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मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

बंदूक सबके पास है-

               राज्य और केन्द्र में सत्ता भाजपा के पास पूर्ण बहुमत है।छत्तीसगढ़ में सालों से पुलिस कार्रवाई हो रही है।नोट स्ट्राइक से सर्जीकल स्ट्राइक तक सब कुछ कर चुके हो,यह भी कह चुके हो,छत्तीसगढ़ और दूसरे इलाकों में नक्सलवाद की कमर तोड़ दी,नक्सल बर्बाद कर दिए,फिर यह अचानक 300 नक्सलों ने सीआरपीएफ पर हमला कैसे कर दिया मोदीजी ?
सीआरपीएफ के अनेक जवान नक्सली हमले में मारे गए हैं,हम सब दुखी हैं ,इस हमले की निंदा करते हैं,लेकिन जब सीआरपीएफ के हमले से नक्सली मारे जाते हैं या फिर उन पर बेइंतिहा पुलिस जुल्म होते हैं,झूठे केस लगाकर उनको फंसाया जाता है तब भी हमें तकलीफ होती है।
देश के लिए पुलिस-सेना के जवान जितने महत्वपूर्ण हैं आदिवासी नक्सली भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं,आदिवासियों की हजारों एकड़ जमीन बंदूक की नोंक पर छीनी जाएगी तो वे बंदूक का जवाब फूलों की माला पहनाकर नहीं देंगे।बंदूकें सबके पास हैं।
आदिवासियों की बंदूक की नोक पर बेदखली बंद करो,आदिवासियों को न्याय और सुरक्षा दो,हम भी देखते हैं नक्सल कैसे हमले करते हैं !
नक्सलों को आदिवासियों में हीरो तो भाजपा की गलत नीतियों ने बनाया है,पहले यही काम कांग्रेस कर रही थी।
आदिवासी हों या नक्सल हों या माओवादी हों ,वे सब वैसे ही भारत के नागरिक हैं जैसे सेना-सीआरपीएफ -कारपोरेट घराने आदि।लेकिन भाजपा सरकार के नजरिए में सेना-कारपोरेट घराने-सीआरपीएफ आदि तो प्रिय हैं लेकिन अन्य अप्रिय हैं,शत्रु हैं,उनको न्याय पाने का हक नहीं है।इस तरह एक आंख से यदि सरकार देखेगी और अन्याय करेगी तो आदिवासियों और नक्सलों का प्रतिवाद थमने वाला नहीं है।
नक्सली प्रतिवाद को टीवी पर विजय का डंका बजाकर,फेसबुक पर बटुकसंघ के साइबरसैनिकों से हमला कराके परास्त नहीं किया जा सकता।कम से कम मोदीजी इतना तो जान लो आपसे या रमनजी की सरकार से छत्तीसगढ़ के आदिवासी खुश नहीं हैं,आदिवासियों की संकट की घड़ी में राज्य सरकार को मदद करनी चाहिए लेकिन हो उलटा रहा है,फलतःआदिवासियों की मदद करने का नक्सलों को मौका मिला है।आदिवासियों में नक्सलों का सांगठनिक विस्तार हुआ है,मोदीजी आपकी और रमन सरकार की नक्सलवादियों के बारे में की गयी सभी घोषणाएं झूठी साबित हुई हैं।आपके और रमन सरकार का आदिवासियों पर कोई असर नहीं है,कोई आदिवासी आप पर विश्वास नहीं करता।आदिवासियों का घर उजाड़कर भाजपा-आरएसएस-कारपोर्ट घरानों का घर बसाया नहीं जा सकता।

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

किसान ज्ञान परंपरा- झारखंड के किसान -स्वामी सहजानंद सरस्वती

    बिहार प्रान्त को असल में 'बिहार और छोटानागपुर' के नाम से ही पुकारा जाता है। यों कभी-कभी संक्षेप में केवल 'बिहार' भी कह देते हैं। जब उड़ीसा का सम्‍बन्‍ध बिहार से था तब तो 'बिहार और उड़ीसा' अकसर कहा जाता था। मगर उड़ीसा के अलग हो जाने के बाद केवल 'बिहार' के बजाए 'बिहार और छोटानागपुर' कहना ही उचित प्रतीत होता है। यों तो उड़ीसा के मिले रहने पर भी कभी-कभी केवल 'बिहार' ही कहते थे। चाहे जो भी हो, छोटानागपुर का महत्‍व काफी है और जान या अनजान में इसकी याद हमेशा बनी रही है।

    बात असल यह है कि इस प्रान्त के कुल सोलह जिलों में सिर्फ सारन, चम्पारन, दरभंगा, मुजफ्फरपुर और पूर्णिया यही पाँच ऐसे हैं जहाँ पहाड़ नहीं हैं। शेष ग्यारह में तो कमोबेश पहाड़ पाए ही जाते हैं। यह ठीक है कि छोटानागपुर के पाँच जिलों पलामू, राँची, हजारीबाग, मानभूम और सिंहभूमतथा संथाल परगना, इन छह जिलों की भूमि जिस प्रकार पार्वत्य या पहाड़मयी है वैसी गया, मुंगेर आदि की नहीं है। ये छह तो पहाड़ों और जंगलों से घिरे हैं। मगर गया वगैरह के कुछ ही हिस्से पहाड़ी हैं। फिर भी यह बात सही है कि ये जिले भी अपने भीतर कुछ न कुछ जंगल और पहाड़ रखते ही हैं। पटना जिले में ही सबसे कम पहाड़ और जंगल हैं। इस प्रकार जंगलों की प्रधानता का खयाल करके ही पलामू आदि छह जिलों को बहुत पहले से झारखंड कहते चले आते हैं। बाकी जो ग्यारह जिले बच जाते हैं उनमें या तो जंगल पहाड़ ही नहीं, या बहुत ज्यादा नहीं हैं। यह भी बात है कि उनमें बौद्धकाल में बौद्ध भिक्षुओं के रहने और पढ़ने आदि के लिए जगह-जगह मठ या मकान प्राय: बने रहते थे जिन्हें बौद्ध सम्प्रदाय में विहार कहते हैं। इसीलिए वे ग्यारह जिले विहार कहे जाने लगे। असल में तो इस लम्बे सूबे को दो भागों में बाँटकर जैसे जंगली भाग को झारखंड कहते थे वैसे ही दूसरे भाग को विहार खंड ही कहना उचित था। मगर जाने क्यों केवल 'विहार' ही कहा जाता था।

    इस प्रकार बिहार या विहार खंड और झारखंड के नाम से दो भागों में बँटे इस सूबे में विहार खंड के किसानों की दशा सुधारने की कोशिशें तो इध्‍यानर बहुत हुई हैं। मगर यह बात झारखंड के बारे में नहीं हुई है। बिहार प्रान्तीय किसान सभा ने भी उतना ध्‍यान इस ओर नहीं दिया है जितना विहार खंड की ओर। फलत: और तो और, बाहरी लोगों को यहाँ के किसानों की समस्याओं तथा मुसीबतों की जानकारी तक प्राय: हुई नहीं! थोड़ी बहुत टूटी-फूटी बातें ही लोग जानते हैं। कभी-कभी कोई उथल-पुथल हो जाने पर ही कुछ नई बातें मालूम हो पाती हैं। जिसे पक्की और ब्यौरे की जानकारी कहते हैं वह तो फिर भी नहीं होती। वहाँ के असली निवासी, जिन्हें आदिवासी भी कहते हैं, आमतौर से मूक जैसे हैं। पढ़ने-लिखने की तो बात ही जाने दीजिए। उनकी भाषा ऐसी है कि दूसरे लोग समझी नहीं सकते। उनके रस्मोरिवाज भी निराले ही हैं। वे सीधे भी हद से ज्यादा हैं।
यह प्रान्त तो बड़ा है नहीं। कुल सोलह जिले हैं। जनसंख्या भी प्राय: साढ़े तीन (36340000) करोड़ ही है। मगर जहाँ तक किसानों की बात है, यहाँ तीन तरह के काश्तकारी कानून लागू हैं। बिहार काश्तकारी कानून Bihar Tenancy Actसिर्फ विहार खंड के दस जिलों में ही लागू है। उसका ताल्लुक झारखंड से ही नहीं। झारखंड में भी दो कानून हैं। संथाल परगनाको छोड़ बाकी पाँच जिलों में छोटानागपुर काश्तकारी कानून Chotanagpur Tenancy Act—प्रचलित है और उसी के अनुसार वहाँ काम होता है। मगर संथाल परगनाकी तो बात ही निराली  हलत मुरारेस्तृतीय: पन्था: है। इन दोनों में एक भी वहाँ लागू नहीं है। उस जिले के लिए एक तीसरी ही कानूनी व्यवस्था है जिसे संथाल परगना मैनअल Santhal Pargana Manualकहते हैं। उसी के अनुसार वहाँ का इन्तजाम होता है। यह मैनुअल भी बना है ज्यादातर 1872 और 1886 के नियम कायदों (Regulations) के आधार पर ही। झारखंड की पेचीदगी इसीलिए और भी बढ़ जाती है।

    बदकिस्मती की बात यह भी है कि वहाँ के मूल निवासियों का नेतृत्व दूसरों के ही हाथ में है। ईसाइयों के जाने कितने ही मिशन वहाँ बहुत दिनों से काम करते हैं। उनने ईसाइयत का प्रचार भी वहाँ काफी किया है। अतएव एक तो वही लोग वहाँ के किसानों का नेतृत्व करते आए हैं। उनके सिवाय समय-समय पर सूबे के उत्तारी भाग या विहार खंड से भी पढ़े-लिखे सूदखोर बनिए या व्यापारी लोग वहाँ समय-समय पर बसते गए हैं। वकील, मुख्तार या और तरह के पढ़े-लिखे लोग, या तो वही हैं या बंगाली। अबरक, कोयला, लोहा वगैरह के कारबार और लाह या लकड़ी के रोजगार के सिलसिले में भी सभी तरह के लोग भारत के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों से भी आके वहाँ बस गए हैं। इसलिए स्वभावत: ऐसे लोग उन गरीबों के अगुवा बनने की कोशिश करते हैं। कांग्रेस जैसी प्रभावशाली संस्था के जितने प्रमुख नेता झारखंड में हैं वे सभी बाहर वाले ही हैं।

    आदिवासी आन्दोलन के रूप में आज एक संस्था वहाँ खड़ी हो गई है सही और उसका नेतृत्व भी आदिवासियों के हाथ में ही बताया जाता है। कई ऐसे लोग भी हैं जो आदिवासी ही हैं और किसान सभा के नाम पर उनने एक संस्था भी बना ली है। मगर उनका नेतृत्व निहायत लचर और अवसरवादी है। वे किसानों को उठाना नहीं चाहते। किन्तु अपना काम निकालना चाहते हैं। आदिवासी आन्दोलन की कमी यह है कि शुद्ध मध्‍यमवर्गीय ढंग से ही चालू हो रहा है। यदि वह किसानों के वर्ग स्वार्थों के ही आधार पर चालू होता तो उसमें अपार शक्ति आ जाती और वह सचमुच झारखंडवासियों का निस्तार ही कर देता।

    यही कारण है कि असलियत का पता नहीं लग पाता और घपले बढ़ गए हैं। मैं शुद्ध किसान हित के खयाल से ही वहाँ की स्थिति पर प्रकाश डालना चाहता हूँ ताकि उस अन्‍धेरीगुफा की झाँकी हमें मिले। हमें और हमारे कार्यकर्ताओं को सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वहाँ के निवासियों के अभाव-अभियोगों को जानते ही नहीं। वहाँ के काश्तकारी कानून की खास बात क्या है और उसमें क्या कमी है यह बात हमें मालूम नहीं। फिर उसके सुधार का आन्दोलन भी किया जाए तो कैसे? बाहरी लोगों की दृष्टि से वहाँ के काश्तकारी कानून में पेचीदगियाँ हैं। कांग्रेसी मंत्रियों के समय वहाँ का कानून भी बहुत कुछ सुधारा गया ठीक बिहार के काश्तकारी कानून के ही ढंग पर। मगर कितने मेम्बरों ने असेम्बली में उसे समझा भी, यह एक सवाल है। सिर्फ रस्मअदाई के खयाल से या दो-चार लोगों के कहने से ही जो कानून बने उससे हम लोगों का फायदा कहाँ तक कर सकते हैं? बिहार के कितने कांग्रेसी नेता हैं जो उन कानूनों को समझते हैं।

