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रविवार, 7 अगस्त 2016

रवीन्द्रनाथ से क्या सीखें -

सात अगस्त 1941 को रवीन्द्रनाथ टैगोर की मृत्यु हुई ,यानी आज का दिन हम भारतवासियों के लिए स्मरणीय दिन है।इसदिन हमारा एक महान लेखक इस धरती पर अजस्र सुंदर सपने देकर चला गया। मनुष्य की सत्ता, स्वतंत्रता और इच्छा के महान प्रवक्ता थे टैगोर।टैगोर आज भारत के जनमानस की शक्ति हैं।आमतौर पर टैगोर को कवि के रूप में ही देखने की आदत है,लेकिन वे जितने बड़े कवि थे,उससे बड़े विचारक भी थे। उनसे सीखने लायक कुछ विचार।

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है "फूल जब खिल उठता है तब मन में यही आता है कि जैसे फूल ही पेड़ का एक-मात्र लक्ष्य हो-उसका सौंदर्य,उसकी सुगन्ध ऐसी होती है कि लगता है जैसे वनलक्ष्मी की साधना चरम धन हो।लेकिन यह बात छिपी रह जाती है कि वह फूल लगने का केवल एक उपलक्ष्य है-वह वर्तमान के गौरव में ही प्रसन्न रहता है,भविष्य उसे अभिभूत नहीं करता।"

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ' मैं क्षुद्र व्यक्ति जब अपनी एक क्षुद्र बात कहने के लिए चंचल हो उठा था तब न जाने किसने मेरा हौसला बढ़ाकर कहा, ''कहो-कहो,अपनी बात ही कहो। उसी बात के लिए लोग टकटकी लगाए देख रहे हैं।" ' आज यही सबक है कि हम अपनी बात बेधड़क कहें।

´हमारे बचपन में भोग-विलास का सरंजाम नहीं था।इतना कहना काफी होगा। मोटे रूप में तब की जीवन-यात्रा आज की तुलना में कहीं ज्यादा सीधी-सादी थी। ...हमारे घर में तो विशेष रूप से लड़कों की देख-रेख या ले- लपक करना एकदम नहीं था।...ले-लपक वाली बात अभिभावकों के अपने सन्तोष के लिए उनकी तृप्ति के लिए होती है...बच्चों के लिए नहीं।´

´मैं पहले ही कह आया हूँ कि उन दिनों छोटे-बड़े के बीच आवा-जाही के लिए पुल न था,लेकिन इन सब पुराने कायदों की भीड़ में ज्योति दा बिलकुल विशुद्ध नया मन लेकर आये थे। मैं उनसे बारह बरस छोटा था। मुझे इसी का आश्चर्य है कि उम्र की इतनी बड़ी दूरी के बावजूद मुझ पर उनकी नजर कैसे पड़ी। और भी आश्चर्य की बात यह है कि बातचीत में उन्होंने कभी अपने बडप्पन के मारे मेरा मुँह बन्द करने की कोशिश नहीं की। इसीलिए कोई भी बात सोचने में मुझे साहस का अभाव न होता। आज बच्चों के बीच ही में रहता हूँ। पाँच तरह की बातें कहता हूँ और उनका मुँह बन्द देखता हूँ।बात पूछने में डर लगता है। मैं समझ सकता हूँ ,यह लोग सब उन्हीं बूढ़ों के जमाने के बच्चे हैं जिस जमाने के बड़े लोग बात कहते थे और छोटे लोग गूंगों की तरह बैठे रहते थे। बात पूछने का साहस नये जमाने के बच्चों का है और बूढ़ों के जमाने के बच्चे सब कुछ सिर झुकाकर मान लेते थे।" सबक यह कि हम अपने बच्चों को निर्भय होकर बोलने दें।

हमारे बीच अनेक ऐसे लोग हैं जो बेकार की बातें करना पसंद नहीं करते और हमेशा ज्ञान चर्चा में डूबे रहते हैं। वे यही चाहते हैं कि पढ़े लिखे लोगों को हमेशा गंभीर रहना चाहिए। बेकार की बातों पर समय खर्च करने को वे फिजूल में समय की बर्बादी समझते हैं। इस तरह के लोगों को और इनके तर्कों को ध्यान में ऱखकर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा ,' आदमी की असली पहचान दूसरे खर्चों से ज्यादा उसके बेकार के खर्चों से होती है, क्योंकि आदमी खर्च करता है बँधे हुए नियमों के अनुसार ,फिजूलखर्ची करता है अपने मन से। जैसे बेकार खर्चा होता है वैसे ही बेकार बात भी होती है।बेकार बात में ही आदमी पकड़ में आता है। उपदेश की बात जिस रास्ते से चलती है वह मनु के समय से बँधा हुआ है; काम की बात जिस रास्ते से अपनी बैलगाड़ी ठेलकर ले जाती है वह रास्ता कामकाजी लोगों के पैंरों से रौंदा जाकर तृण-पुष्प-शून्य हो गया है।बेकार बात अपने ढ़ंग से कहनी ही पड़ती है।' टैगोर ने लिखा ' जो आदमी कहने के लिए कोई खास बात न रहने पर कुछ कह ही नहीं सकता,बोलेगा तो वेदवाक्य;नहीं तो चुप बैठा रहेगा,हे चतुरानन,उसकी कुटुम्बिता,उसका साहचर्य,उसका पड़ोस ' शिरसि मा लिख मा लिख मा लिख ‍!'



मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

संसद में गुमशुदा साहित्यविवेक




       
संसद में “असहिष्णुता” पर बहस चल रही है। यह वह “असहिष्णुता” नहीं है जिसे कॉमनसेंस में हम लोग कहते –सुनते हैं। यह वह भी “असहिष्णुता” नहीं है जिसे राजनीतिक दल आंकड़े दे-देकर व्याख्यायित कर रहे हैं। “असहिष्णुता” के सवाल को राजनीतिकदलों या दल विशेष ने नहीं उठाया,बल्कि लेखकों-बुद्धिजीवियों और वैज्ञानिकों ने उठाया है।ये सब वे लोग हैं जो दलीय राजनीति और कॉमननसेंस के आधार पर “असहिष्णुता” को नहीं देख रहे हैं ,बल्कि अपने सर्जनात्मक कर्म के खिलाफ सामने खड़ी ठोस राजनीतिक-सामाजिक चुनौती के रुप में देख रहे हैं। अफसोस की बात है कि अधिकतर सांसदों ने एक-दूसरे के खिलाफ हिंसा-अपराध के आंकड़े और आख्यान पेश करके यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि “हम ठीक ,तुम गलत।”
    सभी राजनीतिक दलों का यह मानना “हम तो ठीक हैं तुम गलत हो”,यही समूची बहस का मूलाधार है। जबकि लेखकों ने “असहिष्णुता” के सवाल को “हम” और “तुम” की कोटि में रखकर नहीं उठाया,बल्कि वे तो भारतीय समाज में निरंतर बढ़ रही “असहिष्णुता” को एक प्रक्रिया के रुप में देख रहे हैं,उन्होंने उसके हाल के महिनों में तेज होने और ज्यादा आक्रामक हो जाने की ओर ध्यान खींचा है,लेखकों ने किसी दलविशेष को भी इसके लिए दोषी नहीं ठहराया है। वे तो सिर्फ इतनी मांग कर रहे हैं कि केन्द्र सरकार इस ओर ध्यान दे, अभिव्यक्ति की आजादी पर हो रहे हमलों को रोकने के लिए कदम उठाए।

मुश्किल यह है कि लेखक- बुद्धिजीवी-वैज्ञानिकों के लिए "असहिष्णुता" का जो अर्थ है वह राजनेता समझ नहीं सकते,यह बात आज संसद की कार्रवाई देखकर समझ में आ गयी, लेखक और राजनेता की असहिष्णुता की धारणा,अनुभूति और मंशाएं अलग हैं,संसद में बेहतर होता कि लेखकों के बयान पढे़ जाते ,लेखक बोलते और सत्ताधारी सुनते।लेकिन हुआ उलटा लेखक की भावनाओं को दरकिनार करके राजनेताओं की भावनाएं केन्द्र में आ गयीं,यह तो लेखकों के द्वारा उठाए विषय के साथ संसद का अन्याय है,

राजनाथजी ! कल संभवतः आप सांसदों की बहस का जवाब दें।आपको यह तो पता चल ही गया है कि लेखक और राजनेता या सामान्य नागरिक के दिल,अनुभूतियां और अभिव्यक्ति के धरातल अलग - अलग होते हैं, लेखक के पास राजनेता और नागरिक से ज़्यादा विकसित चेतना और अभिव्यक्ति योग्यता होती है,यही वजह है कि वह साहित्य सृजन कर पाता है।राजनेता-सत्ताधीश अल्पकाल में मर जाता, सत्ताधीश के बयान जन्म लेते ही मर जाते हैं, जबकि साहित्य नहीं मरता , साहित्यकार नहीं मरता। बल्कि उलटा होता है, साहित्यसृष्टि करके लेखक नया जन्म लेता है।जबकि नेता का अंत है बोलना।आजतक कोई राजनेता बोलकर अमर नहीं हुआ !

राजनीति और राजनेता अल्पजीवी और बांझ हैं।जबकि साहित्य-कला और विज्ञान दीर्घजीवी और सृजनशील हैं।समाज में विगत दो हजार सालों में कई राजसत्ता आई और गई, कई व्यवस्थाएं भी बदलीं,उनकी भूमिका बदली,लेकिन वे हमेशा अल्पकालिक और सीमित दायरे में ही असर छोड़ पाए,इसके विपरीत लेखकों-कलाकारों-वैज्ञानिकों के सृजन ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी समाज को प्रभावित किया है।

इनदिनों राजनेता अपने दल के हित देखता है,वोटबैंक देखता है।जबकि लेखक के लिए समाज के हित सर्वोपरि हैं। मानव सभ्यता का इतिहास गवाह है कि लेखक स्वभाव से समाज में प्रगतिशील भूमिका निभाते रहे हैं,वे ऐसे सवाल उठाते रहे हैं जो सत्ता को पसंद नहीं रहे,सत्ता की खुशामद करना,सत्तामोह में रहना साहित्य का धर्म नहीं है। साहित्य और साहित्यकार हमेशा से रचनाओं के जरिए सभी किस्म के मोह से मुक्त करके मोहमुक्त समाज की सृष्टि करते रहे हैं। सत्ता का मोह हो या निहित-स्वार्थों का मोह हो ये सब कला-साहित्य आदि के विकास में हमेशा से बाधक रहे हैं,लेखकों ने अपने सर्जनात्मक तरीकों के जरिए इन सबसे अपने को हमेशा मुक्त किया है।अपने आत्मसंघर्ष के जरिए बार-बार साहित्य और कलाओं को समाज की मुक्ति के मार्ग पर ठेला है,हमेशा उन समस्याओं का सामना किया है जो उनके सृजन में बाधक बनकर खड़ी हुई हैं।

आज संसद की बहस देखकर यह धारणा फिर से पुष्ट हुई कि इनदिनों अधिकतर राजनेता साहित्य-कलाबोध और साहित्यचेतना के अभाव के कारण लेखकीय अनुभूति से वंचित हैं।बेहतर तो यह होता कि बुद्धिजीवीसांसदों को असहिष्णुता की बहस में शामिल करके कलाकारों के मन को संसद महसूस करती।आज संसद में असहिष्णुता के सवाल पर जो बहस हुई वह प्रतिवादी साहित्यकारों की अनुभूतियों से कोसों दूर थी। इस बहस में लेखकों का मन और दिल कहीं पर भी नजर नहीं आया।जबकि लेखक भयाक्रांत है,तीन लेखकों की हत्या हो चुकी है,हत्यारों को केन्द्र सरकार में काबिज अनेक राजनेताओं और दल विशेष का समर्थन हासिल है यही वजह है केन्द्र सरकार से बार-बार लेखकों ने हस्तक्षेप की अपील की है।अफसोस की बात है कि केन्द्र सरकार और उसके मुखिया जरा-जरा सी बात पर ट्विट करते रहते हैं,बयान देते रहते हैं ,लेकिन लेखकों के बयान को उन्होंने कभी शिद्दत के साथ,सहानुभूति के साथ समझने की कोशिश नहीं की,उलटे मंत्रियों से लेकर सांसदों तक सभी ने लेखकों पर हमले किए हैं, “इनाम वापसी” को राजनीतिक खेल कहा है। यह सब करके केन्द्र सरकार ने अपनी कलाविरोधी इमेज को ही पेश किया है।

