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बुधवार, 20 जुलाई 2016

सेना के लिए नई सोशलमीडिया नीति



भारत सरकार सेना के लिए नई सोशलमीडिया नीति लेकर आई है।यह नीति 2015 की नीति की तुलना में काफी उदार है।अब सेना के लोग खुलकर सोशलमीडिया का इस्तेमाल कर पाएंगे।उनको अपने पद,मूवमेंट,सेना के ऑपरेशन आदि की सोसलमीडिया में जानकारी शेयर न करने को कहा गया है।
‘Policy on Usage of Social Media’ नामक नीति में कहा है-
“The Rules suggested that serving officers and jawans of the Army can have media account on their name provided that the account holder doesn’t mention anything about his services including rank, place of posting, Unit and Corps etc. They will not upload photographs or videos or make comments while inter-acting on social media, which mentions specific information, unit or establishment,”
“As a general parameter, conduct which will be unacceptable in physical domain in the Army will also be unacceptable in the Cyber/ Social Media domain,”
“Indian Army recognizes the positive potential of social media platforms as exponentially faster means of conveying messages, information and opinions, important role the social media can play for the Army personnel in their personal life for keeping them in touch with their families and friends and in building a cohesive Indian Army Community while upholding its image as a disciplined and professional citizens.
“The social media can also serve as instrument for promoting national security and its values in mass internal communications for building, raising and sustaining morale of all ranks within the Army,”

नई नीति बुरहान वानी के सोशलमीडिया हीरो बनने के संदर्भ में लाई गयी है।खासकर जम्मू-कश्मीर में तैनात सेना को इससे मदद मिलेगी,अन्य इलाकों में काम करने वाले सैनिक भी लाभ उठा पाएंगे।

रविवार, 17 जुलाई 2016

खान ड्रेस ,पेंट शर्ट और सेना

            पाक समर्थित आतंकियों की कश्मीर में भूमिका को कम करके नहीं देखना चाहिए।खासकर पीडीपी-भाजपा सरकार आने के बाद नए सिरे से आतंकियों को जनता में फैलने का मौका मिला है, इनमें से अनेक ग्रुपों ने पीडीपी-भाजपा के लिए चुनावों में काम किया है।ऐसी स्थिति में वहां सामान्य स्थिति बहाल करने में सेना को कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। आतंकियों के जनाधार बनाने के नए नए तरीके सामने आ रहे हैं,उनमें से एक है साइबर मंच।साइबर मंचों के जरिए युवाओं को आतंकी विभिन्न रूपों में गोलबंद कर रहे हैं,लेकिन सरकार ने इसको रोकने के लिए कोई मैकेनिज्म विकसित नहीं किया। उल्लेखनीय है आतंकी –साम्प्रदायिक –पृथकतावादी संगठन सब समय हथियारबंद जंग ही नहीं लड़ते,वे विभिन्न छद्म रूपों में युवाओं को अपने इर्द-गिर्द गोलबंद करते हैं। यहां एक पुराना वाकया याद आ रहा।

सन् 1989-90 के बाद कश्मीर में जो आतंकी उभार आया था उसमें एक बार आतंकियों ने सारे पुरूषों को खान ड्रेस पहनने का आदेश दे दिया,उन दिनों घाटी में आतंकियो का भय इस कदर व्याप्त था कि कोई व्यक्ति उनके आदेस की अवहेलना नहीं कर सकता था।

खान ड्रेस (पठान ड्रेस) पहनने का आदेश निकलते ही देखते ही देखते एक सप्ताह में सभी पुरूषों ने पठान ड्रेस बनवाए और फिर पहनने लगे,यहां तक कि पुरूष पठान ड्रेस पहनकर ऑफिस भी जाते थे,यह सिलसिला दो महिने तक चला।एक दिन सेना ने तय किया कि पठान ड्रेस के खिलाफ मुहिम चलायी जाय। सेना को तुरंत एक्शन में जाने के आदेश दिए गए,सेना ने सड़कों-गलियों-मुहल्लों में खान ड्रेस पहने पुरूषों को पकडकर उनके चूतड़ पर कसकर आठ-दस डंडे लगाने शुरू किए,जो भी खान ड्रेस पहने दिखता उसकी खबर ली जाती,लोग घरों में जाकर अपने चूतडो की सिकाई कर रहे थे और परेशान होकर दर्द से कराह रहे थे,कुछ सप्ताह चले इस अभियान के कारण समूची घाटी में पुरूषों ने पठान ड्रेस पहननी बंद कर दी।सेना जिसे भी पठान ड्रेस पहने देखती सीधे सवाल करती ,चूतड पर डंडे लगाती और कहती कि कल से पैंट-शर्ट में दिखाई दो,इस तरह पठान ड्रेस से कश्मीर को मुक्ति मिली।जबकि आतंकियों ने दो माह तक सारे कश्मीर के पुरूषों को पठान ड्रेस बंदूक की नोंक पर पहनाकर अपना वैचारिक-सामाजिक वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश की जिसे सेना ने नाकाम कर दिया।



