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बुधवार, 23 जून 2010

बर्बर पूंजीवाद का मॉडल है रूस- चीन का


         सोवियत संघ और चीन का समाजवाद से पूंजीवाद में रूपान्तरण हो चुका है। आज रूस और चीन बदल गए हैं। वे वैसे नहीं है जैसे समाजवाद के जमाने में थे। सामाजिक जीवन में पहले की तुलना में असुरक्षा बढ़ी है।
      पहले राजसत्ता से मानवाधिकारों को खतरा था आज लुंपनों ,कारपोरेट घरानों और पार्टी तंत्र से खतरा है। दोनों ही देशों में साधारण आदमी के कष्ट बढ़े हैं। चीन में सरकारीतंत्र के अंग के रूप में पार्टी सदस्य उत्पीड़न कर रहे हैं,सोवियत संघ में अपराधी गिरोहों में बड़ी संख्या में पार्टी सदस्यों ने रूपान्तरण कर लिया है।
     रूसी देशों में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों का बड़ा हिस्सा पृथकतावादी, फंडामेंटलिस्ट,फासिस्ट और माफिया कामों में लग गया है। कम्युनिस्ट पार्टी सदस्यों का इस कदर पतन इस बात का संकेत है कि समाजवाद के दौर में सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी किस कदर सड़ चुकी थी और उसे दुनिया नहीं जानती थी। इस पहलू की ओर कभी भारत के कम्युनिस्टों ने भी ध्यान नहीं दिया। वे लगातार सोवियत संघ जाते थे लेकिन सोवियत संघ के सच को कभी नहीं बताते थे। वे भोंपू की तरह सोवियत प्रचार करते थे।
         सोवियत संघ में समाजवाद के जमाने में साधारण आदमी भौतिक तौर पर निश्चिंत था लेकिन राजनीतिक तौर पर आत्मनिर्भर और स्वतंत्र नहीं था। आज कहने को राजनीतिक तौर पर स्वतंत्र है लेकिन स्वतंत्रता का भोग करने की उसके पास क्षमता नहीं है।
         भू.पू.सोवियत संघ के देशों में भौतिक दुरावस्था ने राजनीतिक स्वतंत्रता को दिवास्वप्न बना दिया है। इसी अर्थ में पूंजीवाद में स्वतंत्रता नहीं होती। पूंजीवाद में स्वतंत्रता का आनंद वे ही ले सकते हैं जो सक्षम हैं। अक्षम लोगों के लिए पूजीवादी स्वतंत्रताओं की कोई प्रासंगिकता नहीं है। आयरनी यह है कि समाजवाद में सोवियत नागरिकों के पास मानवाधिकार नहीं थे ,समाजवाद के पराभव के बाद भी नहीं हैं बल्कि कुछ मामलों में समाजवाद से भी बदतर अवस्था है।
       समाजवाद से पूंजीवाद में रूपान्तरण का एक निष्कर्ष यह है कि जो देश समाजवाद से पूंजीवाद के मार्ग पर आ रहे हैं वे अपने यहां मानवाधिकारों का विकास नहीं कर पाए हैं। यही स्थिति चीन की है। साम्यवादियों के लिए समाजवाद से पूंजीवाद में व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ सिर्फ उत्पादन का स्वामित्व बदलना है । मूल्यबोध और राजनीतिक संरचनाएं बदलना नहीं है।
     साम्यवाद की जगह सिर्फ पूंजीवादी उत्पादन संबंधों का आना और पूंजीवादी मूल्यों के अनुरूप संरचनात्मक और कानूनी व्यवस्थाओ का न आना बर्बर पूंजीवाद को जन्म दे रहा है। यह ऐसा पूंजीवाद है जिसके पास लूट और अनियंत्रित शोषण का तो अधिकार है लेकिन इसकी किसी के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है। रूस और चीन में पूंजीवाद के प्रयोगों की यह धुरी है। राज्य खुलेआम अविवेकपूर्ण ढ़ंग से इन देशों में पूंजीपतिवर्ग के साथ है।
