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रविवार, 26 जून 2016

सोशल मीडिया के डिजिटल संस्कार

       फेसबुक पर अश्लील वीडियो पोस्ट करने,अश्लील गालियां लिखने,औरतों के प्रति अशालीन आचरण करने,गद्दी बातें लिखने वालों की संख्या बढ़ रही है। कायदे से फेसबुक प्रबंधकों को अश्लील, अपमानजनक भाषा और कामुक सामग्री आदि को निजी पहल करके सेंसर करना चाहिए। अश्लील -कामुक सामग्री और गालियां फेसबुक की आचारसंहिता का उल्लंघन है।सभी यूजरों को अश्लील भाषा और कामुक सामग्री के फेसबुक पर प्रचार-प्रसार का विरोध करना चाहिए।

फोटोग्राफी,डिजिटल तकनीक और विज्ञापनों के दबाब ने हमारे चेहरे-मोहरे सब बदल दिए हैं। खासकर नकली शरीर और नकली शक्ल की जो संस्कृति पैदा हुई है उसने असली चेहरे और असली शरीर के बोध ही खत्म कर दिया है। सवाल यह है कि नकली शक्ल और नकली स्कीन से हमारे नकली विचारों और व्यवहार का संबंध भी बन रहा है क्या ?उल्लेखनीय है भारत के मीडिया और सोशलमीडिया में बेरोजगारी, निरूद्योगीकरण और किसानों की बदहाली पर न्यूनतम कवरेज है । मीडिया से लेकर इंटरनेट तक सैलीब्रिटी चेहरे,फिल्म-टीवी,क्रिकेट आदि का ज्यादा कवरेज है। यह वस्तुतः डिजिटल संस्कृति है।इससे राजनीतिक अचेतनता बढ़ती है।

सोशल नेटवर्क और खासकर फेसबुक को जो लोग आजादी का मंच समझ रहे हैं वे गलतफहमी के शिकार हैं। फेसबुक का अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों ,जैसे सीआईए,एफबीआई आदि से याराना है,वे सभी फेसबुक यूजरों की नजरदारी कर रहे हैं,अब इसी पैटर्न पर भारत सरकार भी नजरदारी कर रही है। फेसबुक यूजर शालीनता,लोकतांत्रिकबोध और परिपक्व नागरिक की तरह इस माध्यम का इस्तेमाल करें।

हमारे समाज में मध्यवर्ग के एक बड़े तबके में फैशन की तरह ग्लोबलाईजेशन का प्रभाव बढ़ा है,सरकार की नीतियों में ग्लोबलाइजेशन का अंधानुकरण चल रहा है,यहां तक कि अब तो वे लोग भी ग्लोबलाइजेशन के पक्ष में बोलने लगे हैं जो कल तक उसका विरोध करते थे,ऐसे विचारकों और राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं की तादाद तेजी से बढ़ रही है, वे यह कह रहे हैं कि पूंजीवाद का अब कोई विकल्प नहीं है,ग्लोबलाईजेशन के तर्कों को मानने के अलावा और कोई विकल्प नहीं हैं। यही स्थिति ग्लोबल मीडिया चैनलों की है, उनके उपभोक्ताओं में किसी भी किस्म का प्रतिवाद का स्वर दिखाई नहीं देता बल्कि उल्टे राजनीतिक हल्कों में ज्यादा से ज्यादा चैनल और अखबार समूहों को अपने राजनीतिक रुझान के पक्ष में करने की होड़ चल निकली है।



समग्रता में देखें तो फेसबुक पर हम असहिष्णु समाज बना रहे हैं ?सामान्यतौर पर कम्युनिकेशन सहिष्णु बनाता है,लेकिन फेसबुक ने यूजर के अवचेतन को जगाया है। अवचेतन में पड़ी घृणा,गंदगी, अश्लीलता आदि को अभिव्यक्त करने का सहज मौका दिया है। हमें सोचना चाहिए कि चेतनमन को जगाते हैं या अवचेतन मन को? फिलहाल तो अवचेतन की हवा बह रही है। कम्युनिकेशन के लिए चेतनमन सक्रिय रहे तो सुरक्षा है वरना खतरे ही खतरे हैं।

सोशलमीडिया को लेकर भारत सरकार की सचेतनता का कोई अर्थ नहीं है। असलमें ,सबसे पहले भारत सरकार को पोर्न सामग्री के वितरण पर पाबंदी लगानी चाहिए। पोर्न दिखाना-बेचना अपराध है।इसके सामाजिक दुष्प्रभावों पर सारी दुनिया में बहस हो रही है। लेकिन केन्द्र सरकार और उसके विरोधीदल पोर्न के मामले पर चुप हैं।महिला संगठन भी चुप्पी लगाए हुए हैं।इंटरनेट पर आपत्तिजनक सामग्री की निगरानी को लेकर जारी विवाद के बीच नामी सर्च पोर्टल गूगल ने अपनी पारदर्शिता रिपोर्ट में जनवरी 2011 से लेकर जून 2011 के बीच सरकार की ओर से सामग्री हटाने की सिफारिशें जारी की हैं। गूगल ने बताया है कि इस अवधि में सरकार ने उससे 358 आइटम और 68 कंटेंट हटाने की मांग की थी, जिसमें से कंपनी ने 51 फीसदी मांगों को आंशिक या पूरे तौर पर मान लिया था।

गूगल ने बताया, 'राज्य और स्थानीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने हमसे सामाजिक नेताओं के विरोध में प्रदर्शन, आपत्तिजनक भाषा वाले वीडियो यू ट्यूब से हटाने के लिए कहा था। हमने इनमें से ज्यादातर वीडियो हटाने से मना कर दिया था और महज उन्हीं वीडियो को हटाया था, जिनके कारण समुदायों में रंजिश बढऩे की आशंका थी।

सोशल मीडिया के नियंत्रण के बारे में केन्द्र सरकार की चिन्ताएं अन्ना आंदोलन के समय सामने आ गयी थीं। मोदी सरकार आने के बाद भी केन्द्र सरकार का पुराना नजरिया बदला नहीं है।यह एक तरह से सोशल मीडिया की संचालक कंपनियों को धमकी है कि 'सावधान रहो अपने दायरे के बाहर मत जाओ।' विचारणीय बात यह है जो केन्द्र सरकार दूरसंचार विभाग को नहीं चला पायी और उसे निजी स्वामित्व में दे दिया। वह सोशलमीडिया को क्या नियंत्रित करेगी ! ये सिर्फ कागजी कानूनी शेरों की बातें हैं ! इसके बावजूद हम यह कहना चाहेंगे कि हमारे फेसबुक बंधुओं को शालीन भाषा,सभ्य राजनीति और संस्कृति के नए मानकों को बनाना चाहिए। फेसबुक पर गली-मोहल्लों की भाषा ,खासकर गाली-गलौज की भाषा से बचना चाहिए। अन्ना भक्तमंडली से लेकर भाजपा की वानरटोली तक यह फिनोमिना देखा गया है। इन लोगों के एक धड़े ने फेसबुक पर आएदिन जो गंदगी की है,उसने सोशलमीडिया की साख को बट्टा लगाया है।



फेसबुक पर यूजर्स की निजी सूचना निकालने और उसे विज्ञापनदाताओं को 'बेचने' का

आरोप है और इस मुद्दे पर उसे यूरोप में कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। ' संडे टेलिग्राफ ' की एक रिपोर्ट के अनुसार , फेसबुक अपने यूजर्स के राजनीतिक विचार, लैंगिक पहचान, धार्मिक आस्थाएं और यहां तक कि उनका अता-पता भी जमा कर रही है। यूरोपीय आयोग इस मुद्दे पर कार्रवाई करने की योजना बना रहा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लोग चाहे अपना 'प्राइवेसी सेटिंग' कुछ भी रखें, फेसबुक अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर का उपयोग कर सोशल नेटवर्किंग साइट पर लोगों की गतिविधियों की सूचना जमा कर रही है और उसे विज्ञापनदाताओं को उपलब्ध करा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोपीय आयोग 2012 जनवरी में एक नया निर्देश जारी करने वाला है जिसमें इस तरह के विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है।

दूसरे उद्योगों की तरह भारतीय दूरसंचार के आंकड़े भ्रमित करने वाले हैं। देश में 85 करोड़ से अधिक पंजीकृत मोबाइल नंबर हैं। पर स्पेक्ट्रम आवंटन का ढांचा सेवा प्रदाताओं के लिए इनकी संख्या बढ़ाने में मदद करता है। इसमें से एक तिहाई नंबर ऐक्टिव नहीं हैं। बाकी बचे नंबरों में से भी कई उन ग्राहकों के नाम पर पंजीकृत हैं जो ऑफिस या निजी इस्तेमाल के लिए अलग-अलग नंबर रखते हैं। पिछले कुछ वर्षों से लगातार प्रति ग्राहक औसत राजस्व घटा है। इस कारण से सेवा प्रदाताओं का मुनाफा भी कम हुआ है। हर सर्किल में दर्जनों टेलीकॉम सेवा प्रदाता कंपनियां हैं। इनमें से कुछ ही पैसा बना पाती हैं और नई कंपनियां तो अब तक अपने निवेश का बड़ा हिस्सा तक नहीं वसूल पाई हैं। इस बदहाल अवस्था के बाद तो दूरसंचार क्षेत्र के निजीकरण को यहीं रोकना चाहिए।

सीईए के साथ समझौते और तकनीकी सहमेल के कारण फेसबुक अपने यूजर की प्राइवेसी में हस्तक्षेप और तांक-झांक कर रहा है। फेसबुक अधिकारियों के अनुसार फेसबुक अपने यूज़र के लॉग ऑफ करने के बाद भी इस बात पर नजर रखता है कि उसके यूजर्स कौन सी वेबसाइट विजिट कर रहे हैं।

चीन में इंटरनेट के 50 करोड़ के करीब यूजर हैं और सबसे शक्तिशाली इंटरनेट सेंसरशिप भी है। सर्वसत्तावादी एकतंत्र में यह व्यवस्था बेहद परेशानी खड़ी करने वाली है। नव्य आर्थिक उदारीकरण और विश्व व्यापार संगठन की नीतियों के दायरे में आने के बावजूद वहां पर इंटरनेट सेंसरशिप में कोई ढ़ील नहीं आयी है। कायदे से उसे अपने सिस्टम को और उदार बनाना था,लेकिन उन्होंने नहीं किया। चीन पर विश्व जनमत का भी कोई दबाव नहीं है।इसका अर्थ यही है कि लूट की उदारता में चीन हिस्सेदार है,लोकतांत्रिक छूट देने के मामले में चीन आज भी कंजरवेटिव है। चीन का मॉडल है राजनीति में सर्वसत्तावाद,आर्थिक क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कारपोरेट तंत्र,उपभोक्तावाद और सख्त सेंसरशिप।

भारत में फेसबुक और इंटरनेट पर साइबर हैकरों के हमले बढ़ गए हैं। अभी तक भारत फेसबुक संतों की शांत रमणस्थली था लेकिन विगत एक सप्ताह से साइबर अशांति की खबरें आ रही हैं। भारत सरकार के संस्थानों की बेवसाइट हैक करके नकली लोग अन्य देशों की बेवसाइट पर हमले कर रहे हैं। इसी तरह फेसबुक को बाजार में डाउन करने के लिए नए तरीकों से पोर्न सामग्री फेसबुक पर भेजी जा रही है। साइबर हैकरों की इन शैतानियों के प्रति सजगता जरूरी है। इस विषय पर फेसबुक दोस्तों को अपनी वॉल पर लिखना चाहिए।भारत में संचार क्रांति के दुरूपयोगों के प्रति सचेतनता बढ़ रही है। इंटरनेट,फेसबुक,सोशल साइट ,ब्लॉग आदि पर अपमानजनक बातें लिखने वालों के प्रति अब आम यूजर सचेत हो रहा है। इस सचेतनता के कारण ही एक युवक को एक लड़की के प्रति अपमानजनक और अशालीन बातें नेट पर लिखने के लिए अदालत ने 20हजार रूपये का जुर्माना लगाया है। आप भी आई टी एक्ट के प्रति जागरूक बनें ।

दूसरी ओर सीआईए ने फेसबुक और ट्विटर पर निगरानी तेज कर दी है। वे विभिन्न देशों में चल रही राजनीतिक और अन्य किस्म की गतिविधियों पर गहरी नजर रखे हैं। इसके आधार पर वे अपने रणकौशल को भी बदल रहे हैं ,साथ ही यूजरों का व्यापक प्रोफाइल भी बना रहे हैं। यह यूजरों की निजता का उल्लंघन है ?

इंटरनेट आने के बाद से ऑनलाइन छेडखानी ,उत्पीड़न और अपमान की घटनाओं में इजाफा हुआ है। मसलन् ,आस्ट्रेलिया में 2008 में की गयी रिसर्च में पाया कि 42प्रतिशत युवाओं को ह्रासमेंट का सामना करना पड़ा।एक अन्य सर्वे में 36 फीसद लड़कियों और 32 फीसद लड़कों ने ह्रासमेंट की शिकायत की। ऑनलाइन ह्रासमेंट की घटनाओं से भारत में भी एक बड़ा तबका परेशान है । लेकिन अभी तक ऑनलाइन ह्रासमेंट की सटीक अवधारणा विकसित नहीं हो पायी है ।

फेसबुक के 80 करोड़ यूजर हैं और उसकी विज्ञापनों से इस साल 4.27 बिलियन डालर की आमदनी हुई है जो उसकी सकल आय का 85 फीसदी है। ऐसे में फेसबुक पर मंथली चार्ज लेने की अफवाह उसके प्रतिद्वंद्वी सोशल मीडिया साइट के लोगों ने ही उड़ायी है। फेसबुक पर जो लिखा जाता है उस पर सहज में विश्वास न करें। उसकी अन्य स्रोतों से पुष्टि करें। फेसबुक पर अफवाहें भी चलती हैं।

फेसबुक पर कभी आर्थिक तबाही के घटनाक्रमों पर मित्रलोग बहस क्यों नहीं करते ? क्या भारत में आर्थिक खुशहाली आ गयी है ? क्या मंदी की मार के सवाल सताते हैं ? सवाल यह है फेसबुक को हम भारत की मूल समस्याओं का मंच क्यों नहीं बना पाए हैं ?

