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मंगलवार, 14 सितंबर 2010

हिन्दी दिवस पर विशेष- यूनीकोड भाषायी ठाट और ठसक

               साइबर युग में हिंदी दि‍वस का वही महत्‍व नहीं है जो आज से बीस साल पहले था। संचार क्रांति‍ ने पहलीबार भाषा वि‍शेष के वर्चस्‍व की वि‍दाई की घोषणा कर दी है। संचार क्रांति‍ के पहले भाषा वि‍शेष का वर्चस्‍व हुआ करता था, संचार क्रांति‍ के बाद भाषा वि‍शेष का वर्चस्‍व स्‍थापि‍त करना संभव नहीं है। अब कि‍सी भी भाषा को हाशि‍ए पर बहुत ज्‍यादा समय तक नहीं रखा जा सकता। अब भारत की सभी 22 राजकाज की भाषाओं का फॉण्‍ट मुफ्त में उपलब्‍ध है। भारतीय भाषाओं का साफ्टवेयर बनना स्‍वयं में भाषायी वर्चस्‍व की समाप्‍ति‍ की घोषणा है। संचार क्रांति‍ ने यह संदेश दि‍या है कि‍ भाषा अब लोकल अथवा स्‍थानीय नहीं ग्‍लोबल होगी। भाषा की स्‍थानीयता की जगह भाषा की ग्‍लोबल पहचान ने ले ली है। अब प्रत्‍येक भाषा ग्‍लोबल है। कोई भाषा राष्‍ट्रीय,क्षेत्रीय अथवा आंचलि‍क नहीं है।

उपग्रह क्राति‍ के साथ ही संचार क्रांति‍ हुई और हम सब नए भाषायी पैराडाइम में दाखि‍ल हुए हैं। भाषा की स्‍थानीयता खत्‍म हुई है। बहुभाषि‍कता का प्रसार हुआ है। अब वि‍भि‍न्‍न भाषाओं में लोग आसानी के साथ संवाद कर रहे हैं। एक- दूसरे को संदेश और सामग्री संप्रेषि‍त कर रहे हैं। अब हिंदी की स्‍थानीय अथवा राष्‍ट्रीय स्‍वीकृति‍ की समस्‍या नहीं है। बल्‍कि‍ संचार क्रांति‍ ने हिंदी और अन्‍य सभी भाषाओं को ग्‍लोबल स्‍वीकृति‍ दि‍लायी है। आज वे कंपनि‍यां और कारपोरेट घराने हिंदी का कारोबार करने के लि‍ए मजबूर हैं जो कभी यह मानते थे कि‍ वे सि‍र्फ अंग्रेजी का ही व्‍यवसाय करेंगे। इस प्रसंग में रूपक मडरॉक के स्‍वामि‍त्‍व वाले 'न्‍यूज कारपोरेशन' का उदाहरण देना समीचीन होगा। इस कंपनी की प्रति‍ज्ञा थी कि‍ वह समाचारों का सि‍र्फ अंग्रेजी में ही प्रसारण करेगा, और उसने सारी दुनि‍या में अंग्रेजी के ही न्‍यूज चैनल खोले,लेकि‍न भारत में आने के बाद पहलीबार उसे अपनी प्रति‍ज्ञा हिंदी के आगे तोड़नी पड़ी और स्‍टार न्‍यूज का हिंदी में पहलीबार प्रसारण शुरू हुआ। हिंदी सत्‍ता और महत्‍ता का लोहा एमटीवी संगीत चैनल ने भी माना। एमटीवी के सारी दुनि‍या में अंग्रेजी संगीत चैनल हैं,इस कंपनी ने भारत में जब संगीत चैनल खोलने का फैसला कि‍या तो हिंदी संगीत चैनल के रूप में एमटीवी आया। संचार क्रांति‍ के दबावों के कारण ही भारत सरकार ने तकरीबन 1300 करोड रूपया भारतीय भाषाओं के सॉफ्टवेयर के नि‍र्माण और मुफ्त सप्‍लाई पर खर्च कि‍या है। भाषाओं के उत्‍थान के लि‍ए इतना ज्‍यादा पैसा पहले कभी खर्च नहीं कि‍या गया। इसका सुफल जल्‍दी ही सामने आने वाला है। अब तेजी से हिंदी और भारतीय भाषाओं में भाषान्‍तरण हो रहा है भाषाओं का पहले की तुलना में आज भाषान्‍तरण और संवाद तेजी से हो रहा है। आप सहज ही अपनी भाषा में लि‍खी सामग्री को कि‍सी भी देशी वि‍देशी भाषा में रूपान्‍तरि‍त कर सकते हैं।सि‍र्फ कम्‍प्‍यूटर चलाना आता हो और इंटरनेट कनेक्‍शन हो। उपग्रह क्रांति‍ ने भाषाओं रीयल टाइम में संवाद और संचार को जन्‍म दि‍या है। भाषाओं में तत्‍क्षण संवाद की संभावना पहले कभी नहीं थीं। व्‍यक्‍ति‍ के मि‍लने के बाद ही संवाद होता था,अब तो व्‍यक्‍ति‍ नहीं भाषाएं मि‍ल रही हैं। भाषाओं के लि‍ए संचार क्रांति‍ रैनेसां लेकर आयी है।

