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शनिवार, 12 मार्च 2011

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर विशेष-भूमंडलीकरण के खिलाफ सार्वभौमिक प्रतिरोध (1) माकपा सांसद वृंदा कारात


                                                                                                                      अंतर्राष्ट्रीय मीडिया दुनिया को अभिजात्य पश्चिमी नजरिए से देखता है और 'नारीवादी की मौत' कहकर किलकारता है। उनके अनुसार महिला आंदोलन ने अपनी गतिशीलता खो दी है। उनका एक अमरीकी नारीवादी को इतनी तवज्जह देना, जिसने 'अंतत:' शादी कर ली, उनकी आलोचना के भोंडेपन को दरशाता है। यह बाद में सबूत के तौर पर सामने आया है कि 'कैसे चीजें बदल रही हैं', क्योंकि उनके द्वारा की गई इस व्याख्या के अनुसार 'महिला आंदोलन' के मूलभूत सिध्दांतों में से एक था पुरुषों से घृणा, अत: शादी से नफरत।
इस समझ के विपरीत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिला आंदोलन अपने नए जीवन के दौर में है। यदि इसे अंतर्राष्ट्रीय मीडिया द्वारा पहचाना नहीं जाता है या अनदेखा किया जाता है तो वह इसलिए कि यह उस समझ के आधार पर हो रहा है जो सनसनीखेज मीडिया खांचे में फिट नहीं बैठता, यह महिलाओं के लिए आरक्षित है। यह व्यक्तियों या व्यक्तित्व पर आधारित नहीं है। पूरे विश्व भर में विभिन्न देशों में महिलाओं की बड़ी गोलबंदी महिलाओं के जीवन पर संरचनात्मक समायोजन नीतियों के प्रतिकूल असर पर गतिमान रहे हैं : कुछ साल पहले बीजिंग में महिलाओं के विश्व सम्मेलन में मीडिया ने हिलेरी क्लिंटन के खड़े होकर किए गए स्वागत को तवज्जह दी। जिस हाल में उनका गुणगान हो रहा था उसके बाहर हो रहे बड़े और उग्र विरोध प्रदर्शनों को मीडिया ने अनदेखा किया। लेकिन वैश्विक आंदोलन उन नीतियों का विरोध कर रहे हैं और उन पर सवाल खड़े कर रहे हैं जो विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की नई अंतर्राष्ट्रीय तिकड़ी ने दुनिया पर थोपे हैं। इस विषय पर बहुत ध्यान देने की आवश्यकता है। सिएटल और नीस में हुए प्रदर्शन इसके कुछ उदाहरण हैं। जाहिर है कि सबसे ताकतवर देश के प्रतिनिधि के सम्मुख सिर झुकाने का चलन अभी भी दुनिया में बहुत हद तक जारी है। पर सैध्दांतिक और राजनीतिक अवरोधों की सीमाओं को लांघकर महिलाओं के अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन में बढ़ता हुआ प्रतिरोध एक अहम परिवर्तन है।
2000 में महिलाओं के लिए विश्व मार्च इस बढ़ते प्रतिरोध का सबसे प्रेरणाप्रद उदाहरण था। मानव विकास और मानव अधिकारों में विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष को सबसे बड़ा बाधक ठहराते हुए संरचनात्मक समायोजन की नीतियों के खिलाफ 159 से ज्यादा देशों के 6,000 महिला संगठनों ने एक साथ मिल कर मार्च किया था। यह प्रचार पूंजीवाद को सीधे अस्वीकार करने पर आधारित था। नवउदार आर्थिक नीतियों द्वारा पैदा की गई और बढ़ाई गई गरीबी और हिंसा के खिलाफ प्रचार और प्रदर्शनों में विश्व भर की लाखों महिलाओं ने 8 मार्च 2000 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस से 17 अक्टूबर गरीबी विरोधी दिवस तक हिस्सा लिया। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के खिलाफ न्यूयॉर्क में महिलाओं का मार्च आंदोलन का चरम बिंदु था। महिलाओं की इस वैश्विक पहलकदमी को हमारे देश में शायद इतनी प्रशंसा नहीं मिली, यहां तक कि हमारे दोस्तों से भी नहीं।अलग-अलग प्रवृत्तियों की ताकत और कमजोरियों में इस कोशिश ने बहुत महत्वपूर्ण बदलाव की रेखा खींची। इस वक्त यहां सारी व्याख्या करना संभव नहीं है।
     जो बात काबिलेगौर है वह है जिसे 'पुरातन नारीवाद' कहा जा सकता है उस चलन का कमजोर पड़ना यानी स्त्री-पुरुष समीकरण के सीमित दायरे में कार्रवाई और सामाजिक विश्लेषण। इस विचारधारा का 70 और 80 के दशक में बहुत बोलबाला था। 90 के दशक ने महिलाओं के अनुभव को बृहद नीतियों और सामाजिक-आर्थिक ढांचे के प्रसंग में महिला आंदोलन के काम और विचारधारा को और व्यापक और परिपक्व होते देखा। यद्यपि यह तो पक्का है कि इसे महिलाओं के दमन के प्रति मार्क्सवादी विचारधारा को स्वीकार करना नहीं कहा जा सकता है, वह ढांचा है जो स्वयं को वाम विचारधारा वाले संगठनों (भारत में एडवा जैसे) और 'स्वतंत्र' या 'स्वायत्त' समूहों और संगठनों और गैरसरकारी संगठनों का एक मजबूत हिस्सा, जो गैरसरकारी संगठन की पूर्व यथास्थिति और 'राजनीति विरोधी' ढांचे से अलग हो चुके हैं, उसे व्यापक गठजोड़ की ओर ले जा सकता है। विश्व मार्च के आयोजकों के साहित्य के मुताबिक यह 60 के दशक में वियतनाम युध्द के खिलाफ हुए रेडिकल मार्च की याद दिलाता है। हालांकि इसका विस्तार उतना नहीं था। उन्होंने 'अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के नवीनीकरण और लोकतंत्रीकरण की मांग की। यह मांग ऐसे ऐतिहासिक समय में की गई जब वित्तीय बाजार बिना किसी कानून या नागरिकों के प्रति किसी प्रकार की जवाबदेही के बिना काम कर रहे हैं। वे दुनिया को एक विशालकाय बाजार में बदल रहे हैं जो केवल अमीरों के लिए खानपान का प्रबंध करती है और वस्तुत: मानवता के खिलाफ युध्द का संचालन कर रही है, जिसका परिणाम है घायल, बाहर कर दिए गए, शरणार्थी और मृत।'
विश्व मार्च में दिखाई दी यह अभूतपूर्व एकता एक स्पष्ट राजनीतिक समझ पर आधारित थी, जो जाहिर है कि एक रात में नहीं बनी थी। यह पूरी दुनिया भर में महिलाओं के वास्तविक अनुभवों पर आधारित थी।
पृष्ठभूमि
सोवियत संघ और पूर्वी यूरोपीय शासनों के ध्वस्त होने के बाद विश्व भर में समाजवाद को गहरा धक्का लगा था और औपनिवेशिक ताकतों के हमलों में बढ़ोतरी हुई थी। ऐसे समय में नई अर्थव्यवस्था के सैध्दांतिक योध्दाओं ने ऐलान कर दिया था कि 'पूंजीवाद' के साथ जीना सीखने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचा है। इस विचार से पूंजीवाद ने 'इतिहास का अंत' स्थापित किया। इस नजरिए की झलक वाम खेमे के पूर्व बुध्दिजीवियों में भी दिखाई दी जिन्होंने अपने कदम वापस खींच लिए थे। पीछे हटने का यह कदम ऐसा था जिसने अंतर्राष्ट्रीय महिला आंदोलन के भीतर और साथ ही कई आंदोलनों को भी प्रभावित किया, जिसके परिणामस्वरूप उनका मनोबल गिरा और विखंडन हुआ। महिलाओं के अंतर्राष्ट्रीय लोकतांत्रिक फेडरेशन (डब्ल्यूआईडीएफ), यह एक ऐसी बाडी थी जिससे बहुत बड़ी संख्या में वाम धारा वाले महिला संगठन संबध्द थे, उसके नेतृत्व में वाम धारा वाले संगठनों ने कमोबेश औपनिवेशिक विरोधी संघर्षों में सोवियत संघ के नेतृत्व और विकास के सोवियत मॉडल को स्वीकार किया था। भारत में ऐसा संगठन एनएफआईडब्ल्यू था जो डब्ल्यूआईडीएफ से संबध्द था। डब्ल्यूआईडीएफ ने वैश्विक स्तर पर युध्द के खिलाफ और शांति के पक्ष में, साथ ही तीसरी दुनिया के देशों के साथ भाईचारा बनाए रखने आदि के लिए महिलाओं की गोलबंदी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
      90 के दौरान डब्ल्यूआईडीएफ को वास्तव में लकवा मार गया था और उसने अपनी पुरानी स्थिति को खो दिया था, हालांकि बाद में उसने फिर से संगठन बनाने शुरू कर दिए थे।अन्य महिला आंदोलनों के भीतर भी 'मौजूदा सचाइयों के साथ समझौता' करने की प्रवृत्ति थी। यह दुनिया के विभिन्न हिस्सों में दान से चलने वाली गैरसरकारी संगठनों के कामकाज में प्रतिबिंबित हो रहा था। इन संगठनों ने लघु परियोजना के कार्य के लिए जन प्रदर्शनों और आंदोलनों को ठुकरा दिया था। 'स्थानीय काम' पर अधिक जोर देने और उस काम को व्यापक संदर्भ में संबोधित न करने ने खांटी राजनीति को जहां एक तरफ हाशिए पर रखा और वहीं निहित स्वार्थों के लिए कपट करने का मौका मिला चाहे वे विशेष गैरसरकारी संगठन कितने अच्छे खयालों वाले या समर्पित क्यों न हों।
इसके बावजूद एक और चलन उभरकर सामने आ रहा था। नई आर्थिक व्यवस्था में उनके जीवन-यापन और जिंदगी पर हो रहे क्रूर अत्याचार के संदर्भ में विश्व भर में महिलाएं आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर संगठित हो रही थीं। जो लोग सुन रहे थे, दुनिया भर में महिलाएं एक जैसी बातें कह रही थीं। वे बता रही थीं कि जीवन और कितना ज्यादा मुश्किल हो गया है। उनको कितना ज्यादा काम करना पड़ता है। वे बता रही थीं कि दो जून की रोटी का जुगाड़ करना कितना मुश्किल है। और ये आवाजें न केवल पूर्व समाजवादी देशों, न केवल तीसरी दुनिया के देशों से आ रही थीं बल्कि पहली दुनिया से भी ऐसी ही पुकार सुनाई दे रही थी।
1995 में बीजिंग में ही संकेत स्पष्ट थे जब विश्व भर से महिलाओं के समूहों ने समानांतर एनजीओ सम्मेलन में विश्वीकरण और नवउदार नीतियों का महिलाओं के जीवन पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव पर बहस की थी। संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम को जानबूझकर हटाने और 'नई आर्थिक नीतियों' को अधिक गरीबी लाने वाली नीतियों के रूप में संबोधित करने के लिए इस सम्मेलन के आधिकारिक दस्तावेज की भरसक निंदा की गई थी। यह पहली बार था जब वैश्विक महिला आंदोलनों द्वारा उपनिवेवाद से प्रेरित विश्वीकरण की नीतियों की इतने तीखे स्वर में आलोचना की गई। उसने हकीकत को देखने के लिए अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों को बाध्य किया। उसके बाद संयुक्त राष्ट्र और उससे जुड़ी एजेंसियों द्वारा आयोजित आधिकारिक सम्मेलनों को विश्वीकरण के दौर में महिलाओं के और अधिक हाशिए पर चले जाने पर बार-बार ध्यान आकर्षित करना पड़ा। स्वीकार के बावजूद, जाहिर से कारणों के लिए, जिसमें स्वयं संयुक्त राष्ट्र को किनारे पर रखना शामिल है, कोशिश यही है कि इस नई तिकड़ी की आलोचना को नरम रखा जाए। अत: आधिकारिक अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेजों द्वारा नीतियों को कोई चुनौती नहीं दी गई और जनविरोध को 'सामाजिक सुरक्षा नेट' और 'गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम' का हवाला देकर निस्तेज कर दिया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और हमारे देश में भी कुछ ऐसे महिला संगठन हैं जो इस विकृत तर्क को मानते हैं और व्यवहार में विश्व बैंक की विचारधारा के संवाहक के रूप में कार्य करते हैं।
लोगों की जिंदगियों पर हमला
पूर्व समाजवादी देशों में
लेकिन सत्य को स्वयं साबित करने का एक तरीका है। साम्राज्यवादी प्रचार तंत्र द्वारा प्रचारित मिथ को स्वयं पूर्व समाजवादी देशों के भीतर से महिलाओं के अनुभवों द्वारा चुनौती दी गई। एक 'माडल' बनना तो दूर, जैसा कि साम्राज्यवाद ने वादा किया था, ये देश निर्मम शोषण और दमन के शिकारगाह बन गए। जब तक उनके देश समाजवादी बने रहे महिलाओं और बच्चों को इन देशों में विकसित देशों से पहले एक बेहतर जीवन स्तर और सामाजिक और कानूनी स्थिति को लेकर आश्वस्त कर दिया गया था। लेकिन सबसे पहले और सबसे तकलीफदेह चोट इन्हीं को पहुंची। तथ्य सभी मालूम हैं।
     यूनिसेफ की एक सर्वे रिपोर्ट ने आकलन किया कि इन देशों में पिछले दशक में 2.5 करोड़ नौकरियां गई हैं उनमें से 1.4 करोड़ नौकरियां यानी आधे से अधिक महिलाओं के पास थीं। 70 फीसदी महिलाओं, जिन्होंने अपनी नौकरी खो दी, को या तो अपने ओहदे से छोटे ओहदे की और कम तनख्वाह की नौकरी करनी पड़ी थी। न्यायपालिका में महिलाएं एक-तिहाई महत्वपूर्ण ओहदों पर थीं जो अब घटकर 10 फीसदी से कम पर आ गईं। राजनीतिक भागीदारी के प्रतिशत में अधिक गिरावट आई है। सर्वे में जिन 27 देशों को शामिल किया गया उनमें महिलाओं की जीवन प्रत्याशा घटकर आधी रह गई है। एड्स के मामलों में नौ गुना बढ़ोतरी हुई है, जो कि मूल रूप से महिलाओं की खरीद-फरोख्त की बढ़त को प्रतिबिंबित करता है। बाल सुरक्षा सेवाओं, स्वास्थ्य सेवाओं, आवास और खाद्य सुरक्षा पूरी तरह से समाप्त कर दी गई है जिसके परिणामस्वरूप गरीबी के स्तर में जोरदार बढ़ोतरी हुई है : यह ऐसे देशों में हुआ जहां न्यूनतम मानव आवश्यकताओं के लिए तंत्र मौजूद था जो कि अधिकतर विकसित देशों को मात देता था।
'विकसित' पश्चिम में
अपने स्वयं के देशों में भी बड़े व्यापार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने जबरन ऐसे कार्यक्रम लागू किए हैं जो कि कल्याण लाभों को ठीक हृदय पर काटते हैं। इन लाभों को विकसित पूंजीवादी देशों की कामगार जनता ने बीसवीं सदी में समाजवादी क्रांति के दबाव में विशेष रूप से हासिल किया। समाजवादी व्यवस्था में रहने वाले लोगों को राज्य की जिम्मेदारी के नाते स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा, आश्रय और काम का आश्वासन आदि में प्राप्त ढेर सारे लाभ के उदाहरण की ताकत को पहचानते हुए पूंजीवादी देशों के शासकों को अपने देशों में कामगार लोगों के लिए कुछ कल्याणकारी व्यवस्था करने को बाध्य होना पड़ा।
इसलिए समाजवाद को लगे झटके का असर इन सरकारों की नीतियों पर भी पड़ा। अत: वे नवउदारवादी उपायों के एक हिस्से के रूप में जो भी कल्याणकारी उपाय मौजूद थे, भले बहुत ही अपर्याप्त कल्याणकारी उपाय थे, उनमें कटौती करने लगे। उदाहरण के लिए, इन देशों में, जैसे ब्रिटेन, कनाडा और फ्रांस में असमानताएं बहुत बढ़ गईं क्योंकि गरीबी और हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए जो सब्सिडी राज्य द्वारा दी जाती थी वह समाप्त कर दी गई। ऐसा आकलन किया गया है कि अमरीका में पिछले दशक में जनसंख्या के 75 फीसदी हिस्से ने अपनी वास्तविक आय में गिरावट को देखा है। अमरीका में आज 365 लाख लोग गरीबी में रह रहे हैं और हर चार में से एक बच्चा अभावों का शिकार है। देश की एक फीसदी जनता उसकी 47 फीसदी दौलत की मालिक है। यह वह समय है जब कल्याणकारी उपायों को वास्तव में कम कर दिया गया है, खत्म कर दिया गया है। जो लोग किसी सहायता पर हैं उन्हें पांच साल की ग्रांट मिलती है और उसके बाद वे किसी प्रकार की सहायता के अधिकारी नहीं होते हैं चाहे उनके पास नौकरी न हो। अगर उन्हें काम दिया जाता है तो वह बहुत कम पगार वाला होता है। उदाहरण के लिए, किसी नौकरी में यदि एक नियमित कामगार को 15 या 20 डॉलर प्रति घंटा मिलता है तो एक सहायता प्राप्त व्यक्ति को पांच डॉलर मिलेगा। उसके पास दो ही रास्ते हैं : एक या तो सहायता को जाने दे या फिर कम वेतन वाली नौकरी स्वीकार कर ले, जो कि किसी भी सूरत में स्थायी नहीं है। अत: कामगारों के इन नियोक्ताओं के लिए कम वेतन लागतों के कारण अधिक मुनाफा कमाने में राज्य सहायक होगा। ऐसे समय में जब छंटनी और काम से निकाल देना सामान्य है, कामगार लोगों, खासकर महिलाओं को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। यह सच केवल शहरों का ही नहीं है बल्कि उससे भी अधिक यह खेत मजदूरों का है, जिसमें महिलाएं अधिक हैं।
     टमाटर चुनने वालों के एक सर्वे ने यह दरशाया कि आज जो भी पैसा ये कामगार महिलाएं पाती हैं वह उससे कम है जो वह आज से तीस साल पहले कमाती थीं। एक टोकरी टमाटर के लिए उन्हें 35 से 40 सेंट मिलते हैं जबकि तीन दशक पहले 45 सेंट मिलते थे। इसके साथ ही शिशु सदन (क्रेच) सेवाओं के न होने से भी महिला कामगारों के सामने मुश्किल पेश आती है। जो हैं भी तो वह बहुत महंगे हैं और अधिकतर कामगार महिलाओं के बजट से बाहर हैं। अमरीका ने समान वेतन विधेयक को पास करने से इनकार कर दिया है। अधिकांश नौकरियों में महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले एक-तिहाई से एक-चौथाई कम पगार मिलती है।संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रमों के परिणामस्वरूप तीसरी दुनिया के देशों में महिलाओं के लिए परिस्थितियां और ज्यादा खराब हैं।(क्रमशः)
(भारतीय नारी संघर्ष और मुक्ति,वृंदा कारात,अनुवाद-उषा चौहान,ग्रंथ शिल्पी,नई दिल्ली,से साभार)


शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

मार्क्स और बाज़ार- प्रसिद्ध अर्थशास्त्री गिरीश मिश्र


भले ही सोवियत संघ और उसका समाजवादी खेमा अब अस्तित्व में नहीं है फिर भी वैज्ञानिक समाजवाद के जनक कार्लमार्क्स की प्रासंगिकता कम नहीं हुई हैं। 
वस्तुत: अतिमंदी के वर्तमान दौर में जिन चार चिंतकों के प्रति झुकाव बढ़ा है उनमें कार्लमार्क्स प्रमुख हैं। तीन अन्य है : जॉन मेनार्ड केंस, उपन्यासकार ऐन रैंड और हीमान मिंस्की। वर्ष 2002 में न्यूयार्क से छपी जेर्री जेड मुल्लर की पुस्तक 'द माइंड एंड द मार्केट' में रेखांकित किया गया है कि एक राजनीतिक आन्दोलन के रूप में मार्क्सवाद के प्रति तत्काल आकर्षण कम हुआ लगता है मगर विश्लेषण के आधार और बाजार की समीक्षा के रूप में उसकी प्रासंगिकता बरकरार है। इस आकर्षण के पीछे दो बड़े कारण हैं। पहला, मार्क्स द्वारा औद्योगिक मजदूर वर्ग की बढ़ती भौतिक विपन्नता का जोरदार तथ्यात्मक विवेचन और उसके पीछे बाजार की भूमिका को उजागर करना। दूसरा बाजार में अन्तर्निहित प्रतिस्पर्धा को मानव संबंधों को पशु संबंधों के बराबर लाने के लिए जिम्मेदार ठहराना। बाजार द्वारा लोगों को हमेशा के लिए पेशा विशेष की जंजीर में जकड़ रखने के तथ्य को उजागर कर उसके अमानवीय स्वभाव को स्पष्ट करना।
मार्क्स का सामना पूंजीवाद बाजार से पहली बार हुआ जब वे 'राइनिशे साइतुंग' के संपादक थे। राइनलैंड के किसानों पर उस समय मुकदमा किया गया था कि उन्होंने जंगल से ईंधन के लिए लकड़ी इकट्ठी की जबकि जंगल सामंतों की निजी संपत्ति थी। जांच के बाद मार्क्स ने पाया कि जंगल से जलावन के लिए किसानों द्वारा लकड़ी लेना नया नहीं था। किसान ऐसा करना अपना परंपरागत अधिकार मानते थे। सामंतों द्वारा उनको इस प्रचलित रिवाज से वंचित करने की कोशिश उनके द्वारा पूंजीवादी दृष्टिकोण अपनाने का परिणाम था। किसानों के साथ उनका पुराना संबंध खत्म हो गया था और उनके ऊपर निजी संपत्ति और मुनाफे का भूत हावी हो चुका था। इस कारण चोरी की परिभाषा भी बदल गई थी।
उधर इंग्लैण्ड में रहते हुए फ्रेडरिक एंगेल्स ने महसूस किया कि बाजार अब पारस्परिकता के सिध्दांत पर आधारित नहीं रह गया है। उस पर लालच सवार हो गया है। यही लालच एडम स्मिथ ने 'स्वहित' के बतौर पेश किया था। एंगेल्स का निष्कर्ष था कि पूंजीवाद प्रतिस्पर्धा पर आधारित होने के कारण आदमी को आदमी से भिड़ाता है। इस तरह सब परस्पर युध्दरत हैं। लोग भुक्खड़ जानवर की तरह एक दूसरे को निगलने के लिए तत्पर हैं। बाजार में व्याप्त अनिश्चितता ने लोगों को सट्टेबाज बना दिया है। मार्क्स पर एंगेल्स के इस विश्लेषण का गहरा असर पड़ा जो उनकी कृतियों को पढ़ने से स्पष्ट है। वर्ष 1844-45 मार्क्स और एंगेल्स ने अपने विचारों को स्पष्ट और सुव्यवस्थित करने में व्यतीत किया। उन्होंने कई खंडन-मंडन वाली पुस्तकें लिखीं। उन सब का प्रकाशन तुरंत न हो सका। जिस पुस्तक का उनके विचारों के सार संग्रह बतौर प्रकाशन हुआ और जिसने यूरोप में तहलका मचा दिया वह थी 'कम्युनिस्ट में निफेस्टो' या 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र'।
इसमें उन्होंने उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का वर्णन किया है जिसने बाजार को जन्म दिया। उन्होंने यह तथ्य उजागर किया कि व्यक्तिगत स्वहित पर आधारित बाजार ने पहले की सारी पहचानों को धराशायी कर दिया है जो पुश्तैनी हैसियत, राष्ट्रीयता, धर्म आदि पर आधारित थीं। इसके परिणामस्वरूप मनुष्य श्रमशक्ति धारक माल यानि क्रय-विक्रय की वस्तु में बदल गए और उनका मानवीय पहलू लुप्त-सा हो गया। उनकी नई कानूनी स्वतंत्रता ऐसा आवरण बन गई जिसने बाजार में माल के रूप में बनी उनकी असली हैसियत को ढंकने का काम किया। वस्तुत: तत्कालीन नई परिस्थितियों में उसने उन्हें नए प्रकार का गुलाम बना दिया। जिनका अपने समय और शरीर पर पहले की अपेक्षा काफी कम नियंत्रण रह गया।
इसके बावजूद मार्क्स ने बाजार द्वारा परम्परागत पहचानों को मिटाए जाने को एक सकारात्मक घटना बतलाई। उसने धार्मिक धारणाओं और रीति-रिवाजों द्वारा युगों से ओढ़ाई गई भ्रांति की चादर को उतार फेंका। जिससे वे अपनी असली पहचान को देख पाने में सक्षम हो गए। उनमें से अधिकतर यह जान पाए कि वे शोषित-उत्पीड़ित मजदूर या सर्वहारा वर्ग के सदस्य हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि पूंजीवाद द्वारा लाई गई संपदा और प्रौद्योगिकी मानव समाज की वास्तविक मुक्ति को संभव बनाएगी और लोग प्रकृति एवं अभाव के बंधनों से स्वतंत्र हो पाएंगे।
मार्क्स का कहना था कि बाजार से सबसे अधिक फायदा पूंजीपति वर्ग को होता है जो आरंभ में क्रांतिकारी भूमिका अदा करता है और निंरतर रूपांतरण की प्रक्रिया को आरंभ करता है। जिसके दूरगामी परिणाम हैं और जिससे कोई भी अछूता नहीं रह पाता। उत्पादन के साधन लगातार बदलते हैं जिनसे न सिर्फ आर्थिक बल्कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी भारी परिवर्तन होते हैं। मार्क्स और एंगेल्स ने लिखा: अमेरिका की खोज और उत्तमाशा अंतरीय का रास्ता निकाल लेने से उदीयमान पूंजीपति वर्ग के प्रसार के लिए नया क्षेत्र खुल गया। ईस्टइंडीज और चीनी बाजारों, अमेरिका के उपनिवेशीकरण, उपनिवेशों के साथ व्यापार, विनियम के साधनों और माल उत्पादन में आम वृध्दि ने वाणिज्य, नौ परिवहन और उद्योग को, और फलस्वरूप लड़खड़ाते हुए सामंती समाज के क्रांतिकारी तत्वों को तेजी के साथ विकास करने का अभूतपूर्व अवसर दिया।
उद्योग की सामंती प्रणाली, जिसमें औद्योगिक उत्पादन पर बंद दरवाजों वाले शिल्प संघों का एकाधिकार होता था, नए बाजारों की बढ़ती हुई जरूरतों की पूर्ति के लिए अब काफी न थी। अत: उसकी जगह विनिर्माण ने ले ली। शिल्प संघ के उस्ताद कारीगरों को विनिर्माता मध्यम वर्ग ने ढकेलकर एक ओर कर दिया। अलग-अलग निगमित शिल्पसंघों का श्रम-विभाजन प्रत्येक पृथक-पृथक वर्कशाप के श्रम विभाजन के आगे लुप्त हो गया। इस बीच बाजार बराबर बढ़ते गए और माल की मांग भी निंरतर बढ़ती गई। तब भाप और मशीन के उपयोग ने औद्योगिक उत्पादन में क्रांति पैदा कर दी। अत: मैन्युफैक्चर का स्थान दैत्याकार आधुनिक उद्योग ने और मध्यम वर्ग का स्थान औद्योगिक धन्नासेठों ने, पूरी की पूरी औद्योगिक फौजों के नेताओं ने, आधुनिक पूंजीपतियों ने ले लिया। आधुनिक उद्योग ने विश्व बाजार की स्थापना की है, जिसके लिए अमेरिका की खोज ने पथ प्रशस्त कर दिया था। इस बाजार ने वाणिज्य, नौपरिवहन और थल संचार की जबर्दस्त उन्नति की। आगे चलकर इस उन्नति का प्रभाव उद्योग के विस्तार पर पड़ा, और जिस अनुपात में उद्योग, वाणिज्य, नौपरिवहन और रेल्वे में वृध्दि हुई, उसी अनुपात में पूंजीपति वर्ग ने उन्नति की और उसकी पूंजी बढ़ी; और उसने मध्य युग से चले आते हुए प्रत्येक वर्ग को पृष्ठभूमि में ढकेल दिया। पूंजीवादी बाजार के आगे बढ़ने के साथ ही पुराने सामंती संबंध धराशायी हो गए। उसने मनुष्य को अपने स्वाभाविक बड़ों के साथ बांध रखने वाले नाना प्रकार के सामंती संबंधों को निर्ममता से तोड़ डाला, और नग्न स्वार्थ के 'नकद पैसे-कौडी' क़े हृदय शून्य व्यवहार के सिवाय मनुष्यों के बीच और कोई दूसरा संबंध बाकी रहने नहीं दिया। धार्मिक श्रध्दा के स्वर्गोपम आनंदातिरेक को, वीरोचित उत्साह और कूपमंडूकतापूर्ण भावुकता को उसने आना-पाई के स्वार्थी हिसाब-किताब के बर्फीले पानी में डुबो दिया है। मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को उसने विनिमय मूल्य बना दिया है, और पहले के अनगिनत अनपहरणीय अधिकार पत्र द्वारा प्रदत्त स्वातंत्र्यों की जगह अब उसने एक ऐसे अंत:करण शून्य स्वातंत्र्य की स्थापना की है जिसे मुक्त व्यापार कहते हैं। संक्षेप में, धार्मिक और राजनीतिक भ्रमजाल के पीछे छिपे शोषण के स्थान पर उसने नग्न, निर्ला, प्रत्यक्ष और पाशविक शोषण की स्थापना की है।' जिन पेशों के संबंध में अब तक लोगों के मन में आदर और श्रध्दा की भावना थी, उन सब का प्रभामंडल पूंजीपति वर्ग ने छीन लिया। डॉक्टर, वकील, पुरोहित, कवि और वैज्ञानिक सभी को उसने अपना उजरती मजदूर बना लिया है। पूंजीपति वर्ग ने पारिवारिक संबंधों के ऊपर से भावुकता का पर्दा उतार फेंका है और पारिवारिक संबंध को केवल द्रव्य के संबंध में बदल डाला है। पूंजीवाद ने अपने बढ़ते माल उत्पादन के लिए बाजार की खोज में सारी दुनिया की खाक छानी। नवोदित उद्योगों के लिए कच्चे मालों की तलाश में दूरदराज गया। कालक्रम में तैयार और कच्चे माल के बढ़ते बाजार ने राष्ट्रीय एकांगीपन और संकुचित दृष्टिकोण को खत्म करना आरंभ किया। जिसका एक परिणाम हुआ साहित्य का उदय। पूंजीवादी उत्पादन का पैमाना बढ़ने से मालों का मूल्य घटा।