फेसबुक पर वर्चुअल कामुक औरतें सक्रिय हैं।ये फेसबुक और चैटिंग के बहाने मोहित करती हैं। वर्चुअल प्रेम में फंसाती हैं और अंतमें गहरी निराशा और हताशा में धकेल देती हैं। आज इनके एक शिकार युवा ने फेसबुक से विदा ले ली। कहने का अर्थ है फेसबुक पर वर्चुअल औरतों से चैटिंग ओर वर्चुअल प्रेम न करें। यह आत्मघाती है।

नए साइबर जमाने के युवाओं में लोकतांत्रिक प्रतिवाद की आकांक्षाएं कम है। यह समाज से विच्छिन्न है और पूरी तरह मोबाइल और सोशल नेटवर्किंग से सम्बद्ध है। इस युवा की मनोसंरचनाएं उपभोग,अकेलेपन , क्षण में पाने की आकांक्षा और प्रतिहिंसा ने निर्मित की है।

इंटरनेट महान है,फेसबुक महानतम है और लुढ़कता बाजार और आर्थिक मंदी इन सबसे महान है। संचार क्रांति और भूमंडलीकरण जिस स्वर्ग का सपना लेकर आए थे वहां इन दिनों वैचारिक-सांस्कृतिक सन्नाटा पसरा हुआ है। हमारे दोस्त इन सब सवालों पर चुप हैं । क्या ये सवाल बहस के लायक नहीं हैं ॽ

फेसबुक तो स्वर्ग की इन्द्रसभा है इसमें सुख है,आनंद है,विचार हैं,अमरता है,गान,संगीत, नृत्य, चित्र,मित्र सब हैं,इन्द्रसभा की तरह यहां रसोई ,खाना ,महंगाई ,मंदी ,राक्षस ,पति, पत्नी, संतान,समाज आदि की चिन्ता नहीं है। यहां सिर्फ रस , आनंद और अभिव्यक्ति है।यह सुखियों का संसार है।फेसबुक क्षणिक और अधूरी अभिव्यक्ति का माध्यम है।फेसबुक सिरपड़ों का खेल है,यहां अपरिचय के परिचय,बिना दीवार के वॉल,बिना स्याही कागज का लेखन,मुँह देखी मीठी बातें और खोखली प्रशंसाओं की लंबी सूची,सूचनाओं का ढ़ेर, बिना मांगे उपदेश,मजे की बातें,बोरिंग बातें,विज्ञापन और नकली व्यक्तिवाद का खोखला ताण्डव और फेसबुक का अरबों का धंधा।यानी फेसबुक उल्लू है उसकी सवारी लक्ष्मी करती है।फेसबुक में स्वर्ग और नरक भी हैं , स्वर्ग में उत्तर अमेरिका है वहां की 41 प्रतिशत आबादी ऑनलाइन है । नरक में विश्व की बाकी आबादी है जिसमें मात्र 10 प्रतिशत लोग ऑनलाइन हैं।अफ्रीका की मात्र 1 प्रतिशत आबादी ऑनलाइन है। ऑनलाइन स्वर्ग है और जो लाइन में है वो नरक में हैं। फेसबुक पर कुछ लोग हैं जो 11बजे के बाद अवतरित होते हैं वे फेसबुक के यक्ष-यक्षिणी हैं।

परवर्ती पूंजीवाद में सबसे बड़े किराए वसूलने वाले कारपोरेट घराने हैं। वे केबल टीवी से लेकर डीटीएच तक,इंटरनेट से टेलीफोन तक,डिस्नी लैंड से लेकर साइंस सिटी तक आम जनता से आनंद और कम्युनिकेशन के बदले किराया वसूलते हैं। यह किराया ही मोनोपोली कैपीटलिज्म के मुनाफे और आनंद का मूल स्रोत है। क्या इसके बाद भी हमें पूंजीवाद से प्यार करना चाहिए ?

पूंजीवाद में कोई भी कम्युनिकेशन फोकट में नहीं होता।दूरसंचार -मीडिया के इजारेदार घरानों की मुनाफाखोरी के बिना नहीं होता। मसलन् फेसबुक,ब्लॉग आदि इंटरनेट कम्युनिकेशन के लिए हम किराया देते हैं। दूरसंचार मुगल इस किराए से अमीर बनते हैं।यह परवर्ती पूंजीवाद का किराए का कम्युनिकेशन है और इसी अर्थ में बुर्जुआ कम्युनिकेशन है।

फेसबुक के मित्र किस विचारधारा के हैं यह जानने का आसान तरीका है कि वे किन विषयों पर वॉल पर लिखते हैं,किन विषयों पर अन्यत्र जाकर पढ़ते हैं और आमतौर पर उनकी किस तरह के राजनीतिक-आर्थिक सवालों में रूचि रखते हैं ? टिप्पणी करते हैं ?सवाल यह है कि क्या फेसबुक विचारधारारहित कम्युनिकेशन है ? फेसबुक पर शिक्षित युवा और अधेड़ आमतौर पर जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वो प्रतिगामी भाषिक- सांस्कृतिक मनोदशा की अभिव्यक्ति है। ये,नकली फोटो लगाना, गलत सूचनाएं देना,विभ्रम की बातें करना,अश्लील भाषा या द्वयर्थक भाषा में लिखना,चैट करते हुए किसी भी लिंक को भेज देना आदि। अनेक लोग हैं जो फेसबुक पर लड़की देखी और लगे पीछा करने, ये लोग फेसबुक पर लड़की को पीछा किए बिना क्यों नहीं रह पाते ? पहले दोस्त बनाते हैं फिर चैट में पीछा करते हैं,क्या यह नेट पर स्त्री उत्पीड़न है ?

इंटरनेट पर सत्ता की नजरदारी लगातार बढ़ रही है।लैटिन अमेरिका में इंटरनेट को राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।प्रतिवादियों पर नजर रखी जा रही है,उन पर नियंत्रण लगाया जा रहा है। पेरू से लेकर बोलविया तक इंटरनेट की नजरदारी हो रही है। ईमेल,फेसबुक,ब्लॉग,ई मूवमेंट आदि पर विभिन्न तरीकों से नजर रखी जा रही है। यह नेट प्राइवेसी का अंत है।

इंटरनेट और कम्प्यूटर का ज्यादा उपयोग स्मृति में संचित करने की दिशा बदल सकता है। आमतौर पर अभी वैज्ञानिक नहीं जानते कि इससे मनुष्य की स्मृति का क्षय हो रहा है या स्मृति समृद्ध हो रही है। लेकिन मन के बाहर जो चीज संग्रहीत करना चाहते हैं उसके लिए इंटरनेट और कम्प्यूटर सुंदर माध्यम और संग्रहशाला है। मनुष्य का दिमाग इस मीडिय़म की संगति में धीरे धीरे बदल रहा है।

यह संचार क्रांति की आजादी के अंत की बेला है। संचार क्रांति ने जिस तरह की स्वतंत्रता और प्राइवेसी का आरंभ में वायदा किया था उसका धीरे धीरे अंत हो रहा है। आम लोगों की प्राइवेसी को नियंत्रित और नियोजित किया जा रहा है। बेहतर है नेट की दुनिया में हम अपने निजी पत्ते न खोलें।

साइबर साँड मात्र शब्दों से ही अपमानित नहीं करते वे इलैक्ट्रोनिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। मसलन वे किसी को अपमानित या परेशान करने के लिए गंदे,अश्लील वीडियो फेसबुक की वॉल पर लगा देते हैं।अपमानजनक एमएमएस या ईमेल करते हैं। अपमानजनक या नेगेटिव साइबर टेक्स्ट भेज देते हैं।

साइबर बांस करने के तरीके क्या हैं- पहला तरीका है आघात पहुँचा,अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना,सेक्सुअल लैंग्वेज का इस्तेमाल करना, परेशान करना,मसलन् , बार-बार यह कहना 'बात कीजिए प्लीज' आदि । जो व्यक्ति इस तरह की भाषा का प्रयोग कर रहा है वह कितनी बार दोहराता है अपने व्यवहार को,महिने में एक बार,दो बार ,तीनबार या रोज।इससे आप उसके असंतुलन का अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं।साइबर साँड मूलतःसामाजिक जीवन में मौजूद दादागिरी का ही साइबर रूप है। साइबर साँड ज्यादातर वे युवा और तरूण हैं जो एडजेस्टमेंट प्रॉब्लम के शिकार हैं। इसे साइबर भाषा में रिस्क ग्रुप में रखा जाता है और ये लोग भिन्न किस्म के व्यवहार की मांग करते हैं।साइबर पंगेबाज को साइबर बैल कहना ज्यादा सही होगा।वे अपनी नेगेटिव हरकत को बार बार दोहराते हैं। मसलन् साइबर बैल चैट में आकर पूछते हैं '' क्या आप मुझे पसंद करते हैं'। 'सेक्स करोगे',या वे कोई व्यक्तिगत आक्षेप करने वाले वाक्य या शब्द का इस्तेमाल कर बैठते हैं। साइबर स्पेस में किया गया एक नेगेटिव एक्शन दूरगामी असर छोड़ता है। नेगेटिव एक्शन की पुनरावृत्ति तुरंत प्रतिक्रिया पैदा कर सकती है।साइबर पंगेबाज कैसे लोग होते हैं ,किस उम्र के होते हैं,उनके पंगा लेने का तरीका क्या वे साइबर कम्युनिकेशन में कैसे परेशान करते हैं। इसे साइबर में 'बांस' करना भी कहते हैं।पश्चिम में इसमें ज्यादातर 10-18साल की उम्र के तरूण आते हैं।भारत में ऐसे लोगों में वयस्कों की संख्या ज्यादा है। इन लोगों का काम है नेट,फेसबुक,ब्लॉग,ईमेल,चाट आदि के जरिए आघात पहुँचाना।ये नेगेटिव एक्शन में ज्यादा रहते हैं।

नेट पर किए गए अनेक अनुसंधान बताते हैं कि जो ज्यादा चैट ,ईमेल और शॉपिंग करते हैं उनमें अवसाद के लक्षण ज्यादा होते हैं।ताइवान के कॉलेज छात्रों में किए अध्ययन से पता चला है कि इंटरनेट की लत का पढ़ाई ,दैनिक रूटीन पर असर होता है। जिनको लत है वे अवसाद में कष्ट पाते हैं।फेसबुक की बढ़ती आदत ने अमेरिकी तरूणों की स्कूली पढ़ाई को प्रभावित किया है।इंटरनेट में उन्हीं यूजरों के साथ दुर्व्यवहार या एब्यूज की घटनाएं देखी गयी हैं जिनमें आमने-सामने बात करने की क्षमता का अभाव होता है अथवा जो अवसाद में रहते हैं।रिसर्च में पाया गया है कि इंटरनेट यूजरों में जो अकेलेपन में नहीं हैं वे भावनात्मक सहयोगी की तलाश में नेट पर आते हैं। ऑनलाइन मित्र यहां ऑफलाइन मित्रों से मिलकर संतोष पाते हैं। इस तरह के यूजर भी हैं जो मनो व्यथाओं के शिकार हैं और अपनी व्यथा का समाधान खोजने आते हैं। इनमें बेचैनी,अवसाद और आत्मविश्वास की कमी देखी गयी है।

सन् 1990 के आसपास जब इंटरनेट का चलन तेज हुआ तो उस समय इसे लेकर भय और उत्साह का भाव था।आरंभ के शोध बताते हैं इंटरनेट के उपयोग ने अकेलेपन ,अवसाद और तनाव में वृद्धि की।नेट विशेषज्ञों का मानना है कि संचार की नई तकनीक के कारण हठात कम्युनिकेशन बढ़ जाने का सामाजिक-मनोवैज्ञानिक नकारात्मक असर होता है। इससे लत और अवसाद की जुगलबंदी पैदा होती है।क्या सोशल मीडिया नेटवर्क में गालियों का वही स्थान है जो उसे हमने सामाजिक जीवन में दिया है ? क्या सोशल मीडिया गालियों से ऊर्जा प्राप्त करता है ?गालियां संवादहीनता का संकेत है ।

फेसबुक आने के बाद विरही-विरहिणियों की संख्या बढ़ी है या घटी है ? विरह का प्रसार हुआ है या अवसान हुआ है ?मनमाने ढ़ंग से अपनी बात कहने का ढ़ंग अभागों का ढ़ंग है।कहते-कहते ऐसा भी कुछ सुनने को मिल जाता है जो पहले कभी नहीं सुना था।कहने के स्रोत में जब ज्वार आता है तब न जाने किस गुफा के भीतर की अनजान सामग्री बहती-बहती आकर घाट पर लग जाती है। क्या आपने ऐसा अनुभव किया है ?



