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बुधवार, 25 अप्रैल 2018

बलराज साहनी का स्त्री संबंधी दृष्टिकोण-

                   बलराज साहनी के अभिनय और अभिनय में व्यक्त कलाकौशल और भाव-भंगिमा पर अनेकबार बातें हुई हैं, आज भी ऐसे लोग मिल जाएंगे जो उनकी फिल्मों के प्रशंसक हैं।लेकिन बलराद साहनी के लेखन पर हिंदी में कोई चर्चा नहीं मिलती,जबकि उनके समग्र में उनका समूचा लेखन मौजूद है,साथ ही उनकी पत्नी संतोष साहनी का भी समग्र मौजूद है। इस समग्र को ´बलराज-संतोष साहनी समग्र´ (1994)हिंदी प्रचारक संस्थान ,वाराणसी, ने छापा,इसका संपादन किया डा.बलदेवराज गुप्त ने ।

स्त्री संबंधी उनके नजरिए की सबसे अच्छी बात यह है कि वे आदर्श स्त्री के मानक को नहीं मानते, ´नारी और दृष्टिकोण´(1965) नामक निबंध में वे परंपरागत स्त्री की धारणा को भी नहीं मानते,उन्होंने स्त्री संबंधी अनेक पहलुओं पर विचार करने बाद यह लिखा ´अब तक आदर्श भारतीय नारी की कल्पना करना असंभव है।´(पृ.263) इस प्रसंग में साहनी ने लिखा ´पुरूष ने स्त्री को अपनी,शारीरिक ,मानसिक और कलात्मक भूख मिटाने का साधन समझ रखा है। सदियों से पुरुष को रिझाना ही स्त्री का लक्ष्य बना हुआ है –कभी माँ के रुप में ,कभी बहन के रुप में,कभी पत्नी के रुप में।´ सुंदरता के जन प्रचलित रूपों को चुनौती देते हुए लिखा,

´आदर्श भारतीय नारी का सुन्दर और सुडौल होना हर हालत में जरूरी है।भला असुन्दर होकर वह ´आदर्श´नारी कैसे कहला सकती है ! सुन्दरता को मापने का मेरे पास कोई निजी पैमाना नहीं है।´इसी लेख में उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण बात कही,लिखा, ´अगर हमारा दृष्टिकोण प्रजातंत्रवादी है,तो इस बात की ओर से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं कि स्त्री की सुन्दरता तभी निखर सकती है,जब उसे खाने के लिए खुराक मिले,पहनने के लिए अच्छे कपड़े मिलें और साफ-सुथरा रहने की सहूलियतें मिलें।भारतीय स्त्रियों की बहुसंख्या इन बुनियादी जरूरतों से वंचित है।´ यह भी लिखा ´शारीरिक दृष्टिकोण से अगर मैं किसी आदर्श स्त्री का चुनाव करना चाहूं,तो यह अल्पसंख्यक वर्ग की स्त्री होगी।ऐसी स्त्री पूरे भारत की स्त्रियों की प्रतिनिधि कैसे हो सकती है।´









शनिवार, 20 जुलाई 2013

भारतीय मध्यवर्ग के वहशी रूप

              
भारत में मध्यवर्ग का तेजगति से पतन हो रहा है ।इतनी तेजगति से अन्य किसी वर्ग का पतन नहीं हुआ है। मध्यवर्ग के आदर्शनायक आईएएस -आईपीएस अफसरों में बहुत बड़ा समुदाय तैयार हुआ है जो आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है। ये वे लोग हैं जिनके पास सब कुछ है।सबकुछ होते हुए भी ये क्यों भ्रष्ट हो रहे हैं ?
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भारत के मध्यवर्ग ने सामाजिक-आर्थिक शक्ति अर्जित करते ही सामाजिक-राजनीतिक दायित्वों और लोकतांत्रिक लक्ष्यों से अपने को सचेत रूप से अलग किया है।
अधिकतर मध्यवर्गीय शिक्षितलोग राजनीति को बुरा मानते हैं या भ्रष्ट राजनीति की हिमायत करते हैं या अधिनायकवादी या फासिस्ट राजनीति की हिमायत करते हैं।मध्यवर्ग का इस तरह का चरित्र बताता है कि भारत में संपन्नता जिन वर्गों में पहुंची है उनमें लोकतांत्रिक मूल्य अभी तक नहीं पहुंचे हैं।
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भारत में मध्यवर्ग में सांस्कृतिक परवर्जन तेजी से बढ़ा है। दुनिया के अनेक देशों में आधुनिककाल में वैज्ञानिकचेतना और स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों का मध्यवर्ग में विकास हुआ है ,लेकिन भारत में उलटी गंगा बह रही है। 
भारत के मध्यवर्ग में इन दिनों प्रतिगामिता की आंधी चल रही है। सेक्स से लेकर धर्म तक इसे सहज ही देखा जा सकता है। मध्यवर्ग में प्रतिगामिता के कारण इस वर्ग के बहशीयाना चरित्र की आए दिन परतें खुल रही हैं। 
आश्चर्य की बात है इस वर्ग के पतनशील मूल्यों पर हम सबने हमले करने बंद कर दिए हैं। प्रतिगामिता के साथ हमसब सामंजस्य बिठाकर जीने लगे हैं। मध्यवर्गीय प्रतिगामिता अब हमारे अंदर गुस्सा पैदा नहीं करती। यह स्थिति बदलनी चाहिए।
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मध्यवर्ग की पतनशीलता के तीन बड़े क्षेत्र हैं ,एक है स्त्री उत्पीड़न-शोषण , दूसरा है खुला भ्रष्टाचार और तीसरा है तिकड़मबाजी।

मध्यवर्ग के लोगों में शिक्षितों में आज स्त्री उत्पीड़न ,हिंसाचार,यौनशोषण आदि जिस तरह सतह पर आ गया है,उसने हमें सारी दुनिया में सभ्य कहलाने लायक नहीं छोड़ा। यही हाल भ्रष्टाचार का है। तिकड़मबाजी में तो मध्यवर्ग के नायक सबसे आगे हैं। इन तीनों प्रवृत्तियों को देखकर यही लगता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था का मध्यवर्गीय मूल्य-संरचना पर सकारात्मक असर बहुत कम पड़ा है।

बुधवार, 2 नवंबर 2011

माओवाद,आधुनिकतावाद और हिंसाचार





आधुनिकतावाद के दो प्रमुख बाईप्रोडक्ट है सामाजिकहिंसा और माओवाद। आधुनिकतावाद की खूबी है कि उसने हिंसा को सहज ,स्वाभाविक और अपरिहार्य बनाया है फलतः हिंसा के प्रति घृणा की बजाय उपेक्षा का भाव पैदा हुआ है। हिंसा के हम अभ्यस्त होते चले गए हैं। घरेलू हिसा से लेकर वर्गीय हिंसा तक के व्यापक फलक को देखें तो पाएंगे कि आधुनिकतावाद की आंधी में विकास कम और हिंसा का विस्तार ज्यादा हुआ है। इसमें मीडिया हिंसाचार से लेकर माओवादी हिंसाचार तक का बड़ा दायरा आता है।

आधुनिकतावाद महज कला की समस्या नहीं है बल्कि यह सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक हिंसा से भी जुड़ा फिनोमिना है। यह संयोग की बात है कि भारत में जिस समय आधुनिकतावाद संकटग्रस्त था ठीक उसी समय नक्सलबाड़ी आंदोलन पैदा हुआ।भारत में जिन दिनों दंगे,किसानों की कर्जों के कारण आत्महत्या,औरतों की दहेज-हत्या ,घरेलू हिंसा आदि की सबसे ज्यादा खबरें आई हैं ठीक उसी दौर में माओवादी संगठनों की हिंसाचार की खबरें भी आई हैं।

विचारधारात्मक सच यह है कि माओवादी विचारधारा बुर्जुआजी के अधूरे सपनों को दिखती है और उनको ही पूरा करने पर जोर देती है। बुर्जुआ समाज में जिस तरह अन्य प्रतिवादी विचारधाराएं सक्रिय हैं वैसे ही माओवाद भी सक्रिय है। मसलन् अविकसित आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में वे काम करते हैं और वहीं पर विकास के सवालों को बार-बार विभिन्न रूपों में उठाते हैं। कभी विस्फोट करके,कभी हथियारबंद जंग करके,कभी मुक्तांचलों का निर्माण करके और कभी हडताल करके।