बाजार में टिके रहने की मजबूती उत्पादन के उपकरणों और प्रौद्योगिकी को निरंतर बेहतर बनाने के लए प्रेरित करती है। इस प्रकार पिछली व्यवस्थाओं की तुलना में पूंजीवाद निरंतर गतिशील मगर अस्थिर होता है। पुरानी मान्यताएं, विचार, पूर्वग्रह और मूल्य निरंतर तेजी से धराशायी होते जाते हैं। 'उत्पादन में निरंतर क्रांतिकारी परिवर्तन, सभी सामाजिक अवस्थाओं में लगातार उथल-पुथल, शाश्वत अनिश्चितता और हलचल ये चीजें पूंजीवादी युग को पहले के सभी युगों से अलग करती हैं। सभी स्थिर और जड़ीभूत संबंध, जिनके साथ प्राचीन और पूज्य पूर्वग्रहों तथा मतों की एक पूरी श्रृंखला जुड़ी हुई होती है, मिटा दिए जाते हैं, और सभी नए बनने वाले संबंध जड़ीभूत होने के पहले ही पुराने पड़ जाते हैं। जो कुछ भी ठोस है वह हवा में उड़ जाता है, जो कुछ पावन है वह भ्रष्ट हो जाता है और आखिरकार मनुष्य संजीदा नजर से जीवन की वास्तविक हालतों को मानव-मानव के आपसी संबंधों को देखने के लिए मजबूर हो जाता है।
बाजार में पूंजीपतियों के ऊपर भारी दबाव होता है जिससे वे श्रमिकों से अधिकाधिक अधिशेष मूल्य उगाहने की हर कोशिश करते हैं। इसके लिए कार्य दिवस को यथासंभव बढ़ाने की कोशिश होती है। इस दृष्टि से अभिनवीकरण द्वारा ऐसी मशीनों, उपकरणों और प्रौद्योगिकी को काम में लाया जाता है जिससे कम समय में यथासंभव अधिशेष मूल्य के सृजन के लिए दबाव हो। कहना न होगा कि बाजार जहां एक ओर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देता है वहीं मेहनतकशों को अपनी ताकत पहचानकर संगठित होने के लिए प्रेरित करता है।


बुधवार, 5 जनवरी 2011

कूपमंडूक विचारक हतप्रभ हैं वैश्वीकरण से

कूपमंडूक विचारकों को वैश्वीकरण अभी तक समझ में नहीं आया है। वे यह देखने में असफल हैं कि भारत का बुनियादी आर्थिक नक्शा बदल चुका है। कूपमंडूक विचारकों में कठमुल्लापन इस कदर हावी है कि उनकी कूपमंडूकता के समाने विनलादेन भी शर्मिंदा महसूस करता है। भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारीकरण को औचक और कूपमंडूक भाव से कभी समझा नहीं जा सकता। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विगत एक साल में अर्थव्यवस्था का जो नक्शा तैयार किया है उसको वस्तुगत रूप में देखें तो भारत की तस्वीर आगामी दशक में काफी हद तक बदल जाएगी। इस बदली तस्वीर को हमें पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर देखना होगा। कॉमनसेंस और कठमुल्लेपन से भूमंडलीकरण और नव्य आर्थिक उदारीकरण समझ में नहीं आएगा। भविष्य में भारत का प्रधानमंत्री कोई भी बने लेकिन देश में बड़े आर्थिक परिवर्तनों का आधार मनमोहन सिंह ने रख दिया है और यह काम बड़े ही कौशल और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए किया है। विगत एक साल में मनमोहन सरकार ने अमेरिका,चीन,रूस, फ्रांस,जापान,दक्षिण कोरिया, मलेशिया,संयुक्त अरब अमीरात आदि देशों के साथ 250 से ज्यादा द्विपक्षीय समझौते किए हैं। इन समझौतों के कारण आगामी दशक में भारत की अर्थव्यवस्था में जबर्दस्त परिवर्तन होगा। महाशक्तियों और विकसित देशों के साथ परमाणु ऊर्जा,अंतरिक्ष,परिवहन,संचार आदि के क्षेत्रों में किए गए समझौते बेहद महत्वपूर्ण हैं। मसलन अमेरिका,रूस,फ्रांस चीन ,कनाडा के साथ परमाणु ऊर्जा और अन्य क्षेत्रों में किए गए समझौतों का दूरगामी असर होगा। मसलन रूस के साथ हुए समझौते के अनुसार रूस दो नए परमाणु रिएक्टर लगाएगा और लडाकू विमान के डिजायन निर्माण में मदद करेगा। आगामी 5 सालों में 3 स्थानों पर 18 परमाणु ऊर्जा रिएक्टर लगाए जाने की महत्वाकांक्षी योजना की भी घोषणा की गई है। इसके अलावा 20 बिलियन डॉलर के दुतरफा व्यापारिक समझौते भी हुए हैं। फ्रांस विभिन्न प्रकल्पों में 10 बिलियन डॉलर का निवेश करेगा। चीन ने आगामी 5 सालों में विभिन्न क्षेत्रों में दुतरफा व्यापार के क्षेत्र में 100 बिलियन डॉलर के निवेश का समझौता किया है। चीन ने ऊर्जा और अन्य क्षेत्रों 16 बिलियन डॉलर के 48 समझौते किए हैं। परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अकेले फ्रांस 9,900 मेगावाट बिजली पैदा करने के लिए संयंत्र मुहैय्या कराएगा।
    इसके अलावा फ्रांस के साथ अन्य क्षेत्रों में 12बिलियन डॉलर का,जापान के साथ 20 बिलियन डॉलर, कनाडा के साथ 15 बिलियन डॉलर का समझौता हुआ है। विगत वर्ष राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल की यात्रा के समय संयुक्त अरब अमीरात के साथ 100 बिलियन डॉलर के दुतरफा व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं। इसमें 43 बिलियन का मौजूदा व्यापार शामिल नहीं है। यह भी अनुमान है कि सन् 2010-11 में कृषि उत्पादन भी बढेगा। सन् 2010-11 में 4.4 फीसदी कृषि उत्पादन का लक्ष्य है। जबकि 2008-09 में 1.2 प्रतिशत ही कृषि उत्पादन हुआ था। इसी तरह चीनी और रूई का उत्पादन भी बढ़ेगा। भारत में जहां एक ओर तेजी से विकास हो रहा है। उत्पादन बढ़ रहा है। इन्फ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश बढ़ रहा है। विश्व बाजार में रूई और चीन के दाम बढ़े हैं मसलन चीनी को ही लें,सन् 2010-11 में चीन का उत्पादन 250 लाख टन होने की संभावना है जबकि 2009-10 में 188 लाख टन चीनी का ही उत्पादन हुआ था। चीनी की विश्व बाजार में बड़ी मांग है। उद्योगों में उत्पादन की गति तेज है और औद्योगिक उत्पादन का लक्ष्य 10 प्रतिशत से ऊपर रखा गया है। विगत अक्टूबर में औद्योगिक उत्पादन 10.8 प्रतिशत था और अनुमान है यह आंकड़ा बढ़ेगा। इसी तरह मशीनों के उत्पादन में 22 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। उपभोक्ता मालों का उत्पादन 31 फीसदी बढ़ा है। खान उत्खनन और बिजली उत्पादन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। कारपोरेट कंपोजिट इंडेक्स बढ़कर 10.3 प्रतिशत हो गया है। जो कि पहले 6.9 फीसद था। राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद दर 9 प्रतिशत से ऊपर जा सकती है। आयात और निर्यात दोनों में वृद्धि हुई है। निर्यात में 26.7 प्रतिशत और आयात में 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अभी निर्यात की तुलना में विदेशों से आयात ज्यादा हो रहा है। यह चिंता का क्षेत्र है।
     दूसरी ओर समानान्तर अर्थव्यवस्था या काले धन की संस्कृति का भी विकास हुआ है। एक अनुमान के अनुसार प्रति 24 घंटे में भारत 240 करोड़ रूपये खोता जा रहा है। सन् 1948-2008 की अवधि के दौरान भारत से लगभग 9.7 लाख करोड़ रूपये अवैध पूंजी के रूप में विदेशी बैंकों में जमा कराए गए हैं। इसमें 5.7 लाख करोड़ रूपये तो 2000-08 की अवधि में जमा कराए गए हैं। ये सारी जानकारी ‘ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी-जीएमआई ’ की एक रिपोर्ट में दी गयी है। रिपोर्ट का शीर्षक है- ‘द ड्राइवर्स एण्ड डायनामिक्स ऑफ इल्लिसिट फाइनेंशियल फ्लोज फ्रॉम इण्डियाः1948-2008’। इस अवैध काले धन पर यदि आयकर आदि करों की राशि जोड़ दी जाए तो यह रकम 21 लाख करोड़ रूपये बैठेगी। यह सारा कालाधन है। यदि इस धन को भारत रोक देता तो 230.6 अरब डॉलर के विदेशी ऋण को चुका पाता। इसमें यदि तमाम किस्म की तस्करी आदि का धन भी जोड़ लिया जाए तो यह पूंजी 500 अरब डॉलर से ऊपर बैठेगी। मूल बात यह है कि आर्थिक उदारीकरण लागू किए जाने के बाद से विकास हुआ है साथ में विकास के नाम पर सार्वजनिक संपत्तियों की लूट भी हुई है। क्योंकि विदेशों में जमा अधिकांश कालाधन 1991 के बाद ही जमा किया गया है। कालेधन के विशेषज्ञ अर्थशास्त्रियों का मानना है भारत की 72 फीसदी काली पूंजी विदेशों में जमा है और भारत में मात्र 28 फीसदी है। अवैध कालेधन का समूचा आकार 640 बिलियन डॉलर से ज्यादा का आंका गया है। आने वाले दशक में यह आंकड़ा बढ़ेगा। नव्य उदार अर्थशास्त्र में काले धन पर नकेल लगाने का कोई नियम अभी तक सामने नहीं आया है। केन्द्र सरकार विदेशों में भारतीयों के जमा काले धन को वापस लाने के मामले में कोई ठोस कदम उठाती नजर नहीं आ रही है।  

