करने वाला युध्द होना चाहिए। अंतत: युध्दों का अंत करने वाले युध्द का अंत हुआ पर शुरू हुई ऐसी शांति जिसने शांति का अंत कर दिया। वास्तव में यही हुआ। जर्मनी को इतना अपमानित और दंडित किया गया कि जर्मन लोगों के लिए बर्साई की संधि से मुक्ति राष्ट्रीय सपना बन गया। हताश जर्मनी में हिटलर ऐसा फासीवाद लेकर आया जो जर्मनी में आशा और आत्मविश्वास का संचार कर गया। नात्सीवाद ने नस्लवाद को एक 'सर्जिकल ऑपरेशन' की तरह इस्तेमाल किया और यहूदी कैंसर को काट फेंकना जर्मनी को रोगमुक्त करने के लिए अनिवार्य निदान की तरह पेश किया गया और स्वीकार लिया गया एक अतिवादी रोग का अतिवादी निदान।
जर्मनी में फासीवाद ने सारी सीमाएं तोड़ दीं। वहां एक ऐसा अमानवीय तंत्र सफल दीने लगा जिसने सारी मानवी उपलब्धियों पर मानव-सभ्यता और संस्कृति पर प्रश्न चिह्न ड़ा कर दिया। यह एक ऐसा प्रश्न बन गया है जो इतिहास का सबसे ज्वलंत प्रश्न बना हुआ है आज भी क्योंकि फासीवाद आज भले ही कहीं पूरी तरह सत्तासीन न हो पर वह प्रवृत्ति के रूप में हर कहीं प्रभावी उपकरण के रूप में स्वीकृत और उपयुक्त होता रहा है।
इटली में फासीवाद इसलिए सफल हुआ कि वहां कहा गया कि जर्मनी पराजित होने के बाद जितना तिरस्कृत और अपमानित है इटली तो विजेताओं का साथ देने के बावजूद उतना ही तिरस्कृत है। वहां इटली अभी अपूर्ण है (ढ्ढह्लड्डद्यद्बड्ड द्बह्मह्मद्गस्रड्डह्वह्लड्ड) का नारा उसी तरह कुछ लोगों को प्रभावित करता था जैसे भारत में आज भी '¥¹¢ड भारत' का नारा। वहां उत्तरी इटली की समृध्दि और सिसली की दरिद्रता में इतना असंतुलन था कि 'तर्क से अधिक कारगर चाकू था।' सामंतवाद, विघटन और रूढ़िवादी धर्म (कैथोलिक चर्च) से ग्रस्त इटली में जनतंत्र जड़ नहीं जमा सका था। ऐसे में मुसोलिनी की बात 'फासीवाद का मतलब है अपने को गंभीरता से लेना' काफी कारगर साबित हुई। वह स्वयं समाजवादी रहा था। उसने अपने मोहभंग को राष्ट्रीय मोहभंग बना दिया।
स्पेन आधुनिक काल के प्रारंभ में सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था। पर पूंजीवादी विकास न होने के कारण वहां सामंतवाद फूलता-फलता रहा और लातिन अमरीका में फैला साम्राज्य कामधेनु की तरह स्पेन की आवश्यकताएं पूरी करता रहा। एक परजीवी समाज से क्षरण और तेज हो गया जब उन्नीसवीं सदी में अमरीकी उपनिवेश एक-एक करके आजाद हो गए। फिर भी यूरोप के प्रभाव और कुछ क्षेत्रों के थोड़े औद्योगिक विकास के बाद वहां आधुनिक जनतंत्र अंगड़ाई लेने लगा तो उसका काफी विरोध हुआ। प्रथम विश्वयुध्द के बाद वहां पहली बार एक जनतांत्रिक सरकार चुनी गई। अब तो सारी रूढ़िवादी शक्तियां चर्च-सामंत-सेना एक हो गए और जनरल फ्रांको को आगे करके उन्होंने गृहयुध्द छेड़ दिया। यहां फ्रांको ने एक पिछड़े समाज का फासीवाद विकसित किया।
इस तुलनात्मक पध्दति के कारण फासीवाद की उन संभावनाओं की ओर भी इशारा है जो आज अलग-अलग परिस्थितियों में उजागर हो सकती हैं।
भारत की स्थिति बहुत विडंबनापूर्ण है। एक ओर यहां अनेक समस्याओं के बावजूद जनतंत्र कायम है और कई बार लगता है कि उसकी जड़ें फैल रही हैं। पर कई बार ऐसा भी लगता है कि जनतंत्र के वाहक ही उसके सबसे बड़े विध्वंसक भी हैं। समाज में जिस तरह विघटन और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है और राज्यतंत्र कमजोर साबित हो रहा है, लोग अपनी भी अंग्रेजों के 'राज' या आपातकाल के प्रति 'नॉस्टैलजिक' होते लगते हैं। ऐसी स्थिति फासीवाद के आविर्भाव के लिए ऊर्वर साबित हो सकती है। एक मजबूत राज्य की चाहत और वकालत फासीवाद के लिए चोर दरवाजा खोल सकती है। हमें भूलना नहीं चाहिए कि इटली और जर्मनी में फासीवाद और भारत में आपातकाल पार्लियामेंट के रास्ते ही आया था। इसीलिए खास तौर में भारतवर्ष में फासीवाद की बेहतर और व्यापक समझ जरूरी है।
