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मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

परमाणु सुरक्षा सम्मेलनः ईरान के खिलाफ अमरीकी सैन्यवाद का नया मोर्चा

       अमरीकी सैन्यवाद आज सबसे ज्यादा आक्रामक है। इन दिनों अमेरिका में परमाणु सुरक्षा सम्मेलन हो रहा है,इस सम्मेलन की आड़ में अमेरिका का ओबामा प्रशासन ईरान के खिलाफ सारी दुनिया के स्तर पर राजनीतिक ध्रुवीकरण कर रहा है। परमाणु सुरक्षा सम्मेलन का लक्ष्य है परमाणु सुरक्षा के बहाने ईरान और उत्तरी कोरिया के खिलाफ विभिन्न देशों को अमेरिकी सैन्यवाद के झंड़ेतले एकजुट करना है।
     दुर्भाग्य की बात है कि सभी किस्म के अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को धता बताते हुए अमेरिका संयुक्तराष्ट्र संघ के मंच का ईरान के खिलाफ वैसे ही दुरुपयोग करना चाहता है जिस तरह इराक के खिलाफ किया गया था। अमेरिकी प्रशासन के द्वारा कहा जा रहा है कि इस सम्मेलन का मकसद है परमाणु अस्त्रों की सुरक्षा पर ध्यान देना,परमाणु सामग्री कहीं आतंकी संगठनों के हाथ न लग जाए,उसे रोकना। साथ ही गैर जिम्मेदार परमाणु  शक्ति संपन्न देश के द्वारा इसका दुरुपयोग रोकना।
    जाहिरा तौर पर ईरान और उत्तरी कोरिया को अमेरिका ने परमाणु क्षमता का दुरुपयोग करने वाले देशों की सूची में डाला हुआ है। जबकि इस सूची से इस्राइल और पाकिस्तान को बाहर रखा गया है। ईरान पर जितना हंगामा मच रहा है उतना हंगामा इस्राइल और पाकिस्तान पर नहीं मच रहा। पाकिस्तान का परमाणु प्रशासन चोरी छिपे परमाणु ज्ञान और तकनीक की तस्करी करता रहा है। सारी दुनिया जानती है कि इस्राइल के पास अवैध परमाणु अस्त्र हैं लेकिन कोई भी देश इस्राइल के परमाणु कार्यक्रम के बारे में नहीं बोल रहा है।
    ईरान का परमाणु कार्यक्रम अगर अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की अवहेलना करके जारी है तो इसका फैसला ईरान पर आर्थिक पाबंदी से नहीं किया जा सकता। ईरान के खिलाफ आर्थिक पाबंदी की अमेरिकी मांग सीधे ईरान के खिलाफ युद्ध की घोषणा है। इसका हर हालत में विरोध करना चाहिए।
     मजेदार बात यह है कि ईरान और उत्तरी कोरिया को परमाणु सुरक्षा सम्मेलन में निमंत्रित ही नहीं किया गया है। यह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का खुला असभ्य अमेरिकी आचरण है। अमेरिकी मूल रणनीति है कि परमाणु असुरक्षा के बहाने मध्य-पूर्व में अमेरिकी-इस्राइली सैन्यवाद का विस्तार करना और ईरान के तेल के कुंओं पर कब्जा जमाना। सारी दुनिया जानती है कि इन दिनों परमाणु बम बनाने की सामग्री खुले तौर पर पाक के माध्यम से स्मगल हो रही है और पाक प्रशासन यह काम चीन और अमेरिका के इशारे पर कर रहा है। उत्तरी कोरिया को परमाणु जानकारियां पाक ने बेचीं और चीन ने इस काम में खुलकर मदद की। रही बात ईरान की तो ईरान ने आत्मनिर्भर तरीके से अपनी परमाणविक क्षमता का शांतिपूर्ण कार्यों के लिए विकास किया है। यह काम वैसे ही चल रहा है जैसे भारत में चल रहा है।
    अमेरिकी परमाणु नीति का विरोध करते हुए ईरान आगामी 17-18 अप्रैल 2010 को एक विश्व सम्मेलन करने जा रहा है जिसका नारा है ‘‘ दुनिया को परमाणु बम नहीं परमाणु ऊर्जा चाहिए।’’ देखना है उसमें सारी दुनिया के कितने देश भाग लेते हैं ?
    अमरीकी प्रशासन ने जिस तरह इराक पर हमले  के पहले इराक में जनसंहारक अस्त्र होने का हौव्वा खड़ा किया था और इराक पर हमला करके उसे तबाह कर दिया । ठीक उसी पैटर्न पर ईरान के खिलाफ अमेरिकी कूटनीतिक गोलबंदी चल रही है। ईरान के खिलाफ चल रही साजिशों को आम लोगों में उदघाटित किया जाना चाहिए।
    अमेरिका परमाणु सुरक्षा के नाम पर मध्य-पूर्व में अपने सैन्य-आर्थिक हितों का विस्तार करना चाहता है और इस योजना को असफल बनाने की हरसंभव कोशिश की जानी चाहिए। अमेरिका की जरा परमाणु ‘ईमानदारी’ को अमेरिकी प्रशासन के ही एक व्यक्ति के जरिए देख लें। कैनेडी शासन के दौरान अमेरिका के रक्षा मंत्री रहे रॉबर्ट मैकनमारा ने कहा है कि अमेरिका की परमाणु नीति अनैतिक,अवैध,सैन्य दृष्टि से गैर जरूरी और खतरनाक है। सन् 1999 से अमेरिका ने परमाणु परीक्षण निषेध संधि को जब से खारिज किया है,तब से अमेरिका ने छोटे किस्म के परमाणु हथियार बनाने शुरू कर दिए हैं,परमाणु हथियारों के आधुनिकीकरण के ऊपर अमेरिका सालाना 40 विलियन डालर से ज्यादा खर्च कर रहा है। इस तरह के उसके पास 10 हजार परमाणु युध्दास्त्र हैं।इनमें 2000 सब समय तैयार रहते हैं। इसके अलावा यूरोप में अमेरिका के 480 परमाणु हथियार केन्द्रित हैं। इनमें से 180 परमाणु हथियार गैर परमाणु राष्ट्रों में लगाए हुए हैं। ओबामा साहब जरा अपने परमाणु जखीरे को पहले नष्ट करो फिर सारी दुनिया को परमाणु निषेध की सीख दो।        







