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शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

व्यापारीवर्ग बनाम नरेन्द्र मोदी के पंगे

नरेन्द्र मोदी को सत्ता पर बिठाने में देश के व्यापारियों और कारपोरेट घरानों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।यह वर्ग विगत तीन सालों में मोदी सरकार की नीतियों के कारण किसी न किसी रुप में परेशान है,असंतुष्ट है और धीरे धीरे विभिन्न समूहों के तौर पर सड़कों पर प्रतिवाद के लिए निकल रहा है।मसलन्, विगत बजट के समय स्वर्ण व्यापारियों ने दो महिने तक आंदोलन किया, इधर विभिन्न स्तरों पर मांस के व्यापारी विरोध करते रहे हैं,नोटबंदी के कारण छोटे उद्योगों के मालिकों में गहरा असंतोष पैदा हुआ है।सबसे दिलचस्प है जीएसटी के विरोध में व्यापारियों का एक दिन का राष्ट्रीय बंद और उसके बाद कपड़ा व्यापारियों का सघन होता आंदोलन।ये सारी चीजें इस बात की ओर संकेत कर रही हैं कि मोदीजी को जो वर्ग सत्ता में लेकर आया उसी वर्ग के साथ अंतर्विरोध खुलकर सामने आ गए हैं।

दिलचस्प बात यह है व्यापारियों के जन- आंदोलन हो रहे हैं, विशाल रैलियां हो रही हैं,इस तरह की रैलियां हाल-फिलहाल के वर्षों में नजर नहीं आईं। मसलन् सूरत इन दिनों अशांत है।सूरत की अशांति को सामान्य रुटिन अशांति के रूप में न देखें। बल्कि उसे व्यापक फलक पर रखकर देखें कि किस तरह व्यापारियों के विभिन्न समूहों में मोदी सरकार के खिलाफ प्रतिवाद जन्म ले रहा है।वहीं दूसरी ओर मजदूरों-किसानों के आंदोलन भी हो रहे हैं। इन सबके कारण एक नए किस्म का प्रतिवादी राजनीतिक माहौल जन्म ले रहा है।



अनेक राजनीतिक विशेषज्ञ हैं जो यह मानकर चल रहे हैं कि मोदीजी 2019 में लौटकर फिर से सत्ता में आ रहे हैं। ये विशेषज्ञ भूल रहे हैं कि 2014 में मोदी के खिलाफ कोई असंतोष नहीं था बल्कि आशाएं जुड़ी हुई थीं।लेकिन 2019 तक मोदी के खिलाफ समाज के हर स्तर पर व्यापक असंतोष पैदा होगा,यह अनिवार्य है।कम से कम व्यापारियों के विभिन्न रूपों में हो रहे प्रतिवादों को गंभीरता से लेने की जरूरत है।व्यापारी समुदाय यदि बार बार प्रतिवाद कर रहा है तो यह तय है समाज में अशांति बहुत गहरे जा घुसी है,इस अशांति को मीडिया प्रबंधन के जरिए संभालना संभव नहीं है।इंतजार करें जमीन पक रही है।

गुरुवार, 29 जून 2017

जुनैद की हिमायत में


               आरएसएस और उनके समर्थकों में गजब की क्षमता है कह रहे हैं आरएसएस के बारे में ´षडयंत्र´के रुप में न देखें, हर घटना में न देखें। पहली बात यह कि आरएसएस सामाजिक संगठन नहीं है वह राजनीतिक संगठन है केन्द्र और अनेक राज्यों में उसके नियंत्रण और निर्देश पर सरकारें काम कर रही हैं,नीतियों के निर्धारण में उसकी निर्णायक भूमिका है।जमीनी स्तर पर आरएसएस और उसके संगठनों के बनाए नारे सक्रिय हैं,संयोग की बात है नारों के समानान्तर और संगति में सामाजिक हिंसा भी हो रही है। उनके नारों के पक्ष में न बोलनेवालों या उनका विरोध करने वालों पर आए दिन हमले हो रहे हैं, विभिन्न बहानों से उन नारों के प्रभाववश 22 निर्दोष मुसलमानों की हत्या हुई है। ये हत्याएं जिस तरह हुई हैं और जिन लोगों ने की हैं उनसे एक बात साफ है कि हत्या करने वाले स्वतःस्फूर्त हमले नहीं कर रहे।दूसरी बात यह कि आरएसएस की आलोचना करने पर जो समर्थक साइबरजगत में कुतर्क दे रहे हैं वे भी स्वतःस्फूर्त नहीं बोल रहे बल्कि आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित होकर ही बोल रहे हैं।ऐसी अवस्था में आरएसएस की आलोचना होना उसके राजनीतिक फैसलों का विरोध करना हम सबका दायित्व बनता है।

जुनैद की हत्या सामान्य अपराध नहीं है।आरएसएस को जुनैद की हत्या का सड़कों पर उतरकर विरोध करना चाहिए। लेकिन हो उलटा रहा है। उस हत्या के खिलाफ जो आवाजें उठ रही हैं उनके खिलाफ आरएसएस –भाजपा के नेता और साइबर समर्थक तरह-तरह के कुतर्क दे रहे हैं,सवाल यह है जुनैद की हत्या यदि साम्प्रदायिक हत्या नहीं है तो आरएसएस उसका जमीनी स्तर पर विरोध करने वालों का साथ क्यों नहीं देता ॽ क्यों उन पर हमले कर रहा है ॽ मुसलमान होने के कारण 22लोग अब तक मारे गए हैं एक भी हत्या के खिलाफ भाजपा –आरएसएस ने पूरे देश में एक भी जुलूस नहीं निकाला,जबकि यही आरएसएस-भाजपा मिलकर तीन तलाक के मसले पर मुसलमान हितैषी होने का ढोंग करती रही है, मुसलमानों के मोदी एंड कंपनी को जमकर वोट मिले हैं।इसके बावजूद मुसलमानों पर ही हमले क्यों हो रहे हैं ॽ उनके ही धंधे को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा हैॽ क्या मुसलमान देश में हिन्दुओं पर जुल्म कर रहे हैं या हिंदुओं के खिलाफ बोल रहे हैं ॽ

कायदे से आरएसएस और उससे जुड़े संगठन गऊरक्षकों और दूसरे किस्म साम्प्रदायिक गुंडों के द्वारा हमलों में मारे गए मुसलमानों के परिवारों के साथ आरएसएस खड़ा हो और जो लोग इन घटनाओं का विरोध कर रहे हैं उनका साथ दे,अपनी राज्य और केन्द्र सरकारों को सीधे निर्देश दे कि इस तरह के हत्याकांड करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाय।लेकिन हमें मालूम है आरएसएस यह सब करने नहीं जा रहा।वे और जोशो-खरोश से अपनी हिंदुत्ववादी मुहिम को और तेज करने जा रहे हैं और मुसलमानों के पक्ष में खड़े लोगों पर हमले कर रहे हैं, साइबर हमले कर रहे हैं। सवाल यह है जुनैद के हत्यारे अभी तक पकड़े कयों नहीं गए ॽ आरएसएस-भाजपा के लोग न्याय की मांग करने वालों या हत्यारो की गिरफ्तारी की मांग करने वालों के खिलाफ सीधे जहर क्यों उगल रहे हैं ॽ क्या जनता को विरोध का हक नहीं है ॽ अफसोस इस बात का है इस काम में अनेक शिक्षित लोग,प्रोफेसर लोग भी हत्यारों के साथ खड़े हैं।

भारत में हिंसा के पक्ष में खड़े होने, हिंसा और अत्याचार को वैध ठहराने की परंपरा है।इस परंपरा की जडें हिंदू संस्कारों से खाद-पानी लेती रहती हैं। वे घुमा-फिराकर जुनैद के मसले पर बात करने की बजाय ´पहले यह हुआ आप क्यों नहीं बोले´, ´कश्मीर में यह हुआ आप क्यों नहीं बोले ´, ’मुसलमान इतने खराब हैं आप क्यों नहीं बोले ´, आदि मुहावरों का प्रयोग करके संघियों और उसके हत्यारे गिरोहों की हिमायत कर रहे हैं।

हम विनम्रतापूर्वक एक बात कहना चाहते हैं जुनैद और इसी तरह की हत्याओं के विचारधारात्मक पहलू को देखें,छोटे-छोटे विवरण और ब्यौरों और अतीत के नरक को न देखें। मुसलमानोंके खिलाफ जो हमले हो रहे हैं ये रुटिन हमले नहीं हैं,ये रुटिन मॉब हिंसा नहीं है.बल्कि एक विचारधाराजनित हिंसा है।हम यहां जो लिख रहे हैं वह इस हिंसा के विचारधारात्मक पहलू को केन्द्र में रखकर लिख रहे हैं। दूसरी बात यह कि कांग्रेस के शासन का विरोध करने का अर्थ यह नहीं है कि लोग विकल्प के रुप में आरएसएस के जुल्मों का समर्थन करें। इससे भी बड़ी बात यह कि आरएसएस की विचारधारा के राष्ट्रव्यापी प्रभाव को देखें।आरएसएस ने लोकतांत्रिक हकों पर सीधे हमले किए हैं और सभी किस्म के बौद्धिक कर्म को निम्नस्तर पर पहुँचा दिया है।अब ज्ञान-विवेक के आधार पर संघी लोग बहस नहीं कर रहे वे गालियां दे रहे हैं या फिर आरोप लगारहे हैं या फिर सीधे शारीरिक हमले कर रहे हैं।इसमें भी उनका सबसे ज्यादा गुस्सा वामपंथियों पर निकल रहा है।वाम के प्रति उनकी घृणा का प्रधान कारण वैचारिक है, वाम के खिलाफ घृणा के कारण ही कारपोरेट घराने उनको पसंद करते हैं।संघियों की वामविरोधी घृणा का स्रोत है कारपोरेट घराने।क्योंकि वे भी वाम से नफरत करते हैं,इस मामले में संघ और कारपोरेट घराने जुडबां भाई हैं।

आरएसएस के नारों और राजनैतिक कारनामों के कारण भारत की आर्थिकदशा लगातार खराब हो रही है। जो लोग आरएसएस से प्रेम करते हैं वे कभी इस बात गौर करें कि आरएसएस की विचारधारा ने भारत के आर्थिक ढांचे को कितने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचाया है।आरएसएस के लोकतंत्र में उभार को सामान्य राजनीतिक उभार के रूप में न देखें,यह असामान्य और भयानक है। ठीक वैसे ही जैसे स्पेन में फ्रेंको आया था,जर्मनी में हिटलर आया था।लोकतंत्र में इस तरह की संभावनाएं हैं कि मोदीजी फ्रेंको बन जाएं !

आरएसएस के बनाए दो नए मिथ हैं -´भारतीय हिंदुत्व´ और ´भारतीय लोकतंत्र´। वे इन दोनों की महानता बहुत गुणगान करते रहते हैं। पीएम से लेकर मोहन भागवत तक के भाषणों में इन दोनों मिथों को देख सकते हैं। इन दोनों मिथों का संघी फासिज्म से गहरा समंबंध है।इन दोनों मिथों के कारण आज समूची बहस लोकतंत्र के मसलों,मानवाधिकार के मसलों के बाहर कर दी गयी है।इसके अलावा ´हाशिए´के लोगों की लड़ाई और हितों की रक्षाके सवालों को ठेलकर समाज से बाहर कर दिया गया है।इस समय सिर्फ उन दो मिथों पर बातें हो रही हैं जिनका ऊपर जिक्र किया गया है।प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों तक, मोहन भागवत से लेकर प्रवीण तोगडिया तक इन दोनों मिथों का नया-नया भाष्य रचा जा रहा है।इन दो मिथों की आड़ में सीधे हमले हो रहे हैं।हम कहना चाहते हैं ´भारतीय लोकतंत्र´ महान नहीं है। महान बनाकर लोकतंत्र के मर्म की हत्या की जा रही है,लोकतंत्र को वायवीय बनाया जा रहा है। भारत की जनता को वास्तव अर्थ में लोकतंत्र चाहिए,न कि ´भारतीय लोकतंत्र´।



-´भारतीय हिंदुत्व´ और ´भारतीय लोकतंत्र´ के मिथों की आड़ में ´आक्रामकता´ और ´सैन्य आक्रामकता´की खुलकर वैसे ही हिमायत की जा रही है जैसी एक जमाने में हिटलर ने की थी। हिटलर की नकल करते हुए मोदी के भाषणों को ´राष्ट्रीय आख्यान´ बनाकर पेश किया जा रहा है।आज जरुरत है इन दोनों मिथों के खिलाफ आम जनता को शिक्षित करने और गोलबंद करने की।

गुरुवार, 24 नवंबर 2016

नोट बंदी यानी मोदी सरकार ठप्प है !

            पीएम नरेन्द्र मोदी ने 9नवम्बर से नोटबंदी की नीति लागू करते समय आम जनता से पचास दिन मांगे हैं।कहा है पचास दिन में यह नीति अभीप्सित लक्ष्य हासिल न कर पाए तो जनता पीएम को दण्डित कर सकती है।सवाल यह है नोट बंदी के पहले जो वायदे पूरे करने की बात थी उनका क्या हुआ ॽ क्या उन वायदों को भी 50दिन के लिए स्थगित कर दिया जाय ॽ सवाल यह है नोटबंदी की घोषणा के बाद सरकार ठप्प क्यों हो गयी ॽ

यह सच है नोटबंदी के कारण सब कुछ ठहर गया है। नोटबंदी के बारे में जो कुछ कहा गया उससे उलट परिणाम सामने आने शुरू हो गए हैं।मसलन् यह नहीं कहा गया कि नोटबंदी से कामगारों को बेकारी का सामना करना पड़ेगा,खासकर दैनिक मजूरी करने वालों को तत्काल रोजी-रोटी से हाथ धोना पडेगा।बाजार में सन्नाटा पसर जाएगा।बैंकिंग के नियमित कामकाज बंद हो जाएंगे।आयकर विभाग के नियमित काम ठप्प हो जाएंगे।पुराने नोटों का कालाधन धंधा शुरू हो जाएगा,मुद्रा दलालों की चाँदी ही चाँदी होगी।निर्माण कार्य,विकास कार्य,सरकारी योजनाओं का कार्यान्वयन ठप्प हो जाएगा।

नोटबंदी लागू करने के साथ यह कहा गया इससे काले धन पर रोक लगेगी।लेकिन व्यवहार में ठीक उलटा हुआ है।व्यवहार में मुद्रा दलालों ने बड़ी मात्रा में बैंकरों की मदद से करोड़ों रूपये का धंधा किया है।अभी तक किसी ने यह नहीं बताया कि पुराने खारिज नोट कितनी बड़ी संख्या में मुद्रा दलालों के जरिए बदले गए हैं।अभी तक जन-धन एकाउंट में 21हजार करोड़ रूपये जमा होने की बात केन्द्र सरकार ने मानी है।लेकिन दलालों ने अमान्य मुद्रा में से कितनी मुद्रा को परिवर्तित कराने में मदद की,इसका कोई आंकड़ा सरकार नहीं दे पायी है।जन-धन एकाउंट में अवैध पैसा जमा होने वाली बात भी इसलिए कही जा रही है जिससे ममता बनर्जी और राहुल गांधी को इस मुहिम से जोड़ा जाए,क्योंकि जन-धन एकाउंट में बड़े पैमाने पर पैसा सरकार के मुताबिक बंगाल और कर्नाटक में ही जमा हुआ है।

मोदी सरकार ने सब कुछ जानते हुए भी कि किनके पास अवैध कालाधन कैश में घरों रखा हुआ है उनके यहां घरों पर छापे न मारकर नोटबंदी का रास्ता चुना।सरकार यदि कालेधन के मगरमच्छों को पकड़ना चाहती तो आसानी से पकड़ सकती थी लेकिन उसने यह सब करना जरूरी नहीं समझा,उलटे उनको जन-धन एकाउंट के जरिए धन जमा करने की सुविधा मुहैय्या करायी।जिस तरह अनाप-शनाप तरीकों से जन-धन एकाउंट खुलवाए गए थे उस समय अनेक लोगों ने इन खातों के दुरूपयोग होने की ओर ध्यान खींचा था लेकिन सरकार ने एक भी बात नहीं मानी।आज यही जन-धन एकाउंट कालेधन को बैंकों में जमा करने के सबसे बड़े स्रोत बनकर सामने आए हैं।

नोटबंदी के बाद बैंकों में पारदर्शिता दिखनी चाहिए। केन्द्र सरकार तुरंत अब तक छापे गए और बैंक से दिए गए नोटों का हिसाब सार्वजनिक करे और बताए कि नए नोट कितनी संख्या में जारी किए गए हैं ॽइस समूची प्रक्रिया की गहराई में जाकर जांच करने की जरूरत है।दिलचस्प बात है मोदी सरकार नोटबंदी की नीति लागू होने के बाद एक भी मुद्रा दलाल को अवैध मुद्रा के लेन-देन के चक्कर में पकड़ नहीं पायी है।इसका प्रधान कारण हमारे यहां अवैध,खारिज,फटे-पुराने नोट आदि का कारोबार करने वाले पचासों वर्षों से यह धंधा कर रहे हैं और वैध ढ़ंग से वे अपना काम करते रहे हैं। सवाल यह है जब उनका धंधा वैध है तब आप कालेधन वाले को पकड़ेंगे कैसे ॽ

