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बुधवार, 7 सितंबर 2016

वल्गर मार्क्सवाद के खतरे

        वल्गर आलोचना और वल्गर मार्क्सवाद का गहरा संबंध है।यह संयोग की बात है कि जब मार्क्सवाद की वल्गर धारणाएं सामने आई हैं उसी दौर में सबसे ज्यादा वल्गर साहित्यालोचना भी लिखी गयी है।दोनों में एक चीज साझा है और वह है सत्य की वस्तुगत सत्ता का अस्वीकार।वे जगत और कलाओं के यांत्रिक और इच्छित चित्रण और इच्छित व्याख्या पर जोर देते हैं।इच्छित आलोचना संसार रचने के लिए अपने पक्ष में मनमाने और अप्रासंगिक उद्धरणों का उपयोग करते हैं जिससे यथार्थ को और भी आँखों से ओझल कर सकें।यह काम आलोचना बचाने और आलोचना संवारने के नाम पर करते हैं।इससे आलोचना संवरती नहीं है बल्कि पसर जाती है।

बेहतर आलोचक वह है जो आलोचना के सारवान सवालों को उठाए और उन पर केन्द्रित होकर बहस सृजित करे।बहस सृजित करने के लिए पुराने प्रचलित आलोचना के ढाँचे और साँचों से बाहर निकलने की जरूरत है।नया पाठक सीधे विषय पर केन्द्रित लेखन पढ़ना चाहता है ,वह आलोचना को आलोचना के रूप में देखना चाहता है।वह आलोचना और साहित्य के सुसंगत संबंध को देखना चाहता है।वह समस्या पर केन्द्रित विवाद देखना चाहता है।वह महाख्यान नहीं सुनना चाहता।वह हिमायत में दिए गए उद्धरणों को नहीं ,समस्या के विश्लेषण को देखना चाहता है।

आज के जमाने में इमेज,प्रक्रिया और ज्ञान के विकास से जुड़े पहलुओं पर केन्द्रित होकर विचार करने की जरूरत है।इस पक्ष की ओर सबसे पहले लेनिन ने ध्यान खींचा था।आप यदि विश्लेषण करते हुए इकतरफा ढ़ंग से विवेचन करते हैं तो भाववादी पद्धति के शिकार हो जाते हैं।चाहे आपका नजरिया कुछ भी हो।इकतरफा ढ़ंग से सोचने और लिखने की कला बुर्जुआ कला है,इसका मार्क्सवाद से कोई लेना-देना नहीं है।जब आप अपने विषय के प्रति अंधभाव से देखने और लिखने लगते हैं तो बुर्जुआ विचारधारा के नजरिए से देखने लगते हैं और संयोग की बात है अरूण माहेश्वरी की किताब ´आलोचना के कब्रिस्तान से´किताब में यह प्रवृत्ति ठोस रूप में अभिव्यक्त हुई है।

मैं यहां सिर्फ एक ही समस्या की ओर ध्यान खींचना चाहूँगा। अरूण माहेश्वरी की ´अध्यापकीय शैली´ और ´अध्यापकीय आलोचना´की अपने लेखों में कई जगह तीखी आलोचना की है और उसकी व्यर्थता की ओर ध्यान खींचा है।यह सच है साहित्यालोचना का एक अंश ऐसा भी है जिसमें अस्वीकार करने लायक बहुत कुछ है लेकिन हिन्दी के संदर्भ में यह भी सच्चाई है कि आलोचना का अधिकांश हिस्सा वही है जिसे अध्यापकों ने ही लिखा है।खासकर प्रगतिशील और उदार आलोचना के निर्माण में अध्यापकों की बहुत बड़ी भूमिका रही है।

