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शुक्रवार, 30 जून 2017

हम कितने असहाय हैं !


          संकट गहरा है,यह कहना अब बेकार है,क्योंकि हम सब संकट में घिर चुके हैं।कातिल कितने ताकतवर हैं यह कहना अर्थहीन है क्योंकि हम सब असहाय साबित किए जा चुकेहैं। जब किसी निर्दोष व्यक्ति को भीड़ पीट रही हो और लोग तमाशा देख रहे हों तो समझो चीजें हम नहीं वे तय कर रहे हैं।ये ´वे´कौन हैं ॽ बताने की जरूरत नहीं,ये ´वे´तो ´हम ´में से ही हैं।´हम´को ´वे´में तब्दील करने की कला का नाम ही तो फासिज्म है। उसकी कारीगरी बेहद जटिल होती है।

फासिस्ट विचार एकदिन ,दो दिन ,एक साल या तीन साल में पैदा नहीं होता,बल्कि फासिस्ट विचार लंबा समय लेता है पूरी तरह पकने में।भारत में फासिस्ट विचारों की फसल एक ही दिन में पैदा नहीं हुई है, इस फसल को किसी एक संगठन या विचार विशेष ने तैयार नहीं किया है,बल्कि फासिस्ट विचार को अनेक विचारों,अनेक संगठनों और हजारों लोगों ने मिलकर रचा है। यह किसी एक के दिमाग की खुराफात नहीं है,यह खामखयाली भी नहीं है।

फासिस्ट विचारों का हमारे देश में पहले से भौतिक और वैचारिक आधार मौजूद है, नए फासिस्टों ने सिर्फ इतना किया है कि उस आधार को पाला-पोसा और बड़ा किया है।फासिज्म आज हर व्यक्ति के अंदर जगा दिया गया है। फासिज्म को उन पुरानी सड़ी-गली मान्यताओं और धारणाओं से मदद मिल रही है जिनके बारे में हम यह मानकर चल रहे थे कि वे मान्यताएं तो पुरानी हैं,मर चुकी हैं।लेकिन हकीकत में सड़ी गली मान्यताएं मरती नहीं हैं। भारत में तो एकदम नहीं मरतीं,पुरानी सड़ी गली मान्यताओं को बचाकर रखना,उनमें जीना और उनकी पूजा करना भारत की विशेषता है और यही वह जगह है जहां से फासिस्ट लोग अपने लिए ईंधन और समर्थन जुटाते हैं।

´गऊ हमारी माता है ´ उसी तरह का पुराना विचार है,जिसे हम मान चुके थे कि वह मर गया,लेकिन वह इतना ताकतवर होकर चला आएगा हमने कभी सोचा नहीं था। मन में विचार करें कि पुराने सड़े गले विचार के निशाने पर कौन लोग हैं,उसके नाम पर किस आय़ुवर्ग के लोग हत्याएं कर रहे हैं ॽ पुराने सड़े गले विचारों से चिपके हुए समाज में फासिज्म आसानी से पैदा होता है,तय मानो पीएम लाख चिल्लाएं, मेरे जैसे लोग लाखों-करोड़ों शब्द खर्च कर दें पुराने सड़े गले विचारों को हम सब मिलकर पछाड़ नहीं सकते।वे महाबलि हैं।

पुराने सड़े-गले विचारों को समूल नष्ट करने की भावना हम जब तक अपने मन में नहीं लाते हम आधुनिक मनुष्य नहीं बना सकते।हमने अजीब सा घालमेल किया हुआ है।कपड़े बदल लिए हैं,शिक्षा बदल ली है।व्यवस्था बदल दी है।कम्युनिकेशन के उपकरण बदल दिए हैं,लेकिन विचारों के दुनिया में नए विचारों के प्रवेश को रोक दिया है,विचारों की दुनिया वही सड़े –गले विचारों से लबालब भरी है।

फ्रेडरिक एंगेल्स ने लिखा है जब कोई विचार एकबार जन्म ले लेता है और व्यवहार में आजाता है तो फिर आसानी से वो नष्ट नहीं होता बल्कि एक अवधि के बाद वो भौतिक शक्ति बन जाता है।उसे आप व्यवस्था बदलने के बाद भी हटा नहीं सकते जब तक आप इसके विकल्प को लोगों के मन में न उतार दें। ´गऊ माता है´ के विचार को हम आज तक लोगों के मन से नहीं निकाल पाए,हम कितने असफल हैं,हमारा सिस्टम कितना अक्षम है,हमारी शिक्षा कितनी अधूरी है,यह इस बात का सबूत है।पुराने सड़े-गले विचारों को मन में जब तक बनाए रखोगे फासिस्ट हमले होते रहेंगे,जुनैद-अखलाक जैसे लोग कत्ल होते रहेंगे।