       पूंजीपतिवर्ग का नंगी गुलामी का आदर्श देश हैं चीन और रूस। मसलन् सामान्य तौर पर विकसित पूंजीवादी मुल्कों और अनेक तीसरी दुनिया के देशों में मजदूरों को जितने अधिकार प्राप्त हैं उतने भी अधिकार इन देशों में मजदूरों को प्राप्त नहीं हैं। मजदूर विरोधी ये सारे काम वे लोग कर रहे हैं जो कम्युनिस्ट हैं या थे।
    मजदूर विरोधी मामलों में रूसी भू.पू.कम्युनिस्ट और चीनी मौजूदा कम्युनिस्ट एक ही थाली में मलाई खा रहे हैं। कहने का तात्पर्य कि इन देशों में पूंजीवाद का विकास नहीं हो रहा बल्कि बर्बर पूंजीवाद का विकास हो रहा है। वहां जनता अधिकारहीन है। मानवाधिकारों को लागू नहीं किया गया है और इस हरकत के लिए तरह-तरह के तर्क गढ़ लिए गए हैं। उनमें साझा तर्क यह है कि पश्चिम की तर्ज का लोकतंत्र चीन और रूस के लिए अप्रासंगिक है। मजेदार बात यह है कि पश्चिमी पूंजीवादी उत्पादन, जीवनशैली, खाक-पान,घर-द्वार,मुनाफा,बैंकिंग व्यवस्था,मासकल्चर आदि सब कुछ स्वीकार्य है सिर्फ लोकतंत्र नहीं,लोकतांत्रिक अधिकार नहीं,लोकतांत्रिक जिम्मेदारियां नहीं।
    समाजवाद से पूंजीवाद में आने का एक परिणाम यह निकला है कि आम जीवन में सामूहिकीकरण और व्यक्तिगत प्रयासों में क्या और कितना अच्छा है इस पर बहस छिड़ गयी है। पहले लोग व्यक्तिगत को बेहतर मानते थे और सामूहिकीकरण का विरोध कर रहे थे। आज 25 साल के व्यक्तिगत तजुर्बों ने सबकी नींद उडा दी है। व्यक्तिगत संपत्ति पाने, पैदा करने और उसके आधार पर तरक्की करने की मानसिकता को गहरा झटका लगा है, इसके बावजूद एक बड़ा समुदाय है जो सामूहिकीकरण का विरोध कर रहा है।
     रूस में पहले अधिकांश जनता राज्य के संरक्षण में आर्थिक तौर पर सुरक्षित थी आज ऐसा नहीं है आज अधिकांश जनता बेहतर अवस्था में नहीं है। एक हिस्सा है जो खुशहाल है। भ्रष्टाचार चारों ओर फैला हुआ है। राज्य की नीतियों में जनता के हितों की रक्षा का जितना दावा किया जाए स्थिति वास्तव में अच्छी नहीं है।
     रूस में अब तक कोई स्पष्ट औद्योगिक नीति नहीं है। इसके चलते पूंजी निवेश के मामले में मनमानापन देखा जा रहा है। रूसी पूंजीपति और राज्य यह जानते ही नहीं हैं कि पूंजीवाद कैसे सामाजिक आर्थिक हितों के विस्तार का काम कर सकता है। नीति के अभाव के कारण ही एल्यूमीनियम टायकून ओलिग देरीपास्का को ऑटोमोबाइल प्लांट लगाने की अनुमति नहीं दी गयी। एक अन्य पूंजीपति ने उल्यानेवस्क का ऑटोमोबाइल प्लांट खरीदा लेकिन वह असफल रहा। ऐसी ही कहानी और भी पूंजीपतियों की है। रूस का पूंजीवाद चंदधनियों को महाधनी बनाने और उनके आर्थिक हितों के विस्तार तक ही सीमित है। अधिसंख्य जनता उसके केन्द्र में नहीं है।
   मास्को विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और अर्थशास्त्री स्तीनिस्लेव मेनशिकोव ने ‘प्रावदा’ अखबार को दिए साक्षात्कार में रूसी अर्थव्यवस्था और पूंजीपतिवर्ग की प्रकृति को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं । उन्होंने कहा है  रूस में कर वसूली किसी भी पूंजीवादी मुल्क से ज्यादा होती है। जबकि रूस में कामगारों की पगार ऊँची नहीं है। बड़े पूंजीवादी मुल्कों की तुलना में रूस में 60 प्रतिशत ज्यादा कर वसूली होती है। यह तब है जब रूस के पूंजीपति बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी करते हैं।