माओवादियों की मांगें व्यवहार में बुर्जुआ विकास से जुड़ी हैं। क्रांति की बातें करते हुए वे अधूरे विकास के सवालों पर रोशनी डालते हैं। सामान्यतौर पर अपने को मार्क्सवाद का असली बारिस कहते हैं। उल्लेखनीय है कि आधुनिककाल में दो विचारधाराओं मार्क्सवाद और उदारतावाद का जन्म हुआ। और दोनों ही मुक्तिकामी विचारधारा का दावा करती हैं। दोनों का लक्ष्य है आधुनिक समाज और आधुनिक मनुष्य का निर्माण करना। जिन समाजों में बुर्जुआ सभ्यता,संस्कृति,आचार-व्यवहार,जीवनशैली और सामाजिक विकास नहीं हुआ है उनमें मार्क्सवाद के मानने वाले विभिन्न राजनीतिक गुटों का पहला लक्ष्य होता है असमानताओं को कम करना। अविकसित क्षेत्रों में विकास और समानता की मांग मूलतः बुर्जुआ मांग है। भूमिसुधार,शिक्षा,स्थानीय जनजातियों के हितों का संरक्षण ,सड़क,पानी,बिजली आदि मांगें मूलतः बुर्जुआ मांगें हैं।

आमतौर पर माओवादी वर्चस्व और विकास के सवालों को उठाते हैं ,खासकर गांवों में सामन्तों,जमींदारों और सूदखोरों के वर्चस्व के सवालों को उठाते हैं और उनसे मुक्ति की मांग करते हैं। वे किसानों-आदिवासियों के हितों के सवालों को उठाते हैं और शहरों में मध्यवर्ग-उच्चमध्यवर्ग से जुड़े रहते हैं। यह सच है आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में विकास नहीं हुआ है। अधूरे विकास की जगह पूर्ण विकास की मांग, अधूरी आजादी की जगह पूरी आजादी की मांग,पूंजीवादी उत्पादन संबंधों में व्याप्त असमानता की समाप्ति की मांग मूलतः बुर्जुआ फ्रेमवर्क से आगे निकलने नहीं देती।

माओवादियों की भाषा क्रांति,प्रतिवाद,समाजवाद,वर्गसंघर्ष,वर्गीय अन्तर्विरोध,आदिवासी इलाकों लोकतंत्र के हनन,पुलिस उत्पीड़न,हत्या बलात्कार आदि घटनाओं से भरी होती हैं। इस तरह की भाषा और इन घटनाओं से जुड़ी विचारधारा के प्रचार से बुर्जुआ व्यवस्था के विकास में मदद मिलती है। खासकर उन इलाकों में जहां पूंजीपति वर्ग पहुंचा ही नहीं है वहां पर मार्क्सवाद से प्रभावित विभिन्न राजनीतिक दल ,जिनमें माओवादी भी शामिल हैं, लोकतंत्र के विकास के बुनियादी कामों में दिलचस्पी लेते हैं।

जिस तरह का माओवादी संगठनों के जनाधार का विकास नव्य -उदारतावाद के दौर में हुआ है वैसा विकास पहले नहीं हुआ । सन् 1990 के बाद वे जितने आक्रामक बने हैं इतने आक्रामक वे पहले कभी नहीं थे। माओवादी हों या वामदल हों, इन सबकी शक्ति में इजाफा इस बात पर निर्भर करता है कि बुर्जुआ समाज का किस गति से विकास होता है।

कुछ लोग यह सोचते हैं कि क्रांतिकारी आंदोलन का विकास क्रांति के भावों और विचारों के कारण होता है,लेकिन वस्तुस्थिति यह नहीं है। क्रांति की विचारधारा मूलतः लोकतंत्र का बायनरी अपोजीशन है। यानी बुर्जुआजी का बायनरी अपोजीशन है। मजदूरवर्ग,बुर्जुआजी अपना विकास करेगा तो उसके अपोजीशन का भी विकास होगा। उस अपोजीशन को संगठित करने वाली ताकतों का भी विकास होगा। यही वजह है कि अभी तक मजदूरवर्ग की मांगे मूलतः बुर्जुआ मांगें ही रही हैं। वे अपनी मांगों के संघर्ष के जरिए बुर्जुआ वातावरण का विकास करते हैं।

मसलन् माओवादियों के आदिवासी और पिछड़े हुए इलाकों में सांगठनिक विस्तार को ही गंभीरता से देखें तो पाएंगे कि इनमें से अधिकांश इलाकों में वे तब ही गए हैं जब वहां किसी न किसी प्रकल्प के लिए जमीन ली गयी,बाँध बनाया गया,कारखाना लगाया गया या अन्य किसी काम के लिए आदिवासियों को बेदखल किया गया। आदिवासियों की बेदखली के पहले माओवादी इन इलाकों में नजर नहीं आते। आदिवासी इलाकों में बेदखली के खिलाफ उनकी मांगें क्या हैं ? वे सारी मांगें आदिवासी इलाकों के विकास से जुड़ी हैं। इनमें भी वे आदिवासियों को उनकी जमीन पर अधिकार दिलाने या उनका मालिकाना हक बरकरार रखने पर ज्यादा जोर देते हैं।

यानी वे "सचेतनता" की बजाय "संरचना" (जमीन)को बचाने पर ज्यादा जोर देते हैं। फलतः "सचेतनता" की बजाय "संरचना" पर ज्यादा वजन पड़ रहा है। बुर्जुआजी का जोर भी "संरचना" को हासिल करने पर है और माओवादियों का भी जमीन को बचाने पर मूल जोर है। वे आदिवासी और ग्रामीण समाज में पूर्व सामंती ,सामंती मूल्यों और सामाजिक शक्तियों के खिलाफ इसके आधार पर कोई विकल्प पैदा नहीं कर सकते। आदिवासियों और किसानों को नए मूल्यों और नई सामाजिक संरचनाओं में रूपान्तरित करने का उनके पास कोई विकल्प नहीं है। पुराने वर्गों या शोषक वर्गों से मुक्ति का उनके पास एक ही रास्ता है हत्या और हिंसा। यह शत्रु को खत्म करने का प्राचीनमार्ग है। वर्गशत्रु को जमीनी और मूल्यों की जंग में परास्त करने की बजाय हिंसा के जरिए खत्म करने की पद्धति अंततः उन्हें सामंती और पूर्व-सामंती वर्गों के खिलाफ संघर्ष से विमुख करती है। इस तरह की हिंसा से माओवादियों को तत्काल मदद तो मिलती है लेकिन दीर्घकालिक तौर पर यह पद्धति उनके लिए मददगार साबित नहीं हुई है।

जिन इलाकों में माओवादी वर्चस्व है वहां वे सभी काम माओवादी करने लगते हैं जो जमींदार-सूदखोर और लठैत किया करते थे।यानी वे अपने विरोधी वर्ग के अवगुणों को स्वयं अपना लेते हैं। सूदखोरों-जमींदारों को जान से मारना एक जमाने में उनके लिए गुरिल्ला संघर्ष का महत्वपूर्ण अस्त्र था।वे मानते थे इससे गांवों में जमींदारों-सूदखोरों का वर्चस्व खत्म होगा और आम किसान की सत्ता स्थापित होगी। माओवादियों की इस रणनीति के कारण अनेक जमींदार-सूदखोर इलाका छोड़कर चले गए,जो गांवों में रह गए वे मार दिए गए या उन्होंने माओवादियों के सामने समर्पण कर दिया।

