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बुधवार, 24 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाडा- सूचना समाज की नयी भाषा को पहचानो

         सोवियत संघ के पराभव के बाद सारी दुनिया में मार्क्सवादी चिंतकों को करारे वैचारिक सदमे और अनिश्चितता से गुजरना पड़ा है। सूचना समाज किस तरह वैचारिक विपर्यय पैदा कर सकता है इसके बारे में कभी विचार ही नहीं किया गया। अधिकांश समाजवादी विचारक इसे सामान्य और एक रूटिन परिवर्तन मानकर चल रहे थे। वे यह भी देखने में असमर्थ रहे कि परवर्ती पूंजीवादी मॉडल को लागू किए जाने के बाद मार्क्सवाद का भी रूप बदलेगा। पुराने किस्म का मार्क्सवाद चलने वाला नहीं है। लेकिन अनेक विचारकों के यह बात गले नहीं उतर रही है। एक तरफ मीडिया में समाजवाद विरोधी उन्माद और दूसरी ओर सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ की धड़कनों का हाथ में न आना, यही वह बिडम्वना थी जिसने मार्क्सवादियों को हतप्रभ अवस्था में पहुँचा दिया। सूचना समाज में मार्क्सवाद की प्रकृति और भूमिका एकदम बदल गयी है। राजनीतिक प्रतिवाद की शक्ल बदल गयी है। लोगों को जोड़ने और उनसे संवाद करने और संपर्क करने के तरीके बदल गए। सूचना समाज आने के पहले राजनीतिक मुहावरे,पदबंध आदि संचार के हथकंड़े के रूप में इस्तेमाल किए जाते थे। सूचना समाज के जन्म के साथ ही राजनीतिक पदबंधों और मुहावरों की जगह सांस्कृतिक पदबंधों और मुहावरों ने ले ली। अब सारी चीजें वस्तुओं और उपभोक्तावादी तत्वों के जरिए व्याख्यायित होने लगीं। साहित्य से लेकर राजनीति तक सब जगह उपभोक्तावाद की भाषा और मुहावरे चले आए। मसलन पहले नामवर सिंह की तुलना आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के साथ की जाती थी नए दौर में उनकी तुलना अमिताभबच्चन से होने लगी। प्रसिद्ध आलोचक सुधीश पचौरी ने उन्हें हिन्दी के अमिताभ बच्चन के नाम से पुकारा। कहने का अर्थ यह है कि सूचना समाज अपने साथ नया यथार्थ और नयी भाषा लेकर आया है और इस नए यथार्थ को पढ़ने के लिए नए किस्म की सैद्धांतिकी की भी जरूरत है। इसी प्रसंग में प्रसिद्ध मार्क्सवादी विचारक फ्रेडरिक जेम्सन ने मार्क्सवाद की पांचवी थीसिस में लिखा ‘‘राजनीतिक तथा आर्थिक दोनों क्षेत्रों के लिए संस्कृति का बढ़ता हुआ महत्व इन क्षेत्रों के सोद्देश्यमूलक अलगाव या विभेदीकरण का परिणाम नहीं, बल्कि स्वयं जिन्सीकरण (कोमोडिफिकेशन) की अपेक्षाकृत अधिक विश्वव्यापी संतृप्ति और प्रवेश है। जिन्सीकरण अब उस सांस्कृतिक क्षेत्र के उन विशाल क्षेत्रों को अपना उपनिवेश बनाने में सक्षम हो गया है, जो क्षेत्र अब तक इससे बचे थे और सचमुच इसके विरुध्द या इसके तर्क से असहमत थे। यह तथ्य कि संस्कृति आज अधिकांशतया व्यवसाय में बदल गई है, इसका परिणाम यह हुआ है कि अधिकांश चीजें जो पहले विशिष्ट रूप से आर्थिक और वाणिज्यिक समझी जाती थी, वे भी अब सांस्कृतिक बन गई हैं, यह ऐसी व्याख्या है जिसमें इमेज सोसायटी या उपभोक्तावाद के विभिन्न निदानों को शामिल करने की आवश्यकता है।’’
