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सोमवार, 8 अगस्त 2016

शिक्षा और अंधविश्वास

       हमारे नेता आए दिन कहते हैं देश का विकास करना है तो देश को शिक्षित करना होगा।हमारा मन इस बात को ग्रहण करने में हिचकता है। शिक्षितों में बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की है जो अंधविश्वास में आकंठ डूबे हुए हैं,स्वतंत्र बुद्धि और विज्ञान से जिनको नफरत है।शिक्षा से यदि इस तरह के मनुष्यों का निर्माण होता है तो भगवान बचाए ऐसी शिक्षा और शिक्षितों से।देश के विकास का यह सबसे घटिया समाधान है इसे हम मानने को तैयार नहीं हैं। यह विकास के नाम पर अंधकार जगत में ले जाने की कोशिश है।

हमारे समाज के अधिसंख्य लोगों ने प्रचलित विश्वासों और चिरागत प्रथाओं के सामने पूरी तरह आत्म- समर्पण कर दिया है।इन दिनों शिक्षित और अशिक्षित के बीच में प्रचलित अंधविश्वास में कितना अंतर रह गया है,इस पर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा, " हममें और अशिक्षित लोगों में केवल इतना ही प्रभेद रह जाता है कि वे अपने अन्धविश्वास के कारण बेखटके सोए रहते हैं,और हम आत्म-विस्मृत होकर अफ़ीम की नींद में पड़े रहते हैं,हम कुतर्क द्वारा अपनी लज्जा बचाना चाहते हैं,जो काम जड़ता या कायरता के कारण करते हैं उसके लिए सुनिपुण या अनिपुण व्याख्या तैयार करते हैं और यह दिखाते हैं कि वह काम वास्तव में गर्व का विषय है।लेकिन वकालत के जोर से दुर्गति को छिपाया नहीं जा सकता।"

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा जिस देश के लोग शीतला-माता को चेचक का कारण समझकर निष्क्रिय बैठे रहते हैं,उस देश में शीतला देवी का आसन भी जम जाता है और चेचक जाने का नाम नहीं लेती।वहाँ शीतला माता मानसिक परवशता का प्रतीक है,बुद्धि के स्वातन्त्र्य-नाश का कुत्सित लक्षण है।



रविवार, 7 अगस्त 2016

दूसरी परम्परा , सत्ता और रवीन्द्रनाथ

       इन दिनों अचानक सत्ता के साथ लेखक के संबंध के सवाल को नामवरजी के जन्मदिन के बहाने हमारे अनेक लेखक मित्रों ने सत्ता को रसीले,लुभावने ढ़ंग से परिभाषित करना आरंभ कर दिया है,इसके लिए वे कुतर्क तक गढ़ रहे हैं।लेखक और सत्ता के संबंध का सवाल प्रमुख सवालों में से एक है,यह आश्चर्य की बात है कि ´दूसरी परम्परा की खोज´करते समय इस सवाल पर लोगों ने कभी विचार नहीं किया।जबकि दूसरी परम्परा ने सर्जक रवीन्द्रनाथ ने इस सवाल को अपने तरीके से हल करने की कोशिश की है और उससे बहुत कुछ सीख सकते हैं।

लॉर्ड कर्जन के आदेश से जब दिल्ली-दरबार का आयोजन किया गया तो रवीन्द्रनाथ ने उसका तीव्र विरोध किया था।इसके कारण उनको सरकार का क्रोध सहना पड़ा।उस समय उन्होंने जो बातें कही थीं उनको आज फिर से स्मरण करने की जरूरत है। रवीन्द्र नाथ ने लिखा ´दरबार एक प्राच्य वस्तु है।जब पाश्चात्य अधिकारी उसका उपयोग करते हैं तो उसका खोखलापन ही सामने आता है;उसकी पूर्णता नहीं।इस प्राच्य समारम्भ में ´प्राच्यता´ कहां है ॽ प्राच्यता इसमें है कि दो पक्षों के बीच आत्मिक सम्बन्ध स्वीकार किया गया है।तलवार के जोर से जो सम्बन्ध जुड़ता है वह तो विरोध का सम्बन्ध होता है। लेकिन सौजन्य द्वारा प्रस्थापित सम्बन्ध दोनों पक्षों को निकट लाता है।दरबार में सम्राट को अपना औदार्य व्यक्त करने का अवसर मिलता था।उस दिन सम्राट के महल का द्वार खुला रहता था और उसके दान की कोई सीमा न होती थी।पाश्चात्य नकली दरबार में कृपणता है,वहाँ जन-साधारण का स्थान बहुत ही संकीर्ण है।पहरेदारों के हथियार ´राजपुरूषों´ की संशय-वृत्ति जताते हैं और दरबार में जो व्यय होता है उसका भार अतिथियों को ही वहन करना पड़ता है। नतमस्तक होकर राजा का प्रताप स्वीकार करना-यही है इस दरबार का एक-मात्र तात्पर्य।इस उत्सव-समारोह में दोनों पक्षों के सम्बन्धों में जो अपमान-भावना निहित है वही व्यक्त होती है,और तड़क-भड़क से व्यक्त होती है।ऐसे कृत्रिम,हृदयहीन आडम्बर से प्राच्य हृदय को आक्रान्त किया जा सकता है इस विचार से ही धृष्टता टपकती है और शासकों की प्रजा के प्रति अपमानजनक भावना स्पष्ट होती है।भारत में अँग्रेजों का प्रभुत्व प्रत्येक स्थान पर व्याप्त है-विधान में,सभागृह में,शासनप्रणाली में।लेकिन इस प्रभुत्व को उत्सव का रूप देकर उसे और भी तीव्र बनाने का आखिर क्या प्रयोजन है ॽ ´

रवीन्द्र नाथ ने आगे लिखा ´इस तरह के कृत्रिम उत्सव से घोषित होता है कि भारतवर्ष में अँग्रेज़ मजबूती से जम गए हैं; लेकिन उनके साथ हमारा सम्बन्ध यान्त्रिक है,मानवीय नहीं।इस देश के साथ उनका नाता लाभ का है,व्यवहार का है,हृदय का नाता नहीं है।कर्तव्य के जाल से देश आवृत्त है।इस कर्तव्य की निपुणता और उपयोगिता स्वीकार की जा सकती है।फिर भी हमारी मानवीय प्रकृति तो स्वभावतःइस प्राणहीन शासन-तन्त्र से पीड़ित होती है।´

उन्होंने आगे जो कहा वह बहुत ही महत्वपूर्ण है, लिखा ´भारतवासी यदि आजीवन एक प्रबल शक्तिशाली यन्त्र का हाथ पकड़कर चलने के अभ्यस्त हो जायं तो इससे बढ़कर देश की दूसरी दुर्गति नहीं,चाहे उससे कितनी ही सुविधा क्यों न प्राप्त हो।´





विज़नरी लेखक थे रवीन्द्रनाथ टैगोर

         सात अगस्त रवीन्द्रनाथ टैगोर की पुण्यतिथि है।टैगोर का कवि के रूप में जितना बड़ा योगदान है उतना ही आलोचना के क्षेत्र में भी योगदान है।आमतौर पर उनके कवि रूप को हम ज्यादा याद करते हैं।रवीन्द्र संगीत को याद करते हैं,लेकिन इन दिनों परम्परा,इतिहास,धर्मनिरपेक्षता आदि पर हमले हो रहे हैं तो उनके विचार हम सबके लिए रोशनी का काम कर सकते हैं।हम देखें कि उनके विचार क्या हैं और उनसे हम क्या सीख सकते हैं।

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है- "लोहे से बना कारखाना ही एकमात्र कारखाना नहीं है-विचारहीन नियम लोहे से भी अधिक कठोर हैं,यन्त्र से भी अधिक संकीर्ण है।जो बृहत् व्यवस्था-प्रणाली निष्ठुर शासन का आतंक दिखाकर युग-युग तक कोटि-कोटि नर-नारी से मुक्तिहीन आचारों की पुनरावृत्ति कराती है,वह क्या किसी यन्त्र से कम है ?उसके जाँते में क्या मनुष्यत्व नहीं पिसता ?बुद्धि की स्वाधीनता पर अविश्वास दिखाकर ,विधि-निषेधों के इतने कठोर,चित्तशून्य कारखाने को भारत के अलावा और कहीं तैयार नहीं किया गया।"

