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शनिवार, 4 अप्रैल 2015

बंगाल की धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली और वाम

    
    आम तौर पर जो लोग कलकत्ता या प.बंगाल में घूमने जाते हैं तो उनको एक भिन्न किस्म का का सामाजिक परिवेश नजर आता है। कहने को पश्चिम बंगाल भारत में है लेकिन भारत से भिन्न भी है। पश्चिम बंगाल की भिन्नता है धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली का वर्चस्व। धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली  का गुण है कि वह राजनीतिक सचेतन, सहज,स्वाभाविक,मानवीय और संवेदनशील होती है।  इसमें 'स्व' के प्रति आलोचनात्मक विवेक प्रबल होता है।
      आजादी के साथ ही पश्चिम बंगाल हिन्दू-मुसलिम सामाजिक विभाजन की आग में जल रहा था। भारत-विभाजन का सबसे तीव्र असर यहां पड़ा था.बड़े पैमाने पर दंगे हुए थे, इन दंगों ने यहां के जनमानस को अंदर तक पीड़ित किया था। उस पीड़ा का समाधान करने में धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बंगाल से हमें यह जीवनशैली सीखनी चाहिए। साम्प्रदायिक मनोदशा से लड़ने का आज भी यह सबसे कारगर अस्त्र है।        
        प.बंगाल में धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली के निर्माण में आम जनता और बुर्जुआदलों के अलावा कम्युनिस्टों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कम्युनिस्टों की भूमिका न बिना धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। यह एक सच है कि  आम जनता में साम्प्रदायिक सद्भाव को प्रधान एजेण्डा बनाने में कम्युनिस्टों की निर्णायक भूमिका रही है। वे साम्प्रदायिक सद्भाव के संदेशवाहक के तौर पर राज्य में अग्रणी कतारों में रहे हैं,आम जनता के जीवन से साम्प्रदायिक भेद कैसे खत्म हुआ होगा यह बात आज की युवा पीढ़ी के लिए समझना बहुत ही मुश्किल है ।
   भारत-विभाजन क्यों और कैसे हुआ यह सवाल आज बेमानी है,कौन इसके लिए जिम्मेदार था,यह सवाल भी बेमानी है। भारत विभाजन के समय कम्युनिस्टों का नजरिया सही नहीं था,वह गलत उसूलों पर आधारित था,इसको बाद में कम्युनिस्ट पार्टी ने भी माना। लेकिन भारत विभाजन के कारण जो साम्प्रदायिक भेदभाव,हिंसाचार और घृणा समाज में फैली थी उसको खत्म करने के मामले में कम्युनिस्टों ने उस दौर में धर्मनिरपेक्ष ताकतों के साथ मिलकर कंधे से कंधा मिलाकर काम किया । उस दौर को लेकर कम्युनिस्टों ने कुछ सबक भी हासिल किए जिनको व्यवहार में लागू किया गया।
    पहला सबक यह था कि आम जनता में जड़ें मजबूत बनानी हैं तो अंतर्राष्ट्रीयतावाद के जंजाल में फंसने की बजाय राष्ट्रीय परंपराओं को समझना होगा, राष्ट्रीयता की भावना को पुख्ता बनाना होगा। कौमी परंपरा की नए सिरे से खोज करनी होगी। देश में और खासकर पश्चिम बंगाल में जनाधार बनाने के लिए कौमी परंपरा का निर्माण करना होगा। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से कम्युनिस्टों का रुपान्तरण आरंभ होता है। पंडित जवाहर लाल नेहरु ने सही लिखा है '' पिछली बातों के लिए अंधी भक्ति बुरी होती है । साथ ही उनके लिए नफ़रत भी उतनी ही बुरी है। उसकी वजह है कि इन दोनों में से किसी पर भविष्य की बुनियाद नहीं रखी जा सकती। वर्तमान का और भविष्य लाजिमी तौर से भूतकाल से जन्म होता है और उन पर उसकी छाप होती है। इसको भूल जाने के मानी हैं इमारत को बुनियाद से काट देना ।उसके मानी हैं इन्सान पर असर रखने वाली एक सबसे बड़ी ताकत को भुला देना। राष्ट्रीयता असल में पिछली तरक्की ,परंपरा और अनुभवों की एक समाज के लिए सामूहिक याद है। '' कम्युनिस्टों ने इस ''सामूहिक याद'' को नए सिरे से अर्जित किया ।
     सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीयता की पुरानी यादों के सहारे समाज का विकास संभव है ? पुरानी सामूहिक यादों ने विरेचन का काम किया। समाज से साम्प्रदायिक विद्वेष को खत्म किया। पुरानी सामूहिक यादों को कम्युनिस्टों सामाजिक दुश्मनी को खत्म करने के औजार के रुप में इस्तेमाल किया। मिश्रित संस्कृति और सभ्यता के रुपों की नए सिरे खोज आरंभ की। उसका ही यह सुफल है कि कोलकाता  साम्प्रदायिक प्रदूषण से मुक्त महानगर बन पाया। आजादी के बाद  देश के बाकी हिस्सों में साम्प्रदायिक ताकतें फली-फूली हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में आरएसएस और उसके सहयोगी को संगठनों को जनाधार नहीं मिला, मुस्लिम लीग जनविहीन हो गयी। आम बंगाली के मन से साम्प्रदायिक विद्वेष क्रमशः खत्म होता चला गया।
     यह वामदलों के प्रयासों का ही सुफल है कि आज समूचा बंगाल साम्प्रदायिकचेतना से मुक्त है।आजादी के बाद साम्प्रदायिक विभाजन की  तमाम कोशिशें हुई हैं लेकिन इस राज्य में वे सभी विफल रही हैं। वामदलों के प्रयास का ही यह सुफल  है कि आम जीवनशैली में धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया तेजगति से चली है। आम जीवन में धर्मनिरपेक्षता एक ताकतवर विचार के रुप में काम करता रहा है। यह स्थिति तब है जबकि देश के विभिन्न इलाकों में साम्प्रदायिकता की आंधी चलती रही है। मसलन्,राममंदिर रथयात्रा,बाबरी मसजिद विध्वंस, इंदिरा गांधी की हत्या और सिख जनसंहार, गुजरात का बर्बर जनसंहार आदि बड़ी घटनाएं पश्चिम बंगाल की मनोदशा को प्रभावित करने में असफल रही हैं। यह साधारण बात नहीं है।
    आमतौर पर पश्चिम बंगाल की जीवनशैली का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना है। धर्मनिरपेक्षता यहां वोटबैंक राजनीति तक सीमित नहीं है बल्कि एक विकसित आधुनिक जीवनशैली है। धर्मनिरपेक्ष आधुनिक जीवनशैली की परिकल्पना को वामदलों ने आम जनता की मदद से साकार किया है। आज सारे देश में जातिगत विद्वेष और जातिगत गोलबंदियां  हैं,लेकिन पश्चिम बंगाल इससे एकदम अछूता है। जाति-उत्पीडन यहां  एकसिरे से नदारत है। धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली जब निर्मित होगी तो जातिवाद कमजोर होगा, जाति की पहचान कमजोर होगी। पश्चिम बंगाल में जाति की पहचान कमजोर हुई है और जातीयता या नैशनेलिटी की पहचान पुख्ता हुई है। राज्य में जब भी भेदकारी ताकतों ने सिर उठाने की कोशिश की है उसका आम जनता ने ''हम सब बंगाली हैं'' की एकजुट धर्मनिरपेक्ष भावना के साथ सामना किया है। वामदलों ने राष्ट्रीयनेताओं की परंपराओं को अपनाया और उनका व्यवहार में पालन किया। इसके चलते वामदलों ने अपने लिए नए सिरे से राष्ट्र की खोज की।
     एक जमाना था जब कम्युनिस्ट हर बात में अंतर्राष्ट्रीयतावादी भावनाओं को व्यक्त करते थे लेकिन आजादी के बाद क्रमशः उनमें यह समझ बनी कि देश के विकास के लिए राष्ट्रीयताबोध का पुख्ता बोध का होना जरुरी है। उन्होंने राष्ट्रीय महापुरुषों की इज्जत करना सीखा और उनकी शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार किया। राष्ट्रीयता और कम्युनिस्ट पार्टी की अंतर्कियाओं को बुर्जुआ परंपराओं और नजरिए ने क्रमशःप्रभावित किया। यह भी कह सकते हैं बंगाली लिबरल परंपराओं ने कम्युनिस्ट कतारों को सीधे प्रभावित किया। इस क्रम में बंगाली समाज की मान्यताओं और परंपराओं के साथ अंतर्क्रियाएं भी आरंभ हुईं,फलतः कम्युनिस्टों ने बंगाली परंपराओं और रिवाजों को समझना और सामंजस्य बिठाना सीखा । खासकर खुले दिमाग की बंगाली और भारतीय मनोदशा ने कम्युनिस्टों में लिबरल आचार-व्यवहार के प्रति आकर्षण पैदा किया।देशज संस्कृति,जातीय परंपरा, खुला दिमाग और विवेकवाद ये चार चीजें कम्युनिस्टों को बंगाली समाज से विरासत में मिलीं और इसका कम्युनिस्टों ने आम जनता में जमकर प्रचार किया इससे समूचे समाज में धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली निर्मित करने में मदद मिली।      

