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शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

नयी किताब ' इतिहास के पक्ष में' से -उत्तर आधुनिकतावादी कहां से आते हैं- प्रसिद्ध मार्क्सँवादी आलोचक टेरी इगिल्टन-2-समापन किश्त

एक जटिल समग्रता को समझने के लिए कुछ कठिन विश्लेषण की आवश्यकता है। इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं है कि इस प्रकार के श्रमसाध्य सुव्यवस्थित विचार प्रचलन में नहीं हो। जिस प्रकार के युग की हम कल्पना कर रहे हैं उसमें उसे लैंगिक विज्ञानपरक या तुम्हारे पास क्या है, कहकर खारिज कर दिया जाता हो। जब इस व्यवस्था में कुछ ऐसा खास नहीं जिससे आपको यह पता चले कि आप इसमें कहां हैं तो आप अस्पष्ट, भ्रमित और अनिश्चित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप इथाका या इरवाइन में प्रोफेसर हैं तो इस व्यवस्था में आपका क्या स्थान है। इन परिस्थितियों में बहुत संभव है कि आप आदर्शवादी बन जाएं, यद्यपि उपयुक्त रूप से कुछ नए अर्थों में, न कि घिसे-पिटे पुराने अर्थ में। एक प्रमुख जरिया जिससे हम दुनिया को जानते समझते हैं वह वैचारिक प्रयोग है और यदि किसी महत्वाकांक्षी प्रयोग से हमें वंचित कर दिया जाए तो हमें शीघ्र ही यह अहसास हो जाएगा कि क्या वाकई वहां कुछ है भी या नहीं। ऐसे युग में तब कोई यह उम्मीद करेगा कि उसके इस विश्वास कि यथार्थ एक ऐसी चीज है जो हमारा प्रतिरोध करती है, (जैसा कि फ्रेडरिक जेमसन ने कहा है कि इतिहास वह है जो दुख देता है) इसका स्थान यह विश्वास ले लेगा कि दुनिया की संरचित (कंस्ट्रक्टेड) प्रकृति है। प्रकारांतर से यह विचार निस्संदेह उस ओजपूर्ण ‘संस्कृतिवाद’ के साथ चलेगा जो भौतिक मानवीय जीवों के रूप में पुरुषों और महिलाओं में उभयनिष्ठ है, उसे कम महत्व देता था तथा प्रकृति के बारे में सभी व्याख्या को कपटपूर्ण रहस्यवाद मानता था। इसमें यह अनुभव करने की प्रवृत्ति नहीं होगी कि इस प्रकार का सांस्कृतिवाद उतना ही लघुकारक है जितना कि अर्थवाद या जीवविज्ञानवाद है। मानव चेतना के संज्ञानात्मक तथा वास्तविक विश्लेषण से विभिन्न प्रकार के अर्थक्रियावाद तथा सापेक्षवाद का मार्ग प्रशस्त होगा। आंशिक रूप से इसलिए कि अब यह जानने में राजनीतिक रूप से कुछ दांव पर नहीं प्रतीत होता कि इसकी आपके साथ क्या स्थिति थी। स्वयं उस कथन सहित सब कुछ एक भाष्य हो जाएगा। और जो उपयुक्त रूप से निश्चित ज्ञान के साथ धीरे-धीरे अंत:स्फुटित होगा। वह एक केंद्रित ‘मानव’ विषयी का प्रत्यय होगा जो महत्वपूर्ण कार्रवाई के लिए पर्याप्त रूप से एकीकृत होगा। प्रतीत होता है इस प्रकार की महत्वपूर्ण कार्रवाई अब कम ही होगी और एक बार फिर परिणाम वही असंगठित, विकेंद्रित, खंडित मानसिकता वाले मानव विषयी का गुणगान करते हुए, मजबूरी में इन्हें महत्वपूर्ण बताना होगा। यह मानव विषय इतना संगठित नहीं होगा कि यह दीवार पर रखी बोतल नीचे गिरा सके, सत्ता को गिराने की तो बात बहुत दूर है। लेकिन फिर भी इन्हें पूंजीवाद के अपेक्षाकृत पुराशास्त्रीय दौर में आराम से पड़े पुराने केंद्रित विषयों की तुलना में लोमहर्षक सूत्रधार के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, उत्पादक (सुस्पष्ट, अनुशासित, स्वयं निर्धारण करने वाला) के रूप में व्यक्ति ने उपभोक्ता (गतिशील, परिवर्तनशील, अपूर्ण इच्छाओं से बना) के रूप में व्यक्ति के लिए मार्ग प्रशस्त किया होगा। 

यदि ऐसे युग की 'वाम' रूढ़ियां अर्थक्रियावादी, सापेक्षवादी, बहुलवादी, विरचनावादी होती तो कोई इन विचारों को खतरनाक रूप से रैडिकल मान सकता था। क्योंकि क्या पूंजीवाद को जीवित रहने के लिए सुनिश्चित बुनियादों, स्थायी अस्मिताओं, निरपेक्ष सत्ता, पराभौतिक निश्चितताओं की आवश्यकता नहीं? और क्या जिस प्रकार के विचार की हम कल्पना कर रहे हैं, वह इन सबके नीचे टेक नहीं लगा देगी? इसका उत्तर बहुत क्षीण स्वर में हां और नहीं दोनों है। यह सच है कि पूंजीवाद ने अभी तक अपनी सत्ता को अनिंद्य नैतिक आधार से जोड़े रखने की आवश्यकता को महसूस किया है। उदाहरण के लिए उत्तरी अमरीका में धार्मिक मत में उल्लेखनीय रूप में अटूट विश्वास को देखें।