सौंदर्य मनुष्य को संयम की ओर खींचता है,शालीनता का विकास करता है। इसके अलावा हमारी क्षुधा तृप्ति के साथ -साथ सदा उच्चतर सुर जगाता है।फेसबुक ने आम लोगों में खासकर मध्यवर्ग के लोगों में झूठ बोलने,फुसलाने,हां में हां मिलाने या निरर्थक समय खर्च करने की आदत में इजाफा किया है। छद्म या आभासी यथार्थ में जीने की भावना को पुख्ता बनाया है। आदमी का कम्युनिकेशन फास्ट किया है लेकिन संचार ,समाज ,व्यक्ति और वस्तु के बीच में महा-अंतराल पैदा किया है।फेसबुक यूजरों की संख्या 70 करोड़ के करीब हो गई है। आश्चर्यजनक बात है कि अमेरिका में फेसबुक यूजरों की संख्या में 6 मिलियन की गिरावट आई है।इसी तरह कनाडा,रूस,ब्रिटेन,नार्वे में फेसबुक यूजरों की संख्या घटी है। लेकिन विकासशील देशों में बढ़ रही है। क्या अमेरिकी लोग त्रस्त हैं फेसबुक से ?क्या फेसबुक सामाजिक-भावनात्मक अलगाव पैदा कर रहा है ?फेसबुक की खूबी है "जान ना पहचान मैं तेरा मेहमान",अनजाने लोगों से राजनीतिक-सामाजिक चर्चा तो ठीक है लेकिन इमोशनल बातें करना,व्यक्तिगत जानकारियां देना खतरनाक है।



मंगलवार, 4 नवंबर 2014

इंटरनेट और सामाजिक परिवर्तन के आयाम

      
          संचार तकनीक बहुरंगी होती है।वह कभी एकायामी नहीं होती।उसका संस्कृति ,राजनीति और अर्थव्यवस्था से गहरा सम्बन्ध भी होता है। वह महज कम्युनिकेशन का उपकरण मात्र नहीं है। बल्कि वह तो समाज की धुरी है। सामाजिक अध्ययन किया जाता है वैसे ही कम्युनिकेशन का भी अध्ययन किया जाना चाहिए। समाज कैसा है और कैसा होगा,इन दोनों सवालों को जानने के लिए उत्पादन सम्बन्धों और कम्युनिकेशन तकनीक की अवस्था का संयुक्त रुप से अध्ययन किया जाना चाहिए। प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था में लंबे समय से कम्युनिकेशन के एकाधिक तकनीकी रुप सक्रिय हैं। इनमें वह तकनीकी रुप खोजना चाहिए जो प्रभुत्वशाली हो।प्रभुत्वशाली तकनीकी रुप की पहचान संचार की गति पर आधारित है। संचार की गति के नजरिए से देखें तो आज इंटरनेट
तीव्रगामी संचार माध्यम है। यह माध्यम है और तकनीक भी है।यह ऐसा माध्यम है जिसने अपने पूर्ववर्ती सभी माध्यमों का अपने अंदर समाहार कर लिया है।इसका तकनीकी आधार है उपग्रह संचारप्रणाली और कम्प्यूटर।

कम्प्यूटर और इंटरनेट के आने के बाद कम्युनिकेशन में मूलगामी बदलाव आया है।राजनीति से लेकर संस्कृति तक सब क्षेत्रों में व्यापक परिवर्तन घटित हुए हैं।इसकी शक्ति और स्पीड पर सारी दुनिया मुग्ध है।लेकिन दूसरी ओर लोकतंत्र,लोकतांत्रिक प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थानों को इस तकनीक ने बहुत तेजी से क्षतिग्रस्त किया है। इंटरनेट और कम्प्यूटर की आर्थिक सफलता पर हम मुग्ध हैं लेकिन इसकी अन्य भूमिकाओं को लेकर विभ्रम में जी रहे हैं। अभिव्यक्ति की आजादी खासकर दैनंदिन अभिव्यक्ति के रुपों को लेकर खुश हैं लेकिन कारपोरेट घरानों की भूमिका की अनदेखी करते रहे हैं। राजनीतिक अर्थशास्त्र के आधार पर इंटरनेट के अधिकांश मूल्याँकन असफल साबित हुए हैं । वे यह बताने में असमर्थ रहे हैं कि पूंजीवाद आखिरकार किस तरह समाज को बना रहा है और पूंजीवाद अपने चरित्र का किस तरह गठन कर रहा है । साथ ही इंटरनेट को घर घर में किस तरह घरेलू मीडियम के रूप में पहुँचाया जा रहा है।इंटरनेट के " फ्लो ने इस कदर प्रभावित किया है कि हम भूल ही गए हैं कि पूंजीवाद अपनी हजम कर जाने की प्रवृत्ति के कारण किस तरह समाज में वर्चस्व बनाने का काम कर रहा है । पूंजीवाद के पक्ष-विपक्ष में बोलने वाले दोनों ही पक्ष यह नहीं समझ पा रहे हैं कि हमारे इंटरनेट हमारे "समय "को किस तरह प्रभावित कर रहा है ? खासकर राजनीति ,समाज की प्रकृति और अन्य चीज़ों को किस तरह प्रभावित कर रहा है । मुनाफे की मंशा, व्यावसायिकता , पब्लिक रिलेशन, मार्केटिंग आदि कारपोरेट पूंजीवाद को परिभाषित करने वाले तत्व हैं । ये वे बुनियादी क्षेत्र हैं जिनके आधार पर इंटरनेट को देखा जाना चाहिए । इन्हीं आधारों पर इंटरनेट के विकास का अध्ययन चाहिए और वह इन्हीं आधारों पर विकसित होगा ।मैकचेनी ने लिखा है तकनीक को नियंत्रण के बाहर बताने वाले लोग अब व्यावसायिकता को भी नियंत्रण के बाहर बता रहे हैं ।

माध्यम विशेषज्ञ मैकचेनी के अनुसार इंटरनेट या बृहत्तर डिजिटल क्रांति का निर्धारित तत्व तकनीक मात्र नहीं है । बल्कि हमें देखना चाहिए कि तकनीक को किस शक्ल में लाया जाता है और उसके आने से समाज को किस तरह की शक्ल मिल रही है । इंटरनेट आने के बाद अमेरिका के कारपोरेट घरानों के पास अकूत राजनीतिक शक्ति संचित हो गयी है और वे लोकतंत्र के सिद्धान्तों का उल्लंघन करते रहते हैं । यह संचार नीति अपने असली रुप में निर्माता के रुप में नज़र आती है । दूरसंचार और इंटरनेट के क्षेत्र में बड़ी कंपनियां इंटरनेट व्यावसायिकता के ज़रिए अहर्निश मानवीय स्वभाव को निशाना बना रही हैं। लोगों की सूचनाएँ एकत्रित करना , उनका मुनाफे और विज्ञापन के लिए इस्तेमाल करना , निजी डाटा का दुरुपयोग करना और लोगों को विज्ञापनों के ज़रिए निशाना बनाना , निगरानी करना और प्राइवेसी का उल्लंघन करना आम बात हो गयी है । अमेरिकी राज्य अपने सैन्य हितों और "राष्ट्रीय सुरक्षा" के नाम पर दुरूपयोग करता रहा है ।

कारपोरेट घरानों ने मीडिया में विगत 25सालों में खुलेपन और बहुलतावाद को सीमित करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश किया है । उनके अस्तित्व का दारोमदार मौजूदा व्यवस्था को और भी बंद या क्लोज सिस्टम में तब्दील करने पर है । वे जनता के लिए कम से कम विकल्प खुले रखना चाहते हैं । वे इंटरनेट यूजर की राज्य के ज़रिए निगरानी रखना चाहते हैं और व्यावसायिकता का बांध खोल देना चाहते हैं । आज इंटरनेट को मीडिया का सरताज कहते हैं । उसके ज़रिए उपभोक्ता की शक्ति और दांत काटी प्रतिस्पर्धा की बातें की जा रही हैं । आर्थिक विकास के इतिहास में आज यह माध्यम इजारेदारियों के विकास का सबसे बड़ा माध्यम है । डिजिटल तकनीक तेज़ी से नीचे तक जा रही है । वह उन क्षेत्रों में भी पैठ बना रही है जहाँ पर परंपरागत तकनीक घुस नहीं पायी थी । मैकचेनी ने इसे " किलर एपलीकेशन" की संज्ञा दी है । नई डिजिटल तकनीक प्रतिस्पर्धा के युग से निकलकर इजारेदाराना गति से अपना विकास कर रही है । यह सच है कि इंटरनेट की अनेक सफल फ़र्में हैं । इनका काम करने का तरीका पुराने किस्म के पूंजीवाद की याद ताज़ा करता है । सिस्टम के रुप में ये फ़र्में जो शक्ल बना रही हैं उसको समझने की ज़रूरत है । वे प्राइवेसी को नहीं मानतीं,व्यावसायिकता पर जोर देती हैं, कर अदा करने से परहेज करती हैं, टैक्सचोरी करती हैं । तीसरी दुनिया के देशों में कम पगार पर काम कराती हैं । इन सब बातों को हम बहुत ही जल्दी भूल जाते हैं । वे अपने सिस्टम के लिए खास तरीके से लोग तैयार करते हैं जिससे वे अपने कर्मचारियों के मूल्य और मनोदशा बनाने में सफल हो जाते हैं । इंटरनेट की प्रकृति पूंजी संजय की मानसिकता से बंधी है । इंटरनेट आने के बाद खुलेपन और पारदर्शिता का बंद और मुनाफाखोरी की सीमित सूचना व्यवस्था के बीच सीधे टकराव पैदा हुआ है । इंटरनेट का अपना आंतरिक तर्क है जो डिजिटल तकनीक की लोकतांत्रिक क्षमताओं पर निर्भर है। इंटरनेट पर व्यापक सार्वजनिक स्पेस और वातावरण है जो वस्तु विनिमय के संसार से बाहर ले जाता है । लेकिन निजी स्पेस को और भी क्लोज या बंद बनाता है । इसकी प्राथमिकताएं इजारेदाराना बाजार की हैं । इंटरनेट लगातार गैर- व्यावसायिक साइबर स्पेस को पैदा कर रहा है इसके बावजूद यह गैर - व्यावसायिक स्पेस हाशिए पर है।इंटरनेट को यदि लोकतंत्र का माध्यम बनना है तो उसे असमानता , इजारेदारी, भ्रष्टाचार , अ- राजनातिकरण और ठहराव की ताकतों के बढ़ाव को रोकने का काम करना चाहिए ।

डिजिटल तकनीक आज शिखर पर है । इसके कारण समाज क्या पैदा करता है और क्या पैदा नहीं करता , इसके कारकों को आसानी से देखा जा सकता है । मैकचेनी का मानना है इंटरनेट सार्वजनिक वस्तु है और यह सामाजिक विकास के लिए आदर्श माध्यम है । यह अभाव को ख़त्म करता है और उसे लोकतंत्र के हवाले करता है । नई तकनीक इससे भी आगे बढ़कर उत्पादन की प्रकृति मूलगामी तौर पर बदल रही है । आज चीज़ों के निर्माण में कम लागत आती है और ज्यादा सक्षम चीजें बन रही हैं ।समाज में विकेन्द्रीकृत उत्पादन और वातावरण की अनुगूंज देख सकते हैं। । मैकचेनी के अनुसार 80 और 90 के दशक में जब इंटरनेट की शुरुआत हुई थी तब लोगों को लगा कि यह गैर व्यावसायिक अभिव्यक्ति का समुद्र है । वहाँ आम आदमी जाकर समानता के आधार पर अपने को सबल बनाएगा । आर्थिक और राजनीतिक तौर पर ताकतवर महसूस करेगा । प्रौपेगैण्डा कर सकता है उसके ऊपर कोई निगरानी नहीं होगी । यही इंटरनेट का लोकतांत्रिक विजन है । लेकिन व्यवहार में देखा गया कि इंटरनेट आने के बाद बड़े पैमाने पर इजारेदारियां बढ़ी हैं । पूंजी का केन्द्रीकरण बढ़ा है । गूगल,अमाजा़न,एपल,फेसबुक, माइक्रोसाफ्ट आदि कंपनियां सारी दुनिया में वर्चस्व बनाए हुए हैं । धीरे धीरे इनके बीच में महाद्वीप और देश की सीमाएँ भी तय हो जाएंगी । विभिन्न वस्तुओं के पेटेंट को जिस तरह से इन कंपनियों ने अपने नाम कर लिया है उसके कारण किसी नए खिलाड़ी का इंटरनेट खेल में शामिल होना मुश्किल हो गया है ।

डिजिटल क्रांति सूचना और उसकी व्यापक शेयरिंग पर टिकी है । सूचनाओं को इस दौर में जितना शेयर किया गया पहले कभी इतने बड़े पैमाने पर सूचनाएँ शेयर नहीं की गयीं । यह "सूचना बेचैनी" है। " सूचना बेचैनी" अति सूचना के कारण पैदा हुई है । डिजिटल में लाखों किताबें रोज़ छप रही हैं । अकेले अमेरिका में ही सैंकडों पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं । इंटरनेट के सारी दुनिया में 1995 में 10 मिलियन यूजर थे । सन् 2011 में इनकी संख्या दो विलियन हो गयी । सन् 2020 तक यह संख्या बढ़कर तीन विलियन हो जाएगी । अफ्रीका में मोबाइल फोन के विकास की गति सन् 2000 में दो प्रतिशत थी जो सन्2009 में बढ़कर 28 फीसदी हो गयी है । यह उम्मीद की जा रही है कि 2013 के अंत तक 70 फीसदी जनता के पास मोबाइल पहुँच जाने की उम्मीद है । IMS के शोध के अनुसार मौटेतौर 22 विलियन डिवाइस इंटरनेट और ऑनलाइन कनेक्ट हैं । सन् 2012 तक विश्व की तीन चौथाई आबादी मोबाइल से कनेक्ट हो जाएगी । सन् 2012 की विश्व बैंक रिपोर्ट में कहा कि मनुष्यों पर यह सबसे बड़े प्रभाव की ख़बर है । मैकचेनी के अनुसार इंटरनेट का विकास विगत 200 सालों के इलैक्ट्रोनिक कम्युनिकेशन के शोध का परिणाम है । वेन स्कॉट के अनुसार यह त्रिस्तरीय पैराडाइम शिफ्ट है । निजी संचार , मासमीडिया और बाज़ार सूचना को नई सूचना प्रणाली में समायोजित करके पेश किया गया है इससे इन तीनों पैराडाइम का अंतर ख़त्म हो गया है । मैकचेनी का मानना है आज इंटरनेट हर उस चीज़ को अपना गुलाम बना रहा है और रुपान्तरित कर रहा है जो उसके रास्ते में आ रही है । वस्तुओं और संचार को इंटरनेट अपने उपनिवेश में शामिल करता जा रहा है। इससे भी बड़ी बात यह कि समूची मानव जाति को स्पीड के साथ एक- दूसरे से जोड रहा है । इसके कारण सभी किस्म के कम्युनिकेशन को क्षणभर में पा सकते हैं । इसके कारण समूची मानवीय संस्कृति आपकी पकड में आ गयी है । आज वह मानव सभ्यता का आमुख है और उसके ज़रिए ही वस्तुएँ और सूचनाएँ पहुँच रही हैं । यह ऐसी मशीन है जिसने हमारी मनुष्य की समझ ही बदलकर रख दी है । आज मनुष्य को समझना और भी मुश्किल हो गया है । इंटरनेट ने हमारी ज़िंदगी के हर पहलू को प्रभावित किया है । आज विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारे जीवन को प्रभावित कर रही हैं और इनके कारण विकास की नई नीतियां सामने आ रही हैं ।

