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गुरुवार, 7 जुलाई 2016

बिजली,किताब और आधुनिकता-

सामाजिक विकास के लिए बिजली महत्वपूर्ण है। बिजली नहीं तो आधुनिकता नहीं। जो लोग सोचते हैं बिजली के बिना रैनैसां कर लेंगे वे देखें देश में बिजली जहां पहुँची है वहीं पर रैनेसां हुआ है। बिजली महत्वपूर्ण तत्व है आधुनिकता को समझने के लिए। काश ,हमारे लेखकों-राजनेताओं और रेनैसां नायकों ने बिजली की सत्ता-महत्ता को समझा होता। आज बिन बिजली सब सून।

इसी तरह भारत की सबसे बड़ी बाधा है पुरानी मुर्दा आदतों में जीना। आधुनिक भारत के निर्माण के लिए हमें बाधामुक्त जीवनशैली को अपनाना चाहिए। हमारे विचार नए हैं, संविधान नया है, तनख्बाह नई है, नए माल खाते हैं, लेकिन आदतें और सोचने का ढ़ंग सदियों साल पुराना है और इसके कारण भारत के अंदर एक विलक्षण नस्ल तैयार हुई है जिसके कपड़े नए हैं,दिमाग पुराना है। जिसकी चाहतें नई हैं, उन्हें पाने के उपकरण और आदतें पुरानी हैं। पुरानेपन से भारत को मुक्त करने के लिए शॉक थैरेपी की सख्त जरूरत है।पुराने को पूरी तरह त्यागे आधुनिक नागरिक नहीं बन सकते।इस प्रसंग में किताबें हमारी मदद कर सकती हैं,समाज को बदल सकती है।इस संदर्भ में वाल्टर बेंजामिन की कुछ बातों से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।

वाल्टर बेंजामिन ने लिखा हैः "किताबों और रंडियों को देखकर कोई नहीं कह सकता कि समय उनके लिए मूल्यवान होगा। लेकिन उनके करीब जाने पर ही पता लग सकता है कि वे किस कदर जल्दबाजी में होती हैं।जैसे ही आपकी दिलचस्पी उनमें खत्म होती है,वे चलने की तैयारी करने लगती हैं। "

"किताबें और रंडिया बिस्तर पर ले जाई जा सकती हैं।"

" किताबें और रंडियां समय को बदल देती हैं।वे रात को दिन और दिन को रात में बदल देने की कूबत रखती हैं।"

वाल्टर बेंजामिन के अनुसार यह समाज ,जिसका हर सदस्य अपने निजी कल्याण में लगा है,पाशविक असंवेदनशीलता और जड़ पूर्वाभास का शिकार है।मशीनों द्वारा कलाकृति का पुनरूत्पादन कला के प्रति जनता के रूख को भी बदल देता है।पिकासो के चित्र के प्रति प्रतिक्रियावादी रूख चार्ली चैप्लिन के फिल्मों के प्रति प्रगतिशील होजाता है।प्रगतिशील रूख का मतलब है कि आस्वादन और आलोचना दोनों मिलकर एक हो जाते हैं।

वाल्टर बेंजामिन का मानना है -" यूं तो कच्ची चीजें पेट के लिए स्वास्थ्यप्रद होती हैं।उसी तरह कुछ कच्चा ,और खासकर , स्वयं का भोगा हुआ अनुभव लाभकारी होता है।"

बेंजामिन ने लिखा है - "प्रशंसा की बौछार सबसे अधिक रचनाकार को ही संदिग्ध बना देती है