बुधवार, 27 जनवरी 2010

अमरीकी सैन्य उद्योग का मध्यपूर्व में सूचना वर्चस्व



                    
  (गाजा में इस्राइली नाकेबंदी के प्रतिवाद में बनायी गयी कलाकृतियां)                                                          
       




अमेरिकी साम्राज्यवाद का उत्तर आधुनिक मंत्र है सूचना वर्चस्व बनाए रखो। विरोधी के सूचना तंत्र को नष्ट करो,अप्रासंगिक बनाओ। इस मंत्र का मध्यपूर्व में भी इस्तेमाल किया जा रहा है।जो मीडिया साथ नहीं है ,उसके साथ शत्रुतापूर्ण बर्ताव करना,दण्डित करना, उसे भी आतंकवाद विरोधी मुहिम के निशाने पर लाना। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर मीडिया को चौथा मोर्चा घोषित कर दिया गया है। मीडिया के खिलाफ भी युध्द की घोषणा कर दी गयी है।

नयी परिस्थितियों में संवाददाता,चैनल,अखबार आदि सभी को निशाना बनाया जा रहा है। मीडिया को वस्तुत: युध्द का उपकरण घोषित कर दिया गया है। यह विश्वस्तर पर चल रही अमेरिका की 'आतंकविरोधी मुहिम' का वैध निशाना है।सेना का वैध लक्ष्य है।