दूसरा सवाल यह है जुलाई से सितम्बर माह 2016 के बीच में बैंकों में जमा पूंजी में जबर्दस्त उछाल आया है,वे कौन लोग हैं जिन्होंने अचानक बैंकों में बड़ी मात्रा में धन जमा किया है ॽ बैंकों के सारे खातों को खंगालने की जरूरत है, साथ ही राजनीतिक दलों के खातों को भी खंगालने की जरूरत है। इस अवधि के बीच में जिन लोगों ने पांच लाख ,दस लाख,पचास लाख या उससे ऊपर धन जमा किया है उन लोगों कि शिनाख्त की जानी चाहिए,उनसे आय के स्रोतों की जानकारी देने के लिए कहा जाना चाहिए।इसके अलावा दो लाख से ऊपर के गहने खरीदने वालों की जांच हो।खासकर उन लोगों की जिन्होंने हठात् 8नवम्बर के बाद से महंगे दाम पर सोना खरीदा है, विगत 15दिनों में सोना खरीदने वालों के नाम तो सरकार जारी कर ही सकती है।यह कैसे संभव है कि जिन लोगों ने पहले सोना नहीं खरीदा अचानक 8नवम्बर की 8बजे की घोषणा के बाद ही सोना खरीदा ! उन कंपनियों और ठेकेदारों की भी खोज की जाए जिन्होंने एडवांस में अपने मजदूरों को कई महिने की पगार दे दी और अपना कालाधन सफेद कर लिया। ये बातें उस गोरखधंधे की एक झलक देती हैं जो नोटबंदी के नाम पर विगत 15 दिनों से हो रहा है और मोदी सरकार की इसे रोकने में कोई दिलचस्पी नजर नहीं आती,उलटे हुआ यह है कि नोट बंदी के बाद सरकार के सभी विभाग ठप्प हो गए हैं। नोटबंदी को यदि अचानक लागू करना था तो सरकारी विभाग ठप्प क्यों हो गए ॽ







शनिवार, 17 सितंबर 2016

कश्मीर पर मैनस्ट्रीम मीडिया और बुद्धिजीवी चुप क्यों हैं ॽ


        कश्मीर में कर्फ्यू लगे 70 दिन हो गए। अब 85 लोग मारे जा चुके हैं।लेकिन हमें नहीं मालूम कि वहां क्या हो रहा है,हमारे देश के बुद्धिजीवियों को भी इससे कोई परेशानी नजर नहीं आ रही,किसी भी लेखक संघ ने प्रतिवाद करते हुए आवाज बुलंद नहीं की है,समझ में नहीं आ रहा कि प्रगतिशील लेखक संघ ,जनवादी लेखक संघ आदि संगठनों में कश्मीर को लेकर चुप्पी क्यों है ॽ कश्मीर की पीड़ा हमें तकलीफ क्यों नहीं देती ॽक्या उत्तर प्रदेश या बिहार में दो महिने तक कर्फ्यू लगा रहे तो हम सब इसी तरह चुप बैठे रहते ॽ मुझे बेहद झल्लाहट हो रही है कि हमारे तमाम बेहतरीन बुद्धिजीवी और मानवाधिकार संगठन कश्मीर के मसले पर राष्ट्रीय स्तर पर कोई मुहिम अभी तक क्यों नहीं छेड़ पाए ॽ
          मैं जब कश्मीर में कुछ समय पहले वहां घूमते हुए कश्मीर के बुद्धिजीवियों-लेखकों-रंगकर्मियों और आम लोगों से बातें कर रहा था तो एक बात सबने कही कि आरएसएस और मीडिया के कश्मीर विरोधी अभियान ने कश्मीर को लंबे समय से मुख्यधारा से अलग-थलग कर रखा है।आम कश्मीरी के सुख-दुख को देस के बाकी हिस्से में रहने वाले लोग नहीं जानते ,और न मीडिया बताना चाहता है।सबसे पीड़ादायक रूख केन्द्र सरकार का है,वह एक कदम आगे बढ़कर पृथकतावादियों को बातचीत के लिए अभी तक राजी नहीं कर पायी है।इसका दुष्परिणाम यह निकला है कि आम जनता बुरी तरह से परेशान होकर रह गयी है। आम कश्मीरी अमन-चैन की जिन्दगी जीना चाहता है,लेकिन मोदी सरकार और पृथकतावादी मिलकर आम जनता को अमन के साथ रहने नहीं देना चाहते।
             हम जानना चाहते हैं कि कश्मीर के पृथकतावादी नेता और हुर्रियत (जी) के अध्यक्ष सईद अली जिलानी ने 26अगस्त2016 को जो पत्र सेना के अधिकारियों को लिखा था उस पर केन्द्र सरकार ने कोई जवाब दिया कि नहीं ॽमीडिया में उस पत्र को लेकर मोदी सरकार के रूख का कहीं कोई जिक्र नजर नहीं आता।जिलानी ने अपने पत्र में आरोप लगाया है कि सेना की कार्रवाई से अब तक कश्मीर में एक लाख लोग मारे गए हैं,दस हजार लोग गायब हैं और साठ हजार बच्चे अनाथ हो गए हैं।कम से कम इन आंकड़ों के बारे में तथ्यपूर्ण खंडन केन्द्र सरकार को जरूर देना चाहिए।वरना यही समझा जाएगा कि जिलानी सही कह रहे हैं। जिलानी का यह पत्र अनेक मामलों में बेहद खतरनाक मंशाओं से भरा हुआ है।इन मंशाओं में सबसे खतरनाक मंशा है आम कश्मीरी को दिमागी तौर पर भारत से मुक्त कर देना।
                    केन्द्र सरकार की हरकतों और पृथकतावादियों की चालों में विलक्षण साम्य है,वे जाने-अनजाने एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम कर रहे हैं।कश्मीर में इतने लंबे समय से कर्फ्यू के लगे रहने से पृथकतावादियों को अपने मंसूबे पूरे करने में मदद मिली है।विगत कई सालों में आम कश्मीरी मुख्यधारा में लौटा था,राज्य में शांति लौटी थी लेकिन मोदी सरकार ने बुरहान वानी की हत्या करके समूची कश्मीरी जनता को पृथकतावादियों और सेना के रहमो-करम पर जीने के लिए छोड़ दिया।दो साल पहले कश्मीर में लोकतंत्र था,शांति थी,चुनाव हुए थे,सामान्य जीवन चल रहा था,लेकिन विगत दो महिने में सबकुछ बुनियादी तौर पर बदल गया ।आज आम कश्मीरी जहां एक ओर आतंकियों-पृथकतावादियों से नफरत करता है वहीं वह भारत सरकार से भी नफरत करने लगा है।मोदी सरकार ने राजनीतिक पहल न करके कश्मीर की जनता को पूरी तरह हुर्रियत और दूसरे पृथकतावादी संगठनों के हवाले कर दिया है।जबकि जरूरत यह है कि आम जनता को आतंकियों-पृथकतावादियों से अलग-थलग किया जाए।हजारों करोड़ रूपये का आर्थिक नुकसान झेलने के बाद जम्मू-कश्मीर बहुत जल्दी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाएगा। हमारे नीति निर्माता कहीं न कहीं यह सोचकर चल रहे हैं कि कश्मीरी जनता की आर्थिक तौर पर कमर तोड़ देंगे तो वह सीधे रास्ते पर आ जाएगी।यह धारणा गलत है।यह सोचना भी गलत है कि कश्मीरियों को उत्पीडित करके वहां शांति स्थापित हो जाएगी,पाक का असर कम हो जाएगा,आतंकियों का असर कम हो जाएगा।
           मोदी सरकार मूलतःकश्मीरी जनता के प्रति हृदयहीन भाव से पेश आ रही है।यह हृदयहीनता उनको विरासत में आरएसएस और अमेरिका से मिली है।इस हृदयहीनता का लक्ष्य है आमलोगों के दिलों में दरारें पैदा करना।आम लोगों के अंदर लोकतंत्र के प्रति नफरत गहरी करना।







सोमवार, 15 अगस्त 2016

15अगस्त की आत्मा है लोकतंत्र -

        आज 15अगस्त है और इसे हम स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाते हैं।यह स्वाधीनता बहुत बड़ी कुर्बानियां देकर मिली है,इतिहास के तमाम दुर्गम पहाडों से गुजरकर मिली है,अनेक बुरे फैसले लेने के बाद मिली है।

अधिकांश नेता भारत-विभाजन से दुखी थे,लेकिन वह मजबूरी थी,देश विभाजन न होता तो देश नष्ट होता , आजादी न मिलती।यह भी सच है देश विभाजन की बहुत बड़ी कीमत अदा की है जनता ने।देश की जनता देश विभाजन के पक्ष में नहीं थी,मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच उस समय जो स्थिति थी उसमें देश विभाजन से बेहतर फैसला संभव ही नहीं था,इससे भारत को बड़ी क्षति को बचाने में मदद मिली,इसका अर्थ यह नहीं है कि देश विभाजन से भारत की कोई क्षति नहीं हुई,देश विभाजन से भारत को बहुत बड़ी क्षति उठानी पड़ी।विभाजन की पीड़ा को हम आज भी झेल रहे हैं।लेकिन समग्रता में देखें तो विभाजन और सम्पूर्ण देश विनाश में से विभाजन को चुनकर कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व ने सही फैसला लिय़ा था।

संप्रभु राष्ट्र के रूप में भारत का जन्म हमारे देश की सबसे बड़ी उपलब्धि है।इसके कारण हम लोकतंत्र ,स्वाधीनता और समानता के सपनों के लिए संघर्ष का बुनियादी आधार बनाने में सफल रहे।आज भी लोकतंत्र,समानता और बंधुत्व हम सबके लिए सपने की तरह है।इनके सपनों में जीना और सपनों को पाने के लिए निरन्तर जद्दोजहद करना हमारी दैनंदिन जिन्दगी है।

लोकतंत्र आज हमारी प्राणवायु है,इसके बिना हम जिन्दा नहीं रह सकते।लोकतंत्र पर कोई समझौता नहीं कर सकते,क्योंकि भारत विभाजन जैसी बड़ी कीमत अदा करके हमने इसे पाया है।लोकतंत्र हम सबके लिए बेहद कीमती मूल्य है,जीवनशैली है,हमारे समाज की आत्मा है और आत्मा को बेचकर,आत्मा पर हमले करके कोई समाज सुख से नहीं रह सकता।



स्वाधीनता का अर्थ है लोकतंत्र। वह हमारे देश की प्राणवायु है,यह झूठा लोकतंत्र नहीं है अधूरा लोकतंत्र है,इसे संपूर्ण बनाने के लिए निरंतर संघर्ष और लोकतांत्रिक आंदोलनों की जरूरत है।स्वाधीनता आंदोलन की यह महानतम उपलब्धि है।हमें इस पर गर्व है।

रविवार, 7 अगस्त 2016

दूसरी परम्परा , सत्ता और रवीन्द्रनाथ

       इन दिनों अचानक सत्ता के साथ लेखक के संबंध के सवाल को नामवरजी के जन्मदिन के बहाने हमारे अनेक लेखक मित्रों ने सत्ता को रसीले,लुभावने ढ़ंग से परिभाषित करना आरंभ कर दिया है,इसके लिए वे कुतर्क तक गढ़ रहे हैं।लेखक और सत्ता के संबंध का सवाल प्रमुख सवालों में से एक है,यह आश्चर्य की बात है कि ´दूसरी परम्परा की खोज´करते समय इस सवाल पर लोगों ने कभी विचार नहीं किया।जबकि दूसरी परम्परा ने सर्जक रवीन्द्रनाथ ने इस सवाल को अपने तरीके से हल करने की कोशिश की है और उससे बहुत कुछ सीख सकते हैं।

लॉर्ड कर्जन के आदेश से जब दिल्ली-दरबार का आयोजन किया गया तो रवीन्द्रनाथ ने उसका तीव्र विरोध किया था।इसके कारण उनको सरकार का क्रोध सहना पड़ा।उस समय उन्होंने जो बातें कही थीं उनको आज फिर से स्मरण करने की जरूरत है। रवीन्द्र नाथ ने लिखा ´दरबार एक प्राच्य वस्तु है।जब पाश्चात्य अधिकारी उसका उपयोग करते हैं तो उसका खोखलापन ही सामने आता है;उसकी पूर्णता नहीं।इस प्राच्य समारम्भ में ´प्राच्यता´ कहां है ॽ प्राच्यता इसमें है कि दो पक्षों के बीच आत्मिक सम्बन्ध स्वीकार किया गया है।तलवार के जोर से जो सम्बन्ध जुड़ता है वह तो विरोध का सम्बन्ध होता है। लेकिन सौजन्य द्वारा प्रस्थापित सम्बन्ध दोनों पक्षों को निकट लाता है।दरबार में सम्राट को अपना औदार्य व्यक्त करने का अवसर मिलता था।उस दिन सम्राट के महल का द्वार खुला रहता था और उसके दान की कोई सीमा न होती थी।पाश्चात्य नकली दरबार में कृपणता है,वहाँ जन-साधारण का स्थान बहुत ही संकीर्ण है।पहरेदारों के हथियार ´राजपुरूषों´ की संशय-वृत्ति जताते हैं और दरबार में जो व्यय होता है उसका भार अतिथियों को ही वहन करना पड़ता है। नतमस्तक होकर राजा का प्रताप स्वीकार करना-यही है इस दरबार का एक-मात्र तात्पर्य।इस उत्सव-समारोह में दोनों पक्षों के सम्बन्धों में जो अपमान-भावना निहित है वही व्यक्त होती है,और तड़क-भड़क से व्यक्त होती है।ऐसे कृत्रिम,हृदयहीन आडम्बर से प्राच्य हृदय को आक्रान्त किया जा सकता है इस विचार से ही धृष्टता टपकती है और शासकों की प्रजा के प्रति अपमानजनक भावना स्पष्ट होती है।भारत में अँग्रेजों का प्रभुत्व प्रत्येक स्थान पर व्याप्त है-विधान में,सभागृह में,शासनप्रणाली में।लेकिन इस प्रभुत्व को उत्सव का रूप देकर उसे और भी तीव्र बनाने का आखिर क्या प्रयोजन है ॽ ´

रवीन्द्र नाथ ने आगे लिखा ´इस तरह के कृत्रिम उत्सव से घोषित होता है कि भारतवर्ष में अँग्रेज़ मजबूती से जम गए हैं; लेकिन उनके साथ हमारा सम्बन्ध यान्त्रिक है,मानवीय नहीं।इस देश के साथ उनका नाता लाभ का है,व्यवहार का है,हृदय का नाता नहीं है।कर्तव्य के जाल से देश आवृत्त है।इस कर्तव्य की निपुणता और उपयोगिता स्वीकार की जा सकती है।फिर भी हमारी मानवीय प्रकृति तो स्वभावतःइस प्राणहीन शासन-तन्त्र से पीड़ित होती है।´

उन्होंने आगे जो कहा वह बहुत ही महत्वपूर्ण है, लिखा ´भारतवासी यदि आजीवन एक प्रबल शक्तिशाली यन्त्र का हाथ पकड़कर चलने के अभ्यस्त हो जायं तो इससे बढ़कर देश की दूसरी दुर्गति नहीं,चाहे उससे कितनी ही सुविधा क्यों न प्राप्त हो।´





रविवार, 26 जून 2016

मोदी का भयाक्रांत लोकतंत्र

                मोदी के सत्तारूढ होने के बाद "लोकतंत्र" का "भयाक्रांत लोकतंत्र " में रूपान्तरण करने की कोशिशें हो रही हैं।इस खतरे को गंभीरता से लेने की जरूरत है।मोदीजी चाहते हैं लोकतंत्र,लेकिन साथ में यह भी चाहते हैं कि लोग भयभीत होकर रहें।हमें "भयाक्रांत लोकतंत्र" के समूचे तानेबाने को तोड़ना होगा और "वास्तव लोकतंत्र" स्थापित करने की दिशा में बढ़ना होगा।

सच यह है दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अकेले इस पहलू की ओर विभिन्न बयानों के जरिए ध्यान खींच रहे हैं लेकिन विपक्ष उसे गंभीरता से नहीं ले रहा है।"भयाक्रांत लोकतंत्र " बहुत ही भयानक अवस्था है इसकी परिकल्पना संविधान में भी नहीं है,यह फासीवाद की हरकतों और लक्षणों से भिन्न है।

मोदीजी का "भयाक्रांत लोकतंत्र" वस्तुतःसत्ता को दलीय आधार पर देखता है। सत्ता को दल के आधार पर देखना,संसद में बहुमत के आधार पर देखना,उसके आधार पर सत्ता , संसाधनों और नीतियों का डंडे के बल पर अमल कराना मुख्य विशेषता है।आम जनता के आधार पर सत्ता को न देखना,इसकी मुख्य विशेषता है। जबकि सत्ता का आधार है आम जनता,लेकिन मोदीजी के सत्ता में आने के बाद से सत्ता का समूचा खेल बदल गया है। वे रीयल लोकतंत्र के मानकों,मूल्यों और मान्यताओं पर निरंतर हमले कर रहे हैं। वे आम जनता के जीवन में मच रही तबाही की अनदेखी कर रहे हैं और बार बार अपनी निजी उपलब्धियां गिना रहे हैं,मीडिया का व्यापक तौर पर इसके लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।मीडिया में वे खबरें एकसिरे से नदारत हैं जो आम जनता के कष्टों से जुड़ी हों।सारा मीडिया "भयाक्रांत लोकतंत्र " की चपेट में है।वे कोई भी मसला उठाते हैं तो उन्मादी ढ़ंग से उठाते हैं।मसलन् ,देश योग करे यह भी उन्मादी ढ़ंग से संप्रेषित करते हैं।

लोकतंत्र में उन्माद कैंसर है।"भयाक्रांत लोकतंत्र" का उन्मादी प्रचार सबसे प्रभावशाली हथियार है।मोदीजी के राष्ट्रीय क्षितिज पर आने के बाद कोई भी नीति सामान्य रूप में लागू नहीं हुई है।वहीं दूसरी ओर आम जनता के पहले से अर्जित हकों,कार्यक्रमों आदि पर सुनियोजित हमले हो रहे हैं और उनको बंद किया जा रहा है। "भयाक्रांत लोकतंत्र" का मुख्य लक्ष्य हैं गरीब,आदिवासी,किसान और शिक्षित समाज,अपने अब तक के नीतिगत आदेशों के जरिए इन वर्गों को आतंकित करने में वे व्यस्त हैं।