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

भूमंडलीकरण और विकास - 3- फिदेल कास्त्रो

     लैटिन अमरीका के देशों ने हाल के वर्षों में आर्थिक रक्तस्राव के जो सबसे खराब रूप देखे हैं, उनमें पूंजी पलायन भी एक है। यह विदेशी निवेशकों द्वारा अर्जित लाभ के अंतरण के रूप में नहीं है और न ही यह पलायन उन विदेशी ऋणों के भुगतान के रूप में है जो तानाशाह और भ्रष्ट शासकों के लिए थे जिन्होंने देश की निधियों को उड़ाया और उनका गबन किया, निजी बैंकों से लिए गए निजी ऋण या उसका उपयोग को अदा करने के लिए किया। यह पूंजी पलायन असमान विनिमय के सुविख्यात तत्व के कारण हुए नुकसान का परिणाम भी नहीं है। यह देश के भीतर निर्मित निधियों, कम वेतन पाने वाले मजदूरों की कीमत पर अर्जित बेशी मूल्य या बुध्दिजीवी कार्यकर्ताओं और व्यावसायियों की ईमानादार बचतों या छोटे उद्योगों, कारोबारों और सेवाओं के लाभों के पलायन का मामला है।
लैटिन अमरीकी देशों से घातक पूंजी पलायन का कारण बगैर किसी रोक-टोक और जरूरत के राष्ट्रीय मुद्रा से दुर्लभ मुद्रा की खरीद है। पवित्र नव उदार सिध्दांत के रूप में यह फार्मूला अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संगठनों द्वारा लादा गया है। ऐसा अनुमान है कि वेनेजुएला जैसे देशों से पिछले 40 वर्षों की अवधि के दौरान लगभग 250 अरब डालर का पूंजी पलायन हुआ। अर्जेंटीना, ब्राजील, मैक्सिको तथा अन्य लैटिन अमरीकी देशों से निकली राष्ट्रीय निधियों को भी इसमें जोड़ें।
बहादुर वेनेजुएलाई अवाम और उनके साहसी नेता को शाबासी जिन्होंने विनिमय दर पर नियंत्रण कायम कर लिया है। इससे इस देश से उक्त त्रासदी का अंत हो गया है।
मुझे याद है कि 1959 में क्यूबाई क्रांति की जीत के समय लैटिन अमरीका का कुल ऋण केवल पांच अरब डालर था। उस समय इसकी आबादी 21 करोड़ 44 लाख थी जो अब बढ़कर 54 करोड़ 34 लाख हो गई है। इसमें से 22 करोड़ 40 लाख लोग गरीब हैं और 5 करोड़ से अधिक निरक्षर हैं। 2003 में उसका कुल ऋण कम से कम 800 अरब डालर हो गया था।
विश्व युध्द के बाद गोलार्ध के इस क्षेत्र ने उतना विकास क्यों नहीं किया है जितना कि कनाडा, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने किया है। कभी ये भी यूरोप के उपनिवेश थे। ये तो हमारे मुकाबले भी कम समृध्द और विकसित थे। क्या यह अमरीका के पिछवाड़े रहने के संदिग्ध सौभाग्य का परिणाम है? या क्या यह इस वजह से है कि हम श्वेतों, अश्वेतों, इंडियनों और वर्ण संकरों के घृणित समूह हैं और मानव जीन का यह अध्ययन तथा वैज्ञानिक अनुसंधान गलत है कि मानव जाति में विभिन्न प्रजातियों की बौध्दिक क्षमता में कोई अंतर नहीं है? दोष कहां पर है?
मैंने यह कहकर अपनी बात शुरू की थी कि जो कुछ मौजूद था या आज कुछ मौजूद है वह सब मानवता पर लादा गया है। मैं कार्ल मार्क्स के इस कथन से पूरी तरह सहमत हूं कि जब उत्पादन और वितरण की पूंजीवादी प्रणाली अस्तित्व में नहीं रहेगी और इसके साथ मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण खत्म हो जाएगा तो यह मानव जाति के प्राक्-इतिहास के अंत का सूचक होगा। उनका यह तर्क हमारी जाति के इतिहास के द्वंद्वात्मक विकास पर आधारित है।
बहुत से लोगों को यह विचार अति सरलीकरण और पुराना लग सकता है। मार्क्स ने पूंजीवाद के प्रथम चरण का अध्ययन किया था। यह वह युग था जिसमें एक नए वर्ग का जन्म हुआ, जिसे समाज का कायाकल्प करना था और जो बाद में अनिवार्यत: शोषक और बेरहम बन गया। इससे नई तथा अधिक न्यायपूर्ण दुनिया का मार्ग खुला। जब उन्होंने अपने विचार रखे उस समय बिजली, टेलीफोन, आंतरिक दहन इंजिन, आधुनिक जहाज जो बहुत तेज गति से चलते हैं और भारी सामान ले जाते हैं, आधुनिक रसायन विज्ञान, सिंथेटिक उत्पाद, विमान जो सैकड़ों यात्रियों को लेकर कुछ ही घंटों में अटलांटिक को पार कर जाते हैं, रेडियो, टेलीविजन और कंप्यूटर नहीं थे। उन्होंने यह भयंकर नजारा नहीं देखा था कि मनुष्य द्वारा गैर जिम्मेदाराना रूप में किस तरह से आधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल वनों के विनाश, मिट्टी के कटाव, लाखों हेक्टेयर उपजाऊ भूमि के मरुस्थल में बदलने, समुद्रों के अतिशोषण और प्रदूषण, पौधों और पशुओं की पूरी जाति को नष्ट करने तथा पेयजल, हवा में जहर फैलाने के लिए किया जा रहा है।
मार्क्स ने अपने सिध्दांत का विकास उस समय के सर्वाधिक विकसित देश इंगलैंड में किया। उन्होंने मजदूर-किसान साहचर्य की जरूरत नहीं बताई। न ही उन्होंने उस समय की उपनिवेशी दुनिया से पैदा होने वाली विकट समस्या के बारे में सोचा। यह कार्य उनके मेधावी शिष्य लेनिन ने रूस की विशेष परिस्थितियों में उनके विचार का अनुसरण करके बाद में किया।
मार्क्स ने इंगलैंड की औद्योगिक क्रांति का त्वरित विकास तथा जर्मनी और फ्रांस के शुरुआती विकास को देखा। उस समय कोई भी यह नहीं कह सकता था कि उनकी मृत्यु के मुश्किल से 60 वर्ष बाद अमरीका इस तरह की भूमिका अदा करेगा।
माल्थस ने निराशा के बीज बोए, मार्क्स ने आशा जगाई। उन दिनों धरती के भूगोल और जीवमंडलभूमि, वन, समुद्र और हवा को शासित करने वाले नियमों के बारे में बहुत कम जानकारी थी। बाह्य अंतरिक्ष के बारे में भी बहुत कम ज्ञान था। सापेक्षता का सिध्दांत नहीं आया था तथा बिग बैंग के बारे में एक शब्द भी नहीं लिखा गया था।
मानव इतिहास में पहली बार हमारी जाति के सामने संपूर्ण विनाश का खतरा पैदा हो गया है। केवल प्राकृतिक वास को ही खतरा नहीं है बल्कि गहरी राजनीतिक धमकियों और परिष्कृत हथियारों से भी खतरा है। मार्क्स ने यह सोचा भी नहीं होगा कि सैलफोनों के जरिए लोग धरती के एक कोने से दूसरे कोने तक प्रकाश की गति के साथ बात कर सकेंगे और शेयरों, मुद्राओं तथा हैज प्रचालनों तथा अपनी जगह से तिल भर नहीं हिलाई गई वस्तुओं तथा दूसरी प्रतिभूतियों का खरबों डालर का लेनदेन होगा तथा सट्टेबाजी से होने वाला लाभ बेशी मूल्य से अधिक हो जाएगा।
मार्क्स का उत्पादक ताकतों के विकास तथा विज्ञान और मानव प्रतिभा की अनंत संभावनाओं में विश्वास था। उनका मानना था कि समाज की मौलिक तथा मानसिक जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी वस्तुओं के उत्पादन में सक्षम सामाजिक व्यवस्था दुनिया के पूरी तरह से विकास द्वारा ही कायम की जा सकती है। उन्होंने एक देश में क्रांति की बात नहीं सोची। उन्होंने भविष्य में इतना जरूर झांका कि वह भूमंडलीकृत दुनिया का विचार दे सके, एक ऐसी दुनिया जो शांति के साथ एक होकर रह सके और सब उसमें उपलब्ध धन का पूरा आनंद ले सकें। उन्होंने अमीर और गरीब के बीच बंटी दुनिया के बारे में सोचा भी नहीं होगा। 'दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ!' उन्होंने घोषणा की। आज की वास्तविक दुनिया में इसे आम विनाश और प्राणघातक तथा विनाशकारी ताकत से जुड़े अतिवादी सिध्दांतों के खिलाफ शारीरिक और बौध्दिक मजदूरों, किसानों और गरीबों के एक होने के आह्वान के रूप में लिया जा सकता है।
दुनिया के लिए ये आशा और शांति के दिन नहीं हैं। युध्द होने ही वाला है। यह समान ताकतों के बीच मुकाबला नहीं होगा। एक ओर आधिपत्यवादी महाशक्ति होगी जिसके पास बेइंतहा सैनिक ताकत और तकनीक है तथा जिसे अपने मुख्य साथी का समर्थन प्राप्त है जिसके पास परमाणु क्षमता है और जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य है। दूसरी ओर एक ऐसा देश है जिसके लोग अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा मान्यताप्राप्त स्वतंत्र देश कुवैत पर कब्जे से उत्तेजित गैर बराबर युध्द के बाद दस वर्षों से रोजाना बमबारी से जूझ रहे हैं और जहां लाखों लोग विशेषकर बच्चे भूख और बीमारी से मर रहे हैं।
व्यापक विश्व जनमत नए युध्द के खिलाफ है। वे अंतर्राष्ट्रीय नियमों तथा संयुक्त राष्ट्र संघ की शक्ति और प्राधिकार की परवाह न करने वाली अमरीकी सरकार के एकतरफा निर्णय के खिलाफ है। यह अनावश्यक युध्द है जिसके लिए बनाया गया बहाना न तो विश्वसनीय है और न सही सिध्द हुआ है।
1991 में अमरीका के खिलाफ युध्द के बाद इराक पूरी तरह से कमजोर हो गया था।
उल्लेखनीय है कि ईरान के खिलाफ उसके युध्द के दौरान पश्चिम ने उसका समर्थन किया था तथा भारी मात्रा में हथियार दिए थे। अब उसमें बिलकुल भी क्षमता नहीं बची है जिससे वह अमरीका के आक्रमणात्मक और सुरक्षात्मक हथियारों का मुकाबला कर सके। इसके विपरीत यदि इराक के पास वास्तव में परमाणु, रासायनिक या जैव हथियार हैं तो उनके खतरों को खत्म करने के लिए अमरीका के पास पूरी क्षमता है। इराक के पास ऐसे हथियार होने की कतई संभावना नहीं है और यदि उसके पास हैं भी तो उनके प्रयोग का प्रयास राजनीतिक दृष्टि से असंगत तथा सैनिक दृष्टि से आत्मघाती होगा।
असली खतरा यह है कि इस तरह का सशस्त्र हमला इराकी लोगों के लिए देशभक्ति पूर्ण युध्द बन जाएगा। उनके प्रत्युत्तर और विरोध का अग्रिम तौर पर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता है। इसका कोई अनुमान नहीं कि युध्द कब तक चलेगा, इससे कितनी मौतें और कितना विनाश होगा तथा प्रत्येक प्रतिद्वंद्वी के लिए इसके कितने मानवीय, आर्थिक और राजनीतिक परिणाम होंगे।
दुनिया के सामने पहले से ही मौजूद आर्थिक संकट के मद्देनजर इस युध्द के निश्चित रूप से जबर्दस्त आर्थिक जोखिम होंगे। ऐसे हालात में तेल की कीमतों का क्या होगा कोई नहीं जानता।


