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मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

फेसबुक और पुस्तकमेला



कोलकाता पुस्तकमेला में साहित्यिक पत्रिकाओं का सबसे बड़ा पंडाल होता है और उसमें अनेक लेखक अपनी पत्रिकाएं लिए बैठे रहते हैं। कुछ मेले में बिक्री करते भी नजर आते हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं के स्टॉल देखने लायक होते हैं। जिस पुस्तकमेले में साहित्यिक पत्रिकाओं का वैभव दिखता है वहां पर साहित्यप्रेम की जड़ें गहरी होती हैं।
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कोलकाता बुकफेयर में देश के बड़े लेखक और विचारक जितनी बड़ी तादाद में भाग लेते हैं और तरह -तरह के विषयों पर भाषण देते हैं वह अपने आप में विलक्षण अनुभव है यह अन्यत्र दुर्लभ है। इस मेले का आयोजन राज्य सरकार की मदद से प्रकाशक गिल्ड करता है।
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कोलकाता पुस्तकमेला में रविवार-शनिवार को इतनी भीड़ होती है कि आपको लोगों से सटकर चलना-निकलना होता है। औसतन 7-8लाख आते हैं। 15दिन तक चलने वाले मेले में कुल मिलाकर 35-40लाख लोग आएंगे।
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मुंबई में दौलत है और लाखों शिक्षितजन हैं। दिल्ली में पैसा है,शोहरत है,सत्ताकेन्द्र हैं,मध्यवर्गीय लेखकों की हेकड़ी है ,लेकिन बुकफेयर में भीड़ नहीं है। कोलकाता में न सत्ता है,न शोहरत है, न पैसा है,किताबें ही किताबें हैं और लाखों की भीड़ है। किताबों के खरीददार हैं। मुंबई,दिल्ली,मद्रास आदि किसी भी शहर में बुकफेयर में लोग सपरिवार बुकफेयर नहीं जाते लेकिन कोलकाता में सपरिवार बुकफेयर जाने का रिवाज है।
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जयपुर साहित्य मेले को टीवीवालों ने जिस तरह से प्रायोजित कवरेज के जरिए उछाला और साहित्य के नाम पर नॉनसेंस का प्रचार किया,जयपुर मेले की जनता की शिरकत को जिस तरह सनसनीखेज ढ़ंग से पेश किया उसे देखकर यही आभास मिलता है टीवीवालों ने साहित्यमेले देखे नहीं हैं।
कोलकाता पुस्तकमेला वास्तव अर्थ में पुस्तकमेला है। यहां सालाना मेले में 20करोड़ का कारोबार होता है और इसमें बहुत बड़ा हिस्सा निजी खरीद का है। इस मेले में किसी भी किस्म का कारपोरेट प्रायोजन नहीं है। यहां कोई पांचसितारा लॉन,हॉल और पण्डाल नहीं है,कोई टीवी पर सनसनीखेज कवरेज नहीं है लेकिन स्थानीयस्तर पर आम जनता की शिरकत मन को मुग्ध कर लेती है।
कोलकाता बुकफेयर में बड़ी तादाद में बूढ़े मर्द और औरतों को देख पाएंगे। ये वे लोग हैं जो बुद्धिजीवी हैं या पढ़ने के शौकीन हैं। जयपुर -दिल्ली बुकफेयर या साहित्यमेले में बूढ़े नहीं दिखते। किताबें हैं लेकिन बूढ़े नहीं हैं,यह चिन्ता की बात है। पुरानी किताब और पुराना पाठक समाज की शक्ति हैं।
हर मध्यवर्गीय बंगाली के घर में बच्चे को बुकफेयर के लिए अलग से पैसे हर साल दिए जाते हैं। बुकफेयर उनके सालाना-दैनन्दिन बजट का वैसे ही हिस्सा है जैसे वे अन्य चीजों पर खर्च करते हैं। काश ,बाकी महानगरों के शिक्षितलोग कुछ कोलकातावासी बंगालियों से यह सीख पाते !