उपग्रह क्रांति‍ के कारण यह संभव हो पाया है कि‍ आज भारतीय भाषाओं के टीवी और रेडि‍यो चैनल वि‍श्‍वभर में कहीं पर भी डीटीएच सेवाओं के जरि‍ए देखे और सुने जा सकते हैं।इंटरनेट के जरि‍ए भाषायी प्रेस सारी दुनि‍या में पढा जाता है। इस प्रक्रि‍या में भाषाओं की स्‍थानीयता खत्‍म हुई है। भाषाओं के रैनेसां का युग है। हिंदी आज स्‍वाभावि‍क तौर पर भारत की पहचान का मूलाधार बन गयी है। यह सब संचार क्रांति‍ के कारण संभव हुआ है।

नाइन इलेवन की घटना के बाद अमेरि‍का में जि‍स तरह के सुरक्षा उपाय कि‍ए गए हैं उसके कारण वहां पर सुपर कम्‍प्‍यूटर में सारी दुनि‍या के सभी भाषाओं के ईमेल और तमाम कि‍स्‍म की सामग्री की छानबीन अहर्निश चलती रहती है। इसके कारण अमेरि‍का ने तय कि‍या कि‍ वह अपने देश के स्‍कूलों में चीनी,हिंदी,रूसी आदि‍ भाषाओं के पठन-पाठन की खास व्‍यवस्‍था करेगा। सुरक्षा कारणों और सैन्‍य वर्चस्‍व को बनाए रखने के लि‍हाज से अमेरि‍का में हिंदी के अध्‍यापन की व्‍यापक व्‍यवस्‍था पर ध्‍यान दि‍या जा रहा है। न्‍यूज कारपोरेशन, डि‍जनी,सीएनएन,सोनी,एमटीवी आदि‍ कंपनि‍‍यां भारत के मीडि‍या बाजार में प्रवेश करने के लि‍ए सबसे पहले हिंदी में चैनल ,प्रेस और मीडि‍या प्रोडक्‍ट लेकर आई हैं। अब वे देशी समाचारपत्रों में पैसा लगा रहे हैं।

बांग्‍ला के आनंद बाजार प्रकाशन,जागरण प्रकाशन,अमर उजाला प्रकाशन ,हिंदुस्‍तान टाइम्‍स,टाइम्‍स ऑफ इंडि‍या आदि‍ में वि‍देशी कंपनि‍यों का पूंजी नि‍वेश इस बात का संकेत है कि‍ भाषायी मीडि‍या में बहुराष्‍ट्रीय मीडि‍या कंपनि‍यां नतमस्‍तक होकर पैसा लगाने आ रही हैं और अंग्रेजी की तुलना में देशज भाषाओं की महत्‍ता को स्‍वीकार कर रही हैं। इस क्रम में हिंदी को स्‍वाभावि‍क बढत मि‍ली है,अन्‍य भाषाएं भी इस प्रक्रि‍या में अपना वि‍कास करेंगी। इस अर्थ में यह भाषाओं के नवजागरण का दौर है। हिंदी में अनुवाद और डबिंग का इतना व्‍यापक बाजार पैदा हुआ है इसके बारे में हमने कभी सोचा भी नहीं था। अनुवाद का ही तकरीबन 12 हजार करोड रूपये का भारत में बाजार है।कई हजार करोड रूपये का डबिंग का बाजार है,अभी तो कई बाल चैनल 24 घंटे हिंदी में डब कि‍ए गए कार्यक्रम दि‍खाते रहते हैं। वि‍ज्ञापनों में हिंदी वि‍ज्ञापन अकेले 7-8 हजार करोड के बाजार को घेरे हुए हैं। पहले अनूदि‍त वि‍ज्ञापन होते थे अब हिंदी के मौलि‍क वि‍ज्ञापन तैयार हो रहे हैं।