‘‘इस प्रकार के विश्लेषण, मसलन जिन्सीकरण (कामोडिफिकेशन) की अवधारणा संरचनात्मक और गैर-उपदेशात्मक, में अपेक्षाकृत अधिक सामान्य रूप में मार्क्सवाद को सैध्दांतिक बढ़त हासिल है। नैतिक मनोवेग राजनीतिक कार्रवाई उत्पन्न करता है लेकिन यह बहुत ही क्षणिक होती है जो शीघ्र ही पुनर्समाहित और पुनर्शमित हो जाती है। यह अपने विशिष्ट विषयों को अन्य आंदोलनों के साथ बांटने के लिए शायद ही प्रवृत्त होती है। लेकिन केवल इस प्रकार के संलयन और निर्माण द्वारा ही राजनीतिक आंदोलनों का विकास और विस्तार संभव है। सचमुच मैं इस मुद्दे को दूसरी तरह से कहना चाहूंगा कि उपदेशपरक राजनीति में वहीं विकसित होने की प्रवृत्ति होती है जहां संरचनात्मक संज्ञान और समाज का मानचित्रण (मैपिंग) अवरुध्द होता है। समाजवाद के असफल होने का बोध होने पर उत्पन्न आक्रोश को आज के संजातीय और धार्मिक प्रभुत्व के रूप में, उस शून्य को नए अभिप्रेरकों से भरने के एक हताश अंध प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।’’
‘‘जहां तक उपभोक्तावाद का संबंध है, यह आशा की जा सकती है कि यदि इसके स्थान पर जान बूझकर कुछ और बिलकुल भिन्न चीज चुनना हो तो यह ऐतिहासिक रूप में उतना ही महत्वपूर्ण सिध्द होगा जितना कि मानव समाज को एक जीवन शैली के रूप में उपभोक्तावाद के अनुभवों से गुजरना। लेकिन विश्व के अधिकांश के लिए उपभोक्तावाद के व्यसन वस्तुनिष्ठ रूप में उपलब्ध नहीं होंगे, तब यह संभव प्रतीत होता है कि 1960 के दशक की रैडिकल थ्योरी का दूरदर्शितापूर्ण निदान : कि पूजीवाद स्वयं ठीक उसी रूप में एक क्रांतिकारी शक्ति है जिस रूप में यह नई आवश्यकताओं और इच्छाओं को जन्म देता है लेकिन जिनकी पूर्ति यह नहीं कर सकता है : नई विश्व व्यवस्था के विश्व स्तर पर प्राप्त होगा।’’
‘‘सैध्दांतिक स्तर पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में स्थायी संरचनात्मक बेरोजगारी, वित्तीय सट्टेबाजी और अनियंत्रणीय पूंजी संचलन, इमेज सोसाइटी के ज्वलंत मुद्दे व्यापक रूप में उस स्तर पर एक दूसरे से अंतर्संबंधित हैं जिसे उनकी अंतर्वस्तु, उनके अमूर्तन का अभाव (ठीक उसके विपरीत जिसे किसी अन्य काल में उनका 'आत्मनिर्वासन' (एलीनेशन) कहा जाता) कहा जा सकता है। जब हम विश्वीकरण एवं सूचनाकरण (इनफार्मेटाइजेशन) जैसे मुद्दों को जोड़ने का प्रयास करते हैं तो द्वंद्वात्मकता का और भी विरोधाभासी स्तर मिलता है। जब नए विश्व नेटवर्कों (वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों) की राजनीतिक और विचारधारात्मक संभावनाओं को आज के विश्व तंत्र की स्वायत्तता के लोप तथा किसी राष्ट्र या क्षेत्र की अपनी स्वायत्तता और अस्तित्व प्राप्त करने की असंभावना या स्वयं को विश्व बाजार से अलग करने की असंभावना के साथ जोड़ा जाता है तो प्रतीयमानत: जबरदस्त असमंजस की स्थिति उत्पन्न होती है। किसी एक विचार को अपना लेने मात्र से बुध्दिजीवी इस गलियारे से रास्ता नहीं निकाल सकते। वास्तव में संरचनात्मक विरोधाभासों के परिपक्व होने से ही नई संभावनाओं का विहान होता है। पुनश्च: जैसा कि हीगेल ने कहा होता; हम कम से कम इस असमंजस को 'नकारात्मक से चिपके रहकर' बरकरार रख सकते हैं, उस स्थान को जीवित रखकर जहां से नव्य की अप्रत्याशित रूप से उत्पत्ति की आशा की जा सकती है।’’