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

फेसबुक और पुस्तकमेला



कोलकाता पुस्तकमेला में साहित्यिक पत्रिकाओं का सबसे बड़ा पंडाल होता है और उसमें अनेक लेखक अपनी पत्रिकाएं लिए बैठे रहते हैं। कुछ मेले में बिक्री करते भी नजर आते हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं के स्टॉल देखने लायक होते हैं। जिस पुस्तकमेले में साहित्यिक पत्रिकाओं का वैभव दिखता है वहां पर साहित्यप्रेम की जड़ें गहरी होती हैं।
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कोलकाता बुकफेयर में देश के बड़े लेखक और विचारक जितनी बड़ी तादाद में भाग लेते हैं और तरह -तरह के विषयों पर भाषण देते हैं वह अपने आप में विलक्षण अनुभव है यह अन्यत्र दुर्लभ है। इस मेले का आयोजन राज्य सरकार की मदद से प्रकाशक गिल्ड करता है।
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कोलकाता पुस्तकमेला में रविवार-शनिवार को इतनी भीड़ होती है कि आपको लोगों से सटकर चलना-निकलना होता है। औसतन 7-8लाख आते हैं। 15दिन तक चलने वाले मेले में कुल मिलाकर 35-40लाख लोग आएंगे।
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मुंबई में दौलत है और लाखों शिक्षितजन हैं। दिल्ली में पैसा है,शोहरत है,सत्ताकेन्द्र हैं,मध्यवर्गीय लेखकों की हेकड़ी है ,लेकिन बुकफेयर में भीड़ नहीं है। कोलकाता में न सत्ता है,न शोहरत है, न पैसा है,किताबें ही किताबें हैं और लाखों की भीड़ है। किताबों के खरीददार हैं। मुंबई,दिल्ली,मद्रास आदि किसी भी शहर में बुकफेयर में लोग सपरिवार बुकफेयर नहीं जाते लेकिन कोलकाता में सपरिवार बुकफेयर जाने का रिवाज है।
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जयपुर साहित्य मेले को टीवीवालों ने जिस तरह से प्रायोजित कवरेज के जरिए उछाला और साहित्य के नाम पर नॉनसेंस का प्रचार किया,जयपुर मेले की जनता की शिरकत को जिस तरह सनसनीखेज ढ़ंग से पेश किया उसे देखकर यही आभास मिलता है टीवीवालों ने साहित्यमेले देखे नहीं हैं।
कोलकाता पुस्तकमेला वास्तव अर्थ में पुस्तकमेला है। यहां सालाना मेले में 20करोड़ का कारोबार होता है और इसमें बहुत बड़ा हिस्सा निजी खरीद का है। इस मेले में किसी भी किस्म का कारपोरेट प्रायोजन नहीं है। यहां कोई पांचसितारा लॉन,हॉल और पण्डाल नहीं है,कोई टीवी पर सनसनीखेज कवरेज नहीं है लेकिन स्थानीयस्तर पर आम जनता की शिरकत मन को मुग्ध कर लेती है।
कोलकाता बुकफेयर में बड़ी तादाद में बूढ़े मर्द और औरतों को देख पाएंगे। ये वे लोग हैं जो बुद्धिजीवी हैं या पढ़ने के शौकीन हैं। जयपुर -दिल्ली बुकफेयर या साहित्यमेले में बूढ़े नहीं दिखते। किताबें हैं लेकिन बूढ़े नहीं हैं,यह चिन्ता की बात है। पुरानी किताब और पुराना पाठक समाज की शक्ति हैं।
हर मध्यवर्गीय बंगाली के घर में बच्चे को बुकफेयर के लिए अलग से पैसे हर साल दिए जाते हैं। बुकफेयर उनके सालाना-दैनन्दिन बजट का वैसे ही हिस्सा है जैसे वे अन्य चीजों पर खर्च करते हैं। काश ,बाकी महानगरों के शिक्षितलोग कुछ कोलकातावासी बंगालियों से यह सीख पाते !
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कोलकाता बुकफेयर का सबसे दुखदपक्ष है हिन्दीभाषियों की कम से कम शिरकत। यह शहर मारवाडियों से भरा पड़ा है। इनलोगों की सैंकड़ों संस्थाएं हैं। भारतीय भाषा परिषद जैसी शक्तिशाली संस्था है लेकिन इस संस्था का कोलकाता बुकफेयर में एक स्टॉल तक नहीं है। हिन्दी की पत्रिकाएं कहीं पर भी नजर नहीं आतीं। गिनती की तीन-चार हिन्दी किताबों की दुकान हैं। हिन्दीक्षेत्र के प्रकाशक यहां आते नहीं,कोलकाता में रहने वाले हिन्दीभाषी बुकफेयर जाते नहीं।जबकि कोलकाता में 50 लाख से ज्यादा हिन्दीभाषी लोग रहते हैं। कोलकाता के बाजार पर इनका एकाधिकार है। सारा बिजनेस नियंत्रित करते हैं।
