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रविवार, 24 जुलाई 2011

हिन्दी बुर्जुआ के सांस्कृतिक खेल


     हिन्दी बुर्जुआ का हिन्दीभाषा और साहित्य से तीन-तेरह का संबंध है। इसमें आत्मत्याग की भावना कम है। उसमें दौलत,शानो-शौकत  और सामाजिक हैसियत का अहंकार है। वह प्रत्येक काम के लिए दूसरों पर निर्भर है।दूसरों के अनुकरण में गर्व महसूस करता है। दूसरों के अनुग्रह को सम्मान समझता है।वाक्चातुर्य से भाव-विह्वल हो जाता है। दूसरों की आँखों में धूल झोंकने की इसे आदत है।यही इसकी राजनीति का मूलाधार भी है। स्वभाव से हृदयहीन,क्षुद्र,दंभी और निजभाषा और संस्कृति से रहित है। हिन्दी बुर्जुआ का व्यक्तित्व बेहद जटिल और संश्लिष्ट है। उसमें सरलता का अभाव है। हिन्दी बुर्जुआ की बुद्धि बाल की खाल निकालने में सक्षम है लेकिन बड़ी-बड़ी गांठों को सुलझा नहीं सकती। इस वर्ग में आलस्यमय शांतिप्रियता और स्वार्थमय निष्ठुरता कूट कूटकर भरी है। इसमें दयावृत्ति और चारित्र्य-बल नहीं है।
बुर्जुआवर्ग ने हिन्दीभाषी समाज को ग्राम्य पांडित्य और ग्राम्य बर्बरता से मुक्ति दिलाने का काम नहीं किया। फलतः हिन्दीभाषी समाज में भद्रसमाज के निर्माण की प्रक्रिया काफी धीमी गति से चल रही है। हिन्दीसमाज में ग्रामीण आचार-व्यवहार की संकीर्णताएं बनी हुई हैं। इन संकीर्णताओं की ओट में हिन्दी में 'लोक' का बड़ा महिमामंडन हुआ है। धर्म के प्रति विलक्षण प्रेम है। वह धर्म और मासकल्चर पर जितनी आसानी से खर्च करता है उतनी आसानी से सामाजिक जीवन के विकास कार्यों और संस्कृति पर खर्च नहीं करता। धर्म और मासकल्चर का उसने इस तरह प्रचार किया है कि आम आदमी धर्म और मासकल्चर के कमरे में बंद होकर रह गया है।
     हिन्दीभाषी समाज में विचारहीन नियमों का घेरा है। इसे हिन्दीबुर्जुआ ने कभी चुनौती नहीं दी। धर्मगत भेदबुद्धि के बारे में सवाल नहीं उठाए। इसके कारण हिन्दीसमाज में जातिभेद और धर्मभेद आज भी बुनियादी समस्या बने हुए हैं। धर्मभेद ने साम्प्रदायिकता को हवा दी और जातिभेद ने जातिप्रथा को पुख्ता बनाया। इन दोनों भेदों को उसने कभी चुनौती नहीं दी। इसके विपरीत इन दोनों भेदों को विभिन्न तरीकों से ढंकने की कोशिश की है। मजेदार बात यह है  हिन्दीबुर्जुआ ने अबुद्धि की प्रशंसा की है । उसका महिमामंडन किया और बुद्धि और बुद्धिजीवियों को हिकारत की नजर से देखा। व्यावसायिक पेशेवरज्ञान को महत्व दिया। साहित्य-कला-संस्कृति और इनसे जुड़े पेशेवर लोगों की उपेक्षा की। बुद्धि के स्थान पर सामाजिक हैसियत को प्रतिष्ठित किया। बुद्धि के स्थान पर सामाजिक हैसियत की प्रतिष्ठा की। फलतःस्वाधीनचेतना का विकास बाधित हुआ। परनिर्भरता बढ़ी है। इसके कारण हिन्दीभाषी समाज में कूपमण्डूकता,धर्म,अन्ध संस्कारों, जड़प्रथाओं, गुरू,ज्योतिषी, पंडित, पुजारी आदि की साख बढ़ी। देववाणी,अलौकिक शक्तियां और अंध आज्ञाकारिता का तेजी से प्रसार हुआ।
       हिन्दीमन आस्था में विश्वास करता है बुद्धि में नहीं। हमारी शिक्षाप्रणाली  ने इसे कभी चुनौती नहीं दी गयी। शिक्षित होने के बाबजूद हमारे मन में कुसंस्कार ,पोंगापंथ और भेद-बुद्धि बनी रहती है। हिन्दी में जो शिक्षित हैं उनमें एक बड़ा वर्ग है जो शिक्षा के बाबजूद अंधविश्वासों की हिमायत करता है। वे कुतर्कों के आधार पर अपनी सड़ी-गली मान्यताओं को बचाए रखने में ज्ञानी महसूस करते हैं। वे बुद्धि पर कम और कुबुद्धि पर ज्यादा विश्वास करते हैं। लेकिन हिन्दी में एक छोटा सा समुदाय ऐसा भी है जो बुर्जुआजी के इन नकरात्मक लक्षणों से मुक्त है।  इसे प्रगतिशील हिन्दी बुर्जुआवर्ग कह सकते हैं। इस समुदाय के लोगों ने बड़े पैमाने पर शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में पैसा लगाया है। इसमें विज्ञानचेतना भी है। संस्कृतिप्रेम भी है।
     कुछ बुर्जुआ परिवार ऐसे भी हैं जिन्होंने साहित्य,कला,संस्कृति,प्रेस आदि में पूंजी निवेश किया है। इस तरह के निवेश के जरिए एक तरफ कला आकांक्षाओं की पूर्ति हुई है । सांस्कृतिक इमेज बनी है। लेकिन समग्रता में देखें तो हिन्दीबुर्जुआ ने हिन्दीभाषी राज्यों में संस्कृति,सांस्कृतिक धरोहरों, सांस्कृतिक रूपों,संगीत आदि के विकास पर कोई खास ध्यान नहीं दिया। हिन्दीबुर्जुआ ने शिक्षा में विज्ञान, प्रबंधन, इंजीनियरिंग आदि क्षेत्रों में व्यापक पैमाने पर पैसा खर्च किया है। लेकिन समाजविज्ञान ,भाषाओं की उच्चशिक्षा और शोध पर कोई खास ध्यान नहीं दिया। हिन्दीभाषी इलाकों में दो विश्वविद्यालय है ,एक है वनस्थली विद्यापीठ और दूसरा है सागर विश्वविद्यालय । ये दो विश्वविद्यालय हिन्दीभाषी बुर्जुआजी ने स्थापित किए थे। इसके अलावा विभिन्न राज्यों में अनेक कॉलेज हैं जो हिन्दीबुर्जुआ की मदद से चलते हैं। साहित्य में ज्ञानपीठ और भारतीय भाषा परिषद की साहित्य के आयोजनों में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन साहित्य,कला,संस्कृति के संरक्षण,अनुसंधान आदि के बुनियादी कार्यों में आज भी हिन्दीभाषी बुर्जुआवर्ग की कोई दिलचस्पी नहीं है।
    हिन्दी बुर्जुआवर्ग की आरंभ से ही प्रेस में दिलचस्पी थी और हिन्दी का शक्तिशाली प्रेस और कालान्तर में टीवी मीडिया बनाने में उसने गहरी दिलचस्पी ली । हिन्दी प्रेस के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समाचार समूहों का उसने निर्माण किया। इसमें तेजी से तरक्की की । हिन्दीप्रेस में सक्रिय हिन्दीबुर्जुआ ने ओपिनियन मेकर का काम किया है। उसने लोकतांत्रिक आंदोलन के साथ विभिन्न समयों पर गहरा संबंध भी बनाया है।