दूसरी ओर ब्रिटेनवासियों को देखें जो कि उल्लेखनीय रूप से ईश्वरहीन लोग हैं। अगर कोई ब्रिटिश राजनेता सार्वजनिक रूप से परम पिता परमेश्वर का आह्वान करे तो उसके लिए इससे बड़ी किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति होगी और कुछ भी नहीं। ब्रिटेनवासी पराभौतिक अमूर्त प्रत्ययों जैसे ब्रिटेन के बारे में बहुत कम बातें करते हैं जबकि अमरीका में रहने वाले संयुक्त राज्य जैसे अमूर्त भाव के बारे में उनकी तुलना में अधिक चर्चा करते हैं। दूसरे शब्दों में, यह स्पष्ट नहीं है कि दरअसल उन्नत पूंजीवादी तंत्र को कितनी पराभौतिक बातें करने की आवश्यकता है और यह निश्चित रूप से सच है कि इसकी निर्मम धर्मनिरपेक्षता तथा वैज्ञानिक पुनर्गठन की कार्रवाइयां इसके आध्यात्मिक दावों का खंडन करने का डर पैदा करती हैं। बहरहाल यह स्पष्ट है कि अर्थक्रियावाद तथा बहुलता के बिना व्यवस्था बिलकुल जीवित नहीं रह सकती। अंतर, 'संकरता', विषमांगता, निरंतर गतिशीलता पूंजीवादी उत्पादन की रीति के लिए मौलिक है और इसलिए यह कभी भी रैडिकल परिघटना नहीं है। अत: यदि इस प्रकार के विचार व्यवस्था के एक स्तर पर टेक लगाती है तो दूसरे स्तर पर अपने तर्क खुद पुनर्स्थापित करती है।

यदि ऐसा प्रतीत होता है कि कोई दमनकारी व्यवस्था सब कुछ नियंत्रित करती है, तो ऐसे किसी अंत:क्षेत्र की खोज करना स्वाभाविक है जहां यह कम सच हो। कोई ऐसी जगह जहां कुछ आजादी या निरुद्देश्यता या आनंद अभी भी अस्थिर रूप में मौजूद हो। शायद आप इसे इच्छा, या विमर्श या शरीर या अवचेतन कह सकते हैं। कोई यह भविष्यवाणी कर सकता है कि ऐसे समय में मनोविश्लेषण में रुचि बढ़ेगी क्योंकि मनोविश्लेषण केवल सोचने वाले व्यक्ति का संवेदनवाद नहीं, जिसमें बौध्दिक संचय के साथ अति सनसनीखेज भौतिक वस्तुओं के प्रति आकर्षण का सम्मिश्रण होता है, बल्कि यह विशेष रूप से राजनीतिक हुए बिना रैडिकलिज्म का एक उत्साहवर्धक संकेत है। यदि राज्य, उत्पादन की रीतियों और नागरिक समाज जैसे अधिक अमूर्त प्रश्नों का हल इस समय कठिन लगे तो कोई व्यक्ति अपना राजनीतिक ध्यान अपेक्षाकृत अधिक अंतरतम तथा तात्कालिक, अधिक सजीव और स्थूल जैसे शरीर की ओर अंतरित कर सकता है। 'पुटिंग एनस बैक इनटु कोरयोलेनस' (कोरियालेनस के शरीर में वापस गुदा लगाना) जैसा कॉनफ्रेंस पेपर उन उत्सुक व्यक्तियों की भीड़ को आकर्षित करेगा जिन्होंने बुर्जुआ के बारे कभी भी नहीं सुना लेकिन जो लौंडेबाजी के बारे में सब कुछ जानते हों।

निस्संदेह यह स्थिति उन समाजों में विशेष रूप से परलक्षित होती होगी जिनमें किसी भी हाल में सशक्त समाजवादी परंपराएं उपस्थित नहीं थीं। सचमुच, सार्वभौमिकता के प्रति इसके संदेह के बावजूद यह कल्पना की जा सकती है कि उक्त विचार की शैली इस प्रकार की विशिष्ट राजनीतिक स्थितियों के एक अप्रमाणिक सामान्यीकरण से ज्यादा कुछ भी नहीं है। यह उम्मीद की जाती है कि शारीरिकता (स्थूलता) और लैंगिकता के प्रति इस प्रकार की चिंता एक व्यापक राजनीतिक गहनता तथा समृध्दि दरशाएगा, साथ ही यह संपूर्ण विस्थापना की अभिव्यंजना करेगा। और निस्संदेह ठीक यही बात भाषा तथा संस्कृति के प्रति आसक्ति में उत्तरोत्तर वृध्दि को देखकर कही जा सकती है। भाषा और संस्कृति ही वे विषय हैं जिनमें बुध्दिजीवी भौतिक उत्पादन के क्षेत्र की तुलना में हर हाल में अधिक सहज अनुभव करेंगे।