कोई भाषा कि‍तनी ताकतवर है यह इस बात से तय होता है कि‍ व्‍यापार और आर्थि‍क मीडि‍या उसमें है या नहीं। अंग्रेजी के बाद हिंदी अकेली भाषा है जि‍समें व्‍यापारि‍क चैनल और अखबार हैं, जैसे एनडीटीवी प्रोफि‍ट,जी बि‍जनेस, सीएनबीसी आवाज आदि‍। इसी तरह बि‍जनेस स्‍टैंडर्ड, इकोनॉमि‍क टाइम्‍स जैसे आर्थि‍क अखबार सस्‍ते दामों पर हिंदी में नि‍कल रहे हैं। आर्थि‍क अखबार और टीवी चैनलों का हिंदी में आना ,हिंदी में धडाधड इंटरनेट सामग्री का आना, तेजी से ब्‍लॉग संस्‍कृति‍ का वि‍कास इस बात का संकेत हैं कि‍ हिंदी अब ग्‍लोबल भाषा है सही अर्थों में देशी वि‍देशी नागरि‍कों की वि‍श्‍वभाषा है। सैटेलाइट हिंदी चैनलों के करोड़ों दर्शक भारत के बाहर हैं यह सब संभव हुआ है संचार क्रांति‍,उपग्रह क्रांति‍, कम्‍प्‍यूटर और डि‍जि‍टलाईजेशन के कारण।

कहने का तात्‍पर्य यह है हिंदी आज वास्‍तव अर्थों में ग्‍लोबल भाषा है । हिंदी मीडि‍या ग्‍लोबल स्‍तर पर संचार कर रहा है। यह हिंदी का नया पैराडाइम है। यह राज्‍य,कारपोरेट जगत और तकनीकी कैद से मुक्‍त एक नए रैनेसां की शुरूआत है। आओ हम संचार क्रांति‍ का स्‍वागत करें और अपने को हिंदी संस्‍कृति‍ के साथ '' साक्षर भी बनाएं। '' साक्षरता के बि‍ना हम और हमारी भाषाएं नहीं बचेगी। आज प्रत्‍येक हिंदीभाषी की यह जि‍म्‍मेदारी है कि‍ वह अपने को संचार क्रांति‍ से जोड़े और अपने को '' साक्षर बनाए।