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने राजा राम मोहन राय के बारे में जो लिखा वह बेहद महत्वपूर्ण है।लिखा ´राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई 1772 ई. को राधा नगर नामक बंगाल के एक गाँव में, पुराने विचारों से सम्पन्न बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने अपने जीवन में अरबी, फ़ारसी, अंग्रेज़ी, ग्रीक, हिब्रू आदि भाषाओं का अध्ययन किया था। हिन्दू, ईसाई, इस्लाम और सूफी धर्म का भी उन्होंने गम्भीर अध्ययन किया था। 17 वर्ष की अल्पायु में ही वे मूर्ति पूजा विरोधी हो गये थे।वे अंग्रेज़ी भाषा और सभ्यता से काफ़ी प्रभावित थे।उन्होंने इंग्लैंड की यात्रा की। धर्म और समाज सुधार उनका मुख्य लक्ष्य था। वे ईश्वर की एकता में विश्वास करते थे और सभी प्रकार के धार्मिक अंधविश्वास और कर्मकांडों के विरोधी थे। अपने विचारों को उन्होंने लेखों और पुस्तकों में प्रकाशित करवाया। किन्तु हिन्दू और ईसाई प्रचारकों से उनका काफ़ी संघर्ष हुआ, परन्तु वे जीवन भर अपने विचारों का समर्थन करते रहे और उनके प्रचार के लिए उन्होंने ब्रह्मसमाज की स्थापना की।´

वे ब्रह्म समाज के संस्थापक, भारतीय भाषायी प्रेस के प्रवर्तक, जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता तथा बंगाल में नव-जागरण युग के पितामह थे। धार्मिक और सामाजिक विकास के क्षेत्र में राजा राममोहन राय का नाम सबसे अग्रणी है। राजा राम मोहन राय ने तत्कालीन भारतीय समाज की कट्टरता, रूढ़िवादिता एवं अंधविश्वासों को दूर करके उसे आधुनिक बनाने का प्रयास किया।

राममोहन राय के बारे में टैगोर ने लिखा- "उस समय के मर्म को न विदेशियों ने पहचाना था, न भारतवासियों ने। केवल राममोहन राय समझ सके थे कि इस युग का आह्वान महान् ऐक्य का आह्वान है। ज्ञानालोक से प्रदीप्त उनके उदार हृदय में हिन्दू-मुसलमान-ईसाई सबके लिए स्थान था। उनका हृदय भारत का हृदय है, उन्होंने अपने -आप में भारत का सत्य परिचय दिया है।भारत का सत्य परिचय उसी मनुष्य में मिलता है जिसके हृदय में मनुष्य मात्र के लिए सम्मान है,स्वीकृति है।"

टैगोर ने यह भी लिखा ," मानव-इतिहास की मुख्य समस्या क्या है ?यही कि अन्धता और मूर्खता के कारण मनुष्य का मनुष्य से विच्छेद हो जाता है।मानव समाज का सर्वप्रधान तत्व है मनुष्य-मात्र का ऐक्य।सभ्यता का अर्थ है एकत्र होने का अनुशीलन।"

आज के समय और पश्चिम बंगाल पर रवीन्द्रनाथ टैगोर की ये पक्तियां खरी उतरती हैं,टैगोर ने लिखा है- "बंगदेश में ईर्ष्या ,निन्दा,दलबन्दी, और परस्पर धिक्कार तो हैं ही ,उस पर चित्त का प्रकाश भी मलिन हो चले तो आत्मश्रद्धा के अभाव से दूसरों को नीचे गिराने का प्रयास और भी घातक बन जायगा।"

टैगोर ने लिखा - "साधारणतःस्त्रियों के सुख,स्वास्थ्य और स्वच्छन्दता को हम परिहास का विषय मानते हैं।हमारे लिए यह विनोद का एक उपकरण हो जाता है यह भी हमारी क्षुद्रता और कापुरूषता के लक्षणों में से एक है।"

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने वसंत पर लिखा है- "वसंत के दिन विरहिणी का मन हाहाकार करता है, यह बात हमने प्राचीन काव्यों में पढ़ी है-इस समय यह बात लिखने हुए हमें संकोच होता है,बाद को लोग हँसेंगे। प्रकृति के साथ अपने मन का संकोच हमने ऐसा तोड़ लिया है।वसंत में समस्त वन-उपवन में फूल खिलने का समय उपस्थित होता है;बह उनके प्राण की अजस्रता का,विकास के उत्सव का समय है।तब आत्मदान के उच्छवास से तरू-लता पागल हो उठते हैं;तब उनको हिसाब किताब की कोई चेतना नहीं रह जाती;जहाँ पर दो-ठो फल लगेंगे,वहाँ पच्चीस कलियाँ लग जाती हैं। मनुष्य क्या बस इस अजस्रता के स्रोत से रूँधता रहेगा ?अपने को खिलायेगा नहीं,फलायगा नहीं,दान करना न चाहेगा ?"

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने सोवियत संघ की इकसार शिक्षा व्यवस्था पर जो टिप्पणी लिखी थी उसकी कुछ अति मूल्यवान पंक्तियां पढ़ें।ये पंक्तियां ऐसे समय लिखी गयी थीं जिस समय रूस की वे स्वयं प्रशंसा लिख रहे थे। टैगोर ने लिखा- "वह गलती यह है कि शिक्षा पद्धति का इन्होंने एक साँचा-सा बना डाला है, पर
साँचे में ढला मनुष्य कभी स्थायी नहीं हो सकता -- सजीव हृदय तत्व के साथ यदि विद्या तत्व का मेल न हो, तो या तो किसी दिन साँचा ही टूट जाएगा, या मनुष्य का हृदय ही मर कर मुर्दा बन जाएगा, या मशीन का पुर्जा बना रहेगा।" अंततः सोवियतसंघ टूट गया और टैगोर सही साबित हुए।एक विज़नरी लेखक की यही महानता है कि वह बहुत दूर घटने वाली चीजों को भी पकड़ने में समर्थ होता है।

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है- "अज्ञान और अंध-संस्कार की जलवायु निरंकुश शासन के लिए अनुकूल होती है। मानवोचित अधिकारों से वंचित होकर भी संतुष्ट रहना ऐसी अवस्था में ही संभव होता है।हमारे देश के अनेक पुरूषों के मन में आज भी वही भाव है।लेकिन समय के विरूद्दसंग्राम में आखिर उन्हें हार माननी होगी।"

भारतीय समाज के बारे में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा- "इस समाज ने विचार-बुद्धि के प्रति श्रद्धा रखने का साहस नहीं किया।आचार पर ही पूर्णतया अवलम्बित रहा।"

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है भारतीय स्त्रीके लिए -" स्वामी उनके लिए 'आइडिया' (idea) है,किसी व्यक्ति के सामने स्त्री नतशिर नहीं होती, एक idea के सामने धर्मबल से आत्मसमर्पण करती है। स्वामी में यदि मनुष्यत्व हो तो स्त्री के इस 'आइडियल' प्रेम की शिक्षा से उसका चित्त भी उज्ज्वल हो जाता है।ऐसे उदाहरण हमारे देखने में आते हैं । यही 'आइडियल' प्रेम यथार्थ मुक्त प्रेम है। यह प्रेम प्रकृति के मोहबन्धन की उपेक्षा करता है। "









रवीन्द्रनाथ से क्या सीखें -

सात अगस्त 1941 को रवीन्द्रनाथ टैगोर की मृत्यु हुई ,यानी आज का दिन हम भारतवासियों के लिए स्मरणीय दिन है।इसदिन हमारा एक महान लेखक इस धरती पर अजस्र सुंदर सपने देकर चला गया। मनुष्य की सत्ता, स्वतंत्रता और इच्छा के महान प्रवक्ता थे टैगोर।टैगोर आज भारत के जनमानस की शक्ति हैं।आमतौर पर टैगोर को कवि के रूप में ही देखने की आदत है,लेकिन वे जितने बड़े कवि थे,उससे बड़े विचारक भी थे। उनसे सीखने लायक कुछ विचार।