कलाकारों और लेखकों के प्रति केन्द्र सरकार की असहिष्णुता का कारण मेरी समझ से परे है। भाजपा को जब एक बार केन्द्र में सरकार बनाने का मौका मिल गया तो उसके बाद पीएम,मंत्रियों और सांसदों को सारे देश के प्रतिनिधि के रुप में,सरकार को सारे देश की सरकार के संरक्षक और संचालक के रुप में काम करना चाहिए। लेकिन ऐसा न करके लेखकों-बुद्धिजीवियों पर जिस तरह के वैचारिक हमले किए गए हैं, वह शर्मनाक है।सत्ताधारी दल भाजपा ने “असहिष्णुता” की भावना को दलीय पूर्वाग्रहों और हिंसा के अनंत आंकड़ों के बहाने दरकिनार करने की घृणित कोशिश की है,इसे शासकदल का घटिया आचरण ही कहा जाएगा। शासकदल के सांसद एक-दूसरे के खिलाफ तर्कवारिधि बनने के चक्कर में भूल ही गए कि “असहिष्णुता” का सवाल हिंसा के आंकड़ों से नहीं जुड़ा बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी और उस पर हो रहे हमलों से जुड़ा है। ये हमले विभिन्नदलों के लोग करते रहे हैं,इसलिए इसे दलीय नजरिए से नहीं संवैधानिक नजरिए से,अभिव्यक्ति की आजादी के नजरिए से देखा जाना चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी पर हो रहे हमले मात्र कानून-व्यवस्था की खराब अवस्था की देन नहीं है,वह इस समस्या का एक पहलू है,लेकिन असल पहलू है राजनीतिक।

लेखकों पर राजनीति विशेष के लोग ही हमले ज्यादा कर रहे हैं। यह कौन सी राजनीति है जो लेखकों को निशाना बना रही है ? यह वह राजनीति है जिसे सर्वसत्तावाद से मोहब्बत है,जिसे लंपट पालने और लंपटसमाज बनाने में दिलचस्पी है।यह वह राजनीति है जिसमें अपनी आलोचना सुनने-देखने का धैर्य नहीं है।लोकतंत्र में अधीर राजनीति सबसे खराब राजनीति मानी जाती है,अधीर राजनेता हमेशा शार्टकट हथकंडे अपनाते हैं और लेखकों-बुद्धिजीवियों को निरंतर विभिन्न तरीकों के जरिए आतंकित करके रखते हैं।यदि विभिन्न राजनीतिकदल अपने इस राजनीतिक रवैय्ये को बदल लें तो बेहतर होगा।लेखक मात्र इतना ही चाहता है।

बार-बार यह सवाल उठा है कि पहले क्यों नहीं बोले ? लेखक पहले भी बोले हैं,लेकिन सूचना क्रांतिजनित औसतविवेक और सत्ताधारी दल के आक्रामक मीडिया प्रचार ने ऐसा आभास पैदा करने की कोशिश की है कि लेखक-बुद्धिजीवी पूर्वाग्रह से घिरे हैं,मोदी विरोधी हैं,इसलिए सरकार को घेरने के लिए यह सब कर रहे हैं।

असहिष्णुता के खिलाफ “इनाम वापसी” का सरकार को घेरने के साथ कोई संबंध नहीं है। इसका वोट की राजनीति से भी कोई संबंध नहीं है।यह सीधे समाज में बढ़ रही असहिष्णुता का मामला है जिसको लेकर लेखक-बुद्धिजीवी “इनाम वापसी” की मुहिम के जरिए ध्यान खींचना चाहते हैं,वे इस सोए हुए समाज को जगाना चाहते हैं जो लेखकों पर हो रहे हमलों को लेकर एकदम बेगाना बना हुआ है।“इनाम वापसी” के प्रतिवाद के बहाने लेखक न तो किसी का अपमान कर रहे हैं,न किसी के वोट काट रहे हैं और न किसी नेता विशेष या दल विशेष के खिलाफ बयान दे रहे हैं,बल्कि वे तो मात्र समाज से लेकर संसद तक यही संदेश दे रहे हैं कि देश में चारों ओर असहिष्णुता बढ गयी है और हम सबको मिलकर इसके खिलाफ एकजुट होना चाहिए।

केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार हो या राजनीतिक दल हों, यह सभी की जिम्मेदारी है कि वे लेखकों के सम्मान और संवैधानिक हकों की रक्षा के मामले में एक स्वर से लेखकों के साथ एकजुटता दिखाएं। यह समय लेखकों –बुद्धिजीवियों पर हमला करने का नहीं है,बल्कि उन लोगों पर हमला करने का है जिनलोगों या संगठनों ने लेखकों को निशाना बनाया हुआ है।

राजनीतिक दलों को लेखकों से मनवांछित लेखन की मांग छोड़ देनी चाहिए। लेखक को जो उचित लगे वह लिखें।लेखक-बुद्धिजीवी अपने लेखन के जरिए समाज और संस्कृति का चरित्र बदलते रहे हैं,वे यथास्थिति के पक्षधर कभी नहीं रहे,बल्कि वे यथास्थिति के खिलाफ लिखते रहे हैं,लेखक से मनवांछित लेखन की मांग करना अविवेकपूर्ण है।लेखक कभी यह कर ही नहीं सकता।लेखन में यथास्थिति निषेध अंतर्निहित है.इस नजरिए से लेखक से यह कहना कि वह यह लिखे और वह न लिखे,वस्तुतःलेखक के हकों पर हमला है।अफसोस की बात है कि अधिकांश राजनेताओं के भाषणों में इन दिनों यही व्यक्त हो रहा है।



मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

लेखक और प्रतिवाद का हक

देश में पीएम राजनीति कर सकता है, मोहन भागवत राजनीति कर सकते हैं, जाहिल बटुक भी राजनीति कर सकते हैं, विपक्षीदल भी राजनीति कर सकते हैं, लेकिन लेखक राजनीति न करे! क्यों जी, लेखक राजनीति क्यों न करे? किस अधिकार से उसे राजनीति करने से रोक रहे हैं आप! लेखक सत्ता का गुलाम कभी नहीं रहा , जो सत्ता के गुलाम थे वे आज भी सत्ता की गुलामी कर रहे हैं और लेखकों के द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए जाने पर सवाल खडे कर रहे हैं, इनमें वे भी हैं जो कल उस सत्ता का मुखौटा लगाए हुए थे आज वे मोदी का मुखौटा लगाए हुए हैं। 
   लेखक का राजनीति करना, राजनीतिक मसलों पर स्टैंड लेना, सत्ता और साम्प्रदायिक ताकतों के हिंसक गठजोड. का विरोध करना सही दिशा में उठाया गया कदम है। कुछ लोग कह रहे हैं यहसेक्युलर लेखकों का फ्रस्टेशन है तो कुछ लोग कह रहे हैं कि यह प्रचार की भूख के लिए उठाया गया कदम है। साम्प्रदायिक हिंसा और उसे संघ के खुले समर्थन ने सारे संघर्ष को राजनीतिक बना दिया है। लेखकों परहमला करने वाले जब राजनीतिज्ञ हों तो यह कैसे संभव है कि लेखक चुप रहे, मूकदर्शक बना रहे! 
 लेखकों ने हिंसा शुरु नहीं की , लेखकों पर हमले, निरीह नागरिकों पर जानलेवा हमले बटुकों ने शुरु किए हैं। ये हमला करने वाले पाशविक आचरण कर रहे हैं ऐसे में लेखक और सचेत जनता चुप कैसे रह सकती है। 
   लेखकों का बडे पैमाने पर साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाना गांधीवादी प्रतिवाद है और यह प्रतिवाद जितने बडे पैमाने हुआ है उससे साफ समझ लें देश को हिन्दुत्ववाद की गुलामी में कैद नहीं रखा जा सकता।हमें इस प्रतिवाद में ज्यादा से ज्यादा लेखकों को शामिल करनाहोगा। इसके लिए जरुरी है  कि लोकतंत्र, सभ्यता , धर्मनिरपेक्षता और लेखकीय स्वायत्तत के आधार पर साझा मंच तैयार किया जाय।

शनिवार, 30 मई 2015

संघ की खुराफाती हरकतें और राजनीतिक दुष्कर्म


            आरएसएस के संगठन निरंतर आक्रामक होते जा रहे हैं और खुलेआम राजसत्ता का अपने लक्ष्यों के विस्तार के लिए दुरुपयोग कर रहे हैं। संघ का लक्ष्य है अ-लोकतंत्र की स्थापना करना और कारपोरेट लूट का माहौल बनाना। वह समाज सेवा के नाम पर खुराफाती राजनीति करने वाला संगठन है। सवाल यह है  आम जनता की आंखों में,खासकर मध्यवर्ग की आंखों में धूल झोंकने में यह संगठन कैसे सफल हो जाता है ? आंखों में धूल झोंकना इनकी पुरानी आदत है। इसके लिए वे हर किस्म का हथकंड़ा अपनाते हैं। धूल झोंकने की कला का लक्षण  है  कहो कुछ, करो कुछ,बोलो कुछ और करो कुछ।
      मसलन्, पीएम नरेन्द्र मोदी कहें मैं तो व्यक्ति,धर्म आदि की आजादी का पक्षधर हूँ ,लेकिन जमीनी स्तर पर उनसे जुड़ा संगठन व्यक्ति और धर्म की आजादी पर हमले करे,दंगों में भाग ले,हत्याकांडों में भाग ले, संवैधानिक हकों पर खुलेआम हमले करे तो सच कौन सा मानें ? भाषण वाला या एकेशन वाला ? समाज किससे चलता है भाषण से या एक्शन से ? जाहिर है जीवन में पहचान एक्शन से होती है भाषण और भाषा से नहीं।  मोदी और संघ को एक्शन के आधार पर देखो ,बयानों के आधार पर नहीं। सच भाषा में नहीं, बयान में नहीं.एक्शन में,यथार्थ में होता है। जब हंगामा होता है तो विभ्रम पैदा करने के लिए,आंखों में धूल झोंकने के लिए पुलिस कार्रवाई कर दी जाती है। इसके बावजूद संघियों के एक्शन जारी रहते हैं। जनता के जीवन पर संघियों के हमले जारी रहते हैं। संघी एक्शन में विश्वास करते हैं,भाषण में नहीं।   
     पीएम से लेकर मोहन भागवत तक अम्बेडकर की मूर्तियों पर माला पहना रहे हैं और अम्बेडकर की जय हो -जय हो कर रहे हैं। लेकिन व्यवहार में अम्बेडकर विरोधी कार्य कर रहे हैं,अम्बेडकर विरोधी एक्शन कर रहे हैं, अम्बेडकर के अनुयायियों पर हमले कर रहे हैं।
      सवाल यह है संघ कहां मिलेगा ? मोदी के बयान में या जमीनी संगठनों की हरकतों में ? संघ के जमीनी एक्शन देखें तो नरेन्द्र मोदी बहुत बौने और कमजोर पीएम नजर आते हैं। संघ की विचारधारा बेहद ताकतवर और अ-लोकतांत्रिक नजर आती है। टीवी टॉक शो में अमूमन भाजपा के प्रवक्ता या अन्य लोग पीएम मोदी के तथाकथित सदभाव बनाए रखने वाले बयानों का हवाला देते हैं, लेकिन पीएम मोदी के बयानों का न तो देश पर कोई असर हो रहा है और न संघ के खुराफाती संगठनों पर ही । स्थिति इस कदर बदतर हो चुकी है कि अब तो केन्द्रीय मंत्रालय भी संघ के खुराफाती संगठनों के इशारों पर काम करने लगे हैं। मद्रास आईआईटी के एक छात्रसमूह पर हाल ही में लगाया प्रतिबंध,पाठ्यक्रमों को बदलने की कोशिशें, आईआईटी की कार्यप्रणाली में दखलंदाजी की कोशिशें बता रही हैं कि संघ और मोदी  को देखना हो तो संघ के संगठनों की हरकतों में देखो, मोदी को काम करते आप पीएम हाउस में नहीं खुराफाती संगठनों में देखें तो बेहतर होगा। क्योंकि संघ के खुराफाती संगठनों का काम ही असल काम है, सरकार तो उनके लिए बहाना है। मोदी को पहचानना है तो मुख्यतौर पर संघ के संगठनों के कामों को देखें । सरकार के काम तो पूरक मात्र हैं।
        मोदी को 'महान' बनाने में गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर उनके काम की भूमिका न्यूनतम है,उनकी असली इमेज तो संघ के जमीनी संगठनों की खुराफातों ने बनाई है,मोदी के व्यक्तित्व और कृतित्व का आधार सरकारी या संवैधानिक पद नहीं है,उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के निर्माता हैं संघ के संगठन। मोदी को देखना हो तो संघ के संगठनों की हरकतों के आईने में देखो, वहीं पर रीयल मोदी नजर आएगा। संविधान के आईने में मोदी नजर नहीं आएगा। संविधान तो मोदी के लिए मृग मरीचिका है।    
     उल्लेखनीय है आरएसएस का तथाकथित सामाजिक संगठन का स्वरुप पूरी तरह राजनीतिक है।  यह वैसा ही सामाजिक संगठन है जैसे कि अन्य देशों में साम्प्रदायिक-पृथकतावादी –फंडामेंटलिस्ट संगठन होते हैं। सारी दुनिया का यह अनुभव है कि तमाम किस्म के इस तरह के खुराफाती संगठन खुलकर समाज सेवा करते हैं और उसकी आड़ में जमकर राजनीतिक दुष्कर्म करते हैं, तमाम किस्म का राजनीतिक व्यभिचार करते हैं।
      राजनीतिक व्यभिचार वह है जो इन दिनों कारपोरेट घरानों के पक्ष में संघ कर रहा है। राजनीतिक दुष्कर्म वह है जो इनदिनों आम जनता के जीवन में विभिन्न रुपों में हमले के रुप में सामने आ रहा है। संघ खुलकर किसानों के खिलाफ और कारपोरेट घरानों के पक्ष में मैदान में आ चुका है। सवाल उठता है संघ का लैंडबिल से क्या संबंध है ? वह तो सामाजिक संगठन है ! वह भूमि अधिग्रहण के पक्ष में मैदान में क्यों उतरा ? वह दावा करता है कि उसका काम है सामाजिक सेवा करना। लेकिन लैंड बिल के जरिए वह किसानों की जमीन हथियाने और किसानों को लूट के लिए तैयार करने के अभियान में जुट गया है। इसे समाजसेवा नहीं कहते , यह तो खुली और नंगी किसानविरोधी राजनीति है। यह किसानों के हितों पर संघ का हमला है।
    किसान पर हमले के रुप में ही हमें संघ की गऊवध विरोधी मुहिम को देखना चाहिए। किसान के लिए गाय पशुधन है। वह पुण्य या भगवानसेवा नहीं है। वह पशुधन का अपने कृषिकर्म में उपयोगी पशु और उत्पादन के औजार  के रुप में इस्तेमाल करता है। जिस तरह अनुपयोगी उपकरण को कंपनी या कारखानेदार निकालकर फेंक देता है वैसे ही किसान भी अनुपयोगी पशु को निकालकर फेंक देता है ,बेच देता है, उसका वध करके अन्य कामों में इस्तेमाल कर लेता है। पशुधन किसान के कृषिकर्म का उपकरण है, वह उसका साधन है, वह उसका लक्ष्य नहीं है, लेकिन संघ के लोग इस समूचे प्रसंग में गऊवध रोकने के नाम पर किसान की अर्थव्यवस्था पर ही हमला बोल रहे हैं।

