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शुक्रवार, 25 मार्च 2011

विकीलीक और राजनयिकों का साइबर रोजनामचा


       मजेदार बात है हमारी संसद अपने दोस्त राष्ट्र अमेरिका के राजनयिकों के केबलों पर संसद का बेशकीमती समय बर्बाद कर रही है। हम हर मामले में अमेरिका की नकल करते हैं लेकिन केबल के मामले में हमने अमेरिकी सीनेट की नकल नहीं की , हाँ, अमेरिका के शासकों की नकल करते हुए उसके बारे में मूल्यनिर्णय किया,फतबेबाजी की, यहां तक कि एक मंत्री ने तो विकीलीक को साइबर आतंकवाद तक कह डाला। उल्लेखनीय है अमेरिका में भी कई नेताओं ने जिनमें वहां के उपराष्ट्रपति भी शामिल हैं, उन्होंने जूलियन असांचे को साइबर आतंकवादी और देशद्रोही तक कहा था। उन जनाब की नकल करते हुए भारत की संसद में कांग्रेस के एकमंत्री ने विकीलीक को साइबर आतंकवाद कहा है। प्रधानमंत्री ने विकीलीक से एकदम पल्ला झाड़ लिया है। कांग्रेस और उनके सिपहसालार मंत्रियों-वकीलों को विकीलीक में कोई भी सारवान सत्य और तथ्य नजर नहीं आया। यह बात दीगर है कि वे अपनी रक्षा के सभी सूत्र और भाजपा पर हमले करने के सभी औजार विकीलीक के केबलों से ही जुटाकर बोल रहे हैं।
    विकीलीक के भारत संबंधी या अन्य केबलों के बारे में यह कहा जा सकता है कि ये सत्य केबल हैं। इनमें व्यक्त की गई राय भी संबंधित व्यक्ति या राजदूत या राजनयिक की है। ये वैध केबल हैं। लेकिन ये राजनयिकों के केबल हैं। इन्हें राजनयिक साइबर रोजनामचे के रूप में देखा जाना चाहिए। ये न तो नीति हैं,न प्रमाण हैं, और न ये आतंकी संदेश हैं और न इनका प्रसारण या प्रकाशन साइबर आतंकवाद है। ये तो मात्र अमेरिकी राजनयिकों का साइबर रोजनामचा है। ये मात्र साइबर कम्युनिकेशन हैं। राजनयिक जैसा देख-सुन रहे हैं उसकी दैनन्दिन हू-ब-हू रिपोर्टिंग अपने विदेश विभाग को कर रहे है। इसमें राजनयिकों की अपनी राय कम और अन्य घटनाओं के बारे में उनके द्वारा एकत्रित की गई सूचनाएं,जानकारियां और विश्लेषण हैं।
   विकीलीक वास्तव अर्थ में गुप्त राजनयिक कम्युनिकेशन का उदघाटन है। लेकिन अमेरिकी सिस्टम में यह सहज,सामान्य और वैध प्रक्रिया है औऱ विकीलीक के अधिकांश केबल जूलियन असांजे ने वैध तरीकों से हासिल किए हैं। अमेरिका एक अवधि के बाद गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए जाते हैं ,उन्हें कोई भी व्यक्ति हासिल कर सकता है। इनमें कुछ हैं जो अवैध स्रोतों से हासिल किए हैं। भारत में गोपनीय दस्तावेज सरकार कभी सार्वजनिक नहीं करती ,वे उन्हें जनता को देने की बजाय,लाइब्रेरी को सौंपने की बजाय दीमकों के हवाले करना,आग के हवाले करना पसंद करते हैं।
       अमेरिकी राजनयिक कैसे सूचनाएं एकत्रित करते हैं और वे इन सूचनाओं का क्या करते हैं, क्यों करते हैं आदि चीजों के अलावा राजनयिक की आंखें और मन किन चीजों में उलझा रहता है,इन सबका आईना है विकीलीक केबल। इन लीक में सनसनीखेज कुछ भी नहीं है। आम लोगों को सनसनीखेज इसलिए लग सकता है क्योंकि आम लोग विदेशनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखते।आम लोगों की बात छोड़ दें, हमारा राष्ट्रीय मीडिया भी विदेश नीति में खास रूचि नहीं लेता। हमें पता करना चाहिए कि कितने ऐसे अखबार या मीडिया समूह या घराने हैं जिनके दुनिया के सभी बड़े देशों और घटनास्थलों पर नियमित संवाददाता काम कर रहे हैं ? हमें ज्यादातर अखबार विदेशी समाचार एजेंसियों से प्राप्त समाचारों से भरे रहते हैं। विदेश की खबरों को हम भारत की नहीं विदेशी लोगों की आंखों से देखते और पढ़ते रहे हैं। फलतः हमें देशी आंखों से देखा विदेश नहीं विदेशी आंखों से देखा विदेश देखने में सुंदर और लुभावना लगता है। इसीलिए विकीलीक भी अपील कर रहा है।
