जेएनयू आंदोलन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जेएनयू आंदोलन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 17 सितंबर 2016

जेएनयू और हम


        मैं१९८०-८१ में जेएनयू छात्रसंघ के चुनाव में कौंसलर पद पर एक वोट से जीता था। वी. भास्कर अध्यक्ष चुने गए।उस समय जेएनयू के बाइस चांसलर वाय. नायडुम्मा साहब थे, वे श्रीमती गांधी के भरोसे के व्यक्ति थे विश्वविख्यात चमड़ा विशेषज्ञ थे। स्वभाव से बहुत ही शानदार, उदार और वैज्ञानिक मिज़ाज के थे। बीएचयू से पढ़े थे।भास्कर के साथ पूरी यूनियन उनसे मिलने गयी, सबने उनको अपना परिचय अंग्रेज़ी में दिया मैंने हिन्दी में दिया , क्योंकि मैं अंग्रेज़ी में परिचय देना नहीं जानता था।
नायडुम्मा साहब अंग्रेज़ी में परिचय सुनते हुए एकाग्र हो चुके थे मैंने ज्योंही हिन्दी में परिचय दिया सारा माहौल बदल गया, वे तुरंत टूटी फूटी हिन्दी में शुरू हो गए और बोले आज मैं कई दशक बाद हिन्दी बोल रहा हूँ। तुमने मेरी बीएचयू की यादें ताज़ा कर दीं। इसके बाद मैं उनसे भास्कर के साथ विभिन्न समस्याओं को लेकर अनेकबार मिला वे भास्कर को बीच में टोकते और कहते जगदीश्वर को बोलने दो, मुझे हिन्दी सुनना अच्छा लगता है कहते इसके बहाने मैं काशी में लौट जाता हूं। वे जानते थे मैं सम्पूर्णानंद वि वि से सिद्धांतज्यौतिषाचार्य कर चुका हूं, मेरा बनारस से संबंध है। कहते जेएनयू में तुम मेरे हिन्दी और बनारस के सेतु हो।
मैं बहुत पान खाता था,नायडुम्मा को मेरा पान खाना बहुत पसंद था। जेएनयू में नामवरजी के बाद वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मुझसे पान खाने के लिए माँगा।नायडुम्मा साहब ने कहा जिस दिन अगलीबार आओ तो बिना समस्या के आना, पान लेकर आना बैठकर बातें करेंगे।
मैं एकदिन पान लेकर उनके पास गया और जमकर बातें कीं।अंत में बोले कोई काम हो तो बोलो,मैंने कहा जेएनयू में बडे पैमाने पर जाली इनकम सर्टिफ़िकेट दाख़िले के समय जमा हो रहे हैं आप दुस्साहस करके छात्रों के कमरों में छापे डलवा दें और रेण्डम तरीक़े से इंकम सर्टिफ़िकेट की जाँच करवा दे । वे बोले यूनियन के लोगों के यहाँ भी छापे पड़ेंगे।तुम वायदा करो बाहर कहोगे नहीं , आय सर्टिफ़िकेट भीजांच के लिए भेजे जाएँगे । परिणाम झेलोगे , मैंने कहा हम तैयार हैं। छात्रों के कमरों की तलाशी हुई बडे पैमाने पर कई छात्रों के कमरों से नक़ली मोहरें बरामद हुईं और बड़े पैमाने पर जेएनयू की लाइब्रेरी से चुरायी गयी किताबें बरामद हुईं। आय प्रमाणपत्रों की जाँच के बाद कई सौ छात्रों के सर्टिफ़िकेट जाली पाए गए उनको विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया।हमने वि वि का इस मामले में साथ दिया।

जेएनयू में मेरा पहला मुकाबला नामवरजी से हुआ और यह बेहद मजेदार,शिक्षित करने वाला था।जेएनयू में 1979 में संस्कृत पाठशाला की अकादमिक पृष्ठभूमि से आने वाला मैं पहला छात्र था।मेरे शास्त्री यानी स्नातक में मात्र50फीसदी अंक थे।संभवतःइतने कम अंक पर किसी का वहां दाखिला नहीं हुआ था,मैंने प्रवेश परीक्षा और इंटरव्यू बहुत अच्छा दिया और मुझे दाखिला मिल गया।

कक्षाएं शुरू होने के 10दिन बाद पहला टेस्ट घोषित हो गया,उसके लिए गुरूवर नामवरजी ने दो विषय दिए,पहला,जॉन क्रौरैंसम का न्यू क्रिटिसिज्म ,दूसरा संस्कृत काव्यशास्त्र में रूपवाद।संभवतःपहलीबार मेरे लिए नामवरजी ने संस्कृत काव्यशास्त्र पढाया।खैर ,मैंने परीक्षा दी और अपने लिए न्यू क्रिटिसिज्म को चुना।उत्तर सही दिया।लेकिन गुरूदेव का दिल नहीं जीत पाया।उन्होंने मुझे बी-प्लस ग्रेड दिया।मैं खैर खुश था ,चलो फेल तो नहीं हुआ।कक्षा में उत्तरपुस्तिका दी गयी,सभी छात्र अपनी पुस्तिका पर नामवरजी के कमेंटस पढ़ रहे थे।मेरी उत्तर पुस्तिका पर लालपैन से सही का निशान था और नामवरजी का कोई कमेंटस नहीं था,सिर्फ बी प्लस ग्रेड लिखा था।

बातचीत में नामवरजी प्रत्येक छात्र को एक-एक करके बता रहे थे कि उसके लेखन में क्या कमी है,ऐसे नहीं वैसे लिखो,दिलचस्प बात यह थी कि जिस छात्र को ए प्लस दिया था उसकी उत्तर पुस्तिका में काफी कांट-छांट किया था नामवरजी ने।मेरा नम्बर आया तो मैंने व्यंग्य में कहा,सर,आपने इतने ज्यादा अंक दिए हैं ! इतने नम्बर तो कभी नहीं मिले ! वे तुरंत बोले मैं आपसे नाराज हूँ,मैंने पूछा क्यों,बोले आपने संस्कृत काव्यशास्त्र में रूपवाद वाले सवाल पर क्यों नहीं लिखा, ,मैंने संस्कृत काव्यशास्त्र आपके लिए खासतौर पर तैयार करके पढ़ाया था,मैंने कहा सर,मैं संस्कृत पढ़ते हुए बोर गया था इसलिए न्यू क्रिटिसिज्म पर लिखा ,बोले ,मैं परेशान हूँ कि आप अंग्रेजी नहीं जानते न्यू क्रिटिसिज्म पर कैसे लिख सकते हैं ! मैंने झूठ कहा कि सर आपके क्लास नोटस से तैयार करके परीक्षा दी है,वे बोले नहीं,मैंने तोड़ती पत्थर कविता का उदाहरण कक्षा में नहीं बताया,लेकिन आपने लिखा है।मैंने पूछा ,सर,यह बताइए जो लिखा है वह सही है या गलत लिखा है,वे बोले सही लिखा है,मैंने फिर पूछा जो उदाहरण दिया है वह सही है या गलत,बोले सही है,मैंने पूछा कि फिर समस्या कहां पर है ,वे बोले न्यू क्रिटिसिज्म किताब पढ़ कैसे सकते हो,मैंने बताया ,उस किताब को पढ़कर सुनाया मित्र असद जैदी और कुलदीपकुमार ने,वह किताब कुलदीप के पास थी,इन दोनों ने टेस्ट के पहली वाली रात को सारी रात जगकर न्यू क्रिटिसिज्म को मुझे सुनाया और मैंने सुबह जाकर परीक्षा दे दी।इसके बाद गुरूदेव चुप थे।मैंने कहा सर,मैंने कहा था अंग्रेजी समस्या नहीं है,समझ में नहीं आएगा तो मित्रों से समझ लेंगे।इस तरह मेरे लिए अंग्रेजी मित्रभाषा आज भी बनी हुई है।

मैंने अपने छात्र जीवन में अंग्रेजी न जानते हुए इराकी, ईरानी, फ्रेंच, फिलिस्तीनी, अफ्रीकी,मणिपुरी,नागा आदि जातियों के छात्रों के साथ गहरी मित्रता की और उनका दिल जीता।

मेरा जेएनयू में पहला रूममेट एक दक्षिण अफ्रीकी छात्र था,मैं और वो एक ही साथ सोशल साइंस बिल्डिंग ( आज की पुराने सोशल साइंस इमारत) में जो कि 1979 में बनकर तैयार हुई थी,उसमें एक साथ रहे।उसके बाद दूसरे सेमिस्टर में सतलज होस्टल में मेरा रूममेट एक नागा लड़का था। यानी एमए का पहला वर्ष इन दोनों के साथ गुजरा। दोनों हिन्दी नहीं जानते थे,अंग्रेजी भी बहुत कम जानते थे।अफ्रीकी छात्र कालांतर में नेल्सन मंडेला के मंत्रीमंडल में मंत्री बना,नागा लडका बड़ा नागानेता बना।इनके अलावा जो फिलिस्तीनी लड़का सबसे अच्छा मित्र था वह लंबे समय तक फिलीस्तीनी नेता यासिर अराफात का निजी सचिव था। इन सबके साथ रहते हुए भाषा कभी समस्या के रूप में महसूस नहीं हुई।

मैं जब जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष पद के लिए 1984 में चुनाव लड़ रहा था,तो उस समय कुछ तेलुगूभाषी छात्रों ने कहा कि वे मुझे वोट नहीं देंगे।हमारे पूर्वांचल में रहने वाले मित्रों ने संदेश दिया कि 20-25 तेलुगूभाषी छात्र हैं जो मेरे हिन्दी में बोलने के कारण नाराज हैं और वोट नहीं देंगे।मैंने कहा कि मेरी उनसे मीटिंग तय करो,मैं बैठकर सुनता हूँ,फिर देखते हैं,उनका मन बदलता है या नहीं।मेरी उन सभी तेलुगूभाषी छात्रो के साथ मीटिंग तय हुई,एक कमरे में हम बैठे,मेरी मदद के लिए तेलुगूभाषी कॉमरे़ड थे जिससे भाषा संकट न हो लेकिन तेलुगूभाषी छात्रों ने कहा कि वे मुझसे अलग से और बिना किसी भाषायी मददगार के बात करेंगे,उन्होंने सभी तेलुगू भाषी कॉमरेडों को कमरे के बाहर ही रोक दिया।अंदर कमरे में तेलुगूभाषी थे और मैं अकेला।मेरी मुश्किल यह थी कि मैं हिन्दी के अलावा कोई भाषा नहीं जानता था,वे लोग हिन्दी एकदम नहीं जानते थे।बातचीत शुरू हुई मैंने टूटू फूटी अंग्रेजी में शुरूआत की,गलत-सलत भाषा बोल रहा था,वे लगातार सवाल पर सवाल दागे जा रहे थे और मैं धारावाहिक ढ़ंग से हर सवाल का अंग्रेजी में जवाब दे रहा था,मेरी अंग्रेजी बेइंतिहा खराब,एकदम अशुद्ध लेकिन संवाद अंग्रेजी में जारी था।तकरीबन एक घंटा मैंने उनसे अंग्रेजी में अपनी बात कही और उनसे अनुरोध किया कि आप लोग एसएफआई को पैनल वोट दें,मुझे वोट जरूर दें।कमरे के बाहर तमाम कॉमरेड खडे थे और परेशान थे कि मैं अंग्रेजी नहीं जानता फलतःराजनीतिक क्षति करके ही लौटूँगा।मैं बातचीत खत्म करके बाहर हँसते हुए आया तेलुगूभाषी छात्र भी हँसते हुए बाहर निकले,बाहर खड़े तेलुगूभाषी कॉमरेडों ने उन छात्रोंसे पूछा अब बताओ किसेे वोट दोगे, वे बोले रात को मेरा भाषण सुनने के बाद बताएंगे,उनलोगों से दूसरे दिन सुबह पूछा गया कि अब बताओ जगदीश्वर को वोट दोगे या नहीं,सभी तेलुगूभाषी लड़कों ने कहा हम उसे जरूर वोट देंगे।तेलुगूभाषी कॉमरेड ने कहा आश्चर्य है मैंने समझाया तो वोट देने को राजी नहीं हुए और जगदीश्वर से बात करने के बाद उसे वोट देने को राजी कैसे हो गए ,इस पर एक छात्र ने कहा कि उसकी सम्प्रेषण शैली और दिल जीतने की कला ने हम सबको प्रभावित किया ।उससे बात करने के बाद पता चला कि भाषा भेद की नहीं जोड़ने की कला है।

JNU में कईबार वाम हारा है,लेकिन उसने हार को सम्मान और सभ्यता के साथ स्वीकार किया है,हार के कारणों की खोज करके अपने को दुरूस्त किया है।इसबार जो लोग हारे हैं वे वाम से सीखें कि कैसे हार को स्वीकार करके छात्रों के लिए एकताबद्ध होकर काम किया जाय।

हमने पहले भी कहा है जेएनयू में सब वाम नहीं है। अधिकांश छात्र वाम को नहीं मानते। इसबार का चुनाव और उसके परिणाम देख लें,आज भी बहुसंख्यक छात्र ऐसे हैं जो वाम की विचारधारा को नहीं मानते।इसके बावजूद लोकतंत्र में चुनाव के जरिए वाम चुनाव जीतकर आता है तो यही कहेंगे वाम में कुछ तो है जो बार बार उसको जेएनयू के छात्र अपने छात्रसंघ का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी देते हैं।

वाम यहां नोट,सरकार ,जाति और लट्ठ के बल पर चुनाव नहीं लड़ता,बल्कि विचारधारा और संघर्ष के इतिहास के आधार पर चुनाव लड़ता रहा है।