मोदीजी के "भयाक्रांत लोकतंत्र" की राजनीति व्यक्तिकेन्द्रित है।मोदीजी ने पंडित नेहरू ,सोनिया आदि व्यक्तियों के खिलाफ घृणा प्रचार करते हुए अपना राजनीतिक स्पेस बनाया और समूचे प्रचार और सत्ता तंत्र को मोदीकेन्द्रित बनाकर रख दिया है।इस मॉडल में पक्ष-विपक्ष और प्रचार में व्यक्ति ही मुख्य है।मसलन्,पटेल मुख्य हैं,उनकी राजनीति गौण है।यह निकृष्ट किस्म का व्यक्तिवाद है जो व्यक्ति को उसकी राजनीति से अलग रखकर देखता है।यह नेताकेन्द्रित राजनीति का सबसे घटिया मॉडल है।इस मॉडल में नेता ही महान है और नेता ही अधम है।भयाक्रांत लोकतंत्र अपने लिए जन समर्थन जुटाने के लिए आमतौर पर अविवेकवादी औजारों का प्रयोग करता है।



रविवार, 19 जून 2016

न्याय की गुलामी

         विचारों की दरिद्रता कहें या फिर गुलामी कहें न्यायपालिका की प्रशंसा करते थकते नहीं हैं,सच यह है न्याय प्रक्रिया एकदम भ्रष्ट और उत्पीड़नकारी है,इ सके बावजूद न्यायपालिका की प्रशंसा बढती ही जा रही है।यही है हमारे समाज का संकट ।वह सच को देखने,और सच बोलने से डरता है।
हम सब जानते हैं अदालतों में हर ईंट घूस खाती है लेकिन कभी. कोई पकडा नहीं गया।वकील बेहिसाब पैसे लेते हैं लेकिन कोई नियमन नहीं है।अदने से अहलकार से लेकर पेशकार तक सब पैसे लेते हैं,बिना पैसे लिए कोई काम नहीं करता,इसके बावजूद कभी कोई बोलता नहीं है,सिस्टम चलाने वालों से लेकर जजों तक सबको मालूम है कि पेमेंट की दर क्या है,जब न्यायपालिका भ्रष्ट होगी तो देश भी भ्रष्ट होगा,न्याय दुर्लभ होगा।न्याय कभी समय पर नहीं होगा।जिस देश में न्याय समय पर न हो,जल्दी फैसले न हों तो उस देश का अपराधीकरण तो होगा ही।

पेशेवर लोगों में कभी वकील और जजों को भी आलोचनात्मक नजरिए से देख लिया करो।वकील और जज के पेशे में दिन प्रतिदिन स्वस्थ मूल्यों की गिरावट आई है,जगह जगह राजनीतिक गिरोह बनाकर वकील काम कर रहे हैं। हर दल का वकीलों में नेटवर्क है।जब वकील नेटवर्क का अंत बनेंगे तो न्यायपालिका अपाहिज होगी।इसी तरह संवैधानिक मूल्य,मान्यताएं सबसे ज्यादा दैनंदिन आचरण से नष्ट होते हैं,इस मामले में भी अधिकांश वकीलों का आचरण ईमानदारी भरा नहीं है।इसमें सबसे करप्ट रूप है वकील की फीस का पेमेंट।इसका कोई मानक नहीं है,अकल्पनीय मनमानी है इस मामले में।


दूसरी ओर जजों के फैसले असभ्यों के तर्कों या फासिस्ट मीडिया के तर्कों के सहारे जब लिखे जाने लगे हैं। न्याय को सभ्यता का अंग होना चाहिए लेकिन कई न्यायाधीशों पर इन दिनों पापुलिज्म का दबाव बहुत है।हाल में कई इस तरह के फैसले आए हैं जिनमें भारत के फासिस्टों और नरसंहार करने वालों के तर्कों को आधार बनाकर जजमेंट आए हैं।इस तरह के लक्षणों को गुजरात से लेकर जेएनयू तक के मामलों में आए अनेक फैसलों में देखे जा सकते हैं।

रविवार, 22 मई 2016

विवेकहीनता विकल्प नहीं है फेसबुक मित्रो!


हमारे फेसबुक मित्र उन्मादियों की तरह ,भाजपा के प्रचारक की तरह जीत गए जीत गए हल्ला मचाए हुए हैं ! उनकी इन हरकतों को देखकर हंसी भी आ रही है ,गुस्सा भी आ रहा है,मित्रो,फेसबुक कम्युनिकेशन है, कम्युनिकेशन की शर्त है कि दिमाग की खिड़कियां खुली रहें,दिमाग की खिड़कियां बन्द करके लोकतंत्र नहीं बचता।लोकतंत्र बचता है विवेकपूर्ण कम्युनिकेशन से,असहमतियों की गंभीर मीमांसा करने से। आपलोग पढ़े-लिखे हो,आप लोग किसी के कार्यकर्ता के तौर पर फेसबुक में दाखिल नहीं होते।आप निजी व्यक्ति के नाते यहां संवाद करते हो।यह भी जानते हो कि यह संवाद वोटरों में नहीं हो रहा,फिर इस तरह की विवेकहीनता क्यों
    विवेकहीनता सबसे बड़ी पूंजी है फासिज्म की।लोकतंत्र बचे और समृद्ध बने,यह आप-हम सबको देखना होगा।लेकिन आपलोग तो अपने कम्युनिकेशन से उलटी दिशा में दौड़ रहे हैं।मसलन्, हाल के विधानसभा चुनावों को ही लें तो अनेक नई चीजें देख पाएंगे,इन पर हमें खुलकर बातें करनी चाहिए।मसलन्,नीतियों के सवाल को प्रमुख सवाल बनाया जाना चाहिए,लेकिन आपलोग नीतियों पर तो बात नहीं करना चाहते। नीतिहीनता और अवसरवाद को लोकतंत्र के लिए कैंसर माना जाता है। कमोबेश सभी दल इसकी गिरफ्त में हैं।
    दूसरी बड़ी समस्या यह है भारत को उदार पूंजीवाद के मार्ग पर चलना है या अनुदार पूंजीवाद के मार्ग पर चलना है।हमारे मोदीभक्त मित्र कांग्रेस विरोध की विवेकहीन पगडंडी पर चलकर यदि उदारवाद का मार्ग ग्रहण करते तो हमें कोई आपत्ति नहीं थी लेकिन वे तो भाजपा के अनुदार पूंजीवादी मार्ग पर बढ़ चले हैं,वे भाजपा की हर जीत पर इस तरह खुश हो रहे हैं गोया वे उदारतावाद के मार्ग पर एक और कदम आगे बढ़े हों ! लेकिन मित्रो,भारत में पहले से ही सामंती दौर की संकीर्णताएं,अनुदार भावनाएं,मूल्य आदि मौजूद हैं इनमें भाजपा का अनुदारवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र इजाफा कर रहा है।
    मोदीजी अनुदारवाद की हर स्तर नग्नतम रूप में वकालत कर रहे हैं,अनुदारवाद के स्थानीय दलों को एकजुट कर रहे हैं,इससे भारत कभी आगे नहीं जाएगा।दुर्भाग्य की बात है कारपोरेट मीडिया इस काम में उनकी मदद कर रहा है,बहुराष्ट्रीय कंपनियां मदद कर रही हैं,क्योंकि वे भारत को अनुदार देश के रूप में देखना चाहते हैं।मेरी निजी तौर पर कांग्रेस के साथ कोई मोहब्बत नहीं है।लेकिन कम से कम कांग्रेस घोषित तौर पर,नीति के तौर पर अनुदारवाद की पक्षधर नहीं है,इसलिए तुलनात्मक तौर पर भाजपा से बेहतर है।कांग्रेस की उदारवादी नीतियों ने धीमी गति से ही सही लेकिन देश में उदार मूल्यों,संरचनाओं और संस्कारों के निर्माण में केन्द्रीय भूमिका अदा की है,इसको स्वीकार करने में झिझक नहीं होनी चाहिए।कांग्रेस का हारना उदारतावाद की पराजय है।अब आपलोग तय करें भारत को उदारतावाद के मार्ग पर बढ़ते देखना चाहते हैं या फिर अनुदार मार्ग आगे बढ़ते देखना चाहते हैं।

     फेसबुक पर तथ्य और सत्य के आधारपर बातें होनीं चाहिए।मसलन्,मोदी की नीतियों पर खुलकर बातें हों,जमीनी हकीकत बड़ी भयावह है सरकारी बैंकों से केन्द्र सरकार के इशारे पर जनता के धन की खुली लूट मची हुई है।यह लूट बताती है  मोदीजी किन वर्गों की सेवा कर रहे हैं।मोदी प्रशासन का आलम यह है कि प्रचार के अलावा कोई काम नहीं हो रहा।तमाम किस्म के संवैधानिक संस्थानों पर नियोजित हमले किए जा रहे हैं और यह काम और कोई नहीं संघ परिवार कर रहा है जो सत्ता चला रहा है। आपातकाल को छोड़कर संवैधानिक संस्थाओं पर हमले कभी किसी शासकदल ने नहीं किए लेकिन मोदीजी मजे में हमले कर रहे हैं और इसके लिए ´कांग्रेस नष्ट करो ´का नारा लगाकर ध्यान हटा रहे हैं। मोदी सरकार के अगले निशाने पर बैंकिग सिस्टम है।हमलोग यदि सावधान नहीं हुए तो बाद में बहुत पछताएंगे। 

मंगलवार, 10 मई 2016

भारत का मर्म और पंडित नेहरू


      भारत की आत्मा को समझने में पंडित जवाहरलाल नेहरू से बढ़कर और कोई बुद्धिजीवी हमारी मदद नहीं कर सकता।पंडितजी की भारत को लेकर जो समझ रही है ,वह काबिलेगौर है।वे भारतीय समाज,धर्म, संस्कृति,
इतिहास आदि को जिस नजरिए से व्यापक फलक पर रखकर देखते हैं वह विरल चीज है।

       पंडित नेहरू ने लिखा है ''जो आदर्श और मकसद कल थे,वही आज भी हैं,लेकिन उन पर से मानो एक आब जाता रहा है और उनकी तरफ बढ़ते दिखाई देते हुए भी ऐसा जान पड़ता है कि वे अपनी चमकीली सुंदरता खो बैठे हैं,जिससे दिल में गरमी और जिस्म में ताकत पैदा होती थी।बदी की बहुत अकसर हमेशा जीत होती रही है लेकिन इससे भी अफसोस की बात यह है कि जो चीजें पहले इतनी ठीक जान पड़ती थीं,उनमें एक भद्दापन और कुरूपता आ गई है। '' चीजें क्रमशःभद्दी और कुरूप हुई हैं,सवाल यह है कि यह भद्दापन और कुरूपता आई कहां से ॽक्या इससे बचा जा सकता था ॽयदि हां तो उन पहलुओं की ओर पंडितजी ने जब ध्यान खींचा तो सारा देश उस देश में सक्रिय क्यों नहीं हुआ ॽ

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है" हिंदुस्तान में जिंदगी सस्ती है। इसके साथ ही यहां जिंदगी खोखली है,भद्दी है,उसमें पैबंद लगे हुए हैं और गरीबी का दर्दनाक खोल उसके चारों तरफ है।हिंदुस्तान का वातावरण बहुत कमजोर बनानेवाला हो गया है।उसकी वजहें कुछ बाहर से लादी हुई हैं,और कुछ अंदरूनी हैं,लेकिन वे सब बुनियादी तौर पर गरीबी का नतीजा हैं। हमारे यहां के रहन-सहन का दर्जा बहुत नीचा है और हमारे यहां मौत की रफ्तार बहुत तेज है।" पंडितजी और उनकी परंपरा ´मौत की रफ्तार´ को रोकने में सफल क्यों नहीं हो पायी ॽ पंडित जानते थे कि भारत में जहां गरीबी सबसे बड़ी चुनौती है वहीं दूसरी ओर धर्म और धार्मिकचेतना सबसे बड़ी चुनौती है।

पंडित नेहरू ने लिखा है- "अगर यह माना जाये कि ईश्वर है,तो भी यह वांछनीय हो सकता है कि न तो उसकी तरफ ध्यान दिया जाये और न उस पर निर्भर रहा जाये। दैवी शक्तियों में जरूरत से ज्यादा भरोसा करने से अकसर यह हुआ भी है और अब भी हो सकता है कि आदमी का आत्म-विश्वास घट जाए और उसकी सृजनात्मक योग्यता और सामर्थ्य कुचल जाये।"

धर्म के प्रसंग में नेहरूजी ने लिखा- "धर्म का ढ़ंग बिलकुल दूसरा है।प्रत्यक्ष छान-बीन की पहुंच के परे जो प्रदेश है,धर्म का मुख्यतःउसीसे संबंध है और वह भावना और अंतर्दृष्टि का सहारा लेता है। संगठित धर्म धर्म-शास्त्रों से मिलकर ज्यादातर निहित स्वार्थों से संबंधित रहता है और उसे प्रेरक भावना का ध्यान नहीं होता।वह एक ऐसे स्वभाव को बढ़ावा देता है,जो विज्ञान के स्वभाव से उलटा है। उससे संकीर्णता,गैर-रवादारी, भावुकता,अंधविश्वास,सहज-विश्वास और तर्क-हीनता का जन्म होता है। उसमें आदमी के दिमाग को बंद कर देने का सीमित कर देने का,रूझान है।वह ऐसा स्वभाव बनाता है,जो गुलाम आदमी का,दूसरों का सहारा टटोलनेवाले आदमी का, होता है।" आम आदमी के दिमाग को खोलने के लिए कौन सी चीज करने की जरूरत है ॽक्या तकनीकी वस्तुओं की बाढ़ पैदा करके आदमी के दिमाग को खोल सकते हैं या फिर समस्या की जड़ कहीं और है ॽ

पंडित नेहरू का मानना है - "हिन्दुस्तान को बहुत हद तक बीते हुए जमाने से नाता तोड़ना होगा और वर्तमान पर उसका जो आधिपत्य है,उसे रोकना होगा। इस गुजरे जमाने के बेजान बोझ से हमारी जिंदगी दबी हुई है। जो मुर्दा है और जिसने अपना काम पूरा कर लिया है,उसे जाना होता है।लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि गुजरे जमाने की उन चीजों से हम नाता तोड़ दें या उनको भूल जाएं ,जो जिंदगी देनेवाली हैं और जिनकी अहमियत है।" यह भी लिखा, "पिछली बातों के लिए अंधी भक्ति बुरी होती है।साथ ही उनके लिए नफ़रत भी उतनी ही बुरी होती है।उसकी वजह है कि इन दोनों में से किसी पर भविष्य की बुनियाद नहीं रखी जा सकती।"

"गुजरे हुए जमाने का -उसकी अच्छाई और बुराई दोनों का ही-बोझ एक दबा देने वाला और कभी-कभी दम घुटाने वाला बोझ है,खासकर हम लोगों में से उनके लिए ,जो ऐसी पुरानी सभ्यता में पले हैं,जैसी चीन या हिन्दुस्तान की है। जैसाकि नीत्शे ने कहा है- " न केवल सदियों का ज्ञान,बल्कि ,सदियों का पागलपन भी हममें फूट निकलता है।वारिस होना खतरनाक है।"इसमें सबसे महत्वपूर्ण है ´वारिस´वाला पहलू।इस पर हम सब सोचें।हमें वारिस बनने की मनोदशा से बाहर निकलना होगा।

पंडित नेहरू ने लिखा है- "मार्क्स और लेनिन की रचनाओं के अध्ययन का मुझ पर गहरा असर पड़ा और इसने इतिहास और मौजूदा जमाने के मामलों को नई रोशनी में देखने में मदद पहुँचाई। इतिहास और समाज के विकास के लंबे सिलसिले में एक मतलब और आपस का रिश्ता जान पड़ा और भविष्य का धुंधलापन कुछ कम हो गया।" भविष्य का धुंधलापन कम तब होता है जब भविष्य में दिलचस्पी हो,सामाजिक मर्म को पकड़ने, समझने और बदलने की आकांक्षा हो।इसी प्रसंग में पंडित नेहरू ने कहा "असल में मेरी दिलचस्पी इस दुनिया में और इस जिंदगी में है,किसी दूसरी दुनिया या आनेवाली जिंदगी में नहीं।आत्मा जैसी कोई चीज है भी या नहीं मैं नहीं जानता.और अगरचे ये सवाल महत्व के हैं,फिर भी इनकी मुझे कुछ भी चिंता नहीं।"पंडितजी जानते थे भारत में धर्म सबसे बड़ी वैचारिक चुनौती है।सवाल यह है धर्म को कैसे देखें ॽ



पंडितजी का मानना है " 'धर्म' शब्द का व्यापक अर्थ लेते हुए हम देखेंगे कि इसका संबंध मनुष्य के अनुभव के उन प्रदेशों से है,जिनकी ठीक-ठीक मांग नहीं हुई है,यानी जो विज्ञान की निश्चित जानकारी की हद में नहीं आए हैं।" फलश्रुति यह कि जीवन के सभी क्षेत्रों में विज्ञान को पहुँचाएं,विज्ञान को पहुँचाए वगैर धर्म की विदाई संभव नहीं है।