   हमारे देशी देशभक्त मीडिया में सप्ताह में विदेश नीति पर कितने विवेचनात्मक लेख,खबरें संबंधित पत्रकारों से लिखवाते हैं। सच यह है कि अधिकांश मीडिया घरानों के विदेशों में कोई नियमित संवाददाता नहीं हैं। आमतौर पर वे विदेशनीति के सवालों पर पत्रकारों की बजाय भारत के पूर्व राजनयिकों और सरकारी-अर्द्ध सरकारी थिंकटैंकों में काम करने वाले सरकारी पंडितों से लेख लिखवाते हैं। इन लेखों में अंदर -खाते की पेचीदगियों का जिक्र या रहस्योदघाटन कभी नहीं होता। ऐसी अवस्था में अमेरिकी राजनयिकों की केबलों पर हंगामा और संसद में भीषण चर्चा गले नहीं उतरती, यह संसद का समय बर्बाद करना है। जिन दलों की अमेरिका की राजनीति में रूचि है और अमेरिकी केबलों के आधार जो हंगामा कर रहे हैं ,खासकर भाजपा के सांसद कभी ठंडे दिमाग से सोचें कि वे पार्टी मुखपत्र और संघ परिवार के माध्यमों में विदेश नीति पर कितनी सामग्री नियमित छापते रहे हैं और उसमें भी कितनी रूटिन सामग्री है और कितनी मौलिक,यह भी देखा जाना चाहिए।
    विकीलीक के केबल प्रकाशित करके जूलियन असांजे ने एक बड़ा काम किया है उसने विदेशनीति को विश्वमीडिया का प्रधान एजेण्डा बनाया है। खासकर अमेरिकी विदेश नीति के मूल्यांकन के सवालों को खड़ा कर दिया है। वहीं पर दैनिक हिन्दू ने विकीलीक के केबलों का प्रकाशन करके विदेशनीति की अहमियत की ओर ध्यान खींचा है। उस बड़े सूचना प्रवाह की ओर ध्यान खींचा है जो अमेरिकी दूतावास से अमेरिका की ओर प्रवाहित हो रहा है और फिर पलटकर भारत की राजनीति और राजनीतिज्ञों को अपने घेरे में ले रहा है।
    कायदे से हिन्दू को उन पत्रकारों-लेखकों-बुद्धिजीवियों आदि को भी एक्सपोज करना चाहिए जो अमेरिका के पैरोल पर हैं और भारत में अमेरिकी प्रचारक के रूप में काम कर रहे हैं,कम से कम भारत के नागरिकों को उन महानुभावों की कलम की पोल से वाकिफ कराया जाना चाहिए।
     भारत के अंदर एक अच्छा-खासा तबका है जो अमेरिका के लिए विदेश नीति के मामलों में भारत में पैरोकारी करता रहा है। लिखने से लेकर नेताओं को पटाने तक का काम करता रहा है। इन लोगों की जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
     काफी अर्सा पहले संभवतः 1981-82 में गिरफ्तार किए डबल-ट्रिपिल जासूस रामस्वरूप के घर से सीबीआई ने एक ट्रक गोपनीय सरकारी दस्तावेज पकड़े थे, ये जनाब बहुत कम पैसे में विदेशी जासूसों और दूतावासों को केन्द्र सरकार की गोपनीय फाइलें मुहैय्या कराने का काम किया करते थे। पता नहीं ये जनाब जेल में हैं बाहर हैं या मर गए ? लेकिन इन जनाब को सीबीआई ने गिरफ्तार किया था। इनके यहाँ से जो एकट्रक गोपनीय दस्तावेज मिले थे उनमें जेएनयू के अनेक लब्धप्रतिष्ठित प्रोफेसरों के नाम भीथे जिनको सीआईए से सीधे पैसा मिलता था और इनमें से