माओवादियों की आरंभ में नक्सलवादी के रूप में पहचान थी ।वे गुरिल्ला पद्धति से संघर्ष में विश्वास करते थे,इसी आधार मुक्तांचलों का निर्माण और वर्गशत्रु की हत्या के काम को अंजाम दिया गया। उस समय किसानों और मजदूरों को संगठनबद्ध करने के काम को गौण माना गया। व्यापक शिरकत वाले जनांदोलन की पद्धति को अनुपयुक्त कहा गया। लेकिन कालान्तर में इस पद्धति में सुधार करते हुए माओवादियों ने विभिन्न इलाकों में अलग-अलग नामों से संगठन बनाए या बनवाए और उनके बहाने आदिवासियों-ग्रामीणों आदि को एकजुट करने,मीटिंग करने,रैली करने ,वर्गशत्रु की हत्या करने या बेदखल करने की पद्धति पर जोर दिया गया। गुरिल्ला युद्ध की पद्धति के नाम पर हत्याएं करने के काम को संघर्ष का सर्वोच्च रास्ता माना गया। वे मानते हैं कि इससे सामंती और सत्ता के दलालों के वर्चस्व को खत्म करने में मदद मिलती है।गांवों में किसानों को राजनीतिक शक्ति मिलती है। असल में यह अतिवामपंथ है जो वस्तुगत परिस्थितियों को आत्मगत अधीरभाव से देखता है। कुछ समाजविज्ञानी इसे 'अराजक-आतंकी सिद्धांत' और 'पेटी बुर्जुआ अराजकता' के नाम से भी पुकारते हैं। माओवादियों का मानना है कि उनके द्वारा वर्गशत्रु का सफाया करने की प्रक्रिया के गर्भ से समाज में एक नए मनुष्य का जन्म होगा। यह ऐसा मनुष्य होगा जो मौत से नहीं डरेगा और सभी किस्म के निजी स्वार्थ के विचारों से मुक्त होगा।

माओवादी राजनीति के उभार के कारण नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह के शासनकाल तक के दौरान हुए विकास की सीमाएं बड़ी तेजी से आम लोगों के सामने उजागर हुई हैं। माओवादियों ने बुर्जुआ विकास की तमाम बातों की महानरीय-मध्यवर्गीय सीमाओं को उजागर किया है। आज 136 जिलों में माओवादी सक्रिय हैं और इस सक्रियता का बड़ा कारण है सामाजिक-आर्थिक असमानता का 63 सालों के विकास के बावजूद बने रहना।

माओवादियों ने अंधाधुंध विकास की नव्य-उदारतावादी नीतियों का देश के विभिन्न इलाकों में जनांदोलन खड़ा करके प्रतिवाद किया है ।अनेक स्थानों पर उन्होंने सरकार को पीछे हटने के लिए मजबूर किया है। इस क्रम में कारपोरेट मीडिया में मीडिया उनका महिमामंडन भी हुआ है और माओवादियों ने गरीबी-असमानता और विस्थापन के सवालों पर सरलीकृत फार्मूलों का जमकर दुरूपयोग किया है। इसमें गरीबी को उन्होंने अपनी हिंसा के लिए वैध अस्त्र ठहराया है।



माओवाद के खिलाफ कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि हमें उनके खिलाफ राजनीतिक जंग लड़नी चाहिए। उन्हें जनता में अलग-थलग करना चाहिए। उनके खिलाफ जनता को गोलबंद करना चाहिए। सवाल यह है कि क्या माओवादी हिंसा के समय जनता में राजनीतिक प्रचार किया जा सकता है ? क्या माओवाद का विकल्प जनता को समझाया जा सकता है ? राजनीतिक प्रचार के लिए शांति का माहौल प्राथमिक शर्त है और माओवादी अपने एक्शन से शांति के वातावरण को ही निशाना बनाते हैं,सामान्य वातावरण को ही निशाना बनाते हैं, वे जिस वातावरण की सृष्टि करते हैं उसमें राज्य मशीनरी के सख्त हस्तक्षेप के बिना कोई और विकल्प संभव नहीं है। राज्य की मशीनरी ही माओवादी अथवा आतंकी हिंसा का दमन कर सकती है।

दूसरी बात यह है कि जब एक बार शांति का वातावरण नष्ट हो जाता है तो उसे दुरूस्त करने में बड़ा समय लगता है। माओवादी और उनके समर्थक बुद्धिजीवी माओवादियों की शांति का वातावरण नष्ट कर देने वाली हरकतों से ध्यान हटाने के लिए पुलिस दमन,आदिवासी उत्पीड़न, आदिवासियों का आर्थिक-सामाजिक पिछड़ापन,बहुराष्ट्रीय निगमों के हाथों आदिवासियों की प्राकृतिक भौतिक संपदा को राज्य के द्वारा बेचे जाने,आदिवासियों के विस्थापन आदि को बहाने के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

माओवादी राजनीति या आतंकी राजनीति का सबसे बड़ा योगदान है सामान्य राजनीतिक वातावरण का विनाश। वे जहां पर भी जाते हैं सामान्य वातावरण को बुनियादी तौर पर नष्ट कर देते हैं। ऐसा करके वे भय और निष्क्रियता की सृष्टि करते हैं। इसके आधार पर वे यह दावा पेश करते हैं कि उनके साथ जनता है। सच यह है कि आदिवासी बहुल इलाकों से कांग्रेस, माकपा, भाजपा आदि दलों के लोग चुनाव के जरिए विशाल बहुमत के आधार पर चुनकर आते रहे हैं। माओवादियों के प्रभाव वाले इलाकों में उनकी चुनाव बहिष्कार की अपील का कोई असर नहीं पड़ता।

मीडिया के प्रचार ने कारपोरेट पूंजी निवेश का जिस तरह पारायण किया है और इसके विध्वंसात्मक आयाम पर पर्दादारी की है, उसे गायब किया है, उससे दर्शकीय नजरिया बनाने में मदद मिली है। प्रचार के जरिए हर चीज का जबाब बाजार में खोजा जा रहा है,हमसे सिर्फ देखने और भोग करने की अपील की जा रही है। बाजार,पूंजी निवेश, परवर्ती पूंजीवाद को वस्तुगत बनाने के चक्कर में मीडिया यह भूल ही गया कि वह जनता को सूचना संपन्न नहीं सूचना विपन्न बना रहा है। हमसे यह छिपाया गया है कि पूंजीवाद आखिरकार किन परिस्थितियों में काम करता है।

माओवादी संगठनों के संदर्भ में बुनियादी सवाल यह है कि क्या मौजूदा हिंसाचार जायज, तार्किक,वैध,और न्यायपूर्ण है ? क्या इस हिंसाचार से भारत के किसानों के जानो-माल की रक्षा हो रही है ? क्या माओवादी संगठनों के प्रभाव वाले इलाकों में किसान और आम आदमी चैन की नींद सो रहा है ? माओवादी संगठन अपने प्रभाव वाले इलाकों में जबरिया धन वसूली कर रहे हैं ।

दूसरा सवाल यह है कि माओवादियों के पास कई हजार सशस्त्र गुरिल्ला हैं और उनकी पचासों टुकडियां हैं, इन सबके लिए पैसा कहां से आता है ? गोला-बारूद से लेकर पार्टी होलटाइमरों और सशस्त्र गुरिल्लाओं के वेतन का भुगतान किन स्रोतों से होता है ? कौन हैं वे देशी-विदेशी संगठन और लोग जो इतने बड़े पैमाने पर माओवादी गुरिल्लाओं को पैसा भेज रहे हैं ?

माओवादियों की बात मानें तो आदिवासी अतिदरिद्र हैं। और वे कम से कम माओवादियों के लिए नियमित चंदा नहीं दे सकते। माओवादियों को कभी किसी ने शहरों में भी चंदा की रसीद काटकर या कूपन देकर चंदा वसूलते नहीं देखा। ऐसी स्थिति में वे धन कहां से प्राप्त करते हैं ? हिन्दुस्तान की गरीब जनता और खासकर आदिवासियों को यह जानने का हक है कि माओवादियों के पास धन कहां से आता है ?और किन मदों में खर्च होता है ?