     इस्राइली विस्तारवाद और अमेरिकी अंध आक्रामकता का आलम यह है कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों में बड़े पैमाने पर इस्राइल के बारे में किसी भी किस्म की आलोचना के लिए कोई जगह नहीं है। स्थिति इस कदर बदतर है कि इस्राइल की आलोचना को कानून का उल्लंघन माना जाता है।टेरेल इ.अरनॉल्ड ने ' अगेस्ट दि लॉ टु क्रिट्रीसाइस इस्राइल ?' शीर्षक निबंध में लिखा है कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों में मध्यपूर्व से संबंधित किसी भी विषय पर आलोचना की मनाही है,खासकर उन मसलों पर जिन पर इस्राइल की आलोचना की जा सकती हो।

सीनेटर रीक सेनटोरम और सीनेटर साम ब्राउनबेक के द्वारा बनबाए गए उच्च शिक्षा कानून के छठे संशोधित अनुच्छेद के अनुसार यह व्यवस्था की गई है।किसी भी विश्वविद्यालय के छात्र,शिक्षक और अंशकालिक शिक्षक यदि किसी भी किस्म की इस्राइल के खिलाफ टिप्पणी व्यक्त करते हैं तो उस विश्वविद्यालय का आर्थिक अनुदान बंद कर दिया जाएगा।इस्राइल के बारे में की गई किसी भी किस्म की आलोचना को यहूदियों के खिलाफ की गई आलोचना घोषित कर दिया गया है।इस्राइल को यहूदी का पर्याय बना दिया गया है। जो कि गलत है।
    
    अमेरिका-इस्राइल के द्वारा मध्य पूर्व में नए किस्म की रणनीति लागू की जा रही है। नयी रणनीति के तहत मध्यपूर्व का नया नक्शा बनाया जा रहा है। मध्यपूर्व के तेल और गैस के कुओं पर कब्जा जमाओ,स्थानीय स्तर पर युध्द भड़काओ,जातीय हिंसा भड़काओ।मध्य पूर्व में अमेरिकी-इस्राइल सैन्य विस्तार करो।इस रणनीति के तहत 1991-92 में सऊदी अरब में सेनाओं का जमघट लगाया गया।कुवैत में अमेरिकी सेना के स्थायी अड्डे का इंतजाम किया गया।यह सारा कार्य किया गया सद्दाम हुसैन के जुल्मोसितम को मिटाने के नाम पर।बाद में इराक पर कब्जा जमा लिया गया।अब अगला निशाना ईरान है।

     प्रौपेगैण्डा किसी भी युध्द में उसी तरह महत्वपूर्ण है जैसे सैनिक और बम। खासकर ऐसे समय में जब राज्य अपने एक्शन को वैध ठहराना चाहता हो। दूसरे इराक युध्द के समय से युध्द के संदर्भ में तैयार की गई जन-संपर्क रणनीति का काफी महत्वपूर्ण स्थान है। युध्द के समय जन-संपर्क नीति का लक्ष्य होता है भावुक इमेजों की वर्षा और युध्द के लिए समर्थन जुटाना।इससे युध्द के समय सारा वातावरण नियंत्रित रहता है।

नियंत्रित और सेंसरशिप के माहौल में जब कोई सूचना दी जाती है तो लोग उस पर विश्वास करके चलते हैं।इस सूचना में शायद ही कभी आलोचना शामिल हो। खासकर फिलीस्तीनी इलाकों पर इस्राइल के हमले के दौरान जो खबरें इस्राइली सेना के जरिए आ रही थीं उनमें इस्राइल की आलोचना का जिक्र ही नहीं था। कवरेज के दौरान लगातार हम्मास के हमलों या प्रभावित लोगों के साक्षात्कार दिखाए गए जिनके बहाने इस्राइली हिंसाचार को वैधता प्रदान करने की कोशिश की गई। ज्योंही किसी संवाददाता को इस्राइली एक्रिडिशन मिला ,उसके पास तत्काल ईमेल और फोन कॉल का तांता लग जाता है।