बुधवार, 30 मार्च 2016

वे वाम का साथ छोड़कर क्यों चले गए ॽ



     पश्चिम बंगाल के चुनाव में टीएमसी के खिलाफ दो साल पहले किए गए नारद वीडियो स्टिंग ऑपरेशन के जरिए किसी भयानक राजनीतिक उथल-पुथल की कुछ लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं।हमारा अनुमान है ऐसा कुछ भी नहीं होगा।पश्चिम बंगाल के लोग,खासकर मध्यवर्ग के अंदर इस वीडियो के आने के बाद कोई आक्रोश नजर नहीं आ रहा,यहां के लोग करप्शन से बेखबर हैं,करप्शन देखते हैं,झेलते हैं,सामंजस्य बिठाते हैं और जी रहे हैं,करप्शन को लेकर सारे देश में यही दशा है।जनचेतना की  भयावह स्थिति है कि सारधा चिटफंड कांड में टीएमसी के अधिकांश बड़े नेताओं के लिप्त होने के बावजूद वाममोर्चा कोई विशाल जनांदोलन खड़ा करने में असमर्थ रहा,हां,उसने निरंतर प्रतिवाद जरूर किया,लेकिन जिस स्केल पर लोग चिटफंड घोटाले से लोग प्रभावित हुए हैं उसकी तुलना में दशांश को भी जुलूसों में खींच नहीं पाया,यहां तक कि विधानसभा उपचुनावों में टीएमसी को हराने सफल नहीं हुआ।नगरपालिका चुनावों  में हरा नहीं पाया।ऐसी स्थिति में नारद वीडियो स्टिंग कोई जादू कर देगा हमें नहीं लगता।
     सवाल यह है वाम के साथ जो सामाजिक शक्तियां थीं,जो सामाजिक संतुलन था,वह आज क्यों नहीं है चुनावों की सारी लड़ाई सामाजिक संतुलन को पक्ष में करने की लड़ाई है।ममता ऐन-केन-प्रकारेण सामाजिक संतुलन को अपनी ओर झुकाने में सफल रही है और यही उनके नेतृत्व की सफलता है।

सवाल यह है जो सामाजिक शक्तियां वाम के साथ थीं वे किन कारणों से वाम को छोड़कर चली गयीं मसलन्,शरणार्थी बंगालियों के पुनर्वास में वाम ने सक्रिय भूमिका निभायी और उनकी आर्थिक-सामाजिक शक्ति के विकास में हर संभव मदद की,एक जमाना था ये लोग बेहद गरीब थे,लेकिन वाम जमाने में इनके आर्थिक हालात बदले,इनमें मध्यवर्ग पैदा हुआ,संपत्ति पैदा हुई,लेकिन वामचेतना का विकास न हो सका।वे सिर्फ वोटबैंक बने रहे।लेकिन ज्योंही वाम के खिलाफ सिंगूर-नंदीग्राम आंदोलन के कारण हवा बहने लगी,ये लोग वाम को छोड़कर चले गए।यही हाल शिक्षकों का है। शिक्षकों एक बड़ा वर्ग वाम के साथ था।लेकिन आज वे लोग भी साथ नहीं हैं। जबकि शिक्षकों पर कोई जुल्म नहीं हुआ,इसके बावजूद वे वाम को छोड़कर क्यों चले गए सरकारी कर्मचारियों के संगठन में भी यही हाल है।यह वह वर्ग है जो सचेतन कहलाता है,आर्थिक रूप से सुरक्षित है,इसको कोई खतरा न तो वाम के जमाने में था और न ममता के जमाने में था,फिर यह वर्ग वाम को क्यों छोड़कर चला गया वाम ने कभी सार्वजनिकतौर इन वर्गों के वाम-विमुख हो जाने की समीक्षा नहीं की,क्यों नहीं की ॽक्या बंगलादेशी शरणार्थियों में आई समृद्धि का वाम के नजरिए से कोई अंतर्विरोध है ॽक्या शिक्षकवर्ग के वाम-विमुख होने का वाम के नव्य-आर्थिक उदारीकरण के विरोध और केन्द्र के समान छठे वेतन आयोग के अनुसार नए वेतनमान में केन्द्र के समान महंगाई भत्ता न देने के वाम सरकार के फैसले के साथ कोई संबंध है ॽ जी हां,गहरा संबंध है।इस तरह के फैसलों ने वाम के जनाधार को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है और वाम ने अपनी आज तक आत्मालोचना नहीं की है। समस्या को जानकर भी उसके बारे में चुप रहना वाम की विशेषता है,जबकि आम जनता उत्तर चाहती है।समस्या के समाधान सुझाए बगैर वाम को आम जनता दोबारा आसानी से सत्ता पर पहुँचने नहीं देगी।वाम अपना स्टैंड साफ करे कि उसने केन्द्र के बराबर राज्य कर्मचारियों को महंगाई भत्ता क्यों नहीं दिया ॽ भविष्य में देगा या नहीं ॽ आज राज्य में कॉलेज-वि वि लेक्चरर केन्द्र की तुलना में 25हजार रूपये कम पाता है, प्रोफेसर 60रूपये कम पाता है,यह सीधे वामशासन में लागू की गयी वेतननीति का भयानक परिणाम है।यह साधारण बात नहीं है जिसे दरकिनार किया जाए।माकपा के लोग देस में अन्यत्र जितना वेतन पाते हैं पश्चिम बंगाल में माकपा के और अन्य शिक्षक उनसे काफी कम वेतन पाते हैं।यह माकपा के द्वारा किया गया ऐसा अपराध है जिसके लिए उसे कभी माफ नहीं किया जा सकता।  

लोकतंत्र ,जुल्म और बंगाल


        पश्चिम बंगाल विधानसभा के 2016 के चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण हैं,इस चुनाव का भारतीय राजनीति पर दूरगामी असर हो सकता है।इसबार के चुनाव में कई नई चीजें नजर आ रही हैं जो पहले कभी नहीं देखी गयीं।पहलीबार वाममोर्चा और कांग्रेस के बीच में चुनाव गठबंधन हुआ है,इस तरह का गठबंधन पहले कभी नजर नहीं आया।जमीनी स्तर पर इस मोर्चे ने मिल-जुलकर काम करने की कोशिश की है,इसे आम भाषा मे सिलीगुड़ी लाइन कहते हैं। सबसे पहले सिलीगुडी नगरपालिका चुनाव में कांग्रेस-वाम ने मिलकर चुनाव लड़ा था। उसके परिणाम बेहतर रहे।वाम को वहां विजय मिली।सिलीगुडी लाइन से प्रेरित होकर काफी पहले वाम-कांग्रेस गठबंधन का मन बना चुके थे।

यह पहलीबार हुआ कि राजनीतिक सिद्धांतों को इस मोर्चे के निर्माण में सिलीगुड़ी में आड़े नहीं आने दिया गया,बाद में यही चीज समूचे राज्य में नजर आ रही है।लोकतंत्र के लिए राजनीतिक सफलता जितनी जरूरी है उतना ही जरूरी है सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य ।लेकिन इसबार पश्चिम बंगाल में राजनीतिक सफलता हासिल करना इतना जरूरी हो गया है कि माकपा जैसा सिद्धांतनिष्ठ दल खुलकर इस गठजोड़ के प्रति सैद्धांतिक ढ़ांचा प्रस्तावित नहीं कर पाया,यह माकपा की सबसे बड़ी कमजोरी है।कायदे से संध्याभाषा में पश्चिम बंगाल पर बातें करने से माकपा के केन्द्रीय नेतृत्व को बचने की जरूरत थी और खुलकर यह बताने की जरूरत थी कि उनको कांग्रेस से मिलकर चुनाव लड़ना क्यों जरूरी है ॽ लेकिन माकपा ने ऐसा नहीं किया। इससे माकपा जैसे सिद्धांतनिष्ठ दल की कमजोरी ही सामने आई है,जबकि पश्चिम बंगाल में वह कांग्रेस से कमजोर दल आज भी नहीं है।

सवाल यह है कि क्या राजनीति में सैद्धांतिक पारदर्शिता जरूरी है ॽ यदि हां तो उसका आधार कहां है ॽइस बात को कहने का यह आशय नहीं है कि वाम को कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ना चाहिए।यह माकपा-कांग्रेस तय करें लेकिन कागज पर सैद्धातिकतौर पर परिभाषित तो करें कि वे क्यों और किन परिस्थितियों में मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं ॽ जनता की मांग है,जनता चाहती है,इसलिए वाम-कांग्रेस गठबंधन या सीट समझौता हुआ है,यह सब कहकर सिद्धांतहीनता का प्रदर्शन न करें।कांग्रेस एक सिद्धांतहीन दल है,लेकिन माकपा से हम यह उम्मीद नहीं कर सकते ! भविष्य में कम्युनिस्ट आंदोलन का जो लोग मूल्यांकन करेंगे उनके लिए यह मुश्किल रहेगी कि वे माकपा-कांग्रेस इस गठजोड़ के सैद्धांतिक राजनीतिक दस्तावेज कहीं पर भी नहीं देख पाएंगे। राजनैतिक व्यवहारवाद को इस गठजोड़ का मूलाधार बना दिया गया है।

कांग्रेस-वाम की पश्चिम बंगाल में राजनीतिक एकता का एक धागा जिस तरह सिलीगुड़ी लाइन से जुड़ा है उसी तरह उसका दूसरा धागा हाल के पूना-हैदराबाद-जेएनयू के छात्र आंदोलन से भी जुड़ा है। तीसरा धागा मोदी सरकार की अ-लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी नीतियों के खिलाफ संसद में वाम-कांग्रेस की संयुक्त कार्रवाईयों से भी जुड़ा है। इन तीनों ही धागों से मिलकर वाम-कांग्रेस का पश्चिम बंगाल में जमीनी राजनीतिक समझौता हो पाया है।

पश्चिम बंगाल की जमीनी सच्चाई यह है कि ममता सरकार ने हर मोर्चे पर निकम्मेपन और अपराधीकरण का प्रदर्शन किया है।अपराधियों ने राजनीति को बंधक बना लिया है।खासकर ममता सरकार आने के बाद हर क्षेत्र में अपराधीकरण बढ़ा है,अपराधियों के हमले बढ़े हैं।पुलिस और प्रशासन का दुरूपयोग बढ़ा है।ममता सरकार खुलेआम अपराधियों को संरक्षण देती रही है,औरतों पर अत्याचार बढ़े हैं,बुद्धिजीवियों में सत्ताभक्ति बढ़ी है,गांवों से लेकर शहर तक खुलेआम गुण्डों का दबदबा बढ़ा है।शिक्षित बंगाली मध्यवर्ग ,खासकर लेखकों,बुद्धिजीवियों और शिक्षकों ने सरकार के खिलाफ भय के कारण बोलना बंद कर दिया है।त्रासद पक्ष यह है कि बुद्धिजीवी अपराधियों के संरक्षण में जीने को अभिशप्त हैं।अपराधी किस्म के लोग हर स्तर पर प्रशासन में काम करने वालों को निर्देश दे रहे हैं कि वे क्या करें और क्या न करें।बौद्धिकों का इस तरह का पतन पहले कभी नहीं देखा गया।इससे बंगाल की सांस्कृतिक-बौद्धिक इमेज क्षतिग्रस्त हुई है।समाज में दब्बूपन बढ़ा है।यह वही दब्बूपन है जिसको अपने अंतिम वर्षों में वामशासन में अपराधियों ने पैदा किया था।अपराधियों का सामाजिक क्षितिज पर निर्णायक बन जाना असल में वामयुगीन फिनोमिना है,जो अपराधी एक जमाने में वाम के साथ थे, वाम के चुनाव हारते ही ममता की छत्रछाया में चले गए,इन अपराधियों के कारण वाम को चुनावों में हारना पड़ा,यही अपराधी इसबार ममता के गले की हड्डी बन गए हैं।

सवाल यह है अपराधियों के खिलाफ वाम-कांग्रेस गठबंधन क्या कड़ा रूख अपनाएगा ॽ क्या वे यह वायदा करेंगे कि अपराधियों को संरक्षण नहीं देंगे ॽ पश्चिम बंगाल की जमीनी सच्चाई है अपराधी गिरोह विभिन्न इलाकों में सक्रिय हैं और वोट बैंक नियंत्रित करते हैं।वोट बैंक का नियंत्रण इस तरह देश में अन्यत्र नजर नहीं आता। इस अपराधीकरण पर तकरीबन सभी दल चुप हैं,जबकि सभी मसलों पर थोड़ी बहुत बातें हो रही हैं।यहां तक कि मीडिया कवरेज से भी अपराधी गिरोह गायब हैं। कम से कम मीडिया में विभिन्न इलाकों में सक्रिय अपराधी गिरोहों के काले कारनामों को प्रकाशित करने का काम होना चाहिए।लोकतंत्र को भय मुक्त करने का सबसे आसान पहला कदम है अपराधी गिरोहों की नामों के साथ पहचान को मीडिया में उदघाटित किया जाए।बिना अपराधियों को एक्सपोज किए बंगाल में लोकतंत्र नहीं बचा सकते।तकरीबन 86हजार वारंट कटे हुए लोग राज्य में खुलेआम घूम रहे थे,इनमें से रीयलसेंस में अभी भी 38हजार बाहर हैं,कहा जा रहा है बाकी को चुनाव आयोग के दबाव में पकड़कर बंद कर दिया गया ,लेकिन जमीनी हकीकत बता रही है कि अपराधी खुलेआम बाहर घूम रहे हैं,जिनके एक साल से ज्यादा समय से वारंट कटे हुए थे उनमें से अधिकांश बाहर हैं और सरेआम जनता को धमकाने का काम कर रहे हैं।ऐसी अवस्था में विधानसभा चुनाव में हिंसा का होना,गांवों,मुहल्लों में आतंक का होना स्वाभाविक है। अनेक इलाकों में टीएमसी के नेतागण गांव वालों के मतदादा पहचान पत्र घरों से जबर्दस्ती छीनकर ले गए हैं,अफसरों को कहा गया है कि सत्तारूढ़ टीएमसी के पक्ष में काम करो,मतदान कराओ। जिन इलाकों में हिंसा की घटनाएं हो रही हैं वहां पर पुलिस निष्क्रिय दर्शक बनी हुई है।केन्द्रीय पर्यवेक्षक और केन्द्रीयबलों के आने के बावजूद हिंसक हमले बंद नहीं हुए हैं। आतंक-भय कम नहीं हुआ है। खासकर वाम-कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर अनेक इलाकों में दीवारलेखन से लेकर मीटिंग न करने देने के लिए टीएमसी के लोगों ने हमले किए हैं। निचले स्तर टीएमसी के छद्म संगठनों द्वारा झुग्गी-बस्ती इलाकों में भजन-कीर्तन के आयोजन किए जा रहे हैं,यह हिन्दूवोटरों को जोड़ने की साम्प्रदायिक कोशिश है। इलाके के लोगों में सामूहिक भोज कराए जा रहे हैं, लेकिन चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों का कोई हस्तक्षेप नजर नहीं आ रहा।



इसबार के चुनाव में कांग्रेस-वाम के पास कैडर या कार्यकर्ताओं का अभाव सहज ही देखा जा सकता है। बड़े पैमाने पर माकपा के कैडरों ने टीएमसी में शामिल होकर माकपा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। एक जमाना था माकपा के पास इफरात में कैडर हुआ करते थे,आज टीएमसी के पास कैडर है।सांगठिक हथियारबंद लोग हैं जो एक ही इशारे पर कहीं पर भी जाकर एक्शन कर सकते हैं।यह वह टीम है जो नंदीग्राम-सिंगूर आंदोलन के दौरान बनायी गयी थी।इस टीम में तकरीबन 10हजार लोगों के होने का अनुमान है।इसके अलावा दलालों,बिल्डरों,ठेकेदारों,चिटफंड एजेंट, पुलिस अफसरों के एक अंश का ममता को खुला सहयोग हासिल है।इसने निचले स्तर पर वाम-कांग्रेस के प्रचार को बाधित किया हुआ है।अब देखना यह है कि वाम-कांग्रेस गठजोड़ किस तरह इस नाकेबंदी को तोड़ता है।एक तथ्य साफ है यदि शांतिपूर्ण मतदान होता है तो ममता नहीं जीतेगी।

गुरुवार, 10 दिसंबर 2015

21वीं सदी में माकपा की चुनौतियाँ

CPIM का प्लेनम 27-31दिसम्बर2015 को कोलकाता में होने जा रहा है। माकपा अपनी सांगठनिक समस्याओं पर इसमें विस्तार से चर्चा करेगी।माकपा की सबसे बड़ी चुनौती है संगठन संचालन की पद्धति और रुढबद्ध कार्यक्रम से मुक्त होने की।इसमें सर्जनात्मकता और नए के लिए कोई जगह नहीं है। इसमें सब कुछ तयशुदा तरीकों से काम करने पर बल है, काम करने की यह पद्धति पुरानी हो चुकी है। माकपा को यदि 21वीं सदी की पार्टी के रुप में काम करना है तो उसे नए सांगठनिक ढाँचे और नए कार्यक्रम के बारे में सोचना होगा,उसे यह सोचना होगा कि समाजवाद के अंत के बाद उभरे पूंजीवाद में कैसे काम करे और किस तरह के काम करे।पार्टी कॉमरेडों का नजरिया क्या हो ,नए संचारजगत में सदस्यों को स्वतंत्र रुप से रायजाहिर करने देने की आजादी रहेगी या नहीं ,या फिर यह कहें कि माकपा क्या अपने पार्टी कार्यक्रम को भारत के संविधान में उल्लिखित व्यक्ति के अधिकारों की संगति में अपने सदस्यों को अभिव्यक्ति के अधिकार देने के पक्ष में है या नहीं,फिलहाल माकपा में सदस्यों को उतने भी अधिकार प्राप्त नहीं हैं जितने भारत का संविधान देता है। कहने का आशय यह है कि नागरिक अधिकारों की संगति में माकपा अपने लक्ष्यों और भूमिकाओं को नए सिरे से तय करे,यदि लोकतांत्रिक प्रणाली और लोकतांत्रिक हकों को पार्टी के सांगठनिक ढाँचे और राजनीतिक कार्यक्रम में वरीयता दी जाए तो पार्टी में नई प्राणवायु का संचार हो सकता है। वरना पुराना ढ़ाँचा तो लगातार माकपा को हाशिए के बाहर खदेड़ रहा है और इससे बचने की जरुरत है।फिलहाल माकपा को क्रांतिकारी कार्यक्रम से भी ज्यादा जरुरत है लोकतांत्रिक कार्यक्रम, लोकतांत्रिक संगठन और लोकतांत्रिक संचार प्रणाली की।