इस अवधि के निराशावाद के अनुरूप यह उम्मीद की जा सकती है कि विमर्शों में कैसे निखार लाया जाता है, किस प्रकार इनका नियमन होता है तथा कैसे सशक्त बनाया जाता है। इन बातों पर कुछ लोग जोर देंगे, जबकि अन्य लोग अपेक्षाकृत अधिक स्वच्छंद मुद्रा में यह घोषणा करेंगे कि संकेतक के रोमांच और खतरे व्यवस्था को कैसे धोखा दे सकते हैं। दोनों हालत में निस्संदेह एक व्यापक भाषिक स्फीति द्रष्टव्य होगी क्योंकि जिस बात की अब राजनीतिक यथार्थ में कल्पना नहीं की जा सकती थी, वो अभी भी विमर्श या संकेतों या पाठात्मकता में लगभग संभव थी। पाठ या भाषा की स्वतंत्रता संपूर्ण तंत्र की अस्वतंत्रता की भरपाई करेगी। पुनश्च, एक प्रकार के मनोराज्य की कल्पना होगी, लेकिन अब इसका नाम उत्तरोत्तर पद्यात्मक होता जाएगा। इस शैली के विचार के अति उग्र रूप में यह भी कल्पना करना संभव होगा कि भविष्य यहां और अब है कि मनोराज्य आनंददायक तीव्रताओं, अनेक प्रकार के स्वार्थों, तथा बाजार स्थलों और 'शापिंग माल' में होने वाले आह्लादकारी विनिमयों के रूप में पहले ही आ चुका है। तब तो इतिहास का निश्चित ही अंत हो गया है, एक ऐसा अंत जो रैडिकल राजनीतिक कार्रवाई के निषेध में पहले ही निहित है। इस प्रकार की सामूहिक कार्रवाई सामान्य रूप से असंभव प्रतीत होती तो इतिहास सचमुच ही यादृच्छिक और दिशाहीन प्रतीत होता। और यह दावा करना कि अब कोई 'महान आख्यान' नहीं है अन्य बातों के साथ-साथ यह कहने के समान होगा कि इन स्थितियों में एक प्रभावी आख्यान की परिकल्पना कैसे की जाए, हम नहीं जानते। इस प्रकार के विचार के लिए इतिहास का अंत हो गया होगा क्योंकि स्वतंत्रता अंतत: प्राप्त हो गई होगी; लेकिन मार्क्सवाद के लिए स्वतंत्रता की प्राप्ति इतिहास का आरंभ होगा और उन सब का अंत जो अब तक हमने जाना है यानी वो नीरस प्रागैतिहासिक महान आख्यान, जो वास्तव में तंगहाली, उत्पीड़न और संघर्ष की वही घिसी-पिटी पुनर्संसाधित कहानी है।

अब तक मूर्खतम पाठक ने भी यह अनुमान कर लिया होगा कि मैं जिस स्थिति का वर्णन कर रहा हूं वह पूर्णरूपेण प्राक्काल्पनिक नहीं है। एक ऐसी स्थिति की कल्पना करने के लिए हमें क्यों आमंत्रित किया जाए जो हमारे सामने खड़ी हो? क्या इस उबाऊ शब्दाडंबर से कुछ हासिल किया जाना है? मुझे लगता है कि यह एक वैचारिक प्रयोग है जिसके जरिए हम वास्तविक इतिहास को ब्रैकेट में रखते हुए तत्काल इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि उत्तरआधुनिक सिध्दांत की प्राय: सभी प्रमुख विशेषताएं मानो भारी राजनीतिक पराजय की पूर्वकल्पना से निकाली जा सकती है। मानो उत्तरआधुनिक संस्कृति की सच्चाई का सामना होने पर हम इससे तब तक पीछे हटते रहेंगे जब तक हम उक्त पराजय तक नहीं पहुंच जाते (वास्तव में यह पराजय उतना ही संपूर्ण और निर्णायक रहा है या नहीं जितना उत्तरआधुनिकवाद की मौजूदगी का निहितार्थ प्रतीत होता है, यहां यह मसला नहीं है)। स्वाभाविक है कि इस पूरे काल्पनिक उद्यम का पार्श्वदृष्टि संबंधी लाभ है। और इसे पूरी गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। वास्तव में मेहनतकश वर्ग की युयुत्सा या राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों के धीरे-धीरे समाप्त हो जाने से कोई भी व्यक्ति विरचना या राजनीतिक यथातथ्यता या सस्ते साहित्य को समझ नहीं सकता है। लेकिन यदि उत्तरआधुनिकतावाद इस प्रकार के राजनीतिक इतिहास का अपरिहार्य परिणाम नहीं है, तो भी यह तर्कसंगत है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार 'किंग लियर' का पांचवां अंक पिछले चार अंकों द्वारा आदेशित नहीं होता, पर ऐसा भी नहीं कि यह संयोग मात्र है।