रविवार, 9 दिसंबर 2012

ज्ञानक्रांति का फैसला कब लेंगी ममता


सपने देखना अच्छी बात है। सपनों में आनंद लेना भी अच्छी बात है लेकिन सपनों को साकार करना उससे भी अच्छी बात है। जो राजनेता सपने देखता है और सपने साकार करता है वह विज़नरी कहलाता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यदि पश्चिम बंगाल का सही अर्थ में आइकॉन बनना है तो राजनेता की बजाय विज़नरी बनना होगा। कथनी और करनी के भेद को खत्म करना होगा। भाषण कम और काम ज्यादा। जलसे कम और एक्शन ज्यादा की कर्मसंस्कृति पैदा करनी होगी। राज्य में पूंजीनिवेश भाषणों से नहीं होता। कोई भी उद्योगपति भाषणों से प्रभावित होकर राज्य में पूंजी निवेश नहीं करता। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उनके हाथ से राज्य का यथार्थ खिसकता चला जा रहा है। वे जब से मुख्यमंत्री बनी हैं उनकी आमलोगों से दूरी बढ़ी है ,राज्य की समस्याओं से भी अलगाव बढ़ा है। वे अपने दल के कॉकस और नौकरशाही के घेरे में कैद हैं। कॉकस और नौकरशाही उनको खुलेमन से न तो सोचने देती है और नहीं अपने ही लोगों पर विश्वास करने देती है। जनता और यथार्थ से अलगाव के कारण व्यापक पैमाने पर मुख्यमंत्री के मन में संदेह और अविश्वास बढ़ा है। संदेह और अविश्वास के कारण इनदिनों वे जो भी बोल रही हैं उसमें साफतौर पर फांक नजर आती है। इस फांक के दर्शन इसबार आईआईटी2012 के ग्लोबल सम्मेलन में उनके द्वारा दिए गए भाषण में भी साफ नजर आई। 

एकजमाना था ममता सबको अपील करती थी, लेकिन विगत शुक्रवार को वे जब साइंस सिटी में बोल रही थीं तो वे किसी को प्रभावित नहीं कर पा रही थीं। जानकारों की राय में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भाषण किसी भी दृष्टि से अपील नहीं कर पा रहा था। मुख्यमंत्री के राजनीतिक स्वप्न और आईआईटी के युवाओं के सपनों में कोई मेल नहीं दिख रहा था। इस मौके पर एक आईआईटी स्नातक ने कहा कि ममताजी के शासन में आने के बाद हमें इस राज्य में आईटी का कोई भविष्य ही नजर नहीं आ रहा। मैंने ऐसे ही पूछा कि उन्हें मुख्यमंत्री की अपील पर भरोसा क्यों नहीं है ? उसने कहा कि आईटी क्षेत्र कोई कुटीर उद्योग नहीं है कि कम पूंजी से आरंभ किया जाय। राज्य सरकार के पास कोई विज़न नहीं है।ममता नहीं जानती कि राज्य में सूचना प्रौद्योगिकी किस तरह आए और किस तरह युवाओं को रोजगार मिले। इस युवा आईआईटी स्नातक ने कहा कि अनेक आईटी कंपनियां अपना कारोबार फिलहाल पश्चिम बंगाल में न करने का फैसला ले चुकी हैं और कई कंपनियों ने अपने कारोबार को धीरे धीरे हैदराबाद एवं बंगलौर के केन्द्रों में शिफ्ट कर दिया है। सेक्टर पांच में इन दिनों कोई नई कंपनी आने को तैयार नहीं है। विगत डेढ़ साल में एक भी नई आईटी कंपनी ने अपना काम कोलकाता में आरंभ नहीं किया है।

