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शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

वृन्दावन की विधवाएं और नया बंगाली समाज

           वृन्दावन में विधवाओं की दीन दशा पर आज 'एबीपी न्यूज' टीवी चैनल पर मथुरा से भाजपा सांसद हेमामालिनी का साक्षात्कार सुनने को मिला। हेमामालिनी ने एक दर्शक के नजरिए से वृन्दावन की विधवाओं को देखा है,उन्होंने भाजपा के स्थानीय नेताओं की फीडबैक पर भरोसा किया है। वे इस समस्या की जड़ों में जाना नहीं चाहतीं,लेकिन उनकी एक बात से मैं सहमत हूँ कि विधवाओं को सम्मानजनक ढ़ंग से रहना चाहिए, सम्मानजनक ढ़ंग से वे रहें इसकी व्यवस्था करनी चाहिए। वे भीख न माँगे हमें यह भी देखना चाहिए। असल में औरतों के प्रति हेमामालिनी का 'चाहिएवादी' नजरिया समस्यामूलक है।यह दर्शकीय भाव से पैदा हुआ है और इसका समस्या की सतह से संबंध है।

वृन्दावन में विधवाएं क्यों आती हैं या भेज दी जाती हैं,इसके कारणों की ओर गंभीरता से ध्यान देने की जरुरत है। इस प्रसंग में बंगाली समाज में विगत 100साल में जो आंतरिक परिवर्तन हुए हैं उनको ध्यान में रखें। बंगाली समाज में सबसे पहला परिवर्तन तो यह हुआ है कि परिवार की संरचना बदली है, परिवार में नए आधुनिक जीवन संबंधों का उदय हुआ है। इसने एक खास किस्म की स्थिति बूढ़ों और औरतों के प्रति पैदा की है। दूसरा परिवर्तन यह हुआ है कि उनमें नकली आधुनिकचेतना का विकास हुआ है। नकली आधुनिकता में डूबे रहने के कारण बंगालियों का एक अंश अपने अंदर पुराने मूल्यों और मान्यताओं को छिपाकर जीता रहा है। इसके कारण एक खास किस्म के मिश्रित व्यक्तित्व का निर्माण हुआ है ।

यह नया आधुनिक बंगाली उस बंगाली से भिन्न है जिसको रैनेसां ने रचा था। नया बंगाली उस परंपरा से अपने को जोड़ता है जो रैनेसांविरोधी है। नए बंगाली के पास मुखौटा रैनेसां का है लेकिन अधिकांश जीवनमूल्य और आदतें रैनेसां विरोधी हैं। मसलन् रैनेसां में सामाजिक और निजी संवेदनशीलता थी ,जबकि नए बंगाली में निजी संवेदनशीलता का अभाव है। रैनेसां और रैनेसांविरोधी बंगाली परंपरा में संवेदनशीलता में जो अंतर है उसने औरतों के प्रति मुखौटासंस्कृति पैदा की और इसी संस्कृति के गर्भ से निजी परिजनों के प्रति संवेदनहीनता हमें बार बार देखने को मिलती है। यह संवेदनहीनता उन लोगों में ज्यादा है जो मध्यवर्ग और उच्च-मध्यवर्ग से आते हैं । यही वह वर्ग है जिसमें से सामयिक राजनीतिक नेतृत्व भी पैदा हुआ है। कम्युनिस्टों से लेकर ममतापंथियों तक इस संवेदनहीनता को प्रत्यक्ष रुप में देखा जा सकता है। यह संवेदनहीनता मध्ययुगीन भावबोध की देन है। हमें विचार करना चाहिए कि वे कौन से कारण हैं जिनके कारण मध्ययुगीन संवेदनहीनता या ग्राम्य बर्बरता फिर से बंगाल में इतनी ताकतवर हो गयी ? विधवाओं के वृन्दावन भेजे जाने का सम्बन्ध ग्राम्य बर्बरता से है। यह ग्राम्य बर्बरता नए रुपों में संगठित होकर काम कर रही है। इसका सबसे ज्यादा शिकार औरतें हो रही हैं।

नए बंगाली समाज की मानसिकता है 'अनुपयोगी को बाहर करो' , अनुपयोगी से दूर रहो, बात मत करो। परिवार में भी यही मानसिकता क्रमशःविस्तार पा रही है। परिवारीजनों में प्रयोजनमूलक संबंध बन रहे हैं। जिससे कोई प्रयोजन नहीं है उसको भूल जाओ, जीवन से निकाल दो। बूढे प्रयोजनहीन हैं उन्हें बाहर करो, घर से बाहर करो, प्रांत से बाहर करो,मन से बाहर करो। यह एक तरह का 'तिरस्कारवाद' है, जो पुराने 'अछूतभाव' का ही नया संस्करण है, जो दिनों दिन ताकतवर होकर उभरा है।

मध्ययुगीन भावबोध का शिकार होने के कारण नए बंगाली समाज में सामाजिक परिवर्तन और प्रतिवाद की मूलगामी आकांक्षा खत्म हो चुकी है और उसकी जगह राजनीतिक अवसरवाद ने ले ली है। इसे मध्ययुगीन वफादारी कहते हैं। इसके कारण समाज में अनालोचनात्मक नजरिए की बाढ़ आ गयी है। सभी किस्म के पुराने त्याज्य मूल्य और आदतें हठात प्रबल हो उठे हैं। फलतःचौतरफा औरतों पर हमले हो रहे हैं। बलात्कार,विधवा परित्याग,नियोजित वेश्यावृत्ति आदि में इजाफा हुआ है।

मध्ययुगीन भावबोध को कभी बंगाली जाति ने विगत पैंसठ सालों में कभी चुनौती नहीं दी। वे क्रांति करते रहे,वामएकता करते रहे ,लेकिन मध्ययुगीनता पर ध्यान नहीं दिया। मध्ययुगीन भावबोध वह वायरस है जो धीमी गति से समाज को खाता है और प्रत्येक विचारधारा के साथ सामंजस्य बिठा लेता है। बंगाली समाज की सबसे बड़ी बाधा यही मध्ययुगीनता है इससे चौतरफा संघर्ष करने की जरुरत है। बंगाली समाज से मध्ययुगीन भावबोध जाए इसके लिए जरुरी है कि सभी किस्म के त्याज्य मध्ययुगीन मूल्यों के खिलाफ सीधे संघर्ष किया जाय।

बंगाली बुद्धिजीवी नए सिरे से अपने समाज और परिवार के अंदर झाँकें और बार बार उन पहलुओं को रेखांकित करके बहस चलाएं जिनकी वजह है मध्ययुगीनता पुनर्ज्जीवित हो रही है। मध्ययुगीनता का सम्बन्ध भाजपा के उदय और विकास की प्रक्रियाओं के साथ भी है। अब मध्ययुगीन बर्बरता ने सामाजिक कैंसर का रुप ले लिया है और इससे तकरीबन प्रत्येक परिवार किसी न किसी रुप में प्रभावित है। मध्ययुगीनता के असर के कारण समाज में बुद्धिजीवीवर्ग ने बंगाली समाज की आंतरिक समस्याओं पर सार्वजनिक रुप में लिखना बंद कर दिया है। मैं नहीं जानता कि नामी बंगाली बुद्धिजीवियों ने अपने समाज के आंतरिक तंत्र की कमजोरियों को सार्वजनिक तौर पर कभी उजागर किया हो।जबकि रैनेसां के लोग यह काम बार बार करते थे।

मध्ययुगीन बर्बरता में इजाफे के कारण सबसे ज्यादा औरतें प्रभावित होती हैं,विधवाएं उनमें से एक हैं। विधवाओं की समस्या का एक पहलू है उनके पुनर्वास का,दूसरा पहलू है उनके प्रति सामाजिक नजरिया बदलने का,तीसरा पहलू है विधवाओं के पलायन को रोकने का। इन सभी पहलुओं पर तब बातें होंगी जब बंगाली बुद्धिजीवी इस मसले पर कोई सामूहिक पहल करें।

रविवार, 14 अप्रैल 2013

पश्चिम बंगाल के माफियातंत्र के सामने बौने लग रहे हैं भद्रलोकनेता

विगत शुक्रवार को प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय में चांसलर और राज्य के राज्यपाल एम.के नारायणन ने छात्रों से कैम्पस में हुई तोड़फोड़ और हिंसा से छात्रों की रक्षा न कर पाने के लिए माफी मांगी। चांसलर का स्वर पीड़ा से भरा था लेकिन वे भरोसा पैदा नहीं कर पा रहे थे।कायदे से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को माफी मांगनी चाहिए लेकिन यह काम राज्यपाल से कराया गया।


प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय में टीएमसी के कार्यकर्त्ताओं ने बुधवार को प्रतिवाद करते हुए हिंसा का ताण्डव किया ,कैम्पस में गेट का ताला तोड़कर प्रवेश किया,छात्र-छात्राओं पर हमले किए, ऐतिहासिक बेकर लैव में जाकर तोड़फोड़ की। उपकुलपति मालविका सरकार ने इस हिंसक ताण्डव को अपनी आंखों से देखा, रजिस्ट्रार ने पुलिस से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया लेकिन पुलिस मूकदर्शक बनी रही।


उल्लेखनीय है 9 अप्रैल को दिल्ली में योजना आयोग भवन के अहाते में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके साहयोगी मंत्रियों के खिलाफ एसएफआई ने प्रदर्शन किया था वे मांग कर रहे थे सुदीप्त गुप्ता की पुलिस कस्टैडी में हुई मौत की न्यायिक जांच करायी जाय, उस समय किन्हीं कारणों से एसएफआई कार्यकर्त्ता उत्तेजित हो गए और उन्होंने ममता बनर्जी और उनके सहयोगी मंत्रियों के साथ धींगामुश्ती की,हमला किया,जिसमें राज्य के वित्तमंत्री के कपड़े फट गए और उनको सिर में चोट भी आई। यह निंदनीय घटना थी और लोकतांत्रिक प्रतिवाद की सभी घोषित प्रतिज्ञाओं का खुला उल्लंघन भी। इस घटना के समय मौके पर आंदोलनकारियों में माकपा का दिल्ली नेतृत्व मौजूद था। स्वयं माकपा के राज्यसचिव और एसएफआई के महासचिव जुलूस में मौजूद थे,इसके बाबजूद इस तरह की अशोभनीय घटना घटी। इस घटना के तत्काल बाद समूचे पश्चिम बंगाल में टीएमसी के कार्यकर्त्ताओं ने माकपा के दफ्तरों पर हमले किए,तोड़फोड़ की,आग लगायी।


यहां पर यह उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल में 34 साल के वामशासन में कभी भी मुख्यमंत्री के ऊपर शारीरिक हमला नहीं किया गया,यहां तक कि दिल्ली में भी कभी ज्योति बसु या बुद्धदेव भट्टाचार्य के खिलाफ हिंसक प्रतिवाद उनके विरोधियों ने नहीं किया। जबकि वामशासन में विपक्ष के हजारों कार्यकर्ताओं की माकपा के लोगों के हाथों मौत हुई है। एसएफआई का दिल्ली में हिंसक प्रतिवाद निंदनीय है । इस प्रतिवाद से पता चलता है कि माकपा के अंदर असहिष्णुता और हिंसा की दीमक लग चुकी है। माकपा ने जल्द ही इसका समाधान नहीं खोजा तो जिस तरह हिन्दीभाषी राज्यों में माकपा अस्तित्वहीन हो गयी है कालान्तर में पश्चिम बंगाल में भी उसके अस्तित्वहीन हो जाने का खतरा है। आज स्थिति यह है कि ममता के कुशासन के बाबजूद माकपा पर जनता विश्वास नहीं करती।


9अप्रैल के दिल्लीकांड ने एक अन्य संदेश दिया है कि पश्चिम बंगाल इनदिनों अपने विलोम में जी रहा है। एक जमाना था जब बंगाली समाज शांतिप्रिय, विद्वत्तापसंद, राजनीतिक सचेतन और लोकतंत्र पसंद था। यही चेतना यहां के राजनेताओं में थी। लेकिन इनदिनों यह राज्य एकदम विलोम अवस्था में जी रहा है।


इनदिनों बंगाल का अर्थ है अशांत और असामान्य राज्य। यहां लंपट कल्चर ने सभ्य -लोकतांत्रिक संस्कृति को पदस्थ कर दिया है। नियमहीनता इस राज्य का प्रधान मूल्य है। राजनीति से लेकर प्रशासन के विभिन्न स्तरों और विभागों तक, शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य-उद्योग और जनसेवा के क्षेत्रों तक नियमहीनता और धन वसूली ने अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है।


वामशासन में पार्टी के आदेश पर काम होता था इनदिनों घूस के आदेश पर काम होता है। वामशासन में हिंसा थी इनदिनों अराजकता है। वामशासन में सत्ता पक्ष और विपक्ष में संवादहीनता और निजी हिंसा थी इनदिनों संवादहीनता और सामाजिक हिंसा है। पश्चिम बंगाल में जिस तरह के हालात बन गए हैं उसमें शांति या सामान्य स्थिति की निकट भविष्य में संभावनाएं नजर नहीं आतीं।


चौंतीस साल के वामशासन के अवसान के बाद यह माना जा रहा था कि राज्य में हिंसा ,बमबाजी, तोड़फोड़, धमकी देना,धन वसूलना आदि बंद होगा लेकिन अब यह सब स्वप्न लगता है। समूची राजनीति को उत्पाती मानसिकता ने घेर लिया है।


पश्चिम बंगाल का सामान्य फिनोमिना है उलटा चलो। उलटा चलो या उलटा करो की संस्कृति तब पैदा होती है जब कान बंद हो जाएं,आंखों से दिखाई न दे और बुद्धि का आंख-कान में संबंध खत्म हो जाय। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर विमान बसु तक सभी में उलटा चलो की संस्कृति को सहज ही देखा जा सकता है।


उल्लेखनीय है पश्चिम बंगाल में हिंसा की संस्कृति को कांग्रेस ने रोपा,नक्सलियों ने सींचा,माकपा ने हिंसा के खेतों की रखवाली की और इसकी कई फसलें उठायीं और इनदिनों ममता सरकार उसी हिंसा की फसल के आधार पर अपने राजनीतिक कद का विस्तार करना चाहती हैं।


हिंसा के आधार पर राजनीति कद का विस्तार करने की कला का बीजवपन कांग्रेस ने 1971-72 में किया था,कालान्तर में इस फसल से राजनीतिक लाभ लेने की सभीदलों ने कोशिश की। हिंसा के आधार पर राजनीतिक लाभ लेने के चक्कर में कांग्रेस का यहां अस्तित्व समाप्त हो गया और अब वामदलों का जनाधार तेजी से सिकुड़ रहा है,कालान्तर में ममता और उनके दल को भी अप्रासंगिक होना पड़ेगा। ऐसी अवस्था में राज्य में अपराधी गिरोहों की गुटबाजी में राज्य की राजनीति में फंसकर रह जाएगी।


राजनीतिक दलों के हिंसक होने का अर्थ है माफियातंत्र की प्रतिष्ठा। लोकतंत्र में हिंसा तात्कालिक बढ़त देती है लेकिन दीर्घकालिक तौर पर अप्रासंगिक बना देती है। दुर्भाग्य से पश्चिम बंगाल इन दिनों भद्रलोक से निकलकर माफियालोक की ओर जा रहा है। माफिया गिरोहों के सामने माकपा से लेकर टीएमसी तक सभी बौने नजर आ रहे हैं। माफिया गिरोह जिस तरफ इच्छा होती है उधर चीजों को मोड़ रहे हैं। माफिया मानसिकता ने विगत दो दशक पहले माकपा के पार्टीतंत्र में प्रवेश किया था और आज वह पूरे समाज में छायी हुई है।आज सभी दल इसके सामने नतमस्तक हैं।

रविवार, 9 दिसंबर 2012

ज्ञानक्रांति का फैसला कब लेंगी ममता


सपने देखना अच्छी बात है। सपनों में आनंद लेना भी अच्छी बात है लेकिन सपनों को साकार करना उससे भी अच्छी बात है। जो राजनेता सपने देखता है और सपने साकार करता है वह विज़नरी कहलाता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यदि पश्चिम बंगाल का सही अर्थ में आइकॉन बनना है तो राजनेता की बजाय विज़नरी बनना होगा। कथनी और करनी के भेद को खत्म करना होगा। भाषण कम और काम ज्यादा। जलसे कम और एक्शन ज्यादा की कर्मसंस्कृति पैदा करनी होगी। राज्य में पूंजीनिवेश भाषणों से नहीं होता। कोई भी उद्योगपति भाषणों से प्रभावित होकर राज्य में पूंजी निवेश नहीं करता। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उनके हाथ से राज्य का यथार्थ खिसकता चला जा रहा है। वे जब से मुख्यमंत्री बनी हैं उनकी आमलोगों से दूरी बढ़ी है ,राज्य की समस्याओं से भी अलगाव बढ़ा है। वे अपने दल के कॉकस और नौकरशाही के घेरे में कैद हैं। कॉकस और नौकरशाही उनको खुलेमन से न तो सोचने देती है और नहीं अपने ही लोगों पर विश्वास करने देती है। जनता और यथार्थ से अलगाव के कारण व्यापक पैमाने पर मुख्यमंत्री के मन में संदेह और अविश्वास बढ़ा है। संदेह और अविश्वास के कारण इनदिनों वे जो भी बोल रही हैं उसमें साफतौर पर फांक नजर आती है। इस फांक के दर्शन इसबार आईआईटी2012 के ग्लोबल सम्मेलन में उनके द्वारा दिए गए भाषण में भी साफ नजर आई। 