जेएनयू कैंपस में लोकतांत्रिक राजनीतिक परिवेश बनाए रखने में वाम की केन्द्रीय भूमिका रही है।विश्व में कहीं पर भी यह परिवेश उपलब्ध नहीं है।यह परिवेश एक दिन में नहीं बना बल्कि इसे बनाने में सभी छात्रों की अग्रणी भूमिका रही है।सभी छात्रों को इस परिवेश के लिए संगठित करने का काम वाम ने किया है,यही वजह है कि अधिकांश समय वाम के पास ही नेतृत्व रहा है।जेएनयू के परिवेश का वाम से बेहतर संरक्षक कोई और नहीं हो सकता,यही इसबार के चुनाव का संदेश है।

जेएनयू में वाम एकता मंच की 2016 में जिस तरह जीत हुई है उसे अनेक लोग हजम नहीं कर पा रहे हैं।हम फिर दोहरा रहे हैं कि जेएनयू के छात्रों की दैनंदिन राजनीति में ,दैनंदिन समस्याओं पर हुए संघर्ष में जो संगठन खरे उतरते हैं आमतौर पर जेएनयू के छात्र उनको ही चुनते हैं।

वे सवर्ण-असवर्ण देखकर वोट नहीं देते।यदि किसी संगठन की विचारधारा दलितों-मुसलमानों के पक्ष में है तो इस आधार पर जेएनयू के छात्र वोट नहीं देते,वे वोट छात्रों के लिए घोषित कार्यक्रम और उसके दैनंदिन जीवन में अमल के आधार पर तय करते हैं।

सतह पर देखेंगे तो कागज में सभी संगठन एक जैसी विचारधारात्मक बातें कहते हैं।मसलन्,आम्बेडकर-फुले को लेकर भाजपा -आरएसएस आज जितना कागज पर सक्रिय है ,मीडिया में सक्रिय है उससे उसकी दलित पक्षधरता तय नहीं होती।दलित पक्षधरता तय होगी तब जब वास्तव में दलितों का मुद्दा सामने आए और वह जमकर संघर्ष करे।

वाम ने हमेशा दलितों के हितों की रक्षा के सवाल को जेएनयू में उठाया है,उसके लिए लड़ाई लड़ी है।दलितों के हितों की हर स्तर पर रक्षा की है।यदि उनसे कभी चूक हुई है तो छात्रों ने सबक भी सिखाया है।

जेएनयू के प्रसंग में दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि जेएनयू में भी जातिवाद की समस्या है,जेएनयू के शिक्षकों से लेकर छात्रों तक एक वर्ग में जातिवाद का असर है,यह असर पहले भी था,मैं जब पढ़ता था उस समय भी था,आज भी है।

जब दलितों के हितों के खिलाफ प्रशासन ने कभी कोई कदम उठाया ,छात्रसंघ ने हमेशा उसका पुरजोर विरोध किया।यदि लीडरशिप से कभी चूक हुई तो छात्रों की सेंटर से लेकर स्कूल और फिर विश्वविद्यालय स्तर की आम सभा ने प्रस्ताव पास करके संघर्ष की रूपरेखा तैयार करके दी और छात्रसंघ ने लड़ाई लड़ी।

यह सच है जेएनयू में पहले भी अनेक शिक्षक ऐसे रहे हैं जो भूमिहार या ब्राह्मण जाति के छात्रों को प्राथमिकता से दाखिले से लेकर नम्बर तक देते थे,फैलोशिप भी देते थे।लेकिन छात्रसंघ ने हमेशा इस तरह के फैसलों के खिलाफ एकजुट संघर्ष करके इस तरह के शिक्षकों और उनके फैसलों को बेनकाब किया।इसलिए यह कहना कि वाम सवर्णवादी है,एकसिरे से गलत है।छात्र सिर्फ छात्र रहें,वे छात्रचेतना से लैस हों,प्रगतिशील विचारधाराओं के करीब रहें,यही वामदलों का प्रयास रहा है।

जेएनयू को जो संगठन हिन्दुत्व और इसी तरह की बेगानी विचारधाराओं में डुबोना चाहते थे उनको निराशा हाथ लगी है। जेएनयू का स्वाभाविक भावबोध वामपंथी है। वाम के अलावा यहाँ बाक़ी विचारधाराएँ फ़ैशन की तरह हैं ।

वाम की जेएनयू में जन्म से लेकर आज तक निरंतरता रही है। बाक़ी विचारधाराएँ फ़ैशन की तरह आती जाती रहती हैं।यहाँ जातिवाद टूटा है,धर्म भी टूटा है। धर्मनिरपेक्षता के अनेक रंगों का यहाँ प्रचार होता रहा है।

जेएनयू में जाति महत्वपूर्ण नहीं है, वर्ग भी महत्वपूर्ण नहीं है। छात्र अस्मिता महत्वपूर्ण है। एलीट और एलीट विरोधी, आईएएस और क्रांतिकारी आदि सबने यहाँ लोकतंत्र का पाठ पढ़ा है।लोकतंत्र का पाठ जातिचेतना या वर्गचेतना से निर्मित नहीं होता। छात्रों के प्रति प्रेम से पैदा होता है।

छात्रप्रेम के लिए आम्बेडकर- ज्योतिबा फुले -मार्क्स की नहीं छात्रों को समझने , उनकी समस्याएँ समझने और उनके लिए एकजुट संघर्ष की भावना से पैदा होती हैं।

जेएनयू में छात्रसंघ महत्वपूर्ण है। यह सभी छात्रों के हितों का यह साझा मंच है। छात्रसंघ में चुने जाने का मतलब है सबका छात्र प्रतिनिधि।पार्टीजान ढंग से छात्रसंघ काम नहीं करता। यही वह चीज़ है जिसने कैम्पस में छात्रजीवन, छात्र और साझा मंच की धारणा को जन्म दिया है। समूची प्रक्रिया इतना व्यापक रसायन बनाती है कि मार्क्स-माओ-आम्बेडकर आदि की विचारधाराएँ इस प्रक्रिया के संगम में विलीन हो जाती हैं। यही वजह है कि जेएनयू में लोकतांत्रिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। विचारधारा, जाति, वर्ग,धर्म आदि गौण बन जाते हैं।

जेएनयू में नए संगठन आते रहे हैं, चुनाव में भी भाग लेते हैं। इनमें विभिन्न रंगत के संगठन रहे हैं , जेएनयू में ऐसे उम्मीदवार भी रहे हैं जिनका कोई संगठन नहीं था लेकिन बडी संख्या में छात्र सुनने जाते थे। इस तरह के संगठन आज भी हैं जिनमें गंभीर विचारधारात्मक अंतर हैं, यही चीज़ जेएनयू को जेएनयू बनाती है। यह जेएनयू और वाम के मिश्रित सम्मिश्रण से बनी ज़मीन है जिस पर जेएनयू में हज़ार विचारधाराओं को खिलने दो के आधार पर विशाल जेएनयू खड़ा है। जेएनयू में विचारधारा नहीं छात्र एकता महत्वपूर्ण है। वही विचारधारा वहाँ बची रही है जो छात्रों में जेएनयू स्प्रिट बनाए रखने में मदद करे।

कैम्पसबोध - लोकतांत्रिकबोध इसकी धुरी है। जो लोग नायकों के झुनझुना लिए घूम रहे हैं वे जान लें कि छात्रएकता के सामने सभी नायक नतमस्तक हैं।



जेएनयू में नायक नहीं, विचारधारा नहीं ,छात्रों की व्यापक एकता महत्वपूर्णहै। इस एकता के सामने मार्क्स-एंगेल्स-माओ -ट्रास्टस्की--आम्बेडकर -जयप्रकाश नारायण -लोहिया आदि की विचारधाराओं को नतमस्तक होते देखा है, हर बार नई विचारधारा के संगठनों को यह कैम्पस देख चुका है।इसीलिए तो यह जेएनयू है।

बुधवार, 7 सितंबर 2016

जेएनयू में आइसा-एसएफआई जिताओ

       मैं नहीं जानता कि इस समय जेएनयू छात्रसंघ के चुनाव में किन मुद्दों पर बहस हो रही है।लेकिन एक बात तय है कि जेएनयू के छात्र आंदोलन के सामने गंभीर संकट है।यह संकट ´वैचारिक´ज्यादा है। फरवरी जेएनयू आंदोलन के बाद जो व्यापक छात्र एकता लोकतांत्रिक सवालों और लोकतांत्रिक हकों पर निर्मित हुई है,वह इसबार के चुनाव में अपनी पहली बड़ी परीक्षा से गुजरेगी।सुखद बात यह है कि ´देशद्रोह´के मसले पर हाल ही में सुप्रीमकोर्ट ने जो फैसला दिया है उससे जेएनयू छात्र आंदोलन को बहुत बड़ी मदद मिलेगी।हमने फेसबुक पर पहले देशद्रोह के प्रसंग में जो कुछ लिखा था सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उसको अपने नए आदेश से पुष्ट किया है।किसी भी किस्म की नारेबाजी,सरकार के खिलाफ आलोचना आदि देशद्रोह नहीं है।देशद्रोह तब बनता है जब हिंसा की जाय या फिर हिंसा के लिए उकसाया जाय।महज भाषण या लेखन को हिंसा नहीं कहते,देशद्रोह नहीं कहते।

जेएनयू छात्र आंदोलन की दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि है जेएनयू प्रशासन के द्वारा जिन छात्रनेताओं और छात्रों के खिलाफ फरवरी आंदोलन के संदर्भ में अनुशासनात्मक कार्रवाई की थी उसको लागू करने पर अदालत ने रोक लगा दी है।जबकि इस अनुशासनात्मक कार्रवाई के जरिए वि वि प्रशासन अपने एक्शन को वैध ठहराने की कोशिश कर रहा था।ये दो बड़ी कानूनी जीत हासिल करके जेएनयू का छात्र आंदोलन फिर से नई परीक्षा के लिए तैयार खड़ा है।

इस समय जमीनी हकीकत क्या है मैं नहीं जानता लेकिन इतना कहना चाहूंगा कि एसएफआई-आईइसा के संयुक्त मोर्चे के प्रत्याशियों को हर हालत में जिताना चाहिए।यह वह मोर्चा है जिसने सभी छात्रों को एकजुट रखकर जेएनयू प्रशासन और मोदी सरकार की छात्र विरोधी,लोकतंत्र विरोधी नीतियों का जमकर विरोध किया और उपरोक्त दो बहुत बड़ी कानूनी जीत चुनाव के पहले हासिल करके छात्र आंदोलन के इतिहास में नया कीर्तिमान स्थापित किया है।

केन्द्र सरकार के दमन के खिलाफ जेएनयूछात्रसंघ की उपरोक्त दो कानूनी विजय असाधारण हैं,इस जीत की हर हालत में रक्षा की जानी चाहिए।जेएनयू प्रशासन पूरी शक्ति लगाकर छात्रों को बांटने की कोशिश करेगा।तरह-तरह के नए प्रपंच खड़े किए जाएंगे।इन सबसे बचने की जरूरत है। एक मजबूत वामपंथी छात्र राजनीति ही जेएनयू में छात्रों के व्यापक हितों की रक्षा कर सकती है।मौजूदा आइसा-एसएफआई मोर्चे ने विगत फरवरी आंदोलन के दौरान जिस परिपक्वता,कौशल और राजनीतिक सूझबूझ का परिचय देकर मोदी सरकार और उसके गुर्गों को राजनीतिक तौर पर परास्त किया है वह हम सबके लिए गौरव की बात है।जेएनयू के छात्रों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे आइसा-एसएफआई मोर्चे बड़ी संख्या में वोट देकर दिताएं।क्योंकि ये लोग आपके संघर्ष के साथी है,संघर्ष के नायक हैं।



जेएनयूएसयू के मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व की जीत को किसी भी तरह के द्ग्भ्रमित नारों और राजनीतिक मंचों के कारण कम नहीं किया जाना चाहिए।जेएनयू को वाम चाहिए।वाम छात्र राजनीति फौलादी एकता से बनी है और विभिन्न संघर्षों में उसकी परीक्षा हुई है और हर परीक्षा में वह खरी उतरी है। हमें उम्मीद है कि इसबार के छात्रसंघ के चुनाव में आईएसा-एसएफआई मोर्चे को भारी बहुमत से छात्र समुदाय जीत दिलाएगा।

सोमवार, 9 मई 2016

जेएनयू के छात्र आंदोलन के समर्थन में राष्ट्रपति के नाम अपील

Text of the appeal authored by a former President of the JNUSU , Jagadishwar Chaturvedi , that was passed unopposed by the JNU oldies after more than 50-hours debate , discussions , deliberations , consent after dissent the world over in the larger interest of JNU and democracy in India . Dear Mr President Sir
We the Alumni of JNU, request you to kindly intervene in the ongoing student agitation on the campus and help restore normalcy.
The health of several office-bearers and other members of JNUSU, on an indefinite hunger strike under the banner of JNUSU over the last eight days, is causing serious concern.
The students have been demanding that the ‘disciplinary action’ suggested by the “High Level Enquiry Committee” set up by the University Administration be revoked forthwith.
At the very inception of the committee the students had raised several objections to the setting up of the committee and had said that it was totally unacceptable. It is worth noting that the JNUTA had also rejected the enquiry committee.
The administration rejected the objections and conducted a one sided probe. Police action was also been initiated against the students and the matter is sub-judice.
The action initiated against the students and office bearers of JNUSU is politically motivated. We therefore demand that the JNU administration immediately withdraw the proposed disciplinary action and restore normalcy on Campus
मान्यवर,
हम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र आपसे अनुरोध करते हैं कि विश्वविद्यालय प्रांगण में चल रहे छात्रों के आंदोलन में हस्तक्षेप करके कैंपस में शांति बहाल करने में मदद करें।उल्लेखनीय है कैंपस में छात्रसंघ के बैनरतले अनेक छात्र और छात्रसंघ पदाथिकारी विगत आठ दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हैं।इन सभी छात्रों की शारीरिक अवस्था चिंताजनक है।छात्रों की मांग है कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा गठित उच्चस्तरीय जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर की गयी अनुशासनात्मक कार्रवाई को तुरंत रद्द किया जाय।यह जांच कमेटी जब गठित की गयी थी तब ही छात्रों ने इसके निर्माण पर अनेक आपत्तियां प्रकट की थीं,इन आपत्तियों को प्रशासन ने एकसिरे से अस्वीकार किया और इकतरफा जांच कमेटी का गठन करके उस घटना की जांचकी।उल्लेखनीय है कि जेएनयू शिक्षक संघ ने भी जांच समिति को अस्वीकार किया था।वहीं दूसरी ओर छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई भी गयी।जिससे संबंधित मुकदमा अदालत में विचाराधीन है।हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं कि जिन छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गयी है वह राजनीति से प्रेरित है।अतःहम मांग करते हैं कि जेएनयू प्रशासन तुरंत छात्रों के खिलाफ की गयी अनुशासनात्मक कार्रवाई को वापस ले और कैंपस में शांति बहाल करे।( चन्द्रप्रकाश झा की वॉल से साभार

गुरुवार, 5 मई 2016

जेएनयूएसयू संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं



English version of APPEAL by JNU alumnus to Honourable President of India and JNU visitor- to save JNU and lives of fasting JNU students , including JNUSU President Kanhaiya Kumar - follows shortly.