    जब तक हम वहाँ की असली परिस्थिति न जानें, लोगों की सबसे चुभने वाली माँगों की हमें पूरी जानकारी न हो, सरकारी महकमे वहाँ कैसे काम करते हैं, कचहरियाँ कहाँ तक किस तरह उन गरीबों के साथ मौजूदा कानून के अनुसार भी न्याय कर पाती हैं, इत्यादि बातें हम न समझें उनके लिए कुछ भी कर सकते हैं क्या और कैसे? आदिवासियों की भाषा न तो हाकिम समझते और न दूसरे ही लोग। बाहरी वकील, मुख्तार भी सिर्फ कामचलाऊ बातें ही जानते हैं। नतीजा यह होता है कि वे बेचारे बहुत बार नाहक लद जाते हैं। अंग्रेजी कानूनों की पेचीदगियाँ वे क्या जानने गए? यदि जानते तो बचाव का रास्ता भी निकालते। इधर तो उन्हें पता ही नहीं है उधर सख्त से सख्त सजाएँ उन पर लद जाती हैं। जेल में रहके उनसे बातें करने और उनके साथ बार-बार हिलने-मिलने पर पता चलता है कि वे किस बला में फँस गए हैं। अपने पक्ष का सबूत उनके पास मौजूद है सही। फिर भी ठीक समय पर या कायदे के मुताबिक वे हाकिम के सामने पेश न कर सके और लद गए! मगर वे इन कायदे-कानूनों को जानने क्या गए? उन्हें किसने ये बातें सिखाने की कोशिश कीं? कानून बनते हैं अंग्रेजी में और आदि जनता की तो बात ही नहीं, उनके जो खास सदस्य असेम्बली में चुने गए हैं उनमें शायद ही एकाध अंग्रेजी जानते हैं। बाकियों की तो हालत ज्यादातर 'लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर' जैसी ही है। थोड़ी-बहुत हिन्दी जानने से भी काम तो नहीं चलता।

    ऐसी दशा में आगे जो कुछ लिखा जाएगा वह सबों की जानकारी के ही लिए। किसी दल या पार्टी या सम्प्रदाय के खंडन-मंडन से हमारा मतलब नहीं है। हमें तो अपना काम करना है। यदि हम झारखंड की जनता की और खासकर वहाँ के किसानों की कुछ भी सच्ची सेवा करना चाहते हैं तो सबसे पहले उस क्षेत्र की, उस अन्‍धेरी गफा no man's land की झाँकी लगाना और परिस्थिति समझ लेना जरूरी है। नहीं तो भटक जाने की पूरी सम्भावना है। वैसी हालत में केवल दो-चार ऊपरी बातों से ही हम सन्तोष कर के तह में घुसने की कोशिश करी नहीं सकते हैं। कहा नहीं जा सकता कि हमें इसमें सफलता कहाँ तक मिलेगी।



सेण्ट्रल जेल, हजारीबाग   स्वामी सहजानन्द सरस्वती

नवम्बर दिवस, शुक्रवार 7.11.41

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

आदिवासियों में जेण्डर समानता का मिथ

आदिवासियों के बारे में यह मिथ प्रचलित है कि उनमें स्त्री-पुरूष का भेद नहीं होता। यह धारणा बुनियादी तौर पर गलत है। आदिवासियों के परंपरागत नियम-कानून के मुताबिक स्त्री का दर्जा पुरूष से नीचे है। वह पुरूष की मातहत है। जिन आदिवासी इलाकों में जमीन के सामूहिक स्वामित्व की जगह जमीन के व्यक्तिगत पट्टे दिए गए हैं वहां पर औरत पहले की तुलना में और भी कमजोर हुई है। औरत का परंपराओं पर न्यूनतम अधिकार रह गया है। आदिवासियों में आधुनिकता के प्रयोगों ने औरत को अधिकारहीन बनाया है। यदि कोई व्यक्ति बैंक से कर्ज लेना चाहे या रबड़ के उत्पादन के लिए कर्ज लेना चाहे तो कर्ज उसी व्यक्ति को मिलेगा जिसके पास जमीन का स्वामित्व होगा। उत्तर-पूर्व के अधिकांश राज्यों में राज्य की तरफ से जमीन का स्वामित्व पुरूष को मिला है। इसके कारण सब मामलों में मर्द ही निर्णय लेते हैं। आधुनिकीकरण,उग्रवाद,फिरौती वसूली के कारण आई आवारा पूंजी ने औरत को और भी अदिकारहीन बनाया है। यहां एक ही उदाहरण देना काफी होगा। नागा उग्रवाद के उभार के जमाने में ज्यादातर अनगामी नागा मर्द सशस्त्र संघर्ष के नाम पर भूमिगत हो गए थे ,ऐसे में उनके संसार का सारा दायित्व नागा औरतों ने संभाला। उन्होंने परिवार और समाज की सभी जिम्मेदारियों को पूरा किया। इस क्रम में बड़ी संख्या में औरतों ने शिक्षा भी अर्जित की। यहां तक कि नागा इलाकों में इन औरतों ने स्कूलों का भी निर्माण किया। इसके परिणामस्वरूप औरतों में पुरूषों की तुलना में ज्यादा शिक्षा का प्रसार हुआ। औरतें ज्यादा पढ़ी-लिखी हो गयीं और मर्द कम पढ़े-लिखे हो गए। लेकिन नागा परंपरागत कानून के अनुसार औरत को मर्द से कम पढ़ी-लिखी होना चाहिए। इस जाति की दो तिहाई औरतें स्नातक हैं। इनमें भी 75 प्रतिशत औरतें सरकारी नौकरी करके तनख्बाह उठाती हैं। इसक्रम में नागा परंपरा को सामाजिक सशक्तिकरण की प्रक्रिया ने पछाड़ दिया। इसका दुष्परिणाम यह निकला कि बड़ी संख्या में नागा औरतों की शादी ही नहीं हुई। क्योंकि नागा पुरूषों का मानना था कि पति-पत्नी के रिश्ते में पत्नी का कम पढ़ी-लिखी होना जरूरी है। फलतः अदिकांश शिक्षित नागा औरतों से नागा मर्दों ने शादी ही नहीं की। इसी तरह मेघालय में आरंभ के 10 साल तक विधानसभा में एक भी औरत सदस्य नहीं थी। जबकि मेघालय के तीनों मुख्य आदिवासी समूह मातृप्रधान हैं। इस समय वहां 60 सदस्यों की विधानसभा में 3 या 4 विधानसभा सदस्य औरत हैं। 1970 के दशक में एक राज्यसभा सदस्य थीं। नागालैण्ड में एक भी औरत न तो विधानसभा सदस्य है और न संसद में ही कोई औरत इसराज्य का प्रतिनिधित्व कर रही है। कुछ औरतें 2004 में चुनाव लड़ना चाहती थीं लेकिन परंपरागल आदिवासी कानून की दुहाई देकर उन्हें चुनाव लड़ने नहीं दिया गया।  नागा आदिवासियों के परंपरागत कानून के अनुसार राजनीतिक शक्ति सिर्फ पुरूष के ही पास होती है। औरतों को राजनीतिक शक्ति से परंपरागत कानून वंचित रखता है। स्थिति यहां तक खराब है आदिवासी विकास परिषद में भी कोई औरत सदस्य नहीं है। कुछ औरतों ने कारबी आदिवासी परिषद का चुनाव लड़ा था लेकिन वे हार गयीं। रोचक बात यह है चर्च के द्वारा संचालित शिक्षा संस्थान भी स्त्री की दोयम दर्जे की स्थिति को बदल नहीं पाए हैं। जबकि हिन्दुओं के शिक्षा संस्थानों का अभाव है। चर्च के प्रयास औरत को धर्म से आगे शिक्षा तक ले जाते हैं,जबकि हिन्दू धर्म उन्हें धर्म के दायरे से बांधे रखता है। जिन औरतों में शिक्षा पहुँची है उनमें अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता है। 

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

आदिवासियों में संसाधन के अभाव का मिथ

    समाजविज्ञानी गुलशन सचदेवा ने ‘डिमिस्टाफाइ नॉर्थ-ईस्ट’ (डायलॉग,जनवरी-मार्च 2006) लेख में विस्तार के साथ उत्तर-पूर्व के बारे में प्रचारित मिथों का तथ्यों के आधार पर खंडन किया है।  उत्तर-पूर्व के बारे में यह मिथ है कि यह समूचा इलाका आदिवासी इलाका है, सन् 2001 की जनगणना के आधार पर कह सकते हैं कि मात्र एक-चौथाई आबादी आदिवासी है। सिर्फ मिजोरम,मेघालय,नागालैण्ड और अरूणाचल प्रदेश में आदिवासी बहुसंख्यक हैं। इन राज्यों के भी शिक्षित युवाओं में आदिवासी संस्कृति कम और मॉडर्न मासकल्चर के दर्शन ज्यादा होते हैं। ये लोग कहीं से भी हाशिए के लोग प्रतीत नहीं होते। इन युवाओं की पश्चिमी वेशभूषा और पश्चिमी जीवनशैली इनकी विशेषता है।
    उत्तर-पूर्व के आदिवासियों की इस समूचे क्षेत्र में आबादी है एक-चौथाई और इनका इस क्षेत्र की दो-तिहाई जमीन पर कब्जा है। वे ही इसके मालिक- प्रबंधक हैं। आदिवासी इलाकों में रहने वाले गैर आदिवासी जमीन नहीं खरीद सकते। इससे आदिवासी और गैर आदिवासी के बीच में समानता के सिद्धांत के बारे में गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। यह एक तरह से भारत के संविधान में नागरिक को प्रदत्त मुक्त आवागमन-व्यापार-निवास-खरीद-फरोख्त आदि के संवैधानिक हक का खुला उल्लंघन है। यदि हम यह मान लें कि भारत सरकार इन इलाकों में बाहरी लोगों के प्रवेश को रोकना चाहती है तो यह ते भूमंडलीकरण के मुक्त व्यापार,आवागमन आदि का खुला उल्लंघन है। उत्तर-पूर्व की समस्या को हमारे नीति निर्धारकों ने सामान्य समस्या के रूप में न लेकर विशेष समस्या के रूप में लिया है। इस क्षेत्र के विकास को विशेष क्षेत्र के रूप में चिह्नित करके रखा है,आदिवासियों को सामान्य संरक्षण की बजाय विशेष संरक्षण दिया है,इससे खास किस्म का सामंती ढ़ांचा इन इलाकों में पैदा हुआ है। इससे इस क्षेत्र का विकास कम हुआ है,समस्याएं बढ़ी हैं।
   यह मिथ है कि उत्तर-पूर्व के लिए फंड का अभाव है। फंड के अभाव में विकास नहीं होरहा। इसके लिए सरकारी एजेन्सियों के रंग-बिरंगे आंकड़ों का इस्तेमाल किया जा रहा है। सच यह है कि उत्तर-पूर्व के राज्यों के लिए केन्द्र सरकार के द्वारा पर्याप्त मात्रा में धन मुहैय्या कराया जा रहा है। सन् 190-91 से 2002-03 के बीच में 1,08,504 करोड़ रूपये दिए गए। इसमें असम को 43,000 करोड़ रूपये केन्द्र ने दिए। अरूणाचल 9,900 करोड़ ,मणिपुर 11,500 करोड़ रूपये,मेघालय 9,000 करोड़ रूपये, त्रिपुरा को 14,000 करोड़ रूपये ,नागालैण्ड 12,000 करोड़ रूपये और मिजोरम को 9,000 करोड़ रूपये दिए गए। यह कुल भुगतान है जो केन्द्र ने किया है। इसमें से कुछ राशि ऐसी है जो केन्द्र को कर्ज  ब्याज और मूलधन के भुगतान के लिए वापस देनी पडी होगी।  यह राशि काटकर कुल मिलाकर उत्तर-पूर्व के राज्यों को 92,000 हजार करोड़ रूपये मिले हैं। अतः यह कहना कि उत्तर-पूर्व के विकास के लिए पैसा नहीं मिलता यह बात सही नहीं है। बल्कि ज्यादा पैसा मिल रहा है।
    शिक्षा के क्षेत्र में उच्च साक्षरता का मिथ प्रचारित किया जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि उत्तर-पूर्व के राज्यों में साक्षरता की दर ज्यादा है ,इस मिथ का खंडन करते हुए गुलशन सचदेवा ने लिखा है कि शिक्षा के क्षेत्र में इस क्षेत्र की  बढ़त के कुछ ऐतिहासिक-सामाजिक कारण हैं। इसके बावजूद शिक्षा के क्षेत्र में बढ़त के अतिरंजित होकर नहीं देखना चाहिए। उत्तर-पूर्व में कुछ क्षेत्र हैं जहां साक्षरता दर ज्यादा है। लेकिन समग्रता में उत्तर-पूर्व को देखें तो पाएंगे कि वहां साक्षरता दर 64.5 प्रतिशत है,जो औसत राष्ट्रीय साक्षरता दर से कम है। यहां तक कि पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल की साक्षरता दर (69.22 प्रतिशत) से भी कम है। कम साक्षरता दर अरूणाचल प्रदेश,असम,मेघालय में है।सन् 2001 की जनगणना के अनुसार उत्तर-पूर्व के 72 जिलों में से 35 जिलों की साक्षरता दर राष्ट्रीय साक्षरता दर से भी नीचे है। सन् 2001 की जनगणना के आंकडे बताते हैं कि अरूणाचल में 54.74 प्रतिशत,असम 64.28प्रतिशत, मणिपुर 68.87 प्रतिशत,मेघालय 63.31 प्रतिशत,मिजोरम 88.49 प्रतिशत,नागालैण्ड 67.11 प्रतिशत,सिक्किम 69.68 प्रतिशत,त्रिपुरा 73.66 प्रतिशत,उत्तर-पूर्व की साक्षरता दर 64.48 प्रतिशत और राष्ट्रीय साक्षरता दर 65.38 प्रतिशत आंकी गयी है।
उत्तर-पूर्व के बारे में यह मिथ है कि यह गरीब इलाका है। तथ्य इसकी पुष्टि नहीं करते। प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े बताते हैं कि सन् 1950-51 में इस क्षेत्र की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति आय से भी ज्यादा थी। सन् 1980-81 में प्रति व्यक्ति आय 789 रूपये थी जो 2000-01 में 3776 रूपये ( 1993-94 के मूल्य के आधार पर ) और सन् 2007-08 में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 7632 रूपये हो गयी है।  