( निम्नलिखित किताब की भूमिका से)
फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार
  लेखक-  रोजे बूर्दरों
प्रकाशक- ग्रंथ शिल्पी, बी-7,सरस्वती काम्प्लेक्स,सुभाष चौक,लक्ष्मी नगर,दिल्ली-110092
         मूल्य -275                                 
अनुवादक- लाल बहादुर वर्मा

फासीवाद के प्रधान लक्षण -1- लालबहादुर वर्मा

 :    नकारात्मक और आक्रामक राष्ट्रवाद : फासीवाद का सारतत्व है राष्ट्रवाद पर वह नकारात्मक होता है और उसमें एकांतिकता और आक्रामकता का अतिरेक होता है। इतिहास में व्यक्ति और समुदायव्यष्टि और समष्टि, के बीच जितने भी समन्वयक और जोड़ने वाली संस्थाएं और विचार विकसित हुए हैं उनमें सबसे कारगर बंधन राष्ट्रवाद ही साबित हुआ हैधार्मिक आवेग के जेहाद और 'क्रूसेड्स' से भी अधिक शक्तिशाली और विस्फोट का किसी भी सांस्कृतिक आवेग को विस्फोटक ऊर्जा और सांगठनिक शक्ति आर्थिक-राजनीतिक लाभ की उत्प्रेरणा से ही मिलती रही है।
     आधुनिक काल के प्रारंभ में सामंती जकड़बंदियों को तोड़कर पूंजीवाद के विकास के लिए नई लामबंदी जरूरी थी। पूंजीवाद के अनिवार्य उपकरण के रूप में राष्ट्रवाद का प्रादुर्भाव हुआ और उसने बृहत्तर समुदायों को जोड़ने के लिए जनवाद को हथियार की तरह तराशना शुरू किया। इसी प्रक्रिया में फ्रांस, इंगलैंड, हालैंड और बेल्जियम आदि में राष्ट्र-राज्य विकसित हुए। इन देशों में पूंजीवाद ¹ूब फूला-फला और उसके अनिवार्य बाजारों के रूप में उपनिवेशवाद कारगर हुआ।
     विभिन्न कारणों से इटली जहां पुनर्जागरण का आविर्भाव हुआ था और जर्मनी जहां पूंजीवाद और राष्ट्रवाद के सहचर के रूप में मार्टिन लूथर के धर्म-सुधार का झंडा बुलंद हुआ था राष्ट्र-राज्य के निर्माण में पिछड़ गया। मुख्य कारण इन पर विदेशी शक्तियों का विभाजक प्रभाव था। फ्रांस की क्रांति ने सिध्दांत में और नेपोलियन की विजयों के व्यवहार में इटली और जर्मनी के एकीकरण में आधार प्रस्तुत किया। नेपोलियन के प्रतिकार के लिए भी राष्ट्रवाद एक प्रेरणा-स्रोत बना।
पूंजीवाद राष्ट्रवाद की चालक शक्ति है। जब इटली और जर्मनी में पूंजीवादी-औद्योगिक विकास हुआ तो उसके लिए अनुकूल राजनीतिक संस्थाओं की जरूरतों का दबाव बढ़ा। कहते ही हैं कि आधुनिक राष्ट्रवाद मंडी में जन्मता है। इन क्षेत्रों में मंडियां बढ़ीं तो राष्ट्रवाद अनिवार्य उपकरण लगने लगा। तब जाकर 1871 में इटली और जर्मनी का राष्ट्रीय एकीकरण संभव हो पाया। पर तब तक बाजारों की दौड़ में ये पिछड़ गए थे। अब दौड़ में बने रहने के लिए तेज दौड़ना और आगे निकल गए लोगों को लंगी मारना ही उपाय था। इन दोनों देशों ने दोनों ही हथकंडे अपनाए। ऐसे में इनकी नकारात्मकता और आक्रामकता बढ़ती गई।
इस तरह इटली में फासीवाद, जर्मनी में नात्सीवाद और स्पेन में फालांजवाद आक्रामक तेवर अपना कर ही सत्तासीन हुए। मुसोलिनी ने भूमध्यसागर क्षेत्र और हिटलर ने तो पूरे यूरोप और फिर पूरे विश्व को अपना विस्तार क्षेत्र बना डाला।