Hindi version of the appeal prepared by former JNUSU President Jagadishwar Chaturvedi is given here afresh after deleting the earlier post to avoid any confusion .

Group members requested to endorse it at the earliest and not later than 4 pm ( IST) on Saturday , May 7 , 2016 when JNU alumnus in or around Delhi and even beyond are to assemble @ Freedom Square, JNU Admin block to express solidarity with the agitating students and persuade them to end their fast and deploy other tactics , including legal ones .


APPEAL IN HINDI

मान्यवर,
हम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र आपसे अनुरोध करते हैं कि विश्वविद्यालय प्रांगण में चल रहे छात्रों के आंदोलन में हस्तक्षेप करके कैंपस में शांति बहाल करने में मदद करें।उल्लेखनीय है कैंपस में छात्रसंघ के बैनरतले अनेक छात्र और छात्रसंघ पदाथिकारी विगत आठ दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हैं।इन सभी छात्रों की शारीरिक अवस्था चिंताजनक है।छात्रों की मांग है कि 9फरवरी2016 की घटना के संदर्भ में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा गठित उच्चस्तरीय जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर की गयी अनुशासनात्मक कार्रवाई को तुरंत रद्द किया जाय।यह जांच कमेटी जब गठित की गयी थी तब ही छात्रों ने इसके निर्माण पर अनेक आपत्तियां प्रकट की थीं,इन आपत्तियों को प्रशासन ने एकसिरे से अस्वीकार किया और इकतरफा जांच कमेटी का गठन करके उस घटना की जांचकी।उल्लेखनीय है कि जेएनयू शिक्षक संघ ने भी जांच समिति को अस्वीकार किया था।वहीं दूसरी ओर छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई भी गयी।जिससे संबंधित मुकदमा अदालत में विचाराधीन है।हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं कि 9फरवरी2016 की घटना में न तो हिस्सा लिया और न इसे आयोजित किया था।जेएनयूछात्रसंघ का इस घटना से कोई लेना-देना नहीं है। जिन छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गयी है वह राजनीति से प्रेरित है।अतःहम मांग करते हैं कि जेएनयू प्रशासन तुरंत छात्रों के खिलाफ की गयी अनुशासनात्मक कार्रवाई को वापस ले और कैंपस में शांति बहाल करे।( चन्द्रप्रकाश झा की वॉल से साभा

जेएनयू में आमरण अनशन खत्म करो

जेएनयू में चल रहे छात्र आंदोलन के समर्थन में आज पूर्व छात्रनेता और छात्र जेएनयू में एकत्रित हो रहे हैं। मैं अपनी निजी परेशानियों के कारण इस मौक़े पर शामिल नहीं हो पा रहा हूँ, लेकिन मेरा इस आंदोलन को पूरा समर्थन है।
जेएनयू में संघर्ष और क़ुर्बानियों की शानदार परंपरा रही है, मौजूदा छात्रसंघ नेतृत्व ने इस परंपरा को बरक़रार रखा है। यह हम सबके लिए गर्व की चीज़ है।
आज आठवें दिन जब भूख हड़ताल चल रही है तो कन्हैया और दूसरे छात्रों की हालत लगातार बिगड़ रही है।हम सबके लिए इन आंदोलनकारी छात्रों की ज़िंदगी बेहद महत्वपूर्ण है, हमारे लिए जेएनयू की संघर्षशील परंपरा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। हमें यह चीज़ समझनी चाहिए कि यह मसला जल्द हल होने वाला नहीं है,इसलिए छात्रों की ज़िंदगी, स्वास्थ्य, कैरियर और संघर्ष में संतुलन बनाते हुए संघर्ष के रूपों का चयन करना होगा।इसके लिए ज़रूरी है कि हम दीर्घकालीन संघर्ष की रणनीति बनाएँ। इसके पहले कदम के तौर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल को तुरंत ख़त्म किया जाए और संघर्ष के नए विकल्पों का इस्तेमाल करेँ।भूख हड़ताल को ख़त्म करने का मतलब संघर्ष से भागना नहीं है।हमने पहले भी भूख हड़तालें की हैं और उनको बीच में छोड़ा भी है। हमारे लिए छात्रों का न्यूनतम नुक़सान करके संघर्ष जारी रखना महत्वपूर्ण है। हम चाहते हैं कि यह भूख हड़ताल तुरंत ख़त्म की जाए और भूख हड़तालियों को तुरंत मेडीकल मदद प्रदान की जाए। हमें भूख हड़ताल को संघर्ष का अंतिम अस्त्र मानने की मनोदशा से बाहर निकलना होगा।

रविवार, 1 मई 2016

ऐसे किया श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ प्रतिवाद

         मैं अपने जीवन में सुहेल हाशमी को कभी नहीं भूल सकता।उनके कारण मुझे जमकर लाठियां खानी पड़ीं,नई कमीज फट गयी।वाकया है जेएनयू में श्रीमती इंदिरा गांधी के आने का ,संभवतः1981-82 का सत्र था।छात्रसंघ ने फैसला लिय़ा था कि इंदिरा गांधी के कैंपस प्रवेश का विरोध किया जाए।जेएनयू के पुराने कैंपस में अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान के सामने मैदान में पंडाल बनाकर श्रीमती गांधी के लिए मंच सजाया गया था। कैंपस के मुख्य गेट पर तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष अमरजीत सिंह सिरोही,महामंत्री अजय पटनायक,(सम्प्रति, जेएनयू शिक्षकसंघ के अध्यक्ष) नेतृत्व दे रहे थे।छात्रसंघ के ऑफिस के सामने तकरीबन 2000छात्र-कर्मचारी, मैं,सुहेल हाशमी,उपाध्यक्ष आर.वेणु आदि थे।हमलोगों के साथ इतिहासकार हरबंस मुखिया भी थे।इंदिरा गांधी के मुख्य गेट से प्रवेश करते ही सिरोही ने हाईजंप लिया और कमांडो घेरा तोड़ते हुए सीधे इंदिरा गांधी की कार के ऊपर जाकर गिरे,इसके बाद मुख्यगेट पर जमकर लाठी चार्ज शुरू हो गया।छात्रसंघ के सामने हम लोग नारे लगा रहे थे,पुलिस हमें ठेल रही थी,अचानक सुहेल ने मुझे उत्साहित किया औरमैंने पुलिस के घेरे को तोड़ा और इसके बाद जमकर लाठी चार्ज हुआ,सैंकड़ों लोग घायल हुए,पुलिस मुझे बेरहमी से मारते हुए ले गयी,उस समय छात्रों-कर्मचारियों का हजारों कंठो से प्रतिवाद सुनकर सारा कैंपस गूँज उठा इंदिरा गांधी वापस जाओ । उस लाठी चार्ज में सैंकड़ों छात्र घायल हुए लेकिन छात्रों ने वि वि की संपत्ति पर हमला नहीं किया,गुस्सा था और नारेथे।सारा आंदोलन अहिंसक था।दूसरे दिन के अखबारों में आंदोलन की खबर सुर्खियों में थी,इंदिरा गांधी का भाषण कहीं नहीं था।छात्रों ने बड़े कौशल के साथ इंदिरा गांधी के भाषण के दौरान पंडाल के अंदर लगातार उठकर पूरे भाषणभर प्रतिवाद किया और प्रतिवाद करने वाले छात्रों को पुलिस उठाती रही।पंडाल में अंदर गांधी बोल रही थीं,बाहर हजारों छात्र इंदिरा गांधी मुर्दाबाद,इंदिरा गांधी वापस जाओ,के नारे लगा रहे थे,डीडी टीवी चैनल ने पूरा भाषण रिकॉर्ड किया और उसका जो अंश टीवी पर दिखाया उसमें भाषण के समानांतर नारे जमकर गूंज रहे थे। इस बीच में एक घटना और घटी पुलिस वाले मुझे मारते -मारते वीसी ऑफिस के नीचे गाडियों के गैराज में ले गए ,वहां खड़ा करके चले गए,मैं कुछ देर बाद मौका निकालकर वहां से निकलकर फिरसे भीड़ में आ गया।इंदिरा गांधी के कैंपस से जाने के बाद हमलोग तत्कालीन वीसी नायडुम्मा से मिलने गए उनको मांगपत्र दिया,सवाल किया कि पुलिस को कैंपस में क्या उन्होंने बुलाया था तो उन्होंने कहा नहीं,हमने कहा पुलिस लाठीचार्ज के लिए माफी मांगो,उन्होंने वाकायदा माफी मांगी,प्रेस रिलीज जारी करके पुलिस लाठीचार्ज की निंदा की। पुलिस को फोन करके कहा कि गिरफ्तार छात्रों को तुरंत रिहा करो।इस तरह हम लोगों ने शांतिपूर्ण-अहिंसक प्रतिवाद का एक अध्याय पूरा किया।

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू- 1-

      छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू। छात्र अस्मिता की राजनीति का आरंभ सन् 65-66 में बीएचयू में समाजवादियों ने किया और जेएनयू ने उसे सन् 1972-73के बाद से नई बुलंदियों तक पहुँचाया। देश में छात्र अस्मिता और छात्र राजनीति को लोकतांत्रिक बोध देने में एसएफआई की बड़ी भूमिका रही है, खासकर जेएनयू में। जेएनयू लोकतांत्रिक छात्र राजनीति की प्रयोगशाला है। इस प्रयोगशाला के निर्माण में मार्क्सवादियों, समाजवादियों और फ्री थिंकरों की केन्द्रीय भूमिका रही है।
आमतौर पर शिक्षा का देश में जो वातावरण है वह छात्रों को सामाजिक जड़ताओं और रूढियों से मुक्त नहीं करता। इसके विपरीत जेएनयू के संस्थापकों का सपना था शिक्षा को रूढियों और सभी किस्म की वर्जनाओं से मुक्ति का अस्त्र बनाया जाए। शिक्षा केन्द्र वर्जनाओं से मुक्ति के तीर्थ बनें। जेएनयू के वातावरण में सभी किस्म की वर्जनाओं से मुक्ति का संदेश छिपा है। जेएनयू में पढ़ने वाला छात्र सामान्य प्रयत्न से सामाजिक रूढियों और वर्जनाओं से मुक्त होता है । जेएनयू की संरचना में वर्जना और अछूतभाव के लिए जगह नहीं है।
भारतीय समाज की सबसे बड़ी बाधा है वर्जनाएं ,अछूतभाव और भेदभाव की सभ्यता। जेएनयू का इसी सभ्यता के साथ विचारधारात्मक संघर्ष है। जेएनयू का वातावरण निषेधों और वर्जनाओं के वातावरण का विकल्प देता और इस विकल्प को तैयार करने में जेएनयू के छात्रों और छात्र राजनीति की केन्द्रीय भूमिका रही है। यह वातावरण किसी एक नेता, प्रशासक, संगठन आदि की देन नहीं है बल्कि सामुदायिक प्रयासों की देन है। सामुदायिक प्रयासों ने जाने-अनजाने जेएनयू की धुरी बायनरी अपोजीशन को बना दिया। यहां पर छोटा बड़ा और बड़ा छोटा बन जाता है। भेदों की अनुभूति गायब है।
भारतीय समाज में तरह-तरह के भेद हैं किंतु जेएनयू में अभेद का वैभव है। जेएनयू भेदों को समझता है किंतु मानता नहीं है। बाकी विश्वविद्यालय भेदों को समझने के साथ भेदों में जीते हैं। शिक्षा के लिए भेद और वर्जनाएं सबसे बुरी चीजें हैं। इन्हीं दोनों चीजों को जेएनयू ने निशाना बनाया है। जेएनयू वास्तव अर्थों में संस्थान है यहां प्रत्येक स्तर पर सभी वर्ग शिरकत करते हैं। खासकर छात्रों की शिरकत अभूतपूर्व है। देश के किसी भी विश्वविद्यालय में प्रत्येक स्तर पर छात्रों की शिरकत, सम्मान और साख वैसी नहीं है जैसी जेएनयू में है। फैसलेकुन कमेटियों में सभी स्तरों पर छात्रों की शिरकत और छात्रों की राय का सम्मान जेएनयू की सबसे बड़ी पूंजी है।
जेएनयू का कोई भी आख्यान छात्रों के बिना नहीं बनता। जेएनयू छात्रों की पहचान ज्ञान ,राजनीति और लोकतांत्रिक नजरिए से बनी है। लोकतंत्र की महानता का जैसा आख्यान जेएनयू ने तैयार किया है वैसा दुनिया के किसी भी देश में देखने को नहीं मिलता। जेएनयू के छात्रों के पास दुनिया को देखने का एक विशिष्ट नजरिया है,जीवनशैली और स्वायत्ताता बोध है। यही वजह है जेएनयू का छात्र भिन्न नजर आता है।
जेएनयू के वातावरण में व्यक्तित्व रूपान्तरण की अद्भुत शक्ति है। आप किसी भी पृष्ठभूमि के हों जेएनयू में दाखिला लेने के बाद बदले बिना नहीं रह सकते। व्यक्तित्व रूपान्तरण की इतनी जबर्दस्त स्वाभाविक शक्ति अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलती। आखिरकार परिवर्तन की यह शक्ति आती कहां से है ?
मैं अपने छोटे से तजुर्बे के आधार पर कह सकता हूँ कि जेएनयू की स्वाभाविक धारा में शामिल होने के बाद कोई भी छात्र और अध्यापक अपने को बदले बिना नहीं रह सकता। जो बदल नहीं पाते थे वे संग्रहालय की धरोहर नजर आते थे। बदलो या धरोहर बनो। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से जेएनयू का वातावरण किसी भी छात्र की जीवनशैली और नजरिए को प्रभावित करता है।
जेएनयू में सन् 1979 में जब प्रवेश परीक्षा देने आया तो सबसे पहले गंगा ढाबे पर अनिल चौधरी से परिचय हुआ। वह उस समय एसएफआई के और छात्र संघ के महासचिव थे। उनसे मिलने का प्रधान कारण था वह मथुरा के थे। मैं भी मथुरा का था। उन्होंने बड़े ही आत्मीयभाव से स्वागत किया और अनौपचारिक ढ़ंग से व्यवहार किया। अनिल के अंदाज में खासकिस्म का गर्वीला ठेठ देसी भाव था जो अपनी चाल-ढाल और बातचीत की भाषा में अभिजात्य भावबोध को चुनौती देता था। वह तीक्ष्णबुद्धि और तेजतर्रार छात्रनेता था। अनेक विलायत पलट नेता उसके नजरिए के सामने बौने नजर आते थे। समस्याओं को सुलझाने की उसकी अपनी देशी शैली थी और भाषण का स्थानीय मथुरिया अंदाज था।
मथुरिया अंदाज की विशेषता है बेबाकी मुखरता। अंग्रेजी भाषी अभिजात्य पृष्ठभूमि के लोग उसकी पारदर्शी बुद्धि की दाद देते थे। अनेक बार छात्र आन्दोलन के संकट के क्षणों में अनिल की मेधा बिजली की चमक की तरह दिखती थी, अनिल की हमदर्दी और संवेदनशीलता के सारे कॉमरेड कायल थे और अपने सुख-दुख का उसे साथी मानते थे।