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है "फूल जब खिल उठता है तब मन में यही आता है कि जैसे फूल ही पेड़ का एक-मात्र लक्ष्य हो-उसका सौंदर्य,उसकी सुगन्ध ऐसी होती है कि लगता है जैसे वनलक्ष्मी की साधना चरम धन हो।लेकिन यह बात छिपी रह जाती है कि वह फूल लगने का केवल एक उपलक्ष्य है-वह वर्तमान के गौरव में ही प्रसन्न रहता है,भविष्य उसे अभिभूत नहीं करता।"

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ' मैं क्षुद्र व्यक्ति जब अपनी एक क्षुद्र बात कहने के लिए चंचल हो उठा था तब न जाने किसने मेरा हौसला बढ़ाकर कहा, ''कहो-कहो,अपनी बात ही कहो। उसी बात के लिए लोग टकटकी लगाए देख रहे हैं।" ' आज यही सबक है कि हम अपनी बात बेधड़क कहें।

´हमारे बचपन में भोग-विलास का सरंजाम नहीं था।इतना कहना काफी होगा। मोटे रूप में तब की जीवन-यात्रा आज की तुलना में कहीं ज्यादा सीधी-सादी थी। ...हमारे घर में तो विशेष रूप से लड़कों की देख-रेख या ले- लपक करना एकदम नहीं था।...ले-लपक वाली बात अभिभावकों के अपने सन्तोष के लिए उनकी तृप्ति के लिए होती है...बच्चों के लिए नहीं।´

´मैं पहले ही कह आया हूँ कि उन दिनों छोटे-बड़े के बीच आवा-जाही के लिए पुल न था,लेकिन इन सब पुराने कायदों की भीड़ में ज्योति दा बिलकुल विशुद्ध नया मन लेकर आये थे। मैं उनसे बारह बरस छोटा था। मुझे इसी का आश्चर्य है कि उम्र की इतनी बड़ी दूरी के बावजूद मुझ पर उनकी नजर कैसे पड़ी। और भी आश्चर्य की बात यह है कि बातचीत में उन्होंने कभी अपने बडप्पन के मारे मेरा मुँह बन्द करने की कोशिश नहीं की। इसीलिए कोई भी बात सोचने में मुझे साहस का अभाव न होता। आज बच्चों के बीच ही में रहता हूँ। पाँच तरह की बातें कहता हूँ और उनका मुँह बन्द देखता हूँ।बात पूछने में डर लगता है। मैं समझ सकता हूँ ,यह लोग सब उन्हीं बूढ़ों के जमाने के बच्चे हैं जिस जमाने के बड़े लोग बात कहते थे और छोटे लोग गूंगों की तरह बैठे रहते थे। बात पूछने का साहस नये जमाने के बच्चों का है और बूढ़ों के जमाने के बच्चे सब कुछ सिर झुकाकर मान लेते थे।" सबक यह कि हम अपने बच्चों को निर्भय होकर बोलने दें।

हमारे बीच अनेक ऐसे लोग हैं जो बेकार की बातें करना पसंद नहीं करते और हमेशा ज्ञान चर्चा में डूबे रहते हैं। वे यही चाहते हैं कि पढ़े लिखे लोगों को हमेशा गंभीर रहना चाहिए। बेकार की बातों पर समय खर्च करने को वे फिजूल में समय की बर्बादी समझते हैं। इस तरह के लोगों को और इनके तर्कों को ध्यान में ऱखकर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा ,' आदमी की असली पहचान दूसरे खर्चों से ज्यादा उसके बेकार के खर्चों से होती है, क्योंकि आदमी खर्च करता है बँधे हुए नियमों के अनुसार ,फिजूलखर्ची करता है अपने मन से। जैसे बेकार खर्चा होता है वैसे ही बेकार बात भी होती है।बेकार बात में ही आदमी पकड़ में आता है। उपदेश की बात जिस रास्ते से चलती है वह मनु के समय से बँधा हुआ है; काम की बात जिस रास्ते से अपनी बैलगाड़ी ठेलकर ले जाती है वह रास्ता कामकाजी लोगों के पैंरों से रौंदा जाकर तृण-पुष्प-शून्य हो गया है।बेकार बात अपने ढ़ंग से कहनी ही पड़ती है।' टैगोर ने लिखा ' जो आदमी कहने के लिए कोई खास बात न रहने पर कुछ कह ही नहीं सकता,बोलेगा तो वेदवाक्य;नहीं तो चुप बैठा रहेगा,हे चतुरानन,उसकी कुटुम्बिता,उसका साहचर्य,उसका पड़ोस ' शिरसि मा लिख मा लिख मा लिख ‍!'



सोमवार, 10 मई 2010

महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जन्मतिथि पर विशेष- सभ्यता और सादगी का महाकवि

    रवीन्‍द्रनाथ की 150वीं जयन्ती के मौके पर उनके वि‍चारों और नजरि‍ए पर वि‍चार करने का मन अचानक हुआ और पाया कि‍ रवीन्‍द्रनाथ के यहां मृत्‍यु का जि‍तना जि‍क्र है उससे ज्‍यादा जीवन का जि‍क्र है। रवीन्‍द्रनाथ ने अपने लेखन से वि‍श्‍व मानव सभ्‍यता को आलोकि‍त कि‍या है, चारों ओर उनका यश इतने दि‍नों के बाद आज भी बना हुआ है, आज भी बांग्‍ला का कोई भी वि‍मर्श उनके बि‍ना अधूरा है। रवीन्‍द्र की इस वि‍राटता में उनके दृष्‍टि‍कोण की महत्‍वपूर्ण भूमि‍का थी।
       