इंटरनेट के प्रभाव का यह परिणाम है कि अब हम यह नहीं जानते कि भविष्य में कैसा मनुष्य जन्म लेगा । इंटरनेट के बारे में उपलब्ध सामग्री का विवेचन करते हुए रॉबिन मनसैल ने लिखा कि इंटरनेट सामग्री मूलत: दो कोटि में आती है ,पहली कोटि उस साहित्य की है जो उत्सवधर्मी है और इंटरनेट को महिमामंडित करता है दूसरी कोटि में वह साहित्य आता है जो पलायनवादी है ,ये लोग इंटरनेट की किसी भी किस्म की सकारात्मक भूमिका नहीं देखते। इंटरनेट अध्ययन के क्षेत्र में ये दोनों कोटियां खूब फल फूल रही हैं । हम यहां इंटरनेट के महिमामंडन करने वालों के नजरिए तक सीमित रखेंगे। मैकचेनी ने लिखा मैं इन दोनों कोटियों से प्रभावित हूं और दोनों कोटियाँ संतोषजनक समाधान नहीं देतीं । ये दोनों कोटियाँ बंद गली में ले जाती हैं । इन कोटियों में विभाजन करने वाली कोई बर्लिन की दीवार नहीं है । बल्कि यह दो किस्म के मानसिक गठन के लोगों का विवेचन है ।जेम्स कुरेन ने " मिसअंडरस्टेंडिंग इंटरनेट "( 2012) में लिखा हमें बताया गया इंटरनेट क्रांतिकारी परिवर्तनों का वाहक है । वह व्यापार को संगठित करेगा । समृद्धि लाएगा । वह नए युग के सांस्कृतिक लोकतंत्र का जनक है । यह भी कहा गया पुराना मीडिया ख़त्म हो जाएगा । वह लोकतंत्र को नया जीवन देगा । ई गवर्नेंस के ज़रिए पारदर्शिता बढ़ेगी । कमज़ोर और हाशिए के लोग ताकतवर बनेंगे । ऑटोक्रेट धराशायी होंगे । शक्ति संतुलन बदलेगा । इंटरनेट के कारण दुनिया छोटी हो जाएगी और दो देशों में आपसी संवाद बढ़ेगा । दुनिया में एक दूसरे के प्रति समझदारी बढ़ेगी । एक वाक्य में कहें तो इंटरनेट अबाधित शक्ति है । यह कहा गया कि प्रिंट और बारुद की तरह इंटरनेट अपरिवर्तनीय शक्ति है जो समूचे समाज को स्थायी और अपरिवर्तनीय तौर पर बदल देगा । यह भी कहा गया कि इंटरनेट के द्वारा संसार को बेहतर रुप में बदल दिया जाएगा । इसके बाद संसार को पहचानना मुश्किल होगा । "इंटरनेट केन्द्रित" विश्वासों के कारण उसे सभी तकनीकों का मूलाधार घोषित कर दिया गया । उसे सभी एजेंसियों का आधार बताया गया । जबकि मनसेल के अनुसार डिजिटल तकनीक की खोज और इंटरनेट पर वर्चुअल स्पेस के उदय ने एक किस्म की रहस्यात्मक गुणवत्ता को जन्म दिया है। इस बीच में कईबार मंदी आई लेकिन इंटरनेट और सूचना उद्योग इस संकट से निकलते गए । क्ले सिर्की ने"कागनेटिव सरप्लस" (2010) में लिखा आज जिस तरह की शिरकत नज़र आती है यह उसका छोटा उदाहरण है और यह चारों ओर फैलेगा । यही चीज़ हमारी संस्कृति का आधार हो जाएगी।समस्या यह है कि हमारी संस्कृति कैसी हो । युवा लोग मानते हैं कि नेटमीडिया तो उपभोग, प्रस्तुति, और शेयरिंग का काम करता है । साथ ही वह सबके लिए खुला है । मानवता के लिए लिखने का अर्थ है विश्व के लिए फ्री टाइम को संसाधन बनाना । नए किस्म की शिरकत और शेयरिंग ही इस नए किस्म के संसाधन की विशेषता है। इससे हमारा समाज मूलगामी तौर पर बदलेगा । यही "कागनेटिव सरप्लस "है जो हमारे जीवन को बदलेगा ।हेनरी जैनकिंस ने लिखा, इंटरनेट पर लेखन मशरूम की तरह आ रहा है । यह "सामूहिक बौद्धिकता " की निशानी है । क्योंकि इंटरनेट पर आप अपने संसाधनों एवं कौशल को काम पर लगाते हैं तो उसे सामूहिक बौद्धिकता में रुपान्तरित करते हैं ।मिशेल नेलशेन (फिजिसिस्ट और क्वांटम कम्प्यूटर वैज्ञानिक ) ने "री इनवेंटिंग डिस्कवरी"( 2012) में लिखा इंटरनेट ने जन सहभागिता को संभव करके विज्ञान में कॉगनेटिव वैविध्यगत मूलगामी परिवर्तन किए हैं । ऑनलाइन उपकरणों की उपलब्धता के कारण वैज्ञानिकों की खोजों का रूप ही बदल दिया है । इसके कारण विज्ञान और समाज का संबंध बुनियादी तौर पर बदल गया है । यहाँ पर असंख्य लोगों के शिरकत करने की संभावनाएं हैं और असंख्य लोग शिरकत कर रहे हैं । ऑनलाइन सहभागिता के कारण एकदिन ऐसा भी आएगा कि नोबुल पुरस्कार सामूहिक तौर पर काम करने वाले एमेच्योर वैज्ञानिकों के समूह को मिलेगा । इंटरनेट से सिर्फ़ व्यापार ही नहीं होगा बल्कि अब हर चीज़ का पेटेंट कराने की ज़रूरत होगी और यह भी पता चलेगा कि ज्ञान को कैसे निर्मित किया जाता है । इस प्रक्रिया को पलटा नहीं जा सकता । इंटरनेट आने के बाद मानवीय प्रकृति में बुनियादी बदलाव आया है । हम बेहतरी की ओर बढ़े हैं । चारों ओर नेट पर एक दूसरे से सहयोग करके लोग काम कर रहे हैं । सहभागिता से काम कर रहे हैं । ईमानदारी से काम कर रहे हैं , सही दिशा में काम कर रहे हैं । उदार व्यवहार कर रहे हैं । समूहों में मिलकर काम कर रहे हैं । सही बातों के लिए सहयोग कर रहे हैं । सभ्यता और ममता के साथ पेश आ रहे हैं । विकीपीडिया जैसे ओपन सोर्स मंच खुले हैं ।



मैकचेनी ने लिखा है एक ज़माना था जब सुस्टेंस जैसे लोग कहते थे कि इंटरनेट के कारण लोग असामाजिक हो रहे हैं ।जनता से कट रहे हैं । लेकिन 2006 में सुस्टेन्स ने ही इंफोटोपिया में लिखा कि मनुष्य को इंटरनेट से संचित ज्ञान मिल रहा है ।विकीपीडिया के आने के साथ हमने सूचना की आक्रामकता को मानना आरंभ कर दिया है । उसके प्रति सहिष्णु बने हैं । परा-राष्ट्रीय , परा-भाषी संबंध बने हैं । निज के स्वार्थ और सामाजिक स्वार्थ की पूर्ति के मामले में संतोष मिला है । जैफ जरविस ने इंटरनेट के सार्वजनिक पहलू पर रोशनी डालते हुए लिखा ,"इंटरनेट आने के बाद अभूतपूर्व सार्वजनिकता का उदय हुआ है । यह पब्लिकनेस युगान्तरकारी है ,फलत : पूरी तरह डिसरप्टिव है । इस पब्लिकनेस ने उन संस्थानों को चुनौती दी है जो सूचना और दर्शकों को नियंत्रित करते थे । पब्लिकनेस एक तरह से उन संस्थानों की कीमत पर सशक्तिकरण हासिल करने का प्रयास है ।तानाशाह,राजनेता , मीडिया मुग़ल बताया करते थे कि हम क्या सोचें और क्या न सोचें, लेकिन अब इन लोगों का ज़माना लद गया । आज हमारा समाज वास्तव अर्थों में सार्वजनिक समाज बना है । राजनेता सुनने को मजबूर हैं कि इंटरनेट पर क्या कहा जा रहा है या जनता क्या कह रही है । राजनेताओं को जनता का सम्मान करने की , व्यक्ति के तौर पर सम्मान करने की आदत डालनी होगी । क्योंकि समूह के तौर पर पब्लिक के तौर पर जो शक्ति हासिल की है ,यह उसका सम्मान है । इंटरनेट आने के बाद लोकतांत्रिक शक्तियों की ताकत में इजाफा हुआ है । इंटरनेट तो लोकतंत्र की शक्ति है । यह सूचना की इजारेदारी और केन्द्रीकृत नियंत्रण का अंत है " सोशलमीडिया एंड टैक्नोलाजी " में पामेला लुंड ने लिखा " यह माध्यम पहले की तुलना में और भी ज्यादा शक्ति देता है, मनुष्य को इतनी शक्ति पहले कभी नहीं मिली ।" जरविस ने लिखा है कि "इस माध्यम के खिलाफ़ प्रतिरोध निरर्थक है "











रविवार, 7 सितंबर 2014

इंटरनेट पर वाम-वाम को राम राम



इंटरनेट और उससे जुड़े माध्यमों और विधा रुपों के आने के बाद से संचार की दुनिया में मूलगामी बदलाव आया है। वैचारिक संघर्ष पहले की तुलना में और भी ज़्यादा जटिल और तीव्र हो गया है। जनसंपर्क और जनसंवाद पहले की तुलना में कम खर्चीला और प्रभावशाली हो गया है। लेकिन वामदलों और ख़ासकर कम्युनिस्ट पार्टियों में इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल नज़र नहीं आती। यह सच है कि वामदलों के पास बुद्धिजीवियों का बहुत बड़ा ज़ख़ीरा है और ज्ञान के मामले में ये लोग विभिन्न क्षेत्र में बेजोड़ हैं। आज भी भारत की बेहतरीन समझ के विभिन्न क्षेत्रों में मानक इन्होंने ही बनाए हैं। लेकिन इंटरनेट जैसे प्रभावशाली माध्यम के आने के बाद वामदलों के रवैय्ये में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है।वामदल आज हाशिए पर हैं उसके कई कारण हैं उनमें एक बड़ा कारण है कम्युनिकेशन की नई वास्तविकता को आत्मसात न कर पाना। वे क्यों इंटरनेट के संदर्भ में अपनी गतिविधियों और संचार की भूमिका को सुसंगठित रुप नहीं दे पाए हैं यह समझना मुश्किल है। 
     वामदल जानते हैं कि नेट कम्युनिकेशन न्यूनतम खर्चे पर चलने वाला कम्युनिकेशन है। यह ऐसा कम्युनिकेशन है जो लोकतांत्रिक होने के लिए मजबूर करता है। यह दुतरफ़ा कम्युनिकेशन है। यहाँ दाता और गृहीता एक ही धरातल पर रहते हैं और रीयल टाइम में  मिलते हैं। यहाँ आप अपनी-अपनी कहने के लिए स्वतंत्र हैं साथ ही अन्य की रीयल टाइम में सुनने ,सीखने और बदलने के लिए भी मजबूर हैं। विचारों में साझेदारी और उदारता इसका बुनियादी आधार है। 
     वामदलों की नियोजित नेट गतिविधियाँ इकतरफ़ा कम्युनिकेशन की हैं और इसे बदलना चाहिए। दुतरफ़ा कम्युनिकेशन की पद्धति अपनानी चाहिए। वामदलों की वेबसाइट हैं लेकिन वहाँ यूजरों के लिए संवाद की कोई खुली जगह नहीं है।वामदलों के बुद्धिजीवियों- लेखकों आदि को कम्युनिकेशन के प्रति अपने पुराने संस्कारों को नष्ट करना होगा। 'हम कहेंगे वे सुनेंगे', ' हम लिखेंगे वे पढेंगे' , 'हम देंगे वे लेंगे' इस सोच के ढाँचे को पूरी तरह नष्ट करने की ज़रुरत है। नये दौर का नारा है 'हम कहेंगे और सीखेंगे',' हम कहेंगे और बदलेंगे'। 
     इंटरनेट कम्युनिकेशन आत्मनिर्भर संचार पर ज़ोर देता है । वामदलों के लोग परनिर्भर संचार में जीते रहे हैं। नए दौर की माँग है आत्मनिर्भर बनो। रीयल टाइम में बोलो। बिना किसी की इजाज़त के बोलो।पार्टी की लक्ष्मणरेखा के बाहर निकलकर लोकतान्त्रिक कम्युनिकेशन में शामिल हो और लोकतांत्रिक ढंग से कम्युनिकेट करो। पार्टी में नेता को हक़ है बोलने का , नेता को हक़ है लाइन देने का, पार्टी अख़बार में नेता को हक़ है लिखने का। लेकिन इंटरनेट में प्रत्येक पार्टी सदस्य और हमदर्द को हक़ है बोलने, लिखने और अपनी राय ज़ाहिर करने का। यह राय ज़ाहिर करने का वैध और लोकतांत्रिक मीडियम है । यह प्रौपेगैण्डा का भी प्रभावशाली मीडियम है। यह कम खर्चीला मीडियम है और इसमें शामिल होकर सक्रिय रहने से संचार की रुढियों से मुक्ति मिलने की भी संभावनाएँ हैं। अभी स्थिति यह है कि फ़ेसबुक पर वाम मित्र लाइक करने, एकाध पोस्ट लिखने, फ़ोटो शेयर करने से आगे बढ़ नहीं पाए हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए और वामदलों को सुनियोजित ढंग से अपने सदस्यों को खुलकर इंटरनेट माध्यमों पर अपनी राय ज़ाहिर करने के लिए प्रेरित करना चाहिए इससे पार्टी नेता की जड़ता, मूर्खता,कूपमंडूकता आदि से मुक्ति मिलेगी। 
     

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

फेसबुक और विचार


फेसबुक लेखन को कचड़ा लेखन मानने वालों की संख्या काफी है। ऐसे भी सुधीजन हैं जो यह मानते हैं कि केजुअल लेखन के लिए फेसबुक ठीक है गंभीर विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए यह माध्यम उपयुक्त नहीं है। यह धारणा बुनियादी तौर पर गलत है। फेसबुक पर आप चाहें तो विचारों का गंभीरता के साथ प्रचार-प्रसार भी कर देते हैं।


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फेसबुक पर व्यक्त विचारों का वैसे ही असर होता है जैसा असर किसी के भाषण को सुनते हुए होता है। एक ही शर्त है विचार खुले मन और बिना शर्त के साथ व्यक्त हों। पढ़ने वाला माने तो ठीक न माने तो ठीक। फेसबुक विचारों की कबड्डी का मैदान है। 


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फेसबुक में विचार महान होता है बोलने वाला नहीं। यहां पर आप अपने विचारों को अनौपचारिक तौर पर वैसे ही पेश करें जैसे चाची अपने विचार पेश करती है। बातों बातों में विचारों की प्रस्तुति ही फेसबुक की विचार-कला की धुरी है। 