एक अन्य स्नातक ने गुस्से में कहा कि मुख्यमंत्री को आईटी क्षेत्र को इस राज्य में लाना है तो पहले माफिया और फिरौतीबाजों को नियंत्रित करना होगा। सॉल्टलेक के सेक्टर पांच में भाड़े की दर में आई जबर्दस्त गिरावट बताती है कि राज्य की अर्थव्यवस्था एकदम चरमरा गयी है।

ममता सरकार के आने के पहले सेक्टर पांच में 65-80 रूपये प्रति वर्गफुट भाड़ा था आज यह भाड़ा गिरकर 25-30 रूपये प्रति वर्गफुट हो गया है। बड़ी बड़ी बिल्डिगें खाली पड़ी हैं उनमें कोई भी व्यक्ति नजर नहीं आता। भारत के महानगरों में इस तरह का सुनसान माहौल कहीं पर भी नजर नहीं आएगा जैसा सेक्टर पांच में बन रहा है। नई कंपनियों का न आना और पुरानी कंपनियों का अपने कारोबार का विस्तार न करना,इस बात का संदेश है कि कहीं न कहीं मंदी और राज्य प्रशासन की नौकरशाही के कारण आईटी क्षेत्र के उद्यमी हतोत्साहित हुए हैं।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब आईआईटी ग्लोबल सम्मेलन 2012 को सम्बोधित कर रही थीं तो युवा उद्यमी राज्य सरकार की ओर से किसी नई सुविधाओं की घोषणाओं की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन इसबार मुख्यमंत्री ने नए उद्यमियों को आकर्षित करने के लिए कोई नया पैकेज घोषित नहीं किया। इस सम्मेलन में 600 आईआईटी स्नातक भाग ले रहे हैं। सम्मेलन में भाग ले रहे दिल्ली से आए यशवंत सिंहा ने कहा कि ममताजी को यदि राज्य में सूचना तकनीक को जनप्रिय बनाना है तो उनको सीधे स्कूल,कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कम्प्यूटर के प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए। विश्वविद्यालय शिक्षा का आधुनिकीकरण करना चाहिए,शिक्षकों और छात्रों को लैपटॉप-आईपैड आदि मुहैय्या कराने चाहिए। सूचना तकनीक के प्रति अपील पैदा करने लिए उसे दैनंदिन अकादमिक कामकाज और कम्युनिकेशन का हिस्सा बनाना बेहद जरूरी है और यह भी जरूरी है कि उच्चशिक्षा को परंपरागत शिक्षण-प्रशिक्षण की पद्धति के बाहर लाया जाय। इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाय और शिक्षा के आधुनिकीकरण को प्रमुख एजेण्डा बनाया जाय। मुख्यमंत्री यदि चाहती हैं कि पश्चिम बंगाल फिर से भारत के मानचित्र पर उभर कर सबसे ऊपर आए इसके लिए पहली जरूरत है राज्य की समूची शिक्षा व्यवस्था का उच्च कम्युनिकेशन तकनीक के साथ एकीकृत करके आधुनिकीकरण किया जाय। उच्चमाध्यमिक से लेकर एमए-पीएचडी करने वालों तक राज्य सरकार मुफ्त लैपटॉप बांटे और शिक्षकों को मुफ्त इंटरनेट कनेक्शन दिए जाएं। एक अन्य आईआईटी स्नातक ने कहा कि पश्चिम बंगाल में यदि बिजली की सप्लाई सही है और बिजली कभी नहीं जाती है तो परंपरागत विश्वविद्यालयों को सूचना तकनीक के उपयोग बड़ा क्षेत्र बना देना चाहिए। अकादमिक जगत में आधुनिकशिक्षा को लाने में 19वीं सदी में बंगाल अग्रणी था ,लेकिन नए आधुनिक माहौल में पश्चिम बंगाल की समूची शिक्षा व्यवस्था को समुन्नत संचार तकनीक से जोड़कर ज्ञानक्रांति के क्षेत्र में अग्रणी बनाया जाना चाहिए। हैदराबाद से आए पी.राजू का कहना था कि इंटरनेट कनेक्शन को केन्द्र सरकार को नाममात्र के शुल्क के आधार पर मुहैय्या कराना चाहिए। इससे इंटरनेट-कम्प्यूटर आदि के उपयोग में तेजी से इजाफा होगा।