माओवादियों के संदर्भ में तीसरा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या भारत की बहुलता को माओवादियों के राज्य में कोई जगह मिलेगी ? आज तक राजनीतिक,वैचारिक ,सामाजिक और धार्मिक बहुलतावाद के प्रति माओवादियों का घृणास्पद और बर्बर व्यवहार रहा है ऐसा ही व्यवहार साम्प्रदायिक,फंड़ामेंटलिस्ट और आतंकवादी संगठन भी करते हैं।

आज भारत में ऐसे दल हैं जो क्रांति लाना चाहते हैं। सर्वहारा के अधिनायकवाद के पक्षधर हैं। लेकिन वे भारत के बहुलतावादी समाज और राजनीतिक तानेबाने को मानते हैं और उसकी रक्षा के लिए समय-समय पर अपने दलीय स्वार्थ का भी उन्होंने त्याग किया है। उनकी लोकतंत्र और भारत के संविधान में आस्था है। भारत के दोनों कम्युनिस्ट दल इसके प्रमाण हैं।

समस्या यह है कि माओवादी बहुलतावाद के प्रति सहिष्णु क्यों नहीं हैं ? यदि सहिष्णु हैं तो वह सहिष्णुता व्यवहार में नजर क्यों नहीं आती ? ‘ऊपर से छह इंट छोटा कर देने से लेकर दनादन मौत के घाट उतारने तक’ का माओवादियों का राजनीतिक सफर इस बात की ओर संकेत कर रहता है कि उनके यहां बहुलतावाद के लिए कोई जगह नहीं है।

क्या हम यह कल्पना कर सकते हैं कि माओवादी शासन होगा और उसमें सभी धर्मों की आजादी बरकरार रहेगी ? सभी दलों की राजनीतिक स्वाधीनता बची रहेगी ? सभी वर्गों में भाईचारा रहेगा ? औरतों ,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की राजनीतिक-धार्मिक और भाषायी स्वाधीनता बरकरार रहेगी ? उनके राज्य में विभिन्न रंगत के मार्क्सवादी,राष्ट्रवादी,उदारवादी सुरक्षित और स्वतंत्रभाव से रहेंगे ? और उन्हें अभी जितनी आजादी बुर्जुआ संविधान के तहत मिली हुई है उससे भी ज्यादा स्वाधीनता और अधिकार प्राप्त होंगे ?

माओवाद के संदर्भ में चौथा सवाल यह है कि क्या माओवाद प्रभावित 136 जिलों में सामाजिक-राजनीतिक शक्ति संतुलन माओवादियों के पक्ष में है ? जी नहीं ,माओवादी संगठन ही नहीं सभी रंगत के क्रांतिकारी संगठन मिल जाएं तो भी सामाजिक और राजनीतिक शक्ति संतुलन उनके पक्ष में नहीं है।माकपा और वाममोर्चा लंबे समय से पश्चिम बंगाल,त्रिपुरा और केरल में प्रमुख राजनीतिक शक्ति हैं लेकिन सामाजिक वर्गीय शक्ति संतुलन आज भी उनके पक्ष में नहीं हैं जबकि उन्हें जनता में बड़ी मात्रा में जनसमर्थन प्राप्त है। इसकी तुलना में माओवादियों का किसी भी राज्य में राजनीतिक वर्चस्व नहीं है,सामाजिक वर्गीय शक्ति संतुलन उनके पक्ष में होना तो दिवा-स्वप्न है। माओवादी संगठन किसान,आदिवासी और क्रांति की कितनी ही बातें करें भारत के वैचारिक, राजनीतिक, भाषायी,धार्मिक और सांस्कृतिक बहुलतावाद को नतमस्क होकर स्वीकार करना होगा। बहुलतावाद के इन रूपों को अस्वीकार करने के कारण सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के सभी देशों में समाजवाद गिर गया और कम्युनिस्ट पार्टियों के अंदर से विभिन्न रंगत के पृथकतावादी,फासिस्ट,अंधराष्ट्रवादी,अपराधी, राज्य की संपत्ति के लुटेरे पूंजीपतियों का समूह रातों-रात पैदा हो गया था। समाजवादी व्यवस्था के पराभव के साथ ही हठात् कम्युनिस्टों के अंदर से ऐसे तत्व बाहर आए हैं जिनकी कोई कल्पना तक नहीं कर सकता। आज पूर्व समाजवादी देशों की जनता का कम्युनिस्टों पर विश्वास नहीं है। कहने का अर्थ यह है कि वैचारिक ,सामाजिक और सांस्कृतिक बहुलतावाद और लोकतंत्र वास्तविकता हैं। इनको हर कीमत पर बचाया जाना चाहिए।

माओवादी राजनीति का राजनीतिक बहुलतावाद से बैर है।राजनीतिक बहुलतावाद और लोकतंत्र एक सिक्के के ही दो पहलू हैं। माओवादियों की भारत के लोकतंत्र में आस्था नहीं है ऐसे में बहुलतावाद का क्या होगा ? क्या माओवाद के नाम पर भारत के लोग बहुआयामी बहुलतावाद की बलि देने को तैयार हैं ?

एक अन्य सवाल उठता है कि माओवादी अंधाधुंध कत्लेआम क्यों कर रहे हैं ? इस कत्लेआम का उनके प्रतिवादी संघर्षों और किसान-आदिवासियों में नव्य-उदारतावादजनित विस्थापन और भूमि अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष के एजेण्डे गहरा संबंध है।

आज भारत में नव्य उदारतावाद का एजेण्डा पिट चुका है। दूसरा कारण है माओवादी आंदोलन का चंद क्षेत्रों तक सीमित हो जाना। हिन्दुस्तान के अन्य वर्गों की समस्याएं उनके आंदोलन के केन्द्र में नहीं हैं। वे राजनेताओं और विभिन्न राजनीतिक दलों की नीतियों को खारिज करते हैं। कल तक माओवादियों के अंदर एक हिस्सा था जो लोकतंत्र को नहीं मानता था लेकिन अब वे चुनावों में भाग लेते हैं।

आज माओवादियों के सामने संकट यह है कि नव्य-उदारतावाद के खिलाफ उनका संघर्ष किसानों से लेकर मध्यवर्ग तक अपील खो चुका है। दूसरी ओर बुर्जुआ उदार लोकतंत्र की साख में भी बट्टा लग चुका है। समाजवाद के अधिकांश मॉडल पिट चुके हैं ऐसी अवस्था में माओवादी समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें ?

माओवादियों ने हाल वर्षों में नव्य-उदारतावाद के खिलाफ संघर्ष करके जो जमीन बनायी थी वह ग्लोबल एजेण्डा पूरी तरह पिट गया है। यह अमरीकी ग्लोबल एजेण्डा था आज जब अमेरिका में इस एजेण्डे का अंत हुआ है तो स्वाभाविक तौर पर सारी दुनिया में इसकी विदाई की घोषणा हो गयी है।

नव्य-उदारतावाद की विदाई की बेला में माओवादियों के पास सही एजेण्डे का अभाव है यही बुनियादी वजह है जिसके कारण वे अंधाधुंध हत्याएं कर रहे हैं। यह उनके दिशाहीन होने का संकेत है। माओवादियों का हिंसाचार 2001 के बाद से क्रमशः बढ़ा है और यह उनके एजेण्डे के पिटने का संकेत है।

माकपा और वामदलों ने नव्यउदारतावाद के बरक्स अपनी राजनीति में संतुलन पैदा किया और विकल्प का मार्ग चुना और इस दौर में नव्य उदारतावाद के संदर्भ में नए नीतिगत उपाय लागू कराने में सफलता हासिल की। नव्य-उदारतावाद के पिटते ही सोनिया-राहुल गांधी भी किसानों के हितों का ख्याल रखने की बातें करने लगे हैं। आज सोनिया और माओवादियों में किसानों की जमीन के मामले में एक ही स्वर दिखाई दे रहा है। अब वे जमीन अधिग्रहण के मामले में नया सख्त कानून लाना चाहते हैं। लेकिन अधिकांश राज्यों में किसानों की लाखों एकड़ जमीन तो कारपोरेट घराने खरीद चुके हैं। कानून ही लाना था तो 10 साल पहले क्यों नहीं लाए ?

