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शुक्रवार, 12 जून 2015

ग़ज़ल के मर्म की तलाश में


   ग़ज़ल पर फ़िदा पाठकों की किल्लत नहीं है। सवाल यह है  ग़ज़ल पर इतने पाठक फ़िदा क्यों हैं ? भारत में जिस तरह श्रृंगार रस के चाहने वालों की परंपरा रही है, उसी तरह फारसी और उर्दू की परंपरा में ग़ज़ल के चाहने वालों की परंपरा भी रही है। नवरसों में जिस तरह श्रृंगार रस का वर्चस्व रहा है। उसी तरह उर्दू कविता में ग़ज़ल का वर्चस्व रहा है। ग़ज़ल की लोकप्रियता के कारण ही उसको अनेक स्तरों पर रचने वाले शायरों की जमात पैदा हुई। ग़ज़ल के बहुस्तरीय रुपों को देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि ग़ज़ल दरबारी और बाजारु है।
      ग़ज़ल एक तरह की नहीं बल्कि अनेक किस्म की लिखी गयी है। फिर भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि ग़ज़ल क्या है ? क्या वह स्थायी रुप में कायम है अथवा बदलती रही है ? लेकिन यह बात सच है कि ग़ज़ल पर श्रृंगार –रस का गहरा असर है। जिस तरह श्रृंगारवादी कवि स्त्रीकेन्द्रित पुंसवादी नजरिए का प्रतिपादन करते थे वैसे ही ग़ज़ल लेखक भी औरतों पर पुंसवादी नजरिए से लिखते थे।
     फारसी में 'ग़ज़ल' का अर्थ था औरतोंका जिक्र करना,उनके इश्क़का दम भरना और उनकी मुहब्बतमें मरना। दिलचस्प बात यह थी कि ग़ज़ल में शायर लोग इश्को-मुहब्बतमें इस तरह व्यस्त थे कि उनको परिवारके अन्य सदस्यों के साथ मुहब्बत का ख्याल ही नहीं आया। आरंभिक दौर में ग़ज़ल में काम-भावना से संबंधित विषयों की भरमार थी। इस दौर में कोमल और रसभरी भावनाओं पर केन्द्रित रचनाएं लिखी गयीं। लेकिन ग़ज़ल यहीं तक रुकी नहीं रही। उसमें कालान्तर में ईश्वर और दार्शनिक विषयों का समावेश होने लगा। इससे ग़ज़ल में मिश्रण की परंपरा शुरु हुई।
     आरंभिक दौर के प्रेमकेन्द्रित ग़ज़ल शायरों का हाल यह था कि वे विचारों की जंग तो लड़ना जानते थे लेकिन विचारों का जोखिम उठाना नहीं जानते थे, मसलन् , वे प्रेम या इश्क पर कविता लिखना जानते थे लेकिन सामाजिक बन्धनों से संघर्ष करना नहीं जानते थे। वे पारिवारिक मर्यादाओं को तोड़ना नहीं जानते थे। इनके अलावा इस तरह के शायरों में 'हकीकी ' और 'मजाज़ी ' दो किस्म के शायर थे। इनमें 'हकीकी' शायरों में निराकार ईश्वर का जलवा मिलता है । वे उसे इसी संसार में प्रेयसी के रुप में साकारभाव में देखना चाहते हैं। सूफी शायरों ने इस परंपरा का जमकर विकास किया। उनकी शायरी में मानवीय प्रेम खूब व्यक्त हुआ है।मसलन्, 'रियाज़' खैराबादीने लिखा-
  '' हम आँख बन्द किये तसव्वुरमें पड़े हैं।
    ऐसेमें कहीं छमसे वोह आ जाय तो क्या हो ??''
इसी भाव को इकबाल ने इसतरह व्ययक्त किया-
          '' कभी ऐ हक़ीक़ते -मुन्तजिर! नज़र आ लिबासे-मज़ाज़में।
           कि हजारों सजदे तड़प रहे हैं,मेरी जबीने-नियाजमें।।''
इश्क के सूफियाना अंदाज़ को 'मीर' ने लिखा -'' इश्क बिन यह –अदब नहीं आता।''