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

फेसबुक पर अंग्रेजी लिपि के दीवाने और ग्लैमर

फेसबुक पर कुछ दोस्तों ने अंग्रेजी लिपि की हिमायत में तरह-तरह के तर्क दिए हैं। उन तर्कों को किसी एक धारणा में बांधे तो बहस को ज्यादा गंभीर बनाया जा सकता है। हमारे उर्दू के दोस्तों ने लिपि बनाम भाषा की पुरानी साहित्यिक बहस को यहां अपनी टिप्पणियों में उठाने की कोशिश की है।
    मैं विनम्रता के साथ कहना चाहता हूँ कि फेसबुक या इंटरनेट में हिन्दी  में  लिखने की बहस को उठाने का मकसद पुराने बोझे को ढ़ोना नहीं है। इस बहस का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में लिपि और भाषा के पुराने विवाद से कोई संबंध नहीं है। बल्कि यह एकदम नई बहस है और इसका संदर्भ है इंटरनेट की यूनीकोड भाषा। इस बहस का दूसरा संदर्भ है सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और तीसरा संदर्भ है विज्ञापन और फैशन।
     इन तीन संदर्भों से फेसबुक पर हि्दी की बहस परिचालित है। मैं पहली बात यह कहना चाहता हूँ कि अंग्रेजी में हिन्दी लिखने वाले हिन्दी प्रेमी हैं वे हिन्दी के शत्रु नहीं हैं। उनका मानना है हिन्दी को हिन्दी लिपि में लिखने से ‘अपर्याप्त’ अभिव्यक्ति होती है और यही वजह है कि वे अंग्रेजी में हिन्दी को लिखने के लिए मजबूर हुए हैं। यानी वे अपनी बात हिन्दी लिपि में संप्रेषित नहीं कर पाते और वे भावी दोस्तों या ऐसे दोस्तों को खोना नहीं चाहते जो हिन्दी लिखना-पढ़ना नहीं जानते।
     इस क्रम में अंग्रेजी में हिन्दी के यूजरों ने हिन्दी के अधूरेपन की ओर ध्यान दिलाया है। यह भी कहा है कि इससे वे हिन्दी का भविष्य बना रहे हैं,कुछ लोगों ने यह भी कहा है जैसा मन में आए वैसा लिखो,महत्वपूर्ण है अभिव्यक्ति। ‘जैसा मन में आए वैसा लिखो’ के नारे पर यदि मानव समाज चलता तो आज हमारे पास भाषा का इतना विशाल अक्षय भंड़ार नहीं होता। बड़े-बड़े व्याकरणशास्त्री न होते। भाषा की शिक्षा की जरूरत नहीं थी। इस तरह के तर्क देने वाले भूल जाते हैं कि भाषा जन्मना नहीं पाते बल्कि उसे शिक्षा के जरिए अर्जित करते हैं।
       भाषा की अपर्याप्तता का तर्क भाषा का तर्क नहीं है यह फैशन की भाषा का तर्क है। यह तर्क भाषा को भविष्य में ले जाता है। यह भाषा में प्रचार की कला है। इसमें भाषा को भविष्यकाल के हवाले कर दिया गया है। वे मानते हैं भाषा के बारे में सोचो मत बोलो। भाषा के प्रयोग के बारे में बहस करना बेबकूफी है। जैसा मन करे वैसा लिखो। महत्वपूर्ण संचार है, भाषा नहीं। हिन्दी की यूनीकोड भाषा की बातें करना कठमुल्लापन है। हमें वही भाषा लिखनी चाहिए जिसमें आराम से व्यक्त कर सकें। इन लोगों का यह भी मानना है अंग्रेजी में हिन्दी लिखेंगे तो इससे हिन्दी और हिन्दीभाषी का रुतबा बढ़ेगा।
     इस तरह के तर्क भाषा के बारे में अवैज्ञानिक समझ से पैदा हुए हैं। इन तर्कों का आधार है उपयोगितावाद। भाषा में उपयोगितावाद के जनक अमेरिकी भाषाशास्त्री हैं। जीवनशैली और संस्कृति के विमर्शों में भी उपयोगितावाद के जनक वे ही हैं। उपयोगितावाद सबसे खतरनाक विचारधारा है। वे मानते हैं जो उपयोगी नहीं है वह बेकार है, उसका इस्तेमाल मत करो। यह समझ वस्तुओं के बाजारू तर्क और विज्ञापन कला के तर्क से संचालित है।  वे अंग्रेजी में हिन्दी के प्रयोग की हिमायत सिर्फ उपयोग को ध्यान में रखकर कर रहे हैं।  सवाल उठता है क्या भाषा को उपयोगितावाद का हिस्सा बनाना सही होगा ?
