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मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

मिस्र का राजनीतिक संकट और अमरीकी खेल


      मीडिया प्रस्तुतियों में मिस्र का मौजूदा आंदोलन स्वतःस्फूर्त्त लगता है लेकिन यह संगठित और पूर्व नियोजित प्रतिवाद है। इसे सीआईए,पेंटागन और विदेश विभाग के योजनाकारों ने तैयार किया था और इसकी तैयारियां काफी पहले से चल रही थीं। ग्लोबल रिसर्च डॉट कॉम के अनुसार इसकी योजना तीन साल पहले बना ली गयी थी। इस योजना में सीआईए ने नागरिक संगठनों,ब्रदरहुड और विपक्ष के अन्य संगठनों को शामिल कर लिया था और ठीक योजना के अनुसार ही चीजें घटित हुई हैं। साथ ही इस योजना के बारे में अमेरिका के सत्तापक्ष और विपक्ष की भी सहमति ले ली गयी थी। इस समूची योजना का बुनियादी लक्ष्य था मध्यपूर्व में अमेरिकी हितों की रक्षा और विस्तार करना।
   आम जनता को दिग्भ्रमित करने के लिए मीडिया में अमेरिका के छुटभैय्या नेताओं ने हल्ला मचाया कि मिस्र में इतना बड़ा जनप्रतिवाद होने वाला था और अमेरिकी गुप्तचर संस्थाएं पहले से इसके बारे में बता नहीं पायीं। सच इसके एकदम विपरीत है। समूचा आंदोलन और उसके विभिन्न चरणों की योजना सीआईए-पेंटागन-विदेश विभाग ने बनायी थी। वे जानते थे मिस्र में आम जनता मुबारक के खिलाफ है और उन्हें हटाना चाहती है और इस गुस्से को चैनलाइज करने के लिए प्रिएम्टिव एक्शन के तौर पर जन प्रतिवाद आयोजित किया गया। सतह पर लगता है कि मिस्र की जनता के प्रतिवाद के बारे में अमेरिकी प्रशासन एकदम अंधेरे में था लेकिन सच यह नहीं है,मीडिया ने इसे अमेरिका की जासूसी संस्थाओं की असफलता कहा है और इस प्रचार को बहाने के रूप में इस्तेमाल करते हुए अमेरिकी प्रशासन मिस्र और दूसरे मध्यपूर्व के देशों में अपने जासूसी नेटवर्क को और भी पुख्ता बनाने में जुट गया है।
    मिस्र के जनांदोलन की विशेषता है कि इसे आरंभ किसी भी मंशा से किया गया हो और इसका नेतृत्व किसी भी गुट या राजनीतिक विचारधारा के हाथ में हो लेकिन इस इसके दूरगामी असर होंगे। आम मिस्रवासियों में लोकतंत्र की भावना मजबूत होगी,लोकतंत्र का रास्ता खुलेगा और सामान्य जीवन में लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आकर्षण बढ़ेगा।
     मिस्र के अभी के हालत में कोई सरकार संयुक्त मोर्चे के बिना नहीं बनेगी और सेना की उसमें प्रमुख भूमिका रहेगी ।यही बात अमेरिकी प्रशासन ,मिस्र की सेना और राष्ट्रपति मुबारक का दल चाहता है। इस आंदोलन में ऐसी भी ताकतें हैं जो चाहती हैं कि मिस्र में अमेरिकी वर्चस्व को खत्म किया जाए। दूसरी ओर इस्राइल और यहूदी लॉबी चाहती है कि मिस्र में सेना का प्रशासन में वर्चस्व बना रहे। अमेरिका भी अपने हितों के विस्तार के लिए मिस्र की सेना पर ही निर्भर है। यह बिडम्बना है कि अमेरिका मिस्र में सेना को सत्ता मे बने रहने देना चाहता है जबकि कायदे से मिस्र में नागरिक प्रशासन होना चाहिए और अमेरिका भी यदि लोकतत्र का पक्षधर है तो उसे नागरिक प्रशासन पर जोर देना चाहिए। लेकिन अमेरिका चाहता है किसी भी तरह सेना और फंडामेंटलिस्टों का समझौता हो जाए और लोकतांत्रिक शक्तियों को अलग-थलग कर दिया जाए। इस क्रम में ही फंडामेंटलिस्ट संगठन ब्रदरहुड को बातचीत के लिए बुलाया गया है।
    सवाल उठता है मिस्र के राष्ट्रपति हुसैनी मुबारक के साथ ओबामा प्रशासन के संबंध क्यों खराब हुए ? इसका प्रधान कारण है अमेरिका की ईरान नीति। ईरान का ओबामा ने जिस तरह विरोध किया और परमाणु कार्यक्रम के आधार पर ईरान विरोधी जो रूख अपनाया है ,मिस्र के राष्ट्रपति मुबारक ने उस नीति का समर्थन करने से मना किया और विरोध किया है। इसके कारण अमेरिकी प्रशासन ने मुबारक की पीठ पर से अपना हाथ हटा लिया और मुबारक के खिलाफ जनांदोलन को हवा दी और साफ कहा कि आंदोलन का दमन नहीं किया जाना चाहिए।
      मिस्र में इन दिनों इंटरनेट की खपत बढ़ी है। फेसबुक और ट्विटर के सदस्यों की संख्या 2009 में आठ लाख थी ,विगत दो सालों में इसमें इजाफा हुआ है। इस बार के आंदोलन में दो बड़े धड़े हैं जो सक्रिय रहे हैं पहला है किफाया ग्रुप और दूसरा है मुस्लिम ब्रदरहुड,इसके अलावा बड़े पैमाने पर मजदूर संगठनों की इसमें शिरकत रही है। मजदूर संगठनों की कोई राजनीतिक पहचानवाला नेता सामने नहीं आया है जबकि अन्य गुटों के नेता सामने आ चुके हैं।
   आरंभ में किफाया संगठन ने ही समूचा आंदोलन योजनाबद्ध ढ़ंग से तैयार किया था। यह संगठन अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष अल बरदाई का 2011 में होने वाले राष्ट्रपति के चुनाव में उम्मीदवार के रूप में समर्थन की घोषणा कर चुका है और यह बेहद संगठित दल है और अत्याधुनिक संचार तकनीक और उसकी विभिन्न विधाओं में दक्ष कैडरवाहिनी इसके पास है। यह संगठन मिस्र में परिवर्तनों की मांग करता रहा है और पेंटागन और रैंड कारपोरेशन के साथ इसके गहरे संबंध हैं। किफाया का अर्थ है 'बहुत हुआ।' इसके कैडरों को अमेरिकी वित्तीय संस्थानों के कुशल लोगों ने प्रशिक्षित किया है।  
  उल्लेखनीय है कि National Endowment for Democracy  नामक संगठन बड़े पैमाने पर सन् 2001 से अप्रीका और मध्यपूर्व में विभिन्न सत्ताओं को अपदस्थ करने का काम करता रहा है। इस संगठन की वेबसाइट पर तिब्बत से यूक्रेन ,वेनेजुएला से लेकर अफगानिस्तान,इराक,ईरान तक के उन देशों के नाम दिए हैं जहां पर यह सक्रिय है,इसके अलावा मिस्र,ट्यूनीशिया,जोर्डन,कुवैत,लीबिया ,सीरिया,यमन,सूडान आदि में यह संगठन विभिन्न स्वयसेवी संस्थाओं के जरिए सक्रिय है। इस संगठन की वेबसाइट पर जानकारी दी गयी है कि किफाया नामक संगठन को National Endowment for Democracy से आर्थिक मदद मिलती रही है।
     उल्लेखनीय है National Endowment for Democracy को अमरीकी कांग्रेस से सीधे फंड मिलता है। संक्षेप में इसे 'नेड' कहते हैं, इस संगठन के निर्माता और प्रथम अध्यक्ष एलीन विंस्टीन ने 'वाशिंगटन पोस्ट' को 1991 में कहा था कि  “a lot of what we do today was done covertly 25 years ago by the CIA”।
    'नेड' के निदेशकों में अमेरिका के भू.पू. रक्षासचिव,सीआईए के उपाध्यक्ष,कारयेले ग्रुप के फ्रेंक कारलूसी,नाटो के पूर्व जनरल वीसली क्लार्क,नव्य संकीर्णवादी युद्धपंथी जलमे खिलाजाद,ये जनाव बुश के जमाने में अफगानिस्तान पर हमले के योजनाकार और बाद में अफगानिस्तान में अमेरिकी राजदूत रहे हैं। मिस्र के मौजूदा आंदोलन में यह संगठन मूलाधार में बैठा हुआ है। 