माओवादी संगठनों के हिंसाचार का एक अन्य कारण है भारत में खासकर आदिवासी इलाकों में लोकतंत्र में जनता की व्यापक शिरकत। लोकतंत्र में व्यापक शिरकत के कारण ही वे लाख प्रचार करके भी साधारण लोगों को वोट ड़ालने से रोक नहीं पाए हैं। यही वजह है कि वे गरीबों की अंधाधुंध हत्याएं कर रहे हैं। उल्लेखनीय है नव्य-उदारतावाद के लाख दोष हों लेकिन आम आदमी की चेतना और शिरकत में कई गुना वृद्धि हुई है। संचार क्रांति ने क्रांति के सभी रूपों को फीका बना दिया है। बुर्जुआ लोकतंत्र के प्रति आकर्षण बढ़ा है।

रविवार, 22 मई 2011

आधुनिकता की नई चुनौतियां


   हिन्दी साहित्य में आधुनिकता के सवालों पर आए दिन बहस होती रहती है। आधुनिकता की शुरूआत 'अन्य' या विकल्प के उत्पादन से हुई है। आज 'अन्य' को मारने,हत्या करने,,वंचित करने या उसका शोषण करने या सामना करने की जरूरत नहीं है। उससे घृणा,प्रतिस्पर्धा,प्रेम करने की भी जरूरत नहीं है। आज की चुनौती है कि 'अदर' या 'अन्य' को पैदा किया जाय। अब 'अन्य' पेशन की वस्तु नहीं रह गया है।बल्कि उत्पादन की वस्तु बन गया है। पूंजीवाद के बिना आधुनिकता का उदय नहीं होता,व्यक्तिगत मूल्यों और व्यक्तिवाद का उदय नहीं होता ,अतः आधुनिकता पर कोई भी बहस पूंजीवाद को दरकिनार करके संभव नहीं है। आधुनिकता मूलतः पूंजीवादी प्रकल्प का हिस्सा है। आधुनिकता के उदय के साथ अन्य या हाशिए के लोगों के सवाल,स्त्री,मुसलमान,आदिवासी आदि के सवाल केन्द्र में आ गए हैं। आधुनिकता इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि वह अन्य को या हाशिए के लोगों के सवालों को केन्द्र में ले आ जाती है। हाशिए के लोगों पर प्रतीकात्मक हमले तेज हो जाते हैं। 'अन्य' के भविष्य को लेकर हमारा कोई अनुभव नहीं था,अत: 'अन्य' की हमने 'भिन्न' या 'डिफरेंस' के रूप में खोज की। साहित्य से लेकर मासकल्चर तक अन्य के प्रति हमारे सरोकार शरीर,सेक्स और सामाजिक संबंधों की तलाश में व्यक्त हुए।इसके बहाने हम उसके भवितव्य से पलायन कर गए।हमने उसके शरीर,उसके सेक्स,उसके 'अन्यत्व' को ही भवितव्य बना डाला।शरीर को सेक्स की वस्तु बना दिया।इसी के क्रम में लिंगभेद सामने आया।प्रत्येक लिंग का अपना शारीरिक वैशिष्टय होता है।विशिष्ट मानसिक गठन होता है।उसकी अपनी इच्छाएं होती हैं।इसके कारण अघटित घटनाएं सामने आती हैं।जिनमें इच्छा और सेक्स की विचारधारा भी शामिल है।सेक्सुअल  डिफरेंस का यूटोपिया, प्रकृति और कानून के आधार पर खड़ा किया गया।किंतु इन दोनों का कोई अर्थ ही नहीं था।क्योंकि ये दोनों इच्छाओं को फुसलाते थे।इच्छाओं के बारे में सवाल पैदा नहीं करते थे।बल्कि उनसे खेलते थे।ऐसे में दो लिंगों के बीच समानता का सवाल भी कहां उठता है।इनमें परस्पर विनिमय था।प्रत्येक की भिन्नता और अलगाव में विनिमय था।किंतु वैकल्पिकता और 'अन्यत्व' में फुसलाने का तत्व उन्माद की हद तक पहुँच गया।क्योंकि कभी किसी भी लिंग ने अपनी कामुकता को अन्य तक नहीं पहुँचाया है।अत: दूरी तय कर दी गई।'अन्य' या 'भिन्नता' को स्पर्श ही नहीं किया गया।यह भ्रम की महान अवस्था है जब हम इच्छाओं से खेल रहे थे।इस प्रक्रिया में हमने क्या पैदा किया ?हमने मर्दानगी के उन्माद को जन्म दिया।कामुकता के पैराडाइम को बदल दिया।बदले हुए पैराडाइम ने नए सिरे से सामान्य और सार्वभौम संदर्भों में 'अन्यत्व'के पैराडाइम को बदला।
     उन्माद के दौर में पुरूष के अंदर छिपी नारी की छवि को स्त्री के मन में उतारा।स्त्री के आदर्श शरीर के रूप में इसको प्रतिष्ठित किया।अब रोमांटिक प्यार स्त्री के दिल को जीतना नहीं था।उसे फुसलाना नहीं था।बल्कि उसके अंदर एक यूटोपिया को निर्मित किया गया। आदर्श नारी की छवि पैदा की गई। देवी,दुर्गा,सरस्वती,काली आदि रूपकों के माध्यम से अति-प्राकृतिक छवि निर्मित की गई।हमारे नव-जागरण काल में ऐसे लेखन की भरमार है। इसे ही सद्भाव के आदर्श रूप में पेश किया गया।अब ऐसे रूप सामने आए जो प्यार के तत्व से दूर थे।हम यह भी कह सकते हैं कि वे आदर्श से भी दूर थे।इसी के गर्भ से फुसलाने का दोमुँहापन सामने आया।इसे कारण कामुकता के पूरे तंत्र में बदलाव आया।उसका अर्थ और दिशाएं बदल गईं।क्योंकि कामुक आकर्षण 'अन्यत्व' से आ रहा था।अन्य के पागलपन ने एक जैसे या तुलानात्मक रूप में समान के रूप में अभिव्यक्ति पाई।अब हम अन्य की नजर से अपने को देखने लगे।स्वयं को अन्य की नजर से देखने का दुष्परिणाम यह हुआ कि हमने 'अन्य' से अपने को अलगा लिया।अब'अन्य' और 'मैं' में अंतर नहीं रह गया।यही वजह है कि रोमांटिक प्यार और उसके सारे बाई प्रोडक्ट अंतत: मौत की शरण लेते हैं।क्योंकि कामुकता अगम्यागमन और भवितव्य को पा लेती है।इसी आधुनिकता के दौर में 'फेमिनिटी' या स्त्रीत्व का जन्म होता है,जो स्त्री को 'सुपरफ्लुअस' बना देती है।'डिफरेंस' का उदय स्वयं में उस दोमुँहेपन से ध्यान हटाने वाली चीज है। बौद्रिलार्द ने लिखा है कि फेमिनिज्म वस्तुत: मर्दानगी का उन्मादभरा कथन है।स्त्रियां जिस उन्मादभरे ढ़ंग से मर्दानगी को देख रही हैं।मर्द भी उन्मादित ढ़ंग से स्त्रियों को देख रहे हैं। फलतः हमें स्त्री के 'अन्यत्व' को भिन्न तरीके से देखना होगा।स्त्रियों के बारे में विकल्पबोध पैदा करना होगा।स्त्री के असली रूप को सामने लाना होगा।वह पुरूष के मन की इच्छित छवि नहीं है।बल्कि उसकी अलग दुनिया है।हमें स्त्रियों के अंदर भी विकल्प खोजने होंगे।स्त्री की एक जमाना था।'अन्य' के रूप में जरूरत थी।सामाजिक उत्पादक के रूप में जरूरत थी।हम यह मानते थे कि स्त्री नहीं होगी तो संसार नहीं बसेगा।किंतु आज स्थितियां दल गई हैं।जिस तरह 'क्लोन' की खोज हुई है।उसमें पैदा करने के लिए स्त्री की जरूरत ही नहीं होगी।स्त्री की सेक्सुअल भूमिका एकदम अप्रासंगिक हो गई है। आज पुनरूत्पादन के लिए सेक्सुएलिटी एकदम अप्रासंगिक हो गई।इस परिघटना ने हमारे समूचे चिन्तन में भारी परिवर्तन करने शुरू कर दिए हैं।हमने जिस स्त्री की खोज की थी।अपने अनुकूल ढाला था।वह अब अप्रासंगिक हो गई है।हम यह भी कह सकते हैं कि असली औरत गुम हो गई है।अभी तक हमारे बीच में 'भिन्नता' या 'अन्यत्व' के जितने भी तर्क थे वे सब बेमानी हो गए हैं।ये सारे तर्क हमने पुरूष संदर्भ और पुरूष के प्रति आक्रोश के क्रम में निर्मित किए थे। बदली हुई स्थितियों में हमें विचारधारा और स्त्रीवाद के सभी वैचारिक सवालों पर नए सिरे से विचार करना होगा।