     हिन्दीप्रेस की ताकतवर इमेज ने हिन्दी को शक्तिशाली बनाया है। जनप्रिय बनाया है। हाल के बीस सालों में हिन्दीप्रेस में पेशेवरशैली का तेजी से विकास हुआ है। जो मीडिया घराने बहुभाषी प्रेस चलाते हैं वहां पर एक हिन्दीप्रेस के प्रति भेदभाव दिखता है। एक्सप्रेस ग्रुप से लेकर टाइम्स ग्रुप तक इस भेदभाव को साफ देखा जा सकता है। लेकिन  हिन्दीबुर्जुआ का जो वर्ग सिर्फ हिन्दीप्रेस चला रहा है उसने अभूतपूर्व विकास किया है। हिन्दीप्रेस की सामग्री,रूपसज्जा से लेकर काम करने वालों की पेशेवर क्षमता में भी गुणात्मक परिवर्तन आया है। यही वजह है आज हिन्दीप्रेस का भारतीय प्रेस में सर्वोच्च स्थान है।
     हिन्दी बुर्जुआ की सफलता का एक और बड़ा क्षेत्र है जहां उसने छोटी पूंजी और आवारा पूंजी के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर हिन्दी सिनेमा उद्योग का निर्माण किया। विगत 10 सालों में देश के बड़े पूंजीपति घरानों और बैंकों ने सिनेमाजगत की ओर रूख किया है। लेकिन इससे पहले सिनेमा उद्योग में बड़े पैमाने पर आवारा पूंजी और मझोले किस्म के हिन्दीभाषी पूंजीपतियों की पूंजी लगी थी और कलाकारों में अधिकांश हिन्दीभाषी मध्यवर्ग और निम्नमध्यवर्ग के कलाकारों,गीतकारों,लेखकों ,संगीतकारों, तकनीशियनों आदि का योगदान रहा है। हाल के नव्य-उदारतावादी दौर में सिनेमा और टीवी उद्योग की ओर हिन्दीबुर्जुआ की स्पीड बढ़ी है। हॉलीवुड का भारत में प्रवाह रोकने में हिन्दीसिनेमा की बड़ी भूमिका रही है। यह एक तरह का हिन्दी बुर्जुआ का सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के खिलाफ प्रतिरोध भी है। 
       उल्लेखनीय है संचार तकनीक के द्वारा निर्मित वातावरण स्वभावत: ग्लोबल-लोकल होता है। दूसरी बात यह कि भारतीय सिनेमा का मूलाधार है वैविध्य और बहुलतावाद। जबकि हॉलीवुड सिनेमा की धुरी है इकसारता। भारतीय सिनेमा में संस्कृति और लोकसंस्कृति के तत्वों का फिल्म के कथानक के निर्माण में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। जबकि हॉलीवुड सिनेमा के कथानक की धुरी है मासकल्चर। हॉलीवुड सिनेमा विश्वव्यापी अमरीकी ग्लोबल कल्चर के प्रचारक-प्रसारक की अग्रणी भूमिका रही है। जबकि भारतीय सिनेमा में पापुलरकल्चर के व्यापक प्रयोग मिलते हैं।
    हिन्दीबुर्जुआ की सांस्कृतिक शक्ति ही है कि हॉलीवुड सिनेमा आज तक हिन्दी के मुंबई फिल्म उद्योग को अपदस्थ नहीं कर पाया है। इसने खिचड़ी फिल्मी संस्कृति का निर्माण किया है। स्वायत्त भारतीय फैंटेसी का व्यापक प्रचार-प्रसार किया है। हिन्दी फिल्मी फैंटेसी के चार प्रमुख क्षेत्र हैं, प्रेम, परिवार -समुदाय, राष्ट्र और गरीब। इसमें भाषायी सहिष्णुता है । इसके कारण यह सहज ही भाषायी -सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण कर जाता है।  
        हिन्दी सिनेमा मूलत: समग्रता में ‘महा- आख्यान’ नहीं बनाता। वह ऐसा कोई कथानक नहीं बनाता जो सब कुछ अपने अंदर समेटे हो। इसमें संस्कृति,इतिहास, व्यक्तित्व,अभिनय और कथानक की इकसार अवस्था नहीं मिलती। इससे राष्ट्रीय विविधता को रुपायित करने और बनाए रखने में मदद मिली है। इस बिखरे फिल्मी संसार में सेतु का काम किया है पापुलरकल्चर ने (मासकल्चर नहीं) । पापुलरकल्चर के सेतु से गुजरने के कारण ही मुम्बईया सिनेमा की ‘फ्रेगमेंटरी ’और संवादमूलक प्रकृति है। यह सांस्कृतिक विमर्शों को पैदा करता है।
    हिन्दी का मूलाधार है आनंद। इसके तीन मुख्य तत्व हैं, ये हैं, संस्कार, गाने और संगीत। ये तीनों ही तत्व मिश्रित संस्कृति का रसायन तैयार करते हैं। मिश्रित संस्कृति का संचार करने के कारण ही हिन्दी की फिल्में किसी भी विकसित और अविकसित पूंजीवादी मुल्क से लेकर समाजवादी देशों तक में कई बार वर्ष की सर्वोच्च 10 या 20 फिल्मों में स्थान बनाती रही हैं। सांस्कृतिक बहुलतावाद की जैसी सेवा हिन्दी सिनेमा ने की है वैसी सेवा हॉलीवुड ने नहीं की है। यही वजह है कि बॉलीवुड का हिन्दी सिनेमा शीतयुद्ध के समय में हॉलीवुड के सामने चट्टान की तरह अड़ा रहा। पूरे शीतयुद्ध के दौरान हॉलीवुड सिनेमा ने दुनिया के अधिकांश देशों के सिनेमा उद्योग को बर्बाद कर दिया। किंतु भारत में उसे पैर जमाने में सफलता नहीं मिली।   
     द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर में भारत का एक बड़ा फिनोमिना है आप्रवासी भारतीय। इसमें विविध किस्म के भारतीय हैं और ये अमेरिका से दक्षिण अफ्रीका,मारीशस से कैरिबियन देशों ,मध्यपूर्व के देशों से लेकर समूचे यूरोप तक फैले हैं। इनमें भारत की जातीय-सांस्कृतिक विविधता साफ नजर आती है। हम यह भी कह सकते है कि भारतीय संस्कृति का इन लोगों के कारण विश्वव्यापी प्रसार हुआ है। यही वह बुनियादी कारक है जिसके कारण हिन्दी फिल्मों में आप्रवासी एशियाई संस्कृति की व्यापक अभिव्यक्ति होती रही है। आप्रवासियों का अपनी संस्कृति से प्रेम ही है जो ‘प्राचीन भारत’ से जोड़े रखता है। इस कार्य में भारत की फैंटेसी,संस्कार,यथार्थ,गाने आदि का व्यापक इस्तेमाल किया जाता है।
    उल्लेखनीय है आप्रवासी भारतीय दोहरे दबाब में हैं,एक तरफ वे अपने काम की जगह पर आए दिन भेदभाव के शिकार होते रहते हैं और दूसरी ओर प्राचीन भारत की उम्मीदें उन्हें घेरे रहती हैं। यही वजह है  आप्रवासी भारतीय भारत  में बनी फिल्में खूब देखते हैं, यह काम वे आजादी के पहले से कर रहे हैं। हाल के वर्षों में ग्लोबल भारतीय सिनेमा में वितरण, माइग्रेसन और स्थानीयतावाद का प्रवेश हुआ है। भारतीय सिनेमा सांस्कृतिक समूहों को सम्बोधित करता है। वह जिस तरह देश में देखा जाता है वैसे ही विदेश में भी देखा जाता है। देशी-विदेशी दर्शकों को आकर्षित करने में जिस तत्व का सबसे बड़ा रोल है वह है‘भारतीयता’, इस ‘भारतीयता’ का आधार राजनीतिक न होकर सांस्कृतिक है। हिन्दी बुर्जुआ का यह सकारात्मक पक्ष है कि उसने देशज कलारूपों और देशज भाषाओं जैसे मैथिली-भोजपुरी के सिनेमा का व्यापकरूप में विकास किया। इसके अलावा ऑडियो इण्डस्ट्री का भी विकास किया। इसके कारण हिन्दी संस्कृति के संचार और प्रसार को व्यापक आधार मिला।
     




