       संघ की यदि जनांदोलनों में दिलचस्पी है तो उसे खुलकर अपना स्वरुप बदलकर मैदान में आना चाहिए। वे हर चीज को धर्म से जोड़कर पेश कर रहे हैं। गऊ को भी उन्होंने धार्मिक दृष्टिकोण से जोड़ दिया है फलतः समाज में धार्मिक घृणा का भी विभिन्न रुपों में प्रचार होने लगा है। हर चीज को धर्म से जोड़ना खासकर हिन्दूधर्म से जोड़ना एकसिरे से अनैतिक और अनैतिहासिक है। गाय तो गाय के मालिक की संपत्ति है वह उसे पाले या खाए, यह फैसला करने वाला कानून कौन होता है और यह कौन सा शास्त्र है कि व्यक्ति की निजी संपत्ति पर संघ राजनीति करे , संघ को कोई हक नहीं है कि वह बोले कि गाय का मालिक गाय को पाले या मारे या बिक्री करे। गाय यदि निजी संपत्ति है तो उसके मालिक को हक होगा कि वह गाय का क्या करे,इसके बारे में अन्य किसी को कोई हक नहीं है कि वह तय करे कि गाय का क्या होगा। संघ के जो लोग गाय पालते हैं वे संघ की विचारधारा के अनुसार गाय पालें इस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी ,लेकिन जो संघ की विचारधारा को नहीं मानते और नहीं जानते,वे किसान गाय के बारे में निजी तौर पर फैसला करें कि उनको गाय के साथ क्या करना है ।   

सोमवार, 12 जनवरी 2015

अभिव्यक्ति की आजादी और धर्म

    पेरिस हत्याकांड की घटना ने नए सिरे से माध्यमों में अभिव्यक्ति की आजादी के दायरे से जुड़े सवालों को केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया है। अनेक विचारक सलाह दे रहे हैं अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा होनी चाहिए। वरना अराजकता फैल जाएगी। इस तरह के लोगों के विचारों को सुनकर एक पल के लिए यही लगता है अभिव्यक्ति की आजादी का दायरा खींचने की जरुरत है। सच यह है अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाएं तय करना संभव नहीं है।अभिव्यक्ति का लक्ष्य मात्र अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि उसका परम लक्ष्य तो अभिव्यक्ति की सीमाओं का विस्तार करना और तोड़ना है।हर दौर में लेखकों-कलाकारों ने यह काम किया है,वे यह काम आज भी कर रहे हैं।


सामान्य कम्युनिकेशन भी सीमाएं नहीं मानता। एक जमाना था औरतें पर्दे की आड़ लेकर, घूंघट में से बोलती थीं,लेकिन बोलते –बोलते वे आज जहां तक चली आई हैं उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।बोलना या अभिव्यक्ति तो परिवर्तन की प्रक्रिया में,सीमा तोड़ने की प्रक्रिया में शामिल होना है। इसीलिए हिन्दी में कहावत भी है ''बोला और मरा'' । अभिव्यक्ति की प्रक्रिया में मनुष्य जब भी दाखिल होगा वह देर-सबेर अभिव्यक्ति की सीमाएं तोड़ेगा। एक जमाना था कोई लड़की किसी लड़के से बात करती हुई देख ली जाती थी तो हंगामा हो जाता था लेकिन आज स्थिति यह है कि सामान्य तौर पर शिक्षित लड़कियों के पास अपने मित्र लड़कों के मोबाइल में नम्बर रहते हैं और वे घर में ही आराम से बातें करती रहती हैं। अभिव्यक्ति की विशेषता है कि वह सीमा नहीं मानती। चाहे जितने कानून बनाओ,चाहे जितने आदेश लागूकरो।

अभिव्यक्ति और धर्म केअन्तस्संबंध में एक बात साझा है वह है धर्म भी नियम-सीमा नहीं मानता और अभिव्यक्ति भी नियम –सीमा नहीं मानती। धर्म को यदि प्राचीन नियमों के अनुसार ही चलाया जाय तो धर्म अनाकर्षक होगा। उसकी कोई अपील नहीं होगी। दूसरी बात यह कि प्राचीनकाल में तो धर्म ही कम्युनिकेशन था। कालान्तर में अन्य कम्युनिकेशन के रुप आए हैं। धर्म की भूमिका मूलतः कम्युनिकेशन की ही रही है। कम्युनिकेशन में ज्योंही एक-दूसरे के बीच संवाद आरंभ होगा, कम्युनिकेटर और समाज के बीच में संवाद आरंभ होगा ,अभिव्यक्ति की सीमाएं क्रमशः टूटने लगेंगी। यह अभिव्यक्ति का अंतर्निहित नियम है।

हिन्दू धर्म में भगवान से बड़ा भक्त है। जबकि इस्लाम में अल्ला बड़ा है ,बाकी उसके मातहत हैं। हिन्दूधर्म में भगवान नियंता नहीं है,भक्त नियंता है। हिन्दूधर्म में नियम महत्वपूर्ण नहीं है,आदत या संस्कार महत्वपूर्ण हैं। आदतें महत्वपूर्ण होने से हिन्दूधर्म में किसी भी किस्म के शारीरिक नियंत्रण की संभावनाएं नहीं है। धर्म का लंबे समय से अंदर से रुपान्तरण होता रहा है। हमारे यहां कोई एक नियंता नहीं है। हर नागरिक का अपना-अपना हिन्दूधर्म है। हिन्दू धर्म में यह उदारता या खुलापन बड़े वैचारिक संघर्षों के कारण पैदा हुआ है और यह प्रक्रिया बड़ी श्रम साध्य और त्यागपूर्ण रही है। इसके विपरीत इस्लाम में ऩियंता रहे हैं और नियंता के प्रति हर मुसलमान को समर्पण करना और उसके बनाए नियमों का आचरण करना जरुरी है।वरना उसके प्रति संदेह या अविश्वास पैदा होगा। इसलिए जिन देशों में इस्लाम नियंता और नियामक है वहां पर अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल ही पैदा नहीं होता। अभिव्यक्ति की आजादी के लिए धार्मिक नियंता की अनुपस्थिति जरुरी है। इस्लामिक देशों में चूंकि नियन्ता अल्ला है अतः वहां अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है।

इसके विपरीत भारत में भगवान तो है लेकिन वह नियंता नहीं है। यहां पर भगवान-भक्त का संबंध स्वैच्छिक है।इसमें भक्त बड़ा है ,भगवान से। आराधना के सारे नियम भक्त बनाता है ,भगवान या उसकेनुमाइंदे तय नहीं करते। यही वजह है हिन्दूधर्म में सबसे ज्यादा मत-भिन्नता है,इस्लाम में एक अल्ला है, हमारे यहां तैतीसकरोड़ देवी-देवता हैं,अनेक ईश्वरों के सहस्रनाम हैं। हमने एक भगवान की धारणा कोकभी नहीं माना। जब भगवान एक नहीं है तो नियंता भी एक नहीं है। अमूमन एक ही मंदिरमें अनेक देवी-देवता मिलेंगे। बड़ी तादाद में ऐसे भी मंदिर मिलेंगे जिनमेंआराधक-प्रचारक की भगवान के साथ प्रतिमा लगी हुई है। यानी हमारे यहां भक्त को भगवानके बराबर का दर्जा दिया गया है । इसलिए हिन्दू धर्म की परिस्थितियों के साथ इस्लामकी तुलना करना सही नहीं होगा, इस्लाम के आइने में हिन्दू धर्म को नए सिरे सेसंगठित करना भी सही नहीं है।

हिन्दूधर्म में भगवान कोनियंता के रुप नहीं मानते बल्कि संस्कार के रुप में मानते हैं। आदत है इसीलिए मंदिर के सामने से गुजरते समय सिर झुका लेते हैं. यह आदत मसजिद या गिरिजाघर के सामने से गुजरते समय नहीं होती। ईश्वर कब हमारी आदत या संस्कार में घुलमिल गया हम नहीं जानते। लेकिन इसके बावजूद ईश्वर कभी भी हिन्दू समाज का नियंता नहीं रहा।हिन्दूधर्म के विभिन्न पंथों और सम्प्रदायों के प्रचारकों ने भी कोई संहिता बनाकर उसे लागू करने की कोशिश नहीं की। हिन्दूधर्म के बहुत सारे कोड या संहिताएं सभ्यता के विकास में बहुत बाद में आए,इनके आने के बाद भी समाज में संहिताओं को न मानने की परंपरा बनी रही है। हिन्दू धर्म में ईश प्रशंसा भी कर सकते हैं,ईश-समालोचना भी कर सकते हैं,चाहें तो अपने लिए नया भगवान बना सकते हैं और उसका समूचा ताम-झाम भी खड़ा कर सकते हैं। हिन्दूधर्म में कोई धार्मिक कानूनी किताब नहीं है जिसके आधार पर सामाजिक दण्ड दिए गए हों। यदि किसी ने मनुस्मृति बना दी है तो वह भी रहेगी लेकिन जरुरी नहीं है लोग उसे मानें। भारत में कोई भी ऐसा काल खण्ड नहीं रहा जिसमें मनुस्मृति के हिसाब से समाज को संचालित किया गया हो। समाज संचालन के नियम धार्मिक किताबों के बाहर थे, हो सकता है उनकी किसी लाक्षणिकता का मनुस्मृति से साम्य मिल जाय लेकिन भारत कभी भी मनुस्मृति या धर्मशास्त्र संचालित देश नहीं रहा।भारत में ईश निंदा के लिए किसी की हत्या नहीं की गई। जबकि उनके खिलाफ क्या-क्या किया जाय उसके प्रावधान जरुर हैं ,लेकिन ईश-निन्दा के कारण या नास्तिक होने के कारण किसी को जान से नहीं मारा गया। जबकि इस्लाम में ऐसा नहीं है। ईश-निन्दा हमारी परंपरा में नास्तिकों के संघर्ष के द्वारा अर्जित संस्कार और हक है।