हिन्दी आलोचना का सबसे मूल्यवान वही है जो अध्यापकों ने लिखा है।इतिहास से लेकर आलोचना तक इन अध्यापकों का लेखन फैला हुआ है।मैं अरूण माहेश्वरी के नजरिए का एक नमूना देना चाहूँगा। लिखा है ´जहां तक शुक्लजी का संबंध है,उनकी इतिहास-दृष्टि के साथ कोई निश्चित विश्व-दृष्टि जुड़ी हुई थी,यह दावा तो उनके बड़े से बड़े प्रशंसक भी नहीं करते।´यह निष्कर्ष तथ्य और सत्य से कहीं से भी मेल नहीं खाता।इसी तरह रामविलास शर्मा,नंददुलारे बाजपेयी आदि के बारे में भी अरूण माहेश्वरी ने आत्मगत निष्कर्ष निकाले हैं। आलोचना का यह तरीका स्वयं में समस्यामूलक है,इससे यह पता चलता है आलोचना की किसी भी पद्धति और परिप्रेक्ष्य में अरूण माहेश्वरी की कोई दिलचस्पी नहीं है।साहित्य समीक्षा को बिना किसी आलोचना पद्धति के सहारे लिखने के कारण इस तरह के मनमाने निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

मैं पहले अरूण माहेश्वरी की किताब पर लिखने से बच रहा था लेकिन उसने जिस तरह प्रतिवाद में लिखा है उसने मजबूर कर दिया है कि उसकी उठाई समस्याओं पर वस्तुगत ढ़ंग से बात की जाय।पहली बात यह कि भारत में नवजागरण जैसी कोई परिघटना घटित नहीं हुई है।इसलिए नवजागरण के परिप्रेक्ष्य में साहित्य मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन करने से बचना चाहिए।कम से कम भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर प्रेमचंद तक निराला से लेकर य़शपाल तक के लेखन में कहीं पर भी नवजागरण पदबंध नहीं आता।इनमें से कोई भी लेखक नवजागरण पदबंध का प्रयोग नहीं करता।यहां तक कि बंगाल –महाराष्ट्र के राष्ट्रीय जागरण को नवजागरण नहीं कहा जा सकता,इसमें यूरोप नवजागरण से मिलते-जुलते न तो तत्व हैं और न परिस्थितियां ही हैं। भारत में नवजागरण आलोचकों की इच्छित कल्पना का परिणाम है,इसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।

मार्क्सवाद के नजरिए से यथार्थ की वस्तुगत सत्ता और उसकी साहित्यिक अभिव्यंजना का मूल्यांकन होना चाहिए। न कि इच्छित धारणा और चुनिंदा यथार्थ के बीच के संबंध का। अभी भी साहित्यालोचना में अनंत अनसुलझी समस्याएं पड़ी हुई हैं। दिलचस्प बात यह है 19वीं शताब्दी के विमर्श के जरिए हम बहुत कुछ नया जान पाए हैं लेकिन अभी भी बहुत बड़ा यथार्थ ऐसा है जिसे हमने कभी जानने या उद्घाटित करने की कोशिश नहीं की है।यही दशा मध्यकालीन समाज की है।

मार्क्सवादी आलोचक की चिन्ताएं दो स्तरों पर काम करती हैं,पहला,जो मूल्यांकन किया गया है वह उसके सारवान अंशों को ग्रहण करता है ,दूसरा,यथार्थ के अदृश्य पहलुओं को सामने लाता है।अरूण माहेश्वरी सिर्फ अपनी आलोचना में आलोचकों ने जो लिखा है उसको अस्वीकार करने और खारिज करने में ही सारी शक्ति लगा देते हैं।इस तरह के लेखन का मार्क्सवाद से कोई संबंध नहीं है।

19वीं शताब्दी का राष्ट्रीय जागरण सार्वभौम परिघटनाओं और संवृत्तियों को अपने अंदर समेटे हुए है। उसमें सार्वभौम अंतर्विरोध भी हैं।उसका जितना महत्व है,उसके अंतर्विरोधों का भी उतना ही महत्व है।उसके मिश्रित और शुद्ध रूपों का भी महत्व है।यहां तक कि उसके अधूरेपन का भी महत्व है।हमें उसके विकास के सामाजिक गति के नियमों की खोज करनी चाहिए।हमें यह काम करते समय मूल्य-निर्णय करने,खारिज करने,तिरस्कार करने आदि से बचना चाहिए।अफसोस है कि अरूण माहेश्वरी की उक्त किताब में यह चीज हर निबंध में है।