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

संसद में गुमशुदा साहित्यविवेक




       
संसद में “असहिष्णुता” पर बहस चल रही है। यह वह “असहिष्णुता” नहीं है जिसे कॉमनसेंस में हम लोग कहते –सुनते हैं। यह वह भी “असहिष्णुता” नहीं है जिसे राजनीतिक दल आंकड़े दे-देकर व्याख्यायित कर रहे हैं। “असहिष्णुता” के सवाल को राजनीतिकदलों या दल विशेष ने नहीं उठाया,बल्कि लेखकों-बुद्धिजीवियों और वैज्ञानिकों ने उठाया है।ये सब वे लोग हैं जो दलीय राजनीति और कॉमननसेंस के आधार पर “असहिष्णुता” को नहीं देख रहे हैं ,बल्कि अपने सर्जनात्मक कर्म के खिलाफ सामने खड़ी ठोस राजनीतिक-सामाजिक चुनौती के रुप में देख रहे हैं। अफसोस की बात है कि अधिकतर सांसदों ने एक-दूसरे के खिलाफ हिंसा-अपराध के आंकड़े और आख्यान पेश करके यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि “हम ठीक ,तुम गलत।”
    सभी राजनीतिक दलों का यह मानना “हम तो ठीक हैं तुम गलत हो”,यही समूची बहस का मूलाधार है। जबकि लेखकों ने “असहिष्णुता” के सवाल को “हम” और “तुम” की कोटि में रखकर नहीं उठाया,बल्कि वे तो भारतीय समाज में निरंतर बढ़ रही “असहिष्णुता” को एक प्रक्रिया के रुप में देख रहे हैं,उन्होंने उसके हाल के महिनों में तेज होने और ज्यादा आक्रामक हो जाने की ओर ध्यान खींचा है,लेखकों ने किसी दलविशेष को भी इसके लिए दोषी नहीं ठहराया है। वे तो सिर्फ इतनी मांग कर रहे हैं कि केन्द्र सरकार इस ओर ध्यान दे, अभिव्यक्ति की आजादी पर हो रहे हमलों को रोकने के लिए कदम उठाए।

मुश्किल यह है कि लेखक- बुद्धिजीवी-वैज्ञानिकों के लिए "असहिष्णुता" का जो अर्थ है वह राजनेता समझ नहीं सकते,यह बात आज संसद की कार्रवाई देखकर समझ में आ गयी, लेखक और राजनेता की असहिष्णुता की धारणा,अनुभूति और मंशाएं अलग हैं,संसद में बेहतर होता कि लेखकों के बयान पढे़ जाते ,लेखक बोलते और सत्ताधारी सुनते।लेकिन हुआ उलटा लेखक की भावनाओं को दरकिनार करके राजनेताओं की भावनाएं केन्द्र में आ गयीं,यह तो लेखकों के द्वारा उठाए विषय के साथ संसद का अन्याय है,

राजनाथजी ! कल संभवतः आप सांसदों की बहस का जवाब दें।आपको यह तो पता चल ही गया है कि लेखक और राजनेता या सामान्य नागरिक के दिल,अनुभूतियां और अभिव्यक्ति के धरातल अलग - अलग होते हैं, लेखक के पास राजनेता और नागरिक से ज़्यादा विकसित चेतना और अभिव्यक्ति योग्यता होती है,यही वजह है कि वह साहित्य सृजन कर पाता है।राजनेता-सत्ताधीश अल्पकाल में मर जाता, सत्ताधीश के बयान जन्म लेते ही मर जाते हैं, जबकि साहित्य नहीं मरता , साहित्यकार नहीं मरता। बल्कि उलटा होता है, साहित्यसृष्टि करके लेखक नया जन्म लेता है।जबकि नेता का अंत है बोलना।आजतक कोई राजनेता बोलकर अमर नहीं हुआ !

राजनीति और राजनेता अल्पजीवी और बांझ हैं।जबकि साहित्य-कला और विज्ञान दीर्घजीवी और सृजनशील हैं।समाज में विगत दो हजार सालों में कई राजसत्ता आई और गई, कई व्यवस्थाएं भी बदलीं,उनकी भूमिका बदली,लेकिन वे हमेशा अल्पकालिक और सीमित दायरे में ही असर छोड़ पाए,इसके विपरीत लेखकों-कलाकारों-वैज्ञानिकों के सृजन ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी समाज को प्रभावित किया है।

इनदिनों राजनेता अपने दल के हित देखता है,वोटबैंक देखता है।जबकि लेखक के लिए समाज के हित सर्वोपरि हैं। मानव सभ्यता का इतिहास गवाह है कि लेखक स्वभाव से समाज में प्रगतिशील भूमिका निभाते रहे हैं,वे ऐसे सवाल उठाते रहे हैं जो सत्ता को पसंद नहीं रहे,सत्ता की खुशामद करना,सत्तामोह में रहना साहित्य का धर्म नहीं है। साहित्य और साहित्यकार हमेशा से रचनाओं के जरिए सभी किस्म के मोह से मुक्त करके मोहमुक्त समाज की सृष्टि करते रहे हैं। सत्ता का मोह हो या निहित-स्वार्थों का मोह हो ये सब कला-साहित्य आदि के विकास में हमेशा से बाधक रहे हैं,लेखकों ने अपने सर्जनात्मक तरीकों के जरिए इन सबसे अपने को हमेशा मुक्त किया है।अपने आत्मसंघर्ष के जरिए बार-बार साहित्य और कलाओं को समाज की मुक्ति के मार्ग पर ठेला है,हमेशा उन समस्याओं का सामना किया है जो उनके सृजन में बाधक बनकर खड़ी हुई हैं।

आज संसद की बहस देखकर यह धारणा फिर से पुष्ट हुई कि इनदिनों अधिकतर राजनेता साहित्य-कलाबोध और साहित्यचेतना के अभाव के कारण लेखकीय अनुभूति से वंचित हैं।बेहतर तो यह होता कि बुद्धिजीवीसांसदों को असहिष्णुता की बहस में शामिल करके कलाकारों के मन को संसद महसूस करती।आज संसद में असहिष्णुता के सवाल पर जो बहस हुई वह प्रतिवादी साहित्यकारों की अनुभूतियों से कोसों दूर थी। इस बहस में लेखकों का मन और दिल कहीं पर भी नजर नहीं आया।जबकि लेखक भयाक्रांत है,तीन लेखकों की हत्या हो चुकी है,हत्यारों को केन्द्र सरकार में काबिज अनेक राजनेताओं और दल विशेष का समर्थन हासिल है यही वजह है केन्द्र सरकार से बार-बार लेखकों ने हस्तक्षेप की अपील की है।अफसोस की बात है कि केन्द्र सरकार और उसके मुखिया जरा-जरा सी बात पर ट्विट करते रहते हैं,बयान देते रहते हैं ,लेकिन लेखकों के बयान को उन्होंने कभी शिद्दत के साथ,सहानुभूति के साथ समझने की कोशिश नहीं की,उलटे मंत्रियों से लेकर सांसदों तक सभी ने लेखकों पर हमले किए हैं, “इनाम वापसी” को राजनीतिक खेल कहा है। यह सब करके केन्द्र सरकार ने अपनी कलाविरोधी इमेज को ही पेश किया है।

कलाकारों और लेखकों के प्रति केन्द्र सरकार की असहिष्णुता का कारण मेरी समझ से परे है। भाजपा को जब एक बार केन्द्र में सरकार बनाने का मौका मिल गया तो उसके बाद पीएम,मंत्रियों और सांसदों को सारे देश के प्रतिनिधि के रुप में,सरकार को सारे देश की सरकार के संरक्षक और संचालक के रुप में काम करना चाहिए। लेकिन ऐसा न करके लेखकों-बुद्धिजीवियों पर जिस तरह के वैचारिक हमले किए गए हैं, वह शर्मनाक है।सत्ताधारी दल भाजपा ने “असहिष्णुता” की भावना को दलीय पूर्वाग्रहों और हिंसा के अनंत आंकड़ों के बहाने दरकिनार करने की घृणित कोशिश की है,इसे शासकदल का घटिया आचरण ही कहा जाएगा। शासकदल के सांसद एक-दूसरे के खिलाफ तर्कवारिधि बनने के चक्कर में भूल ही गए कि “असहिष्णुता” का सवाल हिंसा के आंकड़ों से नहीं जुड़ा बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी और उस पर हो रहे हमलों से जुड़ा है। ये हमले विभिन्नदलों के लोग करते रहे हैं,इसलिए इसे दलीय नजरिए से नहीं संवैधानिक नजरिए से,अभिव्यक्ति की आजादी के नजरिए से देखा जाना चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी पर हो रहे हमले मात्र कानून-व्यवस्था की खराब अवस्था की देन नहीं है,वह इस समस्या का एक पहलू है,लेकिन असल पहलू है राजनीतिक।

लेखकों पर राजनीति विशेष के लोग ही हमले ज्यादा कर रहे हैं। यह कौन सी राजनीति है जो लेखकों को निशाना बना रही है ? यह वह राजनीति है जिसे सर्वसत्तावाद से मोहब्बत है,जिसे लंपट पालने और लंपटसमाज बनाने में दिलचस्पी है।यह वह राजनीति है जिसमें अपनी आलोचना सुनने-देखने का धैर्य नहीं है।लोकतंत्र में अधीर राजनीति सबसे खराब राजनीति मानी जाती है,अधीर राजनेता हमेशा शार्टकट हथकंडे अपनाते हैं और लेखकों-बुद्धिजीवियों को निरंतर विभिन्न तरीकों के जरिए आतंकित करके रखते हैं।यदि विभिन्न राजनीतिकदल अपने इस राजनीतिक रवैय्ये को बदल लें तो बेहतर होगा।लेखक मात्र इतना ही चाहता है।

बार-बार यह सवाल उठा है कि पहले क्यों नहीं बोले ? लेखक पहले भी बोले हैं,लेकिन सूचना क्रांतिजनित औसतविवेक और सत्ताधारी दल के आक्रामक मीडिया प्रचार ने ऐसा आभास पैदा करने की कोशिश की है कि लेखक-बुद्धिजीवी पूर्वाग्रह से घिरे हैं,मोदी विरोधी हैं,इसलिए सरकार को घेरने के लिए यह सब कर रहे हैं।

असहिष्णुता के खिलाफ “इनाम वापसी” का सरकार को घेरने के साथ कोई संबंध नहीं है। इसका वोट की राजनीति से भी कोई संबंध नहीं है।यह सीधे समाज में बढ़ रही असहिष्णुता का मामला है जिसको लेकर लेखक-बुद्धिजीवी “इनाम वापसी” की मुहिम के जरिए ध्यान खींचना चाहते हैं,वे इस सोए हुए समाज को जगाना चाहते हैं जो लेखकों पर हो रहे हमलों को लेकर एकदम बेगाना बना हुआ है।“इनाम वापसी” के प्रतिवाद के बहाने लेखक न तो किसी का अपमान कर रहे हैं,न किसी के वोट काट रहे हैं और न किसी नेता विशेष या दल विशेष के खिलाफ बयान दे रहे हैं,बल्कि वे तो मात्र समाज से लेकर संसद तक यही संदेश दे रहे हैं कि देश में चारों ओर असहिष्णुता बढ गयी है और हम सबको मिलकर इसके खिलाफ एकजुट होना चाहिए।

केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार हो या राजनीतिक दल हों, यह सभी की जिम्मेदारी है कि वे लेखकों के सम्मान और संवैधानिक हकों की रक्षा के मामले में एक स्वर से लेखकों के साथ एकजुटता दिखाएं। यह समय लेखकों –बुद्धिजीवियों पर हमला करने का नहीं है,बल्कि उन लोगों पर हमला करने का है जिनलोगों या संगठनों ने लेखकों को निशाना बनाया हुआ है।

राजनीतिक दलों को लेखकों से मनवांछित लेखन की मांग छोड़ देनी चाहिए। लेखक को जो उचित लगे वह लिखें।लेखक-बुद्धिजीवी अपने लेखन के जरिए समाज और संस्कृति का चरित्र बदलते रहे हैं,वे यथास्थिति के पक्षधर कभी नहीं रहे,बल्कि वे यथास्थिति के खिलाफ लिखते रहे हैं,लेखक से मनवांछित लेखन की मांग करना अविवेकपूर्ण है।लेखक कभी यह कर ही नहीं सकता।लेखन में यथास्थिति निषेध अंतर्निहित है.इस नजरिए से लेखक से यह कहना कि वह यह लिखे और वह न लिखे,वस्तुतःलेखक के हकों पर हमला है।अफसोस की बात है कि अधिकांश राजनेताओं के भाषणों में इन दिनों यही व्यक्त हो रहा है।



शनिवार, 28 नवंबर 2015

आओ मोदी हम ढोएंगे पालकी

             पीएम नरेन्द्र मोदी के कल संसद में दिए भाषण पर लेखक उदयप्रकाश की फेसबुक टिप्पणी पढ़कर बेहद शर्मिंदगी का एहसास हुआ। यह कैसा समय है जिसमें लेखक टुकड़ों में देखता है,भाषिक अंशों में देखता है,राजनीति और विचारधारा के बिना देखता है। निश्चित रुप से यह लेखकों के लिए बहुत संकट की घड़ी है। कल का मोदीजी का भाषण न तो ऐतिहासिक था और बेजोड़ था। उदयप्रकाश के राजनीतिक नजरिए पर फेसबुक पर बहुत बहस होती रही है लेकिन उनकी ताजा फेसबुक टिप्पणी ने एक बात जरुर संप्रेषित कर दी है कि हमारे लेखकों के पास फासिज्म के खिलाफ जंग करने की कोई न तो दीर्घकालिक समझ है और न सही विवेक ही है।

उदयप्रकाश ने क्या कहा पहले वह ध्यान से पढ़ें-

“आज हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का संसद में संविधान पर दिया गया भाषण किसी ऐतिहासिक अभिलेख की, किसी महत्वपूर्ण राजकीय दस्तावेज़ की तरह महत्वपूर्ण है। इतना लोकतांत्रिक, समावेशी, उदार और विनम्र संभाषण कम से कम इस प्रभावी शैली में मैंने अपने जीवन में नहीं सुना।
बिना किसी पूर्वाग्रह के अपने पूर्ववर्ती राजनेताओं के योगदान को जिस पारदर्शिता के साथ उन्होंने स्वीकार किया, देश के प्रथम प्रधानमंत्री की लोकतांत्रिक सहिष्णुता, ईमानदारी और तार्किक विवेक की उन्होंने प्रशंसा की, इसके अलावा संविधान की मूल प्रस्तावना के अलावा इसके परवर्ती संशोधनों को, जिसमें 'धर्मनिरपेक्षता' और 'समाजवाद' के अलावा 'आरक्षण' की अनिवार्यता को जिस तरह उन्होंने अपनी सम्मति और समर्थन दिया, वह उन्हें पक्ष और विपक्ष की दोनों सरहदों के आरपार एक सर्वस्वीकृत राजनेता के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए, भावुकता के साथ पर्याप्त था।
मैंने पहले भी कहा है कि अपनी वक्तृता में संभवत: वे सिद्धहस्त अटलबिहारी वाजपेयी जी से भी कई क़दम आगे हैं।
वे अपने व्याख्यानों में शायद, तथ्यों और इतिहास संबंधी भ्रमों-भूलों और हास्यास्पद ग़लतियों के बावजूद, अब तक के एक बेजोड़ वक़्ता- प्रधानमंत्री हैं।
संसद में बाबा साहेब अंबेडकर की स्मृति और संविधान की मूल भावनाओं के पक्ष में दिया गया उनका यह भाषण अप्रत्याशित रूप से प्रशंसनीय ही नहीं, सामयिक और महत्वपूर्ण था।
यह वक्तव्य एक झटके में उनके ही गृहमंत्री राजनाथ सिंह तथा वित्तमंत्री जेटली से उनकी दूरी को प्रदर्शित करने वाला था।
उनका यह संभाषण भारत की विविधता, बहुसांख्यिकता,बहुलता के प्रति उनके सम्मान को प्रकट करने वाला था।
बहुत ख़ुशी हुई। अब उम्मीद है वे अपने सांप्रदायिक, जातिवादी, हिंसक, असामाजिक और उग्र हिंदुत्ववादी तत्वों को भी क़ानून और संविधान के दायरे में ला कर उन पर सख़्त कार्रवाई करेंगे।
लेकिन कहीं यह देश के बदलते हुए मानस को भाँप कर किसी रणनीति के तहत, चतुराई के साथ, अपने दल के 'सरहदी' उग्र सांप्रदायिक और जातिवादी गिरोहों की हरकतों से होने वाली अपनी और अपने दल की गिरती हुई छवि और साख को बचाने की कोई हार को जीत में बदलने वाली चालाक युक्ति तो नहीं है?
या कहीं जनरल सर्विस टैक्स से लेकर कई ऐसे बिलों को, अपने कार्पोरेट मित्रों और सहयोगियों के लाभ के लिए, विपक्ष की मदद से, संसद के इसी सत्र में पारित करा लेने के लिये एक सोची समझी चालाकी तो नहीं है?
आज एक ओर जब प्रधानमंत्री निवास में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी जी उनके साथ चाय पी रहे हैं, ठीक उसी समय चंदन मित्र और शेखर गुप्ता, दोनोंसंविधान में 'धर्मनिरपेक्षता' और 'समाजवाद' के प्रक्षेपण पर राजनाथ सिंह के तर्क के अनुसार बहस की शुरुआत कर रहे हैं।

मुझे तो यही लगता है कि संविधान की मूल आत्मा की हिफ़ाज़त देश की जनता को अपनी एकजुटता के साथ करनी होगी।

राजनीति जिन हाथों में है, पता नहीं क्यों अभी भी दोस्तो, उस पर विश्वास नहीं होता।”