भारत में भगवान का सम्मान करने के लिए कानून को हाथ में लेने की जरुरत नहीं है। कानून के भय से आम जनता में ईश्वर के प्रति सम्मान भावना पैदा नहीं की जा सकती। कानून का काम है सामाजिक नियमन का। ईश्वर के प्रति आस्था पैदा करना कानून का लक्ष्य नहीं है।हमारे यहां ईश्वर है लेकिन वह वैसे ही है जैसे टीवी है,रेडियो,इंटरनेट है। ईश्वर हमेशा से संस्कारों के कम्युनिकेशन का चैनल रहा है और आज भी है,संघ परिवार की भूमिका इसी प्रसंग में सबसे खतरनाक तौर पर उभरकर सामने आई है वे इस्लाम से प्रेरणा लेकर काम कर रहे हैं, हिन्दुओं के सामाजिक नियंता के रुप में ईश्वर की सत्ता स्थापित करना चाहते हैं। इस तरह वे सुचिंतित ढ़ंग से हिन्दूधर्म की परंपराओं और मान्यताओं को फंडामेंटलिस्टों की तरह परिभाषित कर रहे हैं और यदा-कदा लागू करने की कोशिशें भी करते रहे हैं। लवजेहाद,धर्मान्तरण आदि इसी तरह के प्रसंग हैं। सच्चाई यह है कि कौन किस धर्म में जाएगा,किससे शादी करेगा यह हिन्दूधर्म में कभी भी सामाजिक चर्चा के केन्द्र में नहीं रहा। आदि शंकराचार्य के जमाने से लेकर तुलसीदास के जमाने तक यह चीज साफ तौर पर देख सकते हैं कि किससे शादी करोगे और कौन सा धर्ममानोगे यह नागरिक के विवेक पर छोड़ दिया गया था।

मूल बात यह कि धर्म तो कम्युनिकेशन है और कम्युनिकेशन को आप नियमों में बांध नहीं सकते। कम्युनिकेशन का नियम है तोड़ना,वह समाज को तोड़कर बनाने का काम करता है। वह पुराने को नष्ट नहीं करेगा तो नया आएगा कैसे ? हर किस्म का कम्युनिकेशन अपने लिए तोड़ने-बनाने की यह जंग लड़ता है और इसे नियमों में बांधना संभव नहीं है। अभिव्यक्ति का दायरा वहां तक फैला है जहां तक अर्थ का दायरा फैला हुआ है। हम सोचें क्या अभिव्यक्ति के अर्थ की कक्षा तय की जा सकती है ?

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

आशीषनंदी अभिव्यक्ति की आजादी और फेसबुक

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अभिव्यक्ति की आजादी की धारणा के जन्म लेने के बाद विचारकों ने बार-बार अभिव्यक्ति की सीमाओं को तोड़ा है ,और अभिव्यक्ति के नए दायरे पैदा किए हैं। मर्यादा को मानते तो नए दायरे नहीं पैदा होते। यह काम लेखकों-विचारकों ने पुराने सोच,विचार,मान्यता ,मूल्य और न्याय व्यवस्था आदि के बारे में निर्मम विचार संग्राम चलाकर किया है।

ग्राम्शी कहते थे युद्ध में शत्रु के कमजोर हिस्सों पर हमले करो और विचारों की जंग में शत्रु के मजबूत किले पर हमला करो। आशीषनंदी ने मजबूत किले पर हमला बोला है इसीलिए इतनी बेचैनी है।

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टीवी मीडिया पर ज्ञानीजी कह रहे हैं कि अभिव्यक्ति की आजादी के लिए हमें मर्यादा की सीमा तय करनी चाहिए। ये महान ज्ञानी लोग आईबीएन-7 में बोल रहे थे।

अरे मित्रो, अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा तय नहीं कर सकते। अभिव्यक्ति का क्षितिज किसी सीमा में नहीं बांध सकते। अभिव्यक्ति में मर्यादा की मांग अंततः अभिव्यक्ति में कटौती और नियंत्रण की मांग है। अभिव्यक्ति को यह नैतिक आधार पर देखना होगा। अभिव्यक्ति का मसला मर्यादा या सीमा का मसला नहीं है।

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भाषण में किस तरह की भाषा होगी, यह वक्ता तय करेगा। आशीषनंदी के बयान की भाषा को लेकर ज्ञानी लोग टीवी में बैठकर सवाल कर रहे हैं कि वे ऐसे नहीं ,ऐसे बोलते तो मामला ठीक रहता। ये लोग भूल रहे हैं कि भाषा पर विवाद नहीं है, विवाद आशीषनंदी के आइडिया के कारण हुआ है। आशीषनंदी अपने विचार को वापस लेने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में पुलिस-कचहरी आदि के बहाने ये तथाकथित हाशिए की राजनीति करने वाले लोग कानूनी आतंकवाद का सहारा ले रहे हैं ।

जजों के एक वर्ग में भी कानूनी आतंकवाद की महत्ता बनी हुई है। जज कैसे तय कर सकते हैं कि किसी वक्ता को क्या कहना चाहिए।

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दलित विचारकों का एक वर्ग यह कह रहा है कि उनके विचारों को चुनौती नहीं दी जा सकती। यह धारणा लोकतंत्रविरोधी है। लोकतंत्र में सभी किस्म के विचारों और नीतियों की निंदा-आलोचना हो सकती है। लोकतंत्र विचारों का विश्वविद्यालय है। यह एकवर्ग के विचारों का संरक्षकतंत्र नहीं है।

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गजब कुतर्क दिए जा रहे हैं कुछ लोग कह रहे हैं कि आशीषनंदी ने गलत बात की है अतः उनको जेल भेजो। इस तरह के लोग मीडिया से लेकर अदालत तक भीड़तंत्र को लोकतंत्र का सिरमौर बनाने में लगे हैं। ये भीड़तंत्र के छोटे हिटलर हैं।

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भारत साहित्य समारोहों के आयोजक विलक्षण-मजेदार और रीढ़िविहीन हैं। पिछलीबार जयपुर साहित्य महोत्सव में सलमान रूसदी बुलाए गए वे नहीं आ पाए,इसबार वे भारत आए हैं, लेकिन जयपुर में बुलाए नहीं गए.कोलकाता साहित्य महोत्सव में वे बुलाए गए लेकिन ममता के आदेश केकारण शामिल नहीं हो पाए।

मजेदार बात यह कि कलकत्ता साहित्य महोत्सव के आयोजकों ने कहा कि उन्होंने सलमान रूशदी को आमंत्रित ही नहीं किया था। इसके जबाब में रूशदी ने ट्विट किया है कि उनके पास आयोजकों के कई ईमेल हैं, निमंत्रणपत्र है, और यहां तककि आयोजकों ने उनको एयरटिकट भी भेजा था। रूशदी ने कहा कि ममता बनर्जी के दबाब के कारण उनको कोलकाता आने से रोका गया है।

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सुप्रीम कोर्ट ने आशीषनंदी के विवादास्पद बयान पर दर्ज एफआईआर के आधार पर उनको गिरफ्तार करने पर 1फरवरी 2013 को रोक लगा दी ।

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पश्चिम बंगाल में असभ्यता की लहर चल रही है।वामदलों से लेकर तृणमूल कांग्रेस तक,अधिकांश दलों के नेता सार्वजनिक सभाओं में घटिया और गंदी भाषा का जमकर उपयोग कर रहे हैं। यह पश्चिम बंगाल में मध्यवर्ग की सभ्यता के ह्रास का युग है।

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रविवार, 9 सितंबर 2012

फेसबुक और अभिव्यक्ति की लक्ष्मणरेखा


फेसबुक पर अमर्यादित,गाली गलौज, पर्सनल कमेंटस (छींटाकशी) आदि को तुरंत हटादें साथ ही सार्वजनिक तौर पर सावधान करें। न माने तो ब्लॉक कर दें।

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फेसबुक पर स्वीकृति या साख बनाने के लिए जरूरी है कि नियमित लिखें और सारवान और सामयिक लिखें।प्रतिदिन किसी भी मसले को उठाएं तो उससे जुड़े विभिन्न आयामों को अलग-अलग पोस्ट में दें। इससे एजेण्डा बनेगा। कभी-कभार अपनी कहें ,आमतौर पर निजता के सवालों और निजी उपलब्धियों के बारे में बताने से बचें। यदि आप प्रतिदिन अपनी रचनात्मक उपलब्धियां बताएंगे तो अनेक किस्म के कु-कम्युनिकेशन में कैद होकर रह जाएंगे, इससे मन संतोष भी कम मिलेगा। मन संतोष तब ज्यादा मिलता है जब सामाजिक सरोकारों के सवालों पर लिखते हैं और लोग उस पर तरह तरह की राय देते हैं।

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फेसबुक कम्युनिकेशन के लिए इसकी संचार अवस्था को स्वीकारने और समझने की जरूरत है। मसलन् आपने किसी के स्टेटस पर कोई टिप्पणी दी,जरूरी नहीं है वह व्यक्ति आपके उठाए सवालों का जबाव दे,आपने किसी को फेसबुक चैटिंग के जरिए मैसेज दिया,जरूरी नहीं है वह आपको तुरंत जबाव दे, धैर्य रखें और गुस्सा न करें।

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फेसबुक ,चैटिंग आदि में अधीरता पागल कर सकती है, ब्लडप्रैशर बढ़ा सकती है। दुश्मनी भी पैदा कर सकती है। मिसअंडरस्टेंडिंग भी पैदा कर सकती है। फेसबुक रीयलटाइम मीडियम है यह धैर्य की मांग करता है। रीयलटाइम में अधीरता,गुस्सा आदि बेहद खतरनाक हैं, इससे उन्माद पैदा होता है। फेसबुक कम्युनिकेशन को सहजभाव से लें और अधीर न हों।इसमें आपका भला है और दूसरे का भी भला है।

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फेसबुक पर यदि कोई व्यक्ति आपकी वॉल पर नापसंद बात लिख जाए तो उसे रहने दें। इससे यह पता चलता है कि आप अन्य को चाहते हैं,पसंद करते हैं।

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फेसबुक असल में कबीर की उक्ति का साकार अभिव्यक्ति रूप है। उनका मानना था "काल करै सो आज कर,आज करै सो अब।"यानी जो कुछ कहना अभी कहो।रीयलटाइम में कहो

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फेसबुक चूंकि कम्युनिकेशन है अतः वह रहेगा, इसके पहले के कम्युनिकेशन मीडियम भी रहेंगे, यह गलत धारणा है कि पूर्ववर्ती कम्युनिकेशन रूपों या माध्यमों का लोप हो जाएगा। पहले के माध्यमों की भी प्रासंगिकता रहेगी, उपयोगिता रहेगी और फेसबुक की भी। फेसबुक या अन्य रीयलटाइम माध्यम तो इस जगत को जानने में हमारी मदद कर रहे हैं।

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फेसबुक में कम्युनिकेशन महत्वपूर्ण है,अन्य चीजें जैसे वंश,जाति,धर्म,उम्र, हैसियत आदि गौण हैं। फेसबुक एक तरह से अभिव्यक्ति की अति तीव्रगति का खेल है। यहां आप मुस्कराते रहिए,लाइक करते रहिए, कोई आपको हाशिए पर नहीं डाल सकता।

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वर्चुअल तकनीक में अन्य माध्यमों की तुलना में ऑब्शेसन का भाव ज्यादा है। ऑब्शेसन की यह खासियत है कि यह जल्दी अंतरंग जगत को खोल देता है। यही वजह है वर्चुअल माध्यमों के जरिए आदान-प्रदान ,संवाद, खुलेपन की अभिव्यक्ति जल्दी और सहज ढ़ंग से हो जाती है।