हमारे लिए फिनोमिना महत्वपूर्ण है,आलोचक नहीं।हमारे लिए समस्या महत्वपूर्ण है आलोचक महत्वपूर्ण नहीं है,उसका पेशा महत्वपूर्ण नहीं है।आलोचना की प्रत्येक पद्धति में अधूरापन है,उसकी सीमाएं,इसके बावजूद उसमें से ही नई संभावनाओं के द्वार खुलते हैं।आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,रामविलास शर्मा,हजारी प्रसाद द्विवेदी,मुक्तिबोध,नामवर सिंह के लेखन की सीमाएं हैं,उनके मूल्यांकन में बहुत कुछ ऐसा है जो छूट गया लगता है लेकिन बात वहीं से शुरू होनी चाहिए।वल्गर मार्क्सवाद इस सबको देख ही नहीं पाता।

सोमवार, 5 सितंबर 2016

आलोचना और इतिहास का संकट

        हिन्दी आलोचना संकट में है,इसमें दो राय नहीं हैं।अरूण माहेश्वरी ने ´आलोचना के कब्रिस्तान से´अपनी नई किताब में अपने तरीके से इस संकट की ओर ध्यान खींचा है। इस किताब में आलोचना के क्षय के अनेक रूपों का जिक्र आया है। इस किताब में सात लेख हैं।ये सातों लेख मूल्यवान हैं। लेकिन समस्या यह है क्या ´खीझ´या ´गुस्सा´ या ´धिक्कार´ से आलोचना का विकास संभव है ॽयह चीज बार-बार अरूण माहेश्वरी के नजरिए में अभिव्यक्त हुई है।अरूण मेरा सबसे अच्छा मित्र है।हम दोनों एक-दूसरे को करीब से जानते हैं ।मैं आम तौर पर मित्रों की किताब पर आलोचना लिखने से परहेज करता हूँ।लेकिन अरूण का आग्रह था कि मैं उसकी किताब पर कुछ कहूँ।अरूण की आलोचना के क्षय को लेकर चिन्ताएं जेनुइन हैं।लेकिन वो जिस पद्धति के जरिए उनको हल करना चाहता है.वह सही नहीं है। अरूण की अच्छी बात यह है वह निडर होकर धारावाहिक ढंग से लिखता है।उसके इस धारावाहिक लेखन का परिणाम है प्रस्तुत किताब। वह जब लिखता है तो एकायामी होकर राजनीतिक नजरिए से लिखता है।उसकी किताब पढ़ते हुए कुछ सवाल मेरे मन में उठे हैं जिनको मैं शेयर करना चाहता हूँ।

आलोचना कोई दुर्वासा की भाषा नहीं है।यह वकील का तर्कशास्त्र नहीं है। विरोधी को ध्वस्त करने का नाम आलोचना नहीं है। आलोचना संवाद-विवाद और शिरकत है।आलोचना बिना पैमाने या प्रतिमान के लिखी जाएगी तो उसकी कोई पहचान नहीं बनेगी।आलोचना कच्चा माल नहीं है,वह निष्पन्न विधा है।उसके सभी रास्ते खुले होते हैं,वह कोई बंद मार्ग नहीं है।आलोचना साहित्य सहचर है।आलोचना लिखते समय संवाद और नए की खोज का सहारा लेना चाहिए।आलोचना साहित्यिक कृति की जीरोक्स कॉपी नहीं है। आलोचना के लिए पद्धति और परिप्रेक्ष्य का होना बेहद जरूरी है।निष्कर्ष निकालने,जजमेंट देने,मूल्य-निर्णय आदि से आलोचना में बचना चाहिए.आलोचना निष्कर्ष नहीं है।आलोचना तो नई समस्या का आरंभ है।आलोचना को ´गुस्सा´,´क्षोभ´,धिक्कार´ ,´तिरस्कार´ की भाषा से बचना चाहिए।

यह सच है हिन्दी का मौजूदा आलोचना परिदृश्य बेहद पीड़ादायक है।लेकिन आलोचना ´पीड़ा´ नहीं है, वह पीड़ा की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति है।आलोचना जब सर्जनात्मक अभिव्यक्ति बनती है तो नई विधागत संरचना में अपने को तब्दील कर लेती है।शब्दजाल से अपने को मुक्त कर लेती है।लेकिन यदि आलोचना पद्धति और परिप्रेक्ष्य के बिना लिखी जाएगी तो मात्र शब्दजाल बनकर रह जाती है।हिन्दी समीक्षा फिलहाल शब्दजाल में फंसी नजर आ रही है।