      वे अंग्रेजी में हिन्दी का प्रयोग करते हुए निज के रूपान्तरण पर जोर दे रहे हैं। यह मध्यवर्ग को संबोधित प्रचार की कला है । वे इसमें नए बदले वातावरण और बहुलतावादी समाज में भाषायी संचार की सुविधा का तर्क दे रहे हैं। वे अंग्रेजी में हिन्दी के प्रयोग के जरिए आम माहौल और संबंधों के बदलने या रूपांतरण पर जोर दे रहे हैं। सवाल उठता है  अंग्रेजी में हिन्दी लिखने के तर्कों के हिमायती कैसे पैदा हो रहे हैं ? वे कहते हैं परखकर देख लो हमारी बात सच है उर्दू वाला या तमिल वाला हिन्दी वाले से कैसे बात करेगा। इस प्रचार की साख इसलिए बची रहती है कि उसकी सत्यता की जांच की जा सकती है। सत्यता की जांच वायदे की वास्तविक पूर्ति के रूप में नहीं अपितु दर्शक ग्राहक की फैंटेसी और संचार की प्रासंगिकताओं के आधार पर हो रही है। इसका असल लक्ष्य भाषायी यथार्थ को लागू करना नहीं है बल्कि भाषायी दिवा-स्वप्न पैदा करना है।  
    अंग्रेजी में हिन्दी के यूजर ग्लैमर के स्नेहभाजन होना चाहते हैं। अभी तक उन्हें ग्लैमर का स्नेह नहीं मिला था। वे कह रहे हैं कि यदि वे अंग्रेजी में हिन्दी का प्रयोग करते हैं तो प्रभुवर्ग के भविष्य में स्नेहभाजन हो सकते हैं।
     कायदे से हमें भाषा में लोकतंत्र की स्थापना करनी चाहिए,सभी भाषाओं और बोलियों के विकास का वातावरण बनाना चाहिए,इसी क्रम में संचार की साझा भाषा भी बनेगी। लेकिन हमने भाषा में लोकतंत्र की बजाय भाषायी उपभोग की हिमायत आरंभ कर दी है। अभिव्यक्ति में चयन की स्वतंत्रता के नाम पर हम भाषा में लोकतंत्र की मांग नहीं कर रहे बल्कि उपभोग की मांग कर रहे हैं। कोई कैसे अपनी बात कह सकता है ,इस आधार पर हमने इस बात पर जोर दिया है कि कोई क्या खा सकता है।
     अब हम भाषा को खिला रहे हैं और भाषा खा रहे हैं। निजी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने नाम पर यह सारा नाटक चल रहा है। इस क्रम में हमने सभी किस्म के भाषायी मानकों,नियमों आदि की छुट्टी कर दी है। अलोकतांत्रिक और भाषाविरोधी रूपों के साथ सामंजस्य बिठाना आरंभ कर जिया है। अपने इस तरह के भावों को हमने सुंदर जिंदगी के सपने के साथ जोड़ दिया है। इसके कारण हम पूरी तरह प्रचार जगत के गुलाम हो गए हैं।
     अंग्रेजी में हिन्दी के हिमायती जानते नहीं हैं कि वास्तव जगत से इस भाषा का कोई संबंध नहीं है। यह विज्ञापन,मीडिया या प्रौपेगैण्डा की भाषा है। हम एक खास किस्म के भाषायी संशयवाद में फंसकर रह गए हैं जिसमें कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। आजकल मीडिया प्रचार में जिस तरह फोटो कहीं का होता है पाठ कहीं का। भाषा में भी यही हो रहा है।
    अंग्रेजी में हिन्दी लिखने वाले जाने-अनजाने जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं वह प्रचार की भाषा है। प्रौपेगैण्डा या विज्ञापन की भाषा है। इसमें वर्तमान नदारत है साथ ही भाषा में जो हो सकता है वह भी नदारत है। उसे खत्म कर दिया गया है। यह प्रचार की भाषा है। यह अर्जन या अभिग्रहण के इंतजार की भाषा है। अर्जन की भूमिका ने सभी तरह की भूमिकाओं को अपदस्थ कर दिया है। 'होने' की धारणा ने सभी किस्म के अर्थों एवं भावों को समाप्त कर दिया है।
   



