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रविवार, 22 नवंबर 2015

शिक्षा और लोकतंत्र की चुनौतियां


        भारत की शिक्षा प्रणाली खासकर स्कूली शिक्षा पर बातें करते समय हमें बहुत ही कठिन सवालों से गुजरना होगा। मुश्किल यह है कि शिक्षा के कठिन सवालों पर देश में हमने लंबे समय से व्यापक स्तर पर कोई बहस ही नहीं चलायी है, समय-समय पर जब कोई नीति घोषित होती है तो उत्सवधर्मी भाव से कुछ सेमीनार,कन्वेंशन,संगोष्ठियां हो जाती हैं, कुछ प्रस्ताव संसद या विधानसभा में पास हो जाते हैं लेकिन गंभीर विस्तृत चर्चा नहीं होती,जनांदोलन नहीं होता। सवाल यह है कि क्या शिक्षा ऐसा विषय है जिस पर कोई बात ही न की जाए ?

हमने आजादी के बाद शिक्षा का जो ढांचा चुना और नीतिगत रास्ता चुना उस समय भी निचले स्तर पर कोई बड़ी बहस नहीं हुई। बाद में 1990-91 में भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के साथ नत्थी होकर हमारे शासकों ने जो शिक्षा का मार्ग चुना उस समय भी जनबहस नहीं हुई,इस बात को कहने का मकसद यह है कि हमारा समाज जानता ही नहीं है कि हमारे यहां शिक्षा का क्या हाल है और उसके सामने किस तरह की चुनौतियाँ हैं।

शिक्षा के विकास का नेहरु मॉडल पूरी तरह देश में असफल रहा,देश के हर कोने में और प्रत्येक समुदाय के पास शिक्षा पहुँचाने में यह मॉडल असफल रहा।इस मॉडल की सबसे बड़ी खामी यही है कि सने आरंभ से ही सीमित शिक्षा के लक्ष्य को सामने रखा । सीमित शिक्षा,सीमितचेतना और सीमित शिरकत यही इस मॉडल की विशेषता थी। “सबको शिक्षा” का नारा महज नारा ही बना रहा। सभी बच्चे स्कूल में हों यह सपना ही रह गया। बच्चों के स्कूल न जाने का अर्थ है उन्हें मानवाधिकार से वंचित रखना। हम इस पहलू पर विचार करें कि शिक्षा के जरिए मानवाधिकारों का हम कहां तक प्रसार करते हैं ?

उल्लेखनीय है मानवाधिकारों पर जिस गति से हमले बढ़ें हैं उस गति से मानवाधिकारों का प्रसार नहीं हुआ है। स्कूली शिक्षा व्यवस्था के स्वरुप पर गंभीरता से विचार करें तो पाएंगे कि भारत सरकार की प्राथमिकताओं में स्कूली शिक्षा कभी नहीं रही। आज भी नहीं है। जो लोग आए दिन शिक्षा के निजीकरण की हिमायत करते हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि स्कूली शिक्षा का समूचा बोझ उठाने या दायित्व पूरा करने में निजी क्षेत्र एकदम असमर्थ है। आज भी स्कूली शिक्षा का मात्र 10फीसदी नेटवर्क निजी क्षेत्र के दायरे में आता है 90फीसदी क्षेत्र सरकारी स्कूलों के दायरे में आता है। आज यदि सारे देश को स्कूली शिक्षा के दायरे में लाना है तो सालाना 73हजार करोड़ रुपये की हर साल आगामी छह वर्षों तक जरुरत होगी और केन्द्र और राज्य सरकारें यह पैसा खर्च करना नहीं चाहतीं। अकेले बिहार को स्कूली शिक्षा के दायरे में लाने के लिए आगामी नौ सालों तक प्रतिवर्ष 9,500करोड़ रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं। इस स्थिति से एक अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं कि स्कूली शिक्षा की अवस्था बहुत बेहतर नहीं है। हमें स्कूली शिक्षा के विकास के लिए सही नीति,समुचित संसाधन और राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरुरत है। आज ज्यादातर स्कूलों-कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पैरा टीचर बड़ी संख्या में काम कर रहे हैं। सारे देश के स्कूलों में तीन लाख से ज्यादा पैराटीचर काम कर रहे हैं। वहीं कॉलेजों में तकरीबन 50फीसदी से ज्यादा पदों पर पार्टटाइम-अतिथि शिक्षक काम कर रहे हैं। यही हाल विश्वविद्यालयों का भी है।यानी देश का बहुत बड़ा हिस्सा ठेके पर काम करने वाले शिक्षकों पर निर्भर है। यही दशा निजी क्षेत्र की है,वहां पर भी कॉन्ट्रेक्ट के आधार पर शिक्षक पढ़ा रहे हैं। स्थिति की भयीवहता का अंदाजा लगाने के लिए एक ही उदाहरण बताना यथेष्ट होगा। पश्चिम बंगाल में कुछ महिने पहले टीइटी शिक्षकों की भर्ती के लिए ऑनलाइन आवेदन मांगे गए थे,उस समय तकरीबन 22लाख छात्रों ने आवेदन किया, राज्य सरकार को इस आंकड़े को देखकर परीक्षा रद्द करनी पड़ी।क्योंकि इतनी बड़ी तादाद में परीक्षा-इंटरव्यू संपन्न करने में तकरीबन दो साल लगते।

