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बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

ब्रिटिश शासन और भारत में विद्रोह- कार्ल मार्क्स


वियना से तार द्वारा आने वाले समाचार बताते हैं कि तुर्की, सारडीनिया और स्विट्जरलैंड की समस्याओं का शांतिपूर्ण ढंग से हल हो जाना वहां पर निश्चित समझा जाता है।कल रात कॉमन्स सभा में भारत पर बहस सदा की तरह नीरस ढंग से जारी रही। मि. ब्लैकेट ने आरोप लगाया कि सर चार्ल्स वुड और सर जे. हौग के वक्तव्यों में झूठी आशावादिता की झलक दिखलाई देती है। मंत्रिमंडल और डायरेक्टरों के बहुत से हिमायतियों ने अपनी शक्ति भर इस आरोप का खंडन किया, और फिर अचूक मि. ह्यूम ने बहस का सार पेश करते हुए मंत्रियों से मांग की कि अपना बिल वे वापिस ले लें। बहस स्थगित हो गई।
हिंदुस्तान एशियाई आकार का इटली है : एल्प्स की जगह वहां हिमालय है, लोंबार्डी के मैदान की जगह वहां बंगाल का सम-प्रदेश है, ऐपिनाइन के स्थान पर दकन है, और सिसिली के द्वीप की जगह लंका का द्वीप है। भूमि से उपजने वाली वस्तुओं में वहां भी वैसी ही संपन्नतापूर्ण विविधता है और राजनीतिक व्यवस्था की दृष्टि से वहां भी वैसा ही विभाजन है। समय-समय पर विजेता की तलवार इटली को जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के जातीय समूहों में बांटती रही है, उसी प्रकार हम पाते हैं कि, जब उस पर मुसलमानों, मुगलों, अथवा अंगरेजों का दबाव नहीं होता तो हिंदुस्तान भी उतने ही स्वतंत्र और विरोधी राज्यों में बंट जाता है जितने कि उसमें शहर, या यहां तक कि गांव होते हैं। फिर भी, सामाजिक दृष्टिकोण से, हिंदुस्तान पूर्व का इटली नहीं, बल्कि आयरलैंड है। इटली और आयरलैंड के, विलासिता के संसार और पीडा के संसार के, इस विचित्र सम्मिश्रण का आभास हिंदुस्तान के धर्म की प्राचीन परंपराओं में पहले से मौजूद है। वह धर्म एक ही साथ विपुल वासनाओं का और अपने को यातनाएं देने वाले वैराग्य का धर्म है। उसमें लिंगम भी है, जगन्नाथ का रथ भी। यह योगी और भोगी दोनों ही का धर्म है।
मैं उन लोगों की राय से सहमत नहीं हूं जो हिंदुस्तान के किसी स्वर्ण युग में विश्वास करते हैं; लेकिन, अपने मत की पुष्टि के लिए, सर चार्ल्स वुड की भांति, कुली खां की दुहाई मैं नहीं देता। लेकिन उदाहरण के लिए, औरंगजेब के काल को लीजिए; या उस युग को जिसमें उत्तर में मुगल और दक्षिण में पुर्तगाली प्रकट हुए थे; अथवा मुसलिम आक्रमण और दक्षिण भारत में सप्त राज्यों के काल को लीजिए; अथवा, यदि आप चाहें तो, और भी प्राचीन काल में जाइए स्वयं ब्राह्मण के उस पौराणिक इतिहास को लीजिए जो कहता है कि हिंदुस्तानियों की दु:ख-गाथा उस काल से भी पहले शुरू हो गई थी जिसमें कि, ईसाइयों के विश्वास के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति हुई थी।
लेकिन, इस बात में कोई संदेह नहीं हो सकता कि हिंदुस्तान पर जो मुसीबतें अंगरेजों ने ढाई हैं वे हिंदुस्तान ने इससे पहले जितनी मुसीबतें उठाई थीं, उनसे मूलत: भिन्न और अधिक तीव्र किस्म की हैं। मेरा संकेत उस यूरोपीय निरंकुशशाही की ओर नहीं है जिसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने एशिया की अपनी निरंकुशशाही के ऊपर लाद दिया है और जिसके मेल से एक ऐसी भयानक वस्तु पैदा हो गई है कि उसके सामने सालसेट के मंदिर के दैवी दैत्य भी फीके पड़ जाते हैं। यह ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की कोई अपनी विशेषता नहीं है, बल्कि डचों की महज नकल है। यहां तक कि यदि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के तौर-तरीकों का हम वर्णन करना चाहें तो उस वक्तव्य को शब्दश: दोहरा देना ही काफी होगा जो जावा के अंगरेज गवर्नर सर स्टैमफोर्ड रैफल्स ने पुरानी डच ईस्ट इंडिया कंपनी के संबंध में दिया था : डच कंपनी का एक मात्र उद्देश्य लूटना था और अपनी प्रजा की परवाह या उसका खयाल वह उससे भी कम करती थी जितनी कि पश्चिमी भारत के बागानों का गोरा मालिक अपनी जागीर में काम करने वाले गुलामों के दल का किया करता था, क्योंकि बागानों के मालिक ने अपनी मानव संपत्ति को पैसे खर्च करके खरीदा था, लेकिन कंपनी ने उसके लिए एक फूटी कौडी तक खर्च नहीं की थी। इसलिए, जनता से उसकी आखिरी कौड़ी तक छीन लेने के लिए, उसकी श्रमशक्ति की अंतिम बूंद तक चूस लेने के लिए कंपनी ने निरंकुशशाही के तमाम मौजूदा यंत्रों का इस्तेमाल किया था; और, इस तरह, राजनीतिज्ञों की पूरी अभ्यस्त चालबाजी और व्यापारियों की सर्व-भक्षी स्वार्थलिप्सा के साथ उसे चला कर स्वेच्छाचारी और अर्ध्द-बर्बर सरकार के दुर्गुणों को उसने पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया था।
हिंदुस्तान में जितने भी गृहयुध्द छिड़े हैं, आक्रमण हुए हैं, क्रातियां हुई हैं, देश को विदेशियों द्वारा जीता गया है, अकाल पड़े हैंवे सब चीजें ऊपर से देखने में चाहे जितनी विचित्र रूप
से जटिल, जल्दी-जल्दी होने वाली और सत्यानाशी मालूम होती हों, लेकिन वे उसकी सतह से नीचे नहीं गई हैं। पर इंगलैंड ने भारतीय समाज के पूरे ढांचे को ही तोड ड़ाला है और उसके पुनर्निर्माण के कोई लक्षण अभी तक दिखलाई नहीं दे रहे हैं। उसके पुराने संसार के इस तरह उससे छिन जाने और किसी नए संसार के प्राप्त न होने से हिंदुस्तानियों के वर्तमान दु:खों में एक विशेष प्रकार की उदासी जुड़ जाती है, और, ब्रिटेन के शासन के नीचे, हिंदुस्तान अपनी समस्त प्राचीन परंपराओं और अपने संपूर्ण पिछले इतिहास से कट जाता है।