    रूस में सकल घरेलू उत्पाद का पगार पर 27प्रतिशत खर्च होता है वहीं अमेरिका में सकल घरेलू उत्पाद का पगार पर 60 प्रतिशत हिस्सा खर्च किया जाता है। अमेरिकी पूंजीपति अपने कामगार के रहन-सहन और जीवनशैली का ख्याल करते हुए पगार देता है इसके विपरीत रूसी पूंजीपतिवर्ग अपने कामगारों की बदहाल जिंदगी को बेहतर बनाने के लिहाज से पगार नहीं देता। जिस तरह गुंडे अपने मातहत गुंडों को जीनेभर लायक पैसा देते हैं वैसे ही रूसी पूंजीपति अपने मजदूरों को जीनेभर लायक पैसा देता है।
    रूस के पूंजीपति को कुछ महत्वपूर्ण संस्कार साम्यवाद से मिले हैं। इनमें झूठ बोलने और अपारदर्शिता का संस्कार उसे साम्यवाद से मिला है। रूसी पूंजीपति और अभिजात्यवर्ग अपनी आय छिपाता है। बेईमान का यह संस्कार उसे पश्चिमी पूंजीपतिवर्ग से मिला है।
    रूसी पूंजीपतिवर्ग का काम करने का तरीका सब कुछ हडपो। वह सारे लाभ स्वयं खा जाना चाहता है वह नहीं चाहता कि अन्य को लाभ मिले। रूसी सरकार की गरीब और अमीर को लेकर अलग नीति और नजरिया नहीं है। सरकार आम जनता के विकास के लिए पूंजीपतिवर्ग से सरप्लस हासिल करने में असफल रही है। इसके कारण सरकार के पास अर्थव्यवस्था को विकसित करने के लिए पैसा ही नहीं है। सारा सरप्लस पूंजीपतियों के हाथों में चला गया है। इससे चंद वर्षों में ही अमीर और गरीब का विशाल अंतर पैदा हो गया है।  
      रूस के राष्ट्रपति के आर्थिक सलाहकार अरकादी दरकोविच ने कहा है कि रूस में सबसे बड़ी चुनौती है भ्रष्टाचार ,कारोबार का घटिया वातावरण,नए काम करने वालों के लिए कम से कम मौके और लाभ। ये कुछ चीजें हैं जो हमें नुकसान पहुँचा रहे हैं।
    अगले पांच सालों में सेना,पुलिस और नौकरशाही में आठ लाख से ज्यादा लोगों की छंटनी की जाएगी, यह सब किया जाएगा अर्थव्यवस्था को दुरूस्त बनाने के नाम पर। इसके इलावा पुलिस से तीन लाख लोगों की छंटनी की जाएगी। लगता है इससे रूस में अव्यवस्था फैलेगी। पामाली बढ़ेगी।   

मंगलवार, 22 जून 2010

रूस में भूमंडलीकरण का टूटता तिलिस्म

         हिन्दी में कहावत है जो दूसरो के लिए गड़डा खोदता है उसे उसी गड्डे में सोना होता है। दूसरों के लिए यानी मार्क्सवादियों -साम्यवादियों के लिए भूमंडलीकरण का गड्डा अमेरिका द्वारा खोदा गया था । अंत में अमेरिका और उसके सहयोगी राष्ट्रों को उसमें सोना पड़ा है। आर्थिकमंदी ,युद्ध-अर्थव्यवस्था और वर्चस्व बनाए रखने के कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाह हो चुकी है ।
      सोवियत नेतृत्व की सबसे बड़ी असफलता यह थी कि वह अपनी पार्टी की सांगठनिक बर्बरता और भेदभावपूर्ण नीतियों के प्रति सतर्क नहीं हो पाया। उनसे दूसरी गलती यह हुई कि वे शीतयुद्ध और ग्लोबलाइजेशन के अंतस्संबंध को समझने और तदनुरूप नीतियों ,अर्थव्यवस्था और पार्टी की कार्यशैली में परिवर्तन करने में असमर्थ रहा।
       भूमंडलीकरण के कारण सोवियत संघ के सभी गणराज्यों ने जबर्दस्त क्षति उठायी है। आज पुराना सोवियत संघ नहीं है उसकी जगह 11 नए देश आ गए हैं। इनमें सबसे समर्थ और बड़ा देश है रूस। रूस की अर्थव्यवस्था में हाल के वर्षों में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन आए हैं।