बुधवार, 1 सितंबर 2010

इंटरनेट पर हिन्दी वालों में भाषायी विभ्रम

    समझ में नहीं आता कहां से बात शुरू करूँ,शर्म भी आती है और गुस्सा भी आ रहा है। वे चाहते हैं संवाद करना लेकिन जानते ही नहीं हैं कि क्या कर रहे हैं,वे मेरे दोस्त हैं। बुद्धिमान और विद्वान दोस्त हैं। वे तकनीक सक्षम हैं । किसी न किसी हुनर में विशेषज्ञ हैं। उनके पास अभिव्यक्ति के लिए अनगिनत विषय हैं।
    वे हिन्दी जानते हैं । हिन्दी अधिकांश की आजीविका है। वे कम्प्यूटर भी जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि गूगल में अनुवाद की व्यवस्था है। इसके बाबजूद वे इंटरनेट पर हिन्दी फॉण्ट में नहीं लिखते अपनी अभिव्यक्ति को अंग्रेजी में हिन्दी के जरिए व्यक्त करते हैं। मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं ? लेकिन मैं विनम्रता के साथ हिन्दी भाषी इंटरनेट यूजरों से अपील करना चाहता हूँ कि वे नेट पर हिन्दी में लिखें। इससे नेट पर हिन्दी समृद्ध होगी।
    नेट पर हिन्दीभाषी जितनी बड़ी मात्रा में रमण कर रहे हैं और वर्चुअल घुमक्कड़ी करते हुए फेसबुक और अन्य रूपों में अपने को अभिव्यक्त कर रहे हैं यह आनंद की चीज है। मैं साफतौर पर कहना चाहता हूँ कि हिन्दी का अंग्रेजी के जरिए उपयोग उनके लिए तो शोभा देता है जो हिन्दी लिखने में असमर्थ हैं। लेकिन जो हिन्दी लिखने में समर्थ हैं उन्हें हिन्दी फॉण्ट का ही इस्तेमाल करना चाहिए।
     यूनीकोड फॉण्ट की खूबी है वह यूजर को अंधभाषाभाषी नहीं बनाता। आप ज्योंही यूनीकोड में गए आपको भाषायी फंडामेंटलिज्म से मुक्ति मिल जाती है। हिन्दी के बुद्धिजीवी, फिल्म अभिनेता-अभिनेत्री,साहित्यकार और पत्रकार नेट पर हिन्दी में ही लिखें तो इससे हिन्दी की अंतर्राष्ट्रीय ताकत बढ़ेगी।
    अंग्रेजी में हिन्दी लिखने वाले नेट यूजर यह क्यों सोचते कि उन्हें जो हिन्दी में नहीं पढ़ सकता वह गूगल से अनुवाद कर लेगा। आप ईमेल हिन्दी में लिखें,फेसबुक पर हिन्दी में लिखें,ब्लॉग पर हिन्दी में लिखें।
    यूनीकोड फॉण्ट लोकतांत्रिक है। यह सहिष्णु बनाता है। मित्र बनाता है। दूरियां कम करता है। संपर्क-संबंध को सहज बनाता है। इस फॉण्ट के इस्तेमाल का अर्थ है कि आप अपनी अभिव्यक्ति को विश्व भाषा संसार के हवाले कर रहे हैं। यूनीकोड फॉण्ट मित्र फॉण्ट है आप कृपया इसका इस्तेमाल करके तो देखें आपकी अभिव्यक्ति की दुनिया बदल जाएगी।
   दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि भाषा को तकनीक के सहारे नहीं बचा सकते। कुछ लोग सोचते हैं कि भाषा को गूगल के अनुवाद के सहारे हम बचा लेंगे तो वे गलत सोचते हैं। भाषा को सीखकर और लिखकर ही बचा सकते हैं। भाषा अनुवाद की चीज नहीं है। अनुवाद से भाषा नहीं बचती।
    मुझे यह खतरा महसूस हो रहा है कि हिन्दी का नेट यूजर यदि हिन्दी में लिखना नहीं सीखता या उसका व्यवहार नहीं करता तो एक समय के बाद हिन्दी को पढ़ाने वाले भी नहीं मिलेंगे। हिन्दी हमारी भाषा है और यह गर्व की बात है कि हम हिन्दी में लिखते हैं। हमारी अंग्रेजियत हिन्दी के प्रयोग से कम नहीं हो जाती। अंग्रेजियत में जीने वाले लोग अंग्रेजी में लिखें लेकिन कृपा करके हिन्दी को अंग्रेजी में न लिखें। यह भाषा का अपमान है। उसकी अक्षमता की तरफ इशारा है। नेट पर हिन्दी तब तक अक्षम थी जब तक हिन्दी का यूनीकोड फॉण्ट नहीं था लेकिन आज ऐसा नहीं है। यूजर जब अपनी स्वाभाविक भाषा,परिवेश की भाषा का प्रयोग भ्रष्ट ढ़ंग से करता है तो अपने भाषायी विभ्रम को प्रस्तुत करता है। अंग्रेजी में हिन्दी लिखना भाषायी विभ्रम है। भाषायी विभ्रम निजी अस्मिता की मौत है। हम गंभीरता से सोचें कि हम भाषायी विभ्रम के सहारे क्यों मरना चाहते हैं ?      



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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...