सोमवार, 8 नवंबर 2010

अरूण जेटली की अमरीकाभक्ति

        भाजपा नेता अरूण जेटली का आज के अखबारों में एक बड़ा ही अच्छा बयान छपा है। यह बयान इस संदर्भ में अच्छा है कि इसमें उन्होंने ईमानदारी के साथ अपनी बात कही है। उन्होंने कहा है भाजपा कभी अमेरिका विरोधी मुहिम का हिस्सा नहीं रही है। हमें जेटली की इस साफ़गोई की प्रशंसा करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा भाजपा ने तो शीतयुद्ध के जमाने में भी अमेरिका का विरोध नहीं किया था।
     हम कहना चाहते हैं अरूण जेटली साहब यह तो संभव ही नहीं था। शीतयुद्ध का बड़ा निशाना मुसलमान थे और अमेरिका ने मुसलमानों के खिलाफ हिंसा और घृणा में शीतयुद्ध में द्वितीय विश्वयुद्ध के यहूदीविरोधी घृणा के मानदण्डों का भी अतिक्रमण कर दिया था।  
     अमेरिका के मजबूत दबंग के नातेदार इस्राइल ने मध्यपूर्व में मुसलमानों पर जुल्म ढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी और आपका दल भारत में उस दौर में मुस्लिम विरोधी भावनाएं राममंदिर के नाम पर भड़का रहा था। याद करें वैसी घृणा आजाद भारत में भारत विभाजन के बाद पहलीबार देखी गयी थी।  इस अर्थ में आपका दल भी शीतयुद्ध की अमेरिका की विशाल मुस्लिम विरोधी रणनीति का हिस्सा बना हुआ था।संभवतः ओबामा इस बात को जानते हैं।   
     उल्लेखनीय है मुंबई में राष्ट्रपति ओबामा ने 6 नबम्बर 2010 को ताजहोटल में 26/11 की घटना की स्मृति में इस हमले के संदर्भ में अपने भाषण में पाक का जिक्र नहीं किया था। इस पर भाजपा के प्रवक्ता राजीव प्रताप रूढ़ी ने ओबामा के बयान में पाक के जिक्र न होने पर तेज प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। उसी संदर्भ में भाजपा के नीतिगत मत को स्पष्ट करते हुए जेटली ने कहा है कि हम कभी भी अमेरिका विरोधी नहीं रहे।
      अरूण जेटली की यह ईमानदार अमेरिकाभक्ति है। उन्होंने अपनी अमेरिकाभक्ति के रूपों का बखान करते हुए यह भी कहा एनडीए सरकार के शासन के समय में कई महत्वपूर्ण अमेरिकापरस्त रणनीतिक फैसले भी लिए गए। बेहतर तो यही होता कि अरूण जेटली उन फैसलों के बारे में स्वयं बताते। फिर भी एक-दो बातें तो हम भी जानते हैं कि भारत के द्वारा इस्राइल से अस्त्र-शस्त्र खरीदने के सबसे बड़े सौदे उसी दौर में किए गए। फिलीस्तीनियों से दूरी और इस्राइल से मित्रता उसी दौर में आरंभ हुई। एनडीए के दौर में ही अमेरिका की विदेशनीति की सेवा में भारत की विदेश नीति को लगा दिया गया था।
    अफगानिस्तान से लेकर इराक तक अमेरिकी दादागिरी की भाजपा ने उस दौरान और बाद में कभी आलोचना नहीं की। हम समझते हैं कि राष्ट्रपति बराक ओबामा अरूण जेटली की भावनाओं को समझेंगे और राजीव प्रताप रूढ़ी की आलोचना को गंभीरता से नहीं लेंगे। भाजपा पहले से ही अमेरिकाभक्त पार्टी है और वह आगे भी अपनी अमेरिका भक्ति को बरकरार रखेंगे। ऐसा सभी भारतवासी उम्मीद करते हैं।  
      


















मंगलवार, 4 मई 2010

यूरोप में बुद्धिजीवियों का महान प्रतिवाद



         इस्राइल को यहूदी बुद्धिजीवियों के अब तक के सबसे बड़े प्रतिवाद का सामना करना पड़ रहा है। यूरोपीय यहूदी बुद्धिजीवियों के द्वारा जारी अपील पर अब तक 4150 बुद्धिजीवी हस्ताक्षर कर चुके हैं। यूरोप के यहूदी बुद्धिजीवी आमतौर पर शांत रहते हैं और इस्राइलपंथी बुद्धिजीवी सहज ही अपनी राय नहीं बदलते। वे अपने विचारों के प्रति पक्के आस्थावान होते हैं। फिलीस्तीन जनता पर इन दिनों जिस तरह का जुल्मोसितम इस्राइल कर रहा है उस पर किसी भी मनुष्य को इस्राइल से घृणा होने लगेगी। इस्राइल नयी योजना के तहत समूची फिलीस्तीन आबादी को भूख और अभाव से तड़पा तड़पाकर जान से मार देना चाहता है यही वजह है कि उसने गाजा की नाकेबंदी की हुई है और वहां पर किसी भी किस्म की मानवीय सहायता सामग्री ,दवा आदि की सप्लाई तक रोक दी है। बिजली बंद है।पीने के पानी के स्रोत नष्ट कर दिए हैं। साधारण नागरिक अकथनीय तकलीफें उठा रहे हैं। यही वह वास्तविकता है जिसने यूरोपीय बुद्धिजीवियों के दिलों को बेचैन कर दिया है और अब समूचे यूरोप में बौद्धिक प्रतिवाद की आंधी चल निकली है। यूरोप के बुद्धिजीवी सक्रिय हो उठे हैं।
      उल्लेखनीय है रविवार को यूरोप के 3 हजार यहूदी बुद्धिजीवियों ने यूरोपीय संसद को एकपत्र लिखकर अपील की थी कि वैस्ट बैंक और पूर्वी यरुसलम में इस्राइल द्वारा अवैध कॉलोनियों के निर्माण कार्य को तुरंत रोका जाना चाहिए। इस इलाके में शांति स्थापित की जानी चाहिए। इस पत्र पर दस्तखत करने वाले ऐसे भी यहूदी बुद्धिजीवी हैं जो कल तक इस्राइल की प्रत्येक नीति का समर्थन करते थे । इन लोगों में इस्राइल अनेक बड़े बुद्धिजीवी हैं जिनके इस्राइल के राजनेताओं खासकर सीमोन के दोस्त हैं। 
     
        यहूदी बुद्धिजीवियों ने लिखा है कि अब उनके सामने कोई विकल्प नहीं बचा है और वे मजबूरी में यह पत्र लिख रहे हैं। बुद्धिजीवियों ने लिखा है इस्राइल नहीं जानता कि वह किस जमाने में है। वह यह भी नहीं महसूस करता है कि उसका सारी दुनिया से संबंध कट गया है। यूरोप के यहूदी बुद्धिजीवियों ने लिखा है कि इस्राइल को विवेक से काम लेना चाहिए। इन बुद्धिजीवियों ने यह भी कहा है कि इस्राइल सरकार का फिलीस्तीन में पुनर्वास बस्तियां बसाना और उसे सुनियोजित अंध समर्थन खतरनाक कदम है। इस बयान पर जिन लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं उनमें फ्रेंच दार्शनिक बर्नार्ड हेनरी लेवी और एलिन फिनकिलकुर्त्त जैसे महान बुद्धिजीवी भी शामिल हैं। ये वे लोग हैं जो इस्राइल के पक्के समर्थक रहे हैं। इसके अलावा इस पत्र पर वामपंथी महान बुद्धिजीवी डेनियल कोन्ह बेंडिट ,जो 1960 के फ्रांस के छात्र आंदोलन के नेता थे, के भी हस्ताक्षर हैं। इन दिनों वह यूरोपीय संसद में ग्रीन पार्टी के नेता हैं। 
      इन बुद्धिजीवियों ने सोमवार को ब्रूसेल्स में यूरोपीय संसद में अपनी राय व्यक्त करने का फैसला लिया है। इस पत्र में इन बुद्धिजीवियों ने अपने को यूरोपीय देशों के नागरिक के नाते पेश किया है। वे इसके बहाने अपने-अपने देश की सामाजिक जिंदगी को व्यक्त करना चाहते हैं। इन बुद्धिजीवियों ने लिखा है कि इस्राइल सरकार की नीति का सुनियोजित समर्थन खतरनाक है और यह इस्राइल राज्य के किसी सच्चे मकसद को पूरा नहीं करता। इस पत्र में कहा गया है कि इस्राइल को वैस्ट बैंक और पूर्वी यरुसलम में पुनर्वास बस्तियों का निर्माण तुरंत बंद करना चाहिए। पत्र में यह भी कहा गया है कि फिलीस्तीनियों की जमीन पर कब्जा और पुनर्वास बस्तियां बसाने का काम नैतिक और राजनैतिक तौर पर गलत है।
     हिन्दी के ब्लॉगर बंधु यूरोपीय यहूदी बुद्धिजीवियों के द्वारा लिखे इस पत्र और इस पर लिखी बुद्धिजीवियों की टिप्पणियों को http://www.jcall.eu पर जाकर पढ़ सकते हैं। अब तक इस पत्र पर यूरोप के 4150 बुद्धिजीवी हस्ताक्षर कर चुके हैं।
( दोनों पेंटिंग फिलीस्तीन के कलाकारों ने गाजा की नाकेबंदी के प्रतिवाद में बनाई हैं)