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू -2-

       जेएनयू की 'स्प्रि ‍ट' का स्रोत हैं छात्र। छात्रों की एकता,सहनशीलता,मि‍तव्ययता, अनौपचारि‍कता, बौद्धि‍कता आदि‍ के सामने सभी नतमस्तंक होते हैं। जेएनयू की पहचान जी.पार्थसारथी, नायडूम्मा, मुनीस रजा,जीएस भल्ला या नामवर सिंह से नहीं बनती। जेएनयू की पहचान की धुरी है ''छात्र स्प्रिट'। यह 'छात्र स्प्रिट' सारी दुनि‍या में कहीं पर भी देखने को नहीं मि‍लेगी। जेएनयू की 'छात्र स्प्रिट' का आधार न वाम वि‍चारधारा है न दक्षि‍णपंथी वि‍चारधारा है। बल्कि लोकतांत्रि‍क अकादमि‍क वातावरण,वि‍चारधारात्मक वैवि‍ध्य, और लोकतांत्रि‍क छात्र राजनीति‍ इसकी आत्मा है। जेएनयू के वातावरण और 'छात्र स्प्रि ‍ट' को नि‍र्मि‍त करने में अनेक वि‍चारधाराओं की सक्रि‍य भूमि‍का रही है। जेएनयू का अकादमि‍क वातावरण वि‍चारधाराओं के संगम से बना है। जेएनयू में आपको एक नहीं अनेक वि‍चारधाराओं के अध्ययन-अध्यापन और सार्वजनि‍क वि‍मर्श का अवसर मि‍लता है । इस अर्थ में जेएनयू वि‍चारधाराओं का वि‍श्ववि‍द्यालय है। सि‍र्फ वाम वि‍चारधारा का वि‍श्ववि‍द्यालय नहीं है।फर्क इतना है कि‍ अन्यत्र वि‍श्ववि‍द्यालयों में वि‍चारधाराओं के अध्ययन -अध्यापन को लेकर इस तरह का खुलापन,सहि‍ष्णु और लोकतांत्रि‍क भाव नहीं है जि‍स तरह का यहां पर है।
जेएनयू की 'छात्र स्प्रिट' के अनेक नजारे हमारी आंखों से गुजरे हैं। आज भी इस 'छात्र स्प्रिट' को आप व्यंजि‍त होते देख सकते हैं। मुझे मई 1983 का ऐति‍हासि‍क क्षण याद आ रहा है। यह क्षण कई अर्थों में छात्र राजनीति‍ के सभी पुराने मानक तोड़ता है और नए मानकों को जन्मं देता है। यह वह ऐति‍हासि‍क क्षण है जि‍समें जेएनयू अपना समस्त पुराना कलेवर त्यागकर नया कलेवर धारण करता है। छात्रों में अभूतपूर्व एकता,अभूतपूर्व भूल और अभूतपूर्व क्षति‍ के दर्शन एक ही साथ हुए हैं। जेएनयू की अभूतपूर्व क्षति‍ के लि‍ए सि‍र्फ उस समय के छात्रसंघ के नेतृत्व को दोष देना सही नहीं होगा। मई 1983 की जेएनयू की तबाही के लि‍ए छात्र बहानाभर थे। असल खेल तो प्रशासकों ने खेला था। उस खेल में अधि‍कांश नामी गि‍रामी शि‍क्षकों ने प्रशासन का समर्थन कि‍या था। एकमात्र जीपी देशपाण्डे ,प्रभात पटनायक, सुदीप्ति‍‍ कवि‍राज, उत्सा पटनायक, पुष्पेंशपंत आदि ने खुलेआम छात्रों का पक्ष लि‍या था,प्रशासकों के खि‍लाफ आवाज उठायी थी। बाकी सब तो 'बदलो' ,' बदलो' कर रहे थे। मई 83 की घटना के साथ जेएनयू की समस्त पुरानी ऐति‍हासि‍क मान्याताएं, धारणाएं, वि‍श्वास, संस्कार,आदतें, राजनीति‍क मान्यताएं, प्रशासनि‍क नजरि‍या,प्रशासकीय नीति‍यां सब कुछ धराशायी हो गए । मई 83 की घटना को बहाना बनाकर जेएनयू को सुनि‍योजि‍त ढ़ंग से प्रशासकों ने तोड़ा। इस कार्य में लोकल प्रशासकों से लेकर केन्द्रीय शि‍क्षा मंत्रालय तक सभी का हाथ था। छात्र आंदोलन को तो महज बहाने के रूप में इस्तेमाल कि‍या गया था। मई छात्र आंदोलन नहीं होता तब भी जेएनयू में बुनि‍यादी परि‍वर्तन आते। मई 83 के भयानक दमन के बाद भी 'छात्र स्प्रि ट' खत्म नहीं हुई । सारे प्रशासकीय और नीति‍गत परि‍वर्तनों को लाने का बुनि‍यादी लक्ष्य था 'छात्र स्प्रिट' को नष्ट करना। छात्रों ने कभी भी यह लक्ष्य हासि‍ल करने दि‍या।उल्लेखनीय है मई आंदोलन के कारण 170 से अधिक छात्र निष्कासित हुए,एक साल दाखिले नहीं हुए,370से अधिक छात्रों पर 20 से अधिक केस दो साल तक चलते रहे। मई 83 के भयानक उत्पीडन और दमन के बावजूद छात्रों की एकता,भाईचारा, राजनीति‍क सहि‍ष्णुता और बंधुत्व बना रहा। उल्लेखनीय है मई 83 में मैं वहां की राजनीति‍ का अनि‍वार्य हि‍स्सा‍ था। जेएनयू की स्टूडेण्ट फेडरेशन ऑफ इण्डिया की जेएनयू यूनि‍ट का अध्यक्ष और दि‍ल्ली राज्य का उपाध्यक्ष था। बाद में सन् 1984 -85 के छात्रसंघ चुनाव में अध्यक्ष बनने वाला जेएनयू का एकमात्र हि‍न्दीभाषी छात्र था। जेएनयू कि‍सी व्यक्ति का बनाया नहीं है, कुछ व्यंक्तियों का भी बनाया नहीं है। वह प्रोफेसरों का भी बनाया नहीं है। जेएनयू को बनाया है छात्र स्प्रिट ने। कि‍सी महापंडि‍त ने जेएनयू नहीं बनाया। जेएनयू में व्यक्ति नहीं 'स्प्रिट' महत्वपूर्ण है। कर्मण्यता और छात्रसेवा महत्वपूर्ण है। जेएनयू 'छात्र स्प्रिट' की धुरी है कर्मण्यता। जो छात्रों के लि‍ए काम करेगा उसे वे प्यार करते हैं। वे राजनीति‍ पर ध्यान पीछे देते हैं कर्मण्यता पर ध्यान पहले देते हैं। अकर्मण्यक होने पर वे कि‍सी भी धाकड़ नेता को घूल चटा सकते हैं। छात्रों के बीच कौन कि‍तना समय देता है, उनकी तकलीफों में कौन कि‍तना ध्यान देता है,कि‍तना समय उनकी सुख दुखभरी जिंदगी में शेयर करता है। इन चीजों को जेएनयू की 'छात्र स्प्रिट' पहचानती है। कोई बढ़ि‍या नेता हो लेकि‍न छात्रों के बीच में नहीं छात्रसंघ के दफतर में क्लर्क की तरह बैठा रहे। छात्रसंघ की कार्रवाईयों को ही महत्व दे। सार्वजनि‍क तौर पर कम मि‍ले या लोगों में कम घुले मि‍ले तो ऐसे नेता को जेएनयू के छात्र पसंद नहीं करते।