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कलाओं में कलाकार का लगाव व्यक्त होता है। लेकिन फेसबुक लेखन में यूजर का कोई लगाव नहीं होता। यहां लोग व्यक्तिगत तौर पर आते हैं और जातें है। लाइक करते हैं,टिप्पणी करते हैं और निर्विकार अंजान भाव से चले जाते हैं। इस तरह का परायापन अन्य माध्यमो में नहीं देखा। फेसबुक पर लिखते समय शब्द और शरीर में अंतराल रहता है। कलासृजन में यह संभव नहीं है।

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फेसबुक यूजर का ऑब्शेसन अवसाद पैदा करता है और कलाकार का ऑब्शेसन कला की आत्मा से साक्षात कराता है।

मनुष्य अकेला प्राणी है जिसकी अभिव्यक्ति की इच्छाएं कभी शांत नहीं होतीं। वह इनको शांत करने के लिए नए नए उपाय और मीडियम खोजता रहता है। फेसबुक उस प्रक्रिया में उपजा एक मीडियम है ।पता नहीं कब जल्द ही नया मीडियम आ जाए और हम सब फेसबुक को छोड़कर वहां मिलें।

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सभी मानवीय उपकरण मानसिक सुख के लिए बने हैं । फेसबुक का भी यही हाल है इससे आप मानसिक सुख हासिल कर सकते हैं। फेसबुक वस्तुतः अभिव्यक्ति का फास्टफूड है।

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फेसबुक लेखन अ-कलात्मक सपाटलेखन है। आप यहां कला के जितने भी प्रयोग करें संतोष नहीं मिलेगा। फेसबुक का मीडियम के रूप में कला से बैर है।कलात्मक अभिव्यक्ति के लिहाज से फेसबुक बाँझ है।

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फेसबुक पर लिखते समय प्रत्येक यूजर यथाशक्ति कोशिश करता है बेहतरीन लिखे,लेकिन लिखने के बाद महसूस करता है अब अगली पोस्ट ज्यादा बेहतर लिखूँगा। लेकिन बेहतर पोस्ट कभी नहीं बन पाती।

फेसबुक असंतोष को हवा देता है। लोग संतोष के लिए यहां अभिव्यक्त करते हैं लेकिन असंतोष लेकर जाते हैं।


मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

ममता सरकार का अ-लोकतांत्रिक चेहरा



ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री बनने के बाद लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले बढ़े हैं। प्रेस से लेकर जन-आंदोलनों तक ,सभी ओर ममता बनर्जी के बाहुबलियों के पुलिस की मौजूदगी में हमले हो रहे हैं। वहीं दूसरी ओर अभिव्यक्ति की आजादी पर भी हमले तेज हो गए हैं। कल तक ये हमले वामदलों और खासकर माकपा के खिलाफ थे लेकिन इनदिनों सामान्य नागरिकों और नागरिक अधिकार के लिए आंदोलन करने वालों पर शासकदल के बाहुबलियों के हमले हो रहे हैं। इसके खिलाफ आज वे ही लोग ममता बनर्जी के खिलाफ बोल रहे हैं जो कल तक उनको सत्तारूढ़ कराने में अग्रणी थे।
   ममता बनर्जी सरकार की लोकतंत्रविरोधी हरकतों के खिलाफ बुद्धिजीवियों का प्रतिवाद लगातार व्यापक शक्ल अख्तियार करता जा रहा है। वैज्ञानिक पार्थप्रतिम राय की रिहाई की मांग को लेकर विश्व विख्यात मानवाधिकार सेनानी नॉम चोम्स्की सहित 700 से ज्यादा वैज्ञानिकों-बुद्धिजीवियों -लेखकों ने ममता सरकार के जनविरोधी चरित्र की निंदा की है।इस बयान पर महाश्वेता देवी के भी हस्ताक्षर हैं। 
    हिंदी के प्रसिद्ध लेखक  मोहन श्रोत्रिय का मानना है यह फ़ासिज़्म की दस्तक है । वह तरह-तरह के रूपों में प्रकट होता/ हो सकता है फ़ासिज़्म. पहले के राजनेता व्यंग्य के आस्वाद की क्षमता भी रखते थे. समर्थ व्यंग्य तो शिक्षक और मार्गदर्शक की भूमिका अदा करता है. नाम लेकर कहिए कि ममता की यही नहीं, पिछले दिनों की अन्य हरक़तें फ़ासिज़्म के दायरे में आती हैं. दमन संभव हो न हो विश्वविद्यालय का शिक्षक इस जुर्म में गिरफ्तार तो हो ही गया. यह अकादमिक प्रश्न के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए, इसकी घनघोर निंदा और भर्त्सना की जानी चाहिए.
टीएमसी सांसद और पूर्व रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी ने प्रोफेसर अंबिकेश महापात्र का पक्ष लेते हुए कहा कि कार्टून लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा हैं। रेल बजट में रेल किराया बढ़ाने को लेकर उठे विवाद के बाद इस्तीफा देने वाले त्रिवेदी ने कहा, 'मेरा मानना है कि कार्टून स्वस्थ लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा हैं।' 'कार्टून आपकी छवि को खराब नहीं कर सकते हैं। लोग आपकी छवि बनाते हैं और वही इसे नष्ट कर देते हैं।'
उल्लेखनीय है ममता बनर्जी सरकार के द्वारा जादवपुर विश्वविद्यालय के एक अध्यापक को व्यंग्य चित्र को ईमेल के जरिए भेजने और सोशल साइटस पर भेजने के कारण अकारण पकडकर बंद कर दिया गया। ममता बनर्जी सरकार ने सोशल नेटवर्क से प्राप्त कार्टून को सोशल नेटवर्क पर शेयर करने के आरोप में जादवपुर विश्वविद्यालय के एक शिक्षक को कल रात गिरफ्तार कर लिया। एकदिन बाद अलीपुर कोर्ट ने उस शिक्षक को 500 रूपये की जमानत पर छोड़ दिया। आश्चर्य की बात यह है कि उस व्यक्ति को थाने में निजी जमानत पर भी छोड़ा जा सकता था,लेकिन थानेदार ने शिक्षक को नहीं छोड़ा। बंगाल के बुद्धिजीवी इस, घटना से गंभीर रूप से मर्माहत हुए हैं। जादवपुर विश्वविद्यालय कैंपस तो प्रतिवाद के पोस्टरों से अटा पड़ा है।यदि बुद्धिजीवीवर्ग इस मामले पर चुप रहता है तो यह पश्चिम बंगाल और भारत के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा। यह पश्चिम बंगाल के बुद्धिजीवियों का मुँह हमेशा के लिए बंद करने की बृहत्तर परिकल्पना का हिस्सा है।इस तरह की घटना हर स्तर पर प्र पश्चिम बंगाल में कायदे से बंगाली और गैर बंगाली बुद्धिजीवियों को मानवाधिकारों के संरक्षण के सवालों पर एकजुट होना चाहिए। संघर्ष से ही आत्मविश्वास आता है और सत्ता के भय से मुक्ति मिलती है।
ममता सरकार के द्वारा जादवपुर विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के नेट पर प्रदर्शित कार्टून पर पुलिस एक्शन पर ट्विटर पर प्रतिवादी ट्विट तेजी से आ रहे हैं। तकरीबन सभी बड़े समाचारपत्रों और चैनलों ने विवादित कार्टून दिखाया है। ममता सरकार को अपने कानून की रक्षा के लिए इन सबके खिलाफ केस करने का साहस दिखाना चाहिए।असल में, एक शिक्षक को आतंकित करके राज्य सरकार भय पैदा करना चाहती है।
    कायदे से पश्चिम बंगाल में नागरिक समाज को मानवाधिकारों की रक्षा के लिए बृहत्तर आंदोलन संगठित करना चाहिए, क्योंकि सरकार के हमले तेजी से बढ़ रहे हैं और वामदलों को अपने पूर्वाग्रह त्याग करके नागरिक समाज के साथ मिलकर आम जनता की रक्षा के लिए मैदान में आना चाहिए।
    राजनीतिक श्लेष या व्यंग्य लोकतंत्र की धुरी है। सत्यजित राय के व्यंग्य और आर.के. लक्ष्मण के व्यंग्य ने लोकतंत्र को समृद्ध किया है। भारत की सत्ता ने इन दोनों को महान सम्मानजनक पदवियों से सम्मानित किया है। सवाल यह है कि क्या राजनीतिक व्यंग्य का दमन संभव है ?क्या व्यंग्य को साइबर क्राइम में रखा जा सकता है?
    पश्चिम बंगाल की आयरनी यह है कि यहां पर चुनावों में दीवारों पर व्यंग्य चित्र बड़ी संख्या में बनाए जाते हैं और प्रत्येक पार्टी के चित्रकार अपनी कलात्मक क्षमता का प्रदर्शन करते हैं। आश्चर्य की बात है कि एक शिक्षक को नेट के जरिए व्यंग्य चित्र संप्रेषित करने के कारण पुलिस घर से उठाकर ले गयी। स्वयं ममता बनर्जी का दल माकपा पर हमले के लिए व्यंग्यचित्रों का इस्तेमाल करता रहा है। आज वही ममता व्यंग्य चित्रों से डर रही हैं और व्यंग्यचित्र लिखने वालों को निशाना बना रही है।व्यंग्य से तानाशाह और फंडामेंटलिस्ट डरते हैं। व्यंग्य तो लोकतंत्र का ईंधन है। 16 अप्रैल 2012 को कोलकाता सीआईडी विभाग ने फेसबुक और हूहल से विवादास्पद कार्टून पेस्ट करने वाले का आईपी पता मांगा है और उस कार्टून को इंटरनेट और सोशलसाइट से हटाने की मांग की है।
नियमानुसार फेसबुक और गूगल को विवादास्पद कार्टून लगाने वाले यूजर का आई पता नहीं बताना चाहिए। यह सीधे यूजर की प्राइवेसी का हनन है।उल्लेखनीय है गूगल ने चीन में वहां की सरकार द्वारा अपने विरोधियों के आईपी पते मांगे थे जिसे गूगल ने नहीं दिया था। फलतःउसे धंधे से हाथ धोना पड़ा,जबकि अन्य इंटरनेट सेवाप्रदाता कंपनियों माइक्रोसॉफ्ट.याहू आदि ने आईपी पते दे दिए थे। इसके कारण चीन सरकार ने प्रतिवादी नागरिकों की गिरफ्तारियां कीं और उत्पीडित किया। तकरीबन वही हालात पश्चिम बंगाल में बनाने की कोशिश की जा रही है और इसका प्रतिवाद किया जाना चाहिए।


दि टेलीग्राफ में 15अप्रैल 2012 को लेखक रूचिर जोशी ने लिखा-
THE MORAL MINEFIELD
- Thirty-four years in thirty-four weeks
The Thin Edge: Ruchir Joshi

