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शनिवार, 20 जुलाई 2013

जनसत्ता के निराला पर प्रतिक्रियावादी हमले


 हाल ही में जनसत्ता अखबार में शंकरशरण का लेख छपा है जिसमें सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' को हिन्दुत्ववादी सिद्ध करने का आधारहीन प्रयास किया गया है। इस लेख में निराला को समग्रता में देखने की कोशिश ही नहीं की गयी है। साथ ही इस लेख में निरर्थक प्रगतिवाद पर हमला बोला गया है। अप्रासंगिकता को आलोचना में दीमक कहते हैं।
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जनसत्ता जैसे अखबार की प्रगतिशीलता विरोधी मुहिम जारी है और उसमें कविताओं के साथ आलोचना कम कु-समीक्षा ज्यादा लिखी जा रही है।हाल ही में शंकर शरण जैसे लेखक ने अपने लेख में निराला की प्रसिद्ध कविता तुलसीदास का गलत मूल्यांकन किया है।
असल में उसी कविता में निराला ने कविता लिखने का मकसद भी लिखा है। निराला ने लिखा है- "करना होगा यह तिमिर पार। देखना सत्य का मिहिर द्वार।"
यह कविता हिन्दुत्ववादी नजरिए को अभिव्यंजित करने वाली कविता नहीं है। बल्कि इसका लक्ष्य भिन्न है।
इस कविता का मूल लक्ष्य है सांस्कृतिक अंधकार को पार करके सत्य को पाना। साम्प्रदायिक नजरिए का सत्य के सत्य बैर है। शंकरशरण जैसे लेखक इस मूल बात को पकड़ने में असमर्थ रहे हैं। कविता किसके लिए लिखी गयी है यह बात कविता में निराला ने स्वयं लिखी है । सवाल यह है शंकरशरण यह लेख क्यों इनदिनों मोदी को महान बनाने की मुहिम के हिस्से के तौर पर इस तरह के लेख छापकर जनसत्ता अखबार जाने-अनजाने मोदी की जनसंपर्ककला का शिकार बन गया। निराला का हिन्दुत्व से कोई संबंध नहीं है। निराला विचार और कर्म दोनों में साम्प्रदायिकता विरोधी थे।
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शंकर शरण जैसे लेखक को यह भी जानना चाहिए कि साम्प्रदायिक समस्या पर निराला आखिरकार क्या सोचते थे। निराला ने लिखा है- "हिंदू और मुसलमानों की समस्या इस देश की पराधीनता की सबसे बड़ी समस्या है।"
शंकरशरण जैसे लेखकों का इस समस्या के प्रति रूख क्या है ,यह बात भी जाननी दिलचस्प है। वे निराला में से मनवांछित यथार्थ खोज रहे हैं। इस तरह के लेखन को निराला मानसिक दु्र्बलता मानते थे।
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शंकर शरण जैसे लेखकों को ध्यान में रखकर ही निराला ने लिखा था- "हमारे देश में धार्मिक कट्टरता ही प्रबल है। इसका परिणाम यह होता है कि कट्टरता का जड़त्व मस्तिष्क का विकास नहीं होने देता।अपने अनुकूल न होने पर धार्मिक तत्व झूठे जान पड़ते हैं।यह आत्मानुकूल तत्ववृत्ति बहुत बड़ी मानसिक दुर्बलता है। इसके कारण सभी रेखाओं से मन-शक्ति का विकास नहीं हो पाता। प्रहार करने वाली पशुवृत्ति बनी रहती है।मनुष्य सब देशों के साहित्य,समाज,राजनीति और धर्म का महत्व समझ नहीं पाता।प्रगति एक हद तक बंधी रहती है। "
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निराला ने लिखा था- " हिंदुओं की संकीर्णता के कारण ही मुसलमान इस देश में संकीर्ण हो रहे हैं। "

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

मनमोहन की कुछ बेहतरीन कविताएं

कार्तिक-स्नान

एक ही दिन

एक ही मुहुर्त में

हत्यारे स्नान करते हैं

हज़ारों-हज़ार हत्यारे

सरयू में,यमुना में

गंगा में

क्षिप्रा ,नर्मदा और साबरमती में

पवित्र सरोवरों में

संस्कृत बुदबुदाते हैं और

सूर्य को दिखा -दिखा

यज्ञोपवीत बदलते हैं

मल-मलकर गूढ संस्कृत में

छपाछप छपाछप

ख़ूब हुआ स्नान

छुरे धोए गए

एक ही मुगूर्त में

सभी तीर्थों पर

नौकरी न मिली हो

लेकिन कई खत्री तरूण क्षत्रिय बने

और क्षत्रिय ब्राह्मण

नए द्विजों का उपनयन संस्कार हुआ

दलितों का उद्धार हुआ

कितने ही अभागे कारीगरों-शिल्पियों

दर्जि़यो,बुकरों,पतंगसाज़ों,

नानबाइयों,कुंजड़ों और हम्मालों का श्राद्ध हो गया

इसी शुभ घड़ी में

(इनमें पुरानी दिल्ली का एक भिश्ती भी था)

पवित्र जल में धुल गए

इन कम्बख़्तों के

पिछले अगले जन्मों के

समस्त पाप

इनके ख़ून के साथ-साथ

और इन्हें मोक्ष मिला

धन्य है

हर तरह सफल और

सम्पन्न हुआ

हत्याकांड


संचार की नई अवस्था

यह लीजिए जनाब लम्बा चक्कर लगा कर

एक बार फिर हम लोग

उसी जगह आते हैं

जो रास्ते पहले छोड़ दिए थे

खाई बन कर हमारे समाने हैं

जितना एक-दूसरे को देखते हैं

उससे कहीं ज्य़ादा बीच की खाई को

बातें भी एक-दूसरे से कम
ख़ाई से ज्य़ादा करते हैं
जैसे अब खाई ही अकेली पुल बची है


सिर्फ़ अपने-अपने शरीर लेकर 

जैसे वे सिर्फ़ अपने-अपने शरीर लेकर

चली आई हों इस दुनिया में

वे जानती हैं

हमारे पास कैमरे हैं

स्वचालित बहुकोणीय दसों दिशाओं में मुँह किए

जो हर पल उनकी तस्वीरें भेजते हैं

जिन्हें कभी भी प्रकाशित कर सकते हैं

कितनी सावधान वे गुज़रती हैं

मुस्कुराती हुई एक-एक हमारी दुनिया से

जैसे खचाखच भरे किसी जगमगाते स्टेडियम से

अकेले गुज़रती हों

 
सहमति का दौर-

टेढ़े रास्ते सीधे हो रहे हैं

टेढ़े लोग सीधे हो रहे हैं

कोई रूकावट नहीं

न कोई मोड़ है

कोई दो ओर नहीं

सब कहीं सुविधा है

इनकार की जरूरत क्या

थोड़ा -सा इसरार काफ़ी

क्योंकि कोई और नहीं

क्योंकि कोई गै़र नहीं

सब अपने हैं

कोई ऐसा इंतज़ार नहीं

जो हमें विकल कर दे

या तोड़ दे

किसी को कहीं से आना नहीं है

किसी को कहीं जाना नहीं है

बस प्रेम से रहना है

देखिए कमाल

एक राह से एक ही राह निकलती है

कोई दो राहें नहीं निकलतीं

एक बात से एक ही बात निकलती है

कोई दो बातें नहीं निकलतीं

अक्सर एक ही बात

अपने दो नमूने बना लेती है

जिससे बात रह जाती है
सच्चाई बस एक है
बाकी उदाहरण हैं

सहमति बुनियादी है

असहमति तो ऐसे ही है

जिससे सहमति घटित होती दिखाई दे

पहले ही जबाब इतना मौजूद है

कि सवाल पैदा ही नहीं होता

कैसी फुर्ती है

कि समस्या बनने के पहले ही

समाधान हाज़िर हो जाता है
जितना विवाद नहीं

उससे कहीं ज़्यादा बिचौलिए हैं

दलीलें,मिसालें,सुबूत

सब एक तरफ हैं

गवाह ,वकील, मुवक्किल,

मुंसिफ़ यहाँ तक कि मुद्दई

सब एक तरफ़



हमारा जातीय गौरव



आधी से ज्य़ादा आबादी

जहाँ ख़ून की कमी की शिकार थी

हमने वहाँ खून के खुले खेल खेले

हर बड़ा रक्तपात

एक रँगारँग राष्ट्रीय महोत्सव हुआ

हमने खूब बस्तियाँ जलाईं

और ख़ूब उजाला किया

और छत पर चढ़कर चिल्लाकर कहा

देखो,दुनिया के लोगो

देखो हमारा जातीय गौरव !


भारतीय संस्कृति

पहले पहल जब हमने सुना

चमड़े का वॉशर है

तो बरसों बरस नल का पानी नहीं पिया

तब कुओं-बावडि़यों पर हमारा कब्ज़ा था

जो आख़िर तक बना रहा

हमने कुएँ सुखा दिए

पर ऐरों-गैरों को फटकने न दिया

अब भी कायनात में पीने योग्य

जितना पानी बचा है

दलितों की बस्ती की ओर रूख करे इससे पहले

हमीं खींच लेते हैं

हमारे विकास ने जो ज़हर छोड़ा

ज़मीन की तहों में बस गया है
बजबजाते हुए हमारे विशाल पतनाले

हमारी विष्ठा हमारा कूड़ा और हमारा मैल लिए

सभ्यता की बसावट से गुजरते हैं

और नदियों में गिरते हैं

जिन्होने बहना बंद कर दिया है

कितना महान सांस्कृतिक दृश्य है कि

हत्याकांड सम्पन्न करने के बाद हत्यारा भीड़ भरे
                                                                                                                    
घाट पर आता है

और संस्कृत में धारावाहिक स्तोत्र बोलता हुआ

रूकी हुई यमुना के रासायनिक ज़हर में

सौ मन दूध गिराता है


हाय सरदार पटेल ! 

सरदार पटेल होते तो ये सब न होता

कश्मीर की समस्या का तो सवाल ही नहीं था

ये आतंकवाद वातंकवाद कुछ न होता

अब तक मिसाइल दाद चुके होते

साले सबके सब हरामज़ादे एक ही बार में ध्वस्त हो जाते

सरदार पटेल होते तो हमारे देश में

हमारा इस तरह अपमान न होता !

ये साले हुसैन वुसैन

और ये सूडो सेकुलरिस्ट

और ये कम्युनिस्ट वमुनिस्ट

इतनी हाय तौबा मचाते !

हर कोई ऐरे गैरे साले नत्थू खैरे

हमारे सर पर चठ़कर नाचते !

आबादी इस कदर बढ़ती !

मुट्ठीभर पढ़ी लिखी शहरी औरतें

इस तरह बक बक करतीं !

सच कहें,सरदार पटेल होते

तो हम दस बरस पहले प्रोफेसर बन चुके होते !