(रवीन्द्रनाथ के जन्मस्थान जोडासांको में माल्यदान का दृश्य)
      रवीन्‍द्रनाथ आधुनि‍काल के उन चंद वि‍चारकों और लेखकों में हैं जो मृत्‍यु की सत्‍ता को स्‍वीकारते हैं, उसका व्‍यापक चि‍त्रण भी करते हैं। मृत्‍यु को गीत बनाने में रवीन्‍द्रनाथ ने वि‍लक्षण महारत हासि‍ल की थी। सामान्‍य तौर पर भारतीय मनोवि‍ज्ञान मौत से आंखें चुराता है अथवा उसका बहुत कम वि‍मर्श मि‍लता है। रवीन्‍द्रनाथ ने मौत को स्‍वीकारा और उसे चुनौती भी दी।
(जोडासांको का एक दृश्य)
     रवीन्‍द्रनाथ का प्रसि‍द्ध कथन था ,जो उन्‍हें अपनी परंपरा से मि‍ला था, उन्‍होंने लि‍खा ' गृहीत इव केशेषु म़ृत्‍युना धर्म माचरेत्'- अर्थात् मौत ने चोटी पकड़ रखा है यह ध्‍यान में रखते हुए धर्म पर चलो।
      इसी धारणा के आधार पर उन्‍होंने 'संसार नश्‍वर है', इस‍ प्राचीन धारणा का खंड़न कि‍या था और लि‍खा था ' अवसान के बाद जो मि‍थ्‍या है वह अवसान के पहले वास्‍तव है। जि‍स मात्रा में जो चीज सत्‍य है उस मात्रा में उसे मानना होगा। हम न मानें तो वह चीज ज़बरदस्‍ती अपने-आपको मनवा लेगी और एकदि‍न ब्‍याज सहि‍त हमसे बदला लेगी।'
(संसद में रवीन्द्रनाथ की छवि पर माल्यार्पण के बाद दांए से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह,भाजपा नेत्री सुषमा स्वराज,कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी,भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी)  
     जो है उसे मानो और आगे बढ़ो। यदि‍ प्रस्‍तुत यथार्थ को अस्‍वीकार करते हैं तो यथार्थ मनवाकर छोड़ेगा। आमतौर पर हम सबमें यथार्थ को झुठलाने की आदत होती है अथवा यथार्थ से आंखें चुराते हैं। उन्‍होंने लि‍खा '' वस्‍तु को अपनाना और वस्‍तु को छोड़ देना ,दोनों में ही सत्‍य है। ये दोनों सत्‍य एक-दूसरे पर नि‍र्भर हैं, और दोनों को यथार्थ रूप से मि‍लाकर ही पूर्णता लाभ संभव है।''
      हि‍न्‍दी में सामंजस्‍य पर खूब बहस हुई है। इस प्रसंग में रवीन्‍द्रनाथ लि‍खा है '' यदि‍ इस सामंजस्‍य का आश्रय लेना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें देखना होगा मनुष्‍य का सच्‍चा रूप। कि‍सी वि‍शेष प्रयोजन के पक्ष से मनुष्‍य को देखने से काम नहीं चलेगा।'' मनुष्‍य को कि‍सी एक ही प्रयोजन के नजरि‍ए से देखने से वह समझ में नहीं आ सकता। बल्‍कि‍ यह बेकार का नजरि‍या है।
 (जोडासांको के आंगन का दृश्य)     
       रवीन्‍द्रनाथ का मानना था '' यदि‍ हम आम के फल को इस दृष्‍टि‍कोण से देखें कि‍ उससे खटाई कि‍स तरह मि‍ल सकती है तो आम का समग्र रूप हमारे सामने नहीं आता- बल्‍कि‍ हम उसे कच्‍चा ही तोड़कर उसकी गुठली नष्‍ट कर देते हैं। पेड़ को यदि‍ हम केवल ईंधन के रूप में देखें तो उसके फल- फूल-पत्‍तों में हमें कोई तात्‍पर्य नहीं दीख पड़ेगा। इसी तरह यदि‍ मनुष्‍य को हम राज्‍य रक्षा का साधन समझेंगे तो उसे सैनि‍क बना देंगे। यदि‍ व्‍यक्‍ति‍ को जातीय समृद्धि‍ का उपाय-मात्र समझें तो उसे वणि‍क बनाने का प्रयास करेंगे। अपने संस्‍कारों के अनुसार जि‍स गुण को हम सबसे अधि‍क मूल्‍य प्रदान करते हैंउसी के उपकरण के रूप में मनुष्‍य को देखकर उस गुण से सम्‍बन्‍धि‍त प्रयोजन-साधना को ही हम मानव-जीवन की सार्थकता समझने लगते हैं। यह दृष्‍टि‍कोण बि‍लकुल ही बेकार हो,ऐसी बात नहीं। लेकि‍न अंत में इससे सामंजस्‍य नष्‍ट होकर अहि‍त ही हमारे पल्‍ले पड़ता है। जि‍से हम तारा समझकर आकाश में उड़ाते हैं वह कुछ ही देर तक तारे की तरह चमकने के बाद जलकर खाक हो जाता है और जमीन पर आ गि‍रता है।''
       मनुष्‍य का अर्थ प्रयोजनों से बड़ा है। हम व्‍यर्थ में प्रयोजनों के साथ मनुष्‍य के अर्थ को जोड़ देते हैं। मनुष्‍य के सत्‍य को इनके परे जाकर देखना होगा।
       रवीन्‍द्रनाथ टैगोर के जमाने में पूंजीवाद अपने यौवन पर था उन्‍होंने पूंजीवाद की बर्बरता और उपभोक्‍ता संस्‍कृति‍ के मानव वि‍रोधी चरि‍त्र को बड़ी बारीकी के साथ पकड़ा था। टैगोर का मानना था '' आज हम बाजार की भीड़ और शोर-गुल में सम्‍मि‍लि‍त हो रहे हैं,नीचे उतर आए हैं,ओछे हो गए हैं। कलह से हमारा सन्‍तुलन जाता रहा है। पदवि‍यों-उपाधि‍यों को लेकर आपस में झगड़ा कर रहे हैं। बड़े-बड़े अक्षरों के और ऊंचे स्‍वर के विज्ञापनों से अपने को औरों से बड़ा घोषित करने में हमें संकोच नहीं होता। और मजे की बात तो यह है कि जो कुछ हम कर रहे हैं सब 'नकल' है। इसमें सत्‍य की मात्रा नहीं के बराबर है। इसमें शान्ति नहीं,संयम नहीं,गाम्‍भीर्य नहीं, शालीनता नहीं।''
(जोडासांको में रवीन्द्रनाथ का अध्ययन कक्ष)        
रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने सादगी और मानवता पर जोर दिया और ऊपरी आडम्‍बर की जबर्दस्‍त मुखालफत की थी। भद्रता को वे आंतरि‍क चीज मानते थे, भद्रता कोई बाजार में मि‍लने वाली वस्‍तु नहीं थी जि‍से जाकर खरीद लो और पहनकर भद्र बन जाओ।
        टैगोर के शब्‍दों में '' आज हमारी भद्रता सस्‍ते कपड़ों से अपमानि‍त होती है,घर में वि‍लायती ढंग की सजावट न हो तो उस पर आंच आती है बैंक में हमारे नाम पर जो अंक लि‍खे हैं वे कम हों, तो हमारी भद्रता कलंकि‍त होती है। हम यह भूल बैठे हैं कि‍ ऐसी प्रति‍ष्‍ठा को सि‍र पर ढोकर उसका आदर करना वास्‍तव में लज्‍जा का वि‍षय है। जि‍न बेकार की उत्‍तेजनाओं को हमने सुख मानकर चुना है उनसे हमारे समाज का अन्‍त:करण दासता के पाश में जकड़ा जा रहा है।''

रविवार, 9 मई 2010

कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जयन्ती पर विशेष- दीन-हीन मनुष्य का सम्मान पद है धर्म -2-