सोमवार, 3 मई 2010

यूरोप के तीन हजार यहूदी बुद्धिजीवी फिलीस्तीन के समर्थन में मैदान में उतरे

(महान फ्रेंच यहूदी दार्शनिक बर्नार्ड लेवी)
         कल रविवार को यूरोप के 3 हजार यहूदी बुद्धिजीवियों ने यूरोपीय संसद को एकपत्र लिखकर अपील की है कि वैस्ट बैंक और पूर्वी यरुसलम में इस्राइल द्वारा अवैध कॉलोनियों के निर्माण कार्य को तुरंत रोका जाना चाहिए। इस इलाके में शांति स्थापित की जानी चाहिए। इस पत्र पर दस्तखत करने वाले ऐसे भी यहूदी बुद्धिजीवी हैं जो कल तक इस्राइल की प्रत्येक नीति का समर्थन करते थे । इन लोगों में इस्राइल अनेक बड़े बुद्धिजीवी हैं जिनके इस्राइल के राजनेताओं खासकर सीमोन के दोस्त हैं। यहूदी बुद्धिजीवियों ने लिखा है कि अब उनके सामने कोई विकल्प नहीं बचा है और वे मजबूरी में यह पत्र लिख रहे हैं। बुद्धिजीवियों ने लिखा है कि इस्राइल नहीं जानता कि वह किस जमाने में है। वह यह भी नहीं महसूस करता है कि उसका सारी दुनिया से संबंध कट गया है। इस प्रसंग में ‘यूरोपियन जूइस प्रेस’ पर प्रकाशित खबर को पढ़ें--  PARIS-BRUSSELS (EJP)---Around 3,000 European Jews, including prominent intellectuals from France, have launched a drive to call Israel’s government “to reason” in its conflict with the Palestinians, angering the leaders of several French Jewish groups.
They have signed a petition titled “JCall - European Jewish Call for Reason” – on the model of the J Street lobby group in the US-speaking out against Israel’s settlement policy and warning that systematic support for the Israeli government “is dangerous.”
Among those who signed the call are philosophers Bernard Henri-Levy and Alain Finkielkraut, considered some of Israel's strongest defenders among French intellectuals, but also leftists like Daniel Cohn-Bendit, leader of the student protests in the 1960s and now head of the Greens in the European Parliament.
Backers of the petition are to outline their position at a press conference at the European Parliament in Brussels on Monday.
They present themselves as "citizens of European countries, Jews, and involved in the political and social life of our respective countries." They hope to build a European movement that is both "committed to the state of Israel and critical of the current choices of its government."
"Systematic support of Israeli government policy is dangerous and does not serve the true interests of the state of Israel," says the text, published in six languages on the website www.JCall.eu.
The petition calls to stop construction in West Bank settlements and East Jerusalem.
It says that "occupation and settlements are morally and politically wrong," noting that they "feed the unacceptable delegitimization process that Israel currently faces abroad."
"Our objective is to create a European movement that will allow the voice of reason to be heard by all," it adds. "This movement is non-partisan. Its aim is to ensure the survival of Israel as a Jewish and democratic state. This depends on the creation of a viable and sovereign Palestinian state."
David Chemla, chair of  the leftists ‘Peace Now’ movement in France and co-founder of JCall , said:"Diaspora Jewry is not monolithic," adding that members of the new group -- for now primarily in France, Belgium and Switzerland -- had fought against European attempts to boycott Israeli scholars and trade, but "we also criticize the politics of Israel in the territories."
"Of course, we understand that the Israeli government has to make its own decisions," he said. "But we believe that other voices should be heard, in Europe as in the United States."
French Jews angered by JCall
While many signatories have a history of strong support for the state of Israel, the main Jewish groups in France — home to Europe’s biggest Jewish population — reacted with anger.
"This will largely be used by those who are true enemies of Israel," warned Richard Prasquier, president of CRIF, the umbrella representative body of the Jewish community in France, who declined to sign the call, saying he objected to some of its language and its tone.
"Do Israelis need the Jewish Diaspora to know what is 'the right' decision, what should be the borders of a country that their sons and daughters are protecting?" Richard Prasquier wrote in Le Figaro newspaper.
"It’s very serious because these are prestigious personalities," he added, saying that Levy and Finkielkraut had made a “serious mistake”.
Joel Mergui, president of France’s Central Consistory, called the wording of the petition "excessive" and said he was "shocked by the term ‘a call to reason’ when Israel is a democratic state."
Pierre Besnainou, chairman of the United Jewish Social Fund (FSJU), said he was worried about "Jews being divided in public" and Claude Barouch, deputy head of UPJF, the Jewish employers’ association, said the call "weakens Israel."
The Coordinating Committee of Jewish Organizations in Belgium (CCOJB) issued a statement "deploring" the campaign and the timing of its launch on Israel's Independence Day with no mention of Israel's achievements.
It suggested that Muslims and Arabs launch their own "call for reason," urging their brethren to recognize Israel.
Several pro-Israel groups have launched a competing petition roughly translated as "Keep Your Reason" (in French atwww.dialexis.org/php/index.php). A co-sponsor, the Algerian-born French scholar Shmuel Trigano, calls the J Call initiative "totally outdated," giving "the feeling that Israel is the sole obstacle to peace." 
Israel's Foreign Ministry declined to comment because the initiative is not government-sponsored.
'They simply do not understand the situation'
For Emmanuel Navon, Paris-born political commentator and professor at Tel Aviv University, supporters of JCall, as well as J Street, "simply do not understand the situation."

"I wonder if these people even watch the news! The situation has changed, and it is no secret to say that Israel has already accepted the two-state solution. Therefore, there is absolutely no point in trying to convince the Israeli government of anything,", he said.
"On the other hand, what these people do not seem to understand is that every time Israel offered concessions for peace, the Palestinians systematically refused. That is the main issue today – not trying to push for a two-state solution, but getting the Palestinian Authority to resume negotiations."

But according to Elie Barnavi, a former ambassador of Israel to France, who is expected to speak at Monday’s presentation of JCall in Brussels , “it is not enough to speak about a two-state solution, it is also essential to do everything for this solution to take form. And that will only begin with the end of colonization.” 

He said it was "time for other voices to be heard. Israel is in an unbearable situation today, because of its irresponsible government. Time is not our friend. JCall will finally give the opportunity to European Jews to speak out, before it’s too late."













फिलीस्तीनः दो राष्ट्र के समाधान के शत्रु हैं इस्राइल-अमेरिका



(गाजा की नाकेबंदी के खिलाफ फिलीस्तीन चित्रकार मुसावअबूसल का बनाया चित्र)           
       कुछ समय पहले एक सर्वे हुआ था जिसमें फिलीस्तीन और इस्राइली दोनों ही देशों की जनता ने फिलीस्तीन समस्या के समाधान के रुप में दो राष्ट्र के सिद्धान्त पर अपनी राय व्यक्त की थी। कुछ लोगों ने फिलीस्तीन-इस्राइल कनफेडरेशन का सुझाव दिया था।
    यह सर्वे हेरी एस ट्रूमैन रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर दि एडवांसमेंट ऑफ पीस ,हेब्रू विश्वविद्यालय ,यरुसलम ,और पैलेस्टाइनसेंटर फॉर पॉलिसी एंड सर्वे रिसर्च ने मिलकर किया था। इस सर्वे को फोर्ड फाउंडेशन का मदद से किया गया।  यह सर्वे दो देशों की जनता में किया गया।
    सर्वे के परिणाम बताते हैं कि इस्राइलियों में 71 प्रतिशत और फिलीस्तीनियों में 57 प्रतिशत लोग दो राष्ट्र के सिद्धान्त का समर्थन करते हैं। वे चाहते हैं कि फिलीस्तीन और इस्राइल दोनों राष्ट्र पास-पास बना दिए जाएं।
    दो राष्ट्र के समाधान के अलावा और क्या समाधान हो सकता है,इसके बारे में भी सर्वे किया था जिस पर 24 प्रतिशत इस्राइलियों और 29 प्रतिशत फिलीस्तीनियों का मानना है कि वैस्ट बैंक और गाजा को इस्राइल का हिस्सा बना दिया जाए और इन इलाकों में रहने वाले फिलीस्तीनियों को इस्राइलियों के बराबर समान अधिकार दे दिए जाएं।
   तीसरा समाधान यह है कि दो राष्ट्र,दो देशों की जनता को मिलाकर महासंघ बना दिया जाए। इस समाधान को 30 प्रतिशत इस्राइली और 26 प्रतिशत फिलीस्तीनियों का समर्थन प्राप्त है।
    दो राष्ट्र के समाधान को लेकर ज्यादा प्रचार किया जा रहा है,इस पर कई और सर्वे भी उपरोक्त संस्थाओं ने कराए हैं। इसमें यह पाया गया कि दो राष्ट्र के समाधान को इन देशों की जनता को समझाना बेहद मुश्किल है। 38 प्रतिशत इस्राइली और 42 प्रतिशत फिलीस्तीनियों का मानना है कि दो राष्ट्र के समाधान को लागू करना बेहद कठिन काम है। यह सर्वे वैस्ट बैंक,यरुसलम में 1270 लोगों और गाजा के लोगों में 127 लोगों के सेंपिल पर आधारित है।
     उल्लेखनीय है कि विश्व जनमत में दो राष्ट्र के समाधान पर ज्यादा से ज्यादा राय बन रही है और यह माना जा रहा है कि सन् 1967 के जून माह से पहले की अवस्था को आधार बनाकर दो राष्ट्रों का निर्माण कर दिया जाए और उसी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इनकी राष्ट्रीय सीमा भी बना दिया जाए। इसमें जरुरी हो तो छोटे परिवर्तन किए जा सकते हैं।
    दो राष्ट्र का समाधान नया समाधान नहीं है बल्कि यह समाधान 70 के दशक में ही पेश किया जा चुका था लेकिन उस समय अमेरिका ने इसे नहीं माना। मध्यपूर्व और अमेरिकी विदेशनीति के विशेषज्ञ नॉम चोम्स्की ने लिखा है कि दो राष्ट्र के सिद्धान्त को मध्यपूर्व के अरब राष्ट्रों और इस्लामिक देशों के संगठन का भी समर्थन हासिल था,इस संगठन में ईरान भी शामिल है। यहां तक कि हमास ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया था।
    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 1976 में पहलीबार दो राष्ट्र का समाधान पेश किया गया था। यह प्रस्ताव अरब राष्ट्रों ने पेश किया था,सुरक्षा परिषद के इस अधिवेशन का इस्राइल ने बहिष्कार किया था। अमेरिका ने सुरक्षा परिषद में इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया था। अमेरिका ने यही हरकत 1980 में भी की और इसी नीति पर वह अब तक संयुक्त राष्ट्र संघ में चलता रहा है। दो राष्ट्र के समाधान का अमेरिका-इस्राइल हमेशा विरोध करते रहे हैं। जबकि फिलीस्तीन के दोनों प्रधान संगठनों फतह और हमास ने दो राष्ट्र के समाधान का हमेशा समर्थन किया है।  


                     