फासिज्म महज कोई एक संगठन विशेष नहीं है,बल्कि वह एक विचारधारा है।मानव इतिहास की सबसे बर्बर विचारधारा है। इसे हमने विदेशों से नहीं मंगाया है बल्कि यह हमें विरासत में मिली है,हमारे संस्कारों में इसकी गहरी जड़ें हैं,अविवेकवाद इसकी बुनियाद है।अविवेकवाद को त्याग दो फासिज्म मर जाएगा।अविवेकवाद को जब तक गले लगाए रखोगे फासिज्म आपसे चिपटा रहेगा और जुनैद जैसे लोग मरते रहेंगे।

गुरुवार, 29 जून 2017

जुनैद की हिमायत में


               आरएसएस और उनके समर्थकों में गजब की क्षमता है कह रहे हैं आरएसएस के बारे में ´षडयंत्र´के रुप में न देखें, हर घटना में न देखें। पहली बात यह कि आरएसएस सामाजिक संगठन नहीं है वह राजनीतिक संगठन है केन्द्र और अनेक राज्यों में उसके नियंत्रण और निर्देश पर सरकारें काम कर रही हैं,नीतियों के निर्धारण में उसकी निर्णायक भूमिका है।जमीनी स्तर पर आरएसएस और उसके संगठनों के बनाए नारे सक्रिय हैं,संयोग की बात है नारों के समानान्तर और संगति में सामाजिक हिंसा भी हो रही है। उनके नारों के पक्ष में न बोलनेवालों या उनका विरोध करने वालों पर आए दिन हमले हो रहे हैं, विभिन्न बहानों से उन नारों के प्रभाववश 22 निर्दोष मुसलमानों की हत्या हुई है। ये हत्याएं जिस तरह हुई हैं और जिन लोगों ने की हैं उनसे एक बात साफ है कि हत्या करने वाले स्वतःस्फूर्त हमले नहीं कर रहे।दूसरी बात यह कि आरएसएस की आलोचना करने पर जो समर्थक साइबरजगत में कुतर्क दे रहे हैं वे भी स्वतःस्फूर्त नहीं बोल रहे बल्कि आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित होकर ही बोल रहे हैं।ऐसी अवस्था में आरएसएस की आलोचना होना उसके राजनीतिक फैसलों का विरोध करना हम सबका दायित्व बनता है।

जुनैद की हत्या सामान्य अपराध नहीं है।आरएसएस को जुनैद की हत्या का सड़कों पर उतरकर विरोध करना चाहिए। लेकिन हो उलटा रहा है। उस हत्या के खिलाफ जो आवाजें उठ रही हैं उनके खिलाफ आरएसएस –भाजपा के नेता और साइबर समर्थक तरह-तरह के कुतर्क दे रहे हैं,सवाल यह है जुनैद की हत्या यदि साम्प्रदायिक हत्या नहीं है तो आरएसएस उसका जमीनी स्तर पर विरोध करने वालों का साथ क्यों नहीं देता ॽ क्यों उन पर हमले कर रहा है ॽ मुसलमान होने के कारण 22लोग अब तक मारे गए हैं एक भी हत्या के खिलाफ भाजपा –आरएसएस ने पूरे देश में एक भी जुलूस नहीं निकाला,जबकि यही आरएसएस-भाजपा मिलकर तीन तलाक के मसले पर मुसलमान हितैषी होने का ढोंग करती रही है, मुसलमानों के मोदी एंड कंपनी को जमकर वोट मिले हैं।इसके बावजूद मुसलमानों पर ही हमले क्यों हो रहे हैं ॽ उनके ही धंधे को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा हैॽ क्या मुसलमान देश में हिन्दुओं पर जुल्म कर रहे हैं या हिंदुओं के खिलाफ बोल रहे हैं ॽ