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फेसबुक में विचार रखें और चलते बनें,विचारों के शास्त्रार्थ की यह जगह नहीं है। यह कम्युनिकेशन का मंच है और विचार को भी कम्युनिकेशन के ही रूप में आना चाहिए।फलतः विचार को विचारधारा के बंधनों से यहां मुक्ति मिल जाती है। विचार यहां कम्युनिकेशन है ,विचारधारा नहीं। कम्युनिकेशन सबका होता है ,जबकि विचारधारा वर्ग विशेष की होती है।
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फेसबुक पर अनेक विचारवान लोग हैं जो अपने सुंदर विचारों को व्यक्त इसलिए नहीं करते क्योंकि उनके विचारों को कोई चुरा लेगा।

विचारों की चोरी अच्छी बात है इसका ज्यादा से ज्यादा विकास होना चाहिए। यह विचारों का लोकतांत्रिकीकरण है। फेसबुक ने इस अर्थ में ज्ञान और विचार के लोकतांत्रिकीकरण को डिजिटल आयाम दिया है।यहां व्यक्त विचार कभी नहीं मरते। 


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मनुष्य का दिमाग बना है विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए, वह विचारों को कैदगाह करने के लिए नहीं बना। फेसबुक ने रीयल टाइम कम्युनिकेशन की संभावनाओं को साकार करके विचारों के पंखों को साकार किया है। संसार में विचारों से सस्ती कोई चीज नहीं है।

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विचार तो जीवन का मूल्यवान उपहार है। आप किसी व्यक्ति को कोई अच्छा विचार सम्प्रेषित करते हैं तो मूल्यवान गहना देते हैं। विचारों को पढ़ना और सुनना चाहिए। इससे मानवीयबोध समृद्ध होता है। फेसबुक की थुक्का-फजीहत और शैतानियों से निजात दिलाने में अच्छे विचार बड़ी मदद कर सकते हैं।


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फेसबुक की खूबी है कि इसमें आप इमेजों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इमेजों के साथ विचारों को भी बदलना चाहिए। हमारे अनेक फेसबुक मित्र हैं उनको उन्मुक्त भावों की इमेज या फोटो तो अपील करती है लेकिन उन्मुक्त उदार विचार अपील नहीं करते। मसलन् दुर्गा की इमेज तो अपील करती लेकिन दुर्गा के विचार अपील नहीं करते। इमेज बदलने के साथ विचारों में बदलाव आता है।


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फेसबुक पर सामान्य और विशिष्ट, शिक्षित और विद्वान सभी किस्म के लोग हैं जो लिख रहे हैं। बड़े दिमाग के बड़े आइडिया को सही परिप्रेक्ष्य में देखने में फेसबुक कम मदद करता है। बड़े आइडिया को कम बुद्धि के लोग जब देखते हैं तो उलझन में पड़ जाते हैं और अंटशंट लिखने लगते हैं। वे अपनी कम बुद्धि से बड़े विचारों को प्रदूषित करने की असफल चेष्टा करते हैं। 
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फेसबुक पर ऐसे भी मित्र हैं जो किसी भी विचार को पसंद नहीं करते और बकबास करने में सिद्धहस्त हैं। इस तरह के लोग अमूमन व्यक्तिगत हमले करते हैं। फेसबुक पर की गई बकबास अंततः बकबास है वह विचार नहीं है।
-11- 

फेसबुक पर ऐसे भी लोग है जिनके कोई विचार नहीं हैं लेकिन वे किसी न किसी विचार की छाया में रहते हैं। विचार की छाया में रहना ,विचारों में रहना नहीं है। ये वे लोग हैं जो विचार को ग्रहण नहीं कर पाए हैं,समझ ही नहीं पाए हैं। यानी वे विचार को मानते हैं,जानते नहीं।

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

हेकड़ी,अहंकार और फेसबुक

इस दौर में हेकड़ी बढ़ी है। भ्रष्टनेता से लेकर ईमानदार नौकरशाह तक सबमें हेकड़ी का विकास हुआ है। सामान्य कारिंदे से लेकर भिखारी तक सब हेकड़ी में बातें करते हैं। हेकड़ी को नव्यआर्थिक उदारीकरण ने नई बुलंदियों पर पहुँचाया है। पहले हम कभी इतने हेकड़ीबाज तो न थे। 

यहां हेकड़ी और अहंकार के नए रूप के फेसबुक के संदर्भ में नौ लक्षण नजर आ रहे हैं-

- 1-

चूंकि मुझे फोन आया या ईमेल अतः मैं हूँ। यानी मोबाइल फोन या ईमेल आपको मैं का एहसास कराते हैं। व्यक्तिवाद में इजाफा करते हैं।

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सुनियोजित आत्मप्रेम में वृद्धि हुई है। यह स्वाभाविक और सही दिशा है।

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फेसबुक-ब्लॉगिंग के आने के बाद सामान्यजन और लेखक के बीच जो अहं का अंतर था वह खत्म हो गया है। फेसबुक ने सभी में लेखकीय अहं पैदा किया है।

- 4-

इंटरनेट के पहले लेखकीय गरिमा थी,फेसबुक के साथ लेखकीय समर्पण का भावबोध प्रबल हुआ है। इसके कारण प्रतिवादी कम और सरेण्डर करने वाले विचार और प्रचार का वर्चस्व दिखाई देता है।

- 5-

फेसबुक ने लेखकीय अहंकार और अनुभूति दोनों की विदाई कर दी है। अब आप फेसबुक पर बिना किसी अहंकारबोध के साथ लिखें,लेखन को समर्पित करें और आनंद लें।

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लेखक और फेसबुकिए में एक साम्य है दोनों जल्द ही मूल्यनिर्णय करने लगते हैं। मूल्य निर्णय से बचना चाहिए।

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फेसबुक ने अहंकाररहित कम्युनिकेशन को संभव बनाया है। बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा व्यक्ति सहजभाव से अपनी बात कहकर खिसक लेता है। अहंकारहित कम्युनिकेशन जीवन का परमानंद है।

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फेसबुकिए की अपमानजनक या गंदी टिप्पणी पर अमूमन हम नाराज होते हैं, उसे ब्लॉग कर देने का विकल्प भी है, इससे यह धारणा भी बनती है कि फेसबुकिए के अहंकार का अभी तक पूरी तरह खात्मा नहीं हुआ है बल्कि फेसबुक ने नए किस्म का अहंकारबोध पैदा किया है।

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फेसबुकिए हेकड़ीबाज की विशेषता है कि वह अर्थ का अनर्थ करने और विषयान्तर करने में सिद्धहस्त होता है और एकदम असहिष्णु होता है।

गुरुवार, 7 जून 2012

फेसबुक सूक्तियां



कलाकार प्रशिक्षित होता है ।लेकिन फेसबुक यूजर न तो कलाकार है और न प्रशिक्षित है ,वह तो यूजर है।

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कलाओं में कुछ भी रचसकते हैं और उससे मुक्त भी हो सकते हैं। फेसबुक में यह संभव नहीं है। फेसबुक कला नहीं है।

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कलाकार और फेसबुक यूजर में यह साम्य है ,ये दोनों यथार्थ से जुड़े हैं और यथार्थ को व्यक्त करते हैं।कलाकार और फेसबुक यूजर दोनों आज सामाजिक शक्ति नहीं हैं।

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जिस तरह हर व्यक्ति कलाकार होता है, उसी तरह हर व्यक्ति नेट यूजर हो सकता है।

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जिस तरह कलाकार-लेखक और इनकी रचना के बीच में यह समझौता है कि वे एक-दूसरे से यह नहीं पूछते कि कहां जा रहे हो, इसी तरह फेसबुक यूजर और फेसबुक के बीच में यह समझौता है कि वे एक दूसरे से नहीं पूछते कि कहां जा रहे हो या क्या लिख रहे हो।

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जिस तरह लेखक-कलाकार का स्थान सामाजिक वर्ग से भिन्न होता है। उसे वर्ग से परे देखते हैं। वैसे ही फेसबुक यूजर को वर्गीय कोटि के परे रखकर देखना चाहिए।

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कला की एक ही भूमिका है कि वह मनुष्य को वैधता प्रदान करती है, उसका महिमामंडन करती है,ठीक फेसबुक या नेटलेखन की भी यह विशेषता है कि वह मनुष्य का महिमामंडन है।

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जिस तरह कलाकार के पास कई मुखौटे होते हैं वैसे ही फेसबुक या नेट यूजर के पास भी कई मुखौटे होते हैं।

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मैं जब भी फेसबुक लिखा देखता हूँ तो उसमें जीवन की खोज करता हूँ। फेसबुक ही जीवन है।

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अन्तोन चेखव के शब्दों को उधार लेकर कहें कि नेटलेखक या फेसबुक टिप्पणीकार की न तो कोई आकांक्षा है,न कोई उम्मीदें है।और वह किसी से डरता भी नहीं है।

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फेसबुक या नेट की गाडी में कोई सवारी नहीं है ,सब ड्राइवर हैं।

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फेसबुक या मीडिया के पतन की अवस्था में शिक्षा ही कवच है।

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कला हमें पुरानी संस्कृति की ओर अभिमुख रहती है।फेसबुक ताजा राय की ओर ।

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फेसबुक पर प्रयोगमूलक लेखन का एक तय अर्थ होता है।उसकी सीमा है। लेकिन फेसबुक पर घटिया या डर्टीलेखन प्लेग की तरह फैलता है। इसलिए फेसबुक पर डर्टीलेखन से बचना चाहिए।

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नयामीडिया हमसे या यथार्थ जगत से नहीं जोड़ता। वह नए जगत की इमेजों के साथ पुराने संसार को भी नई शक्ल प्रदान करता है।यही काम नए मीडिया केरूप में फेसबुक कर रहा है।

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मनुष्य पहले अपने टूल्स बनाता है फिर टूल्स मनुष्य को बनाते हैं।उसी तरह पहले आप फेसबुक खाता बनाएं ,लिखें, कम्युनिकेट करें , फिर फेसबुक आपको निर्मित करेगा।

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फेसबुक में यदि आप किसी एक विचार को मान लेते हैं या स्वीकार कर लेते हैं तो अन्य विचारों को अनलाइक नहीं करते, बल्कि जिन विचारों को नहीं मानते उनको भी लाइक करते हैं। कला-साहित्य में ऐसा नहीं होता।

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फेसबुक पर विचार और राजनीति के शिखरों के बीच में नॉनसेंस नृत्य करता रहता है।

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जिस तरह कोई व्यक्ति कागज शॉसेज के चिह्न को देखकर पिकासो के विभ्रम में रहता है। ठीक वही अवस्था फेसबुक लेखक की है।

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फेसबुक टिप्पणीकार पोस्टकार्ड लेखक की तरह है।इसका पर्सेप्शन भी पोस्टकार्डलेखक जैसा होता है।

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नेटलेखन या फेसबुक लेखन देखने में एक खासकिस्म का दुरंगापन है। यहां तर्क के पक्ष और विपक्ष दोनों ही रूप दिखते हैं। कुछलोग हैं जिन्हें फेसबुक नॉनसेंस लगता है। बेबकूफी और समय की बर्बादी लगता है। लेकिन कुछ हैं जिन्हें इसका उपयोग ज्ञान-विचार-राजनीति आदि के क्षेत्र में मददगार नजर आता है।फेसबुक असल में वाचिक चिन्तन को बढ़ावा देता है।

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फेसबुक पर आने वालों में नैतिकतावादियों और मस्ताने टिप्पणीकारों की बड़ी तादाद है। यहां भाषाज्ञानी या बुद्धिजीवी बहुत कम संख्या में हैं।इसके बावजूद फेसबुक लेखक को वाइचांस ही कोई बुद्धिजीवी के रूप में सम्मानित करे। फेसबुकलेखक क्या बुद्धिजीवी होता है ?

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जो लोग सामाजिक परिवर्तन में विश्वास करते हैं उनके लिए इंटरनेट,फेसबुक ब्लॉगिंग आदि आमलोगों में संचार का महान उपकरण या मीडियम है.इसकी उपेक्षा संभव नहीं है।

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फेसबुक से लेकर कलाओं तक नई बात,नया मुहावरा,नईभाषा, नई अभिव्यक्ति शैली और नया कंटेंट को हमेशा खतरे के रूप में देखा गया है। नए में खतरे कम और लाभ ज्यादा होते हैं।नए को अपनाओ और आगे जाओ।

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फेसबुक में सटीकबात से एक कदम आगे कही गयी बात मूर्खतापूर्ण लगती है। लेकिन बेबकूफी से एक कदम आगे बढ़ी हुई बात सटीक लगती है।

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फेसबुक की भूमिका है कि यह पर्सेप्शन को संकुचित नहीं होने देता है। नजरिए को उदार बनाता है। इस तरह के लक्षण कला और साहित्य में भी पाए जाते हैं।

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फेसबुक में व्यक्त टिपप्णियां और संवेदनाओं से पढ़नेवाले की संवेदनाएं और नजरिया समृद्ध होता है।

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सोमवार, 28 मई 2012

सांस्कृतिक मालों के अपहरण का मायावीतंत्र है यू-ट्यूब



सिनेमा ने दृश्यमाध्यम के रूप में नई आधुनिकता सामाजिकता को बुलंदियों तक पहुँचाया। नए मीडियम के रूप में कैमरे ने सभी शास्त्रों के शस्त्रों को अपदस्थ कर दिया। यही कैमरा जब डिजिटल और सैटेलाइट के सहमेल से नई भूमिका में बदला तो उसने एकदम नयी कम्युनिकेशन  संस्कृति को जन्म दिया।जिसका नाम है यू-ट्यूब । इसकी दुनिया विकसित पूंजीवादी संस्कारों के चरमोत्कर्ष की पारदर्शी और नियंत्रित दुनिया है। 

यू-ट्यूब का समूचा फॉरमेट देखने में स्वतंत्र अभिव्यक्ति के मंच जैसा है। लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं है। यह फॉरमेट बुनियादी तौर पर सांस्कृतिक इजारेदारी के डिजिटल फॉरमेट की आदर्श अभिव्यक्ति है। मसलन्, इस फॉरमेट के आधार पर समूचा संगीत और सिनेमा उद्योग अरबों रूपये के व्यावसायिक लाभ से वंचित कर दिया गया है।अन्य देशों और व्यक्तियों की सांस्कृतिक संपदा और बौद्धिक-संपदा को अपहृत करके इजारेदार कंपनी के मुनाफे की मशीन बना दिया गया है। यू-ट्यूब ने अनेक विश्व कन्वेंशनों को कागजी बना दिया है। लेखकों,कलाकारों, संगीतकारों, फिल्ममेकरों के कॉपीराइट का खुला उल्लंघन करते हुए उनके सांस्कृतिक मालों को यू-ट्यूब के मालिकों की सांस्कृतिक संपदा बना दिया है।