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कोलकाता बुकफेयर का सबसे दुखदपक्ष है हिन्दीभाषियों की कम से कम शिरकत। यह शहर मारवाडियों से भरा पड़ा है। इनलोगों की सैंकड़ों संस्थाएं हैं। भारतीय भाषा परिषद जैसी शक्तिशाली संस्था है लेकिन इस संस्था का कोलकाता बुकफेयर में एक स्टॉल तक नहीं है। हिन्दी की पत्रिकाएं कहीं पर भी नजर नहीं आतीं। गिनती की तीन-चार हिन्दी किताबों की दुकान हैं। हिन्दीक्षेत्र के प्रकाशक यहां आते नहीं,कोलकाता में रहने वाले हिन्दीभाषी बुकफेयर जाते नहीं।जबकि कोलकाता में 50 लाख से ज्यादा हिन्दीभाषी लोग रहते हैं। कोलकाता के बाजार पर इनका एकाधिकार है। सारा बिजनेस नियंत्रित करते हैं।
एक ही शहर में रहने वाले मध्यवर्गीय बंगाली परिवारों और हिन्दीभाषी मध्यवर्गीय परिवारों में बुकफेयर को लेकर अंतर साफ देख सकते हैं। बंगाली बुकफेयर जाता है हिन्दीभाषी नहीं जाता। हिन्दीभाषियों की कमाने-खाने और सोने की आदत ने बुककल्चर को यहां के हिन्दीभाषियों में विकसित नहीं होने दिया।
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कोलकाता बुकफेयर का कोलकाता के हिन्दी लेखकों,हिन्दी के कॉलेज-विश्वविद्यालय शिक्षकों आदि पर न्यूनतम असर है। इनमें से अधिकांश लोग किताबें नहीं खरीदते और किताबें नहीं पढ़ते। वे हिन्दी में हांकते बहुत हैं। कोलकाता के हिन्दी के तथाकथित लेखक -शिक्षक आपको किताब खरीदने के लिए प्रेरित नहीं करेंगे। यदि आप किताब खरीद रहे हैं या किताब पर बात करना चाहते हैं तो हतोत्साहित जरूर करेंगे।
मसलन् आपने काशीनाथ सिंह की कोई किताब खरीदी और पूछा कि यह किताब कैसी है तो हिन्दी शिक्षक कहेगा अरे यार ,यह क्या है, मेरी तो कल ही काशीजी से एक घंटा बात हुई थी। पाठक भौंचक्का रह जाता है कि कमाल के लोग हैं ये ,मेरे किताब खरीदने और इनके 1घंटा काशीनाथ से बात करने के बीच में क्या रिश्ता है ?
कहने का आशय यह कि कोलकाता के हिन्दी के शिक्षकों-लेखकों ने किताब पढ़ने-पढ़ाने और लेखक पर बात करने की संस्कृति को विकसित ही नहीं किया। इसके विपरीत बंगाली शिक्षक-लेखक यह सब नहीं कहता।
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कोलकाता बुकफेयर ज्ञानसमुद्र है। यहां सनसनी नहीं बिकती। यहां किताबें बिकती हैं। जयपुरमेले पर जो संपादक और मीडिया महर्षि वाह-वाह और आह-आह कर रहे थे वे सोचें कि कोलकाता बुकफेयर में सलमान रूशदी को रोका गया ,मीडिया में खबर बनी और बात खत्म हो गयी। साहित्य में सनसनी नहीं होती।
यहां रोज लेखक एक से बढ़कर एक बेहतर बातें कहते हैं लोग सुनते हैं,मीडिया में रिपोर्ट होती हैं,लेकिन वे सनसनी नहीं बन पातीं। अमर्त्यसेन से लेकर गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक तक विश्वविख्यात लेखक आए ,अपनी बात कही और चले गए।असल में साहित्य एक कम्युनिकेशन है। वह कलह, सनसनी, पुलिस,थाना,मुकदमा नहीं है। जयपुरमेले ने साहित्य को साहित्य नहीं रहने दिया ,उसने साहित्य की मान-मर्यादा भ्रष्ट की है।
कुछ तो कोलकाता बुकफेयर से सीख सकते हैं मीडियावाले !!
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हिन्दी में जो लोग कहते हैं नवजागरण हो गया या हुआ था वे सही नहीं कहते। पुस्तक संस्कृति विकसित किए बिना नवजागरण नहीं होता। हिन्दी में सबकुछ है लेकिन पुस्तक संस्कृति नहीं है।
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हिन्दी लेखक दिल्ली में लाला की दुकान की शोभा बढ़ाते हैं ,किताबें नहीं खरीदते । यहां कोलकाता में बुकफेयर में लेखक मिलेगा लेकिन लाला की दुकान पर शोभा बढ़ाते नहीं ,बल्कि किताबें खरीदते हुए मिलेगा,पाठकों से बात करते मिलेगा,पाठकों को आशीर्वाद देते मिलेगा।
एकबार बुकफेयर में मैं महाश्वेता देवी से बातें कर रहा था देखा एक लड़की आई और उसने पैर छुए और उसकी माँ ने कहा आप लेखिका हैं,इसे आशीर्वाद दीजिए, इसकी हाल ही में शादी हुई है,यह आपका आशीर्वाद लेने बुकफेयर आई है।

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

उत्तरआधुनिक युग में फैशन से अनजाने और फैशन में डूबे लोग ?