एशिया में अनादि काल से आम तौर पर सरकार के केवल तीन विभाग होते आए हैं : वित्त का, अथवा देश के अंदर लूट का विभाग; युध्द का अथवा बाहर की लूट का विभाग; और अंत में सार्वजनिक निर्माण का विभाग। जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों के कारण विशेषकर इस कारण कि सहारा से लेकर अरब, ईरान, भारत और तार्तारी होते हुए एशिया के सबसे ऊंचे पठारों तक विशाल रेगिस्तानी इलाके फैले हुए हैंपूर्व में खेती का आधार मानव द्वारा निर्मित नहरें और जल संग्रह की व्यवस्था के द्वारा सिंचाई हो रही है। मिस्र और भारत की ही तरह मेसोपोटामिया, ईरान, आदि में भी बाग बनाकर पानी को रोकने और फिर उससे जमीन को उपजाऊ बनाने की प्रथा है; नहरों में पानी पहुंचाते रहने के लिए ऊंचे स्तर से लाभ उठाया जाता है। पानी के मिलजुल कर और किफायत के साथ खर्च करने की इस बुनियादी आवश्यकता ने पश्चिम में निजी उद्योग को स्वेच्छा से सहयोग का रास्ता अपनाने के लिए बाध्य कर दिया था, जैसा कि फ्लैंडर्स और इटली में देखने में आया था। पूर्व में, जहां सभ्यता का स्तर बहुत नीचा और भूमि का विस्तार बहुत विशाल था और इसलिए जहां सहयोगी संगठन का स्वेच्छा से बनना कठिन था, इस काम को पूरा करने के लिए सरकार की केंद्रीय शक्ति के हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी। इसलिए सभी एशियाई सरकारों पर एक आर्थिक जिम्मेदारी आ पड़ीसार्वजनिक निर्माण कार्य की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी। भूमि को उपजाऊ बनाने की यह कृत्रिम व्यवस्था, जो एक केंद्रीय सरकार पर निर्भर करती थी, और सिंचाई और आबपाशी के काम की उपेक्षा होते ही तुरंत चौपट हो जाती थी, इस विचित्र लगने वाले तथ्य का भी स्पष्टीकरण कर देती है कि पाल्मीरा, पेत्रा, यमन के भग्नावशेषों और मिस्र, ईरान और हिंदुस्तान के बड़े-बड़े सूबे जैसे वे विशाल क्षेत्र, जो कभी खेती से गुलजार रहते थे, आज हमें उजाड़ और रेगिस्तान बन गए क्यों दिखाई देते हैं। इससे यह बात भी साफ हो जाती है कि यदि एक भी विनाशकारी युध्द आ जाता है तो सदियों के लिए देश को वह किस प्रकार जनविहीन बना देता है और उसकी पूरी सभ्यता का अंत कर देता है।
अंग्रेजों ने पूर्वी भारत में अपने पूर्वाधिकारियों से वित्त और युध्द के विभागों को तो ले लिया है, लेकिन सार्वजनिक निर्माण विभाग की ओर उन्होंने पूर्ण उपेक्षा दिखलाई है। फलस्वरूप, एक ऐसी खेती, जिसे स्वतंत्र व्यवसाय और निर्बाध व्यापार के मुक्त व्यापार वाले ब्रिटिश सिध्दांत के आधार पर नहीं चलाया जा सकता था, पतन के गढ़े में पहुंच गई  है। लेकिन एशियाई साम्राज्यों में हम इस बात को देखने के काफी आदी हैं कि एक सरकार के मातहत खेती की हालत बिगडती है और किसी दूसरी सरकार के मातहत वह फिर सुधर जाती है। वहां पर फसलें अच्छी या बुरी सरकारों के अनुसार होती हैं जैसे कि यूरोप में वे अच्छे या बुरे मौसम पर निर्भर करती हैं। इस तरह, उत्पीड़न और खेती की उपेक्षा बुरी बातें होते हुए भी ऐसी नहीं थीं कि उन्हें भारतीय समाज को ब्रिटिश हस्तक्षेपकारियों द्वारा पहुंचाई गई अंतिम चोट मान लिया जातायदि, उनके साथ-साथ, एक और भी बिलकुल ही भिन्न महत्व की बात न जुड़ी होती, एक ऐसी बात जो पूरी एशियाई दुनिया के इतिहास में एक बिलकुल नई चीज थी। लेकिन, भारत के अतीत का राजनीतिक स्वरूप चाहे कितना ही अधिक बदलता हुआ दिखलाई देता हो, प्राचीन से प्राचीन काल से लेकर 19वीं शताब्दी के पहले दशक तक उसकी सामाजिक स्थिति अपरिवर्तित ही बनी रही हैं। नियमित रूप से असंख्य कातने वालों और बुनकरों को पैदा करने वाला करघा और चर्खा ही उस समाज के ढांचे की धुरी थे। अनादि काल से यूरोप भारतीय कारीगरों के हाथ के बनाए हुए बढ़िया कपड़ों को मंगाता था और उनके बदले में अपनी मूल्यवान धातुओं को भेजता था; और, इस प्रकार, वहां के सुनार के लिए वह कच्चा माल जुटा देता था। सुनार भारतीय समाज का एक आवश्यक अंग होता है। बनाव-शृंगार के प्रति भारत का मोह इतना प्रबल है कि उसके निम्नतम वर्ग तक के लोग, वे लोग जो लगभग नंगे बदन घूमते हैं, आम तौर पर कानों में सोने की एक जोडी बालियां और गले में किसी न किसी का सोने का एक जेवर अवश्य पहने रहते हैं। हाथों और पैरों की उंगलियों में छल्ले पहनने का भी आम रिवाज है। औरतें और बच्चे भी अकसर सोने या चांदी के भारी-भारी कड़े हाथों और पैरों में पहनते हैं और घरों में सोने या चांदी की देवमूर्तियां पाई जाती हैं। ब्रिटिश आक्रमणकारी ने आकर भारतीय करघे को तोड़ दिया और चर्खे को नष्ट कर डाला। इंगलैंड ने भारतीय कपड़े को यूरोप के बाजार से खदेड़ना शुरू किया; फिर उसने हिंदुस्तान में सूत भेजना शुरू किया; और अंत में उसने कपड़े की मातृभूमि को ही अपने कपड़ों से पाट दिया। 1818 और 1836 के बीच ग्रेट ब्रिटेन से भारत आने वाले सूत का परिमाण 5,200 गुना बढ़ गया। 1824 में मुश्किल से 10 लाख गज अंगरेजी मलमल भारत आती थी, लेकिन 1837 में उसकी मात्रा 6 करोड़ 40 लाख गज से भी अधिक पहुंच गई। लेकिन, इसी के साथ-साथ, ढाका की आबादी 1,50,000 से घटकर 20,000 ही रह गई। भारत के जो शहर अपने कपड़ों के लिए प्रसिध्द थे, उनका इस तरह अवनत हो जाना ही इसका सबसे भयानक परिणाम नहीं था। अंगरेजी भाप और विज्ञान ने सारे हिंदुस्तान में खेती और उद्योग की एकता को नष्ट कर दिया।
पूर्व की सभी कौमों की तरह, हिंदुस्तानी एक ओर तो अपने महान सार्वजनिक निर्माण कार्यों को, जो उनकी खेती और व्यापार के मुख्य आधार थे, केंद्रीय सरकार के हाथों में छोड़े रहते थे; दूसरी तरफ, सारे देश में वे उन छोटे-छोटे केंद्रों में बिखरे रहते थे जिन्हें खेती और उद्योग-धंधों की घरेलू एकता ने कायम कर रखा था। इन दो परिस्थितियों ने एक विशेष प्रकार की सामाजिक व्यवस्था को, उस तथाकथित ग्रामीण व्यवस्था को जन्म दिया था जो अनादि काल से चली आ रही है। इस व्यवस्था ने इनमें से प्रत्येक छोटे संघ (केंद्र) को एक स्वतंत्र संगठन और खास तरह का जीवन प्रदान कर रखा था। इस व्यवस्था का अनोखा रूप कैसा था इसे नीचे दिए गए वर्णन से जाना जा सकता है। यह वर्णन भारत के मामलों पर ब्रिटेन की कॉमन्स सभा की एक पुरानी सरकारी रिपोर्ट से लिया गया है : भौगोलिक दृष्टि से, गांव देहात का एक ऐसा हिस्सा होता है जिसमें कुछ सौ या हजार एकड़ उपजाऊ और ऊसर जमीन होती है; राजनीतिक दृष्टि से, वह एक शहर या कसबे के समान होता है। ठीक से व्यवस्थित होने पर उसमें निम्न प्रकार के अफसर और कर्मचारी होते हैं : पटेल, अर्थात मुखिया, जो आम तौर पर गांव के मामलों की देखभाल करता है, उसके निवासियों के आपसी झगड़ों का निपटारा करता है, पुलिस की देख-रेख करता है, और अपने गांव के अंदर मालगुजारी वसूल करने का काम करता है। यह काम ऐसा है जिसके लिए उसका व्यक्तिगत प्रभाव और परिस्थितियों और लोगों की समस्याओं के संबंध में उसकी सूक्ष्म जानकारी उसे खास तौर से सबसे अधिक उपयुक्त व्यक्ति बना देती है। कातिब (पटवारी) खेती का हिसाब-किताब रखता है