कायदे से आरएसएस और उससे जुड़े संगठन गऊरक्षकों और दूसरे किस्म साम्प्रदायिक गुंडों के द्वारा हमलों में मारे गए मुसलमानों के परिवारों के साथ आरएसएस खड़ा हो और जो लोग इन घटनाओं का विरोध कर रहे हैं उनका साथ दे,अपनी राज्य और केन्द्र सरकारों को सीधे निर्देश दे कि इस तरह के हत्याकांड करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाय।लेकिन हमें मालूम है आरएसएस यह सब करने नहीं जा रहा।वे और जोशो-खरोश से अपनी हिंदुत्ववादी मुहिम को और तेज करने जा रहे हैं और मुसलमानों के पक्ष में खड़े लोगों पर हमले कर रहे हैं, साइबर हमले कर रहे हैं। सवाल यह है जुनैद के हत्यारे अभी तक पकड़े कयों नहीं गए ॽ आरएसएस-भाजपा के लोग न्याय की मांग करने वालों या हत्यारो की गिरफ्तारी की मांग करने वालों के खिलाफ सीधे जहर क्यों उगल रहे हैं ॽ क्या जनता को विरोध का हक नहीं है ॽ अफसोस इस बात का है इस काम में अनेक शिक्षित लोग,प्रोफेसर लोग भी हत्यारों के साथ खड़े हैं।

भारत में हिंसा के पक्ष में खड़े होने, हिंसा और अत्याचार को वैध ठहराने की परंपरा है।इस परंपरा की जडें हिंदू संस्कारों से खाद-पानी लेती रहती हैं। वे घुमा-फिराकर जुनैद के मसले पर बात करने की बजाय ´पहले यह हुआ आप क्यों नहीं बोले´, ´कश्मीर में यह हुआ आप क्यों नहीं बोले ´, ’मुसलमान इतने खराब हैं आप क्यों नहीं बोले ´, आदि मुहावरों का प्रयोग करके संघियों और उसके हत्यारे गिरोहों की हिमायत कर रहे हैं।

हम विनम्रतापूर्वक एक बात कहना चाहते हैं जुनैद और इसी तरह की हत्याओं के विचारधारात्मक पहलू को देखें,छोटे-छोटे विवरण और ब्यौरों और अतीत के नरक को न देखें। मुसलमानोंके खिलाफ जो हमले हो रहे हैं ये रुटिन हमले नहीं हैं,ये रुटिन मॉब हिंसा नहीं है.बल्कि एक विचारधाराजनित हिंसा है।हम यहां जो लिख रहे हैं वह इस हिंसा के विचारधारात्मक पहलू को केन्द्र में रखकर लिख रहे हैं। दूसरी बात यह कि कांग्रेस के शासन का विरोध करने का अर्थ यह नहीं है कि लोग विकल्प के रुप में आरएसएस के जुल्मों का समर्थन करें। इससे भी बड़ी बात यह कि आरएसएस की विचारधारा के राष्ट्रव्यापी प्रभाव को देखें।आरएसएस ने लोकतांत्रिक हकों पर सीधे हमले किए हैं और सभी किस्म के बौद्धिक कर्म को निम्नस्तर पर पहुँचा दिया है।अब ज्ञान-विवेक के आधार पर संघी लोग बहस नहीं कर रहे वे गालियां दे रहे हैं या फिर आरोप लगारहे हैं या फिर सीधे शारीरिक हमले कर रहे हैं।इसमें भी उनका सबसे ज्यादा गुस्सा वामपंथियों पर निकल रहा है।वाम के प्रति उनकी घृणा का प्रधान कारण वैचारिक है, वाम के खिलाफ घृणा के कारण ही कारपोरेट घराने उनको पसंद करते हैं।संघियों की वामविरोधी घृणा का स्रोत है कारपोरेट घराने।क्योंकि वे भी वाम से नफरत करते हैं,इस मामले में संघ और कारपोरेट घराने जुडबां भाई हैं।

आरएसएस के नारों और राजनैतिक कारनामों के कारण भारत की आर्थिकदशा लगातार खराब हो रही है। जो लोग आरएसएस से प्रेम करते हैं वे कभी इस बात गौर करें कि आरएसएस की विचारधारा ने भारत के आर्थिक ढांचे को कितने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचाया है।आरएसएस के लोकतंत्र में उभार को सामान्य राजनीतिक उभार के रूप में न देखें,यह असामान्य और भयानक है। ठीक वैसे ही जैसे स्पेन में फ्रेंको आया था,जर्मनी में हिटलर आया था।लोकतंत्र में इस तरह की संभावनाएं हैं कि मोदीजी फ्रेंको बन जाएं !

