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सोमवार, 31 जनवरी 2011

1857 में भारत से आने वाले समाचार- कार्ल मार्क्स


     भारत से आने वाली पिछली डाक, जिसमें दिल्ली की 17 जून तक की और बंबई की 1 जुलाई तक की खबरें मौजूद हैं, भविष्य के संबंध में अत्यंत निराशापूर्ण चिंताएं उत्पन्न करती हैं। नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड ऑफ कंट्रोल) के अध्यक्ष, मि. वर्नन स्मिथ ने जब भारतीय विद्रोह की पहले-पहल कॉमन्स सभा को सूचना दी थी, तो उन्होंने विश्वासपूर्वक कहा था कि अगली डाक यह खबर लेती आएगी कि दिल्ली को जमींदोज कर दिया गया है। डाक आई, लेकिन दिल्ली को अभी तक 'इतिहास के पृष्ठों से साफ' नहीं किया जा सका है। उस वक्त कहा गया था कि तोपखाने की गाड़ी 9 जून से पहले नहीं लाई जा सकेगी और इसलिए शहर पर, जिसकी किस्मत का फैसला हो चुका है, उस तारीख तक के लिए हमला रुक जाएगा। पर 9 जून भी बिना किसी उल्लेखनीय घटना के ही गुजर गया। 12 और 15 जून को कुछ घटनाएं हुईं, लेकिन उलटी ही दिशा मेंदिल्ली पर अंगरेजों का धावा नहीं हुआ, बल्कि अंगरेजों के ऊपर विप्लवकारियों ने हमला बोल दिया। लेकिन उनके बारंबार होने वाले इन हमलों को रोक दिया गया है। इस तरह दिल्ली का पतन फिर स्थगित हो गया है। इसका तथाकथित एकमात्र कारण अब घेरे के लिए तोपखाने की कमी नहीं है, बल्कि उसका कारण जनरल बरनार्ड का यह फैसला है कि और फौजों के आने का इंतजार किया जाए; क्योंकि उस प्राचीन राजधानी पर कब्जा करने के लिए, जिसकी 30 हजार देशी सिपाही हिफाजत कर रहे हैं और जिसके अंदर फौजी सामानों के तमाम गोदाम मौजूद हैं, 3 हजार सैनिकों की फौजी शक्ति एकदम नाकाफी थी। विद्रोहियों ने अजमेरी गेट के बाहर भी एक छावनी कायम कर ली थी। अभी तक फौजी विषयों के तमाम लेखक इस बारे में एकमत थे कि 3 हजार सैनिकों की अंगरेजी फौज 30 या 40 हजार सैनिकों की देशी सेनाको कुचलने के लिए बिलकुल काफी थी। और अगर बात ऐसी नहीं होती, तो लंदन टाइम्स के शब्दों में, इंगलैंड भारत को 'फिर से फतह करने' में समर्थ कैसे हो सकेगा?
भारत की सेना में वास्तव में 30 हजार ब्रिटिश सैनिक हैं। अगले छह महीनों में अंगरेज इंगलैंड से जो सैनिक वहां भेज सकते हैं, उनकी संख्या 20 या 25 हजार सैनिकों से अधिक नहीं हो सकती। इसमें से 6 हजार सैनिक ऐसे होंगे जो भारत में यूरोपियनों की खाली हुई जगहों पर काम करेंगे। बाकी बचे 18 या 19 हजार सैनिकों की शक्ति भी कठिन यात्रा की हानियों, प्रतिकूल जलवायु के नुकसानों और अन्य दुर्घटनाओं के कारण कम होकर लगभग 14 हजार सैनिकों की हो जाएगी। वे ही युध्द के मैदान में उतर सकेंगे। ब्रिटिश सेना को फैसला करना होगा कि या तो वह अपेक्षाकृत इतनी कम संख्या के साथ बागियों का सामना करे, या फिर उनका सामना करने का खयाल एकदम छोड़ दे। हम अभी तक इस चीज को नहीं समझ पा रहे हैं कि दिल्ली के इर्द-गिर्द फौजों को जमा करने के काम में वे इतनी ढिलाई क्यों दिखा रहे हैं। अगर इस मौसम में भी गर्मी एक अविजेय बाधा प्रतीत होती है, जो सर चार्ल्स नेपियर के दिनों में सिध्द नहीं हुई थी, तो कुछ महीनों बाद, यूरोपियन फौजों के आने पर, कुछ न करने के लिए बारिश और भी अच्छा बहाना उपस्थित कर देगी। इस चीज को कभी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि वर्तमान बंगावत दरअसल जनवरी के महीने में ही शुरू हो गई थी; और, इस तरह, अपने गोला-बारूद और अपनी फौजों को तैयार रखने के लिए ब्रिटिश सरकार को काफी पहले से चेतावनी मिल चुकी थी।
अंगरेजी फौजों की घेरेबंदी के बाद भी दिल्ली पर देशी सिपाहियों का इतने दिनों तक कब्जा बने रहने का निस्संदेह स्वाभाविक असर हुआ है। बंगावत कलकत्ते के एकदम दरवाजे तक पहुंच गई है, बंगाल की 50 रेजीमेंटों का अस्तित्व मिट गया है, स्वयं बंगाल की सेना अतीत की एक कहानी मात्र रह गई है, और एक विशाल क्षेत्र में विप्लवकारियों ने इधर-उधर बिखरे और अलग-थलग जगहों में फंस गए यूरोपियनों की या तो हत्या कर दी है या वे एकदम हताश होकर अपनी हिफाजत करने की कोशिश कर रहे हैं। इस बात का पता लग जाने के बाद कि सरकार के आसन पर अचानक हमला करने का एक षडयंत्र रच लिया गया था जो, कहा जाता है कि, पूर ब्योरे के साथ मुकम्मिल था, स्वयं कलकत्ते के ईसाई बाशिंदों ने एक स्वयंसेक रक्षा-दल तैयार कर लिया है और वहां की देशी फौजों को तोड़ दिया गया है। बनारस में एक देशी रेजीमेंट से हथियार छीनने की कोशिश का सिखों के एक दल और 13वीं अनियमित घुड़सवार सेना ने विरोध किया है। यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह मालूम होता है कि मुसलमानों की ही तरह सिख भी ब्राह्मणों के साथ मिलकर आम मोर्चा बना रहे हैं; और, इस तरह, ब्रिटिश शासन के विरुध्द समस्त भिन्न-भिन्न जातियों की व्यापक एकता तेजी से कायम हो रही है। अंगरेजों का यह दृढ़ विश्वास रहा है कि देशी सिपाहियों की सेना ही भारत में उनकी सारी शक्ति का आधार है।
अब, यकायक, उन्हें पक्का यकीन हो गया है कि ठीक वही सेना उनके लिए खतरे का एकमात्र कारण बन गई है। भारत के संबंध में हुई पिछली बहसों के दौरान भी, नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड ऑफ कंट्रोल) के अध्यक्ष मि. वर्नन स्मिथ ने एलान किया था कि 'इस तथ्य पर कभी भी जरूरत से ज्यादा जोर नहीं दिया जा सकता कि देशी रजवाड़ों और विद्रोह के बीच किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं है।' दो दिन बाद, वर्नन स्मिथ को एक समाचार प्रकाशित करना पड़ा जिसमें अशुभ सूचक यह परिच्छेद है :
14 जून को अवध के भूतपूर्व बादशाह को, जिनके बारे में पकड़े गए कागजों से पता चला था कि वह षडयंत्र में शामिल थे, फोर्ट विलियम के अंदर कैद कर दिया गया था और उनके अनुयायियों से हथियार छीन लिए गए थे।
धीरे-धीरे और भी ऐसे तथ्य सामने आएंगे जो स्वयं जौन बुल तक को इस बात का विश्वास दिला देंगे कि जिसे वह एक फौजी बंगावत समझता है, वह वास्तव में, एक राष्ट्रीय विद्रोह है।
अंगरेजी अखबार इस विश्वास से बहुत सांत्वना पाते प्रतीत होते हैं कि विद्रोह अभी तक बंगाल प्रेसिडेंसी की सीमाओं से आगे नहीं फैला है और बंबई और मद्रास की फौजों की वफादारी के संबंध में रत्ती भर भी संदेह करने की गुंजाइश नहीं है। लेकिन सुखद विचार के इस पहलू को निजाम की घुड़सवार सेना में औरंगाबाद में शुरू हुई बंगावत के संबंध में पिछली डाक से आई खबर बुरी तरह काटती प्रतीत होती है। औरंगाबाद बंबई प्रेसिडेंसी के इसी नाम के एक जिले की राजधानी है। स्पष्ट है कि पिछली डाक ने बंबई की सेना में भी विद्रोह के श्रीगणेश का एलान कर दिया है। वास्तव में, कहा तो यह जाता है कि औरंगाबाद की बंगावत को जनरल वुडबर्न ने फौरन कुचल दिया है, लेकिन, क्या मेरठ की बंगावत को भी फौरन कुचल दिए जाने की बात नहीं कही गई थी? सर एच. लॉरेंस द्वारा कुचल दिए जाने के बाद, लखनऊ की बंगावत भी क्या पखवाड़े भर बाद पुन: और भी अदम्य रूप में नहीं फूट पड़ी थी? क्या यह याद नहीं है कि भारतीय फौज की बंगावत के संबंध में दी गई पहली सूचना के साथ ही साथ इस बात की भी सूचना नहीं दी गई थी कि शांति स्थापित कर दी गई है? बंबई या मद्रास की सेनाओं का अधिकांश यद्यपि नीची जाति के लोगों का बना है, लेकिन प्रत्येक रेजीमेंट में अब भी कुछ सौ राजपूत मिल जाएंगे। बंगाल की सेना के उच्च वर्ण के विद्रोहियों के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए यह संख्या पर्याप्त है। पंजाब को शांत घोषित किया गया है, लेकिन इसी के साथ हमें सूचित किया गया है कि 'फिरोजपुर में, 13 जून को, फौजी फांसियां हुई थीं'! और, इसी के साथ बाघन की सेनापंजाब की 5वीं पैदल सेना की '55वीं देशी पैदल सेना का पीछा करने में सराहनीय कार्य करने' के लिए प्रशांसा की गई है। कहना पड़ेगा कि यह बहुत ही विचित्र प्रकार की 'शांति' है!
(14 अगस्त 1857 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5091, में प्रकाशित हुआ।)