     अप्रैल 2010 में रूस के प्रधानमंत्री व्लादीमीर पुतिन ने रूस की संसद को बताया कि उनका देश मंदी से बाहर निकल आया है। अब हमारा लक्ष्य है स्वास्थ्य सुधारों को लागू करना। नीतिगत कौशल के कारण रूस की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त होने से बचा लिया गया है। सन् 1998 में रूस की अर्थव्यवस्था को करारा झटका लगा था। मंदी के कारण अनेक देशों में पेंशन और भत्ते बंद कर दिए गए ,लेकिन रूस में ऐसा नहीं करना पड़ा। इसके विपरीत रूस के बजट खर्च में 27.3 प्रतिशत की वृद्घि हुई है। पगार,पेंशन और सामाजिक भत्तों में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
    उल्लेखनीय है यह वह दोर है जिसमें अमेरिका में  बेकारी बढ़ी है,सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में कटौती हुई है। सैंकड़ों बैंक दिवालिया हुई हैं। अनेक नामी कंपनिया दिवालिया हुई हैं। अमेरिका में भूमंडलीकरण के कारण सबसे ज्यादा आर्थिक अराजकता देखने में आयी है।
       अमेरिका में  आम आदमी की आय में गिरावट आयी है इसके विपरीत रूस में 2008-09 और 2009-10 में आय में 2.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। कंपनियों के द्वारा सामाजिक सुरक्षा मद में दिए जाने वाले धन की राशि 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 34 प्रतिशत कर दी गयी है। इस पैसे से स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार पर ध्यान दिया जाएगा। पेंशन में 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गयी है। सैनिकों और माताओं के लिए अतिरिक्त धन का आवंटन किया गया है। बैंकों ने आम लोगों के लिए कर्ज देने शुरू कर दिए हैं।
    रूस की आर्थिक तरक्की का सबसे बड़ा संकेत है वहां पर गरीबी की रेखा के नीचे जीने वालों के आर्थिक स्तर में आया सुधार। सन् 1998-2009 के आंकड़े बताते हैं कि रूस में गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों की संख्या 33 प्रतिशत से घटकर मात्र 3 प्रतिशत रह गयी है। यह सर्वे इंटरनेशनल मानीटरिंग ऑफ इकोनोमिक कंडीशंस इन रशिया ने   
 किया था।
     गरीबी की रेखा के नीचे जीने वालों की संख्या में आए सुधार का सबसे ज्यादा लाभ बच्चों और बूढ़ों को मिला है। अतिगरीबी में जीने वाले बच्चों की संख्या सन् 2008 में 3.1 प्रतिशत थी जो सन् 2009 में घटकर 1.4 प्रतिशत रह गयी है। इसी तरह बूढ़ों की अतिगरीबी में 2.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
    उल्लेखनीय है रूस में पैरेस्त्रोइका लागू किए जाने के पहले आर्थिक हालात इतने खराब नहीं थे। कम्युनिस्ट पार्टी का शासन खत्म होते ही पूरे सोवियत संघ में सरकारी संपत्ति की देशी-विदेशी लोगों के द्वारा जमकर लूट की गयी ,पूरी अर्थव्यवस्था अराजक और लुटेरे कारपोरेट पूंजीपतियों के हाथों में फंस गयी,सामाजिक-आर्थिक तानाबाना ठूट गया। खासकर युवाओं को निशाना बनाया गया उन्हें पूंजीवादी मूल्यों में ढुबो दिया गया,सारे समाज में अपराध और नशे की लत ने कब्जा जमा लिया। कोई सोच नहीं सकता कि जिस देश में कभी कोई पूंजीवादी संस्कारों का प्रचार नहीं किया गया हो वहां अचानक युवाओं पर सांस्कृतिक विपत्ति का पहाड़ कैसे टूट पड़ा ?