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू-3-

             जेएनयू की एक आयरनी है कि इसमें आइकॉन विरोधी भावबोध है। इसके बावजूद कुछ छात्रनेता ऐसे भी हुए जो अपने को जेएनयू के आइकॉन या प्रतीक पुरूष के रूप में प्रतिष्ठित करने में सफल रहे। इनमें जिसने सबसे ज्यादा शोहरत और साख हासिल की है वह देवी प्रसाद त्रिपाठी यानी डीपीटी। इन दिनों वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। देवी प्रसाद त्रिपाठी से मेरी पहली मुलाकात सन् 1979 के अक्टूबर महिने में छात्रसंघ के चुनाव के मौके पर हुई। त्रिपाठीजी के बारे में मैं लगातार अन्तर्विरोधी बातें सुनता रहता था। खासकर जेएनयू आने के बाद अनेक एसएफआई नेता थे जो नहीं चाहते थे कि त्रिपाठी जी को कभी भी एसएफआई और उससे जुड़े मंचों पर बुलाया जाए। मजेदार बात यह थी कि ये नेतागण उनके बारे में तरह-तरह की कानाफूसी भी किया करते थे। एक अवस्था तो यह भी आयी कि माकपा के दिल्ली राज्य नेतृत्व से यह तय करा लिया गया कि त्रिपाठी को कभी जेएनयू चुनाव में प्रचार के लिए नहीं बुलाया जाएगा। सन् 1979 में डी.रघुनंदन को एसएफआई ने अध्यक्ष पद पर लड़ाने का फैसला लिया। आखिरी समय में स्थितियां एसएफआई के अनुकूल नहीं थीं। उस साल एआईएसएफ के साथ चुनावी समझौता भी नहीं हो पाया था। अंत में झक मारकर जेएनयू पार्टी ब्रांच ने निर्णय लिया कि देवीप्रसाद त्रिपाठी को प्रचार के लिए इलाहाबाद से बुलाया जाए। देवी प्रसाद त्रिपाठी उस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग में अध्यापन कार्य कर रहे थे और माकपा के उ.प्र. राज्य कमेटी सदस्य थे। इलाहाबाद में पार्टी का काम मूलत: उन्हीं के जिम्मे था। उल्लेखनीय है उनके इलाहाबाद में पार्टी कार्य देखने के दौरान ही पहलीबार इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यक्ष पद पर एसएफआई ने चुनाव जीता था। त्रिपाठीजी की इन सारी स्थितियों के बावजूद जेएनयू के कुछ नेताओं का उनके प्रति गुटपरस्तभाव मुझे आज तक समझ में नहीं आया। मेरी समझ है जब एक व्यक्ति पार्टी का सदस्य है तो उसके प्रति पार्टी के अंदर भेदभाव नहीं होना चाहिए। डीपीटी के संदर्भ में माकपा के अंदर भेदभाव और गुटपरस्ती को मैंने पहलीबार जब देखा तो माथा ठनका था। कई बार इस मसले को लेकर पार्टी में गर्मागर्म बहसें भी हुईं और उसका यह सुपरिणाम था कि मैं त्रिपाठीजी को देखना चाहता था, मैंने कुलदीपकुमार से अपनी इच्छा व्यक्त की मेरी डीपीटी से मुलाकात करा दो। कुलदीप ने कहा वे रघु के चुनाव प्रचार के लिए आ रहे हैं तुम मेरे साथ रहना मुलाकात हो जाएगी और त्रिपाठी आए तो सबसे पहले उन्हें खाना खिलाने के लिए हम दोनों डाउन कैम्पस में कटवारिया सराय में एक रेस्टोरैंट में ले गए हम तीनों ने जमकर खाना खाया और खूब बातें की। अंत में खाना खाकर तकरीबन ग्यारह बजे रात को हम ऊपर कैम्पस में आए और गोदावरी होस्टल (लड़कियों का) में चुनावसभा स्थल पर पहुँचे और तकरीबन एक बजे करीब डीपीटी ने अपना भाषण शुरू किया जो तकरीबन ढाई घंटे का था । इतना लंबा धारावाहिक, आकर्षक, विचारों से भरा भाषण्ा सुनकर सभी छात्र मुग्ध थे, मेरे लिए यह विलक्षण अनुभव था। मैंने अनेक नेताओं के भाषण सुने थे, सबसे लंबे भाषण के रूप में जयप्रकाशनारायण और चन्द्रशेखर का भाषण मैं मथुरा में सुन चुका था। किंतु डीपीटी के भाषण के बाद जो अनुभूति भाषणकला के प्रति पैदा हुई वह आनंददायी थी। डीपीटी का भाषण आकर्षक,सरस, मानवीय और विचारधारात्मक था। यह भाषण द्विभाषी था। अधिकांश समय अंग्रेजी को मिला तकरीबन आधा घंटा हिन्दी में भी बोले। अनिलचौधरी और रमेश दधीचि के अलावा त्रिपाठीजी तीसरे छात्र नेता थे जो हिन्दी में भी थोड़ा समय बोलते थे। रघु के चुनाव की यह अंतिम सभा थी और इसमें प्रकाश कारात, सीताराम येचुरी ने भी भाषण दिया और जब त्रिपाठीजी बोल रहे थे वे दोनों मुग्धभाव से सुन रहे थे और बार-बार यह संकेत भी कर रहे थे कि त्रिपाठी को सुनना एक आनंद से कम नहीं है। मजेदार बात यह थी कि उन्हें इतना मजा आ रहा था कि प्रत्येक बीस मिनट के बाद एक स्लिप डीपीटी की ओर बढ़ा देते थे कि बीस मिनट और बोलो। किसी नेता के भाषण के प्रति किसी नेता का यह आग्रह निश्चित रूप से विरल चीज थी। डीपीटी के भाषण शुरू होने के बाद कैम्पस में और कहीं पर किसी भी संगठन को अपनी चुनावी सभा जारी रखने में जबर्दस्त मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। विपक्ष के सभी नेता और कार्यकत्तर्ाा अपनी सभा खत्म करके उनका भाषण सुनने चले आते थे ,रघु की चुनाव सभा में कहने को मंच पर प्रकाश कारात और सीताराम येचुरी बैठे थे वे पहले ही भाषण दे चुके थे उनके भाषणों के दौरान वह हलचल और सुनने की बेचैनी नहीं देखी गयी जो त्रिपाठी के भाषण के समय देखी गयी। त्रिपाठी को लंबे समय तक विपक्ष की सभाभंग करने वाले वक्ता के रूप में भी जाना जाता था। त्रिपाठी के भाषण के प्रति आम छात्रों में एक तरह का पागलपन था। मैंने अनेक छात्रों से पूछा कि भाई ऐसा क्या है जो पागल की तरह सुनने आ गए, सभी एक ही बात कहते थे कि त्रिपाठी को सुनने में मजा आता है। त्रिपाठी के भाषण के बाद जाना कि भाषण को आनंद देने वाला होना चाहिए। अमूमन नेतागण भाषणों के जरिए बोर करते हैं। त्रिपाठी के भाषणों में रस होता था। त्रिपाठी ने अपनी भाषणकला में राजनीतिक भाषण कला में समाजवादी, कम्युनिस्ट और पंडितों की कथाशैली का सम्मिश्रण करके एक ऐसा फॉरमेट तैयार किया था जिसमें समाजवादियों की तरह विचारधारात्मक विवाद थे, कथाओं की तरह आनंद और आख्यान था साथ ही कम्युनिस्टों की समाहार शैली भी थी। त्रिपाठी की कोशिश हुआ करती थी कि श्रोताओं को कुछ देर के लिए दैनन्दिन जंजाल के बाहर ज्ञान के जंजाल में आनंद लेने को तैयार किया जाए। फलत: भाषण में विवाद ,समाहार,और आनंद की त्रिवेणी का एक अच्छी विचारोत्तोजक सुबह में मिलन होता था। त्रिपाठी का भाषण आधी रात के बाद कभी शुरू होता था और सुबह सूर्योदय के पहले तक चलता था। रघु के चुनाव के समय जो जलवा था वही जलवा अगले साल वी. भास्कर के चुनाव के समय भी था और दोनों ही मौकों पर मैन ऑफ द मैच त्रिपाठी थे। त्रिपाठी का हिन्दी का देशी ठाठ हिन्दीभाषी प्रान्तों के छात्रों को बेहद अपील करता था। डीपीटी अकेले वक्ता थे जिनकी अभिजन और गैर अभिजनों में समान अपील और सम्मान था। रघु की चुनाव सभा खत्म करने के बाद डीपीटी और मै,ं कुलदीपकुमार के पेरियार होस्टल स्थित कमरे में चले आए तब त्रिपाठीजी ने अपने हंसी-मजाक वाले अंदाज में ही मुझसे अपनी ज्योतिष संबंधी जिज्ञासाएं रखीं और इस तरह मैंने पहलीबार किसी माक्र्सवादी को ज्योतिषी से प्रश्न करते पाया।

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू-4-

        जेएनयू के प्रतीक पुरूषों में तीन कॉमरेडों का नाम आता है ये हैं देवीप्रसाद त्रिपाठी, प्रकाश कारात और सीताराम येचुरी। इनमें से एकमात्र देवी प्रसाद त्रिपाठी ने सबसे ज्यादा कुर्बानियां दीं। आपातकाल में 18 महीनों तक जेल में रहे। जबकि बाकी दोनों का किसी भी किस्म की कुर्बानी देने का रिकॉर्ड नहीं है। यह बात दीगर है कि प्रकाशकारात और सीताराम येचुरी को माकपा के शीर्ष नेतृत्व में जगह मिली। इन दोनों नेताओं के व्यक्तित्व की अपनी-अपनी निजी विशेषताएं हैं। किंतु कुछ साझा विशेषताएं भी हैं। दोनों माक्र्सवाद की किताबी भाषा से अच्छी तरह वाकिफ हैं। दोनों का माक्र्सवाद और हिंदुस्तान के प्रति दर्शकीय संबंध है। प्रकाश कारात ने जेएनयू में सन् 1980 में भास्कर वेंकटरमन के अध्यक्ष पद हेतु आखिरी चुनाव प्रचार सभा की। तब से प्रकाशकारात ने कभी छात्र चुनाव सभाओं में हिस्सा नहीं लिया।इसी साल से चुनाव के मुख्य वक्ताओं में मेरा नाम शामिल हुआ जो 1987तक बना रहा। प्रकाश कारात का भाषण पार्टी प्रेस विज्ञप्ति, पार्टी कक्षा और पार्टी के संपादकीय शैली का मिश्रित रूप था ,उसके भाषणों में जिंदगी की धड़कनों का अभाव खटकता था, चाहकर भी वह अंत तक इस कमजोरी से मुक्त हो पाया। प्रकाश के इस स्वभाव का जीवन और पार्टी के प्रति यांत्रिक और संवेदनाहीन समझ से गहरा संबंध है। कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर जो लोग स्टालिन टाइप व्यक्तित्व से प्रभावित हैं उन्हें प्रकाश अपील करता है। साधारण छात्रों में उसके भाषण्ाों की न्यूनतम अपील होती थी, सिर्फ एसएफआई के सदस्यों का एक हिस्सा ही उसे आदर्श वक्ता के रूप में पसंद करता था। इसके विपरीत सीताराम येचुरी के भाषणों में पब्लिक स्कूल के डिबेटरों की शैली थी, यह शैली जेएनयू के पब्लिक स्कूल मार्का छात्रों को अपील करती थी, इसी शैली के कारण सीताराम को मीडिया में भी ज्यादा पसंद किया जाता है। पब्लिक स्कूल मार्का वक्तृता शैली मूलत: आभिजात्य पापुलिज्म को संबोधित करती है। आभिजात्य पृष्ठभूमि के छात्रों में सीताराम की जनप्रियता जबर्दस्त थी । उल्लेखनीय है आभिजात्य की जनप्रियता खोखली और अस्थायी होती है। यही वजह है सीता के भाषणों का क्षणिक प्रभाव होता था। वह जिस क्षण बोलता है तत्काल ही प्रभावहीन हो जाता है। आप जब तक भाषण सुनते हैं अच्छा लगता है, भाषण बंद और प्रभाव भी खत्म। इसके विपरीत डीपीटी के भाषणों में आख्यान और विचार की सम्मिश्रित पध्दति का प्रयोग था। डीपीटी का भाषण सुनते हुए छात्र आनंद लेते थे बाद में उसे स्मरण करके बहस करते थे। बहस अंतर्वस्तु और भाषणकला दोनों को लेकर होती थी। जेएनयू की वामपंथी छात्र संस्कृति को बनाने में जिन छात्रों की भूमिका महत्वपूर्ण थी और जो आइकॉन नहीं थे किंतु अपने जमाने के जेएनयू के बेहतरीन छात्र होने के साथ बेहतरीन संगठनकर्ता थे इनमें सर्वप्रथम दो नाम आते हैं पहला रमेश दीक्षित का और दूसरा है सुनीत चोपड़ा का। इन दोनों ने अपने-अपने तरीके से जेएनयू के छात्र आंदोलन की बुनियाद का निर्माण किया।ये दोनों देश में एसएफआई जैसे विशाल छात्र संगठन के संस्थापक सदस्यों में भी हैं। सुनीत इन दिनों माकपा में हैं,खेतमजदूर यूनियन के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं,वर्षों माकपा की केन्द्रीय कमेटी के सदस्य रहे हैं जबकि रमेश दीक्षित राष्ट्रवादी कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व का अंग हैं। इन दोनों छात्रनेताओं ने लंबे समय तक जेएनयू के उदात्त मानवीय चरित्र को अपने दैनन्दिन व्यवहार और विचारधारात्मक कार्यों से आगे बढ़ाया। इनके अलावा उस जमाने में छात्र आंदोलन के अग्रणी नेताओं में दिनेश अवरोल, प्रबीर पुरकायस्थ, अशोकलता जैन, इंदु अग्निहोत्री,सुहैल हाशमी, दिलीप उपाध्याय ,सीताराम प्रसाद सिंह, कैशर शमीम, रमेश दधीचि ,मनमोहन ,अनिल चौधरी ,डी.रघुनंदन आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

टीवीयुग में कन्हैया कुमार की सीमाएं-

        मेरे कल के आलेख ´कन्हैया कुमारःविभ्रम और यथार्थ´ पर टिप्पणी करते हुए प्रियंकर पालीवाल ने कुछ गंभीर सवाल उठाए हैं जिन पर सोचने की जरूरत है। पालीवाल का मानना है,´कन्हैया कुमार,राज ठाकरे, लालूप्रसाद और नरेंद्र मोदी इन सबके भाषण उनके समर्थकों में जबर्दस्त लोकप्रिय हैं . सेंस ऑफ ह्यूमर ? खांटीपन ? देसी मुहावरा ? लफ्फाज़ी ? अन्य के लिए घृणा-प्रचार ? आखिर क्या है इनकी लोकप्रियता का राज ? इसका विश्लेषण होना चाहिए . अगर जे.एन.यू. के पूर्व छात्र नेताओं से ही तुलना करनी हो तो डी.पी.त्रिपाठी या सीताराम येचुरी से कर ली जाए . जगदीश्वर चतुर्वेदी से ही कर ली जाए . पर एक बात तय है कि कन्हैया की लोकप्रियता अभिजात वाम की लोकप्रियता नहीं है. वह वाम के आभिजात्य को तोड़ने वाली ग्रामी-वामी यानी भदेस-वामी लोकप्रियता है .´

इस प्रसंग सबसे पहली बात यह कि कन्हैया कुमार के भाषण को राज ठाकरे,लालू प्रसाद यादव ,नरेन्द्र मोदी के साथ तुलना करके नहीं देखा जाना चाहिए।राज ठाकरे लंपट राजनीति का मीडियानायक है,लालू यादव बिहार का सबसे जनप्रियनेता है,नरेन्द्र मोदी हिन्दुत्व के नायक हैं, जबकि कन्हैया कुमार जेएनयू का छात्रनेता है।इन चारों में यह बुनियादी अंतर है।इन चारों का जनाधार अलग है और राजनीतिक नजरिया भी अलग है।चारों की भाषा और मुहावरे में भी अंतर है।कौन नेता कैसा है यह इस पर निर्भर करता है कि उसका जनाधार किस तरह के लोगों में है और वह राजनीति को किस नजरिए से देखता है।सेंस ऑफ ह्यूमर या देसी खांटीपन,कभी भी टिकाऊ नेता नहीं बनाते।उपरोक्त चारों नेताओ में राज ठाकरे घृणा की राजनीति करते रहे हैं,जबकि लालू यादव और कन्हैया कुमार ने घृणा की राजनीति नहीं की है।उनकी राजनीति का बुनियादी आधार लोकतांत्रिक परिवेश से जुड़े सवालों पर केन्द्रित रहा है।जबकि नरेन्द्र मोदी ने घृणा और विकास के रसायन के आधार पर बहुसंख्यकवाद की राजनीति की है। ।