हिन्दी आलोचना की दो बड़ी समस्याएं हैं ,पहली है ,वाम राजनीति और वाम विरोधी राजनीति, हिन्दी में इन दोनों के नजरिए से बड़े पैमाने पर आलोचना लिखी गयी,इस तरह की आलोचना का न तो राजनीतिक महत्व है और न साहित्यिक महत्व है,हां,इस तरह की आलोचना का प्रचार महत्व जरूर है।इस नजरिए से देखें तो हिन्दी में प्रचार के लिए आलोचना खूब लिखी गयी है।आलोचना जब प्रचार के लिए लिखी जाती है तो उसकी नजर सिर्फ अंतर्वस्तु और व्याख्या पर होती है।इस क्रम में आलोचना के मानदंड और परिप्रेक्ष्य के सवाल बहुत दूर छूट जाते हैं।इस तरह की आलोचना ´वर्तमान´केन्द्रित और सांगठनिक-राजनतिक उपयोगितापरक होती है। जबकि आलोचना को इससे बचना चाहिए।

´पञ्चतंत्र´ और उससे जुड़े सवाल-

इसी तरह आलोचना लिखते समय ´अनैतिहासिकता´ और ´ऐतिहासिकता के सरलीकरणों ´से बचने की जरूरत है।मैं यहां नमूने के तौर पर अरूण माहेश्वरी के लेख ´रवीन्द्रनाथ ,छायावाद और हिन्दी आलोचना´का जिक्र करना चाहता हूँ।इसमें पंचतंत्र की कहानियों के बारे में जिस तरह का निष्कर्ष निकाला गया है, उससे बचना चाहिए।बतर्ज माहेश्वरी ´पञ्चतंत्र´ की कहानियां ´ आज भी ज्ञान के शॉर्टकट की तलाश में लगे लोगों को´ अपनी ओर खींचती हैं , यह ´कान में मंत्र फूंकने वाला´साहित्य है। इस तरह के मूल्यांकन तुलनात्मक तौर गैर जरूरी हैं। चरमोत्कर्ष देखें ´लेकिन गौर करने की बात यह है कि पञ्चतंत्र की ये कहानियां जो खास प्रयोजन के लिए रची गईं,कभी भी पाणिनी के व्याकरण,चाणक्य के अर्थशास्त्र और वात्स्यायन के कामशास्त्र का स्थान नहीं ले पाईं।´ मेरे ख्याल से ´पंचतंत्र´की कहानियों का यह अनैतिहासिक विवेचन है।

प्राचीनकालीन सर्जनात्मक साहित्य के मूल्यांकन में हमें कार्ल मार्क्स के ´कला और समाज के विषम संबंध का सिद्धान्त´और मिखाइल बाख्तिन के महाकाव्य संबंधी आलोचनात्मक दृष्टिकोण की मदद लेनी चाहिए।