मंगलवार, 25 जनवरी 2011

भारत में विद्रोह- फ्रेडरिक एंगेल्स


गर्मी और वर्षा के गर्म महीनों में भारत का अभियान लगभग पूर्ण रूप में स्थगित कर दिया गया है। सर कॉलिन कैंपबेल ने एक शाक्तिशाली प्रयास के द्वारा अवध और रुहेलखंड के तमाम महत्वपूर्ण स्थानों पर गर्मी के प्रारंभ में ही अधिकार कर लिया था। उसके बाद उन्होंने अपने सैनिकों को छावनी में रख दिया है और बाकी देश को खुले तौर पर बागियों के कब्जे में छोड़ दिया है। और अपनी कोशिशों को वे संचार के अपने साधनों को बनाए रखने तक ही सीमित रख रहे हैं। इस काल में महत्व की जो एकमात्र घटना अवध में हुई है, वह है मान सिंह की सहायता के लिए सर होप ग्रैंट का शाहगंज के लिए अभियान। मान सिंह एक ऐसा देशी राजा है जिसने काफी हीले-हवाले के बाद कुछ ही समय पहले अंगरेजों के साथ समझौता कर लिया था और अब उसके पुराने देशी मित्रों ने उसे घेर लिया था। यह अभियान केवल एक सैनिक सैर के समान सिध्द हुआ-यद्यपि लू और हैजे की वजह से अंगरेजों का उसमें भारी नुकसान हुआ होगा। देशी लोग बिना मुकाबला किए ही तितर-बितर हो गए और मान सिंह अंगरेजों से जा मिला। इतनी सरलता से प्राप्त हुई इस सफलता से यद्यपि यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरा अवध इसी प्रकार आसानी से अंगरेजों के सामने नत-मस्तक हो जाएगा, लेकिन इससे यह तो मालूम ही हो जाता है कि बागियों की हिम्मत एकदम टूट गई है। अंगरेजों के हित में यदि यह था कि गर्मी के मौसम में आराम करें, तो विल्पकारियों के हित में यह था कि वे उन्हें अधिक से अधिक परेशान करें। लेकिन इसके बजाए कि वे सक्रिय रूप से छापामार युध्द का संगठन करें, दुश्मन ने जिन शहरों पर अधिकार कर रखा है उनके बीच के उसके संचार-साधनों को छिन्न-विच्छिन्न करें, उसकी छोटी-छोटी टुकड़ियों को घात लगाकर रास्ते में ही साफ कर दें, दाना-पानी की खोज करने वाले उसके दलों को हलकान कर दें, रसद की सप्लाई के काम को नामुमकिन बना दें, अर्थात उन सब चीजों का आना-जाना एकदम रोक दें जिनके बिना अंगरेजों के कब्जे का कोई भी बड़ा शहर जिंदा नहीं रह सकता हैइन सब चीजों को करने के बजाए, देशी लोग लगान वसूल करने और उसके दुश्मनों ने जो थोडी सी मोहलत उन्हें दे दी है, उसका उपभोग करने में ही वे प्रसन्न हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि, मालूम होता है कि, वे आपस में लड़ भी गए हैं। न ही ऐसा मालूम होता है कि इन चंद शांतिपूर्ण हफ्तों का उपयोग उन्होंने अपनी शक्तियों को पुनर्संगठित करने, गोला-बारूद के अपने भंडारों को फिर से भरने, अथवा नष्ट हो गई तोपों की जगह दूसरी तोपें इकट्ठा करने के ही काम में किया है। शाहगंज की उनकी भगदड़ प्रकट करती है कि पहले की किसी भी पराजय की अपेक्षा अब उनका विश्वास अपने में और अपने नेताओं में और भी कम हो गया है। इसी बीच अधिकांश राजे-रजवाड़ों और ब्रिटिश सरकार के बीच गुप्त पत्र-व्यवहार चल रहा है। ब्रिटिश सरकार ने, आखिरकार, देख लिया है कि अवध की पूरी सरजमीन को हड़प जाना उनके लिए एक अव्यावहारिक सा काम है और इसलिए इस बात के लिए वह अच्छी तरह राजी हो गई है कि उचित शर्तों पर उसे फिर उसके पुराने स्वामियों को लौटा दी जाए। इस भांति, अंगरेजों को अंतिम विजय के संबंध में अब कोई संदेह नहीं रह गया है और इसलिए लगता है कि अवध का विद्रोह सक्रिय छापामार युध्द के दौर से गुजरे बिना ही खतम हो जाएगा। अधिकांश जमींदार-ताल्लुकेदार अंगरेजों के साथ ज्योंही समझौता कर लेंगे, त्योंही विप्लवकारियों के दल छिन्न-भिन्न हो जाएंगे और जिन लोगों को सरकार का बहुत ज्यादा डर है वे डाकू बन जाएंगे और उन्हें पकड़वाने में फिर किसान भी सरकार को खुशी-खुशी मदद देंगे।
अवध के दक्षिण-पश्चिम में जगदीशपुर के जंगल इस तरह के डकैतों के लिए एक अच्छा आश्रय-स्थल मालूम पड़ते हैं। बांसों और झाड़ियों के इन अभेद्य जंगलों पर अमर सिंह के नेतृत्व में विप्लवकारियों के एक दल का कब्जा है। अमर सिंह को छापामार युध्द का अधिक ज्ञान है, ऐसा मालूम होता है और वह क्रियाशील भी अधिक है। जो कुछ भी हो, चुपचाप इंतजार करने के बजाए जब भी मौका मिलता है वह अंगरेजों के ऊपर हमला बोल देता है। उस सुदृढ़ अड्डे से भगाए जाने से पहले ही उसके पास जाकर अवध के विद्रोहियों का एक भाग भी अगर मिल गया जैसी कि आशंका है तो अंगरेजों के लिए मुसीबत हो जाएगी और उनका काम बहुत बढ़ जाएगा। लगभग 8 महीनों से ये जंगल विप्लवकारी दलों के लिए छिपने और विश्राम करने के स्थल बने हुए हैं। इन दलों ने कलकत्ता और इलाहाबाद के बीच की सड़क, ग्रैंड टं्रक रोड को, जो अंगरेजों का मुख्य संचार मार्ग है, अत्यंत असुरक्षित बना दिया है।
पश्चिमी भारत में जनरल रौबट्र्स और कर्नल होम्स अब भी ग्वालियर के विद्रोहियों का पीछा कर रहे हैं। ग्वालियर पर जिस समय कब्जा किया गया, उस समय यह प्रश्न बहुत महत्व का था कि पीछे हटती हुई सेना कौन सी दिशा अपनाएगी; क्योंकि मराठों का पूरा देश और राजपूताने का एक भाग मानो विद्रोह के लिए तैयार बैठा थाइंतजार बस वह इस बात का कर रहा था कि नियमित सैनिकों की एक मजबूत सेना पहुंच जाए जिससे कि विद्रोह का एक अच्छा केंद्र वहां कायम हो जाए। उस वक्त लगता था कि इस लक्ष्य की प्राप्ति की दृष्टि से सबसे अधिक संभावना इसी बात की दिखलाई देती थी कि ग्वालियर की फौजें पैंतरा बदलकर होशियारी से दक्षिण-पश्चिमी दिशा की ओर निकल जाएंगी। लेकिन विप्लवकारियों ने पीछे हटने के लिए उत्तर-पश्चिमी दिशा को चुना है। ऐसा उन्होंने किन कारणों से किया है, इसका उन रिपोर्टों से हम अनुमान नहीं लगा सकते जो हमारे सामने हैं। वे जयपुर गए, वहां से दक्षिण उदयपुर की तरफ घूम गए और मराठों के प्रदेश में पहुंचने वाले मार्ग पर आगे बढ़ने की कोशिश करने लगे। लेकिन इस चक्करदार रास्ते की वजह से रौबट्र्स को यह मौका मिल गया कि वह उनको जा पकड़े। रौबट्र्स उनके पास पहुंच गया और बिना किसी बड़े प्रयास के ही, उसने उन्हें पूरे तौर से हरा दिया। इस सेना के जो अवशेष बचे हैं, उनके पास न तोपें हैं, न संगठन और न गोला-बारूद हैं, न कोई नामी नेता है। नए विद्रोह खड़े कर सकेंऐसे ये लोग नहीं हैं। इसके विपरीत मालूम होता है कि लूट-खसोट में प्राप्त चीजों की जो विशाल मात्रा वे अपने साथ ले जा रहे हैं और जिसकी वजह से उनकी तमाम गतिविधि में बाधा पड़ रही है, उसने किसानों की लोलुपता को जगा दिया है। अलग-थलग घूमते-भटकते हर सिपाही को मार दिया जाता है और सोने की मोहरों के भार से उसे मुक्त कर दिया जाता है। स्थिति अगर यही रही, तो इन सिपाहियों को अंतिम रूप से ठिकाने लगाने के काम को जनरल रौबट्र्स बड़े मजे में अब देहाती जनता के जिम्मे छोड़ दे सकता है। सिंधिया के खजाने को उसके सिपाहियों ने लूट लिया है; इससे अंगरेजों के लिए
हिंदुस्तान से भी अधिक खतरनाक एक दूसरे क्षेत्र में विद्रोह के फिर से शुरू हो जाने का खतरा मिट गया है। यह क्षेत्र अंगरेजों के लिए बहुत खतरनाक था, क्योंकि मराठों के प्रदेश में विद्रोह शुरू हो जाने पर बंबई की फौज के लिए बड़ी ही कठोर परीक्षा का समय आ जाता।
ग्वालियर के पड़ोस में एक नई बंगावत उठ खड़ी हुई है। एक छोटा सरदारमान सिंह (अवध का मान सिंह नहीं), जो सिंधिया के अधीन था, विप्लवकारियों के साथ जा मिला है और पौड़ी के छोटे किले पर उसने कब्जा कर लिया है। लेकिन उस जगह को अंगरेजों ने घेर लिया है और जल्द ही उस पर कब्जा हो जाना चाहिए।
इस बीच, जीते गए इलाके धीरे-धीरे शांत होते जा रहे हैं। कहा जाता है कि दिल्ली के पास-पड़ोस के इलाके में सर जे. लॉरेंस ने ऐसी पूर्ण शांति कायम कर दी है कि कोई भी यूरोपियन अब वहां बिना हथियार के और बिना अंगरक्षकों को लिए पूर्ण सुरक्षा के साथ इधर-उधर आ-जा सकता है। इसका रहस्य यह है कि किसी गांव के क्षेत्र में होने वाले हर जुर्म अथवा बलवे के लिए उस गांव की जनता को अंगरेजों ने सामूहिक रूप से जिम्मेदार बना दिया है; उन्होंने एक फौजी पुलिस संगठित कर दी है; और इस सबसे भी अधिक हर जगह कोर्ट मॉर्शल द्वारा आनन-फानन में सजा देने की व्यवस्था कायम होर् गई। पूर्व के लोगों पर कोर्ट मॉर्शल की व्यवस्था का कुछ खास ही रौब पड़ता है। फिर भी यह सफलता एक अपवाद जैसी मालूम होती है, क्योंकि दूसरे क्षेत्रों से तरह की कोई चीज हमें सुनाई नहीं देती। रुहेलखंड और अवध को, बुंदेलखंड और दूसरे अनेक बड़े प्रांतों को पूर्णतया शांत करने के काम के लिए अब भी बहुत लंबे समय की जरूरत होगी और उसके सिलसिले में अंगरेजी सैनिकों और कोर्ट मॉर्शलों को अब भी बहुत काम करना पड़ेगा।
लेकिन जहां हिंदुस्तान के विद्रोह का विस्तार इतना छोटा हो गया है कि अब उसमें फौजी दिलचस्पी की कोई चीज नहीं रह गई है, वहीं वहां से काफी दूरअफगानिस्तान के अंतिम सीमांतों परएक ऐसी घटना हो गई है जिसमें आगे चलकर भारी कठिनाइयां उत्पन्न होने की आशंका छिपी हुई है। डेरा इस्माइल खान में स्थित कई सिख रेजीमेंटों में अंगरेजों के खिलाफ विद्रोह करने और अपने अफसरों की हत्या कर देने के एक षडयंत्र का पता लगा है। इस षडयंत्र की जड़ें कितनी दूर तक फैली हुई हैं, यह हम नहीं बता सकते। संभव है कि वह केवल एक स्थानीय चीज हो जिसका सिखों के एक खास वर्ग से सबंध हो। लेकिन इस बात को हम साधिकार नहीं कह सकते। कुछ भी हो, यह बहुत ही खतरनाक लक्षण है। ब्रिटिश सेना में इस समय लगभग 1,00,000 सिख हैं, और यह तो हम सुन ही चुके हैं कि वे कितने उद्दंड हैं। वे कहते हैं कि आज वे अंगरेजों की तरफ से लड़ते हैं, पर अगर भगवान की ऐसी ही मर्जी हुई तो कल उनके खिलाफ भी लड़ सकते हैं! वे बहादुर होते हैं, जोशीले होते हैं, अस्थिर होते हैं और दूसरे पूर्वी लोगों से भी अधिक आकस्मिक और अन-अपेक्षित आवेगों के शिकार हो जाते हैं। यदि सचमुच उनके अंदर बंगावत शुरू हो जाए, तब फिर अंगरेजों के लिए अपने को बचाए रखने का काम कठिन हो जाएगा। भारत के निवासियों में सिख हमेशा अंगरेजों के सबसे कट्टर विरोधी रहे हैं; अपेक्षाकृत एक काफी शक्तिशाली साम्राज्य की उन्होंने स्थापना कर ली है; वे ब्राह्मणों के एक खास संप्रदाय के हैं और हिंदुओं और मुसलमानों दोनों से नफरत करते हैं। ब्रिटिश 'राज' को वे अधिकतम खतरे के समय देख चुके हैं, उसकी पुनर्स्थापना के कार्य में उन्होंने बहुत योग दिया है, और उन्हें तो इस बात का भी पूरा विश्वास है कि उनका योग ही वह निर्णायक चीज थी जिसने ब्रिटिश राज्य को बचा लिया है। तब फिर इससे अधिक स्वाभाविक और क्या हो सकता है यदि वे यह सोचें कि ब्रिटिश राज्य की जगह अब सिख राज्य की स्थापना कर दी जानी चाहिए, दिल्ली या कलकत्ते की गद्दी पर भारत का शासन करने के लिए किसी सिख सम्राट का अभिषेक कर दिया जाना चाहिए? संभव है कि यह विचार अभी तक सिखों के अंदर बहुत परिपक्व न हुआ हो, यह भी संभव है कि उन्हें होशियारी से इस तरह अलग-अलग वितरित कर दिया जाए कि हर जगह उनका मुकाबला करने के लिए काफी यूरोपियन मौजूद रहें जिससे कि कहीं भी विद्रोह होने पर उन्हें आसानी से दबा दिया जा सके। लेकिन यह विचार अब उनके अंदर आ गया है, यह चीज, हमारे, खयाल के मुताबिक, हर उस व्यक्ति को स्पष्ट होगी जिसने पढ़ा है कि दिल्ली और लखनऊ के बाद से सिखों के क्या रंग-ढंग हैं।
लेकिन, फिलहाल, भारत को अंगरेजों ने फिर जीत लिया है। वह महान विद्रोह जिसकी चिनगारी बंगाल की सेना की बंगावत से उठी थी, लगता है, सचमुच ही खतम हो रहा है। लेकिन इस दोबारा विजय से इंगलैंड भारतीय जनता के मन पर अपना प्रभाव नहीं बैठा सका है। देशियों द्वारा किए जाने वाले अनाचारों-अत्याचारों की बढ़ी-चढ़ी और झूठी रिपोर्टों से क्रुध्द होकर अंगरेजी फौजों ने बदले की कार्रवाई के तहत जो बर्बर और जघन्य कार्य किए हैं, उनकी क्रूरता ने और अवध के राज्य को पूरे तौर से और टुकड़े-टुकड़े करके, दोनों तरफ से, हड़प लेने की उनकी कोशिशों ने विजेताओं के लिए कोई खास प्रेम की भावना नहीं पैदा की है। इसके विपरीत, अंगरेज स्वयं स्वीकार करते हैं कि हिंदुओं और मुमलमानों दोनों के अंदर ईसाई आक्रमणकारी के विरुध्द पुश्तैनी घृणा की भावना आज हमेशा से ही अधिक तीव्र है। यह घृणा इस समय भले ही दुर्बल हो, लेकिन जब तक सिखों के पंजाब के सिर पर भयानक बादल मंडरा रहा है, तब तक उसे महत्वहीन और निरर्थक नहीं कहा जा सकता। बात इतनी ही नहीं है। दोनों महान एशियाई ताकतें इंगलैंड और रूसइस समय साइबेरिया और भारत के बीच एक ऐसे बिंदु पर पहुंच गई हैं जहां रूसियों और अंगरेजों के स्वार्थों में सीधी टक्कर होना अनिवार्य है। वह बिंदु पीकिंग है। वहां से पश्चिम की और पूरे एशियाई महाद्वीप पर, एक किनारे से दूसरे किनारे तक एक ऐसी रेखा जल्द ही खींच दी जाएगी जिस पर इन दो विरोधी स्वार्थों के बीच निरंतर संघर्ष होता रहेगा। इस प्रकार, वास्तव में संभव है कि वह समय बहुत दूर न हो जब व्यास नदी के मैदानों में अगेरजी फौज और कज्जाक का मुकाबला हो जाए। और अगर यह मुकाबला होना है, तो 1,50,000 देशी भारतीयों की उत्कट ब्रिटिश-विरोधी भावनाएं गंभीर चिंता का विषय बन जाएंगी।
(1 अक्टूबर 1858 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 1443, में एक संपादकीय लेख के रूप में प्रकाशित हुआ।)




शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में लखनऊ पर कब्जे की कहानी फ्रेडरिक एंगेल्स की जुबानी


                भारतीय विद्रोह के दूसरे संकटपूर्ण काल की समाप्ति हो गई है। पहले का केंद्र दिल्ली था; उसका अंत उस शहर पर हमले के द्वारा कब्जा करके किया गया था। दूसरे का केंद्र लखनऊ था और अब उसका भी पतन हो गया है। जो जगहें अभी तक शांत रही हैं, यदि वहां नए विद्रोह नहीं फूट पड़ते, तो विद्रोह धीरे-धीरे शांत होता हुआ अपने उस अंतिम लंबे काल में प्रवेश कर जाएगा जिसमें कि, अंत में, विद्रोही डकैतों या डाकुओं का रूप ले लेंगे। और तब वे देखेंगे कि देश के निवासी भी उनके उतने ही कट्टर शत्रु हैं जैसे कि स्वयं ब्रिटिश।
लखनऊ के हमले का ब्योरा अभी तक प्राप्त नहीं हुआ। लेकिन प्रारंभिक कार्रवाइयों की और अंतिम संघर्षों की रूपरेखाएं ज्ञात हैं। हमारे पाठकों को याद होगा कि लखनऊ की रेजीडेंसी की सहायता करने के बाद जनरल कैंपबेल ने उस सैनिक अड्डे को उड़ा दिया था। लेकिन जनरल आउट्रम को लगभग पांच हजार सैनिकों के साथ उन्होंने आलमबाग में तैनात कर दिया था। यह शहर के कुछ मील के फासले पर एक किलाबंद स्थान था। शेष अपनी फौजों के साथ कैंपबेल स्वयं कानपुर लौट गए थे। वहां पर विद्रोहियों ने जनरल विंढम को हरा दिया था। इन विद्रोहियों को कैंपबेल ने पूर्णतया परास्त कर दिया और जमुना के उस पार कालपी में खदेड़ दिया। इसके बाद सैनिक सहायता और भारी तोपों के आने का कानपुर में वे इंतजार करने लगे। आक्रमण की अपनी योजनाएं उन्होंने तैयार कीं, अवध पर कब्जा करने के लिए जिन सेनाओं को भेजना था उन्हें एक जगह जमा होने के आदेश उन्होंने जारी किए, और कानपुर को एक ऐसा मजबूत और विशाल कैंप बना दिया जिससे कि लखनऊ के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाइयों का वह फौजी और मुख्य अड्डा बन
सके। जब यह सब पूरा हो गया तो एक और काम उन्होंने किया। इस काम को पूरा करने से पहले आगे बढ़ने को वह निरापद नहीं समझते थे। इस काम को पूरा करने की उनकी कोशिश पहले के लगभग तमाम भारतीय कमांडरों से अलग करके उन्हें विशिष्ट बना देती है। कैंपबेल ने कहा कि कैंप में औरतें नहीं चाहिए। लखनऊ में, कानपुर की ओर कूच के समय इन 'वीरांगनाओं' को वह काफी देख चुके थे। ये स्त्रियां इसे बिलकुल स्वाभाविक मानती थीं कि फौज की सारी गतिविधि उनकी इच्छाओं और आराम के विचार को ध्यान में रखकर हो। भारत में हमेशा ऐसा ही होता आया था। कैंपबेल ज्योंही कानुपर पहुंचे, त्योंही उन्होंने इस पूरी दिलचस्प और तकलीफदेह कौम को, अपने रास्ते से दूर, इलाहाबाद भेज दिया। फिर तुरंत ही महिलाओं के उस दूसरे दल को भी उन्होंने बुलवा भेजा जो उस समय आगरे में था। जब तक वे कानपुर नहीं आ गईं और जब तक सकुशल उन्हें भी उन्होंने इलाहाबाद के लिए रवाना नहीं कर दिया, तब तक लखनऊ की तरफ बढ़ रही अपनी फौजों के साथ वह भी आगे नहीं गए।
अवध के इस अभियान के लिए जिस पैमाने पर व्यवस्था की गई थी, वह भारत में अब तक बेमिसाल थी। वहां पर अंगरेजों ने जो सबसे बड़ा अभियान, अफगानिस्तान पर आक्रमण के अभियान समान संगठित किया था। उसमें इस्तेमाल किए जाने वाले सैनिकों की संख्या किसी भी समय 20,000 से अधिक न थी, और उनमें भी बहुत बड़ा बहुमत हिंदुस्तानियों का था। इसके विपरीत, अवध के इस अभियान में केवल यूरोपियनों की संख्या अफगानिस्तान भेजे गए तमाम सैनिकों की संख्या से अधिक थी। मुख्य सेना में, जिसका नेतृत्व सर कॉलिन कैंपबेल स्वयं कर रहे थे, तीन डिवीजन पैदल सेना के थे, एक घुड़सवारों का और एक तोपखाना और एक डिवीजन इंजीनियरों का था। पैदल सेना का पहला डिवीजन, आउट्रम के नेतृत्व में, आलमबाग पर अधिकार किए हुए था। उसमें पांच यूरोपियन और एक देशी रेजीमेंट थी। कैंपबेल की सक्रिया सेना में, जिसे लेकर कानपुर से सड़क के मार्ग से वह आगे बढ़े थे, दूसरे (जिसमें चार यूरोपियन और एक देशी रेजीमेंट थी) और तीसरे (जिसमें पांच यूरोपियन और एक देशी रेजीमेंट थी) डिवीजन थे, सर होप ग्रैंट के नीचे का एक घुड़सवार डिवीजन था (जिसमें तीन यूरोपियन और चार या पांच देशी रेजीमेंटें थीं) और तोपखाने का अधिकांश था (जिसमें अड़तालीस मैदानी तोपें, घेरा डालने वाली गाड़ियां और इंजीनियर थे)। गोमती और गंगा के बीच, जौनपुर और आजमगढ़ में, एक ब्रिगेड ब्रिगेडियर फ्रैंक्स के नेतृत्व में केंद्रित था। उसको गोमती के किनारे-किनारे लखनऊ की ओर बढ़ने का आदेश था। इस ब्रिगेड में देशी सैनिकों के अलावा तीन यूरोपियन रेजीमेंटें और दो बैट्रियां (तोपखाने की टुकड़िया) थीं। इस ब्रिगेड को कैंपबेल के सैनिक अभियान का दाहिना अंग बनाना था। इन्हें लेकर कैंपबेल की सेना में कुछ सैनिक इस प्रकार थे :
                      पैदल सेना    घुड़सवार     तोपखाना और       कुल
                                            इंजीनियर
यूरोपियन     15,000           2,000              3,000                20,000
देशी   5,000    3,000    2,000    10,000
अर्थात, कुल मिलाकर उसमें 30,000 सैनिक थे। इन्हीं में उन 10,000 नेपाली गोरखों को जोड़ देना चाहिए जो जंग बहादुर के नेतृत्व में गोरखपुर से सुलतानपुर की तरफ बढ़ रहे थे। इनको लेकर आक्रमणकारी सेना की कुल संख्या 40,000 सैनिकों की हो जाती है। लगभग ये सब नियमित सैनिक थे। लेकिन बात यहीं नहीं खतम होती। कानपुर के दक्षिण में, एक मजबूत सेना के साथ सर एच. रोज थे। सागर से वह कालपी और जमुना के निचले भाग की ओर बढ़ रहे थे। उनका लक्ष्य यह था कि अगर फ्रैंक्स और कैंपबेल की दोनों सेनाओं के बीच में कुछ लोग भाग निकलें तो वह उन्हें पकड़ लें। उत्तर-पश्चिम में, फरबरी के अंत के करीब ब्रिगेडियर चैंबरलेन ने उत्तर गंगा को पार कर लिया। अवध के उत्तर-पश्चिम में स्थित रुहेलखंड में वह प्रविष्ट हो गया। जैसा कि ठीक ही अनुमान लगाया गया था, विद्रोही सेनाओं के पीछे हटने के लिए मुख्य अड्डा यही जगह तय थी। इर्द-गिर्द से अवध को घेरे रखने वाले शहरों के गैरीसनों को भी उसी सेना में मिला दिया जाना चाहिए जिसने, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, उस राज्य के ऊपर किए गए आक्रमण में भाग लिया था। इस तरह, इस पूरी सेना में निश्चित रूप से 70,000 से 80,000 तक लड़ने वाले हैं। इनमें से, सरकारी वक्तव्यों के अनुसार, कम से कम 28,000 अंगरेज हैं। इस सैनिक शक्ति में सर जॉन लॉरेंस की उस सेना के अधिकांश को नहीं शामिल किया गया है जो दिल्ली में एक प्रकार से बाजू पर अधिकार किए हुए पड़ी है और जिसमें मेरठ और दिल्ली के 5,500 यूरोपियन और 20,000 या 30,000 के करीब पंजाबी हैं।
इस विशाल सैनिक शक्ति का एक जगह केंद्रीकरण कुछ तो जनरल कैंपबेल के व्यूह रचना का परिणाम है, लेकिन कुछ वह इस बात का भी परिणाम है कि हिंदुस्तान के विभिन्न भागों में विद्रोह को कुचल दिया गया है, और इसकी वजह से, स्वाभाविक रूप से सैनिक इस घटनास्थल पर आकर जमा हो गए हैं। इसमें संदेह नहीं कि कैंपबेल इससे कम सैनिक-शक्ति होने पर भी हमला करता; लेकिन, जिस समय वह हमले की तैयारी कर रहा था, उसी समय परिस्थितिवश, उसके पास और भी सैनिकों की नई कुमुक पहुंच गई; और, यह जानते हुए भी कि लखनऊ में उसे कैसे तुच्छ दुश्मन से लड़ना है, ऐसा आदमी वह नहीं था कि इन नए मौकों का फायदा उठाने से इनकार कर देता। और यह बात भी भुलाई नहीं जानी चाहिए कि यद्यपि सैनिकों की यह संख्या बहुत बड़ी लगती है, लेकिन वह फ्रांस के बराबर के बड़े क्षेत्र में फैली हुई थी; और निर्णायक क्षण में केवल लगभग 20,000 यूरोपियनों, 10,000 हिंदुस्तानियों और 10,000 गोरखों को ही लेकर वह लखनऊ पहुंच
सका था। इनमें से भी देशी अफसरों की कमान में काम करने वाले गोरखा सैनिकों की वफादारी, कम से कम संदेहजनक तो थी ही। निस्संदेह, शीघ्र विजय प्राप्त करने के लिए इस सैनिक शक्ति का केवल यूरोपियन भाग ही काफी से अधिक था; लेकिन, फिर भी, उसके सामने जो काम था उसके मुकाबले में उसकी शक्ति बहुत ज्यादा नहीं थी। और, बहुत संभव मालूम पड़ता है कि कैंपबेल की इच्छा यह थी कि, कम से कम एक बार, अवध के लोगों को गोरी फिरंगी फौज की एक इतनी भयावनी तादाद वह दिखा दे जितनी कि भारत मेंजहां विद्रोह इसीलिए संभव हो सका था कि यूरोपियनों की संख्या थोड़ी
थी और देश भर में वे दूर-दूर फैले हुए थेऔर कहीं की जनता ने इससे पहले कभी न देखी थी।