I am writing this letter to you on my own computer and sending it out for publication via my own email. I am not, and have never been, a member of any political party, of any communist party anywhere including the Communist Party of India (Marxist) or CPI(M).
I am a citizen of India, of West Bengal, of Calcutta, and I live in the constituency you formerly represented as an MP — South Calcutta.
I have also never been a supporter of yours or of your party, though I was certainly among the millions who celebrated after the election results last year. All of us were celebrating the end of the long, incompetent, corrupt, oppressive rule by the Left Front, even though I’m certain some millions of us were anxious as to what your tenure in power would bring.
But we had believed in the hope of paribartan. I think we, the sceptical West Bengali millions, were hoping that you would lead a better, cleaner, fairer government than the disgraced, departing Left Front. In the euphoria of the election results it was impossible to imagine that you could do worse than Buddhadeb Bhattacharjee’s government.
I myself made a resolution that I would not write anything critical of you or your administration for at least one year. It was only fair, given the huge mess you were inheriting, a mess that was not only administrative and financial but also, centrally, moral. The Left had so completely dismantled and thrown away all decency and humanity in matters of State that you could trace the roots of all their other failures to this institutionalized immorality; surely you had to be given a fair chance to begin to clean up this overflowing sewer?
Sadly, despite my best efforts, I’m going to fall short of my promise by exactly one month. I am now forced to write to you openly in this column. Madam, in only eleven months you have proved yourself to be a grotesquely disastrous chief minister.
Before taking on any of the other challenges, your primary challenge was the moral one: to stem the corrosion of morality and honesty in public service. The Left had subverted the state police into becoming their armed peons, you were supposed to counter that by bringing back genuine independence of the police and security forces. The Left had overseen the gang-rape and assaults on women from Bantola and Birati to Nandigram, you were supposed to do the opposite, especially as you yourself were one of the women their goondas had grievously assaulted. The Left had ruthlessly attacked anyone who criticized them, using State machinery to silence and sideline dissent, you were supposed to ensure that democracy and freedom of speech were once again protected, and yes, precisely, even at a cost to yourself and your party.
Instead, we can now see that you yourself were already deeply corroded by those years of Left rule. Instead of being the chief surgeon who could excise and help cure the corruptions of absolute power, you yourself were terminally infected by the Baam Front rot, by their poisonous paranoia, by their vengeful megalomania.
You and your administration have achieved what we thought was impossible in such a short time: you have actually increased misery and sadness inside the state, even as you’ve turned Bengal into the laughing stock of the rest of India. If, under the Left Front, the rest of India used to pity us and snigger at us, now the country is just laughing at us, belly-laughter mixed with open contempt.
If the communists spent the last fourteen years of their rule doing nothing other than clinging on to power by whatever means, fair or foul, it was after they had tried to actually do something for the people for the first twenty years, even if they were wrong-headed, even if they were incompetent and without any genuine vision, even as their too-long reign began to inject acid into their souls and spines. What we did not foresee, what is truly terrifying, is that you seem to have scrunched that trajectory of thirty-four years into thirty-four weeks.
Madam, perhaps it might be time for you to resign and go.
Had someone in your administration, whoever was in charge of fire safety, taken responsibility and resigned after the AMRI fire, it may not have come to this. Had you fought your own rising paranoia and kept from commenting after the Park Street rape, it may not have come to this. Had you realized that you had not only offended the modesty of a rape victim but the collective conscience of Bengal and unreservedly apologized to the woman, it may not have come to this. Had you not transferred the police officer who proved that rape, you could have perhaps escaped this situation. Had you kept from compounding your mistake by similar irresponsible and callous comments about other assaults on women, or on the murders in Burdwan, it may have been different now. Had you not treated every bit of tragic news as only a lens through which to gaze lovingly and protectively at yourself, you may still have kept some credibility. Had you avoided attacking newspapers and TV channels that were critical of you, you would have been left with some democratic honour. Had you not pushed out your own minister from the door of the runaway train of your rule, there would have been no mild photo-cartoon sent to 25 of the 90 million people you rule and no criminal over-reaction from your party goondas and your paaltu police. As it is, you now oblige us to remember that adage about history repeating itself, first as tragedy and then as a farce: if the Left Front was the tragedy, you — and since there is no one but you in your Trinamul, you, solely — are the macabre farce.
Madam, one of the most bizarrely funny things you’ve kept repeating during your election campaign and afterwards is how you want to turn Calcutta into London. Well, perhaps it’s high time we imported some aspects of London culture. For instance, let me tell you how the last four British prime ministers have been portrayed in cartoons in London newspapers: John Major, always wearing his underpants outside his trousers; Tony Blair, as a one-eyed monster, sometimes as a one-eyed poodle trotting after George W. Bush; Gordon Brown, as a square, financial thug and bouncer; David Cameron, repeatedly, as an empty, blown-up condom. Along with these, they have also repeatedly had George Bush as a rampant, psychopathic chimpanzee, (once actually wiping his bottom with the UN logo), they’ve had Nicolas Sarkozy as all sorts of ferret-like animals, Berlusconi as a lecherous octopus and, recently, Angela Merkel as a dominatrix in skimpy black leather costume and fishnet stockings, wielding a financial whip over the exposed backsides of other European leaders. Besides this, one of the most widely read British satirical magazines, Private Eye, almost always has actual photographs of leaders and royalty with fictional speech bubbles coming out of their mouths, saying the most outrageous things. Let me tell you, no one has ever sued about these portrayals, no one is beaten up, no one is arrested, no one even lodges a written protest.
Madam, as one who had set such high hopes in you, I might be speaking for millions like myself: you need to resign and go, leaving us at the beginning of this Bangla new year to recover the best we can. May I suggest that after you resign, you plan a short or long visit to London? You will find they actually do dynamic new things to the city, like the huge Crossrail construction that’s now in progress, but that no one, neither premier nor mayor, can unilaterally decide to paint the city a bilious blue. You will also find they take rape and assault very seriously over there, and cartoons very lightly indeed. As you take in the reality of this culture and the courage of this freedom of speech, may I hope that you will begin to realize why you never deserved — forget being a world or national leader — but why you never actually deserved to be in charge of a state such as Bengal for even thirty-four days?

दैनिक हिन्दू (14 अप्रैल 2012) ने सम्पादकीय में लिखा
bonfire of free speech
There is an oppressive climate of intolerance towards dissent and free speech in West Bengal today. In an act of crude censorship, the government recently removed several newspapers from over 2,480 public libraries that it runs, aids or sponsors. Now, the police have arrested two people, including a professor from Jadavpur University, for allegedly defaming Chief Minister Mamata Banerjee through a cartoon they posted on a social networking site. These are blatant acts of authoritarianism that mock at constitutional values and freedoms and deserve to be condemned. The decision to purge the public library system of most mass circulation Bengali dailies and English language newspapers reflects a deep-seated contempt for democratic values. This has been done, ironically, under the guise of developing free thinking among readers. But the Chief Minister has only to read the Library Bill of Rights of the American Library Association to understand how far removed her government's views are from civilised practice. “Materials should not be excluded because of the origin, background, or views of those contributing to their creation,” the charter states, affirming the right of readers to have access to all shades of opinion. Specifically, nothing should be excluded because of partisan or doctrinal disapproval. What makes the decision of the West Bengal government particularly offensive is its calculated approach to suppressing ideas and information.
If democracy is to flourish, the public library system must be insulated from censorship. The Centre should strengthen the role of libraries and make their collections mandatorily inclusive. India's public libraries must be governed by a specific freedom charter that spells out their rights and those of readers. This can be done by making it mandatory for libraries to consult the community they serve through public hearings, and acquire publications based on local demand. Such principles are universal, and even titles that are not available at a given moment can be specially requested by readers. The repressive orders in West Bengal are aimed at chilling independent thought. School textbooks have been rewritten to remove the philosophy of Karl Marx and Friedrich Engels because Ms. Banerjee has so decreed. And now, citizens are being arrested for merely lampooning leaders. State governments invariably pursue the goal of control of the media, and their favourite tool is grant or denial of government advertisements to bring about self-censorship. But in West Bengal, an era of a more direct assault on free speech seems to have begun. It needs a strong response from democratic forces.

शनिवार, 13 अगस्त 2011

'आरक्षण' फिल्म और खोखली दलित चिन्ताएं


       आरक्षण फिल्म रिलीज हो गयी। तीन राज्यों उत्तरप्रदेश,पंजाब और आंध्र ने इसके प्रदर्शन पर रोक लगायी हुई है। आंध्र में कांग्रेस ,यू.पी. में बहुजन समाज पार्टी और पंजाब में अकाली-भाजपा की राज्य सरकार है। यह संकेत है कला और राजनीति के अन्तर्विरोध का। सुप्रीम कोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट में मामला विचाराधीन है।  इस फिल्म का सारा हंगामा इसके प्रोमो को देखकर आरंभ हुआ। उसके आधार पर शिकायतें की गयीं। बाद में फिल्म देखकर एससी-एसटी कमीशन ने आपत्तियां व्यक्त कीं। इससे यह तथ्य भी सामने आया कि हमारे राजनेता अभी कलाबोध से कोसों दूर हैं। राजनीतिज्ञों को कलाविद भी होना चाहिए। कलाविहीन राजनेता फासिस्ट होते हैं।