उदयजी आप जानते हैं कि पीएम के नाते मोदी के पास संसद में संविधान की वैचारिक सरहदों के बाहर जाने का कोई मार्ग नहीं है। संसद में बोलना है तो संसद, संविधान और घोषित नीतियों के फ्रेमवर्क में ही बोलना होगा।इस नजरिए से देखें तो पीएम मोदी जो कुछ भी कह रहे थे वह मजबूरी में कह रहे थे,यह उनकी स्वाभाविक वैचारिक भाषा और विचारधारा नहीं है। प्रधानमंत्री के रुप में संसद में मोदी या मुख्यमंत्री के रुप में गुजरात विधानसभा के अंदर मोदी हमेशा संविधान की सरहदों में कैद होकर ही बोलते रहे हैं। यह मोदी की महानता नहीं बल्कि राजनीतिक कौशल है। संसद में बोलते हुए कोई भी पीएम घोषित नीतियों,संविधान की मान्यताओं और धारणाओं के खिलाफ नहीं बोल सकता,यदि वह ऐसा करता है तो उसको गंभीर संवैधानिक संकट और चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

सवाल यह है कि यही मोदी संसद के बाहर आम जनता में किस भाषा,विचारधारा और नजरिए से बोलता है। सवाल यह भी है कि यही मोदी एक पीएम के नाते कितना लोकतांत्रिक व्यवहार अपने मंत्रीमंडल सहयोगियों के साथ करता है। समूची सत्ता को पीएम कार्यालय में केन्द्रित कर लेने वाले को लोकतांत्रिक और उदार कहना सही नहीं है बल्कि यह तो सर्वसत्तावादी नायक के लक्षण हैं। एक ऐसे नायक के लक्षण हैं जिसने लोकतंत्र के पग-पग पर धुर्रे उडाए हैं,लेखकों का अपमान किया है,लेखकों के प्रतिवाद का अपमान किया है,वह किसी भी दृष्टि से अपने राजनीतिक आचरण में लोकतांत्रिक और उदार नहीं है। इसके बावजूद उदयजी आपका उसको लोकतांत्रिक और उदार कहना गले नहीं उतरता।

सवाल यह है हम किसी नेता के संसद में दिए गए भाषण के बल पर उसके बारे में राय बनाएं या उसकी समग्र भूमिका के आधार पर राय बनाएं ? उदयजी आपने जल्दी कर दी। पीएम मोदी राजनीतिक कौशल से लैस बड़ा दुष्ट खिलाड़ी है,वह अटलजी जैसा या उनसे बेहतर नहीं है,न तो नजरिए में ,न राजनीतिक आचरण में ,इसके बावजूद आपकी प्रशंसा का कोई सामयिक तर्क मैं अभी तक खोज नहीं पा रहा हूँ।आपकी फेसबुक टिप्पणी ने यह सवाल केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया है कि क्या किसी नेता के भाषण को एकल स्वायत्त रुप में देखें या फिर उसके समग्र राजनीतिककर्म के फ्लो की संगति में देखें। लोकतांत्रिक नजरिया हमें समग्र फ्लो में रखकर देखने के लिए कहता है।

उदयजी आप अच्छी तरह जानते हैं कि पीएम मोदी विनम्र नहीं हैं। उनकी भाषा,आचरण और मूल्यबोध में विनम्रता दूर –दूर तक नहीं है।इसे सहज ही उनकी इमेजों के जरिए पढ़ा जा सकता है,जिनलोगों ने उसे करीब से देखा है वे भी बार-बार इसके विपरीत ही कहते रहे हैं।आपने पत्रकार अरुण शॉरी के मोदी के शासन पर दिए गए बयान पढ़े होंगे और भी बहुत सारी चीजें आप बेहतर ढ़ंग से जानते हैं इसके बावजूद आपने विनम्रता को मोदी में खोज लिया ।सच में कहना होगा आपके पास पारखी नजर है जो लालकृष्ण आडवाणी को नजर नहीं आई लेकिन आपको दिख गयी !



सोमवार, 23 नवंबर 2015

लोकतंत्र का अनंत और भाषिकचेतना



लोकतंत्र के बारे में छात्रों से जब भी बात होती है तो यह भाषा सुनने को मिलती है। “मैं तो चुनाव के समय राजनीतिक बहस सुनता हूँ”,”मैं कभी राजनीति में सक्रिय रुप से शामिल नहीं हुआ”,”मैंने कभी सक्रिय रुप से किसी भी मसले पर सार्वजनिक तौर पर पक्ष-विपक्ष में बहस में भाग नहीं लिया ”, “मैं खबरें सुनता हूँ लेकिन उन पर ध्यान नहीं देता,” “अपनी दैनंदिन समस्याओं से ही मुक्ति नहीं मिलती,राजनीति पर कब बात करूँ”, “मैं वोट देता हूँ,लेकिन सक्रिय राजनीति में कभी भाग नहीं लेता,”, “ मैं वोट देता हूँ,थोड़ा बहुत काम कर देता हूँ,इससे ज्यादा मेरी राजनीति में दिलचस्पी नहीं है,”, मैंने मतदान के दिन वोट दिया है लेकिन मेरी राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है”, यानी लोकतंत्र में निरपेक्ष या साधुभाव से भाग लेने वालों की यह मनोदशा अपने-आप में बहुत कुछ कह देती है । छात्रों का एक बड़ा वर्ग लोकतंत्र का मतलब वोट देना ही समझता है। यह सीमित लोकतंत्र की समझ है। हम इस तरह की मनोदशा के मित्रों से कहना चाहेंगे कि आप इस सीमा के बाहर निकलें और किसी अंतर्राष्ट्रीय-राष्ट्रीय मसले पर नियमित वाद-विवाद-संवाद जरुर करें। यह काम करने से आपको लोकतंत्र का भिन्न रुप नजर आएगा।लोकतंत्र वोट डालना भर नहीं है , वह ज्ञानकांड भी है। इनमें से कई छात्र तो यह भी कहते मिले कि हम तो चुनाव के समय ही राजनीति पर ध्यान देते हैं ,क्योंकि वोट देने जाना होता है,सवाल यह है इस तरह के युवाओं को इस दायरे के बाहर कैसे लाया जाय ।

हमारे शिक्षकों के पास लोकतांत्रिक अकादमिक अनुभव की कमी है फलतः उनके मन में अनेक किस्म के सेंसर या भय काम करते रहते हैं।वे विवादास्पद चीजें पढ़ाने से डरते हैं,वे डरते हैं कि कहीं लेबल चस्पां न कर दिया जाय, लेकिन हमें इस सबसे डरना नहीं चाहिए,हमें डरकर विवादास्पद विषय उठाने से डरना नहीं चाहिए। हम यदि चाहते हैं कि अधिकांश छात्र सक्रिय रुप से राजनीति में भाग लें तो हमें विवादास्पद विषयों को नियमित उठाना चाहिए। इससे विवाद होगा,छात्रों की शिरकत बढ़ेगी। साथ ही सामाजिक –न्याय के लक्ष्य को अपने नजरिए के केन्द्र में रखना चाहिए। हम यह भी देखें कि हमने लोकतंत्र का जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में विकास किस रुप में किया है ? उस विकास का स्वरुप और सीमाएं क्या हैं।यह बात हमेशा ध्यान रहे कि लोकतंत्र असीम है,उसकी कोई सीमा नहीं है। इस क्रम में हमें लोकतंत्र की अवधारणात्मक समझ को भी बहस के केन्द्र रखना चाहिए। सामान्य तौर पर आम लोगों की लोकतंत्र के बारे में समझ क्या है ,नमूने देखें- “लोकतंत्र यानी स्वतंत्रता या आजादी”, “चुनने का अधिकार” , “हम लोकतांत्रिक समाज में रहते हैं,हमें पसंदीदा व्यक्ति को चुनने के बहाने अपनी राय जाहिर करने का हक है”, “हम उन सभी मसलों पर वोट करते हैं जो हमारे सामाजिक सरोकारों और आस्थाओं की अभिव्यंजना करते हैं”, लोकतंत्र की इस तरह की जनप्रिय समझ दरशाती है कि लोकतंत्र को हम अभी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं।

इसी तरह लोकतंत्र पर बातें करते समय “अदर” या अन्य या हाशिए के लोगों का ख्याल रखा जाना चाहिए। हम”अदर” को जितना बेहतर ढ़ंग से जानेंगे उतनी ही गहरी हमारी लोकतांत्रिक समझ बनेगी। “अदर” के प्रति हमारा अज्ञान इन दिनों चरम पर है जिसे हम हमेशा छिपाते हैं। इसने यह स्थिति पैदा की है कि हम अन्य से नफरत करने लगे हैं या फिर उसके मसलों को लेकर गंभीर नहीं हैं,उनकी उपेक्षा करते हैं। हाल में पैदा हुआ आरक्षण विरोध इस दृष्टि की ताजा अभिव्यंजना है। हमें ध्यान रखना होगा कि “स्वतंत्रता” और “लोकतंत्र” पर बातें करते समय “अदर” का ज्ञान,उसके प्रति प्रतिबद्धता का होना जरुरी है।

इन दिनों हम कह रहे हैं कि “राष्ट्रभक्ति” पर बहस हो,या “राष्ट्रभक्ति” दिखाओ, लेकिन जब आप बहस करेंगे तो आपको “राष्ट्रद्रोह” पर भी बहस करनी होगी। यह संभव ही नहीं है कि देभक्ति पर बहस हो लेकिन देशद्रोह पर बहस न हो, ये दोनों एक ही साथ बहस के केन्द्र में आएंगे,इन दिनों संघी बटुक कह रहे हैं जो देशभक्त नहीं है वह राष्ट्रद्रोही है।जो कि एकदम गलत है।

लोकतंत्र की बुनियादी शिक्षा चार बुनियादी तत्वों से जुड़ी है। ये हैं-1.नागरिकचेतना का ज्ञान, 2.नागरिकचेतना के ज्ञानात्मक उपकरणों की समझ,3.नागरिक जीवन में हर स्तर पर कौशलपूर्ण शिरकत,4.नागरिकता के प्रति समर्पणभाव। इनमें से ज्योंही किसी भी एक चीज से जुडेंगे दूसरी चीज अपने आप खुलने लगेगी।एक शिक्षक की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने कौशल का इस्तेमाल करके इन चारों चीजों को खोले। इन चीजों को खोलते समय विवादास्पद सवाल भी आएंगे,उन सवालों को बड़े ही कौशल के साथ हल करना चाहिए। इसीलिए कहा गया है कि लोकतंत्र तो कौशल,ज्ञान,एटीट्यूट और एक्शन इन सबके संतुलन की मांग करता है।



लोकतंत्र के प्रसंग में बहुलतावाद को विगत 65 सालों में विभिन्न रुपों में पेश किया गया है।पंडित नेहरु से लेकर मोदी तक सभी बहुलतावाद की बातें कर रहे हैं। सच यह है सर्वसत्तावादी राजनीति के लिए बहुलतावाद भाषिक उपकरण से अधिक महत्व नहीं रखता। ये नेतागण कभी बहुलतावाद को आचार-व्यवहार में लागू नहीं करते,संस्कार में शामिल नहीं करते और यथार्थ से जोड़कर नहीं देखते। पंडित नेहरु की बहुलतावाद की समझ का ही यह दुष्परिणाम या खोखलापन है कि सच्चर कमीशन को बताना पड़ा कि मुसलमानों की देश में किस तरह की दुर्दशापूर्ण स्थिति है, यही हाल औरतों का भी है। यह कैसा बहुलतावाद है जो हिंसक-उत्पीडक है।हाशिए के लोगों को हाशिए के बाहर निकलने ही नहीं देता। पीएम मोदी की भी मूलतःवही स्थिति है। उनके लिए बहुलतावाद या भारत की विविधता भाषिक अलंकारमात्र है। उनके आचरण,उनके दल (संघ) के आचरण और उनकी नीतियों का बहुलतावाद के साथ तीन-तेरह का संबंध है। इसलिए लोकतंत्र में बहुलतावाद पर जब भी बातें हों तो बहुलताओं का सम्मान मात्र न करें,उसके आगे निकलें और देखें कि बहुलतावाद के विकास के लिए हमारे पास कौन सी नीतियां और योजनाएं हैं।

रविवार, 22 नवंबर 2015

शिक्षा और लोकतंत्र की चुनौतियां


        भारत की शिक्षा प्रणाली खासकर स्कूली शिक्षा पर बातें करते समय हमें बहुत ही कठिन सवालों से गुजरना होगा। मुश्किल यह है कि शिक्षा के कठिन सवालों पर देश में हमने लंबे समय से व्यापक स्तर पर कोई बहस ही नहीं चलायी है, समय-समय पर जब कोई नीति घोषित होती है तो उत्सवधर्मी भाव से कुछ सेमीनार,कन्वेंशन,संगोष्ठियां हो जाती हैं, कुछ प्रस्ताव संसद या विधानसभा में पास हो जाते हैं लेकिन गंभीर विस्तृत चर्चा नहीं होती,जनांदोलन नहीं होता। सवाल यह है कि क्या शिक्षा ऐसा विषय है जिस पर कोई बात ही न की जाए ?

हमने आजादी के बाद शिक्षा का जो ढांचा चुना और नीतिगत रास्ता चुना उस समय भी निचले स्तर पर कोई बड़ी बहस नहीं हुई। बाद में 1990-91 में भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के साथ नत्थी होकर हमारे शासकों ने जो शिक्षा का मार्ग चुना उस समय भी जनबहस नहीं हुई,इस बात को कहने का मकसद यह है कि हमारा समाज जानता ही नहीं है कि हमारे यहां शिक्षा का क्या हाल है और उसके सामने किस तरह की चुनौतियाँ हैं।

शिक्षा के विकास का नेहरु मॉडल पूरी तरह देश में असफल रहा,देश के हर कोने में और प्रत्येक समुदाय के पास शिक्षा पहुँचाने में यह मॉडल असफल रहा।इस मॉडल की सबसे बड़ी खामी यही है कि सने आरंभ से ही सीमित शिक्षा के लक्ष्य को सामने रखा । सीमित शिक्षा,सीमितचेतना और सीमित शिरकत यही इस मॉडल की विशेषता थी। “सबको शिक्षा” का नारा महज नारा ही बना रहा। सभी बच्चे स्कूल में हों यह सपना ही रह गया। बच्चों के स्कूल न जाने का अर्थ है उन्हें मानवाधिकार से वंचित रखना। हम इस पहलू पर विचार करें कि शिक्षा के जरिए मानवाधिकारों का हम कहां तक प्रसार करते हैं ?

उल्लेखनीय है मानवाधिकारों पर जिस गति से हमले बढ़ें हैं उस गति से मानवाधिकारों का प्रसार नहीं हुआ है। स्कूली शिक्षा व्यवस्था के स्वरुप पर गंभीरता से विचार करें तो पाएंगे कि भारत सरकार की प्राथमिकताओं में स्कूली शिक्षा कभी नहीं रही। आज भी नहीं है। जो लोग आए दिन शिक्षा के निजीकरण की हिमायत करते हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि स्कूली शिक्षा का समूचा बोझ उठाने या दायित्व पूरा करने में निजी क्षेत्र एकदम असमर्थ है। आज भी स्कूली शिक्षा का मात्र 10फीसदी नेटवर्क निजी क्षेत्र के दायरे में आता है 90फीसदी क्षेत्र सरकारी स्कूलों के दायरे में आता है। आज यदि सारे देश को स्कूली शिक्षा के दायरे में लाना है तो सालाना 73हजार करोड़ रुपये की हर साल आगामी छह वर्षों तक जरुरत होगी और केन्द्र और राज्य सरकारें यह पैसा खर्च करना नहीं चाहतीं। अकेले बिहार को स्कूली शिक्षा के दायरे में लाने के लिए आगामी नौ सालों तक प्रतिवर्ष 9,500करोड़ रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं। इस स्थिति से एक अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं कि स्कूली शिक्षा की अवस्था बहुत बेहतर नहीं है। हमें स्कूली शिक्षा के विकास के लिए सही नीति,समुचित संसाधन और राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरुरत है। आज ज्यादातर स्कूलों-कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पैरा टीचर बड़ी संख्या में काम कर रहे हैं। सारे देश के स्कूलों में तीन लाख से ज्यादा पैराटीचर काम कर रहे हैं। वहीं कॉलेजों में तकरीबन 50फीसदी से ज्यादा पदों पर पार्टटाइम-अतिथि शिक्षक काम कर रहे हैं। यही हाल विश्वविद्यालयों का भी है।यानी देश का बहुत बड़ा हिस्सा ठेके पर काम करने वाले शिक्षकों पर निर्भर है। यही दशा निजी क्षेत्र की है,वहां पर भी कॉन्ट्रेक्ट के आधार पर शिक्षक पढ़ा रहे हैं। स्थिति की भयीवहता का अंदाजा लगाने के लिए एक ही उदाहरण बताना यथेष्ट होगा। पश्चिम बंगाल में कुछ महिने पहले टीइटी शिक्षकों की भर्ती के लिए ऑनलाइन आवेदन मांगे गए थे,उस समय तकरीबन 22लाख छात्रों ने आवेदन किया, राज्य सरकार को इस आंकड़े को देखकर परीक्षा रद्द करनी पड़ी।क्योंकि इतनी बड़ी तादाद में परीक्षा-इंटरव्यू संपन्न करने में तकरीबन दो साल लगते।