आज स्त्री अपनी वास्तव इमेज को प्रस्तुत नहीं कर पा रही है।हम स्त्री की अनुमानित इमेजों के आधार पर भूमिका तय कर रहे हैं।इसी क्रम में लिंग और मर्दानगी के वैशिष्टय पर भी हमें नए ढ़ंग से सोचना होगा।विज्ञान की नई खोजों ने स्त्री के वैशिष्टय और भिन्नता को पूरी तरह खत्म कर दिया है।अब लिंगभेद समस्या नहीं रह गई है।बड़े पैमाने पर कामुक रूपान्तरण हो रहा है।मर्दानगी की इच्छाओं के सामने समस्याएं आ खड़ी हुई हैं।यह युग ट्रांससेक्सुअलिज्म का है।जबकि हमारे सारे संघर्ष लिंगभेद पर टिके रहे हैं।असली कामुकता और असली 'अदरनेस' का अब लोप होने वाला है। पुरूष के उन्माद और स्त्री के उन्माद के बीच सफलतापूर्वक सम्मिलन हो चुका है।यहां तक कि शरीरों का भी सम्मिलन हो चुका है।आज 'निज' का 'अन्य' में समावेश हो चुका है।'मैं' और 'अन्य' का भेद खत्म हो चुका है।आज 'अन्यत्व' का कोई भवितव्य हम नहीं जानते।हम इस भवितव्य के बारे में कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं। शरीर,सेक्स,बीमारी,मृत्यु,अस्मिता आदि में निरंतर बदलाव आ रहा है।इस परिवर्तन को लेकर आप कुछ भी नहीं कर सकते।यही भवितव्य है।आज व्यक्ति की इच्छा,लुक,हाव- भाव, इमेज आदि सभी में प्लास्टिक सर्जरी का इस्तेमाल हो रहा है।यदि हम अपना शरीर पराया लग रहा है।हम इसकी प्लास्टिक सर्जरी करा सकते हैं।संतोष प्राप्त कर सकते हैं।परिवर्तन करा सकते हैं।इसे आइडियल ऑब्जेक्ट बना सकते है।चुस्त-दुरूस्त बना सकते हैं।शरीर के प्रति आकर्षण,शरीर की चाह अंतत: अन्य का अस्तित्व ही खत्म कर देती है।आज प्रामाणिक संस्कृति की जगह छद्म प्रामाणिकता ने ले ली है।स्वाभाविक संबंधों की जगह 'अन्य' के प्रति कृत्रिम संबंध आ गए हैं।आज सभी अलगाव की बात कर रहे हैं।खासकर 'अन्य' के साथ अलगाव की बातें ज्यादा हो रही हैं।सच यह है कि हमने 'अन्य' पर अलगाव थोपा है।इसके कारण हम 'अन्य' की मौजूदगी के बिना 'अन्य' को पैदा कर लेते हैं।यह सब हम अपनी इमेज और पहचान के आधार पर कर रहे हैं।आज हमारी जो आलोचना हो रही है वह अलगाव के कारण नहीं हो रही।आज हम अपनी इमेज की निन्दा कर रहे हैं।सच यह है कि 'अन्य' गुम हो गया है।अलगाव खत्म हो गया है। आभासी जगत में भी अन्य गायब हो गया है।यह सबसे बड़ी दुर्घटना है।आज प्रत्येक क्षेत्र में प्लास्टिक सर्जरी का साम्राज्य है।आज इसके जरिए सब कुछ बदल सकते हैं।शरीर और चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी तो अदरनेस और भवितव्य का एक छोटा पक्ष है।सवाल उठता है कि क्या करें ? देखिए किसी भी किस्म का कामुकता का आंदोलन इसका समाधान नहीं है। कामुकता के प्रति आकर्षण भी इसका समाधान नहीं है। अन्य का अस्वीकार और उसके भवितव्य का अस्वीकार भी इसका समाधान नहीं है।अन्य को फुसलाने से इसकी मुक्ति संभव नहीं है।फुसलाने को मुक्ति समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।हमें अपने शरीर,प्रकृति, स्त्रीत्व, अन्यत्व,स्व के प्रति असंतोष को बनाए रखना चाहिए।इस असंतोष में ही आकर्षण है।यहीं से हमारी मुक्ति और परिवर्तन की जंग शुरू होती है।प्लास्टिक सर्जरी अन्य की मुक्ति का मार्ग नहीं है।बल्कि भ्रम है। असल में सूचना हाइवे या सूचना समाज एक रूपक है।इसमें तीव्रगामी स्पीड,मोशन और डायरेक्शन संभव है।एक मर्तबा रोलां बार्थ ने लिखा था कि,जब हम ड्राइवर / दर्शक की नजर से इमेजों को देखते हैं तब हमारे सहज मोशन दृश्य अनुभव में बदलते हैं। ऐसे में में इमेजों का रूपान्तरण करते है। वास्तव जगत का नहीं।साइबर स्पेस जो मिथ्याभास पैदा करता है वह स्क्रीन के परे होता है। यहां वास्तव जगत का कोई संदर्भ नहीं होता। सब कुछ अवास्तविक,काल्पनिक,इमेजरी होता है।यह गहराई रहित सतह है।बौद्रिलार्द्र के शब्दों में यह यथार्थ का सैटेलाइजेशन है।जिसे हाईपर रियलिटी की तेज गति से पलायन करके उपलब्ब्ध किया जाता है।यह ऐसी दुनिया है जहां रूपक और इमेज के बीच किसी खेल की अनुमति नहीं है।यहां मेटाफर का परिवर्तन के लिए इस्तेमाल नहीं हो रहा।अपितु मिथ्याभास की दुनिया में भ्रमण के लिए तरह-तरह के रूपकों का इस्तेमाल हो रहा है।हाईपर रियलिटी के रूपकों की इमेजों में हम विचरण करते हैं।पॉल विरलियो के शब्दों में कम्प्यूटर अथवा टेलीकम्युनिकेशन आखिरी वाहन है,जो हमारे सभी तरह के टोपोलॉजिकल या संस्थिति विज्ञान संबंधी सरोकारों से मुक्त कर देता है।मोशन,स्पीड,एवं पर्यटन अपना असली अर्थ खो देते हैं। यह अपनी शक्ति मिथ्याभास से अर्जित करता है।आभासी जगत की जगह गतिमान जगत  आ जाता है।यह भी कह सकते हैं कि वास्तव की जगह गतिमान(काईनेटिक) ऊर्जा जन्म ले लेती है।साइबर ट्रेवल के नामपर हम जिस दुनिया में भ्रमण करते हैं वह रूपकों की दुनिया है,यह कम्प्यूटर स्क्रीन के परे है।आज 'ग्लोब' का अर्थ 'विश्व' नहीं रह गया है।क्योंकि वह अब 'वर्ल्ड' मात्र रह गया है।यदि इस परिप्रेक्ष्य में मीडिया इमेजों और इंटरनेट के बारे में विचार किया जाए तो पाएंगे कि साइबरमेटिक वर्ल्ड के 'स्पेस' के जितने भी तर्क हैं वे जगत से जुड़े नहीं हैं।वे ऐसे जगत से वचित कर देता है जिसे देखा जा सकता था,महसूस किया जा सकता था,जो पारदर्शी था,तत्क्षण उपलब्घ था।टैक्नोलॉजी का यह कार्य था कि वह दूरियां कम करे।किंतु इसने तो दूरी की अवधारणा को ही खत्म कर दिया।इसने स्पेस और टाइम को खत्म कर दिया।आज वह निरंतर किसी न किसी विषय का खास समय और स्थान के संदर्भ से अपहरण कर रही है।  कम्प्यूटर स्क्रीन तो आभासी है।इसे भरा नहीं जा सकता।इसका अतिक्रमण भी नहीं कर सकते।आप इसमें मीडिया के जरिए सर्कुलेट कर सकते हैं।वास्तव दूरी का विस्फोट की तरह गायब हो जाना असल में इसे पानेकी हमारी चुनौतियों को बढ़ा देता है।स्थान और दूरी के अंतराल को शरीर से नहीं भरा जा सकता।अपितु स्वयं की आभासी यात्राओं से ही भर सकते हैं। आभासी संसार वास्तव नहीं होता।इस संसार की शुरूआत सभी किस्म के संदर्भों के खात्मे से होती है। यहां संकेतों की कृत्रिम दुनिया का बोलवाला है।संकेतों की दुनिया में अर्थ सबसे ज्यादा अस्थिर होता है।वहां अर्थ से ज्यादा वस्तु का महत्व होता है।यहां व्यवस्थाएं बराबर हैं।यहां सभी विरोधाभासी चीजें,धारणाएं भी बराबर हैं।