सैन्यवाद : आक्रामकता निराधार नहीं हो सकती। उसका सैनिक और आर्थिक आधार होना चाहिए। सैन्यीकरण ऐसे में कारगर उपाय होता है। इससे शासक और राज्य शक्तिशाली होते हैं और देश को अनुशासन में रखा जा सकता है। सेना राज्य का विस्तार करती है और इस क्रम में आर्थिक लामबंदी भी होती चलती है।
मुसोलिनी और हिटलर ने अपनी पार्टियों को भी सैनिक तंत्र की तरह ही संगठित कियापूरी तरह अनुशासन और श्रेणीबध्द। पार्टी और राज्य दोनों विध्वंस और उच्छेदन (ह्यह्वङ्ढद्गह्मह्यद्बशठ्ठ) के कारगर हथियार बना दिए गए। उत्पादन, रोजगार और विस्तार एक दूसरे के पूरक बन गए।
सैन्यवाद को विचारधारात्मक गरिमा प्रदान की गई। मध्यकाल की तरह का गौरव-गान किया जाने लगा। युध्द और विजय का 'ट्रस्ट, क्रोबे, फ्राइट' (विश्वास करो, आज्ञा का पालन करो और लड़ो) यही राष्ट्रीय आह्वान बन गया। मारिओ कार्लो ने कहा : 'इटलीवासी हमेशा युध्दरत रहे हैं और रहेंगे।' हिटलर और मुसोलिनी जनरल की यूनीफार्म में ही दि¹ने लगे। पार्टी के प्रदर्शन सैनिक परेड की तरह होने लगे। पूरा देश युध्दरत सेना की तरह संचालित होने लगा। इसका तात्कालिक प्रभाव पड़ना ही था और पड़ा।
विकृत पूंजीवाद : निश्चित ही ऐसे तामझाम और विस्तारवादी-सर्वसत्तावादी राज्य को चलाने के लिए आवश्यक आधार एक विकासमान अर्थव्यवस्था ही प्रदान कर सकती थी। वह व्यवस्था पूंजीवादी ही हो सकती थी। इटली और जर्मनी के पूंजीपतियों ने फासीवाद को आगे बढ़ाने में अपना लाभ देकर उसकी मदद की थी। सत्तासीन होने के बाद अर्थव्यवस्था का सामान्य विकास उनको स्वीकार्य नहीं था। वैसे भी सामान्य विकास असामान्य जरूरतें नहीं पूरी कर सकता था। इसलिए त्वरित और असाधारण विकास के लिए युध्दस्तर पर उत्पादन कार्य शुरू किया गया। इससे तात्कालिक रूप से तो काफी लाभ हुआ। पर पूंजीवाद के बाजार की स्वतंत्रता एक हद तक निर्णायक होती है। एक फासीवादी राज्य में अत्यधिक केंद्रीकरण किसी को किसी तरह की आजादी नहीं देता। इतने नियंत्रण में बाजार की शक्तियां कुंठित होती हैं। इसके अलावा युध्द जैसी अर्थव्यवस्था असंतुलित होती है। निर्णायक होती हैं सैनिक आवश्यकताएं। उससे जनता की सामान्य आवश्यकताएं महत्वपूर्ण नहीं रह जातीं। भारी उत्पादन रोजगार तो मुहैया कर देता है पर वह उत्पादन युध्द की आवश्यकताओं द्वारा निर्धारित होती है। 1939 में जब विश्वयुध्द शुरू हो गया तो भारी विध्वंस के कारण उत्पादन में और तेजी आ गई। पर यह सब असंतुलित और विकृत उद्विकास था। इससे समाज का स्थायी और संतुलित लाभ नहीं हो सकता था। पूंजीवाद स्वयं सारे समाज की जरूरतें नहीं पूरी करता। उसका विकृत रूप तो निश्चित ही और अधिक असंतोष पैदा कर रहा था।
1929 के बाद जब भारी मंदी आई तो जर्मनी उसका सबसे बड़ा शिकार हो गया। जर्मन मार्क का मूल्य उस कागज के मूल्य जितना भी नहीं रहा जिस पर वह छपा होता था।
ऐसी अर्थव्यवस्था का वास्तविक रूप युध्द के अंतिम दिनों में उजागर होने लगी थी। जब वितरण को कठोर नियंत्रण के हवाले करना पड़ा था। युध्द और फासीवाद के अंत के बाद नए सिरे से निर्माण ने ही अर्थव्यवस्था को उबारा था।
सर्वसत्तावादी व्यवस्था : ऐसा नियंत्रित और कुछ हितों की पूर्ति के लिए संचालित व्यवस्था के लिए कठोर और अतिशय केंद्रीकरण एक मात्र उपाय था। इसलिए फासीवाद सर्वसत्तावादी व्यवस्था के रूप में ही चल सकता है। फासीवाद सत्ता का एक पिरामिड निर्मित करता है जिसमें अंतिम रूप से सत्ता का संचालक सर्वोच्च नेता ही होता है। इसके लिए जनवाद का पूर्णतया नकार होता हैघर से राज्य तक।