       सारा देश सरकार के भरोसे सुरक्षित नींद सोता था, किसी के पास अभाव नहीं था,उस समाज में अचानक समाजवाद से मुक्ति के बहाने इतनी बड़ी मुसीबत आ जाएगी, ऐसा किसी ने भी नहीं सोचा था। सोवियत संघ में समाजवादी व्यवस्था का गिरना असामान्य घटना थी, इसका सारी दुनिया पर बुरा असर पड़ा,सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था तो पूरी तरह तबाह हो गयी। इससे विश्व का आर्थिक संतुलन भी गड़बड़ा गया। पूंजीवाद निरंकुश होकर सारी दुनिया में लूट मचाने लगा। खासकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने विगत 25 सालों में जितनी लूट की है। उतनी लूट मानव सभ्यता के इतिहास में कभी नहीं हुई है। मानव इतिहास क समस्त लुटेरे शासकों की लूट से सैंकड़ो गुना ज्यादा थन की लूट बहुराष्ट्रीय कंरनियों ने विगत 25 सालों में की है। इस लूट को वैध बनाने के लिए भूमंडलीकरण,नव्य-उदारवाद ,विश्व व्यापार संगठन आदि का निर्माण किया गया।


उत्तर मार्क्सवाद श्रृंखला- भूलों के आंगन के पार मार्क्सवाद

           एक जमाना था भारत में कहावत थी कि मास्को में सर्दी पड़ती है तो कॉमरेड को दिल्ली में जुकाम होता है। भारत में सोवियत संघ के गुणगान गाने वालों की समाजवाद के जमाने या सोवियत जमाने में कमी नहीं थी। जब से समाजवादी व्यवस्था गिरी और सोवियत संघ का विघटन हुआ ,तब से भारत और खासकर हिन्दी के सोवियत भक्तों का दूर-दूर तक पता नहीं है।
     विगत 20 सालों में मैंने किसी भी हिन्दी के सोवियत भक्त का सोवियतों ,सोवियत समाजवाद और सोवियत जनता के बारे में कुछ भी लिखा हुआ नहीं देखा है। बेरुखी का आलम यह है कि कम्युनिस्ट पार्टियों के प्रकाशनों में पुराने सोवियत की ताजा खबरें अब नजर नहीं आतीं।
      एक जमाना था भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सलाह लेने सोवियत संघ जाया करते थे। पार्टी कक्षाओं में बढ़-चढ़कर अपनी सोवियत भक्ति का प्रदर्शन किया करते थे। अब ये लोग किसी भी तरह अपनी सोवियत भक्ति का प्रदर्शन नहीं करते।
     ऐसा क्या हुआ है कि भू.पू.सोवियत संघ के बारे में प्रगतिशीलों ने दिलचस्पी ही लेनी बंद कर दी ? भू.पू.सोवियत में सब कुछ पुराना बाकी है। सिर्फ समाजवाद बदला है। देश का अनेक देशों में रूपान्तरण हुआ है। कम्युनिस्ट पार्टी हाशिए पर चली गयी है।
     किसी भी देश में समाजवाद रहे या पूंजीवाद रहे यह फैसला वहां की जनता करेगी। उस देश के राजनीतिक दल करेंगे। हमारे प्रगतिशीलों की सोवियतों में दिलचस्पी इस परिवर्तन के कारण कैसे खत्म हो सकती है ?
     सवाल उठता है कि सोवियतों के प्रति,सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति हमारे सोवियत भक्तों का प्रेम क्या समाजवाद के कारण था ? क्या हमारे सोवियत भक्तों का सोवियत जनता,सभ्यता,संस्कृति आदि से कोई प्रेम नहीं था ? यदि था तो जब सोवियत संघ इतने व्यापक परिवर्तनों से गुजर रहा था तो इस दौरान हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों ने इन परिवर्तनों और विगत 20-25 साल में घट रही घटनाओं पर हिन्दी के पाठकों को जानकारी देने की कोई कोशिश क्यों नहीं की ? क्या भू.पू.सोवियत संघ से हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों का सिर्फ मलाई खाने का संबंध था ? सोवियत संघ से मलाई मिलनी बंद हो गयी तो उन्होंने सोवियतों के बारे में बताना ही बंद कर दिया।