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

आदिवासी जीवन में परिवर्तन का विरोध क्यों ?

    आदिवासियों के जब भी सवाल उठते हैं तो एक सवाल मन में आता है कि क्या आदिवासी अपरिवर्तनीय हैं ? क्या वे जैसे रहते आए हैं उन्हें वैसे ही रहने दिया जाए ? भारत में पूंजीवादी परिवर्तनों का आदिवासियों पर क्या असर हुआ है ?  भारत में 400 आदिवासी समुदाय रहते हैं। जिन्हें आधिकारिक तौर पर शिड्यूल ट्राइव के नाम से जानते हैं। विगत 200 सालों में इनमें बुनयादी परिवर्तन आए हैं। इन परिवर्तनों को हमें वैज्ञानिक तरीके से देखना चाहिए।
आदिवासियों में आए परिवर्तन दो तरह के हैं। पहली कोटि में वे परिवर्तन आते हैं जो स्वाभाविक हैं और स्वाभाविक सामाजिक प्रक्रिया के गर्भ से जन्म ले रहे हैं। दूसरी कोटि में ऐसे परिवर्तन आते हैं जो अस्वाभाविक हैं और उन पर थोपे गए हैं अथवा उन्हें अपनाने के लिए मजबूर किया गया है।
   आदिवासी परिवर्तनों को देखने के लिए मिथकीय पूर्वाग्रहों से बाहर आकर देखने की जरूरत है। आदिवासियों को समझने के लिए उन्हें मिथक बनाने से बचना चाहिए। यह मिथ है कि वे जैसे रहते आए हैं ,वे वैसे ही बने रहना चाहते हैं । दूसरा मिथ यह भी है कि आदिवासियों के जीवन में परिवर्तन सामाजिक -परिवेशगत अलगाव और बृहत्तर समाज के साथ एकीकरण से पैदा होता है।   
 आदिवासियों के बारे में जब भी बातें होती हैं या कोई आंदोलन आरंभ होता है तो एक ही बात कही जाती है कि आदिवासी इलाकों में विकास नहीं हुआ, विकास के अभाव में ही इन इलाकों में उग्रवाद पनप रहा है। आदिवासी इलाकों में विकासहीनता की बात में एकदम दम नहीं है। विकास का अभान जिस तरह बहाना बनाया जा रहा है उसे यदि गंभीरता से लेंगे तो  पंजाब में 1980 के दशक में पैदा हुए खालिस्तानी आंदोलन के लिए कोई तर्क हमारे पास नहीं होगा। पंजाब में हरित क्रांति के बाद उग्रवाद का पनपना इस बात का संकेत है कि उग्रवाद का विकासहीनता से कोई संबंध नहीं है। उग्रवाद एक राजनीतिक फिनोमिना है और यह उन ताकतों के लिए सहज रास्ता है जो मुख्यधारा की राजनीति में स्वाभाविक राजनीति के जरिए स्थान नहीं बना पाते। उग्रवाद के संदर्भ में विकासहीनता एक स्टीरियोटाइप है।  विकासहीनता की बात लालगढ़ (पश्चिम बंगाल) में भी गलत है। लालगढ़ की नौ हजार की आबादी में 10 माध्यमिक स्कूल,एक कॉलेज और अनेक निजी स्कूल हैं। लालगढ़ में विगत 25 सालों से वाममोर्चे का शासन नहीं था। इस इलाके की पंचायतों पर झारखण्डियों के एक दल का कब्जा रहा है। हाल ही में ममता बनर्जी ने जो रैली लालगढ़ में की है उसमें भाग लेने वाले सभी लोग अच्छे कपड़े पहनकर आए थे। सिर्फ पिछले चुनाव में वाममोर्चा जीता है।
    आदिवासियों के बारे में नस्ल और मुख्यधारा से अलगाव का मिथ अंग्रेजों ने बनाया था और उन्होंने ही इसे प्रसारित किया था। इसी तरह मैदानी और पर्वतीय का मिथ भी उनका ही बनाया हुआ है। कहा गया मैदानी लोगों से पर्वतीय लोग भिन्न होते हैं। स्थिति इतनी खराब हो गयी कि 1973 में इनर लाइन रेगूलेशन कानून लागू करना पड़ा। मैदानी इलाके के लोगों को पर्वतीय इलाकों में जाने के लिए अनुमति लेनी पड़ती है,खासकर नागा हिल (नागालैण्ड) मिजोरम की मिजो हिल और अरूणाचल प्रदेश के पर्वतीय इलाकों में जाने के लिए विशेष अनुमति लेनी होती है। भारत से कटे होने की अनुभूति ने उत्तर-पूर्व के राज्यों के निवासियों के मन में अलगाव की भावना को हवा दी। भारत के नामी मार्क्सवादी इतिहासकारों तपनराय चौधरी और इरफान हबीब ने विस्तार के साथ उत्तर-पूर्व के इतिहास का अध्ययन किया है। लेकिन ‘कैम्ब्रिज इकोनोमिक हिस्ट्री’ (भाग1) में इन इतिहासकारों ने असम के मध्यकालीन इतिहास को शामिल किया है। लेकिन यह काम एपेंडिक्स में ही हो पाया है। इतिहास में नागा,जमातिया,खासी,मिजो,मणिपुरी आदि जनजातियों के ब्रिटिश विरोधी संघर्षों को कोई स्थान नहीं मिला है। इसने भी उत्तर-पूर्व के आदिवासियों को राष्ट्रीय अलगाव की अनुभूति में ठेला है। मजेदार बात यह है कि इतिहास कांग्रेस के समय पढ़े जाने वाले पर्चों के जो दस्तावेजी वोल्यूम देखे हैं उनमें उत्तर-पूर्व के आदिवासियों के ब्रिटिश विरोधी संघर्षों के पर्चों को ‘गैर-भारतीय’ की केटेगरी में शामिल किया गया है। ( विस्तार से जानकारी के लिए देखें- Proceedings of North-East India History Association (NEIHA), Session XVII)  
   इतिहासकारों में एक बड़ा तबका रहा है जो उत्तर-पूर्व के आदिवासियों के बारे में सुनियोजित ढ़ंग से साम्राज्यवादी मिथों का प्रचार करता रहा है। इनमें पहला मिथ है नस्ल का। इसके तहत आर्य-मंगोल विभाजन बनाकर इतिहास लिखा गया है। एडवर्ड गेट ने इसकेआदार पर सुर-असुर का विभाजन किया है। उन्होंने सुर-असुर के आधार पर उत्तर-पूर्व के इतिहास को व्याख्यायित करने की कोशिश की है। इसके अलावा इन लोगों ने आदिवासी जातियों के माइग्रेसन को भी अतिरंजित बनाया है। सुर-असुर के नाम पर आदिवासियों को देखने का नस्ली नजरिया है। साम्राज्यवादी विचारकों ने इसी तरह कोर-फ्रिंज के अन्तर्विरोध की बात को भी बेवजह हवा दी है। हिन्दी में इसे केन्द्र-हाशिए के अन्तर्विरोध के नाम से जाना जाता है। इसे हम आदिवासियों के संदर्भ में मुख्यधारा और हाशिए पर पड़े आदिवासियों के अन्तर्विरोध के रूप में देख सकते हैं। इस पदबंध का उदार बुद्धिजीवी भी खुलकर प्रयोग करते हैं।
  आदिवासी अलग-थलग तब ही लगेंगे जब उनको हम भारत का समग्र इमेज के बाहर देखेंगे। वामदलों ने आदिवासियों को भारत की समग्र छबि के अंग के रूप में उन्हें देखा है। आदिवासी पूरे देश से कभी भी अलग नहीं थे,वे हमेशा जुड़े रहे हैं। इनका देश से संबंध था साथ ही पास के राज्यों से भी संबंध-संपर्क था। आदिवासियों का समूचे देश और पड़ोसी राज्यों से जमीनी मार्ग के जरिए गहरा संबंध रहा है। मध्यकाल से लेकर आधुनिककाल तक इस संपर्क-संबंध के प्रमाण उपलब्ध हैं। प्राचीनकाल से उत्तर-पूर्व के राज्य भारत का हिस्सा रहे हैं, इसका विस्तार के साथ इतिहास की किताबों में जिक्र मिलता है। आजादी के बाद पैदा हुए नागा आंदोलन का एकमात्र बड़ा योगदान था उत्तर-पूर्व केराज्यों में बंदूक की संस्कृति की स्थापना। नागा आंदोलन नागालैण्ड की स्थापना के साथ शांत नहीं हुआ। आम आदिवासी में इस आंदोलन से यह संदेश गया कि नागालैण्ड का गठन बंदूक की नोंक पर हुआ है,आदिवासियों को अगर कोई चीज हासिल करनी है तो वे बंदूक की राजनीति करें। नागालैण्ड की मांग को मानने के साथ समूचे उत्तर-पूर्व में समस्याओं का पिटारा खुल गया और इस समूचे क्षेत्र में विभिन्न किस्म के उग्रवादी गुटों की हमलावर कार्रवाईयां बढ़ी हैं। नागा गुटों का यह प्रचार रहा है कि उन्हें जो राज् मिला है वह सशस्त्र संघर्ष की देन है। यही सशस्त्र संघर्ष का छद्म प्रचार ही है जो उत्तर-पूर्व के आदिवासियों में पृथकतावादी-उग्रवादी संगठनों को पैदा करता रहा है। इन दिनों स्थिति य़ह है कि उत्तर-पूर्व में आदिवासियों के हितों की रक्षा के नाम पर बने तमाम उग्रवादी संगठन हफ्ता वसूली, जबरिया कर वसूली,विकास योजनाओं में हफ्ता वसूली,अपहरण,कारचोरी,हत्या आदि के जरिए धन वसूली का व्यापक उद्योग बन चुका है। हाल ही में मीडिया में इसके चौंकाने वाले समाचार आए हैं। जिनमें एक ही चीज साफतौर पर उभर कर आ रही है कि आदिवासी विकास के नाम पर लालगढ़ से लेकर नागालैण्ड तक जितने भी आंदोलन उभरकर सामने आए हैं उनमें कई चीजें साझा हैं। जैसे- इन आंदोलनों का आदिवासियों के हितों के संरक्षण और विस्तार के साथ कोई संबंध नहीं है। उदाहरण के लिए लालगढ़ में चल रहे माओवादी संघर्ष में यह तथ्य सामने आ चुका है कि इस आंदोलन में नेतृत्व करने वाले आदिवासी नहीं हैं। आदिवासी पेड़ नहीं काटते। वे पेड़ की पूजा करते हैं। लेकिन इस इलाके में सक्रिय और माओवादी आंदोलन से जुड़े ‘पुलिस संत्रास विरोघी कमेटी’ के लोगों ने सुरक्षाबलों को लालगढ़ में प्रवेश न करने देने के नाम पर सैंकड़ो पेड़ काट डाले और उन्हें सड़कों पर अवरोध के रूप में पहले इस्तेमाल किया,बाद में सैंकड़ों पेड़ों को अवैध ढ़ंग से बाजार में बेच दिया।  