रविवार, 2 मई 2010

जो हिटलर की चाल चलेगा वो हिटलर की मौत मरेगा



         हमारे हिन्दी के कुछ सुधी पाठक नाराज हैं कि फिलीस्तीन पर इतना हल्ला क्यों मचाए हुए हैं। पाठकों ने तीन सवाल उठाए हैं, पहला सवाल यह है कि फिलिस्तीन पर आंसू क्यों बहा रहे हैं ?
    हम इस प्रसंग में कहना चाहते हैं कि भारत की श्रेष्ठ मानवीय परंपरा है दूसरों के दुखों में शरीक होना। फिलीस्तीन हमारे लिए आज दूसरे बन गए हैं। महात्मा गांधी ने भी फिलिस्तीनियों के संप्रभु राष्ट्र के संघर्ष का समर्थन किया था। भारत सरकार की आम सहमति से बनी नीति है फिलीस्तीन राष्ट्र के समर्थन की। हम जो भी बातें लिख रहे हैं वे भारत की राष्ट्रीय नीति के समर्थन और गांधीजी के सपनों को पूरा करने के लिए लिख रहे हैं।
     दूसरी बात पाठकों ने यह कही है कि इस्राइल जो कुछ कर रहा है आत्मरक्षा के लिए कर रहा है। यह बात प्रत्येक दृष्टि से गलत है। इस्राइल ने  फिलीस्तीनियों के देश पर कब्जा किया हुआ है। कोई भी देशप्रेमी नागरिक यह पसंद नहीं करेगा कि उसके देश पर कोई बाहरी शक्ति आकर कब्जा कर ले।
    इस्राइल -अमेरिका ने आज तक फिलीस्तीन के बारे में संयुक्तराष्ट्र संघ और सुरक्षा परिषद का एक भी प्रस्ताव लागू नहीं किया है। इन दोनों देशों के अलावा सारी दुनिया चाहती है कि फिलीस्तीनियों की अवैध कब्जा की गई जमीन इस्राइल छोड़ दे। लेकिन वह मानने को तैयार नहीं है।
   एक पाठक ने पूछा है कि हम्मास क्या है ? हम्मास देशभक्त जुझारू क्रांतिकारी संगठन है और हम्मास को फिलीस्तीन की जनता में व्यापक समर्थन प्राप्त है। हम्मास ने हमेशा अपनी मातृभूमि के लिए संघर्ष किया है। हम्मास के कब्जे में इस्राइल का कोई हिस्सा नहीं है। हम्मास का फिलीस्तीन इलाकों में व्यापक नेटवर्क है जिसमें शिक्षा संस्थान,अस्पताल, अनाथालय आदि पचासों किस्म के जनसेवा के काम होते हैं। हम्मास के विकासमूलक कार्यों के लिए यूरोपीय देशों से व्यापक आर्थिक मदद भी मिलती है। अमेरिका और उसके भोंपू उसे आतंकवादी मानते हैं। जो तथ्य और सत्य दोनों ही दृष्टियों से गलत है। आप चाहें तो हम्मास के बारे में नेट पर फिलीस्तीन स्रोत सामग्री पढ़कर और ज्यादा जान सकते हैं।
     फिलीस्तीन आज सारी दुनिया में आजादी के प्रतीक है,स्वतंत्रता के संघर्ष में सबसे कठिन संघर्ष कर रहे हैं। हमें संप्रभु राष्ट्र,स्वतंत्रता और आजादी के मूल्य को इस्राइली-अमेरिकी बर्बरता से बचाना है तो फिलीस्तीन को आजादी और राष्ट्र की जमीन दिलाने के लिए समर्थन देना चाहिए। फिलीस्तीन की मुक्ति हम सबकी मुक्ति है। इस्राइली-अमेरिकी विस्तारवाद की पराजय मानवता के सुरक्षित विकास के लिए जरुरी है। सारी दुनिया में मानवाधिकारों के लिए,खासकर अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा किए जा रहे मानवाधिकार हनन की प्रक्रिया को इससे ्रारा झटका लगेगे। यह गठबंधन हारता है तो भारत भी मजबूत बनेगा
   जो लोग इस्राइल को फिलीस्तीन प्रसंग में निर्दोष मान रहे हैं वे जानते हैं कि इस्राइल की जितनी भी बर्बरता और युद्धोन्माद है उसका गोमुख है अमेरिका। अमेरिकी प्रशासन नहीं याहता कि फिलीस्तीन को मुक्ति मिले। इस्राइल कभी भी अपने बूते पर फिलीस्तीन का दमन नहीं कर सकता।
    अमेरिका की बेशुमार आर्थिक और सामरिक मदद का निरंतर बने रहना ही इस्राइल की बर्बरता का प्रधान कारण है। आज इस्राइल की पूरी अर्थव्यवस्था अमेरिकी मदद पर टिकी है। अमेरिका यदि आज इस्राइल की आर्थिक और सैन्य मदद बंद कर दे। हथियारों की सप्लाई बंद कर दे तो फिलीस्तीनी इलाकों से इस्राइल को भागना पड़े।
      फिलीस्तीन जनता के पास किसी भी तरह के आधुनिक हथियार नहीं हैं। गोला-बारुद नहीं है। अब स्थिति यह है कि पत्थर भी मारने के लिए नहीं बचे हैं। फिलीस्तीन के लोग इसके बावजूद बहादुरी के साथ निहत्थे जंग कर रहे हैं और उनके निहत्थे संघर्ष से मध्य-पूर्व का सबसे ताकतवर देश इस्राइल ढरा हुआ है। फिलीस्तीन को लेकर इस्राइली नेताओं में जिस कदर भय बैठा हुआ है उस भय को इस्राइली नेता परमाणु बम होने के बावजूद दूर नहीं कर पा रहे हैं।
       उल्लेखनीय है इस्राइल के पास अत्याधुनिक हथियारों का जितना बड़ा जखीरा है वैसा जखीरा मध्यपूर्व में किसी भी देश के पास नहीं है। फिलीस्तीन के भय से कांपते इस्राइली शासकों की रातों की नींद गायब है और वे उन हथकंडों को अपना रहे हैं जो कभी हिटलर ने यहूदियों पर लागू किए थे। हिटलर ने यहूदियों के सफाए को हर कीमत पर सुनिश्चित करने की कोशिश की और अंत में स्वयं ही मौत का शिकार बना। दुर्भाग्य की बात है कि इस्राइल का यहूदी नेतृत्व हिटलर के रास्ते पर चल निकला है। हिटलर का रास्ता पतन का रास्ता है। हिन्दी में चर्चित नारा है ‘‘ जो हिटलर की चाल चलेगा वो हिटलर की मौत मरेगा’’।
      


शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

इस्राइली यहूदी फंडामेंटलिज्म के सामने असहाय दुनिया

     फिलीस्तीन इलाकों में जहां इस्राइली सेनाओं ने अवैध कब्जा जमा लिया है वहां पर फिलीस्तीनी नागरिकों को बेदखल किया जा रहा है और अवैध बस्तियों का निर्माण किया जा रहा है। इस्राइल अधिकृत फिलीस्तीनी इलाकों में बर्बरता का कानून चल रहा है। स्थिति इतनी भयाभय है कि जो स्वयंसेवी संस्थाएं फिलीस्तीनियों के लिए मानवीय सहायता का काम कर रही हैं, उन्हें अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की अवहेलना करके प्रवेश परमिट नहीं दिया जा रहा है। इस्राइली प्रशासन काम करने नहीं दे रहा है।
     अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्थाओं को 16 दिसम्बर 2009 को अचानक ईमेल के जरिए इस्राइली प्रशासन ने सूचित किया कि स्वयंसेवी संस्थाओं को इस्राइल अधिकृत फिलीस्तीन इलाकों में काम करने का परमिट नहीं दिया जाएगा।
    पहली बात यह कि फिलीस्तीन इलाकों में परमिट देने का अधिकार फिलीस्तीन प्रशासन को है, यदि इस्राइल ऐसा करता है तो वह फिलीस्तीन प्रशासन को कागजी संगठन मात्र बना रहा है और यह फिलीस्तीन जनता का अपमान है।
    उल्लेखनीय है फिलीस्तीन प्रशासन में इन दिनों जो लोग बैठे हैं वे जनता के द्वारा चुने गए लोग हैं। फिलीस्तीन में आम चुनाव जितने पारदर्शी और लोकतांत्रिक ढ़ंग से होते हैं वैसे चुनाव इस्राइल में भी नहीं होते। फिलीस्तीन की संसद में ईमानदार और जनसेवा के लिए कुर्बानी देने वाले लोग ही संसद के लिए चुने जाते हैं।
    इसके विपरीत इस्राइल में समूचा राजनीतिक नेतृत्व भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ है। मध्य-पूर्व के सबसे ज्यादा भ्रष्ट और बर्बर फंड़ामेंटलिस्ट इस्राइल में सत्ता पर कब्जा जमाए बैठे हैं। इनमें यहूदी फंडामेंटलिस्टों का वर्चस्व है।
      फिलीस्तीन की सामयिक सच्चाई यह है कि अभी तक इस्राइल ने फिलीस्तीन की जमीन से अपने अवैध कब्जे नहीं हटाए है। अवैध रूप से बसायी गयी पुनर्वास बस्तियों को नहीं हटाया गया है । कुछ बस्तियों को कुछ समय पहले प्रतीकात्मक तौर पर खाली कराया गया था किंतु असल में सभी अवैध पुनर्वास बस्तियां ज्यों की त्यों बसी हुई हैं। संकेत मिल रहे हैं कि वेस्ट बैंक में बसायी गयी अवैध 149 बस्तियों को इजरायल नहीं हटाएगा। इसका अर्थ है कि फिलीस्तीनियों को स्थायी तौर पर विभाजन और घृणा में जीना पड़ेगा।
संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवीय कार्यकलाप संयोजन दफतर के मुताबिक अभी वेस्ट बैंक में इस समय 651 निगरानी चौकियां हैं। इन निगरानी चौकियों के जरिए फिलीस्तीनियों की चैकिंग होती है।  जबकि अवैध बस्तियों के इलाकों में मात्र आठ निगरानी चौकियां हैं।
     निगरानी चौकियों के बहाने फिलीस्तीनियों को दैनन्दिन जीवन में अकथनीय तकलीफों का सामना करना पड़ता है।  उनकी रोजमर्रा की जिंदगी से लेकर समूची अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाह हो गयी है। आश्चर्य की बात है  जो फिलीस्तीनी नागरिक अपने वतन आना चाहते हैं उन्हें इस्राइल आने नहीं देता और इसके बदले में फिलीस्तीनियों की जमीन पर अवैध ढ़ंग से यहूदियों को बाहर से लाकर बसाया जा रहा है। ऐसा करके स्थायी तौर पर वह फिलीस्तीन को पूरी तरह नष्ट करके उसका अंत ही कर देने पर आमादा है। 
फिलीस्तीनियों पर एक तरफ हमले हो रहे हैं दूसरी ओर उन्हें बेदखल करके उनकी जमीन हथियाकर अवैध ढंग से यहूदी बस्तियां बसायी जा रही हैं। अवैध यहूदी बस्तियां सिर्फ बस्तियां ही नहीं हैं बल्कि इन्हें फिलीस्तीनी बस्तियों से अलग काटकर बसाया जा रहा है। उनकी बस्तियों से अलग इन्हें दीवार बनाकर किले की तरह बसाया जा रहा है। यह एक तरह का स्थायी विभाजन है जिसे फिलीस्तीन की सरजमीं पर थोपा जा रहा है।
     कोई सभ्यता मानवीय है या नहीं यह इस तथ्य से तय होता है कि वह हमलावर है या नहीं। भारतीय सभ्यता का दर्जा इसी अर्थ में पश्चिमी सभ्यता से काफी ऊँचा है। भारतीय सभ्यता हमलावर नहीं है। इसमें मित्रता का भाव है,इसके विपरीत पश्चिमी पूंजीवादी सभ्यता हमलावर सभ्यता है। वह युध्द के बिना जिंदा नहीं रह सकती,बर्बर आक्रमण उसकी दैनन्दिन खुराक है।

बड़े पूंजीवादी राष्ट्र अन्य कमजोर देशों पर बर्बर हमले न करें तो पश्चिमी सभ्यता की सांसें बंद हो जाएं ,कारखाने बंद हो जाएं। पश्चिमी सभ्यता के भक्तों को इस तथ्य पर विचार करना चाहिए कि पश्चिम इतना बर्बर, निष्ठुर, निरंकुश ,असहिष्णु, और आक्रामक क्यों है ?