    फैशन पर विचार करते समय फैशन से दूरी आवश्यक है। दूरी न हो तो फैशन में फंसने की संभावना होती है। रोलां बार्थ ने लिखा कि फैशन के लेखकों की यह खूबी होती है कि वे रोज नई-नई भाषा का निर्माण करते हैं। नई भाषा फैशन को जीवन में उतारने में सफल हो जाती है। पुरानी वस्तु, पुराने फैशन रूप को तथाकथित नए रूप में उतारने में फैशन की भाषा महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है, जबकि फैशन आलोचक की भूमिका फैशन लेखक से भिन्न होती है। वह चीजों को भूलता नहीं, फैशन को मानव-सभ्यता के विकास के क्रम में रखकर देखता है। यह लक्ष्य तब ही प्राप्त कर सकता है जब वह फैशन के चक्कर से मुक्त हो। आज फैशन में समूचे मानवीय कार्य-व्यापार को अपने दायरे में शामिल कर लिया है। शरीर, चलने का ढंग, अभिव्यक्ति की शैली, स्वास्थ्य, बीमारी, हाव-भाव आदि इसके दायरे में आ चुके हैं।
      प्रसिद्ध फैशन आलोचक एस.आर. स्टीनमेट्ज ने 'फैशन' शीर्षक निबंध में इसकी परिभाषा देते हुए लिखा : 'फैशन का अर्थ है युगानुरूप स्टाइल में चरित्रागत परिवर्तन। फैशन शुध्दत: तथ्यपरक होता है, उसमें सामाजिक परिवर्तन और नियंत्राण के कारण परिवर्तन आते रहते हैं।' इसका प्रधान कारण है परांपरागत फॉर्म या रूप का अप्रासंगिक हो जाना। परिणामत: फैशन को नए को आत्मसात करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यह नई परिस्थितियों का आत्मसातीकरण है। फैशन समय-केंद्रित होता है। सामाजिक गतिशीलता से उसका गहरा संबंध है। फैशन के उपभोग की जब इच्छाएं पैदा हो जाती हैं तब उसमें स्थिरता आती है। फैशन कभी भी लक्ष्यहीन और निर्विरोधपूर्ण परिवर्तनों के साथ समाप्त नहीं होता। फैशन में दिखावे और प्रदर्शन के तत्व समाहित रहते हैं। जब तक चंद लोग किसी फैशन का व्यवहार करते हैं उस पर फैशन के तौर पर बात नहीं की जा सकती। फैशन तब ही फैशन का दर्जा अख्तियार करता है जब व्यापक जनता के हिस्से प्रयोग करने लगें। फैशन का जब कोई रूप जन्म लेता है तो उसके प्रसार एवं बृहत्तर व्यवहार को रोकना मुश्किल होता है। उसका समूचे समाज पर प्रभाव होता है। इसीलिए यह कहा जाता है कि फैशन का एकांत में विकास नहीं होता। उसे विश्व रंगमंच चाहिए। फैशन से स्टाइल ही नहीं बदलता अपितु वह आत्मसातीकरण या समाहार की प्रक्रिया को रिवाज की तरह जीवन का अंग बना देता है। फैशन के प्रसार की प्रक्रिया में सामाजिक संस्कार और सामाजिक नैतिक मानदंड दबाव का काम करते हैं। फैशन के प्रसार के लिए जरूरी है कि इसके दायरे में उन लोगों को लाया जाए जो इसके दायरे से बाहर हैं।
फैशन की विशेषता है कि जो उसका विरोध करते हैं वे भी इसका अंग बन जाते हैं। अमूमन फैशन के प्रतिवाद का उदय तब होता है जब वह सार्वभौम रूप ग्रहण कर लेता है। फैशन को संवृत्ति बनानेवाले तत्व हमेशा वर्तमान समय में रहते हैं। नए के प्रति आकर्षण फैशन का भविष्य तय करता है। नए के प्रति उत्सुकता असुरक्षा से पैदा होती है। इसके लिए वह सब जगह से सामग्री ग्रहण करता है। फैशन का जन्म व्यापार के कारण नहीं होता। फैशनोन्मुख व्यवहार की अनुपस्थिति में फैशन का व्यापार नहीं