एकजमाना था ममता सबको अपील करती थी, लेकिन विगत शुक्रवार को वे जब साइंस सिटी में बोल रही थीं तो वे किसी को प्रभावित नहीं कर पा रही थीं। जानकारों की राय में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भाषण किसी भी दृष्टि से अपील नहीं कर पा रहा था। मुख्यमंत्री के राजनीतिक स्वप्न और आईआईटी के युवाओं के सपनों में कोई मेल नहीं दिख रहा था। इस मौके पर एक आईआईटी स्नातक ने कहा कि ममताजी के शासन में आने के बाद हमें इस राज्य में आईटी का कोई भविष्य ही नजर नहीं आ रहा। मैंने ऐसे ही पूछा कि उन्हें मुख्यमंत्री की अपील पर भरोसा क्यों नहीं है ? उसने कहा कि आईटी क्षेत्र कोई कुटीर उद्योग नहीं है कि कम पूंजी से आरंभ किया जाय। राज्य सरकार के पास कोई विज़न नहीं है।ममता नहीं जानती कि राज्य में सूचना प्रौद्योगिकी किस तरह आए और किस तरह युवाओं को रोजगार मिले। इस युवा आईआईटी स्नातक ने कहा कि अनेक आईटी कंपनियां अपना कारोबार फिलहाल पश्चिम बंगाल में न करने का फैसला ले चुकी हैं और कई कंपनियों ने अपने कारोबार को धीरे धीरे हैदराबाद एवं बंगलौर के केन्द्रों में शिफ्ट कर दिया है। सेक्टर पांच में इन दिनों कोई नई कंपनी आने को तैयार नहीं है। विगत डेढ़ साल में एक भी नई आईटी कंपनी ने अपना काम कोलकाता में आरंभ नहीं किया है।

एक अन्य स्नातक ने गुस्से में कहा कि मुख्यमंत्री को आईटी क्षेत्र को इस राज्य में लाना है तो पहले माफिया और फिरौतीबाजों को नियंत्रित करना होगा। सॉल्टलेक के सेक्टर पांच में भाड़े की दर में आई जबर्दस्त गिरावट बताती है कि राज्य की अर्थव्यवस्था एकदम चरमरा गयी है।

ममता सरकार के आने के पहले सेक्टर पांच में 65-80 रूपये प्रति वर्गफुट भाड़ा था आज यह भाड़ा गिरकर 25-30 रूपये प्रति वर्गफुट हो गया है। बड़ी बड़ी बिल्डिगें खाली पड़ी हैं उनमें कोई भी व्यक्ति नजर नहीं आता। भारत के महानगरों में इस तरह का सुनसान माहौल कहीं पर भी नजर नहीं आएगा जैसा सेक्टर पांच में बन रहा है। नई कंपनियों का न आना और पुरानी कंपनियों का अपने कारोबार का विस्तार न करना,इस बात का संदेश है कि कहीं न कहीं मंदी और राज्य प्रशासन की नौकरशाही के कारण आईटी क्षेत्र के उद्यमी हतोत्साहित हुए हैं।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब आईआईटी ग्लोबल सम्मेलन 2012 को सम्बोधित कर रही थीं तो युवा उद्यमी राज्य सरकार की ओर से किसी नई सुविधाओं की घोषणाओं की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन इसबार मुख्यमंत्री ने नए उद्यमियों को आकर्षित करने के लिए कोई नया पैकेज घोषित नहीं किया। इस सम्मेलन में 600 आईआईटी स्नातक भाग ले रहे हैं। सम्मेलन में भाग ले रहे दिल्ली से आए यशवंत सिंहा ने कहा कि ममताजी को यदि राज्य में सूचना तकनीक को जनप्रिय बनाना है तो उनको सीधे स्कूल,कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कम्प्यूटर के प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए। विश्वविद्यालय शिक्षा का आधुनिकीकरण करना चाहिए,शिक्षकों और छात्रों को लैपटॉप-आईपैड आदि मुहैय्या कराने चाहिए। सूचना तकनीक के प्रति अपील पैदा करने लिए उसे दैनंदिन अकादमिक कामकाज और कम्युनिकेशन का हिस्सा बनाना बेहद जरूरी है और यह भी जरूरी है कि उच्चशिक्षा को परंपरागत शिक्षण-प्रशिक्षण की पद्धति के बाहर लाया जाय। इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाय और शिक्षा के आधुनिकीकरण को प्रमुख एजेण्डा बनाया जाय। मुख्यमंत्री यदि चाहती हैं कि पश्चिम बंगाल फिर से भारत के मानचित्र पर उभर कर सबसे ऊपर आए इसके लिए पहली जरूरत है राज्य की समूची शिक्षा व्यवस्था का उच्च कम्युनिकेशन तकनीक के साथ एकीकृत करके आधुनिकीकरण किया जाय। उच्चमाध्यमिक से लेकर एमए-पीएचडी करने वालों तक राज्य सरकार मुफ्त लैपटॉप बांटे और शिक्षकों को मुफ्त इंटरनेट कनेक्शन दिए जाएं। एक अन्य आईआईटी स्नातक ने कहा कि पश्चिम बंगाल में यदि बिजली की सप्लाई सही है और बिजली कभी नहीं जाती है तो परंपरागत विश्वविद्यालयों को सूचना तकनीक के उपयोग बड़ा क्षेत्र बना देना चाहिए। अकादमिक जगत में आधुनिकशिक्षा को लाने में 19वीं सदी में बंगाल अग्रणी था ,लेकिन नए आधुनिक माहौल में पश्चिम बंगाल की समूची शिक्षा व्यवस्था को समुन्नत संचार तकनीक से जोड़कर ज्ञानक्रांति के क्षेत्र में अग्रणी बनाया जाना चाहिए। हैदराबाद से आए पी.राजू का कहना था कि इंटरनेट कनेक्शन को केन्द्र सरकार को नाममात्र के शुल्क के आधार पर मुहैय्या कराना चाहिए। इससे इंटरनेट-कम्प्यूटर आदि के उपयोग में तेजी से इजाफा होगा।

सोमवार, 26 नवंबर 2012

ममता के हस्तक्षेप के इंतजार में 35 बंगाली मजदूर

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कल तक उनको किसी भी बंगाली पर हमला होने,उसकी अवैध गिरफ्तारी पर गुस्सा आता था लेकिन इनदिनों वे बदली हुई सी लग रही हैं। ममता का बंगाली जाति के प्रति प्रेम निर्विवाद है। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी बंगाली जाति के प्रति बेरुखी बढ़ी है। उनकी बेरुखी की जड़ें हमारी राजनीतिक संस्कृति में हैं। भारत में इनदिनों जिस तरह की वोटबैंक संस्कृति पैदा हुई है उसमें आम जनता के प्रति बेगानापन और जातीय घृणा का बढ़ना स्वाभाविक बात है। 

वोटबैंक संस्कृति दलीय मोह पैदा करती है।भाषायी,धार्मिक और जातिवादी घृणा के जरिए अपना विस्तार करती है। यह राजनीति में नकारात्मक फिनोमिना है। इसके कारण सामाजिक विभाजन तेज होता है। मन में दरारें पैदा होती हैं। प्रशासनिक संरचनाएं इसकी गिरफ्त में जल्दी आती हैं। साथ ही वंचितों और हाशिए के लोगों से प्रशासन की दूरी बढ़ती है। अनुयायियों के प्रति प्रेम में इजाफा होता है। इसके अलावा अविश्वास और संशय में तेजी से वृद्धि होती है। उत्तर- पूर्व के राज्यों में यह बीमारी पहले आई बाद में इसने अन्य राज्यों में पैर पसारने आरंभ कर दिए । हाल ही में महाराष्ट्र में यह फिनोमिना जोरों पर है। वहां पर गैर-मराठियों के प्रति विद्वेष की राजनीति को जिस तरह स्थानीय दलों ने हवा दी है उससे महाराष्ट्र का पुलिस प्रशासन पूरी तरह प्रभावित है । भारत में बोले जानेवाली भाषाओं और बोलियों के बाशिंदों के प्रति संदेह और घृणा का भाव अंततः भारत की एकता और अखण्डता को नष्ट करता है साथ ही इससे भारत के संविधान का अपमान होता है।

भारत का संविधान सभी भारतवासियों को चाहे वे कोई भी भाषा बोलते हों,देश में कहीं पर भी आने-जाने, व्यवसाय करने और काम करने की आजादी देता है। हमारे संविधान में भाषा,धर्म और जाति के आधार पर किए गए भेदभाव को दण्डनीय अपराध माना गया है। इसके बावजूद भारत में आए दिन भेदभाव और उत्पीड़न की खबरें आती रहती हैं। ये खबरें किसी भी देशभक्त को परेशान कर सकती हैं लेकिन पश्चिम बंगाल के मौजूदा शासकों को ये चीजें कम परेशान कर रही हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो ममता सरकार का बंगालियों के प्रति जो बेगानापन बढ़ रहा है वह समझ में आएगा। ममता सरकार का राज्य की आम जनता और उसकी समस्याओं के प्रति सजग भावबोध तेजी से क्षीण हुआ है। राज्य की आम जनता पर पुलिस के हमले बढ़े हैं,साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तेज हुआ है।

सत्तारूढ़ होने के पहले तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल और बंगाली जाति से जुड़े हर सवाल पर सक्रिय थीं लेकिन इन दिनों वे और उनके अनुयायी एकसिरे से बंगालियों पर बढ़ रहे हमलों पर चुप रहते हैं।

हाल ही में माकपा सांसद वासुदेव आचार्य ने एक महत्वपूर्ण मसले की ओर ध्यान खींचा है। महाराष्ट्र में 35बंगालियों को बंगला बोलने के कारण पुलिस ने बंगलादेशी का आरोप लगाकर गिरफ्तार करके कैद किया हुआ है। जबकि ये सभी मजदूर हैं और पुरूलिया के रहने वाले हैं। आश्चर्य की बात है कि माकपा सांसद के द्वारा इन बंगालियों की अवैध गिरफ्तारी का सवाल पहले उठाया गया और राज्य सरकार ने अभी तक इस मसले पर एक शब्द तक नहीं कहा। ये लोग दो महिने से जेल में बंद हैं। ये सभी पुरूलिया जिले के बाशिंदे हैं। ये लोग काम की तलाश में महाराष्ट्र आए थे । 22 सितम्बर को इन सभी को मुंबई पुलिस के बांकुला थाना इलाके में बंगलादेशी कहकर गिरफ्तार कर लिया और तब से ये सभी जेलों में बंद हैं। माकपा सांसद वासुदेव आचार्य ने इस मसले पर 9 अक्टूबर को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान को पत्र लिखकर जानकारी दी और उनसे फोन पर विस्तार से बातें करके हस्तक्षेप करने की अपील की । माकपा सांसद ने इस बीच महाराष्ट्र के गृहमंत्री से भी बात की है और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से हस्तक्षेप की अपील करते हुए उनको 31 अक्टूबर को एक पत्र लिखा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हस्तक्षेप का आश्वासन देते हुए वासुदेव आचार्य को 6 नवम्बर को पत्र लिखा है। लेकिन प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप का कोई अभीप्सित परिणाम नहीं निकला है।

सवाल उठता है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मसले में दिलचस्पी क्यों नहीं ली ? असल में ममता की विचारधारात्मक संरचना में पापुलिज्म पहले आता है। इस पापुलिज्म का दलतंत्र की मनोदशा से गहरा संबंध है। इसके अलावा ममता उनसभी विषयों को संदेह की नजर से देखती हैं जो समाधान की मांग करते हैं। ममता की दिलचस्पी उन विषयों में होती है जो समाधान की मांग नहीं करते। मुंबई पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए 35 बंगाली मजदूर अपनी रिहाई की मांग कर रहे हैं और उनकी रिहाई को दलीय स्वार्थ त्यागकर सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

माकपा सांसद वासुदेव आचार्य ने संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में बंगाली मजदूरों की अवैध गिरफ्तारी के मसले को उठाने का फैसला किया है और हम उम्मीद करते हैं कि उनके प्रयासों से ये मजदूर तत्काल रिहा होंगे।

शनिवार, 7 मई 2011

पश्चिमबंगाल में 'स्वशासन' बनाम 'सुशासन' की जंग

पश्चिम बंगाल में इसबार का विधानसभा चुनाव 'स्वशासन' ( पार्टी शासन) बनाम 'सुशासन' के नारे के तहत लड़ा जा रहा है। 'सुशासन' की धुरी है जनता और कानून का शासन। 'स्वशासन' की धुरी है पार्टीतंत्र की मनमानी और सामाजिक नियंत्रण। इसके आधार पर वोट पड़ने जा रहे हैं। इसबार का चुनाव नव्य आर्थिक उदारीकरण के सवालों पर नहीं हो रहा। यह चुनाव माओवादी हिसा के सवाल पर भी नहीं लड़ा जा रहा। इस चुनाव में ममताबनर्जी की इमेज और वर्गीय चरित्र को लेकर पर भी बहस नहीं हो रही। इस चुनाव का प्रधान मुद्दा 'स्वशासन' बनाम 'सुशासन' है। मुख्य सवाल है राज्य में पार्टीतंत्र का शासन चलेगा या भारतीय कानून का शासन चलेगा। ममता ने सुशासन के सवालों को प्रधान मुद्दा बनाया है और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। 

इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पश्चिम बंगाल विधानसभा के आगामी चुनाव असाधारण होंगे। 35 सालों में वाम मोर्चे ने सातबार आराम से चुनाव जीता है लेकिन इसबार ऐसा लग रहा है कि वाम मोर्चा कठिन चुनौती का सामना कर रहा है। वाम मोर्चा और खासकर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी) या माकपा और ममता बनर्जी दोनों के लिए यह चुनाव आर-पार की लड़ाई है। इस चुनाव में कई बुनियादी सवाल उठे हैं जिनसे वाम मोर्चा और राज्य की राजनीति पहलीबार मुखातिब है। विलक्षण आयरनी है वाम मोर्चे का एक तबका यह चाहता है कि इसबार वाम मोर्चा चुनाव हारे। इससे वाम के अंदर जो सामाजिक गंदगी है वो साफ होगी। सामाजिक नियंत्रण टूटेगा। इसबार का बुनियादी मुद्दा है माकपा के सामाजिक नियंत्रण तंत्र को ध्वस्त करो।

उल्लेखनीय है माकपा ने 2009 में लोकसभा चुनाव के पहले एक शुद्धीकरण अभियान चलाया था । कई हजार दोषी पार्टी सदस्यों को अपने दल से निकाला था ये हजारों लोग बाद में ममता की राजनीतिक पार्टी में चले गए । उसकी राजनीतिक ताकत बन गए। फलतःसन् 2009 के लोकसभा चुनाव में वाम मोर्चे को अभूतपूर्व पराजय का सामना करना पड़ा। सन् 2009 की पराजय के बाद वाम मोर्चे को छोड़ने वालों का सिलसिला थमा नहीं है। ऐसी अवस्था में वाम की पहली बड़ी चुनौती है अपने संगठन और सांगठनिक जनाधार को बचाने की ।दूसरी चुनौती है विधानसभा चुनाव जीतने की।

वाम और खासकर माकपा की कुछ बुनियादी भूलें रही हैं जिनके कारण बड़े पैमाने पर जनता नाराज है और चाहती है ममता बनर्जी को कम से कम एकबार मौका दे दिया जाए। इसके कारण पहलीबार वाम मोर्चा प्रत्याशी क्षमाप्रार्थी हैं। 23 मार्च को राज्य के मुख्यमंत्री और माकपा के पोलिट ब्यूरो सदस्य बुद्धदेव भट्टाचार्य ने प्रेस कॉफ्रेस में पार्टी सदस्यों की नागरिक जीवन में हस्तक्षेप करने वाली हरकतों की पहलीबार तीखी आलोचना की है। उन पहलुओं पर पहलीबार खुलकर बोला है जिन पर वे अब तक पार्टी के अंदर बोलते रहे हैं। असल में गड़बड़ियां ज्यादा गहरी हैं। इन्हें संक्षेप में मार्क्सवाद की 5 भूलों के रूप में देख सकते हैं। पहली भूल , पार्टी और प्रशासन के बीच में भेद की समाप्ति। इसके तहत प्रशासन की गतिविधियों को ठप्प करके पार्टी आदेशों को प्रशासन के आदेश बना दिया गया । दूसरी भूल ,माकपा कार्यकर्ताओं ने आम जनता के दैनंन्दिन-पारिवारिक -सामाजिक जीवन में व्यापक स्तर पर हस्तक्षेप किया है,और स्थानीयस्तर पर विभिन्न संस्थाओं और क्लबों के जरिए सामाजिक नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की । तीसरी भूल , अनेक कमेटियों ने कामकाज के वैज्ञानिक तौर-तरीकों को तिलांजलि देकर तदर्थवाद अपना लिया । अवैध ढ़ंग से जनता से धन वसूली और अपराधी लोगों का लोकल तंत्र स्थापित किया । चौथी भूल ,बड़े पैमाने पर अयोग्य,अक्षम और कैरियरिस्ट किस्म के नेताओं के हाथों में विभिन्न स्तरों पर पार्टी का नेतृत्व आ गया है।