इस्राइली प्रशासन के द्वारा संवाददाता का खास ख्याल रखा जाता है। उसे तरह-तरह की सुविधाएं प्रदान की जाती हैं,पैकेज टूर कराए जाते हैं,खबरों का पुलिंदा भेज दिया जाता है। उसे खबर खोजनी नहीं होती,बल्कि इस्राइली प्रेस विभाग के लोग स्वयं खबर की व्यवस्था कर देते हैं। लंच,विशेषज्ञ आदि की व्यवस्था कर देते हैं। ये सारी चीजें पत्रकार को बगैर मांगे ही पेश कर दी जाती हैं।यानी पत्रकार को खबर खोजने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता।ईमेल के जरिए संवाददाता के पास खबरों का अम्बार लगा दिया जाता है।पत्रकार को खबर के लिए कहीं भी जाने की जरूरत नहीं है,उसे सिर्फ फोन भर कर देना है,सारी चीजें रेडीमेड रूप में तत्काल उपलब्ध करा दी जाती हैं।

खासकर रेडियो और टीवी पत्रकारों को अपनी खबरों के लिए बार-बार होटल से बाहर जाना रास नहीं आता,उन्हें परेशानी होती है,उनके लिए इस्राइली प्रशासन की इस तरह की व्यवस्था से लाभ होता है। ईमेल से पत्रकारों को जिन खबरों को पोस्ट किया जाता है,उसमें चश्मदीद गवाहों के नाम,फोन नम्बर तक दिए रहते हैं,संवाददाता चाहे तो होटल में बैठे-बैठे उनसे बातें करके अपनी स्टोरी तैयार कर ले।यदि यह भी न कर सके तो उनके बयान साथ में ही रहते हैं,उनका इस्तेमाल कर ले। किसी भी चश्मदीद गवाह का बयान लेते समय भाषा संबंधी असुविधाओं का भी ख्याल रखा जाता है। अनुवादक की व्यवस्था भी करायी जाती है।इसका सारा खर्चा इस्राइली प्रशासन उठाता है। गवाहों में अनेक भाषा के लोगों के नाम रहते हैं,आप चाहे जिस भाषा के गवाह का इस्तेमाल कर सकते हैं। ये सारे जन संपर्क के हथकंडे हैं। जिनके जरिए संवाददाता को युध्द के यथार्थ से काट दिया जाता है।
मानव इतिहास में संकट की अवस्था में सबसे ज्यादा अगर किसी चीज की जरूरत होती है तो वह है वस्तुगत मीडिया। वस्तुगत मीडिया के बिना जनता को सही जानकारी नहीं मिलती।       खासकर युध्द,आतंकवाद और अतिवादी राजनीतिक कार्रवाईयों के दौर में वस्तुगत मीडिया जनता का सबसे विश्वसनीय साथी होता है। इन तीनों अवस्थाओं में सबसे पहले सत्य की हत्या होती है। सत्य को बोलना अपराध घोषित कर दिया जाता है।जबकि ऐसी अवस्था में सत्य का उद्धाटन सबसे पहली जरूरत है।

इन अवस्थाओं में मीडिया के मैथड और मंशा का बड़ा महत्व है। जब मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो और राजनीतिक ध्रुवीकरण चरम पर हो,ऐसी अवस्था में वस्तुगत मीडिया बेहद जरूरी है।जबकि यह देखा गया है कि  संकट की इन अवस्था में मीडिया वस्तुगत होने की बजाय ज्यादा से ज्यादा पूर्वाग्रहग्रस्त हो जाता है। उसके सारे पूर्वाग्रह जनतंत्र के लिए खतरा के नाम पर सामने आते हैं।

आश्चर्य की बात यह है कि आज मध्यपूर्व में मीडिया तेजी से अपना विकास कर रहा है।मध्यपूर्व में मीडिया के चरमोत्कर्ष ने खुलापन पैदा किया है। मध्यपूर्व के लोगों में जनतंत्र, जनतांत्रिक मूल्य और समानतावादी विचारों के प्रति आग्रह पैदा हुए हैं। पश्चिम निर्मित यथार्थ का तिलिस्म टूटा है। बेहतरीन टीवी पत्रकारिता का प्रसार हुआ है।