अवध की सेना बंगाल के अधिकांश विद्रोही रेजीमेटों के अवशेषों और उसी इलाके में इकट्ठे किए गए देशी रंगरूटों को लेकर बनी थी। बंगाल के विद्रोही रेजीमेंटों से आए हुए लोगों की संख्या 35,000 या 40,000 से अधिक नहीं हो सकती थी। आरंभ में इस सेना में 80,000 आदमी थे। युध्द की मार-काट, सेना-त्याग और पस्तहिम्मती की वजह से इसकी शक्ति कम से कम आधी घट गई होगी। जो कुछ बच रही थी, वह भी असंगठित थी, आशाविहीन थी, बुरी हालत में थी और युध्द के मोर्चों पर जाने के लिहाज से सर्वथा अयोग्य थी। नई भर्ती की गई फौजों के सैनिकों की संख्या एक लाख से डेढ़ लाख तक बताई जाती है; लेकिन उनकी संख्या कितनी थी यह महत्वहीन है। उनके हथियारों में कुछ बंदूकें थीं, वे भी रद्दी किस्म की। लेकिन उनमें से अधिकांश के पास जो हथियार थे, उनका इस्तेमाल बिलकुल पास की लड़ाई में ही किया जा सकता थाऐसी लड़ाई में जिसकी सबसे कम संभावना थी। इस सैनिक शक्ति का अधिकांश लखनऊ में था जो सर जे. आउट्रम के सैनिकों का मुकाबला कर रहा था; लेकिन उसकी दो टुकड़ियां इलाहाबाद और जौनपुर की दिशा में भी काम कर रही थीं।
लखनऊ को चारों तरफ से घेरने का अभियान फरवरी के मध्य के करीब आरंभ हुआ। 15 से 26 तारीख तक मुख्य सेना और उसके नौकरों-चाकरों की भारी संख्या (जिनमें 60,000 तो केवल सफरी सामान ले चलने वाले अनुचर थे) कानपुर से अवध की राजधानी की तरफ कूच करती रही। रास्ते में उसे कहीं किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। इसी बीच, 21 और 24 फरवरी को, सफलता की जरा भी आशा के बिना, दुश्मन के आउट्रम वाले मोर्चे पर हमला बोल दिया। 19 तारीख को फ्रैंक्स ने सुलतानपुर पर धावा कर दिया; विद्रोहियों की दोनों सेनाओं को उसने एक ही दिन में हरा दिया; और फिर, घुड़सवारों के अभाव में जितनी भी अच्छी तरह उनका पीछा किया जा सकता उतनी अच्छी तरह से उसने उनका पीछा किया। दोनों पराजित सेनाओं के मिल जाने पर, 23 तारीख को उन्हें फिर उसने हरा दिया। उनकी 20 तोपें और उनका खेमा और सारा सरोसामान इस टक्कर में नष्ट हो गया। जनरल होप ग्रैंट मुख्य सेना के अगले भाग का नेतृत्व कर रहा था। जबरदस्ती कूच के
समय मुख्य सेना से अपने को उसने अलग कर लिया था और बाईं तरफ बढ़ कर, 23 और 24 तारीख को, लखनऊ से रुहेलखंड को जाने वाली सड़क पर स्थित दो किलों को उसने तहस-नहस कर दिया था।
2 मार्च को मुख्य सेना लखनऊ के दक्षिणी भाग में केंद्रित कर दी गई थी। नहर इस भाग की हिफाजत करती है। शहर पर अपने पिछले हमले के समय कैंपबेल को इस नहर को पार करना पड़ा था। इस नहर के पीछे खंदकें खोदकर मजबूत किलेबंदी कर ली गई। 3 तारीख को अंगरेजों ने दिलकुशा पार्क पर कब्जा कर लिया। इस पर कब्जा करने के साथ-साथ पहले आक्रमण का भी श्रीगणेश हो गया था। 4 तारीख को ब्रिगेडियर फ्रैंक्स मुख्य सेना में आ मिला। वह अब उसका दाहिना अंग बन गया। स्वयं उसके दाहिनी तरफ गोमती नदी थी जो उसकी सहायता कर रही थी। इसी बीच दुश्मन की मोर्चेबंदी के खिलाफ बैट्रियां (तोपें) अड़ा दी गईं, और, शहर के आगे, गोमती के आर-पार, दो पानी में तैरने वाले पुल बन लिए गए। ये पुल ज्योंही तैयार हो गए, त्योंही पैदल सेना के अपने डिवीजन, 1,400 घोड़ों और 30 तोपों को लेकर, सर जे. आउट्रम बाईं तरफ, यानी उत्तरी-पूर्वी किनारे पर मोर्चा लगाने के लिए नदी के पार चले गए। इस स्थान से नहर के किनारे-किनारे फैली हुई दुश्मन की सेना के एक बड़े भाग को और उसके पीछे के कई किलाबंद महलों को वह घेर ले सकता था। यहां पहुंचकर अवध के पूरे उत्तर-पूर्वी भाग के साथ दुश्मन के संचार साधनों को भी उसने काट दिया। 6 और 7 तारीख को उसे काफी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन दुश्मन को उसने सामने से मार भगाया। 8 तारीख को उसके ऊपर फिर हमला हुआ, पर इसमें भी दुश्मन को कोई सफलता नहीं मिली। इसी बीच, दाहिने तट की बैट्रियों ने गोलंदाजी शुरू कर दी थी। नदी के तट पर स्थित आउट्रम की बैट्रियों ने विद्रोहियों के बाजू और पिछवाड़े पर प्रहार करना शुरू कर दिया। 9 तारीख को सर ई. लुगर्ड के मातहत दूसरे डिवीजन ने मारटीनियर पर धावा करके अपने अधिकार में ले लिया। यह, जैसा कि हमारे पाठकों को याद होगा, दिलकुशा के सामने, नहर के दक्षिण भाग में, जहां यह नहर गोमती से मिलती है, एक कालेज और पार्क है। 10 तारीख को बैंक घर सेंध लगा दी गई और उस पर कब्जा कर लिया गया। आउट्रम नदी के किनारे-किनारे और आगे बढ़ता गया और विद्रोही जहां भी पड़ाव डालते, वहीं अपनी तोपों से उनको वह भूनने लगता। 11 तारीख को दो पहाड़ी रेजीमेंटों ने (42वीं और 93वीं रेजीमेंटों ने) बेगम के महल पर हमला कर दिया और आउट्रम ने, नदी के बाएं किनारे से, शहर जाने वाले पत्थर के पुल पर हमला बोल दिया और आगे बढ़ गया। फिर अपने सैनिकों को उसने नदी के पार उतार दिया और सामने की अगली इमारत के बरक्स हमले में शामिल हो गया। 13 मार्च को एक दूसरी किलाबंद इमारत, इमामबाड़े पर हमला किया गया। तोपखाने को सुरक्षित स्थान में खड़ा करने के लिए एक खाई खोद ली गई थी और, अगले दिन सेंध के तैयार होते ही इस इमारत पर धावा करके कब्जा कर लिया गया। कैसरबाग, यानी बादशाह के महल की तरफ भागते
हुए दुश्मन का पीछा इतनी तेजी से किया गया कि भगोड़ों के पीछे-पीछे गोरी फौज भी उसके अंदर घुस गई। एक हिंसापूर्ण संघर्ष शुरू हो गया, लेकिन तीसरे पहर तीन बजे तक महल अंगरेजों के कब्जे में आ गया था। लगता है कि इसके बाद संकट पैदा हो गया। कम से कम प्रतिरोध की सारी भावना खतम हो गई और कैंपबेल ने भागने वाले लोगों का पीछा करने और उन्हें पकड़ने की कार्रवाइयां फौरन शुरू कर दीं। घुड़सवारों के एक ब्रिगेड और घुड़सवार तोपखाने की कुछ तोपों के साथ ब्रिगेडियर कैंपबेल को उनका पीछा करने के लिए भेजा गया। इधर ग्रैंट एक दूसरे ब्रिगेड को लेकर विद्रोहियों को पकड़ने के लिए लखनऊ से रुहेलखंड के मार्ग पर सीतापुर की ओर चल पड़े। इस प्रकार गैरीसन के उस भाग को, जो भाग खड़ा हुआ था, ठिकाने लगाने की व्यवस्था करके पैदल सेना तोपखाना समेत शहर के भीतर उन लोगों का सफाया करने के लिए आगे बढ़ी जो अब भी वहां जमे हुए थे। 15 से 19 तारीख तक लड़ाई मुख्यतया शहर की संकरी गलियों में ही होती रही होगी, क्योंकि नदी के किनारे के हमलों और बागों पर तो पहले ही कब्जा कर लिया गया था। 19 तारीख को पूरा शहर कैंपबेल के अधिकार में था। कहा जाता है कि लगभग 50,000 विद्रोही भाग गए हैं, कुछ रुहेलखंड की तरफ, कुछ दोआब और बुंदेलखंड की तरफ। दोआब और बुंदेलखंड की दिशा में भागने का मौका उन्हें इसलिए मिला कि जनरल रोज अपनी सेना के साथ जमुना से अब भी कम से कम 60 मील की दूरी पर हैं, और कहा जाता है कि, 30,000 विद्रोही उनके सामने हैं। रुहेलखंड की दिशा में विद्रोहियों के लिए फिर इकट्ठा हो सकने का भी एक अवसर था, क्योंकि कैंपबेल इस स्थिति में नहीं होंगे कि बहुत तेजी से उनका पीछा कर सकें और चैंबरलेन कहां है, इसके बारे में किसी को कोई खबर नहीं है। इसके अतिरिक्त, इलाका काफी बड़ा है और कुछ समय के लिए उन्हें मजे में पनाह दे सकता है। इसलिए विद्रोह का नया रूप संभवत: यह शक्ल अख्तियार करे कि बुंदेलखंड और रुहेलखंड में दो विद्रोही सेनाएं संगठित हो जाएं। लेकिन लखनऊ और दिल्ली की सेनाएं रुहेलखंड की तरफ कूच करके रुहेलखंड की सेना का जल्दी ही सफाया कर सकती हैं।
इस अभियान में सर सी. कैंपबेल की कारवाइयां, जहां तक हम अभी उनको समझ सकते हैं, उसी बुध्दिमानी और तेजी के साथ संगठित की गई थीं जिससे वे अब तक आम तौर पर उन्हें संगठित करते आए हैं। लखनऊ को चारों तरफ से घेरने के लिए सेनाओं का व्यूह बहुत अच्छी तरह से तैयार किया गया था। मालूम होता है कि हमले के संबंध में हर परिस्थिति का पूरा-पूरा लाभ उठाया गया था। दूसरी तरफ, विद्रोहियों का आचरण अगर ज्यादा नहीं तो पहले के समान ही हेय था। लाल कोटों को देखते ही उनके अंदर हर जगह भय छा गया। फ्रैंक्स की सेना ने अपने से 20 गुनी अधिक सेना को पराजित कर दिया और उसका एक भी आदपी खेत नहीं रहा। जो तार आए हैं वे यद्यपि, हमेशा की तरह, 'सख्त प्रतिरोध' और 'जबरदस्त लड़ाई' की ही बातें करते हैं, लेकिन अंगरेजों को हुआ नुकसान >जहां वह बताया गया हैहास्यास्पद रूप से इतना कम है कि हमारा खयाल है कि इस बार भी उन्हें लखनऊ में उससे ज्यादा बहादुरी दिखलाने की जरूरत नहीं थी जितनी उन्होंने तब दिखलाई थी जब अंगरेज पहले वहां पहुंच थे। और न उससे अधिक यश ही उन्होंने इस बार प्राप्त किया है।