उल्लेखनीय है आदिवासी पेड़ लगाते हैं,उसकी पूजा करते हैं, उसे काटते और बेचते नहीं हैं। ठीक यही फिनोमिना उत्तर-पूर्व के राज्यों में चल रहे आंदोलनों को दौरान भी देखा गया,इसने इस क्षेत्र में टिम्बर माफिया की शक्ल लेली है। टिम्बर माफिया, अवैध हथियारों की स्मगलिंग,फिरौती वसूली, स्थानीय दादा कर आदि इसके चर्चित रूप हैं। माओवादी नेता किसनजी के लैपटॉप और अन्य गिरफ्तार माओवादियों के पास से जो दस्तावेज मिले हैं,झारखण्ड के नेता मधु कोडा के पास से सीबीआई ने छापे के दौरान जो दस्तावेज पकड़े हैं वे इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि माओवाद प्रभावित इलाकों में पंचायतों से लेकर खानों तक माओवादियों का हफ्ता बंधा है और सालाना दो हजार करोड़ रूपये की वे वसूली कर रहे हैं। इन रूपयों से हथियार खरीदने से लेकर कैडरों के पालन-पोषण और बुद्धिजीवियों के खर्चे के लिए धन भी मुहैय्य़ा कराया जाता है। माओवादियों के पास बेनामी धन कैसे पहुँच रहा है और वे उसे कैसे जमा करते हैं। इसका एक ही उदाहरण काफी है। सन् 2009 में पश्चिम बंगाल की पुलिस ने एक युवा माओवादी को गिरफ्तार किया था, इसके बैंक खाते में एक साल में 36 करोड़ रूपये जमा हुए हैं। असम में एक कांग्रेस नेता के माध्यम से 11 सौ करोड़ रूपये उग्रवादी संगठनों के पास विकास खातों में घपला करके पहुँचाया गया। यह तथ्यहाल ही में मीडिया में सुर्खियों में आया है,जिसे सबसे पहले सीएनएन-आईबीएन ने उजागर किया। उत्तर-पूर्व में काम कर रही तमाम सरकारी कंपनियां,तेल कंपनियां और निजी कारपोरेट कंपनियां उग्रवादियों को नियमित हफ्ता देती हैं। इनमें टाटा टी कंपनी द्रवारा उल्फा को सालाना एक करोड़ रूपये सुरक्षा के नाम पर देने का मामला कंपनी के आधिकारिक दस्तावेजों में पाया गया है। इस तथ्य क् प्रकाश में आने के बावजूद इस कंपनी के खिलाफ पुलिस में एफआईआर तक दर्ज नहीं करायी गयी। इसी तरह बोडोलैण्ड आंदोलन के संचालक ‘नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैण्ड ’ को 1994-95 और 1995-96 में विलियमसन मगर नामक कंपनी ने एक करोड़ चंदा दिया था,यह तथ्य कंपनी के आधिकारिक ऑडिट खाते में पाए गए हैं। इसी तरह एक छोटी कंपनी भेरगांव टी स्टेट ने पच्चीस लाख रूपये दिए। इस कंपनी के एक ही साल में दो अपहरण का घटनाएं झेलनी पड़ीं। उल्लेखनीय है कि 1990 में असम के राज्यपाल देवीदास ठाकुर ने राष्ट्रपति को  भेजी रिपोर्ट में लिखा कि अकेले उल्फा ने फिरौती,हफ्ता वसूली,सुरक्षा-कर आदि के नाम पर तकरीबन 400 करोड़ रूपये वसूले हैं। किसी भी सशस्त्र उग्रवादी संगठन को चलाने के लिए बड़े पैमाने पर धन की आवश्यकता होती है। उग्रवादी संगठन शुद्ध विचारधारा के आधार पर नहीं चलते। मसलन् उल्फा जैसे उग्रवादी संगठन को सिर्फ अपने मुख्यालय के लिए के लिए सालाना 30 करोड़ रूपये की जरूरत होती थी। यह जानकारी सुरक्षाबलों को छापे में मिले उल्फा के दस्तावेजों से मिली है। इसके अलावा बटालियन के लिए रसद,गोला-बारूद,हथियार,भोजन,कपड़े आदि के कितने धन की आवश्यकता होती होगी इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। उल्फा के भूटान स्थित मुख्यालय ने अपनी गतिविधियों का पूरा ब्यौरा छापा है। यह एक खुला सच है कि उत्तर-पूर्व उग्रवादियों के फंड सबसे बड़ा स्रोत सरकारी प्रकल्प हैं। सरकारी स्रोतों से धन जुटाना और उससे संगठन चलाना बेहतर धंधा साबित हुआ है। सरकारी सार्वजनिक कंपनियों और बैंक के अधिकारियों से बड़ी रकम ऐंठने में उग्रवादी सफल रहे हैं। उत्तर-पू्र्व के राज्यों के लिए विकास प्रकल्पों के लिए आवंटित धन का अधिकांश हिस्सा उग्रवादी संगठनों के पास जा रहा है। यह बात सरकार जानती है लेकिन इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठा पायी है। उल्फा से जुड़े ठेकेदारों को विकास के बड़े ठेके दिए जाते रहे हैं और उन प्रकल्पों का कहीं पर भी अता-पता नहीं है। इस धंधे में नौकरशाह और राजनेता भी धन खा रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार ग्रामीण विकास के 1992-93 से फरवरी 1998 तक की अवधि में 11.65 बिलियन रूपये आवंटित किए गए। इसमें से मुश्किल से चार बिलियन रूपये ग्रामीण विकास पर वैध योजनाओं पर खर्च हुए हैं,बाकी पैसा उग्रवादी संगठनों और स्थानीय नेताओं ने मिलकर खाया है। विकास फंड का असामाजिक कार्यों के लिए स्थानान्तरण स्वयं में केन्द्र और राज्य सरकार की असफलता को बयान करता है। मीडिया की रिपोर्ट बताती हैं कि उत्तर-पूर्व में सुरक्षा संबंधी खर्चा बढ़ता जा रहा है। सन् 2001 से सालाना 100 करोड़ रूपये सुरक्षा के नाम पर उग्रवादियों की जेब में जा रहे हैं। इसके अलावा विकास फंड से न्यूनतम 10 प्रतिशत धन उग्रवादियों के पास जा रहा है। नागालैण्ड और मिजोरम के उग्रवादी प्रत्येक व्यक्ति से सुरक्षा हफ्ता वसूलते हैं। प्रत्येक सरकारी कर्मचारी को हफ्ता देना होता है।  प्रति तेल टैंकर 3000 हजार प्रतिबार, खाने के गैस सिलेण्डर ले जाने वाले ट्रक से प्रति चक्कर 2000 रूपये,सीमेंट ट्रक से 1000 हजार वसूले जाते हैं। इसके अलावा इस क्षेत्र के उग्रवादी प्रति ट्रक 7000 हजार,टूरिस्ट बस से 12000 हजार रूपये सालाना परमिट शुल्क वसूल करते हैं। मार्च 2008 में सम्पन्न हुए आम चुनाव में नागालैण्ड में 58 उम्मीदवार करोड़पति थे। ये आंकड़े नागालैण्ड इनेक्शन वॉच नामक संगठन ने जारी किए हैं। मेघालय में 27 करोड़पति उम्मीदवार खड़े हुए थे। यह तो छोटे से राज्य का हाल है।  इन सभी उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि थी। इसी तरह मणिपुर में तो उग्रवादियों ने सभी आर्थिक गतिविधियां ठप्प ही कर दी हैं। मणिपुर के मध्यवर्ग के ज्यादातर युवा राज्य के बाहर चले जाते हैं। बाहर ही पढ़ते हैं। उल्लेखनीय है कि उत्तर-पूर्व के राज्यों में एकमात्र त्रिपुरा ऐसा राज्य है जहां पर विकास फंड किसी भी तरह उग्रवादियों के हाथ नहीं लगा है और विकास कार्यों पर सीधे धन खर्च किया जा रहा है। इसके परिणाम भी सामने आने लगे हैं। त्रिपुरा की विकास दर सालाना 9 प्रतिशत दर्ज की गयी है। सरकार फंड का उग्रवादियों को मिलना एकदम बंद है। कभी-कभार उग्रवादी संगठन हिंसा की वारदात करने में सफल हो जाते हैं। कुछ इलाकों में नियमित रूप से उग्रवादी अभी भी हफ्ता वसूल रहे हैं। लेकिन सरकारी फंड का स्रोत बंद है। इससे राज्य की आर्थिक दशा में तेजी से परिवर्तन आया है। 
 





मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

त्रिपुरा की सबसे बड़ी कमजोरी है अति दरिद्रता

     त्रिपुरा को समग्रता में देखें तो सभी समुदायों के लोगों के जमीन के स्वामित्व में गिरावट आयी है। इसी तरह आदिवासियों में शिक्षा की दर भी बेहतर नहीं है। इस मामले में वाममोर्चा शासित राज्यों में भी स्थिति काफी असंतोषजनक है। खासतौर पर त्रिपुरा के संदर्भ में आदिवासियों की स्थिति पर गौर करें तो कई नए तथ्य सामने आते हैं। सन् 2001 की जनगणना के अनुसार त्रिपुरा की कुल जनसंख्या 3,199,203 है। इसमें 993,426 लोग जनजाति के हैं। यानी कुल आबादी का 31.1 प्रतिशत लोग जनजाति से आते हैं ।
     त्रिपुरा का नाम ही आदिवासी जाति पर है। इस जनजाति के आदिवासी जनसंख्या में 54.7 प्रतिशत लोग रहते हैं। रियांग 16.6 प्रतिशत,जमातिया 7.5 प्रतिशत,चकमा 6.5 प्रतिशत,हलम 4.8,माग 3.1,मुंडा 1.2, कुकी 1.2,गारो 1.1 प्रतिशत आदिवासी रहते हैं।
     त्रिपुरा में आदिवासी लिंग अनुपात 970 है। जो राष्ट्रीय अनुपात (978) से कम है।जमातिया में सबसे ज्यादा लिंग अनुपात 996 दर्ज किया गया। जबकि मुंडा (950),चकमा (951) और रियांग (962) में सबसे कम लिंग अनुपात दर्ज किया गया। त्रिपुरा में आदिवासी आबादी में शिक्षा का प्रतिशत अच्छा है। सकल आदिवासी आबादी में साक्षरों की संख्या 56.5 प्रतिशत है। जबकि राष्ट्रीय  स्तर पर आदिवासी साक्षरता दर 47.1 प्रतिशत है।  इसमें पुरूषों की साक्षरता दर 68 प्रतिशत और औरतों में साक्षरता दर 44.6 प्रतिशत है। इससे यह भी पता चलता है कि औरतों में मर्दों की तुलना में साक्षरता का प्रसार कम हुआ है। त्रिपुरा के आदिवासियों में कुकी जनजाति के लोगों में साक्षरता दर सबसे ज्यादा है ,आंकड़े बताते हैं कि उनमें 73.1 प्रतिशत साक्षरता है। जबकि त्रिपुरा जनजाति में 62.1 प्रतिशत साक्षरता है। मर्दों और औरतों में क्रमशः81.9प्रतिशत और 44.6 प्रतिशत साक्षरता दर्ज की गयी है। दूसरी ओर चकमा,मुंडा और रियांग जनजाति में आधी से ज्यादा आबादी अभी भी निरक्षर बनी हुई है।
   त्रिपुरा में 5-14 साल की उम्र के 62.7 प्रतिशत आदिवासी बच्चे स्कूल जाते हैं। इनमें कुकी जनजाति के सबसे ज्यादा 77.6 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाते हैं। मुंडा जाति (36.7) के सबसे कम बच्चे स्कूल जाते हैं। आदिवासियों में शिक्षितों में 9.5 प्रतिशत के पास मैट्रिक या सैकेण्डरी स्तर की शिक्षा है।इसमें त्रिपुरा में 10.5 प्रतिशत मैट्रिक या सैकेण्डरी पास हैं। मुंडा में 4 प्रतिशत,माग में 6.5 प्रतिशत मैट्रिक हैं।
   सन् 2001 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि त्रिपुरा की सकल आदिवासी आबादी का मात्र 42.7 प्रतिशत कोई न कोई काम करता है। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासियों की काम करने वाली आबादी 49.1 प्रतिशत है। यानी राष्ट्रीय औसत से भी नीचे है का करने वाले आदिवासियों की संख्या। त्रिपुरा की कुल कामकाजी आदिवासी आबादी में 69.6 नियमित मजदूरी करने वाले लोग  हैं। 30.4 प्रतिशत हाशिए के मजदूर हैं। इनमें कामकाजी औरतों का 37.5 प्रतिशत और पुरूषों का 47.6 प्रतिशत है। यहां पर लिंगभेद साफ देखा जा सकता है। यह लिंगभेद नियमित कामकाजी मजदूरों में बहुत ज्यादा है। नियमित मजदूरों में 86.5 प्रतिशत पुरूष हैं जबकि 47.5 प्रतिशत औरतें नियमित मजदूर के रूप में दर्ज की गयी हैं। जमातिया जनजाति में सबसे ज्यादा कामकाजी लोग 48.7 प्रतिशत दर्ज किए गए हैं जबकि सबसे कम रियांग जनजाति में 39.2 प्रतिशत दर्ज किए गए हैं। कामकाजी मजदूरों में बड़ी संख्या खेत मजदूरों की है। इनमें मुख्य कामकाजी लोगों में 45.9 प्रतिशत कृषक हैं और 29.7 प्रतिशत खेत मजदूर हैं। रियांग मुख्यतः खेती करते हैं, इनमें 64.9 प्रतिशत कामकाजी लोग खेती करते हैं। जबकि मुण्डा जनजाति में सबसे कम 2 प्रतिशत खेती  करते हैं।
    वैवाहिक जीवन के आंकड़े बताते हैं कि त्रिपुरा के आदिवासियों में 54.3 प्रतिशत लोग अविवाहित रहते हैं। 41.9 प्रतिशत की शादी हुई है। 3.3 प्रतिशत विधवाएं हैं। 0.6 प्रतिशत तलाकशुदा या अपने पति से अलग रहने वाली औरतें हैं। गारो (4.4 प्रतिशत) और मुंड़ा (4.1 प्रतिशत) जनजाति में विधवा औरतों की संख्या सबसे ज्यादा है।जबकि तलाकशुदा औरतों की संख्या माग जनजाति में  1.1 प्रतिशत सबसे ज्यादा है , और चकमा में सबसे कम 0.3 प्रतिशत है। त्रिपुरा के आदिवासियों में अभी भी एक हिस्सा ऐसा है जिसमें बाल विवाह की प्रथा बरकरार है। त्रिपुरा के आदिवासियों में 80.1 प्रतिशत हिन्दू, 10 प्रतिशत ईसाई, 9.8 प्रतिशत बौद्ध और मात्र 0.2 प्रतिशत मुसलमान हैं।
    त्रिपुरा की सबसे बड़ी कमजोरी है अति दरिद्रता। नेशनल सेंपिल सर्वे के 2001-02 के आंकड़े बताते हैं कि त्रिपुरा में 55 प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा के नीचे निवास करती है। इन आंकड़ों को योजना आयोग के नवीनतम सुझावों के आधार पर सही पाया गया है।


त्रिपुरा में जनजातियों की अवस्था

    जनजातियों के प्रति वाम की प्रयोगस्थली त्रिपुरा है। सारे देश में आदिवासियों के बारे में वामपंथी दलों ,खासकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया (मार्क्सवादी) का जो नजरिया है, उसका व्यवहार में शानदार प्रयोग यहां मिलता है। वामपंथी दलों के शासन में आने के बाद से त्रिपुरा के आदिवासी इलाकों में ,कुछ समय को छोड़कर, आमतौर पर शांति है और जनजातियों के लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका अदा कर रहे हैं।
    उत्तर-पूर्व के राज्यों त्रिपुरा अकेला राज्य है जहां वामपंथी दलों के नेतृत्व में 1977 से निरंतर लोकतांत्रिक शासन चल रहा है। यह अकेला राज्य है जहां सेना या अर्द्ध-सैन्यबलों ने बिना शासन चल रहा है। जबकि इस क्षेत्र के अन्य राज्यों में निरंतर अशांति बनी हुई है। त्रिपुरा में जनजातियों की आबादी 19 पर्वतीय इलाकों में बसी हुई है। मोटेतौर समूचे राज्य की आबादी का 31 प्रतिशत हिस्सा जनजातियों का है। इस राज्य के ज्यादातर जनजातियां तिब्बती-बर्मी मूल की हैं।
    त्रिपुरा की प्रमुख जनजातियां हैं चाइमल,हलाम,जमातिया,तिप्पेरा,त्रिपुरी ,मोग, रियांग,लेप्चा, आदि। इनमें त्रिपुरी और रियांग जनजाति का अधिकांश जनजाति इलाके में वर्चस्व है। कोकबोराक इनकी आमचीत की भाषा है। त्रिपुरा की जनजातियों पर बौद्ध ,ईसाई, और त्रिपुरसुंदरी सम्प्रदाय का गहरा प्रभाव है।
    हाल ही में 3 मई 2010 को त्रिपुरा आदिवासी स्वायत्त जिला परिषद के चुनाव हुए हैं जिसमें 27 के परिणाम आए हैं और सभी सीटों पर वामपंथी उम्मीदवार जाते हैं। इसमें 25 पर माकपा, 1-1 सीट भाकपा और फार्बर्ड ब्लॉग को सफलता मिली है।
   उल्लेखनीय है कि त्रिपुरा को एक नबम्वर 1957 को केन्द्रशासित क्षेत्र बनाया गया और 21 जनवरी 1972 को राज्य का दर्जा दिया गया। आरंभ में त्रिपुरा में पंचायतों का गठन यनाइटंड प्रोविंस पंचायत राज एक्ट 1947 के आधार पर होता था,उसके तहत ग्रामसभा का गठन किया जाता था। बाद में वाममोर्चा सरकार ने त्रिपुरा पंचायत एक्ट 1983 बनाया और 1984 से इसे लागू किया। इसने 1947 के कानून की जगह ली। सन् 1993 में त्रि-स्तरीय पंचायत की व्यवस्था की गयी। सबसे निचले स्तर पर ग्राम पंचायत,ब्लॉक स्तर पर पंचायतसमिति और जिला स्तर पर जिला परिषद का गठन किया गया। इसके अलावा आदिवासियों के लिए आदिवासी स्वायत्त जिला परिषद का संविधान की छठी अनुसूची के तहत 1985 में गठन किया गया। यह मूलतः आदिवासियों की चुनी हुऊ संस्था है और इसमें कुल 28 जनता के द्वारा चुने सदस्य हैं और दो सदस्य राज्यपाल के द्वारा नामांकित किए जाते हैं,ये भी जनजाति के ही होते हैं। यह परिषद राज्य के दो-तिहाई भौगोलिक क्षेत्र को समेटे हुए है। जबकि इसके दायरे में आने वाली आबादी में दो-तिहाई गैर जनजाति के लोग बसते हैं और एक-तिहाई जनजाति के लोग रहते हैं। इस जाति संरचना में आए असंतुलन को आधार बनाकर विभाजनकारी ताकतें जनजाति और गैर-जनजाति समूहों के बीच में टकराव पैदा करने की कोशिश करते रहते हैं। इन तनाव को बार-बार वाममोर्चे ने सफलता के साथ हल किया है। अनेक बार इस तनाव के कारण दंगे भी हुए हैं।अनेकउग्रवादी गुट जनजातियों के असंतोष को भड़काकर दंगों को हवा देते रहे हैं। इस प्रसंग में उनका एक ही प्रचार है कि वाम के शासन में जनजातियों की उपेक्षा हुई है,आदिवासियों के लिए बनी स्वायत्त परिषद के कानूनों को बड़ी ही धीमी गति से लागू किया जा रहा है। वाममोर्चे ने अपने तरीके से बंगाली बनाम जनजाति के बीच में पैदा किए गए विवादों को बड़े ही कौशल के साथ हल किया है और इसमें उसने आदिवसियों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। उत्तर-पूर्व के राज्यों और खासकर त्रिपुरा के संदर्भ में जनजातियों के मूल्यांकन के संदर्भ में कई मिथ फैले हुए हैं। इन मिथों का समूची जनजातु आबादी में अलगाव पैदा करने ,राष्ट्रीय एकता भंग करने, सामाजिक टकराव पैदा करने के लिए समय-समय पर इस्तेमाल किया जाता है।
    आमतौर यह कहा जाता है कि जनजातियों में देश के बाकी हिस्सों और अन्य समुदायों के साथ अलगाव और सामाजिक-आर्थिक विकास के अभाव के कारण अलगाववादी स्वर सुनाई देते हैं। इसी आधार पर आदिवासियों में पैदा हुए पृथकतावादी-उग्रवादी गुटों की गतिविधियों की व्याख्या भी की जाती है।
   सन् 2001 की जनगणना के अनुसार देश में  आदिवासियों की संख्या 8.1प्रतिशत है। यानी कुल 83.6 मिलियन आदिवासी रहते हैं। यो लोग देश के विभिन्न इलाकों में 461 समुदायों में रहते हैं। इनकी आधिकांश आबादी मध्यभारत,पूर्व,उत्तर-पूर्व भारत में निवास करती है। ये लोग समाज के सबसे शोषित समुदाय में आते हैं। इनमें से ज्यादातर खानों में काम करते हैं,बागानों में काम करते हैं या फिर ठेका मजदूर के रूप में काम करते हैं। इनमें से अधिकांश की सामाजिक-आर्थिक दशा बडी खराब है। इनकी बुनियादी समस्याएं हैं इनका जमीन से अलगाव,जंगलात और उसके इस्तेमाल से इनका वंचित रहना, विकास प्रकल्पों के कारण बड़े पैमाने पर विस्थापन,आदिवासी औरतों की दुर्दशापूर्ण अवस्था,सामाजिक उत्पीड़न और शोषण,शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, आदिवासी भाषा और संस्कृति का अवरूद्ध विकास, आदिवासी इलाकों में स्वायत्त प्रशासनिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था का अभाव। ब्रिटिश शासकों से लेकर आधुनिक भारत के स्वतंत्र शासकों तक जितने भी शासन आए हैं वे आदिवासियों के उनकी जमीन और जंगल पर स्नामित्व के अधिकार को अस्वीकार करते हैं। अंधाधुंध पूंजीवादी विकास नेआदिवासियों को उनकी जमीन,वातावरण और संस्कृति से विस्थापित किया है। आदिवासियों की जमीनों पर विकास और अन्य बहानों से बसाया गया है। इसके लिए बड़े पैमाने पर कानूनी मेनीपुलेशन का सहारा लिया गया। यह फिनोमिना उत्र-पूर्व के कुछ राज्यों को छोड़कर सारे देश में आदिवासी इलाकों में देखा गया है। गैर आदिवासियों द्वारा आदिवासियों की जमीन हथियाने के लिए कई हथकंड़े अपनाए जाते रहे हैं, इनमें प्रमुख हैं-जमीन को गिरवी रखकर कर्ज देना,लीज पर लेना,बेनामी हस्तांतरण,झूठे नामों से जमीन का स्वामित्व हथियाना,आदिवासी औरतों से शादी करके जमीन हथियाना, आदिवासियों को मजदूरी के नाम पर बंधुआ बनाना और बाद में उनकी जमीन हड़पना आदि कुछ रास्ते हैं जिनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता रहा है।
आदिवासियों की अस्मिता को बचाने का सबसे सटीक रास्ता है उन्हें उनकी जमीन से जोड़े रखना। आदिवासियों में भूमिसुधार कार्यक्रमों को सख्ती से लागू करना। आदिवासियों की पहचान उनके जमीन के स्वामित्व से जुड़ी है। इस काम को वाममोर्चा सरकारों ने बड़ी गंभीरता के साथ किया है। जो लोग इन दिनों आदिवासियों के सवाल पर वामपंथी दलों खासकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया (मार्क्सवादी) पर लालगढ़ के तथाकथित माओवादी हिंसाचार के बहाने हमले कर रहे हैं और मीडिया और बुद्धिजीवियों में मिथ्या प्रचार कर रहे हैं वे जानते हुए भी सत्य को छिपा रहे हैं कि आदिवासियों में भूमिसुधार लागू करने का वाममोर्चे का शानदार रिकॉर्ड रहा है। मसलन पश्चिम बंगाल में भूमिसुधार के तहत ग्यारह लाख एकड़ जमीन पच्चीस लाख परिवारों में वितरित की गई है। इसमें से पांच लाख परिवार आदिवासी हैं।  इसी तरह त्रिपुरा में भी आदिवासियों को भूमिसुधारों का व्यापक लाभ मिला है। आदिवासियों का अपनी जमीन से अलगाव कम हुआ है।
   आर्थिक उदारीकरण लागू किए जाने के कारण सबसे ज्यादा आदिवासियों पर बुरा असर पड़ा है। आदिवासी इलाकों में भुखमरी बढ़ी है। राशन व्यवस्था पूरी तरह बैठ गयी है। खानों के अधाधुंध उत्खनन ने आदिवासियों की बेदखली बढ़ा दी है। इसके विपरीत आदिवासी इलाकों में विकास कार्य एकदम बंद पड़े हैं। शिक्षा,स्वास्थ्य और आजीविका के अभाव और सूदखोरों के शोषण ने आदिवासियों को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है।