एक ही शहर में रहने वाले मध्यवर्गीय बंगाली परिवारों और हिन्दीभाषी मध्यवर्गीय परिवारों में बुकफेयर को लेकर अंतर साफ देख सकते हैं। बंगाली बुकफेयर जाता है हिन्दीभाषी नहीं जाता। हिन्दीभाषियों की कमाने-खाने और सोने की आदत ने बुककल्चर को यहां के हिन्दीभाषियों में विकसित नहीं होने दिया।
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कोलकाता बुकफेयर का कोलकाता के हिन्दी लेखकों,हिन्दी के कॉलेज-विश्वविद्यालय शिक्षकों आदि पर न्यूनतम असर है। इनमें से अधिकांश लोग किताबें नहीं खरीदते और किताबें नहीं पढ़ते। वे हिन्दी में हांकते बहुत हैं। कोलकाता के हिन्दी के तथाकथित लेखक -शिक्षक आपको किताब खरीदने के लिए प्रेरित नहीं करेंगे। यदि आप किताब खरीद रहे हैं या किताब पर बात करना चाहते हैं तो हतोत्साहित जरूर करेंगे।
मसलन् आपने काशीनाथ सिंह की कोई किताब खरीदी और पूछा कि यह किताब कैसी है तो हिन्दी शिक्षक कहेगा अरे यार ,यह क्या है, मेरी तो कल ही काशीजी से एक घंटा बात हुई थी। पाठक भौंचक्का रह जाता है कि कमाल के लोग हैं ये ,मेरे किताब खरीदने और इनके 1घंटा काशीनाथ से बात करने के बीच में क्या रिश्ता है ?
कहने का आशय यह कि कोलकाता के हिन्दी के शिक्षकों-लेखकों ने किताब पढ़ने-पढ़ाने और लेखक पर बात करने की संस्कृति को विकसित ही नहीं किया। इसके विपरीत बंगाली शिक्षक-लेखक यह सब नहीं कहता।
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कोलकाता बुकफेयर ज्ञानसमुद्र है। यहां सनसनी नहीं बिकती। यहां किताबें बिकती हैं। जयपुरमेले पर जो संपादक और मीडिया महर्षि वाह-वाह और आह-आह कर रहे थे वे सोचें कि कोलकाता बुकफेयर में सलमान रूशदी को रोका गया ,मीडिया में खबर बनी और बात खत्म हो गयी। साहित्य में सनसनी नहीं होती।
यहां रोज लेखक एक से बढ़कर एक बेहतर बातें कहते हैं लोग सुनते हैं,मीडिया में रिपोर्ट होती हैं,लेकिन वे सनसनी नहीं बन पातीं। अमर्त्यसेन से लेकर गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक तक विश्वविख्यात लेखक आए ,अपनी बात कही और चले गए।असल में साहित्य एक कम्युनिकेशन है। वह कलह, सनसनी, पुलिस,थाना,मुकदमा नहीं है। जयपुरमेले ने साहित्य को साहित्य नहीं रहने दिया ,उसने साहित्य की मान-मर्यादा भ्रष्ट की है।
कुछ तो कोलकाता बुकफेयर से सीख सकते हैं मीडियावाले !!
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हिन्दी में जो लोग कहते हैं नवजागरण हो गया या हुआ था वे सही नहीं कहते। पुस्तक संस्कृति विकसित किए बिना नवजागरण नहीं होता। हिन्दी में सबकुछ है लेकिन पुस्तक संस्कृति नहीं है।
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हिन्दी लेखक दिल्ली में लाला की दुकान की शोभा बढ़ाते हैं ,किताबें नहीं खरीदते । यहां कोलकाता में बुकफेयर में लेखक मिलेगा लेकिन लाला की दुकान पर शोभा बढ़ाते नहीं ,बल्कि किताबें खरीदते हुए मिलेगा,पाठकों से बात करते मिलेगा,पाठकों को आशीर्वाद देते मिलेगा।
एकबार बुकफेयर में मैं महाश्वेता देवी से बातें कर रहा था देखा एक लड़की आई और उसने पैर छुए और उसकी माँ ने कहा आप लेखिका हैं,इसे आशीर्वाद दीजिए, इसकी हाल ही में शादी हुई है,यह आपका आशीर्वाद लेने बुकफेयर आई है।