मसलन् जिन व्यक्तियों के पास भाषा की तमीज नहीं है,मार्क्सवाद का ज्ञान नहीं है,पेशेवर लेखन में शून्य हैं ,बौद्धिकों में साख नहीं है,ऐसे लोग पार्टी के अखबार,पत्रिकाएं और टीवी चैनल चला रहे हैं। वैचारिकगुरू बने हुए हैं। अलेखक-अबुद्धिजीवी किस्म के लोग बुद्धिजीवियों के संगठनों के नेता बने हुए हैं। जो व्यक्ति कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में सामान्य विचारधारात्मक ज्ञान नहीं रखता वह नेता है। जिस विधायक या सांसद की साख में बट्टा लगा है वह अपने पद पर बना हुआ है।

पांचवी भूल, राज्य प्रशासन का मानवाधिकारों की रक्षा के प्रति नकारात्मक रवैय्या रहा है। मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक सबके अंदर 'हम' और 'तुम' के आधार पर सोचने की प्रवृत्ति ने राज्य प्रशासन के प्रति सामान्य जनता की आस्थाएं घटा दी हैं। आम जनता के दैनन्दिन जीवन में प्रशासन सहयोगी की बजाय सबसे बड़ी बाधा बन गया है और निहित स्वार्थी लोगों ने राज्य प्रशासन को मानवाधिकारों के हनन का औजार बना दिया है।

विगत 35 सालों में विकेन्द्रीकरण के बाबजूद राज्य में प्रत्येक स्तर पर लोकतंत्र पंगु बना है। विकेन्द्रीकरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं के चुनाव प्रत्येक स्तर पर मखौल बनकर रह गए हैं। स्थिति की भयावहता को समझने के लिए एक-दो उदाहरण ही काफी हैं,मसलन राज्य में छात्रसंघों के नियमित चुनाव होते हैं लेकिन विपक्षी उम्मीदवारों को नामांकन पत्र तक दाखिल नहीं करने दिया जाता । मजेदार बात है ज्यादातर कॉलेज और विश्वविद्यालयों में वाम प्रत्याशी बगैर किसी प्रतिद्वंद्विता के जीत जाते हैं। जो छात्र वाम प्रत्याशियों खासकर एसएफआई के खिलाफ अपना नामांकन भरना चाहता है उसे तरह तरह से आतंकित किया जाता है,परेशान किया जाता है,यहां तक कि उसके परीक्षा के नम्बर कटवाने की धमकियां भी दी जाती हैं और साथ में रहने,मुँह बंद करके रहने के लिए परीक्षा में अच्छे नम्बर देने का आश्वासन दिया जाता है। इस काम में घृणिततम ढ़ंग से शिक्षकों का एक धड़ा उनकी मदद करता है और ये ही लोग शिक्षा में सामाजिक नियंत्रण का काम भी करते हैं। इसके बाबजूद भी यदि कोई छात्र चुनाव लड़ना ही चाहे तो बमबाजी का सामना करना होता,कॉलेज के रास्ते में कई दिनों तक अशांति बनी रहती है ,बमबाजी होती रहती है। इस पूरे काम में स्थानीय पुलिस घृणिततम ढ़ंग से उत्पातियों की मदद करती है।

कायदे से छात्रसंघ चुनावों में आम छात्रों की शिरकत बढ़नी चाहिए लेकिन व्यवहार में देखा गया है कि शिरकत घटी है,रस्मीतौर पर चुनाव होते हैं , इनकी वास्तविक प्रक्रिया अलोकतांत्रिक है। कागज पर लोकतांत्रिक नियम हैं लेकिन व्यवहार में विशुद्ध सामाजिक नियंत्रण के फार्मूले हैं जिनका छात्रनेता पालन करते हैं।यही दशा तकरीबन सभी स्तरों पर होने वाले चुनावों की है। 35 सालों में पहलीबार नंदीग्राम-सिंगूर की घटना के बाद माकपा के सामाजिक नियंत्रण के खिलाफ व्यापक विक्षोभ दिखाई दिया और वाम और खासकर माकपा के मजबूत किलों में भी जनता ने सामाजिक प्रतिवाद किया और ममता बनर्जी को जो राजनीत्क हाशिए पर थी हठात रातोंरात बड़ी राजनीतिक ताकत बना दिया।

आम लोगों में माकपा के सामाजिक नियंत्रण की नीति के खिलाफ व्यापक असंतोष है। मसलन आप कोई मकान खरीदना चाहते हैं तो स्थानीय माकपा पार्टी इकाई के सहयोग के बिना यह काम नहीं कर सकते। यदि आप अपना मकान बनाना चाहते हैं तो मिट्टी,सीमेंट,चूना,ईंट किससे लेंगे यह भी पार्टी ही तय करेगी,अन्य को वे सप्लाई नहीं करने देंगे। आपके साथ कोई आपराधिक कांड हो जाए और आप थाने में एफआईआर दर्ज कराने जाएं तो पुलिस शिकायत दर्ज नहीं करेगी जब तक आप किसी लोकल पार्टी ऑफिस से फोन नहीं करा देते। आम रिवाज रहा है कोई भी परेशानी है पहले पार्टी ऑफिस जाओ,वहां बैठे नेता को कहो ,वो फिर सोचेगा कि क्या किया जाए,यहां तक कि हत्या होने पर भी पुलिस एफआईआर नहीं लिखती।

यदि आप कॉलेज-विश्वविद्यालय शिक्षक हैं और आपका माकपा के साथ मतैक्य नहीं है तो तय मानिए आपको भेदभाव,उपेक्षा,बहिष्कार,अपमान आदि का सामना करना पड़ेगा। जीवन के प्रत्येक स्तर पर पार्टी वफादारी को बुनियादी पैमाना है और यह सारा खेल लोकतंत्र,मार्क्सवाद आदि की ओट में चलता रहा है। इसके कारण व्यापक सामाजिक असंतोष पैदा हुआ है। यह असंतोष शांत होगा इसमें संदेह है। इस असंतोष को ममता ने पापुलिज्म के जरिए अभिव्यक्ति दी है।

ममता के पापुलिज्म की सामाजिक धुरी है माकपा के सामाजिक नियंत्रण से सतायी जनता। इस क्रम में ममता बनर्जी के पापुलिस्ट राजनीतिक खेल ने पश्चिम बंगाल में अस्मिताओं को जगाया है। ममता बनर्जी की राजनीति के दो छोर हैं एक है अस्मिता की राजनीति और दूसरा है पापुलिज्म। इसके तहत ही उसने मुस्लिम धार्मिक अस्मिता को हवा दी है। विभिन्न जिलों में अस्मिता के मोर्चों के साथ गठबंधन किया है।

पश्चिम बंगाल में अस्मिता की राजनीति के उभार के दो बड़े कारण हैं। पहला , निरूद्योगीकरण और जंगी मजदूर आंदोलन का लोप। दूसरा ,विगत 10 सालों में राज्य सरकार ने किसानों की जमीन का बड़े पैमाने पर अंधाधुंध अनियोजित -लक्ष्यहीन ढ़ंग से अधिग्रहण किया है। यह जमीन बिना किसी योजना के किसानों से ले ली गयी और इससे बड़े पैमाने पर छोटी जोत के किसान प्रभावित हुए हैं। इनमें मुस्लिम किसानों की संख्या काफी है। इस मौके का लाभ उठाते हुए ममता ने अस्मिता और किसानों की जमीन रक्षा के सवाल को बड़ा मसला बना दिया है। ममता जानती है अस्मिता की राजनीति का मुस्लिम खेल खतरनाक साम्प्रदायिक खेल है। यह नियंत्रण के बाहर न चला जाए इसलिए वाम ने सरकारी नौकरियों में मुसलमानों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की है। लेकिन क्या इससे अस्मिताएं शांत होंगी ?

उल्लेखनीय है वाम मोर्चे ने बड़े ही कौशल के साथ बंगभाषायी श्रेष्ठत्व और वर्गीय राजनीति का मिश्रित रसायन तैयार किया था। इसमें अल्पसंख्यकों और उनकी भाषाओं को दोयमदर्जे के रूप में देखा गया। वाम ने अपनी भूलों से ममता बनर्जी को अस्मिता की राजनीति का कार्ड खेलने के लिए भौतिक परिवेश प्रदान किया और देखते ही देखते वह विभिन्न समूहों और समुदायों में जनप्रिय हो उठीं। माकपा विरोधी मुस्लिम असंतोष को उसने वोटबैंक में तब्दील किया। वाम के खिलाफ एकमुश्त वोट देने पर जोर दिया। वाम मोर्चे के 35 साल के शासन में मुसलमानों की उपेक्षा को बहाना बनाया ।

सच यह है सारे देश में मुसलमानों को दोयम दर्जे के नागरिक का जीवन जीना पड़ रहा है,इसकी तुलना में पश्चिम बंगाल में वाम ने मुसलमानों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान की। गांवों में भूमिसुधार कार्यक्रम के तहत हजारों मुसलमानों को जमीनों के पट्टे दिए । हाल ही में मुसलमानों के लिए सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण दिया। साम्प्रदायिक सदभाव का माहौल दिया। लेकिन यह सब किया सामाजिक नियंत्रण के दासरे और पार्टी वर्चस्व के तहत। सामाजिक वर्चस्व की निकृष्टतम परिणति है सरकारी नौकरियों में पार्टी मेम्बरों और हमदर्दों की भरती। इसके तहत पूरे राज्य में सरकारी विभागों में विगत 35 साल में माकपा और वाम के अलावा अन्य किसी दल के कार्यकर्ता की नौकरी नहीं लगी।

ममता बनर्जी की रणनीति है छोटे मसलों को बड़ा बनाना। स्थानीय मसलों को राष्ट्रीय और आर्थिक समस्याओं से ऊपर स्थान देना। वे राजनीतिक हथियार के तौर पर वाम के प्रति किसी एकल स्थानीय मसले को उठाती हैं । वह वाम की किसी एक गलती को पकडती है और फिर कारपोरेट मीडिया के जरिए 'माकपा शैतान' 'माकपा शैतान' का प्रचार आरंभ कर देती है। वे यथार्थ के अंश को समग्र राज्य का सच कहकर प्रचारित करती हैं। यह पद्धति उन्होंने लैटिन अमेरिका के कम्युनिस्ट विरोधियों के प्रौपेगैण्डा से सीखी है।

मसलन वाम शासन में नंदीग्राम में पुलिस गोलीबारी में किसानों के मारे जाने को उन्होंने इतना बड़ा घटनाक्रम बनाया कि देखने वाले को लगे कि देश में उससे ब़ड़ा जघन्य कांड और कहीं नहीं हुआ ! नंदीग्राम पर वे जितनी बेचैन रही हैं वैसी बेचैनी और आक्रोश उनमें गुजरात के दंगों को लेकर नहीं दिखाई दिया।

असल में अस्मिता की राजनीति का पाठ ममता बनर्जी ने नरेन्द्र मोदी से पढ़ा है। गुजरात में हिन्दू अस्मिता के खेल की सफलता ने उन्हें पश्चिम बंगाल में मुस्लिम अस्मिता का कार्ड चलाने की प्रेरणा दी है। अस्मिता की राजनीति मूलतः खोखली राजनीति है। यह सामाजिक विभाजन पैदा करती है। ममता बनर्जी जब भी कोई मसला उठाती हैं तो 'मैं सही' की राजनीति पर जोर देती हैं। प्रचार की यह कला उन्होंने संघ परिवार से सीखी है।

उल्लेखनीय है वामदलों का मुसलमानों में एक अंश पर प्रभाव रहा है। राज्य सारे मुसलमान कभी भी वामदलों को वोट नहीं देते थे। अधिकांश मुसलमान पहले कांग्रेस के साथ थे आज भी वे कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के साथ हैं। अंतर एक है कि मुसलमानों के सवालों को ममता ने सीधे सम्बोधित किया है। अस्मिता की राजनीति के फ्रेम में रखकर उठाया है। मुस्लिम प्रतीकात्मकता का जमकर दोहन किया है। इसके विपरीत वामदलों ने अस्मिता के रूप में मुसलमानों को कभी नहीं देखा। उन्होंने सामाजिक सम्मिश्रण बनाने के लिए हिन्दुओं-मुसलमानों के बीच सदभाव स्थापित करने की कोशिश। उनकी स्थानीय धार्मिक पहचान की बजाय बंगला जातीय पहचान पर जोर दिया। यह काम बड़े ही सचेत ढ़ंग से किया गया।

वाम आंदोलन का यह बड़ा योगदान है कि उसने मुसलमानों को धर्मनिरपेक्ष पहचान दी और धार्मिक पहचान से मुक्ति दिलायी। ममता बनर्जी ने नंदीग्राम आंदोलन के बहाने मुसलमानों की धार्मिक अस्मिता और उसकी रक्षा के सवालों को प्रमुख सवाल बना दिया है और मुसलमानों की संपत्ति और खेती की जमीन खतरे में है, मुसलमानों के लिए वाम मोर्चे ने कुछ नहीं किया आदि बातों को उठाते हुए विकास पर कम मुसलमान की अस्मिता के उभार और माकपा विरोध में मुस्लिम एकजुटता पर जोर दिया है। यह आश्वासन दिया है कि वे और उनका दल मुसलमानों का सबसे बड़ा हितैषी है। मुसलमानों का हितैषी होने का ममता बनर्जी का दावा एकसिरे से बुनियाद है। वे वाम मोर्चा विरोध के नाम पर मुसलमानों को प्रतिक्रियावादी और धार्मिक अस्मिता के आधार पर गोलबंद कर रही हैं । यह पुराना कांग्रेसी फार्मूला है कि मुसलमान को मुसलमान रहने दो।

वाम मोर्चे ने सचेत रूप से इस फार्मूले को धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक-सांस्कृतिक रसायन के जरिए तोड़ा था। मुसलमानों को धर्मनिरपेक्ष जातीय भाषायी पहचान के साथ एकीकृत किया है। यह मुसलमानों की जिंदगी में एक बड़ा मूलगामी कदम था लेकिन ममता बनर्जी महज वोटों की खातिर मुसलमानों को धर्मनिरपेक्ष जातीय भाषीय पहचान से वंचित करके उन्हें महज मुसलमान बनाने पर तुली हैं। ढ़ोंगी राजनेताओं की तरह विभिन्न मुस्लिम त्यौहारों पर मुस्लिम वेशभूषा पहनकर नाटक करती रहती हैं। इस संदर्भ में ही ममता बनर्जी का मुस्लिमों औरतों की तरह सिर ढकना और प्रार्थना करना आदि सहज ही देखा जा सकता है।

ममता बनर्जी जानती हैं वे मुसलमान नहीं हैं और वे मुस्लिम वेशभूषा और आचरण करके मुस्लिम समुदाय के सबसे प्रतिक्रियावादी तबकों को आकर्षित करके मुसलमान की धर्मनिरपेक्षता अस्मिता को अपदस्थ करके धार्मिक अस्मिता की स्थापना करना चाहती हैं और यह अस्मिता की राजनीति का खतरनाक खेल है। उल्लेखनीय है कम्युनिस्टों में शानदार मुस्लिमनेताओं की परंपरा रही है और वे कम्युनिस्ट पार्टी से लेकर राज्य प्रशासन के सर्वोच्च पदों पर आसीन रहे हैं ,कभी भी उनको सार्वजनिक मंचों पर तथाकथित मुस्लिम ड्रेसकोड में नाटक करते नहीं देखा गया। मसलन मुजफ्फर अहमद और विधानसभा स्पीकर हाशिम अब्दुल हलीम को कभी किसी ने सार्वजनिक राजनीतिक मंचों पर मुस्लिम अस्मिता के साथ जुड़ने के लिए मुस्लिम वेशभूषा बदलकर नाटक करते नहीं देखा। इन लोगों का एक भी फोटो नहीं मिलेगा कि ये अपने को धार्मिक पहचान के साथ जोड़ रहे हैं,जबकि ये पक्के धर्मनिरपेक्ष मुसलमान हैं और इस्लाम के भी बड़े सुंदर ज्ञाता रहे हैं,और वे मुसलमानों की धार्मिक अस्मिता की बजाय जातीय बंग भाषायी अस्मिता पर जोर देते रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे ने धार्मिक अस्मिता को गौण बनाया और बांग्ला जातीय गौरव पर जोर दिया है। सामाजिक नियंत्रण के फार्मूले को लागू करने के चक्कर में उसने कभी अस्मिता की राजनीति को पनपने नहीं दिया। अन्य के लिए राजनीतिक स्पेस नहीं दिया। लेकिन आज वाम की यह वैचारिक घेराबंदी टूट चुकी है। वाम ने जनता से लेकर बुद्धिजीवियों तक सबको पार्टी पक्षधरता और बंगला जातीय श्रेष्ठत्व के दायरे में कैद रखा। पार्टी और जातीय श्रेष्ठत्व की वैचारिक नाकेबंदी की संसार के अनेक साम्यवादी देशों में दुर्गति हुई है। पश्चिम बंगाल में यह काम वाम मोर्चा कैसे करता रहा है इसका एक ही उदाहरण देखें।यहां पर दुर्गापूजा पंडालों में लाउडस्पीकर खूब बजते हैं ,गाने भी बजते हैं,लेकिन पंडालों में हिन्दी गाने बजाने पर पाबंदी है। लेकिन विगत लोकसभा चुनाव में वाम की जबर्दस्त पराजय के बाद पहलीबार अधिकांश पूजा पंडालों में बंगला की बजाय हिन्दी फिल्मी गानों की गूंज रही। वाम दलों को ध्यान रखना होगा इंटरनेट के युग में सामाजिक नियंत्रण की रणनीति पिटेगी। वे इससे बाज आएं। यही स्थिति उन अधिकांश रिहाइशी कॉपरेटिव सोसायटियों की है जो बंगालियों ने बनाई हैं। इनमें अधिकांश में भेदभावपूर्ण नियम हैं,मसलन बंगाली ही मकान खरीदने या कॉपरेटिव सोसायटी का सदस्य होने का अधिकारी है।हिन्दी भाषी और मुसलमानों को यह हक प्राप्त नहीं है।