मध्यपूर्व में घट रहे यथार्थ को लेकर मध्यपूर्व का मीडिया सत्य का पक्षधर बनकर सामने आया है,इसके विपरीत पश्चिम का बहुराष्ट्रीय मीडिया पूर्वाग्रहों से ग्रस्त नजर आता है,उसके ऊपर मध्यपूर्व की जनता विश्वास नहीं करती। मध्यपूर्व में एक तरह से मीडिया-सूचना क्रांति की हवा चल रही है,जिसकी धुरी है सत्य के उद्धाटन का आग्रह और पश्चिमी पूर्वाग्रहों के प्रति घृणा। पश्चिमी मीडिया को आज मध्यपूर्व में अपनी साख बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

पश्चिमी मीडिया को मध्यपूर्व की ऑडिएंस कुसमाचार और अमेरिकी प्रचार के तंत्र के रूप में देख रही है। अमेरिका के मीडिया को खासकर इस संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है। मध्यपूर्व में पश्चिमी मीडिया के पूर्वाग्रह खासकर इस्राइल-फिलीस्तीनी संघर्ष,लेबनान-इस्राइल संघर्ष,इराक-अमेरिकी संघर्ष के समय साफ दिखाई दिए हैं। इन तीनों क्षेत्रों में भड़काने वाले के रूप में फिलीस्तीन,हिजबुल्ला और सद्दाम प्रशासन को चित्रित किया है।

फिलीस्तीनी इलाकों में इस्राइल इसलिए गया क्योंकि फिलीस्तीनी भड़काऊ कार्रवाई कर रहे थे।यही तर्क अन्य क्षेत्रों के बारे में है। इन क्षेत्रों की रिपोर्टिंग झगड़े से शुरू होती है और झगडे तक ही सीमित रहती है। झगड़े के बुनियादी कारणों को रिपोर्टिंग में खोजने की कोशिश ही नहीं की जाती। इस क्रम में फिलीस्तीनी संगठन क्या चाहते हैं,उनका क्या मानना है, घटना विशेष पर उसकी क्या राय है, इत्यादि के बारे में कभी समग्र तस्वीर पेश नहीं की जाती। किसी घटना विशेष की रिपोर्टिंग करते समय मैनस्ट्रीम मीडिया सटीक रिपोर्टिंग का आभास देता है।

     संबंधित घटना को पेश करते समय उसका आरंभ अनुकूल तर्क को केन्द्र में  रखकर होता है।जिससे वह आकर्षक और तार्किक लगे।इसके लिए घटना को क्रमवार पेश किया जाता है। किंतु मुख्यधारा का मीडिया फिलीस्तीन नागरिकों के दैनंदिन जीवन के कष्टों के बारे में हमें खबरें नहीं देता। वह यह नहीं बताता है कि किस तरह इस्राइली कार्रवाई ने उनका जीना दूभर कर दिया है ।