और उससे संबंधित हर चीज को अपने कागजों में दर्ज करता है। तालियर (चौकीदार) और तोती (दूसरी तरफ का चौकीदार)इनमें से तालियर का काम अपराधों और जुर्मों का पता लगाना और एक गांव से दूसरे गांव जाने वाले यात्रियों को वहां तक पहुंचाना और उनकी रक्षा करना होता है; तोती का काम गांव के अंदरूनी मामलों से अधिक जुड़ा हुआ मालूम होता है, अन्य कामों के साथ-साथ वह फसलों की चौकीदारी करता है और उन्हें मापने में मदद देता है। सीमा-कर्मचारी, जो गांव की सीमाओं की रक्षा करता है, अथवा कोई विवाद उठने पर उसके संबंध में गवाही देता है। तालाबों और सोतों का सुपरिंटेंडेंट खेती के लिए पानी बांटता है। ब्राह्मण गांव की ओर से पूजा करता है। स्कूल मास्टर रेत के ऊपर गांव के बच्चों को पढ़ना और लिखना सिखाता हुआ दिखलाई देता है। पत्र वाला ब्राह्मण, अथवा ज्योतिषी आदि भी होता है। ये अधिकारी और कर्मचारी ही आम तौर से गांव का प्रबंध करते हैं। लेकिन देश के कुछ भागों में इस प्रबंधव्यवस्था का विस्तार इतना नहीं होता; ऊपर बताए गए कर्तव्यों और कार्यों में से कुछ एक ही व्यक्ति को करने पड़ते हैं। दूसरे भागों में इन अधिकारियों और कर्मचारियों की तादाद ऊपर गिनाए गए व्यक्तियों से भी अधिक होती है। इसी सरल म्युनिसिपल शासन के अंतर्गत इस देश के निवासी न जाने कब से रहते आए हैं। गांवों की सीमाएं शायद ही कभी बदली गई हों; और यद्यपि गांव स्वयं कभी-कभी युध्द, अकाल अथवा महामारी से तबाह और बर्बाद तक हो गए हैं, लेकिन उनके वही नाम, वही सीमाएं, वही हित, और यहां तक कि वही परिवार युगों-
युगों तक कायम रहे हैं। राज्यों के टूटने और छिन्न-विच्छिन्न हो जाने के संबंध में निवासियों ने कभी कोई चिंता नहीं की। जब तक गांव पूरा का पूरा बना रहता है, वे इस बात की परवाह नहीं करते कि वह किस सत्ता के हाथ में चला जाता है, या उस पर किस बादशाह की हुकूमत कायम होती है। गांव की अंदरूनी आर्थिक व्यवस्था अपरिवर्तित ही बनी रहती है। पटेल अब भी गांव का मुखिया बना रहता है, और अब भी वही छोटे न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट की तरह गांव से मालगुजारी वसूल करने अथवा जमीन को उठाने का काम करता रहता है।
सामाजिक संगठन के ये छोटे-छोटे एक ही तरह के रूप अब अधिकतर मिट गए हैं, और मिटते जा रहे हैं। टैक्स इकट्ठा करने वाले अंगरेज अफसरों और अंगरेज सिपाहियों के पाशविक हस्तक्षेप के कारण वे इतने नहीं मिटे हैं जितने कि अंगरेजी भाप और अंगरेजी मुक्त व्यापार की कारगुजारियों के कारण। गांवों में रहने-सहने वाले उन परिवारों का आधार घरेलू उद्योग थे। हाथ से सूत बुनने, हाथ से सूत कातने और हाथ से ही खेती करने के उस अनोखे संयोग से उन्हें आत्मनिर्भरता की शक्ति प्राप्त होती थी। अंगरेजों के हस्तक्षेप ने सूत कातने वाले को लंकाशायर में और बुनकर को बंगाल में रख कर, या हिंदुस्तानी सूत कातने वाले और बुनकर दोनों का सफाया करकेउनके आर्थिक आधार को नष्ट करकेइन छोटी-छोटी अर्ध्द बर्बर, अर्ध्द सभ्य बस्तियों को छिन्न-विछिन्न कर दिया है और इस तरह उसने एशिया की महानतम और सच कहा जाए तो एकमात्र सामाजिक क्रांति कर डाली है।
यह ठीक है कि उन असंख्य उद्योगशील पितृसत्तात्मक और निरीह सामाजिक संगठनों का इस तरह टूटना और टुकडाें-टुकड़ों में बिखर जाना विपत्तियों के सागर में पड़ जाना, और साथ ही साथ उनके व्यक्तिगत सदस्यों द्वारा अपनी प्राचीन सभ्यता और जीविका कमाने के पुश्तैनी साधनों को खो बैठना निस्संदेह ऐसी चीजें हैं जिनसे मानव-भावना अवसाद में डूब जाती है; लेकिन, हमें यह न भूलना चाहिए कि, ये काव्यमय ग्रामीण बस्तियां ही, ऊपर से वे चाहे कितनी ही निर्दोष दिखलाई देती हों, पूर्व की निरंकुशशाही का सदा ठोस आधार रही हैं, कि मनुष्य के मस्तिष्क को उन्होंने संकुचित से संकुचित सीमाओं में बांधे रखा है जिससे वह अंधविश्वासों का असहाय साधन बन गया है, परंपररागत रूढियों का गुलाम बन गया है और उसकी समस्त गरिमा और ऐतिहासिक ओज उससे छिन गया है। उस बर्बर अहमन्यता को हमें नहीं भूलना चाहिए जो, अपना सारा ध्यान जमीन के किसी छोटे से टुकड़े पर लगाए हुए, साम्राज्यों को टूटते-मिटते, अवर्णनीय अत्याचारों को होते, बड़े-बड़े शहरों की जनसंख्या का कत्लेआम होते चुपचाप देखती रही। इन चीजों की तरफ देखकर उसने ऐसे मुंह फिरा लिया है जैसे कि वे कोई प्राकृतिक घटनाएं हों। वह स्वयं भी हर उस आक्रमणकारी का असहाय शिकार बनती रही है जिसने उसकी तरफ किंचित भी दृष्टिपात करने की परवाह की है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दूसरी तरफ, इसी प्रतिष्ठाहीन, गतिहीन और सर्वथा जड़ जीवन ने, उस तरह के निष्क्रिय अस्तित्व ने, अपने से बिलकुल भिन्न, विनाश की अनियंत्रित, उद्देश्यहीन, असीमित शक्तियों को भी जगा दिया था, और मनुष्य-हत्या तक को हिंदुस्तान की एक धार्मिक प्रथा बना दिया था। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन छोटी-छोटी बस्तियों को जात-पांत के भेदभावों और दासता की प्रथा ने दूषित कर रखा है, कि मनुष्य को परिस्थितियों का सर्वसत्ताशाली स्वामी बनाने के बजाए उन्होंने उसे बाह्य परिस्थितियों का दास बना दिया है, कि अपने आप विकसित होने वाली एक सामाजिक सत्ता को उसने एक कभी न बदलने वाला स्वाभाविक प्रारब्ध का रूप दे दिया है और, इस प्रकार उसने एक ऐसी प्रकृति-पूजा को प्रतिष्ठित कर दिया है जिसमें मनुष्य अपनी मनुष्यता खोता जा रहा है। इस मनुष्य का अध:पतन इस बात से भी स्पष्ट हो रहा था कि प्रकृति का सर्वसत्ताशाली स्वामी मनुष्य घुटने टेककर बानर हनुमान और गऊ शबला की पूजा करने लगा था।
यह सच है कि हिंदुस्तान में इंग्लैंड ने निकृष्टतम उद्देश्यों से प्रेरित होकर सामाजिक क्रांति की थी और उपने उद्देश्यों को साधने का उसका तरीका भी बहुत मूर्खतापूर्ण था। लेकिन सवाल यह नहीं है। सवाल यह है कि क्या एशिया की सामाजिक अवस्था में एक बुनियादी क्रांति के बिना मानव-जाति अपने लक्ष्य तक पहुंच सकती है? यदि नहीं, तो मानना पड़ेगा कि इंगलैंड के चाहे जो गुनाह रहे हों, उस क्रांति को लाने में वह इतिहास का एक अचेतन साधन था।
(25 जून 1853 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, संख्या 3804, में प्रकाशित हुआ।)





शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

किसान ज्ञान परंपरा- झारखंड के किसान -स्वामी सहजानंद सरस्वती

    बिहार प्रान्त को असल में 'बिहार और छोटानागपुर' के नाम से ही पुकारा जाता है। यों कभी-कभी संक्षेप में केवल 'बिहार' भी कह देते हैं। जब उड़ीसा का सम्‍बन्‍ध बिहार से था तब तो 'बिहार और उड़ीसा' अकसर कहा जाता था। मगर उड़ीसा के अलग हो जाने के बाद केवल 'बिहार' के बजाए 'बिहार और छोटानागपुर' कहना ही उचित प्रतीत होता है। यों तो उड़ीसा के मिले रहने पर भी कभी-कभी केवल 'बिहार' ही कहते थे। चाहे जो भी हो, छोटानागपुर का महत्‍व काफी है और जान या अनजान में इसकी याद हमेशा बनी रही है।

    बात असल यह है कि इस प्रान्त के कुल सोलह जिलों में सिर्फ सारन, चम्पारन, दरभंगा, मुजफ्फरपुर और पूर्णिया यही पाँच ऐसे हैं जहाँ पहाड़ नहीं हैं। शेष ग्यारह में तो कमोबेश पहाड़ पाए ही जाते हैं। यह ठीक है कि छोटानागपुर के पाँच जिलों पलामू, राँची, हजारीबाग, मानभूम और सिंहभूमतथा संथाल परगना, इन छह जिलों की भूमि जिस प्रकार पार्वत्य या पहाड़मयी है वैसी गया, मुंगेर आदि की नहीं है। ये छह तो पहाड़ों और जंगलों से घिरे हैं। मगर गया वगैरह के कुछ ही हिस्से पहाड़ी हैं। फिर भी यह बात सही है कि ये जिले भी अपने भीतर कुछ न कुछ जंगल और पहाड़ रखते ही हैं। पटना जिले में ही सबसे कम पहाड़ और जंगल हैं। इस प्रकार जंगलों की प्रधानता का खयाल करके ही पलामू आदि छह जिलों को बहुत पहले से झारखंड कहते चले आते हैं। बाकी जो ग्यारह जिले बच जाते हैं उनमें या तो जंगल पहाड़ ही नहीं, या बहुत ज्यादा नहीं हैं। यह भी बात है कि उनमें बौद्धकाल में बौद्ध भिक्षुओं के रहने और पढ़ने आदि के लिए जगह-जगह मठ या मकान प्राय: बने रहते थे जिन्हें बौद्ध सम्प्रदाय में विहार कहते हैं। इसीलिए वे ग्यारह जिले विहार कहे जाने लगे। असल में तो इस लम्बे सूबे को दो भागों में बाँटकर जैसे जंगली भाग को झारखंड कहते थे वैसे ही दूसरे भाग को विहार खंड ही कहना उचित था। मगर जाने क्यों केवल 'विहार' ही कहा जाता था।

    इस प्रकार बिहार या विहार खंड और झारखंड के नाम से दो भागों में बँटे इस सूबे में विहार खंड के किसानों की दशा सुधारने की कोशिशें तो इध्‍यानर बहुत हुई हैं। मगर यह बात झारखंड के बारे में नहीं हुई है। बिहार प्रान्तीय किसान सभा ने भी उतना ध्‍यान इस ओर नहीं दिया है जितना विहार खंड की ओर। फलत: और तो और, बाहरी लोगों को यहाँ के किसानों की समस्याओं तथा मुसीबतों की जानकारी तक प्राय: हुई नहीं! थोड़ी बहुत टूटी-फूटी बातें ही लोग जानते हैं। कभी-कभी कोई उथल-पुथल हो जाने पर ही कुछ नई बातें मालूम हो पाती हैं। जिसे पक्की और ब्यौरे की जानकारी कहते हैं वह तो फिर भी नहीं होती। वहाँ के असली निवासी, जिन्हें आदिवासी भी कहते हैं, आमतौर से मूक जैसे हैं। पढ़ने-लिखने की तो बात ही जाने दीजिए। उनकी भाषा ऐसी है कि दूसरे लोग समझी नहीं सकते। उनके रस्मोरिवाज भी निराले ही हैं। वे सीधे भी हद से ज्यादा हैं।
यह प्रान्त तो बड़ा है नहीं। कुल सोलह जिले हैं। जनसंख्या भी प्राय: साढ़े तीन (36340000) करोड़ ही है। मगर जहाँ तक किसानों की बात है, यहाँ तीन तरह के काश्तकारी कानून लागू हैं। बिहार काश्तकारी कानून Bihar Tenancy Actसिर्फ विहार खंड के दस जिलों में ही लागू है। उसका ताल्लुक झारखंड से ही नहीं। झारखंड में भी दो कानून हैं। संथाल परगनाको छोड़ बाकी पाँच जिलों में छोटानागपुर काश्तकारी कानून Chotanagpur Tenancy Act—प्रचलित है और उसी के अनुसार वहाँ काम होता है। मगर संथाल परगनाकी तो बात ही निराली  हलत मुरारेस्तृतीय: पन्था: है। इन दोनों में एक भी वहाँ लागू नहीं है। उस जिले के लिए एक तीसरी ही कानूनी व्यवस्था है जिसे संथाल परगना मैनअल Santhal Pargana Manualकहते हैं। उसी के अनुसार वहाँ का इन्तजाम होता है। यह मैनुअल भी बना है ज्यादातर 1872 और 1886 के नियम कायदों (Regulations) के आधार पर ही। झारखंड की पेचीदगी इसीलिए और भी बढ़ जाती है।