रविवार, 15 अगस्त 2010

स्वाधीनता का कारपोरेट महाआख्यान


स्वाधीनता दिवस का अर्थ सरकारी उपलब्धियों का जयगान नहीं है। स्वाधीनता दिवस का अर्थ सरकारी नीतियों के दायरे में बांधकर सोचना भी नहीं है। स्वाधीनता का अर्थ यह भी नहीं है कि इस पर किसी नेता,प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति या मीडिया सर्वे करने वाले छुटभैय्ये ज्ञानियों के ज्ञानसागर में डुबकी लगाना। आज के दिन मीडिया में स्वाधीनता दिवस पर तरह -तरह के विचार छपे हैं । स्वाधीनता को व्याख्यायित करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इस कोशिश में आम जनता और उत्पादक शक्तियां कहीं पीछे छूटती नजर आ रही हैं। अब स्वाधीनता के जनाख्यान की जगह कारपोरेट आख्यान ने ले ली है।
     स्वाधीनता का कारपोरेट आख्यान जनता को नियम ,कानून और सरकारी नीतियों के दायरे में बांधने की कोशिश करता है। स्वाधीनता दिवस के बारे में कोई भी बात नियम के दायरे में बांधकर नहीं की जा सकती। स्वाधीनता का दायरा नियम के आधार पर तय नहीं हो सकता। जब भी हम स्वाधीनता की सीमा तय करते हैं तो जाने-अनजाने स्वाधीनता का ह्रास करते हैं।
    स्वाधीनता को नियमों के फ्रेम में देखने का नजरिया शासकवर्गों का है। विगत 63 सालों में हम स्वाधीनता को नियमों के फ्रेमवर्क में रखकर देखने के आदी हो चुके हैं। उसका ही यह परिणाम निकला है कि साधारण आदमी ज्योंही अपने हितों की रक्षा के लिए संघर्ष करने जाता है,हड़ताल करता है,जुलूस निकालता है,आंदोलन करता है ,उसकी आवाज को संविधान और कानून की विभिन्न धाराओं के आधार पर प्रतिबंधित कर दिया जाता है।
      नियमों में बंधी स्वाधीनता अमीरों की सेवा करती है। गरीबों के हितों को सीमित करती है। नियमभंग का अमीरों के  पास अधिकार है। गरीबों को नियमभंग का दण्ड भोगना होता है। यह दैनन्दिन जीवन में मजदूरों और किसानों के संदर्भ में हम आए दिन देखते हैं। देश स्वाधीनता के किस नुक्कड़ पर खड़ा है ? उसे जानने का सबसे सटीक पैमाने उत्पादक शक्तियां हो सकती हैं । स्वाधीनता का मीडियाराग उत्पादक शक्तियों को आधार बनाकर चर्चा नहीं करता। उसके केन्द्र में अनुत्पादक शक्तियां हैं। वह केन्द्र के सवालों या जनता के बुनियादी सवालों पर चर्चा नहीं करता बल्कि गैर-जरूरी सवालों पर चर्चा करता है।
    मसलन् यदि आप यह पूछेंगे कि भारत ने विगत 63 सालों में तरक्की की है या नहीं ? उत्तर होगा हां। कौन कहेगा भारत ने तरक्की नहीं की है। यदि उत्पादक शक्तियों को केन्द्र में रखकर सवाल पूछा जाएगा कि विगत 63 सालों में मजदूर की दैनिक आय या मासिक घटी है बढ़ी है ? तो परिणाम भिन्न होंगे । किसानों की स्थिति में सुधार आया है या गिरावट आयी है ? तो उत्तर नहीं में आएगा। किसान-मजदूर की संपत्ति घटी है या बढ़ी है ? निम्नमध्यवर्ग और मध्यवर्ग की विगत 63 सालों में संपत्ति घटी है बढ़ी है ? आप अपने घर में देख सकते हैं कि विगत 63 सालों में सोना,चांदी,पीतल,जमा धन घटा है या बढ़ा है ? इसके विपरीत कारपोरेट घरानों की संपत्ति घटी है या बढ़ी है ?  आज मध्यवर्ग का कोई नौकरीपेशा व्यक्ति ऐसा नहीं है जिस पर बैंकों का कर्जा न हो। कहने का अर्थ है आम लोगों के जीवन में पामाली बढ़ेगी।  
      आज ‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’ (15 अगस्त 2010) में एक सर्वे छपा है जिसमें कुछ सवाल पूछे गए हैं। यह सर्वे कई तथ्यों की ओर ध्यान खींचता है। पहला संदेश यह देता है कि उत्पादक शक्तियों (मजदूर-किसान) के लिए मीडिया के पास सवाल नहीं होते। जाहिर है जब मजदूर-किसान के लिए सवाल नहीं होंगे तो उसकी राय भी नहीं होगी। यही वजह है कि यह सर्वे दिल्ली,कोलकाता,मुम्बई,बंगलौर और चेन्नई में किया गया। किस वर्ग के लोगों में किया गया इसे सर्वे करने वालों ने नहीं बताया है। यह कहा गया है कि 500 लोगों में आमने-सामने बैठकर बात करके यह सर्वे किया गया है।
      इस सर्वे से दूसरा संदेश यह निकलता है कि स्वाधीनता के असली अर्थ का ह्रास हुआ है। मसलन् सर्वे में पहला सवाल था स्वाधीनता का अर्थ क्या है ? इसमें जिस क्रम और अनुपात में लोगों ने जबाब दिया वह काबिलेगौर है। क्रमशःजबाब था- चुनाव में वोट देने का अधिकार (27 प्रतिशत),स्वच्छंद विचरण का अधिकार (28प्रतिशत), चयन की स्वतंत्रता (17 प्रतिशत),अदालत,सुरक्षाबलों आदि को पाना ( 9 प्रतिशत) ,बुनियादी सुविधाएं ( 15 प्रतिशत), संघर्ष का अधिकार (4 प्रतिशत)।
 इस प्रश्नोत्तर में साफ है कि जिन अधिकारों को सबसे कम लोग चाहते हैं वह है प्रतिवाद का अधिकार। यह उत्तर इस बात का संकेत है कि जिन लोगों में यह सर्वे किया गया है वे खाए-अघाए लोग हैं। वे अधिकारों के प्रति सही नजरिया तक नहीं रखते।