(30 अप्रैल 1858 न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5312, में
एक संपादकीय लेख के रूप में प्रकाशित हुआ।)

रविवार, 15 अगस्त 2010

स्वाधीनता का कारपोरेट महाआख्यान


स्वाधीनता दिवस का अर्थ सरकारी उपलब्धियों का जयगान नहीं है। स्वाधीनता दिवस का अर्थ सरकारी नीतियों के दायरे में बांधकर सोचना भी नहीं है। स्वाधीनता का अर्थ यह भी नहीं है कि इस पर किसी नेता,प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति या मीडिया सर्वे करने वाले छुटभैय्ये ज्ञानियों के ज्ञानसागर में डुबकी लगाना। आज के दिन मीडिया में स्वाधीनता दिवस पर तरह -तरह के विचार छपे हैं । स्वाधीनता को व्याख्यायित करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इस कोशिश में आम जनता और उत्पादक शक्तियां कहीं पीछे छूटती नजर आ रही हैं। अब स्वाधीनता के जनाख्यान की जगह कारपोरेट आख्यान ने ले ली है।
     स्वाधीनता का कारपोरेट आख्यान जनता को नियम ,कानून और सरकारी नीतियों के दायरे में बांधने की कोशिश करता है। स्वाधीनता दिवस के बारे में कोई भी बात नियम के दायरे में बांधकर नहीं की जा सकती। स्वाधीनता का दायरा नियम के आधार पर तय नहीं हो सकता। जब भी हम स्वाधीनता की सीमा तय करते हैं तो जाने-अनजाने स्वाधीनता का ह्रास करते हैं।
    स्वाधीनता को नियमों के फ्रेम में देखने का नजरिया शासकवर्गों का है। विगत 63 सालों में हम स्वाधीनता को नियमों के फ्रेमवर्क में रखकर देखने के आदी हो चुके हैं। उसका ही यह परिणाम निकला है कि साधारण आदमी ज्योंही अपने हितों की रक्षा के लिए संघर्ष करने जाता है,हड़ताल करता है,जुलूस निकालता है,आंदोलन करता है ,उसकी आवाज को संविधान और कानून की विभिन्न धाराओं के आधार पर प्रतिबंधित कर दिया जाता है।
      नियमों में बंधी स्वाधीनता अमीरों की सेवा करती है। गरीबों के हितों को सीमित करती है। नियमभंग का अमीरों के  पास अधिकार है। गरीबों को नियमभंग का दण्ड भोगना होता है। यह दैनन्दिन जीवन में मजदूरों और किसानों के संदर्भ में हम आए दिन देखते हैं। देश स्वाधीनता के किस नुक्कड़ पर खड़ा है ? उसे जानने का सबसे सटीक पैमाने उत्पादक शक्तियां हो सकती हैं । स्वाधीनता का मीडियाराग उत्पादक शक्तियों को आधार बनाकर चर्चा नहीं करता। उसके केन्द्र में अनुत्पादक शक्तियां हैं। वह केन्द्र के सवालों या जनता के बुनियादी सवालों पर चर्चा नहीं करता बल्कि गैर-जरूरी सवालों पर चर्चा करता है।
    मसलन् यदि आप यह पूछेंगे कि भारत ने विगत 63 सालों में तरक्की की है या नहीं ? उत्तर होगा हां। कौन कहेगा भारत ने तरक्की नहीं की है। यदि उत्पादक शक्तियों को केन्द्र में रखकर सवाल पूछा जाएगा कि विगत 63 सालों में मजदूर की दैनिक आय या मासिक घटी है बढ़ी है ? तो परिणाम भिन्न होंगे । किसानों की स्थिति में सुधार आया है या गिरावट आयी है ? तो उत्तर नहीं में आएगा। किसान-मजदूर की संपत्ति घटी है या बढ़ी है ? निम्नमध्यवर्ग और मध्यवर्ग की विगत 63 सालों में संपत्ति घटी है बढ़ी है ? आप अपने घर में देख सकते हैं कि विगत 63 सालों में सोना,चांदी,पीतल,जमा धन घटा है या बढ़ा है ? इसके विपरीत कारपोरेट घरानों की संपत्ति घटी है या बढ़ी है ?  आज मध्यवर्ग का कोई नौकरीपेशा व्यक्ति ऐसा नहीं है जिस पर बैंकों का कर्जा न हो। कहने का अर्थ है आम लोगों के जीवन में पामाली बढ़ेगी।  
      आज ‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’ (15 अगस्त 2010) में एक सर्वे छपा है जिसमें कुछ सवाल पूछे गए हैं। यह सर्वे कई तथ्यों की ओर ध्यान खींचता है। पहला संदेश यह देता है कि उत्पादक शक्तियों (मजदूर-किसान) के लिए मीडिया के पास सवाल नहीं होते। जाहिर है जब मजदूर-किसान के लिए सवाल नहीं होंगे तो उसकी राय भी नहीं होगी। यही वजह है कि यह सर्वे दिल्ली,कोलकाता,मुम्बई,बंगलौर और चेन्नई में किया गया। किस वर्ग के लोगों में किया गया इसे सर्वे करने वालों ने नहीं बताया है। यह कहा गया है कि 500 लोगों में आमने-सामने बैठकर बात करके यह सर्वे किया गया है।
      इस सर्वे से दूसरा संदेश यह निकलता है कि स्वाधीनता के असली अर्थ का ह्रास हुआ है। मसलन् सर्वे में पहला सवाल था स्वाधीनता का अर्थ क्या है ? इसमें जिस क्रम और अनुपात में लोगों ने जबाब दिया वह काबिलेगौर है। क्रमशःजबाब था- चुनाव में वोट देने का अधिकार (27 प्रतिशत),स्वच्छंद विचरण का अधिकार (28प्रतिशत), चयन की स्वतंत्रता (17 प्रतिशत),अदालत,सुरक्षाबलों आदि को पाना ( 9 प्रतिशत) ,बुनियादी सुविधाएं ( 15 प्रतिशत), संघर्ष का अधिकार (4 प्रतिशत)।
 इस प्रश्नोत्तर में साफ है कि जिन अधिकारों को सबसे कम लोग चाहते हैं वह है प्रतिवाद का अधिकार। यह उत्तर इस बात का संकेत है कि जिन लोगों में यह सर्वे किया गया है वे खाए-अघाए लोग हैं। वे अधिकारों के प्रति सही नजरिया तक नहीं रखते।
   इस सर्वे में  एक प्रश्न हरियाणा की खाप पंचायत को लेकर है,मजेदार बात यह है कि खाप पंचायतों का ऊपर बताए महानगरों से कोई संबंध नहीं है। यदि यह सवाल किया जाना ही था तो हरियाणा में पूछा जाता तो सटीक राय जानने का मौका मिलता लेकिन खाप पंचायत के बारे में दिल्ली,मुम्बई,चेन्नई,कोलकाता,बंगलौर में किए गए सर्वे का कोई अर्थ नहीं है,इन शहरों के लोगों के लिए खाप पंचायतें अप्रासंगिक हैं।
     इसी तरह समलैंगिक विवाह के बारे में सवाल किया गया है। समलैंगिक विवाह करने वालों की संख्या भारत में नगण्य है। यह सवाल अमेरिका के लिए प्रासंगिक हो सकता है। भारत के लिए नहीं।
      स्वाधीनता की चेतना का किस हद तक विकास हुआ है इसे जानने का सबसे अच्छा आधार हो सकता है प्रतिवाद की स्वतंत्रता का सवाल। संदर्भ था कि क्या व्यवस्था की गडबडि़यों के खिलाफ आवाज उठाना असली स्वतंत्रता है। 45 प्रतिशत मानते हैं हां, 32 प्रतिशत मानते हैं कुछ हद तक,21 प्रतिशत मानते हैं देश की सुरक्षा के लिए, 2 प्रतिशत लोग हैं कि वे नहीं जानते।
    स्वतंत्रता बनाम प्राइवेसी के संदर्भ में पूछा गया राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सरकार को टेलीफोन कॉल ,बैंक एकाउण्ट,ईमेल आदि की छानबीन करने का हक है 53 प्रतिशत ने कहा हां,28 प्रतिशत ने कहा नहीं, 19 प्रतिशत ने कहा कि सिर्फ जिन पर संदेह हो। दिल्ली में 66 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि उनके कॉल मॉनीटर किए जाएं। कोलकाता में 30 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि जिन पर संदेह हो उन पर ही नजरदारी की जाए।
    यही है नए मध्यवर्ग की गुलाम मानसिकता का आदर्श मीडिया नमूना। नया महानगरीय मध्यवर्ग और कारपोरेट लोकतंत्र के पहरूए चाहते हैं कि उन पर निगरानी रखी जाए। इस सर्वे में सबसे मजेदार सवाल था स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने वाली चीज कौन सी है ?  38 प्रतिशत ने कहा सुरक्षाबल,24 प्रतिशत ने कहा पत्रकार,16 प्रतिशत ने कहा जज,11 प्रतिशत ने कहा सिविल सोसायटी, 7 प्रतिशत ने कहा राजनीतिज्ञ, 3 प्रतिशत ने कहा फिल्म निर्माता,अभिनेता,गायक,पेण्टर आदि। 2 प्रतिशत मानते हैं कि बाबू और नौकरशाही से ही स्वतंत्रता की रक्षा की जा सकती है।
     इन लोगों की बुद्धि पर तरस आता है कि इन्हें आम आदमी दिखाई नही दिया, हिन्दुस्तान के मजदूर-किसान दिखाई नहीं दिए। हिन्दुस्तान की सुरक्षा किसी के हाथों में सुरक्षित है तो वह है आम जनता और उत्पादक शक्तियां। आज हम जितनी भी स्वतंत्रता का भोग कर रहे हैं उसे सुरक्षित रखने और समृद्ध करने में आम जनता और उत्पादक शक्तियों की केन्द्रीय भूमिका है। किसान और मजदूर अपना हाथ खींच लें तो सारी स्वतंत्रता धरी रह जाए। सुरक्षाबलों का समूचा ढ़ांचा चरमरा जाए। मध्यवर्ग की कमर टूट जाए।
      संसद ,अदालत,न्यायपालिका,पेशेवर तबका हमारी स्वतंत्रता के बुनियादी संरक्षक नहीं हैं। बुनियादी संरक्षक हैं उत्पादक शक्तियां। खेत-खलिहान से लेकर कल-कारखानों में काम करने वाले लोग। ये लोग देश के लिए संपदा पैदा करते हैं और अपने लिए दरिद्रता और अभाव। हम मीडिया की चकाचौध और बुर्जुआजी के विचारधारात्मक प्रचार अभियान के हंगामे के बीच में आम जनता और उत्पादक शक्तियों को भूल गए हैं।
    शासकवर्गों और उनके सहयोगी वर्गों ने कभी भी स्वतंत्रता की रक्षा नहीं की है उन्होंने स्वतंत्रता का भोग किया है,दुरूपयोग किया है और अपने हितों का विस्तार किया है। शासकवर्गों के लिए स्वतंत्रता वर्चस्व बनाए रखने का औजार मात्र है।
    इसके विपरीत आम जनता के लिए स्वतंत्रता लाइफलाइन या प्राणवायु है। आम जनता और उत्पादक शक्तियों के लिए स्वतंत्रता लग्जरी नहीं है। उन्हें स्वतंत्रता पाने के लिए कुर्बानी देनी पड़ती है। शासकवर्ग और उसके सहयोगी वर्गों को स्वतंत्रता के लिए कम से कम कुर्बानी देनी पड़ती है। ये वर्ग असल में उत्पादक शक्तियों की कुर्बानी के फल खाते हैं और परजीवी की तरह समाज में स्वतंत्रता का उपभोग मात्र करते हैं।
    मध्यवर्ग का एक अच्छा खासा अनुत्पादक समुदाय है जो परजीवी की तरह शासकवर्गों के भोंपू और ढ़ाल का काम करता है। कारपोरेट मीडिया में आने वाले सर्वे और राय देने वाले इसी परजीवी-भोंदूवर्ग से आते हैं। यह समाज से कटा हुआ वर्ग है। यह वर्ग अपने को अहर्निश असुरक्षित महसूस करता है यही वजह है इसे स्वतंत्रता का सबसे बड़ा संरक्षक सुरक्षाबल ही नजर आते हैं,क्योंकि आम जनता की शक्ति और आस्थाओं के सामने यह अपने को बौना महसूस करता है,फलतः आम जनता को यह स्वतंत्रता का संरक्षक नहीं मानता। यही वर्ग स्वाधीनता के कारपोरेट महाख्यान का सर्जक है।
 




रविवार, 9 मई 2010

महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जयन्ती पर विशेष- मनुष्य की अक्षय और अपराजित आत्मा का महागायक - सरला माहेश्वरी

(महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर)
‘‘बड़ा आदमी वह होता है जिसके सम्पर्क में आनेवाले का अपना देवत्व जाग उठता है। रवीन्द्रनाथ ऐसे ही महान पुरुष थे। ... वे उन महापुरुषों में थे जिनकी वाणी किसी विशेष देश या सम्प्रदाय के लिए नहीं होती, बल्कि जो समूची मनुष्यता के उत्कर्ष के लिए सबको मार्ग बताती हुई दीपक की भांति जलती रहती है।‘‘ (हजारी प्रसाद द्वि‍वेदी)
      रवीन्द्रनाथ की 150वीं जयंती हम एक ऐसे काल में मना रहे हैं जब मानव सभ्यता उथलपुथल के एक अभूतपूर्व अकल्पनीय दौर से गुजर रही है। लगता है जैसे आदमी ने अपने अथक और अनवरत प्रयासों से जिस सृष्टि की रचना की उसे वह अपने ही हाथों मटियामेट करने पर तुल गया है। लाभ और लोभ की कोख से जन्मी पूंजी और उसपर टिका पूरा तंत्र, एक समग्र पूंजीवादी दर्शन, उसका विकराल पैशाचिक रूप, साम्राज्यवादी वैश्वीकरण आज समूची मानवता को अपने नागपाश में जकड़कर लहूलुहान कर रहा है। जल, जमीन, जंगल और यह पूरा जगत आज उसके जहर से विषाक्त अजीबोगरीब ढंग से विरूपित दिखाई देता है। सभ्यता के ऐसे संकट की काली छाया को उस भविष्यद्रष्टा कवि, चिंतक ने देख लिया था और अपनी मौत से कुछ दिन पहले उनकी आत्मा उनसे सवाल कर रही थी
भगवान्, तुमने युगयुग में बारबार इस दयाहीन संसार में अपने दूत भेजे हैं।
वे कह गये हैंक्षमा करो,
कह गये हैंप्रेम करो, अंतर से विद्वेष का विष नष्ट कर दो।
वरणीय हैं वे, स्मरणीय हैं वे,
तो भी आज दुर्दिन के समय उन्हें निरर्थक नमस्कार के साथ बाहर के द्वार से ही लौटा दे रहा हूं।
मैंने देखा हैगोपन हिंसा ने
कपटरात्रि की छाया में निस्सहाय को चोट पहुंचाई है,
मैंने देखा हैप्रतीकारविहीन जबर्दस्त के अत्याचार से विचार की वाणी
चुपचाप एकांत में रो रही है,
मैंने देखा हैतरुण बालक उन्मत्त होकर दौड़ पड़ा है, बेकार ही पत्थर पर
सिर पटककर मर गया है़;
कैसी घोर यंत्रणा है उसकी!
आज मेरा गला रुंध गया है, मेरी बांसुरी का संगीत खो गया है, अमावश्या
की कारा ने मेरे संसार को दु:स्वप्नों के नीचे लुप्त कर दिया है,
इसीलिए तो आंसू भरी आंखों से तुमसे पूछ रहा हूं
जो लोग तुम्हारी हवा को विषाक्त बना रहे हैं,
उन्हें क्या तुमने क्षमा कर दिया है?
उन्हें क्या तुमने प्यार किया है?‘‘
रवीन्द्रनाथ क्या ये प्रश्न किसी अदृश्य, अमूर्त शक्ति से कर रहे थे? नहीं, उसे तो उन्होंने निरर्थक नमस्कार के साथ बाहर के द्वार से ही लौटा दिया था। वे यह सवाल उस मनुष्य से कर रहे थे, उसकी मनुष्यता से कर रहे थे जो दिनप्रतिदिन अपनी प्राण शक्ति खोे रही थी। और इसलिये वे उसकी प्राण शक्ति को, उसके विवेक को ललकार करके कह रहे थे कि तुम इन्हें कैसे माफ कर सकते हो, तुम इन्हें कैसे प्यार कर सकते हो?
        रवीन्द्रनाथ का जीवन, उनका पूरा साहित्य, उनका चिंतन इस बात की गवाही देता है कि इस महान मानव ने मनुष्यता में कभी अपना विश्वास नहीं खोया। भारत की सामासिक संस्कृति के जीवंत प्रतीक ठाकुर परिवार में जन्मे रवीन्द्रनाथ का परिवार एक ऐसा परिवार था जिसके बारे में खुद कविगुरु ने लिखा था कि उनका परिवार हिंदू सभ्यता, मुस्लिम सभ्यता और ब्रिटिश सभ्यताओं की त्रिवेणी था।
        दादा द्वारकानाथ अरबी और फारसी भाषा के प्रख्यात विद्वान थे। उन्होंने उस समय समुद्र की यात्राएं की जब समुद्र यात्रा किसी हिंदू के लिये वर्जित थी और उसके लिये कठोर दंड का विधान था। उनकी मृत्यु पर लंदन के द टाइम्स‘ ( 3 अगस्त 1946) ने लिखासंभवतया भारत में उनकी टक्कर का कोई नहीं है, भले ही वह किसी भी पद या प्रतिष्ठा पर हो, जिसने अपने आसपास खड़े लोगों की प्रगति और बेहतरी को इतनी उदारता से संरक्षण प्रदान किया हो। और हम यह भी विश्वास कर सकते हैं कि भारत और इंग्लैंड में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं जो अपनी वर्तमान सफलता और स्वतंत्रता के लिए द्वारकानाथ ठाकुर के अनुग्रह के प्रति कृतज्ञ न हों।‘‘
        रवीन्द्रनाथ के पिता देवेन्द्रनाथ इन्हीं द्वारकानाथ ठाकुर के सबसे बड़े पुत्र थे। लोग इन्हें महर्षि के नाम से पुकारते थे। मात्र 18 वर्ष की वय में इस तरुण ने गंगा के किनारे तीन दिनों तक अपनी मौत की प्रतीक्षा कर रही प्रिय दादी के पास रहते हुए जीवन के एक नये सत्य को खोज लिया था। अब वह एकदम बदल गया था। उन्होंने लिखा – ‘‘मैं ठीक पहले जैसा आदमी नहीं रहा। संपत्ति के प्रति मेरा लगाव उदासीन सा हो गया। वह फटीपुरानी बांस की चटाई जिस पर मैं बैठा थामुझे अपने लिये उपयुक्त जान पड़ी। कालीन और कीमती दिखावे मुझे घृणास्पद प्रतीत होने लगे और मेरा मानस उस आनंद से परिपूर्ण हो उठा, जिसका अनुभव मैंने पहले कभी नहीं किया।‘‘ इस प्रकार यह युवक धन की माया से दूर मनुष्य की अंतरआत्मा के गहन संसार में डूब गया। प्राचीन वैदिक साहित्य के साथ ही पाश्चात्य दर्शन का भी अघ्ययन किया।
        इसी महर्षि की चौदहवीं कृति संतान के रूप में 7 मई 1861 (बंगाब्द 25 बैसाख 1268) को रवीन्द्रनाथ का जन्म हुआ था। बड़ी बहन ने होनहार बिरवा के चिकनेचिकने पातकी झलक बचपन में ही देख ली थी इसीलिये नहलाने के समय प्राय: कहा करती, मेरा रवि भले ही सावंला हो, बहुत गोरा न हो लेकिन वह अपने तेज से सब पर छा जायेगा। रवीन्द्रनाथ ने अपनी बड़ी बहन की इस भविष्यवाणी को पूरी तरह सच साबित करके दिखाया और न सिर्फ‍ अपने देश बल्कि पूरे विश्व को मानवता की उदात्तता का प्रकाश दिखाया। 
      उनकी मृत्यु पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने लिखा – ‘‘रवीन्द्रनाथ टैगोर की मृत्यु में हमने न केवल इस युग के एक महानतम कवि को खोया है बल्कि एक उत्कृष्ट राष्ट्रभक्त जो एक मानवतावादी भी थे, उन्हें खोया है। शायद ही ऐसा कोई सार्वजनिक कार्य हो जिस पर उनके शक्तिशाली व्यक्तित्व ने छाप न छोड़ी हो। शांतिनिकेतन और श्रीनिकेतन के रूप में उन्होंने सारे राष्ट्र के लिए, वस्तुत: विश्व के लिए एक विरासत छोड़ी है।‘‘
      आज के इस अंधेरे दौर में रवीन्द्रनाथ की उस महान विरासत को याद करके उन्हीं की तरह हम उस अक्षत, अपराजित विश्वास को हासिल कर सकें और कह सके– ‘‘टुक खड़े तो हो जाओ एक बार सिर उठाकर! जिसके भय से तुम डर रहे हो, वह अन्यायी तुम से कहीं अधिक कमजोर है। तुम जागे नहीं कि वह भाग खड़ा होगाजैसे ही तुम उसके सामने तनकर खड़े हुए कि वह राह के कुत्ते की भांति संकोच और त्रास से दुबककर रह जायेगा। देवता उससे विमुख हैकोई नहीं है उसका सहायकवह तो केवल मुंह से ही बड़ीबड़ी बातें हांका करता है; किंतु मन ही मन अपनी हीनता को खूब पहचानता है! अतएव हे कवि ,उठ आओ! यदि तुम्हारे अंदर केवल प्राण ही बाकी हों, तो उन्हें ही साथ लेते आओ–(वही क्या कम है)उन्हें न्यौछावर कर दो। बड़ा दुख है...बड़ी व्यथा हैसामने कष्ट का संसार फैला हुआ है। बड़ा ही दरिद्र हैशून्य हैक्षुद्र है...अंधकार में बद्ध है। उसे अन्न चाहिएप्राण चाहिएआलोक चाहिए, चाहिए मुक्त वायु, बल, स्वास्थ्यआनंदोज्जवल परमायु और चाहिए साहस से चौड़ी छाती। इसी दीनता के बीच, हे कवि, एक बार ले तो आओ स्वर्ग से विश्वास की छवि!‘‘