शनिवार, 4 दिसंबर 2010

'आदिवासी' अवधारणा की तलाश में- 2-समापन किश्त

       भारत में जनजातियों की दुनिया वैविध्यपूर्ण है। उसके बारे में इकसारभाव से सोचने से सही नीति नहीं बायी जा सकती है। विभिन्न इलाकों में जनजातियों की समस्या,मूल बाशिंदों की अवस्था, स्थानान्तरित जनजातियों की स्थिति ,संस्कार,धर्म आदि में अंतर है। भारत में जो लोग ‘इनडिजिनस पीपुल’ पदबंध के इस्तेमाल जनजातियों के संदर्भ में करते हैं। उनमें ज्यादातर स्वयंसेवी संगठनों के लोग हैं। यह पदबंध संयुक्त राष्ट्र संघ के इण्डिजिनस पीपुल के अध्ययन के लिए बनाए वर्किंग ग्रुप की धारणा का अंधानुकरण है। इसमें यूरोपीय पूर्वाग्रह हैं।  ‘इण्डिजिनस पीपुल’ और ‘राष्ट्र’ वे हैं जिनमें हमलों के पहले या ब्रिटिश औपनिवेशिक समाज के आने के पूर्व ऐतिहासिक निरंतरता हो। उन्होंने अपना क्षेत्र विकसित कर लिया हो। वे अपने को समाज के अन्य समुदायों से भिन्न मानते हों। साथ ही वे जिस क्षेत्र में रहते हों वह उनके क्षेत्र के दायरे में आता हो। ये लोग अपने को मौजूदा समय में गैर वर्चस्वशाली समूह के रूप में अपनी पहचान,संस्कृति,क्षेत्र,आदतें,सामाजिक संस्थान, कानून और एथनिक पहचान को बनाए रखना चाहते हैं। आदिवासी इलाकों में रहने वाली सभी जनजातियां मूल जनजतियां नहीं हैं। इसी तरह सभी जनजातियों को आदिवासी के एक ही धागे में बांधना भी सही नहीं होग। सभी जनजातियों को आदिवासी के एक ही धागे में बांधने का काम यूरेपीय देशों के फंड़ से चलने वाले स्वयंसेवी संगठन कर रहे हैं। उनके इस काम से जनजातियों में टकराव बढ़ा है। स्वयंसेवी संगठन भारत सरकार पर दबाब डालते रहे हैं कि सभी जनजातियों को आदिवासी के रीप में देखा जाए। इस तरह के संगठव छत्तीसगढ़,झारखंड और दिल्ली में बड़ी संख्या में सक्रिय हैं इनके सिरमौर हैं मेधा पाटकर-अरूंधती राय-महाश्वेता देवी आदि। इन संगठनों के आदिवासी संघर्षो ने विभिन्न इलाकों में जनजातियों में टकराव की स्थिति पैदा की है। ज्यातर आदिवासी संगठनों की मांग है शिड्यूल ट्राइव या जनजाति सूची में आदिवासियों के नाम शामिल न किए जाएं। खासकर असम में यह चीज दर्ज की गयी है। ( विस्तार से अध्ययन के लिए देखें- Kar, R.K. and Sharma, K.L., 1990, “Ethnic Identity of Tea Labour: A Case Study in Assam” in D. Pakem (ed.) Nationality, Ethnicity and Cultural Identity in North-East India; New Delhi)
असम में ऐसी आबादी कुल आबादी का 20 प्रतिशत है। यानी 40 लाख से ज्यादा लोग है जो आदिवासी हैं। जबकि बोडो 27 लाख हैं। समूचे उत्तर-पूर्व में जनजातियों की आबादी 80 लाख है। यदि आदिवासियों को जनजाति में शामिल कर लिया जाएगा तो उत्तर-पूर्व में जनजातियों की संख्या में 50 फीसदी की वृद्धि हो जाएगी। वे कुल संख्या का तीसरा हिस्सा हो जाएंगे। अनेक जनजातियां इससे घबडायी हुई हैं। अनेक जनजातियों नौकरियों में आरक्षण की सुविधा और संसाधनों से वंचित हो जाने से डरी हुई हैं। जनजाति के लोग नहीं चाहते कि आदिवासियों को जनजाति सूची में शामिल किया जाए। वे मानते हैं कि आदिवासी बाहरी लोग हैं और उन्हें झारखंड बगैरह से लाकर खेती आदि कराने के लिए ब्रिटिश शासकों ने बसाया था ,उन्हें जमीन दी थी। इसी अर्थ में ‘इंडिजिनस पीपुल’ या आदिवासी पदबंध विवादास्पद और विभ्रम पैदा करने वाला है।
  उल्लेखनीय है कि सन् 1941की जनगणना में ‘ट्राइवल’ पहलीबार परिभाषित किया गया। इसमें उनकी धार्मिक आस्था को आधार बनाया गया। उसके पहले ‘ट्राइवल’ को हिन्दू धर्म के मानने वाले के रूप में पेश किया जा रहा था। यह मान लिया गया था कि जिन आदिम जातियों का कोई धर्म नहीं है वे सब हिन्दू हैं,क्योंकि हिन्दू धर्म सबसे पुराना धर्म है। ब्रिटिश शासन में जितने भी सेंशस हुए उनमें 1941 को छोड़कर बाकी सभी जनगणना रिपोर्ट में धर्म एक महत्वपूर्ण आधार था। सन् 1931 के सेंशस तक आदिवासियों को ‘एनीमिस्ट’ के नाम से वर्गीकृत किया जाता था। सन् 1931 में पहलीबार ‘ट्राइवल रिलीजन’ पदबंध दाखिल होता है। आदिवासियों के संदर्भ में मुख्य दिक्कत तब आयी जब आदिवासी धर्म और हिन्दू धर्म के बीच संबंधों को परिभाषित करने की आवश्यकता महसूस की गयी। आदिवासी धर्म से भिन्न हिन्दू धर्म को माना गया। यह माना जाता है कि आदिवासी धर्म अति विकसित और पुराना है उसकी तुलना में हिन्दू धर्म नया है और पिछड़ा है। हिन्दू धर्म की विशेषता है कि यह प्रतिगामी है,पर्वेसिव है। यह अपने अंदर प्रत्येक चीज को समाहित कर लेता है। यह इतना तथाकथित उदार है कि इसका किसी भी समुदाय में प्रवेश हो सकता है। यदि कोई आदिवासी समूह अपने मूल धर्म को न जानता हो तो हिन्दू धर्म आसानी से उस आदिवासी समूह को प्राचीन धर्म होने के नाते अपने नाम से विभूषित कर सकता है। सन् 1909 को भारत में महत्वपूर्ण कह सकते हैं क्योंकि इस साल भिन्न किस्म के धर्म के मानने वालों की गणना आरंभ हुई। भारत में वोट देने वाले भिन्न धर्म के मानने वाले कितने हैं, इसकी गणना आरंभ हुई तो उस समय हिन्दू संगठनों ने उन तमाम जातियों-जनजातियों को हिन्दू धर्म में शामिल करा दिया जिनको अपने धर्म के बारे में जरा सा भी संदेह था। यह चीज कालांतर में 1931 की जनगणना में दिखाई देता है। ‘हिन्दू ही आदिवासी हैं’ का नारा लगाते हुए मुम्बई की 90 प्रतिशत और चेन्नई की 50 प्रतिशत आबादी आदिवासी लिखा दी गयी।     
    सन् 1881 में  जब पहली व्यवस्थित जनगणना हुई थी तब उसमें ‘ट्राइव’ पदबंध का इस्तेमाल नहीं किया गया था,बल्कि ‘फोरेस्ट ट्राइव’ पदबंध का इस्तेमाल किया गया था। इसमें अनेक उपशीर्षक भी रखे गए थे। उसमें कृषि और पशुपालन करने वाली जाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है। 