शिक्षा ,साक्षरता और उपभोक्ता-

सन् 1990-91 के बाद से देश में स्कूली शिक्षा का अर्थ ही बदल गया है। अब शिक्षा का अर्थ बच्चे के ज्ञान और क्षमता का विकास करना नहीं है। इसके विपरीत शिक्षा का अर्थ है प्रयोजनमूलक शिक्षा या साक्षरता। यानी बाजार की जरुरत के अनुसार पढ़ो,सीखो और बाजार में उतरो। अब साक्षर बनाने पर जोर है, क्षमता बढ़ाने पर जोर नहीं है। जबकि एक जमाने में शिक्षा का अर्थ था बच्चे की ग्रहण क्षमता और ज्ञानक्षमता का विकास करना। लेकिन इन दिनों ये दोनों काम शिक्षाप्रणाली ने छोड़ दिए हैं और अब ज्यादा से ज्यादा साक्षर बनाने पर जोर दिया जा रहा है,इससे स्थिति बेहद खराब हुई है।अब प्रशिक्षित शिक्षकों को पैराटीचरों ने अपदस्थ कर दिया है।मसलन्, बिहार सरकार ने 1991 में घोषित किया कि स्कूल टीचर के लिए प्रशिक्षण आवश्यक नहीं होगा। असल में 1980 के दशक में शिक्षा को साक्षर बनाने की जो प्रक्रिया शुरु हुई वह अपना सारे देश में चक्र पूरा कर चुकी है। आज सारे देश में तकरीबन तीन से लाख से ज्यादा पैरा टीचर हैं। अब शिक्षा पर नहीं साक्षरता पर जोर है।समूची शिक्षा व्यवस्था का वस्तुकरण हो चुका है। अब बच्चों को साक्षर बनाने पर जोर है शिक्षा देकर उनकी बौद्धिक क्षमता बढ़ाने पर जोर नहीं है। जबकि शिक्षा का मकसद है छात्रों में बौद्धिक क्षमता, ग्रहण क्षमता,सामाजिकचेतना और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना पैदा करना। आज ये सारे लक्ष्य किनारे कर दिए गए हैं और नौकरी पाना ही प्रधान लक्ष्य है। यही वजह कि अधिकांश छात्र समझ ही नहीं पाते कि समाज में सही या गलत क्या हो रहा है ? वे तो मीडिया से संचालित होकर अपनी राय बनाते हैं। वे मीडिया को ही अपना सर्वे-सर्वा मानते हैं । मीडिया और खासकर विज्ञापन और जनसंपर्क तो उनके लिए खुदा है, उसके हर वाक्य को वे आप्त वाक्य मानते हैं। यही वजह है वे साक्षरता के आगे अपनी चेतना का विकास नहीं कर पाए हैं। उनके पास डिग्री है ,लेकिन चेतना का स्तर साक्षरों के बराबर है।

नई समझ यह बनायी जा रही है कि छात्र को उपभोक्ता मानो। शिक्षा को सेवाक्षेत्र मानो। इस समझ ने छात्र की पहचान को उपभोक्ता की पहचान के जरिए अपदस्थ कर दिया है। शिक्षा का बड़े पैमाने पर व्यवसायीकरण हो रहा है ,शिक्षा को बाजार की जरुरतों के साथ जोड़ दिया है। इसके कारण शिक्षा का क्षय तो हुआ ही है,शिक्षकों का भी क्षय हुआ है,एक जमाना था शिक्षक “पब्लिक इंटेलेक्चुअल” हुआ करते थे,लेकिन आज कोई भी शिक्षक इस कोटि में नहीं है।अब शिक्षक भी एक “माल” हैं,स्कूल एक बाजार है और छात्र उसके उपभोक्ता हैं। प्राइवेट स्कूलों से लेकर निजी विश्वविद्यालयों तक छात्रों को उपभोक्ता की तरह सेवाएं प्रदान की जा रही हैं और उनसे हर सेवा के पैसे लिए जाते हैं। इस समूची प्रक्रिया ने छात्र-शिक्षक के संबंध को खत्मकर दिया है. आज शिक्षकों पर दवाब है कि वे बाजार की जरुरतों और मांगों की पूर्ति के लिए पढाएं, इस तरह का पाठ्यक्रम पढाओ जिससे छात्रों को नौकरी मिले,वे काम करे, “काम करने” को इतना महत्व दिया गया है कि सोचने-विचारने के लक्ष्य को बहुत कहीं पीछे छोड़ दिया गया है। इस क्रम में हमने कभी सोचा ही नहीं कि इससे देश ताकतवर बनेगा या कमजोर बनेगा !

सवाल यह है हम लोकतंत्र के लिए “नागरिक” चाहते हैं या “उपभोक्ता” ? यदि “उपभोक्ता” के जरिए लोकतंत्र का निर्माण करना चाहते हैं तो लोकतंत्र की प्रकृति अलग होगी.यदि नागरिक के जरिए लोकतंत्र बनाना चाहते हैं तो लोकतंत्र की प्रकृति अलग होगी। “उपभोक्ता” और “नागरिक” में गहरा अन्तर्विरोध है। “उपभोक्ता” के “अन्य” के प्रति कोई सामाजिक सरोकार नहीं होते,वह सिर्फ अपने बारे में सोचता है, निहित स्वार्थों को सामाजिकता कहता है।इसके विपरीत “नागरिक” के निजी नहीं सामाजिक स्वार्थ होते हैं,सामाजिक लक्ष्य होते हैं , उसे अपने से ज्यादा “अन्य” की चिन्ता होती है। लोकतंत्र के विकास के लिए हमें “उपभोक्ता”नहीं “नागरिक” चाहिए। लोकतंत्र कभी भी उपभोक्ता के जरिए समृद्ध नहीं होता, नागरिक और नागरिकचेतना के जरिए समृद्ध होता है। शिक्षा के सेवाक्षेत्र में जाने और छात्र के उपभोक्ता बन जाने का प्रकारान्तर से असर यह हुआ कि छात्र-शिक्षक का संबंध खत्म हो गया। दूसरा, “छात्र(उपभोक्ता) हमेशा सही होता है”,इस धारणा को बल मिला। यही वह धारणा है जिसके आधार पर कहा जा रहा है कि शिक्षकों की भूमिका का छात्र मूल्यांकन करेंगे।यह असल में बाजार की मांग-पूर्ति के गर्भ से उपजा प्रपंच है।तीसरा,दवाब यह है कि शिक्षक वही पढाएं जो छात्र को बाजार में खड़े होने में मदद करे,प्रतिस्पर्धा में खड़े होने में मदद करे। चौथा, यह भ्रम निकाल दें कि निजी स्कूल,निजी क्षेत्र में खुल रहे विश्वविद्यालय आदि शिक्षा के मंदिर हैं ,ये तो “नौकरी” देने वाले संस्थान हैं,शिक्षा देना इनका मकसद नहीं है।निजी क्षेत्र में चल रहे विश्वविद्यालय और स्कूल आदि तो शिक्षा की गुणवत्ता के आधार पर नहीं चल रहे ये तो मीडिया निर्मित इमेज और जनसंपर्क अभियान के जरिए चल रहे हैं। ये कारपोरेट फंडिंग,अनुदान,व्यवसायिक हिस्सेदारी,मुनाफे और नियंत्रण पर आधारित हैं। इन संस्थानों में किसी भी स्तर पर लोकतांत्रिक संरचनाएं और लोकतांत्रिक माहौल नहीं हैं।