उल्लेखनीय है वाम विचारधारा कभी आभिजात्य में लोकप्रिय नहीं रही।जेएनयू में भी वह आभिजात्य की प्रिय विचारधारा नहीं है।जेएनयू में वाम राजनीति में शामिल होने वालों में अधिकांश गैर-आभिजात्य वर्ग से आए छात्र रहे हैं।यह मिथ है कि जेएनयू में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र आभिजात्य होते हैं।सच्चाई इसके विपरीत है।एक अन्य चीज है जिसे हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए, भाषण की जनप्रियता हमेशा संदर्भ,मीडिया और परिवेश की संगति-असंगति के संबंध पर निर्भर करती है।इसका कोई तयशुदा नियम नहीं है।

कन्हैया कुमार के 9फरवरी के पहले और बाद के भाषण जनप्रिय हुए हैं,वह आम लोगों को इंटरनेट पर अपनी ओर खींचने में सफल रहा है।लेकिन वह उतने लोगों को भविष्य में अपने भाषणों के करीब नहीं खींच पाएगा।इसका प्रधान कारण है कि टीवी प्रसारण में उसकी अनुपस्थिति। टीवी प्रसारण में कन्हैया के पहले वाले भाषण आए,प्रसारित हुए,उसने उसके इंटरनेट पर उपलब्ध भाषणों की दर्शक संख्या भी बढ़ा दी।आज भी हमारे समाज में कम्युनिकेशन में टीवी चैनलों की निर्णायक भूमिका है।मेरा अनुमान है जेएनयू कैंपस के बाहर कन्हैया कुमार तब तक ही जनप्रिय रहेगा जब तक वह टीवी पर रहेगा,टीवी से गायब होते ही उसके भाषण के प्रति आकर्षण कम हो जाएगा। इसका प्रधान कारण है टेलीविजन कम्युनिकेशन। इन दिनों जितने भी नेता जनप्रिय हैं वे अपने भाषणों के कारण जनप्रिय नहीं हैं वे जनप्रिय हैं टेलीविजन कम्युनिकेशन के कारण।



जिस व्यक्ति को टीवी ने उछाल दिया वह जनप्रिय हो गया,चाहे वह निर्मल बाबा हो या श्रीश्री रविशंकर हो या बाबा रामदेव हो,या मोदी हो या लालू हो।इन सबकी जनप्रियता इनके भाषण कला के कारण नहीं है,बल्कि टेलीविजन कम्युनिकेशन के कारण है। इस युग में जो टीवी में है वह जनप्रिय है जो टीवी में नहीं है वह जनप्रिय नहीं है।नरेन्द्र मोदी की महा-लोकप्रियता इसलिए नहीं है कि मोदी ने महान कार्य किए हैं,बल्कि इसलिए है कि उसने टेलीविजन नेटवर्क को सबसे अधिक घेरा हुआ है।इस युग के नेता तब तक जिंदा हैं जब तक वे टीवी पर्दे पर हैं।

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

कन्हैया कुमारः विभ्रम और यथार्थ

       कन्हैया कुमार,जेएनयूएसयू अध्यक्ष, काफी लंबे समय से छात्र राजनीति कर रहे हैं,लेकिन 9फरवरी 2016 की घटना ने उनको रातों-रात जेएनयू कैंपस के बाहर बेहद जनप्रिय बना दिया।इस घटना के पहले वह जेएनयू में जनप्रिय थे,लेकिन 9फरवरी की घटना के मीडिया कवरेज ने उनको राष्ट्रीय स्तर पर जनप्रिय बना दिया।इस जनप्रियता का श्रेय मीडिया,साइबर मीडिया और कन्हैया के वाम नजरिए को जाता है।कन्हैया कुमार ने ऐसा कुछ नहीं कहा जो वह पहले किसी वाम नेता ने नहीं बोला हो।इसके बावजूद किसी युवा वाम छात्रनेता को उतनी जनप्रियता नहीं मिली,जितनी कन्हैया कुमार को मिली।इस जनप्रियता के कारणों और प्रक्रिया की खोज की जानी चाहिए।

कन्हैया कुमार जो कुछ बोलता है, जिस मुहावरे में बोलता है वह वाम छात्र राजनीति की चिर-परिचित शैली है।इसे जेएनयूएसयू के किसी भी वाम छात्रनेता में सामान्यतौर पर देख सकते हैं।इसमें विलक्षण जैसी कोई चीज नहीं है।कन्हैया कुमार जब बोलता है तो सामान्य,सहज और जोशीली भाषा में बोलता है।यह खूबी वाम छात्रनेताओं की है।

उल्लेखनीय है युवा पीढ़ी नरेन्द्र मोदी और दूसरे नेताओं के भाषणों से विगत दो सालों से घिरी रही है,इस पीढ़ी ने कन्हैया कुमार में नएपन का अनुभव किया है।मोदी के केन्द्रीय राजनीति में आने के बाद उसके भाषणों का अहर्निश´फ्लो´ मीडिया और साइबर मीडिया के जरिए प्रवाहित हुआ है।यह सुनिश्चित, अनिवार्य और अपरिहार्य ´फ्लो´है जिससे सभी बोर हो चुके हैं,यह ´भाषण फ्लो´थमने का नाम नहीं ले रहा।जेएनयू और 9फरवरी की घटना को लेकर केन्द्रीय मंत्रियों से लेकर भाजपा के नेताओं, आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत आदि के अविवेकपूर्ण बयानों, आरएसएस और उसके प्रवक्ताओं की मीडिया मूर्खताओं ,कुतर्कों, ताबड़तोड़ हमला करके परास्त करने की शैली, कन्हैया कुमार आदि छात्रों को देशद्रोह के झूठे मुकदमे में पकड़वाने के षडयंत्र, और जेएनयू के बारे में जहरीले प्रचार अभियान ने हठात् कन्हैया कुमार की ओर सबका ध्यान खींचा है ।

मीडिया से लेकर साइबरमीडिया तक कन्हैया कुमार के भाषणों को बेहद सराहा गया,बहुत बड़ी संख्या में सुना गया।असल में,कन्हैया कुमार की लोकप्रियता की आग में घी का काम किया पीएम नरेन्द्र मोदी और संघ परिवार की विगत दो सालों की असफलताओं ने।यही वजह है कि कन्हैया कुमार के निशाने पर केन्द्र सरकार और उसकी जनविरोधी नीतियां हैं।इसके अलावा आरएसएस ने हिन्दू राष्ट्रवाद के नाम पर इसी दौरान जो आंदोलन शुरू किया उसने भी कन्हैया कुमार के लिए पर्याप्त ईंधन जुगाड़ करके दे दिया। आरएसएस और मोदी सरकार ने 9फरवरी की कैंपस स्तर की घटना को स्थानीय घटना की बजाय राष्ट्रीय घटना बना दिया और सारे मामले को जेएनयू कैंपस के बाहर संघ के हिन्दू राष्ट्रवाद की मुहिम का प्रमुख अंग बनाकर पेश किया और यह उनकी सबसे बड़ी भूल थी।यही वह मुख्य बिंदु है जहां से कन्हैया कुमार कैंपस के बाहर निकलता है और मीडिया से लेकर साइबर मीडिया तक नए संघ विरोधी-मोदी विरोधी आख्यान का नया नरेटिव बनाता है।

जबकि सच्चाई यह है जेएनयू छात्रसंघ और कन्हैया कुमार 9फरवरी की घटना के पहले लगातार अनेक मसलों को लेकर आंदोलन करते रहे हैं।इनमें प्रमुख हैं-पूना के फिल्म एवं टेलीविजन इंस्टीट्यूट के छात्रों के समर्थन में किया गया आंदोलन,यूजीसी के खिलाफ चलाया गया आंदोलन,हैदराबाद वि वि के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के खिलाफ चलाया गया आंदोलन।इन सभी आंदोलनों में जेएनयू के छात्रसंघ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।इन सबमें कन्हैया कुमार की भी सक्रिय भूमिका रही है। लेकिन उसे राष्ट्रीय स्तर पर कोई नहीं जानता था।लेकिन 9फरवरी की घटना और उसे लेकर मीडिया-संघ के हमले ने हठात् कन्हैया कुमार को राष्ट्रीय क्षितिज पर लाकर खड़ा कर दिया।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो कन्हैया कुमार 9फरवरी की घटना के पहले से सक्रिय था,लेकिन कैंपस तक जनप्रिय था। लेकिन 9फरवरी2016 की घटना ने उसे गुणात्मक रूप से भिन्न भूमिका में ले जाकर खड़ा कर दिया।आज कन्हैया कुमार सारे देश के छात्रों में बेहद जनप्रिय है।उसके बारे में आम लोग तरह-तरह के कयास लगा रहे हैं,उसे राष्ट्रीयनेता बना रहे हैं।लेकिन कन्हैया कुमार राष्ट्रीय नेता नहीं है,वह तो जेएनयूएसयू का अध्यक्ष है,छात्रनेता है,छात्र है।वह छात्र के रूप में ही फिलहाल रहना चाहता है।लेकिन जेएनयू प्रशासन ने संघ के इशारों पर काम करते हुए कन्हैया कुमार सहित 14छात्रों के खिलाफ 9फरवरी की घटना को लेकर दण्डात्मक कार्रवाई करके साफ कर दिया है कि उनका लोकतंत्र,संविधान और न्यायपालिका में कोई विश्वास नहीं है।जेएनयू प्रशासन के इस फैसले का हर स्तर पर विरोध किया जाना चाहिए।



बुधवार, 30 मार्च 2016

"गलतबयानी" से सच नहीं बदलता किरन खेरजी !


किरन खेरजी आप सांसद एवं अभिनेत्री हैं।हम आपकी बहुत इज्जत करते हैं।लेकिन आज कन्हैया कुमार,जेएनयूएसयू ,अध्यक्ष के 1984 के बयान पर आपका बयान देखकर हमें बहुत तकलीफ हुई।

आपको हमने पहले कभी 1984 के कातिलों पर बोलते नहीं सुना,वरना,आप जानती ही हैं कि उसमें कांग्रेस के अलावा आपके दल के लोगों के नाम भी मीडिया में सामने आए थे ,हाल ही में एक आरटीआई से यह रहस्य सामने आया था कि 1984 के दंगों में संघ के कुछ लोगों ने हिस्सा लिया था लेकिन उनके खिलाफ पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।पता नहीं आपको यह खबर सामने आने के बाद आपको संघ पर गुस्सा क्यों नहीं आया ॽ आपको यदि 1984 के हत्यारों से सच में घृणा है तो आपको तो भाजपा को छोड़ देना चाहिए !

कन्हैया कुमार ने 1984 के दंगों का राजनीतिक विवेचन करते समय चूक की , उसे यह चूक नहीं करनी चाहिए,लेकिन किरनजी वह दंगा करने नहीं गया,उसका दल (भाकपा या एआईएसएफ) भी कभी साम्प्रदायिक दंगे करने नहीं गया,1984 के दंगों में भी शामिल नहीं था,लेकिन कांग्रेस-आररएसएस के लोग तो शामिल थे।यह हमने मीडिया में ही नहीं पढ़ा अपने छात्र जीवन में जेएनयू , दिल्ली , में पढ़ते हुए,सिख नरसंहार पीडिताओं के मुँह से शरणार्थी शिविरों में प्रत्यक्ष सुना है। मैं उन दिनों जेएनयूएसयू का अध्यक्ष था,कन्हैया कुमार,जेएनयूएसयू,की उसी परंपरा का वारिस है।जिस तरह आप आरएसएस-भाजपा की परंपरा की वारिस है।

किरनजी आप सोचकर देखें आप कहां खड़ी हैं और कन्हैया कुमार कहां खड़ा है ॽआप हत्यारों के साथ हैं और कन्हैया सिख नरसंहार में मदद करने वालों की परंपरा में खड़ा है।आपको 1984 के दंगे पर बोलते समय सबसे पहले अपने नीचे की जमीन देखनी चाहिए ,आपके नीचे की जमीन में सिखों के हत्यारों के चिह्न मिलेंगे,जरा एकबार चप्पलें उतार जमीन पर ठीक से पैर उठाकर तो देखें कि आप किनके ऊपर खड़ी हैं ॽ किस परंपरा के साथ जुड़ी हैं ॽ

किरनजी, मैं नहीं कहता आप दंगाई हैं,मैं नहीं कहता आप अमानवीय हैं,लेकिन मैं आपसे यह उम्मीद तो कर ही सकता हूँ कि कभी हत्यारों को पुलिस के हवाले करवाने में आरएसएस पर दबाव डालेंगी,कम से कम से कम जिन आरएसएस वालों के नाम पुलिस केस दर्ज नहीं हुआ उनके खिलाफ केस दर्ज कराने की कोशिश करेंगी।मैं चाहता हूं पहले आप कांग्रेस-आरएसएस के 1984 के हत्यारों के नामोल्लेख करते हुए बयान तो जरूर दें।

किरनजी, आपने अकारण कन्हैया कुमार को कोसा है कि वह अपनी माँ का ख्याल करे,इत्यादि इत्यादि। मैं कन्हैया को नहीं जानता,मैं उससे कभी नहीं मिला,मैंने उसकी माँ को टीवी पर सुना है,उसके बयान को सुनकर यही लगा कि कन्हैया कुमार जो कुछ कर रहा है वह अपनी माँ के सपनों के अनुरूप ही कर रहा है।आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि कन्हैया की मां देखने में सरल,सीधी महिला है लेकिन चेतना में क्रांतिकारी है।आप क्रांतिकारी माताओं से नहीं मिली हैं इसलिए उनके सपनों के बारे में नहीं जानतीं, कभी समय निकालकर कन्हैया कुमार की माँ से जाकर मिलकर देखो और जानने की कोशिश करो कि वह महिला क्या सोचती है अपने पुत्र के बारे में !