       

रविवार, 21 सितंबर 2014

कार्ल मार्क्स और सर्वहारा की तानाशाही

              इन दिनों फेसबुक पर अशिक्षितों का फैशन हो गया है कि वे मार्क्स को शैतान सिद्धांतकार और सर्वहारा की तानाशाही को गंदी गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं। इसमें सभी रंगत और विचारधारा के लोग हैं,यहां तक कि मार्क्स के अनुयायी होने का दावा करने वाले पूर्व मार्क्सवादियों में भी एक वर्ग है जो सर्वहारा की तानाशाही की गलत व्याख्या करता है।
       
      सर्वहारा की तानाशाही का मतलब कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही नहीं है। व्यवहार में अनेक पूर्व समाजवादी देशों में इस अवधारणा का इसी रुप में इस्तेमाल किया गया। पूर्व समाजवादी देशों में सर्वहारा की तानाशाही का जिस तरह दुरुपयोग हुआ उससे यह धारणा विकृत हुई और इसकी गलत समझ प्रचारित हुई। मुश्किल यह है कि एक तरफ बुर्जुआजी का कु-प्रचार और दूसरी ओर कम्युनिस्टों के द्वारा इस धारणा का भ्रष्टीकरण ये दो चुनौतियां आज भी बनी हुई हैं। कार्ल मार्क्स की अनेक धारणाओं को इन दोनों ओर से गंभीर खतरा है। तीसरा खतरा सोशल मीडिया ने पैदा किया है। इसके यूजरों का एक बड़ा हिस्सा है जो मार्क्सवाद को एकदम नहीं जानता लेकिन मार्क्सवाद ,साम्यवाद और उससे जुड़ी धारणाओं के बारे में आए दिन फेक प्रतिक्रियाएं देते रहते हैं। यहां हम ''सर्वहारा की तानाशाही'' के बारे में मार्क्स के विचारों के विवेचन तक सीमित रखेंगे।