देश में स्कूली शिक्षा की स्थिति बेहद खराब है। कक्षा एक से पांच के बीच पढाई के दौरान बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने वाले विद्यार्थियों की संख्या तकरीबन 61 प्रतिशत है।यही संख्या बिहार में 75प्रतिशत है।इनमें अनुसूचित जाति-जनजाति के छात्रों की संख्या काफी ज्यादा है। इनमें अनुसूचित जाति के 70फीसदी और जनजाति के 78प्रतिशत छात्र बीच में ही पढाई छोड़ जाते हैं। आज भी 30प्रतिशत बच्चे स्कूल नहीं पहुँच पाए हैं। बिहार में 50फीसदी बच्चे स्कूल के बाहर हैं। बच्चों को स्कूल से बाहर रखने का अर्थ है उनको मानवाधिकार से वंचित करना। इसी प्रसंग में हम निजी और सरकारी क्षेत्र की भूमिका पर भी सोचें। आज हकीकत यह है कि 90फीसदी स्कूल सरकारी क्षेत्र में हैं और मात्र 10फीसदी स्कूल निजी क्षेत्र में हैं। निजी क्षेत्र में सब बच्चों को पढ़ाने की क्षमता ही नहीं है। मौटे तौर पर स्कूली शिक्षा का स्तर बेहद खराब है।

लोकतांत्रिक शिक्षा व्यवस्था-

सवाल उठता है कि छात्रों को इतिहास,अंग्रेजी और विज्ञान पढ़ाएंगे तो क्या देश का विकास होगा या देश में लोकतंत्र को मजबूत करने में मदद मिलेगी ? क्या विज्ञानसम्मत पाठ्यक्रम पढ़ाने मात्र से बेहतर व्यक्ति पैदा होता है ? उत्तर होगा नहीं। वास्तविकता यह है कि हमारे पाठ्यक्रम,छात्र,शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था का “सामाजिक न्याय” की अवधारणा के साथ गहरा अन्तर्विरोध है। हमारे शिक्षक-छात्रों में से अधिकांश कभी सामाजिक न्याय के नजरिए से न तो समाज के बारे में सोचते हैं और न शिक्षा व्यवस्था के बारे में सोचते हैं। हमने तो “मैं” या व्यक्तिवाद के आधार शिक्षा का समूचा ढाँचा तैयार किया है। हम जो पाठ्यक्रम पढ़ाते हैं वह सामाजिक यथार्थ जोड़ता नहीं है। मसलन्, हमारे छात्र कहीं पर भी यह नहीं जान पाते कि आखिर गेंहूं की बाली कैसी होती है,चमेली का पौधा कैसा होता है। प्रयोजनमूलक किताब और अंततःकिताब ही उनके ज्ञान का सर्वस्व है। इसके कारण एक कमाऊ व्यक्ति तो शिक्षा बना देती है,सिस्टम के लिए आदमी बना देती है लेकिन समाज के लिए “नागरिक” नहीं बना पाती। शिक्षानीति का आधार जब तक “सामाजिक न्याय” और नागरिकचेतना” को नहीं बनाते हम शिक्षा को बाजार के दवाब से मुक्त नहीं कर सकते। समाज में सर्वसत्तावादी राजनीति को हमेशा उपभोक्ता-छात्र से मदद मिलती रही है,यही वह छात्र है जो “अ-राजनीति” की राजनीति रहा है और खुलेआम सर्वसत्तावादी राजनीति के साथ खड़ा नजर आता है।जबकि वैकल्पिक राजनीति करने वालों के लिए जरुरी है कि वे छात्र को नागरिक बनाएं,मानवाधिकारों की चेतना दें,उसे छात्र जीवन में ,शिक्षा में राजनीति करने,शिक्षा के लोकतांत्रिकीकरण की प्रक्रिया का अंग बनाने और लोकतांत्रिक राजनीति करने के लिए तैयार करें। आज बड़े पैमाने पर जिस संविधानविरोधी और धर्मनिरपेक्षताविरोधी चेतना को युवाओं के एक बड़े समूह में सरेआम देख रहे हैं यह असल में वही समुदाय है जिसे उपभोक्ता-छात्र राजनीति ने तैयार किया है। मुश्किल यह है कि सर्वसत्तावाद की राजनीति करने वाले दोनों प्रधान दल कांग्रेस और भाजपा दोनों को “अ-राजनीति” की राजनीति सही लगती है,वे उसकी दैनंदिन अकादमिक जीवन में वकालत करते हैं और इन्हीं दोनों दलों के बीच उपभोक्ता छात्रों का बड़ा समूह आज आपको खड़ा दिखाई देगा।

देशकी शिक्षा नीति राजनीतिक दल और संसद तय कर रहे हैं,फंड भी राजनीतिक नजरिए से तय हो रहा है,संसाधनों का आवंटन भी राजनीति के आधार पर हो रहा है तो फिर स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालय के स्तर पर छात्रों को राजनीति करने से मना क्यों किया जा रहा है ? कायदे से शिक्षा संस्थानों में संविधानसम्मत राजनीति की गंभीरता के साथ शिक्षा देनी चाहिए। संविधानसम्मत लक्ष्यों के अनुरुप शिक्षकों के दिलो-दिमाग को रुपान्तरित करने, लोकतांत्रिक नजरिया,लोकतांत्रिक संस्कार और आदतें विकसित करने के प्रयास किए जाने चाहिए। आज देश को संविधानसम्मत विवेक से लैस लोकतांत्रिक शिक्षक चाहिए।