    बदकिस्मती की बात यह भी है कि वहाँ के मूल निवासियों का नेतृत्व दूसरों के ही हाथ में है। ईसाइयों के जाने कितने ही मिशन वहाँ बहुत दिनों से काम करते हैं। उनने ईसाइयत का प्रचार भी वहाँ काफी किया है। अतएव एक तो वही लोग वहाँ के किसानों का नेतृत्व करते आए हैं। उनके सिवाय समय-समय पर सूबे के उत्तारी भाग या विहार खंड से भी पढ़े-लिखे सूदखोर बनिए या व्यापारी लोग वहाँ समय-समय पर बसते गए हैं। वकील, मुख्तार या और तरह के पढ़े-लिखे लोग, या तो वही हैं या बंगाली। अबरक, कोयला, लोहा वगैरह के कारबार और लाह या लकड़ी के रोजगार के सिलसिले में भी सभी तरह के लोग भारत के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों से भी आके वहाँ बस गए हैं। इसलिए स्वभावत: ऐसे लोग उन गरीबों के अगुवा बनने की कोशिश करते हैं। कांग्रेस जैसी प्रभावशाली संस्था के जितने प्रमुख नेता झारखंड में हैं वे सभी बाहर वाले ही हैं।

    आदिवासी आन्दोलन के रूप में आज एक संस्था वहाँ खड़ी हो गई है सही और उसका नेतृत्व भी आदिवासियों के हाथ में ही बताया जाता है। कई ऐसे लोग भी हैं जो आदिवासी ही हैं और किसान सभा के नाम पर उनने एक संस्था भी बना ली है। मगर उनका नेतृत्व निहायत लचर और अवसरवादी है। वे किसानों को उठाना नहीं चाहते। किन्तु अपना काम निकालना चाहते हैं। आदिवासी आन्दोलन की कमी यह है कि शुद्ध मध्‍यमवर्गीय ढंग से ही चालू हो रहा है। यदि वह किसानों के वर्ग स्वार्थों के ही आधार पर चालू होता तो उसमें अपार शक्ति आ जाती और वह सचमुच झारखंडवासियों का निस्तार ही कर देता।

    यही कारण है कि असलियत का पता नहीं लग पाता और घपले बढ़ गए हैं। मैं शुद्ध किसान हित के खयाल से ही वहाँ की स्थिति पर प्रकाश डालना चाहता हूँ ताकि उस अन्‍धेरीगुफा की झाँकी हमें मिले। हमें और हमारे कार्यकर्ताओं को सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वहाँ के निवासियों के अभाव-अभियोगों को जानते ही नहीं। वहाँ के काश्तकारी कानून की खास बात क्या है और उसमें क्या कमी है यह बात हमें मालूम नहीं। फिर उसके सुधार का आन्दोलन भी किया जाए तो कैसे? बाहरी लोगों की दृष्टि से वहाँ के काश्तकारी कानून में पेचीदगियाँ हैं। कांग्रेसी मंत्रियों के समय वहाँ का कानून भी बहुत कुछ सुधारा गया ठीक बिहार के काश्तकारी कानून के ही ढंग पर। मगर कितने मेम्बरों ने असेम्बली में उसे समझा भी, यह एक सवाल है। सिर्फ रस्मअदाई के खयाल से या दो-चार लोगों के कहने से ही जो कानून बने उससे हम लोगों का फायदा कहाँ तक कर सकते हैं? बिहार के कितने कांग्रेसी नेता हैं जो उन कानूनों को समझते हैं।

    जब तक हम वहाँ की असली परिस्थिति न जानें, लोगों की सबसे चुभने वाली माँगों की हमें पूरी जानकारी न हो, सरकारी महकमे वहाँ कैसे काम करते हैं, कचहरियाँ कहाँ तक किस तरह उन गरीबों के साथ मौजूदा कानून के अनुसार भी न्याय कर पाती हैं, इत्यादि बातें हम न समझें उनके लिए कुछ भी कर सकते हैं क्या और कैसे? आदिवासियों की भाषा न तो हाकिम समझते और न दूसरे ही लोग। बाहरी वकील, मुख्तार भी सिर्फ कामचलाऊ बातें ही जानते हैं। नतीजा यह होता है कि वे बेचारे बहुत बार नाहक लद जाते हैं। अंग्रेजी कानूनों की पेचीदगियाँ वे क्या जानने गए? यदि जानते तो बचाव का रास्ता भी निकालते। इधर तो उन्हें पता ही नहीं है उधर सख्त से सख्त सजाएँ उन पर लद जाती हैं। जेल में रहके उनसे बातें करने और उनके साथ बार-बार हिलने-मिलने पर पता चलता है कि वे किस बला में फँस गए हैं। अपने पक्ष का सबूत उनके पास मौजूद है सही। फिर भी ठीक समय पर या कायदे के मुताबिक वे हाकिम के सामने पेश न कर सके और लद गए! मगर वे इन कायदे-कानूनों को जानने क्या गए? उन्हें किसने ये बातें सिखाने की कोशिश कीं? कानून बनते हैं अंग्रेजी में और आदि जनता की तो बात ही नहीं, उनके जो खास सदस्य असेम्बली में चुने गए हैं उनमें शायद ही एकाध अंग्रेजी जानते हैं। बाकियों की तो हालत ज्यादातर 'लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर' जैसी ही है। थोड़ी-बहुत हिन्दी जानने से भी काम तो नहीं चलता।

    ऐसी दशा में आगे जो कुछ लिखा जाएगा वह सबों की जानकारी के ही लिए। किसी दल या पार्टी या सम्प्रदाय के खंडन-मंडन से हमारा मतलब नहीं है। हमें तो अपना काम करना है। यदि हम झारखंड की जनता की और खासकर वहाँ के किसानों की कुछ भी सच्ची सेवा करना चाहते हैं तो सबसे पहले उस क्षेत्र की, उस अन्‍धेरी गफा no man's land की झाँकी लगाना और परिस्थिति समझ लेना जरूरी है। नहीं तो भटक जाने की पूरी सम्भावना है। वैसी हालत में केवल दो-चार ऊपरी बातों से ही हम सन्तोष कर के तह में घुसने की कोशिश करी नहीं सकते हैं। कहा नहीं जा सकता कि हमें इसमें सफलता कहाँ तक मिलेगी।



सेण्ट्रल जेल, हजारीबाग   स्वामी सहजानन्द सरस्वती

नवम्बर दिवस, शुक्रवार 7.11.41

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

9अक्टूबर को चे का स्मृति दिवस- महान क्रांतिकारी चेग्वारा की विरासत -4- फिदेल कास्त्रो