रविवार, 26 दिसंबर 2010

जनवादी अज्ञेय की तलाश में

      इस साल स.ही.वा.अज्ञेय का जन्मशती वर्ष मनाया जा रहा है और उनके नाम पर बड़े-बड़े जलसे हो रहे हैं और इन जलसों में सबसे विलक्षण बात है प्रगतिशील आलोचकों और लेखकों की उपस्थिति। उल्लेखनीय है प्रगतिशील आलोचकों ने अज्ञेय का कभी संतुलन के साथ मूल्यांकन नहीं किया और वे उन्हें लगातार आधुनिकतावादी और अमेरिकापंथी कहकर खारिज करते रहे हैं। वे अज्ञेय को लोकतांत्रिक लेखक नहीं मानते। ऐसे  लेखकों-आलोचकों को जब अज्ञेय के जलसों में देखता हूँ तो आश्चर्य होता है। ये लोग साहित्य की रेबड़ियां खाने में हमेशा आगे रहते हैं। ये साहित्य के जन-संपर्क अधिकारी हैं। ये सबके हैं और सब इनके हैं। सेठ,सत्ता,सेठानी,विश्वविद्यालय ,टीवी आदि सभी मंचों पर इन्हें देख सकते हैं।  ये असल में साहित्य के प्रगतिशील लेखक-आलोचक नहीं जनसंपर्क अधिकारी हैं। उन्हें मंच से मतलब है और वे किसी भी लेखक के आयोजन में और किसी भी विषय पर सानंद पधारने को तैयार रहते हैं बस उन्हें सिर्फ पत्र-पुष्प और कुर्सी चाहिए। इससे हिन्दी का सिर नीचा हुआ है, आलोचना दरिद्र हुई है।
      अज्ञेय को कल तक लोकतंत्र का शत्रु बताने वाले,अमेरिका का एजेण्ट बताने वाले और आधुनिकतावादी बताने वाले स्वनामधन्य प्रगतिशील हिन्दी आलोचकों की वैचारिक दरिद्रता ही कही जाएगी कि वे खुलकर अपनी आत्मालोचना नहीं कर रहे हैं। वे अज्ञेय का पुनर्मूल्यांकन भी नहीं कर रहे हैं। वे यह भी नहीं बता रहे हैं कि साहित्य में पहली और दूसरी परंपरा बनाते समय उन्हें अज्ञेय का स्मरण क्यों नहीं आया ? वे नहीं बता रहे हैं कि धर्मनिरपेक्षता,लोकतंत्र और समानता के व्यापक संदर्भ में अज्ञेय क्यों प्रासंगिक हैं ?
     वे हमें अज्ञेय पर कुछ किस्से बता रहे हैं। संस्मरण बता रहे हैं। गूढ़ किस्म की अबूझ बातें बता रहे हैं जिन्हें मौजूदा दौर से जोड़कर देखने और समझने में असुविधा होती है। जो लोग साम्प्रदायिकता का विरोध करने वालों और अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन करने वालों को अभी तक जनवादी और धर्मनिरपेक्ष मानते रहे हैं वे भी अज्ञेय को जनवादी और धर्मनिरपेक्ष लेखक मानने से किनाराकशी कर रहे हैं। हिन्दी साहित्य में जो लोग अज्ञेय की ‘कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ की गतिविधियों का विरोध करते रहे हैं और उसके आधार पर उन्हें सीआईए का एजेंट तक बताते रहे हैं उन्हें इस बात का जबाब देना चाहिए कि इन दिनों सीआईए और अमेरिकी विदेश नीति के झंड़े तले चलने वाले विश्वव्यापी लोकतंत्र बचाओ संगठन ‘ दि इनडोवमेंट फॉर डेमोक्रेसी ’ के साथ जुड़े हुए प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन उन्हें सीआईए एजेण्ट नजर क्यों नहीं आते ? समझ में नहीं आता कि अज्ञेय को ही शीतयुद्धीय तमंगे क्यों दिए गए ? जबकि अज्ञेय ने आपात्काल का विरोध किया था। साम्प्रदायिकता का विरोध किया था,धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में जमकर लिखा। अज्ञेय हिन्दी के प्रमुख जनवादी और धर्मनिरपेक्ष लेखक हैं उन्होंने अलगाव की धारणा का साहित्य में,खासकर कथा साहित्य में सर्जनात्मक सकारात्मक रूपायन किया है। अज्ञेय पर नयी समीक्षा का गहरा असर था। कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के साथ वे जुड़े हुए थे। उन्होंने 1980 में ‘जय जानकी यात्रा’ के नाम पर बहुत कुछ ऐसा किया जिसकी आलोचना भारत के संदर्भ में रखकर की जानी चाहिए। यह अध्यात्म और साहित्य की जुगलबंदी थी।
   ‘कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ नामक अमेरिकी संगठन के साथ बाबू जयप्रकाश नारायण आदि भारत के अनेक राजनेता-बुद्धिजीवी जुड़े हुए थे। लेकिन उन सबको भारत की राजनीति में लोकतांत्रिक माना गया । लेकिन अज्ञेय को नहीं।  भारत में भाजपा को लोग लोकतांत्रिक मानने को तैयार हैं लेकिन अज्ञेय को नहीं। सवाल उठता है क्या अज्ञेय लोकतांत्रिक हैं ? यदि हैं तो उनका एक लोकतांत्रिक लेखक के रूप में मूल्यांकन होना चाहिए। अज्ञेय को हिन्दी आलोचना के एक बड़े हिस्से ने शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क में रखकर पढ़ा और विश्लेषित किया है। कम से कम हमें अब अज्ञेय और हिन्दी साहित्य का शीतयुद्ध की वैचारिक बंद गली के बाहर लाकर मूल्यांकन करना चाहिए।
      अज्ञेय की कविता के बारे में बात करते समय हमें समग्रता और विविधता दोनों का ख्याल रखना होगा। ‘समग्रता और विविधता’ उनकी आधुनिकता की धुरी है। वे हठात आधुनिकतावाद के क्लासिकल लेखक कैसे बन गए ? कल तक जो लोग यह मान रहे थे कि अज्ञेय के आधुनिकतावाद का कोई महत्व नहीं है ,उन्हीं को अज्ञेय इतने प्रासंगिक क्यों लग रहे हैं ? जिन समस्याओं पर अज्ञेय ने प्रगतिवाद की आलोचना करते हुए सबसे पहले ध्यान खींचा था। समाजवाद की अनेक बड़ी कमजोरियों को अपनी रचना के माध्यम से उजागर किया था। उन पर पुनर्विचार की जरूरत है।
    समाजवाद, साम्प्रदायिकता,लोकतंत्र, आपात्काल,साहित्य और यथार्थ,साहित्य और क्रांति, साहित्य और अलगाव, साहित्य और दैनंदिन जीवन,साहित्य और आत्मकथा, साहित्य और नैतिकता, साहित्य और धर्म, कहानी और उपन्यास की संरचनाएं,कविता या साहित्य का लक्ष्य,लेखक की भूमिका,साहित्य की सामाजिक भूमिका,साहित्य की राजनीतिक भूमिका ,पत्रकारिता और राष्ट्रवाद,पत्रकारिता और लोकतंत्र आदि सवालों पर उन्होंने विस्तार के साथ विचार किया है। इन सभी सवालों पर विचार करते हुए अज्ञेय ने साहित्य और पत्रकारिता के सर्जनात्मक और सूचनात्मक रूप के साथ कोई समझौता नहीं किया। उनकी सर्जनात्मक प्रतिभा का लोहा उनके आलोचक भी मानते हैं। उनके लेखन में स्टीरियोटाईप रूपों का निषेध है।