यू-ट्यूब के अनुसार 500 वर्ष के बराबर यू-ट्यूब वीडियो प्रति दिन फेसबुक पर देखे जाते हैं, और प्रति मिनट 700 से अधिक यू-ट्यूब वीडियो ट्विटर पर शेयर किए जाते हैं। प्रत्येक सप्ताह 100 मिलियन लोग यू-ट्यूब पर सामाजिक रूप से सक्रिय रहते हैं (पसंद करते हैं, शेयर करते हैं, टिप्‍पणियां करते हैं, आदि)।

स्वचालित रूप से शेयर किए गए एक ट्वीट के परिणामस्वरूप औसतन 6 नए यू-ट्यूब सत्र होते हैं, और हम प्रति मिनट यू-ट्यूब लिंक वाले 500 से अधिक ट्वीट देखते हैं।हर दिन कई मिलियन ग्राहक बनते हैं. ग्राहकी आपको उस व्‍यक्ति से कनेक्‍ट होने देती है, जिसमें आपकी रुचि है — चाहे वह मित्र हो, या NBA — और साइट पर उनकी गतिविधि बनाए रखने की सुविधा देती है। यू-ट्यूब पर 50% से अधिक वीडियो रेट किए गए हैं या उनमें समुदाय की टिप्‍पणियां शामिल हैं।हर दिन कई मिलियन वीडियो पसंदीदा बनाए जाते हैं। यू-ट्यूब पर 50% से अधिक वीडियो रेट किए गए हैं या उनमें समुदाय की टिप्‍पणियां शामिल हैं।हर दिन कई मिलियन वीडियो पसंदीदा बनाए जाते हैं।

यू ट्यूव दृश्यमीडिया में क्रांतिकारी छलांग है। इसका कन्‍टैंट आईडी हर दिन 100 से अधिक वर्षों का वीडियो स्‍कैन करता है।प्रत्येक प्रमुख यूएस नेटवर्क प्रसारणकर्ता, फिल्‍म स्‍टूडियो और रिकॉर्ड लेबल सहित, 3,000 से अधिक सहयोगी कन्टैंट आईडी का उपयोग करते हैं।इसके कन्टैंट आईडी डेटाबेस में आठ मिलियन (500,000 घंटों से अधिक समय की सामग्री) से अधिक संदर्भ फ़ाइलें हैं; यह दुनिया में सबसे समृद्ध है. पिछले वर्ष से संख्‍या दोगुनी हो गई है।यू-ट्यूब के कुल मुद्रीकृत दृश्‍यों का एक तिहाई से अधिक भाग कन्टैंट आईडी से आता है।कन्टैंट आईडी के द्वारा 120 मिलियन से अधिक वीडियो पर दावा किया गया।

यू-ट्यूब में एक माह के भीतर 60 वर्षों में बनाए गए 3 मुख्‍य यूएस नेटवर्क की अपेक्षा अधिक वीडियो अपलोड किए गए।यू-ट्यूब का 70% ट्रैफिक यूएस के बाहर से आता है।यू-ट्यूब 39 देशों और 54 भाषाओं में स्‍थानीयकृत किया जा चुका है।सन् 2011 में, यू-ट्यूब के पास 1 ट्रिलियन से भी अधिक देखे जाने की संख्‍या या धरती के प्रत्‍येक व्‍यक्ति के लिए लगभग 140 बार देखे जाने की संख्‍या थी।

प्रति मिनट 60 घंटे के बराबर वीडियो अपलोड किए जाते हैं, या यू-ट्यूब पर प्रति सेकंड एक घंटे के वीडियो अपलोड किए जाते हैं।एक दिन में 4 बिलियन से अधिक वीडियो देखे जाते हैं.हर माह 800 मिलियन अद्वितीय प्रयोक्ता YouTube पर विज़िट करते हैं। यू-ट्यूब पर हर माह 3 बिलियन घंटे के बराबर वीडियो देखे जाते हैं।

गुरुवार, 17 मई 2012

फेसबुक का लक्ष्य है सामाजिक खुलापन ,अंतहीन साझेदारी और संपर्क

फेसबुक के सर्जक मार्क जुकेरबर्ग ने सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज कमीशन के सामने एस- 1 के तहत सन् 2012 के आरंभ में जो बयान दिया है उसमें उसने कहा है कि फेसबुक का लक्ष्य है विश्व में ज्यादा खुलापन और संपर्क पैदा करना । यानी ज्यादा खुला और कनेक्टेड संसार निर्मित करना फेसबुक का लक्ष्य है। फेसबुक ने अपने इस लक्ष्य के लिए लगातार अपनी तकनीकी और फेसबुक सुविधाओं में निरंतर सुधार करके अपडेटिंग और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को तेज किया है। फेसबुक का दूसरा बड़ा लक्ष्य है अंतहीन साझेदारी। विचार से लेकर वीडियो तक सभी चीजों की सीमाहीन साझेदारी का ऐसा सुंदर मंच मानव सभ्यता में पहले कभी नहीं दिखा । इस क्रम में अनेक मामलों में कॉपीराइट के अनेक नियम भी टूटे हैं।

फेसबुक ने मात्र 8सालों में 75करोड़ लोगों को अपने से जोड़ लिया है। किसी अकेले मीडियम का इतनी बड़ी संख्या में जुड़ना स्वयं में बहुत बड़ी बात है।इतने कम समय में टीवी ने भी यह सफलता नहीं पाई थी। आज फेसबुक पर प्रतिमाह व्यक्ति 7 घंटे खर्च करता है।सन् 2009 में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 4घंटे खर्च करता था। मनुष्यों को एक साथ जोड़ने वाला कोई और प्लेटफॉर्म नहीं है।

फेसबुक पर नाराजगी जताने या उसके यूजरों पर नाराज होने से फेसबुक कम्युनिकेशन की समस्या हल होने वाली नहीं है। इंटरनेट में आज सभी किस्म के कम्युनिकेशन समाहित हो चुके हैं। फोन से लेकर डाकूमेंटस तक,रेडियो से लेकर वीडियो तक।

पहले लोग सोच रहे थे बेव और इंटरनेट की दुनिया महान है लेकिन फेसबुक ने अब इस सबको चुनौती दे दी है। फेसबुक पर हम सब वैसे ही विचरण कर रहे हैं जैसे भाड़े की जमीन पर किसान खेती करता है।वह जितनी मेहनत करता है उतनी बेहतर फसल पैदा होती है। ठीक वैसे ही हम फेसबुक पर हम जितनी मेहनत करेंगे फेसबुक को उतना ही सुंदर बना सकते हैं। प्लेटफॉर्म किसी और का है, लेकिन हम सब उसके किराएदार हैं । कल तक फेसबुक पर विचरण करने को समय की बर्बादी कहा जाता था,लेकिन आज ऐसा नहीं है।जबकि आज कहा जा रहा है कि यह सबसे सस्ता माध्यम है। यह भी कहा जा रहा है कि फेसबुक से समाज के बुनियादी मूल्यों और प्राइवेसी को खतरा है। असल में फेसबुक आक्रामक और प्रभावशाली मीडियम है, इससे खतरे कम हैं फायदे ज्यादा हैं।

फेसबुक ने 8 साल में 75करोड़ लोगों को जोड़ा है,लेकिन इंटरनेट जिस गति से लोगों से जुड़ रहा है उसके अनुसार इतने लोग जोड़ने में उसे 30 साल लगेंगे।पूंजीवाद के इतिहास में कम्युनिकेशन और संपर्क की फेसबुक महानतम उपलब्धि है। इस उपलब्धि को हम सभी बेहतर सभ्य भाषा में इस्तेमाल करें तो ज्यादा स्थायी दोस्त बना सकते हैं।

मंगलवार, 1 मई 2012

ओम थानवी और माध्यम निरक्षरता



            
ओम थानवी साहब बहुत अच्छे व्यक्ति हैं। मैं कभी उनसे नहीं मिला हूँ।लेकिन उनके लिखे को इज्जत के साथ पढ़ता रहा हूँ। "आवाजाही" शीर्षक से उन्होंने 29अप्रैल 2012 को जनसत्ता में एक लेख लिखा है,वह एक संपादक के ज्ञान का आभास कम और माध्यम निरक्षरता का एहसास ज्यादा कराता है।  
     ओम थानवी का लेख चौंकाने वाला है। यह लेख इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि एक्सप्रेस ग्रुप के एक अखबार के संपादक को इंटरनेट जैसे महान माध्यम का सही ज्ञान नहीं है। इंटरनेट-फेसबुक आदि के बारे में थानवी साहब का मानना है ," इंटरनेट बतरस का एक लोकप्रिय माध्यम बन गया है। घर-परिवार से लेकर दुनिया-जहान के मसलों पर लोग सूचनाओंजानकारियोंविचारों का आदान-प्रदान करते हैंप्रतिक्रिया देते हैं। ब्लॉगपोर्टल या वेब-पत्रिकाएं और सार्वजनिक संवाद के सोशल’ ठिकाने यानी फेसबुक-ट्वीटर आदि की खिड़कियां आज घर-घर में खुलती हैं। गली-मुहल्लोंचाय की थड़ी या कहवा-घरोंक्लबों-अड्डों या पान की दुकानों की प्रत्यक्ष बातचीत के बरक्स इंटरनेट की यह बतरस काम की कितनी हैमेरा अपना अनुभव तो यह है कि त्वरित और व्यापक संचार के बावजूद इंटरनेट के मंचों पर बात कम और चीत ज्यादा होती है। "
     थानवी साहब यह बताएं क्या अखबार में छपे पर पाठक बात नहीं करते ? रसमय चर्चा नहीं करते? बहसें नहीं करते ?क्या अखबार के सब पाठक अक्लमंद होते हैं ? और अखबार में क्या सब ज्ञान में डूबा हुआ ही छपता है ? आप जानते हैं अज्ञानी संपादक बड़ा खतरनाक होता है।  जो संपादक नहीं जानता वो पढ़ता है ,जानने की कोशिश करता है। लेकिन आप तो महान हैं आपने बिना जाने ही इंटरनेट आदि के बारे में फतवा जारी कर दिया। बिना जाने लिखना पत्रकारिता की भाषा में पीत पत्रकारिता की कोटि में आता है।
    थानवी इंटरनेट को वास्तव में सोशल ठिकाने के रूप में नहीं देख रहे। यह बेहद ताकतवर मीडियम है। बेहतर हो थानवी भी इसका आनंद लें। बैसे वे भी आनंद लेते हैं। थानवी ने अपने नाती की खबर सबसे पहले फेसबुक पर दी और हम सबने खुशियां मनाईं। अब आप ही कहें कि हम आपके समाज में आते हैं या नहीं,यदि नहीं आते तो आपने नाती होने की खबर फेसबुक पर क्यों दी ? क्या वो बतरस था? जी नहीं . थानवी जी, नाती की खबर ठोस सच है। और यह फेसबुक पर ही संभव है कि आप अपनी खुशी का इजहार कर सकें। हमें यह कहते हुए कष्ट हो रहा है कि आप जिस अखबार के संपादक हैं वहां यह खबर पहले पन्ने पर तो छोडें किसी पन्ने पर भी नहीं छाप सकते। क्या आप अन्य किसी अखबार में नाती के होने और अपनी खुशी की खबर को छपवा सकते हैं ? यह सिर्फ इंटरनेट –फेसबुक-ब्लॉग आदि में संभव है। अतःइंटरनेट के प्रति आप अपना नजरिया बदलें और गंभीरता पैदा करें। थानवी जी आप जानते हैं अखबार गंदे और घटिया भी निकलते हैं, संपादकों में ऐसे लोग हैं जो कमीने किस्म के हैं। लेकिन जनसत्ता वैसा अखबार नहीं है और आप एक अच्छे संपादक हैं। क्या गंदे अखबारों के कारण हम समूचे प्रेस को गाली दें या हंसी उडाएं ? आपने फेसबुक-ब्लॉग पर लिखे को संभवतः ध्यान से नहीं पढ़ा है। वरना आप यह सब नहीं लिखते। एक प्रतिष्ठित अखबार के संपादक होने के नाते आपने अपने अखबार का इंटरनेट के खिलाफ दुरूपयोग किया है। उसके बारे में गलत राय प्रचारित की है। आपने जो बात कही है वह बात यदि कोई सामान्य व्यक्ति कहता तो उपेक्षा कर सकते थे, लेकिन एक संपादक कहे तो उपेक्षा की नहीं ,कड़ी आलोचना की जरूरत होती है। कायदे से आप ईमानदारी दिखाएं और अपने लेख के जबाब में इंटरनेट पर जो लेख आ रहे हैं उन्हें अपने अखबार में जगह दें ,यह लोकतंत्र और ईमानदार पत्रकारिता का तकाजा है।
थानवी साहब दूसरी बड़ी भूल आपने यह की है कि रीयलटाइम कम्युनिकेशन के माध्यमों में चल रही बहस पर आपने यथास्थान अपनी राय नहीं लिखी। वहां पर आप लिख सकते थे लेकिन आप अपनी संपादकीय हैसियत के नशे में चूर , संपादकीय सत्ता और पन्ने का दुरूपयोग करते हुए अपना लेख लिखने में लग गए। आपकी कोई राय है और वह नेट पर चल रही किसी बहस के बारे में है तो आपको यथास्थान अपनी राय व्यक्त करनी चाहिए। इससे संबंधित लोग अपनी राय भी दे सकें।
    थानवी ने लिखा है- "उदाहरण के लिए हाल में इंटरनेट पर विकट चर्चा में रहे दो कवियों का मसला लें। विष्णु खरे और मंगलेश डबराल को लेकर कुछ लोगों ने रोष प्रकट किया। उन्हीं की विचारधारा वाले सहोदरउन पर पिल पड़े। मंगलेश तो नेट-मार्गी हैं नहीं, इ-मेल भेज-भिजवा देते हैं। विष्णु खरे चौकन्ने होकर ब्लॉग-ब्लॉग की खबर रखते हैं, उन्हीं के शब्दों में- ‘‘(ताकि) देख पाऊं कि उनमें जहालत की कौन-सी ऊंचाइयां-नीचाइयां छुई जा रही हैं।’’ इसी सिलसिले में वे इंटरनेट पर नई पीढ़ी के जुझारू ब्लॉगरों- नेटवर्करों से जूझते देखे गए, डबराल नहीं। हालांकि डबराल की चुप्पी को लोग संदेह की नजर से देख रहे हैं।" इसके बाद थानवी ने विष्णु खरे, गुंटर ग्रास, मंगलेश डवराल , उदयप्रकाश आदि को अप्रासंगिक और गलत समझ के साथ घसीटा है।
    थानवी का मानना हैकि  लेखकों में आवाजाही रहनी चाहिए। विचारधारा की भिन्नता के बावजूद आवाजाही रहे। सवाल यह है कि इंटरनेट-फेसबुक-ब्लॉग आदि में लेखकों और पाठकों के बीच जो भी कम्युनिकेशन है वो वस्तुतः खुली आवाजाही है। लेकिन यह तो  आपको पसंद नहीं है। लेखकों में दलबंदी है, पसंद-नापसंद,विचारधारात्मक मित्रता आदि फिनोमिना मिलते हैं। लेकिन यह तो अखबारों में भी है। मीडिया में भी है। देवताओं और दर्शन में भी है।वर्ग समाज में यह स्वाभाविक चीज है।
    बुनियादी तौर पर ओम थानवी का लेख लक्ष्यहीन है और साहित्यिक पीतपत्रकारिता के नजरिए से लिखा गया है। इसमें लेखकों के प्रति उनके निजी दुराग्रह व्यक्त हुए हैं।  आयरनी यह है कि लेख का शीर्षक है आवाजाही लेकिन इसमें बार बार उल्लिखित ( विष्णु खरे,मंगलेश डबराल, उदयप्रकाश  आदि) लेखकों के प्रति पूर्वाग्रह व्यक्त हुए हैं। दूसरी बात यह कि लेखक संगठनों और उनसे जुड़े लेखकों के बारे में थानवी ने जो लिखा है वह तथ्यहीन है।  इससे यह भी संकेत मिलता है कि ओम थानवी को लेखक संगठनों की गतिविधियों और कार्यप्रणाली का ज्ञान नहीं है। भारत में लेखक संगठन बेहद कमजोर हैं। उनमें यदा-कदा संकीर्णता भी दिखती है, लेकिन आम लेखकों में संकीर्णता कम है।
   लेखक संगठनों के बारे में एक बड़े अखबार के संपादक के रूप में ओमथानवी  की टिप्पणी बताती है कि थानवी को लेखक संगठनों और हिन्दी लेखकों की मित्रता का कोई एहसास नहीं है।  देखें-  "प्रगति या जन-गण की बात करने वाले अपनी ही विचारधारा के घेरे में गोलबंद होने लगे, इसके लिए खुद विचार’-वान लेखक कम कसूरवार नहीं हैं। पहले देश में कभी एक कम्युनिस्ट पार्टी थी और उसके पीछे चलने वाला एक लेखक संघ। पार्टी टूटी तो संघ के लेखक भी टूट गए। एक और लेखक संघ बना। बाद में एक और। इन लेखक संघों ने अक्सर अपने मत केलेखकों को ऊंचा उठाने की कोशिश की है और दूसरों को गिराने की। एक ही विचारधारा के होने के बावजूद लेखक संघों में राग-विराग देखा जाता है। लेखक का स्तर या वजन भी संघ के विश्वास के अनुरूप तय होने लगा है। इसी संकीर्णता की ताजा परिणति है कि कौन लेखक कहां जाए, कहां बैठे, क्या कहे, क्या सुने- इसका निर्णय भी अब लेखक संघ या सहमत-विचारों वाले दूसरे लेखक करने लगे हैं। "
     हिन्दी लेखक स्वभाव और व्यवहार में संकीर्ण नहीं है। यदि ऐसा होता तो नामवर सिंह तरूणविजय की किताब का लोकार्पण क्यों करते ? उदयप्रकाश अवैद्यनाथ के साथ मंच पर क्यों जाते ? मंगलेश डबराल संघ परिवार के बंदे के साथ एक ही मंच पर क्यों जाते ? लेखकों का एक बहुत छोटा तबका है जो अनुदार है। अधिकांश लेखक उदार हैं। हां , एक चीज है जो लेखकों के नजरिए पर असर डाल रही है वह है गैर-पेशेवर हिन्दी का वातावरण।इस वातावरण को परवर्ती पूंजीवाद की संगति में विकसित होना चाहिए। हिन्दी लेखकों में अभी भी कबीलाई लक्षण बीच बीच में चमक मारते हैं।  
    ओम थानवी लेख लिखते समय तय करके बैठे थे, लेकिन लेख बन नहीं पाया, यही वजह है कि वे किसी एक मसले पर फोकस नहीं कर पाए हैं। वे प्रत्येक पैराग्राफ में विषयान्तर करते हैं। एक संपादक का विषय पर फोकस न करना बेहद त्रासद और दुखद है। संयोग से वे जनसत्ता जैसे अखबार के संपादक हैं जो अपने फोकस मिजाज के लिए जाना जाता है। लेखक का विषय पर स्थिर न रह पाना दो कारणों से होता है पहला सामग्री के अभाव ,ज्ञान और सही परिप्रेक्ष्य के अभाव के कारण और दूसरा दिमागी गड़बड़ी के कारण। ओम थानवी के लेख पर पहला कारण एकदम सटीक बैठता है। काश ! उन्होंने अज्ञेय की संगति में रहकर फोकस लेखन की कला ही सीखी होती। रही बात आवाजाही की तो अखबार,फिल्म आदि जनमाध्यमों में संकीर्णता है।रूढ़ियां हैं।  इन माध्यमों की सीमा और संकीर्णताओं को इंटरनेट,फेसबुक और ब्लॉग लेखन ने हमेशा के लिए नष्ट कर दिया है। असल में इंटरनेट लेखन और लेखक के जीवन में छलांग है। क्रांति है। इसे हल्के फुल्के माध्यम के रूप में देखने की भूल नहीं करनी चाहिए।