मंगलवार, 29 मार्च 2011

रघुवीर सहाय की पांच छोटी कविताएं



उसका रहना  
  रोज़ सुबह उठकर पाते हो उसको तुम घर में
  इससे यह मत मान लो वह हरदम मौजूद रहेगी



बेटे से

 टूट रहा है यह घर जो तेरे वास्ते बनाया था
जहाँ कहीं हो आ जाओ... 
नहीं यह मत लिखो लिखो जहाँ हो वहीं अपने को टूटने से बचाओ
हम एक दिन इस घर से दूर दुनिया के कोने में कहीं
बाहें फैलाकर मिल जाएँगे



 भ्रम निवारण
तुम क्या समझते हो कि
हर लड़की जो मुझे देखकर 
मुस्कुराती है मेरी पहचानी है
नहीं,वह तो सिर्फ 
अपनी दुनिया में मस्त रहती है



ग़रीबी
 "हम गरीबी हटाने चले
और उस समाज में जहाँ आज भी दरिद्र होना दीनता नहीं
भारतीयता की पहचान है,दासता विरोध है दमन का प्रतिकार है
हम ग़रीबी हटाने चले
हम यानी ग़रीबों से नफ़रत हिकारत परहेज़ करनेवाले
 हम गरीबी हटाते हैं तो ग़रीब का आत्म सम्मान लिया करते हैं
इसलिए मैं तो इस तरह ग़रीबी हटाने की नीति के विरूद्ध हूं
क्योंकि वही तो कभी-कभी अपने सम्मान की अकेली 
रचना रह जाती है



 ख़तरा 
एक चिटका हुआ पुल है 
एक रिसता हुआ बाँध है
ज़मीन के नीचे बढ़ता हुआ पानी है
ख़तरे में राम ख़तरे में राजधानी है
पहले खुदा के यहाँ देर थी अँधेर न था
 अब खुदा के यहाँ अंधेर है और उसमें देर नहीं







शनिवार, 19 मार्च 2011

हिन्दी का विलक्षण कवि मनमोहन

               मनमोहन के बारे में बातें करना बेहद जोखिमभरा काम है। खासकर उसके काव्य व्यक्तित्व पर बातें करते समय यही समस्या रहती है कि आखिर उस पर क्या बात करें ? वह 45 साल से कविताएँ लिख रहा है । वह देखने में जितना सीधा,सरल,सौम्य है, विचारों के क्षेत्र में उतना ही दुर्धर्ष है। विचारों की दुनिया में उसे पछाड़ना असंभव है। एकदम मौलिक पैराडाइम पर रखकर सोचने की कल्पनाशील बुद्धि उसे विरासत में अपने पिता की संगीतचेतना से मिली है। मनमोहन का परिवार मथुरा के उन चंद चतुर्वेदी परिवारों में से एक है जो पूरी तरह मॉडर्न परिवार कहलाते थे।सामंती मान्यताओं और आजीविका के सामंती तरीकों से एकदम मुक्त चतुर्वेदी परिवार की कल्पना करना उस जमाने में असंभव थी।
     मनमोहन के पिता संगीत के विद्वान शिक्षक थे और बेहद सुलझे हुए,ईमानदार, जनप्रिय सांस्कृतिक अभिरूचियों के पुंज थे। उनके स्वभाव में चतुर्वेदी समाज की सामंती-अर्द्ध सामंती मान्यताएं,मूल्य और संस्कार एकदम नहीं थे। यही वह बुनियादी पारिवारिक परिवेश था जिसमें मनमोहन का मनोजगत और सामाजिक जगत तैयार हुआ। सभ्यता, संस्कृति, शालीनता आदि में मनमोहन के पिता को आदर्श के रूप में समूचा शहर जानता था और यही वह चीज है जिसने मनमोहन के समूचे व्यक्तित्व को बनाया है। 
     परिवार की संगीत परंपरा के प्रभाव के कारण मनमोहन की संवेदनाएं और इन्द्रियबोध पक्षियों जैसा है। मैंने करीब से उसके सरल और पढ़ाकू स्वभाव को देखा है। बचपन में मेरा पढ़ने में कम मन लगता था उसका खूब,वो शहर के सबसे अच्छे कॉलेज में पढ़ता था मैं संस्कृत पाठशाला में। मैं पक्का ईश्वरभक्त था और वो पक्का नास्तिक। वो नास्तिक कब और कैसे बना यह मैं नहीं जानता लेकिन उसके घर में मंदिर था और मंदिर की कभी -कभार उसे सेवा भी करनी पड़ती थी,इस काम को वो बखूबी अंजाम देता था।  
   मेरा उसके साथ बचपन से संबंध है। मैं पौराणिक कथाओं में डूबा रहता वो मार्क्सवादी सिद्धान्तों से जुड़े वैज्ञानिक चिंतन की समस्याओं में उलझा रहता। मैं उसकी किसी भी बात से सहमत नहीं होता था।उसके साथ विवाद करता था। मेरे और उसके बीच में खेल के लिए कभी दोस्ती नहीं हो पायी, वह कम खेलता था,मेरे कहने के बाद उसने शतरंज खेलना आरंभ किया और कभी-कभार मेरे कहने पर दशहरे पर पतंग उड़ाने छत पर भी चला जाता था। मेरी क्रिकेट,पतंग,शतरंज आदि खेलों में रूचि थी,उसकी दोस्ती करने, कविता सुनाने,दोस्तों के साथ ज्ञान बांटने,पार्क में घूमने और विभिन्न विषयों पर विमर्श और बहस करने में रूचि थी।
      मुझे यहां याद है वह कक्षा 10 में पढ़ता था तब से उसकी कविताएं हिन्दी की विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में छपती रही हैं। मथुरा में मनमोहन के चंद पाठक थे उनमें एक मैं भी था।सव्यसाची उसके बड़े प्रशंसक थे।वे उन दिनों मथुरा में कम्युनिस्ट पार्टी के जिलामंत्री थे।एक साहित्यिक पत्रिका 'उत्तरार्द्ध ' निकालते थे।उनके यहां हिन्दी की समस्त साहित्यिक पत्रिकाएं आती थीं । हम सभी उनसे वे पत्रिकाएं लेकर पढ़ते थे।
      मनमोहन की काव्य बुनावट की धुरी है मथुरा के वातावरण का बांकपन और व्यंग्य। उसकी कविता की खूबी है नियोजित विचार औऱ व्यंग्यपूर्ण काव्यभाषा । वह कविता लिखने के पहले कोई योजना नहीं बनाता। वह योजना बनाकर न तो सोचता है और न लिखता ही है। विषय, कल्पना और विचार में वह मुक्तभाव से विचरण करता है। ब्रज के वैष्णवसंतों की उदारता और पैनापन उसकी काव्यभाषा में घुला-मिला है। इस परंपरा के असर के कारण उसमें एकदम अहंकार नहीं है। वह स्वभाव और आदतों से वैष्णव है और विचारों से मार्क्सवादी है।
       कविता में बाँकपन और सीधे कहने की कला उसे मथुरा के परिवेश से विरासत में मिली हैं। मथुरा में उस समय आमतौर पर मध्यवर्ग के लोगों में ब्रजभाषा का प्रयोग होता था लेकिन मनमोहन ने अपने को सचेत रूप से ब्रजभाषा के दायरे से बाहर निकालकर खड़ी बोली हिन्दी के आधुनिक वातावरण में ढ़ाला। उस समय मथुरा में ब्रजभाषा में कविता लिखने वाले कवियों की अच्छी-खासी संख्या थी। मनमोहन के दोस्तों में मेरी याद में महेन्द्र 'नेह' अकेले कवि थे जो खड़ी बोली में क्रांतिकारी कविता लिखा करते थे।
    वह पहले भी युवाओं में नायक था और आज भी युवाओं में नायक है,युवा उसके दीवाने हैं। उसके विचारों में डूबते उतराते रहते हैं । उन्हें वह किसी न किसी वैचारिक-सामाजिक युक्ति के आधार पर बाँधने में सफल भी हो जाता है। मैंने अनेक कवि देखे हैं जिनका प्रगतिशील परंपरा में बड़ा योगदान है लेकिन उनमें से अधिकांश कम्युनिस्ट पार्टी और उसके संगठनों में जनता और युवाओं को संगठित करके लाने के काम में कमजोर रहे हैं। मनमोहन इस मामले में बेजोड़ है। वह जितना शानदार कवि है उतना ही शानदार संगठनकर्ता भी है। मनमोहन का मोटो है संगठन के बिना आंदोलन नहीं, आंदोलन के बिना कविता नहीं,कविता के बिना जीवन नहीं।
     भारत में किसी कवि ने इतने बड़े पैमाने पर कम्युनिस्ट कार्यकर्ता तैयार नहीं किए जितने उसने किए हैं। उसके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर सैंकड़ों युवाओं ने कम्युनिस्ट पार्टी का रूख किया है। इस तरह की मिसाल पुराने जमाने में इप्टा के दौर में मिलती हैं। लेकिन आजाद भारत में ऐसी मिसाल नहीं मिलती कि कवि स्वयं लिखे,जनता को संगठित करे,कम्युनिस्ट कैडर तैयार करे।
    जमीनी हकीकत को जानने और समझने की क्षमता वाले सैंकड़ों कम्युनिस्ट कार्यकर्ता पैदा करने में मनमोहन का अतुलनीय योगदान रहा है। मनमोहन के लिए मार्क्सवाद और क्रांति महज विचार नहीं हैं जिनके सहारे जी लिया जाए और कविता लिख दी जाए। मार्क्सवाद और क्रांति के कामों के लिए संरचनाओं के निर्माण के काम को जिस प्राथमिकता के साथ मनमोहन ने किया है उसके कारण वह बड़े-बड़े प्रगतिशीलों की नजर में छोटी उम्र में ही आदर का पात्र बन गया। उसकी यही चीज उसे हिन्दी की प्रगतिशील कवि परंपरा से भिन्न धरातल पर खड़ा कर देती है।  
          मथुरा में मनमोहन ने जब कविता लिखना आरंभ किया था तो  उस जमाने के ब्रज के ज्यादातर कवि सामयिक विषयों पर कविता नहीं लिखते थे। उनकी कविताओं में 17वीं और 18वीं शती के काव्य विषयों की भरमार थी। स्थानीयताबोध हावी था। मनमोहन की कविता का आरंभ ब्रजभाषा के इस स्थानीयतावाद से लड़ते हुआ। उसके नजरिए पर हिन्दी की प्रगतिशील काव्य परंपरा का गहरा असर था जिसने उसे कम उम्र में ही  ब्रजभाषा के स्थानीयतावाद से मुक्त होने में मदद की। उसे आरंभ से ही किसी भी किस्म के रीतिवाद से घृणा थी, वह न तो साहित्यिक रूढ़ियों को मानता था और नहीं सामाजिक रूढ़ियों की मानता था।यह सिलसिला आज भी जारी है।  
मनमोहन की कविता का आज जो ठाट दिखाई देता है वह एक दिन में नहीं बना है। इसमें मनमोहन की बड़ी मेहनत लगी है। मनमोहन की खूबी है उसे प्रगतिशील कविताएं बेहद पसंद हैं मुक्तिबोध और नागार्जुन का वो दीवाना है। लेकिन उसे प्रगतिशील कविता में व्याप्त स्टीरियोटाइप और एक खास किस्म के रीतिवाद से नफ़रत भी है।
मसलन् प्रगतिशील कविता में उन दिनों सार्वभौम लेखन हावी था,एक ही किस्म के विषयों पर लिखना,एक ही किस्म के सजे-सजाए विचारों को परोसना,मजदूर-किसान-आंदोलन और क्रांति ये चार विषय थे जिनके इर्दगिर्द हिन्दी की प्रगतिशील कविता के सार्वभौम विषयों का संसार घूमता रहा है। प्रगतिशीलों में सर्जनात्मकता के स्तर पर इस सार्वभौम (यूनीवर्सल) की हिमायत में खूब लिखा भी गया है। मनमोहन की कविता में आरंभ से यह प्रगतिशील यूनीवर्सल गायब है। हिन्दी कविता में यूनीवर्सल विषय और भावबोध के बिना कविता लिखी जा सकती है और उसे प्रगतिशील कविता कहते हैं इस बात को सामने लाने में मनमोहन की कविताओं की बड़ी भूमिका है।  
    वह आरंभ से प्रतिबद्ध कवि है। मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता आज भी बनी हुई है। मार्क्सवाद के जड़ और यांत्रिक प्रयोगों को मनमोहन ने कभी स्वीकार नहीं किया। सार्वजनिक मंचों पर वह मार्क्सवाद के लिए लड़ता है और अंदर पार्टी मंचों पर मार्क्सवाद और मार्क्सवादियों से लड़ता है।
    मार्क्सवाद को समाज में पाना और अंदर से उसकी अविवेकवादी मान्यताओं से लड़ना उसके कवि व्यक्तित्व की विशेषता है। इस क्रम में मनमोहन ने पाया कम और खोया ज्यादा है। मनमोहन की प्राप्ति है उसकी सामाजिक साख ,अभिव्यक्ति का पैनापन और सामाजिक परिवर्तन के कामों के प्रति उसका एकनिष्ठ समर्पणभाव ।
   मनमोहन की कविता में आधुनिकता के पूंजीवादी रूपों, संस्कारों,आदतों और रोमानियत के प्रति तेज और तीखा व्यंग्य मिलता है। उसने बुनियादी तौर पर आधुनिकतावादी राजनीति,संस्कृति,तकनीक और विधाओं से जुड़े सवालों को निशाना बनाया है। उसकी एक कविता है 'इच्छा',लिखा है- "एक ऐसी स्वच्छ सुबह मैं जागूँ/ जब सब कुछ याद रह जाय/और बहुत कुछ भूल जाय,जो फ़ालतू है/"
    मनमोहन की कविता में एक चीज में आरंभ से देख रहा हूँ कि उसे 'छिपाने' की आदत और 'भय' से सख्त नफरत है। 'छिपाने' की आदत और 'भय' के कारण आम तौर पर खोज का काम नहीं हो पाता। 'छिपाने' की आदत और 'भय' के प्रतिवाद के कारण उसकी कविताएं भावुकता से पूरी तरह मुक्त हैं।
     हिन्दी कविता में भावुकता को वे कवि ज्यादा इस्तेमाल करते हैं जो 'छिपाने' की कला में माहिर हैं। मनमोहन की कविता में जो फैंटेसी,भाषा और व्यंग्य है उसकी पहली और आखिर मुठभेड़ इस छिपाने की काव्यकला से है।यह सामंती कला रूप है।इसका जीवन से लेकर साहित्य तक साम्राज्य है।
     मनमोहन की कविता को खोलने के लिए 'छिपाने' की कला के समूचे ताने-बाने को जानना बेहद जरूरी है। छिपे को उजागर करने के चक्कर में उसे अनेक बार अभिव्यक्ति के संकट का भी सामना करना पड़ता है। फलतः अनेक बार उसकी कविता में प्योर विचारों में सच्चाई व्यक्त होती है। कविता में उसे जब अपनी बेचैनी और आक्रोश को व्यक्त करने के लिए कुछ नहीं मिलता तो विचार के अस्त्र का सफलता के साथ इस्तेमाल करता है। विचार को भी वह उजागर करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। अनेक कवि हैं जो विचार का छिपाने के लिए इस्तेमाल करते हैं लेकिन मनमोहन के लिए विचार छिपाने के कौशल का हिस्सा नहीं है। वह कविता कुछ इस तरह पेश करता है कि पाठक को लगे कि अरे यह तो मैं जानता था। ऐसी एक बेहद सुंदर कविता है 'ईश वन्दना' ,देखें-
"धन्य हो परमपिता ‍!
 सबसे ऊँचा अकेला आसन
ललाट पर विधान का लेखा                             
ओंठ तिरछे
नेत्र निर्विकार अनासक्त
भृकुटि में शाप और वरदान
रात और दिन कन्धों पर
स्वर्ग इधर नरक उधर
 वाणी में छिपा है निर्णय
 एक हाथ में न्याय की तुला
 दूसरे में संस्कृति की चाबुक
 दूर -दूर तक फैली है
 प्रकृति
 साक्षात पाप की तरह।"
        इस तरह की कविताशैली के जरिए मनमोहन एक ऐसे संसार की ओर ध्यान खींचना चाहता है जिसे हम भूल गए हैं। अपनी कविताओं में मनमोहन उन बातों का व्यापक जिक्र करता है जिन्हें हम भूल गए हैं। आधुनिकता ने स्मृतिक्षय को तेज गति से सम्पन्न किया है इस संदर्भ में देखें तो समझ सकते हैं कि वह भुलादी गयी बातों को कविता के केन्द्र में क्यों लाना चाहता है। यह रेखांकित करता है कि हमारी ईश्वर ,चीजों,विषयों,यथार्थ आदि के बारे में हमारी कितनी सीमित समझ है।
      छिपे यथार्थ को सामने लाने के पीछे प्रधान कारण है सत्य की खोज करना। इस सत्य की खोज के चक्कर में मनमोहन दैनंदिन जीवन के छोटे से अंश को पकड़ता है और अनसुलझे जटिल अलगाव की ओर संकेत करता है तो कभी मनोदशाओं के चित्रण में खो जाता है,कभी अवसाद और क्रांति की शरण में चला जाता है।
    छिपे हुए की खोज अंततः मनमोहन की कविता में विरल खेल करती है वह जब छिपे सत्य की खोज करता है तो झूठ को नंगा कर बैठता है। आपातकाल के प्रतिवाद में लिखी उसकी कविता 'आ राजा का बाजा बजा' कुछ इसी तरह के शिल्प की कविता है। यही कलात्मक कौशल उसकी कविता 'ग़लती ने राहत की साँस ली' में दिखाई देता है। लिखा है, "उन्होंने झटपट कहा/हम अपनी ग़लती मानते हैं/ग़लती मनवाने वाले खुश हुए/कि आख़िर उन्होंने ग़लती मनवा कर ही छोड़ी/उधर ग़लती ने राहत की साँस ली/कि अभी उसे पहचाना नहीं गया/"
     मनमोहन ने कविता के प्रचलित आख्यान को डिस्टर्ब किया है। वह कविता के नरेटिव की आकांक्षाओं को डिस्टर्ब करता है। उसकी कविता के नरेटिव के डिस्टर्ब होने का प्रधान कारण है कविता में अवधारणाओं का सृजन। आमतौर पर हिन्दी कवियों के यहाँ कविता में निहित आख्यान सीधे चलता है और यह परंपरा निराला से लेकर नागार्जुन तक सभी के यहां बरकरार है लेकिन मनमोहन इस परंपरा की काव्यशैली के गठन से अपने को अलग करता है।