आधुनिककाल में इश्क पर लिखने वाले शायरों में दो तरह के शायर मिलते हैं एक वे हैं जो 'स्वानुभव' के आधारपर लिख रहे थे,दूसरे वे हैं  जिन्हें कभी तिरछी नजरसे न तो घायल होना नसीब हुआ , न कभी किसी की चौखट पर सर टेकना मयस्सर हुआ। इनमें अधिकतर नकली आशिक शायर हैं। ये वे शायर हैं जिनकी शायरी में आँसुओं का दरिया बहता नजर आएगा लेकिन जिन्दगी में आंसू की कभी इन शायरों ने एक बूँद भी नहीं गिरायी।
        ऐसे भी शायर रहे हैं जिन्होंने एकबार जिसे दिल दे दिया फिर दिल सारी जिन्दगी उसके नाम कर दिया। ये अनुभवहीन शायर हैं, ये लोग 'खुदा मुहब्बत है, और मुहब्बत खुदा है।'के नारे इर्द-गिर्द शायरी करते रहे हैं। 'मीर' संभवतः पहले शायर हैं जिनके यहां यह परंपरा आरंभ होती है ,'मीर' ने लिखा-
         '' चाहें तो तुमको चाहें,देखें तो तुमको देखें।
          ख़्बाहिश दिलोंकी तुम हो.आंखोंकी आरजू तुम।।''
        ''ज़ौक़'' ने लिखा
          '' मैं ऐसे साहिबे –अस्मत परी-पैकरै आशिक हूँ।
            नमाजैं पढ़ती हैं हूरें,हमेशा जिसके दामन पर।''  
इनमें ही दूसरी कोटि बाजारु शायरों की है।यह कामलोलुप,विषयासक्त लोगों की शायरी है।इस तरह की शायरी पर वेश्याओं के संपर्क और दरबारी संस्कृति का गहरा असर है। चंचल और खण्डिता नायिका का विचार इनके असर से ही आया है। इस तरह के शायरों को कामुक शायर कहना समीचीन होगा। बाजारी इश्क के अलावा बेवफ़ा माशूक आदि विषयों को शायरों ने दरबारों से ग्रहण किया।
     मुश्किल यह भी है कि दिल्ली के शायरों और लखनऊ के शायरों का अनेक विषयों पर नजरिया एक जैसा नहीं था। मसलन्, लखनऊ के शायरों में निराशा और असफलता की अभिव्यंजना बहुत कम मिलती है जबकि दिल्ली के शायरों में यह खूब है, इसका प्रधान कारण है लखनऊ में जिन दिनों अवधप्रांत के दरबारों चमक मार रही थी ,, इसके कारण अवध के शायरों में एक बड़ा अंश श्रृंगार रस और दरबारी संस्कृति से प्रभावित था। वहीं उस समय दिल्ली के शायरों ने कष्ट में जिन्दगी गुजारी। यह कष्ट उनकी शायरी के लिए वरदान साबित हुआ। इसलिए देहलवी शायरों ने दुख दर्द, पीड़ा,भरण-पोषण की चिन्ताएं,असफलता आदि विषयों पर जमकर लिखा।
  जोश मलाहाबादी ने लिखा- '' मेरे रोनेका जिसमें क़िस्सा है।
                          उम्रका बहतरीन हिस्सा है।।''    
जिगर मुरादाबादी ने लिखा - '' इससे बढ़कर दोस्त कोई दूसरा होता नहीं ।
                          सब जुदा हो जायें,लेकिन ग़म जुदा होता नहीं ।।
कहने का आशय यह कि लखनऊ और दिल्ली के शायरों के परिवेशगत अंतर ने उनकी शायरी और नजरिए को गहरे प्रभावित किया। दिल्ली के शायरों की आपदाओं में जवानियाँ गुजरीं. वहीं दूसरी ओर लखनवी शायरोंने भोग-विलास में आँखें खोली थीं ।
        यह भी हकीकत है कि 'मीर' जब लखनऊ जाते तो उनको भी लखनऊ की रंगीन फ़िजा आकर्षित करती और कह बैठते-'' मिलो इन दिनों हमसे एकरात जानी। कहीँ हम कहाँ तुम कहाँ फिर जवानी।'