इटली और जर्मनी में फासीवाद का प्रादुर्भाव जनतंत्र का इस्तेमाल करते ही हुआ। स्पेन में एक जनतांत्रिक सरकार को अपदस्थ करके हुआ। पर कमजोर पड़ते जा रहे जनतंत्र और अन्य पार्टियों की अदूरदर्शिता और अनिर्णय और असमंजस की स्थिति का लाभ उठाकर एक बार सत्ता हड़प लेने के बाद फासीवाद ने हर तरह की असहमति का उन्मूलन करना शुरू कर दिया। कुछ दिनों में ही न स्थानीय स्वायत्तता बची न संसदीय जनतंत्र। देश में एकमात्र पार्टी और उसके एकमात्र नेता की सत्ता सर्वोपरि स्थापित हो गई। एक ऐसी व्यवस्था कायम हो गई जिसमें नागरिक प्रजा बना दिया गया जिसके केवल कर्तव्य थे, कोई अधिकार नहीं।
इस तरह फासीवाद की मूल प्रकृति जनवाद का पूर्ण नकार और निषेध बन गया।
कम्युनिज्म विरोध : सकारात्मक ऊर्जा का संचार धीरे-धीरे होता है पर नकारात्मकता का विस्फोट हो सकता हैनकारना सारत: सकारात्मक हो तब भी और पूर्णतया नकारात्मक हो तब तो निश्चित ही।
उपनिवेशवाद को नकारने के आह्वान पर भारत जैसे पस्त और पिछड़ते जा रहे देश में भी मानो बिजली दौड़ गई थी। उसी तरह बुरी तरह पराजित, दमित और दंडित और भयानक मंदी का शिकार जर्मनी विजेताओं को नकारने से शुरू कर कम्युनिस्टों और यहूदियों के नकार के माध्यम से लामबंद होता गया। यह कैसे हुआ
होगा इसका आभास भारत में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिंखों को, गुजरात में मुसलमानों और महाराष्ट्र में 'भइयों' को नकारने के आवेग के दौरान देखा जा चुका है। गुजरात में तो महिलाओं को भी हिंसक कार्रवाइयों में भागीदारी करते देखा गया था।
फासीवाद का पहला नकार कम्युनिज्म है क्योंकि उसकी अंतर्राष्ट्रीयता को राष्ट्रविरोधी करार दिया जा सकता है। राष्ट्रमातृपितृभूमि ऐसे प्रतीक हैं कि उनके ¹तरे में हाने का आह्वान लोगों को और लगावों से खींचकर राष्ट्र के नाम पर लामबंद कर देते हैं। इसमें भीतरघात का तरा लोगों को और आक्रामक बना देता है।
इटली और जर्मनी में देर से उद्योगीकरण हुआ था। वहां औद्योगिक नगरों में मजदूरों के भारी संकेंद्रण से भारी समस्याएं पैदा हुई थीं और इसी कारण उनका भारी पैमाने पर संगठन शुरू हो गया था। ऐसा लगता था कि पहली मजदूर क्रांति जर्मनी में ही होगी। अनापेक्षित रूप में हो जाने के बाद यह निश्चित लग रहा था कि अगली क्रांति जर्मनी में ही होगी। लेनिन ने कहा था कि जर्मनी में क्रांति नहीं हुई तो रूस की क्रांति भी चरितार्थ नहीं होगी। जर्मनी की यथास्थितिवादी शक्तियां आतंकित थीं। धर्म और धन को नियंत्रित करने वाले कम्युनिज्म की बाढ़ को नियंत्रित करने के लिए कुछ भी करने को तैयार थे।
ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय परिपूर्णता के मार्ग में कम्युनिज्म और यहूदियों को व्यवधान घोषित किया गया। इससे अभूतपूर्व नकारात्मक ऊर्जा का संचार हुआ। हताश देश आगे उबार लिए गए। षडयंत्र में एक रहस्यवादी आकर्षण होता है। दमित-कुंठित-असंतुष्ट लोगोंविशेषकर बेरोजगार युवा को तत्काल कुछ कर गुजरने का अवसर मिल गया। तेजी से लामबंदी होती चली गई।

( इस किताब की भूमिका से) 
फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार
  लेखक-  रोजे बूर्दरों
प्रकाशक- ग्रंथ शिल्पी, बी-7,सरस्वती काम्प्लेक्स,सुभाष चौक,लक्ष्मी नगर,दिल्ली-110092
         मूल्य -275                                 
अनुवादक- लाल बहादुर वर्मा

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