       

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

नागार्जुन की जन्मशती पर विशेष- कविता के नए लोकतंत्र की तलाश में


    हिन्दी में बाबा नागार्जुन को पूज्यनीय बनाने और शब्दों की जुगाली करके ठिकाने लगाने की मित्र क्रियाएं आरंभ हो गयी हैं। बाबा पर इन दिनों जितनी चर्चाएं हो रही हैं उनमें बुर्जुआ लोकतंत्र और प्रतिवादी लोकतंत्र के बीच के अंतर पर बातें कम हो रही हैं। बाबा की कविता में बुर्जुआ लोकतंत्र की गंभीर आलोचना व्यक्त हुई है। बाबा पर बातें करते समय आमतौर पर अवधारणाओं को अमूर्त्त बनाकर देखने और चित्रित करने का रिवाज रहा है।
   मसलन नागार्जुन की कविता की रोशनी में हिन्दी समीक्षक उन्हें लोकतंत्र विरोधी के रूप में चित्रित करते रहे हैं और समाजवादी बना रहे हैं। उनकी कविता की खूबी है कि वह राजनीतिक और लोकतांत्रिक है। यह बुर्जुआ लोकतंत्र के समीक्षा की कविता है। यह ऐसी कविता है जो बुर्जुआ लोकतंत्र के दमनात्मक रूप का उदघाटन करती है। उसके रेशनल को ध्वस्त करती है।  इस कविता ने परंपरागत कविता के फॉर्म को तोड़ा है। उसकी जगह कविता के लोकतांत्रिक ढ़ांचे को बनाया है।अभी हम जिस लोकतंत्र में रह रहे हैं उसमें हेज़ेमनी है और व्यक्ति के द्वारा व्यक्ति का शोषण चरम पर है। इस वातावरण में रूपकथाओं,रूपकों,मिथकों और राजनीतिक मुहावरों में सोचने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। जीवन की कठोर वास्तविकताओं की बजाय सॉफ्ट यथार्थ और निर्मित यथार्थ केन्द्र में आ गया है। हिन्दी में इन दोनों इस तरह के यथार्थ पर खूब लिखा जा रहा है। इसका महिमामंडन भी हो रहा है। इस क्रम में ठोस यथार्थ क्या होता है और उसके प्रमुख सवाल क्या हैं , उन पर बातें बंद हैं। बाबा के बहाने हम सोचें कि कविता के सामने आज क्या संकट है या चुनौतियां हैं।
    कविता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है सामयिक यथार्थ के मर्म को पकड़ने की। पहले एक नयी स्थिति पर ध्यान दें। एक जमाना था साहित्य में दुनिया के सवाल उठाए जाते थे,लेकिन नए दौर में साहित्य के बारे में ही ,कविता के बारे में सवाल खड़े किए जा रहे हैं। साहित्य और कविता की प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
    एक जमाना था कविता में कल्पना का बोलवाला था। लेकिन बाबा ने कल्पना को गौण और सच को प्रधान बनाया और यह काम बड़े ही कौशल के साथ किया है। वे कविता की अधिरचना को सतही यथार्थ के जरिए आरंभ करते हैं और फिर उसके वास्तव मर्म के अंदर चले जाते हैं। यहां उनका यथार्थ के प्रति आग्रह प्रबल हो उठता है। इस प्रसंग में उनकी कविता ‘कौन हाँफ रहा है’ (1990) को देख सकते हैं। यह समाजवाद के पतन पर लिखी शानदार कविता है। लिखा है- ‘‘कौन हाँफ रहा है ? / किसका दम घुट रहा है ? / अरे ,अरे, मैं पहचानता हूँ/दूर से ही सही/मैंने बार-बार/उसके पैंरों की आहट सुनी है/जी,मैं पहचानता हूँ/ वो सोशलिज्म है/ वो कम्युनिज्म की तरफ /तेजी से बढ़ा जा रहा था/ हाय,बीच रास्ते में ही/ इसका दम क्यों फूलने लगा ?/ क्या वे कोलखोज यक्-ब-यक् / ऊसर हो गए ? / सामूहिक कृषि-फार्म के / गेंहूँ तो हम तक भी पहुँचे थे/ दूर ग्रामांचल में,‘तरौनी’गांव तक / सोव्रवोज वाली सुनहली फसलों की खुशबू/मेरे ग्रामांचल की आबोहवा में भी /जाने कितनी बार फैली है.../ यह सब कुछ तुम्हें बतलाएँगे /कामरेड चतुरानन -झा!! / साथी श्यामलकिशोर / आप बतलाओ/वे कोलखोज क्या अब /बालू ही बालू रह गए/ क्या सचमुच रूस के लोग भूखे-प्यासे/ दिन पर दिन गुजारते हैं अब ? / ‘पेरेस्त्रोइका’ क्या हुआ ! / ‘ग्लासनोस्त’शंख-नाद का क्या हुआ !/ कामरेड गोर्बाचोब सच-सच बतलाओ- / सोवियत -भूमि में इन दिनों/ क्या कुछ कर रहे हैं लोग ?’’  
     इस कविता में फिक्शन और गैर फिक्शन दोनों घुले मिले हैं। कल्पना और सच दोनों घुलमिल गए हैं। विचारधारा और कविता दोनों घुल मिल गए हैं। यह कविता एक तरह से गैर-काल्पनिक फॉर्म है। यह कविता नहीं है बल्कि एक तरह का लेखन है। पत्रकारिता है। कविता को लेखन में तब्दील करने की कोशिश है।
     बाबा की कविता में एक और प्रयास नजर आता है वह है राजनीतिक कविता की साख बनाने का। वे हिन्दी में कलावादियों के द्वारा बनाए अराजनीतिक कविता के वातावरण को तोड़ते हैं। राजनीतिक कविता की साख बनाते हैं। निश्चित रूप से इसमें प्रगतिशील काव्यधारा की भी बड़ी भूमिका रही है लेकिन बाबा की अन्यतम भूमिका रही है। राजनीतिक कविता में सामाजिक सच्चाई को प्रभावी ढ़ंग से व्यक्त किया जा सकता है, इस बात की स्वीकृति बाबा ने ही करायी है। वैविध्यपूर्ण राजनीतिक कविता लिखकर कविता को जहां विचारधारा के दायरे के परे ले गए वहीं दूसरी ओर लोकतंत्र के भी परे ले गए। राजनीतिक कविता को साहित्यिक स्वीकृति दिलाकर बाबा ने शीतयुद्ध का जबाव दिया है। वे किसी भी तरह शीतयुद्ध के इस या उस खेमे के साथ बंधते नहीं हैं। वे जिस समय राजनीतिक कविता की साख बना रहे थे उसी समय हिन्दी की भी साख बना रहे थे। हिन्दी भाषा को प्रतिवाद की भाषा बना रहे थे। वे कविता में नए-नए राजनीतिक विमर्शों को रच रहे थे। कविता में विमर्श के वे सबसे बड़े कवि हैं। जो लोग इन दिनों साहित्य में विमर्श को देखकर नाक-भौं सिकोड़ते हैं उनके लिए बाबा सटीक जबाव हैं। वे कविता में विमर्श के कवि हैं। जिस तरह शमशेर कवियों के कवि हैं। बाबा विमर्शों के कवि हैं। जो लोग यह कहते हैं विमर्श की संस्कृति उत्तर आधुनिक संस्कृति है,आयातित संस्कृति है,परायी संस्कृति हैं उनको बाबा की कविता को देखना चाहिए। वे बड़े पैमाने पर विमर्शों को कविता में ले आते हैं।
   बाबा हिन्दी में पैराडाइम शिफ्ट के कवि हैं। पैराडाइम शिफ्ट का कवि वह होता है जो अपनी कविता के जरिए अन्य संस्कृति की ओर ले जाए। बाबा ने अपनी राजनीतिक कविताओं ,खासकर हिन्दी,बांग्ला और मैथिली कविताओं के माध्यम से यह संभावनाएं पैदा की हैं।  उनकी कविता एक ही साथ कई संस्कृतियों में विचरण करती है। वे कविता को खासकर प्रगतिशील कविता को एक नए पैराडाइम में लेजाते हैं। वे उन चंद कवियों में हैं जो हिन्दी कविता को दैनन्दिन राजनीति के करीब ले जाते हैं। दैनन्दिन राजनीति के पास कविता के जाने का असर यह हुआ है कि कालांतर में हिन्दी कवियों ने दैनन्दिन जीवन पर केन्द्रित होकर कविताएं लिखीं। दैनन्दिन जीवन कविता के केन्द्र में आया। दैनन्दिन राजनीतिक कविताएं सामयिक आंदोलनों के प्रत्युत्तर और जरूरतों के लिहाज से लिखी गयी थीं,इन कवियाओं को बाद में साहित्य की राजनीतिक प्रतिक्रिया भी मान लिया गया।
      प्रगतिशील कविता का साम्यवादी आंदोलन के बाहर भी भविष्य है इसकी ओर भी बाबा ने ध्यान खींचा है। वे कविता में पहलीबार व्यापक रूप में मानवाधिकारों के सवालों को ले आते हैं। बाबा के पहले मानवाधिकारों को कविता के केन्द्र में कोई नहीं लाया । कविता को मजदूर-किसान के स्टीरिटाईप से निकालकर मानवाधिकारों के बृहत्तर कैनवास में लाकर बाबा ने पैराडाइम शिफ्ट का काम किया है। बाबा की 1970-71 से मानवाधिकारों पर केन्द्रित कविताएं आनी शुरू होती हैं और यह सिलसिला थमता नहीं है। वे अब कविता में उन विषयों की ओर मुड़ते हैं जो मानवाधिकारों से संबंधित हैं। इस प्रसंग में उनकी पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में हुई बूथ केप्चरिंग और अर्द्धफासी आतंक पर लिखी कविताएं प्रस्थान बिंदु के रूप में देखी जानी चाहिए। ये कविताएं बाबा को प्रगतिशील कवि की प्रचलित कोटि के बाहर ले जाती हैं और वे हठात मानवाधिकारों के रक्षक कवि के रूप में सामने आते हैं। वे दल और विचारधारा की सीमाओं का भी इसी आधार पर अतिक्रमण करते हैं और इसी आधार पर लोकतंत्र के खोखलेपन की आलोचना भी करते हैं। हमें 1970-71 के बाद की बाबा की कविताओं को मानवाधिकार साहित्य परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। वे पहलीबार प्रगतिशील कविता की सहमति को तोड़ते हैं। प्रगतिशील कवियों में अनेक सवाल हैं जिन पर आम सहमति नहीं है इनमें बाबा की कविताएं ज्यादा