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

साइबरयुग में प्रतिक्रांति के नए रूप

     साइबरयुग में प्रतिक्रांति के तरीके वे ही नहीं हैं जो शीतयुद्ध के जमाने में थे। साइबरयुग की केन्द्रीय उपलब्धि है समाजवाद का अंत। इस अंत को संभव बनाने में समाजवादी देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों के आंतरिक कलह ,भ्रष्टाचार,बर्बर व्यवहार की प्रमुख भूमिका रही है। लेकिन सारी दुनिया में सूचना क्रांति और साइबर संस्कृति के प्रसार ने समाजवाद के खिलाफ नए किस्म की चुनौतियों को प्रस्तुत किया है। इन चुनौतियों का सबसे अच्छा रूप समाजवादी देशों में ही नजर आ रहा है और दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सूचना के अबाधित प्रवाह में नजर आ रहा है।
   साइबरयुग में अभिव्यक्ति को बाधित करना प्रतिक्रांतिकारी कार्य है। परवर्ती पूंजूवाद के पहले अभिव्यक्ति को नियंत्रित करना संभव था। इसलिए वह तार्किक भी लगता था। उस जमाने में सेंसरशिप का तर्क पूंजीवाद और समाजवाद दोनों की ही संगति में था। लेकिन परवर्ती पूंजीवाद ने सेंसरशिप को आत्म-सेंसरशिप में बदल दिया है। यही वजह है कि पूंजीवाद बड़े पैमाने पर इन दिनों आत्म-सेंसरशिप पर जोर दे रहा है।
    आत्म-सेंसरशिप कारपोरेट संस्कृति का आज अभिन्न हिस्सा है। मीडिया को भी आत्म-सेंसरशिप अपनाने के लिए कारपोरेट घरानों ने बाध्य कर दिया है। इसके चलते सतह पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महसूस होती है वास्तव में आत्म-सेंसरशिप जारी है। सतह पर हम आजादी महसूस करते हैं लेकिन वास्तव जिंदगी में साइबर निगरानी के दायरे में रहते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे कि जिस तरह क्रांति का मुहावरा बदला है वैसे ही प्रतिक्रांति का मुहावरा भी बदला है।
      समाजवादी चीन और क्यूबा में ऐसा बहुत कुछ घट रहा है जो प्रतिक्राति की कोटि में आता है। परवर्ती पूंजीवाद के पहले समाजवाद के खिलाफ बाहर से सैन्य और गैर-सैन्य हमले संगठित किए जाते थे। लेकिन परवर्ती पूंजीवाद के दौर में समाजवाद के अंदर से प्रतिक्रांतिकारी हमले संगठित किए जा रहे हैं। पहले पूंजीपतिवर्ग और अमेरिका आदि साम्राज्यवादी देश इन हमलों को नियोजित करते थे,लेकिन परवर्ती पूंजीवाद में स्वयं साम्यवादी कतारों के अंदर से क्रांति के खिलाफ संगठित हमले हो रहे हैं। सोवियत संघ और अन्य समाजवादी देशों में साम्यवादी शासन के पराभव का यह बुनियादी कारण है।
      स्वयं से नफरत करना,अपनी भाषा,अपने विचार.अपनी संस्कृति और अपनी सभ्यता से नफरत करना परवर्ती पूंजीवाद का बुनियादी मंत्र है। एक वाक्य में कहें कि परवर्ती पूंजीवाद स्वयं से नफरत पैदा करने के चक्कर में व्यक्ति को स्वयं के खिलाफ खड़ा कर देता है और इसके चलते मानव मात्र के प्रति नफरत.बेगानापन,उपेक्षा आदि को एक आमफहम फिनोमिना बना देता है। व्यक्ति का व्यक्ति के ऊपर से विश्वास खत्म हो जाता है। अब एक-दूसरे पर अविश्वास और संदेह करने लगते हैं। यह फिनोमिना समाजवादी देशों में परवर्ती पूंजीवाद की विश्वव्यापी प्रक्रिया के माध्यम से  प्रवेश करता है और समाजवाद धराशायी हो जाता है। लेकिन जिन देशों में अभी साम्यवादी दलों का शासन है ,खासकर चीन और क्यूबा में उन्हें तो कम से कम इन चीजों से बचना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि चीन और क्यूबा में परवर्ती पूंजीवाद के प्रतिक्रांतिकारी संस्कार तंजी से फल फूल रहे हैं।