हाल ही में बंगला के नामी संस्कृतिकर्मियों ने बांग्ला में डबिंग किए गए महाभारत सीरियल के प्रसारण का विरोध किया और उसका प्रसारण बंद करा दिया। ये लोग पहले भी इस तरह के प्रसारण रूकवा चुके हैं। इनका मानना है डबिंग कार्यक्रमों से बांग्ला मर जाएगी। कलाकर भूखे मर जाएंगे। यह राज्य में वाम अंधलोकवाद की सबसे खराब मिसाल है। डबिंग और अनुवाद से कोई भाषा नहीं मरती। यदि ऐसा होता तो हिन्दी सिनेमा को तो तबाह हो जाना चाहिए था।

बंगाल के इस आख्यान का लक्ष्य यह तय करना नहीं है कि विधानसभा चुनाव कौन जीतेगा ? बल्कि यह बताना है कि पश्चिम बंगाल की जमीनी हकीकत के बारे में आम लोग बहुत कम जानते हैं। यहां तक कि राष्ट्रीय मीडिया भी सामाजिक नियंत्रण के सवाल पर चुप्पी लगाए है। विधानसभा चुनाव में वामदलों का सारा जोर इस बात पर है कि हमसे गलतियां हुई हैं हमें माफ कर दो, लेकिन वे यह नहीं कह रहे कि वे सामाजिक नियंत्रण नहीं करेंगे और जो लोग इसके लिए दोषी रहे हैं उनको वे दण्डित नहीं कर रहे। ऐसे में वाम के प्रति आम जनता का गुस्सा कम होगा ,इसमें संदेह है।

दूसरी ओर ममता बनर्जी की आक्रामक प्रचार शैली ने वाम को स्थानीयस्तर पर रक्षात्मक मुद्रा में पहुँचा दिया है। ममता बनर्जी इसबार कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही हैं। वे पहले भी मिलकर लड़ चुकी हैं लेकिन वे सफल नहीं हो पायीं।

ममता बनर्जी की मुश्किल यह है कि वे माकपा की कैडरवाहिनी से मुखातिब हैं और इसबार वे यदि सफल होती हैं तो यह निश्चित रूप से वाम के लिए गहरे सदमे से कम नहीं होगा। क्योंकि पश्चिम बंगाल में 35 सालों तक शासन करते करते वामदल यह भूल ही गए कि लोकतंत्र में पराजय भी होती है। लोकतंत्र में हार-जीत सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं है। वे निहितस्वार्थी और अपराधी गिरोह अब रातों-रात ममता के साथ आ खड़े हुए हैं जो कल तक माकपा के बैनरतले सामाजिक नियंत्रण और लूट कर रहे थे। ऐसी स्थिति में भविष्य में सामाजिक नियंत्रण का मसला खत्म हो जाएगा इसमें संदेह है। बल्कि संभावनाएं यही हैं कि खूंरेजी बढ़ेगी। पश्चिम बंगाल के चुनावों की घोषणा होने के बाद से गांवों में हिंसाचार अचानक थम गया है ,शहरों में हिसा नहीं हो रही है। यह अस्वाभाविक शांति है।











बुधवार, 8 दिसंबर 2010

वाम की जीत और प्राइमरी शिक्षा का सच


हाल ही में पश्चिम बंगाल प्राथमिक शिक्षा परिषद के चुनावों में वाममोर्चे को भारी जीत मिली है। यह जीत इस बात की सूचना है कि प्राथमिक शिक्षकों और कर्मचारियों में वाम मोर्चे का प्रभाव बरकरार है। किन्तु इस जीत का यह अर्थ नहीं है कि प्राइमरी शिक्षा में सब ठीक चल रहा है। वाम की जीत और प्राइमरी शिक्षा की बदहाल अवस्था के बीच कोई संबंध नहीं है। इन परिणामों ने ममता बनर्जी को संदेश दिया है अहर्निश हिंसा के माहौल में उनका दल चुनाव हार भी सकता है। दूसरी ओर वामनेता इस जीत में मग्न हैं और प्राइमरी शिक्षा को लेकर आत्मालोचना नहीं कर रहे हैं। वे प्राथमिक शिक्षा में मच रही तबाही को संगठनबल के आधार पर ढकना चाहते हैं। पिछले 35 सालों में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में वामदलों की असफलताओं के लिए कम से कम तृणमूल कांग्रेस को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
    नेशनल सेंपिल सर्वे के अनुसार राज्य में 1990-2000 के दौरान गांवों में रहनेवाले 27 प्रतिशत परिवारों और 12 प्रतिशत शहरी परिवारों में एक भी वयस्क (15 साल से ऊपर) व्यक्ति साक्षर नहीं है। जबकि एकदम निरक्षर परिवारों की संख्या तुलनात्मक तौर पर और भी ज्यादा दर्ज की गई है। यानी गांवों में 51 प्रतिशत और शहरों में 31 प्रतिशत परिवार हैं जो पूर्णतः निरक्षर हैं। अनुसूचित जाति ,जनजाति और अल्पसंख्यकों में तो स्थिति और भी बदतर है। खासकर ग्रामीण बंगाल में भयावह स्थिति है। नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे 2 के अनुसार साक्षरों के आंकड़े बताते हैं सन् 1998 -99 में मात्र 17 प्रतिशत लोग प्राइमरी से कम शिक्षा प्राप्त थे। सन् 1998-99 में मात्र गांवों में मात्र 48 प्रतिशत पुरूष 27 फीसदी ग्रामीण औरतें,जिनकी आयु 15 साल से ऊपर है,प्राइमरी शिक्षा प्राप्त थे। इनमें से मात्र एक-तिहाई लोग सैकेण्ड्री शिक्षा प्राप्त थे।
     आश्चर्य की बात है जिन वर्गों में वामदलों के जनसंगठन हैं उन वर्गों में शिक्षा का प्रसार कम हुआ है। मसलन खेतमजदूरों में शिक्षा अभी पहुँची ही नहीं है। जबकि इस वर्ग में माकपा का सबसे ताकतवर संगठन है। लेकिन कृषिक्षेत्र के आत्मनिर्भर समूहों में साक्षरता की दर बेहतर रही है। इसी तरह पुरूष और स्त्री के बीच में साक्षरता को लेकर व्यापक अंतर है। मजदूर औरतों में साक्षरता का प्रसार करने में वामपंथ पूरी तरह असफल रहा है। सन् 2001 की जनगणना के अनुसार आदिवासियों में मात्र 43.4 प्रतिशत जनसंख्या साक्षर है। जबकि राष्ट्रीय साक्षरता दर 47.1 प्रतिशत है। इनमें औरतों में मात्र 29.2 प्रतिशत और पुरूषों में मात्र 57.4 प्रतिशत साक्षरता दर्ज की गयी है। आदिवासियों में मात्र 8.4 प्रतिशत आबादी को माध्यमिक और उससे ऊपर की शिक्षा मिल पायी है। इसी तरह विभिन्न अनुसूचित जाति समूहों में भी साक्षरता की स्थिति खराब है। सुदूरवर्ती इलाकों में रहने वाले अनुसूचित जाति और जनजाति के समूहों में न्यूनतम लोगों तक ही शिक्षा पहुँच पायी है। मसलन कोलकाता में साक्षरता दर सबसे ज्यादा है और सुदूरवर्ती जिलों में साक्षरता दर बहुत नीचे है। यदि पश्चिम बंगाल के धार्मिक समूहों में साक्षरता के स्तर को देखें तो पाएंगे कि हिन्दुओं में 66 प्रतिशत, मुसलमानों में 32 प्रतिशत लोगों में साक्षरता है। 7 साल और उससे ऊपर की उम्र के मुसलमानों में 46 प्रतिशत परिवार साक्षर हैं जबकि हिन्दुओं में इससे भी कम यानी 35 प्रतिशत परिवार ही साक्षर हैं। इसी तरह अनुसूचित जाति,जनजाति की तुलना में मुसलमान शिक्षां में उतने वंचित नहीं हैं।
          प्राइमरी शिक्षा के राज्य सरकार के आंकड़ों में धांधलेबाजी चरम पर है।  स्कूलों के रजिस्टर के आधार पर दिए गए आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए हैं। यह बात प्रसिद्ध मार्क्सवादी अर्थशास्त्री जयति घोष ने मानव लिकास रिपोर्ट 2004 में रेखांकित की है। मार्क्सवादी प्रभात पटनायक और अभिजीत सेन की भी इस रिपोर्ट के साथ सहमति है। रिपोर्ट में कहा गया है गांवों में कक्षा 1 में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में 4-8 साल की आयु के बच्चे पढ़ते हैं,जबकि वे इस कक्षा में वास्तव में पढ़ते ही नहीं हैं। उनके नकली नाम रजिस्टर में दर्ज हैं। झूठी हाजिरी दर्ज है। मार्क्सवादी अर्थशास्त्रियों ने माना है पश्चिम बंगाल में प्राथमिक शिक्षा के बुनियादी ढ़ांचे का जबर्दस्त अभाव है। वाम सरकार अपने 35 साल के शासन में प्राइमरी शिक्षा के लिए पर्याप्त स्कूलों का निर्माण नहीं कर पायी है और न बुनियादी बिल्डिंग सुविधाओं को बना पायी है। राज्य में स्कूल हैं लेकिन पर्याप्त कमरे नहीं हैं। कमरेरहित स्कूलों की संख्या बहुत ज्यादा है। राज्य सरकार ने तेजी से स्कूल खोले हैं, स्कूल शिक्षकों की नियुक्तियां भी की हैं लेकिन कमरे नहीं बना पायी है। राज्य में जितने स्कूल हैं उनमें पांच में से एक स्कूल के पास बिल्डिंग नहीं है। यह आंकड़ा बेहद बड़ा है और इससे राज्य सरकार की अगंभीरता और गैर-जिम्मेदारी का भी पता चलता है। इससे यह भी पता चलता है कि बच्चों को बिल्डिंग के अभाव में कैसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा रही होगी ? राज्य में पांच में से एक स्कूल ऐसा है जिसके पास मात्र एक ही कमरा है। यानी इन स्कूलों में सारी प्राइमरी कक्षाएं एक ही कमरे में चल रही हैं। अब इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कितनी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा रही होगी ? राज्य में औसत प्रति स्कूल शिक्षक संख्या है तीन। प्राइमरी शिक्षा के लिहाज से यह शिक्षक संख्या अपर्याप्त है। एक स्कूल में कक्षा 1-4 या 1-5तक की कक्षाएं लगती हैं तो औसतन एक शिक्षक एक साथ दो कक्षाएं पढ़ाता है। सन् 1997 में यह पाया गया कि आधे से ज्यादा स्कूलों में एक या दो शिक्षक हैं। इसका अर्थ है एक ही शिक्षक एकाधिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को पढ़ाता है और सामान्य भाषा में इसे कहते हैं स्कूली शिक्षा का सर्वनाश। इसके अलावा स्कूलों में बच्चों के टॉयलेट नहीं है.पीने के स्वच्छ पानी की व्यवस्था नहीं है। पढ़ाने के लिए स्कूल में ब्लैकबोर्ड तक नहीं है। गांवों में चलने वाले अधिकांश स्कूलों में बिजली नहीं है। प्राकृतिक रोशनी में ये स्कूल चलते हैं। स्कूलों में घटिया किस्म का फर्नीचर है जिस पर बैठकर बच्चे पढ़ते हैं। स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से पेशाबघर तक नहीं हैं। स्कूलों की दशा के कुछ आंकड़े देखें तो शायद यथार्थ समझ में आ जाए। मसलन 1986 में 4.6 प्रतिशत कमरेरहित स्कूल थे। इनकी संख्या 1993 में बढ़कर 5.0 प्रतिशत और 1997 में बढ़कर 18.0 प्रतिशत हो गयी। सन् 1986 में एक कमरे में चलने वाले स्कूलों की संख्या 26.9 प्रतिशत थी,जो 1993 में घटकर 23.5 और 1997 में 23.1 प्रतिशत दर्ज की गयी। दो कमरे वाले स्कूलों की संख्या 1986 में 23.0 प्रतिशत, 1993 में32.4 प्रतिशत और 1997 में 23.1 प्रतिशत दर्ज की गई है। तीन या उससे ज्यादा कमरे वाले स्कूल सन् 1986 में 45.2 प्रतिशत, 1993 में 39.1 प्रतिशत और 1997 में 40.9 प्रतिशत थी। राज्य स्कूलों में पढ़ाने वाले 45 प्रतिशत से ज्यादा शिक्षक अप्रशिक्षित हैं।
   राज्य  सरकार के द्वारा प्राइमरी शिक्षा पर किए जा रहे खर्चे के आंकड़े बताते हैं कि राज्य सरकार का 90 प्रतिशत पैसा शिक्षकों-कर्मचारियों की पगार में चला जाता है। जबकि पाठ्यपुस्तक प्रकाशन ,स्कूल मरम्मत और निर्माण आदि पर 2.1 प्रतिशत खर्चा होता है, बच्चों के दोपहर के खाने पर 1.5 प्रतिशत,शिक्षक प्रशिक्षण पर 0.4 प्रतिशत और स्कूल मुआयने पर 1.6 प्रतिशत का खर्चा किया जाता है। यानी स्कूलों के विकास पर खर्च करने के लिए वाम सरकार द्वारा बहुत कम पैसा खर्च किया जाता है।