किरनजी ,आप कलाकार हैं,लेकिन कन्हैया के 1984 के बयान पर आपकी कलाकारी रंग नहीं दिखा पाई!! आपको दीक्षा अच्छी नहीं मिली,अच्छी ट्रेनिंग रही होती तो कन्हैयाकुमार ने बहुत कुछ बोला है मोदीजी के बारे में उसकी तीखी आलोचना करतीं,लेकिन आपको तो किसी ने सिखा दिया कि 1984 के बयान पर कन्हैया को घेर लो,लेकिन आपको तो मालूम है वो नटखट कन्हैया है,चट से दुरूस्त कर लेता है,उसने बयान की चूक को दुरूस्त कर लिया,आपने दुरूस्त अंश को क्यों नहीं पढ़ा ॽ आप अभिनय करें लेकिन पूरी स्क्रिप्ट देखकर ! अधूरी स्क्रिप्ट से अभिन्य भी अधूरा ही रहता है,आप कलाकार है,आप मेरी बात को गंभीरता से लेंगी,कन्हैया ने बयान दुरूस्त कर लिया है उसे आगे बढ़ने का साहस देंगी!!

रविवार, 27 मार्च 2016

जेएनयू और छिपाने की कला


        जेएनयू का 9फरवरी2016 का मुद्दा राजनीतिक-डिजिटल है।राजनीतिक आयाम समझ में आ रहेहैं उन पर बहस भी हो रही है।लेकिन डिजिटल दुरूपयोग के आयाम खुलने बाकी हैं। जिस समय 9फरवरी की घटना घटी उसी दिन मौके पर पुलिस मौजूद थी,कोई वीडियोग्राफर भी था,लेकिन तत्काल किसी ने पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं की।पुलिस ने मौके पर रहते हुए किसी की गिरफ्तारी नहीं की,यहां तक कि बाद में भी पुलिस ने किसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं करायी।चूंकि घटना कैम्पस में हुई थी अतःइस घटना पर विश्वविद्यालय की एफआईआर दर्ज कराने की जिम्मेदारी बनती है लेकिन वि.वि. ने भी इस घटना पर पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं करायी,यही वह बिंदु है जहां से जेएनयू की 9फरवरी की घटना एक नियोजित सत्ता षडयंत्र प्रतीत होती है।जो भी शिकायतें या एफआईआर पुलिस में हुई हैं वे भाजपा के सांसद और एबीबीपी के जेएनयू नेताओं ने करायी हैं।जबकि तकनीकी तौर पर वे इसके लिए अधिकारी नहीं हैं। असल में ,डिजिटल मेनीपुलेशन के जरिए जेएनयू के छात्रों,वि.वि.समुदाय और शिक्षकों के साथ समूचे वि.वि. को बदनाम करने की कोशिश की गयी।जेएनयू के 5 छात्रनेताओं ,जिनमें छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार शामिल है,को राष्ट्रद्रोह के झूठे मुकदमे में फंसाया गया और कन्हैया को जेएनयू से गिरफ्तार किया गया,सारे कैम्पस में पुलिस ने छापे मारे,तलाशी ली।सबसे खतरनाक बात हुई कि 9फरवरी2016 की घटना के एक वीडियो का कई टीवी चैनलों ने जमकर दुरूपयोग किया और जबकि यह वीडियो मेनीपुलेशन से तैयार किया गया था।फेक वीडियो था।

इस समूचे प्रसंगने राजनीतिक शत्रुता के लिए डिजिटल दुरूपयोग की नई मिसाल कायम की,इस तरह के डिजिटल मेनीपुलेशन की हरकतें मुजफ्फरनगर के दंगों के समय भी हुई हैं। राजनीतिक शत्रुता के लिए डिजिटल को औजार की तरह इस्तेमाल करने की इस तरह की हरकतों ने डिजिटल सचेतनता के सवालों को केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया है।इस तरह की घटनाओं ने यह भी साफ कर दिया है कि आरएसएस डिजिटल मेनीपुलेशन में बादशाह है।

डिजिटल मेनीपुलेशन नए किस्म का खतरा है जो जमीनीस्तर पर कलह पैदा करता है। आजकल घटनाएं घट रही हैं लेकिन हम नहीं जानते कि क्या हो रहा है ॽक्यों हो रहा है ॽकौन लोग कर रहे हैं ॽघटना हो रही हैं लेकिन हम उसके ´तथ्य´और ´सत्य´को नहीं जानते।असलमें, हम सब राजनीति से दूरी बनाकर रखते हैं।राजनीतिक लक्ष्यों से भी दूरी बनाकर रखते हैं इसलिए नहीं जानते कि यह सब क्यों हो रहा है। साम्प्रदायिक- विभाजनकारी-आतंकी संगठनों से लेकर समर्थ भाजपा जैसा दल भी डिजिटल मेनीपुलेशन का जमकर इस्तेमाल कर रहा है। इसे ´´तकनीकी विभ्रमवाद´´कहे तो बेहतर होगा।इसका दायरा इराक,बोस्निया,अफगानिस्तान से लेकर जेएनयू तक के घटनाक्रम तक फैला हुआ है। इस दौर में जो हमले हो रहे हैं उनमें एक ओर से सत्ता हमलावर है तो दूसरी ओर हमलावर मीडिया है। लोकतांत्रिक हकों पर हमले को ´राष्ट्रसेवा´ या ´राष्ट्रवाद´कहा जा रहा है।अंधविश्वास के खिलाफ बोलने वालों पर बर्बर हमले किए जा रहे हैं।इन हमलों को वैचारिक ´श्रेष्ठत्व´कहा जा रहा है।जिन घटनाओं पर माफी मांगनी चाहिए उन पर नेतागण हेकड़ी और अहंकार से उनकी हिमायत में बोल रहे हैं।

आयरनी यह है सत्ता के हमलों को लोकतंत्र कहा जा रहा है,कानून के दुरूपयोग को न्यायपालन कहा जा रहा है।मीडिया और साइबर हमलों के जरिए सभी किस्म के कानूनों को मुक्ति दे दी गयी है।सभ्यता के मानकों को त्यागकर अधिकांश मीडिया ने आतंक का मार्ग ग्रहण कर लिया है। इसे साइबर डी-रेगूलेशन कह सकते हैं।जिसके आधार पर इराक से लेकर सीरिया तक स्वचालित मिसाइलों के हमले हो रहे हैं ,और कानूनभंग हो रहा है,´हमलावर´ को क्षमादान दे दिया गया है। ´हवाई ट्रांसपोर्ट ´और ´साइबर संचार´का पूरी तरह ´डी-रेगूलेशन´करके ग्लोबल पूंजीवाद ने नई परिस्थितियों को पैदा किया है। शांति स्थापना के नाम पर सेना और हथियारों के जरिए घेराबंदी और हमले,देश में शांति के नाम पर हिन्दुत्ववादियों के हमले,कुल मिलाकर त्रासद समय की सृष्टि कर रहे हैं।

पहले ´मतभेद´ होते थे तो उनको सार्वजनिक तौर पर व्यक्त करते थे,लोग सुनते थे,लेकिन नयी संस्कृति है ´हमला करो´, ´हिंसा के जरिए´ ´कानूनी आतंक´के जरिए मुँह बंद करो। पहले राजनैतिक विवाद को जमीनी स्तर पर हल करने या जीत हासिल करने की कोशिश की जाती थी लेकिन इन दिनों विवाद को सत्ता के तंत्र के जरिए,बाहुबल के जरिए हल करने की कोशिशें हो रही हैं।पहले प्रतिवाद करने वाले का सम्मान करते थे,इन दिनों उसके खिलाफ घृणा प्रचार हो रहा है।जेएनयू की घटना इस फिनोमिना का आदर्श उदाहरण है। पहले प्रतिवाद का सम्मान करते थे, इन दिनों प्रतिवाद का अपमान करते हुए प्रतिवाद का प्रतिवाद करते हैं।इस बहाने प्रतिवाद से ही वंचित करने की कोशिशें हो रही हैं।इस हठकंडे का आरएसएस जमकर इस्तेमाल कर रहा है।अब खबरों को भी मैन्युफेक्चर किया जा रहा है,इनके आधार पर हिन्दूभारत के निर्माण की कोशिशें हो रही हैं।

इन दिनों ´विवादों´में राजसत्ता का हस्तक्षेप सबसे बड़ी चुनौती है।जेएनयू के मसले पर यह तत्व सबसे उग्र रूप में सामने आया है, राजनेताओं,केन्द्रीय मंत्रियों और पुलिसतंत्र के जरिए जिस तरह स्थानीय छोटी समस्या में मोदी सरकार ने हस्तक्षेप किया है वह अपने आपमें लक्षण है कि संघ किस तरह की राजनीति कर रहा है।संघ सीधे सत्ता के जरिए नाकेबंदी करके हस्तक्षेप कर रहा है,तथाकथित आम सहमति के नाम पर आतंक पैदा कर रहा है,अभिव्यक्ति की आजादी को बाधित कर रहा है। इसके अलावा संघ के दबाव में लेखकों के कॉलम बंद कराए जा रहे हैं,किताबों की खरीद-फरोख्त में विचारधारा के आधार पर फैसले लिए जा रहे हैं।ये सब चुप कराने के तरीके हैं।

दिक्कत यह है कि अब हर चीज तेजगति से आ रही है। तेजगति से ही संघ के हमले हो रहे हैं। जो तेजगति के मंत्र जानता है वह तो इन हमलों से बच सकता है जो नहीं जानता वह इन हमलों में मर सकता है। विश्व परिप्रेक्ष्य में देखें तो मानवाधिकार बचाने के नाम पर युद्ध हो रहे हैं।लेखक,संस्थान और राष्ट्र की संप्रभुता पर हमले हो रहे हैं।क्षेत्र,राष्ट्र-राज्य और मनुष्य की संप्रभुता खतरे में है।धर्मनिरपेक्षता और संविधान पर संविधान का नाम लेकर हमले किए जा रहे हैं।´हस्तक्षेप´को परम पुनीत कर्त्तव्य के रूप में पेश किया जा रहा है।जो लोग आरएसएस के खिलाफ हैं उनके खिलाफ सूचना युद्ध की घोषणा हो चुकी है।इस काम में कारपोरेट मीडिया और इंटरनेट का सुनियोजित ढ़ंग से इस्तेमाल हो रहा है।

हमें नए युग की प्रक्रियाओं को बृहत्तर परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए।खासकर ´कम्प्यूटर विवेकवाद´ के नजरिए से देखना चाहिए। ´कम्प्यूटर विवेकवाद´ के बहाने नए किस्म के विवेकवाद को आरोपित किया जा रहा है।यह वह विवेकवाद है जिसे कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग के जरिए थोपा जा रहा है।इसका आरंभ युद्ध में स्वचालित मिसाइलों के प्रयोग से हुआ।आज यह साइबर सत्ता का सबसे प्रभावशाली औजार है।इसका जनक है कम्प्यूटर इंजीनियरिंग,और भोक्ता है शासकवर्ग।इसके जरिए सुनियोजित ढ़ंग से रेशनेलिटी को ´स्पेस´से लेकर दैनंदिन जीवन तक आरोपित किया जारहा है।इसे ´साइबर हमलावर´ कहें तो अत्युक्ति न होगी।

´साइबर हमलावर´वे हैं जिनका कोई सामाजिक दायित्व नहीं है।संविधान,कानून,संसद,समाज आदि किसी के प्रति ये लोग जबावदेह नहीं हैं।पॉल विरिलिओ के अनुसार यह ऐतिहासिक ´शिफ्ट´ है. पहले जो लोग हस्तक्षेप थे उनको आप जानते थे,उनकी भूमिका थी,दायित्व तय थे। लेकिन आज ऐसा नहीं है,आज सारा कार्य-व्यापार ´वर्चुअल स्पेस ´ से संचालित है।वहीं से चीजें देखी जा रही हैं और वहीं से ´एक्शन´ तय हो रहे हैं। इस तरह के हस्तक्षेप के बारे में पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं है।आज सत्ता को परिभाषित करने के रूप बदल गए हैं।इनमें वर्चुअल स्पेस की बड़ी भूमिका है। ´वर्चुअल स्पेस´ के जरिए व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक सबकी संप्रभुता पर हमले किए जा रहे हैं।पहले राष्ट्र संरक्षक था ,लेकिन इन दिनों राष्ट्र हमलावर है।आजकल वर्चुअल स्पेस बहुत महत्वपूर्ण है ,इसे भौगोलिक क्षेत्रफल के पूरक के रूप में देखना चाहिए ।इसी तरह साइबर अभिव्यक्ति को अभिव्यक्ति के पूरक के रूप में देखना चाहिए।पहले हस्तक्षेप के जरिए बहस या संवाद करने में मदद मिलती थी, लेकिन अब हस्तक्षेप का मतलब है ´तर्कहीनता´ और ´अन्य´के स्पेस का खात्मा।अब ऐसा माहौल बना है जिसमें ´अन्य´ अप्रासंगिक है। हस्तक्षेप के नाम पर आवाज बंद की जा रही है।इससे समूचा समाज टेंशन में है।यही वो परिप्रेक्ष्य है जिसमें जेएनयू और रोहित वेमुला के आंदोलन को देखने की जरूरत है।

एक तरफ मीडिया नियंत्रण बढ़ा है,वहीं दूसरी ओर साइबरसंसार के विकास के साथ ´साइबर लॉजिक बम´से हमले किए जा रहे हैं।इससे अराजकता बढ़ी है। असल में सारी चीजें ´ग्लोबल सूचना वर्चस्व´ के परिप्रेक्ष्य में विकसित हो रही हैं।इस सिस्टम की विशेषता है हर चीज को रीयल टाइम में खोजना,निशाना बनाना और वर्चुअल हमले करना। ´ग्लोबल सूचना वर्चस्व´ के तीन प्रमुख तत्व हैं,1.देश के ऊपर स्थायी उपग्रह प्रणाली की स्थापना,2.सूचना का रीयल टाइम में स्थानांतरण और प्रसारण,3.डाटा का तेजी के साथ विश्लेषण,खासकर विभिन्न चैनलों,माध्यमों आदि के जरिए आ रहे डाटा का तुरंत विश्लेषण ।