मौजूदा दौर में हमारे समाज पर विश्वव्यापी वित्तीय संस्थाओं ,बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बैंकों का नियंत्रण है। वे ही तय कर रहे हैं कि देश और दुनिया में क्या होगा ?किस तरह का विकास होगा और किस तरह के सामाजिक मूल्य और राजनीतिक संरचनाएं काम करेंगी? इन संस्थाओं के निदेशकों को जनता कभी नहीं चुनती,यानी आज दुनिया को वे लोग चला रहे हैं जिनका चयन जनता नहीं करती।जबकि इनके फैसलों से करोड़ों लोग सीधे प्रभावित होते हैं।ये ही वे लोग हैं जिन्होंने सत्तादास की नयी राजनीतिक श्रेणी निर्मित की है जो सरकार चलाती है।सतह पर सरकारें कभी –कभी अपने इन आकाओं के खिलाफ फैसले लेती हैं, टैक्सचोरी के आरोप लगाकर जुर्माना वसूलती हैं,किसी न किसी अपराध में उनके बड़े अफसरों को गिरफ्तार भी करती हैं। यहां तक कि उनके ऊपर असामाजिक आचरण का आरोप तक लगाती हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिनको मार्क्स में तानाशाही नजर आती है लेकिन उनको वित्तीय-संस्थाओं की तानाशाही नजर नहीं आती।बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बैंकों के मालिकों के आचरण में कहीं तानाशाही नजर नहीं आती।जबकि ये संस्थाएं खुलेआम अ-लोकतांत्रिक व्यक्तियों के निर्देशन में काम करती हैं। सच्चाई यह है कि मौजूदा पूंजीवादी समाज ने मानवता की अपूरणीय क्षति की है। इसके बावजूद हमारा पूंजीवाद के प्रति आकर्षण किसी भी तरह कम नहीं हो रहा। हम इस या उस पूंजीवादी दल के अनुयायी होने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। हमें कांग्रेस से नफरत है या भाजपा या बसपा या सपा आदि से नफरत है लेकिन अंततः हम यही चाहते हैं कि कोई न कोई पूंजीवादी दल सत्ता में आए। जबकि पूंजीवाद की जनविरोधी,लोकतंत्र विरोधी भूमिका के प्रमाण पग-पग पर बिखरे पड़े हैं।इनकी ओर हम कभी देखते तक नहीं हैं और आए दिन कम्युनिस्टों और मार्क्सवादियों पर हमले करते रहते हैं। मार्क्सवादियों पर किया गया प्रत्येक हमला बर्बर पूंजीवाद की सेवा ही माना जाएगा। यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसे ध्यान रखें और मार्क्स प्रतिपादित ''सर्वहारा की तानाशाही'' की अवधारणा पर विचार करें।

मार्क्स ने 'फ्रांस में गृह-युद्ध' नामक कृति में विस्तार के साथ अपने लोकतांत्रिक नजरिए का प्रतिपादन किया है। मार्क्स ने रेखांकित किया है कि मजदूरवर्ग कभी भी राज्य की तैयारशुदा मशीनरी के साथ हाथ मिलाकर काम नहीं कर सकता।क्योंकि राज्य की मशीनरी का मकसद और मजदूरवर्ग के मकसद में अंतर है। दूसरा कारण यह कि राज्य मशीनरी में यथास्थितिवाद के प्रति पूर्वाग्रह भरे होते हैं। आज हम जिस लोकतंत्र में रह रहे हैं उसमें अनेक अ-लोकतांत्रिक चीजें मुखौटे लगाकर सक्रिय हैं वे अलोकतांत्रिक हितों की खुलेआम रक्षा कर रहे हैं।

मार्क्स के लोकतांत्रिक स्व-शासन के मॉडल को देखना हो तो सन् 1871 के पेरिस कम्यून के शासन को गंभीरता से देखा जाना चाहिए। यह वह दौर है जिसमें कुछ समय के लिए फ्रांस के मजदूरों और आम जनता ने शासन अपने हाथों में ले लिया था। 'फ्रांस में गृहयुद्ध' नामक कृति में मार्क्स ने बताया है कि कम्यून का अर्थ क्या है ? यह मूलतः नगरपालिका के स्थानीय कौंसलरों का शासन है, जिनमें अधिकतर कामकाजी लोग थे,ये लोकप्रिय मतदान के जरिए चुनकर आए थे और उनको जनता को वापस बुलाने का भी अधिकार था। यहां पर उनको मजदूरों की मजदूरी के बराबर काम करने के लिए वेतन मिलता था। कोई विशेषाधिकार या विशेष सुविधाएं उनके पास नहीं थीं। स्थायी सेना समाप्त कर दी गयी थी।पुलिस को कम्यून के प्रति जबावदेह बनाया गया था।कम्यून आने के पहले फ्रांस के राज्य,कमाण्डरों और पादरियों के हाथों में सत्ता हुआ करती थी,कम्यून का शासन स्थापित होने के बाद ये सब सार्वजनिक जीवन से गायब हो गए। शिक्षा संस्थानों के दरवाजे आम जनता के लिए खोल दिए गए।शिक्षा को राज्य और चर्च के दखल से मुक्त कर दिया गया।मजिस्ट्रेट,जज और सार्वजनिक पदों पर काम करने वालों का जनता चुनाव करती थी। वे जनता प्रति जबावदेह थे और जनता को उनको वापस बुलाने हक भी था। कम्यून के शासन ने निजी संपत्ति को भी खत्म कर दिया था।उसकी जगह सामुदायिक उत्पादन ने ले ली थी। पूंजीवादी वर्गीय शोषण को खत्म करके सामाजिक जनतंत्र की नींव रखी गयी।स्थायी सेना को खत्म करके जनता को हथियारबंद कर दिया गया।