बुधवार, 10 नवंबर 2010

बराक ओबामा और किसान का भीख का कटोरा

       अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की तीन दिन की यात्रा का सारा मीडिया कवरेज देखकर लगता है कि ओबामा को भारत के बारे में कम मालूम है। ओबामा ने अपने भाषणों में सारा ध्यान व्यापारियों,सरकारी संस्थानों,मध्यवर्ग और भारत की विकासशील दशा पर केन्द्रित किया। एक तरह से यह भारत के एक वर्ग विशेष को सम्बोधित यात्रा थी। ओबामा की नजर सारे समय भारत की सभ्यता,उन्नति और विशाल मध्यवर्ग पर टिकी रही । ओबामा बताएं भारत की सभ्यता और उन्नति में किसान की भी कोई भूमिका है या नहीं ?  
     सवाल उठता है ओबामा को एकबार भी भारत के अन्नदाता किसान की याद क्यों नहीं आयी ? ओबामा को हरितक्रांति की याद आयी लेकिन हरित क्रांति में पिस गए किसान की याद क्यों नहीं आयी ?हरित क्रांति के साथ पंजाब में जो दिक्कतें आयी हैं उनके बारे में उन्होंने एक वाक्य भी नहीं कहा।
    बराक ओबामा संभवतः पहले अमेरिकी राष्ट्रपति हैं जो भारत की इतने व्यापक ऱूप में प्रशंसा करके गए हैं। इसमें सत्य का अंश कम है,प्रौपेगैण्डा ज्यादा है, मिथ्या बातें ज्यादा हैं। ओबामा की वक्तृता से किसान अचानक गायब नहीं था बल्कि सुचिंतित कारणों की वजह से गायब था।
     बराक ओबामा जानते हैं नव्य उदारवादी ग्लोबल अमरीकी नीतियों के कारण भारत का किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। उसे विगत 30 सालों में जिस कष्ट ,उत्पीड़न और विस्थापन से गुजरना पड़ा है उसकी पहले कभी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।
     हरित क्रांति के बाद गांवों में तबाही आयी है और गांवों में एक लाख से ज्यादा किसानों मे आत्महत्याएं की हैं और तकरीबन चार करोड़ से ज्यादा लोग गांवों से विभिन्न कारणों की वजह से पलायन करके या विस्थापित होकर महानगरों की ओर आए हैं। हाल के बर्षों में हजारों एकड़ जमीन सेज के नाम पर दी गई है और उससे भी लाखों किसानों को विस्थापन का सामना करना पड़ा है।
   पंजाब के जो इलाके हरित क्रांति के कारण हरे-भरे दिखते थे उनमें भयानक प्राकृतिक असंतुलन पैदा हो गया है। गांवों में पानी सैंकड़ों फीट नीचे चला गया है। हरित क्रांति के कारण भारत की भुखमरी कम हुई या बढ़ी यह विवाद का विषय है।
    जो लोग कहते हैं  हरित क्रांति भारत की महान उपलब्धि है उनसे पूछना चाहिए  जिन इलाकों में हरित क्रांति हुई वहां आतंकवादी आंदोलन क्यों पैदा हुआ ? सिख आतंकवादियों को विदेशों में खासकर अमेरिका और कनाडा में शरण किसने दी ? हरित क्रांति का अर्थ महज गेंहूँ -चावल उत्पादन नहीं है उसके साथ और भी बहुत कुछ पैदा हुआ है।
     भारत सरकार द्वारा गठित स्वामीनाथन कमीशन के अनुसार आज पंजाब में बड़े पैमाने पर गेंहूँ और चावल पैदा किया जाता है। सारे देश की पैदावार का 50 फीसद हिस्सा इसी राज्य से आता है। उसका असर यह हुआ है कि मिट्टी और पानी की गुणवत्ता में ह्रास हुआ है। पर्यावरण और भूमि की गुणवत्ता में भी ह्रास हुआ है।
    आज पंजाब 2.2 करोड़ टन का योगदान कर रहा है। इसका लगभग 50 प्रतिशत बफर भंडार के लिए अधिप्राप्त किया जाता है। पंजाब के आम किसानों में गरीबी और ऋणग्रस्तता बढ़ी है। पंजाब में भूजल का स्तर कम हो जाने के कारण कृषि के लिए पानी जुटाने में किसान को ज्यादा खर्चा करना पड़ रहा है। उसकी उपज के सही दाम नहीं मिल रहे।
    दूसरी ओर नव्य उदारीकरण ने किसानों की सब्सीडी घटा दी है। पंजाब में सूखे चारे की कमी के कारण पशुओं के पालन-पोषण पर बुरा असर हुआ है।  हरित क्रांति के नाम पर राज्य के प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण का भयानक दोहन किया गया। इसके कारण प्राकृतिक असंतुलन पैदा हुआ है। स्वामीनाथन कमीशन ने रेखांकित किया है पंजाब के 45 प्रतिशत किसान आर्थिक तौर पर पूरी तरह अक्षम हैं उन्हें ऋण न मिले तो वे खेती नहीं कर सकते। वे असल में ऋण पर गुजारा करते हैं और ऋण के आधार पर ही खेती करते हैं। आप ही बताएं ओबामा यह उन्नति है या अवनति ?
   स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट में पंजाब के सरकारी प्रतिनिधियों का बयान भी शामिल है। उसमें पंजाब के अधिकारियों ने बताया है कि पंजाब के किसानों के सभी कर्ज भी माफ कर दिए जाएं तब भी 45 प्रतिशत किसान कुछ भी करने में सक्षम नहीं हैं। पंजाब के किसानों में उच्चतर शिक्षा का अभाव है जिसके कारण वे अन्यत्र किसी कामकाज में भाग नहीं ले पाते। कमीशन ने माना है सन् 2001-05 के बीच में पंजाब के किसानों की आय में गिरावट आयी है।
  ‘नेशनल सेंपिल सर्वे’ के अनुसार भारत में 72 फीसद गांव हैं जहां पर प्राथमिक स्कूल हैं।66 प्रतिशत गांवों में पूर्व-प्राथमिक स्कूल है। मात्र 10 प्रतिशत गांवों में औषधि की दुकान है। मात्र 20 प्रतिशत गांवों में प्राइवेट क्लिनिक या डाक्टर है।
    एक किलोमीटर के अंदर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र मात्र 46 प्रतिशत गांवों में है। डाकघर मात्र 22 प्रतिशत गांवों में है। नलके का पानी मात्र 18 प्रतिशत गांवों में सप्लाई किया जाता है।किसी खास किस्म की नाली की व्यवस्था 30 प्रतिशत गांवों में है। 
     ओबामा साहब आप जानबूझकर हरित क्रांति के नाम पर झूठ बोल रहे हैं।  नव्य उदारीकरण के दौर में भारत में पशुधन और फसल उत्पादन के क्षेत्र में निरंतर गिरावट आई है। सन् 1996-97 से किसान की वास्तविक फार्म आय में कोई वृद्धि नहीं हुई है। कृषि आय की क्रयशक्ति,सतत कीमतों पर जीडीपी की तुलना में भी कम हो गई है। फसलों का उत्पादन घटा है।
बराक ओबामा साहब आप भारत की ज्ञानक्रांति से बड़े अभिभूत हैं । हम समझ नहीं पा रहे हैं आपको असली भारत क्यों नजर नहीं आया ? आप सिर्फ मध्यवर्ग को ही क्यों देख रहे हैं ,आई टी कम्पनियों और उद्योग की तरक्की को ही क्यों देख रहे हैं ? आपके भाषणों का भारत के सत्य और ज्ञानसमाज के सत्य से कोई संबंध नहीं है। आपके भाषण जनसंपर्क कंपनियों के इशारे पर लिखे गए स्टीरियोटाईप भाषा और भावबोध से भरे हुए थे। अमेरिका में वे बिकते हों,भारत में नहीं बिकते।
     हम कितने ज्ञान सम्पन्न हैं यह बात आपको कुछ तथ्यों की रोशनी में समझ में आ जाएगी। आज भारत में सबसे अधिक संख्या में अल्प-पोषित बच्चे,महिलाएं और पुरूष हैं। मातृ और भ्रूण अल्प-पोषण के कारण बच्चे जन्म के समय कम भार के पैदा होते हैं ऐसे कम भार वाले बच्चे जन्म के समय मस्तिष्क विकास से बाधित होते हैं जो असमानता का सबसे भयंकर रूप है। इसके बाबजूद आपने भारत को ज्ञान की महाशक्ति के रूप में चित्रित किया इससे यही लगता है आपको भारत के बारे में सही जानकारी नहीं दी गयी। 
   कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन ने अमेरिकी नव्य उदारीकरण की नीतियों की सामाजिक परिणतियों को ध्यान में रखकर कहा है  भारत को आज कृषि विकास के शब्दों में कहें तो ‘भीख का कटोरा’ उठाना होगा । जहां भूख रहती है वहां शान्ति कायम नहीं रह सकती।





सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

भूमंडलीकरण और विकास - 2- फिदेल कास्त्रो

               (क्यूबा के महान् क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो)
    जनसंचार पर एकाधिकार के जरिए धरती के हर कोने में उपभोक्तावाद का जहर फैलाकर देश की राष्ट्रीय संस्कृति को कौन नष्ट कर रहा है? प्रति वर्ष वाणिज्यिक विज्ञापनों पर एक खरब डालर के खर्चे के बारे हम क्या कहें जबकि इस रकम का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, पेय जल और आवास के अभाव तथा भूख और कुपोषण को दूर करने के लिए किया जा सकता था? क्या यह केवल आर्थिक मुद्दा है? राजनीतिक और नैतिक नहीं?
नव उदार भूमंडलीकरण बिलकुल साफतौर पर तीसरी दुनिया का फिर से उपनिवेशीकरण है। जैसा कि यहां पहले ही दोहराया जा चुका है, एफ.टी.ए.ए. वास्तव में अमरीका का लैटिन अमरीका पर कब्जा है जिसमें बलवान देश पड़ोसी कनाडा, मैक्सिको और ब्राजील सहित सबसे कमजोर देशों को निगल जाएगा। यह अनैतिक करार है जिसके अंतर्गत पूंजी और वस्तुओं की मुक्त आवाजाही होगी लेकिन कत्लघर बन चुकी मैक्सिको और अमरीका की सीमाओं को पार करने वाले 'जंगलियों' को मौत मिलेगी। उनके लिए कोई एडजस्टमेंट एक्ट नहीं है जिससे आवास और रोजगार का स्वत: अधिकार मिल जाए, भले ही उन्होंने कोई भी उल्लंघन या अपराध किया हो। यह एक्ट तो हमारे देश में क्रांतिकारी परिवर्तनों के लिए क्यूबा को दंडित करने के वास्ते बनाया गया था।
बेहतर दुनिया संभव होने में विश्वास करने वाले एक क्रांतिकारी और योध्दा के रूप में मेरा दृढ़तापूर्वक तथा बगैर हिचक के यह कहना है कि विदेशी निवेश के बदले में किसी देश की संपदा और प्राकृतिक संसाधनों का निजीकरण करना बहुत बड़ा अपराध है। यह तीसरी दुनिया के देशों के जीने के संसाधनों को बहुत सस्ते में बल्कि मुफ्त दे देने जैसी बात है। इससे नए तरह का उपनिवेशीकरण होगा जो कि और अधिक सुविधाजनक और अपने आप काम करने वाला होगा। मूल निवासियों को कानून व्यवस्था तथा अन्य अनिवार्य चीजों की लागत चुकानी होगी जैसा कि पहले उपनिवेशवादी ताकतों के मामले में होता था।
विदेशी पूंजी के साथ संबंधों के मामले में क्यूबा सहयोग के परस्पर लाभप्रद और ध्यानपूर्वक विचारे गए रूपों का प्रयोग करता है जिससे देश की प्रभुसत्ता पर आंच नहीं पहुचंती और राष्ट्रीय संपदा तथा देश के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन का नियंत्रण विदेशी पूंजी या ताकत के हाथों में नहीं रहता।
हमारा एक नियम है कि हम कोई चीज मुफ्त नहीं देते। कीमत संबंधी किसी उलझन की स्थिति में हम जिसका जो बनता है उसे वह दे देते हैं। इस बारे में कोई गलतफहमी न रहे कि हम समाजवादी देश हैं और हम समाजवादी रहेंगे। जबर्दस्त बाधाओं के बावजूद हम और अधिक अनुभव, उत्साह, ऊर्जा और सपने के साथ अधिक मानवीय समाज बना रहे हैं। हमारे यहां अमरीकी डालर चलता है, यूरो चलना शुरू हुआ है। पर्यटन की सुविधा के लिए अन्य मुद्राएं भी चल सकती हैं, लेकिन बुनियादी तौर पर चलने वाली मुद्रा सामान्य क्यूबाई पेसो और परिवर्तनीय क्यूबाई पेसो है। मौद्रिक स्थिति नियंत्रण में है। 2002 में पूरे वर्ष में हमारी मुद्रा का मूल्य स्थिर रहा। दूसरे देशों में ऐसी स्थिति नहीं रही। हमारे यहां से दुर्लभ मुद्रा भी नहीं गई।
जैसा कि सबको मालूम है हमारे गोलार्ध में सबसे विकट समस्या भारी बाह्य कर्जे की है। इस कर्ज के मूलधन और ब्याज चुकाने में कई बार राष्ट्रीय बजट का 50 प्रतिशत हिस्सा चला जाता है जिससे देश की अनिवार्य सेवाओंस्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
सट्टा बाजार के हमलों और पूंजी पलायन से अपने आपको बचाने के लिए सरकारें बैंक में धन जमा रखती हैं। इसका भारी ब्याज उन्हें चुकाना पड़ता है। इसी कारण कोई भी देश अपने ही धन के बल पर विकास हासिल नहीं कर पा रहा है।
नई आर्थिक व्यवस्था द्वारा लादा गया मुक्त मुद्रा विनिमय विकास के लिए जूझ रहे देशों की कमजोर अर्थव्यवस्थाओं के लिए घातक सिध्द हुआ है। काफी लंबे समय से मुद्रा किसी काम की चीज नहीं रह गई है जैसे कि वह पहले हुआ करती थी। इसकी बचत की जा सकती थी और सोने या चांदी के टुकड़ों की तरह बर्तन में रखकर जमीन में गाड़ा जा सकता था।
जैसा कि सभी अर्थशास्त्रियों को मालूम है ब्रेटन वुड्स में अमरीका, जिसके पास विश्व के स्वर्ण भंडार का 80 प्रतिशत हिस्सा है, को विश्व भर में आरक्षित मुद्रा जारी करने का विशेषाधिकार दिया गया है। लेकिन उस समय उसने जारी किए गए प्रत्येक बैंक नोट के मूल्य को सोने में बदलने के उत्तरदायित्व का करार किया। यह उत्तरदायित्व पूरा किया गया जिसमें कागज की मुद्रा के मूल्य की गारंटी थी। इसके लिए देश की सरकार बहुत साधारण क्रियाविधि अपनाती थी और वह थी बाजार में बेशी या कमी के अनुसार आवश्यक सोना बेचना या खरीदना। यह फार्मूला 1971 तक चलता रहा जब राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने भारी सैनिक खर्चों और कर रहित युध्द के बाद एकतरफा निर्णय लेते हुए अमरीकी डालर को स्वर्ण मानक से अलग कर दिया।
उस समय किसी ने भी यह कल्पना नहीं की होगी कि इसके बाद मुद्रा की खरीद-बिक्री में जबर्दस्त सट्टेबाजी की जाएगी। आज प्रतिदिन इस तरह के 1 खरब डालर का लेनदेन होता है।
अमरीकी डालर द्वारा विश्वसनीयता संचित कर लिए जाने, सबके द्वारा इसे विनिमय के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करने की आदत, इसे जारी करने वाले देश की जबर्दस्त आर्थिक शक्ति तथा किसी अन्य उपकरण के अभाव में यह महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

यह विशेषाधिकार लैटिन अमरीका तथा शेष तीसरी दुनिया के देशों के पास नहीं था। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हमारी मुद्राएं कागज के टुकड़े मात्र हैं। उनका मूल्य दुर्लभ मुद्रा, बुनियादी तौर पर अमरीकी डालरों के राष्ट्रीय भंडार पर निर्भर है। लैटिन अमरीका या कैरेबिया के किसी भी देश की मुद्रा न तो स्थिर है न स्थिर रह सकती है। आज यदि किसी
मुद्रा का मूल्य 100 है तो कुछ महीनों, सप्ताहों या दिनों में बाह्य या आंतरिक तत्वों के कारण उसका मूल्य उसके पहले के मूल्य का 50 प्रतिशत, 40 प्रतिशत या यहां तक कि 10 प्रतिशत हो जा सकता है। अर्जेंटीना में पेसो का मूल्य डालर के बराबर रखने के रमणीय, अव्यावहारिक और लोकप्रशंसित प्रयास का क्या हुआ? इसकी परिणति विनाश में ही हुई। रियाल और डालर की टक्कर में भी यही हुआ। इक्वाडोर जैसे देशों ने अपनी मुद्रा कचरे के ढेर में डाल दी तथा अमरीकी डालर को देश में प्रचलन की एक मात्र मुद्रा के रूप में स्वीकार कर लिया।
मैक्सिको में नियमित रूप से हर छह साल बाद सरकार के बदल जाने के कारण भारी अवमूल्यन हुआ जिससे उसकी मुद्रा का मूल्य बहुत कम रह गया। सट्टेबाजी के आखिरी आघात तथा 1998 के संकट के बाद ब्राजील को अपनी 40 अरब डालर की रकम, जो कि उसने अपनी सर्वोत्तम उत्पादन तथा सेवा कंपनियों के निजीकरण द्वारा हासिल की थी, को गंवाने में मुश्किल से आठ सप्ताह लगे।