लेकिन क्या यह ठीक उसी प्रकार की ऐतिहासिक न्यूनीकरणमूलक व्याख्या नहीं जिसे उत्तरआधुनिकतावाद स्वयं अरुचिकर पाता है? नहीं, क्योंकि यहां कोई ऐसा संकेत नहीं कि उत्तरआधुनिकतावाद केवल राजनीतिक असफलता का परिणाम है। यह समझना कठिन है कि मैडोना या 'मॉक-गोथिक' भवन या 'उम्बर्तो इको' के उपन्यास इस प्रकार की जुगुप्सा की उत्पत्ति कैसे है, यद्यपि कुछ प्रतिभावान सांस्कृतिक टीकाकार शायद इसका प्रयास करते रहेंगे।



उत्तरआधुनिकतावाद के कई स्रोत हैं वास्तविक आधुनिकतावाद, तथाकथित उत्तर-उद्योगीकरण, नई शक्तिशाली राजनीतिक शक्तियां, सांस्कृतिक अवांगार्द का पुन: प्रभाव बढ़ना, वस्तु रूप द्वारा सांस्कृतिक जीवन में पैठ, कला के लिए घटता हुआ'स्वायत्त' स्थान, कतिपय पुराशास्त्रीय बुर्जुआ सिध्दांतों की समाप्ति आदि। लेकिन यह और जो कुछ भी हो, निश्चित ही राजनीतिक पराजय की उत्पत्ति है। इसके द्वारा लैंगिक और सामुदायिक मुद्दों के उठाए जाने के कार्य ने निस्संदेह श्वेत पुरुष पाश्चात्य वाम के सैध्दांतिक अंत:क्षेत्र का हमेशा के लिए अतिक्रमण कर लिया है, जिसके बारे में हद से हद यह कहा जा सकता है कम से कम हम मृत नहीं हैं और साथ ही एक प्रबल संस्कृतिवादी विमर्श को हम मानकर चलते हैं जो भूमंडल के उस कोने से संबंधित है। इन महत्वपूर्ण पूर्वग्रहों ने भी प्राय: उस शक्ति के प्रति पर्याप्त तटस्थता दरशाई है जो दैनिक जीवन का अदृष्य रंग है; जो हमारे अस्तित्व को निर्धारित करती है, कभी-कभी प्राय: शब्दश: हर क्षेत्र में ऐसा करती है; जो काफी हद कि देशों की नियति तथा उनके बीच आपस के झगड़ों का निर्णय करती है। मानो हर अन्य दमनकारी शक्ति की आसानी से चर्चा की जा सकती है लेकिन उसके बारे में नहीं जो अकसर उनके लिए दीर्घकालिक एजेंडा निर्धारित करता है या उनके अभ्यंतर में उनसे न्यूनतम उलझी हुई है। अब पूंजी की शक्ति से सभी इतने उबाऊपूर्ण ढंग से परिचित हैं कि वामपंथ के बड़े धड़े ने भी इसे स्वाभाविक तथा अपरिवर्तनीय संरचना के रूप में स्वीकार कर लिया है। एक उपयुक्त सादृश्य के लिए पराजित दक्षिणपंथ की कल्पना करनी होगी जो राजतंत्र, परिवार, शिष्टाचार की मृत्यु के बारे में उत्कंठा के साथ चर्चा कर रहा हो जबकि संपत्ति के अधिकारों के बारे में आखिर उन्हें क्या सबसे आंतरिक रूप से आकर्षित करता है, उस पर कठोर चुप्पी साधे हुए हो। क्योंकि इनका स्वामित्वहरण इतनी पूर्णता से कर लिया गया है कि उन्हें वापस पाने की कामना केवल सैध्दांतिक प्रतीत होती है।

उत्तरआधुनिकतावादी संस्कृति ने कलाओं के संपूर्ण क्षेत्र में एक समृध्द, साहसी और उल्लसित कलाकृति का निर्माण किया है तथा उत्सर्जन-योग्य भावुकता और परिहासपूर्ण कला या साहित्य की एक अच्छी खासी मात्रा का भी सृजन किया है। इसने कई आत्मसंतुष्ट निश्चितताओं के नीचे से आधार हटा दिए हैं, कुछ विक्षिप्त समग्रताओं को कौतूहलपूर्ण ढंग से खोल दिया है, जोशपूर्ण ढंग से बचाकर सुरक्षित रखी कुछ शुध्दताओं को दागदार कर दिया है; कुछ दमनकारी प्रतिमानों को मोड़ा है, और कुछ अपेक्षाकृत मजबूत दिखने वाली बुनियादों को हिला दिया है। इसमें राजनीतिक रूप से अशक्तकारी संदेहवाद, एक भड़कीला जनवाद, ओजपूर्ण नैतिक सापेक्षवाद तथा एक किस्म के वितंडावाद के आगे समर्पण की भी प्रवृत्ति है। इसके लिए हम भी स्वतंत्र दुनिया के उन मूल्यों की पुष्टि कर सकते हैं चूंकि सभी परंपराएं स्वैच्छिक हैं। अपने राजनीतिक विरोधियों की निश्चितताओं के नीचे से आधार हटाने के क्रम में इस उत्तरआधुनिक संस्कृति ने प्राय: अपने ही आधार को हटा दिया है और इसके पास कोई तर्क नहीं रहा है कि हमें फासीवाद का विरोध क्यों करना चाहिए, सिवाय इस कमजोर व्यावहारिक तर्क के कि फासीवाद वह तरीका नहीं जिसके जरिए हम ससेक्स या सैक्रेमेंटो में काम करते हैं। अपने विनोदपूर्ण, पैरोडी भाव से इसने उच्च संस्कृति के भयावह आत्मसंयम को निम्न बना दिया है और इस प्रकार वस्तु रूप के अनुकरण में बाजार स्थल के व्यर्थकारी संयमों को पुन: बहाल करने में सफल रहा है।