इस्राइल की बर्बरता और युध्दवादी मानसिकता के पीछे आज समूचा पश्चिमी सत्ता तंत्र खड़ा है। इस्राइल को पश्चिमी समाज आधुनिकता का आदर्श मॉडल बताकर पेश करता रहा है,जबकि  इस्राइल सबसे ज्यादा बर्बर और हिंसक देश है। इस्राइली आक्रामकता,हिंसाचार,यहूदीवादी विस्तारवाद की चैनलों से गाथाएं गायब हैं। मरने वालों के बारे में कोई विस्तृत रिपोर्ट नहीं आ रही है। यहां तक कि संयुक्तराष्ट्र संघ भी इस्राइल के सामने असहाय है।

मुसलमानों का प्रतिदिन किसी न किसी बहाने कत्ल या जनसंहार दिखाना आम रिवाज बन गया है, इससे मुसलमानों के बारे में खास किस्म की इमेज बन रही है। मुसलमानों को बर्बर, आतंकवादी,हिंसक आदि रूपों में पेश किया जा रहा है। इसके कारण मुसलमानों के प्रति सही और संतुलित ढ़ंग से आम जीवन में बातें करना भी मुश्किल हो गया है।

 मिथकशास्त्री एस.कीन ने मध्यपूर्व युध्द में निर्मित किए गए मिथों का खुलासा करते हुए लिखा है,''हथियारों से हत्या करने से पहले सबसे पहले हम मन में लोगों की हत्या करें।चाहे जिस तरह का युध्द हो।शत्रु हमेशा संहारक होता है और हम अच्छे लोगों की तरफ होते हैं।वे बर्बर होते हैं।हम सभ्य होते हैं।वे शैतान होते हैं।टेलीविजन से निरंतर आग के गोले दर्शक को एक ऐसे स्वप्नलोक में ले जाते हैं जहां उसके दिमाग में किसी भी किस्म के विचार नहीं आते। अब शत्रु को नम्बरों में बदल दिया गया था। "
समाचार चैनलों में मारे गए इस्राइली नागरिकों ,बच्चों के माता-पिता के बयान,फोटो, दुखी चेहरे दिखाई दे जाएंगे ,किन्तु किसी मुसलमान बच्चे के माता-पिता के दुखी चेहरे नजर नहीं आएंगे। गाजा में तो लंबे समय से सिर्फ बच्चों का ही इस्राइल द्वारा कत्ल किया जा रहा है किन्तु किसी भी चैनल ने पीडित माता-पिता के दृश्य नहीं दिखाए, गोया ! मुसलमान बच्चों के माता-पिता नहीं होते !
      चैनलों में लेबनान,सीरिया,इण्डोनेशिया, इरान, इराक, सोमालिया, सऊदी अरब, लीबिया, सूडान,अफगानिस्तान,पाकिस्तान आदि के मुसलमानों की कत्लेआम की खबरें आम हो गई हैं। आतंकवाद विरोधी मुहिम के तहत इन देशों के मुस्लिम बाशिंदों को खदेड़ा जा रहा है, हमले ए जा रहे हैं,बदनाम किया जा रहा है,सवाल किया जाना चाहिए कि यदि इन सभी देशों से मुसलमानों को निकाल देगें तो आखिरकार मुसलमान जाएंगे कहां ? क्या सारी दुनिया में मुसलमान सिर्फ शरणार्थी शिविरों में ही रहेंगे ? अथवा मुसलमानों को उनके देश में ही कैद करके रखा जाएगा ?जिससे उन्हें कभी भी कुत्तों की तरह गोलियों से भून दिया जाए,जैसा कि अभी मध्य-पूर्व के देशों में हो रहा है। पश्चिमी सभ्यता के रखवाले अमेरिका-इस्राइल ने मुसलमानों के सामने जनतांत्रिक प्रतिवाद का कोई अवसर ही नहीं छोड़ा है। मुसलमान को प्रतिवाद करना हो तो आतंकवादी बने अथवा अमेरिका के चरणों में पड़ा रहे।

मध्यपूर्व  अमेरिका की जो दादागिरी चल रही है उसका गहरा संबंध अमेरिका के सैन्य उद्योग समूह के साथ है।अमेरिका की विदेश नीति का यह उद्योग समूह मूलाधार है। अमेरिका की समूची अर्थव्यवस्था इस समय सैन्य उद्योग,संस्कृति उद्योग और सूचना उद्योग पर टिकी हुई है। ये तीनों उद्योग समूह एक-दूसरे पर निर्भर हैं।एक के बिना दूसरे का विकास संभव नहीं है। हथियार उत्पादन अमेरिकी नीतियों में सबसे प्रमुख क्षेत्र है।हथियार उत्पादन क्षेत्र यदि प्रमुख क्षेत्र होगा तो उसका दूसरा कदम हथियारों का निर्यात करना होगा।अमेरिकी कंपनियों को इसके लिए ग्लोबल रणनीति बनानी होती है।इसका अर्थ यह है कि युध्द का निरंतर बने रहना। युध्द नहीं होंगे तो हथियार नहीं बिकेंगे। हथियार नहीं बिकेंगे तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी।इसका अर्थ यह हुआ कि निररंतर युध्द का बने रहना।

मजेदार बात यह है कि हमारे शांति आंदोलन की मांगों में युध्द बंद करने या अमेरिका की युध्दवादी नीतियों को नंगा करने वाली मांगें तो रहती हैं किंतु सैन्य उद्योग को शांति और विकास के कार्यों में रूपान्तरित करने की मांग शामिल नहीं रहती।यह स्थिति अमेरिका के शांति आंदोलन की भी है।

कायदे से शांति आन्दोलन को युध्द के साथ -साथ सैन्य उद्योग के शांति एवं विकास कार्यों में रूपान्तरण की मांगों को भी अपना एजेण्डा बनाना चाहिए। शांति आंदोलन की मुश्किल यह है कि युध्द के खत्म होते ही वे शांत हो जाते हैं। जबकि सैन्य उद्योग काम करता रहता है।

युध्द को खत्म करने के लिए जरूरी है कि हथियारों के उत्पादन पर रोक लगायी जाए।हम यह चेतना अभी तक पैदा नहीं कर पाए हैं कि जनसंहारक अस्त्रों के निर्माण कार्य में हमारे वैज्ञानिक,रक्षा विशेषज्ञ आदि भाग न लें। हथियारों को बनाने वाले हाथ नहीं होगे तो हथियार भी नहीं बनेंगे। जनसंहारक अस्त्रों के निर्माण की प्रक्रिया से लेकर युध्द के मैदान और युध्द के बाद की स्थितियों तक शांति आंदोलन का दायरा फैला हुआ है।

हमें इस लचर  तर्क से बचना चाहिए वैज्ञानिक अस्त्र नहीं बनाएंगे तो खाएंगे क्या ?सैन्य उद्योग समूह पर जो परिवार निर्भर हैं वे क्या खाएंगे ? अमेरिकी कंपनियां इस्राइल को नए अस्त्र-शस्त्र सप्लाई कर रही हैं। अमेरिकी सैन्य उद्योग में काम करने वाले ओवरटाइम काम कर रहे हैं। वे इस्राइल के आर्डर की सप्लाई लाइन चालू रखे हुए हैं।

सैन्य उद्योग में काम करने वाले कर्मचारी इस बात पर गर्वित हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा उत्पादन कर रहे हैं। क्या हमारे मजदूर आंदोलन को सैन्य उद्योग में काम करने वाले कर्मचारियों के साथ शांति आंदोलन को जोड़ने के बारे में नहीं सोचना चाहिए ? हमें इस सवाल का भी जबाव खोजना होगा कि आखिरकार अमेरिका के शांति आंदोलन ने सैन्य कर्मचारियों को अपने प्रभाव में अभी तक क्यों नहीं लिया है ?