कई लोग भारत सरकार के गलियारों में नीति निर्धारकों बन गए। राजदूत की कुर्सियों पर विराजमान हो गए। रामस्वरूप के यहां पाए गए दस्तावेजों में पत्रकारों की भी सूची थी। नेताओं,युवानेताओं की भी सूची मिली थी,जिन्हें सीधे सीआईए से पैसा मिलता था और ये बातें सीआईए के वैध कागजों में पाई गई थीं । मैं उन दिनों जेएनयू में पढ़ता था और वहां की सक्रिय छात्र राजनीति का हिस्सा था। हमने सभी छात्रों के सामने उन चेहरों को बेनकाब भी किया था जो सीआईए के लिए काम करते थे। इस बात को रखने का मकसद यह है कि अमेरिका की हमारे देश की राजनीति में आज ही दिलचस्पी नहीं पैदा हुई,यह दिलचस्पी आरंभ से है।शीतयुद्ध के जमाने में तो और भी गहरी दिलचस्पी थी। चूंकि विकीलीक ने 1960 के बाद के अमेरिका के अधिकांश गोपनीय दस्तावेज,केबल आदि हासिल किए हैं अतः कोशिश करके शीतयुद्ध के दौरान और बाद के केबलों को सामने लाया जाना चाहिए। इस तरह के केबलों से वे परतें खुल रही हैं जिन्हें अमेरिकीतंत्र ने हमारे देश में नेताओं,मीडिया और व्यापारियों में बिछा दिया है।
    विकीलीक के केबल अमेरिकी तंत्र की कार्यप्रणाली,खासकर राजनयिकों की दैनंदिन कार्यप्रणाली और विचारधारात्मक मानसिक संरचनाओं को समझने का पुख्ता आधार देते हैं। ये राजनयिक प्रशिक्षणशास्त्र की अनेक नई दिशाओं पर रोशनी डाल रहे हैं। इन केबलों से यह भी पता चल रहा है कि अमेरिकी राजनयिक कूटनीतिज्ञ होने के साथ एक अच्छे जनसंपर्क अधिकारी भी होते हैं। इसलिए वे अमेरिकी विचारों के प्रसारक होते हैं. अन्य को फुसलाने और पटाने की कला में निष्णात होते हैं। 






सोमवार, 21 मार्च 2011

विकीलीक और अमेरिकी गुलामों की नई नस्ल


           कांग्रेस पार्टी और मनमोहन सिंह सरकार के लिए विकीलीक के भारतीय केबल राजनीतिक सिरदर्द बनते जा रहे हैं। इन केबलों का जनता पर कितना असर होगा यह कहना मुश्किल है । क्योंकि आम जनता में विदेश नीति कभी प्रौपेगैण्डा का बड़ा विषय नहीं रही है। यहां तक मासमीडिया में भी विदेश नीति बहुत ही सीमित दायरे में रही है। जो लोग विदेश नीति में दिलचस्पी लेते रहे हैं उनके लिए तो विकीलीक के विदेशनीति संबंधी केबल नवजागरण का काम करेंगे । इसके अलावा राजनीतिक दलों में विदेश नीति को लेकर सतर्कता बढ़ेगी। राजनयिक गलियारों में बातें करते समय भारतीय राजनयिक सतर्कता का पालन करेंगे।
     लेकिन इस सबके अलावा जो चीज सबसे ज्यादा परेशान करने वाली है वह है मनमोहन सरकार में अमेरिकी घुसपैठ। विदेशनीति से लेकर अर्थनीति तक सभी मामलों में अमेरिका की गहरी दिलचस्पी है।यह हस्तक्षेप है। यह हमारी सार्वभौम संप्रभुता का अपमान है। आश्चर्य की बात है कि जो लोग भारत के संविधान और सार्वभौम संप्रभुता की शपथ खाकर सत्ता में बैठे हैं वे ही अमेरिकी गुलामी कर रहे हैं। अमेरिका के इशारों पर नाच रहे हैं।
   विकीलीक केबल बताते हैं कि अमेरिकी प्रशासन हमारे देश की सामान्य से लेकर विशिष्ट सभी किस्म की राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यप्रणाली और नीति निर्धारण को कौशलपूर्ण ढ़ंग से प्रभावित करता रहा है। साथ ही पूरी केबीनेट में अमेरिकापरस्तों को सुचिंतित भाव से बिठाने का पर्दे के पीछे से अमेरिकी खेल चलता रहा है।