   इस्राइली आतंक के कारण उन्हें किस तरह की मानसिक,शारीरिक,आर्थिक और राजनीतिक यंत्रणाओं से गुजरना पड़ रहा है ? इस्राइली विमानों के द्वारा बस्तियों पर नीचे तक आकर उडान भरने,बम फेंकने आदि के कारण किस तरह रोज आतंक,उत्पीडन और भड़कानेवाली यंत्रणाओं से गुजरना पड़ता है। गर्भवती औरतों का इसके कारण गर्भपात हो जाता है।बच्चों और औरतों के कान के पर्दे फट जाते हैं।रात में जब ये विमान बस्तियों के ऊपर मडराते रहते हैं तो रात की नींद गायब हो जाती है। मीडिया ने कभी इस्राइल के इस तरह के अमानवीय आचरण को अपनी रिपोर्टिंग का हिस्सा नहीं बनाया।
    मध्यपूर्व में दो युध्द चल रहे हैं,पहला युध्द इस्राइली सेना  लड़ रही है,दूसरा युध्द मीडिया लड़ रहा है।मीडिया के पर्दे पर बम के धुंए और तबाही के चित्र आते हैं,भागते हुए लोग दिखाई देते हैं। किन्तु मीडिया कभी अपने को आलोचनात्मक नजरिए से नहीं देखता।वह संकट की प्रक्रियाओं को नहीं दिखाता।बल्कि वह ऐसा दृश्य पेश करता है कि सभी पक्ष पूर्वाग्रह से घिरे हैं।इस प्रक्रिया में अनेक किस्म के आख्यान और व्याख्याएं एक ही साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए नजर आते हैं।
    सवाल यह नहीं है कि सत्य क्या है और आप इसे कैसे जानते हैं ?बल्कि समस्या यह है कि तेजी से परिवर्तित परिस्थितियों में आप क्या जानना चाहते हैं,क्या परिवर्तित परिस्थितियों के सही संदर्भ में चीजें पेश की जा रही हैं ? डच पत्रकार जोरिस लियोनदिजिक ने अपनी नयी किताब ' देआर जस्ट लाइक ह्यूमन विंग' में इस प्रसंग को विस्तार से विश्लेषित किया है।उसने लिखा है ''जब फिलीस्तीन-इस्राइल संघर्ष की रिपोर्टिंग की जाती है तो 'मीडियावार' पदबंध का शायद ही कोई अर्थ हो,समाचारपत्र और टीवी इस संघर्ष की तटस्थ  खिड़की नहीं हैं।बल्कि वह मंच ज्यादा बेहतर जगह है जहां लड़ाई लड़ी जा रही है।दोनों ही पक्षों के परिप्रेक्ष्य एक-दूसरे से कोसों दूर नजर आते हैं। ऐसे में निष्पक्षता का बने रहना एकदम असंभव है।

इस समूची प्रक्रिया में मीडिया भाषा और नजरिए का महत्वपूर्ण स्थान होता है।यहां सारी प्रक्रिया शब्द चयन से शुरू होती है,आतंकवादी या स्वाधीनता सेनानी,शांति की प्रक्रिया या शांति स्थापित करने के प्रयास,ज्यों ही इस्राइल के बारे में कवरेज आना शुरू होता है तो इस्राइल की नीतियों की आलोचना आती है तो इस्राइल यही कहना शुरू कर देता है कि मीडिया के उसके प्रति पूर्वाग्रह हैं।जबकि सच यह है कि अधिकांश मैनस्ट्रीम मीडिया इस्राइलपंथी है।पीडितों को ही आक्रामक के रूप में पेश करता है।
     सामान्यत: मध्यपूर्व में इस्राइली हिंसा से पीडित हैं उन्हें ही आक्रामक के रूप में पेश किया जाता रहा है। किंतु इस्राइली बमबारी और तबाही के जो विवरण और ब्यौरे आने चाहिए थे,वे एकसिरे से गायब हैं। मुख्यधारा के मीडिया ने इस्राइली हमलों को आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई कहा। मध्यपूर्व संघर्ष में मीडिया को सीधे दोषी ठहरा दिया जाए, यह एक तरह का सरलीकरण होगा। मीडिया का काम है मध्यपूर्व में जो मीडिया युध्द चल रहा है उसे उद्धाटित किया जाए। मीडिया युध्द में जो भी पक्ष गलत काम कर रहा है,उसे उजागर किया जाय।
                   

शनिवार, 23 जनवरी 2010

गाजापट्टी की नाकेबंदी और जनता की तबाही


                  