इसने स्थानीय, प्रादेशिक, क्षेत्रीय शक्ति को निर्मुक्त किया है साथ ही साथ विश्व को और अधिक शुष्क समान स्थल बनाने में योगदान दिया है। 'सत्यता' जैसी अवधारणाओं के सम्मुख इसकी घबराहट ने बिशपों (धर्मगुरुओं) को चौकन्ना कर दिया है और व्यावसायिक कार्यकारियों को मोह लिया है। विश्व की यथातथ्य व्याख्या की संभावना से यह लगातार इनकार करता है और उतनी ही निरंतरता से यह अपने आपको ऐसा करते पाता है। यह सार्वभौम नैतिक निर्देशों से परिपूर्ण है, जैसे बहुलता से व्यक्तिपरकता श्रेष्ठ है, समानता से विविधता, एकरूपता से विषमता श्रेयस्कर है और यह इस प्रकार के सभी सार्वभौमवाद को दमनकारी मानकर निंदा करता है। यह एक ऐसे मनुष्य का स्वप्न देखता है जो कानून और बंधन से मुक्त हो, जो एक 'विषय-स्थिति' से दूसरी स्थिति में अस्पष्ट रूप से सरल रहा हो और उस मनुष्य को सांस्कृतिक शक्तियों के एक निश्चित परिणाम से अधिक नहीं मानता है। यह शैली और आनंद में विश्वास करता है और आम तौर पर वैसे पाठ का सृजन करता है जिसका संयोजन कंप्यूटर द्वारा तथा इस पर किया गया हो।

बहरहाल ये सारी चीजें उत्तरआधुनिकतावाद के द्वंद्वात्मक आकलन से संबंधित है और उत्तरआधुनिकतावाद स्वयं इस बात पर जोर देता है कि द्वंद्वात्मक विचार को पराभौतिक कूड़े की ढेर पर डाल दिया जा सकता है। शायद यहां यह मार्क्सवाद से सबसे अधिक भिन्न है। यह माना जाता है कि मार्क्सवादी 'मात्र-सिध्दांतवादी' विचारक होते हैं। फिर भी वे मानते हैं कि प्रबुध्द बुर्जुआ उदारवाद की समृध्द विरासत के बिना कोई प्रामाणिक समाजवाद नहीं हो सकता। उत्तरआधुनिकतावादी बहुलवाद, परिवर्तन, निष्प्रयोजनता के आत्मघोषित समर्थक हैं फिर भी हमेशा मानववाद, उदारवाद, प्रबोधन केंद्रित विषय तथा शेष की निंदा करते हुए देखे जाते हैं। लेकिन बुर्जुआ प्रबोधन सामाजिक वर्ग के समान है : इससे मुक्ति के लिए पहले आपको इससे होकर मार्ग निकालना होगा। शायद इसी बिंदु पर मार्क्सवाद और उत्तरआधुनिकतावाद के बीच सबसे अधिक अनबन है।

उत्तरआधुनिकतावाद की आंखें विडंबना के प्रति बहुत सजग हैं लेकिन लगता है विडंबना ऐसी है जो इसकी आंखों से भी बच निकली है। ठीक उसी समय जब यह क्रांति के प्रत्यय को 'पराभौतिक' मानकर इसकी निंदा कर रहा था, 'सामूहिक विषय' की धारणा का तिरस्कार कर रहा था और समग्रता के खतरों पर जोर दे रहा था, उन जगहों पर क्रांति आरंभ हो गई जहां इसकी सबसे कम संभावना थी। किसी प्रकार के 'सामूहिक विषय' ने उत्तरपूंजीवादी नौकरशाहों के 'संपूर्ण तंत्र' पर आघात किया था। जाहिर है उस परिवर्तन के वर्तमान परिणाम वे नहीं हैं जिन पर समाजवादी धैर्यपूर्वक विचार कर सकें; लेकिन पूर्वी यूरोप के नाटकीय उथल-पुथल उत्तरआधुनिक पश्चिम की कई नई चलन की पूर्वकल्पनाओं को झुठलाते हैं। जबरदस्त रूप से अजनबियाने के अंदाज में वे उत्तर आधुनिकतावाद का उदार-पूंजीवादी बुध्दिजीवी वर्ग के विचित्र रूप से थके हुए पराजयवादी समूह की विचारधारा के रूप में पर्दाफाश करते हैं, जिसने गलती से अपनी स्थानीय कठिनाइयों को ठीक सार्वभौमवादी विचारधाराओं, जिनकी यह निंदा करता है, के समान ही सार्वभौममानवीय स्थिति समझ लिया है। लेकिन यद्यपि इसके पूरब में जो भी हुआ है उससे उत्तरआधुनिकवाद को उपयोगी रूप से 'विमुख' किया गया हो, लेकिन यह निश्चित ही उस पतन से उत्पन्न नहीं हुआ है। उत्तरआधुनिकतावाद साम्यवाद के पराजय (जो कि हर हाल में इससे पहले हुआ) की प्रतिक्रिया कम है। बनिस्बत इसके यह, कम से कम अपने प्रतिक्रियावादी संस्करणों में, पूंजीवाद की 'सफलता' का प्रत्युत्तर है। इसलिए यहां एक और विडंबना है। संकटग्रस्त 1990 के दशक में पूंजीवादी सफलता को प्रकृति का सामान्य और अपरिवर्तनीय नियम मानना कुछ ज्यादा ही अजीब लगता है। यदि यह ठीक उसी प्रकार की गैर ऐतिहासिक निरपेक्षतावाद नहीं, जिसे उत्तरआधुनिकतावादी उग्रता से अस्वीकार करते हैं, तो यह समझना कठिन है कि यह आखिर क्या है।