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

मुक्तांचल की जंग है माओवाद

    अंग्रेजीमार्का बहुत सारे बुद्धिजीवी इन दिनों माओवाद पर फिदा हैं। वे बीच-बीच में आदिवासियों घूम आते हैं । प्रेस को फोटोसत्र के लिए बुला लेते हैं । चंद घंटों या चंद रोज की यात्रा के बाद बताते हैं कि माओवादी न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। इन अंग्रेजीदा बुद्धिजीवियों की बांकी अदाओं पर बलिहारी मध्यवर्ग के युवाओं की बड़ी तादाद है।      
     मीडिया में वे कह रहे हैं माओवादी न्याय के लिए लड़ रहे हैं। हम कहना चाहते हैं न्याय के लिए वहां जंग होती है जहां अन्याय हो रहा हो। अन्याय वहां होता है जब  सरकार ने किसानों की जबर्दस्ती जमीन ली हो, उन्हें बेदखल किया हो। लेकिन जहां न किसी की जमीन ली गयी है और न किसी को बेदखल किया है, न किसी को मारा है न पीटा है,वहां पर न्याय की जंग के नाम पर खूनी खेल क्यों चल रहा है ? लालगढ़ ऐसा ही एक इलाका है।
    लालगढ़ में माओवादी किसके लिए लड़ रहे हैं और क्या वे सचमुच में आंदोलन कर रहे हैं ? लालगढ़ में माओवादी कोई आंदोलन नहीं चला रहे। वहां पर उनकी कोई मांगें नहीं हैं। इसके बावजूद यदि कोई यह कहे कि माओवादी न्याय के लिए लड़ रहे हैं तो सफेद झूठ बोलता है। माओवाद के नाम पर वे सिर्फ कत्ल कर रहे हैं,निर्दोष लोगों की हत्याएं कर रहे हैं।
    हत्या करना न्याय नहीं है। बल्कि अपराध है। हमें न्याय और अपराध में अंतर करना चाहिए। जहां वे लोकतांत्रिक ढ़ंग से संघर्ष कर रहे हैं वहां पर उनकी न्याय की जंग हो सकती है। लेकिन जहां पर वे अकारण हत्याएं कर रहे हैं वहां पर उनका खाता हत्या के अपराधियों के नाम से ही तैयार होगा।
      माओवादी हत्याएं करते हुए तर्क दे रहे हैं कि वे हत्या नहीं कर रहे बल्कि वर्ग उन्मूलन कर रहे हैं। शोषकवर्ग और उसके समर्थकों का सफाया कर रहे हैं। शारीरिक तौर पर मौत के घाट उतारने को वर्ग उन्मूलन नहीं कहते यह तो जनसंहार है जिसे किश्तों में संपन्न किया जा रहा है।
     माओवादी अच्छी तरह जानते हैं  उनके हिंसाचार से आदिवासियों और किसानों की जिन्दगी में खुशहाली आने वाली नहीं है। माओवादी जानते हैं बंदूक और बमों से क्रांतिकारी चेतना का निर्माण नहीं होता।
   बम और बंदूक से यदि क्रांति निकलती तो माफिया गिरोह आसानी से क्रांतिकारी  बन जाते । हत्याओं से सामाजिक वर्गों का उन्मूलन नहीं होता। जो लोग हिंसा और घृणा को प्रत्येक समस्या की रामबाण दवा मानते हैं उन्हें सोचना चाहिए कि क्या इससे उन्हें अपना अभीप्सित लक्ष्य प्राप्त करने में सफलता मिल सकती है ?
    माओवादी बताएं कि उनके हथियारबंद गिरोहों के लिए हथियार ,गोली-बारूद, बम, लैंडमाइन आदि के लिए पैसा कहां से आता है ? क्या हम मान लें कि उनके लिए गांव के गरीब किसान और आदिवासी पैसा देते हैं ? क्या यह संभव है जिन आदिवासियों-किसानों के पास स्वयं खाने को एक फूटी कौड़ी न हो वे माओवादियों को चंदे में मोटी रकम देते होंगे ? शहरों में माओवादी कहीं पर भी चंदा इकट्ठा करते नजर नहीं आते, तथाकथित बौद्धिकों की सभाओं में उन्हें कभी-कभार चंदा जरूर मिलता है । लेकिन उससे माओवादियों का विशाल नेटवर्क नहीं चल सकता।
    माओवादियों का मानना है वे जबरिया धन वसूलते नहीं हैं,किसी से फिरौती नहीं लेते। डाकेजनी नहीं करते। चौथ नहीं वसूलते। ऐसी स्थिति में तो यह सवाल और भी प्रासंगिक है कि उन्हें पैसा कहां से मिलता है ?
   माओवादियों के पास कई हजार हथियारबंद कैडर हैं जिन्हें मासिक भत्ता मिलता है, इसके अलावा उनके सैंकड़ों पूरावक्ती कार्यकर्त्ता हैं जो मासिक वेतन पर उनके लिए काम करते हैं। आखिर इस विशाल कैडर और गुरिल्लावाहिनी के लिए पैसा कहां से आता है ? क्या माओवादियों को विदेशों से पैसा आता है ? क्या भारत के कारपोरेट घराने उन्हें पैसा देते हैं ? क्या वे तस्करों के नेटवर्क की मदद से पैसा पाते हैं ? या फिर उन्हें भगवान पैसे देता है ?
     माओवादियों का संगठन शुद्ध विचारधारा के आधार पर नहीं चल रहा है। उसकी दौलत की गंगोत्री कहां है ? इसके बारे में गंभीरता के साथ पता किया जाना चाहिए। विभिन्न राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह बताएं माओवादी कहां से रसद प्राप्त कर रहे हैं ? कम से कम इतना तय है  माओवादियों को धन किसी पवित्र स्रोत से नहीं मिल रहा है।
      जो लोग यह कहते हैं कि लालगढ़ का आंदोलन न्यायपूर्ण आंदोलन है उन्हें माओवादी नेता किशन जी का ‘फ्रंटलाइन’ को दिया साक्षात्कार पढ़ना चाहिए,इस साक्षात्कार में किशनजी ने कहा है कि उनके संगठन का प्रधान लक्ष्य है पश्चिम बंगाल में लिबरेटेड क्षेत्र बनाना। पत्रिका ने पूछा कि पश्चिम बंगाल को लेकर क्या योजना है, किशनजी ने कहा  ‘‘Very simply, to establish a liberated area. We decided in 2007 that this [the Jangalmahal] would be a guerilla area. Since then we have progressed a lot, we have already reached out to more than half the population of the region and made it politically aware. I can tell you only so much. Our politburo does not allow us to divulge the tactical aspects of our programmes.’’ (Volume 26 - Issue 22 :: Oct. 24-Nov. 06, 2009)
यानी माओवादी पश्चिम बंगाल में न्याययुद्ध नहीं लड़ रहे बल्कि मुक्त क्षेत्र या गुरिल्लाक्षेत्र बनाने की जंग लड़ रहे हैं और उन्हें ममता बनर्जी समर्थन कर रही है।
    विभिन्न राजनीतिक दलों,केन्द्र और राज्य सरकारों से सवाल पूछा जाना चाहिए कि वे मुक्तक्षेत्र की धारणा के बारे में क्या सोचते हैं ? ममता बनर्जी,कांग्रेस, भाजपा, माकपा,भाकपा आदि सभी दलों को अपना स्टैंड साफ करना चाहिए कि वे मुक्तक्षेत्र की धारणा के बारे में क्या सोच रहे हैं ?
    उन तमाम बुद्धिजीवियों से भी सवाल है कि क्या वे भारत के संविधान के तहत गांवों को चलाना चाहते हैं या मुक्तक्षेत्र के नाम पर माओवादी अदालतों और अपराधियों के झंड़े तले शासन चलाना चाहते हैं ? संविधान और कानून का शासन होना चाहिए या मुक्तांचल का शासन होना चाहिए ?
     इस सवाल का जबाब अरूंधती राय,मेधा पाटेकर,महाश्वेता देवी आदि को भी देना चाहिए कि वे संविधान के तहत शासन चलाना चाहते हैं या मुक्तांचल का स्वयंभू माओवादी शासन चाहते हैं? यदि मुक्तांचल जरूरी है तो पहले हमारे इन प्यारे बुद्धिजीवियों को अपने डेरे शहरों से माओवाद प्रभावित गांवों में जल्दी से स्थानान्तरित कर देने चाहिए। संविधान,लोकतंत्र, और पूंजीवादी सुविधाओं और वातावरण का परित्याग करके जंगलमहल में चले जाना चाहिए। वे शहरों में घरों में रहते हैं लालगढ़ में वे जंगलमहल में रहेंगे तो उससे अनेक लोगों को लाभ होगा। किसानों -आदिवासियों को भी सांस्कृतिक बनाने का अवसर मिलेगा। कम से कम पहले चरण में इन अभिजात्य बुद्घिजीवियों से गांव के गरीबों को बहुत कुछ देश-देशान्तर के बारे में सीखने को मिलेगा।      








गुरुवार, 10 जून 2010

पश्चिम बंगाल में माकपा की पराजय के कारणों की तलाश में

( यह लेख 2004 में दो किश्तों में दैनिक हिन्दुस्तान में छपा था, उस समय मैं माकपा का सदस्य था। माकपा के  अनेक नेता इस लेख पर नाराज हो गए। कुछ बड़े नेताओ ने तो पोलिट ब्यूरो तक लिखित शिकायत की। यह लेख पश्चिम बंगाल में वामपंथ की असफलताओं पर रोशनी ड़ालता है, काश ,उस समय इस लेख पर माकपा के नेताओं ने ध्यान दिया होता तो आज इतनी शर्मनाक पराजय का सामना नहीं करना पड़ता )