है। फैशनोन्मुख व्यवहार पूरी तरह खुला होता है। यही फैशन के व्यापार के लिए ऊर्जा का कार्य करता है। व्यापार उसकी अंतर्वस्तु तय करता है। फैशन अपरिचित के प्रति अप्रतिरोधात्मक आकर्षण पैदा करता है। यह प्रक्रिया संक्रमण काल में पैदा होती है।
मसलन, बीसवीं सदी में हृष्ट-पुष्ट स्वास्थ्य की जगह देखने में आकर्षक इकहरे या छरहरे शरीर की संरचना पर जोर दिया जा रहा है। सीधे और सुव्यवस्थित हाव-भाव के लिए सूर्य जैसी चमकीली त्वचा को आदर्शीकृत किया जा रहा है। इसके लिए लोशन, पाउडर एवं प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा त्वचा रक्षा के उपायों पर बल दिया जा रहा है। इसके लिए प्रेरक व्यक्तित्व के तौर पर हीरो, हीरोइन, लोकप्रिय व्यक्तित्व, खिलाड़ी, बिजनेस एक्जीक्यूटिव, उदीयमान व्यापारी आदि का फैशन के चरित्रा के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
कपड़ों या अन्य वस्तुओं के विज्ञापनों में आनेवाले पुरुष चरित्रों में चौड़े कंधे वालों को उभारा जा रहा है। अगर किसी मॉडल के कंधे चौड़े नहीं होते तो उसके लिए पैड का इस्तेमाल किया जाता है। आज के पुरुष के कंधे अपने परबाबा के कंधों से भी चौड़े हो गए हैं। अब जैकेट ढीली हो गई है। पैंट 'बैगी' हो गई है। लंबे-चौड़े ढीले-ढाले वैस्ट कोट को फुटबॉल की जर्सी ने अपदस्थ कर दिया है। यहां तक कि फुटबॉल की जर्सी कोट के नीचे ये लोग भी पहनने लगे हैं जिन्होंने कभी फुटबाल का मैदान तक नहीं देखा। इस तरह के पहनावे के कारण हमारी मुद्राएं काफी शांत, कम सख्त हो गई हैं। सीधे और आराम से पहनने लायक वस्त्रों को पहनने के कारण हमारे चलने का ढंग अति सतर्क और नजाकत भरा हो गया है। हमारी भुजाएं ज्यादा गतिशील और कम रचनात्मक हो गई हैं। इसी दौरान कलफ दिए गए कमीज के कालर के लोप ने गतिशीलता को उभारा है। पुराने वेस्ट कोट का पुनरोदय हुआ है। पुरुष की पैंट में आई शिथिलता का औरतों के वस्त्रों की लंबाई-चौड़ाई पर भी असर हुआ है।
         फैशन के बारे में यह कहना मुश्किल है कि कृत्रिम कहां है और स्वाभाविक कहां है। इस तरह का विभाजन बेमानी है। उसकी पहचान न तो कृत्रिम से होती है और न स्वाभाविक से। उसकी पहचान के अपने नियम हैं। इन नियमों की कोई सीमा नहीं है। फैशन का प्रारंभ मॉडलिंग और शारीरिक मुद्राओं से होता है। इसका दायरा एटीटयूड, पेशे, विचारों और व्यक्ति के हितों तक फैला हुआ है। अगर इकहरा शरीर फैशन के केंद्र में है तो औरतें दुबली होने की कोशिश करती हैं। युवा लड़की और भी ज्यादा छोटी उम्र की दिखने की कोशिश करती है।
आम जीवन का सघन विकास, अनेक फैशन रूपों का सृजन और लोप, जीवन में फैशन की गति को बढ़ा देता है। फैशन आज के सांस्कृतिक आविष्कार का कारखाना है जो सनक के साथ आता है और खारिज फैशन रूपों का अंबार खड़ा करके चला जाता है। फैशन के एक रूप के लोप के साथ ही नया रूप जन्म ले लेता है। यहां नए को कभी हतोत्साहित नहीं किया जाता। इससे मनुष्य की रचनात्मक समृध्दि का पुनर्निर्माण होता रहता है जो मनुष्य की रचनात्मक क्षमता को उभारता है। उम्र और वर्गगत अंतर ड्रेस में किस तरह की भूमिका अदा करते हैंऌस विषय पर हरबर्ट स्पेंशर की कृति प्रिंसिपल्स ऑफ सोशियोलाजी (चार खंड) में विस्तार से प्रकाश डाला गया है। वह लिखता है कि 'फैशन का उच्च और निम्नवर्ग विकास करते हैं। निम्नवर्गों के द्वारा फैशन का कोई रूप अपना लिये जाने के बाद उच्च वर्गों पर दबाव पड़ता है कि वे अपनी वेशभूषा बदलें।' स्पेंशर ने फैशन को हैसियत से जोड़ा है। यह पूर्व-औद्योगिक समाज में प्रचलित नजरिए का ही विकास है। एस.