ऐतिहासिक रूप में देखें तो ´पञ्चतंत्र´ की कहानियां हमारे प्राचीन समाज की पशु-कथा परंपरा का अंग हैं। इनको किसी भी तरह के वर्गीकरण में बांधने से बचना चाहिए।उल्लेखनीय है ऋग्वेद से पशु-कथा कहने की परंपरा चली आ रही है।इनका उपनिषदों में भी उल्लेख मिलता है।बाद में महाभारत और फिर पंचतंत्र में पशु-कथाएं मिलती हैं।यह असल में मनुष्य की आदतों के पशुओं में स्थानान्तरण की समस्या की ओर ध्यान खींचती हैं।ये महज उपदेशात्मक कथाएं नहीं हैं।बल्कि इनमें जानवरों के कर्म को मनुष्यों को उपदेश देने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया गया है।उपदेश की पद्धति महज सरलता से ग्रहण कर लेने के लिहाज से इस्तेमाल की गयी है।लेकिन पंचतंत्र की कहानियां हमारी प्राचीन कथा का कलात्मक रूप हैं।कहने का आशय है कि पशु कथा की परम्परा पहले से चली आ रही थी जिसे पंचतंत्र ने अपने तरीके से नई कलात्मक ऊँचाई पर पहुँचाया।पशु कथाओं का पतंजलि,पाणिनी आदि के यहां भी प्रयोग मिलता है।इस तरह की कहानियों में अधिकांश कहानियों में पुनर्जन्म की धारणा को प्रचारित करने की कोशिश की गयी है।यह काम बौद्धों ने भी खूब किया है। वे पशु और मनुष्य के निकट सम्बन्ध को चित्रित करने के बहाने पुनर्जन्म की कल्पना को पेश करते थे।वे लोग पिछले जन्मों में बुद्ध और उनके समकालीन महापुरूषों की महत्ता एवं उनके कार्यों का उदाहरण देने के लिए पशुओं की कथाओं का उपयोग करते हैं।पाणिनी,पतंजलि आदि के यहां पशु कथाओं का जिस तरह जिक्र मिलता है,उससे यह अंदाजा लगा सकते हैं कि पुराने जमाने में पशु कथाओं को साहित्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता था।पंचतंत्र की कहानियों में कला की कमी है,यह सर्व-स्वीकृत तथ्य है।इन कहानियों में अंशतः कहानी, अंशतः व्यावहारिक जीवन के आदर्श या सिद्धांत,भले ही वे नैतिक दृष्टि से उच्चतर न हों,का चित्रण मिलता है।पशुकथाएं मूलतःअर्थशास्त्र और नीतिशास्त्र से संबंधित हैं। ये धर्मशास्त्र से संबंधित न होकर व्यावहारिक राजनीति में मनुष्य के कर्तव्यों,दैनन्दिन जीवन और पारस्परिक संबंध के अनुष्ठान से सम्बन्धित हैं।चूंकि पंचतंत्र की कहानियों को सुनाने वाले ब्राह्मण थे अतः उनमें धर्मशास्त्र का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है।वे आम जनता के लिए नहीं, राजा के लड़कों के लिए लिखी गयी कहानियां हैं।ये कहानियां संस्कृत में लिखी गयीं अतःयह साफ है कि इनका लक्ष्य राज परिवार और उनके लड़के ही थे।

´पञ्चतंत्र´ के मूल स्वरूप और उसके स्रोत को लेकर संस्कृत साहित्य के आलोचकों में गहरा विवाद है। सवाल यह है ´पंचतंत्र´ के नाम से हम जिस किताब को जानते हैं वह कौन सी किताब है ॽ उसका लेखक कौन है और कहां का निवासी है ॽउल्लेखनीय है 570 ईसा पूर्व ´पंचतंत्र´का पहलवी रूपान्तर अब लुप्त हो चुका है।उसका एक सीरियन रूपान्तर और एक अरबी रूपान्तर जरूर मिलता है।इसके अलावा गुणाढ्य की ´बृहत्कथा´ में समाविष्ट रूपान्तर मिलता है।जिसके आधार पर 11वीं सदी में सोमदेव ने ´कथासरित्सागर´ और क्षेमेन्द्र ने ´बृहत्कथामञ्जरी´की रचना की।इसके अलावा ´तन्त्राख्यायिक´ नाम से दो पाठान्तर मिलते हैं।दो जैनी संस्करण भी मिलते हैं।ब्युहलर,कीलहॉर्न ने भी बालकों के लिए उपयोगार्थ सरल ´पञ्चतंत्र´तथा पूर्णभद्र के ´पञ्चतंत्र´का उल्लेख भी मिलता है।इसके अलावा दक्षिणी ´पञ्चतंत्र´ ,नेपाली ´पंञ्चतंत्र´ के रूप भी उपलब्ध हैं।