हैं जो आम सहमति को तोड़ती हैं। वे चीन-भारत युद्ध का सवाल हो या,नक्सलों के चित्रण का सवाल हो,संपूर्ण क्रांति आंदोलन के प्रश्न हों या आपात्काल के प्रश्न हों, आपातकाल के बाद तो यह सिलसिला और भी तेज गति से आगे बढ़ता है। मानवाधिकार के पैराडाइम में आने के साथ प्रगतिशील कविता में बनी आम सहमति टूट जाती है। प्रगतिशील कविता के पैराडाइम में अधिकांश कवि साम्यवादी विचारधारा से बंधे थे। लेकिन बाबा ने जबसे मानवाधिकारों की दुनिया में शिफ्ट किया सारा मामला बदल गया। वे साम्यवादी विचारधारा के बाहर चले गए। यह शिफ्ट आया तो भारत-चीन युद्ध के समय से है,लेकिन उसने आधार बनाया पश्चिम बंगाल के 1972-77 के अर्द्ध -फासी आतंक के समय को। उसके बाद से बाबा ने कविता में मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य को छोड़ा नहीं। इसी अर्थ में बाबा को पैराडाइम शिफ्ट का बड़ा कवि कह सकते हैं। मुक्तिबोध,केदारनाथ अग्रवाल,शमशेर,त्रिलोचन,शीलजी आदि की एक ही मुश्किल है कि वे पैराडाइम शिफ्ट के कवि नहीं हैं। यही हाल बाद के कवियों रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, ,केदारनाथ सिंह आदि का है। ये एक की पैराडाइम में बंधे हैं।
   बाबा लोकतंत्र की आलोचना करते हुए आरंभ में कविता में समय को दर्ज करते हैं लेकिन बाद में उसे समयरहित अवस्था की ओर ले जाते हैं। उनकी कविता में आलोचक सामयिक राजनीतिक सत्य के साथ सामान्य सत्य की भी खोज करते रहे हैं। कविता में सत्य की खोज को वे मूल्यांकन का हिस्सा बना देते हैं। बाबा अपनी राजनीतिक कविताओं में राजनीति के शिकार लोगों के आख्यान को सामने लाते हैं। राजनीति की आलोचना को सामने लाते हैं और यह काम कविता की सर्जनात्मकता को बनाए रखकर करते हैं। वे आलोचना को मानकों के परे ले जाकर पेश करते हैं। मसलन समाजवाद की आलोचना में लिखी उपरोक्त कविता की पंक्तियों को देखें-  ‘‘कौन हाँफ रहा है ? / किसका दम घुट रहा है ? / अरे ,अरे, मैं पहचानता हूँ/दूर से ही सही/मैंने बार-बार/ उसके पैंरों की आहट सुनी है/जी,मैं पहचानता हूँ/ वो सोशलिज्म है/’’ समाजवाद के पराभव को इतने सुंदर ढ़ंग से व्यक्त किया है कि कोई सोच ही नहीं सकता है कि समाजवाद ‘ हाँफ रहा है’, यह एक वाक्य ही काफी है पराभव को रेखांकित करने के लिए। इसी अर्थ में बाबा अपनी कविताओं के माध्यम से एक नया भाषाय़ीखेल खेलते हैं।  उनकी कविता में भाषा में बहुत ही गहरे अर्थों,बहुस्तरीय अर्थों की अभिव्यंजना हुई है। वे अपने भाषागेम में किसी न किसी विचार को केन्द्र में रखते हैं। वे उस विचार की ऐतिहासिकता में नहीं जाते उसे मूल्यहीन नहीं बनाते बल्कि नए मूल्य से लैस करते हैं। वे भाषाखेल को साहित्य की परिवर्तित अवधारणा की संगति में विकसित करते हैं। रूपायित करते हैं। वे अनुभव और अभिव्यक्ति में अंतराल पैदा करते हुए,उनके बीच के अंतर को गौण बना देते हैं।
    बाबा की कविता की धुरी है ‘घृणा करो या प्यार करो’, वे इस नारे के आधार पर कविता लिखते हैं। वे समाजवाद से प्यार करते हैं या फिर घृणा करते हैं। वे लोकतंत्र से प्यार करते हैं या घृणा करते हैं। वे लोकतंत्र के विभिन्न रूपों के प्रति अपनी घृणा व्यक्त करते हैं जो उन्हें परेशान करते हैं।
     बाबा के काव्य संकलनों की प्रकृति देखें तो पाएंगे कि ज्यादातर कविताएं विभिन्न समयों पर लिखी गयी और प्रकशित हुई हैं। उन्होंने किसी विषय विशेष को ध्यान में रखकर संकलन नहीं लिखा था। बाद में उनकी बिखरी हुई कविताओं को एकत्रित करके संकलन बनाए गए हैं। ये संकलन एक तरह से भिन्न किस्म की ‘पुस्तक’ की परिभाषा के अंदर आते हैं। अगर गौर से देखें तो बाबा की कविताओं में एक खास किस्म का बिखरा-बिखरा भाव है, एक अराजकता मिलेगी। असल में उनके इस तरह के काव्य संकलन को ‘रेडीकल बुक’ की देलुत्ज-गुअतारी की ‘ ए थाउजेंडस प्लेटोज’ में वर्णित अवधारणा के दायरे में ऱख सकते हैं।
     इन संकलनों के निशाने पर कुछ खास किस्म के संकेत या साइन हैं। इन संकलनों में प्रकाशित कविताओं में ऐतिहासिक समय संदर्भ है लेकिन काव्य संकलन का कोई ऐतिहासिक समय संदर्भ नहीं है। इन कविताओं में एक कविता के बाद ‘और’फिर ‘और’ इसके बाद फिर ‘और’ की पद्धति से कविताएं संकलित की गई हैं। इस तरह की पुस्तक संरचना में यह सवाल अर्थहीन हो जाता है कि आप कहां से चले थे,कहां जाना है । मैं यहां कुछ संकलनों के सहारे इस ‘रेडीकल बुक’ की अवधारणा पर रोशनी डालना चाहता हूँ। मसलन ‘भूल जाओ पुराने सपने’(1994) को ही लें इसमें 51 कविताएं हैं और ये विभिन्न समय में देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपी हैं। 1979से 1993 के बीच में प्रकाशित कविताएं इसमें हैं। इसी तरह ‘सतरंगे पंखों वाली’ (1984) संकलन में 1956-58 के बीच लिखी कविताएं शामिल की गई हैं। यही हाल ‘रत्नगर्भ ’ (1984) संकलन का इसमें 8 लंबी कविताएँ हैं जो अलग-अलग पत्रिकाओं में विभिन्न समयों में छपी हैं। यही हाल अधिकांश काव्य संकलनों का है। हिन्दी में अभी तक इस सवाल पर सोचा ही नहीं गया कि किसी कवि का जो संकलन आ रहा है वह किस तरह की ‘किताब’ की अवधारणा में बंधकर आ रहा है। हिन्दी आलोचक के लिए सिर्फ काव्य संकलन आ गया यही काफी है। यहां तक कि बाबा के नाम पर हिन्दी में जो विशेषज्ञ आलोचक हैं वे भी अभी तक समझ नहीं पाए हैं कि बाबा के ‘किताब’ के फॉर्म की व्याख्या कैसे करें। बाबा के काव्य संकलन को आप कहीं से भी और किसी भी कविता से आरंभ कर सकते हैं। चाहें तो एक कविता पढ़ें या दो या तीन या पूरी किताब उलट-पलटकर पढ़ें,आपको किसी क्रम को मानने की जरूरत नहीं है। कहां से आरंभ कर रहे हैं,कहां बंद कर रहे हैं और कहां जा रहे हैं,ये सारे सवाल बाबा की कविता की किताब पढ़ते समय अप्रासंगिक हैं। इस तरह के संकलन में कहने के लिए प्रत्येक कविता स्वतंत्र है लेकिन मजेदार बात है कि एक कविता का पाठ दूसरी कविता के पाठ से जुड़ता प्रतीत होता है। यह भी कह सकते हैं कि बाबा के काव्य संकलन में एकाधिक स्तर पर कविताएं सक्रिय हैं। उनके एक नहीं बल्कि बहुस्तरीय अर्थ भी हैं। एक कविता दूसरी कविता के पूरक की भूमिका में नजर आती है। कविता के अर्थ की बहुस्तरीयता कविताओं को एक ही आयाम की ओर ले जाती प्रतीत होती है। वे अनेक कविताओं से आधुनिक कविता का नया फॉर्म इजाद करते हैं। कविता का नया फॉर्म है कविता की बहुस्तरीयता और एक दिशा।
    इन संकलनों में विषय के वैविध्य के अलावा एक चीज साझा है वह है राजनीतिक कविता। बाबा ने राजनीतिक कविता के फॉर्म को बनाने के लिए विभिन्न समयों में लिखी कविताओं को एक ही ढ़ांचे में बांधा है। कविताओं के लेखन का समय अलग-अलग है,प्रकाशन समय अलग है लेकिन दिशा एक है। इन संकलनों की विशेषता है कविता के अर्थ की बहुस्तरीयता। और एक दिशा है लोकतंत्र के परे चलो। कविता के प्रचलित ढ़ांचे के परे चलो।
    बाबा के लेखे लोकतंत्र में अराजकता है,कोई ऐसी चीज नहीं है जिस पर भरोसा किया जाए। यह ऐसा युग है जिसमें विषय और व्यक्ति के बीच में एकता स्थापित करना संभव नहीं है। स्वाभाविक यथार्थ और बौद्धिक यथार्थ के बीच में एकता स्थापित करना संभव नहीं है। यह ऐसा जगत है जो अपनी धुरी खो चुका है। बार-बार लोकतंत्र की कमजोरियों,अन्याय आदि का कविताओं में उदघाटन करते हुए बताते हैं की देश में लोकतंत्र नहीं है। लोकतंत्र अपनी धुरी से उतर चुका है। अतः कविता में समाज और व्यक्ति के बीच की एकता के चिर-परिचित दायरे से भी ऊपर लेजाने की जरूरत है। वे समाजवाद के भी परे कविता को ले जाते हैं। बाबा के लिए मौजूदा जगत अपनी धुरी खो चुका है। उनकी कविता इस धुरी से उतरे जगत के रूपायन पर केन्द्रित है। समाज में अराजकता है इसलिए काव्य संकलनों में भी बिखरापन है।
    बाबा की कविताओं को संकलन में पढ़ते हुए एक किस्म के सत्य के दर्शन नहीं होते बल्कि अनेक किस्म के सत्य के दर्शन होते हैं। सत्य की बहुस्तरीयता ही उनकी कविता की धुरी है। इसे आप किसी भी किस्म की आलोचना की भाषिक चालाकी से ढंक नहीं सकते।                       



