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सोमवार, 19 सितंबर 2016

मित्रता के मायने

        एक जमाना था जब राजनीति देखकर मित्र बनाया जाता था।मित्रता की राजनीति पर बातें होती थीं,केदारनाथ अग्रवाल और रामविलास शर्मा के बीच का मित्र संवाद जगजाहिर है।

मित्रता में राजनीति की तलाश का दौर क्या अब खत्म हो गया है ?मुझे लगता है अब खत्म हो गया है,अब स्वार्थों की मित्रता रह गयी है।यह उत्तर शीतयुद्धीय मित्रता का दौर है।इसमें मित्रता नहीं स्वार्थ बड़ा है।

सबसे अच्छी मित्रता वह है जो अज्ञात से ज्ञात की ओर ले जाए,लेकिन इन दिनों बीमारी यह है कि मित्रता में हम ज्ञात से ज्ञात की ओर ही जाते हैं।इस क्रम में वर्षों दोस्त रहते हैं लेकिन एक-दूसरे से कुछ नहीं सीखते। इस तरह के मित्र अज्ञात से डरते हैं,अज्ञात सामने आता है तो नाराज हो जाते हैं,बुरा मान जाते हैं।मुक्तिबोध के शब्दों में कहें " यह तो अपनी ही कील पर अपने ही आसपास घूमते रहना है।यह अच्छा नहीं है।इसलिए अज्ञात से डरने की जरूरत नहीं है। "

मुक्तिबोध ने मित्रता की पेचीदगियों के समाधान के रूप में बहुत महत्वपूर्ण समाधान पेश किया है,मैं स्वयं भी मुक्तिबोध के समाधान का कायल रहा हूँ और इसका पालन करता रहा हूँ।

मुक्तिबोध के अनुसार- "हम अपने जीवन को एक-उपन्यास समझ लें,और हमारे जीवन में आनेवाले लोगों को केवल पात्र,तो ज्यादा युक्ति-युक्त होगा और हमारा जीवन भी अधिक रसमय हो जाएगा।"

सवाल यह उठता है मैं आज यह सब क्यों लिख रहा हूँ इसलिए कि आज की जिन्दगी में एक-दूसरे को लेकर जहर बहुत उगला जा रहा है,इस जहर से बचने का एकमात्र रास्ता है मुक्तिबोधीय समाधान।

हमारे जो मित्र साहित्य में सत्य खोज रहे हैं ,सत्य की कसौटी खोज रहे हैं,साहित्य की प्रासंगिकता के सवालों के उत्तर खोज रहे हैं,वे एकायामी नजरिए के शिकार हैं। सत्य की कसौटी साहित्य नहीं ,मनुष्य का जीवन है,उसका अन्तर्जगत है।

साहित्य में सत्य नहीं होता,सत्य का आभास होता है।इसी तरह जो मित्र साहित्य में प्रकाश ही प्रकाश खोज रहे हैं,वे भूल कर रहे हैं,साहित्य का प्रकाश सत्य से भिन्न होता है। इसी प्रसंग में मुक्तिबोध ने एक बहुत ही मार्के की बात कही है, "साहित्य पर आवश्यकता से अधिक भरोसा रखना मूर्खता है।"

मुक्तिबोध के अनुसार "आत्म-साक्षात्कार बहुत आसान है,स्वयं का चरित्र साक्षात्कार अत्यन्त कठिन है।" यहीं पर हमारी मित्रता की अनेक गुत्थियों के सवालों के उत्तर छिपे हैं।

अनेक मित्र मेरी तरह-तरह से आलोचना और विश्लेषण करते हैं,मैं उनकी बातों को आमतौर पर चुप सुन लेता हूँ ,बाद में सोचता हूँ,उसमें कोई बात ऐसी लगे जो मेरी कमजोरियों को सामने लाए तो तत्काल मान भी लेता हूँ।लेकिन मैं किसी भी मित्र के द्वारा किए गए व्यक्तित्व विश्लेषण को अंतिम मानने को तैयार नहीं हूँ।क्योंकि मैंने अपने को लगातार सुधारा है। लेकिन मुझे मुक्तिबोध की ही तरह स्वयं-कृत व्यक्तित्व विश्लेषण अविवेकपूर्ण लगता है।मौजूदा दौर उसी का है।

इस दौर में हमारे मित्र स्वयं-कृत व्यक्तित्व विश्लेषण को बड़ी निष्ठा और दृढ़ आस्था के साथ करते हैं।इस तरह के विश्लेषण को मुक्तिबोध ने अविवेकपूर्ण माना है।

मित्रता के लिए जरूरी है "मैं" भाव को न छोड़ें।अनेक मित्र हैं जो अपने स्वार्थ के लिए मुझे "मैं" भाव से दूर ले जाना चाहते हैं।इसके कारण अविवेकपूर्ण अधिकार भावना का भी प्रदर्शन करते हैं,इससे बचने की सलाह मुक्तिबोध देते हैं।नए दौर में मित्रता का मुहावरा सीखना हो तो मुक्तिबोध से सीखना चाहिए।

मित्रता में जब प्यार नाटकीय रूपों में व्यक्त होने लगे तो समझो मित्रता गयी पानी भरने ! मुक्तिबोध को घिन आती थी ऐसी मित्रता और इस तरह के मित्रों से ! इस तरह की मित्रता घरघोर आत्मबद्ध भाव की शिकार होती है।वह इल्जाजिक पर सवार होकर आती है।इस तरह की मित्रता तथाकथित "हृदय की गाथाओं" से गुजरकर हम तक आती है।इसमें अहंकार कूट-कूटकर भरा है।इसमें खास किस्म का मनोवैज्ञानिक स्वार्थ भी है।

मित्रता का नया पैमाना है आत्मरक्षा और उसके संबंध में अपनी दृढता के भावबोध का प्रदर्शन,मुक्तिबोध इसके गहरे आलोचक थे।

सबसे अच्छी दोस्त होती है माँ! दोस्त बनना है तो माँ जैसा त्याग और निस्वार्थ प्रेम पैदा करो।

सबसे अच्छा दोस्त वह जो एकांत दे!