पेरिस कम्यून की स्थापना जनता के द्वारा चुने गए सभासदों के जरिए की गयी। मार्क्स ने लिखा है ''कम्यून नगर सभासदों को लेकर गठित हुआ था,जो नगर के वार्डों से सार्विक मताधिकार द्वारा चुने गए थे,जो उत्तरदायी थे और साथ ही किसी भी समय हटाये जा सकते थे।कम्यून के अधिकांश सदस्य स्वभाववतया मजदूर अथवा मजदूर वर्ग के जाने –माने प्रतिनिधि थे। कम्यून संसदीय नहीं ,बल्कि एक कार्यशील संगठन था,जो कार्यकारी और विधिकारी दोनों कार्य साथ-साथ करता था।''( का,मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स,पेरिल कम्यून,प्रगति प्रकाशन, 1980, पृ.84) पुलिस को कम्यून के प्रति जबावदेह बनाया गया और यही काम प्रशासन के अन्य अंगों के बारे में भी किया गया। कम्यून के सदस्यों को वही मजदूरी मिलती थी जो मजदूरों को मिलती थी। विभिन्न किस्म के भत्तों का अंत कर दिया गया।किसी भी विभाग के पास कोई विशेषाधिकार नहीं थे, सब कुछ कम्यून के हवाले था।पादरियों को सार्वजनिक पदों से मुक्त करके एकांत में जीने के लिए भेज दिया गया। उन्हें धार्मिक महात्माओं की तरह जीवन-यापन करने के लिए कहा गया।इसी तरह विज्ञान को भी वर्गीय-पूर्वाग्रहों और सरकारी दबावों से मुक्त कर दिया गया। चर्च की संपत्ति जब्त कर ली गयी। बंद पड़े वर्कशाप और फैक्ट्रियों को मुआवजे की शर्त के साथ खोल दिया गया । वर्ग-संपत्ति को खत्म कर दिया गया।

कम्यून के संचालक यह नहीं मानते ते कि वे कभी गलती नहीं कर सकते। उनकी जानकारी में यदि कोई गलती लायी जाती थी तो वे उसे तुरंत दुरुस्त करते थे।उनकी कथनी और करनी में साम्य था। वे जो कहते थे वही करते थे। पेरिस कम्यून स्थापित होने के बाद पेरिस की शक्ल ही बदल गयी। भ्रष्ट आडंबरयुक्त पेरिस खत्म हो गया। मुर्दाखाने में लाशें न थीं,रात को चोरियां होना बंद हो गयीं,राहजनी बंद हो गयी।फरवरी 1848 के बाद पेरिस की सड़कें पहलीबार निरापद हुईं। सड़कों पर पुलिस का पहरा नहीं होता था।पेरिस की वेश्याएं गायब हो गयीं।हत्या,चोरी और व्यक्तियों पर हमले की घटनाएं एकदम बंद हो गयीं। यही वह शासन है जिसको उस समय ''सर्वहारा की तानाशाही'' का नाम दिया गया। उस समय इसका वह अर्थ नहीं था जो इन दिनों प्रचारित किया जाता है।