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

नयी किताब ' इतिहास के पक्ष में' से -उत्तर आधुनिकतावादी कहां से आते हैं- प्रसिद्ध मार्क्सँवादी आलोचक टेरी इगिल्टन-1-

     एक ऐसे आमूलपरिवर्तनकारी (रेडिकल) आंदोलन की कल्पना कीजिए जिसे भारी पराजय का सामना करना पड़ा हो। इतनी करारी हार कि वास्तव में पूरे जीवनकाल में इसके दोबारा उठ खड़े होने की संभावना नहीं रह गई हो। समय बीतने के साथ इस आंदोलन की धारणाएं महज अप्रासंगिक लगने के बजाए कम गलत या अप्रभावी लगने लग सकती हैं। इसके विरोधियों के लिए इन सिध्दांतों का आक्रामक खंडन करना इतना बड़ा मसला नहीं रह गया हो, जितना इन पर किंचित उस पुरातत्वविषयक रुचि से विचार करना जिसे किसी ने टालेमी के ब्रह्मांड विज्ञान या थामस क्विन के वितंडावाद पर विचार करने के लिए सुरक्षित रखा हो। संभव है आमूलपरिवर्तनकारी (रैडिकल्स) अपना सफाया देखने के बजाए कम घबराए या कम तर्कहीन पाएं। वे ऐसी भाषा बोलते हुए पाए जाएं जो उनके युग की भाषा से मेल नहीं खाती हो। जैसा कि अफलातूनवाद (प्लेटोनिज्म) या प्रणय याचन की भाषा के साथ हुआ, जिसके बारे में अब कोई यह पूछने की जहमत नहीं उठाता कि यह सही है या नहीं। ऐसी गंभीर स्थिति के प्रति वामपंथियों की संभावित प्रतिक्रिया क्या होगी? 

निस्संदेह इनमें से कई अपने पुराने विचारों को बचकाना आदर्शवाद मानकर पश्चाताप करते हुए या तो विद्वेषपूर्ण भाव से या निष्ठा के साथ दक्षिणपंथ की ओर मुड़ जाएंगे। अन्य आदतवश, चिंतावश या विरहवश, एक काल्पनिक पहचान से चिपके हुए अपनी विचारधारा से जुड़े रह सकते हैं और इसके साथ आने वाले मनस्ताप का जोखिम उठा सकते हैं। कुछ अतिआशावादी वामपंथी विजयोन्मादी युयुत्सा के अति मध्दिम स्फुरण में भी क्रांति की चिनगारी ढूंढ़ते रहेंगे। अन्य, रैडिकल आवेश उपस्थित रहने पर भी वे इसे अन्यत्र आव्रजन के लिए मजबूर करेंगे। कल्पना की जा सकती है कि इस युग की प्रचलित पूर्वकल्पना यह रही होगी कि कम से कम इस समय के लिए तंत्र अनतिक्रमणीय थी, और यह देखा जा सकता है कि वामपंथियों के कई निष्कर्ष इसी निराश पूर्वकल्पना से निकले हैं। उदाहरण के लिए कोई यह उम्मीद कर सकता है कि तंत्र के हाशिए तथा दरारों में, उन अस्पष्ट, अनिश्चित स्थानों में जहां इसकी शक्ति कम सुरक्षित प्रतीत होती हो, उनमें रुचि अत्यधिक बढ़ेगी। यदि व्यवस्था का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता, तो कम से कम उन शक्तियोंकी आशा तो की जा सकती है, जो कुछ क्षण के लिए ही सही, इसका उल्लंघन कर सके; इसे तोड़-मरोड़ सके; धोखा दे सके।