सबसे अच्छा मित्र वह जो परेशान न करे !





सोमवार, 3 जून 2013

फेसबुक मित्रों का हिप्पोक्रेटिक चरित्र

                 
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फेसबुक यूजर नई समस्याओं के समाधान रामायण,महाभारत, हनुमान चालीसा ,शिवचालीसा आदि में क्यों खोजता हैं ? अतीत के बोझ को त्यागे बिना आधुनिक नहीं बन सकते फेसबुक यूजर.
-2-
फेसबुक यूजर अपनी वर्तमान इमेज के एक अंशमात्र को अभिव्यक्त करता है। वह अपना अतीत छिपाता है। सच बोलने से कतराता है ,फलतःजो मित्रता बनती है वह खोखली होती है। यह माउस मित्रता है या मूषक मित्रता है।
-3-
फेसबुक में एनीमि यानी शत्रु की केटेगरी नहीं है, फलतः यही लगता है कि यह मीडियम शत्रुरहित है लेकिन अजातशत्रु युधिष्ठिर का हश्र हम देख चुके हैं उनका कोई शत्रु नहीं था लेकिन घर में 100 कौरव शत्रु निकले, क्या आप शत्रुओं से घिरे हैं ?
-4-
फेसबुक में लाइक है ,डिसलाइक नहीं है। मित्रता के लिए मित्र की कठोर बात को भूलने की जरूरत होती है ,संभवतः इसी कारण डिसलाइक का विकल्प नहीं है।
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फेसबुक पर नकली उदारता के जरिए मित्रगण मित्रता का दावा करते हैं। इस मित्रता में कोई सामाजिक बंधन और जिम्मेदारी नहीं है।
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फेसबुक पर नकली उदारता का प्रदर्शन अंततः हिप्पोक्रेसी है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो नकली उदारता की बाढ़ का प्रत्येक वॉल पर सहज ही प्रदर्शन देख सकते हैं। नकली उदारता को बुद्धिमत्तापूर्ण अभिव्यक्ति समझनेकी भूल न करें।
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फेसबुक पर हिप्पोक्रेसी वही करते हैं जो आमजीवन में भी हिप्पोक्रेट हैं। हिप्पोक्रेट बड़े महत्वाकांक्षी होते हैं। लेकिन फेसबुक तो महत्वाकांक्षाओं का अन्त है।
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कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए हिप्पोक्रेसी का निषेध हर स्तर पर किया जाना चाहिए। जो कलात्मक अभिव्यक्ति में अक्षम हैं वे ही नकली अस्मिता का इस्तेमाल करते हैं। हमें इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि फेसबुक आने के बाद हिप्पोक्रेसी बढ़ी है या घटी है ? जो लोग सामने मिलने पर अच्छे से बात नहीं करते वे फेसबुक पर भद्रभाव से बातें करते हैं, यह नकली कम्युनिकेशन का आदर्श प्रमाण है।
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फेसबुक में जो नकली नाम से सक्रिय है वे मूलतःवे लोग हैं जिनका स्वयं के प्रति कोई श्रद्धा और सम्मान नहीं है। नकली लोग और नकली नाम अंततः हिप्पोक्रेसी का वातावरण बनाते हैं और यह कु-कम्युनिकेशन की कोटि में आता है।
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फेसबुक में नकली नामों का जमघट है यह फेसबुक यूजर की हिप्पोक्रेसी है और हिप्पोक्रेट समाज नहीं बदल सकते।
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हिप्पोक्रेसी के कारण शब्द और अर्थ व्यक्ति के विचार और कर्म के बीच फांक नजर आती है। इस दरार को फेसबुक ने और भी चौड़ा किया है।
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फेसबुक यूजर को कलाकार-लेखक की कोटि में नहीं रख सकते। इसका प्रधान कारण है लेखक-कलाकार को कम्युनिकेशन में अंततःसफलता मिलती है लेकिन फेसबुक में कम्युनिकेशन के कु-कम्युनिकेशन में रूपान्तरित होने का खतरा हमेशा बना रहता है।पता नहीं आपकी लिखी पंक्तियां किसे कष्ट दे रही हो ? या कौन गलत ढ़ंग से पढ़ रहा हो ?
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फेसबुक पर हिप्पोक्रेसी खूब दिखती है। हिप्पोक्रेसी के कारण ही मित्रगण कुछ भी वायदा करते हैं, क्योंकि वायदा करने में कोई क्षति नहीं है।
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नया कम्युनिकेशन युग मनुष्य की संप्रेषण क्षमताओं का विस्तार है। साथ ही कम्युनिकेशन तकनीकी मनुष्य की संवेदनशीलता का विस्तार है।
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इंटरनेट कम्युनिकेशन के विभिन्न रूपों के आने के साथ ही प्राइवेसी का नया पैराडाइम सामने आया है।
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फेसबुक में सवारी कोई नहीं सब ड्राइवर हैं।
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फेसबुक वस्तुतः ऑटोमेशन युग का कम्युनिकेशन है इसमें जब भी आप कम्युनिकेट करेंगे अपने आप कम्युनिकेट करना होगा। आप क्या हैं और किस तरह कम्युनिकेट करना चाहते हैं यह निजी तौर पर खोज करनी पड़ेगी।

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