   सन् 1780 ई. के पूर्व 'हबीब' का तसव्वुर स्पष्ट नहीं था। उसके लिए संज्ञा,विशेषण,क्रिया,सम्बोधन आदि सब स्त्री लिंग के न होकर पुलिंग के व्यवहृत होते थे। हबीब का अर्थ है 'प्यारा' । यानी जिसे प्यार किया जाय वोह हबीब है। ग़ज़लमें सबसे पहले हसरत देहलवी (1772-1797 ई.) ने स्त्री को हबीब का दर्जा दिया। तबसे लखनवी शायरी में स्त्री के लिए हबीब का प्रयोग होने लगा।  धीरे धीरे यही शायरी जनानी शायरी होती चली गयी। उसमें श्रृंगार रस का वर्चस्व बढ़ता चला गया। 

मंगलवार, 9 जून 2015

ग़ज़ल के रुपान्तरण की प्रक्रिया


आधुनिककाल आने के बाद ग़ज़ल का रुप वही नहीं रह गया जो उसके पहले था। खासतौर पर उपन्यास विधा और अखबारों के उदय और प्रसार  ने ग़ज़ल के विधागत चरित्र को सीधे प्रभावित किया। प्रेस और उपन्यास ने आधुनिककाल में यथार्थवादी नजरिए ,विस्तीर्ण भाव से लिखने और समसामयिकता को साहित्य-सृजन का अनिवार्य अंग बनाया। इससे लेखक,लेखन और समाज के बीच में नए किस्म के रिश्ते, नए किस्म के लेखकीय संस्कारों की शुरुआत हुई। यही वजह थी कि गालिब को यह कहना पड़ा 'कुछ और चाहिए वुसअत मेरे बयाँ के लिए'
      गालिब पहले बड़े शायर हैं जिन्होंने ग़ज़ल को नई जिन्दगी दी,नए विषयों और नए नजरिए की ओर मोड़ा।ग़ज़ल को दैनन्दिन जीवन की घटनाओं और सामयिक राजनीतिक घटनाओं से जोड़ा। पहलीबार ग़ज़ल को आंदोलन और राजनीति से सीधे जोड़ने की परंपरा आरंभ हुई। गालिब ने जो सिलसिला आरंभ किया उसे पं.वृजनारायण चकबस्त ने नई बुलंदियों पर पहुँचाया। देशभक्ति और राजनीतिक आंदोलनों से ग़ज़ल को सीधे जोड़ा।
     उल्लेखनीय है ग़ज़ल लिखने वाले शायरों में कई विचारधाराओं के मानने वाले लोग थे।ग़ज़ल एक ही विचारधारा के दायरे में नहीं रही है। इसमें दलीय पक्षधरता भी रही है। नये और पुराने के बीच में वैचारिक और सर्जनात्मक जंग भी रही है।  लोग कहते हैं ग़ज़ल सूत्र है,नज्म भाष्य है।ग़ज़ल संकेत है,नज्म स्वीकृति।