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के लोप का रहस्य

  ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी के 22 खंड़ हैं । इन 22 खंड़ों का बहुत बड़ा बाजार है। इन दिनों मीडिया में यह खबर है कि ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के किताबी रूप के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा हो गया है। यह मूलतः बाजार के ठंड़ेपन को दूर करने की रणनीति के तहत उड़ायी गयी अफवाह है। इस डिक्शनरी की बाजार में बिक्री के गिरते हुए ग्राफ को ऑक्सफोर्ड के प्रकाशक ने यह आशंका जतायी है कि आगामी 30 सालों में यह डिक्शनरी बाजार से गायब हो जाएगी। पुस्तक की तुलना में इसका ‘ई’ रूप ज्यादा पढ़ा जा रहा है। इन दिनों इसके तीसरे संस्करण की तैयारियां चल रही हैं।
    प्रकाशक के अनुसार इसका 28 प्रतिशत हिस्सा पूरी तरह तैयार हो चुका है। ऑनलाइन खपत बढ़ने के साथ डिक्शनरी की मांग थोड़ा कम हुई है। इसके बावजूद किताब धड़ाधड़ बिक रही है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी को ऑनलाइन पढ़ने के लिए 10 साल की सदस्यता लेनी होती है और इसमें नई सामग्री भी जोड़ी गयी है। इस डिक्शनरी का एक हिस्सा मुफ्त में ऑनलाइन पर उपलब्ध है। कंपनी में इन दिनों डिक्शनरी के नए ऑनलाइन ऱूप को लेकर मंथन चल रहा है। मौजूदा ऑनलाइन रूप को http://oxforddictionaries.com पर देख सकते हैं।
    इस प्रसंग में पहली बात यह कि ऑनलाइन किताब आने के साथ ही मुद्रित किताब का लोप नहीं होगा। मौजूदा दौर ‘ई बुक’ का है ,यह विकासशील बाजार है जिसके कारण मुद्रित किताब के लिए खतरे की आशंका व्यक्त की जा रही है।
    अमाजॉन कंपनी के ताजा आंकड़े बताते हैं इन दिनों 100 मुद्रित किताब की तुलना में 180 ‘ई बुक’ बिक रही है। ये मासिक बिक्री के आंकड़े हैं। अमॉजान के किंडल बुकस्टोर में 630,000 ‘ई’ बुक उपलब्ध हैं। इनमें 1.8 मिलियन मुफ्त  और कॉपीराइट प्रपंच से मुक्त किताबें उपलब्ध हैं।
   सारी दुनिया में सन् 2009 में किताब की बिक्री में 0.5 प्रतिशत की गिरावट आई है। तकरीबन 35.04 बिलियन की किताबें बिकी हैं।  किताबों की बिक्री में आई गिरावट का ऑनलाइन किताब या ‘ई बुक’ की बिक्री के साथ कम और आर्थिकमंदी के साथ गहरा संबंध है। इसके अलावा पेपरबैक किताबों की बिक्री ने भी अपना नया बड़ा बाजार पैदा किया है। लेकिन मंदी ने हार्डकवर बुक और पेपरबैक दोनों को ही प्रभावित किया है। पेपरबैक की बिक्री में 3.0 प्रतिशत और हार्डकवर की बिक्री में 6.8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। उच्च शिक्षा और सामान्य अभिरूचि की किताबों की बिक्री बढ़ी है। धार्मिक किताबों की बिक्री 7 प्रतिशत घटी है। ‘ई बुक’ की बिक्री में  4.5 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। प्रोफेशनल किताबों की बिक्री में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ऑडियो किताब की बिक्री में 4.7 प्रतिशत की गिरावट आई है।
    अमेरिका के आंकड़े बताते हैं कि ‘ई बुक’ के मामले में यहां का बाजार तेजी से फैल रहा है। जून 2010 में ‘ई बुक’ की बिक्री 29.9 मिलियन डॉलर रही। जबकि सन् 2009 में इसी अवधि में 13.7 मिलियन डॉलर की बिक्री हुई थी। सन् 2010 की पहली छमाही में कुल 180 मिलियन डॉलर की बिक्री दर्ज की गई है। जबकि सन् 2009 में इसी अवधि में 59.2 मिलियन डॉलर की बिक्री दर्ज की गई थी।    