मार्क्सवादी आलोचक टेरी इगिलटन ने लिखा है कि उस समय इस पदबंध का अर्थ था ''लोकप्रिय लोकतंत्र''। ''सर्वहारा की तानाशाही'' का सामान्य अर्थ था बहुमत का शासन। आज ''तानाशाही'' का जो अर्थ लिया जाता है वह अर्थ मार्क्स के जमाने में नहीं था। आजकल तानाशाही का अर्थ है संविधान का उल्लंघनकर्ता। असल में कार्ल मार्क्स ने ''सर्वहारा की तानाशाही''पदबंध लूइ ओग्यूस्त ब्लांकी (1805-1881) से लिया। ब्लांकी फ्रांसीसी क्रांतिकारी थे और उन्होंने ही इस पदबंध को जन्म दिया। उनकी नजर में ''सर्वहारा की तानाशाही'' का अर्थ था साधारण जनता का स्व-शासन। मार्क्स ने भी इसी अर्थ में इस पदबंध का इस्तेमाल किया है। उल्लेखनीय है लूइ ओग्यूस्त ब्लांकी बाद में पेरिस कम्यून के जनता के द्वारा चुने गए राष्ट्रपति बने लेकिन उस समय जेल में डाल दिए गए थे।





गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

काश ! हिन्दी की महत्ता कम्युनिस्ट पार्टियां समझतीं

( भारत की कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) के महासचिव प्रकाश कारात)
        सबसे पहले मैं अपने एक पाठक की टिप्पणी पर ध्यान देना चाहूँगा । उन्होने एक बड़ी समस्या की ओर ध्यान खींचा हैं। लिखा है -
"भारत गांवों का देश है। यहां की ग्रामीण जनता मुख्‍य रूप से हिन्‍दी बोलती है और उसका मुख्‍य पेशा कृषि है। लेकिन मुझे लगता है कि भारत के कम्‍युनिस्‍टों ने दोंनों में से किसी का साथ नहीं दिया - न हिन्‍दी का, न ही कृषि का। गांवों का भी नहीं। अपने प्रयोजन के लिए इनका इस्‍तेमाल खूब किया, लेकिन इन्‍हें मजबूती नहीं दी।"   
    मैं इस बात से बुनियादी तौर पर सहमत हूँ कि हिन्दी के लिए कम्युनिस्टों ने ज्यादा कुछ नहीं किया। मैं इस पूरी समस्या को कुछ बड़े फलक पर रखकर देखना चाहूँगा। इस समस्या का एक पहलू है जो कम्युनिस्ट पार्टी के संगठनों से जुड़ा है ,दूसरा पहलू वह है जो मार्क्सवादियों के ज्ञानकांड से जुड़ा है। यह सच है कि कम्युनिस्ट पार्टियों ने संगठन के रूप में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए बहुत कम काम किया है। इससे भी बड़ा सच यह है कि  हिन्दीभाषीक्षेत्र के मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों, खासकर हिन्दी के मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों ने हिन्दी साहित्य,कविता,कहानी, भाषा, आलोचना आदि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया है।
    हिन्दी की तस्वीर सिर्फ राजनीतिक प्रौपेगैण्डा के आधार पर नहीं बनायी जानी चाहिए। यह सच है कि हिन्दीभाषी क्षेत्र में कम्युनिस्टों के प्रचार के माध्यम बेहद कमजोर हैं। उसका ही यह दुष्परिणाम है कि हिन्दीभाषी क्षेत्र में कम्युनिस्ट संगठन सिकुड़ते चले गए हैं। हिन्दी में प्रचारतंत्र की महत्ता का अभी कम्युनिस्ट पार्टियों में बोध ही पैदा नहीं हुआ है। फलतःकम्युनिस्ट आंदोलन का हिन्दीभाषी क्षेत्र में विकास नहीं हो पाया है। साथ ही अभी जो नेतृत्व है उसकी हिन्दीभाषी यथार्थ पर पकड़ कम है। इन इलाकों के