     हिंदी के लेखकों और आलोचकों की मुश्‍कि‍ल यह है कि‍ वे धर्म और साहि‍त्‍य को अलग -अलग खांचों में रखकर देखते हैं। वे धर्म,मनुष्‍य और साहि‍त्‍य के बीच के अन्‍तस्‍संबंध को अभी तक देख ही नहीं पाए हैं। आदि‍कवि‍ से लेकर भक्‍ति‍ आंदोलन के कवि‍यों तक यह अन्‍तस्‍संबंध साफ दि‍खाई देता है। यहां तक कि‍ भारतेन्‍दु के यहां भी इसकी छाप नजर आती है। उसके बाद पता नहीं कबसे यह संबंध टूट गया। धर्म,मनुष्‍य और साहि‍त्‍य को अलग कर दि‍या गया। हम साहि‍त्‍य से प्‍यार करने लगे और धर्म से नफरत।
      इस प्रक्रि‍या में पहले हाथ से धर्म गया अब साहि‍त्‍य भी जा रहा है। रह गयी हैं कुछ कि‍ताबें ,संपादक,अध्‍यापक,आलोचक और साहि‍त्‍य गायब है। साहि‍त्‍य का वि‍मर्श गायब है। धर्म हाथ से जाएगा तो कलाएं भी जाएंगी। हिंदी में कलावंतों और कलाबोध की क्‍या दशा है यह हम सब अच्‍छी तरह जानते हैं। हिंदीभाषी शहरों में कला के ट्यूटर तक नहीं मि‍लते। आस्‍वाद करने वाले तो दूर-दूर तक नजर नहीं आते और कला दीर्घाएं हजारों कि‍लोमीटर दूर जा चुकी हैं। साहि‍त्‍य की अवस्‍था इससे बेहतर नहीं है। इस समूची प्रक्रि‍या का दयानंद सरस्‍वती के सुधार आंदोलन और उपयोगि‍तावाद के साथ गहरा संबंध है।
         धर्म को हमने पहले त्‍यागा। धर्म को त्‍यागने का अर्थ है मनुष्‍यता को त्‍यागना। धर्म को त्‍यागकर कोई लेखक मनुष्‍यत्‍व के मर्म को नहीं पकड सकता। धर्म बैर की नहीं प्‍यार की चीज है, घृणा की नहीं मोहब्‍बत की चीज। धर्म की सतही और पोंगापंथी बातें धर्म का सही रूप नहीं हैं। प्रत्‍येक समझदार व्‍यक्‍ति‍ ने धर्म के दुरूपयोग, पाखंड, कर्मकांड आदि‍ का वि‍रोध कि‍या है। धर्म का अर्थ बाह्याचार नहीं है।धर्म अंदर की चीज है।धर्म हमारे अन्‍त:करण में होता है। धर्म हमारी प्राणवायु है।
साहि‍त्‍य हमारे हृदय से नि‍कलता है और मनुष्‍य के हृदय को ही सम्‍बोधि‍त करता है। लेखक हृदय के आदेश पर ही लि‍खता है। पार्टी,वि‍चारधारा,राष्‍ट्र आदि‍ के आदेश पर नहीं लि‍खता। धर्म का बाह्याडंबर अन्‍त:करण को सम्‍बोधि‍त नहीं करता फलत: अन्‍त:करण को बदलने की उसमें क्षमता नहीं है।
      धर्म स्‍वभावत: प्रगति‍शील है, मानवीय है। हमें सोचना चाहि‍ए धर्म से कटने के कारण कहीं समाज और सभ्‍यता से हमारा संबंध वि‍च्‍छेद तो नहीं हो गया ? सभ्‍यता वि‍मर्श धर्म में मि‍लता है,सृजन का वि‍मर्श भी धर्म की गोद में बैठकर ही आया है। जि‍तने भी क्‍लासि‍क हैं वे धर्मवि‍मुख होकर नहीं लि‍खे गए, हमारे पास जि‍तने भी बेहतरीन लेखक, महापुरूष, दार्शनि‍क आदि‍ हैं वे सभी धर्मप्राण थे।
उदयप्रकाश ने सही लि‍खा है ,‘धर्मके अंतर्विरोधों के बीच से ही उसकी सामाजिक जड़ता और उसके अमानवीकरण तथा सांस्थानीकरण के विरुद्ध विद्रोह फूटते रहे हैं। हमारे देश के अपने इतिहास में भी अंधविश्वासों और कर्मकांडों के विरुद्ध, ब्राह्मणवाद और पुरोहितवाद के विरुद्ध अथवा जड़ और प्रतिगामी सामाजिक रीति-रिवाजों, परंपराओं के विरुद्ध धर्म की किसी प्रशाखा ने ही सबसे सक्षम विद्रोह किया था।'
     मैं यहां सि‍र्फ अपने ज्‍योति‍षशास्‍त्र के तजुर्बे से बता सकता हूं कि‍ फलि‍त ज्‍योति‍ष के पाखंड के खि‍लाफ जि‍तना वि‍स्‍तार के साथ प्राचीन और मध्‍यकाल में सि‍द्धान्‍त ज्‍योति‍ष के वि‍द्वानों ने आम जनता को शिक्षि‍त कि‍या था उतना कि‍सी और ने नहीं कि‍या। स्‍वयं आर्यभट को वि‍ज्ञानसम्‍मत वि‍चार व्‍यक्‍त करने के कारण प्रसि‍द्ध राजज्‍योति‍षी वराहमि‍हि‍र ने कहीं नौकरी नहीं लेने दी।आर्यभट को दर दर की ठोकरें खानी पड़ीं लेकि‍न उन्‍होंने ज्‍योति‍ष संबंधी अपने वैज्ञानि‍क वि‍चारों को ति‍लांजलि‍ नहीं दी।
    उदयप्रकाश ने लि‍खा है '' यहां यह समझा पाना लगभग असंभव है भगत सिंह का लेख मैं नास्तिक क्यों हूंया राहुल जी का तुम्हारी क्षय होका उपयोग सांप्रदायिक राजनीति, समाज सुधार, कर्मकांड और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध तो हो सकता है, लेकिन सृजन और कला, साहित्य,संगीत, वास्तु और शिल्प आदि के क्षेत्रों में अगर उसे यथावत् किसी सौंदर्यशास्त्र के वैकल्पिक स्वरूप के बतौर लागू करने का प्रयत्न किया गया तो परिणाम घातक होंगे।''
     उदयप्रकाश की इस धारणा से पूरी तरह सहमत होना संभव नहीं है। इसका प्रधान कारण है कि‍ भगतसिंह और राहुल साकृत्‍यायन दोनों ही धर्म की सकारात्‍मक भूमि‍का देखने में असमर्थ रहे हैं। उनके यहां धर्म के प्रति‍ इकहरा नजरि‍या व्‍यक्‍त हुआ है, इससे साम्‍प्रदायि‍कता आदि‍ को परास्‍त करना संभव नहीं है।
इस प्रसंग में रवीन्‍द्रनाथ टैगोर के 29 अगस्‍त 1921 को पढे गए नि‍बंध 'सत्‍य का आह्वान‘ का हवाला देना चाहूंगा। तमाम कि‍स्‍म के क्रांति‍कारी असहयोग आंदोलन की आलोचना कर रहे थे, और अलग से क्रांति‍ का बि‍गुल बजाए हुए थे,बंग भंग का राजनीति‍क वातावरण था।