नज्म काव्य है,ग़ज़ल सूक्ति है। नज़्मों में समसामयिक घटनाओं और रीतिरिवाजों के बारे में जमकर लिखा गया। इससे नज़्म और राजनीति, नज़्म और आंदोलन,नज़्म और समसामयिकता का नया अंतस्संबंध सामने आया। खासकर राजनीतिक विषयों पर लिखी नज़्में  खूब जनप्रिय हुईं। इस तरह की रचनाओं का तात्कालिक असर खूब होता था,लेकिन तात्कालिक जरुरत खत्म होते ही ये बेकार हो जाती हैं, यह सिलसिला आज भी बरकरार है।
      नज़्म से विचारधारात्मक प्रौपेगैण्डा में बहुत मदद मिली।  आशय यह कि प्रचार खत्म तो नज़्म भी खत्म। इसके विपरीत ग़ज़ल में विधा के तौर पर दीर्घजीवी भाव रहा है। मजेदार बात है उर्दू के तमाम बड़े शायरों ने नज़्म और ग़ज़ल दोनों लिखी हैं। वे इन दोनों ही रुपों का समय देखकर इस्तेमाल करते थे। तमाम प्रगतिशील शायरों की जनप्रियता में नज़्म की भी  भूमिका रही है।
    ग़ज़ल में अप्रत्यक्ष और संकेतात्मक शैली प्रमुख रही है। एक शायर ने लिखा भी है कि ग़ज़लका वार पत्थरकी तरह सीधे न होकर दुशालेमें लिपटा हुआ होता है। ग़ज़ल में कहना है तो उसकी सीमाओं में रहकर ही कह सकते हैं । मसलन्, दानीसे शायर 'अदम' कह रहा है-
' शिकन न डाल जबींपर शराब देते हुए।
यह मुसकराती हुई चीज़ मुसकराके पिला।।'
अब यदि कोई कमअक्ल इसे मयखाने के लिए लिखी शायरी समझे तो हम क्या करें! इसीलिए कहा गया है  ग़ज़ल को जानने के लिए गहरे साहित्यबोध की जरुरत होती है। उसे साहित्यिक कॉमनसेंस या यांत्रिक ढ़ंग से नहीं समझा जा सकता।
मसलन्, व्यवस्था परिवर्तन के सवाल पर आनंदनारायण मुल्ला का यह शेर देखें-
'' निजामे-मैकदा साक़ी! बदलनेकी जरुरत है।
 हजारों हैं सफें जिनमें , न मैं आई, न जाम आया।। ''
ढोंगी और नेताओं पर 'मीर' ने लिखा-
    '' मसजिदमें इमाम आज हुआ,आके वहाँसे।
     कल तक तो यही 'मीर' ख़राबत नशीं था।।'
चेतावनी के प्रसंग में 'मीर' का शानदार शेर पढ़ें-
  '' ऐ वोह कोई जो आज पिये है शराबे-ऐश।
   ख़ातिरमें रखियो कलके भी रंजो-ख़ुमारको।।''