    हम शिक्षा के बारे में यूनेस्को के अध्ययन से संबंधित आंकड़ों को देख रहे थे। हमने पाया कि हमारे देश में ग्रामर स्कूलों की चौथी और पांचवीं कक्षा के छात्रों का भाषा और गणित ज्ञान लैटिन अमरीका के शेष देशों के इस उम्र के बच्चों के ज्ञान से दुगुना है। लैटिन अमरीका ही नहीं बल्कि अमरीका से भी अधिक है ।
मैं ऐसे देश में बोल रहा हूं जहां शिक्षा और संस्कृति का स्तर बहुत ऊंचा है। मैं अर्जेंटीना के लोगों और उनके ज्ञान के विषय में जानता हूं। आज हमारे देश का स्तर बहुत ऊँचा है लकिन अर्जेंटीना उन चार या पांच देशों में से है जो कि हमारे स्तर के नजदीक हैं। लेकिन हमें इस बात से बहुत खुशी हुई कि भाषा और गणित पर हमारे ग्रामर स्कूलों के छात्रों का अधिकार दुनिया के सर्वाधिक विकसित देशों के मुकाबले कहीं अधिक अच्छा है।
इस प्रकार हमारे देश की यह स्थिति है।
    हमारे देश में जीवन के पहले वर्ष शिशु मृत्यु दर प्रति हजार प्रसव 7 से कम है। पिछले साल यह 6.5 थी और उससे पहले साल 6.2 थी। हम इसे और नीचे लाने की कोशिश कर रहे हैं। हम यह भी नहीं जानते कि उष्णकटिबंधी देश में इसे कम किया जा सकता है क्योंकि कई तत्व काम करते हैं। जलवायु का प्रभाव होता है। आनुवंशिक तत्व होते हैं। और भी कई तत्व हैं जैसे कि स्वास्थ्य सुविधा, पोषण आदि। हमें इसे 10 से कम लाने की उम्मीद नहीं थी। इसके इतने नीचे आने से हम बहुत प्रोत्साहित हुए हैं।
सबसे अच्छी दरें केवल राजधानी में नहीं है। पूरे प्रांतों में शिशु मृत्यु दरें पांच से कम है। पूरे देश में न्यूनाधिक ये ही दरें हैं। यहां हमारे उत्तरी पड़ोसी जैसी स्थिति नहीं है। वहां तो जिन इलाकों में लोगों के पास अधिक संसाधन, बेहतर स्वास्थ्य सुविधा और बेहतर पोषक तत्व आदि हैं वहां यह दर चार या पांच है, लेकिन अमरीका की राजधानी सहित जिन इलाकों में बहुत गरीब लोग और अमरीकी अफ्रीकी जैसे प्रजाति समूह रहते हैं, जिन्हें पर्याप्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहां यह दर आवश्यक सेवाओं से संपन्न इलाकों के मुकाबले तीन गुना, चार गुना, यहां तक कि पांच गुना अधिक है।
हम हिस्पानिक अमरीकियों, अफ्रीकी अमरीकियों तथा यहां आए दुनिया के दूसरे हिस्सों के लोगों की स्थिति से वाकिफ हैं, उनकी शिशु मृत्यु दरें, उनकी जीवन प्रत्याशा दरें, उनके स्वास्थ्य संकेतक। हम यह भी जानते हैं कि अमरीका में चार करोड़ लोगों का चिकित्सा बीमा नहीं है।
अमरीकी अवाम के प्रति मेरे मन में कोई घृणा नहीं है क्योंकि हमारी क्रांति ने हमें घृणा नहीं सिखाई है। हमारी क्रांति विचारों पर आधारित है कट्टरपन या उग्र राष्ट्रीयता पर नहीं । हमें यह शिक्षा मिली है कि हम सब भाई बहन हैं। हमारे लोगों को दोस्ती और भाईचारे की भावनाओं की शिक्षा मिली है। हमारे विचार से यही अंतर्राष्ट्रीय भावनाएं होनी चाहिए ।
हमारे लाखों क्यूबाई साथी इसी विचारधारा से गुजरे हैं। इसीलिए मैं कहता हूं कि क्रांति को समाप्त करना इतना आसान नहीं है। हमारे लोगों की इच्छाशक्ति को कुचलना इतना आसान नहीं है क्योंकि उसके पीछे विचारों, अवधारणाओं और भावनाओं की ताकत है। विचारों और भावनाओं को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। हमारे हर कर्म के पीछे यही सच्चाई होती है। जिस अवाम ने ज्ञान के कुछ निश्चित स्तर प्राप्त कर लिए हैं, मुद्दों को समझने की एक निश्चित क्षमता अर्जित कर ली है और जिसमें एकता और अनुशासन की क्षमता है उसे धरती से मिटाना इतना आसान नहीं है । यही कारण है कि इन नाजीवादी-फासीवादी सिध्दांतों के बावजूद हमारा यह पक्का विश्वास है कि हमारे देश पर हमले के लिए उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। हमारे लोग कभी आत्मसमर्पण नहीं करेंगे। वे कभी भी युद्ध के पीछे नहीं हटेंगे । लड़ने में सक्षम एक भी स्त्री या पुरुष जब तक जीवित है वह लड़ता रहेगा।
हम अपने शत्रु के बारे में दशकों से जानते हैं। इसलिए हमारे देश ने अपनी रक्षा करना सीख लिया है। हमारा देश दूसरे देशों पर बम नहीं गिराता और न ही शहरों पर बमबारी के लिए हजारों जहाज भेजता है। हमारे पास परमाणु, रासायनिक या जैव हथियार नहीं हैं । हमारे देश के हजारों वैज्ञानिकों और डॉक्टरों को जीवन बचाने का दर्शन सिखाया गया है । हमारे किसी डॉक्टर या वैज्ञानिक को मानवों की हत्या करने में सक्षम कोई बैक्टीरिया या जीवाणु पैदा करने के लिए कहना उसके संस्कारों के विपरीत होगा।
क्यूबा पर जैव हथियारों के लिए अनुसंधान करने के आरोप लगाए गए। हमारे देश में आनुवंशिक इंजीनियरिंग तकनीकों से उत्पन्न टीकों के जरिए मेनिंजोकोकल मेनिनजाइटिस और हेपाटाइटिस जैसी भयंकर बीमारियों का इलाज करने के लिए अनुसंधान किया जाता है या मोलिक्यूलर प्रतिरक्षा अथवा इलाज के लिए खोज की जाती है। इस तरह की तकनीकी भाषा के प्रयोग के लिए आप मुझे क्षमा करें। इन विधियों से घातक कोशिकाओं पर सीधे-सीधे आघात किया जाता है। कुछ बीमारियों को रोकते हैं और कुछ उनका इलाज करते हैं। हम इस दिशा में प्रगति कर रहे हैं। हमारे डॉक्टरों और अनुसंधान केंद्रों के लिए यह गर्व की बात है।