       रवीन्द्रनाथ का स्वर्ग कोई काल्पनिक इन्द्रलोक नहीं था। वे ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या में विश्वास नहीं करते थे। वे इस पृथ्वी को ही मनुष्य की सबसे सुंदर कृति बनाना चाहते थे। और इसलिये इस पृथ्वी को छोड़कर वैरागी बनकर किसी देवता की शरण में जाकर स्वर्ग को खोजने वालों को कहते हैं, देवता मंदिर में नही है, मनुष्यत्व में है। अपनी एक कहानी में वे कहते है।– ‘‘संसार से वैराग्य लेने वाला एक वैरागी गंभीर रात्रि में बोल उठा : आज मैं इष्टदेव के लिए घर छोड़ दूंगा कौन मुझे भुलाकर यहां बांधे हुए है? देवता ने कहा :मैं‘! उसने नहीं सुना। नींद में डूबे शिशु को छाती से चिपटाकर प्रेयसी शय्या के एक किनारे सो रही थी। वैरागी ने कहा : ऐ माया की छलना, तू कौन है? देवता बोल उठे : मैं‘! किंतु किसी ने नहीं सुना। शय्या पर से उठकर वैरागी ने पुकारा : प्रभो! तुम कहां हो? देवता ने उत्तर दिया : यहां‘! तो भी वैरागी ने नहीं सुना। स्वप्न में माता को शिशु खींच कर रो पड़ा देवता ने कहा : लौट आओ। वैरागी को यह वाणी भी नहीं सुनाई दी। अंत में लंबी सांस लेकर देवता ने कहा – ‘हाय, मेरा भक्त मुझे छोड़कर कहां चला!'
         रवीन्द्रनाथ ने कबीर की तरह बारबार मनुष्य को चेताया कि तुम्हारे देवता देवालयों में नहीं है। उन्होंने इस भले मानुष को समझाते हुए कहा–‘‘अरे ओ भलेमानुष, क्यों तू देवालय का दरवाजा बंद करके उसके कोने में पड़ा हुआ है? अरे, रहने दे अपने इस भजन और पूजन को, ध्यान और आराधना को। अपने मन के अंधेरे में छिपा हुआ तू चुपचाप किसकी पूजा कर रहा है? जरा आंख खोलकर देख तो भला, देवता तेरे घर में नहीं है। वे वहां चले गये हैं, जहां किसान मिट्टी तोड़कर हल जोत रहा है, जहां मजदूर बारह महीने पत्थर काटकर रास्ता तैयार कर रहा है। वे धूप और पानी में सबके साथ हैं। उनके दोनों हाथों में धूल लगी हुई है। भले मानस, तू भी उन्हीं के समान इस पवित्र वस्त्र को फेंककर धूल में उतर जा। रहने दे अपनी घ्यान धारणा, पड़ी रहने दे अपने फूलों की डलिया, फट जाने दे इस शुचिवस्त्र को, लगने दे इस शरीर में धूल और बालू। ऐसा हो कि उनके साथ कर्मयोग में चूर होकर तेरा पसीना चुए।‘‘
      रवीन्द्रनाथ ने जहां कहीं भी मनुष्य और मनुष्यता का अपमान होते हुए देखा फिर चाहे वह सांमतीपूंजीवादीसाम्राज्यवादी शोषण हो, संकीर्ण उग्रराष्ट्रवाद हो, फासीवाद हो, स्वार्थों की आग से धधकता युद्धोन्माद हो, जातिवाद और धार्मिक करता हो, हर किसी का तीखा विरोध किया। साम्राज्यवादी वैश्वीकरण और उसको संचालित करने वाली मुक्त बाजार की इस बर्बर व्यवस्था में जब एक बार फिर सर्वोत्तम की उत्तरजीविता का राग अलापा जा रहा है, उस समय हमें रवीन्द्रनाथ की वाणी याद आती है
     ‘‘जापान को पश्चिम के बाह्य लक्षणों का अनुकरण करने में खतरा नहीं है, बल्कि पश्चिमी राष्ट्रवाद की प्रेरक शक्ति को अपना बना लेने से है। राजनीति के दबाव के आगे उसके सामाजिक आदर्शों के ह्रास के संकेत अभी से दिखने लगे हैं।  विज्ञान से उधार लिया गया आदर्श वाक्य, ‘योग्यत्तम की उत्तरजीवितामुझे उसके आधुनिक इतिहास पर लिखा हुआ साफसाफ दिखाई पड़ रहा है। यह एक ऐसा आदर्श वाक्य है जिसका एक अर्थ यह भी होता है कि अपनी सहायता खुद करो और दूसरों की परवाह मत करो। यह एक ऐसा आदर्श वाक्य है जो उस अंधे आदमी का आदर्श होता है जो केवल उसी चीज में विश्वास करता है जिसे वह छू रहा होता है क्योंकि बाकी को तो वह देख ही नहीं पाता। लेकिन जो लोग देख सकते हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि मानव एकदूसरे से एक सूत्र में पिरोया हुआ है और जब आप दूसरों पर चोट करते हैं तो उसका असर आप पर भी होता है। नैतिक नियम जो मनुष्य का सबसे बड़ा आविष्कार है, वह इस अद्भुत सत्य पर आधारित है कि मानव उतना ही अधिक सच्चा साबित होता है जितना अधिक वह दूसरों में स्वयं को अनुभूत करता है।
     रवीन्द्रनाथ मनुष्य में ही सत्य को देखते थे। ‘‘सत्य ही मनुष्य का प्रकाश है। इस सत्य के विषय में उपनिषद का कहना है : आत्मवत् सर्वभूतेषू य पश्यति स पश्यति। जिन्होंने जीवन मात्र को अपने समान समझा है, उन्होंने ही सत्य को समझा है।"
        इस सत्य की अवहेलना करके ,उसे अपमानित और उपेक्षित करके पूंजी को ब्रह्म और मुनाफे को मोक्ष समझने वालों को धिक्कारते हुए रवीन्द्रनाथ ने कहा था – ‘‘ये तो महास्वार्थ को ही विश्व के सभी देशों का सार्वभौमिक धर्म बनाने पर तुले हुए हैं। हम विज्ञान द्वारा दी गई किसी भी अन्य चीज को स्वीकार करने के लिये तैयार हैं लेकिन हम उसके द्वारा नैतिकता के अमृत को नष्ट होता स्वीकार नहीं कर सकते।"
      लेकिन आज हिंस्र, बर्बर और अराजक हो चुकी आवारा पूंजी मनुष्यता के हर मूल्य को बाजार में बेच रही है। लगभग 150 वर्ष पहले कार्ल मार्क्‍स ने पूंजी के इस भयावह दानवीय रूप के बारे में कहा था –‘‘यदि लाभ समुचित हो तो, पूंजी बहुत साहसी होती है। 10 प्रतिशत निश्चित लाभ उसकी व्यग्रता सुनिश्चित करेगा और 50 प्रतिशत उसकी अति साहसिकता; 100 प्रतिशत लाभ के लिए यह सभी कानूनों को पैरों तले रौंदने को तैयार हो जायेगी; लाभ 300 प्रतिशत हो तो ऐसा कोई अपराध नहीं है जिसे करने में यह हिचकिचायेगी, न कोई ऐसा खतरा है जो यह नहीं उठाएगी, चाहे इसके मालिक के फांसी चढ़ने की ही संभावना क्यों न हो...।"
      खतरों की खिलाड़ी इस चमत्कारी पूंजी ने अपने मुनाफे के लिये पूरी मानवता को खतरे में डाल दिया, एक ओर मुट्ठी भर लोगों के वैभव का सुखी संसार और दूसरी और अभावों और असुरक्षा का दुखी संसार। पूंजी का इतना कुत्सित रूप कि खुद पूंजीवाद के प्रवक्ता शर्मसार हो गये और पूंजी के इस कुत्सित रूप को मानवीच चेहरा देने, विकास के इस एकांगी रूप को समावेशी रूप देने, नैतिकता की राजनीति, और ऐथिक्स आफ इकोनोमी की बातें होने लगी, ताकि किसी तरह इस डूबते हुए जहाज को बचाया जा सके। लेकिन अन्याय, अत्याचार, अमानवीयता से भरा हुआ यह जहाज किनारे लग नहीं सकता। डूबना ही इसकी नियति है।
      एक बार फिर रवीन्द्रनाथ याद आते हैं – ‘‘मानव के इतिहास में आतिशबाजी के कुछ ऐसे युग भी आते हैं, जो अपनी शक्ति व गति से हमें चकित कर देते हैं। ये न केवल हमारे साधारण घरेलू दीपकों की हंसी उड़ाते हैं, बल्कि अनंत नक्षत्रों का भी मजाक उड़ाते हैं। लेकिन इस भड़काऊ दिखावे के आगे हममें अपने दीपकों को निरस्त करने की इच्छा मन में नहीं आनी चाहिए। हमें इस अपमान को धैर्यपूर्वक सहना होगा और यह समझना होगा कि इस आतिशबाजी में आकर्षण तो है पर यह स्थायी नहीं है क्योंकि इसकी अति ज्वलनशीलता ही इसकी शक्ति और अंतत: इसके बुझ जाने का भी कारण होती है। यह किसी लाभ व उत्पादन के बजाय अपनी ऊर्जा तथा क्षार को भारी मात्रा में खर्च करती है।"
      मनुष्य की आत्मा के दीपक को बुझाकर कोई भी सभ्यता जिंदा नहीं रह सकती और रवीन्द्रनाथ मनुष्य की इसी अक्षत, अपराजेय आत्मशक्ति के महान गायक थे। उनकी वाणी आज भी हमें बल प्रदान कर रही है– ‘तुम सबको इस स्वार्थदानव के मंदिर की दीवालें तोड़ देनी होगी, यह नरबली अब नहीं चलेगी। हुक्म मिलते ही तोप के गोले आकर उस मंदिर की दीवालों को तड़ातड़ चूर्ण करने में जुट गये हैं। ...जो लोग आराम में थे, वे आराम को धिक्कार देकर कहने लगे हैंप्राणों से चिपके नहीं रहेंगें, मनुष्य के पास प्राणों से भी बढ़कर कोई और चीज है। आज तोपों के गर्जन में मानव का जयसंगीत बज उठा है।"