कहने का आशय यह कि ग़ज़लगो शायर हर बात इशारेमें और परदेमें बयान करता है। यही वजह है कि कभी वह विश्ववेदनाको अपनी वेदना बनाकर ग़मे-जानाँके परदे में पेश करता है। मसलन्, '' जो ग़म हुआ,उसे ग़मे –जानाँ बना लिया।।''      

शुक्रवार, 5 जून 2015

ग़ज़ल और सम-सामयिकता की समस्या

  
ग़ज़ल आज सबसे जनप्रिय विधा है। इसके पढ़ने-सुनने वाले बेशुमार हैं। इसके बारे में आमतौर पर सोशलमीडिया में बातें नहीं होतीं,लोग ग़ज़ल के अंश शेयर करते हैं. पूरी ग़ज़ल भी शेयर करते हैं, लेकिन उसकी समस्याओं पर भी कभी ठहरकर सोचना चाहिए। आमतौर पर ग़ज़ल सामयिक विषयों पर नहीं लिखी जाती। शायर का इस संदर्भ में विश्वास यह रहा है कि ग़ज़ल ऐसी हो जो सदाबहार हो,कालातीत हो। ग़ज़ल लेखक अपने सामने घटने वाली भयानक से भयानक घटनाओं को देखकर भी उन पर नहीं लिखते ,असल में शायर की कोशिश रहती है कि इस विधा को समसामयिकता से दूर रखा जाय और इसमें उन विषयों पर लिखा जाय जो चिरकाल तक इस विधा को बनाए रखें। कालातीत सार्वभौम प्रयोग की यह शानदार विधा है। इस विधा में रमने के लिए शायर के पास गम खाने,दुख सहने और व्यथा को काव्यात्मक रुपान्तरण की शक्ति अर्जित करनी पड़ती है।
     अमूमन दो तरह शायर मिलते हैं। एक हैं नज्म-गो शायर और दूसरे हैं ग़ज़ल-गो शायर। इन दोनों में अंतर है। नज्म –गो शायर आपदाओंको अतिरंजित भाव से देखता है, उससे प्रभावित होता है उसका अतिरंजित चित्रण करता है। जबकि ग़ज़ल-गो शायर आपदाओं को अपने अंदर ज़ज्ब कर लेता है,फिर जो जज़्बात उसके मुँहसे निकलते हैं वही ग़ज़ल कहलाते हैं। उर्दू में मीर,गालिब आदि ऐसे ही शायर हुए हैं। जिनके जीवनकाल में अनेक मूलगामी परिवर्तन आए,आपदाएं आईं,दिल्ली लुटी,इन्कलाब आए लेकिन वे अंदर ही अंदर घुटते रहे,मिटते रहे। मीर तो यह कहकर ही चुप हो गए-
                                   दीदनी है शिकस्तगी दिलकी।
                                    क्या इमारत ग़मोंने ढ़ाई है।।
गालिब ने लिखा – चिराग़े-मुर्दा हूँ मैं बे जबाँ गोरे-गरीबाँका-
ऐसा नहीं है कि ग़ज़ल-गो शायरों ने सामयिक घटनाओं पर नहीं लिखा.लेकिन संक्षिप्त और नपे-तुले शब्दों में लिखा है। 'मीर' के जीवनकाल में क़ादिर रहीलाने शाहआलम बादशाहकी आँखोंमें नीलकी सलाइयाँ फेरकर उन्हें ज्योतिहीन कर दिया था। इस दर्दनाक घटना को 'मीर' ने अपनी ग़ज़ल के एक शेरमें यूँ व्यक्त किया है-
          शहाँ कि कुहले-जवाहर थी खाके-पा जिनकी।
          उन्हींकी आँखोंमें फिरती सलाइयाँ देखी।।
इसी घटना को इकबाल ने नज्म में पेश किया है जिसमें काफी अशआर हैं। लेकिन आधुनिक जिंदगी के दवाबों के चलते इधर के वर्षों में ग़ज़ल पर समसामयिकता का दवाब बढ़ा है।
 मसलन् शायर यगाना के साम्प्रदायिकता पर लिखे चंद शेर पढ़ें -
'पढ़के दो कलमें अगर कोई मुसलमाँ हो जाय।
फिर तो हैवान भी दो रोज़में इन्साँ हो जाय!!  
सब तेरे सिवा खाफ़िर,आख़िर इसका मतलब क्या ?
सिर फिरा दे इन्साँ ऐसा खब्ते-मज़हब क्या ?
महराबोंमें सजदा वाजिब ,हुस्नके आगे सजदा हराम।
ऐसे गुनहगारोंपै खुदाकी मार नहीं तो कुछ भी नहीं।।
दुनियाके साथ दीनकी बेगार अलअमाँ ।
इन्सान आदमी न हुआ,जानवर हुआ।।
बस एक नुक़्त-ए-फ़र्जीका नाम है काबा।
किसीको मरकज़-तहकीक़का पता न चला।।
मज़हबसे दग़ा न कर,दग़ासे बाज़ आ।
किस कामका हज़! मकरो-रियासे बाज़ आ।।

ईमान तो कहता है कि इन्साँ बन जा।
बन्देकी मददको आ,खुदासे बाज़ आ।।

इसी तरह आनन्दनारायण मुल्ला ने लिखा- 
मैं फ़कत इन्सान हूँ ,हिन्दू-मुसलमाँ कुछ भी नहीं।
मेरे दिलके दर्दमें तफ़रीके-ईमाँ कुछ नहीं।।
असर लखनवी ने लिखा-
       मसजिदेवाजसे इक रिन्द यह कहते उट्ठा
       ''काफिर अच्छे हैं दिलाज़ार मुसलमानोंसे'' ।।

  

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