सोमवार, 23 अप्रैल 2012

विचारधारा का कम्युनिकेशन में अवमूल्यन है फेसबुक


                   
       फेसबुक के 85 करोड़ यूजर हैं और इसने पिछले साल 3.7 बिलियन डॉलर का मुनाफा कमाया है। कंपनी का मानना है कि वह आगामी दिनों में बाजार से 5बिलियन डॉलर शेयर बेचकर उठाएगी। इस कंपनी की हैसियत 100 बिलियन से ऊपर आंकी जा रही है।
फेसबुक महज एक कंपनी नहीं है वह नए युग की कम्युनिकेशन, सभ्यता-संस्कृति की रचयिता भी है। यह बेवदुनिया की पहली कंपनी है जिसके एक माह में 1 ट्रिलियन पन्ने पढ़े जाते हैं। प्रतिदिन फेसबुक पर 2.7बिलियन लाइक कमेंटस आते हैं। किसी भी कम्युनिकेशन कंपनी को इस तरह सफलता नहीं मिली ,यही वजह है कि फेसबुक परवर्ती पूंजीवाद की संस्कृति निर्माता है। वह महज कंपनी नहीं है।
गूगल के सह-संस्थापक सिर्गेयी ब्रीन ने इंटरनेट के भविष्य को लेकर गहरी चिन्ता व्यक्त की है। इंटरनेट की अभिव्यक्ति की आजादी को अमेरिका और दूसरे देशों में जिस तरह कानूनी बंदिशों में बांधा जा रहा है उससे मुक्त अभिव्यक्ति के इस माध्यम का मूल स्वरूप ही नष्ट हो जाएगा।
फेसबुक पर यदि कोई यूजर कहीं से सामग्री ले रहा है और उसे पुनः प्रस्तुत करता है और अपने स्रोत को नहीं बताता तो इससे नाराज नहीं होना चाहिए। यूजर ने जो लिखा है वह उसके विचारधारात्मक नजरिए का भी प्रमाण हो जरूरी नहीं है।
फेसबुक तो नकल की सामग्री या अनौपचारिक अभिव्यक्ति का मीडियम है। यह अभिव्यक्ति की अभिव्यक्ति  या कम्युनिकेशन का कम्युनिकेशन है। यहां विचारधारा, व्यक्ति, उम्र,हैसियत,पद. जाति, वंश, धर्म आदि के आधार पर कम्युनिकेशन नहीं होता। फेसबुक में संदर्भ और नाम नहीं कम्युनिकेशन महत्वपूर्ण है। फेसबुक की वॉल पर लिखी इबारत महज लेखन है। इसकी कोई विचारधारा नहीं है। फेसबुक पर लोग विचारधारारहित होकर कम्युनिकेट करते हैं। विचारधारा के आधार पर कम्युनिकेट करने वालों का यह मीडियम " ई" यूजरों से अलगाव पैदा करता है।
फेसबुक विचारधारात्मक संघर्ष की जगह नहीं है। यह मात्र कम्युनिकेशन की जगह है। इस क्रम में मूड खराब करने या गुस्सा करने या सूची से निकालने की कोई जरूरत नहीं है। हम कम्युनिकेशन को कम्युनिकेशन रहने दें। कु-कम्युनिकेशन न बनाएं। फेसबुक कम्युनिकेशन क्षणिक कम्युनिकेशन है। अनेक बार फेसबुक में गलत को सही करने के लिए लिखें ,लेकिन इसमें व्यक्तिगत आत्मगत चीजों को न लाएं। दूसरी बात यह कि फेसबुक मित्र तो विचारधारा और पहचानरहित वायवीय मित्र हैं। आभासी मित्रों से आभासी बहस हो।यानी मजे मजे में कम्युनिकेट करें। असल में ,विचारधारा का कम्युनिकेशन में अवमूल्यन है फेसबुक।
        एक अन्य सवाल उठा है कि  क्या फेसबुक और ट्विटर ने अकेलेपन को कम किया है या अकेलेपन में इजाफा किया है ? यह अकेले व्यक्ति को और भी एकांत में धकेलता है। संपर्क तो रहता है ,लेकिन संबंधों का बंधन नहीं बंधने देता। दोस्त तो होते हैं लेकिन कभी मिलते नहीं हैं।
     फेसबुक ने मनुष्य की मूलभूत विशेषताओं को कम्युनिकेशन का आधार बनाकर समूची प्रोग्रामिंग की है। मनुष्य की मूलभूत विशेषता है शेयर करने की और लाइक करने की। इन दो सहजजात संवृत्तियों को फेसबुक ने कम्युनिकेशन का महामंत्र बना डाला। इसमें भी फोटो शेयरिंग एक बड़ी छलांग है। यूजर जितने फोटो शेयर करता है वह नेट पर उतना ही ज्यादा समय खर्च करता है। आप जितना समय खर्च करते हैं उतना ही खुश होते हैं और फेसबुक को उससे बेशुमार विज्ञापन मिलते हैं । विगत वर्ष फेसबुक को विज्ञापनों से 1 बिलियन डॉलर की कमाई हुई है। असल में फेसबुक सामुदायिक साझेदारी का माध्यम है।यदि कोई इसे घृणा का माध्यम बनाना चाहे तो उसे असफलता हाथ लगेगी। फेसबुक में धर्म,धार्मिक प्रचार, राजनीतिक प्रचार आदि सब सतह पर विचारधारात्मक लगते हैं लेकिन प्रचारित होते ही क्षणिक कम्युनिकेशन में रूपान्तरित हो जाते हैं। विचारधारा और विचार का महज कम्युनिकेशन में रूपान्तरण एक बड़ा फिनोमिना है। जिनकी तरीके से देखने की आदत है वे इस तथ्य को अभी भी पकड़ नहीं पा रहे हैं।
     इंटरनेट के समानान्तर सैटेलाइट टीवी और मोबाइल कम्युनिकेशन का भी तेजी से विस्तार हुआ है। नई पूंजीवादी संचार क्रांति समाज को स्मार्ट मोबाइल क्रांति की ओर धकेल रही है। स्मार्ट मोबाइल के उपभोग के मामले में चीन ने सारी दुनिया को पीछे छोड़ दिया है। भारत में बिजली की कमी के अभाव में रूकी संचार क्रांति निकट भविष्य में स्मार्ट मोबाइल फोन से गति पकड़ेगी ।  स्मार्ट फोन के जरिए हम पीसी-लैपटॉप को भी जल्द ही पीछे छोड़ जाएंगे ।  