शनिवार, 31 जुलाई 2010

पेंग्विन के 75 साल और ई-बुक की चुनौतियां

 पेंग्विन प्रकाशन के 75 साल हो गए हैं। यह अपने आपमें बड़ी घटना है। पेंग्विन ने इन 75 सालों में पुस्तक की दुनिया में मूलगामी परिवर्तनों को जन्म दिया है। एक जमाना था किताब मंहगी आती थी, पहलीबार पेंग्विन ने छह पेंस में ब्रिटेन में पेपरबैक निकाला था ,उस समय इतने पैसे में एक सिगरेट आती थी । उसके बाद पेपरबैक पुस्तक की आंधी ने अज्ञान के दरवाजों पर जिस गति से दस्तक दी है उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। पेंग्विन ने पढ़ने और किताब खरीदने के रवैय्ये में बुनियादी बदलाव पैदा किया। पेंग्विन ने पन्द्रह हजार से ज्यादा टाइटिल छापे हैं और एक लाख से ज्यादा संस्करण प्रकाशित किए है।
     अब पुस्तक की दुनिया नए संचार संसार में दाखिल हो गयी है। यह ई-बुक का युग है। पेंग्विन के सामने ई-बुक का बड़ा उदीयमान बाजार है जिसको अभी सस्ता होना है। ई-बुक को सस्ता बनाने में पेंग्विन जैसे प्रकाशन की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। अभी ई-बुक के बाजार में पेंग्विन की हिस्सेदारी मात्र एक प्रतिशत है। अमेरिका और दुनिया के दूसरे शहरों में छह प्रतिशत डिजिटल बुक के ग्राहक है।
     पेंग्विन ने 75 वर्ष पूरे होने पर आईपेड के लिए डिजिटल बुक जारी की है। यह पुस्तक पोर्चगीज़ भाषा के महान लेखक जॉन ली केरी की रचना का अंग्रेजी अनुवाद है। कुछ किताबों के टीवी रूपान्तरण भी बाजार में उतारे हैं।
     इस साल की पहली छमाही में पेंग्विन का मुनाफा दुगुना हो गया है और उसने 44 मिलियन पॉण्ड की आय दर्ज की है। मुनाफे में आए इस उछाल का बडा कारण है भारत के डिजायनर और प्रेस वाले। उनके कारण पेंग्विन का मुनाफा दुगुना हो गया है। पेंग्विन ने प्रकाशन में आउटसोर्सिंग की और इसका उसे लाभ मिला है। भारत में प्रकाशन अभी बहुत सस्ता है। अकेले दिल्ली में ही 100 डिजायनर पेंग्विन के लिए काम कर रहे हैं।
    पेंग्विन ने सस्ती किताबें छापी हैं,विभिन्न विचारधारा और विषयों की किताबें छापी हैं इससे उसकी लोकतांत्रिक कारपोरेट प्रकाशक की इमेज बनी है। इस समय पेंग्विन के पास 3458 ई-बुक उपलब्ध हैं। इनमें ज्यादातर उपन्यास और गंभीर किस्म की कथेतर किताबें हैं।                             