शुक्रवार, 11 मार्च 2011

शमशेर जन्मशती समारोह - काल से होड़ लेता सृजन- दिनेश राय द्विवेदी

नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, अज्ञेय, फैज अहमद फैज और शमशेर बहादुर सिंह के शताब्दी वर्ष को एक साथ पा कर आश्चर्य होता है कि इतने सारे महत्वपूर्ण कवि-साहित्यकार एक साथ एक ही वर्ष में कैसे पैदा हो गए। वस्तुतः यह कोई संयोग नहीं था। अपितु इन सब के जन्म के बाद का वह काल और उस काल की भारत की परिस्थितियाँ थीं जिस ने इन सब को महत्वपूर्ण बनाया। निश्चित ही उनके महत्वपूर्ण होने में उन के स्वयं के परिश्रम के योगदान को कमतर नहीं कहा जा सकता। इन सब को, और इन के रचना कर्म को समझने के लिए हमें उन के काल को समझना होगा। यदि हम उस परिप्रेक्ष्य में इन्हें समझने का प्रयत्न करें तो चीजें जो जटिल अथवा संश्लिष्ट दिखाई पड़ती हैं वे यकायक स्पष्ट दिखाई देने लगती हैं जैसे हम उन्हें किसी सूक्ष्मदर्शी पर परख रहे हों। शमशेर बहादुर सिंह पर यह काम राजस्थान साहित्य अकादमी, ‘विकल्प’ और जन सांस्कृतिक मंच, कोटा के संयुक्त तत्वावधान में 12-13 फरवरी को कोटा में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘काल से होड़ लेता सृजन* में हुआ। 


उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार और दूरदर्शन जयपुर के पूर्व निदेशक नन्द भारद्वाज ने यह स्पष्ट किया कि शमशेर बहादुर सिंह को प्रेम और सौंदर्य का कवि भी कहा जाता है, लेकिन उन का प्रेम सारी मानवता और प्रकृति से, और उन का सौंदर्य प्रकृति और मानवीय गुणों का सौंदर्य था। उन्हें एक जटिल कवि माना जाता है, लेकिन उन की जटिलता वास्तव में संश्लिष्टता है जो उलझाती नहीं है अपितु जगत के जटिल व्यवहारों के संबंध में समझ पैदा करती है। वे काल से जिस होड़ की बात करते हैं वह उन की व्यक्तिगत नहीं है अपितु समस्त मनुष्य की होड़ है। उनका लेखन सूक्ष्म से सूक्ष्मतर व्याख्या चाहता है। उन के सभी समकालीन सभी श्रेष्ठ लेखकों ने उन के बारे में लिखा, उन की कविता और अन्य साहित्य के बारे में लिखा। लेकिन शमशेर का विस्तार इतना है कि अभी एक शताब्दी और उस के बाद भी उन के बारे में लिखा जाता रहेगा। इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रमुख साहित्यकार और ‘अलाव’ के संपादक रामकुमार कृषक ने कहा कि शमशेर अपने समकालीनों में सरोकार के स्तर पर सर्वोपरि दीख पड़ते हैं। उन की रचनाएँ स्वयं को और जन-मानस को अभिव्यक्त करने का माध्यम भर हैं। वे समाज में उपस्थित तमाम अमानवीय ताकतों के विरुद्ध, और सताए हुए लोगों के साथ हैं। वे नए समाज की रचना चाहते हैं। इस के लिए वे जो कहना चाहते हैं, उस के लिए हर विधा का उपयोग पूरी कलात्मक श्रेष्ठता के साथ करते हैं, इसीलिए उन के लेखन में एक जादूगरी दिखाई पड़ती है। वे कलावादी नहीं हैं। वे कला का उपयोग सामाजिक सरोकारों के लिए करते हैं। बदलाव की गहरी आकांक्षा और चेतना उनके साहित्य में पग-पग पर मौजूद है। वे हमें आसान राह नहीं दिखाते क्यों कि मुक्ति कभी आसान नहीं होती। यह रोशनी की साधना है। 

‘विकल्प’ जनसांस्कृतिक मंच के अखिल भारतीय महासचिव, कवि गीतकार और इस आयोजन के मुख्य सूत्रधार महेन्द्र ‘नेह’ ने सत्रारंभ में अतिथियों का स्वागत करते हुए ही स्पष्ट कर दिया था कि हम यहाँ दो दिन शमशेर के रचनाकर्म की गहराइयों में जाएंगे और जानेंगे कि वे कितने विलक्षण रचनाकार थे। उन्हें कलावादी और जनवादी दोनों अपना क्यों कहते हैं? हम पाएंगे कि वे जनता के कवि थे, उन की रचनाओं की मुख्य चिंता पीड़ित जन और उन की मुक्ति थी। विशिष्ट अतिथि कवि समीक्षक सुरेश ‘सलिल’ ने शमशेर के साहित्य और जीवन का परिचय दिया।इस सत्र का सफल संचालन कवि अम्बिकादत्त ने किया। उन्हों ने महेद्र ‘नेह’ की बात को और स्पष्ट कर दिया था कि शमशेर समय को समझने में हमारी मदद करते हैं, इन दो दिनों में हम शमशेर के माध्यम से अपने समय को समझने का प्रयत्न करेंगे। इस सत्र का आरंभ नंद भारद्वाज ने मशाल प्रज्ज्वलित कर किया था और उस के तुरंत बाद रविकुमार के शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं पर बनाए गए पोस्टरों की प्रदर्शनी का भी उद्घाटन किया। संगोष्ठी स्थल पर जाने के पहले इस प्रदर्शनी से हर किसी को गुजरना होता था। इस प्रदर्शनी ने तथा सत्रारंभ के पूर्व जमनाप्रसाद ठाड़ा राही के प्रसिद्ध गीत ‘जाग जाग री बस्ती’ की शरद तैलंग द्वारा संगीतमय प्रस्तुति ने संगोष्ठी के विमर्श को वातावरण प्रदान करने की महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। 

अपरान्ह सत्र का विषय ‘हिन्दी ग़ज़ल में शमशेरियत’ था। सत्र का मुख्य पत्रवाचन करते हुए रामकुमार कृषक ने कहा कि शमशेर की ग़ज़लों में भाषाई द्वैत नहीं है। वस्तुतः उन की ग़जलें हिन्दी में लिखी गई उर्दू ग़ज़लें हैं। वे उर्दू और हिन्दी के द्वैत को तोड़ कर हिन्दुस्तानी बोली और भारत की गंगा-जमुनी तहजीब तक जाती हैं। प्रयोगवादी और प्रगतिशील दोनों ही उन्हें अपना मानते हैं। यह सही है कि उन्हों ने अपनी रचनाओं में प्रयोग किए हैं, इतने, कि सभी प्रयोगवादी पीछे छूट जाते हैं। लेकिन शमशेर का आधार जनवाद है। वे जनता के दर्द को, उसकी वजहों को बखूबी बयाँ करते हैं। वे एंद्रीयबोध और वस्तुगत परिस्थितियों में एक संतुलन उत्पन्न करते हैं, वे कला पर विजय प्राप्त कर के खम ठोकते हुए अपनी बात कहते हैं, कला उन के कथ्य पर हावी नहीं होती, उन का कथ्य नए कला रूपों को उत्पन्न करता है। सत्र का दूसरे पत्र में हितेष व्यास ने प्रमाणित किया कि शमशेर के लिए हिन्दी और उर्दू दो भाषाएँ नहीं थीं अपितु एक जान दो शरीर थे। वे भाषा का प्रयोग पूरी कलात्मक सूक्ष्मता के साथ अपनी बात कहने के लिए करते थे।