            सांस्कृतिक क्षय एक सामाजिक प्रक्रिया है।यह जनतांत्रिक परिवेश और आलोचनात्मक विवेक के अभाव में शुरू होता है। यह तब शुरू होती है जब समाज अपने बारे में आलोचनात्मक ढ़ंग से सोचना बंद कर देता है। समाज के स्पंदन को बौध्दिक जगत महसूस करना बंद कर देता है।सब समय अतीत में जीता है।अतीतबोध में डूबा रहता है। पश्‍चि‍म बंगाल में इन दिनों ऐसा ही घट रहा है।बौद्धिकों,संस्कृतिकर्मियों, लेखकों,समाजविज्ञानियों आदि ने आलोचनात्मक विवेक को राजनीति और अतीतगौरव के मातहत कर दिया है।
        एक जमाने में पश्‍चि‍म बंगाल को देश की सांस्कृतिक मशाल कहा जाता था। किंतु आज सांस्कृतिक क्षय की अवस्था है। संस्कृति को राजनीति ने हड़प लिया है।सब कुछ राजनीतिक है। राजनीति के अलावा सब बेकार है।आज सत्ता ,राजनीति और अतीतबोध का जिस तरह का दबाव सांस्कृतिक प्रक्रियाओं पर है वैसा इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया। कहने के लिए सतह पर सब कुछ सांस्कृतिक नजर आता है। मुख्यमंत्री से लेकर सरकारी बस के ड्राइवर तक सबके गले से साहित्य की प्रशंसा के स्वर सुने जा सकते हैं।किंतु सच्चाई यह है कि विगत पचास वर्षों में बंगला भाषा का क्षय हुआ है।बांग्ला के पठन-पाठन, अध्ययन,अध्यापन, लेखन, साक्षरता आदि में गिरावट आई है। कुछ अर्सा पहले जब पश्‍चि‍म बंगाल सरकार ने बंगला भाषा में सरकारी कामकाज को तरजीह देने का फैसला लिया तो पता चला कि ज्यादातर क्लर्क बांग्‍ला लिखना नहीं जानते। जो चालीस साल के युवा हैं उनमें से अधिकांश को बंगला बोलने,पढ़ने का अभ्यास है किंतु लिखने में मुश्‍कि‍लों का सामना करना पड़ता है।यह बांग्‍ला भाषा के क्षय का संकेत है।
      एक जमाना था जब रैनेसां के दौर में बंगाल के बड़े-बड़े वैज्ञानिक,समाजविज्ञानी आदि अपने विचारों को बांग्‍ला में लिखना पसंद करते थे। कितु आज गिनती के पांच वैज्ञानिक और समाजविज्ञानी नहीं हैं जो बांग्‍ला में अपने को व्यक्त करने की क्षमता रखते हों। बांग्‍ला आज बौध्दिक विमर्ष की भाषा नहीं रह गई है। बंगाल के विश्‍वविद्यालय अजायबघर नजर आते हैं।यह रैनेसां के महाख्यान के अंत की सूचना है। स्थिति की भयावहता को सिर्फ एक तथ्य से समझ सकते हैं कि ईश्‍वरचंद्र विद्यासागर का जिस गांव में जन्म हुआ था वह गांव अभी तक पूर्ण साक्षर नहीं बन पाया है।
      पश्‍चि‍म बंगाल के भूमिसुधार कार्यक्रम के बारे में मिथ बना हुआ है। उसे पश्‍चि‍म बंगाल सरकार अपनी सबसे बेहतरीन उपलब्धि मानती है। किंतु सच्चाई का एक अन्य पहलु भी है। प्रसिद्ध कृषि‍ अर्थशास्त्री और पश्‍चि‍म बंगाल योजना बोर्ड के सदस्य अजित नारायन बसु ने हाल ही में वामपंथी मोर्चे के सदस्य दल आर.एस.पी.के मुखपत्र गणवार्ता में रहस्योद्धाटन किया है कि भूमि सुधार से गांव के गरीबों के सशक्तिकरण में कोई मदद नहीं मिली है।
          बसु के अनुसार पश्‍चि‍म बंगाल के 53. 38 फीसदी ग्रामीण परिवारों के पास कुल कृषि‍ योग्य जमीन में से मात्र 3.29 फीसदी कृषि‍ योग्य जमीन है।यह राष्‍ट्रीय औसत से काफी नीचे है।राष्‍ट्रीय स्तर पर 58. 28 फीसदी परिवारों के पास 5. 97 फीसदी कृषि‍योग्य जमीन है।इसी तरह पश्‍चि‍म बंगाल के 13. 24 फीसदी समृद्ध ग्रामीण परिवारों के पास 58. 56 फीसदी कृषि‍योग्य जमीन है।बसु ने रेखांकित किया है पश्‍चि‍म बंगाल में 1992 और 2001 में कृषि‍ मजदूरों को तयशुदा सरकारी मजूरी की तुलना में क्रमश: 12.3 और 21.5 फीसदी कम न्यूनतम मजूरी मिलती है। सरकार के अनुसार न्यूनतम मजूरी का यह आंकड़ा 7,052 करोड़ रूपये बैठता है। बसु का मानना है मौजूदा परिस्थितियों में वाममोर्चा सरकार यदि चाहे तो कृषि‍योग्य उपलब्ध जमीन में से 143. 69 एकड़ जमीन को 68 लाख किसान परिवारों में बांट सकती है।यदि ऐसा हो जाता है तो इससे समस्त गरीब ग्रामीण परिवारों को गरीबी की रेखा से ऊपर ले जाने में मदद मिलेगी।
         बसु का मानना है वामपंथी दलों के लाख दावों के बावजूद गांव के गरीबों की स्थिति में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं आया है। ज्यादातर वामपंथी दलों के संगठनों में गरीब ग्रामीण मजदूरों की बजाय मध्यवर्गीय किसानों का वर्चस्व है।ये लोग सामाजिक परिवर्तन के पक्ष में नहीं है।बल्कि यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं।
उन्नीसवीं शताब्दी और बीसवीं शताब्दी के छठे और सातवें दशक तक कोलकाता में जब हिन्दीभाषी बहुत में कम मात्रा में रहते थे। तब साहित्य में कोलकाता के हिन्दीभाषी बुध्दिजीवियों का बोलवाला था। कितु इसके बाद से पतनगाथा शुरू हुई है। खासकर नेहरू युग के समापन के साथ कोलकाता के सांस्कृतिक क्षय की प्रक्रिया ने बल पकड़ा है। वामपंथ विभाजित हुआ। अर्द्धफासी दौर और आपातकाल में राजनीति में हिंसाचार पैदा हुआ। नक्सलपंथी, माकपाई,भाकपाई और कांग्रेसियों ने एक -दूसरे पर खूनी हमले किए। सन् 1961-62 से पश्‍चि‍‍म बंगाल में राजनीतिक घृणा और हिंसा का जो माहौल तैयार हुआ उसने आलोचनात्मक परिवेश और स्वस्थ सांस्कृतिक विकास की समस्त संभावनाओं को खत्म कर दिया। यह पश्‍चि‍म बंगाल के सांस्कृतिक पतन का प्रस्थान बिन्दु है। इसके बाद से राजनीतिक वफादारी का तत्व इस कदर हावी हुआ है कि आज राजनीतिक वफादारों का समाज में बोलवाला है।
       पहले राजनीति में प्रतिबद्धता की मांग की जाती थी। बाद में वफादारी की मांग की जाने लगी।राजनीतिक वफादारी का जनतांत्रि‍कबोध से कोई लेना-देना नहीं है। राजनीतिक वफादारी के दौर में राजनीतिक संघर्ष उग्र हुए हैं। राजनीतिक हिंसा में मरनेवालों की तादाद चौंकानेवाली है।सन् 1977 के बाद से विभिन्न दलों के खूनी संघर्षों में तकरीबन पचास हजार से ज्‍यादा लोग मारे जा चुके हैं।इसमें अकेले माकपा के 20हजार से ज्यादा कार्यकर्त्‍ता और समर्थक मारे गए हैं।ये समस्त खूनी लड़ाईयां जनतंत्र की रक्षा के नाम पर लड़ी गईं।
राजनीतिक वफादारी जनतांत्रिक परिवेश को नष्‍ट कर देती है। अन्य के स्वर को कुचल देती है।
बंगाल में कहने को जनतंत्र है।चुनी हुई सरकार है।पंचायती व्यवस्था है।किंतु इस समूची प्रक्रिया का संपादन वफादारी के पैमाने से हो रहा है।जनतांत्रिक मूल्यों के प्रसार से इसमें कम मदद मिली है।आज जनतंत्र पर वफादार भारी पड़ रहे हैं। जनतांत्रिक परिवेश और आलोचनात्मक विवेक की मांग है कि जनतंत्र को वफादारी के दायरे से बाहर निकाला जाए।
          वफादारी, सामंती मूल्य है।इसका जनतंत्र से कोई संबंध नहीं है।बल्कि वैरभाव है।वफादारी में नागरिक के अधिकारों के प्रति घष्णाभाव भरा है।वफादारों का बढ़ता हुआ वर्चस्व नागरिक समाज,नागरिक चेतना और नागरिक परिवेष को नष्‍ट कर रहा है। आज बंगाल में राजनीतिक वफादारी के आधार पर जगह-जगह गुण्डों के गिरोह सक्रिय हैं।इनके किस्से समूचे बंगाल में लोककथा के रूप में जनप्रिय हैं। बड़े पैमाने पर शि‍क्षितों में इस सबको लेकर असंतोष है। दूसरी ओर बंगाली जाति के श्रेष्‍ठत्व और अतीतप्रेम के प्रेतों को जगाया जा रहा है।इससे वैचारिक तौर पर प्रतिगामी परिवेश की सृष्‍टि‍ हो रही है।
           पश्‍चि‍म बंगाल के संदर्भ में सबसे मुख्य विचारणीय सवाल यह भी है कि आखिरकार ऐसा क्या हुआ कि बंगाल से हिन्दी का हरभरा बगीचा गायब हो गया।बंगाल में आधुनिक हिन्दी प्रेस की शुरूआत हुई।देश में सबसे पहले विश्‍वविद्यालय स्तर पर हिन्दी की पढ़ाई शुरू हुई। हिन्दी के मूर्धन्य लेखकों का बंगाल गढ़ था।किंतु आजादी के बाद यह गढ़ ढह गया।इसका प्रधान कारण है हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन और अनुसंधान के स्तरीय ढ़ांचे ,शि‍क्षकों और बौध्दिकों का कोलकाता में अभाव। ऐसी स्थिति में कोलकाता का हिन्दी केन्द्र नष्‍ट हो गया।
           उल्लेखनीय है कि आधुनिक काल में शि‍क्षा सबसे बड़ा क्षेत्र है जिसके जरिए नए बौद्धिक केन्द्र की परंपरा जन्म लेती है। हिन्दी के स्तरहीन पठन-पाठन के कारण महानगर होने के बावजूद कोलकाता को हिन्दी के केन्द्र के रूप में बचाकर नहीं रखा जा सका।जिन लोगों ने आधुनिक काल के आरंभ में हिन्दी के विकास में कोलकाता को अपना कर्म क्षेत्र बनाया था उनमें से ज्यादातर लेखक-पत्रकार गैर-हिन्दीभाषी थे। जो हिन्दी लेखक कोलकाता से अपना संबंध जोड़ रहे थे वे कोलकाता के नहीं थे।उनका कोलकाता के हिन्दी के शैक्षणिक माहौल से कोई लेना-देना नहीं था।
       आधुनिक काल में जिन राज्यों में हिन्दी के स्तरीय अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था थी, वे ही षहर हिन्दी के केन्द्र के रूप में उभर कर सामने आए। उन सब स्थानों पर हिन्दी के बुद्धिजीवियों की परंपरा का निर्माण हुआ। कोलकाता में व्यापक पुस्तकालय नेटवर्क होने के बावजूद हिन्दी साहित्य के विकास में कोलकाता विश्‍वविद्यालय से एक भी उल्लेखनीय रिसर्च का सामने न आना,इस तथ्य का संकेत है कि कलकत्ता विश्‍वविद्यालय का हिन्दी के उत्थान में प्रचारात्मक अवदान जरूर है।शोधपरक अवदान नहीं रहा। इसके विपरीत अन्य वि‍षयों के विभागों में ऐसी स्थिति नहीं रही है। विज्ञान,समाजविज्ञान,बंगला साहित्य, भाषाविज्ञान आदि के क्षेत्र में कलकत्ता विश्‍वविद्यालय अग्रणी है।
      कोलकाता के हिन्दीभाषि‍यों के पास पूंजी है। किंतु संस्कृति नहीं है।मेहनत-मजदूरी करके जीने का हुनर है।किंतु पहचान नहीं है।आज कोलकाता में हिन्दीभाषी बहुसंख्यक हैं,बंगाली अल्पसंख्यक हैं।किंतु हिन्दीभाषि‍यों की राजनीतिक पहचान और आवाज कहीं पर भी सुनाई नहीं देती।मजदूर संगठनों में ज्यादातर श्रमिक हिन्दीभाषी हैं किंतु नेतृत्‍व बंगालियों के पास है। उद्योगों में पूंजी हिन्दीभाषी पूंजीपतियों की लगी है,किंतु राजनीतिक वर्चस्व बंगालियों का है।हिन्दीभाषी पूंजी और समाज का जिस तरह का व्यक्तित्वहीन स्वरूप कोलकाता में उभरकर आया है। वैसा अन्यत्र दिखाई नहीं देता।
     बंगाल में सबसे पहले हिन्दी भागी।बाद में हिन्दीभाषी लोगों की पूंजी भागी। बंगाल में हिन्दी की संस्कृति पहले आई।हिन्दीभाषी लोगों की पूंजी बाद में आई।आजादी के बाद तेजी से परिदृश्‍य बदला और हिन्दी के केन्द्र के रूप में कोलकाता खत्म हुआ।बाद में हिन्दीभाषी उद्योगपतियों ने अपने कारोबार को समेटना शुरू किया।आज कोई नया प्रकल्प हिन्दीभाषी पूंजीपति बंगाल में लगाना नहीं चाहता।
     अघोषि‍त तौर पर बंगाल में भूमिपुत्रों का बोलवाला है।'अन्य' की आवाज को कोई भी तवज्जह नहीं देता।अंदर ही अंदर हिन्दीभाषि‍यों के प्रति घृष्णा का प्रचार चल रहा है।इसकी अनुगूंज कभी किसी बड़े नेता के भाषण में सुनाई देती है तो कभी बंगाली अखबारों में बंगाल के रैनेसांपंथी लेखकों में दिखाई देती है।ये लोग हिन्दीभाषि‍यों के बारे में तकरीबन उसी भाषा में बोलते हैं जिस भाषा में मुंबई में शि‍वसेना वाले बोलते हैं।
रैनेसांपंथी बुध्दिजीवियों के हिन्दीविरोधी जहर से भरे लेख आए दिन बंगला के दैनिक अखबारों में प्रकाशि‍त होते रहते हैं।इन लेखों में हिन्दी साम्राज्यवाद का रोना रहता है।एक जमाना था जब हिन्दी के उत्थान के लिए बंगला के बुध्दिजीवी आगे आए थे।किंतु आज बंगला के चर्चित लेखकों,संस्कृतिकर्मियों में एक अच्छा खासा तबका पैदा हो गया है जो हिन्दी विरोधी उन्माद से ग्रस्‍त है।
    लेनिन की प्रसिध्द उक्ति है कि अगर किसी समाज विकास के स्तर को देखना हो तो उस समाज में स्त्रियों की कैसी अवस्था है ?इसे देखना चाहिए।स्त्रियों की सामाजिक-सांस्कृतिक दशा के आधार पर पश्‍चि‍म बंगाल को सारे देश के संदर्भ में रखकर देखें तो बड़ी भयानक तस्वीर उभरकर सामने आती है।इसके आधारभूत विश्‍लेषण के लिए 'नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे -2' के आंकड़ों पर गौर कर लेना समीचीन होगा।ये आंकड़े पश्‍चि‍म बंगाल के बारे में प्रचलित बहुत सारे मिथों को खंडित करते हैं।खासकर महिला सशक्तिकरण के समस्त दावों का खण्डन करते हैं।
      पश्‍चि‍म बंगाल में राजनीतिक चेतना का स्तर अन्य राज्यों की तुलना में काफी ऊँचा है।वामपंथी आंदोलन काफी मजबूत है।महिला आंदोलन सबसे ताकतवर है। इसके बावजूद महिला सशक्तिकरण के संदर्भ में देश के अन्य राज्यों से काफी पीछे है।'नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे-2' के अनुसार महिला सशक्तिकरण के पैमाने के लिहाज से पश्‍चि‍म बंगाल सबसे नीचे के राज्यों में आता है।
       मसलन् जब महिलाओं से उनकी व्यक्तिगत स्वास्थ्य देखभाल के बारे में सवाल किया गया तो पाया कि बंगाल में मात्र 16.7 फीसदी महिलाएं ही अपने स्वास्थ्य की देखभाल के बारे में निजी तौर पर निर्णय ले पाती हैं। बंगाल के नीचे सिर्फ राजस्थान,उडीसा और नागालैण्ड का स्थान है।बाकी राज्यों का बंगाल के ऊपर स्थान है।जब यह सवाल पूछा गया कि महिलाएं अपने स्वास्थ्य की देखभाल के बारे में पति या किसी अन्य के साथ मिलकर निर्णय लेती है।इस संदर्भ में भी बंगाल की महिलाएं काफी पीछे हैं।ज्वेलरी वगैरह खरीदने का फैसला महिलाएं निजी तौर पर कितनी फीसदी संख्या में लेती हैं तो इसके जबाव में पता चला कि निजी तौर पर मात्र 15.9 फीसदी महिलाएं गहने वगैरह खरीदने का फैसला लेती हैं। जबकि निजी तौर पर गहने वगैरह खरीदने का फैसला लेने के मामले में बंगाल से आगे त्रिपुरा,केरल,गोवा और तमिलनाडु हैं। इसी तरह अपनी कमाई को खर्च करने के मामले में बंगाल की औरतों की स्थिति सारे देश में काफी नीचे है। मात्र 51.7फीसदी महिलाएं ही अपनी कमाई को अपनी इच्छा से खर्च कर पाती हैं। जबकि बंगाल से ऊपर देश के आठ राज्य आते हैं।ये हैं-दिल्ली, हरियाणा,हिमाचल प्रदेष,जम्मू-कष्मीर,पंजाब, मणिपुर,सिक्किम, गोवा ।इनके अलावा बाकी राज्य बंगाल से पीछे हैं।
        महिला सशक्तिकरण के संदर्भ में जब महिलाओं से यह सवाल पूछा गया कि क्या उन्हें बाजार जाने के लिए किसी से अनुमति लेनी होती है ? इस सवाल के जबाव में पता चला कि मात्र 17.8 फीसदी महिलाओं ने कहा कि उन्हें बाजार जाने के लिए किसी से अनुमति नहीं लेनी होती। जबकि इस मामले में बंगाल से ऊपर 21 राज्य हैं। पश्‍चि‍म बंगाल की मात्र 14.1 फीसदी महिलाओं ने कहा कि उन्हें अपनी मित्र या नाते-रिश्‍तेदार के यहां जाने लिए किसी से अनुमति नहीं लेनी होती। इस सवाल के संदर्भ में पष्चिम बंगाल से ऊपर बीस राज्य हैं। इन दोंनों सवालों पर सिर्फ जम्मू-कष्मीर और उत्तर प्रदेश का स्थान बंगाल के बाद है।यानी देश में नीचे से तीसरा। आने-जाने की सीमित स्वतंत्रता के सवाल पर तमिलनाडु ,गोवा,मिजोरम और गुजरात का सबसे ऊपर स्थान है। इन राज्यों में आधे से ज्यादा औरतों को आने-जाने के मामले में किसी से अनुमति नहीं लेनी होती। जबकि आने-जाने के मामले में सबसे खराब स्थिति जम्मू-कश्‍मीर, असम, उत्तरप्रदेश,नागालैण्ड,पश्‍चि‍म बंगाल, उडीसा, राजस्थान,और आंध्र की है। इन राज्यों में बीस फीसदी अथवा इससे भी कम संख्या में औरतों को आने-जाने के लिए अनुमति नहीं लेनी होती है।
           सर्वे में बताया गया है कि ज्यादातर औरतें लिंगीय भेदभाव को मानती हैं।साथ ही पुरूष की तुलना में स्त्री को दोयमदर्जे का नागरिक मानती हैं।वे यह भी मानती हैं कि पुरूष को ही औरत की जिन्दगी को नियमित करने,उसके व्यवहार को सुनिश्‍चि‍त करने का हक है।इसके लिए यदि वह ताकत का इस्तेमाल करे,पत्नी को मारे तो भी जायज है। मसलन् पति अपनी पत्नी के चरित्र के बारे में संदेह करे।उस पर अविश्‍वास करे। पत्नी के घर वाले इच्छित माल या गहना या अन्य वस्तु दहेज में न दे पाएं। यदि पत्नी अपने सास-ससुर के प्रति अश्रध्दा दिखाए।वगैर बताए घर के बाहर जाए।यदि वह बच्चों या घर की उपेक्षा करे।यदि वह सही ढ़ंग से खाना न पकाए इत्यादि कारणों से अथवा इनमें से किसी एक कारण से यदि पति अपनी पत्नी को मारता है तो औरतें उसे वैध मानती हैं।
            पूरे देश में 15से 49 साल की शादीशुदा औरतों में 57 फीसदी पति द्वारा पत्नी की उपरोक्त कारणों में से किसी एक कारण से पिटाई को जायज मानती हैं। विभिन्न राज्यों में इसका अनुपात अलग-अलग है। मसलन् 20 से 25 फीसदी के बीच में जो राज्य आते हैं वे हैं-दिल्ली,पंजाब, पश्‍चि‍म बंगाल और हिमाचल प्रदेश।
जबकि पति द्वारा पत्नी की पिटाई को जायज ठहराने वाली 70 फीसदी औरतों वाले नौ राज्य हैं इनमें आंध्र,तमिलनाडु और महाराष्‍ट्र शामिल हैं। लिंगीय भेदभाव का सबसे अच्छा उदाहरण है शि‍क्षा।छह साल और उससे ऊपर के लड़के-लड़कियों को साक्षर बनाने के मामले में 'नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे-2' के आंकड़े बताते हैं कि पश्‍चि‍म बंगाल में मात्र 57.5 फीसदी लड़कियों को साक्षर बनाया जा सका है।जबकि इस उम्र की लड़कियों को साक्षर बनाने के मामले में पश्‍चि‍म बंगाल से काफी ऊपर दिल्ली, हिमाचलप्रदेश,पंजाब, असम,मणि‍पुर, मेघालय,मिजोरम, नागालैण्ड, सिक्किम, त्रिपुरा, गोवा,महाराष्‍ट्र, तमिलनाडु और केरल हैं। यानी पश्‍चि‍म बंगाल का देश में सोलहवां स्थान है।
         पश्‍चि‍म बंगाल से नीचे सिर्फ राजस्थान,मध्यप्रदेश,उत्तर प्रदेश,बिहार, उडीसा, अरुणाचल प्रदेश,गुजरात,आंध्र और कर्नाटक का स्थान है। इसी तरह बीस वर्ष और उससे ज्यादा उम्र की कम से कम हाईस्कूल पास लड़कियों की पश्‍चि‍म बंगाल में संख्या मात्र 12 फीसदी है। जबकि पश्‍चि‍म बंगाल से इस वर्ग में 18 राज्य ऊपर हैं। ये हैं-दिल्ली,हरियाणा, हिमाचल प्रदेश,जम्मू- कश्‍मीर, पंजाब, असम,मणिपुर, मेघालय, मिजोरम,  नागालैण्ड, सिक्किम,त्रिपुरा,गोवा, गुजरात, महाराष्‍ट्र, कर्नाटक,तमिलनाडु और केरल। जबकि पश्‍चि‍म बंगाल से जो राज्य नीचे हैं वे हैं-राजस्थान,मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार,उडीसा, और अरुणाचल प्रदेश।
       भारत में ज्यादातर औरतें निरक्षर हैं अथवा उनके पास सीमित षिक्षा है।ऐसी स्थिति में जनमाध्यम जैसे अनौपचारिक रूपों की भूमिका बढ़ जाती है। जनमाध्यमों के द्वारा औरतें बाह्य जगत को देख पाती हैं। बाह्य जगत के बारे में उनकी जानकारी में इजाफा होता है।यह सच है कि जनमाध्यमों का मूलत: मनोरंजन माध्यम के रूप में इस्तेमाल होता है। किंतु यह भी सच है कि जनमाध्यमों का शैक्षणिक मूल्य भी है।इस दृष्‍टि‍ से जनमाध्यमों को देखने, सुनने के स्तर को देखकर भी महिला सशक्तिकरण की दशा का अंदाजा लगाया जा सकता है।
       सप्ताह में कम से कम एकबार जिन औरतों को टेलीविजन देखने का मौका मिलता है ऐसी औरतों की पश्‍चि‍म बंगाल में संख्या 40.8 फीसदी है।जबकि सप्ताह में कम से कम एकबार रेडियो सुनने वाली औरतों की संख्या 41.6 फीसदी है। सप्ताह में कम से कम एकबार सिनेमाूहाल में जाकर फिल्म देखनेवाली औरतों की संख्या मात्र 9.7 फीसदी है। उल्लेखनीय है कि प्रथम 'नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे' के समय सिनेमाहॉल में जाकर फिल्म देखने वाली औरतों की संख्या 16 फीसदी थी। यानी इसमें सात फीसदी की गिरावट आई है।
उसी तरह रेडियो सुनने वालों की संख्या 48.3 फीसदी थी। यानी इसमें भी सात फीसदी की गिरावट आई है। वहीं      
       दूसरी ओर टीवी देखनेवाली औरतों की संख्या में पहले सर्वे की तुलना में सात फीसदी की वृद्धि‍ हुई है।अन्य राज्यों की तुलना में इस मामले में भी पश्‍चि‍म बंगाल काफी पीछे है।
         दूसरे सर्वे में औरतों के साप्ताहिक टेलीविजन देखने के मामले में 19 राज्य पश्‍चि‍म बंगाल से आगे हैं।ये हैं-दिल्ली,हरियाणा,हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्‍मीर, पंजाब, मध्यप्रदेश, अरुणाचल प्रदेश,मणिपुर ,मिजोरम, नागालैण्ड, सिक्किम,त्रिपुरा,गोवा,गुजरात,महाराष्‍ट्र,आंध्र,कर्नाटक,केरल और तमिलनाडु। जबकि पश्‍चि‍म बंगाल से जो राज्य पीछे हैं वे हैं-राजस्थान, उत्तर प्रदेश,बिहार,उडीसा,असम,मेघालय।
        इसी तरह रेडियो सुनने के मामले में दिल्ली,हिमाचल प्रदेश,जम्मू-कश्‍मीर,मणिपुर,मिजोरम,सिक्किम, गोवा, कर्नाटक,केरल और तमिलनाडु का स्थान पश्‍चि‍म बंगाल से ऊपर है।बाकी राज्य पश्‍चि‍म बंगाल से नीचे हैं।
           इसी तरह सप्ताह में कम से कम एकबार सिनेमा हॉल में जाकर फिल्म देखने वाली औरतों की तादाद के मामले में पश्‍चि‍म बंगाल से आठ राज्य ऊपर हैं।ये हैं-दिल्ली,अरुणाचल प्रदेश,मणिपुर, सिक्किम,आंध्र, कर्नाटक,केरल और तमिलनाडु। बाकी राज्यों का स्थान पश्‍चि‍म बंगाल से नीचे है।
         पश्‍चि‍म बंगाल में 60.8 फीसदी औरतें कम से कम एक जनमाध्यम के संपर्क में जरूर हैं।जबकि इस संदर्भ में 18 राज्य पष्चिम बंगाल से ऊपर हैं। यानी सारे देश में पश्‍चि‍म बंगाल का इस मामले में 19वां स्थान है।
महिला सशक्तिकरण में आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रमुख स्थान है।नौकरी करके महिलाओं को आत्मनिर्भरता का अहसास जल्दी होता है। पश्‍चि‍म बंगाल में नौकरी के क्षेत्र में महिलाओं की संख्या 28.5 फीसदी है।जबकि इससे ज्यादा तादाद में औरतें जम्मू-कष्मीर,राजस्थान,मध्यप्रदेश,उडीसा,अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर,मेघालय, मिजोरम, नागालैण्ड, गोवा, गुजरात, महाराष्‍ट्र,आंध्र,कर्नाटक और तमिलनाडु में नौकरी करती हैं।बाकी राज्यों में पश्‍चि‍म बंगाल से कम तादाद में औरतें नौकरी करती हैं। पेशेवर ,तकनीकी अथवा प्रबंधकीय नौकरियों मे पश्‍चि‍म बंगाल में मात्र 1.5 फीसदी औरतें नौकरी में हैं। पष्चिम बंगाल से ऊपर 21 राज्यों का स्थान है।
पश्‍चि‍म बंगाल में महिलाओं पर अत्याचार की घटनाओं में तेजी से इजाफा हुआ है। पश्‍चि‍म बंगाल में ऐसी औरतों की संख्या बहुत कम है जो 15से लेकर 49 साल की आयु के बीच कभी न कभी एकाधिक बार अपने पति से पिटी न हो। इस मामले में 11राज्यों से पश्‍चि‍म बंगाल आगे है। पश्‍चि‍म बंगाल में 15 वर्ष की आयु से लेकर 49 वर्ष तक की हिंसाचार की शि‍कार शादीसुदा महिलाओं की संख्या 17.6 फीसदी थी।जबकि दिल्ली,हरियाणा,हिमाचल प्रदेश,पंजाब,राजस्थान,असम सिक्किम,त्रिपुरा,गुजरात,और केरल में पश्‍चि‍म बंगाल से कम औरतें हिंसाचार की शि‍कार हुई हैं। बाकी राज्यों में पश्‍चि‍म बंगाल से ज्यादा औरतें हिंसाचार की शि‍कार होती रही हैं।
विगत एक वर्ष (2004) में पश्‍चि‍म बंगाल में 8.7 फीसदी औरतें हिंसा की शि‍कार हुईं। जबकि तेरह राज्यों का आंकड़ा बंगाल से नीचे है। पश्‍चि‍म बंगाल से कम हिंसा जिन राज्यों में दर्ज की गई वे हैं- दिल्ली,हरियाणा,हिमाचल प्रदेष,पंजाब,राजस्थान, असम, मणिपुर,सिक्किम, त्रिपुरा,गोवा,गुजरात,महाराष्‍ट्र और केरल। हाल ही में जिन औरतों की शादी हुई है,उनके प्रति हिंसाचार के मामले में पश्‍चि‍म बंगाल का रिकॉर्ड काफी खराब है।हाल ही में संपन्न शादीशुदा औरतों के प्रति हिंसाचार की शि‍कार औरतों की पश्‍चि‍म बंगाल में तादाद 15.2 फीसदी है।इस मामले में भी पष्चिम बंगाल से कम हिंसा दिल्ली,हरियाणा,हिमाचल प्रदेश, जम्मू- कश्‍मीर,पंजाब,राजस्थान,असम,मणिपुर,मेघालय, मिजोरम, नागालैण्ड,सिक्किम,त्रिपुरा,गोवा,गुजरात और केरल में दर्ज की गई है। बाकी राज्यों में पश्‍चि‍म बंगाल से ज्यादा तादाद में औरतों को शादी के तत्काल बाद ही हिंसाचार का शि‍कार होना पड़ा है।
'नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे -2' के अनुसार महिला सशक्तिकरण के जो मानक तय किए गए हैं उनमें पहला मानक था-परिवार के कामकाज में औरतों की फैसलों में शि‍रकत,बाजार आदि स्वतंत्र रूप से जाने की आजादी,पति द्वारा पत्नी को किसी न किसी कारण मारने के कम से कम एक कारण के आधार पर हिंसाचार का समर्थन,लड़का या लड़की को शि‍क्षा में तरजीह दिए जाने का सवाल,जनमाध्यम देखने,सुनने आदि का समय,इन सभी मानकों के आधार पर पश्‍चि‍म बंगाल का देश में 16वां स्थान है।
दूसरा मानक था-छह साल एवं उससे ज्यादा उम्र की महिलाओं में साक्षरता की दर,नियमित टेलीविजन देखने,रेडियो सुनने,फिल्म देखने आदि की दर,महिलाओं में नौकरी की दर। इस मानक के आधार पर पश्‍चि‍म बंगाल का सारे देश में बीसवां स्थान है। महिला सशक्तिकरण तीसरा मानक है-शादी की उम्र,महिला एकल परिवार,संयुक्त परिवार में रहती है,पति-पत्नी की उम्र में कितना अंतर है,शि‍क्षा और उम्र में समानता है या अंतर है इत्यादि। इन मानकों के आधार पर पश्‍चि‍म बंगाल का समूचे देश में सोलहवां स्थान है । समग्रता में महिला सशक्तिकरण के मानकों के आधार पर देश में पश्‍चि‍म बंगाल अठारहवें स्थान पर आता है।
महिलाओं के सशक्तिकरण के मामले में ही पष्चिम बंगाल पिछड़ा हुआ नहीं है अपितु शि‍क्षा और स्वास्थ्य के सामान्य स्तर,सुविधाओं आदि के मामले में भी बहुत पिछड़ा हुआ है।सर्जनात्मक साहित्य के क्षेत्र में हिन्दी,मराठी,तेलुगू आदि का सामयिक साहित्य जिन ऊँचाईयों पर है उसकी तुलना में बंगला साहित्य काफी पीछे है।
इन दिनों बंगला में श्रेष्‍ठ साहित्य नहीं लिखा जा रहा।औसत दर्जे का साहित्य लिखा जा रहा है।बंगला में अन्य भाषाओं का अनुवाद साहित्य बहुत कम मात्रा में आ रहा है।इसका प्रधान कारण है बंगाली लेखकों और प्रकाशकों की यह मान्यता कि बंगला का साहित्य तो सबसे विकसित साहित्य है,उसे अन्य भाषा के साहित्य को जानने की जरूरत नहीं है।
बंगला का सिनेमा उद्योग आज सबसे बुरी अवस्था में है।इक्का-दुक्का बंगला फिल्मों के अलावा बंगला में अच्छी फिल्में नहीं बन रहीं।ज्यादातर सिनेमाघरों में हिन्दी फिल्में चलती हैं।बंगला चैनलों में पुरानी बंगला फिल्में दिखाई जा रही हैं।शायद ही कभी कोई नई बंगला फिल्म चैनलों में दिखाई गई हो।
      कहने का तात्पर्य यह है कि बंगला का जो महाख्यान रैनेसां ने रचा था वह खत्म हो चुका है।सांस्कृतिक श्रेश्ठत्व के गौरवपूर्ण अतीत का जो महाख्यान औद्योगिक क्राति के कंधों पर सवार होकर आया था।वह निरूद्योगीकरण के कंधों पर सवार होकर विदा हो चुका है।