विरिलिओ कहते हैं यह असल में ´बिना दीवारों के किले´ का युग है।यह अंतरिक्ष श्रेष्ठता का युग है।जहां भी ’टकराव´ हो वहां अबाध हमले किए जाएं।साइबर स्मगलिंग पर जोर दिया जाए।पुराने संस्कारों, जिनमें धर्म भी आता है,उस पर कुछ न कहो।मसलन्, कोसोवो में बड़े पैमाने पर कब्रें खोज निकाली गयीं,उनकी सैटेलाइट इमेजों की वर्षा की गयी,लेकिन एबीसी टीवी चैनल ने एक भी कब्र नहीं दिखाई। पेंटागन से सैटेलाइट के जरिए यह दिखाया गया कि कोसोवो में पहाड़ों पर रहने वाले लोग पलायन कर रहे ये लोग ´जनसंहार´के डर से भाग रहे थे।जबकि बताया गया कि वे ´उत्पीडन´के कारण भाग रहे हैं। यह भी कहा गया कि अमेरिका का काम है ´अपराधी´खोजना। ठीक यही पद्धति जेएनयू के 9फरवरी के घटनाक्रम पर लागू की गयी।अचानक एक वीडियो ,फिर दूसरा और फिर तीसरा,चौथा.पांचवां वीडियो साइबर स्पेस में अवतरित होता है और जेएनयू पर हमले शुरू हो जाते हैं।किसी भी मीडिया घराने ने घटनास्थल पर जाकर सत्य जानने की कोशिश नहीं की,नारे लगाने वालों को कभी टीवी पर दिखाया नहीं, पुलिस घटनास्थल पर मौजूद थी लेकिन किसी भी नारे लगाने वाले को पकड़ा नहीं,यहां तक कि संघ के लोगों ने भी नहीं पकड़ा।साइबर से लेकर मीडिया तक जेएनयू पर जिस तरह का मीडिया हमला हुआ है वह टिपिकल ´मीडिया संहार´है,इसका लक्ष्य है जेएनयू को कलंकित करना,बदनाम करना,राष्ट्रविरोधी संस्थान बताना।संभवतःआजाद भारत में किसी वि.वि. पर इतना व्यापक हमला पहले कभी नहीं हुआ।यह हमला परंपरागत जासूसी,हमले,अफवाह आदि के हथकंडों से परे है। कम्प्यूटर की भाषा में यह ´ऑप्टिकल हमला´ है ,यह ऐसा हमला है जिसमें जेएनयू पर तो कड़ी निगरानी है ही,जेएनयू आंदोलन का समर्थन करने वालों पर भी निगरानी जारी है।इसके लिए ´पब्लिक ओपिनियन´पर भी निगरानी रखी जा रही है,उसको भी नियंत्रित किया जा रहा है। इसमें साइबर जासूसी से लेकर मीडिया जासूसी तक के हठकंडों का प्रयोग हुआ है। यह समूचा मॉडल ’टेली-सर्विलेंश´के नजरिए से संचालित है।इसके जरिए ही जेएनयू के बारे में आम जनता के नजरिए को प्रभावित किया जा रहा है,सामाजिक व्यवहार और आचरण को प्रभावित किया जा रहा है।

जेएनयू का आंदोलन मूलतः इमेज युद्ध के मानकों से लड़ा गया है।इमेज युद्ध में सूचनाओं के प्रवाह पर नजर रहती है,मोदी सरकार और संघ ने संगठित ढ़ंग से मीडिया से लेकर इंटरनेट तक फेक सूचनाओं के ´ फ्लो´ को बनाए रखा,उसे नियंत्रित किया।इससे बड़े पैमाने पर मीडिया प्रभावित भी हुआ। अधिकांश मीडिया घराने संघ के ´फ्लो´ में संप्रेषित सूचनाओं को ही परोस रहे हैं।इसे मीडिया का सर्वसत्तावादी हस्तक्षेप भी कह सकते हैं।इसके बहाने तर्क,प्रत्युत्तर सभी को अपदस्थ करने की कोशिश की गयी। इस हमले की विशेषता है- ´तुम सिद्ध करो कि तुमने नारे नहीं लगाए,तुम सिद्ध करो कि तुम झूठ नहीं बोल रहे,´ यानी निराधार आरोप लगाएंगे आरएसएस-पुलिस-मोदी सरकार के मंत्री ,वे आरोप के पक्ष में कोई प्रमाण नहीं देंगे ,वे सिर्फ आरोप लगाएंगे ,आरोपों की अंधाधुंध वर्षा करेंगे,अब तुम जेएनयूवालो सिद्ध करो कि आरोप झूठे हैं,तुम प्रमाण दो।यह ´आरोप´ लगाने की अमेरिकी पद्धति है,इस पद्धति के आधार पर अफगानिस्तान,इराक,सीरिया आदि को तबाह किया जा चुका है।



जेएनयू की जो इमेज वर्षा हुई है उसमें बार-बार एंकर से लेकर भाजपा-पुलिस-संघ के प्रवक्ता तक यही कह रहे थे कि ´जेएनयू में देशद्रोही नारे लगे हैं,जिन्होंने नारे लगाएं वे देशद्रोही हैं,´यही मूल आधारभूत वाक्य है जिसका करोड़ों बार प्रक्षेपण किया गया।इस पंक्ति के आधार पर समूचे मीडिया में हंगामा खड़ा किया गया।भ्रम पैदा किया गया। अंत में ,जेएनयू के छात्रनेताओं,जिनमें वर्तमान छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार सहित पांच नेताओं को ´राष्ट्रद्रोह´में भाजपा सांसद महेश गिरि की एफआईआर के आधार पर निशाने पर रखा गया,इन छात्रनेताओं की गिरफ्तारी वैध ठहराने के लिए ´जेएनयू में देशद्रोही नारे लगे हैं,जिन्होंने नारे लगाएं वे देशद्रोही हैं,´इस पंक्ति को अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया गया।इसके इर्द-गिर्द मीडिया-साइबर प्रौपेगैण्डा निर्मित किया गया। यह विशुद्ध असत्य प्रचार अभियान था।इस प्रचार अभियान के जरिए जेएनयू के छात्रों से पूछा गया तुम नाम बताओ,उनको खोजकर लाओ, बताओ वे कौन थे,कहां रहते हैं,यदि नहीं बताओगे तो तुम जिम्मेदार हो।इसके पक्ष में माहौल बनाने के लिए आरएसएस ने वोटक्लव से लेकर राजघाट तक भगवा ब्रिगेड को सड़कों पर उतार दिया,इनमें असामाजिक तत्वों से लेकर कुछ सौ पूर्व सैनिक भी थे।इस तरह के जुलूसों के जरिए यह माहौल बनाने की कोशिश की गयी कि जेएनयू देशद्रोहियों की शरणस्थली है।यह टिपिकल फासिस्ट तरीकों से जेएनयू की घेराबंदी है। जिसका लक्ष्य है आम जनता को जेएनयू के छात्रों के खिलाफ खड़ा करना,इसमें संघ कुछ हद तक सफल रहा,लेकिन शिक्षित समुदाय के बड़े तबके को जेएनयू के छात्र अपने साथ लाने,मीडिया के अंश को अपने सत्य के करीब लाने में सफल रहे,यह लड़ाई अभी बंद नहीं हुई है इसलिए और भी चौकन्ने रहने की जरूरत है।

गुरुवार, 10 मार्च 2016

जेएनयू की आँखें और विश्वचेतना

        जेएनयू पर बहस कर रहे हैं तो हमें यह सवाल उठाना चाहिए कि हमारे विश्वविद्यालयों की आंखें कैसी हैं ॽ विश्वविद्यालयों की आंखें कैसी हैं यह इस बात तय होगा कि विश्वविद्यालय ,सरकार को कैसे देखता हैं ॽ सरकार की उसके पास किस तरह की अवधारणा है ॽसरकार की अवधारणा चांस से पैदा नहीं होती ,वह क्लासरूम में पैदा होती है। विश्वविद्यालय सरकार को कैसे देखते हैं यह इस बात से तय होगा शिक्षक कक्षा में पढ़ाते कैसे हैं ॽ विश्वविद्यालय को संगठित कैसे करते हैं ॽ संचालित कैसे करते हैं ॽ किस तरह के शिक्षकों की नियुक्ति करते हैं ॽ

इसी तरह शिक्षक और छात्र पढ़ते हुए तटस्थ नहीं हो सकते।उनको यह कहने का हक नहीं है कि सरकार के बारे में हम कुछ नहीं बोलेंगे।आमतौर पर भारत के सभी विश्वविद्यालयों में सरकार के प्रति यही रूख है या फिर सरकार का अनुकरण करने की प्रवृत्ति है। विश्वविद्यालय के अंदर का समाज हमारे समाज का प्रतिबिम्बन है। उसमें छात्र जहाँ समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं वहीं दूसरी ओर शिक्षक समाज के दूसरे वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं।ये असल कारीगर हैं,ट्रस्टीहै, जो अपने शिक्षण से छात्रों को तराशने का काम करते हैं।उनका काम है छात्रों को अंतर्विरोधों के लिए तैयार करना। शिक्षक वस्तुतः लक्ष्य है जिसको पाना छात्रों की इच्छा होती है।किसी भी विश्वविद्यालय की आँखें कैसी होंगी यह निर्भर करता है कि शिक्षक कैसे हैं ॽ शिक्षक वि.वि. के ट्रस्टी होने के नाते सामुदायिक तौर पर वि.वि. के मर्म का निर्माण करते हैं।वे इस क्रम में अपनी स्वायत्तता भी निर्मित करते हैं।

शिक्षक महज शिक्षक नहीं होता वह स्कॉलर या विद्वान होता है ।विद्वान की परख विद्वान ही कर सकता है,अन्य नहीं।मोदी सरकार आने के बाद यह मुश्किल बढ़ी है कि विद्वान की परख विद्वान नहीं कर रहे लफंगे और जाहिल किस्म के लोग कर रहे हैं।इसके कारण सारे देश में विद्वानगण अपने को लज्जित और अपमानित महसूस कर रहे हैं।जेएनयू के वीसी ने ठीक वही काम किया जो आरएसएस चाहता है।उसने विद्वान की भूमिका नहीं निभायी। हमारे अधिकांश विश्वविद्यालयों में शिक्षक तो ढ़ेर सारे हैं लेकिन विद्वान या स्कॉलर बहुत कम हैं।

विश्वविद्यालय की आँखें विद्वान होते हैं,शिक्षक नहीं।हमने शिक्षक बनाने पर खूब जोर दिया और सारे देश को शिक्षकों से भर दिया है,इससे शिक्षा का स्तर गिरा है,शिक्षा को हमने रूपये – कौडी के धंधे में तब्दील कर दिया है।शिक्षा को बाजारू बना दिया है, और शिक्षक को बिकाऊ मजदूर ! दुखद है कि हम लेकिन वि.वि. को वि.वि. न बना पाए।जेएनयू इसलिए सारे देश के विश्वविद्यालयों से अलग है क्योंकि यहां विद्वान या स्कॉलरों की परंपरा है। यहां शिक्षक कम और विद्वान ज्यादा पाए जाते हैं।वे अपने छात्रों को पढ़ाते नहीं हैं,ज्ञान में साझीदार बनाते हैं,ज्ञान का भोक्ता नहीं सर्जक बनाते हैं। इस अर्थ में जेएनयू सारे देश के विश्वविद्यालयों से भिन्न है।

यहां हर छात्र-शिक्षक निडर होकर सरकार के खिलाफ,वि.वि.प्रशासन के खिलाफ बोल सकता है।यहां छोटे-बड़े का भेद एकदम नहीं है।यहां हर छात्र को अपनी हाइपोथीसिस पर काम करने का हक है।किसी भी वि .वि . में ज्ञान के विकास की यह बुनियादी शर्त है।कोई भी छात्र जब हाइपोथीसिस बनाकर काम करता है तो ज्ञान का सृजन करता है।जनता के बीच में अपनी क्षमता का प्रदर्शन करता है।ज्ञान के संदर्भ में शक्ति अर्जित करता है। वह जो ज्ञान निर्मित करता है उसका आम जनता पर असर भी होता है।इस अर्थ में वह अपनी स्वायत्तता को निर्मित करता है,स्वायत्त संसार बनाता है।यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से जेएनयू अपने को सरकार के नाभिनाल से काटता है।

जेएनयू के स्कॉलरों की आँखें हैं उनके ज्ञान की वैज्ञानिकक्षमता।जो सरकार और उसके तंत्र से पूरी तरह स्वतंत्र है। देश में कहने को अनेक वि.वि. हैं जो कागज पर स्वायत्त हैं,जेएनयू भी स्वायत्त है, लेकिन जेएनयू स्वायत्तता से भी एकदम आगे जाकर काम करता रहा है,स्वायत्तता के आधार वि.वि.सिर्फ अपने अंदर के कामकाज को लेकर स्वायत्त रह सकते हैं।यह स्वायत्तता की सीमा है।स्वायत्तता के तहत वि.वि. वही काम कर सकते हैं जो उनको सौंपे गए हैं।लेकिन जेएनयू उससे भिन्न भूमिका अदा करता रहा है,वह उनके प्रति भी जिम्मेदारी निभाता रहा है जो स्वायत्तता देनेवाली एजेंसी नहीं हैं। यानी गैर-सत्ताकेन्द्रों या विश्वसमाज के बृहत्तर तबकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाता रहा है।यही वजह है कि जेएनयू के छात्रों में सरकारीचेतना की बजाय विश्वचेतना,सामाजिकचेतना प्रबल होती है।इस अर्थ में वे देश के अन्य संस्थानों से भिन्न होते हैं।



विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...