आरएसएस के बनाए दो नए मिथ हैं -´भारतीय हिंदुत्व´ और ´भारतीय लोकतंत्र´। वे इन दोनों की महानता बहुत गुणगान करते रहते हैं। पीएम से लेकर मोहन भागवत तक के भाषणों में इन दोनों मिथों को देख सकते हैं। इन दोनों मिथों का संघी फासिज्म से गहरा समंबंध है।इन दोनों मिथों के कारण आज समूची बहस लोकतंत्र के मसलों,मानवाधिकार के मसलों के बाहर कर दी गयी है।इसके अलावा ´हाशिए´के लोगों की लड़ाई और हितों की रक्षाके सवालों को ठेलकर समाज से बाहर कर दिया गया है।इस समय सिर्फ उन दो मिथों पर बातें हो रही हैं जिनका ऊपर जिक्र किया गया है।प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों तक, मोहन भागवत से लेकर प्रवीण तोगडिया तक इन दोनों मिथों का नया-नया भाष्य रचा जा रहा है।इन दो मिथों की आड़ में सीधे हमले हो रहे हैं।हम कहना चाहते हैं ´भारतीय लोकतंत्र´ महान नहीं है। महान बनाकर लोकतंत्र के मर्म की हत्या की जा रही है,लोकतंत्र को वायवीय बनाया जा रहा है। भारत की जनता को वास्तव अर्थ में लोकतंत्र चाहिए,न कि ´भारतीय लोकतंत्र´।



-´भारतीय हिंदुत्व´ और ´भारतीय लोकतंत्र´ के मिथों की आड़ में ´आक्रामकता´ और ´सैन्य आक्रामकता´की खुलकर वैसे ही हिमायत की जा रही है जैसी एक जमाने में हिटलर ने की थी। हिटलर की नकल करते हुए मोदी के भाषणों को ´राष्ट्रीय आख्यान´ बनाकर पेश किया जा रहा है।आज जरुरत है इन दोनों मिथों के खिलाफ आम जनता को शिक्षित करने और गोलबंद करने की।

बुधवार, 28 जून 2017

जुनैद के हत्यारों की तलाश में

        जुनैद मारा जाए या अखलाक मारा जाए,एक वर्ग ऐसा है जो इन सब हत्याओं से बेखबर-निश्चिंत है।उनके तर्क सुनेंगे तो गुस्सा आने लगेगा।वहीं दूसरी ओर आरएसएस वालों के तर्क सुनेंगे तो वे पलटकर कहेंगे आप इस समय बोल रहे हैं, मुसलमान मारे जा रहे हैं तब क्यों नहीं बोल रहे थे, फलां-फलां समय फलां –फलां मारा गया तब आप चुप क्यों थे, आपने हल्ला क्यों नहीं किया।आप उनको कहेंगे कि देखिए यह पैटर्न है हत्या का ,और अब तक 22 मुसलमान मौत के घाट उतारे जा चुके हैं, तो वे कहेंगे हम इसमें क्या करें,हत्या हुई है तो कानून अपना काम करेगा,कानून को काम करने दें।कानूनी तंत्र जो कहे और जो करे उसकी मानें।आप ज्यादा बोलेंगे तो वे एक लंबी फेहरिश्त बताने लगते हैं और कहते हैं सैंकड़ों सालों से मुसलमानों ने हिन्दुओं को मारा है उस समय के बारे में कुछ क्यों नहीं बोलते।

कहने का आशय यह कि साम्प्रदायिक हिंसा की जब भी कोई घटना होती है और आप संवाद करना चाहें तो साम्प्रदायिक लोग बहस को अतीत में ले जाते हैं, गैर-जरूरी ,अप्रासंगिक मसलों की ओर ले जाते हैं।इस क्रम में वे तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं,बार-बार वैज्ञानिक समझ और नजरिए को निशाना बनाते हैं,कम्युनिस्टों पर हमले करते हैं।

असल में साम्प्रदायिकता की बुनियादी लड़ाई मुसलमान या ईसाईयों से नहीं है बल्कि प्रगति की अवधारणा से है। वे प्रगति को सहन नहीं कर पाते। विचारों से लेकर जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रगति को वे सहन नहीं कर पाते। यह सच है विगत 70साल में देश में प्रगति हुई है। अनेक कमियों के बावजूद प्रगति हुई है और यही प्रगति असल में आरएसएस जैसे साम्प्रदायिक संगठनों के निशाने पर है।