   अंग्रेजी दैनिक हिन्दू ने विकीलीक से एक समझौते के तहत केबल हासिल किए हैं। भारत संबंधी केबल की संख्या 5100 है। इनमें से पहले मात्र 40 केबल पहले विभिन्न अखबारों में छपे हैं। बाकी सभी केबलों पर हिन्दू अपने विशेषज्ञ-पत्रकारों के जरिए व्याख्याएं लिखवाकर प्रकाशित कर रहा है।
हिन्दू के संपादक ने विकीलीक केबल हासिल करने की प्रक्रिया पर लिखा, "Hopes of getting our hands on the entire India Cache rose in the second half of December when Julian Assange spoke, in a newspaper interview, of “the incredible potential of the Indian media” in a context of “a lot of corruption” (waiting to be exposed), a rising middle class, and growing access to the internet – and specifically mentioned and praised The Hindu.
To cut the story short, our active contacts with WikiLeaks resumed in mid-February 2011. A breakthrough was achieved without any fuss, resulting in a detailed understanding on the terms and modus of publication, including redacting (where, and only where, necessary) and compliance with a security protocol for protecting and handling the sensitive material – and we had the whole cache of the India Cables in our hands in early March.
Unlike the experience of the five western newspapers, which were involved in a prolonged and complex collaborative venture even while making independent publication choices (described in two books published by The Guardian and The New York Times), The Hindu's receipt, processing, and publication of the cables is a standalone arrangement with WikiLeaks, which, as in the case of the five newspapers, has no say in the content of stories we publish based on the cables."
विकीलीक केबल में जिन अमेरिकी राजनयिकों की टिप्पणियां प्रकाशित हुई हैं वे कई रोचक चीजों पर रोशनी डालती हैं। पहली चीज यह कि अमेरिकी दूतावास भारत की दैनंदिन राजनीति में सीमा से ज्यादा दिलचस्पी ले रहा है। दूसरा ,भारत में किसी भी राजनेता को शासनारूढ़ करने के पहले अमेरिकी नजरिए पर पहले ध्यान दिया जाता है। मसलन किस आदमी को वित्तमंत्री बनाया जाए यह इस बात से तय होगा कि उसका अमेरिका के प्रति अनुकूल नजरिया है या नहीं ? कोई सक्षम है यही बड़ा आधार नहीं है वित्तमंत्री बनने का। बल्कि वित्तमंत्री बनने का मूलाधार है अमेरिका के प्रति उस सांसद की भक्तिभावना। तीसरा ,अमेरिकी राजनयिक अव्वल दर्जे के जनसंपर्क अधिकारी होते हैं और वे जनसंपर्क की कलाओं के जरिए नेताओं-राजनयिकों की राय को बदलने का काम करते हैं। चौथा ,अमेरिकी राजनयिकों को भारत की जमीनी राजनीतिक हकीकत का उतना ही ज्ञान है जितना वे मीडिया में पढ़ते हैं या विशेषज्ञों से सुन लेते हैं। वे अपनी कूटनीतिक चालों के जरिए सर्वज्ञ होने का दावा करते हैं लेकिन वे भारत की जमीनी वास्तविकता को कम से कम जानते हैं।