इसी सत्र में शायर पुरुषोत्तम यक़ीन ने कहा कि शमशेर ने अपने समकालीनों पर खूब लिखा और समकालीनों ने उन पर, इस से उस समय के साहित्य और रचनाकारों को विकास का अवसर प्राप्त हुआ, हमें इस परंपरा का अनुसरण करना चाहिए। सलीम खाँ फरीद ने अपने पत्र में बताया कि शमशेर सूक्ष्म सौंदर्यबोध के कवि थे जो उन की ग़ज़लों में भी पूरी तरह स्पष्ट है। डॉ. हुसैनी बोहरा को अगले दिन शमशेर के गद्य पर पत्रवाचन करना था लेकिन अगले दिन उपलब्ध न होने के कारण उन्हों ने मुख्यतः उन के निबंध संग्रह ‘दोआब’ पर अपना पत्रवाचन करते हुए कहा कि उन की सम्वेदना मनुष्य के प्रति थी, वे हिन्दी और उर्दू के साहित्य का अलग अलग मूल्यांकन कर के देखने के विरोधी थे। उन का मानना था कि हिन्दी और उर्दू को अलग-अलग कर के देखना ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नीति थी। जब कि शमशेर के लिए दोनों भारत की जुबानें ऐसी जुबानें थीं जिन की आधारभूमि एक ही है। उन का कहना था कि आधुनिक हिन्दी साहित्य में शमशेर का गद्य सर्वश्रेष्ठ है, वे साहित्य को मानवता का औजार मानते थे।

सत्र की अध्यक्षता कर रहे डॉ. हरप्रकाश गौड़ ने कहा कि शमशेर के आजादी पूर्व के साहित्य की चिंता राष्ट्रीय आंदोलन था। उन के साहित्य को समझने के लिए राष्ट्रीय आंदोलन और उस की जटिलताओं को समझना होगा। वे आरंभ में रोमांस के कवि थे, रोमांस से आरंभ हो कर वे जनता के दुख-दर्द और उससे मुक्ति के साथ प्रतिबद्धता की ओर बढ़े। उन्हों ने जनता को बाँटने वाली कट्टरपंथी धार्मिकता के विरुद्ध और गरीब श्रमजीवी जनता के पक्ष में अपना रचनाकर्म किया। निराला ने ग़ज़ल को जनसंघर्ष से जोड़ा और शमशेर ने उस परंपरा को आगे बढ़ाया। सभी वक्ताओं और पत्रवाचकों में तारतम्य बनाये रखते हुए इस सत्र का सफल संचालन शायर शकूर ‘अनवर’ ने किया।


इसी दिन रात्रि को कविसम्मेलन-मुशायरा आयोजित किया गया, जिसमें हिन्दी, उर्दू और हाड़ौती कवियों के अतिरिक्त अतिथि कवियों ने कवितापाठ किया। अगले दिन 13 फरवरी का पहला सत्र ‘शमशेर की कविताओं में जनचेतना’ विषय पर था। जिस का आरंभ ओम नागर की कविता ‘काट बुर्जुआ भावों की बेड़ी’ से हुआ। इस सत्र में. बीना शर्मा ने कहा कि शमशेर को ऐंद्रिकता, दुर्बोधता और सौंदर्य का कवि कह कर पल्ला नहीं छुड़ा सकते। हम उनके समूचे काव्य कर्म का मूल्यांकन करें तो वहाँ पाएंगे कि जन की पीड़ा की अभिव्यक्ति उन के काव्य का केंद्र है। अतुल चतुर्वेदी ने कहा कि उन के लेखन का मानवीय पक्ष बहुत सशक्त है, वे रूस की समाजवादी क्रांति से प्रभावित हुए और अंत तक श्रमजीवी जनता के लिए लेखन करते रहे। जयपुर से आए प्रेमचंद गांधी ने कहा कि वे सचेत जनपक्षधरता के कवि ही नहीं थे अपितु जनसंघर्षों में जनता के साथ सक्रिय रूप से खड़े थे। उन के जन का अर्थ बहुत व्यापक है। उन के काव्य की अमूर्तता अनेक स्तरों पर बोलती है। जब उस के अर्थ खुलते हैं तो दो पंक्तियों में पूरी दुनिया दिखाई देने लगती है। उन की कविता का दर्शन पूरी दुनिया जन की मुक्ति का दर्शन है। इस सत्र का मुख्य वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए शैलेंद्र चौहान ने कहा कि शमशेर वामपंथी तो हैं, लेकिन वे वाम चेतना को पचा कर रचनाकर्म करते हैं। वे एक सम्पूर्ण कलाकार के रूप में सामने आते हैं जो अन्य ललितकलाओं के रूपों को कविता में ले आते हैं। इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे मनु शर्मा ने कहा कि शमशेर के साहित्य को समझने के लिए चित्रकला को समझना जरूरी है। उन का चित्रकला का अभ्यास उन की कविता में रूपायित हुआ है। इस सत्र का सफल संचालन डॉ. उषा झा ने किया। 

संगोष्ठी का चौथा सत्र ‘शमशेर : जीवन, कला और सौंदर्य’ विषय पर था। इस विषय को खोलते हुए कवि-व्यंग्यकार अतुल कनक ने कहा कि शमशेर की रूमानियत व्यक्तिगत नहीं अपितु सत्यम शिवम् सुंदरम है। डॉ. राजेश चौधरी ने कहा कि शमशेर ने अपनी हर रचना के साथ कला का नया प्रयोग किया, इसी से उन्हें दुर्बोध कहना उचित नहीं। साहित्यकार रौनक रशीद ने कहा कि शमशेर को दुरूह कहना उन के साथ अन्याय करना है वे ग़ज़ल जैसी परंपरागत विधा के साथ पूरा न्याय करते हैं और पूरी तरह सहज हो जाते हैं। वरिष्ठ ब्लागर दिनेशराय द्विवेदी ने उन की कविताएँ ‘काल से होड़’ और ‘प्रेम’ प्रस्तुत करते हुए कहा कि शमशेर का अभावों से परिपूर्ण जीवन अभावग्रस्त जनता के साथ उन का तादात्म्य स्थापित करता था। उन के साहित्य में जीवन साधनों से ले कर प्रेम और सौंदर्य के अभाव की तीव्रता पूरी संश्लिष्टता के साथ प्रकट होती है। इस सत्र के अध्यक्ष सुरेश सलिल ने पत्र वाचन करते हुए बताया कि शमशेर में मानवीय सौंदर्य से राजनैतिक दृष्टि का विकास दिखाई देता है, उन्हें समझने के लिए हम साहित्य के पुराने प्रतिमानों से काम नहीं चला सकते। हमें उन के लिए नए प्रतिमान खोजने होंगे। इस सत्र का संचालन अजमेर से आए कवि अनंत भटनागर ने किया।

संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि व केन्द्रीय साहित्य अकादमी के सदस्य अम्बिकादत्त ने कहा कि शमशेर बहादुर सिंह का साहित्य यह चुनौती प्रस्तुत करता है कि समीक्षा के औजारों में सुधार किया जाए और आवश्यकता होने पर नए औजार ईजाद किए जाने चाहिए। यही कारण है कि शमशेर के साहित्य को व्याख्यायित करने की आवश्यकता अभी तक बनी हुई है और आगे भी बनी रहेगी। समापन सत्र में ‘शमशेर का गद्य और विचार भूमि’ विषय पर डॉ.गीता सक्सेना, कवियित्री कृष्णा कुमारी, साहित्यकार भगवती प्रसाद गौतम तथा डॉ. विवेक शंकर ने पत्र वाचन किया तथा कथाकार विजय जोशी ने अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया। इस सत्र का संचालन करते हुए ^विकल्प* के अध्यक्ष महेन्द्र नेह ने कहा कि केवल शमशेर ही हैं जो यह बताते हैं कि किस तरह एक महत्वाकांक्षी लेखक अपनी परंपरा, विश्वसाहित्य का सघन अध्ययन करते हुए तथा जनता के साथ तादात्म्य स्थापित करते हुए साहित्यकार बन सकता है।

इस संगोष्ठी का आयोजन कोटा की प्राचीनतम संस्था भारतेंदु समिति के भवन में किया गया। संगोष्ठी पुराने नगर के मध्य में आयोजन का लाभ यह भी रहा कि आम-जन भी इस में उपस्थित होते रहे। वरिष्ठ नागरिक जवाहरलाल जैन ने सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि वे चाहते हैं कि कोटा में इस तरह के आयोजन होते रहें। देश के महत्वपूर्ण रचनाकार यहाँ आते रहें और उन के बीच नगर के रचनाकारों को सीखने और अपना विकास करने का वातावरण मिले और जनता भी उन से प्रेरणा प्राप्त करे। उन्होंने कहा कि इस वर्ष नागार्जुन की जन्म शताब्दी भी है और उन पर भी एक बड़ा आयोजन करना चाहिए।

संगोष्ठी के अंत में सब ने यह महसूस किया कि शमशेर बहादुर सिंह के रचनाकर्म को न केवल पढ़ना जरूरी है, अपितु उस का गहरा अध्ययन जनता के मनोभावों की अभिव्यक्ति के लिए नए कलारूपों का द्वार खोल सकता है।