संगठनकर्ताओं के प्रति उनके मन में समानता के भाव का अभाव है। वरना यह कैसे संभव है कि हिन्दीभाषी क्षेत्र से माकपा के पोलिटब्यूरो में एक भी सदस्य में न हो ! माकपा जैसी विशाल पार्टी में 50 करोड़ की आबादी का पोलिट ब्यूरो में कोई भी व्यक्ति न होना यह इस बात का संकेत है कि पार्टी अभी भी संगठन बनाने के मामले में पुराने ढ़ंग से सोचती है। उसके पास पिछड़े क्षेत्रों से केन्द्रीय नेतृत्व में ऊपर लाने के लिए संतुलित समझ का अभी तक विकास नहीं हुआ है अथवा यो कहें कि वह अभी क्षेत्रीय दबाबों में दबी पड़ी है। आज भी उनका मानना है कि जिन इलाकों में संगठन ज्यादा मजबूत है उन इलाकों से ही सर्वोच्च नेतृत्व में लोग रखे जाएंगे। इस आधार पर तो कभी भी पिछड़े इलाकों से प्रतिभावान मार्क्सवादी ऊपर नहीं आ पाएंगे।
    संगठन में क्षेत्रवाद असंतुलन पैदा करता है। संगठन निर्माण में समानता के सिद्धांत का पालना किया जाना चाहिए। कोई भी तरीका निकालकर हिन्दीभाषी क्षेत्र के अनुभवी और मेधावी कॉमरेडों को पोलिट ब्यूरो में अन्य मजबूत इलाके के संगठकों के बराबर स्थान मिलना चाहिए। इससे हिन्दी भाषी राज्यों को तरक्की की मौका मिलेगा।
हिन्दी के उत्थान और उसे जनप्रिय बनाने के लिए हिन्दी के मार्क्सवाद से प्रभावित लेखकों ने जितना काम किया है उतना काम किसी अन्य ने नहीं किया है। हिन्दी के श्रेष्ठ समीक्षक,पत्रकार,लेखक,आलोचक,कवि,कहानीकार,उपन्यालकार,शोधकर्ता आदि मार्क्सवादियों के  यहां ही पैदा हुए हैं। आधुनिककाल का हिन्दी साहित्य का विमर्श हो या इतिहास लेखन हो इस मामले में हिन्दीभाषी समाज का योगदान अतुलनीय है। राहुल सांकृत्यायन, रामविलास शर्मा, यशपाल, मुक्तिबोध आदि की परंपरा में सैंकड़ों लेखक हिन्दी में हैं जिन पर मार्क्सवाद का असर है और वे उसके प्रति आस्था भी रखते हैं। यह एक ऐसे समाज में पैदा हुए लेखक हैं जहां कम्युनिस्ट आंदोलन बेहद कमजोर है। कमजोर आंदोलन और शानदार साहित्य परंपरा का असंतुलित विकास हिन्दी में ही संभव है। यह विरल फिनोमिना है।
    हिन्दीभाषी क्षेत्र में कम्युनिस्ट पार्टी की कोई दीर्घकालिक सांगठनिक नीति नहीं रही है इसके कारण भी समय-समय पर इस क्षेत्र में पैदा हुए कम्युनिस्ट उभार की रक्षा केन्द्रीय नेतृत्व नहीं कर पाया है। विभिन्न किस्म की गुटबाजियों और इरेशनल बातों को आधार बनाकर प्रतिभावान कम्युनिस्टों को हाशिए पर डालना,उनकी उपेक्षा करना,पार्टी से निकालना,निंदा करना आदि सामंती हथकंड़ों का व्यक्तिगत पंगे और स्कोर हासिल करने के लिए इस्तेमाल होता रहा है,इसके कारण बिहार, पंजाब, राजस्थान,उत्तरप्रदेश आदि राज्यों में जमे-जमाए आंदोलन को सुचिंतित ढ़ंग से नष्ट किया गया। इसका ही यह परिणाम है कि आज इन राज्यों में कम्युनिस्ट ढ़ूढ़ने से भी नहीं मिलते।