आज हथियारों की दौड़ धरती तक ही सीमित नहीं है बल्कि उसने पूरे अंतरिक्ष को भी अपनी जद में ले लिया है।पेंटागन का अब तक का सबसे बड़ा प्रकल्प है प्लेनेट अर्थ ।इसका लक्ष्य है अंतरिक्ष को हथियारों से भर देना। यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि आज अमेरिका अपने देश में शांति के काम में आने वाली कितनी चीजें पैदा कर रहा है ? बाजार में जाने पर बमुश्किल कोई ऐसी चीजें नजर आएं।हथियारों का निर्माण करके अमेरिका बड़े पैमाने जहां युध्द को बनाए रखना चाहता है,वहीं दूसरी ओर अमेरिका युध्द के बहाने गैस और तेल के भंडारों को अपने कब्जे में लेना चाहता है।यह सिलसिला जारी है।

              


          


गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

ओबामा का वायदा दो साल में फिलीस्तीन राष्ट्र

(फिलीस्तीन राष्ट्रपति महमूद अब्बास और अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा)  
      अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने फिलीस्तीन के राष्ट्रपति  महमूद अब्बास से वायदा किया है कि दो साल में संप्रभु सार्वभौम फिलीस्तीन राष्ट्र का निर्माण कर दिया जाएगा। यह खबर मिस्र के सरकारी सूत्रों के हवाले से अरबी भाषा के अखबार अल हयात में छपी है।
      उल्लेखनीय है ओबामा प्रशासन का इस्राइल पर राजनीतिक दबाब अभी काम नहीं कर रहा है। क्योंकि अमेरिका की यहूदी लॉबी और शस्त्र उद्योग के मालिक इस्राइल के विस्तारवादी-सैन्यवादी बर्बर इरादों का खुला समर्थन कर रही है। इस लॉबी पर ओबामा निर्भर हैं। 
   आज अमेरिकी प्रशासन की किसी भी सलाह को इस्राइली शासक सुन नहीं रहे हैं। हाल ही में ओबामा के मध्य-पूर्व में विशेष राजदूत जार्ज मिशेल ने इस्राइल को फिलीस्तीन के इलाकों से इस्राइली सेनाओं को तुरंत हटाने के लिए कहा था जिसे इस्राइली प्रशासन ने तुरंत खारिज कर दिया। अमेरिकी दूत ने वैस्टबैंक के उन इलाकों से इस्राइली सेना हटाने के लिए कहा था जहां पर सन् 2000 के सैकिण्ड इंतिफादा के समय उसने अवैध कब्जा जमाया हुआ है। इसके बदले में इस्राइल ने कुछ नाका चौकियां हटाने और इस्राइली जेलों में बंद कुछ कैदियों को छोड़ने का प्रस्ताव किया था।
     उल्लेखनीय है कि विगत सप्ताह फतह पार्टी के सम्मेलन में फिलीस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने अमेरिकी राष्ट्रपति से यह अपील की थी कि फिलीस्तीन राष्ट्र के निर्माण के लिए मध्य-पूर्व पर समाधान थोपा जाए। श्री अब्बास ने फिलीस्तीन क्षेत्र के अंदर अस्थायी सीमारेखा बनाकर फिलीस्तीन राष्ट्र बनाने  के इस्राइली प्रस्ताव को एकसिरे से ठुकरा दिया है।                      







फिलीस्तीन की आर्थिक तबाही पर चुप क्यों हैं भारतीय बुद्धिजीवी


(फिलीस्तीनी फूलों की दुकान)
          एक जमाना था हिन्दी में साहित्यकारों और युवा राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं में युद्ध विरोधी भावनाएं चरमोत्कर्ष पर हुआ करती थीं, हिन्दीभाषी क्षेत्र के विभिन्न इलाकों में युध्द विरोधी गोष्ठियां,प्रदर्शन, काव्य पाठ आदि के आयोजन हुआ करते थे,किंतु अब यह सब परीकथा की तरह लगता है।
      हिन्दी के बुद्धिजीवियों में अंतर्राष्ट्रीय मानवीय सरोकारों को लेकर बेगानापन बढ़ा है। हिन्दी के बुध्दिजीवी खासकर प्रगतिशील बुद्धिजीवी स्थानीय सरोकारों और मुद्दों पर इस कदर व्यस्त हैं कि उन्हें स्थानीयता के अलावा अन्य कुछ भी नजर ही नहीं आता। यह हिन्दी के बुद्धिजीवी की बदली हुई मनोदशा का संकेत है।
       अब प्रगतिशील जितना साम्प्रदायिकता पर हल्ला करते हैं, अमेरिका-इस्राइल के मध्यपूर्व में चलाए जा रहे जनसंहार अभियान पर उतना हल्ला नहीं मचाते। यह अचानक नहीं है कि मध्यपूर्व में चल रहा जनसंहार हिन्दी के बुद्धिजीवियों के चिन्तन के केन्द्र से अचानक गायब हो गया है।
        भूमंडलीकरण के वैचारिक हथौड़े ने बुद्धिजीवियों को व्यापक जनहित के सरोकारों की बजाय स्थानीय सरोकारों में उलझा दिया है। जबकि सच यह है कि बुद्धिजीवी वही कहलाता है जो अपने समय के सबसे बड़े सरोकारों को व्यक्त करता है। फिलीस्तीन में हाल ही में जिस तरह का बर्बर ताण्डव चल रहा है। वह हम सबके लिए शर्म की बात है। हमें प्रत्येक स्तर पर अमेरिकी-इस्राइली बर्बरता के खिलाफ एकजुट होकर आवाज बुलंद करनी चाहिए। हमें सोचना होगा कि इराक में जब तक अमेरिका एवं उसके सहयोगियों की सेनाएं कब्जा जमाए हुए हैं,इराकी जनता पर मानव सभ्यता के सबसे बर्बर अत्याचार हो रहे हैं,फिलीस्तीन जब तक अपनी धरती से वंचित है।ऐसी अवस्था में दुनिया में किसी भी किस्म की शांति की कल्पना करना बेमानी है।
          मध्यपूर्व में अमेरिका-इस्राइल की सैन्य कार्रवाई ने हमारे घरों के चूल्हे,कल-कारखाने,मोटर, गाडियां, परिवहन, माल ढुलाई,विकास आदि के प्रकल्पों को मंहगा बना दिया है। मध्यपूर्व में अमेरिका-इस्राइल जितना आक्रामक होंगे हमारा घरेलू बजट उतना ही गडबड़ाएगा। यह संभव ही नहीं है कि युध्द मध्यपूर्व में हो और हम उसके प्रभाव से बच जाएं। भूमंडलीकरण के दौर में कोई भी घटना स्थानीय नहीं होती,युद्ध भी स्थानीय नहीं होते।इस दौर में जो लोकल है वह ग्लोबल होता है और जो ग्लोबल है वह लोकल है। सैन्य दृष्टि से युद्ध स्थानीय होता है,किंतु राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव की दृष्टि से युद्ध हमेशा ग्लोबल होता है।
      फिलीस्तीनी जनता के खिलाफ किए जा रहे हमलों की जड़ में दो प्रधान लक्ष्य हैं , पहला है ,फिलीस्तीनी अर्थव्यवस्था को तबाह करना और दूसरा फिलीस्तीन जाति को पूरी तरह नष्ट करना। फिलीस्तीन की आर्थिक नाकेबंदी का अर्थव्यवस्था पर सीधा बुरा असर हो रहा है। इस्राइली समर्थन में काम करने वाला बहुराष्ट्रीय मीडिया ,फिलीस्तीन की तबाही के लिए फिलीस्तीन की मुक्ति के संघर्ष में सक्रिय संगठनों की तथाकथित हमलावर कार्रवाईयों के लिए जिम्मेदार ठहराता रहा है। साथ ही इस्राइली हमलों का लक्ष्य आतंकी निशानों को बताता रहा है। वास्तविकता यह है कि इस्राइली सैनिकों के द्वारा आम जनता,रिहायशी बस्तियों ,और अर्थव्यवस्था पर हमले होते रहे हैं।
      हाल ही में अदालत में इस्राइल के वकील ने यह माना कि आतंकियों पर हमले के दौरान जनता की संपत्ति पर भी हमले हुए हैं। अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए बिजली काट दी गयी, पानी की सप्लाई बंद कर दी गयी। गैस लाइन बंद कर दी गयी। इस्राइल के इस तरह के कदम फिलीस्तीन जनता के खिलाफ की गयी सामूहिक दंडात्मक कार्रवाई हैं। बिजली ,पानी की सप्लाई काटना अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन है।
      फिलीस्तीनी बस्तियों की वास्तविकता यह है कि उनमें इस्राइल ने जगह -जगह बेरीकेट लगा दिए हैं। प्रत्येक बेरीकेट पर इस्राइली सैनिकों की चौकियां हैं , इनसे माल और लोगों का आना -जाना बेहद कठिन है। फिलीस्तीनी नागरिकों पर चौतरफा हमले हो रहे हैं। कभी इस्राइली सैनिक हमले कर देते हैं तो कभी फिलीस्तीनी इलाकों में रहने वाले अवैध इस्राइली हमले कर देते हैं। इस प्रक्रिया में फिलीस्तीन के सकल घरेलू उत्पाद में सन् 1999-2007 के बीच 40 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गयी। उद्योग के क्षेत्र में निवेश बंद हो गया है। फिलीस्तीनियों की 37 फीसदी जमीन पर अवैध बस्तियां बसा दी गयी हैं। अकेले वैस्ट बैंक में 100 से ज्यादा अवैध बस्तियां बसायी गयी हैं।
      वैस्ट बैंक और पूर्वी यरुसलम में इस्राइली पाबंदियों और अवैध बस्तियों के बसाने के कारण अवैध इस्राइलियों की तादाद में सालाना 3.44 प्रतिशत की दर से इजाफा हुआ है। अकेले इस इलाके में 461,000 अवैध इस्राइलियों की संख्या बढ़ी है। वेस्ट बैंक के 227 इलाके हैं जो ओसलो समझौते के अनुसार फिलीस्तीन प्रशासन के तहत आते हैं। इन इलाकों का संपूर्ण दायित्व फिलीस्तीनी प्रशासन का है।
      ओसलो समझौते के अनुसार वेस्टबैंक के ए.बी.और सी तीन क्षेत्र हैं. इनमें ए और बी क्षेत्र में आने वाले सघन शहरी क्षेत्र की जमीन के इस्तेमाल और नागरिक प्रशासन की जिम्मेदारी फिलीस्तीन स्वशासन की है , बी क्षेत्र में आने वाले ग्रामीण इलाकों की भी जिम्मेदारी फिलिस्तीनियों की है। लेकिन इस क्षेत्र के ग्रामीण क्षेत्र की सुरक्षा की इस्राइल और फिलीस्तीनियों की साझा जिम्मेदारी है।
        उल्लेखनीय है कि वेस्ट बैंक के ए और बी क्षेत्र साझा नहीं हैं। लेकिन सी केटेगरी में आने वाले क्षेत्र वस्तुत : ए और बी वाले क्षेत्रों की नाकाबंदी करते हैं, चारो ओर से ए और बी के क्षेत्र को घेरते हैं। सी क्षेत्र में ही वेस्ट बैंक के सभी मुख्य इन्फ्रास्ट्रक्चर हैं, इनमें मुख्य सड़कें भी शामिल हैं। सी क्षेत्र पूरी तरह इस्राइली सेना के कब्जे में है। सी क्षेत्र के 59 फीसदी इलाके में अवैध बस्तियां बसा दी गयी हैं। उल्लेखनीय है सी क्षेत्र में किसी किस्म का निर्माण कार्य करने का इस्राइल को अधिकार नहीं है। इसके बावजूद बड़े पैमाने पर अवैध बस्तियों का निर्माण जारी है।
      ओसलो समझौते अनुसार गाजा से सटे समुद्री इलाके में फिलीस्तीनी मछुआरे बगैर किसी बाधा के 20 मील तक समुद्र में नौका लेकर जा सकते हैं। सन् 2000 में दूसरे इंतिफादा के बाद से यह इलाका हम्मास के कब्जे में आने के बाद से इस्राइल ने समुद्री सीमा को 20 से घटाकर 6 मील तक सीमित कर दिया था। विगत दो सालों में 3 मछुआरे इस्राइली सेना के हाथों अतिक्रमण करने के कारण मारे गए हैं। अनेक घायल हुए हैं और अन्य की नौकाएं जब्त कर ली गयी हैं। जो मछुआरे पकड़े जाते थे उन्हें नंगा करके समुद्र में तैरकर उस जगह तक जाने के लिए बाध्य किया जाता है जहां तक वह अपनी नौका लेकर गया था। यहां तक कि तेज ठंड़ में भी उन्हें यह दंड झेलना पड़ता है. बाद में उन्हें इस्राइली सैनिक चौकियों पर ले जाया जाता है।
       संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार समुद्र से मछली पकड़ने के लिए कम से कम 12-15 मील तक अंदर जाने पर ही अच्छी मछलियों के मिलने की संभावना होती है। इस्राइली पाबंदी के कारण मछली उत्पादन में गिरावट आयी है। चूंकि समुद्र में ज्यादा गहरे जाकर मछली पकड़ने की संभावनाएं खत्म हो गयीं और लागत बढ़ गयी इसके कारण मछुआरों ने इस धंधे से अपना मुँह फेरना शुरु कर दिया।
       संयुक्तराष्ट्र संघ के अनुसार सन् 2006 में मछली उत्पादन 823 टन था जो सन् 2006 में घटकर 50 टन रह गया। उल्लेखनीय है फिलीस्तीनियों के सकल घरेलू उत्पाद का 4 फीसदी मछली उद्योग से आता था। फिलीस्तीन बड़े पैमाने पर मछली का निर्यात करते थे। 1990 के दशक में 10 मिलियन डालर की इस क्षेत्र से सालाना आय होती थी। आज मछली उद्योग पूरी तरह तबाह पड़ा है।
       सन् 2001 से 2006 के बीच में मछुआरों और समुद्री इलाके के बाशिंदों की अच्छी आय हुआ करती थी। लेकिन इन दिनों गाजा में भयानक बेकारी है। लगातार कुपोषण बढ़ रहा है। अब मछली का इस्राइल आयात किया जा रहा है। बाजार में मछली की जबर्दस्त मांग है लेकिन मछली नहीं है।
      दूसरी ओर गाजा में फूलों का समूचा व्यापार लगभग चौपट हो गया है। उल्लेखनीय है गाजा से फूलों का यूरोपीय देशों में बड़े पैमाने पर निर्यात किया जाता है, लेकिन गाजा की निरंतर नाकेबंदी और बमबारी ने फूलों का व्यापार बर्बाद कर दिया है। गाजा में 480 बड़े फूलों के बागान हैं जिनमें सालाना ( नवम्बर-मई के बीच) 60 मिलियन फूल पैदा होते हैं। सीजनल एक्सपोर्ट के जरिए सालाना 5 मिलियन डॉलर का रेवेन्यू आता था और तकरीबन 4 हजार नौजवानों को नौकरी भी मिलती थी, नाकेबंदी का इस पर महरा प्रभाव पड़ा है।
       इस्राइल के द्वारा सीमाएं बंद कर देने का अन्य बातों के अलावा फूलों के व्यापार पर सीधा असर हुआ है। क्योंकि फिलीस्तीन के बाहर कोई भी चीज बाहर तभी जा सकती है जब वह इस्राइल द्वारा रोकी न जाए। फिलीस्तीन की सारी सीमाएं इस्राइल के रहमोकरम पर निर्भर हैं। अकेले यूरोपीय देशों के लिए गाजा से 75 मिलियन करमुक्त फूल निर्यात किए जाते थे, इस साल बमुश्किल 5 मिलियन फूलों का ही निर्यात हो पाया है।
        नाकेबंदी ने फूलों का कारोबार बर्बाद कर दिया है। फूल उत्पादक कर्जों में डूब गए हैं। फूलों की बिक्री से आज न्यूनतम आमदनी भी नहीं हो पा रही है। इसके कारण माली- मजदूर, बीज,खाद आदि के भुगतान करने में फूल उत्पादक असमर्थ महसूस कर रहे हैं।
       चूंकि ज्यादातर फूल उत्पादक कर्ज लेकर खेती करते रहे हैं अतः उनके पास कर्ज चुकाने के लिए रुपये नहीं हैं और ऐसी स्थिति में उन्हें जेल की हवा खानी पड़ रही है। इस्राइल की हैवानियत का आलम यह है कि वह उन्हीं फूल उत्पादकों को सीमा पार जाकर फूल बेचने दे रहा है जो इस्राइली प्रशासन को यह लिखकर दें कि वे फूलों का निर्यात नहीं करेंगे। अनेक मर्तबा यह होता है कि फूलों से भरे ट्रक सीमा पर लंबे समय तक खड़े रहते हैं और सारे फूल नष्ट हो जाते हैं। इस्राइल ने समुद्री जहाजों से फूल निर्यात पर पाबंदी लगा दी है। यदि फूल देरी से सप्लाई के कारण नष्ट हो जाते हैं तो उसकी कीमत फूल उत्पादक को ही देनी होती है। जबकि देरी में इस्राइली अधिकारियों का हाथ होता है,फूलों के नष्ट होने की कीमत उनसे वसूली जानी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता और देरी के कारण नष्ट होने वाले फूलों की कीमत फूल उत्पादकों को भरनी होती है। इस समूची प्रक्रिया में बेलेन्टाइन डे पर फूलों का कारोबार पूरी तरह चौपट हो चुका है, आगामी 11 मई को मातृदिवस पर फूलों के निर्यात के लिए फूल उत्पादक आस लगाए बैठे हैं। लेकिन अभी तक के हालात से लगता नहीं है कि कोई खास कारोबार हो पाएगा।