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

प्रगतिशील विरासत- भूमंडलीकरण और विकास - 1- फिदेल कास्त्रो

     यहां हम एक ध्यान देने योग्य बहस तथा विभिन्न विचारों को सुनने के लिए इकट्ठा हुए हैं। प्रतिष्ठित और संवेदनशील विचारकों ने यहां आकर हमारा मान बढ़ाया है। लेकिन हम कोई शिकायत नहीं कर सकते। हम ऐसे युग में रह रहे हैं जिसे मानव इतिहास में अत्यधिक असाधारण और निर्णायक युग कहा जा सकता है। कोलंबिया विश्वविद्यालय के अमरीकी प्रोफेसर एडमेंड फेप्स जिस आर्थिक विषय पर बोल रहे थे, उससे अलग मुद्दा छेड़े जाने पर उन्होंने कहा, 'यह मेरा और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों का मुद्दा नहीं है। इन्होंने यह जानते हुए भी यहां आने का आमंत्रण कृपापूर्वक स्वीकार किया है कि इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने वाले अधिकांश लोगों के विचार उनकी संस्थाओं द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियों के काफी उलट हैं। आतिथ्य सत्कार और अलग मन रखने वालों के प्रति सम्मान इस तरह की बैठकों की परंपरा बन गई है। व्यक्त विचारों का मुकाबला यदि दुनिया के बारे में भिन्न दृष्टिकोण रखने वाले लोगों के बिलकुल उलट लेकिन बहादुरी के साथ संजोए गए विचारों से नहीं किया गया तो हमारे विश्लेषण का क्या अर्थ रह जाएगा?'
हममें से जो विद्वान नहीं हैं उनको भी साहस की खुराक चाहिए। दुनिया में जो कुछ हो रहा है उसे अधिकाधिक जान लेने की कोशिश के बावजूद कभी-कभी हमारे पास यह जानने के लिए समय नहीं होता कि हम जिस अद्वितीय इतिहास प्रक्रिया से गुजर रहे हैं उसके बारे में क्या नए तथ्य और विचार उभरकर सामने आ रहे हैं और हमारे सामने खड़ा अनिश्चित भविष्य कैसा होगा? मैं पहले ही बता दूं कि आज मेरा विषय अर्थशास्त्र नहीं है। आज मेरा विषय राजनीति शास्त्र है। हालांकि राजनीतिशास्त्र के बगैर अर्थशास्त्र या अर्थशास्त्र के बगैर राजनीतिशास्त्र जैसी कोई चीज नहीं होती।
पहले जो चीज थी या आज जो है वह मानवता पर थोपी गई है। मानव जाति को विकसित करके विवेकशील हस्ती बना देने वाले प्राकृतिक नियमों से लेकर जाति मूल, चमड़ी के रंग तक; वनों में फल तथा कंदमूल बटोरने, शिकार करने या मछली पकड़ने वाले व्यक्तियों से लेकर ऐसे पूंजीवादी उपभोक्ता समाजों तक यही बात लागू होती है जिनसे धनी राष्ट्रों का एक समूह आज धरती को लहूलुहान कर रहा है।
विकसित पूंजीवाद, आधुनिक साम्राज्यवाद और नव उदार भूमंडलीकरण विश्व शोषण की प्रणालियों के रूप में दुनिया पर थोपे गए हैं। दूसरी ओर सभी मानवों के लिए विचारकों और दार्शनिकों द्वारा शताब्दियों से मांगे जा रहे न्याय के सिद्धांत धरती पर वास्तविकता नहीं बने हैं। यहां तक कि जिन्होंने 1776 में उत्तरी अमरीका के 13 ब्रिटिश उपनिवेशों को यह 'स्वत:स्पष्ट' घोषणा करते हुए स्वतंत्र कराया था कि सभी मनुष्य एक जैसे बनाए गए और विधाता ने सभी को कुछ अभिन्न अधिकार दिए हैं, जैसे कि जीवन, स्वतंत्रता, खुशी की तलाश, वे भी दासों को स्वतंत्र नहीं करा सके। इसके विपरीत यह विकराल प्रथा लगभग पूरी एक शताब्दी पर्यंत उस समय तक चलती रही जब तक कि वह पुरानी और अटिकाऊ नहीं हो गई और इसका स्थान एक ऐसे वहशी और खूनी युद्ध ने न ले लिया जिसमें शोषण और प्रजातीय भेदभाव के सूक्ष्म और आधुनिक तरीकों का प्रयोग किया जाता है। 1789 में फ्रांसीसी क्रांति करने वालों के बारे में भी यही कहा जा सकता है। उन्होंने स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की घोषणा की लेकिन हैती में अपने गुलामों की आजादी और इस लाभप्रद उपनिवेश की स्वतंत्रता की बात नहीं मानी। इसके विपरीत उनके दमन के असफल प्रयास के रूप में उन्होंने 30000 सैनिक भेजे। प्रबोधन के हामीदार लोगों की इच्छाओं या मंशाओं के बावजूद वास्तव में उपनिवेशवादी युग शुरू हुआ। शताब्दियों तक चला यह उपनिवेशीकरण अफ्रीका, ओशनिया और लगभग पूरे एशिया में फैल गया और इसने इंडोनेशिया, भारत और चीन जैसे विशाल देशों को भी अपने घेरे में ले लिया।
जापान के साथ व्यापार के दरवाजे बम गिराकर करके खोले गए। आज लोकतंत्र, स्वतंत्रता और देशों की आजादी के नाम पर 5 करोड़ लोगों की जान लेने वाले युध्द के बाद उसी तरह से विश्व व्यापार संगठन तथा बहुपक्षीय निवेश करार के लिए, दुनिया के वित्तीय संसाधनों पर नियंत्रण, विकासशील देशों में सरकारी कंपनियों के निजीकरण, पेटेंटों और टेक्नोलोजी पर एकाधिकार के लिए दरवाजे धमाका करके खोले जा रहे हैं। खरबों डालर का कर्ज चुकाने की मांग की जा रही है जिसे न तो कर्जदाता वसूल कर सकते हैं और न कर्जदार अदा कर सकते हैं क्योंकि ये कर्जदार अधिकाधिक गरीब तथा भूखे होते जा रहे हैं। उनका जीवन स्तर उन लोगों के जीवन स्तर से अधिकाधिक कम होता जा रहा है जो शताब्दियों तक उसके उपनिवेशवादी मालिक थे और जिन्होंने उनके बेटों और बेटियों को गुलामों के रूप में बेचा या मौत के कगार तक शोषण किया, बिलकुल उसी तरह से जैसे उन्होंने इस गोलार्ध के मूल निवासियों के साथ किया था।
यह नहीं कहा जा सकता कि 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में दुनिया को फिर से उसी तरह बांटा जा रहा है जैसे कि 19वीं शताब्दी के अंत या 20वीं शताब्दी के शुरू में बांटा गया था। आज दुनिया को बांटा नहीं जा सकता क्योंकि अब वह पूरी तरह से एक राष्ट्र के कब्जे में है जो उथल-पुथल के इस इतिहास के बाद एकमात्र महाशक्ति तथा सर्वाधिक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में उभरा है। यही कारण है कि वाशिंगटन में आखिरी शब्द या बयान की घोषणा किए जाने से पहले या इस तरह की घोषणा के समय दुनिया के लगभग सभी देशों की राजधानियां कांपने लगती हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के बारे में यदि कोई भ्रम था तो वह मुश्किल से 17 महीने पहले विनाशकारी 11 सितंबर को खत्म हो गया तथा उसकी जगह भयंकर तथा अभूतपूर्व एकतरफावाद ने ले ली है।
पिछले कुछ दिनों में मैंने यहां अपने विशिष्ट अतिथियों को विभिन्न मुद्दों पर बहुत तीखे तर्क देते हुए सुना मसलन विश्व आर्थिक संकट विशेष रूप से लैटिन अमरीका में स्थिति, एफ.टी.ए.ए., वर्तमान दुनिया में गरीब देशों के विकास में बाधाएं, सामाजिक नीतियों की भूमिका तथा इतनी अधिक और ऐसी गंभीर त्रासदियों के कारणों के बारे में इन मुद्दों द्वारा प्रकाश में लाए गए विस्तृत तथ्य। जब मैं यह सुनता हूं कि सकल घरेलू उत्पाद बढ़ा या गिरा, लगातार वृध्दि हुई और फिर रुक गई, घाटे को कम करने, संतुलन बहाल करने, नौकरियां पैदा करने, गरीबी कम करने, विकास को बढ़ावा देने, दायित्व पूरे करने के लिए निर्यात जरूरी है और जब यह कहा जाता है कि निजीकरण बहुत उपयोगी हो सकता है, विश्वास पैदा कर सकता है, किसी भी कीमत पर निवेश आकर्षित कर सकता है, प्रतिस्पर्धा पैदा कर सकता है, इत्यादि तो मेरा मन इस बात की प्रशंसा किए बगैर नहीं रहता कि किस प्रकार आधी शताब्दी से ये लोग अल्पविकास और गरीबी को दूर करने के उपाय सुझा रहे हैं।
मैंने पहले कहा था कि सभी मतों का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन इसी तरह से हमारे दिमागों में उठने वाले सवालों और संदेहों का भी सम्मान किया जाना चाहिए। हम किस तरह की रमणीय दुनिया में जी रहे हैं? न्यूनतम समानता की ऐसी स्थितियां कहां है जहां से हमें अर्थशास्त्र के स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले समाधान मिल सकें और जिनसे तीसरी दुनिया के देशों का विकास हो सके? क्या वास्तव में मुक्त स्पर्धा, संसाधनों की समान उपलब्धता या संबंधित शिल्प विज्ञानों तक सबकी पहुंच है? इन पर तो उन लोगों का एकाधिकार है जो न केवल अपनी प्रतिभाओं का फल खाते हैं बल्कि दूसरों की अर्थात ऐसे अल्पविकसित देशों से छीनी गई प्रतिभाओं का फल भी खाते हैं जिन्होंने उनके प्रशिक्षण पर अपने सीमित संसाधन लगाए हैं तथा जिन्हें इसके बदले में एक कौड़ी भी नहीं मिलती।
अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं और भारी मात्रों में फालतू निधियां किसके हाथों में हैं? बड़े बैंकों के मालिक कौन हैं? वित्तीय सट्टेबाजी, कर चोरी, बड़े पैमाने पर नशे के पदार्थों के व्यापार, भारी गबन से कमाई गई मोटी रकमें कहां कैसे और किसके द्वारा जमा कराई जाती हैं? मोबुतु तथा सरकारी धन के अन्य दर्जनों गबनकर्ताओं की निधियां कहां हैं जिन्होंने अपने पश्चिमी अभिभावकों के आशीर्वाद से अपने संसाधन और अपनी प्रभुसत्ता विदेशियों को सौंप दी? पूर्व सोवियत संघ और रूस से सैकड़ों अरब डालर कहां गायब हो गए और ऐसा उस समय कैसे हुआ जब यूरोप और अमरीका से आए सलाहकार, विशेषज्ञ और विचारक उसे पूंजीवाद का शानदार और सौभाग्यशाली मार्ग दिखा रहे थे और हर दिशा से गिध्द देश के प्राकृतिक और आर्थिक संसाधनों पर टूट रहे थे? इस तथ्य के लिए कौन जिम्मेदार है कि आज उसकी जनसंख्या घट रही है और उसकी स्वास्थ्य स्थितियोंशिशुतथा माता मृत्यु सहित की हालत खराब हो रही है तथा फासिज्म के खिलाफ लड़ने वाले इसके वृध्द स्त्री-पुरुषों सहित सभी लोग भूख तथा अत्यधिक गरीबी से ग्रस्त हैं? (क्रमशः)

रविवार, 5 सितंबर 2010

भूमंडलीकरण की महान उपलब्धि है असमानता और भेदभाव का चरमोत्कर्ष

    भूमंडलीकरण के लागू किए जाने के बाद सारी दुनिया में दो चीजों में इजाफा हुआ है वह है प्रथम असमानता और दूसरा है भेदभाव। इन दो चीजों के कारण स्थितियां पहले से भी ज्यादा जटिल हो गई हैं। प्रत्यंक राष्ट्र बहुराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के कर्जे में ढूबा हुआ है। कर्ज के काऱ विभिन्न राष्ट्र खासकर तीसरी दुनिया के देश किसी किस्म का ठोस विकास नहीं कर पा रहे हैं। फिदेल कास्त्रो का मानना था ''इस बारे में लगभग आम सहमति है कि भूमंडलीकरण के लाभ 80 प्रतिशत आबादी की कीमत पर केवल 20 प्रतिशत आबादी को मिल रहे हैं। धनी देशों और सीमांत दुनिया के बीच खाई बढ़ती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था का रूप बदलने की आवश्यकता पर भी एक मत था। ... शुल्क और गैर शुल्क पाबंदी के जरिए असमान तथा अनुचित व्यापार तीसरी दुनिया के निर्यात राजस्व को खा रहा है जिसकी वजह से कर्ज चुकाने तथा टिकाऊ आर्थिक और सामाजिक विकास करने के लिए पर्याप्त राशि नहीं बचती।'' 
   फिदेल कास्त्रो ने यह भी कहा कि '' वैज्ञानिक और तकनीकी विकास पर धनी देशों के विशिष्ट क्लब का एकाधिकार है। इसलिए वह हमारी पहुंच के बाहर है। धनी देशों का अनुसंधान केंद्रों पर नियंत्रण है, 100 फीसदी पेटेंट उनके पास हैं तथा वे ज्ञान और प्रौद्योगिकी तक हमारी पहुंच में बाधा पैदा करते हैं। दक्षिण के कुछ नेताओं ने हमारा ध्यान एक ऐसे तथ्य की ओर दिलाया है जिसका उल्लेख नव उदार नीतियों और अर्थशास्त्र संबंधी किताबों में नहीं है। यह है तीसरी दुनिया के उच्च शिक्षा प्राप्त दिमागों की शर्मनाक चोरी। उत्तरी देश उन्हें अपने आगोश में समेट रहे हैं क्योंकि दक्षिण के पास पर्याप्त अनुसंधान केंद्र नहीं है। न ही उनके पास देने के लिए इतना वेतन है जो उन्हें उन उपभोक्ता समाजों की ओर जाने से रोक सके जिन्होंने उन पर एक धेला भी खर्च नहीं किया है। इसके अतिरिक्त, पूर्व उपनिवेशवादी शक्तियों के पास या अन्य धनी देशों के विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे तीसरी दुनिया के प्रतिभाशाली युवा ग्रेजुएशन के बाद अपने देश नहीं लौटते।''
    आज की सामाजिक सच्चाई पर रोशनी डालते हुए फिदेल ने कहा आज '' करोड़ों लोगों को जीने के लिए दो डालर से कम, एक डालर से कम या कुछेक सेंट ही मिलते हैं तो यह मानना पड़ता है कि हमारी इस धरती से मानवीयता खत्म हो गई है। किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि 200 साल पहले स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के लिए क्रांति की शताब्दी और इसके बाद तेजी से हुए उद्योगीकरण तथा संचार, विज्ञान और श्रम उत्पादकता में जबर्दस्त प्रगति से युक्त हाल ही में समाप्त हुई शताब्दी के बाद हम अरबों लोगों के भूखे, कुपोषित, निरक्षर, बेरोजगार होने पर चर्चा करेंगे। इसी प्रकार अपनी उम्र के हिसाब से कम लंबाई या कम वजन वाले बच्चे हैं जिनके लिए कोई स्कूल या चिकित्सा सुविधा नहीं है या जिन्हें थका देने वाली स्थितियों में कम पैसे पर काम करना पड़ता है। हमारे देशों में शिशु मृत्यु दर धनी राष्ट्रों के मुकाबले 20 गुना अधिक है। हमारे यही स्थायी मानवाधिकार हैं।''
''हमारे युग के प्रतीक के रूप में हमारी स्मृति में एड्स से प्रभावित तीन करोड़ साठ लाख लोगों की संख्या अंकित है और जैसा कि संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने बताया है इनमें से दो करोड़ साठ लाख लोग अफ्रीका महाद्वीप में हैं। इनके इलाज के लिए प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 10000 अमरीकी डालर चाहिए। अगले बारह महीनों में इस संख्या में साठ लाख लोग और जुड़ जाएंगे।''
  फिदेल ने सवाल उठाया है कि यह सब क्यों होता है? यह सब कब तक चलेगा ? दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि '' पहले लोग अफ्रीका में नस्लभेद की बात किया करते थे। आज हम पूरी दुनिया में नस्लभेद की बात कर सकते हैं। यहां चार अरब लोग मानव के अत्यधिक बुनियादी अधिकारों अर्थात जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छ जल, भोजन, मकान, रोजगार तथा अपने और अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की आशा के अधिकारों से वंचित हैं। हम जिस गति से आगे बढ़ रहे हैं, उससे हम सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा से भी वंचित हो जाएंगे। यह हवा फिजूलखर्च उपभोक्ता समाजों द्वारा अधिकाधिक विषाक्त की जा रही है। ये जीवन के लिए आवश्यक तत्वों को दूषित कर रहे हैं और मानव के प्राकृतिक आश्रय को नष्ट कर रहे हैं। मध्य अमरीका, वेनेजुएला, मोजांबीक तथा अन्य देशोंजिनमें से लगभग सभी तीसरी दुनिया में हैंमें मुश्किल से 18 महीनों की अवधि में जो प्राकृतिक आपदाएं आई हैं उनका 20वीं शताब्दी में नाम तक नहीं सुना गया था। इन आपदाओं ने हजारों लोगों की जान ले ली। ये जलवायु परिवर्तनों और प्रकृति के विनाश का परिणाम हैं। हम यहां पर जमा हुए लोग यदि न्याय के सार्वभौमिक मानकों के साथ-साथ धरती पर जीवन की रक्षा के लिए संघर्ष शुरू करें तो गलत न होगा।''
''धनी दुनिया इस तथ्य की उपेक्षा कर रही है कि शताब्दियों तक हमारे देशों की दासता, उपनिवेशीकरण, नृशंस शोषण और लूट के कारण हम अविकसित और गरीब हैं। वे हमें घटिया राष्ट्र के रूप में देखते हैं। वे हमारी गरीबी का कारण यह बताते हैं कि अफ्रीकी, एशियाई, लैटिन अमरीकी देश अर्थात हम काली और पीली चमड़ी वाले देशी तथा मिश्रित नस्ल के लोग किसी तरह का विकास, यहां तक कि खुद पर शासन नहीं कर सकते। वे हमारी कमियां गिनाते हैं और यह भूल जाते हैं कि उन्होंने ही हमारे शुध्द तथा श्रेष्ठ लोगों में उपनिवेशवादी या शोषक की बुराइयां भरीं।''
''वे यह भी भूल जाते हैं कि जब यूरोप में ऐसे लोगों का वास था जिन्हें रोमन साम्राज्य वहशी कहता था उस समय चीन, भारत, सुदूर पूर्व, मध्य पूर्व और दक्षिणी तथा मध्य अफ्रीका में सभ्यताएं थीं और उन्होंने उन चीजों का सृजन कर दिया था जिन्हें दुनिया के अजूबे कहा जाता है। यूनानियों द्वारा पढ़ना सीखे जाने और होमर द्वारा इलियड लिखे जाने से पहले उन्होंने लिखित भाषाएं विकसित कर ली थीं। हमारे अपने गोलार्ध में माया और इंका पूर्व सभ्यताओं ने वह ज्ञान अर्जित कर लिया था जिससे आज भी दुनिया चकित रह जाती है।''
''मैं पूरे विश्वास के साथ कहता हूं कि धनी देशों द्वारा लादी गई वर्तमान आर्थिक व्यवस्था न केवल निर्दयी, अन्यायपूर्ण, अमानवीय और इतिहास के अवश्यंभावी प्रवाह के विपरीत है बल्कि मूल रूप में नस्लवादी है। इसके पीछे वही नस्लवादी विचार हैं जो किसी समय यूरोप में नाजी नरसंहार और यातना शिविरों की प्रेरणा बने थे। इन्हीं विचारों की छाया आज तीसरी दुनिया के तथाकथित शरणार्थी शिविरों में देखी जा सकती है। यहां गरीबी, भूख और हिंसा के शिकार लोगों को इकट्ठा कर दिया जाता है। ये वही नस्लवादी विचार हैं जिन्होंने अफ्रीका में विकराल नस्लभेद की व्यवस्था को प्रेरणा दी।''
    