क्यूबा के हजारों डॉक्टरों ने धरती पर दूरदराज के तथा असत्कारशील स्थानों में अंतर्राष्ट्रीय मिशनों के लिए अपनी सेवाएं दी हैं। मैंने एक बार कहा था कि हमारा देश दुनिया के किसी अंधेरे कोने पर पूर्व हमले नहीं करेगा। इसके विपरीत हमने दुनिया के सबसे अधेरे कोने में सबसे अधिक जरूरी डॉक्टर भेजे हैं । बम नहीं बल्कि डॉक्टर, समझदार हथियार या कहिए अचूक हथियार क्योंकि जो हथियार कपट करके मारता है वह समझदार नहीं हो सकता, बल्कि डॉक्टर ।
जैसा कि आप, यहां मौजूद छात्र देख रहे हैं, मैंने उन मुद्दों पर बात की है जो हमारी क्रांति के लिए गर्व के बड़े स्रोत हैं। कुछ लोग हैं जो यह कहते हैं कि क्यूबा ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अच्छा कार्य किया है,शुक्र है कि कुछ तो माना। वे यह भी मानते हैं कि खेलों का भी अच्छा विकास हुआ है। और मैं जानता हूं कि आप बहुत बड़े खेल प्रेमी हैं और यह 'ओले-ओले' एक खास खेल से जुड़ा है ।जिसके आप ब्राजील के साथ चैंपियन हैं । लेकिन उन्हें शीघ्र ही यह भी कहना होगा कि क्यूबा संस्कृति और कला के क्षेत्र में भी बहुत आगे बढ़ रहा है । और हम कलावादी संस्कृति के पीछे नहीं हैं बल्कि व्यापक सामान्य संस्कृति और ज्ञान को अपना रहे हैं।
अपने देश के बारे में कुछ और छोटी-छोटी बातें मैं आपको बताना चाहता हूं। पिछले तीन सालों में विश्वविद्यालयों की संख्या काफी बढ़ी है।...पहले केवल एक मेडिकल स्कूल हुआ करता था अब 22 मेडिकल स्कूल हैं। इनमें से एक का नाम लैटिन अमरीकन मेडिकल स्कूल है जिसमें लैटिन अमरीका के सब देशों से लगभग 7000 छात्र हैं। बाद में इनकी संख्या बढ़ाकर 10000 कर दी जाएगी (करतल ध्वनि)। हम जानते हैं कि अमरीका में विश्वविद्यालय शिक्षा विशेषकर मेडिकल स्कूल में शिक्षा के लिए एक व्यक्ति को 2 लाख डालर अदा करने पड़ते हैं ।
कई साल पहले बने इस स्कूल से जब 10000 छात्र अपनी शिक्षा पूरी कर लेंगे तो केवल इसी क्षेत्र में तीसरी दुनिया के देशों को हमारा योगदान दो अरब डालर के बराबर हो जाएगा। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि कोई देश अच्छे विचारों के मार्ग पर चलता है तो भले ही वह गरीब हो, बहुत चीजों को कर सकता है ।
इस देश की 44 साल से नाकाबंदी चल रही है। समाजवादी खेमा, जो खरीद और वाणिज्य के जरिए हमारा प्राथमिक व्यापार साझीदार और आपूर्तिकर्ता था, के पतन हो जाने के बाद साम्राज्यवाद ने अपने आर्थिक उपाय शुरू कर दिए जिन्हें टोरिसेली और हेम्सबर्टन एक्टों द्वारा और कड़ा कर दिया गया ।
इसके अलावा एक और आपराधिक कानून है जिसे हम कातिल क्यूबन एडजस्टमेंट एक्ट कहते हैं। यह दुनिया के केवल एक देश पर लागू होता है और वह है क्यूबा। यदि कोई अपने आपराधिक रिकार्ड या अन्य किसी कारण से वीजा पाने का हकदार नहीं है तो वह यदि किसी नाव को चुराकर या जहाज का अपहरण करके या अन्य किसी माध्यम से अमरीका पहुंच जाता है तो उसे स्वत: ही अमरीका में निवास मिल जाता है और उसे अगले दिन से ही काम करने का प्राधिकार मिल जाता है।यह बात ध्यान से सुनें। मैक्सिको और अमरीका की सीमा पर हर साल 500 आदमी मरते हैं और उनकी मौत बड़ी भयानक होती है। मैक्सिको के साथ एक संधि की गई है या उस पर लादी गई जिसका नाम है नार्थ अमरीकन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट या नाफ्टा। इस करार में पूंजी और वस्तुओं की मुक्त आवाजाही की तो अनुमति है लेकिन मानवों की नहीं । इस बीच उन्होंने हमारे देश पर यह एडजस्टमेंट एक्ट लागू कर दिया है। यह कातिल कानून है और हम नहीं चाहते कि यह दूसरों पर लागू हो। लेकिन हम इस बात पर कायम हैं कि जो हरेक किसी पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हैं और क्यूबा पर तो यह आरोप घृणित बदनामी और शर्मनाक तथा हास्यास्पद झूठों के जरिए लगाया जाता है, वे सभी मानवों को यह अधिकार दें। इस सीमा पर सैकड़ों मैक्सिकोवासी और लैटिन अमरीकी मारे जाते हैं। यहां हर साल इतने व्यक्ति मरते हैं जितने बर्लिन की दीवार के 29 साल के अस्तित्व में भी नहीं मरे ।
उन्होंने लाखों बार बर्लिन की दीवार की बात की है लेकिन इस सीमा को पार करने की चेष्टा करने वाले मैक्सिकोवासियों की मौत के बारे में कोई भी समाचार नहीं दिया जाता और दिया भी जाता है तो छिटपुट।
यदि आप लैटिन अमरीकी हैं या एशियन हैं या किसी और देश से हैं और आप गैरकानूनी तरीके से अमरीका पहुंच जाते हैं और आपको वहां ठहरने दिया जाता है तो आपको शरणार्थी या आप्रवासी कहा जाएगा और यदि आप क्यूबाई हैं तो आपको निर्वासित पुकारा जाएगा।