       इस प्रसंग में टैगोर ने लि‍खा '' जब तक राष्‍ट्र तैयार नहीं है तब तक क्रान्‍ति‍ का प्रयत्‍न करना गलत मार्ग पर चलना है। यह मार्ग उचि‍त मार्ग की तुलना में छोटा है,लेकि‍न उस पर चलकर हम लक्ष्‍य तक नहीं पहुँचते ,रास्‍ते में दोनों पाँव कांटों से जख्‍मी हो जाते हैं।प्रत्‍येक वस्‍तु का पूरा दाम देना होता है -यदि‍ आधा ही दाम दि‍या गया तो रूपया भी जाता है और वस्‍तु भी नहीं मि‍लती। वे दु:साहसी युवक समझते थे कि‍ सारे देश के लि‍ए यदि‍ कुछ लोग आत्‍मोत्‍सर्ग करें तो क्रांति‍ सफल होगी।उनके लि‍ए यह सर्वनाशा था,देश के लि‍ए एक सस्‍ती बात।देश का उद्धार समस्‍त देश के अन्‍त:करण से होना चाहि‍ए,उसके एक अंश से नहीं।''
        एक अन्‍य चीज जि‍से ध्‍यान में रखना चाहि‍ए। टैगोर के ही शब्‍दों में '' मनुष्‍य मधुमक्‍खी की तरह नहीं है जो एक ही तरह का छत्‍ता बनाती है, न वह मकड़ी की तरह है जो एक ही 'पैटर्न' का जाल बुनती है।उसकी सबसे बड़ी शक्‍ति‍ है उसका अन्‍त:करण। मनुष्‍य का पूरा दायि‍त्‍व अन्‍त:करण के सामने है। अभ्‍यासपरता के सामने नहीं।''            
     धर्म डरने, दुत्‍कारने अथवा बहि‍ष्‍कार करने की चीज नहीं है। हजारों वर्षों से धर्म का दुरूपयोग,बहि‍ष्‍कार,दुत्‍कार आदि‍ सब कुछ चल रहा है, इसके बावजूद धर्म का प्रवाह अव्‍याहत बना हुआ है। इसका अर्थ है कि‍ कहीं कोई ऐसी शक्‍ति‍ जरूर होगी जो धर्म को आगे ले जा रही है। इस पहलू का रवीन्‍द्रनाथ ने बड़ा ही सुंदर वि‍वेचन कि‍या है।
लि‍खा है, '' मनुष्‍य की शक्‍ति‍ के दो पक्ष हैं : एक पक्ष का नाम है 'कर सकता है' और दूसरे पक्ष का नाम है 'करेगा'। पहला पक्ष उसके लि‍ए सहज है,लेकि‍न उसकी तपस्‍या दूसरे पक्ष की ओर है। धर्म मनुष्‍य के 'करेगा' पक्ष के सर्वोच्‍च शि‍खर पर खड़ा होकर उसके समस्‍त 'कर सकता है' को पुकारता है ; उसे वि‍श्राम नहीं करने देता ; उसे कि‍सी सामान्‍य लाभ से ही सन्‍तुष्‍ट नहीं होने देता। जहॉं मनुष्‍य का 'कर सकता है' इसी 'करेगा' के नि‍र्देशन में आगे बढ़ता जाता है वहीं मनुष्‍यता की वीरता है-वहीं उसका सत्‍य -रूप से आत्‍मलाभ है।''
     धर्म की मूल क्षमता यह है कि‍ वह मनुष्‍य को असाध्‍य कार्य करने में सक्षम बनाता है। मनुष्‍य की अक्षमता,मूर्खता,दुष्‍टता,शैतानि‍यों आदि‍ को अस्‍वीकार करता है और सि‍र्फ मनुष्‍यता पर बल देता है। धर्म बंदी नहीं बनाता,धर्म वि‍चारों की गुलामी भी नहीं थोपता। धर्म कहीं से भी अंधवि‍श्‍वास,पुनर्जन्‍म आदि‍ की हि‍मायत नहीं हैं। अंधवि‍श्‍वास, पुनर्जन्‍म आदि‍ की बातें उन लोगों ने की हैं जो धर्म को अन्‍त:करण से काटकर बाह्याचारों के रूप में देखते हैं।
एक मायने में धर्म और कला सृजन एक ही लक्ष्‍य की पूर्त्‍ति करते हैं । दोनों मनुष्‍यत्‍व का संदेश देते हैं। दोनों हृदय के साथ संवाद करते हैं,अन्‍त:करण की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ करते हैं। दोनों से पुण्‍य मि‍लता है। हृदय को शांति‍ मि‍लती है। तनाव दूर होता है। दोनों सर्जनात्‍मक हैं, ऊर्जा से भरे हैं। दोनों मनुष्‍य को और भी बेहतर मनुष्‍य बनाते हैं। दोनों के बि‍ना मनुष्‍य अधूरा है। इनमें से कि‍सी भी एक त्‍यागा नहीं जा सकता।
       धर्म का स्‍तर उठाने के लि‍ए हमें वहां से आगे सोचना चाहि‍ए जहां पर हमारे पूर्वज धर्म के वि‍मर्श को छोड़ गए थे। हमने इस वि‍मर्श को आगे नहीं बढाया है बल्‍कि‍ और भी पीछे की ओर ,सतही चीजों की ओर ले गए हैं। इससे हमारा धर्मबोध वि‍कृत हुआ है। धर्म और कलाओं के प्रति‍ हमें पुराने नुस्‍खे को अपनाना होगा,पुराना नुस्‍खा था '' अभी और'',हम जहां थे उससे आगे के बारे में सोचें। कला और धर्म जहां है उससे आगे के बारे में सोचें। इस प्रक्रि‍या को जि‍तनी दूर तक ले जा सकें,ले जाएं। इससे मानवीय चेतना के नए दि‍गंत खुलेंगे।
     हमें धर्म के बारे में सहजबुद्धि‍ के धरातल पर खड़े होकर नहीं सोचना चाहि‍ए। हमें धर्म को वि‍श्‍वास के आधार से भी नहीं देखना चाहि‍ए। धर्म अंदर की चीज है, मनुष्‍यत्‍व का मर्म है। उसे सहज,सस्‍ता,चमकीला बनाने से वह सामाजि‍क तकलीफ देता है।जो लोग ऐसा करते हैं वे धर्म नहीं 'ठगी धर्म' करते हैं।
      रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने लि‍खा है '' धर्म मनुष्‍य की पूर्ण शक्‍ति‍ की अकुण्‍ठि‍त वाणी है। उसमें कोई द्वि‍धा नहीं है। वह मनुष्‍य को मूर्ख कहकर स्‍वीकार नहीं करता,और न दुर्बल कहकर अवज्ञा करता है। वह मनुष्‍य को पुकारकर कहता है- ' तुम अजेय हो,अभय हो,अमर हो।' धर्म की शक्‍ति‍ से ही मनुष्‍य असंभव लगने वाले कामों में जुट जाता है, और ऐसे स्‍तर पर पर पहुँच जाता है जि‍सकी वह स्‍वप्‍न में भी कल्‍पना नहीं कर सकता। इसी धर्म के मुख से कहलाएं : 'तुम मूढ़ हो , समझ न सकोगे' तो फि‍र मनुष्‍य की मूढ़ता कौन दूर करेगा ?यदि‍ धर्म से ही हम कहलाएं: 'तुम अक्षम हो,कुछ न कर सकोगे', तो मनुष्‍य को शक्‍ति‍ कौन देगा ?'' '' वास्‍तव में हीन-से -हीन मनुष्‍य के लि‍ए सम्‍मान का एकमात्र स्‍थान धर्म ही है।''

महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जयन्ती पर विशेष- मनुष्य की अक्षय और अपराजित आत्मा का महागायक - सरला माहेश्वरी

(महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर)
‘‘बड़ा आदमी वह होता है जिसके सम्पर्क में आनेवाले का अपना देवत्व जाग उठता है। रवीन्द्रनाथ ऐसे ही महान पुरुष थे। ... वे उन महापुरुषों में थे जिनकी वाणी किसी विशेष देश या सम्प्रदाय के लिए नहीं होती, बल्कि जो समूची मनुष्यता के उत्कर्ष के लिए सबको मार्ग बताती हुई दीपक की भांति जलती रहती है।‘‘ (हजारी प्रसाद द्वि‍वेदी)
      रवीन्द्रनाथ की 150वीं जयंती हम एक ऐसे काल में मना रहे हैं जब मानव सभ्यता उथलपुथल के एक अभूतपूर्व अकल्पनीय दौर से गुजर रही है। लगता है जैसे आदमी ने अपने अथक और अनवरत प्रयासों से जिस सृष्टि की रचना की उसे वह अपने ही हाथों मटियामेट करने पर तुल गया है। लाभ और लोभ की कोख से जन्मी पूंजी और उसपर टिका पूरा तंत्र, एक समग्र पूंजीवादी दर्शन, उसका विकराल पैशाचिक रूप, साम्राज्यवादी वैश्वीकरण आज समूची मानवता को अपने नागपाश में जकड़कर लहूलुहान कर रहा है। जल, जमीन, जंगल और यह पूरा जगत आज उसके जहर से विषाक्त अजीबोगरीब ढंग से विरूपित दिखाई देता है। सभ्यता के ऐसे संकट की काली छाया को उस भविष्यद्रष्टा कवि, चिंतक ने देख लिया था और अपनी मौत से कुछ दिन पहले उनकी आत्मा उनसे सवाल कर रही थी
भगवान्, तुमने युगयुग में बारबार इस दयाहीन संसार में अपने दूत भेजे हैं।
वे कह गये हैंक्षमा करो,
कह गये हैंप्रेम करो, अंतर से विद्वेष का विष नष्ट कर दो।
वरणीय हैं वे, स्मरणीय हैं वे,
तो भी आज दुर्दिन के समय उन्हें निरर्थक नमस्कार के साथ बाहर के द्वार से ही लौटा दे रहा हूं।
मैंने देखा हैगोपन हिंसा ने
कपटरात्रि की छाया में निस्सहाय को चोट पहुंचाई है,
मैंने देखा हैप्रतीकारविहीन जबर्दस्त के अत्याचार से विचार की वाणी
चुपचाप एकांत में रो रही है,
मैंने देखा हैतरुण बालक उन्मत्त होकर दौड़ पड़ा है, बेकार ही पत्थर पर
सिर पटककर मर गया है़;
कैसी घोर यंत्रणा है उसकी!
आज मेरा गला रुंध गया है, मेरी बांसुरी का संगीत खो गया है, अमावश्या
की कारा ने मेरे संसार को दु:स्वप्नों के नीचे लुप्त कर दिया है,
इसीलिए तो आंसू भरी आंखों से तुमसे पूछ रहा हूं
जो लोग तुम्हारी हवा को विषाक्त बना रहे हैं,
उन्हें क्या तुमने क्षमा कर दिया है?
उन्हें क्या तुमने प्यार किया है?‘‘
रवीन्द्रनाथ क्या ये प्रश्न किसी अदृश्य, अमूर्त शक्ति से कर रहे थे? नहीं, उसे तो उन्होंने निरर्थक नमस्कार के साथ बाहर के द्वार से ही लौटा दिया था। वे यह सवाल उस मनुष्य से कर रहे थे, उसकी मनुष्यता से कर रहे थे जो दिनप्रतिदिन अपनी प्राण शक्ति खोे रही थी। और इसलिये वे उसकी प्राण शक्ति को, उसके विवेक को ललकार करके कह रहे थे कि तुम इन्हें कैसे माफ कर सकते हो, तुम इन्हें कैसे प्यार कर सकते हो?
        रवीन्द्रनाथ का जीवन, उनका पूरा साहित्य, उनका चिंतन इस बात की गवाही देता है कि इस महान मानव ने मनुष्यता में कभी अपना विश्वास नहीं खोया। भारत की सामासिक संस्कृति के जीवंत प्रतीक ठाकुर परिवार में जन्मे रवीन्द्रनाथ का परिवार एक ऐसा परिवार था जिसके बारे में खुद कविगुरु ने लिखा था कि उनका परिवार हिंदू सभ्यता, मुस्लिम सभ्यता और ब्रिटिश सभ्यताओं की त्रिवेणी था।
        दादा द्वारकानाथ अरबी और फारसी भाषा के प्रख्यात विद्वान थे। उन्होंने उस समय समुद्र की यात्राएं की जब समुद्र यात्रा किसी हिंदू के लिये वर्जित थी और उसके लिये कठोर दंड का विधान था। उनकी मृत्यु पर लंदन के द टाइम्स‘ ( 3 अगस्त 1946) ने लिखासंभवतया भारत में उनकी टक्कर का कोई नहीं है, भले ही वह किसी भी पद या प्रतिष्ठा पर हो, जिसने अपने आसपास खड़े लोगों की प्रगति और बेहतरी को इतनी उदारता से संरक्षण प्रदान किया हो। और हम यह भी विश्वास कर सकते हैं कि भारत और इंग्लैंड में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं जो अपनी वर्तमान सफलता और स्वतंत्रता के लिए द्वारकानाथ ठाकुर के अनुग्रह के प्रति कृतज्ञ न हों।‘‘
        रवीन्द्रनाथ के पिता देवेन्द्रनाथ इन्हीं द्वारकानाथ ठाकुर के सबसे बड़े पुत्र थे। लोग इन्हें महर्षि के नाम से पुकारते थे। मात्र 18 वर्ष की वय में इस तरुण ने गंगा के किनारे तीन दिनों तक अपनी मौत की प्रतीक्षा कर रही प्रिय दादी के पास रहते हुए जीवन के एक नये सत्य को खोज लिया था। अब वह एकदम बदल गया था। उन्होंने लिखा – ‘‘मैं ठीक पहले जैसा आदमी नहीं रहा। संपत्ति के प्रति मेरा लगाव उदासीन सा हो गया। वह फटीपुरानी बांस की चटाई जिस पर मैं बैठा थामुझे अपने लिये उपयुक्त जान पड़ी। कालीन और कीमती दिखावे मुझे घृणास्पद प्रतीत होने लगे और मेरा मानस उस आनंद से परिपूर्ण हो उठा, जिसका अनुभव मैंने पहले कभी नहीं किया।‘‘ इस प्रकार यह युवक धन की माया से दूर मनुष्य की अंतरआत्मा के गहन संसार में डूब गया। प्राचीन वैदिक साहित्य के साथ ही पाश्चात्य दर्शन का भी अघ्ययन किया।
        इसी महर्षि की चौदहवीं कृति संतान के रूप में 7 मई 1861 (बंगाब्द 25 बैसाख 1268) को रवीन्द्रनाथ का जन्म हुआ था। बड़ी बहन ने होनहार बिरवा के चिकनेचिकने पातकी झलक बचपन में ही देख ली थी इसीलिये नहलाने के समय प्राय: कहा करती, मेरा रवि भले ही सावंला हो, बहुत गोरा न हो लेकिन वह अपने तेज से सब पर छा जायेगा। रवीन्द्रनाथ ने अपनी बड़ी बहन की इस भविष्यवाणी को पूरी तरह सच साबित करके दिखाया और न सिर्फ‍ अपने देश बल्कि पूरे विश्व को मानवता की उदात्तता का प्रकाश दिखाया। 
      उनकी मृत्यु पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने लिखा – ‘‘रवीन्द्रनाथ टैगोर की मृत्यु में हमने न केवल इस युग के एक महानतम कवि को खोया है बल्कि एक उत्कृष्ट राष्ट्रभक्त जो एक मानवतावादी भी थे, उन्हें खोया है। शायद ही ऐसा कोई सार्वजनिक कार्य हो जिस पर उनके शक्तिशाली व्यक्तित्व ने छाप न छोड़ी हो। शांतिनिकेतन और श्रीनिकेतन के रूप में उन्होंने सारे राष्ट्र के लिए, वस्तुत: विश्व के लिए एक विरासत छोड़ी है।‘‘
      आज के इस अंधेरे दौर में रवीन्द्रनाथ की उस महान विरासत को याद करके उन्हीं की तरह हम उस अक्षत, अपराजित विश्वास को हासिल कर सकें और कह सके– ‘‘टुक खड़े तो हो जाओ एक बार सिर उठाकर! जिसके भय से तुम डर रहे हो, वह अन्यायी तुम से कहीं अधिक कमजोर है। तुम जागे नहीं कि वह भाग खड़ा होगाजैसे ही तुम उसके सामने तनकर खड़े हुए कि वह राह के कुत्ते की भांति संकोच और त्रास से दुबककर रह जायेगा। देवता उससे विमुख हैकोई नहीं है उसका सहायकवह तो केवल मुंह से ही बड़ीबड़ी बातें हांका करता है; किंतु मन ही मन अपनी हीनता को खूब पहचानता है! अतएव हे कवि ,उठ आओ! यदि तुम्हारे अंदर केवल प्राण ही बाकी हों, तो उन्हें ही साथ लेते आओ–(वही क्या कम है)उन्हें न्यौछावर कर दो। बड़ा दुख है...बड़ी व्यथा हैसामने कष्ट का संसार फैला हुआ है। बड़ा ही दरिद्र हैशून्य हैक्षुद्र है...अंधकार में बद्ध है। उसे अन्न चाहिएप्राण चाहिएआलोक चाहिए, चाहिए मुक्त वायु, बल, स्वास्थ्यआनंदोज्जवल परमायु और चाहिए साहस से चौड़ी छाती। इसी दीनता के बीच, हे कवि, एक बार ले तो आओ स्वर्ग से विश्वास की छवि!‘‘