सवाल यह है हम शिक्षा के जरिए किस तरह का व्यक्ति निर्मित करना चाहते हैं ? हम “नागरिक बनाना चाहते हैं या धार्मिक प्राणी या फिर उपभोक्ता बनाना चाहते हैं ? लोकतंत्र के विकास की बुनियाद है “नागरिक” और लोकतंत्र की विचारधारा है मानवाधिकार या संविधानप्रदत्त अधिकार। “नागरिक” बनाए वगैर संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा करना संभव नहीं है। आज स्थिति यह है कि शिक्षितों में बहुत बड़ा अंश है जो “नागरिकबोध” से वंचित है,देश में रहते हैं,देश का उपभोग कर रहे हैं लेकिन नागरिकचेतना से शून्य हैं। इसने इफ़रात में मध्यवर्ग के अंदर सर्वसत्तावादी राजनीति का आधार बनाया है।इस तरह के लोग जाने-अनजाने संविधान,लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ आए दिन आचरण करते नजर आते हैं।

आज जो शिक्षित है उसे लोकतंत्र नहीं ,तानाशाही अच्छी लगती है। यही हमारी शिक्षा की आयरनी है। यह वर्ग अपने निहित-स्वार्थों से आगे जाकर देख ही नहीं रहा। यही वह वर्ग है जिसको “सामाजिक न्याय” के नजरिए से चिढ़ है।यही वह वर्ग है जो शिक्षा और समाज के प्रति अपनी जवाबदेही से भागता है। उपेक्षितों से इसने खास दूरी बनायी है। समय-समय उनके हितों पर हमले किए हैं। आज देश में आरक्षण, धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सबसे ज्यादा वैचारिक और राजनीतिक हमले इसी वर्ग की ओर से हो रहे हैं और देश के सबसे घृणित राजनीतिक समूह (हिन्दुत्ववादियों) के द्वारा इस समूचे घृणा अभियान को शिक्षितों में नियोजित ढ़ंग से चलाया जा रहा है।एक जमाने में यही वर्ग आपातकाल में श्रीमती इंदिरागांधी और मनमोहन सिंह सरकार के साथ खड़ा था।

लोकतांत्रिक शिक्षा के लिए जरुरी है कि विश्वविद्यालय से लेकर स्कूल स्तर तक शिक्षा का समूचा तंत्र लोकतांत्रिक,पारदर्शी और जनशिरकत वाला बनाया जाय। शिक्षा में शामिल लोगों की व्यक्तिगत,सामुदायिक और सामाजिक जवाबदेही तय की जाय। आज स्थिति इतनी भयावह है कि सरेआम संविधान प्रदत्त अधिकारों और मूल्यों को चुनौती दी जा रही है और शिक्षितों में से उसका प्रतिवाद नजर नहीं आ रहा,बल्कि उलटे शिक्षितों का बड़ा समूह हमले कर रहा है।आज सतह पर निजीतौर पर जिम्मेदार नागरिक,शिरकत करने वाला नागरिक और न्याय केन्द्रित नागरिक दिख जाएगा। लेकिन हमें तो ऐसा नागरिक चाहिए जो नागरिकचेना के प्रति वचनवद्ध हो। हमें टुकड़ों में नागरिक हकों से प्यार करने वाला नागरिक नहीं चाहिए। एक अन्य चीज है जिस पर गौर करने की जरुरत है वह है अनुकरण और देशभक्ति, ये दोनों तत्व बेहद दुखदायी हैं, इनसे लोकतांत्रिक लक्ष्यों को हासिल करने में मदद नहीं मिलती, उलटे बाधाएं उठ खड़ी होती हैं। इसी तरह पड़ोसी से अच्छा बर्ताव या ईमानदारी पर अतिरिक्त जोर देने की जरुरत नहीं है ये तो लोकतंत्र के अंतर्निहित गुण हैं।

हमारी शिक्षा का तंत्र वस्तुतःगूंगे-बहरों का तंत्र है। इसमें आने वाले समाज की बहसें और मसलों पर वैचारिक सरगर्मी नजर नहीं आती। क्या हम मान बैठे हैं कि यथास्थिति बनाए रखें ? भविष्य में कुछ भी बदलना नहीं चाहते ? भविष्य के सवालों और समस्याओं पर अकादमिक जगत में सन्नाटा बताता है हमारा शिक्षित समुदाय किस कदर समाज निरपेक्ष है और उसे समाज के भविष्य की कोई चिन्ता नहीं है। यह उसके परजीवी विवेक का आदर्श नमूना है। सवाल यह है हमारी शिक्षा व्यवस्था यथास्थितिवादी है या परिवर्तनशील है ? बहुलतावादी संवेदना निर्मित करती है या धार्मिकचेतना निर्मित करती है ? साम्प्रदायिक ,जातिगत और धार्मिकभेदों को यह समाप्त क्यों नहीं कर पाई ? सच तो यही है कि बहुलतावाद के ऊपरी आवरण को हटा दें तो शिक्षा ने जमीनी स्तर पर भेदों की समाप्ति करने की बजाय भेदों की सृष्टि करने वाली संस्कृति,मूल्य और मानसिकता को निर्मित किया है।

लोकतांत्रिक शिक्षा का लक्ष्य है आलोचनात्मक विवेक पैदा करना। जबकि उपभोक्ता केन्द्रित मौजूदा शिक्षा का लक्ष्य है सर्वसत्तावादी विवेक पैदा करना। इसलिए मौजूदा मॉडल को अंदर और बाहर हर स्तर पर आलोचना के केन्द्र में रखने की जरुरत है। लोकतांत्रिक शिक्षा का परिवेश सामाजिक बहस के नए मुद्दों को जन्म दे सकता है,लोकतंत्र में पॉजिटिव भूमिका निभाने का माहौल बना सकता है। शिक्षकों की पॉजिटिव इमेज बना सकता है और छात्र को नागरिक बना सकता है।