    याद रखें एक कम्युनिस्ट को तैयार करने में बड़ा समय लगता है और हमारे बड़े कम्युनिस्ट नेता महज किसी सामान्य बात को असामान्य बनाकर उस व्यक्ति को निकाल देते हैं जिसने खून पसीना एक करके संगठन बनाया होता है। वे भूल जाते हैं कि संगठन बनाने वाले को निकालने का अर्थ है संगठन की आत्मा को निकाल देना। संगठनकर्ता की आत्मा के बिना संगठन बेजान होता है.कागजी होता है। बिहार, उत्तरप्रदेश, पंजाब, राजस्थान आदि में कुछ-कुछ ऐसा ही घटा है। इसका असर हिन्दीभाषी समाज पर भी पड़ा है। आज हिन्दीभाषी समाज में युवाओं ,बुद्धिजीवियों,स्त्रियों, किसानों आदि में प्रभाव पैदा करने वाले कम्युनिस्टों का अकाल है। जबकि एक जमाने में हिन्दीभाषी क्षेत्र में ऐसा नहीं था।
    कम्युनिस्ट पार्टियों के केन्द्रीय नेतृत्व की मानसिकता यह है कि हिन्दीभाषी क्षेत्र पिछड़ा है,यहां प्रतिभाशाली कम्युनिस्ट नहीं हैं। हिन्दी वाले सांस्कृतिक -राजनीतिक तौर पर पिछड़े हैं अतः उन्हें उपेक्षित रखो। इस बीमारी ने एक खास किस्म का गैर हिन्दीभाषी विवेक कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं में पैदा किया है। इसके कारण कम्युनिस्ट पार्टियां आज भी हिन्दीभाषी क्षेत्र में पनप नहीं पायी हैं। इस मामले में कम्युनिस्टों को अपने शत्रुओं से सीखना चाहिए। खासकर आरएसएस से सीखना चाहिए।
      कम्युनिस्ट पार्टियों की मुश्किल यह है कि केन्द्रीय नेतृत्व अंग्रेजी प्रेम में डूबा हुआ है। जहां संगठन मजबूत है मसलन केरल,पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में वहां स्थानीय भाषा के आग्रहों में डूबे हुए हैं। जाहिर है अंग्रेजी,मलयालम,बांग्ला,त्रिपुरी से आप भारत की जनता के पास नहीं पहुँच सकते। मेरे लिए यह आश्चर्य और बेहद तकलीफ की बात है कि ईएमएस जैसा महापंडित कई दशक तक दिल्ली में रहने के बाबजूद हिन्दी में बोलना नहीं सीख पाया। पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री एक भी बार हिन्दी में बोलने की केशिश नहीं करता। मैं अभी तक यह समझने में असमर्थ हूँ कि जिस भाषा को भारत की संपर्कभाषा माना जाता है उसके प्रति कम्युनिस्ट नेताओं का रूख मित्रतापूर्ण नहीं है।
    आज भी कम्युनिस्ट पार्टी के हिन्दी अखबार बेहद खराब अवस्था में हैं। हिन्दी अखबार प्रकाशन के नाम पर अंग्रेजी अखबार का अनुवाद छापकर कम्युनिस्ट पार्टियां अपने कर्म की इतिश्री मान लेती हैं। वे यह महसूस ही नहीं करते कि हिन्दी अनुवाद की भाषा नहीं है। जाहिर है जब वे हिन्दी के बारे में महसूस ही नहीं करते तो देश की जनता के बड़े हिस्से तक उनकी पहुँच नहीं हो पाएगी।
    कम्युनिस्ट पार्टियां जब तक हिन्दीभाषी क्षेत्र को प्राथमिकता नहीं देतीं। हिन्दी के प्रति  समानता और सम्मान का व्यवहार नहीं करतीं। अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं के मोहजाल से बाहर नहीं आतीं तब तक हिन्दीभाषी राज्यों में कम्युनिस्ट पार्टियों के विकास की संभावनाएं कम हैं। केन्द्रीय नेतृत्व के गैर-कम्युनिस्ट व्यवहार के कारण बिहार,यू.पी. और राजस्थान में संगठन तबाह हो चुके हैं। भविष्य में इसके कारण हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और मध्यप्रदेश के संगठन भी नष्ट हो सकते हैं ।  












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