हममें से अधिकतर लोग हिन्दुत्व की विचारधारा को शाकाहारी विचारधारा के रुप में देखते हैं। लेकिन व्यवहार में साम्प्रदायिकता या हिंदुत्व एकदम नॉनवेज विचारधारा नहीं है,बिना हिंसा के इसे चैन नहीं मिलता।सतह पर हिन्दुत्ववादी विचार बड़ा भोला-सीधा लगता है लेकिन आचरण में पूरी तरह अविवेकवादी है।समाज में अविवेकवादी होना पशुता की निशानी है लेकिन हमने कभी इस रुप में देखने की कोशिश ही नहीं की।

दिलचस्प बात यह है कि कारपोरेट घरानों या बुर्जुआजीके प्रति आम जनता में जितना गुस्सा बढ़ता है ठीक उसके समानांतर आरएसएस जैसे संगठन आक्रामक रुप में खड़े हो जाते हैं।बुर्जुआजी जब बेचैन,निराश और पराजय के दौर से गुजरता है तब ही आरएसएस जैसे संगठन प्रगतिशील विचारों,मजदूरों-किसानों के हितों पर हमला बोलते हैं,इसी अर्थ में मैंने कहा था कि संघ को प्रगति से नफरत है। वे मुसलमान से नफरत नहीं करते वे प्रगति और प्रगतिशील विचारधारा और प्रगतिशील वर्गों से नफरत करते हैं और कारपोरेट घरानों की वैचारिक-राजनीतिक सेवा करते हैं।

नव्य आर्थिक उदारीकरण के खिलाफ सारे देश में जिस समय सबसे ज्यादा गुस्सा था,मनमोहन सिंह के खिलाफ देश में आंधी चल रही थी,कारपोरेट घराने और उनके विचारक जनता में अलग-थलग पड़ चुके थे ठीक उसी समय सांड की तरह आरएसएस सामने आता है और सभी किस्म के प्रगतिशील विचारों को पहला और आखिरी निशाना बनाता है और यही वह चीज है जो गंभीरता से समझने की जरूरत है।सवाल यह है आरएसएस इतना ताकतवर क्यों बना ॽ उसके कामकाज और राजनैतिक एक्शन किसकी वैचारिक मदद करते हैं ॽ



हम सब लगातार समाज में विवेकवाद का प्रचार प्रसार कर रहे हैं और चाहते हैं कि विवेकवाद को आम जनता के आम-फहम विचार की तरह पेश किया जाए,यह चीज बुर्जुआजी को नापसंद है और यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां पर आरएसएस हमला करता है,आरएसएस के हमलों की धुरी है अविवेकवाद। इस तथ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। आरएसएस को यदि किसी चीज की जरूरत है तो वह है अविवेकवाद।वे अपनी सांगठनिक और वैचारिक क्षमता के विकास और विस्तार के लिए अविवेकवाद का बहुआयामी इस्तेमाल करते हैं।आज देश के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि देश को अविवेकवाद की आंधी से कैसे बचाएं।

जुनैद नहीं भारत की हत्या के प्रतिवाद में

         छह दिन हो गए हैं लेकिन अभी तक एक गिरफ्तारी हुई है।जबकि वे बीस से अधिक थे और उन सबके हाथों में चाकू थे,वे चाकू लिए ही ट्रेन में दाखिल हुए थे,संयोग की बात थी कि जुनैद अपने भाईयों के साथ उस ट्रेन में था।कोई तर्क जुनैद की हत्या को वैध नहीं बना सकता,लेकिन मजाल है कि भाजपा के लोगों के मुँह पर शिकन पड़ी हो,वे गम में हों !

प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक सबको मालूम है लेकिन कोई जुनैद के घर नहीं गया। हरियाणा के मुख्यमंत्री भी जुनैद के घर नहीं गए।कम से कम मानवता और संवेदनशीलता के नाते जुनैद के घर शोक व्यक्त करने जा सकते थे,ट्विटर पर एक-दो पोस्ट लिख सकते थे।लेकिन पीएम,सीएम,मुख्यमंत्री किसी के पास जुनैद की मौत पर शोक व्यक्त करने का समय नहीं है।