लोकतांत्रिक अध्यापक- लोकतांत्रिक शिक्षा के लिए लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य,लोकतांत्रिक अकादमिक परिवेश और लोकतांत्रिक शिक्षक का होना जरुरी है। लोकतांत्रिक शिक्षक के बिना लोकतांत्रिक छात्र का निर्माण संभव नहीं है। शिक्षा को बदलने के लिए जरुरी है कि शिक्षकों के नजरिए,संस्कार,आदतें आदि को लोकतांत्रिक बनाया जाय, शिक्षक अपना कायाकल्प करें। लोकतंत्र की धारणा को स्पष्ट तौर पर समझें,लोकतंत्र का मतलब अ-राजनीतिक तंत्र नहीं है,वोट देना मात्र नहीं है,लोकतांत्रिक समाज का मतलब अ-राजनीतिक समाज नहीं है। लोकतंत्र का मतलब है राजनीतिक समाज,ऐसा समाज जिसमें समाज के सभी वर्गों और समुदायों के विकास,मूल्य ,आचार-व्यवहार आदि को लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी पर परखा जाय जो मूल्य खरे उतरें उन्हें बचाएं और जो अप्रासंगिक हैं उनको ठुकराएं। समानता, धर्मनिरपेक्षता ,सामाजिक न्याय और समाजवाद इसके भावी लक्ष्य हैं जिनको प्राप्त करना है।

आज हमारे बीच में इस तरह के लोग है जो शिक्षा के लोकतांत्रिकीकरण का खुलकर विरोध करते हैं और कहते हैं कि शिक्षा को राजनीति से मुक्त रखो। इस तरह के लोगों से यही कहना है कि लोकतंत्र में रहना है तो राजनीतिक होकर रहना होगा। राजनीति के बिना लोकतंत्र संभव नहीं है। लोकतांत्रिक राजनीतिक शिरकत और लोकतांत्रिक राजनीतिकबोध के बिना संवैधानिक मान्यताओं और मूल्यों की रक्षा करना संभव नहीं है। देश में राजनीतिकदलों और संसद से ऊपर है संविधान और उसकी मान्यताएं,हमें किसी भी कीमत पर संविधान के दर्जे को कम नहीं होने देना चाहिए। आज विभिन्न तरीकों से संविधान प्रदत्त मूल्यों और हकों पर हमले हो रहे हैं इन हमलों के खिलाफ आम जनता के साथ शिक्षित समुदाय को मिलकर संघर्ष करने की जरुरत है।आने वाले समय में मोदी सरकार नई शिक्षा नीति लाने जा रही है ,इस सरकार के रंग-ढ़ंग को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है ये लोग किस रास्ते देश की शिक्षा व्यवस्था को ले जाना चाहते हैं। यही वजह है हमें अभी से शिक्षा जगत में विभिन्न स्तरों पर आने वाली शिक्षा नीति के बारे में सचेत होकर जागरण अभियान चलाने की जरुरत है। अब तक के शिक्षा के अनुभवों को शेयर करने की जरुरत है,नए हमलों को विस्तार से अकादमिक जगत को बताने की जरुरत है,क्योंकि यह वर्ग सम-सामयिक यथार्थ से पूरी तरह विच्छिन्न है और उसे सम-सामयिक यथार्थ के लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य के साथ जोड़ने की जरुरत है।

शिक्षा के मौजूदा ढाँचे पर बातें करते समय एक पहलू है सरकारी नीति का,दूसरा पहलू है शिक्षक की अवधारणा का और तीसरा पहलू है छात्र के स्वरुप का। भारत में लोकतंत्र है और लोकतंत्र के बहुमुखी विकास में मदद करना हमारी शिक्षा प्रणाली का बुनियादी लक्ष्य होना चाहिए। इसके लिए जरुरी है कि हम लोकतंत्र की समझ बेहतर और गंभीर बनाएं।एक शिक्षक को आचार-व्यवहार और परिप्रेक्ष्य के लिहाज से लोकतांत्रिक होना चाहिए।वह अपने विषय़ को गंभीरता से जाने , छात्रों में अध्ययन और श्रम के प्रति गहन रुचि पैदा करने की उसमें क्षमता हो।वह पढ़ाई के अत्याधुनिक तरीकों से वाकिफ हो,अपने काम की जगह स्वच्छ और सुव्यवस्थित रखना सिखाए,पुस्तकीय सामग्री और कम्युनिकेशन उपकरणों के उपयोग के तरीकों से परिचित हो।छात्रों में सबके साझे कार्यों में शिरकत की भावना पैदा करे, सामाजिक शिरकत और पहलकदमी के लिए प्रेरित करे। साथ ही छात्रों में समाज के प्रति सही दृष्टिकोण पैदा करे। हम यह ध्यान रखें कि शिक्षक के आचार-व्यवहार का छात्रों की सक्रियता पर असर पड़ता है। जो शिक्षक अपने छात्रों को सक्रिय न कर सके ,वह कमजोर शिक्षक माना जाएगा। छात्र में सक्रियता,शिरकत और पहलकदमी की भावना निर्मित करने में स्कूल शिक्षक बुनियाद निर्माण का काम कर सकते हैं। शिक्षा में सक्रियता का अर्थ है बच्चों को सोद्देश्य बौद्धिक क्रियाओं की ओर सक्रिय करना,बौद्धिक क्रिया और वस्तुजगत की एकता पर जोर देना। यदि यह प्रक्रिया एक बार आरंभ हो जाती है तो छात्रों को सही-गलत का फैसला करने में मदद मिलती है। साथ ही श्रम के महत्व को बच्चों के आचरण का अंग बनाना भी जरुरी है। हमारे बच्चे श्रम को पसंद नहीं करते,अपना काम अपने आप नहीं करते।इससे उनके अंदर श्रम विरोधी नजरिया पैदा होता है।



मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

वाम शासन में जलपाईगुड़ी में शिक्षा में भ्रष्टाचार



पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा सरकार और खासकर कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) किस संकट और नरक में फंसी हुई है उसकी एक छवि आज के टाइम्स ऑफ इण्डिया अखबार के कोलकाता संस्करण के मुखपृष्ठ पर छपी खबर को पढ़कर लगा सकते हैं। शिक्षा में ऊपर से नीचे तक गैरे पेशवर नजरिया,भ्रष्टाचार आदि के मामले में तो इन दिनों वाम यहां मायावती और लालूयादव के मार्ग पर चल पड़ा है। खबर पढ़ें-

Teacher hiring scam: 423 more to get the sack
Pinak Priya Bhattacharya, TNN, Dec 21, 2010, 03.38am IST