    मसलन भारत के चुनावों में विदेशनीति और मध्यपूर्व नीति को लेकर कभी न तो वोट पड़े हैं और न जनता ने,खासकर मुसलमानों ने मध्यपू्र्व नीति को ध्यान में रखकर कभी वोट नहीं दिया। अतः मध्यपूर्व नीति के साथ स्थानीय मुसलमानों की नाराजगी को जोड़कर देखने का अमेरिकी राजनयिकों का नजरिया वास्तविकता से कोसों दूर है। असल में अमेरिकी राजनयिक न तो भारत को जानते हैं और न यहां के मुसलमानों को जानते हैं। वे अपने केबलों में अमेरिकी मुस्लिम स्टीरियोटाइप के आधार पर यहां मुसलमानों को देख रहे हैं।  
     भारत में मुसलमानों को जिस तरह सुचिंतित ढ़ंग से हाशिए पर डाला गया है उसने मुसलमानों के सामने अस्तित्व के सवालों को प्रमुख बनाया है । उनके लिए मध्यपूर्व, फिलीस्तीन, मिस्र, ईरान,इराक,अफगानिस्तान में मुसलमानों की दशा-दुर्दशा के सवाल प्रमुख तो छोड़ो हाशिए के सवाल भी नहीं हैं। भारत के मुसलमान 'विश्व के मुसलमानों एक हो' नारे में यकीन रही रखते।
     विकीलीक के भारत संबंधी केबल एक तथ्य को बार-बार सामने ला रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी और मनमोहन सरकार का अमेरिका से गहरा याराना है। अमेरिका के इशारों पर मनमोहन सरकार काम करती रही है। यह मनमोहन सिंह और कांग्रेस के लिए शर्मिंदगी की बात है। साथ ही यह तथ्य भी सामने आया है कि भाजपा को अमेरिकी राजनयिक दोगले स्टैंड वाली पार्टी के रूप में देखते हैं।
 
         
              



शुक्रवार, 18 मार्च 2011

विकीलीक और भारत की पाखंडी राजनीति


       विकीलीक के भारत संबंधी केबलों के अंग्रेजी दैनिक ' हिन्दू' में निरंतर प्रकाशन के बाद से संसद में हंगामा मचा हुआ है। रोज सांसद इस अखबार में छपी बासी केबलों पर उबल रहे हैं,मचल रहे हैं,संसद ठप्प कर रहे हैं,मनमोहन सिंह से इस्तीफा मांग रहे हैं। यह प्रच्छन्न तरीके से आने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का मुँह कैसे काला किया जाए और उसे कैसे नंगा करके जनता में अलग-थलग किया जाए,इस पर भी केबल पत्रकारों की नजर है। खासकर पश्चिम बंगाल,केरल, तमिलनाडु और असम में विधानसभा चुनाव अप्रैल-मई में होने जा रहे हैं।
  विकीलीक के भारतीय केबलों को प्रकाशन के लिए दैनिक 'हिन्दू' ने हासिल करके सुंदर काम किया है। इससे एक तरफ भारतीय राजनीतिक दलों में व्याप्त विचारधारात्मक पतन की परतें खुलेंगी ,लोकतंत्र का खोखलापन सामने आएगा,लोकतंत्र के प्रति संशय बढ़ेगा,राजनीति से किनाराकशी बढ़ेगी और अराजनीतिकरण बढ़ेगा। दूसरी ओर यह भी पता चलेगा कि अमेरिका हमारे देश में कितनी,क्यों और किन विषयों में दिलचस्पी ले रहा है। भारतीय राजनीति के किन नेताओं को अमेरिकी प्रशासन अपने लिए लाड़ला मानता है और कौन हैं जो लाड़ले नहीं हैं। इससे इन नेताओं की इज्जत में बट्टा नहीं लगेगा। वे कभी राजनीतिक तौर पर असुरक्षा के शिकार भी नहीं होंगे। इससे भी बड़ी बात यह है कि भारत की आंतरिक राजनीति में अमेरिकी दूतावास किस तरह काम कर रहा है और क्यों उसकी भारत के आंतरिक मामलों में दिलचस्पी है,यह सब आसानी से सामने आएगा। वैसे अमेरिका भारत में जितनी दिलचस्पी ले रहा है उससे कहीं ज्यादा दिलचस्पी रूस ले रहा है,चीन ले रहा है,वो प्रत्येक देश ले रहा है जिसके हित भारत में दांव पर लगे हैं। भारत भी उनदेशों में दिलचस्पी लेता है जहाँ उसके हित दाँव पर लगे हैं। जरा विकीलीक वाले कोशिश करें कि रूस के भारत में दिलचस्पी के कौन से क्षेत्र हैं,पाक के कौन से क्षेत्र हैं ?