आर. स्टीनमेट्ज ने 'फैशन' शीर्षक निबंध में स्पेंशर के दृष्टिकोण का दृढ़ता से खंडन किया है। उनकी धारणा है कि 'पूंजीवादी समाज में फैशन में वर्गीय अंतर्विरोध दिखाई नहीं देते। अत: सामाजिक हैसियत को फैशन का एकमात्रा स्रोत नहीं मानना चाहिए।'
फैशन का सामाजिक हैसियत से भी रिश्ता होता है, इसके बगैर फैशन पर चर्चा संभव ही नहीं है। दूसरी बात यह कि फैशन का उदय हमेशा उच्चवर्गों में हुआ। फैशन को लेकर इसी वर्ग में प्रतिस्पर्धा रही है। प्रतिस्पर्धा के कारण अनेक नए रूपों ने जन्म लिया। उच्चवर्ग के फैशन रूपों के प्रयोग की निम्नवर्गों को किसी अवसर विशेष पर ही अनुमति दी जाती थी, यह स्थिति पूर्व-आधुनिक दौर में थी।




रविवार, 12 सितंबर 2010

संस्कृति उद्योग की नीति के अभाव में गुलामी का रास्ता

भारत में मौजूदा हालात काफी चिन्ताजनक हैं।हमारे यहां विकासमूलक मीडिया के बारे में तकरीबन चर्चाएं ही बंद हो गई हैं।समूचे मीडिया परिदृश्य देशी इजारेदार मीडिया कंपनियों ,बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियों और विज्ञापन कंपनियों ने वर्चस्व स्थापित कर लिया है।विभिन्न मीडिया मालों की बिक्री के माध्यम से ये कंपनियां दस हजार करोड़ रूपये से ज्यादा का कारोबार कर रही हैं।ये मीडिया की अन्तर्वस्तु ही तय नहीं कर रही हैं, सामान्यजन की अभिरूचियों,संस्कार,जीवन मूल्य, और आदतों को भी रच रही हैं।वे पुराना और बासी सांस्कृतिक मालों के साथ हमले कर रही हैं।इनमें नया बहुत कम मात्रा में आ रहा है। खासकर टेलीविजन में इस बासीपन की गंध आसानी से पासकते हैं।इस प्रसंग में यह तथ्य भी ध्यान मे रखना होगा कि मीडिया तकनीकी और सूचना तकनीकी में गहरा भाईचारा है।इनमे अन्तर्क्रिया चलती रहती है।ये दोनों मिलकर तकनीकी रूप मिलकर 'तत्क्षण पाने','सनसनी' और 'रोमांचकता' के तत्वों का अपने नजरिए में जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं।इनके कार्यक्रमों में 'तार्किकता' की बजाए 'निजी अनुभव' और 'भावुकता' का खूब रूपायन हो रहा है।विवादास्पद और अविचारित जीवन-शैलियों के रूप मुखर हो उठे हैं।'कल्पना' की जगह 'फैण्टेसी' ने ले ली है।परंपराएं हतप्रभ और रक्षात्मक मुद्रा अख्तियार कर रही हैं।संस्कृति को सुसंगत और समग्र दृष्टिकोण से देखने की दृष्टि का लोप होता जा रहा है।पी.डब्ल्यू. ब्रीडमैन के शब्दों में ''इस नए समाज में अवधारणाओं के रूप में समझने और सोचने की संभावनाएं खत्म होती जाती हैं।चिंतन-प्रक्रिया में किसी भी धारणा के बारे में पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते,उसे व्यवहार में कैसे लागू करें इस पर भी सोच नहीं पाते।इससे हमारे चिन्तन की आदतें प्रभावित होती हैं।'' एस मूर के शब्दों में '' अन्तर्राष्ट्रीय संचार की क्षमता आज इतनी बढ़ चुकी है कि वह प्रत्येक घटना और वस्तु की दवि बना रही है।