रविवार, 11 जुलाई 2010

आदमी के सपनों में किताब की खोज

      स्त्री और पुरूष दोनों किस्म के लेखन में संरक्षक का बड़ा महत्व है। वर्जीनिया वुल्फ ने संरक्षक के सवाल पर विचार करते हुए लिखा है कि आम तौर पर स्त्री पुरूष दोनों ही अव्यावहारिक सलाह के आधार पर लिखते हैं। सलाह देने वाले यह सोचते ही नहीं हैं कि उनके दिमाग में क्या है। लेखक चाहे या न चाहे वे अपनी सलाह दे देते हैं।
      लेखक को अपना आश्रयदाता,संरक्षक,सलाहकार सावधानी के साथ चुनना चाहिए। लेखक को लिखना होता है जिसे अन्य कोई पढ़ता है। आश्रयदाता आपको सिर्फ पैसा ही नहीं देता बल्कि यह भी बताता है कि क्या लिखो,इसकी प्रच्छन्न रूप में सलाह या प्रेरणा भी देता है। अत: आश्रयदाता या संरक्षक ऐसा व्यक्ति हो जिसे आप पसंद करते हों।लोग जिसे पसंद करें।यह पसंदीदा व्यक्ति कौन होगा ? कैसा होगा ?
       प्रत्येक काल में पसंदीदा व्यक्ति की अवधारणा बदलती रही है। मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल तक लेखक के आश्रयदाता और पसंदीदा व्यक्ति का विवेचन करने के बाद वर्जीनिया वुल्फ ने लिखा है प्रत्येक लेखक की अपनी जनता होती है। अपना पाठकवर्ग होता है। यह पाठकवर्ग आज्ञाकारी की तरह अपने लेखक का अनुसरण करता है। उसकी रचनाएं पढ़ता है।लेखक अपनी जनता के प्रति सजग भी रहता है। उससे ज्यादा श्रेष्ठ बने रहने की कोशिश भी करता है। लेखक की अपनी जनता में जनप्रियता अपने लेखन के कारण होती है। क्योंकि लेखन ही संप्रेषण है।
          आधुनिक लेखक का संरक्षक उसका पाठकवर्ग है,जनता है।आधुनिक काल में पत्रकारिता का लेखक पर दबाव होता है कि वह प्रेस में लिखे,पत्रकारिता पूरी कोशिश करती है कि किताब में लिखना बेकार है, कोई नहीं पढ़ता,अत: प्रेस में लिखो। वुल्फ ने लिखा है कि इस धारणा को चुनौती दी जानी चाहिए। किताब को हर हालत में जिन्दा रखा जाना चाहिए।किताब को पत्रकारिता के सामने जिन्दा रखने के लिए जरूरी है कि उसकी गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाए।
      हमें ऐसे संरक्षक की खोज करनी चाहिए जो पढ़ने वालों तक पुस्तक ले जा सके। हमें किताब के साथ खेलने वालों की नहीं पढ़ने वालों की जरूरत है। ऐसा साहित्य लिखा जाए जो अन्य युग के साहित्य को निर्देशित कर सके,अन्य जाति के लोगों को आदेश दे सके।लेखक को अपने संरक्षक का चुनाव करना चाहिए,यह उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। सवाल यह है कि उसे कैसे चुना जाए ? कैसे अच्छा लिखा जाए ? वर्जीनिया वुल्फ ने सवाल उठाया है कि हमारे साहित्य में स्त्री का चेहरा तो आता है।किन्तु उसकी इच्छाएं नहीं आतीं। उसके भाव नहीं आते। उसके प्रति सबके मन में सहानुभूति है,वह सब जगह दिखाई भी देती है। किन्तु उसकी इच्छाएं कहीं भी नजर नहीं आतीं।