     असल बात यह है कि विकीलीक के केबल सत्य और तथ्य नहीं हैं ये तो अमेरिकी दूतावास में काम करने वाले राजनयिकों की राय हैं,जिन्हें अमेरिकी प्रशासन फीडबैक के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। किसी राजनयिक की राय,भारत के घटनाक्रम पर उसके ब्यौरे और विवरण आदि हमारे देश के लिए किस काम के हैं ? क्या इस तरह के राजनयिक केबलों के जरिए सत्य और तथ्य तक पहुँचा जा सकता है ? मुश्किल यह है कि राय को तथ्य मानकर चला जा रहा है और उसके आधार पर संसद को ठप्प कर दिया गया है। मान लें अमेरिकी राजनयिक जो केबल लिख रहे हैं, सच लिख रहे हैं, लेकिन इस सत्य की पुष्टि कैसे करेंगे ? राय है तो उसके ठोस रूप में पुष्ट भी तो होना चाहिए। हमारे कानूनी ढ़ाँचे और राजनीतिक संरचनाओं में इस तरह के केबल को पुष्ट करने का कोई ठोस ढ़ांचा उपलब्ध नहीं है।
     'हिन्दू' बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित अखबार है। उसके संपादक एन.राम की मीडिया में बड़ी साख है,लेकिन वे एक चीज भूल रहे हैं कि विकीलीक को पुष्ट करने का कोई रास्ता नहीं है। मैं यहाँ बोफोर्स कांड एक्सपोजर की तरफ ध्यान खींचना चाहता हूँ जिसका सबसे ज्यादा खुलासा हिन्दू  अखबार,एन.राम,चित्रा सुब्रह्मण्यम और पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने किया था। 25 सालों तक यह मसला चलता रहा। बोफोर्स कांड के एक्सपोजर के बाद वी पी सिंह  प्रधानमंत्री भी हुए लेकिन वे राजीव गाँधी के खिलाफ सीबीआई को घूसखोरी का कोई प्रमाण नहीं दे पाए। ऐसा कोई प्रमाण स्वयं हिन्दू अखबार ने भी नहीं सौंपा था। हिन्दू अखबार के पास स्विस प्रशासन के जरिए हासिल दस्तावेज थे जिनके आधार पर उसने बोफोर्स कांड को उछाला था लेकिन 250 करोड़ रूपये और 25 साल खर्च करने के बाद भी उसमें यह तय नहीं हो पाया कि घूस किसने ली। स्विस अदालतों से लेकर भारत की अदालतों तक 25 साल में जब हम सिद्ध नहीं कर पाए तो हमें विदेशी स्रोतों पर इतना भरोसा करने की क्या जरूरत है ?
     एक अन्य उदाहरण और लें, क्रिकेट में सट्टेबाजी होती है इसे लेकर 10 साल पहले अमेरिकी प्रशासन ने एक केबल भारत सरकार के पास भेजा था और उस केबल के आधार पर क्रिकेट में सट्टेबाजी पर जमकर हंगामा हुआ और अनेक खिलाडियों का कैरियर बर्बाद हो गया,वह केस अभी भी अदालत में झूल रहा है और 10 साल बाद भी सीबीआई उस केस में चार्जशीट नहीं दे पायी है। केबल स्वयं में प्रमाण नहीं है ,उसे अन्य ठोस आधारों पर पुष्ट किया जाना चाहिए।
     इस पूरे प्रसंग में एक और समस्या है कि विपक्षीदल यह मांग कर रहे हैं कि कांग्रेस सिद्ध करे कि वो सन् 2008 में संसद में विश्वास मत हासिल करने के समय नेक-पाक थी। सब लोग जानते हैं कि कांग्रेस और अन्यदलों का नेक-पाक राजनीति से अब बहुत कम लेना-देना रह गया है। क्लीन राजनीति को कांग्रेस ने बहुत पहले विदा कर दिया था। दूसरी बात यह कि केबल प्रमाण नहीं हैं,यदि इन पर जांच भी होती है तो कुछ भी नहीं निकलेगा और यूपीए -1 की जबाबदेही के लिए नई सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। जिस समय का वाकया हिन्दू ने उछाला है उस समय भी सब जानते थे कि पैसा देकर सांसद खरीदे गए हैं, लेकिन प्रमाण नहीं मिले। संसद में नोटों से भरा बक्शा पहुँच गया लेकिन उसे प्रमाण नहीं माना गया। यही वह बिंदु है जहां पर हमें नोट,केबल और दलीय हितों से ऊपर उठकर सोचना होगा।