JALPAIGURI: The Jalpaiguri primary teacher recruitment scam is snowballing into a disaster for the CPM-led government. The state education department, which had suspended 16 fresh recruits in August, has announced disciplinary steps against 423 others — 79 more that it originally planned. That's a shocking 40% of the merit list. What's more, the state government is already calling them 'delinquents'. It is turning into a huge embarrassment for the ruling party since nearly 70% of the recruits are said to be CPM loyalists, relatives of CPM leaders or officials of District Primary School Council (DPSC). Among the 16 suspended in the first phase (after an inquiry) are the wife of then DPSC chairman Mrinal Paul and the daughter-in-law of the Jalpaiguri CPM secretary Manik Sanyal. Paul has since been removed from his post.
There are allegations that some CPM leaders took `2.5-3 lakh each from candidates to secure them a place on the final list. The question papers were allegedly leaked to these candidates and the inquiry panel found that the examiners had given away surprisingly generous marks. Faced with such damning revelations, the state government had no option but to act.
On December 14, the education department sent a letter to the DPSC saying appointments of 423 candidates were "not proper" and they are liable for disciplinary action. The suspect candidates would be served showcause notices and given 15 days to reply. "After receipt of reply or if no reply is received, the disciplinary authority shall issue a chargesheet, framing charges against the delinquent teachers," the letter reads.
The education department has asked the DPSC to cancel the empanelment of candidates whose appointment letters are yet to be sent and withdraw appointment letters of candidates who have not joined the posts. This is a clear indication that the government is not ready to continue with the 423 recruits.
"There have been irregularities in tabulating the Madhyamik marks of the candidates. Certificates have been fabricated, and there are many other things that I am not supposed to disclose. We will serve the showcause notices 10 days from now," said DI, primary, Kallol Roy on Monday, refusing to show journalists a copy of the letter.
The irregularities were so blatant that district tribal welfare officer D K Bardua, who was the administration's representative in the recruitment process, refused to approve it. But that had no effect as the results were published without his signature. The education department then set up an inquiry committee under joint secretary T K Adhikary. Its report opened a can of worms. District inspector of schools, primary, Kaushik Roy, who was also secretary of DPSC was demoted. The AI, primary, of Malbazar, Jugal Kishore Bera, was transferred. His wife, Anita Mondol, was among those selected.

इसी अखबार ने दो दिन पहले खबर दी ,उसे भी पढ़ें- 


Exposed: Dirty dealings for teaching jobs
Pinak Priya Bhattacharya, TNN, Dec 19, 2010,


Want to be a primary school teacher in Bengal? Qualification does not matter. Nor does talent, apparently. You only need to be a close relative to a ruling party leader. And if you don't fulfil the first criteria, you can also pay your way through, some 2.5 lakh in the least. You will get a leaked copy of the question papers in advance and if that's still tough for you, some helpful invigilators will be extremely generous with your marks.Till the other day, this was just an allegation. The scam over primary teacher recruitment in Jalpaiguri has proved that it is based on firm grounds. The ruling party leaders in Jalpaiguri got a little too greedy this time or desperate perhaps because of the winds of change. Over 70% of the new recruits this year are known CPM loyalists either DYFI or SFI activists, say sources. Many of these candidates got above 90% in the written test.They include the wife of Mrinal Paul, the chairman of the District Primary School Council (DPSC), which conducts the recruitment exam, and the daughter in law of Jalpaiguri district CPM secretary Manik Sanyal.
Such largescale irregularity was not likely to go undetected. Paul has since been removed from his post. More heads are rolling. The state education department has decided to suspend 344 recruits, in addition to the 16 suspended a few days ago, and is set to serve showcause notices on the 14 teachers who examined the test papers. The Opposition has already smelt blood. The scam is going to hurt the CPM, cornered as it is, even more in the run-up to the assembly election.The Last Straw The problem begins with the fact that no commission monitors primary teacher recruitment in Bengal. Teachers are always recruited in bulk, so the ruling party has always tried to get its own people empanelled.
When the results were published in August this year, it came as a shock that most of the selected candidates were either from families of top district leaders of the party or were relatives of DPSC employees. There are also instances where more than one candidate has got selected from the house of a DPSC worker or CPM leader.It is learnt that owing to the discrepancies, district tribal welfare officer D K Bardua, who was the administration's representative in the recruitment process, refused to approve it. But that had no effect as the results were published without his signature.Now, though, the times are different. Trinamool Congress and Congress launched a massive agitation across the district. They gheraoed the DPSC office, staged dharnas in front of the Kotwali police station, and took out rallies. Hundreds of youths, who were rejected in the exam, started lodging complaints.
With pressure mounting, Jalpaiguri district magistrate Vandana Yadav asked the state education department to start an inquiry. The probe committee reported gross irregularities, following which the education department suspended 16 new recruits, including Manik Sanyal's daughter-in-law.
DPSC chairman Mrinal Paul was removed immediately since his wife, Anita Das, had been selected. The rules prohibit a sitting chairman's relatives from appearing in the exam. DI, primary, Kaushik Roy, who was also secretary of DPSC was demoted. The AI, primary, of Malbazar, Jugal Kishore Bera, was transferred. His wife, Anita Mondol, was among those selected.On examining the test papers, the enquiry committee is said to have found that some candidates fetched undeservedly high marks in essay writing. "The distribution of marks was significant enough to convince the committee that the recruitment process was mishandled," said a source. The Jalpaiguri DPSC had called 21,000 candidates for the written examination for 1,411 posts. Appointments were given to 1,091 candidates and 320 posts were withheld'. The education department has decided to suspend a shocking 33% of the recruits.
Why did it all happen?
First, it was the pressure from party members in Jalpaiguri, who thought this would be their last chance to grab some goodies before next year's assembly election. Second, some CPM leaders wanted to make quick money.Leave aside the opposition, even members of the CPM's teacher's wing, the All Bengal Primary Teachers' Association, alleges that a section of party leaders had taken a lot of money from candidates, anything from Rs.2.5 lakh to Rs 3 lakh. A few influential CPM leaders allegedly controlled the entire process with the help of some DYFI and SFI leaders. It is also alleged that the question paper was leaked to chosen candidates and that the invigilators selectively turned a blind eye to cheating in the exam. None of these allegations could be corroborated, though.
But why were CPM leaders so desperate? It is becoming clearer to them that the party may not be able to withstand the winds of change, so party cadres started pressurizing leaders for jobs. The leaders, too, knew that if they did not take a last-ditch risk, they will not be able to hold on to their cadres for long. Wary of mass desertion from the ranks, some leaders got involved in the scam. Some others were in a hurry to make money.Initially, the Jalpaiguri CPM leadership tried to bluff and browbeat its way out of the mess. They went hammer and tongs at the Opposition, insisting that the allegations were baseless. "CPM has got nothing to do with the recruitment. It was done completely with accordance with all the rules of the primary school council. It's the candidates who did not get selected that are raising questions," Manik Sanyal had told TOI in August.Now the CPM is on the back foot and the leaders running for cover. When TOI contacted Sanyal on Saturday, he said: "I am not going speak on the issue."Consequences Not only Congress and Trinamool, a large section of SFI and DYFI activists are also upset by the recruitment scam because it affects the party's image.
"The party leadership has consistently misguided us. When the results came out, our leaders told us that even candidates with Congress and Trinamool background had been selected. Later we found that it was not true. Even when the first 16 candidates were suspended, our leaders claimed all was well. Now, with the government deciding to suspend another 344 new recruits, we are finding it really difficult to face questions that people are throwing at us," a DYFI leader said."We ended up looking like fools. The common people are taunting us," an SFI supporter said."Earlier, too, CPM used to influence the recruitment process to have their relatives selected. But this time they crossed all limits," alleged Chandan Bhowmick, secretary general of Jalpaiguri Trinamool Congress."This is the real character of CPM and even their party cadres have started understanding that," said Jalpaiguri Youth Congress president Saikat Chatterjee.