     फिल्म के संदर्भ में संवैधानिक संस्थाओं में किसकी मानें ? मसलन फिल्मों के मामले में सेंसरबोर्ड ,मुख्यमंत्री ,एससी-एसटी कमीशन,अदालत आदि में कौन है निर्धारण करने वाली संस्था ? बॉम्बे हाईकोर्ट ने सेंसरबोर्ड को ही अंतिम फैसला लेने वाली संस्था कहा है। यदि ऐसा है तो फिर आरक्षण पर तीन राज्यों ने रोक क्यों लगायी ? क्या यह अदालत और सेंसरबोर्ड का अपमान है ?
      भारत में फिल्म और राजनीति का अन्तर्विरोध पुराना है। राजनेता किसी भी माध्यम से उतना नहीं डरते जितना फिल्म से डरते हैं। यही वजह है कि वे आए दिन किसी न किसी फिल्म पर प्रतिवाद और हंगामा करते हैं। नीतिगत मामले में पश्चिम की नकल करने वाले राजनेता और राजनीतिकदल कम से कम पश्चिमी देशों से इस मामले में बहुत कुछ सीख सकते हैं। पश्चिम में नेतागण किसी फिल्म पर इस तरह गुलगपाड़ा नहीं मचाते। राजनेता और उनके छुटभैय्ये भूल जाते हैं कि फिल्म से वोट नहीं कटते और न वोटों में इजाफा होता है। फिल्म भी अन्य कलारूपों की तरह संचार का प्रभावशाली कलारूप है। 
हैडलाइन टुडे चैनल पर एससी-एसटी कमीशन के चेयरमैन से आरक्षण फिल्म के संदर्भ में फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप ने पूछा कि आपको किसने शिकायत की ? बिना फिल्म देखे उस व्यक्ति ने कैसे शिकायत की ?आपने उस व्यक्ति को यह क्यों नहीं कहा कि फिल्म जब रिलीज ही नहीं हुई है तो उसके बारे में आपत्तियां कैसी ? बिना फिल्म देखे आपने उसकी आपत्तियों को विचारयोग्य कैसे मान लिया ?  चेयरमैन साहब अंत तक जबाब नहीं दे पाए। कायदे से बिना देखे ,जाने और समझे कलाओं के बारे में सवाल नहीं उठाने चाहिए। यदि सवाल भी उठें तो वे प्रतिबंध की शर्त के साथ नहीं।   
       इन दिनों टीवी के साथ सांठगांठ करके छुटभैय्ये नेता किसी भी मसले पर बाइटस की बमबारी आरंभ कर देते हैं। टीवी चैनल बगैर किसी नीति के चल रहे हैं और हर विवाद पर बहस चला देते हैं और अंत में टीवी कार्यक्रमों को दबाब की राजनीति के अंग के रूप में प्रशासन पर प्रभाव पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। आरक्षण फिल्म के बारे में यही हुआ है। बाइटस की बमबारी को हम आम जनता का प्रतिवाद समझने लगते हैं। इस चक्कर में टीवी वीले अपने को जनता के प्रतिबिम्ब के रूप में पेश करते हैं।यह टीवी वालों का विभ्रम है। टीवी बाइटस विभ्रम पैदा करती है। वह सत्य और तथ्य के बीच में मेनीपुलेशन है। उसे आम जनता की राय,तथ्यपूर्ण राय,सत्य आदि कहना सही नहीं है।
    सेंसरबोर्ड की चेयर पर्सन ने हैडलाइन टुडे से कहा यदि इस फिल्म का नाम आरक्षण न होता तो इतना हंगामा न होता। यह बात एक हद तक सच है।  फिल्ममेकर अनुराग कश्यप ने कहा आरक्षण फिल्म वस्तुतः आरक्षण का पक्ष लेती है। उन्होंने एससी-एसटी कमीशन के अध्यक्ष से सवाल किया फिल्म देखने के बाद क्या महसूस होता है ? क्या यह फिल्म आरक्षण विरोधी संदेश देती है ? इस सवाल का वे सीधे जबाब नहीं दे पाए।
    असल बात यह है फिल्म या कलाएं आनंद देती हैं, घृणा का प्रचार नहीं करतीं । सर्जकों के नजरिए की अभिव्यक्ति हैं। अनुराग कश्यप ने सुझाव दिया है राजनेताओं के लिए फिल्मों का एक फिल्म एप्रिशियेसन का कोर्स पढ़ाया जाना चाहिए । उनका दूसरा सुझाव है  फिल्मों के बहाने हो रही सुपरसेंसरशिप बंद होनी चाहिए और समूचे फिल्म जगत को इसका एकजुट होकर विरोध करना चाहिए। सेंसरबोर्ड ने एस-एसटी अध्यक्ष की आपत्तियों की कानूनी हैसियत जानने के लिए भारत सरकार के महाधिवक्ता की राय मांगी है।
मुश्किल यह है फिल्म कला है तो व्यापार भी है। व्यापार में व्यापारियों में एकजुटता का होना विरल घटना है। बॉम्बे फिल्म उद्योग में कलाकार हैं,कला उत्पादन होता है लेकिन कलाओं के संसार के मालिक पूंजीपति भी हैं जो बाजार की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में लगे हैं।
     फिल्मों को लेकर उठे विवाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार की स्वतंत्रता के विवाद हैं। इन मसलों पर प्रत्येक फिल्ममेकर को निजी जंग लड़नी होगी। सामूहिक जंग हो यह बेहतर स्थिति है, लेकिन व्यापार की प्रतिस्पर्धा कभी एकजुट नहीं रखती। वरना जावेद अख्तर को यह बयान देने की क्या जरूरत थी कि जब फना पर पाबंदी लगी तो लोग क्यों नहीं बोले ? जावेद साहब न बोलने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन उनका यह कहना कि फना पर या अन्य किसी फिल्म पर पाबंदी के समय फिल्मजगत क्यों नहीं बोला ? एक लेखक के मुँह से इस तरह के बयान शोभा नहीं देते। फना हो या आरक्षण हो ,कोई भी फिल्म हो ,फिल्ममेकर को सेंसरबोर्ड के अलावा किसी के दबाब में नहीं आना चाहिए। खासकर राजनेताओं के दबाब में आकर फिल्म में अंश निकालने का काम कभी नहीं करना चाहिए। हिन्दी सिनेमा का यह दुर्भाग्य है मणिरत्नम की फिल्म बॉम्बे से लेकर अमिताभ बच्चन की फिल्मों तक यह राजनीतिक दबाब में आकर कट करने का सिलसिला चला आ रहा है। फिल्मों के मालिक एकबार पैसा लगा देने के बाद येन-केन प्रकारेण पैसा निकलना चाहते हैं और कलाकारों पर दबाब पैदा करते है।
    फिल्मवालों को ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए कि कोई उपन्यासकार-कहानीकार किसी भी राजनीतिक दबाब के आगे झुककर अपनी कृति से विवादित अंश नहीं निकालता। इस तरह की दृढ़ता फिल्ममेकरों और फिल्म कलाकारों में क्यों नहीं है ? सलमान रूशदी ने सारी दुनिया में विवाद उठने कस बाबजूद सैटेनिक वर्शेज को वापस नहीं लिया,विवादित अंश नहीं निकाले और वे मजे में सारी धमकियों के बाबजूद जिंदा हैं। फिल्ममेकरों को अपनी कला से प्यार है तो फिल्मों की कटिंग या सुपरसेंसरशिप से बचना होगा। मकबूल फिदा हुसैन देश छोड़कर चले गए लेकिन अपनी कलाकृतियों को लेकर फंडामेंटलिस्टों के सामने घुटने नहीं टेके। जब तक यह दृढ़ता फिल्ममेकर में नहीं आती वह बार -बार मार खाएगा और कट करने के लिए बाध्य किया जाएगा।
आरक्षण फिल्म के खिलाफ समुदाय की राजनीति और कारपोरेट मीडिया फासिज्म वस एक-दूसरे के पूरक की भूमिका अदा की हैं।टीवी ने इसके पक्ष-विपक्ष में बहस आयोजित करके प्रेशर की फासिस्ट राजनीति को हवा दी है। कायदे से सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेकर सेंसरबोर्ड से पास फिल्मों के प्रदर्शन को सुनिश्चित बनाने के लिए राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार को आदेश देना चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस नहीं की जा सकती। जो लोग आरक्षण फिल्म पर बहस करा रहे हैं वे वस्तुतः फासिज्म की सेवा कर रहे हैं। आरक्षण फिल्म के प्रसारण का सवाल अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल है। यह फिल्म आरक्षण का सिद्धान्ततः विरोध नहीं है। इसके बावजूद हमारे देश में आरक्षण का विरोध करने की राजनीतिक स्वतंत्रता है। जो लोग यह सोच रहे हैं कि आरक्षण संवैधानिक है ,तो वे जानते हैं कि इस देश का एक बड़ा राजनीतिक समुदाय आरक्षण का विरोध करता रहा है। वे लोग संसद से लेकर सड़कों तक भाषण करते रहे हैं। कोई अधिकार संवैधानिक है तो उस पर बात नहीं की जा सकती,मतभिन्नता का प्रदर्शन नहीं किया जा सकता,यह मान्यता स्वयं में फासिस्ट मनोवृत्ति को व्यक्त करती है। दुर्भाग्य से हमारे कुछ अच्छे दलित नेताओं ने आरक्षण फिल्म को इसी नजरिए से देखा है ।
आरक्षण फिल्म के खिलाफ जिस तरह की 'समुदाय' की दबाब की राजनीति हो रही है यह भारत के भावी खतरनाक भविष्य का संकेत भी है।हम एक ऐसे युग में हैं जहां कलाविहीन लोग कलाओं पर फैसले सुना रहे हैं।यह वैसे ही है जैसे बीमार की चिकित्सा के लिए डाक्टर को बुलाने की बजाय झाड़-फूंकवाले ढ़ोंगी बाबा से इलाज कराया जाए।
     आरक्षण फिल्म को सेंसरबोर्ड की अनुमति मिल जाने के बाद उसे प्रदर्शन से रोकना अन्याय है। यू.पी.पंजाब , आंध्र आदि राज्य सरकारों ने कभी भी दलित और पिछड़वर्ग के लोगों के सामाजिक सवालों और दलित महापुरूषों पर कोई फिल्म नहीं बनायी। वे कभी कोशिश नहीं करते कि दलितों में अच्छे सिनेमा का प्रचार प्रसार हो,वे कभी दलितों के लिए फिल्म शो आयोजित नहीं करते। वे दलितों में राजनीतिक प्रचार करते हैं कलाओं का प्रचार नहीं करते। दलित विचारकों को यह सवाल दलितनेताओं से पूछना चाहिए कि दलितों में कलाओं के प्रचार-प्रसार के लिए राज्य सरकारों ने क्या किया ? कितने फिल्म क्लब या फिल्म सोसायटी बनायी गयीं? कितनी कला प्रदर्शनियां दलितों के इलाकों में आयोजित की गयीं ? कितने दलितलेखकों की रचनाओं को खरीदकर राज्य सरकारों ने दलितों को मुफ्त में मुहैय्या कराया ? मेरे कहने का आशय है कि राजनेताओं और उनके कलमघिस्सुओं का दलितप्रेम नकली और निहित स्वार्थी है,उसमें दलितों को कला सम्पन्न बनाने की न तो पीड़ा है और न पहलकदमी ही है।
    किसी फिल्ममेकर को घेरना आसान है लेकिन दलितों के लिए नियमित मुफ्त फिल्म प्रदर्शन आयोजित करना,साहित्य गोष्ठियां आयोजित करना,कला प्रदर्शनी आयोजित करना मुश्किल है। किसी टीवी चैनल में दलितों की हिमायत में बोलना जितना जरूरी है उतना ही दलितों के बीच में कलाओं और पापुलरकल्चर को संगठित ढ़ंग से ले जाना भी जरूरी है। यह सवाल भी उठा है कि दलितहितों की रक्षक सरकारों ने दलित महापुरूषों या सामान्य दलित जीवन के विभिन्न प्रसंगों पर केन्द्रित कितनी फिल्में और सीरियल बनाए हैं ? कितनी स्क्रिप्ट लिखीं हैं ? किसने रोका है दलितों को सिनेमा-फिल्मों में आगे आने से ? कम से कम फिल्म निर्माण में तो ये लोग अपना भाग्य आजमा सकते हैं।
   साहित्य में दलित लिख रहे हैं तो लोग उनका लोहा मान रहे हैं। यदि वे फिल्में भी बनाने लगेंगे तो हो सकता है वहां भी लोग लोहा मानने लगें। यह दुख की बात है कि दलितनेताओं को दलितों के कलात्मक उत्थान की कोई चिंता नहीं है। दलितों को कला,फिल्म,सीरियल आदि कौन देगा ? क्या दलित विचारक,एससी-एसटी कमीशन इस ओर कोई ठोस कदम उठाएंगे ? दलितों का मंदिर प्रवेश निषेध अपराध है लेकिन दलितों के बीच में कलाओं का न पहुँचना उससे भी भयानक अपराध है। दलितों को मंदिर तक पहुँचाने की चिंता करने वालों को उनके पास कलाओं को ले जाने का काम करना चाहिए। कलाओं से दलितों की दूरी खत्म की जानी चाहिए। दलितों को भगवान से ज्यादा कलाओं की जरूरत है।


बुधवार, 20 जुलाई 2011

फेसबुक पर सत्ता का कसता शिकंजा


 भारत सरकार ने हाल ही में याहू.गूगल,माइक्रोसॉफ्ट आदि कंपनियों को वह सॉफ्टवेयर प्रदान करने का आदेश दिया है जिसके आधार पर वह उनके सरवर के जरिए नेट पर चल रही भारतीयों की सभी किस्म की गतिविधियों की निगरानी कर सके। उपग्रह संचार ने जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जन्म दिया था उसके साथ सत्ता का अन्तर्विरोध बढ़ता जा रहा है। अमेरिका में भी इंटरनेट और सत्ता के अन्तर्विरोध तीखे हो गए हैं। साइबर कानूनों को कड़ा बनाया जा रहा है। जिससे इंटरनेट पर मुक्त अभिव्यक्ति बाधित होगी। इस काम में इंटरनेट सर्विस प्रदाता कंपनियां सत्ता के चौकीदार की भूमिका अदा कर रही हैं। वे रीयलटाइम में ऑनलाइन पर आने वाले लाखों -करोड़ों संदेशों को विश्लेषित करके सत्ताकेन्द्रों को संप्रेषित कर रहे हैं। पहले किसी को यह समझ में नहीं आया कि इंटरनेट को कैसे नियंत्रित किया जाएगा लेकिन बाद में इसका भी रास्ता निकाल लिया गया । अब इंटरनेट सर्विस प्रदाता कंपनी ही यूजर पर निगरानी करने लगी है।