                                                    
 गाजा की इस्राइल द्वारा नाकेबंदी जारी है। हजारों लोग खुले आकाश के नीचे कड़कड़ती ठंड में ठिठुर रहे हैं , इन लोगों के पास न तो कम्बल हैं, न टैंट हैं, न खाना है, न पीने का साफ पानी है। यह बातें संयुक्तराष्ट्र संघ मानवीय सहायता दल के संयोजक मैक्सवेल गेलार्ड ने फिलीस्तीनी इलाकों का हाल ही में निरीक्षण करने के बाद पत्रकारों से कही हैं।
     उल्लेखनीय है पिछले साल दिसम्बर-08 से जनवरी 2009 के बीच गाजा पर की गई भयानक बमबारी के कारण हजारों बिल्डिंगें ,मकान, स्कूल,अस्पताल सड़कें आदि पूरी तरह नष्ट हो गए थे। एक गैर सरकारी संस्था ऑक्सफॉम के अनुसार गाजा को तत्काल 268,000 मीटर कांच खिड़कियों के लिए और 67,000 स्क्वेयर मीटर सोलर वाटर हीटर के लिए चाहिए। इसके अलावा इतना ही कांच 30 फुटबाल पिचों को कवर करने के लिए चाहिए।
     गाजा में पिछले साल हुई इस्राइली बमबारी के कारण पानी,पायखाना,बिजली आदि का समूचा ढ़ांचा नष्ट हो गया। सहायता कार्य में लगी संस्थाओं बड़ी परेशानी हो रही है। उन्हें सीवर लाइन के पाइप,वाटर पंप ,टंकी आदि की मरम्मत  के लिए पर्याप्त सामान, पुर्जे,तेल आदि नहीं मिल पा रहे हैं। इसके कारण पीने के साफ पानी का अभाव भी बना हुआ है। बिजली उत्पादन व्यवस्था के बमबारी के कारण पूरी तरह नष्ट हो जाने का पानी की सप्लाई पर सीधा असर हुआ है।
     फिलीस्तीन का दैनन्दिन नजारा यह है कि गाजा के सभी रास्ते इस्राइली सेना ने बंद पर दिए हैं। आए दिन लगातार इस्राइली सैनिक घर -घर घुसकर तलाशी अभियान चला रहे हैं, ऊपर से रॉकेट से बस्तियों पर हमले किए जा रहे हैं। कई नाके वाले इलाकों में इस्राइली सैनिकों और हम्मास के सैनिकों के बीच झड़पें भी हुई हैं। विगत कुछ दिनों में जिस तरह झड़पें हुई हैं और इस्राइल ने हमले तेज किए हैं उससे यह भी कयास लगाए जा रहा है कि इस्राइल के द्वारा गाजा पर बड़े हमले की तैयारी चल रही है।     
शांति के नाम पर इस्राइल-अमेरिका मांग कर रहे हैं कि फिलिस्तीनी जनता अपने संघर्ष की सभी योजनाओं को त्याग दे।प्रतिरोध के सभी प्रयास बंद कर दे।इस्राइल के आतंक-उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष बंद कर दे।उल्लेखनीय है  इस्राइल के द्वारा फिलिस्तीनियों का उत्पीड़न उनके क्षेत्र में हो रहा है।इस्राइल बृहद इजरायल के सपने को साकार करने में लगा है।इस प्लान के आने के पहले जिन्नी प्लान,टेनेट प्लान आदि लाए गए किंतु अंतत: इस्राइली विस्तारवाद के आगे सबको ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया गया।

फिलिस्तीनी बच्चों को इस्राइली हमलों के कारण गंभीर मनोवैज्ञानिक कष्टों से गुजरना पड़ रहा है।इस्राइली हमलों का ये बच्चे मात्र पत्थरों से प्रतिरोध कर रहे हैं।जबकि इस्राइ के द्वारा न पर टैंकों, वायुयानों और तोपों से हमले किए जा रहे हैं।अनेक मर्तबा तो निहत्थे बच्चों को सीधे गोलियों का निशाना बनाया जा रहा है।फिलिस्तीनी जनता के खिलाफ इस्राइल सभी किस्म के हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है। मानव सभ्यता के इतिहास में इतने बर्बर हमले पहले शायद किसी ने नहीं किए जितने इस्राइल ने किए हैं।