   इस सर्वे में  एक प्रश्न हरियाणा की खाप पंचायत को लेकर है,मजेदार बात यह है कि खाप पंचायतों का ऊपर बताए महानगरों से कोई संबंध नहीं है। यदि यह सवाल किया जाना ही था तो हरियाणा में पूछा जाता तो सटीक राय जानने का मौका मिलता लेकिन खाप पंचायत के बारे में दिल्ली,मुम्बई,चेन्नई,कोलकाता,बंगलौर में किए गए सर्वे का कोई अर्थ नहीं है,इन शहरों के लोगों के लिए खाप पंचायतें अप्रासंगिक हैं।
     इसी तरह समलैंगिक विवाह के बारे में सवाल किया गया है। समलैंगिक विवाह करने वालों की संख्या भारत में नगण्य है। यह सवाल अमेरिका के लिए प्रासंगिक हो सकता है। भारत के लिए नहीं।
      स्वाधीनता की चेतना का किस हद तक विकास हुआ है इसे जानने का सबसे अच्छा आधार हो सकता है प्रतिवाद की स्वतंत्रता का सवाल। संदर्भ था कि क्या व्यवस्था की गडबडि़यों के खिलाफ आवाज उठाना असली स्वतंत्रता है। 45 प्रतिशत मानते हैं हां, 32 प्रतिशत मानते हैं कुछ हद तक,21 प्रतिशत मानते हैं देश की सुरक्षा के लिए, 2 प्रतिशत लोग हैं कि वे नहीं जानते।
    स्वतंत्रता बनाम प्राइवेसी के संदर्भ में पूछा गया राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सरकार को टेलीफोन कॉल ,बैंक एकाउण्ट,ईमेल आदि की छानबीन करने का हक है 53 प्रतिशत ने कहा हां,28 प्रतिशत ने कहा नहीं, 19 प्रतिशत ने कहा कि सिर्फ जिन पर संदेह हो। दिल्ली में 66 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि उनके कॉल मॉनीटर किए जाएं। कोलकाता में 30 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि जिन पर संदेह हो उन पर ही नजरदारी की जाए।
    यही है नए मध्यवर्ग की गुलाम मानसिकता का आदर्श मीडिया नमूना। नया महानगरीय मध्यवर्ग और कारपोरेट लोकतंत्र के पहरूए चाहते हैं कि उन पर निगरानी रखी जाए। इस सर्वे में सबसे मजेदार सवाल था स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने वाली चीज कौन सी है ?  38 प्रतिशत ने कहा सुरक्षाबल,24 प्रतिशत ने कहा पत्रकार,16 प्रतिशत ने कहा जज,11 प्रतिशत ने कहा सिविल सोसायटी, 7 प्रतिशत ने कहा राजनीतिज्ञ, 3 प्रतिशत ने कहा फिल्म निर्माता,अभिनेता,गायक,पेण्टर आदि। 2 प्रतिशत मानते हैं कि बाबू और नौकरशाही से ही स्वतंत्रता की रक्षा की जा सकती है।
     इन लोगों की बुद्धि पर तरस आता है कि इन्हें आम आदमी दिखाई नही दिया, हिन्दुस्तान के मजदूर-किसान दिखाई नहीं दिए। हिन्दुस्तान की सुरक्षा किसी के हाथों में सुरक्षित है तो वह है आम जनता और उत्पादक शक्तियां। आज हम जितनी भी स्वतंत्रता का भोग कर रहे हैं उसे सुरक्षित रखने और समृद्ध करने में आम जनता और उत्पादक शक्तियों की केन्द्रीय भूमिका है। किसान और मजदूर अपना हाथ खींच लें तो सारी स्वतंत्रता धरी रह जाए। सुरक्षाबलों का समूचा ढ़ांचा चरमरा जाए। मध्यवर्ग की कमर टूट जाए।
      संसद ,अदालत,न्यायपालिका,पेशेवर तबका हमारी स्वतंत्रता के बुनियादी संरक्षक नहीं हैं। बुनियादी संरक्षक हैं उत्पादक शक्तियां। खेत-खलिहान से लेकर कल-कारखानों में काम करने वाले लोग। ये लोग देश के लिए संपदा पैदा करते हैं और अपने लिए दरिद्रता और अभाव। हम मीडिया की चकाचौध और बुर्जुआजी के विचारधारात्मक प्रचार अभियान के हंगामे के बीच में आम जनता और उत्पादक शक्तियों को भूल गए हैं।
    शासकवर्गों और उनके सहयोगी वर्गों ने कभी भी स्वतंत्रता की रक्षा नहीं की है उन्होंने स्वतंत्रता का भोग किया है,दुरूपयोग किया है और अपने हितों का विस्तार किया है। शासकवर्गों के लिए स्वतंत्रता वर्चस्व बनाए रखने का औजार मात्र है।
    इसके विपरीत आम जनता के लिए स्वतंत्रता लाइफलाइन या प्राणवायु है। आम जनता और उत्पादक शक्तियों के लिए स्वतंत्रता लग्जरी नहीं है। उन्हें स्वतंत्रता पाने के लिए कुर्बानी देनी पड़ती है। शासकवर्ग और उसके सहयोगी वर्गों को स्वतंत्रता के लिए कम से कम कुर्बानी देनी पड़ती है। ये वर्ग असल में उत्पादक शक्तियों की कुर्बानी के फल खाते हैं और परजीवी की तरह समाज में स्वतंत्रता का उपभोग मात्र करते हैं।
    मध्यवर्ग का एक अच्छा खासा अनुत्पादक समुदाय है जो परजीवी की तरह शासकवर्गों के भोंपू और ढ़ाल का काम करता है। कारपोरेट मीडिया में आने वाले सर्वे और राय देने वाले इसी परजीवी-भोंदूवर्ग से आते हैं। यह समाज से कटा हुआ वर्ग है। यह वर्ग अपने को अहर्निश असुरक्षित महसूस करता है यही वजह है इसे स्वतंत्रता का सबसे बड़ा संरक्षक सुरक्षाबल ही नजर आते हैं,क्योंकि आम जनता की शक्ति और आस्थाओं के सामने यह अपने को बौना महसूस करता है,फलतः आम जनता को यह स्वतंत्रता का संरक्षक नहीं मानता। यही वर्ग स्वाधीनता के कारपोरेट महाख्यान का सर्जक है।
 