बुधवार, 8 दिसंबर 2010

वाम की जीत और प्राइमरी शिक्षा का सच


हाल ही में पश्चिम बंगाल प्राथमिक शिक्षा परिषद के चुनावों में वाममोर्चे को भारी जीत मिली है। यह जीत इस बात की सूचना है कि प्राथमिक शिक्षकों और कर्मचारियों में वाम मोर्चे का प्रभाव बरकरार है। किन्तु इस जीत का यह अर्थ नहीं है कि प्राइमरी शिक्षा में सब ठीक चल रहा है। वाम की जीत और प्राइमरी शिक्षा की बदहाल अवस्था के बीच कोई संबंध नहीं है। इन परिणामों ने ममता बनर्जी को संदेश दिया है अहर्निश हिंसा के माहौल में उनका दल चुनाव हार भी सकता है। दूसरी ओर वामनेता इस जीत में मग्न हैं और प्राइमरी शिक्षा को लेकर आत्मालोचना नहीं कर रहे हैं। वे प्राथमिक शिक्षा में मच रही तबाही को संगठनबल के आधार पर ढकना चाहते हैं। पिछले 35 सालों में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में वामदलों की असफलताओं के लिए कम से कम तृणमूल कांग्रेस को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
    नेशनल सेंपिल सर्वे के अनुसार राज्य में 1990-2000 के दौरान गांवों में रहनेवाले 27 प्रतिशत परिवारों और 12 प्रतिशत शहरी परिवारों में एक भी वयस्क (15 साल से ऊपर) व्यक्ति साक्षर नहीं है। जबकि एकदम निरक्षर परिवारों की संख्या तुलनात्मक तौर पर और भी ज्यादा दर्ज की गई है। यानी गांवों में 51 प्रतिशत और शहरों में 31 प्रतिशत परिवार हैं जो पूर्णतः निरक्षर हैं। अनुसूचित जाति ,जनजाति और अल्पसंख्यकों में तो स्थिति और भी बदतर है। खासकर ग्रामीण बंगाल में भयावह स्थिति है। नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे 2 के अनुसार साक्षरों के आंकड़े बताते हैं सन् 1998 -99 में मात्र 17 प्रतिशत लोग प्राइमरी से कम शिक्षा प्राप्त थे। सन् 1998-99 में मात्र गांवों में मात्र 48 प्रतिशत पुरूष 27 फीसदी ग्रामीण औरतें,जिनकी आयु 15 साल से ऊपर है,प्राइमरी शिक्षा प्राप्त थे। इनमें से मात्र एक-तिहाई लोग सैकेण्ड्री शिक्षा प्राप्त थे।
     आश्चर्य की बात है जिन वर्गों में वामदलों के जनसंगठन हैं उन वर्गों में शिक्षा का प्रसार कम हुआ है। मसलन खेतमजदूरों में शिक्षा अभी पहुँची ही नहीं है। जबकि इस वर्ग में माकपा का सबसे ताकतवर संगठन है। लेकिन कृषिक्षेत्र के आत्मनिर्भर समूहों में साक्षरता की दर बेहतर रही है। इसी तरह पुरूष और स्त्री के बीच में साक्षरता को लेकर व्यापक अंतर है। मजदूर औरतों में साक्षरता का प्रसार करने में वामपंथ पूरी तरह असफल रहा है। सन् 2001 की जनगणना के अनुसार आदिवासियों में मात्र 43.4 प्रतिशत जनसंख्या साक्षर है। जबकि राष्ट्रीय साक्षरता दर 47.1 प्रतिशत है। इनमें औरतों में मात्र 29.2 प्रतिशत और पुरूषों में मात्र 57.4 प्रतिशत साक्षरता दर्ज की गयी है। आदिवासियों में मात्र 8.4 प्रतिशत आबादी को माध्यमिक और उससे ऊपर की शिक्षा मिल पायी है। इसी तरह विभिन्न अनुसूचित जाति समूहों में भी साक्षरता की स्थिति खराब है। सुदूरवर्ती इलाकों में रहने वाले अनुसूचित जाति और जनजाति के समूहों में न्यूनतम लोगों तक ही शिक्षा पहुँच पायी है। मसलन कोलकाता में साक्षरता दर सबसे ज्यादा है और सुदूरवर्ती जिलों में साक्षरता दर बहुत नीचे है। यदि पश्चिम बंगाल के धार्मिक समूहों में साक्षरता के स्तर को देखें तो पाएंगे कि हिन्दुओं में 66 प्रतिशत, मुसलमानों में 32 प्रतिशत लोगों में साक्षरता है। 7 साल और उससे ऊपर की उम्र के मुसलमानों में 46 प्रतिशत परिवार साक्षर हैं जबकि हिन्दुओं में इससे भी कम यानी 35 प्रतिशत परिवार ही साक्षर हैं। इसी तरह अनुसूचित जाति,जनजाति की तुलना में मुसलमान शिक्षां में उतने वंचित नहीं हैं।