 ( प्रसिद्ध लेखिका वर्जीनिया वुल्फ)        
       वुल्फ कहती है पुस्तक कैसे पढ़ें इसके बारे में कोई भी निर्देश नहीं दिए जा सकते। प्रत्येक पाठक को जैसे उचित लगे पढ़ना चाहिए। उसे अपने तर्क का इस्तेमाल करना चाहिए और अपने निष्कर्ष निकालने चाहिए। हमें स्वतंत्रता का प्रयोग करना चाहिए। किन्तु कहीं ऐसा न हो कि इसका दुरूपयोग होने लगे। पाठक की शक्ति का सही इस्तेमाल करने के लिए उसके प्रशिक्षण की भी जरूरत है।
     पुस्तक पढ़ते समय यह ध्यान रखा जाए कि हम कहां से शुरूआत करते हैं ? हम पाठ में व्याप्त अव्यवस्था में कैसे व्यवस्था पैदा करते हैं, उसे कैसे एक अनुशासन में बांधकर पढ़ते हैं। जिससे उसमें गंभीरता से आनंद लिया जा सके। पुस्तक पढते समय हमें विधाओं में प्रचलित मान्यताओं का त्याग करके पढ़ना चाहिए।
     मसलन् लोग मानते हैं कि कहानी सत्य होती है। कविता छद्म होती है। जीवनी में चाटुकारिता होती है, इतिहास में पूर्वाग्रह होते हैं। हमें इस तरह की पूर्व धारणाओं को त्यागकर साहित्य पढ़ना चाहिए। आप अपने लेखक को निर्देश या आदेश न दें। बल्कि उसे खोजने की कोशिश करें। लेखक जैसा बनने की कोशिश करें। उसके सहयात्री बनें। यदि आप पहले से ही किसी लेखक की आलोचना करेंगे तो उसकी कृति का आनंद नहीं ले पाएंगे। यदि खुले दिमाग और व्यापक परिप्रेक्ष्य में कृति को पढ़ने की कोशिश करेंगे तो कृति में निहित श्रेष्ठ अंश को खोज पाएंगे।
       निबंध विधा के बारे में वर्जीनिया वुल्फ का मानना था निबंध छोटा भी हो सकता है और लंबा भी।गंभीर भी हो सकता है और अगंभीर भी। वह पाठक को आनंद देता है। वह किसी भी विषय पर हो सकता है। निबंध का अंतिम लक्ष्य है पाठक को आनंद देना। निबंध को पानी और शराब की तरह शुध्द होना चाहिए। अपवित्रता का वहां कोई स्थान नहीं है।निबंध में सत्य को एकदम नग्न यथार्थ की तरह आना चाहिए।सत्य ही निबंध को प्रामाणिक बनाता है।उसको सीमित दायरे से बाहर ले जाता है।सघन बनाता है।विक्टोरियन युग में लेखक लंबे निबंध लिखते थे ? उस समय पाठक के पास समय था।वह आराम से बैठकर लंबे निबंध पढ़ता था। लंबे समय से निबंध के स्वरूप में बदलाव आता रहा है। इसके बावजूद निबंध जिन्दा है। अपना विकास कर रहा है।वुल्फ का मानना था कि निबंध सबसे सटीक और खतरनाक उपकरण है।इसमें आप भगवान के बारे में लिख सकते हैं।व्यक्ति के जीवन के दुख,सुख के बारे में लिख सकते हैं।निबंध ही था जिसके कारण लेखक का व्यक्तित्व साहित्य में दाखिल हुआ। निबंध शैली का बडा महत्व है। किसी लेखक के बारे में लिख सकते हैं।यह भी सच है कि इतिहास का उदय निबंध से हुआ है।



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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...