सूचना अब माल की शक्ल ले चुकी है। कम्प्यूटरीकृत सूचना जगत राष्ट्रीय बाजार से स्वतंत्र,अंतर्राष्ट्रीय बाजार और बहाुष्ट्रीय निगमों के वर्चस्व में है।फलत: सूचना के लिए बाजार की शक्तियों पर निर्भरता बढ़ गई है।'' हकीकत में सूचना अब सिर्फ सूचना या वस्तु या खबर या प्रोसेस मात्र नहीं है और ना ही इसका समुच्चय है अपितु वर्चस्व स्थापित करने का प्रभावी उपकरण है।इस संदर्भ में देखें तो हमें सुसंगत नजरिए से संस्कृति उद्योग नीति बनानी चाहिए।
       केन्द्र में मनमोहन सिंह की सरकार के आने के बाद यह उम्मीद बंधी थी कि केन्द्र संस्कृति उद्योग की सुध लेगा।किंतु अभी तक इस क्षेत्र की समस्याओं की तरफ केन्द्र सरकार का ध्यान ही नहीं गया।यहां तक कि यूपीए के साझा कार्यक्रम में भी इस क्षेत्र के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया। संस्कृति उद्योग ऐसा उद्योग है जिसकी क्षमताओं के बारे में कोई भी संदेह व्यक्त नहीं कर सकता।इसमें तकरीबन पच्चीस हजार करोड़ रूपयों का सालाना कारोबार होता है। लाखों लोग इसमें काम करते हैं।प्रतिदिन सैंकड़ों नए लोगों को इसमें काम मिल रहा है।किंतु इसके बारे में प्रामाणिक तथ्यों,सूचनाओं,विश्लेषण,नीतियों आदि का अभाव है।यह अभाव क्यों है इसकी ओर किसी भी केन्द्र सरकार ने ध्यान नहीं दिया।इसके उत्पादन, पुनर्रूत्पादन का हमारे पास प्रामाणिक लेखा-जोखा नहीं है।इसके सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभावों के बारे में केन्द्र और राज्य सरकारों ने कभी आधिकारिक रूप में प्रयास नहीं किया। यहां तक कि संस्कृति उद्योग के बारे में समग्रता में कभी कोई नीति नहीं बनायी गयी। उलटे इस क्षेत्र को चोर दरवाजे से इस क्षेत्र को हमने अमेरिकी बहुराष्ट्रीय माध्यम कंपनियों के हवाले कर दिया गया है।
     भूमंडलीकरण के आने के बाद संस्कृति उद्योग की समस्याएं जटिल रूप अख्तियार कर चुकी हैं।बगैर नीति बनाए हमने अपना समूचा संस्कृति उद्योग बाहरी ताकतों के लिए खोल दिया है। बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियों के लिए मौजूदा युग स्वर्णकाल है।आज स्थिति यह है कि संस्कृति के बारे में हमारी कोई अपील और दलील सुननेवाला नहीं है।हम अपने ही देश में बेगाने हैं। जो बेगाने थे,पराए थे, उन्होंने सांस्कृतिक परिदृश्य पर कब्जा जमा लिया है।उनसे हमारी जनता का एक हिस्सा प्यार करने लगा है।जनता के बीच संस्कृति उद्योग के जरिए पश्चिम की परायी संस्कृति की बाढ़ आई हुई है।आज समूचा संस्कृति जगत किर्ंकत्तव्य-विमूढ़ है।सत्ता के शिखर से लेकर न्यायालय के दरवाजों तक बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियों ने घेराबंदी कर ली है। आज संस्कृति उद्योग के बारे में प्रत्येक फैसला बहुराष्ट्रीय माध्यम कपनियों के हितों को ध्यान रखकर किया जा रहा है।संस्कृतिकर्मियों के लिए यह शर्मिन्दगी और अपमान का दौर है। सांस्कृतिक आत्म-सम्मान कब हमारे समाज से चुपचाप उठकर चला गया हम नहीं जानते।हमारे जागरूक लोगों और राजनीतिक दलों को संस्कृति और संस्कृति उद्योग के प्रति इस उपेक्षाभाव की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।अभी भी समय नहीं गुजरा है हमें अपने देश के संस्कृति उद्योग और संस्कृति के बारे में नीति की बना लेनी चाहिए।