     रोलां बार्थ के शब्दों में किसी भी साहित्य की महानता इस तथ्य से आंकी जानी चाहिए कि क्या उसमें जीवन की धड़कनें व्यंजित होती हैं ? क्या साहित्य से जीवन को प्राणवायु मिलती है ? क्या जीवन को साहित्य विकसित करता है या उसका विध्वंस करता है ? कम से कम अज्ञेय के साहित्य के संदर्भ में हम यह कह सकते हैं कि साहित्य में जीवन संचार के साथ-साथ जीवन में भी सर्जनात्मक प्राणवायु के संचार में उनके साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान है। खासकर उनके क्रांतिकारी जीवन की रचनाओं, भारत-विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखी रचनाओं,अलगावकेन्द्रित कथा साहित्य और आपातकाल के विरोध में लिखी रचनाओं ने हिन्दी साहित्य की जनवादी परंपरा को समृद्ध किया है।
    अज्ञेय और प्रगतिशील लेखकों में एक बड़ा अंतर है प्रगतिशील लेखकों ने सार्वभौम को प्रधानता दी, सामयिकता-स्थानीयता के रूपायन पर जोर दिया , तात्कालिक राजनीतिक जरूरतों की साहित्यपूर्ति पर जोर दिया। जबकि अज्ञेय ने सामयिक समस्याओं को सार्वभौम परिप्रेक्ष्य में पेश किया। रचना को तात्कालिक राजनीतिक  दबावों से मुक्त रखा । वे इस क्रम में विचारधारा का परित्याग नहीं करते। जिस तरह प्रगतिशील लेखकों को विचारधारा से लगाव है वैसे ही अज्ञेय को भी विचारधारा से लगाव है। वे अपनी विचारधारात्मक अभिव्यक्तियों में वैविध्यपूर्ण इमेजरी और प्रतीकों का जमकर इस्तेमाल करते हैं। बहुस्तरीय अर्थ संरचनाओं को अभिव्यक्ति देते हैं।  यहां उनकी उन कविताओं में से सिर्फ एक कविता की चर्चा करना चाहता हूँ जिस पर हिन्दी आलोचना में कभी चर्चा नहीं हुई । कविता का शीर्षक है  ‘घृणा का गान’ । यह कविता भारत के उस यथार्थ की ओर ध्यान खींचती है जिसे हम अछूत कहते हैं। लिखा है-‘‘सुनो,तुम्हें ललकार रहा हूँ,सुनो घृणा का गान! / तुम,जो भाई को अछूत कह वस्त्र बचाकर भागे/ तुम,जो बहिनों छोड़ बिलखती,बढ़े जारहे आगे! / उत्तर दो,मेरा है प्रतिहत आह्वान-/ सुनो ,तुम्हें ललकार रहा हूँ,सुनो घृणा का गान! /’’
    यह कविता हिन्दी की अछूत समस्या पर लिखी शानदार कविता है। इसमें लेखक का अछूत को भाई मानना बड़ा ही अर्थपूर्ण है और यह कविता अज्ञेय ने लाहौर में 30 जनवरी 1935 को लिखी थी। इस कविता के माध्यम से लेखक ने अमीरों,सवर्णों, लेखकों, सत्ताधारियों आदि के अछूतों के प्रति अमानवीय रवैय्ये का जितना सुंदर चित्रण किया है। वह उल्लेखनीय है। अछूतविरोधी भावनाओं को उन्होंने घृणा के गान की संज्ञा दी है। जो अछूतों से परहेज रखते थे उन्हें अज्ञेय ने ‘श्मशानों के देव’ कहा। अछूतों के प्रति अमानवीय रवैय्या उनका भी है जो प्राचीनतापंथी हैं। लिखा है ‘‘ तुम ,सत्ताधारी, मानवता के शव पर आसीन/ जीवन के चिर-रिपु,विकास के प्रतिद्वंद्वी प्राचीन/ तुम श्मशान के देव! सुनो यह रण-भेरी की तान-/ आज तुम्हें ललकार रहा हूँ,सुनो घृणा का गान।’’
     अज्ञेय के बारे में आम तौर पर जितनी चर्चाएं हुई हैं उनमें ज्यादातर उन्हीं रचनाओं का हवाला दिया जाता है और मूल्यांकन किया जाता है जो पाठ्यपुस्तकों में हैं अथवा जिन पर प्रगतिशील आलोचकों ने कहीं पर कुछ बोल या लिख दिया है। इसके कारण अज्ञेय के समग्र लेखन को लेकर हिन्दी में कभी चर्चा ही नहीं हुई है। यहां तक कि किसी बड़े प्रगतिशील आलोचक ने उनके ऊपर कोई आलोचना किताब भी नहीं लिखी है। इससे हिन्दी आलोचना के उपेक्षापूर्ण रूख को आसानी से समझा जा सकता है।
    अज्ञेय आधुनिकतावादी विजन में गहरी आस्था रखते हैं और उसके आधार पर आधुनिकतावादी सौंदर्यात्मक अभिव्यक्ति का समूचा तंत्र निर्मित करते हैं। इससे उनके लेखन में आकर्षण पैदा हुआ वहीं दूसरी ओर हिन्दी साहित्य में प्रगतिशील सौंदर्य मानकों के समानान्तर आधुनिकतावादी सौंदर्य के हिन्दी काव्य मानकों का जन्म हुआ।
    वे अपनी कविताओं में जिस विषय को उठाते हैं उसमें प्रतीक को अंतर्वस्तु के साथ जोड़ते हैं। आधुनिक समाज के उन रूपों और प्रक्रियाओं को सबसे पहले देखते हैं जिनके साथ आधुनिकतावादी मानकों का गहरा संबंध है। वे मध्यवर्ग को आधुनिकतावादी सौंदर्य मानकों के सर्जक के रूप में चिह्नित करते हैं।
    मध्यवर्ग इस समाज का सबसे महत्वपूर्ण सर्जक वर्ग है और भविष्य का नायक भी है यह बात अज्ञेय ने प्रतिष्ठित की है। अज्ञेय के सृजन की पीड़ा और लक्ष्य को व्यक्त करने वाली पंक्तियां देखें,लिखा है, ‘‘ प्रेम को प्राप्त करना,जीवन के मिष्टानों को चखना और जीवन के मीठे आसव में मत्त रहना मेरे लिए नहीं है।मेरा काम केवल इतना ही है कि जो प्रेम औरों ने प्राप्त किया है,जिस आसव ने दूसरों को उन्मत्त किया है ,उसकी पवित्र मिठास को अपनी वाणी द्वारा संसार-भर में फैला दूँ- और जो दुःख और क्लेश मैंने देखे हैं,उन्हें अपने पास संचित कर लूँ -उस से एक विराट् समाधि बना लूँ जिस में मृत्यु के बाद मेरा शरीर दब जाय।’’
     आधुनिकतावाद की एक खूबी है वहां छद्म और फेक भाषा का व्यापक प्रयोग मिलता है। क्या अज्ञेय ने अपने साहित्य में फेक भाषा का प्रयोग किया है ? क्या वे ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं जो गलत समझी जाती हो,भ्रमित करती हो ?भ्रमित व्याख्या को जन्म देती हो ? आधुनिकतावादी नहीं जानते कि भाषा का साहस के साथ कैसे इस्तेमाल करें। लेकिन अज्ञेय के साथ यह संकट नहीं है। वे भाषा का साहसिक प्रयोग करते हैं साथ ही भाषा की काव्यात्मकता और संप्रेषणीयता के बीच संतुलन बनाए रखते हैं। वे हिन्दी में नए विषयों और पात्रों को लेकर आए। साहित्य को भारत विभाजन की अभिव्यक्ति का आधार बनाया,आपातकाल के प्रतिवाद का औजार बनाया और यह काम उन्हें आधुनिकतावादी से जनवादी बनाता है। 





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         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...