          प्राइमरी शिक्षा के राज्य सरकार के आंकड़ों में धांधलेबाजी चरम पर है।  स्कूलों के रजिस्टर के आधार पर दिए गए आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए हैं। यह बात प्रसिद्ध मार्क्सवादी अर्थशास्त्री जयति घोष ने मानव लिकास रिपोर्ट 2004 में रेखांकित की है। मार्क्सवादी प्रभात पटनायक और अभिजीत सेन की भी इस रिपोर्ट के साथ सहमति है। रिपोर्ट में कहा गया है गांवों में कक्षा 1 में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में 4-8 साल की आयु के बच्चे पढ़ते हैं,जबकि वे इस कक्षा में वास्तव में पढ़ते ही नहीं हैं। उनके नकली नाम रजिस्टर में दर्ज हैं। झूठी हाजिरी दर्ज है। मार्क्सवादी अर्थशास्त्रियों ने माना है पश्चिम बंगाल में प्राथमिक शिक्षा के बुनियादी ढ़ांचे का जबर्दस्त अभाव है। वाम सरकार अपने 35 साल के शासन में प्राइमरी शिक्षा के लिए पर्याप्त स्कूलों का निर्माण नहीं कर पायी है और न बुनियादी बिल्डिंग सुविधाओं को बना पायी है। राज्य में स्कूल हैं लेकिन पर्याप्त कमरे नहीं हैं। कमरेरहित स्कूलों की संख्या बहुत ज्यादा है। राज्य सरकार ने तेजी से स्कूल खोले हैं, स्कूल शिक्षकों की नियुक्तियां भी की हैं लेकिन कमरे नहीं बना पायी है। राज्य में जितने स्कूल हैं उनमें पांच में से एक स्कूल के पास बिल्डिंग नहीं है। यह आंकड़ा बेहद बड़ा है और इससे राज्य सरकार की अगंभीरता और गैर-जिम्मेदारी का भी पता चलता है। इससे यह भी पता चलता है कि बच्चों को बिल्डिंग के अभाव में कैसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा रही होगी ? राज्य में पांच में से एक स्कूल ऐसा है जिसके पास मात्र एक ही कमरा है। यानी इन स्कूलों में सारी प्राइमरी कक्षाएं एक ही कमरे में चल रही हैं। अब इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कितनी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा रही होगी ? राज्य में औसत प्रति स्कूल शिक्षक संख्या है तीन। प्राइमरी शिक्षा के लिहाज से यह शिक्षक संख्या अपर्याप्त है। एक स्कूल में कक्षा 1-4 या 1-5तक की कक्षाएं लगती हैं तो औसतन एक शिक्षक एक साथ दो कक्षाएं पढ़ाता है। सन् 1997 में यह पाया गया कि आधे से ज्यादा स्कूलों में एक या दो शिक्षक हैं। इसका अर्थ है एक ही शिक्षक एकाधिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को पढ़ाता है और सामान्य भाषा में इसे कहते हैं स्कूली शिक्षा का सर्वनाश। इसके अलावा स्कूलों में बच्चों के टॉयलेट नहीं है.पीने के स्वच्छ पानी की व्यवस्था नहीं है। पढ़ाने के लिए स्कूल में ब्लैकबोर्ड तक नहीं है। गांवों में चलने वाले अधिकांश स्कूलों में बिजली नहीं है। प्राकृतिक रोशनी में ये स्कूल चलते हैं। स्कूलों में घटिया किस्म का फर्नीचर है जिस पर बैठकर बच्चे पढ़ते हैं। स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से पेशाबघर तक नहीं हैं। स्कूलों की दशा के कुछ आंकड़े देखें तो शायद यथार्थ समझ में आ जाए। मसलन 1986 में 4.6 प्रतिशत कमरेरहित स्कूल थे। इनकी संख्या 1993 में बढ़कर 5.0 प्रतिशत और 1997 में बढ़कर 18.0 प्रतिशत हो गयी। सन् 1986 में एक कमरे में चलने वाले स्कूलों की संख्या 26.9 प्रतिशत थी,जो 1993 में घटकर 23.5 और 1997 में 23.1 प्रतिशत दर्ज की गयी। दो कमरे वाले स्कूलों की संख्या 1986 में 23.0 प्रतिशत, 1993 में32.4 प्रतिशत और 1997 में 23.1 प्रतिशत दर्ज की गई है। तीन या उससे ज्यादा कमरे वाले स्कूल सन् 1986 में 45.2 प्रतिशत, 1993 में 39.1 प्रतिशत और 1997 में 40.9 प्रतिशत थी। राज्य स्कूलों में पढ़ाने वाले 45 प्रतिशत से ज्यादा शिक्षक अप्रशिक्षित हैं।
   राज्य  सरकार के द्वारा प्राइमरी शिक्षा पर किए जा रहे खर्चे के आंकड़े बताते हैं कि राज्य सरकार का 90 प्रतिशत पैसा शिक्षकों-कर्मचारियों की पगार में चला जाता है। जबकि पाठ्यपुस्तक प्रकाशन ,स्कूल मरम्मत और निर्माण आदि पर 2.1 प्रतिशत खर्चा होता है, बच्चों के दोपहर के खाने पर 1.5 प्रतिशत,शिक्षक प्रशिक्षण पर 0.4 प्रतिशत और स्कूल मुआयने पर 1.6 प्रतिशत का खर्चा किया जाता है। यानी स्कूलों के विकास पर खर्च करने के लिए वाम सरकार द्वारा बहुत कम पैसा खर्च किया जाता है।

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