        आज यह एक वास्तविकता है कि देश के अधिकांश संस्कृतिकर्मियों और बौध्दिकों का बहुमत भूमंडलीकरण के पक्ष में नहीं है।अधिकांश जनता भी इसके पक्ष में नहीं है।इसके बावजूद यदि सत्ता के गलियारों में संस्कृति उद्योग को लेकर उदासीनता है तो इसके कारण गंभीर हैं। इस उदासीनता की जड़ें हमारे बौध्दिकों की सांस्कृतिक गुलामी में हैं।स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विभिन्न राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणापत्रों में भी इसका जिक्र नहीं मिलता।कहने का तात्पर्य यह है कि हमने संस्कृति और संस्कृति उद्योग को कभी गंभीरता से कभी नहीं लिया।हमने संस्कृति और संस्कृति उद्योग के साथ तदर्थ और उपयोगितावादी रिश्ता बनाया है।संस्कृति और संस्कृति उद्योग को हमने उपभोग से ज्यादा महत्व ही नहीं दिया।वस्तुत: उसे हमने अभिजन के हवाले कर दिया है। और अभिजन को सरकारों ने तरह-तरह के प्रलोभनों के जरिए बांध लिया है।वे संस्कृति के अभिजनवादी कारोबार में मशगूल हैं। मजेदार बात यह है कि अभिजन वर्ग को संस्कृति उद्योग नीति के अभाव पर कभी भी बोलते नहीं सुना गया।वे संसार के तमाम सवालों पर बोलते नजर आएंगे।किंतु संस्कृति और संस्कृति उद्योग नीति के सवाल पर कन्नी काट जाते हैं।
       आज हमारे यहाँ संस्कृति उद्योग के बड़े उत्पादक केन्द्र हैं।जिनमें प्रेस,फिल्म,रेडियो, टेलीविजन,वीडियो,ऑडियो उद्योग शामिल हैं।इन क्षेत्रों के बारे में हमारे यहां कुछ कानून हैं।किंतु इसे संस्कृति उद्योग के नाम से सरकार ने कभी परिभाषित नहीं किया और न कोई इसे लेकर नीति ही है।उल्लेखनीय है कि भूमंडलीकरण और विश्व व्यापार संगठन के सदस्य होने के नाते हमारी अब तक की तमाम घोषणाओं ने संस्कृति उद्योग को विदेशी बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियों के लिए पूरी तरह खोल दिया है। केन्द्र सरकार के पास सरकारी टेलीविजन - रेडियो के बारे में भी कोई साफ नीति नहीं है।लस्टमपस्टम तरीके से प्रसार भारती चल रहा है। प्रसार भारती से संबंधित सभी महत्वपूर्ण  सिफारिशें ठंडे बस्ते में पड़ी हैं।सुसंगत नीति के अभाव का ही दुष्परिणाम है कि आज हमारी विभिन्न केन्द्र सरकारों  द्वारा रेडियो तरंगों का निजी क्षेत्र के हित में दुरूपयोग हो रहा है।उल्लेखनीय है कि रेडियो तरंगे राष्ट्र के लिए आवंटित हैं।ये निजी क्षेत्र के लिए आवंटित नहीं हैं।यह अंतर्राष्ट्रीय नीति का पूंजीपतियों के हित में खुला उल्लंघन है।कोई भी दल रेडियो तरंगों के निजी क्षेत्र के हित में इस्तेमाल किए जाने के खिलाफ नहीं बोल रहा। हमारे पास संस्कृति उद्योग के प्रामाणिक आंकडे,कार्यरत लोगों की संख्या,वेतनमान,व्यापार एवं वितरण प्रणाली के नेटवर्क,नीतियों,प्रभाव आदि की प्रामाणिक सूचनाएं उपलब्ध नहीं है।सब कुछ छिपाकर और गुमनाम तरीके से हो रहा है।कायदे से केन्द्र सरकार को संस्कृति के विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग टास्क फोर्स बनाने चाहिए। जिससे संस्कृति उद्योग के बारे में नीति बनायी जा सके।
     



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