सोमवार, 7 मार्च 2011

फेसबुक पर सर्वहारा कवि शील की कविता और सभ्यता


           शील जी हिन्दी की प्रगतिशील काव्यधारा के अग्रणी कतार के लेखक हैं। उनके कर्म,विचार,सृजन और आंदोलन में फांक नहीं है। ऐसा एकीकृत समग्र व्यक्तित्व हिन्दी में विरल घटना है। हिन्दी के अनेक प्रगतिशील लेखकों जैसे नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल,शमशेर ,त्रिलोचन आदि में आजादी के बाद के दौर में अनेक किस्म के विचलन देखे गए। कर्म,विचार और सृजन में फांक भी देखी गयी,लेकिन शील जी इस व्याधि से मुक्त अविचलभाव से मार्क्सवाद,कम्युनिस्ट आंदोलन,प्रगतिशील-जनवादी साहित्य की एकनिष्ठ भाव से सेवा करते रहते रहे।
    शील जी का व्यक्तित्व सामाजिक आग्रहों और गरीबों की मुक्ति के संकल्पों से बना था। उनके व्यक्तित्व की अनेक खूबियों को मुझे करीब से देखने का भी सौभाग्य मिला था। शील जी ने मजदूरों-किसानों और प्रतिशील साहित्य के प्रति कमिटमेंट को कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने संकलन ' लावा और फूल' (1967) के समर्पण में लिखा है, "देश की  उन असंख्य बलिदानी माताओं की तरह,माँ तूने भी अपने लाल को देश की स्वतंत्रता के लिए न्यौछाबर कर दिया था। 1930 में में गान्धी बाबा की पुकार पर में जेल गया ।यह अंग्रेज परस्त जमींदार को अच्छा न लगा। लेकिन मां ! तुझे पुत्र विछोह की असीम पीड़ा के साथ गर्व भी था कि तेरा लाल देश की स्वतंत्रता के लिए जेल गया है। यह बात भी,अंगरेज परस्त जमींदार को अच्छी न लगी। मेरे छूटने के चौबीस घंटे पूर्व उसने यह अफ़वाह फैलाकर ( कि तेरा लाल,मन्नू जेल के दंगे में गोली से मार दिया गया) तेरे प्राण ले लिए। मां,तेरी पीड़ा,जमींदार का जुल्म,और मेरी ममता-सब कुछ मेरे देखते-देखते उनकी आँखों से वह निकली। और वे भी तेरी ही तरह सदा के लिए मुझसे दूर हो गए।माँ बता कि तेरे और पिता जी के सिवा अपना यह कृतित्व,किसे समर्पित करूं,यह तो तुम दोनों की आहुति का ही परिणाम है। और तुम्हें ही समर्पित है।"
    शीलजी का अपनी माँ की कुर्बानियों और पीड़ाओं को काव्य संकलन के समर्पण वक्तव्य में इस तरह याद करना अपने आपमें विरल बात है। हिन्दी के लेखकों को माँ की पीड़ा और कुर्बानियों का ध्यान कम आता है,सार्वजनिक तौर पर उसका उल्लेख वे कभी नहीं करते। इस नजरिए से देखें तो 1967 में यह बात जो शीलजी ने लिखी,नयी बात थी और इससे कविमन की पीड़ा,मानवीयता,रिश्तों के प्रति कृतज्ञता,वफादारी आदि का बोध भी व्यक्त होता है।
    हिन्दी की अकादमिक समीक्षा की आयरनी है कि वह जीवन के ज्वलंत सवालों से कन्नी काटती रही है। यह बात शीलजी की उपेक्षा के संदर्भ में भी कही जा सकती है। लेखक के लिए किस तरह की पीड़ा रही है,इसका अंदाजा आज के मीडिया युग में लगाना संभव नहीं है।  अपने काव्य संकलन ' लावा और फूल' के प्रकाशन के लिए लेखक को मुहिम चलानी पड़ा,कोई छापने के लिए तैयार नहीं था।
     उल्लेखनीय है शील जी के प्रथम काव्यसंकलन 'अंगडाई' (1944)के साथ एक प्रकाशक ने बड़ी बुरी की, उसने उस संकलन के कवर पर एक नंगी औरत का फोटो छाप दिया था। इससे भी बुरी बात यह हुई कि इस संकलन को किसी भी प्रगतिशील समीक्षक ने नोटिस ही नहीं लिया। वे उन दिनों पंत की ग्राम्या और अंचल की लाल चूनर को लेकर व्यस्त थे।
   'लावा और फूल'  की भूमिका में शील जी ने एक बड़ी महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान खींचा है। लिखा है, " अखबारों का प्रभाव एक अध्ययनशील विद्यार्थी को प्रभावित कर सकता है,उकसा सकता है किन्तु उसमें कर्म का उपक्रम पैदा नहीं कर सकता। उसकी सबसे बड़ी योग्यता ,उसकी अनुभूति की अपरोक्षता और तीव्रता में होती है।जो केवल पुस्तकीज्ञान से नहीं पैदा हो सकती। रोटी और प्रेम के राग बिना साक्षात के नहीं गाए जाते। जिन्होंने जीविकोपार्जन की मुसीबतों,अपमानों का अनुभव नहीं किया,भोक्तावर्ग में बने रहकर दूर-दूर से अवलोकन मात्र किया है। वे शोषितमात्र पर दया ही कर सकते हैं:-उसकी आवाज में बोल नहीं सकते।"
    शील जी ने सवाल किया है कि "नयी कविता में नए यथार्थ की स्वीकृति है,पर यह नया यथार्थ किस सभ्यता का यथार्थ है ? नयी कविता का कवि किस सभ्यता की सेवा कर रहा है ? नए कवि की नई कविता में किस सभ्यता के चरण पड़ रहे हैं ? क्योंकि सभ्यता,मनुष्य के समाज के सदस्य होने के ज्ञान को कर्म में परणित करती है। सभ्यता परिष्कृत सामाजिक चेतना के लिए उन्मेषपूर्ण अवस्थाएं जन्मती है। वह सभ्यता अधिक समय तक नहीं बदलती जो बदली हुई दुनिया के लिए कोई नयी वस्तु देने में असमर्थ होती है।''
         शील जी ने यह भी लिखा '' पूँजीवादी सभ्यता की प्रजननशक्ति समाप्त हो चुकी है। पूँजीवादी सभ्यता पितृसत्तात्मक सभ्यता है। पूँजीवादी सभ्यता में श्रम और नारी ,दोनों ही अनुपस्थित होकर ईश्वर के अधीन रखे जाते हैं। हमारे देश में तो पितृसत्ता के अभिशापस्वरूप ,कन्या-दान कर दी जाती है। मार्क्सवादी दृष्टिकोण की सभ्यता, श्रम और नारी के मुक्ति की सभ्यता -समाजवादी सभ्यता है,यह न मातृ सत्तात्मक है,पितृसत्तात्मक।"
यहां शील जी की वे काव्यपंक्तियां प्रस्तुत हैं जो मैंने अपने फेसबुक वॉल पर दी हैं। इन काव्यअंशों में जीवन के यथार्थ को कवि ने समाजवादी नजरिए से रूपायित किया है।   
 शील जी ने 1964 में लिखा था- "समाजवाद की घोषणा और मेरा गाँव ! मुझे हंसी आती है/मैं अनुभव करता हूँ/मेरे देश का कांग्रेसी लोकतंत्र /मेरे गांव की तरह अनाथ है/"

शील की एक कविता है 'तुम्हारा न्याय' उसका अंश देखें- "तुम्हारा न्याय/बेलगाम तंग कसे घोड़े की तरह/ दुलत्ती झा़ड़ रहा है/तुम्हारे सभासदःअपराधों की अपच से मोटे हो गए हैं/ भेडिए बतखों के साथ बलात्कार करते हैं /सामाजिक प्रश्नों के हल तुम्हें विघटन में दिखाई देते हैं/ गॉव केचुए काटते रहे/गलियाँ प्रस्तावों की सुगंध लेती रहें/भूमि प्रबन्धक समिति अंगूठों की स्याही देखते रहे/और उत्पीड़न की देह-तुम्हें फूल फल देती रहे।"

भ्रष्टाचार के खिलाफ 30अगस्त 1965 को शील जी ने एक कविता लिखी थी जो आज भी प्रासंगिक है,लिखा- "मर्ज़ लाइलाज है/दाँत न दिखाओ/सोख्ते की मलाई खाओ ! सन्तति निग्रह रस की मालिश करो !बहादुर बनो !कोई क्या कर सकता है !भ्रष्टाचार जिंदाबाद !सोख्ते की सरकार जिंदाबाद।"

शील की कविता एकजमाने में इप्टा की शान थी और उनकी लिखी रचनाएं मुम्बई के पृथ्वी थियेटर में गूंजती थीं। लिखा- "आंधियां उठ रहीं भूख की आग की/फिर क़हर के फरिश्तों में है गूफ्तगू/ काम देगी न फसलों की जल्वागिरी/हम ख़यालो मनोरथ के हांक दो ! बदचलन मुंसिफ़ों के उठादो चलन !हाँकदो- हाँकदो चौमुखी हाँक दो !"

शील जी ने लिखा- "हमें मिटाने की हलचल है/मन्दिर-मसजिद के भीतर/नागपाश लेकर बैठे हैं/युग के जड़ शोषक ईश्वर/"

शील जी नागार्जुन-केदारनाथ अग्रवाल-त्रिलोचन के समकालीन थे,लिखा- "ये शब्दों के बीज/तुम्हारी गर्भवती आस्था की तह में/फूट पड़ेंगे/अंकुर देंगे/आलोडित होने दो अपने मन की पीड़ा/और सपचने दो जठरानल/संयम के संराधक तुम ! /शिव की साध पचाकर देखो ! / ये शब्दों के बीज तुम्हारे पुत्र बनेंगे/"


शील जी ने लिखा- साथियो ! "अंधराष्ट्रवाद /पूंजीपतियों का रिसाला है/ जो खोखली राष्ट्रीयताओं के लिए/कुर्बानियों की चादर ओढ़े/पिला रहा है तुम्हें अफ़यून के घूंट/"

प्रगतिशील कवि शील ने लिखा- "साथियो ईश्वर और नफ़रत,इन्हीं पूजीपतियों की विरासत है,साथियो पूंजीपतियों का उसूल,घृणा का गुब्बारा है,जो मशीन पै ढलता है।"
प्रगतिशील कवि शील ने लिखा- "साथियो होश में हो ! वक्त आराम का नहीं,कलम की नोंक से अवाम के फफोलों को कुरेदो ?लहू गर्म करो ?दिलों के दर्द में सियासत की हरारत भर दो ?अदब को सरमाया की गर्दिश से निकालो? "

एक कविता अंश देखें - "कागज के पुल से-फार्मूला लादे/योजनाओं के गधे जा रहे हैं/ आप मुस्करा रहे हैं/जैसे आप,नसबंदी से बच जाएंगे/और आपकी पत्नी लूप लगाने से/"

रविवार, 17 अक्टूबर 2010

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ जन्मशती- भारतीय उपमहाद्वीप का सर्वहारा का महाकवि

 (फ़ैज़ साहब अपनी बेटी के साथ बीबीसी लंदन रेडियो के एक कार्यक्रम में)        
        आज भारत में अनेक हिन्दी-उर्दू कवियों और लेखकों ने भारत में सत्ता और संस्कृति उद्योग के सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया है। इन लोगों ने मजदूरों के पक्ष में बोलना बरसों से बंद कर दिया है। देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों की मलाई खाने और प्रतिष्ठानी कर्मकांड का अपने को हिस्सा बना लिया है। खासकर उर्दू कविता का तो और भी बुरा हाल है। उसमें मजदूरों-किसानों की हिमायत करके रहना तो एकदम असंभव हो गया है। उर्दू के अधिकांश कवियों-साहित्यकारों ने मजलूमों के हकों के लिए जमीनी जंग की बजाय संस्कृति उद्योग में पैर जमाने की जंग में सारी शक्ति लगा दी है।  कुछ ने आधुनिकतावादी चोगा पहन लिया है। कुछ अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने पूरी तरह समर्पण कर चुके हैं। कुछ ने कलम को अमेरिकी नजरिए का गुलाम बना दिया है और अमेरिकीदृष्टि से राजनीतिक और सांस्कृतिक मसलों को देख रहे हैं। ऐसे में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का शताब्दी समारोह मनाना अपने आप में महत्वपूर्ण है। हिन्दी में भी इसकी शुरूआत हो चुकी है। हिन्दी के जो प्रगतिशील आलोचक-लेखक-कवि फ़ैज़ पर सबसे ज्यादा समारोहों में नजर आ रहे हैं उनके हाथों में प्रतिवाद की कलम नहीं है। वे आजाद भारत में सत्ता के साथी हो गए हैं। खासकर आपातकाल में उनके हाथ जनतंत्र के खून से सने हैं। वे आज भी मनमोहन सिंह के फरमानों पर उठते और बैठते हैं।
       ऐसे भी आलोचक-लेखक हैं जो अमेरिका और उसके सांस्कृतिक संस्थानों को भारत भवन के जरिए में कला-संस्कृति के क्षेत्र में लेकर आए और उनके लिए कईदशकों से काम कर रहे हैं। ये ही लोग वर्धा में आयोजित फ़ैज़ के जलसे में भी नज़र आए हैं।
    हमें थोड़ा ईमानदारी के साथ एक बार हिन्दी-उर्दू के साहित्यकारों और लेखकों के सत्तापंथी साहित्यिक कर्मकांड के बाहर जाकर फ़ैज़ की जिन्दगी के तजुर्बों की रोशनी में ,उन मानकों की रोशनी में हिन्दी-उर्दू की प्रगतिशील साहित्य परंपरा और लेखकीय कर्म पर आलोचनात्मक नजरिए से विचार करना चाहिए।
    सवाल उठता है कि आखिरकार ऐसा क्या हुआ जिसके कारण फ़ैज़ ने सारी जिन्दगी सत्ता के जुल्मो-सितम के सामने समर्पण नहीं किया लेकिन उर्दू-हिन्दी के अनेक बड़े कवियों और लेखकों ने समर्पण कर दिया। वह कौन सी चीज है जो फ़ैज़ को महान बनाती है ? क्या कविता कवि को महान बनाती है ? क्या पुरस्कार महान बनाते हैं ? क्या सरकारी ओहदे महान बनाते हैं ? क्या कवि को राजनेताओं और पेजथ्री संस्कृति का संसर्ग महान बनाता है ? क्या लेखक को मीडिया महान बनाता है ?
    इनमें से कोई भी चीज कवि या लेखक को महान नहीं बनाती। कवि के व्यापक सामाजिक सरोकार, उन्हें पाने के लिए उसकी कुर्बानियां और सही नजरिया उसे महान बनाता है।
      कवि महान है या साधारण है यह इस बात से तय होगा कि उसकी कविता और जीवन का कितना बड़ा लक्ष्य है ?क्या बड़े सामाजिक लक्ष्य को पाने के लिए व्यापक दृष्टि भी है ? उस लक्ष्य को पाने के लिए वह किस हद तक कुर्बानी देना चाहता है ?
     दुख की बात यह है कि हिन्दी-उर्दू में कवि तो हैं लेकिन कुर्बानी देने वाले कवि कम हैं। कवि तो हैं ,दुख उठाने वाले कवि भी हैं लेकिन अविचलित भाव से सही नजरिए से लिखने और जो लिखा है उसके लिए अनवरत जमीनी संघर्ष करने वाले कवियों का हमारे पास अभाव है। फ़ैज़ इस अर्थ में विरल कवि हैं कि उन्होंने अविचल भाव से बगैर किसी वैचारिक और कलात्मक विचलन के सर्वहारा के नजरिया का कविता और जीवन में अक्षरशःपालन किया।
     पाकिस्तान की सत्ता में कोई आए या जाए फ़ैज़ ने अपना नजरिया और संघर्ष का रास्ता नहीं बदला। हिन्दी-उर्दू में विचलित कवियों की लंबी फेहरिश्त है, जिनका नजरिया नेता,नीति और आंदोलन के साथ बदलता रहा है।
   बिकना और जी-हुजूरी फ़ैज़ की जिन्दगी में नहीं है। भारत-विभाजन,भारत-पाक युद्ध जैसी बड़ी घटनाएं भी उन्हें सही विचारधारात्मक रास्ते से नहीं भटका सकीं। वे कभी राष्ट्रवाद के जुनून में नहीं फंसे। जबकि हिन्दी-उर्दू के अनेक बड़े कवियों में यह विचलन सहज ही भारत -विभाजन,भारत-चीन युद्ध,भारत-पाक युद्ध के समय देखा गया है। इसलिए फ़ैज़ ने लिखा-
‘‘नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही

न तन मे खून फराहम न अश्क आंखों में
नमाज़े-शौक़ तो वाज़िब है, बे-वज़ू ही सही

यही बहुत है के सालिम है दिल का पैराहन
ये चाक-चाक गरेबान बेरफू ही सही

किसी तरह तो जमे बज़्म, मैकदेवालों
नहीं जो बादा-ओ-सागर तो हा-ओ-हू ही सही

गर इन्तज़ार कठिन है तो जब तलक ऐ दिल
किसी के वाद-ए-फर्दा से गुफ्तगू ही सही

दयारे-गैर में महरम अगर नहीं कोई
तो फ़ैज़ ज़िक्रे-वतन अपने रू-ब-रू ही सही।’’
   कवि तो बहुत हुए हैं। फ़ैज़ से भी बड़े कवि हुए हैं। ऐसे भी कवि हुए हैं जो उनसे बेहतर कविता लिखते थे। ऐसे भी कवि हुए हैं जिनके पास सम्मान-प्रतिष्ठा आदि किसी चीज की कमी नहीं थी। लेकिन यह सच है कि बीसवीं सदी में फ़ैज़ जैसा कवि भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं हुआ। मजदूरों-किसानों के हकों के लिए जमीनी जंग लड़ने वाला ऐसा महान कवि नहीं हुआ।  
                            (स्व.फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)
   फ़ैज़ की कविता में जिन्दगी का यथार्थ ही व्यक्त नहीं हुआ है बल्कि उन्होंने अपने कर्म और कुर्बानी से पहले अविभाजित भारत और बाद में पाकिस्तान में एक आदर्श मिसाल कायम की है। सर्वहारा के लिए सोचना,उसके लिए जीना और उसके लिए किसी भी कुर्बानी के लिए तैयार रहना यही सबसे बड़ी विशेषता थी जिसके कारण फ़ैज़ सिर्फ फ़ैज़ थे। मजदूरों की जीवनदशा पर उनसे बेहतर पंक्तियां और कोई लिख ही नहीं पाया । उन्होंने लिखा-
‘‘जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है.’’
मजदूरों के अधिकारों का हनन,उनका उत्पीड़न और उन पर बढ़ रहे जुल्म ही थे जिनके कारण उनकी कविता महान कविता में तब्दील हो गयी। मजदूर की पीड़ा उन्हें बार-बार आंदोलित करती थी,बेचैन करती। मजदूरों के हकों का इतना बड़ा कवि भारतीय उपमहाद्वीप में दूसरा नहीं हुआ।फ़ैज़ ने लिखा-
‘‘गुलों में रंग भरे आज नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले
 कफस उदास है यारों सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-खुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले
 कभी तो सुबह तेरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुशकबार चले
 बडा़ है दर्द का रिश्ता ये दिल गरीब सही
तुम्हारे नाम पे आएंगे गमगुसार चले
 जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब-ए-हिजरां
हमारे अशक तेरी आकबत संवार चले
 मकाम 'फैज़' कोई राह में जँचा ही नहीं
जो कुए यार से निकले तो सुए दार चले।’’
     फ़ैज़ की कविता में जाति,धर्म,साम्प्रदायिकता,राष्ट्र,राष्ट्रवाद आदि का अतिक्रमण दिखाई देता है । उन्होंने सचेत रूप में समूची मानवता और मानव जाति के सबसे ज्यादा वंचित वर्गों पर हो रहे जुल्मों के प्रतिवाद में अपना सारा जीवन लगा दिया। फ़ैज़ ने लिखा -  
‘‘चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पर मजबूर हैं हम
इक ज़रा और सितम सह लें तड़प लें रो लें
अपने अज़दाद की मीरास है माज़ूर हैं हम
 जिस्म पर क़ैद है जज़्बात पे ज़ंजीरे है
फ़िक्र महबूस है गुफ़्तार पे ताज़ीरें हैं
और अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिये जाते हैं
ज़िन्दगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है
जिस में हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं
 लेकिन अब ज़ुल्म की मियाद के दिन थोड़े हैं
इक ज़रा सब्र कि फ़रियाद के थोड़े हैं
 अर्सा-ए-दहर की झुलसी हुई वीरानी में
हम को रहना है पर यूं ही तो नहीं रहना है
अजनबी हाथों का बेनाम गरांबार सितम
आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है
 ये तेरी हुस्न से लिपटी हुई आलाम की गर्द
अपनी दो रोज़ा जवानी की शिकस्तों का शुमार
चाँदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द
दिल की बेसूद तड़प जिस्म की मायूस पुकार
 चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़।’’
     फ़ैज़ मात्र उर्दू कवि नहीं थे। बल्कि मजदूरवर्ग के भारतीय उपमहाद्वीप के महाकवि थे। वे सारी जिंदगी सर्वहारावर्ग के बने रहे। वे अविभाजित भारत और बाद में पाकिस्तान सर्वहारा की जंग के महायोद्धा बने रहे। फ़ैज़ उन बड़े कवियों में हैं जिनकी चेतना ने राष्ट्र और राष्ट्रवाद का सही अर्थों में अतिक्रमण किया था और समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के मजदूरों-किसानों और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कविता लिखने से लेकर जमीनी स्तर तक की वास्तव लड़ाईयों का नेतृत्व किया था। सर्वहारा उनकी पहली मुहब्बत थी और वे सारी जिंदगी इस फिदा रहे। उन्होंने लिखा-   
‘‘मैं ने समझा था कि तू है तो दरख्शां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूं हो जाये
यूं न था मैंने फ़क़त चाहा था यूं हो जाये
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग
अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-किमखाब में बुनवाये हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए ख़ून में नहलाये हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मग़र क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग।’’
    महाकवि  फ़ैज़ का सियालकोट (पंजाब,पाकिस्तान) में 13 फरवरी 1911 को जन्म हुआ था। फ़ैज़ ने उर्दू कविता को नई बुलंदियों तक पहुँचाया। फ़ैज़ की खूबी थी कि वे एक ही साथ इस्लाम और मार्क्सवाद के धुरंधर विद्वान थे। उनके घर वालों ने बचपन में उनको कुरान की शिक्षा दी। उर्दू-फारसी-अरबी की प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने अंग्रेजी और अरबी में एम.ए. किया था लेकिन वे कविताएं उर्दू में करते थे। फ़ैज़ ने 1942 से 1947 तक सेना में काम किया।बाद में लियाकत अली खाँ की सरकार के तख्ता पलट करने की साजिश के जुर्म में उन्हें 1951-1955 तक जेल में बंद रखा।
     उनका पहला काव्य संकलन ‘नक़्शे-फ़रियादी’ था।  इसमें 1928-29 से लेकर1934-35 तक की कविताएं शामिल हैं। इस संकलन की कविताओं की पृष्ठभूमि थोड़ा अलग रही है। इस पर फ़ैज़ ने लिखा है- ‘‘ सन् 1920से 1930 तक का जमाना हमारे यहाँ मआ’शी ( आर्थिक) और समाजी तौर से कुछ अजब तरह की बे-फ्रिक्री,आसूदगी और वलवल; अंग्रेजी का जमाना था, जिसमें अहम कौमी और सियासी तहरीकों के साथ-साथ नस्र-ओ-नज़्म में बेशतर संजीदःफ़िक्र -ओ -मुसाहिदे (चिन्तन और अध्ययन) के बजाय कुछ रंगरेलियाँ मनाने का सा अंदाज़ था। शे’र में अव्वलन हसरत मोहानी और उनके बाद जोश,ह़फीज़ जालंधरी और अख्तर शीरानी की रियासत कायम थी।अफसाने में वलदरम और तनक़ीद में हुस्न-बराए-हुस्न और अदब-बराए-अदब का चर्चा था।’’
   इस संकलन में प्रेम की कविताएं भी शामिल हैं। इस संकलन की उनकी अनेक कविताएं हैं जो मुझे बेहद अच्छी लगती हैं। जो सबसे अच्छी लगती है वह है ‘‘ मिरी जाँ अब भी अपना हुस्न वापस फेर दे मुझको।’’  उसका एक अंश पढ़ें-
          ‘‘ मिरी जाँ अब भी अपनाहुस्न वापस फेर दे मुझको
               अभी तक दिल में तेरे इश्क की कंदील रेशन है
               तिरे जल्बों से बज़्मे-ज़िंदगी जन्नत-व-दामन है।
        मिरी रूह अब भी तनहाई में तुझको याद करती है
         हर इक तारे-नफ़स में आरजू बेदार है अब भी
          हर इक बे-रंग साअ’त मुंतज़िर है तेरी आमद की
        निगाहें बिछ रही हैं रास्ता ज़रकार है अब भी
        मगर जाने हज़ी सदमे सहेगी आखिरश कब तक?
        तिरी बे -मेह्रियों पे जान देगी आखिरश कब तक ?’’
   भारत-विभाजन के बाद फ़ैज़ की काव्यात्मक अनुभूतियों ने नई ऊँचाईयों का स्पर्श किया और बदले माहौल पर लिखा-
‘‘ ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर
वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं
ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू लेकर
चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्त में तरों की आख़री मंज़िल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज् का साहिल
कहीं तो जा के रुकेगा सफ़िना-ए-ग़म-ए-दिल
जवाँ लहू की पुर-असरार शाहराहों से
चले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़े
दयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों से
पुकरती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे
बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगन
बहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामन
सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी दबी थी थकन
सुना है हो भी चुका है फ़िरक़-ए-ज़ुल्मत-ए-नूर
सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम
बदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूर
निशात-ए-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाब-ए-हिज्र-ए-हराम
जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन
किसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहीं
कहाँ से आई निगार-ए-सबा, किधर को गई
अभी चिराग़-ए-सर-ए-रह को कुछ ख़बर ही नहीं
अभी गरानि-ए-शब में कमी नहीं आई
नजात-ए-दीद-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई
चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई ।’’

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