मंगलवार, 11 मई 2010

कारपोरेट मीडिया का तालिबानी फ्लो

    प्यार के फलसफे़ ने बड़े -बड़े लोगों का भूत उतार दिया है। मीडिया से लेकर से पंचायतें तक सभी प्यार की मार से बेहाल हैं। आए दिन प्यार का नकली राग अलापने वाला कारपोरेट मीडिया भी अपनी औकात पर उतर आया है और सच्ची और आंखों देखी खबरें दिखाने वाले मीडिया के रणबांकुरे युवा पत्रकार खुलकर प्यार की तौहीन करने में लगे हैं। राजदीप सरदेसाई,अर्णव गोस्वामी,बरखा दत्त से लेकर सभी एंकर और समाचार संपादक मीडिया के तालिबानी भाव में खुलकर खेल रहे हैं।
       खासकर कारपोरेट मीडिया ने निरुपमा हत्याकांड के मामले पर जिस तरह यूटर्न लिया है और प्रेमी को ही कातिल बनाया है उससे एक बात साफ है कि कारपोरेट मीडिया में प्यार के लिए कोई जगह नहीं है।
     एक तरफ हरियाणा की बदनाम और दागी जाति पंचायतों के आपराधिक कारनामों को कारपोरेट मीडिया महिमामंडित कर रहा है। दूसरी ओर प्यार विरोधियों को व्यापक कवरेज दे रहा है। एनडीटीवी से लेकर सीएनएन तक सभी जगह प्यार विरोधी शैतानों को विचारों की संतुलित प्रस्तुति और सभी पक्षों की राय पेश करने के नाम पर मीडिया कवरेज का तालिबानी फ्लो बना हुआ है।  
     सवाल यह है कि एक ही टॉक शो में प्यार के दुश्मन और दोस्त एक ही साथ कैसे बैठ सकते हैं। उत्पीड़क और उत्पीडि़त एक ही समान धरातल पर कैसे रखे जा सकते हैं ? शैतान को इंसान के बराबर कैसे रखा जा सकता ? यह विचारों के प्रति समानता नहीं है बल्कि विचारों के प्रति असमानता की अभिव्यक्ति है। शैतान का महिमामंडन है। यह मीडिया का तालिबानी भावबोध है।
    इस तरह की प्रस्तुतियों में शैतान और इंसान को वस्तुगत प्रस्तुति के नाम पर समान दर्जा दिया जा रहा है। जिन लोगों को शैतानी विचारों के सार्वजनिक प्रसारण के लिए जेल में होना चाहिए,वे खुश हैं और सनसनाते घूम रहे हैं कि चलो चैनल पर बोल आए और अब देखते हैं हमारा कोई क्या बिगाड़ लेता है। ऐसे लोग अपने इलाकों में तालिबानी फरमान जारी करने,सामूहिक तौर पर मानवाधिकारों का हनन करने में  अग्रणी भूमिका निभाते हैं। अपने शैतानी विचारों को यह कहकर प्रचारित करते हैं कि हम जो कह रहे हैं वह बात मीडिया में भी बोल चुके हैं,हमारे विचार सही हैं यही वजह है हमारे थिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है।  
   मीडिया और जीवन में शैतान और इंसान को एक साथ बिठाने का अर्थ है मनुष्य का अपमान,मनुष्य को छोटा बनाना और शैतान को महान बनाना। इस प्रवृत्ति के कारण ही सभी रंगत के नेता और कारपोरेट मीडिया, प्यार को दण्डित करने के मामले में एकजुट हो गया है।
      कारपोरेट मीडिया में प्यार के आख्यान को देखकर हम नकली आनंद में जीते हैं। मीडिया के छोटे-बड़े पर्दे पर प्यार अपील करता है और यही नकली प्यार जब बार-बार मीडिया के विभिन्न रुपों के जरिए दोहराया जाता है तो अपना विलोम पैदा करता है। प्यार के प्रति नफ़रत पैदा करता है। प्यार का मीडिया में रुपायन सामाजिक जीवन में प्यार के प्रति विपरीत वातावरण बनाता है। स्त्री पर हमले तेज हो जाते हैं। औरतों की सामाजिक असुरक्षा बढ़ जाती है।  
    निरुपमा की हत्या में कौन शामिल है यह तहकीकात करना मीडिया का नहीं पुलिस का काम है और मीडिया ने इस मामले में जिस तरह अमानवीय भूमिका निभायी है उससे फिर से यह बात सिद्ध हुई है कि कारपोरेट मीडिया की मानवीय मूल्यों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है।
    निरुपमा प्रकरण से लेकर पंचायतों के बर्बर कारनामों तक मीडिया कवरेज के जरिए एक ही संदेश दिया जा रहा है कि प्यार बुरी चीज है,प्यार में झंझट है.झगड़ा है, हत्या है,पुलिस है,कानून है,लोकनिंदा है, जान को खतरा है,प्यार करो तो डरो। प्यार को समाज और कानून पसंद नहीं करता ,प्यार करने वालों से परहेज करो। प्यार से दूर रहो।
   कारपोरेट मीडिया का समूचा रवैय्या इस तर्क से संचालित है हम सही तुम गलत। इस चक्कर में कारपोरेट मीडिया उस जगह खड़ा होता है जहां उसे नहीं होना चाहिए। कारपोरट मीडिया की प्रेम के प्रसंग में ,न्याय के प्रसंग में,भ्रष्टाचार के प्रसंग में,अपराधियों के प्रसंग में ,सत्य की खोज के प्रसंग में हमेशा गलत के साथ दोस्ती रही है। गलत,असत्य और अमानवीय का चित्रण करने के लिए कारपोरेट मीडिया तरह-तरह की पद्धतियों का इस्तेमाल करता है।    