शनिवार, 6 मार्च 2010

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर खास- भारतीय औरत का राजनीतिक मर्म



                                                                                  
जेण्डर सामाजिक निर्मिति है। जेण्डर के प्रयोग को लेकर हिन्दी में समानधर्मा सही शब्द औरत या महिला है। जबकि लिंग के पर्याय के रूप में दोनों लिंग -स्त्री और पुरूष- का बोध होता है। लिंग के रूप में जन्म प्रकृत्या होता है। किन्तु जेण्डर के रूप में औरत का निर्माण किया जाता है। कोई भी स्त्री जन्म से औरत के गुण लेकर पैदा नहीं होती। बल्कि उसके निर्माण में परिवार,शिक्षा, संस्कृति, राजनीति,अर्थशास्त्र आदि की केन्द्रीय भूमिका होती है।


   सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में औरत की पहचान के मानक भी बदले हैं। आज औरत की पहचान का जो मानक प्रचलन में है वह दो सौ साल पहले नहीं था।अत: औरत के बारे में बात करते समय ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का होना प्राथमिक शर्त्त है। ऐतिहासिक नजरिए के बिना औरत को समझना मुश्किल है। औरत सिर्फ सामयिक ही नहीं है। वह सिर्फ अतीत भी नहीं है। उसे काल में बांधना सही नहीं होगा । उसकी पहचान को ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। वह जितनी दिखती है उससे ज्यादा छिपी रहती है। वह प्रक्रिया है यही वजह है सबसे ज्यादा लोचदार है। किसी के साथ और किसी भी स्थिति में सामंजस्य बिठा लेती है। वह कब बदलेगी,उसका नया रूप कैसा होगा,नये रूप में वह समाज के साथ किस रूप में पेश आएगी इत्यादि सवालों के तयशुदा उत्तर हमेशा गलत साबित हुए हैं। 
मसलन् यह सवाल किया जा सकता है कि भारत के स्वाधीनता संग्राम में औरतों ने व्यापक स्तर पर हिस्सा लिया और राजीतिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कुर्बानी भी झेली। किन्तु यही औरत आजादी के बाद घर की चौहद्दी में वापस क्यों लौट गई ? ऐसा क्यों हुआ कि जिस औरत ने सामाजिक-राजनीति जीवन में अपने लिए व्यापक जगह तैयार की थी और राजनीति-सामाजिक मसलों पर दृढ़ रवैय्या अपनाया था , उसका समाज में पूरी तरह राजनीतिक प्रक्रियाओं में रूपान्तरण क्यों नहीं हुआ ? हमारे स्वाधीनता संग्राम ने औरत को राजनीतिक शिरकत का मौका दिया, गांधी और नेहरू जैसे नेताओं के नेतृत्व में आन्दोलन का अवसर दिया, सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में महिला सैन्य दल भी बना, महिला संगठनों के जुझारू दल भी बने किन्तु आजादी मिलने के बाद यह संघर्षशील औरत अचानक गायब हो गई। यह औरत कहां गुम हो गई ? इसके बारे में अभी तक ठीक से कुछ भी पता नहीं है ।
          आजादी के बाद सत्ता को औरत के राजनीतिक-सामाजिक रूप की बजाय उसका घर की चारदीवारी में सक्रिय रूप ही ज्यादा पसंद था। इस औरत के गायब हो जाने का दूसरा  प्रधान कारण था हमारी स्वाधीनता का पुंसवादी चरित्र। औरतें स्वाधीनता संग्राम हो या क्रांतिकारी कतारें हों सब जगहों पर नेतृत्व और फैसलेकुन कमेटियों का हिस्सा थीं। उसे राजनीतिक शिरकत के लिए घर से बाहर निकाला गया था ,उसका ब्रिटिश शासकों के खिलाफ दबाव के औजार की तरह इस्तेमाल किया गया। उसके साम्राज्यवाद विरोधी भावबोध को स्त्री की स्वाधीनताकामी चेतना में रूपान्तरित नहीं किया गया। उसे देश की आजादी के लिए मर मिटने के लिए तैयार किया गया। देश की पहचान के साथ जोड़ा गया। ऐसा करते समय हम यह भूल गए कि देश या राष्ट्र पुंसवाद का प्रतीक होता है। हमारे आजाद भारत के नए नक्शे में औरत में परंपरागत औरत को ही रखा गया। यही वजह है कि जब स्वाधीन भारत का जन्म हुआ तो देश नया था,मर्द नया था,मध्यवर्ग नया था,मजदूरवर्ग नया था, किन्तु औरत का वही पुराना रूप था जिससे निकलकर उसने देश की मुक्ति की कामना की थी ?
         यह सवाल महिला संगठनों से भी पूछा जाना चाहिए कि ऐसा कैसे हुआ कि स्वाधीनता संग्राम की आग में तपकर जो औरत सामने आयी थी वह अचानक गैर-राजनीतिक कैसे बन गयी ? महिला संगठनों ने आजादी के तुरंत बाद औरत को राजनीतिक तौर पर जगाए रखने का काम क्यों नहीं किया ? आजादी के तुरंत बाद कांग्रेसियों ,सोशलिस्टों और कम्युनिस्टों ने स्त्री जागरण की उपेक्षा क्यों की ?
जो औरत 15 अगस्त 1947 तक राजनीति में सक्रिय हिस्सेदारी के लिए महत्वपूर्ण मानी गयी वही औरत आजादी के बाद राजनीति के  परिदृश्य से गायब क्यों हो गई ? क्या सिर्फ राजनीतिक शिरकत से औरत की चेतना बदल जाती है ? हमारे स्वाधीनता-संग्राम ने क्या स्त्री -चेतना को बदला था ? क्या भारत -विभाजन के दौरान हुए साम्प्रदायिक कत्लेआम का औरत की चेतना के अ-राजनीतिकरण में अवदान है ? क्या भारत विभाजन ने अ-राजनीति की राजनीति की वैचारिक जमीन तैयार की थी ?क्या इसके कारण स्त्री -चेतना का साम्प्रदायिकीकरण हुआ था ? इन सवालों का अभी तक संतोषजनक उत्तर नहीं मिला है।
     यह सच है कि साम्प्रदायिक राजनीति का जो सिलसिला आजादी के आन्दोलन के दौरान शुरू हुआ उससे महिलाओं की राजनीतिक चेतना पर भी बुरा असर हुआ और भारत विभाजन में जिस तरह लाखों औरतों को नारकीय यंत्रणाएं झेलनी पड़ीं,कत्लेआम और शोषण का सामना करना पड़ा उसके कारण महिलाचेतना और महिलाओं की राजनीतिक शिरकत को गहरा धक्का लगा। महिलाओं का अ-राजनीतिकरण हुआ।
जिस समय सन् 1980 के बाद महिला आन्दोलन तेजी से आगे बढ़ रहा था। उसी समय बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि आंदोलन के बहाने शुरू हुई साम्प्रदायिक लहर ने महिलाओं को भी प्रभावित किया। पहलीबार महिलाओं के साम्प्रदायिक राजनीतिक संगठन सामने आए, साम्प्रदायिक हिंसाचार में औरतों को सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए साम्प्रदायिक हिन्दू संगठनों ने प्रयास शुरू किए। दंगों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी देखी गई।

                       










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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...