शिक्षा ,साक्षरता और उपभोक्ता-

सन् 1990-91 के बाद से देश में स्कूली शिक्षा का अर्थ ही बदल गया है। अब शिक्षा का अर्थ बच्चे के ज्ञान और क्षमता का विकास करना नहीं है। इसके विपरीत शिक्षा का अर्थ है प्रयोजनमूलक शिक्षा या साक्षरता। यानी बाजार की जरुरत के अनुसार पढ़ो,सीखो और बाजार में उतरो। अब साक्षर बनाने पर जोर है, क्षमता बढ़ाने पर जोर नहीं है। जबकि एक जमाने में शिक्षा का अर्थ था बच्चे की ग्रहण क्षमता और ज्ञानक्षमता का विकास करना। लेकिन इन दिनों ये दोनों काम शिक्षाप्रणाली ने छोड़ दिए हैं और अब ज्यादा से ज्यादा साक्षर बनाने पर जोर दिया जा रहा है,इससे स्थिति बेहद खराब हुई है।अब प्रशिक्षित शिक्षकों को पैराटीचरों ने अपदस्थ कर दिया है।मसलन्, बिहार सरकार ने 1991 में घोषित किया कि स्कूल टीचर के लिए प्रशिक्षण आवश्यक नहीं होगा। असल में 1980 के दशक में शिक्षा को साक्षर बनाने की जो प्रक्रिया शुरु हुई वह अपना सारे देश में चक्र पूरा कर चुकी है। आज सारे देश में तकरीबन तीन से लाख से ज्यादा पैरा टीचर हैं। अब शिक्षा पर नहीं साक्षरता पर जोर है।समूची शिक्षा व्यवस्था का वस्तुकरण हो चुका है। अब बच्चों को साक्षर बनाने पर जोर है शिक्षा देकर उनकी बौद्धिक क्षमता बढ़ाने पर जोर नहीं है। जबकि शिक्षा का मकसद है छात्रों में बौद्धिक क्षमता, ग्रहण क्षमता,सामाजिकचेतना और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना पैदा करना। आज ये सारे लक्ष्य किनारे कर दिए गए हैं और नौकरी पाना ही प्रधान लक्ष्य है। यही वजह कि अधिकांश छात्र समझ ही नहीं पाते कि समाज में सही या गलत क्या हो रहा है ? वे तो मीडिया से संचालित होकर अपनी राय बनाते हैं। वे मीडिया को ही अपना सर्वे-सर्वा मानते हैं । मीडिया और खासकर विज्ञापन और जनसंपर्क तो उनके लिए खुदा है, उसके हर वाक्य को वे आप्त वाक्य मानते हैं। यही वजह है वे साक्षरता के आगे अपनी चेतना का विकास नहीं कर पाए हैं। उनके पास डिग्री है ,लेकिन चेतना का स्तर साक्षरों के बराबर है।

नई समझ यह बनायी जा रही है कि छात्र को उपभोक्ता मानो। शिक्षा को सेवाक्षेत्र मानो। इस समझ ने छात्र की पहचान को उपभोक्ता की पहचान के जरिए अपदस्थ कर दिया है। शिक्षा का बड़े पैमाने पर व्यवसायीकरण हो रहा है ,शिक्षा को बाजार की जरुरतों के साथ जोड़ दिया है। इसके कारण शिक्षा का क्षय तो हुआ ही है,शिक्षकों का भी क्षय हुआ है,एक जमाना था शिक्षक “पब्लिक इंटेलेक्चुअल” हुआ करते थे,लेकिन आज कोई भी शिक्षक इस कोटि में नहीं है।अब शिक्षक भी एक “माल” हैं,स्कूल एक बाजार है और छात्र उसके उपभोक्ता हैं। प्राइवेट स्कूलों से लेकर निजी विश्वविद्यालयों तक छात्रों को उपभोक्ता की तरह सेवाएं प्रदान की जा रही हैं और उनसे हर सेवा के पैसे लिए जाते हैं। इस समूची प्रक्रिया ने छात्र-शिक्षक के संबंध को खत्मकर दिया है. आज शिक्षकों पर दवाब है कि वे बाजार की जरुरतों और मांगों की पूर्ति के लिए पढाएं, इस तरह का पाठ्यक्रम पढाओ जिससे छात्रों को नौकरी मिले,वे काम करे, “काम करने” को इतना महत्व दिया गया है कि सोचने-विचारने के लक्ष्य को बहुत कहीं पीछे छोड़ दिया गया है। इस क्रम में हमने कभी सोचा ही नहीं कि इससे देश ताकतवर बनेगा या कमजोर बनेगा !

सवाल यह है हम लोकतंत्र के लिए “नागरिक” चाहते हैं या “उपभोक्ता” ? यदि “उपभोक्ता” के जरिए लोकतंत्र का निर्माण करना चाहते हैं तो लोकतंत्र की प्रकृति अलग होगी.यदि नागरिक के जरिए लोकतंत्र बनाना चाहते हैं तो लोकतंत्र की प्रकृति अलग होगी। “उपभोक्ता” और “नागरिक” में गहरा अन्तर्विरोध है। “उपभोक्ता” के “अन्य” के प्रति कोई सामाजिक सरोकार नहीं होते,वह सिर्फ अपने बारे में सोचता है, निहित स्वार्थों को सामाजिकता कहता है।इसके विपरीत “नागरिक” के निजी नहीं सामाजिक स्वार्थ होते हैं,सामाजिक लक्ष्य होते हैं , उसे अपने से ज्यादा “अन्य” की चिन्ता होती है। लोकतंत्र के विकास के लिए हमें “उपभोक्ता”नहीं “नागरिक” चाहिए। लोकतंत्र कभी भी उपभोक्ता के जरिए समृद्ध नहीं होता, नागरिक और नागरिकचेतना के जरिए समृद्ध होता है। शिक्षा के सेवाक्षेत्र में जाने और छात्र के उपभोक्ता बन जाने का प्रकारान्तर से असर यह हुआ कि छात्र-शिक्षक का संबंध खत्म हो गया। दूसरा, “छात्र(उपभोक्ता) हमेशा सही होता है”,इस धारणा को बल मिला। यही वह धारणा है जिसके आधार पर कहा जा रहा है कि शिक्षकों की भूमिका का छात्र मूल्यांकन करेंगे।यह असल में बाजार की मांग-पूर्ति के गर्भ से उपजा प्रपंच है।तीसरा,दवाब यह है कि शिक्षक वही पढाएं जो छात्र को बाजार में खड़े होने में मदद करे,प्रतिस्पर्धा में खड़े होने में मदद करे। चौथा, यह भ्रम निकाल दें कि निजी स्कूल,निजी क्षेत्र में खुल रहे विश्वविद्यालय आदि शिक्षा के मंदिर हैं ,ये तो “नौकरी” देने वाले संस्थान हैं,शिक्षा देना इनका मकसद नहीं है।निजी क्षेत्र में चल रहे विश्वविद्यालय और स्कूल आदि तो शिक्षा की गुणवत्ता के आधार पर नहीं चल रहे ये तो मीडिया निर्मित इमेज और जनसंपर्क अभियान के जरिए चल रहे हैं। ये कारपोरेट फंडिंग,अनुदान,व्यवसायिक हिस्सेदारी,मुनाफे और नियंत्रण पर आधारित हैं। इन संस्थानों में किसी भी स्तर पर लोकतांत्रिक संरचनाएं और लोकतांत्रिक माहौल नहीं हैं।

देश में स्कूली शिक्षा की स्थिति बेहद खराब है। कक्षा एक से पांच के बीच पढाई के दौरान बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने वाले विद्यार्थियों की संख्या तकरीबन 61 प्रतिशत है।यही संख्या बिहार में 75प्रतिशत है।इनमें अनुसूचित जाति-जनजाति के छात्रों की संख्या काफी ज्यादा है। इनमें अनुसूचित जाति के 70फीसदी और जनजाति के 78प्रतिशत छात्र बीच में ही पढाई छोड़ जाते हैं। आज भी 30प्रतिशत बच्चे स्कूल नहीं पहुँच पाए हैं। बिहार में 50फीसदी बच्चे स्कूल के बाहर हैं। बच्चों को स्कूल से बाहर रखने का अर्थ है उनको मानवाधिकार से वंचित करना। इसी प्रसंग में हम निजी और सरकारी क्षेत्र की भूमिका पर भी सोचें। आज हकीकत यह है कि 90फीसदी स्कूल सरकारी क्षेत्र में हैं और मात्र 10फीसदी स्कूल निजी क्षेत्र में हैं। निजी क्षेत्र में सब बच्चों को पढ़ाने की क्षमता ही नहीं है। मौटे तौर पर स्कूली शिक्षा का स्तर बेहद खराब है।

लोकतांत्रिक शिक्षा व्यवस्था-

सवाल उठता है कि छात्रों को इतिहास,अंग्रेजी और विज्ञान पढ़ाएंगे तो क्या देश का विकास होगा या देश में लोकतंत्र को मजबूत करने में मदद मिलेगी ? क्या विज्ञानसम्मत पाठ्यक्रम पढ़ाने मात्र से बेहतर व्यक्ति पैदा होता है ? उत्तर होगा नहीं। वास्तविकता यह है कि हमारे पाठ्यक्रम,छात्र,शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था का “सामाजिक न्याय” की अवधारणा के साथ गहरा अन्तर्विरोध है। हमारे शिक्षक-छात्रों में से अधिकांश कभी सामाजिक न्याय के नजरिए से न तो समाज के बारे में सोचते हैं और न शिक्षा व्यवस्था के बारे में सोचते हैं। हमने तो “मैं” या व्यक्तिवाद के आधार शिक्षा का समूचा ढाँचा तैयार किया है। हम जो पाठ्यक्रम पढ़ाते हैं वह सामाजिक यथार्थ जोड़ता नहीं है। मसलन्, हमारे छात्र कहीं पर भी यह नहीं जान पाते कि आखिर गेंहूं की बाली कैसी होती है,चमेली का पौधा कैसा होता है। प्रयोजनमूलक किताब और अंततःकिताब ही उनके ज्ञान का सर्वस्व है। इसके कारण एक कमाऊ व्यक्ति तो शिक्षा बना देती है,सिस्टम के लिए आदमी बना देती है लेकिन समाज के लिए “नागरिक” नहीं बना पाती। शिक्षानीति का आधार जब तक “सामाजिक न्याय” और नागरिकचेतना” को नहीं बनाते हम शिक्षा को बाजार के दवाब से मुक्त नहीं कर सकते। समाज में सर्वसत्तावादी राजनीति को हमेशा उपभोक्ता-छात्र से मदद मिलती रही है,यही वह छात्र है जो “अ-राजनीति” की राजनीति रहा है और खुलेआम सर्वसत्तावादी राजनीति के साथ खड़ा नजर आता है।जबकि वैकल्पिक राजनीति करने वालों के लिए जरुरी है कि वे छात्र को नागरिक बनाएं,मानवाधिकारों की चेतना दें,उसे छात्र जीवन में ,शिक्षा में राजनीति करने,शिक्षा के लोकतांत्रिकीकरण की प्रक्रिया का अंग बनाने और लोकतांत्रिक राजनीति करने के लिए तैयार करें। आज बड़े पैमाने पर जिस संविधानविरोधी और धर्मनिरपेक्षताविरोधी चेतना को युवाओं के एक बड़े समूह में सरेआम देख रहे हैं यह असल में वही समुदाय है जिसे उपभोक्ता-छात्र राजनीति ने तैयार किया है। मुश्किल यह है कि सर्वसत्तावाद की राजनीति करने वाले दोनों प्रधान दल कांग्रेस और भाजपा दोनों को “अ-राजनीति” की राजनीति सही लगती है,वे उसकी दैनंदिन अकादमिक जीवन में वकालत करते हैं और इन्हीं दोनों दलों के बीच उपभोक्ता छात्रों का बड़ा समूह आज आपको खड़ा दिखाई देगा।

देशकी शिक्षा नीति राजनीतिक दल और संसद तय कर रहे हैं,फंड भी राजनीतिक नजरिए से तय हो रहा है,संसाधनों का आवंटन भी राजनीति के आधार पर हो रहा है तो फिर स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालय के स्तर पर छात्रों को राजनीति करने से मना क्यों किया जा रहा है ? कायदे से शिक्षा संस्थानों में संविधानसम्मत राजनीति की गंभीरता के साथ शिक्षा देनी चाहिए। संविधानसम्मत लक्ष्यों के अनुरुप शिक्षकों के दिलो-दिमाग को रुपान्तरित करने, लोकतांत्रिक नजरिया,लोकतांत्रिक संस्कार और आदतें विकसित करने के प्रयास किए जाने चाहिए। आज देश को संविधानसम्मत विवेक से लैस लोकतांत्रिक शिक्षक चाहिए।

सवाल यह है हम शिक्षा के जरिए किस तरह का व्यक्ति निर्मित करना चाहते हैं ? हम “नागरिक बनाना चाहते हैं या धार्मिक प्राणी या फिर उपभोक्ता बनाना चाहते हैं ? लोकतंत्र के विकास की बुनियाद है “नागरिक” और लोकतंत्र की विचारधारा है मानवाधिकार या संविधानप्रदत्त अधिकार। “नागरिक” बनाए वगैर संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा करना संभव नहीं है। आज स्थिति यह है कि शिक्षितों में बहुत बड़ा अंश है जो “नागरिकबोध” से वंचित है,देश में रहते हैं,देश का उपभोग कर रहे हैं लेकिन नागरिकचेतना से शून्य हैं। इसने इफ़रात में मध्यवर्ग के अंदर सर्वसत्तावादी राजनीति का आधार बनाया है।इस तरह के लोग जाने-अनजाने संविधान,लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ आए दिन आचरण करते नजर आते हैं।

आज जो शिक्षित है उसे लोकतंत्र नहीं ,तानाशाही अच्छी लगती है। यही हमारी शिक्षा की आयरनी है। यह वर्ग अपने निहित-स्वार्थों से आगे जाकर देख ही नहीं रहा। यही वह वर्ग है जिसको “सामाजिक न्याय” के नजरिए से चिढ़ है।यही वह वर्ग है जो शिक्षा और समाज के प्रति अपनी जवाबदेही से भागता है। उपेक्षितों से इसने खास दूरी बनायी है। समय-समय उनके हितों पर हमले किए हैं। आज देश में आरक्षण, धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सबसे ज्यादा वैचारिक और राजनीतिक हमले इसी वर्ग की ओर से हो रहे हैं और देश के सबसे घृणित राजनीतिक समूह (हिन्दुत्ववादियों) के द्वारा इस समूचे घृणा अभियान को शिक्षितों में नियोजित ढ़ंग से चलाया जा रहा है।एक जमाने में यही वर्ग आपातकाल में श्रीमती इंदिरागांधी और मनमोहन सिंह सरकार के साथ खड़ा था।

लोकतांत्रिक शिक्षा के लिए जरुरी है कि विश्वविद्यालय से लेकर स्कूल स्तर तक शिक्षा का समूचा तंत्र लोकतांत्रिक,पारदर्शी और जनशिरकत वाला बनाया जाय। शिक्षा में शामिल लोगों की व्यक्तिगत,सामुदायिक और सामाजिक जवाबदेही तय की जाय। आज स्थिति इतनी भयावह है कि सरेआम संविधान प्रदत्त अधिकारों और मूल्यों को चुनौती दी जा रही है और शिक्षितों में से उसका प्रतिवाद नजर नहीं आ रहा,बल्कि उलटे शिक्षितों का बड़ा समूह हमले कर रहा है।आज सतह पर निजीतौर पर जिम्मेदार नागरिक,शिरकत करने वाला नागरिक और न्याय केन्द्रित नागरिक दिख जाएगा। लेकिन हमें तो ऐसा नागरिक चाहिए जो नागरिकचेना के प्रति वचनवद्ध हो। हमें टुकड़ों में नागरिक हकों से प्यार करने वाला नागरिक नहीं चाहिए। एक अन्य चीज है जिस पर गौर करने की जरुरत है वह है अनुकरण और देशभक्ति, ये दोनों तत्व बेहद दुखदायी हैं, इनसे लोकतांत्रिक लक्ष्यों को हासिल करने में मदद नहीं मिलती, उलटे बाधाएं उठ खड़ी होती हैं। इसी तरह पड़ोसी से अच्छा बर्ताव या ईमानदारी पर अतिरिक्त जोर देने की जरुरत नहीं है ये तो लोकतंत्र के अंतर्निहित गुण हैं।

हमारी शिक्षा का तंत्र वस्तुतःगूंगे-बहरों का तंत्र है। इसमें आने वाले समाज की बहसें और मसलों पर वैचारिक सरगर्मी नजर नहीं आती। क्या हम मान बैठे हैं कि यथास्थिति बनाए रखें ? भविष्य में कुछ भी बदलना नहीं चाहते ? भविष्य के सवालों और समस्याओं पर अकादमिक जगत में सन्नाटा बताता है हमारा शिक्षित समुदाय किस कदर समाज निरपेक्ष है और उसे समाज के भविष्य की कोई चिन्ता नहीं है। यह उसके परजीवी विवेक का आदर्श नमूना है। सवाल यह है हमारी शिक्षा व्यवस्था यथास्थितिवादी है या परिवर्तनशील है ? बहुलतावादी संवेदना निर्मित करती है या धार्मिकचेतना निर्मित करती है ? साम्प्रदायिक ,जातिगत और धार्मिकभेदों को यह समाप्त क्यों नहीं कर पाई ? सच तो यही है कि बहुलतावाद के ऊपरी आवरण को हटा दें तो शिक्षा ने जमीनी स्तर पर भेदों की समाप्ति करने की बजाय भेदों की सृष्टि करने वाली संस्कृति,मूल्य और मानसिकता को निर्मित किया है।

लोकतांत्रिक शिक्षा का लक्ष्य है आलोचनात्मक विवेक पैदा करना। जबकि उपभोक्ता केन्द्रित मौजूदा शिक्षा का लक्ष्य है सर्वसत्तावादी विवेक पैदा करना। इसलिए मौजूदा मॉडल को अंदर और बाहर हर स्तर पर आलोचना के केन्द्र में रखने की जरुरत है। लोकतांत्रिक शिक्षा का परिवेश सामाजिक बहस के नए मुद्दों को जन्म दे सकता है,लोकतंत्र में पॉजिटिव भूमिका निभाने का माहौल बना सकता है। शिक्षकों की पॉजिटिव इमेज बना सकता है और छात्र को नागरिक बना सकता है।