बुधवार, 17 मार्च 2010

संस्कृति उद्योग के विचारधारात्मक खेल



    विश्व विख्यात कला इतिहासकार अर्नाल्ड  हाउजर ने लिखा कि ''मनोरंजन उद्योग के ध्वजवाहक स्वभावतया केवल पैसा कमाना चाहते हैं और इसके लिए यदि वे अच्छी कला के मुकाबले बुरी कला को चुनते हैं तो सबसे पहले इसलिए कि बुरी कला का उत्पादन और विक्रय आसान है।’’
    ‘‘कहने का मतलब यह नहीं कि वे वैचारिक संघर्ष में भाग नहीं लेते। हम जानते हैं कि विचारधाराएं मंतव्य या चेतना के परे काम करती हैं और किसी षडयंत्र या निश्चित योजना या अभियान के बगैर भी वे सक्रिय रह सकती हैं। लेकिन बेस्ट-सेलर किताबों के प्रकाशक और हालीवुड के फिल्म-निर्माता किसी भी तरह अपनी वर्ग विचारधारा के सबसे निष्ठावान अनुचर नहीं होते;उन पर यही आरोप लगाना बुद्धिमत्तापूर्ण होगा कि वे जितने हठी कल्पनाजीवी होते हैं उसके मुकाबले उनमें विश्वास की कमी होती है। ’’
   ‘‘वे प्रत्येक व्यक्ति को सम्बोधित करते हैं,सबको संतुष्ट करना चाहते हैं ,और किसी की भावनाओं को चोट नहीं पहुँचाते ; उन्हें अपने ग्राहक जो बनाए रखने हैं।इसलिए जिन विचारधारात्मक सिध्दान्तों को वे जानते हैं वे सकारात्मक होने की बजाए नकारात्मक किस्म के होते हैं;महत्वपूर्ण चीज यह है कि कुछ विषयों को उठाया न जाए या छुआ भी न जाए।ये विषय हैं-स्वस्थ सेक्स संबंध,वर्गसंघर्ष या मजदूर आंदोलन, मौजूदा समाज व्यवस्था या अधिकारियों के विरूद्ध कोई भी आलोचना,धार्मिक संदेह या फिर चर्च का विरोध।इन विषयों को बचा ले जाना मौजूदा परिस्थितियों को इंगित करता है,लेकिन जो सकारात्मक प्रचार है उसका मतलब,सामान्यत: कहें तो ,कुछ-कुछ हिचकिचाहट के साथ यह आश्वसन है कि तमाम संभव दुनियाओं में यह दुनिया सर्वोत्तम है।''
हाउजर ने लिखा है कि ''निस्संदेह अकसर किया गया यह दावा सारत: सही है कि मनोरंजन उद्योग द्वारा परोसे गए मास सांस्कृतिक उत्पाद लोगों की सांस्कृतिक जरूरतों को संतुष्ट करने के लिए नहीं,उसका दोहन करने के लिए होते हैं ; यह भी कोई कम सही बात नहीं है कि इन उत्पादों की खराब गुणवत्ता एक ऐतिहासिक संयोग-संस्कृति के जनतांत्रिकीकरण और प्रतिद्वंद्वितामूलक पूंजीवाद के संयोग का परिणाम है।’’
   ‘‘बहरहाल ,कुछ लोगों ने इस संकटपूर्ण स्थिति से यह निष्कर्ष निकालना उचित समझा है कि ' यदि संस्कृति को फिर से स्वास्थ्य लाभ करना है तो हमें या तो शोषण या फिर जनतंत्र में से किसी एक को खत्म करना होगा।यह निष्कर्ष ठीक नहीं है। सांस्कृतिक अभिजन अभिजन और बाकी समाज में तनाव कोई आज की या कल की परिघटना नहीं है;लोकप्रिय कला में हमेशा ही उच्च कलात्मक संस्कृति के प्रति एक खास विरोध रहा है।यह आशा करना शुद्ध काल्पनिक स्वप्न होगा कि यह तनाव अचानक खत्म हो जाएगा और ऐसी सामुदायिक कला का जन्म होगा जो सबके लिए रूचिकर और संतोषप्रद होगी।’’
   ‘‘लोकप्रिय कला के मानोन्नय के रास्ते और साधन हैं,तथा इस दिशा में प्रगति के लिए निश्चय ही झकझोर देने वाले आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों की जरूरत पड़ेगी,लेकिन इसके लिए पूंजीवाद और जनतंत्र मे से किसी एक नाश अनिवार्य नहीं है।वर्गों के बीच की दीवार और प्राकृतिक चुनाव के रास्ते में आने वाली बाहरी बाधाओं को उखाड़ फेंकने से ही इस समस्या का अपने आप सुलझ जाना मुश्किल है।यह आशा तो पूरी नहीं हुई कि संस्कृति के दरवाजों को जनता के लिए खोल देने से नई प्रतिभाओं की बाढ़ आ जाएगी,और न ही इसके पूरा होने के कोई आसार हैं,कम से कम उस तरह तो नहीं जिस तरह पहले सोचा गया था।प्रतिभाशाली लोग संस्कृति के खुले हुए दरवाजों से चलकर अपे आप नहीं आ पहुँचते'अच्छी रूचि,,कला में बुरे से अच्छे को अलगाने और अच्छे का सचेत रूप से चुनाव करने की ताकत ऐसी चीज नहीं है जिसे लोगों ,जनसमूह,सर्वहरा या जो भी आप कहें उसकी स्वर्त:स्फूत्त अनुभूतियों,'अप्रदूषित' स्वस्थ वृत्तियों के भरोसे छोड़ा जा सके।अच्छी रूचि सौन्दर्यात्मक संस्कृति का मूल नहीं,उसका फल होती है।''
मीडिया मालिकों के तर्कों को अस्वीकार करते हुए आर्नल्ड हाउजर ने लिखा कि ''लोकप्रिय कला की वर्तमान हालत के लिए यह कहकर जिम्मेदारी छुड़ा लेना उचित नहीं है कि जनता जो चाहती है वह पाती है।जनरूचि प्राथमिक आधार नहीं है ;यह जो है वह बनी है। केवल जनता ही यह निर्णय नहीं करती कि वह क्या चाहती है ;उसका चाहना अंशत: इस बात से निर्धारित होता है कि उसे दिया क्या जा रहा है।‘‘
’’यह प्रक्रिया एक वृत्त के समान है।लेकिन इसे तोड़ा जा सकता है।बहरहाल,इसे तोड़ने के लिए समय और पैसे की जरूरत पड़ती है,और यह सबको पता है कि प्रकाशक और फिल्म निर्माता परोपकारी जीव नहीं होते।जैसे व्यवसायियों का स्वभाव है,ये लोग कोई खास उद्यमी नहीं होते;केवल इस आश्वासन के भरोसे कि जनता की शिक्षा दूरगामी दृष्टि से फायदेमंद होगी, वे अपने सुरक्षित बाजार को गड़बड़ा देने का खतरा न उठाएंगे।''
   