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

मनमोहन-सोनिया -आडवाणी शर्म करो इस्राइली बर्बरता पर बोलो



( फिलीस्तीनी चित्रकार मोहम्मद सावू का गाजा दमन के खिलाफ बनाया चित्र)
          
   गाजा की इस्राइल द्वारा नाकेबंदी जारी है। हजारों लोग खुले आकाश के नीचे कड़कड़ाती ठंड में ठिठुर रहे हैं , इन लोगों के पास न तो कम्बल हैं, न टैंट हैं, न खाना है, न पीने का साफ पानी है। यह बातें संयुक्तराष्ट्रसंघ मानवीय सहायता दल के संयोजक मैक्सवेल गेलार्ड ने फिलीस्तीनी इलाकों का ङाल ही में निरीक्षण करने के बाद पत्रकारों से कही हैं। 
    आश्चर्य की बात है भारत सरकार ने अभी तक गाजा की तबाही और इस्राइली नादिरशाही के खिलाफ एक भी बयान तक जारी नहीं किया है। कांग्रेस के नेतृत्व का फिलिस्तीनियों पर इस्राइली सेना के बर्बर अत्याचारों पर चुप्पी लगाए रहना भारत के लिए शर्मिंदगी की बात है। भारत लगातार फिलीस्तीनी जनता के स्वाधीनता संग्राम का समर्थक रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के जमाने में विगत 6 सालों से इस्राइल के साथ जिस तरह का राजनीतिक व्यवहार किया जा रहा है और फिलीस्तीनी जनता के ऊपर हो रहे बर्बर हमलों पर जिस तरह की चुप्पी विदेश मंत्रालय ने लगाई हुई है वह भारत सरकार की फिलीस्तीन समर्थक विदेश नीति में आए बदलाव की सूचना है, यह इस बात का भी संकेत है कि कांग्रेस ने इस्राइल के प्रति समर्पण की एनडीए के शासन के दौरान अपनायी गयी नीति को स्वीकार कर लिया है। यह भारत की फिलीस्तीनी जनता के साथ भीतरघात है। भारत की जनता का अपमान है। हम जरा गाजा में झांककर देखें कि वहां क्या हो रहा है।
     उल्लेखनीय है पिछले साल दिसम्बर-08 से जनवरी 2009 के बीच गाजा पर की गई भयानक बमबारी के कारण हजारों बिल्डिंगें ,मकान, स्कूल,अस्पताल सड़कें आदि पूरी तरह नष्ट हो गए थे। एक गैर सरकारी संस्था ऑक्सफॉम के अनुसार गाजा को तत्काल 268,000 मीटर कांच खिड़कियों के लिए और 67,000 स्क्वेयर मीटर सोलर वाटर हीटर के लिए चाहिए। इसके अलावा इतना ही कांच 30 फुटबाल पिचों को कवर करने के लिए चाहिए।
     गाजा में फिछले साल हुई इस्राइली बमबारी के कारण पानी सप्लाई , पायखाना, बिजली आदि का समूचा ढ़ांचा नष्ट हो गया। सहायता कार्य में लगी संस्थाओं को बड़ी परेशानी हो रही है। उन्हें सीवर लाइन के पाइप,वाटर पंप ,टंकी आदि की मरम्मत के लिए पर्याप्त सामान, पुर्जे,तेल आदि नहीं मिल पा रहे हैं। इसके कारण पीने के साफ पानी का अभाव बना हुआ है। बिजली उत्पादन व्यवस्था के बमबारी के कारण पूरी तरह नष्ट हो जाने का पानी की सप्लाई पर सीधा असर हुआ है।
     फिलीस्तीन का दैनन्दिन नजारा यह है कि गाजा के सभी रास्ते इस्राइली सेना ने बंद पर दिए हैं। आए दिन लगातार इस्राइली सैनिक घर -घर घुसकर तलाशी अभियान चला रहे हैं, ऊपर से रॉकेट से बस्तियों पर हमले किए जा रहे हैं। कई नाके वाले इलाकों में इस्राइली सैनिकों और हम्मास के सैनिकों के बीच झड़पें भी हुई हैं। विगत कुछ दिनों में जिस तरह झड़पें हुई हैं और इस्राइल ने हमले तेज किए हैं उससे यह भी कयास लगाए जा रहा है कि इस्राइल के द्वारा गाजा पर बड़े हमले की तैयारी चल रही है।    
शांति के नाम पर इस्राइल-अमेरिका मांग कर रहे हैं कि फिलिस्तीनी जनता अपने संघर्ष की सभी योजनाओं को त्याग दे।प्रतिरोध के सभी प्रयास बंद कर दे।इस्राइल के आतंक-उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष बंद कर दे।उल्लेखनीय है  इस्राइल के द्वारा फिलिस्तीनियों का उत्पीड़न उनके क्षेत्र में हो रहा है।इस्राइल बृहद इस्राइल के सपने को साकार करने में लगा है।इस प्लान के आने के पहले जिन्नी प्लान,टेनेट प्लान आदि लाए गए किंतु अंतत: इस्राइली विस्तारवाद के आगे सबको ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया गया।
     फिलिस्तीनी बच्चों को इस्राइली हमलों के कारण गंभीर मनोवैज्ञानिक कष्टों से गुजरना पड़ रहा है। इस्राइली हमलों का ये बच्चे मात्र पत्थरों से प्रतिरोध कर रहे हैं।जबकि इस्राइल के द्वारा उन पर टैंकों, वायुयानों और तोपों से हमले किए जा रहे हैं।अनेक मर्तबा तो निहत्थे बच्चों को सीधे गोलियों का निशाना बनाया जा रहा है।फिलिस्तीनी जनता के खिलाफ इस्राइल सभी किस्म के हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है। मानव सभ्यता के इतिहास में इतने बर्बर हमले पहले शायद किसी ने नहीं किए जितने इस्राइल ने किए हैं।