लोकतांत्रिक अध्यापक- लोकतांत्रिक शिक्षा के लिए लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य,लोकतांत्रिक अकादमिक परिवेश और लोकतांत्रिक शिक्षक का होना जरुरी है। लोकतांत्रिक शिक्षक के बिना लोकतांत्रिक छात्र का निर्माण संभव नहीं है। शिक्षा को बदलने के लिए जरुरी है कि शिक्षकों के नजरिए,संस्कार,आदतें आदि को लोकतांत्रिक बनाया जाय, शिक्षक अपना कायाकल्प करें। लोकतंत्र की धारणा को स्पष्ट तौर पर समझें,लोकतंत्र का मतलब अ-राजनीतिक तंत्र नहीं है,वोट देना मात्र नहीं है,लोकतांत्रिक समाज का मतलब अ-राजनीतिक समाज नहीं है। लोकतंत्र का मतलब है राजनीतिक समाज,ऐसा समाज जिसमें समाज के सभी वर्गों और समुदायों के विकास,मूल्य ,आचार-व्यवहार आदि को लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी पर परखा जाय जो मूल्य खरे उतरें उन्हें बचाएं और जो अप्रासंगिक हैं उनको ठुकराएं। समानता, धर्मनिरपेक्षता ,सामाजिक न्याय और समाजवाद इसके भावी लक्ष्य हैं जिनको प्राप्त करना है।

आज हमारे बीच में इस तरह के लोग है जो शिक्षा के लोकतांत्रिकीकरण का खुलकर विरोध करते हैं और कहते हैं कि शिक्षा को राजनीति से मुक्त रखो। इस तरह के लोगों से यही कहना है कि लोकतंत्र में रहना है तो राजनीतिक होकर रहना होगा। राजनीति के बिना लोकतंत्र संभव नहीं है। लोकतांत्रिक राजनीतिक शिरकत और लोकतांत्रिक राजनीतिकबोध के बिना संवैधानिक मान्यताओं और मूल्यों की रक्षा करना संभव नहीं है। देश में राजनीतिकदलों और संसद से ऊपर है संविधान और उसकी मान्यताएं,हमें किसी भी कीमत पर संविधान के दर्जे को कम नहीं होने देना चाहिए। आज विभिन्न तरीकों से संविधान प्रदत्त मूल्यों और हकों पर हमले हो रहे हैं इन हमलों के खिलाफ आम जनता के साथ शिक्षित समुदाय को मिलकर संघर्ष करने की जरुरत है।आने वाले समय में मोदी सरकार नई शिक्षा नीति लाने जा रही है ,इस सरकार के रंग-ढ़ंग को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है ये लोग किस रास्ते देश की शिक्षा व्यवस्था को ले जाना चाहते हैं। यही वजह है हमें अभी से शिक्षा जगत में विभिन्न स्तरों पर आने वाली शिक्षा नीति के बारे में सचेत होकर जागरण अभियान चलाने की जरुरत है। अब तक के शिक्षा के अनुभवों को शेयर करने की जरुरत है,नए हमलों को विस्तार से अकादमिक जगत को बताने की जरुरत है,क्योंकि यह वर्ग सम-सामयिक यथार्थ से पूरी तरह विच्छिन्न है और उसे सम-सामयिक यथार्थ के लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य के साथ जोड़ने की जरुरत है।

शिक्षा के मौजूदा ढाँचे पर बातें करते समय एक पहलू है सरकारी नीति का,दूसरा पहलू है शिक्षक की अवधारणा का और तीसरा पहलू है छात्र के स्वरुप का। भारत में लोकतंत्र है और लोकतंत्र के बहुमुखी विकास में मदद करना हमारी शिक्षा प्रणाली का बुनियादी लक्ष्य होना चाहिए। इसके लिए जरुरी है कि हम लोकतंत्र की समझ बेहतर और गंभीर बनाएं।एक शिक्षक को आचार-व्यवहार और परिप्रेक्ष्य के लिहाज से लोकतांत्रिक होना चाहिए।वह अपने विषय़ को गंभीरता से जाने , छात्रों में अध्ययन और श्रम के प्रति गहन रुचि पैदा करने की उसमें क्षमता हो।वह पढ़ाई के अत्याधुनिक तरीकों से वाकिफ हो,अपने काम की जगह स्वच्छ और सुव्यवस्थित रखना सिखाए,पुस्तकीय सामग्री और कम्युनिकेशन उपकरणों के उपयोग के तरीकों से परिचित हो।छात्रों में सबके साझे कार्यों में शिरकत की भावना पैदा करे, सामाजिक शिरकत और पहलकदमी के लिए प्रेरित करे। साथ ही छात्रों में समाज के प्रति सही दृष्टिकोण पैदा करे। हम यह ध्यान रखें कि शिक्षक के आचार-व्यवहार का छात्रों की सक्रियता पर असर पड़ता है। जो शिक्षक अपने छात्रों को सक्रिय न कर सके ,वह कमजोर शिक्षक माना जाएगा। छात्र में सक्रियता,शिरकत और पहलकदमी की भावना निर्मित करने में स्कूल शिक्षक बुनियाद निर्माण का काम कर सकते हैं। शिक्षा में सक्रियता का अर्थ है बच्चों को सोद्देश्य बौद्धिक क्रियाओं की ओर सक्रिय करना,बौद्धिक क्रिया और वस्तुजगत की एकता पर जोर देना। यदि यह प्रक्रिया एक बार आरंभ हो जाती है तो छात्रों को सही-गलत का फैसला करने में मदद मिलती है। साथ ही श्रम के महत्व को बच्चों के आचरण का अंग बनाना भी जरुरी है। हमारे बच्चे श्रम को पसंद नहीं करते,अपना काम अपने आप नहीं करते।इससे उनके अंदर श्रम विरोधी नजरिया पैदा होता है।



मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

लेखक और प्रतिवाद का हक

देश में पीएम राजनीति कर सकता है, मोहन भागवत राजनीति कर सकते हैं, जाहिल बटुक भी राजनीति कर सकते हैं, विपक्षीदल भी राजनीति कर सकते हैं, लेकिन लेखक राजनीति न करे! क्यों जी, लेखक राजनीति क्यों न करे? किस अधिकार से उसे राजनीति करने से रोक रहे हैं आप! लेखक सत्ता का गुलाम कभी नहीं रहा , जो सत्ता के गुलाम थे वे आज भी सत्ता की गुलामी कर रहे हैं और लेखकों के द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए जाने पर सवाल खडे कर रहे हैं, इनमें वे भी हैं जो कल उस सत्ता का मुखौटा लगाए हुए थे आज वे मोदी का मुखौटा लगाए हुए हैं। 
   लेखक का राजनीति करना, राजनीतिक मसलों पर स्टैंड लेना, सत्ता और साम्प्रदायिक ताकतों के हिंसक गठजोड. का विरोध करना सही दिशा में उठाया गया कदम है। कुछ लोग कह रहे हैं यहसेक्युलर लेखकों का फ्रस्टेशन है तो कुछ लोग कह रहे हैं कि यह प्रचार की भूख के लिए उठाया गया कदम है। साम्प्रदायिक हिंसा और उसे संघ के खुले समर्थन ने सारे संघर्ष को राजनीतिक बना दिया है। लेखकों परहमला करने वाले जब राजनीतिज्ञ हों तो यह कैसे संभव है कि लेखक चुप रहे, मूकदर्शक बना रहे! 
 लेखकों ने हिंसा शुरु नहीं की , लेखकों पर हमले, निरीह नागरिकों पर जानलेवा हमले बटुकों ने शुरु किए हैं। ये हमला करने वाले पाशविक आचरण कर रहे हैं ऐसे में लेखक और सचेत जनता चुप कैसे रह सकती है। 
   लेखकों का बडे पैमाने पर साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाना गांधीवादी प्रतिवाद है और यह प्रतिवाद जितने बडे पैमाने हुआ है उससे साफ समझ लें देश को हिन्दुत्ववाद की गुलामी में कैद नहीं रखा जा सकता।हमें इस प्रतिवाद में ज्यादा से ज्यादा लेखकों को शामिल करनाहोगा। इसके लिए जरुरी है  कि लोकतंत्र, सभ्यता , धर्मनिरपेक्षता और लेखकीय स्वायत्तत के आधार पर साझा मंच तैयार किया जाय।

बुधवार, 19 अगस्त 2015

नीतीश -मोदी और विभ्रम -


लोकतंत्र में विभ्रम निर्णायक हैं,जनता के वोट से लेकर दिमाग तक विभ्रम का खेल तूफान की तरह चलता है। मोदी से लेकर नीतीश तक सबके पास विभ्रम हैं। हम में से कोई भी रियलिटी देखना नहीं चाहता और रियलिटी पर बातें करना नहीं चाहता।
विभ्रम का सबसे ज्यादा असर हम मध्यवर्ग के लोगों पर होता है। हमें विभ्रम बड़े प्यारे हैं, हम विभ्रम में अहर्निश विचरण करना पसंद करते हैं।पहले मनमोहन सिंह के विभ्रम से घिरे थे अब मोदी के विभ्रमों में फंसे हैं।हम भूल जाते हैं कि समाज को विभ्रमों से ऊर्जा नहीं मिलती,बल्कि विभ्रमों का जितना दवाब होता है संकट उतना ही गहराता चला जाता है। विभ्रम का खेल देखें कि मनमोहन से नफरत करते थे लेकिन मोदी से प्यार करने लगे जबकि नीतियां वही हैं। बेकारी चरम पर है महंगाई रोज बढ़ रही है,सामाजिक असुरक्षा बढ़ी है,पाक से तनाव बरकरार है,घूसखोरी चरम पर है,सीबीआई के पास मनमोहन सिंह के जमाने की तुलना में मोदीशासन में ज्यादा करप्शन केस दर्ज हुए हैं, अदालतें चरमरा गयी हैं। लेकिन हम हैं कि विभ्रम में आनंदित हैं,मोदी-मोदी के नशे में मस्त हैं।
लोकतंत्र में विभ्रम संकट को नजरों से कुछ समय के लिए ओझल रखते हैं,लेकिन एक अवधि के बाद जब संकट सतह पर आ जाता है और हम असंतुष्ट होने लगते हैं शासकवर्ग नए विभ्रमों की सृष्टि करते हैं और हम फिर से आनंद में डूब जाते हैं और संकट भूल जाते हैं।
सोचिए रॉबर्ट बाड्रा के खिलाफ कोई केस क्यों नहीं हुआ अभी तक,जबकि मोदी खुलकर हमले कर रहे थे, शीला दीक्षित पर कोई केस नहीं हुआ जबकि केजरीवाल-मोदी दोनों ही हमले कर रहे थे, पश्चिम बंगाल में 34साल शासन करने वाले वामनेताओं के खिलाफ कोई करप्शन केस न तो राज्य सरकार ने किया न केन्द्र सरकार ने किया, जबकि ममता-मोदी दोनों ही आम जनता को वाम नेताओं के बारे में झूठी कहानियां सुना-सुनाकर व्यस्त करने,आनंदित करने में सफल रहे,वाम हार गया लेकिन सच तो नहीं बदला,सच यह है कि वामनेताओं का शासन बेदाग था।
लोकतंत्र को पुख्ता बनाना है तो विभ्रमों से बचो,बिहार के प्रसंग में मोदी फिर से विभ्रमों की वर्षा करने जा रहे हैं, इस रणनीति को समझने की जरुरत है। बिहार की सच्चाई को खुली आंख देखने की जरुरत है। जो सच है उसके आधार देखें।
सच यह है बिहार में पहले की तुलना अपराध कम हुए हैं, कम से कम मीडिया में विगत पाँच साल में अपराधों का कवरेज एकसिरे से कम हुआ है,सामाजिक टकराव की घटनाएं तकरीबन नहीं हुई हैं। सड़कों का जाल फैला है। यह सब ऐसी अवस्था में हुआ था जब बिहार का सिस्टम पूरी तरह बैठ गया था।
यह सच है कि बिहार में अभी भी बहुत कुछ होना बाकी है,नीतीश से आपके मतभेद हो सकते हैं,लेकिन नीतीश कुमार बेदाग नेता हैं।उनके खिलाफ न तो दंगा कराने का आरोप है और न भ्रष्टाचार के आरोप हैं। उनके बारे में कोई यह नहीं कह सकता कि वे कारपोरेट घरानों के बंधुआनेता हैं और उनके हितों के लिए काम कर रहे हैं। जबकि ये सारी बाते नरेन्द्र मोदी पर खरी उतरती हैं।
नीतीश कुमार के बारे में सबसे अच्छी बात यह है वह कभी काल्पनिक वायदे नहीं करते। अनर्गल नहीं बोलते,मुख्यमंत्री के रुप में नियमित ऑफिस जाते हैं,विधानसभा सत्र के समय सदन में रहते हैं। लेकिन नरेन्द्र मोदी के बारे में यह नहीं कह सकते, वे मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक हवा-हवाई की धुन में रहे हैं।
मूल बात यह विभ्रमों से बचो रियलिटी पर बातें करो। जो व्यक्ति दिल्ली की गद्दी पर बैठकर एक भी समस्या का डेढ़ साल में समाधान नहीं कर पाया उसे बिहार को सौंपने का अर्थ है बिहार को पुनःअपराधी गिरोहों के हवाले करना।

शुक्रवार, 8 मई 2015

न्याय का अन्यायमुख


            कानून के खिलाफ बोलना या न्याय का विरोध करना अपने आपमें जोखिम का काम है,  आमतौर पर भारत में जो कानून के जानकार या विशेषज्ञ हैं वे कानून के दार्शनिक-वैचारिक पहलुओं पर कम  बोलते हैं । सामान्य तौर पर पूंजीवादी समाज में कानून के पास फरियाद लेकर जाओ तब कानून हस्तक्षेप करता है, अपनी पहल पर वह कभी हस्तक्षेप नहीं करता। इससे यह भी पता चलता है कि कानून में निजी पहलकदमी का अभाव है। कानून की धुरी न्याय नहीं है, बल्कि युक्तियां और फैसले हैं,न्याय की परंपरा है, फैसलों की परंपरा है।फलतःकानून किताबों और दलीलों का विशाल जंजाल है।
      न्यायालयों में वही नियम लागू होता है जो समाज में लागू होता है। समाज  जिस तरह बल प्रयोग के आधार पर चलता है, वैसे ही बल के आधार पर लोकतंत्र भी चलता है,उसी तरह न्यायालयों में भी बल के आधार पर ही फैसले होते हैं।  अदालत के अंदर बली होने के लिए जरुरी है कि आप जमकर पैसा फेंकें और अदालत में बल का प्रदर्शन करें। बड़े से बड़े वकील को खड़ा करें। बड़े वकील का मतलब ज्यादा फीस और मुकदमा लड़ने वाले की ताकत । इसीलिए यह कहते हैं कि कानून का समूचा दारोमदार न्यायिक बल -संतुलन पर टिका है। जिस तरह हिंसा में बल की भूमिका होती है ,उसी तरह कानून में भी बल की भूमिका होती है।
     कहने के लिए लोकतंत्र आम आदमी के ऊपर टिका है लेकिन वस्तुगत तौर पर देखें तो लोकतंत्र सामाजिक-आर्थिक शक्ति संतुलन पर टिका है। लोकतंत्र में वही सफल है जो अपने पक्ष में सामाजिक-आर्थिक शक्ति संतुलन एकत्रित करने में सफल हो जाता है। मसलन् नरेन्द्र मोदी की जीत के पीछे मात्र 31फीसदी वोटरों की भूमिका है 69फीसदी वोटर उनके खिलाफ हैं ,लेकिन आर्थिक शक्तियों का संतुलन वे अपने पक्ष में लामबंद करने में सफल हो गए और पीएम बन गए।

      समग्रता में अदालतों में वही सफल होता है जिसके पास ताकत है,संसाधनों की शक्ति है। न्याय के आधार पर अदालतों में फैसले नहीं होते, अदालतों में फैसले तो न्यायबल के आधार पर होते हैं, न्यायबल में महत्वपूर्ण न्याय नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण है 'बल' । पूंजीवादी न्याय में असमानता अन्तर्निहत है, वह सतह पर समानता का लाख जयगान करे लेकिन व्यवहार में वह असमानता को ही तरजीह देता है। असमानता का आचरण करता है। यह असमान व्यवहार चौतरफा सहज ही देख सकते हैं। भारतीय न्याय प्रणाली की मूलभूत अनुभवजन्य विशेषता है कि कानून स्वयं जिन बातों का दावा करता है उन बातों का पालन नहीं करता। मसलन् कानू यह दावा करता है कि वह करप्ट नहीं है लेकिन यह पाया गया कि भारत के सुप्रीमकोर्ट के 9 में से 7मुख्यन्यायाधीश करप्ट थे जिनके बारे में प्रसिद्ध कानूनविद शांतिभूषण ने सीधे आरोप लगाया था। कानून में करप्शन का स्रोत है नियमहीनता का सिद्धांत। मसलन्, न्यायालयों में वकीलों की फीस का कोई नियम नहीं है, वकील लोग मनमानी फीस लेते हैं,सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अलत तक हमें करप्शन के दर्शन सहज ही मिल जाएंगे। अदालत से यह तो पूछा ही जाना चाहिए कि वकीलों की फीस का मानक क्यों नहीं बनाया गया ? क्यों किसी वकील की फीस करोडों में होती है और किसी की हजारों में होती है ? क्या न्यायालय को पता नहीं है कि आम आदमी की आमदनी कितनी है ? सारी दुनिया को ईमानदारी,नियम,पारदर्शिता का उपदेश देने वाली न्यायपालिका में इतनी अंधेरगर्दी क्यों है ? प्रमाण और फैसलों के जंजाल में न्याय पाना आज सबसे मुश्किल काम है। कानून की किताबें सहज,सरल और छोटी क्यों नहीं होती ?       

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...