               




रविवार, 22 नवंबर 2009

कारपोरेट मीडि‍या और गुलामचेतना

       
हाल ही में मुम्‍बई में शि‍वसैनि‍कों ने सीएनएन / आईबीएन के कार्यालय में अंदर जाकर जमकर बबाल मचाया,तोड़फोड़ की और मीडि‍या में इसके खि‍लाफ जमकर प्रति‍वाद भी दि‍खाई दि‍या। कुछ उत्‍पाती सैनि‍कों की गि‍रफ्तारी भी हुई। जि‍स दि‍न यह घटना हुई उसके दो दि‍न या तीन पहले 'आईबीएन 7'  और 'सीएनबीसी 18'   ने अपने यहां काम करने वाले 150 मीडि‍याकर्मियों ‍को नौकरी से अचानक नि‍काल दि‍या। यह खबर मुख्‍यधारा के मीडि‍या में गायब है। इतनी बड़ी तादाद में पत्रकारों को नि‍काला जाना साधारण घटना नहीं है, लेकि‍न प्रेस ने इसे सुर्खी नहीं बनाया। चैनलों ने इस खबर को प्रसारि‍त नहीं कि‍या। यह कारपोरेट मीडि‍या के दो चेहरे हैं।
    कारपोरेट मीडि‍या अपने ऊपर हुए हमले को महत्‍व देता है,उसे जनतंत्र पर हमला करार देता है और जब यही कारपोरेट मीडि‍या अपने यहां जनतांत्रि‍क हमले करता है तो उसकी कहीं पर कोई खबर तक नहीं बनती। आखि‍र हम कि‍स तरह के मीडि‍‍यायुग में जी रहे हैं ? क्‍या यही लोकतंत्र है ? हमें ऐसे लोकतंत्र पर शर्म आती है जि‍समें लोकतंत्र के पहरूए जब कत्‍ल कि‍ए जा रहे हों तो कोई भी नहीं बोलता। संसद नहीं बोलती । न्‍यायपालि‍का नहीं बोलती। साधारण सी अखबार की खबर पर सक्रि‍य होने वाले हमारे स्‍वतंत्र न्‍यायाधीश इस तरह की खबरों पर सक्रि‍य  नहीं होते । ब्रॉडकास्‍टिंग का नि‍यमन करने वाली संस्‍था  नहीं बोलती। जो लोग आए दि‍न मानवाधि‍कार हनन का हंगामा करते हैं ,वे स्‍वयंसेवी संगठन और उनके हि‍मायती वरि‍ष्‍ठ मानवाधि‍कार संरक्षक वकील,बुद्धि‍जीवी आदि‍ सक्रि‍य होकर हस्‍तेक्षेप नहीं करते ।
     एक जमाना था जब  कि‍सी पत्रकार को अगर मालि‍क ने नौकरी से वेवजह नि‍काल दि‍या तो प्रेस में हंगामा खड़ा हो जाता था, लेकि‍न अब  एक मीडि‍या ग्रुप ने सैंकड़ों पत्रकारों को एक ही झटके में अकारण नौकरी से नि‍काल दि‍या और उसकी खबर तक प्रकाशि‍त नहीं हुई है। सारा कारपोरेट मीडि‍या एक शब्‍द भी नहीं बोल रहा। यह मीडि‍याचेतना के क्षय का संकेत है। आखि‍रकार लोकतंत्र के पहरूए मानवाधि‍कार संगठनों की क्‍या कोई जि‍म्‍मेदारी है कि‍ नहीं , मीडि‍या की स्‍वाधीनता को बनाए रखने में न्‍यायपालि‍का और लोकतांत्रि‍क सरकार की कोई जि‍म्‍मेदारी बनती है या नहीं ? यदि‍ बनती है तो मानवाधि‍कार संगठनों को आगे आकर इस मसले को अपने हाथ में लेना चाहि‍ए। मानवाधि‍कारों के परि‍प्रेक्ष्‍य में मीडि‍याकर्मियों के कामकाज,अधि‍कार,दायि‍त्‍व ,नौकरी की शर्तों आदि‍ के बारे में कानून बनवाने की दि‍शा में पहल करनी चाहि‍ए।  इसके लि‍ए चौतरफा दबाव पैदा करना चाहि‍ए।
     हमें ध्‍यान रखना होगा कि‍ कारपोरेट मीडि‍या में काम करने वाले बुनि‍यादी तौर पर गुलामों से भी बदतर कंडीशन और भ्‍यानक असुरक्षा में काम करते हैं। हो सकता है कुछ कारपोरेट मीडि‍या ग्रुप अच्‍छी पगार देते हों,लेकि‍न इन लोगों को वे कि‍सी भी कि‍स्‍म का अधि‍कार नहीं देते। मानवाधि‍कार संगठनों को अपने आदि‍वासी,दलि‍त,कि‍सान एजेण्‍डे के बाहर आकर थोड़ा कारपोरेट मीडि‍या के मोर्चे पर चल रही गुलामप्रथा के खि‍लाफ आवाज बुलंद करनी चाहि‍ए।
     दुनि‍या के वि‍कसि‍त पूंजीवादी मुल्‍कों में कहीं पर कारपोरेट इलैक्‍ट्रोनि‍क मीडि‍या इस तरह का दुर्व्‍यवहार नहीं करता जैसा भारत में हो रहा है। हमें सवाल करना चाहि‍ए क्‍या सीएनएन के लोग अमेरि‍का में अपने कर्मचारि‍यों के साथ इस तरह का बुरा व्‍यवहार कर सकते हैं ? वे यदि‍ भूल से कि‍सी के साथ दुर्व्‍यवहार कर बैठें या नौकरी से नि‍काल दें उसे व्‍यापक कवरेज मि‍लता है, चारों ओर प्रति‍वाद भी होता है।
    भारत में सीएनएन की सहजि‍या संस्‍था अपने ही कर्मचारि‍यों के साथ नि‍रंकुश व्‍यवहार कर रही है और उसने 150 कर्मचारि‍यों को नौकरी से नि‍काल दि‍या वह भी तब जब मंदी का दौर खत्‍म हो गया है। मंदी के दौर में यह घटना घटी होती तो कोई कुछ नहीं बोलता लेकि‍न अब तो मीडि‍या की बल्‍ले बल्‍ले हो रही है। ऐसे में 150 लोगों को नौकरी से नि‍कालना समूचे कारपोरेट मीडि‍या की लोकतांत्रि‍क इमेज पर काला धब्‍बा है।