1901 और 1911 की जनगणना में ‘तथाकथित-पशुजीवी’ जाति नाम रखा गया था। बाद में 1921 में यह केटेगरी बदल दी गयी और ‘पशुजीवी’ की जगह ‘ट्राइवल रिलीजन’ पदबंध का इस्तेमाल किया गया। बाद में प्रसिद्ध समाजविज्ञानी घुर्ये ने आदिवासियों ‘पिछडे हिन्दू’ के नाम से वर्गीकृत किया। यही वह प्रक्रिया है जिसमें आदिवासियों को जाति के रूप में व्याख्यायित करने का समूचा प्रपंच खड़ा किया गया। आजादी के बाद समाजविज्ञानियों ने जाति और आदिवासी इन दोनों को अलग करके देखने का वैज्ञानिक आधारों पर प्रयास किया और नए किस्म की अवधारणाएं बनायीं। ब्रिटिश समाजविज्ञानियों ने ‘जाति’ और ‘आदिवासी’, ‘धर्म’ और ‘आदिवासी’ में गड्डमड्ड किया। जिसे स्वाधीनता के बाद दुरूस्त करके नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश की गयी और यह माना गया कि ‘जाति’ और ‘आदिवासी’ दो भिन्न किस्म के सामाजिक संगठन का प्रतिनिधित्व करते हैं। जाति वंशानुगत श्रम विभाजन ,छोटे-बड़े का भेद,शुद्धता,अपवित्रता,धार्मिक और नागरिक अपंगता आदि पर आधारित है, जबकि आदिवासियों वे लक्षण नहीं होते जो जाति में होते हैं। जाति और आदिवासी नामक दोनों सामाजिक संगठन दो भिन्न किस्म के नियमों से संचालित हैं। आदिवासियों में ‘ किंनशिप’ संबंध होते हैं। इसके बंधनों में वे बंधे होते हैं। आदिवासियों में ‘क्लॉन’ मूल ईकाई है। वही इसके उपभोग और स्वामित्व की स्वामी है, इसमें अन्य से प्रत्येक व्यक्ति की समानता पर जोर है। इसके विपरीत जाति समाज में असमानता ,परनिर्भरता और मातहत भाव है। इसी तरह जाति और आदिवासी में धर्म के उपयोगी और अनुपयोगी रूपों को लेकर भी भेद है। आदिवासियों और जाति में आनंद,मनोरंजन,सेक्स,मद्यपान,नृत्य,वाद्य आदि को लेकर भी भिन्न किस्म की आदतें हैं। जाति के लोगों में इन सब चीजों को लेकर तरह-तरह की रूढ़ियां चलन में हैं। आदिवासियों को हमेशा से हिन्दू समाज अथवा मुख्यधारा के समाज से बाहर रखा गया है। आदिवासियों की पहचान का आधार राजनीतिक-प्रशासनिक है। हमें कायदे से आदिवासी की अवधारणा पर आलोचनात्मक ढ़ंग से विचार करना चाहिए। ब्रिटिश शासन में आदिवासियों और मुख्य समाज के बीच के अन्तस्संबंध और संपर्क पर ध्यान नहीं दिया गया जबकि आजाद भारत में आदिवासियों और बाकी समाज के बीच के अन्तस्संबंधों पर ध्यान दिया गया। आदिवासियों को जब आप मुख्यधारा के समाज के साथ संपर्क-संबंध बनाते हुए देखते हैं तो आदिवासी जीवन की अपरिवर्तनीय छबि टूटती है और आदिवासी परिवर्तन की छबि सामने आती है। आदिवासी जब मुख्यधारा के समाज से जुड़ते हैं तो सभ्यता में अन्तर्भुक्त होते चले जाते हैं। आदिवासियों के अतीत को लेकर किए गए तमाम अनुसंधान इसकी पुष्टि करते हैं।डीडी कोसाम्बी से लेकर एन के बोस तक का समस्त सामाजिक शोध इस बात की पुष्टि करता है कि आदिवासियों को बाकी समाज या हिन्दू समाज अपने अंदर का हिस्सा बनाता रहा है। उन्हें जाति में तब्दील करता रहा है। यह भी तथ्य सामने आए हैं कि आदिवासी जाति के लोगों ने जाति में अपने को रूपान्तरित कर लिया है और जाति के नियम-कायदे मानने लगे हैं और उन्हें हिन्दू किसानों में गिना जाने लगा है। ऐसी जनजातियों में भील,भूमीज्स,माझी,खासास,राज-गोंडस आदि के नाम लिए जा सकते हैं। अधिकांश मानवविज्ञानियों का लेखन यही तथ्य रेखांकित करता हैं कि जनजातियों का जाति में रूपान्तरण हुआ है। राय-बर्मन (1972) में आदिवासी उन्हें माना जो (1) हिन्दूसमाज में शामिल हैं। (2) जिनका सकारात्मक ढ़ंग से हिन्दू समाजीकरण हो चुका है, (3) जिनका नकारात्मक ढ़ंग से नजरिया बना है, (4)जो हिन्दू समाज से अलग हैं। विद्यार्थी ने लिखा कि आदिवासी वह है जो वन में रहे। गांव में रहे। अर्द्ध विकसित क्षेत्र में रहे। इल्विन (1944)ने लिखा कि आदिवासी वह है जो सबसे शुद्ध हो। वह ऐसा ग्रुप है जो मैदानी इलाकों में रहने वालों के संपर्क में हो और आदिवासी जीवनशैली में रहता हो। डीडी कोसाम्बी (1975) ने लिखा है कि आदिवासियों के द्वारा हिन्दू समाज की तकनीक अपनाने के कारण बड़े पैमाने पर मौजूदा उत्पादन प्रणाली में उन्हें आत्मसात कर लिया गया। आदिवासी गैर प्रतिस्पर्धी व्यवस्था में रखे गए ,इसके कारण उन्हें संरक्षण भी दिया गया। संस्कृतिकरण दूसरा मैथड था जिसके आधार पर आदिवासियों को हिन्दू समाज का हिस्सा बनाया गया। आदिवासियों के रूपान्तरण का तीसरा रूप है आदिवासी राज्य का उदय। जो लोग आदिवासी राज्य की धारणा पर जोर देते रहे हैं उनका मानना है कि आदिवासी जाति या जनजाति या संस्कृतिकरण के सही आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं अतः राज्य के व्यापक सदर्भ में आदिवासियोंका मूल्यांकन किया जाना चाहिए। एक अन्य समस्या है कि जो आदिवासी समूह या व्यक्ति आधुनिक राज्य ,शिक्षा, संस्थान,नौकरी और बाजार के संपर्क में आ चुके हैं और अपना जनजाति समूह और इलाका त्याग चुके हैं। वे क्या अब भी आदिवासी की कोटि में रखे जाने के लायक हैं। आजादी के बाद जो आदिवासी बच्चे सभी किस्म की आरक्षण सुविधाएं प्राप्त करके दूसरी -तीसरी पीढ़ी में नगरजीवन जी रहे हैं क्या उन्हें आदिवासी कहना सही होगा ?    
जिस आदिवासी का संस्कृतिकरण-हिन्दूकरण और नगरीकरण हो चुका है क्या वह अभी भी आदिवासी है ? संस्कृतिकरण ने जनजाति को जाति में बदला है, क्या जाति का भी रूपान्तरण हो रहा है या नहीं ? उपभोग की संस्कृति के विस्तार ने जाति के बंधनों और मान्यताओं को कमजोर करना आरंभ कर दिया है। उपभोक्तावाद ने सभी किस्म के धार्मिक-सामाजिक मतभेदों को मासकल्चर के अदीन कर दिया है। अब आदिवासी संस्कृति का तंजी सं मासकल्चर में रूपान्तरण हो रहा है। आदिवासियों की जीवनशैली से जुड़ी वस्तुएं शहरी मध्यवर्ग के ड्राइंग रूम में सजावट की वस्तुओं के रूप में घुस आई हैं। आदिवासी जीवनशैली की प्रत्येक वस्तु आज मासकल्चर का शानदार माल है। आदिवासी गहनों से लेकर भालों तक,चटाई से लेकर चोटी तक सभी चीजें मासकल्चर का अंग हैं। ग्लोबल-लोकल के द्वंद्व में आदिवासी की संस्कृति का आदिवासी इलाकों,देश और भाषा की सीमाओं के पार बाजार और उपभोक्ता तैयार हो गया है। अब आदिवासी संस्कृति की विशिष्टता को मासकल्चर ने वस्तु और माल में तब्दील कर दिया है। यह रूपान्तरण आदिवासियों की निजता और विशिष्टता को तेजी से खत्म कर रहा है। आदिवासी भी अब एक उपभोक्ता मात्र बनकर रह गया है।
   मासकल्चर के दौर में आदिवासियों में जाति संस्कृति कम मासकल्चर ज्यादा फलेगी-फूलेगी। इसके कारण सामाजिक तनाव पैदा होंगे। आदिवासियों में छद्मशत्रु से लड़ाईयां बढ़ेंगी। आदिवासियों की संस्कृति की निजता और विशिष्टता के लिए खतरा किसी अन्य जाति के लोगों से नहीं है बल्कि मासकल्चर से है.पूंजीवाद से है। मुश्किल यह है कि आदिवासियों में इसकी गलत समझ का ज्यादा प्रचार हो रहा है। आम तौर पर आदिवासी अपने शत्रु के रूप में गैर आदिवासी या अन्य जनजाति के लोगों को देख रहे हैं। इसके कारण उत्तर-पूर्व के राज्यों में जनजातियों के बीच आए दिन खूनी झगड़े होते रहते हैं। आदिवासियों का विकास हो इसके लिए जरूरी है कि उन्हें पूंजीवाद की साझा संरचनाओं,उपभोग,उत्पादन,संस्कार आदि की संगतियों में लाया जाए। आदिवासियों में किस तरह की जीवनशैली होगी, किस तरह के संस्कार,आचार-विचार होंगे यह वे ही तय करें। लेकिन आधुनिक शिक्षा के वातावरण की रोशनी उनके दरवाजों तक पहुँचे। लोकतंत्र की प्रक्रिया से जुड़ी संरचनाएं और लोकतांत्रिक कानून व्यवस्था उनके गांवों तक पहुँचे। राज्य और अन्य जातियों के साथ उनके टकराव की नहीं सहयोग की जरूरत है। आदिवासियों पर किसी के वर्चस्व की नहीं समानतावादी भावबोध की जरूरत है।   