स्राइली आतंक ने फिलिस्तीनी बच्चों को सामान्य बच्चों से भिन्न बना दिया है।बच्चों के ऊपर जिस तरह का दबाव पड़ रहा है उसके कारण बच्चों का अपने ऊपर नियंत्रण खत्म होता जा रहा है। उनके अंदर सुरक्षा की भावना खत्म होती जा रही है।दैनंदिन आतंक ने बच्चों को अंतर्विरोधी अनुभूतियों का शिकार बना दिया है। इनमें कुछ सकारात्मक अनुभूतियां हैं तो कुछ नकारात्मक अनुभूतियां हैं।

मसलन् बंदूक से पलायन ही बच्चों में खुशी का कारण बन जाता है।बच्चे परेशान रहते हैं कि स्कूल कब खुलेंगे।बाजार कब खुलेगा।पिता कब लौटकर आएंगे।माता-पिता कब तक घर से दूर रहेंगे।वे दिन-रात इस्राइली सेना के हमले के दुस्वप्न देखते रहते हैं।इस्राइली सेना के प्रक्षेपास्त्र हमलों को लेकर आतंकित रहते हैं।सो नहीं पाते।ज्यादातर बच्चों की पाचन-क्रिया गड़बड़ा गई है। इससे बच्चों का शारीरिक विकास बाधित हो रहा है।
स्राइली आतंक ने बच्चों के खेलों का चरित्र बदल दिया है।पहले बच्चे जुलूस,सेना और बमबारी का खेल खेलते थे।किंतु अब इसमें मशीनगन और हेलीकॉप्टर भी शामिल हो गए हैं। हले बच्चे रबड़ की गोलियों,शब्द करने वाले पटाखों,धुँआ छोड़ने वाले या ऑंसू गैस के गोलों और बमों से खेलते थे। किंतु अब बच्चे हवाई जहाज, बमों,टैंक,खुले घरों,बम,और रॉकेट आदि से खेलते हैं।
 बच्चों की भाषा में भी बदलाव आया है।अब बच्चे धार्मिक भाषा में बोलने लगे हैं।वे कहते हैं कि 'शरीर मरता नहीं बल्कि स्वर्ग में जीवित है।' राष्ट्रवादी भावनाओं का राष्ट्रीय नारों के तहत प्रसार हो रहा है।वे राष्ट्रीय एकता के नारे लगाते रहते हैं। इन परिवर्तनों से भविष्य के मुक्तिदूत तैयार हो रहे हैं। इस्राइली प्रशासन द्वारा फिलिस्तीनी जनता पर उत्पीड़न की प्रतिदिन अनेक घटनाएं हो रही हैं।किंतु इक्का-दुक्का ही टीवी में दिखती हैं।
गार्जियन में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार गाजा में सहायता कार्यों में लगे 80 से ज्यादा एनजीओ संगठनों,विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक बयान में कहा है कि गाजा की नाकेबंदी के कारण 14 लाख लोगों का स्वास्थ्य दांव पर लगा है। बीमार लोगों में बीस प्रतिशत सख्त मरीज हैं, इन्हें तत्काल इलाज के लिए इस्राइल के अस्पतालों में भर्ती कराने की जरुरत है। गाजा में जिस तरह सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक हालात खराब हुए हैं उसके कारण लोगों की तबियत ज्यादा तेजी से खराब हो रही है।
    दूसरी ओर इस्राइली अस्पतालों में इलाज के लिए आने वाले मरीजों के साथ घनघोर अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है। फिलीस्तीनी मरीजों को इस्राइल में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा रही है। उल्लेखनीय है गाजा पर सन् 2007 से हम्मास का नियंत्रण स्थापित होने के बाद से इस्राइल ने गाजा की ओर जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए हैं, फिलीस्तीन का शेष  संसार के साथ संपर्क और संचार के जितने भी रास्ते हैं वे इस्राइल और मिस्र से जुड़े हैं। इस्राइल की नाकेबंदी का फिलीस्तीन के लिए अर्थ है संसार से समस्त संपर्कों की समाप्ति। नाकेबंदी के कारण पर्याप्त मात्रा में दवा,इलाज की मशीनें ,एक्सरे मशीन आदि की सप्लाई तक में बाधा पड़ी है।
    
        
















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