ऐसे में कोई यह पूर्वानुमान कर सकता है कि ऐसी स्थिति हाशिए पर बैठे लोगों के लिए जश्न की होगी। लेकिन यह तो आंशिक रूप से आवश्यकतावश स्थिति को महत्वपूर्ण बताना होगा क्योंकि वामपंथी स्वयं ही मुख्यधारा से अपमानित ढंग से विस्थापित हो गए होंगे और इस प्रकार से आसानी से केंद्रीयता की सारी बातों को संदेह की दृष्टि से देखेंगे। अपने सर्वाधिक अपरिष्कृत रूप में इस सीमांतवादी संस्कृति की एक सरल प्राक्कल्पना यह होगी कि अल्पसंख्यक सकारात्मक थे और बहुसंख्यक दमनकारी। फासीवादी समूहों, 'अल्स्टर' यूनियनवादियों या अंतर्राष्ट्रीय बुर्जुआ जैसे अल्पसंख्यक इस तसवीर में कैसे फिट होंगे, पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। न ही यह स्पष्ट है कि इस प्रकार की स्थिति 'ए एन सी' जैसे पूर्व के सीमांतवादी आंदोलन के राजनीतिक रूप से प्रभावशाली बनने के साथ कैसे समन्वय स्थापित कर सकती है, जबकि इसका रूढ़िवादी पूर्वग्रह यह है कि इस तरह का वर्चस्व अवांछनीय है। इस प्रकार के विचार का ऐतिहासिक आधार यह तथ्य होगा कि जो राजनीतिक आंदोलन कभी व्यापक, केंद्रीय तथा सृजनात्मक थे अब कुल मिलाकर सक्रिय नहीं रहे। सचमुच एक आंदोलन का प्रत्यय जो कभी केंद्रीय और विध्वंसक था अब पदों का विरोधाभास प्रतीत होगा। अत: व्यापक, प्रभुत्वशाली और सहमतिजन्य की भर्त्सना करना और इनसे व्यतिक्रम के लिए जो कुछ हुआ उसे रूमानी रंग देना स्वाभाविक प्रतीत होगा। इन सबसे अधिक यह उन युवा विद्रोहियों की अभिवृत्ति होगी जिनके पास राजनीतिक दृष्टि से स्मरण करने के लिए कुछ खास नहीं था; जिन्हें व्यापक रैडिकल आंदोलन की कोई वास्तविक स्मृति या अनुभव नहीं थे लेकिन जिन्होंने दुखद दमनकारी बहुलताओं का अत्यधिक अनुभव किया था।

यदि ऐसा प्रतीत हो कि तंत्र ने अपने विरुध्द सारे विरोध खारिज कर दिए हैं तो इससे यह अस्पष्ट अराजकतावादी धारणा बना लेना कठिन नहीं होगा कि तंत्र दमनकारी है। आकर्षक राजनीतिक तंत्र के रूप में अन्य किसी विकल्प की अनुपस्थिति में यह दावा स्पष्ट रूप से युक्तिसंगत प्रतीत होगा। तंत्र की वास्तविक आलोचना इसके बाहर रहकर ही की जा सकती है अत: ऐसे समय में 'अन्यत्व' के प्रति अतिविश्वास की आशा की जा सकती है। 'आर्दवाक' से लेकर 'अल्फासेंचुरी' तक उन सारी चीजों में अत्यधिक रुचि ली जाएगी जो बाहरी, विसामान्य, अन्यस्थानिक और समाविष्ट नहीं होने वाली हैं। तंत्र के तर्क से परे कोई भी चीज जो हमारे सामने लुभावना दृश्य उपस्थित करता हो, उसके प्रति आसक्ति होगी। लेकिन बड़ी विचित्र बात है कि यह रूमानी अति-वामवाद भंगुर निराशावाद के साथ-साथ रहेगा। क्योंकि सचाई यह है कि यदि तंत्र सर्वशक्तिमान है तो परिभाषानुसार इसके बाहर कुछ भी नहीं, जैसे कि ब्रंह्मांड के अनंत विस्तार के बाहर कुछ भी नहीं है। यदि इस तंत्र के बाहर कुछ होगा भी तो वह ज्ञान की सीमा से बिलकुल परे होगा और इस प्रकार हमें बचाने में अयोग्य। लेकिन यदि हम इसे तंत्र के भीतर केंद्र में ला सकें ताकि यह प्रभावशाली ढंगसे अपने पैर जमा सके तो इसका 'अन्यत्व' तुरंत संदूषित हो जाएगा और इस प्रकार इसकी विध्वंसक शक्ति क्षीण हो जाएगी। अत: सैध्दांतिक रूप से इस तंत्र को नकारने वाली चीजें, व्यावहारिक रूप में ऐसा नहीं कर पाएंगी। हम जो कुछ समझ सकते हैं परिभाषानुसार वह रैडिकल नहीं हो सकता क्योंकि यह व्यवस्था के भीतर ही होगा; लेकिन जो कुछ भी व्यवस्था के दायरे से बाहर होगा, उसके बारे में हमें सिर्फ रहस्यमय फुसफुसाहट ही सुनाई देगी।