सोमवार, 6 सितंबर 2010

कूड़ा नहीं होते क्रांतिकारियों के विचार

    क्रांति को गाली देने वालों की कमी नहीं है। भारत में  ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है जो क्रांति और क्रांतिकारी विचारों को आए दिन गरियाते रहते हैं। क्रांति की असफलता और मार्क्सवाद की असफलता के साथ-साथ कम्युनिस्ट नजरिए की खिल्ली उड़ाते रहते हैं। ऐसे लोगों से यही कहना है कि विचारों की जंग और व्यवस्था परिवर्तन की जंग में फिलहाल क्रांतिकारी पिछड़ गए हैं। लेकिन दुनिया की जटिलतम समस्याओं के बारे में आज भी किसी भी पूंजीवादी विचारक और राजनेता से ज्यादा सटीक समझ किसी क्रांतिकारी के पास ही मिलेगी। किसी मार्क्सवादी के पास ही मिलेगी।
मसलन् हम अपने मौजूदा दौर को ही लें और देखें कि कौन ऐसा नेता है जो ज्यादा सफाई के साथ इस दुनिया को देख रहा है ? इसका एक ही जबाब होगा फिदेल कास्त्रो। 
    फिदेल ने सारी दुनिया को दिखाया है कि संकट के समय में कैसे समाजवाद की रक्षा की जा सकती है और समाजवाद के मार्ग को त्यागे बिना किस तरह आगे बढ़ा जा सकता है। मार्क्सवाद विरोधियों की मुश्किल यह है कि वे मार्क्सवाद के सटीक प्रयोगों और सटीक विचारों की चर्चा नहीं कर करते बल्कि मार्क्सवादियों के भ्रमित विचारों की चर्चा करते हैं।
     आज सारी दुनिया में नस्लवादी भेदभाव सबसे बड़ी समस्या है। भारत में यह छूत-अछूत, छोटे -बड़े, सवर्ण-असवर्ण, ब्राह्मण-शूद्र, हिन्दू-मुसलमान के भेद के रूप में प्रचलन में है। इस भेदभाव को ईश्वरकृत और स्वाभाविक मानने वालों की समाज में अच्छी-खासी संख्या है।
        फिदेल कास्त्रो ने इस प्रसंग में लिखा है ‘‘ नस्लवाद, नस्ली भेदभाव और विदेशी द्वेष मानव की सहज स्वाभाविक प्रतिक्रियाएं नहीं हैं। ये तो सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रवृत्तियां हैं जो मानव समाज के पूरे इतिहास में युद्धों, सैनिक विजयों, गुलामी तथा सर्वाधिक शक्तिशाली द्वारा सर्वाधिक कमजोर के वैयक्तिक या सामूहिक शोषण से सीधे-सीधे पैदा होती हैं। ’’  
   भेदभाव की समस्या को बगैर किसी पूर्वशर्त के सम्बोधित किया जाना चाहिए। यह ऐसी समस्या है जिससे पलायन नहीं कर सकते। कुछ लोग हैं जो इस समस्या से ऑखें बंद किए हुए हैं और अपने स्वायत्त लोक में जीना चाहते हैं।
     नस्ली भेदभाव के आधार पर फिलीस्तीनियों के साथ यहूदीवादी इस्राइल के द्वारा बर्बर व्यवहार किया जा रहा है। इन दिनों फिलीस्तीन और इस्राइल दोनों बातचीत के लिए राजी हो गए हैं। नस्लवादी भेदभाव और फिलीस्तीन के संदर्भ में फिदेल कास्त्रो ने मांग की है कि नस्लवाद के शिकार लोगों को हरजाना दिया जाना चाहिए।
फिदेल का मानना है हरजाना देना ‘‘नस्लवाद के शिकार लोगों के प्रति अनिवार्य नैतिक जिम्मेदारी है। इसके पहले हिब्रू जाति के वंशजों को इस तरह का हरजाना दिया जा चुका है जिन्हें यूरोप की हृदयस्थली में नृशंस और घृणित नस्लवादी नरसंहार का सामना करना पड़ा था। हम शताब्दियों से इस तरह की कार्रवाई के शिकार लोगों के वंशजों और देशों को खोज निकालने जैसा असंभव कार्य करने के लिए नहीं कह रहे। लेकिन अकाटय तथ्य यह है कि करोड़ों अफ्रीकियों को बंदी बनाया गया, वस्तु की तरह बेचा गया और गुलाम की तरह काम करने के लिए अटलांटिक के उस पार भेज दिया गया। धरती के उस हिस्से में 7 करोड़ मूल निवासी भी यूरोपीय विजय और उपनिवेशीकरण के कारण मारे गए।’’
     नस्लवादी शोषण के इतिहास पर रोशनी ड़ालते हुए फिदेल कास्त्रो ने आगे कहा ’’एशिया समेत तीन महाद्वीपों के लोगों के अमानवीय शोषण ने तीसरी दुनिया में रह रहे साढ़े चार अरब लोगों की तकदीर और जिंदगी हमेशा के लिए तय कर दी है। इन लोगों में व्याप्त गरीबी, बेरोजगारी, निरक्षरता, स्वास्थ्य दर, शिशु मृत्यु, जीवन अवधि तथा अन्य बहुत सी चीजों की भयावह तथा रोंगटे खड़े कर देने वाली स्थिति है। वे शताब्दियों तक चले उस अत्याचार के मौजूदा पीड़ित लोग हैं। वे अपने पूर्वजों और देशवासियों के खिलाफ भयंकर अपराध के लिए मुआवजे के हकदार हैं।’’
‘‘वास्तव में बहुत से देशों के आजाद हो जाने तथा गुलामी का औपचारिक उन्मूलन हो जाने के बाद भी यह नृशंस शोषण बंद नहीं हुआ। आजादी के ठीक बाद अमरीकी संघ के विचारकों ने 18वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटिश प्रभुत्व से मुक्त 13 उपनिवेशों के बारे में निश्चित रूप से विस्तारवादी विचार और रणनीतियां रखीं।’’
     ‘‘इस तरह के विचारों के आधार पर ही यूरोपीय मूल के श्वेत बाशिंदों ने पश्चिम की ओर कूच करते हुए उस जमीन पर कब्जा कर लिया जिस पर मूल अमरीकी हजारों सालों से रह रहे थे। इस कवायद में लाखों मूल निवासी मारे गए। लेकिन वे पूर्व में स्पेनी कब्जे वाली सीमा पर भी नहीं रुके। इसके परिणामस्वरूप 1821 में आजाद हुए लैटिन अमरीकी देश मैक्सिको के लाखों वर्ग किलोमीटर इलाके तथा बेशकीमती प्राकृतिक संसाधनों को छीन लिया गया।’’
     ‘‘इस बीच उत्तरी अमरीका में पैदा हुए शक्तिशाली और विस्तारवादी राष्ट्र में 1776 की विख्यात स्वतंत्रता की घोषणा के लगभग सौ साल बाद तक अमानवीय दास प्रथा चलती रही, जबकि इस घोषणा में ही कहा गया था कि जन्म से सभी मनुष्य मुक्त और बराबर हैं।’’
     ‘‘दास प्रथा से महज औपचारिक आजादी के बाद सौ से अधिक वर्षों तक अफ्रीकी-अमरीकियों के साथ क्रूरतम किस्म का नस्ली भेदभाव चलता रहा। इसके बाद चार से अधिक दशकों तक चले जबर्दस्त संघर्ष तथा 1960 के दशक की उपलब्धियां जिनके लिए मार्टिन लूथर किंग जूनियर, मैलकम एक्स तथा अन्य विशिष्ट योद्धाओं ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए, उनके बाद भी इस दासता की कुछ विशेषताएं तथा प्रथाएं आज भी बरकरार हैं। विशुद्ध रूप से नस्लवादी तर्क के आधार पर अफ्रीकी-अमरीकियों के खिलाफ लंबे तथा अत्यधिक कठोर निर्णय सुनाए जाते हैं। इन्हें धनी अमरीकी समाज में निपट गरीबी और न्यूनतम जीवन स्तर के साथ रहना पड़ता है।’’
‘‘इसी प्रकार संयुक्त राज्य अमरीका के वर्तमान क्षेत्र के बड़े हिस्से में बसे मूल अमरीकी निवासियों के बचे-खुचे वंशजों को भेदभाव और उपेक्षा की बदतर स्थितियों में जीना पड़ रहा है।’’
     ‘‘अफ्रीका की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के बारे में आंकड़े देने की आवश्यकता नहीं है। पूरे के पूरे देश यहां तक कि पूरा सब-सहारा क्षेत्र समाप्ति के कगार पर है। यह सब आर्थिक पिछड़ेपन, असह्य गरीबी तथा महाविपत्ति बन चुकी नई-पुरानी बीमारियों के अत्यंत जटिल संयोग का परिणाम है। बहुत से एशियाई देशों में भी स्थिति कम भयावह नहीं है। इन देशों पर कभी न चुकाए जा सकने वाले भारी ऋण हैं, व्यापार की विषम शर्तें हैं, बुनियादी वस्तुओं की तबाह कर देने वाली कीमतें हैं, नव उदार भूमंडलीकरण है तथाजलवायु बदलाव है जिसके कारण कभी लंबे अकाल पड़ते हैं तो कभी भारी वर्षा और बाढ़। यह बात गणितीय ढंग से सिद्ध की जा सकती है कि ऐसी स्थिति को संभाला नहीं जा सकता।’’





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