    आश्चर्य है कि भू.पू. सोवियत देश अभी भी मौजूद हैं। रूस आज भी दुनिया की महान शक्तियों में से एक है। महान रूसी जनता व्यवस्था परिवर्तन के चक्रव्यूह को भेदते हुए शानदार ढ़ंग से उन्नति के मार्ग पर आगे जा रही है।
     भूमंडलीकरण की पहली चोट सोवियत समाजवादी समूह के देशों पर हुई थी। सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी अपने आंतरिक क्रिया-कलापों के कारण बिखर गयी। चूंकि पार्टी ने अपने विस्तार के क्रम में सारे सोवियत संघ की जनता को अपना बना लिया था ,अन्य कोई राजनीतिक दल वहां पर नहीं  था। पार्टी ही देश का पर्याय थी। फलतः जब पार्टी टूटी तो देश भी टूटा।
    सोवियत समाजवादी मॉडल की विशेषता थी पार्टी ,जनता और राष्ट्र का एकीकरण। इस एकीकरण की धुरी थी पार्टी । कमोबेश यही मॉडल सारी दुनिया में आदर्श के रूप में प्रचारित किया गया। चीन,यूगोस्लाविया,चैकोस्लोवाकिया,पोलैण्ड, हंगरी, पूर्वी जर्मनी, क्यूबा, कम्बोडिया,उत्तरी कोरिया आदि में यही मॉडल लागू किया गया।
      सोवियत संघ में समाजवाद के पराभव की जड़ में समाजवाद कम और समाजवादी सोवियत मॉडल ज्यादा जिम्मेदार था। पार्टी,जनता और देश के एकीकरण के खिलाफ प्रतिवाद के स्वर पोलैण्ड में पहले सुनाई दिए और कम्युनिस्ट पार्टी धराशायी हुई।
     पार्टी,जनता और राष्ट्र के एकीकरण पर टिका समाजवाद किस कदर ताकत अर्जित कर लेता है इसका शानदार प्रयोग पश्चिम बंगाल में माकपा ने करके दिखाया है और उसमें रूसी-चीनी मॉडल की विशेषताओ के साथ भारतीय विशेषता के रूप में लोकतंत्र को शामिल कर लिया है। पश्चिम बंगाल के समाजवादी मॉडल में लोकतंत्र निर्णायक नहीं है निर्णायक है पार्टी संगठन। पार्टी संगठन का तानाबाना टूटने के साथ ही सोवियत संघ में परिवर्तन आए और 11 स्वतंत्र देशों का उदय हुआ। पुराने सोवियत संघ का विघटन हुआ।
     सोवियत संघ का विघटन किसी साजिश का परिणाम नहीं था। बल्कि पार्टी,जनता और राष्ट्र के बीच में जो एकीकरण हुआ था उसकी त्रासद परिणति थी। किसी भी देश में पार्टी,जनता और राष्ट्र का एकीकरण इसी तरह के त्रासद मार्ग से गुजरेगा। पार्टी के नाम पर देश या प्रांत को बांधना अवैज्ञानिक है। आप जोर-जबर्दस्ती करके कुछ समय तक तो बांधे ऱख सकते हैं लेकिन अनंतकाल तक नहीं।
     राष्ट्र और जनता को दल विशेष या विचारधारा विशेष में बांधना और सबको एक ही दिशा में सोचने के लिए बाध्य करना अवैज्ञानिक है,तानाशाही है और सामाजिक वैविध्य का अस्वीकार है। समाजवाद के इस सोवियत मॉडल से साम्यवादियों ने ही प्रेरणा नहीं ली, बल्कि फासीवादियों और फंडामेंलिस्टों को भी यह मॉडल पसंद है। वे भी एक पार्टी और एक ही विचारधारा के खूंटे से देश विशेष की जनता को बांधना चाहते हैं। यह एक तरह से जनता को नपुंसक बनाने, गुलाम बनाने और उसके मानवाधिकारों को छीनने की कोशिश है। यह उदारतावादी विचारधाराओं का अस्वीकार है।
     सवाल यह है कि मार्क्सवाद का पूंजीवादी उदारतावाद के साथ किस रूप में संवाद बनता है ? राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक वैविध्य को स्वीकार करते हुए मार्क्सवाद का कैसे विकास किया जाए ? अन्य विचारधाराओं और गैर सर्वहारा वर्गों के प्रति सदभाव बनाए रखकर मार्क्सवाद को कैसे लागू किया जाए यही वह चुनौती है जिसे सोवियत मॉडल बनाने वाले समझने में असमर्थ रहे। उनकी .ही असमर्थता एक दिन उन्हें देश-विभाजन और समाजवाद के विसर्जन तक ले गयी।   
   
        




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