    






     

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

'आदिवासी' अवधारणा की तलाश में -1-

     ‘आदिवासी’ पदबंध के बारे में पहली बात यह कि यह हिन्दी का नाम है और हिन्दी क्षेत्र में इसकी एक सीमा तक प्रासंगिकता है। लेकिन अन्यत्र कोई प्रासंगिकता नहीं है। ‘आदिवासी’ पदबंध विभ्रम पैदा करता है। यह मूल जनजातियों के साथ अनेय जनजातियों के बीच तनाव पैदा करता है। ‘आदिवासी’ पदबंध के पीछे स्वयंसेवी संगठनों की जनजातियों के बीच में विभाजनकारी की भूमिका रही है।  इसने अंग्रेजी के ‘ट्राइवल’पदबंध को समूचे विमर्श से अपदस्थ किया है। अंग्रेजी ने नाम में नकारात्मक अर्थ था जबकि हिन्दी का नाम उन्हें मूल बाशिंदे के रूप में देखता है। जब ‘ट्राइवल’ कहते थे तो यह अर्थ संप्रेषित होता था कि समाज से बाहर सामाजिक समूह। मातहत लोग। इसके विपरीत ‘आदिवासी’ पदबंध की अर्थध्वनि एकदम अलग है। आदिवासी कहते ही उनके अधिकारों का बात ज़ेहन में आती है। उनके प्रतिरोध, उभार, संघर्ष,आंदोलन,सशक्तिकरण की बातें मन में आती हैं। 
     भारत में 67.7 मिलियन आदिवासी रहते हैं। आदिवासी को प्रशासनिक भाषा में शिड्यूल ट्राइव भी ये शिड्यूल ट्राइव जातियां आदिवासी की केटेगरी में आती हैं। इन्हें ‘ इंडिजिनस पीपुल’ माना जाता है। इन्हें एसटी कहते हैं। भारत में 5653 विशिष्ट किस्म की जातियां रहती हैं इनमें से 635 जातियां हैं जिन्हें ‘आदिवासी’ की कोटि में रखा गया है। इसके कारण भारत में जनजातियों के समूहों की संख्या 250 से 593 के बीच में है।
     भारत के संविधान में ‘आदिवासी’ पदबंध का प्रयोग नहीं मिलता,बल्कि ‘अनुसूचित जनजाति’ पदबंध का प्रयोग मिलता है। यह ज्यादा सटीक अर्थ को व्यक्त करने वाला पदबंध है। हिन्दीजगत में  ‘जन’ पदबंध सैंकड़ों सालों से बेहद जनप्रिय रहा है। आदिवासियों को आदि बाशिंदा मानने के पीछे प्रधान कारण था उनके जमीन,क्षेत्र और कच्चे संसाधनों पर अधिकारों को स्वीकार करना।
      आरएसएस के संगठन उन्हें ‘वनवासी’ के नाम से पुकारते हैं। ‘वनवासी’ पदबंध उनके पुराने निवासी का अर्थ व्यंजित करता है लेकिन उनके क्षेत्रगत अधिकारों की व्यंजना नहीं करता। यही स्थिति गांधीजी की है वे उन्हें ‘वन्यजाति’ मानते थे। इसमें भी सांस्कृतिक अर्थ की व्यंजना होती है ,क्षेत्रगत आधिकार को वे भी नहीं मानते थे। यही वजह है 60 साल तक कांग्रेस पार्टी ने कभी भी आदिवासियों के अपने इलाके और उसके संसाधनों के स्वामित्व के अधिकारों को स्वीकृति नहीं दी।
  पहलीबार ‘यूपीए -1’ सरकार के शासन में वामपंथियों के दबाब के चलते आदिवासियों के अपने क्षेत्र और संसाधनों पर अधिकार की बात को कानूनी तौर पर मान्यता मिली। आदिवासी संरक्षण के लिए नया कानून बना जिसके द्वारा ब्रिटिश जमाने के समस्त नकारात्मक प्रावधानों की विदाई हुई। 
      आदिवासियों के विशेषज्ञ जे.जे. राय बर्मन के अनुसार आदिवासियों में सभी जातियां मूल आदिवासी जाति की केटेगरी में नहीं आतीं, इसी तरह मूल आदिवासियों में अनेक जनजातियां बाहर से आयी हैं। आज इन जनजातियों के लोग जहां रहते हैं वहां वे मूल रूप से नहीं रहते थे। मसलन मणिपुर के कूकी आदिवासी,मिजोरम के लूसिस जनजाति के लोग मूलतः दक्षिण चीन और चिन पर्वत के निवासी हैं। ये लोग कुछ सौ साल पहले ही स्थानान्तरित होकर भारत में आए हैं। कूकी को ब्रिटिश शासकों ने नागा बहुल इलाकों में बसाया था। जिससे नागा और वैष्णवपंथी मैइती जनजाति के बीच में बफर जॉन पैदा किया जाए। लूसी जनजाति से सैलो का संबंध है इसके मुखिया को ब्रिटिश शासकों ने ठेकेदार के रूप में बढ़ावा दिया जिससे वह मिजोरम में सड़कें बनाए। इस तरह अन्य जगह से लाकर बसाए गए आदिवासियों की बस्तियों का दायरा धीरे-धीरे त्रिपुरा तक फैल गया। जिसे इन दिनों तुइकुक के नाम से जानते हैं।  यहा त्रिपुरा के राजा की नीति थी ,उसने अपने राज्य में रियांग और चकमा जनजाति के लोगों को बाहर से लाकर बसाया। जिससे कॉटन मिलों के लिए झूम की खेती के जरिए कॉटन का अबाधित प्रवाह बनाए रखा जा सके।
    बोडो जनजाति के लोग मूलतः भूटान के हैं और बाद में वे असम में आकर बस गए। टोटोपारा इलाके के टोटो जनजाति के लोग भूटान से आकर उत्तर बंगाल की सीमा पर आकर बस गए। इनमें अनेक ऐसी जनजातियां भी हैं जो एक जमाने में अपराधी जाति के रूप में ही जानी जाती थीं उन्हें भूटान के राजा ने अपने राज्य से निष्कासित कर दिया था। मेघालय में रहने वाली खासी जनजाति के लोग मूलतः कम्पूचिया के हैं और माइग्रेट होकर कुछ सौ वर्ष पहले ही मेघालय में आकर बसे हैं। ये खमेर जनजाति का अंग हैं। देंजोंग भूटिया जनजाति जो सिक्किम की वफादार जनजाति है ,वह तिब्बत से आकर बसे हैं। इसी तरह पश्चिम बंगाल के वीरभूम और मिदनापुर जिले से माइग्रेट करके संथाल जनजाति के लोग झाररखण्ड के संथाल परगना में जाकर बस गए हैं। ये ऐतिहासिक तथ्य हैं।   
    मजेदार बात यह है कि जिस तरह आदिवासी अपने को भारत का मूल या आदि बाशिंदा मानते हैं, वैसे ही कुछ दलित विचारक भी दलितों को भारत का आदि बाशिंदा मानते हैं। लेकिन भारत सरकार उन्हें आदि बाशिंदा मानने को तैयार नहीं है। कुछ ब्राह्मण,राजपूत का नाम जनजाति सूची में वैसे ही है जैसे उत्तराखंड में जौनसारी जाति के लोगों का नाम जनजाति सूची में है यही स्थिति हिमाचल प्रदेश के कनौर जनजाति की भी है।
    आदिवासी पदबंध का उत्तर बंगाल,सिक्किम,अरूणाचल प्रदेश,असम,मेघालय, नागालैण्ड, त्रिपुरा में चायबागानों में काम करने वाले मजदूरों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इन इलाकों में संथाल,मुण्डा,ओरांव आदि ब्रिटिश जमाने में माइग्रेट करके आए थे। इन इलाकों के मूल आदिवासी अपने को इससे अपमानित महसूस करते हैं। क्योंकि उन्हें भी आदिवासी के रूप में जाना जाता है। इसके कारण उत्तर बंगाल के मूल आदिवासी अपने को आदिवासी के नाम से नहीं बल्कि अपनी मूल जाति के नाम से पुकारते हैं ,वे अपने को राभा,मिच,राजवंशी जनजाति या एथनिक ग्रुप के नाम से पुकारते हैं। वे इस बात का विरोध करते हैं कि उन्हें आदिवासी कहा जाए। सिक्किम के आदिवासी अपने यहां छोटा नागपुर से माइग्रेट करके आए पर्वतीय मजदूरों को आदिवासी मानते हैं वे उन्हें उनकी जनजाति के नाम से नहीं पुकारते। उत्तर बंगाल के सुंदरवन में माइग्रेट करके आए संथाल,उरांव,मुण्डा, हो जनजाति के कृषि मजदूरों और छोटी जोत के किसानों को आदिवासी के नाम से पुकारते हैं ,उनकी जनजाति के नाम से नहीं। इनमें से ज्यादातर अनुसूचित जनजाति में आते हैं। कहने का अर्थ यह है कि आदिवासी पदबंध उत्तर-पूर्वी भारत में उत्पत्तिमूलक है और उससे मध्य भारत के माइग्रेटेड आदिवासी मजदूर,छोटे किसानों की पहचान बनती है। इस बात को रखने का प्रधान मकसद है कि ‘ट्राइवल’, ‘जनजाति’ और ‘आदिवासी’ इन तीनों पदबंधों के अर्थ में अंतर है। ‘आदिवासी’ पदबंध के भारत में स्वयंसेवी संगठनों ने जनप्रिय बनाया है। इससे मूल जनजातियों और माइग्रेटेड जनजातियों में टकराव बढ़ा है। जे.जे, राय बर्मन ने सही रेखांकित किया है कि हमें ‘आदिवासी’ पदबंध को ‘ट्राइवल’ के वजन का नहीं समझना चाहिए। ‘आदिवासी’ के नाम से परिचित जातियों को आदि जातियां नहीं कहा जा सकता। ‘आदिवासी’ पदबंध का प्रयोग जनजातियों में भारत विरोधी भावनाएं भड़काने का काम करता है। खासकर उत्तर बंगाल,सिक्किम और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों में इस पदबंध के प्रयोग से अधिकांश मूल जनजातियां अपने को अपमानित महसूस करती हैं। यहां उल्लेखनीय है कि ‘ट्राइवल’ पदबंध स्वयं में समस्यामूलक है और इसे ब्रिटिश संस्कृति के जनजातियों पर हमले के रूप में देखा जाता है। भारत में कुछ नए विचारक आए हैं जो ‘फ्रेण्डस ऑफ ट्राइव’ (आदिवासी बंधु) के नाम से काम कर रहे हैं। वे आदिवासियों को रोमांटिसाइज करते हैं। वे आदिवासियों के क्रांतिकारी सशक्तिकरण का हल्ला करते हैं। (क्रमशः)
  

सोमवार, 29 नवंबर 2010

आदिवासी अस्मिता की चुनौतियां

    आदिवासी समस्या राष्ट्रीय समस्या है। भारत की राजनीति में आदिवासियों को दरकिनार करके कोई राजनीतिक दल नहीं रह सकता। एक जमाना था आदिवासी हाशिए पर थे लेकिन आज केन्द्र में हैं। आदिवासियों की राजनीति के केन्द्र में आने के पीछे प्रधान कारण है आदिवासी क्षेत्रों में कारपोरेट घरानों का प्रवेश और आदिवासियों में बढ़ती जागरूकता। आदिवासियों के प्रति वामपंथी दलों का रूख कांग्रेस और भाजपा के रुख से बुनियादी तौर पर भिन्न है। वामपंथी दलों ने आदिवासियों को कभी भी आदिवासी बनाए रखने, वे जैसे हैं वैसा बनाए रखने की कोशिश नहीं की है। वामपंथी दलों ने आदिवासियों को साम्राज्यवादी विचारकों द्वारा दी गयी घृणित पहचान से मुक्त किया है। उन्हें मनुष्य के रूप में प्रतिष्ठा दी है। यह कार्य उनके मानवाधिकारों की रक्षा करते हुए किया है। आदिवासियों को वे सभी सुविधा और सुरक्षा मिले जो देश के बाकी नागरिकों को मिलती हैं। आदिवासियों का समूचा सांस्कृतिक तानाबाना और जीवनशैली वे जैसा चाहें रखें,राज्य की उसमें किसी भी किस्म के हस्तक्षेप की भूमिका नहीं होगी,इस प्रक्रिया में भारत के संविधान में संभावित रूप में जितना भी संभव है उसे आदवासियों तक पहुँचाने में वामपंथियों की बड़ी भूमिका रही है। आदिवासियों को आतंकी या हथियारबंद करके उनके लिए लोकतांत्रिक स्पेस तैयार नहीं किया जा सकता। लोकतांत्रिक स्पेस तैयार करने के लिए आदिवासियों के बीच लोकतांत्रिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक कानूनों क पालन और प्रचार-प्रसार पर जोर देना होगा। आदिवासियों के लिए लोकतंत्र में जगह तब ही मिलेगी जब उन्होंने लोकतांत्रिक ढ़ंग से लोकतान्त्रिक समस्याओं पर गोलबंद किया है। लोकतंत्र की बृहत्तर प्रक्रिया का उन्हें हिस्सा बनाया जाए। आदिवासियों के लिए बंदूक की नोंक पर लाई गई राजनीति आपराधिक कर्म को बढ़ावा देगी। उन्हें अपराधी बनायेगी। साम्राज्यवादी विचारकों के आदिवासियों को अपराधी की कोटि में रखा। इन दिनों आदिवासियों को तरह-तरह के बहानों से मिलिटेंट बनाने,जुझारू बनाने,हथियारबंद करने,पृथकतावादी बनाने,सर्वतंत्र-स्वतंत्र बनाने के जितने भी प्रयास उत्तर-पूर्व के राज्यों से लेकर छत्तीसगढ़-लालगढ़ तक चल रहे हैं ,वे सभी आदिवासियों को अपराधकर्म में ठेल रहे हैं। अंतर यह है कि उसके ऊपर राजनीति का मुखौटा लगा हुआ है। आदिवासी को मनुष्य बनाने की बजाय मिलिटेंट बनाना सामाजिक-राजनीतिक अपराध है।
 
हमें इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि आदिवासी इलाकों में ही उग्रवाद क्यों पनपा है ? कांग्रेस के नेताओं और भारत सरकार के गृहमंत्री पी.चिदम्बरम के पास उग्रवाद की समस्या का एक ही समाधान है वह है आदिवासी इलाकों में विकास और पुलिस कार्रवाई। इसी एक्शन प्लान पर ही सारा मीडिया और कारपोरेट जोर दे रहा है।  इस एक्शन प्लान को आदिवासी समस्या के लिए रामबाण दवा कहा जा रहा है। केन्द्र सरकार ने इस दिशा में कदम उठाते हुए कुछ घोषणाएं भी की हैं। लेकिन यह प्लान बुनियादी तौर पर अयथार्थपरक है। इस प्लान में आदिवासियों का उनकी जमीन से उच्छेद रोकना, उनके क्षेत्र के संसाधनों का स्वामित्व,विस्थापन और उनके पीढ़ियों के जमीन के स्वामित्व की बहाली की योजना या कार्यक्रम गायब है। मनमोहन-चिदम्बरम् बाबू जिस तरह का लिकास करना चाहते हैं उसमें आदिवासियों का विस्थापन अनिवार्य है। समस्या यहां पर है कि क्या केन्द्र सरकार विकास का मॉडल बदलना चाहती है ? जी नहीं, केन्द्र सरकार विकास का नव्य-उदार मॉडल जारी रखना चाहती है। आदिवासियों की उनकी जमीन से बेदखली जारी रखना चाहती है, ऐसे में आदिवासियों के सड़कें,स्कूल-कॉलेज,रोजगार के सपने देकर शांत नहीं किया जा सकता। विकास के मनमोहन मॉडल में वस्थापन अनिवार्य और अपरिहार्य है। ऐसी अवस्था में आदिवासियों के बीच में विकास और पुलिस एक्शन का प्लॉन पिटेगा। आदिवासियों का प्रतिवाद बढ़ेगा। दूसरी बात यह कि विस्थापन का विकल्प मुआवजा नहीं है। मुआवजा ज्यादा हो या कम इससे भी आदिवासियों का गुस्सा शांत होने वाला नहीं है। इस प्रसंग में सबसे बुनियादी परिवर्तन यह करना होगा कि आदिवासियों के इलाकों पर उनका ही स्वामित्व रहे। क्रेन्द्र या राज्य सरकार का आदिवासियों की जमीन और जंगल पर स्वामित्व संवैधानिक तौर पर खत्म करना होगा।
    आदिवासियों के सामने इस समय दो तरह की चुनौतियां हैं, पहली चुनौती है आदिवासियों के प्रति उपेक्षा और विस्थापन से रक्षा करने की और उसके विकल्प के रूप में परंपरागत संस्थाओं और आदिवासी एकजुटता को बनाए रखने की। दूसरी चुनौती है नयी परिवर्तित परिस्थितियों के अनुकूल बदलने और लदनुरूप अपने संस्कारों,आदतों और कानूनों में बदलाव लाने की। आदिवासियों पर कोई भी परिवर्तन यदि बाहर से थोपा जाएगा तो वे प्ररोध करेंगे। आदिवासियों का प्रतिरोध स्वाभाविक है। वे किसी भी चीज को स्वयं लागू करना चाहते हैं। यदि केन्द्र सरकार उनके ऊपर विकास को थोपने की कोशिश करेगी तो उसमें अंततः असफलता ही हाथ लगेगी। आदिवासी अस्मिता की धुरी है स्व-संस्कृति प्रेम, आत्मनिर्णय और आत्म-सम्मान में विश्वास। 




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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...