शनिवार, 15 मई 2010

चीन और पश्चिम बंगाल में भाषायी अंधलोकवाद

( कॉमरेड वेंग लीक्वान) 
      चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने अंततः पश्चिमी सिनजियांग क्षेत्र के पार्टी सचिव वेंग लिक्वान को सचिव पद से हटा दिया है और उनकी पदावनति कर दी गयी है। उल्लेखनीय है जुलाई 2009 में सिनजियांग उईघूर क्षेत्र में भयानक दंगे हुए थे जिनमें चीनी मुसलमानों की बड़े पैमाने पर संपत्ति नष्ट हुई थी और 200 से ज्यादा निर्दोष नागरिक मारे गए थे। सचिव साहब दंगे और मुसलमानों के खिलाफ हमले रोकने में पूरी तरह असफल रहे। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने इस क्षेत्र के सचिव को हटाकर दंगे रोकने में पार्टी की असफलता को एकतरह से मान लिया है। वेंग की जगह झांग चुन सियान को इस क्षेत्र का पार्टी सचिव बनाया गया है। यह खबर चीन की सरकारी समाचार एजेंसी सिंहुआ ने आज दी है।  
   उल्लेखनीय है वेंग लीक्वान 1994 - 2010 तक इस क्षेत्र में पार्टी सचिव और केन्द्रीय समिति के सदस्य रहे हैं। सन् 1966 से पार्टी सदस्य हैं। ये जनाब अल्पसंख्यकों के प्रति कड़े रवैय्ये के लिए जाने जाते हैं। इनका स्थानीय संस्कृति और भाषा के प्रति पूर्वाग्रह रहा है। वेंग ने अल्पसंख्यकों के इलाके में उनकी  उईघूर भाषा के बदले मेनडेरियन भाषा को प्राइमरी स्कूलों में लागू किया और अल्पसंख्यकों की भाषा को सरकारी ऑफिसों और स्कूलों में प्रतिबंधित कर दिया।
     अल्पसंख्यकों के प्रति इस तरह के सख्त रुख के कारण जिस तरह भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को लौहपुरुष कहा जाता है उसी तरह वेंग को भी लौहपुरुष कहा जाता है।
     पश्चिम बंगाल में भी अल्पसंख्यकों की भाषा हिन्दी के प्रति माकपा के नेताओं का एक वर्ग भेदभावपूर्ण बर्ताव करता रहा है। हिन्दी की अल्पसंख्यकों की भाषा के रुप में संवैधानिक तौर पर जो व्यवस्था होनी चाहिए वह 34 साल के वाम शासन में नहीं हो पायी है।
      पश्चिम बंगाल सरकार के तहत चलने वाली पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी का 8 साल से गठन नहीं हुआ है। 15 सालों से लेखकों को पुरस्कार नहीं दिए गए हैं। 6-7 साल से एक भी मीटिंग नहीं हुई है। अकादमी के पास कोई स्थायी कर्मचारी नहीं है। राज्य सरकार ने कई वर्षों से अकादमी के किसी भी आयोजन के लिए एक भी पैसा नहीं दिया है।
     जनवादी लेखक संघ और अन्य प्रगतिशील संगठन और उनसे जुड़े लेखक जो आए दिन दिल्ली हिन्दी अकादमी और दूसरी हिन्दी संस्थाओं को लेकर बयान देते रहते हैं पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी के बारे में एक शब्द नहीं बोल रहे हैं।    
      हिन्दीभाषी लोगों के प्रति माकपा का रवैय्या किस तरह सौतेलेपन का शिकार है इसे एक ही उदाहरण से सहज ही समझा जा सकता है निकट भविष्य में राज्य में 80 नगरपालिकाओं के चुनाव होने वाले हैं। माकपा के उम्मीदवारों की सूची में 50 उम्मीदवार भी हिन्दीभाषी नहीं हैं, हां, उर्दूभाषी मुस्लिम प्रत्याशियों को कुछ सीटों पर ममता बनर्जी के मुसलमान कार्ड को काटने के लिए जरुर खड़ा किया गया है। जबकि अकेले कोलकाता में 30 लाख से ज्यादा हिन्दीभाषी रहते हैं उनमें गिनती के 1-2 उम्मीदवार हिन्दीभाषी खड़े किए गए हैं।
     जिस तरह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी हेन जाति के वर्चस्व को अन्य जातियों के खिलाफ इस्तेमाल करती रही है ठीक वैसे ही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टीँ पश्चिम बंगाल में बंगाली अंधलोकवाद का भाषायी अल्पसंख्यकों के प्रति औजार की तरह चालाकी के साथ इस्तेमाल करती रही है।
    भारत में भाजपा में हिन्दू और हिन्दी वर्चस्व को लेकर अंधलोकवादी ऱुझान है जिनके आधार पर वह भाषायी और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ आए दिन आक्रामक व्यवहार और हमले करती रही है।
       भाषायी अल्पसंख्यकों के प्रति पश्चिम बंगाल में सामान्यतौर पर दोयम दर्जे के नागरिक जैसा व्यवहार होता है। उल्लेखनीय है भाषायी अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैय्या सोवियत संघ से लेकर यूगोस्लाविया तक, चैकोस्लोवाकिया से चीन तक समाजवाद का साझा फिनोमिना है। यह फिनोमिना पश्चिम बंगाल में भी खूब फलफूल रहा है। बांग्ला अंधलोकवाद के कारण आज बंगाली जाति और बांग्ला भाषा के प्रति असम,उड़ीसा, झारखण्ड में उग्र प्रतिक्रियाओ का चक्र चल रहा है। भाषायी अंधलोकवाद अंततः राष्ट्रीयस्तर पर राजनीतिक तौर पर अप्रासंगिक बनाता है और सामाजिक विभाजन पैदा करता है काश हमारे यहां यह बीमारी न आयी होती ?    






सोमवार, 31 अगस्त 2009

खाद्य आंदोलन की स्‍मृति‍ और वाममोर्चे के कार्यभार

वाममोर्चा ने पश्‍चि‍म बंगाल 31 अगस्‍त के दि‍न खाद्य आंदोलन की याद में शानदार रैली की। इस रैली को लेकर तरह -तरह का टीवी कवरेज था,चैनलों में जमकर इस रैली के तात्‍कालि‍क राजनीति‍क अर्थों को खोलने की कोशि‍श की गयी। हमेशा की तरह बांग्‍ला चैनल राजनीति‍क आधार पर बंटे हुए थे,चैनलों का इस रैली को लेकर सामयि‍क राजनीति‍क नफा नुकसान खोजना बेतुका प्रयास ही कहा जाएगा। कायदे से खाद्य आंदोलन को लेकर वाममोर्चे की यह नयी पहल नहीं थी, फर्क इतना भर था पहले छोटा जलसा करते थे इसबार बड़ा जलसा कि‍या । इस जलसे में वोट के संदर्भ अर्थ खोजना बेवकूफी होगी। आज से ठीक पचास साल पहले वि‍धानचन्‍द्र राय के शासनकाल के दौरान तकरीबन तीन लाख लोगों की एक रैली आज के सभा स्‍थल के पास के मैदान में हुई थी ,उस रैली में भाग लेने वाले लोग अपने लि‍ए अन्‍न की मांग कर रहे थे, उस समय पश्‍चि‍म बंगाल में गांवों में गंभीर खाद्य संकट था और तत्‍कालीन राज्‍य सरकार इससे नि‍बटने में बुरी तरह वि‍फल रही थी। गरीबों की उस रैली पर तत्‍कालीन प्रशासन के इशारे पर पुलि‍स ने नृशंस लाठीचार्ज कि‍या और आंसूगैस के गोले छोडे,कहने के लि‍ए पुलि‍स ने गोली नहीं चलायी थी,लेकि‍न बर्बर लाठीचार्ज के कारण 80 लोग मारे गए,हजारों घायल हुए और 27 हजार से ज्‍यादा लोगों ने गि‍रफ्तारी दी।मामला उसी दि‍न शांत नहीं हुआ बाद में कई दि‍नों तक रैली में भाग लेने वालों पर वि‍भि‍न्‍न इलाकों में जुल्‍म चलता रहा। इस घटना में मारे गए शहीदों की स्‍मृति‍ में आज इस घटना के पचास साल होने पर वि‍शाल जनसभा का वाममोर्चे ने आयोजन कि‍या था,यह आयोजन नि‍श्‍चि‍त रूप से प्रशंसनीय प्रयास कहा जाएगा।
वाममोर्चे के नेता अच्‍छी तरह जानते हैं कि‍ हाल के लोकसभा चुनाव में हुई भारी पराजय और व्‍यापक स्‍तर पर जनता से कटाव को इस तरह के आयोजन से भरना संभव नहीं है। वामनेता यह भी अच्‍छी तरह जानते हैं कि‍ राज्‍य में व्‍यापक पैमाने पर गरीबी और भुखमरी फैली हुई है। राज्‍य में खाद्य उत्‍पादन में वि‍गत तीन सालों में गि‍रावट आयी है, चायबागानों में पि‍छले दि‍नों भुखमरी के कारण एक हजार से ज्‍यादा लोग मौत के मुंह में जा चुके हैं। यह भी एक वास्‍तवि‍कता है कि‍ वि‍गत 35 सालों में पश्‍चि‍म बंगाल में भुखमरी का भी राजनीति‍क बंटबारा हुआ है,केन्‍द्र की जि‍तनी भी योजनाएं गरीबों के लि‍ए हैं वे नौकरशाही और दलीय स्‍वार्थ की बलि‍ चढ चुकी हैं। गरीब को राजनीति‍क दलों के साथ नत्‍थी कर दि‍या गया है। वामदल अपने समर्थक को ही केन्‍द्र सरकार की योजनाओं के लाभ देना चाहते हैं,इसी तरह जहां तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस का वर्चस्‍व है वहां पर वे भी सि‍र्फ अपने ही समर्थक गरीबों को योजनाओं के लाभ देना चाहते हैं। तेरा गरीब मेरा गरीब की बंदरबांट के कारण राज्‍य में खाद्य का पर्याप्‍त भंडार होने के बावजूद सही वि‍तरण व्‍यवस्‍था को राज्‍य सरकार अभी तक सुनि‍श्‍चि‍त नहीं कर पायी है। वाममोर्चे को कायदे से आज के दि‍न यह प्रति‍ज्ञा करनी चाहि‍ए कि‍ गरीबों के लि‍ए केन्‍द्र सरकार की सभी योजनाओं को पक्षपात और भेदभाव के बि‍ना लागू कि‍या जाएगा,इस काम में नौकरशाही और पार्टीतंत्र को आड़े नहीं आने दि‍या जाएगा। वाममोर्चे को आज के अवसर पर ज्‍योति‍ बसु के द्वारा भेजे संदेश में नि‍हि‍त राजनीति‍क संदेश को भी गंभीरता से लेना होगा। वाममोर्चा जनता से कट चुका है, जनता का दि‍ल जीतने के लि‍ए अपनी गलति‍यों को उसे खुले मन से आम लोगों के बीच में जाकर स्‍वीकार करना चाहि‍ए और उन तमाम नि‍हि‍तस्‍वार्थी और अपराधी तत्‍वों को पार्टी से अलग करना चाहि‍ए जि‍नकी आम जनता में छवि‍ खराब है। खाद्य आंदोलन का वाममोर्चे के लि‍ए एक ही सबक है कि‍ राज्‍य में कोई व्‍यक्‍ति‍ भूख से नहीं मरेगा। दुर्भाग्‍य की बात यह है कि‍ वाममोर्चे ने इस सबक को अभी सीखा नहीं है, 35 साल के शासन के बावजूद वि‍तरण प्रणाली को दुरूस्‍त नहीं कि‍या है,गरीबों के खि‍लाफ पक्षपात करने वाले लोगों को चाहे वे कि‍सी भी दल के हों, उन्‍हें कानून के हवाले नहीं कि‍या है। यदि‍ वाम मोर्चा आगामी दि‍नों में यह सब कर पाता है तो नि‍श्‍चि‍त तौरपर राज्‍य की जनता वाम को अपना प्‍यार देगी,दूसरी बात यह कि‍ वाम को वि‍पक्ष को अपमानि‍त करने अथवा नीचा दि‍खाने वाली क्षुद्र राजनीति‍ से अलग करना होगा। आज वि‍पक्ष के पास वाम से ज्‍यादा जनसमर्थन है कि‍सी भी कि‍स्‍म की अपमानजनक अथवा उपहासजनक टि‍प्‍पणी वाम के लि‍ए नुकसान कर सकती है। वाम नेताओं को यह बात सोचनी चाहि‍ए कि‍ अपनी खोई हुई साख वे कैसे अर्जित करते हैं ? ममता बनर्जी को व्‍यक्‍ति‍गत नि‍शाना बनाने की रणनीति‍ बुरी तरह पि‍ट चुकी है,उससे ममता को लाभ मि‍ला है। वाम को अपनी नीति‍ और व्‍यवहार में साम्‍य पैदा करना होगा। इस संदर्भ में उन्‍हें अभी काफी कुछ करना बाकी है, महज एक दो रैली से वाम मोर्चे के प्रति‍ जनता का वि‍श्‍वास वापस नहीं आएगा। वाम की रैली में पहले भी ज्‍यादा लोग आते थे इसके बावजूद वाम का लोकसभा चुनाव में सफाया हो गया,रैली को जनप्रि‍यता का मानक नहीं बनाएं। जनता के बीच में राज्‍य प्रशासन की अकर्मण्‍य प्रशासन की छवि‍ को जब तक दुरूस्‍त नहीं कि‍या जाता तब तक रैलि‍यों को राजनीति‍क पूंजी में तब्‍दील नहीं कि‍या जा सकता।