       रवीन्द्रनाथ का स्वर्ग कोई काल्पनिक इन्द्रलोक नहीं था। वे ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या में विश्वास नहीं करते थे। वे इस पृथ्वी को ही मनुष्य की सबसे सुंदर कृति बनाना चाहते थे। और इसलिये इस पृथ्वी को छोड़कर वैरागी बनकर किसी देवता की शरण में जाकर स्वर्ग को खोजने वालों को कहते हैं, देवता मंदिर में नही है, मनुष्यत्व में है। अपनी एक कहानी में वे कहते है।– ‘‘संसार से वैराग्य लेने वाला एक वैरागी गंभीर रात्रि में बोल उठा : आज मैं इष्टदेव के लिए घर छोड़ दूंगा कौन मुझे भुलाकर यहां बांधे हुए है? देवता ने कहा :मैं‘! उसने नहीं सुना। नींद में डूबे शिशु को छाती से चिपटाकर प्रेयसी शय्या के एक किनारे सो रही थी। वैरागी ने कहा : ऐ माया की छलना, तू कौन है? देवता बोल उठे : मैं‘! किंतु किसी ने नहीं सुना। शय्या पर से उठकर वैरागी ने पुकारा : प्रभो! तुम कहां हो? देवता ने उत्तर दिया : यहां‘! तो भी वैरागी ने नहीं सुना। स्वप्न में माता को शिशु खींच कर रो पड़ा देवता ने कहा : लौट आओ। वैरागी को यह वाणी भी नहीं सुनाई दी। अंत में लंबी सांस लेकर देवता ने कहा – ‘हाय, मेरा भक्त मुझे छोड़कर कहां चला!'
         रवीन्द्रनाथ ने कबीर की तरह बारबार मनुष्य को चेताया कि तुम्हारे देवता देवालयों में नहीं है। उन्होंने इस भले मानुष को समझाते हुए कहा–‘‘अरे ओ भलेमानुष, क्यों तू देवालय का दरवाजा बंद करके उसके कोने में पड़ा हुआ है? अरे, रहने दे अपने इस भजन और पूजन को, ध्यान और आराधना को। अपने मन के अंधेरे में छिपा हुआ तू चुपचाप किसकी पूजा कर रहा है? जरा आंख खोलकर देख तो भला, देवता तेरे घर में नहीं है। वे वहां चले गये हैं, जहां किसान मिट्टी तोड़कर हल जोत रहा है, जहां मजदूर बारह महीने पत्थर काटकर रास्ता तैयार कर रहा है। वे धूप और पानी में सबके साथ हैं। उनके दोनों हाथों में धूल लगी हुई है। भले मानस, तू भी उन्हीं के समान इस पवित्र वस्त्र को फेंककर धूल में उतर जा। रहने दे अपनी घ्यान धारणा, पड़ी रहने दे अपने फूलों की डलिया, फट जाने दे इस शुचिवस्त्र को, लगने दे इस शरीर में धूल और बालू। ऐसा हो कि उनके साथ कर्मयोग में चूर होकर तेरा पसीना चुए।‘‘
      रवीन्द्रनाथ ने जहां कहीं भी मनुष्य और मनुष्यता का अपमान होते हुए देखा फिर चाहे वह सांमतीपूंजीवादीसाम्राज्यवादी शोषण हो, संकीर्ण उग्रराष्ट्रवाद हो, फासीवाद हो, स्वार्थों की आग से धधकता युद्धोन्माद हो, जातिवाद और धार्मिक करता हो, हर किसी का तीखा विरोध किया। साम्राज्यवादी वैश्वीकरण और उसको संचालित करने वाली मुक्त बाजार की इस बर्बर व्यवस्था में जब एक बार फिर सर्वोत्तम की उत्तरजीविता का राग अलापा जा रहा है, उस समय हमें रवीन्द्रनाथ की वाणी याद आती है
     ‘‘जापान को पश्चिम के बाह्य लक्षणों का अनुकरण करने में खतरा नहीं है, बल्कि पश्चिमी राष्ट्रवाद की प्रेरक शक्ति को अपना बना लेने से है। राजनीति के दबाव के आगे उसके सामाजिक आदर्शों के ह्रास के संकेत अभी से दिखने लगे हैं।  विज्ञान से उधार लिया गया आदर्श वाक्य, ‘योग्यत्तम की उत्तरजीवितामुझे उसके आधुनिक इतिहास पर लिखा हुआ साफसाफ दिखाई पड़ रहा है। यह एक ऐसा आदर्श वाक्य है जिसका एक अर्थ यह भी होता है कि अपनी सहायता खुद करो और दूसरों की परवाह मत करो। यह एक ऐसा आदर्श वाक्य है जो उस अंधे आदमी का आदर्श होता है जो केवल उसी चीज में विश्वास करता है जिसे वह छू रहा होता है क्योंकि बाकी को तो वह देख ही नहीं पाता। लेकिन जो लोग देख सकते हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि मानव एकदूसरे से एक सूत्र में पिरोया हुआ है और जब आप दूसरों पर चोट करते हैं तो उसका असर आप पर भी होता है। नैतिक नियम जो मनुष्य का सबसे बड़ा आविष्कार है, वह इस अद्भुत सत्य पर आधारित है कि मानव उतना ही अधिक सच्चा साबित होता है जितना अधिक वह दूसरों में स्वयं को अनुभूत करता है।
     रवीन्द्रनाथ मनुष्य में ही सत्य को देखते थे। ‘‘सत्य ही मनुष्य का प्रकाश है। इस सत्य के विषय में उपनिषद का कहना है : आत्मवत् सर्वभूतेषू य पश्यति स पश्यति। जिन्होंने जीवन मात्र को अपने समान समझा है, उन्होंने ही सत्य को समझा है।"
        इस सत्य की अवहेलना करके ,उसे अपमानित और उपेक्षित करके पूंजी को ब्रह्म और मुनाफे को मोक्ष समझने वालों को धिक्कारते हुए रवीन्द्रनाथ ने कहा था – ‘‘ये तो महास्वार्थ को ही विश्व के सभी देशों का सार्वभौमिक धर्म बनाने पर तुले हुए हैं। हम विज्ञान द्वारा दी गई किसी भी अन्य चीज को स्वीकार करने के लिये तैयार हैं लेकिन हम उसके द्वारा नैतिकता के अमृत को नष्ट होता स्वीकार नहीं कर सकते।"
      लेकिन आज हिंस्र, बर्बर और अराजक हो चुकी आवारा पूंजी मनुष्यता के हर मूल्य को बाजार में बेच रही है। लगभग 150 वर्ष पहले कार्ल मार्क्‍स ने पूंजी के इस भयावह दानवीय रूप के बारे में कहा था –‘‘यदि लाभ समुचित हो तो, पूंजी बहुत साहसी होती है। 10 प्रतिशत निश्चित लाभ उसकी व्यग्रता सुनिश्चित करेगा और 50 प्रतिशत उसकी अति साहसिकता; 100 प्रतिशत लाभ के लिए यह सभी कानूनों को पैरों तले रौंदने को तैयार हो जायेगी; लाभ 300 प्रतिशत हो तो ऐसा कोई अपराध नहीं है जिसे करने में यह हिचकिचायेगी, न कोई ऐसा खतरा है जो यह नहीं उठाएगी, चाहे इसके मालिक के फांसी चढ़ने की ही संभावना क्यों न हो...।"
      खतरों की खिलाड़ी इस चमत्कारी पूंजी ने अपने मुनाफे के लिये पूरी मानवता को खतरे में डाल दिया, एक ओर मुट्ठी भर लोगों के वैभव का सुखी संसार और दूसरी और अभावों और असुरक्षा का दुखी संसार। पूंजी का इतना कुत्सित रूप कि खुद पूंजीवाद के प्रवक्ता शर्मसार हो गये और पूंजी के इस कुत्सित रूप को मानवीच चेहरा देने, विकास के इस एकांगी रूप को समावेशी रूप देने, नैतिकता की राजनीति, और ऐथिक्स आफ इकोनोमी की बातें होने लगी, ताकि किसी तरह इस डूबते हुए जहाज को बचाया जा सके। लेकिन अन्याय, अत्याचार, अमानवीयता से भरा हुआ यह जहाज किनारे लग नहीं सकता। डूबना ही इसकी नियति है।
      एक बार फिर रवीन्द्रनाथ याद आते हैं – ‘‘मानव के इतिहास में आतिशबाजी के कुछ ऐसे युग भी आते हैं, जो अपनी शक्ति व गति से हमें चकित कर देते हैं। ये न केवल हमारे साधारण घरेलू दीपकों की हंसी उड़ाते हैं, बल्कि अनंत नक्षत्रों का भी मजाक उड़ाते हैं। लेकिन इस भड़काऊ दिखावे के आगे हममें अपने दीपकों को निरस्त करने की इच्छा मन में नहीं आनी चाहिए। हमें इस अपमान को धैर्यपूर्वक सहना होगा और यह समझना होगा कि इस आतिशबाजी में आकर्षण तो है पर यह स्थायी नहीं है क्योंकि इसकी अति ज्वलनशीलता ही इसकी शक्ति और अंतत: इसके बुझ जाने का भी कारण होती है। यह किसी लाभ व उत्पादन के बजाय अपनी ऊर्जा तथा क्षार को भारी मात्रा में खर्च करती है।"
      मनुष्य की आत्मा के दीपक को बुझाकर कोई भी सभ्यता जिंदा नहीं रह सकती और रवीन्द्रनाथ मनुष्य की इसी अक्षत, अपराजेय आत्मशक्ति के महान गायक थे। उनकी वाणी आज भी हमें बल प्रदान कर रही है– ‘तुम सबको इस स्वार्थदानव के मंदिर की दीवालें तोड़ देनी होगी, यह नरबली अब नहीं चलेगी। हुक्म मिलते ही तोप के गोले आकर उस मंदिर की दीवालों को तड़ातड़ चूर्ण करने में जुट गये हैं। ...जो लोग आराम में थे, वे आराम को धिक्कार देकर कहने लगे हैंप्राणों से चिपके नहीं रहेंगें, मनुष्य के पास प्राणों से भी बढ़कर कोई और चीज है। आज तोपों के गर्जन में मानव का जयसंगीत बज उठा है।"


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