इस कहानी को कहने का आशय यह है कि आतंकी-साम्प्रदायिक संगठन आम जनता की जीवनशैली पर हमला बोलते हैं और अपना ड्रेसकोड थोपते हैं।इसलिए इन संगठनों से सिर्फ राजनीतिक संघर्ष ही नहीं जीवनशैली के स्तर पर भी संघर्ष करना पड़ता है।

आतंकी टीपू सुल्तान की मौत और हमारी सेना

         यह वाकया 1992-93 का जब कश्मीर में संकट गहरा था।आतंकी-पृथकतावादी संगठनों का उभार चरम पर था,घर –घर तलाशी हो रही थी।हर आदमी पर पुलिस नजर रखे हुए थी,ऐसे हालात में पाक स्थित आतंकियों ने कश्मीर के क इलाके के सरगना के तौर पर टीपू सुल्तान का नाम मीडिया में उछाल दिया,टीपू सुल्तान ने भी खुशी-खुशी इलाके के कमांडर की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। यह वाकया कश्मीर के किसी छोटे इलाके का है, आतंकी कमांडर बनाए जाने की घोषणा के बाद टीपू सुल्तान बड़े अहंकारी भाव में रहने लगा,दिन में एक-दोबार बाजार में एके47 लेकर घूम आता था।इलाके के लोग घरे रहते लेकिन जानते थे कि वह आतंकी नहीं है गरीबी का मारा चिरकुट किस्म का आदमी है।

टीपू सुल्तान खुश था कि उसको आतंकियों ने इलाके का कमांडर बना दिया, वास्तविकता यह थी कि टीपू सुल्तान ढाई पसली का आदमी था,एकदम सूखा हुआ शरीर, लेकिन साढ़े छह फुट लंबा। खाने और सोने का कोई ठिकाना नहीं ,उसके परिवार में कोई नहीं था,वह एक छोटे से कमरे के घर में रहता था। मीडिया में ज्योंही टीपू सुल्तान का नाम आतंकियों ने उछाला उस मुहल्ले को पुलिस ने कुछ ही दिन बाद आकर उसे घेर लिया।उसके नाम की घोषणा के बाद उस पर इनाम भी घोषित कर दिया गया।लेकिन मुश्किल यह थी पुलिस और सेना के पास उसका कोई फोटो नहीं था,यहां तक कि आतंकियों के पास भी फोटो नहीं था। दस-पन्द्रह दिन बाद कश्मीर के डाउन टाउन इलाके को तकरीबन 11सौ सैनिकों ने घेर लिया,मुहल्ले के सारे लोगों को कहा गया कि वे टीपू सुल्तान को सेना को सौंप दें,दिल्लगी यह कि टीपू सुल्तान की सेना में फोटो किसी ने देखी नहीं थी,मुहल्ले के लोगों के अलावा उसे कोई जानता नहीं था,सेना के पास उसकी कोई फोटो नहीं थी, ऊपर के अफसरों का आदेश था जाओ और टीपू को पकड़कर लाओ, लेकिन 1500सैनिकों में से कोई भी उसे पहचानता नहीं था।