    भारत की राजनीति साफ-सुथरी नहीं है। यहां पंचायत से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक सब कुछ खरीदा और बेचा जाता है इस सत्य को सारे दल जानते हैं। इस सत्य की पुष्टि के लिए किसी विकीलीक केबल की जरूरत नहीं है।
     भारत की बुर्जुआ राजनीति में घूस को बुरा नहीं मानते,कानूनी नजरों में बुरा मानते हैं,वह भी बुर्जुआजी के सड़े हुए चरित्र पर परदा डाले रखने के लिए,इससे बुर्जुआ राजनीति में ईमानदारी का नाटक चलता रहता है।  बुर्जुआ राजनीति में इस कदर सडांध भरी है कि आप एक मसले पर पकड़ नहीं पाते तब तक दूसरा घोटाला सामने आ जाता है। कानूनी पर्दे की आड़ में बुर्जुआजी आराम से सत्ता की लूट जारी रखता है।
     ये केबल एक बात पुष्ट करते हैं कि भारत में राजनीति नपुंसक हो मीडिया कलंकित हो गया है। मीडिया का कलंकित होना और नेताओं का नपुंसक होना ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इस समूचे प्रसंग का सबसे दुखद पहलू है कि अमेरिकी केबलों की नजर से हमारा मीडिया और राजनेताओं के द्वारा भारतीय सच को देखा जा रहा है। सवालउठता है कि हम अमेरिकी राजनयिकों की आंखों से भारतीय सच को देखें या भारतीय आंखों से राजनीति की नंगी सचाई को देखें ?
   अमेरिकी केबलों के आधार पर जो आज संसद में उछल रहे हैं और उन्हें प्रमाण मान रहे हैं वे सचमुच में अमेरिकी आईने से भारतीय समाज को देख रहे हैं.यह खतरनाक कैदखाना है जहां विकीलीक ने हमारे नेताओं और मीडिया को कैद कर लिया है। हमारा एक ही सवाल है  यदि विकीलीक के केबल इतने ही महत्वपूर्ण हैं और सत्यांशों से भरे हैं तो कोई मीडिया घराना इस सत्य के बारे में अभी तक कोई अतिरिक्त तथ्य सामने क्यों नहीं ला पाया ? स्वयं हिन्दू अखबार ने विकीलीक की किसी स्टोरी को आगे ले जाकर विकसित क्यों नहीं किया ? उसमें नए तथ्य क्यों नहीं जोड़े ?
    विकीलीक के अमेरिकी केबल पत्रकारिता का कच्चा माल हैं पत्रकारिता नहीं है। इनकी पुनर्प्रस्तुति तो स्टेनोग्राफी है। यह पत्रकारिता नहीं है। उपलब्ध सत्य और तथ्य में इजाफा किए बगैर पुनरावृत्ति मात्र से इसे एक्टिव खबर नहीं बनाया जा सकता।
   विकीलीक मृतसूचना संसार का हिस्सा हैं। मृत सूचना संसार कितना ही बड़ा सत्य सामने लाए उससे सामयिक यथार्थ को प्रभावित नहीं किया जा सकता है। विकीलीक वैसे ही जैसे ताजमहल है। ताजमलहल के बारे में हम रोज नई -नई ऐतिहासिक खोज समाने लाएं इससे ताजमहल के बारे में दर्शकीय पर्यटन नजरिया आसानी से नहीं बदलेगा। विकीलीक भी अमेरिकी सूचनाओं का ताजमहल है इसमें घुमन्तूओं,यायावरों और मीडिया की दिलचस्पी हो सकती है,पाठकों की इसमें दर्शकीय दिलचस्पी हो सकता है ,इससे ज्यादा इसका कोई महत्व नहीं है।
विकीलीक केबल की घटनाएं घट चुकी हैं। घटित को पुनः हासिल करना, उनके आधार पर पाठकों या जनता को सक्रिय करना असंभव है। विकीलीक में घटनाएं अमेरिकी राजनयिक नजरिए से निर्मित की गई हैं। उन्हें निर्मिति के रूप में ही देखा जाना चाहिए। यह खोजी पत्रकारिता नहीं है। यह तो विकीलीक केबल की अखबारी व्याख्या है।







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