बेशर्मी की हद देखो कि टीवी चैनलों में जुनैद की हत्या को वर्गीकृत कर रहे हैं और बता रहे हैं यह तो यात्रियों के बीच में सीट पर बैठने का झगड़ा था।सत्ता में बैठे लोग यह देखने को तैयार नहीं है कि देश में चारों ओर घृणा की विचारधारा की जहरीली हवा चल रही है और उस हवा को चलाने में आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों की केन्द्रीय भूमिका है। हम सब जानते हैं साम्प्रदायिकता या पृथकतावाद के नाम पर जब भी जहां पर भी प्रचार आरंभ होता है ,जब आम जनता उसमें भाग लेने लगती तो सबसे पहले राजसत्ता और उसके तंत्र ठंड़े पड़ जाते हैं,पुलिस-सेना के हाथ-पैर फूल जाते हैं,दिमाग सुन्न हो जाता है,अनेक मामलों में तो सत्ता के तंत्र स्वयं भी उस जहरीले प्रचार का अंग बन जाते हैं और आम जनता पर साम्प्रदायिक-पृथकतावादी ताकतों के साथ मिलकर हमला करने लगते हैं।आज ठीक देश की यही अवस्था है।सारा देश मुसलिम विरोधी प्रचार में डूबा हुआ है। मुसलिम विरोध को स्वाभाविक बनाकर हम सबके मन में उतार दिया गया है।

आज वास्तविकता यह है कि मोदीसरकार रहे या जाए मुसलिम विरोधी जहरीला प्रचार समाज से सहज ही जाने वाला नहीं है।इसका प्रधान कारण है साम्प्रदायिकता के खिलाफ केन्द्र और राज्य सरकारों का खुला समर्पण।देश के विभिन्न इलाको में इस समर्पण को साफ तौर पर देखा जा सकता है।मुसलिम विरोधी साम्प्रदायिक जहर महज सामान्य प्रचार या राजनैतिक कार्यक्रम नहीं है,बल्कि यह असामान्य राजनैतिक कार्यक्रम है। इसका लक्ष्य है समाज को,लोगों के दिलो-दिमाग को साम्प्रदायिक आधारों पर विभाजित करना,साम्प्रदायिक तर्कों को सहज,बोधगम्य बनाना और आम लोगों के दिलो-दिमाग में उतारना।इस काम में आरएसएस पूरी तरह सफल हो चुका है। आज उसकी साम्प्रदायिक विचारधारा की पकड़ में सारा देश है।हर आदमी है।चाहे वह किसी भी दल का हो।

जो लोग सोचते हैं साम्प्रदायिक विचार मुझे नहीं उसे प्रभावित कर सकते हैं वे गलतफहमी के शिकार हैं। साम्प्रदायिक विचार सबको प्रभावित कर सकते हैं,वे जिस गति ,आक्रामकता और स्वाभाविक रूप में आ रहे हैं उससे हर कोई प्रभावित होगा,वे भी प्रभावित हो सकते हैं जो उसके शत्रु दिख रहे हैं।

साम्प्रदायिकता का मुसलिम विरोधी जहरीला प्रचार तमाम किस्म के कॉमनसेंस विश्वासों,कपोल-कल्पित कहानियों और धारणाओं के जरिए फैलाया जा रहा है। जुनैद की हत्या सतह पर उन 20गुंडों ने की है जिनके पास चाकू थे,लेकिन असल में उन चाकुओं में धार और उनको चलाने का बहशियाना भावबोध तो मुसलिम विरोधी प्रचार ने निर्मित किया था।जुनैद के कातिल पकड़े जाएं यह जरूरी है। लेकिन इससे ज्यादा जरूरी है कि मुसलिम विरोधी जहरीले प्रचार अभियान के खिलाफ बिना किसी किन्तु-परन्तु और बहानेबाजी के हम सब एकजुट हों,उसके खिलाफ जमकर लिखें,बोलें,आंदोलन करें।असल में जुनैद के हत्यारे हमारे अंदर प्रवेश कर चुके हैं। वे जुनैद को नहीं हम सबको रोज चाकुओं से मार रहे हैं,हमें साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष करने से रोक रहे हैं।



जुनैद मुसलमान नहीं था।वह भारतीय नागरिक था।साम्प्रदायिक ताकतें सतह पर मुसलमान को मारती दिखती हैं लेकिन वे असल में नागरिक को मार रही होती हैं,नागरिक हकों पर हमले कर रही होती हैं,संविधान के परखच्चे उडा रही होती हैं।उनके सामने पीएम,सीएम,न्यायपालिका बौने हैं।

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