टीपू आतंकियों का इलाका कमांडर था इसलिए मुहल्ले के लोग उससे डरने लगे थे,मजेदार बात यह कि कमांडर घोषित होने के पहले टीपू सुल्तान को किसी ने किसी भी किस्म की बदमाशी,शरारत,गुंडागर्दी आदि करते नहीं देखा,लेकिन अचानक एक रात वह कमांडर बन गया,उसके हाथ में एके 47 बंदूक आ गयी और उसने भी बंदूक के साथ मुहल्ले में प्रदर्शन करके सूचना देदी कि वह आतंकी संगठन का इलाके का कमांडर है। लेकिन ज्योंही सेना ने मुहल्ले को घेरा तो बाहर जीप से लाउडस्पीकर लगाकर सेना का कमांडर टीपू सुल्तान को समर्पण करने की अपील कर रहा था, घरों में तलाशी शुरू हो गयी,लेकिन टीपू सुल्तान तो अपने कमरे से निकलकर सीधे कमांडर के पास कर खड़ा हो गया,कमांडर को उसकी कद-काठी देखकर नहीं लगा कि यह कोई आतंकी है।वह कमांडर के पास सहज भाव से खड़ा,घरों में दहशत थी,कई घंटे तलाशी अभियान चला ,सेना को टीपू नहीं मिला,जबकि टीपू तो बाहर सेना के कमांडर के पास ही खड़ा था। सेना के जाने के बाद टीपू ने मुहल्ले के लोगों में बढ़-चढ़कर बातें कहीं और अपनी वीरता के किस्से सुनाए,लोगों को आश्चर्य था कि टीपू तो सेना के कमांडर के पास ही खड़ा था फिर सेना ने उसको पकड़ा क्यों नहीं। कुछ दिन तक टीपू के किस्से चलते रहे, अंत में एक दिन टीपू को अपनी बंदूक से पुलिस पर गोली चलाने का शौक चर्राया और उसने सीधे बंदूक करके फायरिंग शुरू कर दी,वह जानता नहीं था कि एक47 गन से फायरिंग के साथ ही पीछे तेजी से झटका लगता है,वह बेहद दुबला-पतला था, उसने ज्योंही फायरिंग शुरू की बंदूक की दिशा पलटकर उसकी ओर हो गयी और वह अपनी ही गोली से ढेर हो गया,बाद में आतंकियों ने खबर फैला दी कि एरिया कमांडर टीपू सुल्तान सेना से मुठभेड़ करते मारा गया।

सोमवार, 11 जुलाई 2016

कश्मीर के फायरब्राँण्ड आतंकी


   कश्मीर में आप मुहल्लों में जाएं और आम लोगों से बात करें तो पाएंगे कि वहां जितने आतंकी आऱंभिक दिनों में आतंकी टोलियों में शामिल हुए उनमें से अधिकांश जानते तक नहीं थे कि वे आतंकी टोली में क्यों शामिल हो रहे हैं।अनेक मर्तबा ऐसे युवा भी आतंकी टोली में शामिल हुए जो किसी न किसी रूप में सैन्यबलों के उत्पीड़न के शिकार रहे हैं।अनेक इस तरह के युवा भी थे जो बंदूक या पिस्तौल चलाना जानते तक नहीं थे और आतंकियों की बंदूक-पिस्तौल लेकर घूमते रहते थे,हथियार चमकाकर इलाके में दादागिरी करते थे। किस तरह मूर्खताएं करते थे और पाकप्रेरित आतंकी संगठनों के जाने-अनजाने एजेंट बन गए।एक सच्चा किस्सा पढ़ें-एक कश्मीरी युवा देखने में सुंदर और छरछरे किस्म का था, नाम था उस्मान।एक दिन उसको आतंकियों ने एक ग्रेनेड दे दिया और उसको कहा कि जाकर नशाने पर फेंक दो।वह जानता नहीं था उसका किस तरह इस्तेमाल करें।ग्रेनेड में एक पिन होता है,उस पिन को निकालते ही उसे सात सैकिण्ड में निशाने पर फेंक देना होता है लेकिन वह युवा पिन निकालकर देख रहा था कि कहां फेंकूँ,वह जानता ही नहीं था कि उसे कितनी देर में फेंकना है,वह युवक सोचता रह गया सात सैकिण्ड के बाद ग्रेनेड उसी युवक के हाथ में फट गया।फलतःवह उसी क्षण मर गया।लेकिन आतंकियों ने प्रचारित कर दिया कि सैन्यबलों ने मार दिया।यह श्रीनगर के डाउन टाउन की सच्ची कहानी है।





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