       शि‍वसेना के सैनि‍कों ने जो तोड़फोड़ की उसका समय बड़ा ही महत्‍वपूर्ण है ,जब 150 कर्मचारी सीएनएन आईबीएन से नि‍काले गए उसके तत्‍काल बाद ही यह तोड़फोड़ हुई है जि‍ससे कर्मचारि‍यों को नि‍काले जाने वाली घटना पर कोई ध्‍यान ही न दे। इसे कहते हैं कारपोरेट मीडि‍या और लुंपन राजनीति‍ की जुगलबंदी।
     कौन नहीं जानता कारपोरेट घराने शि‍वसेना के 'सामना' अखबार को सबसे ज्‍यादा वि‍ज्ञापन देकर आर्थिक मदद देते रहे हैं। 'सामना' समूह कारपोरेट घरानों से सबसे ज्‍यादा वि‍ज्ञापन उठाने वाला अखबार है। शि‍वसैनि‍कों की फंडिंग का सबसे बड़ा स्रोत हैं कारपोरेट घराने। यह अचानक नहीं है कि‍ आईबीएन 7 पर हमले का समय वही चुना गया जि‍स समय कर्मचारि‍यों को नौकरी से नि‍काला गया।
    धन्‍य हैं वागले साहब ,राजदीप सरदेसाई ,संजय पुंगलि‍या जि‍नकी  लोकतांत्रि‍क छवि‍ को भारत के पत्रकार गुलाम पत्रकार के रूप में याद करेंगे। सवाल कि‍या जाना चाहि‍ए कि‍ राजदीप सरदेसाई जैसे इलैक्‍ट्रोनि‍क मीडि‍या के तथाकथि‍त कर्ता मीडि‍याकर्मियों ,खासकर चैनलकर्मि‍यों पर होने वाले हमले के समय हमेशा चुप क्‍यों रहते हैं । कोई भी जनप्रि‍य चैनल, यहां तक कि‍ डीडी 1 भी इस मामले पर चुप है।
    राजनीति‍क दलों और ट्रेडयूनि‍यनों का हाल यह है कि‍ वे तो मीडि‍याकर्मियों के प्रति‍ कोई सहानुभूति‍ नहीं रखते उलटे यही सोचते हैं कि‍ मीडि‍याकर्मी तो सत्‍ता के दलाल हैं। वे कभी मीडि‍याकर्मियों को कर्मी के रूप में नहीं देखते। यही वजह है कि‍ प्रत्‍येक राजनीति‍क दल इस मसले पर चुप्‍पी लगाए बैठा है। ऐसा नहीं है कि‍ यह पहलीबार हुआ है कि‍ कि‍सी चैनल ने अपने यहां काम करने वालों को नौकरी से नि‍काला है । पहले भी मीडि‍या में काम करने वाले अकारण नौकरी से नि‍काले गए हैं।
       हमारे लोकतंत्र के रखवाले राजनीति‍क दल मूकदर्शक की तरह तमाशा देखते रहते हैं। यह इन दलों में व्‍याप्‍त माध्‍यम नि‍रक्षरता का संकेत है। राजनीति‍क दल मीडि‍या खरीदना जानते हैं। मीडि‍या की‍ प्रौपेगैण्‍डा क्षमता भी जानते हैं। उसका कैसे दुरूपयोग कि‍या जाए यह भी जानते हैं लेकि‍न यह नहीं जानते अथवा जानबूझकर अनजान बने रहते हैं कि‍ आखि‍र मीडि‍या लोकतंत्र की बुनि‍याद है। मीडि‍या के भी नि‍यम,कायदे कानून होने चाहि‍ए, कारपोरेट मीडि‍या के भी कायदे कानून होने चाहि‍ए। कारपोरेट मीडि‍या में लोग असुरक्षा में काम कर रहे हैं । असुरक्षि‍त और अनिश्‍चि‍त वातावरण में काम कर रहे हैं। इन सबसे हमारे राजनीति‍क दलों और तथाकथि‍त बौद्धि‍क समुदाय को कोई लेना देना नहीं है। उनके जेहन में यह धारणा बैठी हुई है कि‍ मीडि‍या में काम करने वाला बड़ा आदमी होता है, मोटी तनख्‍बाह पाता है, बड़ा आदमी है,सत्‍ता का आदमी है बगैरह बगैरह। वे यह मानकर ही नहीं चलते कि‍ वह मीडि‍याकर्मी है और एक कर्मचारी की तरह उसे भी अपनी सुरक्षा के लि‍ए तयशुदा नि‍यमों और व्‍यवस्‍था की जरूरत है, यह ऐसी व्‍यवस्‍था हो जो सम्‍मानजनक हो, मानवाधि‍कार के परि‍प्रेक्ष्‍य में परि‍भाषि‍त की गई हो।
     दूसरी ओर मीडि‍याकर्मियों को मीडि‍या के नशे में नहीं मीडि‍याचेतना में रहना होगा। मीडि‍याचेतना अर्जित करनी होती है, यह मीडि‍या में काम करने मात्र से स्‍वत: पैदा नहीं होती। अपने पेशे, कामकाज के कानून, नि‍यम,सामाजि‍क जि‍म्‍मेदारी और एकजुट संगठन की चेतना और साझेपन की भावना की मि‍ट्टी से तैयार होती है।  कोई भी मीडि‍याकर्मी चाहे जि‍तने बड़े ओहदे पर हो वह ओहदे और मीडि‍या के अहंकार में रहेगा तो आफत,वि‍पत में कोई उनकी मदद करने नहीं आएगा। मीडि‍याकर्मी का गरूर उसका सबसे बड़ा शत्रु है।
    मीडि‍या गरूर या छद्मचेतना तब ही पैदा होती है जब माध्‍यम साक्षरता का अभाव होता है। आप मीडि‍या में काम कर रहे हैं इसका यह अर्थ नहीं है कि‍ आप मीडि‍याचेतना सम्‍पन्‍न भी हैं। हमारे अधि‍कांश मीडियाकर्मियों‍ का मीडि‍याचेतना संपन्‍न होना अभी बाकी है। मीडि‍याचेतना सम्‍पन्‍नता का ही अभाव है कि‍ उन्‍हें अपने अधि‍कार,अस्‍मि‍ता,दायि‍त्‍व आदि‍ का बोध वहीं तक है जहां तक मालि‍क सोचने की अनुमति‍ देता है। इसके आगे जाकर वे कभी सोच ही नहीं पाते। यह दोस्‍तो गुलामचेतना है। स्‍वाधीनचेतना नहीं है।
     







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