सोमवार, 17 अगस्त 2009

लालगढ़ में पुलि‍स की नौटंकी और उत्‍साही जनता

लालगढ़ में आज एकबार फि‍र नाटक हुआ और छत्रधर महतो अपनी जनसभा करने में सफल रहा। मजेदार बात यह है कि‍ राज्‍य सरकार उसकी गि‍रफ्तारी का हुकुम दे चुकी है , इसके बावजूद उसे पकड़ा नहीं गया है, और आज लालगढ में 'पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी' के आह्वान पर जनसभा थी ,जहां जनसभा होने वाली थी वहां पुलि‍सबलों ने पहले से ही जाकर कब्‍जा जमा लि‍या और जनसभा के मंच को उखाड़ फेंका। इसका इलाके की जनता पर कोई असर नहीं पड़ा ,अर्द्धसैनि‍क बलों ने दहशत पैदा करने के लि‍ए कई राउण्‍ड गोलि‍यां भी चलाई उससे भी लोग नहीं डरे और अंत में लोग सभास्‍थल से कुछ दूर जमा होने लगे और उन्‍होंने अपनी जनसभा भी कि‍ और उनके नेता छत्रधर महतो ने जमकर भाषण भी दि‍या । बाद में प्रेस से भी बातें कीं।
इस प्रसंग में यह सवाल उठता है जब पुलि‍स को कोई कार्रवाई ही नहीं करनी थी तो धारा 144 लगाने का क्‍या अर्थ है ? दूसरी बात यह कि‍ जब छत्रधर महतो को पकड़ना ही नहीं था तो गि‍रफ्तारी का आदेश जारी करने क्‍या अर्थ है ? तीसरी बात , जब पुलि‍सबलों को जनसभा को रोकना ही नहीं था तो इलाके के लोग जहां पर सभा करना चाहते थे उन्‍हें सभा करने देनी चाहि‍ए थी, यदि‍ प्रशासन का मानना था कि‍ जनसभा से परेशानी बढ़ सकती है तो फि‍र दूसरी जगह भी जनसभा को रोकना चाहि‍ए था। समग्रता में देखें तो पुलि‍स ने जनसभा करने दी और छत्रधर महतो को गि‍रफ्तारी भी नहीं कि‍या,ऐसी अवस्‍था में राज्‍य प्रशासन को गंभीरता के साथ 'पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी' के लोगों के साथ बातचीत आरंभ करनी चाहि‍ए और अति‍रि‍क्‍त पुलि‍सबलों को इस इलाके से हटा लेना चाहि‍ए।
थाने,पंचायत,वीडि‍ओ ऑफि‍स आदि‍ का इलाके में सुचारू रूप से काम चलना चाहि‍ए और जनता से मुठभेड़ से जि‍स तरह प्रशासन बचता रहा है यह उसकी सही नीति‍ है इस नीति‍ की संगति‍ में ही आन्‍दोलनकारि‍यों की मांगे मानकर सारे मामले को जि‍तना जल्‍दी हो सके सि‍लटा देना चाहि‍ए।
इसी प्रसंग में आज दि‍ल्‍ली में हुई मुख्‍यमंत्रि‍यों की बैठक का जि‍क्र करना भी समीचीन होगा।उल्‍लेखनीय है पश्‍चि‍म बंगाल के मुख्‍यमंत्री फ्लू से पीडि‍त होने के कारण दि‍ल्‍ली नहीं जा पाए, किंतु राज्‍य सरकार को उनकी अनुपस्‍थि‍ति‍ में कम से कम कि‍सी केबीनेट मंत्री को राज्‍य का पक्ष रखने के लि‍ए जरूर भेजना चाहि‍ए था। राज्‍य सरकार ने मुख्‍यमंत्रि‍यों की बैठक को गंभीरता से नहीं लि‍या है उसने मुख्‍यमंत्री की अनुपस्‍थि‍ति‍ में कि‍सी भी मंत्री को नहीं भेजकर सही राजनीति‍क समझ का परि‍चय नहीं दि‍या है,क्‍या यह भूल माकपा नेतृत्‍व के इशारे पर की गयी है ? राज्‍य सरकार ने अपने बड़े अधि‍कारि‍यों को इस बैठक में भेजकर यह संदेश भी दि‍या है कि‍ राज्‍य में इन दि‍नों राजनीति‍क मंदी छायी हुई है। मुख्‍यमंत्रि‍यों की बैठक में केरल के मुख्‍यमंत्री भी नहीं आए किंतु उन्‍होने अपनी एवज में एक जि‍म्‍मदार मंत्री को बैठक में भेजा। बुद्धदेव प्रशासन इतनी बड़ी भूल क्‍यों कर बैठा इसे कि‍सी भी तर्क से समझना मुश्‍कि‍ल है।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

महामहि‍म राज्‍यपाल: ताकत के खि‍लाफ शांति‍ के पक्ष में

पश्‍चि‍म बंगाल के राज्‍यपाल महामहि‍म गोपालकृष्‍ण गांधी ने कल रात को दस बजे प्रेस के लि‍ए वि‍ज्ञप्‍ति‍ जारी की है जि‍समें उन्‍होंने बड़े ही मार्के की बात कही है। अपने बयान के आरंभ में ही महामहि‍म ने एक उद्धरण दि‍या है जि‍समें कहा गया है कि‍ हमारी जमीन पर पुनर्नि‍र्माण और आशा का उदय तब तक नहीं होगा जब तक ताकत के सभी रूपों की पूजा समाप्‍त नहीं कर देते। काम के आधार पर प्रति‍ष्‍ठि‍त करें हिंसा के आधार पर नहीं। महामहि‍म के पत्र में यह उद्धरण मारक है।
पश्‍चि‍म बंगाल का मौजूदा परि‍दृश्‍य भयावह है ,गांवों में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही। महामहि‍म ने लि‍खा है लोकसभा चुनाव के बाद राज्‍य में चारों ओर राजनीति‍क हिंसा का ताण्‍डव चल रहा है। कोई दि‍न ऐसा नहीं जाता जि‍स दि‍न कि‍सी न कि‍सी की राजनीति‍क हत्‍या की खबर न आती हो।प्रति‍दि‍न वि‍धवाओं की संख्‍या बढ़ती जा रही है। महामहि‍म ने अपने पत्र में यह भी लि‍खा है कि‍ मुझसे वाममोर्चा,कांग्रेस,तृणमूल कांग्रेस सभी के प्रति‍नि‍धि‍मंडल आकर मि‍ल गए हैं सवाल उठता है कि‍ जब इन सभी दलों का साझा लक्ष्‍य है हिंसा खत्‍म हो तो हिंसा थम क्‍यों नहीं रही है।
इसके जबाव में राज्‍यपाल ने लि‍खा है पश्‍चि‍म बंगाल में तीन तरह की राजनीति‍क आग जल रही है। राज्‍य के राजनीति‍क नेताओं की यह जि‍म्‍मेदारी है कि‍ वे इस आग को बुझाएं। वे अपने समर्थकों और सदस्‍यों से कहें कि‍ वे इस आग को बुझाएं। वे हिंसा से उत्‍तेजि‍त न हों और उत्‍तेजि‍त न करें। जि‍ससे और हिंसा भड़के। यह उनकी जि‍म्‍मेदारी है वे अपने संगठन के अंदर हिंसा को रेखांकि‍त करें और उससे कानून के जरि‍ए नि‍बटें। राज्‍यपाल ने मांग की है कि‍ राज्‍य में अवैध हथि‍यारों के फि‍नोमि‍ना पर तेजी से रोक लगायी जाए। हिंसा करने वालों को कानून के हवाले कि‍या जाए। आम जनता में भरोसा पैदा कि‍या जाए कि‍ उनकी राजनीति‍ और सुरक्षा एक दूसरे से जुड़े नहीं हैं।
राज्‍यपाल के इस पत्र को राज्‍य सरकार को गंभीरता से लेना चाहि‍ए और इस दि‍शा में ठोस कदम उठाने चाहि‍ए। इस प्रसंग में सबसे मुश्‍कि‍ल बात है राजनीति‍क दलों को हिंसा को त्‍यागने के लि‍ए तैयार करना। राज्‍य के तीनों राजनीति‍क धड़े (वाम मोर्चा,कांग्रेस,तृणमूल कांग्रेस) हिंसा का अपने -अपने इलाकों में सहारा ले रहे हैं। राजनीति‍क हिंसा में खुलेआम राजनीति‍क दलों की हि‍स्‍सेदारी ने राज्‍य के समूचे वातावरण को असुरक्षा और भय से भर दि‍या है।
राजनीति‍क हिंसा बंद हो इसके लि‍ए सबसे पहले माकपा को ही कदम उठाना होगा और तृणमूल कांग्रेस को यह सुनि‍श्‍चि‍त करना होगा कि‍ वह शांति‍ के माहौल को इलाका दखल के बहाने हिंसा में तब्‍दील न करे। मुश्‍कि‍ल यह है कि‍ ज्‍यों ही कि‍सी इलाके में हिंसा थमती है दूसरा दल इलाके में रहने वाले अन्‍य पार्टी के लोगों को दल छोड़ने के लि‍ए दबाव ड़ालना शुरू कर देता है। यदि‍ व्‍यक्‍ति‍ दल नहीं छोड़ता तो उसे सीधे नि‍शाना बनाकर हत्‍या कर दी जाती है अथवा गांव से बेदखल कर दि‍या जाता है। यह इलाका दखल और अन्‍य राजनीति‍क दल को नेस्‍तनाबूद करने वाला फि‍नोमि‍ना लंबे समय से चल रहा है। पहले इसका वाम ने लाभ उठाया था अब वि‍पक्ष लाभ उठा रहा है और राजनीति‍क हिंसाचार करने में लि‍प्‍त है।
सभी राजनीति‍क दलों को इलाका दखल और राजनीति‍क तानाशाही के भाव को त्‍यागना होगा इसके बि‍ना पश्‍चि‍म बंगाल में शांति‍ नहीं लौटेगी। राज्‍य में शांति‍ का माहौल नहीं लौटने का एक और बड़ा कारण है वे पुराने जमींदार जि‍नकी जमीनें वाम सरकार ने गरीबों में बांट दी थीं और अब वे जमींदारवर्ग के लोग वि‍पक्ष के साथ एकजुट होकर अपने राजनीति‍क बदले ले रहे हैं। यदि‍ गंभीरता के साथ मरने वालों की सामाजि‍क और जाति‍ हैसि‍यत देखें तो यह फि‍नोमि‍ना से समझ में आएगा कि‍ पश्‍चि‍म बंगाल की ग्राम्‍य हिंसा में वर्गीय टकराव भी चल रहा है। इसका माओवादि‍यों से लेकर तृणमूल कांग्रेस तक सभी लाभ उठाने की कोशि‍श में हैं।
साधारण ग्रामीण जो कि‍सी भी पार्टी का सदस्‍य हो उसे संभवत: यह राजनीति‍क दलीय हिंसा दि‍ख सकती है, मीडि‍या के लि‍ए दलीय जंग है। राज्‍यपाल साहब के लि‍ए यह ताकत का खूनी खेल है। व्‍यापक परि‍प्रेक्ष्‍य में देखें तो यह वर्गीय हिंसा है और वाम मोर्चे की पकड़ जि‍तनी कमजोर होगी,यह हिंसा बढेगी घटेगी नहीं। पुराने जमींदारवर्ग के लोगों ने अपने को नए रूपों में संगठि‍त कर लि‍या है और वे आक्रामक मुद्रा में हैं। इसके लि‍ए बहुस्‍तरीय योजना बनानी होगी।
राज्‍य प्रशासन कानून का शासन स्‍थापि‍त करे, वाममोर्चा अपना राजनीति‍क काम करे और जनता को गोलबंद करे। वाममोर्चे में नंदीग्राम के घटनाक्रम के बाद से राजनीति‍क पस्‍ती छायी हुई है। राजनीति‍क पस्‍ती और अवसाद से माकपा और वाममोर्चा बाहर नहीं नि‍कलता है तो गरीब जनता की अपूरणीय क्षति‍ हो जाएगी और इसके बाद पश्‍चि‍म बंगाल की जनता वाम मोर्चे को कभी माफ नहीं करेगी।
वाम मोर्चे को यह भी समझना होगा कि‍ वाम की शक्‍ति‍ जनता में है हथि‍यारों और हिंसाचार में नहीं। सन 1977 में वाममोर्चा हिंसा का वि‍रोध करके शांति‍ का संदेश लेकर आया था। गुंडे़,हथि‍यारबंद गि‍रोह,दादा कभी भी माकपा और वाम की शक्‍ि‍त नहीं थे,सन 1977 के पहले मरकर वाम के कार्यकर्त्‍ताओं ने जनता का दि‍ल जीता था, मारकर नहीं।
कांग्रेस के हत्‍यारे गि‍रोहों को अभी लोग भूले नहीं हैं। गलती यह हुई है कि‍ वाम मोर्चा खासकर माकपा के सांगठनि‍क ढ़ांचे में अपराधी तत्‍वों,बमबाजों और असामाजि‍क तत्‍वों ने व्‍यापक रूप में शरण ले ली है और माकपा इनके साथ अपनी दूरी बरकरार रखने में असफल रही है। यही वह कमजोर कड़ी है जहां से राजनीति‍क हिंसा पैदा हो रही है,माकपा को अपनी इस कमजोर कड़ी को काटकर फेंकना होगा, इसके कारण चाहे जि‍तनी बड़ी राजनीति‍क क्षति‍ क्‍यों न उठानी पड़े। माकपा के लि‍ए राज्‍य की जनता के हि‍त सबसे पहले आते हैं, गुण्‍डों और अपराधी तत्‍वों के हि‍तों से उसे अलग करना होगा। तब ही सही मायने में शांति‍ का वातावरण भी बन पाएगा।

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