इस्राइली आतंक ने फिलिस्तीनी बच्चों को सामान्य बच्चों से भिन्न बना दिया है।बच्चों के ऊपर जिस तरह का दबाव पड़ रहा है उसके कारण बच्चों का अपने ऊपर नियंत्रण खत्म होता जा रहा है। उनके अंदर सुरक्षा की भावना खत्म होती जा रही है।दैनंदिन आतंक ने बच्चों को अंतर्विरोधी अनुभूतियों का शिकार बना दिया है। इनमें कुछ सकारात्मक अनुभूतियां हैं तो कुछ नकारात्मक अनुभूतियां हैं।

मसलन् बंदूक से पलायन ही बच्चों में खुशी का कारण बन जाता है।बच्चे परेशान रहते हैं कि स्कूल कब खुलेंगे।बाजार कब खुलेगा।पिता कब लौटकर आएंगे।माता-पिता कब तक घर से दूर रहेंगे।वे दिन-रात इस्राइली सेना के हमले के दुस्वप्न देखते रहते हैं।इस्राइली सेना के प्रक्षेपास्त्र हमलों को लेकर आतंकित रहते हैं।सो नहीं पाते।ज्यादातर बच्चों की पाचन-क्रिया गड़बड़ा गई है। इससे बच्चों का शारीरिक विकास बाधित हो रहा है।
इस्राइली आतंक ने बच्चों के खेलों का चरित्र बदल दिया है।पहले बच्चे जुलूस,सेना और बमबारी का खेल खेलते थे।किंतु अब इसमें मशीनगन और हेलीकॉप्टर भी शामिल हो गए हैं। पहले बच्चे रबड़ की गोलियों,शब्द करने वाले पटाखों,धुँआ छोड़ने वाले या ऑंसू गैस के गोलों और बमों से खेलते थे। किंतु अब बच्चे हवाई जहाज, बमों,टैंक,खुले घरों,बम,और रॉकेट आदि से खेलते हैं।
 बच्चों की भाषा में भी बदलाव आया है।अब बच्चे धार्मिक भाषा में बोलने लगे हैं।वे कहते हैं कि 'शरीर मरता नहीं बल्कि स्वर्ग में जीवित है।' राष्ट्रवादी भावनाओं का राष्ट्रीय नारों के तहत प्रसार हो रहा है।वे राष्ट्रीय एकता के नारे लगाते रहते हैं। इन परिवर्तनों से भविष्य के मुक्तिदूत तैयार हो रहे हैं। इस्राइली प्रशासन द्वारा फिलिस्तीनी जनता पर उत्पीड़न की प्रतिदिन अनेक घटनाएं हो रही हैं।किंतु इक्का-दुक्का ही टीवी में दिखती हैं।
हाल ही में गार्जियन में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार गाजा में सहायता कार्यों में लगे 80 से ज्यादा एनजीओ संगठनों और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक बयान में कहा है कि गाजा की नाकेबंदी के कारण 14 लाख लोगों का स्वास्थ्य दांव पर लगा है। बीमार लोगों में बीस प्रतिशत सख्त मरीज हैं, इन्हें तत्काल इलाज के लिए इस्राइल के अस्पतालों में भर्ती कराने की जरुरत है। गाजा में जिस तरह सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक हालात खराब हुए हैं उसके कारण लोगों की तबियत ज्यादा तेजी से खराब हो रही है।
    दूसरी ओर इस्राइली अस्पतालों में इलाज के लिए आने वाले मरीजों के साथ घनघोर अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है। फिलीस्तीनी मरीजों को इस्राइल में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा रही है। उल्लेखनीय है गाजा पर सन् 2007 से हम्मास का नियंत्रण स्थापित होने के बाद से इस्राइल ने गाजा की ओर जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए हैं, फिलीस्तीन का शेष  संसार के साथ संपर्क और संचार के जितने भी रास्ते हैं वे इस्राइल और मिस्र से होकर जाते हैं। इस्राइल की नाकेबंदी का फिलीस्तीन के लिए अर्थ है संसार से समस्त संपर्कों की समाप्ति। नाकेबंदी के कारण पर्याप्त मात्रा में दवा,इलाज की मशीनें ,एक्सरे मशीन आदि की सप्लाई तक में बाधा पड़ी है। यहां हम अपील पेश कर रहे हैं जो हाल ही में गाजा के हालात पर ध्यान खींचने के लिए यहूदियों ने जारी की है।
    
        
Rabbis Condemn Israel for War Crimes Committed in Gaza: Open Letter to Judge Goldstone

Global Research, April 26, 2010
Jewish Fast for Gaza - 2010-04-21

Dear Judge Goldstone,
As rabbis from diverse traditions and locations, we want to extend our warmest mazel tov to you as an elder in our community upon the Bar Mitzvah of your grandson. Bar and Bat Mitzvah is a call to conscience, a call to be responsible for the welfare of others, a call to fulfill the covenant of peace and justice articulated in our tradition.
As rabbis, we note the religious implications of the Report you authored. We are reminded of Shimon Ben Gamliel’s quote, “The world stands on three things: justice, truth, and peace as it says ‘Execute the judgment of truth, and justice and peace will be established in your gates’ (Zaccariah 8:16).” We affirm the truth of the report that bears your name.
We are deeply saddened by the controversy around the report. We affirm your findings and believe you set up an impeccable standard that presents strong evidence that during the war in Gaza Israel engaged in war crimes that revealed a pattern of continuous and systematic assault against Palestinian people and land that has very little to do with Israel’s claim of security. Your report made clear the intentional targeting of civilian infrastructures such as hospitals, schools, agricultural properties, water and sewage treatment centers and civilians themselves with deadly weapons that are illegal when used in civilian centers.
This is the ugly truth that is so hard for many Jewish people to face. Anyone who spends a day in Palestinian territories sees this truth immediately.
Judge Goldstone, we want to offer you our deepest thanks for upholding the principles of justice, compassion and truth that are the heart of Jewish religion and without which our claims to Jewishness are empty of meaning. We regret that your findings have led to controversy and caused you not to feel welcome at your own grandson’s Bar Mitzvah. We believe your report is a clarion call to Israel and the Jewish people to awaken from the slumber of denial and return to the path of peace.
This letter is endorsed by Taanit Tzedek- Jewish Fast for Gaza , Shomer Shalom Institute for Jewish Nonviolence, Tikkun and the Shalom Center.
Rabbi Lynn Gottlieb, Shomer Shalom Network for Jewish Nonviolence
Rabbi Brant Rosen, Taanit Tzedek –Jewish Fast for Gaza
Rabbi Brian Walt, Taanit Tzedek –Jewish Fast for Gaza
Rabbi Haim Beliak
Rabbi Michael Lerner, Tikkun Community
Rabbi Arthur Waskow, The Shalom Center
Rabbi Rebecca Alpert
Rabbi Phyllis Berman
Rabbi Michael Feinberg
Rabbi Zev-Hayyim Feyer
Rabbi Margaret Holub
Rabbi Shai Gluskin
Rabbi Douglas Krantz
Rabbi Eyal Levinson
Rabbi Mordecai Liebling
Rabbi David Mivasair
Rabbi David Shneyer
Rabbi Laurie Zimmerman
Rabbi Gershon Steinberg-Caudill
Rabbi Erin Hirsh
Rabbi Michael Rothbaum
Rabbi Benjamin Barnett
Rabbi Julie Greenberg
Rabbi Linda Holtzman
Rabbi Ayelet S.Cohen
Rabbi Jeffrey Marker
Rabbi Nina H.Mandel
Rabbi Victor Reinstein
Rabbi Everett Gendler
Rabbi Meryl M. Crean
Rabbi Sheila Weinberg
Rabbi Pamela Frydman Baugh
Rabbi Lewis Weiss
Rabbi Shaul Magid
Rabbi Stephen Booth-Nadav
Rabbi Phillip Bentley
Rabbi Anna Boswell-Levy
Rabbi Chava Bahle
This letter is supported by Taanit Tzedek- Jewish Fast for Gaza , Shomer Shalom Institute for Jewish Nonviolence, Tikkun and the Shalom Center.
If you are a rabbi and would like to add your name to this statement, send an e-mail to Rabbi Lynn Gottlieb (rabbilynn at earthlink dot net).



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