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

सावधान इंटरनेट पर सीआईए आपकी जासूसी कर रहा है


   कल तक इंटरनेट पर आनंद और स्‍वाधीनता के दि‍न थे। अब खतरा सामने आ गया है। अमेरि‍की गुप्‍तचर संस्‍था सीआईए ने अपने पैर इंटरनेट पर रख दि‍ए हैं। सीआईए की नजरदारी का काफी गंभीर अर्थ है। अब सीआईए के 'ई जासूस' आपके ब्‍लॉग पढ़ना चाहते हैं,ट्वि‍टर और फेसबुक में आप क्‍या कर रहे हैं उसे देखना चाहते हैं। यहां तक कि‍ वे यह भी जानना चाहते हैं कि‍ इंटरनेट से आप कौन सी कि‍ताब 'अमाजॉन' से खरीद रहे हैं ,कौन सी कि‍ताब आप इंटरनेट पर पढ़ रहे हैं। इस सबका हि‍साब सीआईए तैयार कर रहा है। अमेरि‍का की एक नि‍वेश कंपनी ' इन -क्‍यू- टेल' ने अपनी पूंजी का बड़ा हि‍स्‍सा इस क्षेत्र में नि‍वेश करने का फैसला लि‍या है। यह फर्म सीआईए की सहयोगी कंपनी है। इस कंपनी ने दृश्‍य तकनीकी संसार में पैसा लगाने का फैसला कि‍या है। यह काम वह अनेक साफटवेयर कंपनि‍यों में पैसा नि‍वेश करके करना चाहती है। इसके बहाने वह पूरे इंटरनेट पर नजरदारी करेगी।
     अमेरि‍का में गुप्‍तचर सेवाओं में एक बड़ा आन्‍दोलन चल रहा है जि‍सके तहत नेट की सूचनाओं को जानने,एकत्रि‍त करने और फि‍र उसे सीआईए,एफबीआई आदि‍ के काम में लगाने के लि‍ए हजारों लोग लगे हैं। अब आपकी इंटरनेट पर लि‍खी प्रत्‍येक चीज उनके नि‍शाने पर है। 
    इस समय इंटरनेट पर मीडि‍या के वि‍भि‍न्‍न माध्‍यमों के जरि‍ए सूचनाओं,कार्यक्रमों आदि‍ के संचार की बाढ़ आयी हुई है। एक अनुमान के अनुसार वेब 2.0 साइट पर जाने वाले लोगों की तादाद प्रति‍दि‍न पांच लाख है। इसी तरह तकरीबन एक मि‍लि‍यन से ज्‍यादा लोग प्रति‍दि‍न ब्‍लॉग,बातचीत,ई व्‍यापार, फ्लि‍कर,यू ट्यूब,आदि‍ का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। सीआईए के गुप्‍तचर अपने '' जासूसों के जरि‍ए यह भी वर्गीकरण कर रहे हैं कि‍ कौन कि‍तना प्रभावशाली संप्रेषण कर रहा है। प्रभावशाली,कम प्रभावशाली और सामान्‍य संप्रेषण के नाम से तीन वर्ग बनाए गए हैं। वे यह भी देख रहे हैं कि‍ यूजर कि‍स तरह की प्रति‍क्रि‍याएं व्‍यक्‍त कर रहा है। यूजर कौन सी पोस्‍ट को फार्वर्ड कर रहा है। नेट लेखक के साथ  यूजर कि‍स तरह का संवाद कर रहा है। जि‍न मसलों पर सोशल नेटवर्क या ब्‍लाक पर चर्चाएं हो रही हैं उनका वि‍श्‍व राजनीति‍ पर क्‍या असर होगा। अगर असर गंभीर होने की संभावनाएं हैं तो सीआईए जासूस चेतावनी देंगे। ये बातें 'इन-क्‍यू टेल' के प्रवक्‍ता डोनाल्‍ड ति‍घे ने कही हैं।  इस कार्य के लि‍ए खास कि‍स्‍म का सॉफ्टवेयर इस्‍तेमाल कि‍या गया है जि‍सके जरि‍ए आपकी सूचनाएं एकत्रि‍त की जा रही हैं। यह सॉफ्टवेयर बताता है कि‍ कि‍सकी पोस्‍ट पॉजि‍टि‍व है, कि‍सकी नेगेटि‍व है। वि‍भि‍न्‍न संचार उपकरण बनाने वाली कंपनि‍यां और संचार बहुराष्‍ट्रीय कंपनि‍यां इस सॉफटवेयर का इस्‍तेमाल कर रही हैं। 'इन-क्‍यू-टेल' कंपनी अपनी इस योजना के आधार पर एक पायलट सर्वे करने जा रही है और यह पायलट सर्वे यदि‍ सफल रहता है तो इसके बड़े ही दूरगामी परि‍णाम होंगे। यह सीधे व्‍यक्‍ति‍ के मौलि‍क अधि‍कारों के साथ मानवाधि‍कारों का हनन है। 'आई-क्‍यू-टेल' कंपनी ने इस काम में अभी 90 लोगों को लगाया हे और आरंभि‍क तौर पर 20 मि‍लि‍यन डालर का नि‍वेश कि‍या है, लेकि‍न यह नि‍वेश बढ़ भी सकता है। इस मामले में वि‍देशी भाषाओं पर भी नजरदारी रहेगी। अभी 9 वि‍देशी भाषाएं इस प्रयोग के लि‍ए चुनी गयी हैं। यह सारा काम 'वि‍जि‍वि‍ल टेक्‍नोलॉजी' कंपनी के जरि‍ए कराया जा रहा है। उसने ही इसका सॉफ्टवेयर बनाया है। यह कंपनी 2008 से इस क्षेत्र में प्रवेश पाने की कोशि‍श कर रही थी और अंत में उसे सफलता मि‍ल ही गयी। यह कंपनी अमरीकी गुप्‍तचर संस्‍था की सहयोगी कंपनी के रूप में काम कर रही हे और इसने वि‍भि‍न्‍न भाषाओं के वि‍शेषज्ञ और सैन्‍य वि‍शेषज्ञ इंजीनि‍यर जुगाड़ कि‍ए हैं। इनका काम है वि‍भि‍न्‍न भाषाओं की नेट संचार सामग्री की जांच-पड़ताल करना। इस समय अरबी,फ्रेंच, उर्दू, फारसी और रूसी पर नजरदारी चल रही है। इस कंपनी ने अपनी 'सूचना व्‍यवस्‍था सुरक्षा इंजीनि‍यरों' की एक वि‍शालकाय फौज तैयार की है इसमें सूचना तकनीक के कुशल लोगों को शामि‍ल कि‍या गया है। इसमें वे लोग भी शामि‍ल कि‍ए गए हैं जो पॉलि‍ग्राफ सुरक्षा में कुशल माने जाते हैं।
    सीआईए परेशान है सोशल नेटवर्किंग साइट की बढ़ती जनप्रि‍यता से। वे लगातार छान फटक रहे हैं कि‍ कौन सी साइट जनप्रि‍य है और उस पर तुरंत अपने '' जासूस लगा देते हैं। ये '' जासूस लगातार बेचैन आत्‍मा की तरह एक साइट से दूसरे साइट की ओर भागते रहते हैं। अमेरि‍का के जासूस परेशान हैं कि‍ नेट के 70 प्रति‍शत यूजर गैर अमेरि‍की हैं। ये अमेरि‍का के बाहर रहते हैं। इनका जाल दुनि‍या के 180 देशों में फैला हुआ है। तकरीबन 200 गैर अंग्रेजी भाषी ब्‍लागर-ट्वि‍टर समूह हैं, ये लोग रीयल टाइम में तूफान मचाए हुए हैं। इन्‍हें सीआईए नजरअंदाज नहीं करना चाहता। उनका मानना है कि‍ यह रीयल टाइम सूचना सुनामी है। हम उन्‍हें अबोध कहकर नजरअंदाज नहीं कर सकते।





                     
    

बुधवार, 20 जुलाई 2011

फेसबुक पर सत्ता का कसता शिकंजा


 भारत सरकार ने हाल ही में याहू.गूगल,माइक्रोसॉफ्ट आदि कंपनियों को वह सॉफ्टवेयर प्रदान करने का आदेश दिया है जिसके आधार पर वह उनके सरवर के जरिए नेट पर चल रही भारतीयों की सभी किस्म की गतिविधियों की निगरानी कर सके। उपग्रह संचार ने जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जन्म दिया था उसके साथ सत्ता का अन्तर्विरोध बढ़ता जा रहा है। अमेरिका में भी इंटरनेट और सत्ता के अन्तर्विरोध तीखे हो गए हैं। साइबर कानूनों को कड़ा बनाया जा रहा है। जिससे इंटरनेट पर मुक्त अभिव्यक्ति बाधित होगी। इस काम में इंटरनेट सर्विस प्रदाता कंपनियां सत्ता के चौकीदार की भूमिका अदा कर रही हैं। वे रीयलटाइम में ऑनलाइन पर आने वाले लाखों -करोड़ों संदेशों को विश्लेषित करके सत्ताकेन्द्रों को संप्रेषित कर रहे हैं। पहले किसी को यह समझ में नहीं आया कि इंटरनेट को कैसे नियंत्रित किया जाएगा लेकिन बाद में इसका भी रास्ता निकाल लिया गया । अब इंटरनेट सर्विस प्रदाता कंपनी ही यूजर पर निगरानी करने लगी है।

नये कानून के अनुसार भारत और अमेरिका में इंटरनेट पर ब्लॉग से लेकर फेसबुक तक गुमनाम टिप्पणी लिखना अपराध घोषित होने जा रहा है। प्रशासन चाहता है कि इंटरनेट पर सही नाम से लिखा जाए। ऑनलाइन गुमनामी को खत्म करने के साथ ही इंटरनेट कंपनियों ने एक नया सिस्टम ईजाद किया है जिस पर कनाडा की एक प्राइवेसी वाचडाग संस्था ने लिखा है कि गुमनामी खत्म होते ही प्रत्येक आदमी की 24 घंटे निगरानी करने में मदद मिलेगी।  इंटरनेट पर गुमनाम टिप्पणी लिखने वाले लेखकों की प्रकृति क्या है,वे कौन हैं और क्यों लिखते हैं ,इन सबका पता लगा लिया गया है। ट्विटर,ब्लॉग,इंटरनेट, फेसबुक आदि पर जो लोग अनाम टिप्पणियां लिखते हैं उन्हें अब चिह्नित कर लिया गया है। विज्ञान तत्वशास्त्र के विद्वान डेविड मिसकेविज ने अपने अनुसंधान के जरिए अनाम लोगों की पहचान की है। मिसकेविज ने यह रहस्योदघाटन चर्च की एक घरेलू पत्रिका में प्रकाशित लेख में किया है। मिसकेविज का मानना है इंटरनेट पर ‘अनाम’ मुखौटे वाले सबवर्सिव और अराजकतावादी हैं। ये लोग मनोरंजन उद्योग पर आए दिन हमले करते हैं।ये लोग विकीलीक पर भी बेहद सक्रिय हैं। इसके अलावा फेसबुक के मालिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है जिसके तहत यूजर इमेज को कम्प्यूटर पहचान लेगा और उस पर टैग भी लगा देगा। अभी इस तकनीक का प्रयोग अमेरिका में किया जाएगा। फेसबुक के अनुसार अभी वह प्रतिदिन दस करोड़ फोटो पर टैग लगाने का काम कर रहा है। फेस रिकॉगिनीशन प्रोसेस के नाम से यह प्रक्रिया फेसबुक ने आरंभ की है। इस प्रक्रिया का निहितार्थ यह भी है कि फेसबुक पर नकली फोटो के साथ भ्रमण करना अब खतरे से खाली नहीं होगा। प्रत्येक इमेज पर टैग होगा। जब इमेज के साथ कोई टैग लगी है तो आप सहज ही उससे अपने को विच्छिन्न नहीं कर पाएंगे। यह काम फेसबुक का सिस्टम स्वचालित ढ़ंग से करेगा। मसलन किसी नाम के साथ अगर कोई टैग तय हो चुका है तो फिर उसका कोई अन्य दुरूपयोग नहीं कर पाएगा। आप जो भी इमेज पोस्ट करेंगे वह टैग दिखाई जाएगी,आप चाहें तो अपनी टैग में रद्दोबदल कर सकते हैं लेकिन बिना टैग के अब फेसबुक पर कोई इमेज नहीं होगी। इससे फेसबुक नजरदारी बढ़ जाएगी। संबंधित टैग से जुड़ी सूचनाएं स्वतः एक जगह संचित होती जाएंगी।  दूसरी ओर एक सर्वे से यह भी पता चला है कि फेसबुक पर आनंद के विषयों का बोलवाला है। वहां पर गंभीर विषयों पर बहुत कम बातें हो रही हैं। मसलन् फेसबुक और ट्विटर पर इराक-अफगानिस्तान युद्ध ,नव्य आर्थिक उदारीकरण, भूमंडलीकरण,मंदी बेकारी, निरूद्योगीकरण ,अमेरिका की आंतरिक राजनीति और देशज राजनीतिक विवाद एकसिरे से गायब हैं।
     सोशल नेटवर्क के प्रभाव के बारे में हम जितना जानेंगे उतना ही बच्चों और युवाओं को भी बेहतर ढ़ंग से जान पाएंगे। बच्चों और युवाओं का बहुत बड़ा हिस्सा सोशल नेटवर्क पर विभिन्न किस्म के संचार और संपर्क का काम कर रहा है। मसलन अमेरिका में 75 प्रतिशत युवा (18-24 साल की आयु के) सोशल नेटवर्क पर जाते हैं। 65 साल से ऊपर की आयु के मात्र 7 प्रतिशत लोग ही सोशल नेटवर्क पर जाते हैं। कहने का अर्थ यह है कि सोशल नेटवर्क युवाओं का माध्यम है। जबकि 25-34साल आयु के 57 प्रतिशत,35-44 साल के 30 प्रतिशत,45-54 साल के 19 प्रतिशत,55-64 साल के 10 प्रतिशत लोग सोशल नेटवर्क पर जाते हैं।
   विभिन्न सामाजिक नेटवर्क में माइस्पेस पर 50 प्रतिशत,फेसबुक पर 22 प्रतिशत और लिनकेदिन पर 6 फीसदी का प्रोफाइल है। ज्यादातर तरूण अपने परिचितों के साथ ही जुड़ते हैं। 51 फीसदी सोशल नेटवर्क यूजर की दो या उससे ज्यादा ऑनलाइन प्रोफाइल हैं। जबकि 43 प्रतिशत का एक ही प्रोफाइल है।ज्यादातर सोशल नेटवर्क यूजर प्राइवेसी सचेतन हैं। इसके बावजूद यूजरों की वेब पर प्रच्छन्नतःजासूसी जारी है। लेकिन फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्क ऑफिसों में समग्र ऑफिस समय का 1.5 फीसदी समय बचाते हैं। यह बात ' नुक्लिस रिसर्च' के पिछले साल कराए सर्वे में सामने आयी है। एक अन्य संस्था मोर्से के सर्वे में यह तथ्य सामने आया है कि ब्रिटिश कंपनियों को फेसबुक जैसे मंचों के  जरिए काम करने से सालाना 2.2 बिलियन डॉलर का लाभ हुआ है। यह भी पाया गया है कि छोटे स्तर पर ब्लॉगिंग में खर्च होने वाला समय वस्तुतः समय की बर्बादी है। इसके विपरीत फेसबुक में आप निरंतर संपर्क,संवाद और उच्चकोटि की सर्जनात्मकता बनाए रख सकते हैं। फेसबुक में सर्जनात्मक निरंतरता बनाए रखने की क्षमता है। वह इंटरनेट की सभी विधाओं का निर्धारक है। इंटरनेट में क्या होगा ,ऑनलाइन समूह क्या करेंगे,यूजर कैसे रहे ,उसकी प्राइवेसी क्या है,सार्वजनिक क्या है और यूजर को कैसे बोलना चाहिए,कैसे व्यक्त करना चाहिए,भावों-संवेदनाओं और अनुभूतियों को कैसे व्यक्त करें आदि बातों का निर्धारक फेसबुक है। फेसबुक में सभी पूर्ववर्ती मीडिया और नेट विधाओं का समाहार कर लिया है। अनेक अभिव्यक्ति रूपों को सार्वजनिक कर दिया है।




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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

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