बुधवार, 11 अगस्त 2010

भूमंडलीकरणजनित मीडिया सुधारों का तानाबाना

      किसी भी देश की मीडिया नीतियों के सुधारों को उस देश की विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों के संदर्भ में देखना चाहिए,उसी संदर्भ में भूमंडलीकरण के ''दूर से प्रभाव'' को भी देखा जा सकता है। ग्लोबलाईजेशन के संदर्भ में जब मीडिया सुधारों की बात की जाती है तो सबसे पहले विनियमन किया जाता है। प्रचलित मीडिया नीतियों के जरिए प्रसारण,प्रकाशन आदि के क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश से लेकर प्रसारण के अधिकार के मामले में जो प्रतिबंध लगे होते हैं उन्हें सिलेसिलेवार ढ़ंग से हटा लिया जाता है। हमारे देश में इसके लिए सबसे पहले टीवी प्रसारण की निजी क्षेत्र को अनुमति दी गयी,फिर प्रेस और इलैक्ट्रोनिक मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश का फैसला लिया गया।सबसे बाद में रेडियो के क्षेत्र में प्रतिबंध हटाए गए।मीडिया में विनियमन के कारण बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियों के अलावा बड़े पैमाने पर देशी इजारेदार कंपनियों ने भी मीडिया के क्षेत्र में पैसा निवेश किया है।
     मीडिया में निजी पूंजी निवेश और विनियमन का सबसे बड़ा पभाव यह हुआ है कि भारत की अस्मिता,यहां के बाशिंदों की अस्मिता को नये ढ़ंग से नए नजरिए के साथ निर्मित किया जा रहा है। विगत पन्द्रह सालों के मीडिया सुधारों ने भारत की पहचान को बदल दिया है,अब पहचान के पुराने मानक बेकार हो गए हैं।भारत की नयी पहचान ज्ञान समाज के सारथी की है।विकासमान अर्थव्यवस्था की है। एक ऐसे देश की है जिसमें सूचना तकनीकी के विकास की अनंत संभावनाएं हैं। पहले भारत की पहचान गरीब के साथ होती थी,आज संपदा के साथ होती है,टैक्नोक्रेट के साथ होती है,उद्यमियों के साथ होती है।यह भारत की अस्मिता का बदलता पैराडाइम है जिसे नए मीडिया ने रचा है।
      भारत की पहचान की धुरी है जनतंत्र,विविधता और विकास। नए मीडिया ने अपने विमर्श और इमेज बिल्डिंग का बहुत बड़ा हिस्सा इन्हीं तीन पक्षों पर खर्च किया है।एक जमाना था कि हमारे यहां विदेशी निवेश आता था,किंतु आज नया पक्ष है कि भारतीय उद्योगपति देश के बाहर बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश कर रहे हैं।यहां तक कि मीडिया में भी निवेश कर रहे हैं।
     मीडिया सुधार का दूसरा बड़ा प्रभाव पड़ा है प्रसारभारती पर। पहले सरकारी माध्यम व्यवसाय से नफरत करते थे,अब व्यवसाय ही गुरूमंत्र है।टीवी-रेडियो का पूरी तरह कॉमर्शियलाईजेशन कर दिया गया है,यहां तक कि राजनीति का भी व्यवसायीकरण हो चुका है। भारत में निजीकरण से ज्यादा कॉमर्शियलासईजेशन ज्यादा प्रभावशाली होकर सामने आया है।
      हमारे देश में निजीकरण और व्यवसायीकरण ये दो केन्द्रीय फिनोमिना के रुप में सामने आए हैं,इनमें व्यसायीकरण ज्यादा प्रभावी दिख रहा है मीडिया के संदर्भ में। इसी प्रक्रिया में समुदाय की चेतना बढ़ी है ,सामुदायिक रेडियो का जन्म हुआ है।यह सामुदायिकतावाद मूलत: मार्शल मैकलुहान के ग्लोबल विलेज की धारणा का ही प्रतिफलन है। इसीलिए 'विकासमूलक मीडिया' की बातें भी इसी संदर्भ में उठ रही हैं।
    सामुदायिक रेडियो की धारणा मूलत: वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ ऑफ कम्युनिटी रेडियो ब्रॉडकास्टरस के द्वारा विश्वभर में चलाए गए प्रचार अभियान का प्रतिफलन है। सामुदायिक रेडियो मूलत: सरकारी और व्यवसायिक प्रसारण सेवा से भिन्न है,उन दोनों का विकल्प है। भारत में आगामी दस वर्षों में ऐसे चालीस हजार रेडियो स्टेशन खुलने की संभावनाएं हैं। सामुदायिक रेडियो के खिलाफ दबाव सबसे ज्यादा सरकारों की तरफ से आ रहा है।
     मीडिया के क्षेत्र में नीतिगत प्रभाव का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है टेक्नोलॉजिकल कनवर्जेंस।बड़े पैमाने पर इस दिशा में पूंजी निवेश और नयी तकनीकी के प्रयोग की दिशा में हम आगे बढ़ चुके हैं।अब नयी मीडियम में सारे मीडियम वास्तविकता बनते जा रहे हैं। 
     कम्प्यूटर में सब मीडिया सुन,देख और पढ़ सकते हैं,मोबाइल में रेडियो,टीवी ,इंटरनेट आदि आ गया है। यह एक तरह से मीडिया और सूचना तकनीकी के बीच,माध्यम और दूरसंचार के बीच की खाई का खात्मा है।ब्रॉडकास्टिंग और टेलीकम्युनिकेशन को अलग-अलग देखने की परंपरा की विदाई है। इसे ही कहते हैं ग्लोबलाईजेशन की 'दूर से प्रभावित' करने की नीति का परिणाम। इसके अलावा सबसे बड़ा परिवर्तन यह हुआ है कि आज मीडिया में साधारण आदमी को अभिव्यक्ति के लिए पहले से ज्यादा जगह मिली है।
      मीडिया वातावरण में साधारण आदमी के लिए जगह बनना एक ऐसी परिघटना है जिसका अभी विस्तार से मूल्यांकन होना बाकी है। सवाल यह है कि क्या मीडिया सुधारों के बिना साधारण आदमी के लिए मीडिया खासकर बड़े मीडिया में जगह मिलना संभव थी ?मीडिया सुधारों के बिना यह संभव नहीं था। मीडिया सुधार हमेशा सत्ता के संरचनात्मक परिवर्तनों में सुधार के साथ ही आते हैं और इनके बिना जिंदा भी नहीं रहते। यह एक तरह से ग्लोबल मीडिया का जनतंत्र का आत्मसातकरण है,जनतंत्र को अपने अंदर समाहित कर लेने की कार्यनीति का हिस्सा है।
    मीडिया सुधारों के बाद आयी मीडिया बाढ़ ने संवाद और वैचारिक-सांस्कृतिक आदान-प्रदान की अनंत संभावनाएं पैदा की हैं।इनमें यदि वर्चस्व की विचारधारा है तो वर्चस्व विरोधी विचारधारा के लोगों के लिए भी काम करने की अनंत संभावनाएं हैं,पहले हम वर्चस्व का विरोध करने के लिए वर्चस्ववादी माध्यमों में जगह तलाशते फिरते थे और वे जगह मुश्किल से देते थे,किंतु आज यह स्थिति नहीं है आप वर्चस्व के प्रतिरोध में अपने मीडिया नेटवर्क,चैनल,रेडियो,वेबसाइड आदि का निर्माण कर सकते हैं,कहने का तात्पर्य यह है संवाद और संचार के लिए आत्मनिर्भरता बुनियादी शर्त है। पहले हमारे पास आत्मविश्वास था किंतु आत्मनिर्भर नहीं बने थे,अभिव्यक्ति का वातावरण नहीं था,आज हमारे पास आत्मविश्वास ,आत्मनिर्भरता और अभिव्यक्ति का माहौल ये तीनों चीजें हैं।
      कनवर्जेंस के बारे में जब भी चर्चा होती है तो अमूमन प्रसारण,प्रिण्टिंग और अन्य मीडिया रुपों के बारे में चर्चा करते हैं। किंतु कारपोरेट जगत के द्वारा इस क्षेत्र में जो निवेश किया जा रहा है,उसके बारे में समग्र समझ बनाने की जरुरत है। उत्तर-औद्योगिक अवस्था में पूंजीपतिवर्ग विशुद्ध इलैक्ट्रोनिक कम्युनिकेशन पर निवेश कर रहा है। वर्चुअल यथार्थ में दाखिल हो रहा है।इसके लिए ग्लोबल डिजिटल नेटवर्क बना रहा है। भौतिक वस्तुएं और सेवाएं इस दौर के संबंध और संचार का आदर्श आधार हैं।
     डिजिटल कम्युनिकेशन नेटवर्क के कारण केरीयर और कंटेंट के बीच का अंतर खत्म हो गया है। व्यक्तिगत संचार और औपचारिक प्रसारण का अंतर खत्म हो गया है। व्यापार की संस्कृति और संस्कृति का व्यापार के बीच का भेद खत्म हो गया है। प्रोडक्शन और उपभोग के बीच का अंतर खत्म हो गया है। सार्वजनिक परिवेश और व्यक्तिगत या निजी परिवेश का अंतर खत्म हो गया है।इसी तरह पहले जिस तरह संसाधन,मैन्यूफैक्चरिंग, वित्तीय,शिक्षा,मनोरंजन आदि के नाम पर जो वर्गीकरण किए हुए थे,क्षेत्र बनाए हुए थे,उन सभी का अंत हो गया है।इसके कारण बुनियादी तौर पर नए सिरे से काल और स्थान बोघ के साथ समाज को पुनर्गठित किया जा रहा है। डिजिटल नेटवर्क  मूलत: व्यापार का उपकरण है। इसकर शिलान्यास सन् 1972 में चिप्स के उदय के बाद हुआ है। यह संपदा संचय और केन्द्रीकरण लचीला उपकरण है,यह नयी विश्व अर्थव्यवस्था का हिस्सा है।वर्चुअल रियलिटी का अथ्र है कि आप कायिक तौर पर मौजूद न रहकर भी वर्चुअल उपस्थिति बना सकते हैं। वर्चुअल उपस्थिति सब जगह और सब समय बना सकते हैं।इसके लिए आपके पास सिर्फ एक डिजिटल कनेक्शन चाहिए।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...