´पञ्चतंत्र´ का अर्थ क्या है ॽ इसका संबंध पाँच प्रतिपाद्य विषयों से संबंध है। मूलपाठ कौन सा है इसके बारे में ठीक से कुछ भी कहना संभव नहीं है।लेकिन ´पंञ्चतंत्र´के लेखक को महाभारत के बारे में अच्छी जानकारी थी यह पता जरूर चलता है. महाभारत में ´दीनार´का प्रयोग मिलता है यही प्रयोग ´पञ्चतंत्र ´में भी मिलता है।इसके आधार पर इसकी रचना 200ईसापूर्व हुई होगी। इसके लेखक के रूप में विष्णुशर्मा का नाम आता है।यह नाम विवाद के घेरे में है। कुछ लोग इसे कल्पित नाम मानते हैं कुछ कहते हैं इस नाम की उपेक्षा न की जाय। फिर भी यह नाम प्रचलन में है।दक्षिण के ´पञ्चतंत्र´में उल्लिखित बातों के अनुसार विष्णुशर्मा दक्षिण के महिलारोप्य या मिहिलारोप्य के राजा अमरशक्ति के पुत्रों को कहानियाँ सुनाया करते थे.इसके अलावा तन्त्राख्यिक तथा जैन पाठान्तर में भी ऋष्यमूक नामक पर्वत का उल्लेख है जो दक्षिण में ही है। हेर्टेल का विचार है ´पञ्चतंत्र´कश्मीर में रचा गया,क्योंकि मूल पुस्तक में न तो व्याघ्र का और न हाथी का ही कोई स्थान है,जबकि ऊँट ज्ञात है। कहने का आशय यह कि ´पंञ्चतंत्र´कहां रचा गया इस सवाल को खुला ही रखें तो बेहतर होगा।

रवीन्द्रनाथ से जुड़े सवाल – रवीन्द्रनाथ पर हिन्दी आलोचकों के नजरिए की आलोचना करते हुए अरूण माहेश्वरी ने ´संतुलन´ से काम नहीं लिया है। आलोचना का काम ´अर्द्ध सत्य´प्रसारित करना नहीं है। आलोचना का काम है सत्य और यथार्थ के बीच संतुलन से पैदा करना। ´संतुलन´ किसी भी ऐतिहासिक विश्लेषण का सार है।रवीन्द्रनाथ का हजारीप्रसाद द्विवेदी पर क्या असर पड़ा इसको समझने के लिए द्विवेदीजी की समग्र इतिहासदृष्टि को केन्द्र में रखकर देखना समीचीन होगा।द्विवेदीजी के बारे में अरूण माहेश्वरी के निष्कर्ष गलत और अनैतिहासिक हैं।रवीन्द्रनाथ के असर को यदि देखना है तो ´हिन्दी साहित्य भूमिका´को देखना समीचीन होगा।यह शांतिनिकेतन का ही असर था कि द्विवेदीजी ने ´भारतीय साहित्य´के परिप्रेक्ष्य में ´हिन्दी साहित्य के इतिहास को देखने पर बल दिया।पहलीबार क्षेत्रीयदृष्टिकोण से साहित्येतिहास को बाहर निकाला,दूसरी परम्परा का वह प्रस्थान बिन्दु है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि द्विवेदीजी ने इतिहास में काल-विभाजन को गैर जरूरी माना।वे रवीन्द्रनाथ की तरह ही इतिहास के अविकल प्रवाह को देखने पर जोर देते हैं।तीसरा महत्वपूर्ण पहलू है मानवतावाद। इतिहासदृष्टि और आलोचना में मानवतावाद की प्रतिष्ठा करने वाले वे पहले हिन्दी आलोचक हैं। ये सारी चीजें रवीन्द्रनाथ के प्रभाव का ही परिणाम हैं।



रवीन्द्रनाथ पर विचार करते हुए हमें इस पहलू पर नजर रखनी चाहिए कि रवीन्द्रनाथ में अनेक अंतर्विरोधी चीजें भी हैं।समस्या यह है अंतर्विरोधी चीजों से पैदा हुई समस्याओं को हम कैसे हल करते हैं ॽ मसलन्, प्रगति,स्वदेशी आंदोलन,राष्ट्रवाद,धर्म,उपनिषद,बुर्जुआ समाज,बुर्जुआ संस्कृति,समाजवाद आदि के प्रति रवीन्द्रनाथ के नजरिए को नए सिरे से विश्लेषित करने की जरूरत है।