इस प्रकार के विचार ने एक ऐसे तंत्र की पूरी अवधारणा का ही त्याग कर दिया है जो आंतरिक रूप से विरोधाभासी है, जिसने अपने केंद्र में उसे स्थापित कर लिया है जो संभवतया उसका विनाश कर सकता है। बल्कि, यह तंत्र के 'भीतर' या 'बाहर' की दो सख्त विरोधी विकल्पों के रूप में सोचती है। जहां तंत्र के भीतर होने का अर्थ है सह अपराधिता और बाहर होने का मतलब है लाचार, नपुंसक हो जाना। इस युग की इस विशिष्ट विचार शैली को 'स्वच्छंदतावादी' निराशावाद कहा जा सकता है। स्वच्छंदतावादी, क्योंकि किसी ने हमारे पास जो है उससे बिलकुल अलग किसी चीज का ख्वाब देखना नहीं छोड़ा होगा और निराशावादी क्योंकि कानून और सत्ता के सर्वशक्तिमान होने के प्रति इनसान इतना अधिक सजग होगा कि वह शायद ही सोच सकता है कि उसके ख्वाब कभी पूरे होंगे। यदि इसके बाद भी कोई विध्वंस में विश्वास करता है लेकिन इसे करने वाले हाड़ मांस के इनसानों की उपस्थिति में नहीं तो यह कल्पना करना संभव है कि व्यवस्था ने किसी प्रकार स्वयं ही अपने को विनष्ट कर लिया; अपने ही तर्क को विरचित कर लिया, जो कि तब आपको कतिपय आमूलपरिवर्तनवाद के साथ कतिपय संदेहवाद की भी अनुमति देगा।

यदि तंत्र स्वयं सर्वशक्तिमान ईश्वर के समान हर जगह मौजूद है तो ऐसा प्रतीत होगा कि यह किसी स्थान विशेष पर द्रष्टव्य नहीं है और इसलिए यह मानना संभव हो जाएगा कि वहां जो कुछ भी मौजूद है, वह तंत्र तो बिलकुल ही नहीं, जो कि काफी विरोधाभासी है। तंत्र इतना जटिल है कि इसे दरशाया नहीं जा सकता, यह दावा करना इस घोषणा से थोड़ा ही अलग है कि तंत्र मौजूद नहीं है। जिस समय की हम कल्पना कर रहे हैं उसमें निस्संदेह कुछ लोग एक वास्तविक सामाजिक समग्रता की तानाशाही के विरुध्द शोर मचाते पाए जाएंगे, जबकि अन्य समग्रता के संपूर्ण प्रत्यय की विरंचना करने तथा यह दावा करने में व्यस्त होंगे कि यह प्रत्यय केवल हमारे दिमागों में है। इसे कम से कम आंशिक रूप में, सैध्दांतिक तौर पर इस तथ्य की क्षतिपूर्ति मानने में कठिनाई नहीं होगी कि सामाजिक समग्रता को व्यवहार में लाना कठिन साबित हो रहा था। यदि वर्तमान में कोई अतिमहत्वाकांक्षी राजनीतिक कार्रवाई संभव नहीं प्रतीत हो; यदि तथाकथित सूक्ष्म राजनीति ही समय की मांग प्रतीत हो तो इस आवश्यकता को गुण में तब्दील करना, अपने आपको यह सांत्वना देना कि किसी भी व्यक्ति की राजनीतिक सीमाओं का यथार्थ में, इस तथ्य में एक निरपेक्ष आधार होता है कि सामाजिक 'समग्रता' हर हाल में एक भ्रम है ('पराभौतिक' भ्रम आपकी स्थिति को अपेक्षाकृत भव्य बनाने के बजाए मजबूत बनाता है)। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि संपूर्ण परिवर्तन के लिए राजनीतिक अभिकर्ता है या नहीं क्योंकि वास्तव में संपूर्णपरिवर्तन जैसी कोई चीज ही नहीं है। यह मानो किसी व्यक्ति द्वारा चाकू को ब्रेड पर चलाने के बजाए कहीं और चलाकर यह घोषणा करने के समान है कि ब्रेड पहले से ही कटा हुआ है। लेकिन समग्रता भी भ्रम प्रतीत हो सकती है क्योंकि कोई स्पष्ट राजनीतिक अभिकर्ता नहीं होगा जिसके लिए समाज खुद को समग्रता के रूप में प्रस्तुत करे। फिर वे लोग हैं जिन्हें यह समझने की आवश्यकता है कि स्वतंत्र होने के लिए वे इसके साथ कैसे जुड़े हैं और जो यह पाते हैं कि वे यह तभी कर सकते हैं जब वे उस पूरी संरचना के थोड़े भाग को समझें जिससे उनकी वर्तमान स्थिति संबंधित है। यहां स्थानीय और वैश्विक दो सरल विरोधी खेमे या सैध्दांतिक विकल्प नहीं है जैसा कि वे उन बुध्दिजीवियों के लिए हो सकते हैं, जो बड़ा सोचने को तरजीह देते हैं तथा उन अधिक विनम्र शिक्षाविदों के लिए जो इसे ठोस सच के करीब रखना चाहते हैं। लेकिन यदि उन पारंपरिक राजनीतिक अभिकर्ताओं में से कुछ कठिनाई में हैं तो सामाजिक समग्रता की अवधारणा भी कठिनाई में होगी क्योंकि इन्हीं अभिकर्ताओं की इसकी आवश्यकता इसे इसकी शक्ति देती है। (क्रमशः)

(   इतिहास के पक्ष में, साभार, प्रकाशक-  ग्रंथ शिल्पी,नई दिल्ली )



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