      प्रतिक्रांति का पहला रूप है साइबरयुगीन वास्तविकताओं से इंकार। साइबरयुग की विश्वव्यापी प्रवृत्तियों की अनदेखी से प्रतिक्रांति की प्रबल संभावनाएं हैं। मसलन नागरिकों को रीयल टाइम कनेक्टविटी से वंचित करना प्रतिक्रांति है। साइबर जासूसी प्रतिक्रांति है। सरकारी एक्शन को हमेशा सही ठहराना,टीवी या मीडिया में सरकारी भोंपू के रूप में काम करना, यानी सरकारी प्रचारक के रूप में काम करना प्रतिक्रांति है।
    चीन में नागरिकों को सरकार के पक्ष में लिखने के लिए पैसा दिया जाता है। खासकर इंटरनेट पर लिखने लिए लेखकों को प्रति पोस्ट पचास सेंट दिए जा रहे हैं। इस पद्धति के जरिए आम जनता का मुँह बंद करने वालों का नेटवर्क तैयार किया गया है। उन लोगों को खासकर निशाना बनाया जा रहा है जो कम्युनिस्ट पार्टी के विचारों से असहमत हैं। साइबरयुग में असहमति को कुचलना प्रतिक्रांति है, व्यर्थ का प्रयास है।
     साइबर संस्कृति का प्रभाव है कि आज चीन में इंटरनेट पर दस लाख से ज्यादा फोरम हैं और 20 करोड़ से ज्यादा ब्लॉग हैं। हजारों चाटरूम हैं। प्रतिदिन हजारों नए ब्लॉग बन रहे हैं। चीन परेशान है इस साइबर संस्कृति के प्रसार से। चीन के बारे में प्रतिदिन सत्य के नए रूप इंटरनेट में सबसे पहले उद्घाटित हो रहे  हैं।
    चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की बेवसाइट पर किसी भी किस्म की टिप्पणियां नजर नहीं आतीं अथवा एक-दो टिप्पणियां नजर आती हैं। मसलन् पीपुल्स डेली ऑन लाइन,झिंहुआ ऑनलाइन पर इक्का-दुक्का कमेंट हैं। सीना डॉट कॉम जैसे चीन के सबसे बड़े कॉमर्शियल इंटरनेट पोर्टेल पर 373 कमेंट हैं।
     मजेदार बात यह है कि चीन में यूजर वही राय व्यक्त कर सकते हैं जिसकी कानून इजाजत देता है। चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के पक्ष में लिखने वालों को प्रति पोस्ट पचास सेंट देने का रिवाज चलाकर अभिन्यक्ति को एक तरह से खरीदा जा रहा है। सवाल यह है कि पैसे के लालच में लिखी बातें क्या सच पर रोशनी डाल पाएंगी ?
     इसी तरह सरकारी प्रयासों से आधिकारिक तौर पर नेट पर राय देने वालों की ऑनलाइन टीमें पार्टी के द्वारा बनाई जा रही हैं। गंगजू प्रदेश में ऐसी ही ऑनलाइन कमेंट लिखने वालों की 650 लोगों की टीम बनाई गई है जिसका वेस्टर्न बिजनेस पोस्ट नामक अखबार ने खुलासा किया है। इन लोगों का काम है नेट पर जाना और विभिन्न स्थानों पर टिप्पणियां लिखना। बेवसाइट,ब्लॉग,बेव बुलेटिन आदि पर कमेंट लिखना। चीन में इंटरनेट और साइबर संस्कृति का इतना व्यापक विस्तार साम्यवाद के कारण नहीं हुआ है बल्कि साइबरसंस्कृति और संचार क्रांति के कारण हुआ है। संचार क्रांति परवर्ती पूंजीवाद की देन है। साम्यवादी क्रांति की नहीं।                    





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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...