सोमवार, 15 अगस्त 2016

कलकत्ते के वे दिन

      मैं 1989 में जब कलकत्ता आया तो आने के कुछ ही दिन बाद रोज ´स्वाधीनता´अखबार के दफ्तर जाता था वहां अयोध्या सिंह,महादेव साहा,इजरायल, अरूण माहेश्वरी,सरला माहेश्वरी के साथ घंटों बैठना होता। तरह –तरह की बातें होतीं।हमलोगों का रोज शाम को चार बजे लेकर 8बजे तक का समय बहुत ही मस्ती और आनंद में कटता, इस दौरान देश-दुनिया की तमाम खबरों के साथ –साथ कम्युनिस्ट आंदोलन की समस्याओं,कम्युनिस्ट नेताओं के आचरण और उनमें आ रहे परिवर्तनों पर भी लंबी बातचीत होती थी।लंबे समय तक यही मेरी दिनचर्या थी , मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय से कक्षाएं करके ´स्वाधीनता´चला आता,वहां 3-4घंटे रहता और अंत में लौटते समय अरूण माहेश्वरी अपनी गाड़ी से उलटा डांगा छोड़ देते और वहां से बस लेकर मैं अपने घर चला आता,अरूण जब ´स्वाधीनता´नहीं आता तब मैं जोडागिरजा से बस लेकर अकेले घर लौटता।इसी क्रम में धीरे –धीरे ´स्वाधीनता´ अखबार में कई साल मैंने जमकर लिखा। क्या लिखा और किस तरह की समस्याओं का सामना किया इस पर बाद में फिर कभी लिखूँगा। महादेव साहा चलते-फिरते इनसाइक्लोपीडिया थे। वहीं दूसरी ओर अयोध्या सिंह की इतिहास और कम्युनिस्ट आंदोलन को लेकर बहुत गहरी समझ थी।इनके बीच में शाम गुजारने के कई लाभ थे,पार्टी भी उनसे लाभान्वित होती थी,हमसब भी।

हम सबकी शाम का मुख्य नाश्ता मूडी(मुरमुरा),चना,मूंगफली,कभी -कभी पकौड़े या चॉप या समौसा हुआ करता,साथ में ब्लैक टी।हालत यह थी कि हम सब शाम को मिलने के आदी हो गए थे।रोज शाम मिलने के लिए बुरी तरह झटपटाते थे,किसी को देर भी हो जाए तब भी मिलने जरूर आते थे।इस मेल-मुलाकात में कॉमरेडशिप तो थी साथ ही बात करने का सुख था जिसके कारण हम सब एक-दूसरे के आने का बेसब्री से इंतजार करते रहते।इजरायल साहब का हाल यह था उनकी अरूण-सरला के साथ बातें रोज रात साढ़े दस बजे के पहले खत्म नहीं होती थीं।इजरायल,अरूण,सरला और मैं एक साथ अरूण की गाड़ी से निकलते,मैं बीच में उलटाडांगा उतर जाता ,वे तीनों अरूण के घर चले जाते।

इस दैनंदिन मेल-मुलाकात के कारण अनेक काम हुए,जमकर बेशुमार लिखना हुआ।सरला जब सांसद बनकर दिल्ली चली गयी तो अरूण भी साथ चला गया,लेकिन वो हर सप्ताह शनिवार को जरूर कोलकाता आ जाती और हम लोग फिर मिलकर बातें करते। बीच-बीच में महादेव साहा भी दिल्ली चले जाते लेकिन कुछ दिन वहां रहकर लौट आते।



मैं जेएनयू से जब कोलकाता आया तो बेहद परेशान था ,कोलकाता में शाम की संगत ,सुंदर बातचीत आदि के लिए सही साथी नहीं दीखे,हिन्दी के शिक्षकों की सीमाओं और सीमित दुनिया से मैं वाकिफ था इसलिए उसमें समय गुजारना बहुत मुश्किल था,हिन्दी शिक्षकों से विचारयुक्त मित्रता कोलकाता में संभव नहीं दिखी,ऐसी स्थिति में ´स्वाधीनता´में उपरोक्त कॉमरेडों का साथ बहुत सुखकारी साबित हुआ।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...