नये कानून के अनुसार भारत और अमेरिका में इंटरनेट पर ब्लॉग से लेकर फेसबुक तक गुमनाम टिप्पणी लिखना अपराध घोषित होने जा रहा है। प्रशासन चाहता है कि इंटरनेट पर सही नाम से लिखा जाए। ऑनलाइन गुमनामी को खत्म करने के साथ ही इंटरनेट कंपनियों ने एक नया सिस्टम ईजाद किया है जिस पर कनाडा की एक प्राइवेसी वाचडाग संस्था ने लिखा है कि गुमनामी खत्म होते ही प्रत्येक आदमी की 24 घंटे निगरानी करने में मदद मिलेगी।  इंटरनेट पर गुमनाम टिप्पणी लिखने वाले लेखकों की प्रकृति क्या है,वे कौन हैं और क्यों लिखते हैं ,इन सबका पता लगा लिया गया है। ट्विटर,ब्लॉग,इंटरनेट, फेसबुक आदि पर जो लोग अनाम टिप्पणियां लिखते हैं उन्हें अब चिह्नित कर लिया गया है। विज्ञान तत्वशास्त्र के विद्वान डेविड मिसकेविज ने अपने अनुसंधान के जरिए अनाम लोगों की पहचान की है। मिसकेविज ने यह रहस्योदघाटन चर्च की एक घरेलू पत्रिका में प्रकाशित लेख में किया है। मिसकेविज का मानना है इंटरनेट पर ‘अनाम’ मुखौटे वाले सबवर्सिव और अराजकतावादी हैं। ये लोग मनोरंजन उद्योग पर आए दिन हमले करते हैं।ये लोग विकीलीक पर भी बेहद सक्रिय हैं। इसके अलावा फेसबुक के मालिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है जिसके तहत यूजर इमेज को कम्प्यूटर पहचान लेगा और उस पर टैग भी लगा देगा। अभी इस तकनीक का प्रयोग अमेरिका में किया जाएगा। फेसबुक के अनुसार अभी वह प्रतिदिन दस करोड़ फोटो पर टैग लगाने का काम कर रहा है। फेस रिकॉगिनीशन प्रोसेस के नाम से यह प्रक्रिया फेसबुक ने आरंभ की है। इस प्रक्रिया का निहितार्थ यह भी है कि फेसबुक पर नकली फोटो के साथ भ्रमण करना अब खतरे से खाली नहीं होगा। प्रत्येक इमेज पर टैग होगा। जब इमेज के साथ कोई टैग लगी है तो आप सहज ही उससे अपने को विच्छिन्न नहीं कर पाएंगे। यह काम फेसबुक का सिस्टम स्वचालित ढ़ंग से करेगा। मसलन किसी नाम के साथ अगर कोई टैग तय हो चुका है तो फिर उसका कोई अन्य दुरूपयोग नहीं कर पाएगा। आप जो भी इमेज पोस्ट करेंगे वह टैग दिखाई जाएगी,आप चाहें तो अपनी टैग में रद्दोबदल कर सकते हैं लेकिन बिना टैग के अब फेसबुक पर कोई इमेज नहीं होगी। इससे फेसबुक नजरदारी बढ़ जाएगी। संबंधित टैग से जुड़ी सूचनाएं स्वतः एक जगह संचित होती जाएंगी।  दूसरी ओर एक सर्वे से यह भी पता चला है कि फेसबुक पर आनंद के विषयों का बोलवाला है। वहां पर गंभीर विषयों पर बहुत कम बातें हो रही हैं। मसलन् फेसबुक और ट्विटर पर इराक-अफगानिस्तान युद्ध ,नव्य आर्थिक उदारीकरण, भूमंडलीकरण,मंदी बेकारी, निरूद्योगीकरण ,अमेरिका की आंतरिक राजनीति और देशज राजनीतिक विवाद एकसिरे से गायब हैं।
     सोशल नेटवर्क के प्रभाव के बारे में हम जितना जानेंगे उतना ही बच्चों और युवाओं को भी बेहतर ढ़ंग से जान पाएंगे। बच्चों और युवाओं का बहुत बड़ा हिस्सा सोशल नेटवर्क पर विभिन्न किस्म के संचार और संपर्क का काम कर रहा है। मसलन अमेरिका में 75 प्रतिशत युवा (18-24 साल की आयु के) सोशल नेटवर्क पर जाते हैं। 65 साल से ऊपर की आयु के मात्र 7 प्रतिशत लोग ही सोशल नेटवर्क पर जाते हैं। कहने का अर्थ यह है कि सोशल नेटवर्क युवाओं का माध्यम है। जबकि 25-34साल आयु के 57 प्रतिशत,35-44 साल के 30 प्रतिशत,45-54 साल के 19 प्रतिशत,55-64 साल के 10 प्रतिशत लोग सोशल नेटवर्क पर जाते हैं।
   विभिन्न सामाजिक नेटवर्क में माइस्पेस पर 50 प्रतिशत,फेसबुक पर 22 प्रतिशत और लिनकेदिन पर 6 फीसदी का प्रोफाइल है। ज्यादातर तरूण अपने परिचितों के साथ ही जुड़ते हैं। 51 फीसदी सोशल नेटवर्क यूजर की दो या उससे ज्यादा ऑनलाइन प्रोफाइल हैं। जबकि 43 प्रतिशत का एक ही प्रोफाइल है।ज्यादातर सोशल नेटवर्क यूजर प्राइवेसी सचेतन हैं। इसके बावजूद यूजरों की वेब पर प्रच्छन्नतःजासूसी जारी है। लेकिन फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्क ऑफिसों में समग्र ऑफिस समय का 1.5 फीसदी समय बचाते हैं। यह बात ' नुक्लिस रिसर्च' के पिछले साल कराए सर्वे में सामने आयी है। एक अन्य संस्था मोर्से के सर्वे में यह तथ्य सामने आया है कि ब्रिटिश कंपनियों को फेसबुक जैसे मंचों के  जरिए काम करने से सालाना 2.2 बिलियन डॉलर का लाभ हुआ है। यह भी पाया गया है कि छोटे स्तर पर ब्लॉगिंग में खर्च होने वाला समय वस्तुतः समय की बर्बादी है। इसके विपरीत फेसबुक में आप निरंतर संपर्क,संवाद और उच्चकोटि की सर्जनात्मकता बनाए रख सकते हैं। फेसबुक में सर्जनात्मक निरंतरता बनाए रखने की क्षमता है। वह इंटरनेट की सभी विधाओं का निर्धारक है। इंटरनेट में क्या होगा ,ऑनलाइन समूह क्या करेंगे,यूजर कैसे रहे ,उसकी प्राइवेसी क्या है,सार्वजनिक क्या है और यूजर को कैसे बोलना चाहिए,कैसे व्यक्त करना चाहिए,भावों-संवेदनाओं और अनुभूतियों को कैसे व्यक्त करें आदि बातों का निर्धारक फेसबुक है। फेसबुक में सभी पूर्ववर्ती मीडिया और नेट विधाओं का समाहार कर लिया है। अनेक अभिव्यक्ति रूपों को सार्वजनिक कर दिया है।




शनिवार, 23 अप्रैल 2011

लेनिन जन्मदिन पर विशेष- राजनीतिक कैंसर है अवसरवाद

लेनिन का पाठ बार -बार अनेक मामलों में बुर्जुआ नजरिए के प्रति वैकल्पिक दृष्टि देने का काम करता है। सोवियत संघ में एक जमाने में आलोचना की स्वतंत्रता को लेकर बहस चली है। बुर्जुआ लोकतांत्रिक नजरिए वाले लोगों के लिए आलोचना की स्वतंत्रता का जो मतलब होता है वहीं क्रांतिकारी ताकतों के लिए नहीं है। प्रत्येक बुर्जुआ देश में आलोचना की स्वतंत्रता को लेकर तरह -तरह के कानून हैं। बुर्जुआजी के लिए आलोचना की स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ कानूनभर बना देना है। वे कभी इन कानूनों पर अमल नहीं करते। ध्यान रहे आलोचना की स्वतंत्रता का आधार अवर्गीय ढ़ंग से देखेंगे तो गलत निष्कर्ष निकलने की संभावनाएं हैं।
     आलोचना की स्वतंत्रता वाचिक सुख नहीं है। यह थोथी अभिव्यक्ति की आजादी भी नहीं है। आलोचना का मनुष्य के सामाजिक अस्तित्व रक्षा के सवालों के साथ गहरा संबंध है। बुर्जुआ विचारधारा ने अभिव्यक्ति की आजादी को वाचिक क्षेत्र तक सीमित कर दिया है और उसे सामाजिक अस्तित्व के बुनियादी सवालों से काट दिया है।
      बुर्जुआ व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का लाभ वे ही लोग उठाते है जो आर्थिक रूप में समर्थ और सक्षम हैं। गरीब,पीडित और अक्षम लोगों के लिए अभिव्यक्ति की आजादी दिवा-स्वप्न है। अभिव्यक्ति की आजादी या आलोचना की स्वतंत्रता पर विचार करते हुए हमें समाजवाद और वंचितों के प्रति इसके रूख की परीक्षा करनी चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी पर विचार करते हुए बुनियादी सामाजिक-आर्थिक अंतर्विरोधों पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
     आमतौर पर लेनिन की धारणाओं को लेकर विश्वभर में आदर और सम्मान का भाव रहा है। आलोचना की स्वतंत्रता या अभिव्यक्ति की आजादी के सवाल पर लेनिन के विचार साफ और सुलझे हुए हैं। लेनिन ने अभिव्यक्ति की आजादी को अवसरवाद कहा है। लेनिन ने लिखा है- "यह नई 'आलोचनात्मक' प्रवृत्ति एक नए किस्म के अवसरवाद से ज्यादा या कम और कुछ नहीं है।" 
     आए दिन हम 'स्वतंत्रता' की बातें सुनते हैं और करते हैं। लेकिन इस स्वतंत्रता का असली भोक्ता तो उद्योगपति है जो आम जनता को थोथी बातों में उलझा देता है और अपने लिए स्वतंत्रता के नाम पर अबाधित लूट का रास्ता खोल लेता है। लेनिन ने लिखा है - "'स्वतंत्रता' एक महान शब्द है। लेकिन उद्योग की स्वतंत्रता के बैनर तले सर्वाधिक लुटेरे किस्म के युध्द हुए हैं। श्रम की स्वतंत्रता के बैनर तले श्रमिक लूटे गए हैं। 'आलोचना की स्वतंत्रता' शब्दपद के इस आधुनिक इस्तेमाल में भी ऐसा ही फरेब अंतर्निहित है। जो लोग इस बात में यकीन रखते हैं कि उन्होंने सचमुच विज्ञान में तरक्की हासिल की है, वे इस स्वतंत्रता की मांग नहीं करेंगे कि पुराने के साथ-साथ नए विचार चलें बल्कि वे यह चाहेंगे कि नए विचार पुराने विचारों की जगह ले लें। 'आलोचना की स्वतंत्रता जीवित रहे' का मौजूदा आर्त्तनाद खाली कनस्तर से गूंजती आवाज सा प्रतीत होता है।" उल्लेखनीय है सोवियत संघ में समाजवादी व्यवस्था के निर्माण के आरंभिक सालों में अनेक बुद्धिजीवियों ने यह मांग की थी समाजवाद की जगह उदारतावाद की स्थापना की जाए और आलोचना की स्वतंत्रता दी जाए,लेनिन ने अपने उपरोक्त विचार उसी संदर्भ में व्यक्त किए हैं।
      इसी प्रसंग में बर्नस्टीन और दूसरे बुद्धिजीवियों की आलोचना करते हुए लेनिन ने कहा था "हम एक ठोस समूह में एक दूसरे का हाथ थामे तेज रफ्तार से एक दुर्गम रास्ते पर चल रहे हैं। हम चारों ओर से दुश्मनों से घिरे हुए हैं और हमें उनके फायर (गोलीबारी) के साए में लगातार आगे बढ़ना है। हम मुक्त भाव से लिए गए फैसले के तहत और इस उद्देश्य के लिए इकट्ठा हुए हैं कि हमें दुश्मनों से लड़ना है न कि पास में मौजूद दलदल में फंस जाना है। हमें पता है कि इस दलदल के निवासी हमें पहले ही धिक्कार चुके हैं, क्योंकि हम एक अनन्य समूह हैं। ऐसा समूह जिसने 'सुलह' के बजाय 'संघर्ष' का रास्ता चुना है। अब हममें से कुछ लोग यह कहने लगे हैं कि हमें दलदल में जाने दो। जब हम उन्हें इस बात के लिए शर्मसार करते हैं तो हमें जबाव मिलता है कि तुम लोग कितने पिछड़े हुए हो! हमें कहा जाता है कि तुम्हें क्या उलटा इस बात के लिए शर्मसार नहीं होना चाहिए कि तुम मुक्ति के बेहतर रास्ते पर आमंत्रण (हमारे) को ठुकरा रहे हो? हां महानुभावो! आप लोग हमें न केवल आमंत्रित करने के लिए आजाद हैं, बल्कि जहां चाहें वहां जाने के लिए भी मुक्त हैं। दलदल में जाने तक के लिए भी हैं। दरअसल हमें लगता है कि दलदल ही आपके लिए सही जगह है और हम आपको आपकी सही जगह तक पहुंचाने के लिए भी यथासंभव सहयोग कर देंगे। बस आप हमारा हाथ छोड़ दें। स्वतंत्रता जैसे महान शब्द को कलंकित न करें। इसलिए हम लोग भी अपनी राह चलने को स्वतंत्र हैं। हम भी इस दलदल के खिलाफ संघर्ष करने को मुक्त हैं। हम लोग उनके खिलाफ भी संघर्ष करने को स्वतंत्र हैं जो दलदल की ओर कदम बढ़ा रहे हैं!"
      लेनिन ने बार बार स्वतंत्रता को मजदूरवर्ग के हितों के साथ जोड़कर देखा और वंचितों के सामाजिक अस्तित्व रक्षा के संदर्भ में व्याख्यायित करते हुए स्वतंत्रता को भाववाद से मुक्त करते हुए भौतिकवाद से जोड़ा।
     बुर्जुआ मीडिया और विचारक अमूमन स्वतंत्रता ,अभिव्यक्ति की आजादी और आलोचना की स्वतंत्रता के नाम पर भाववादी नजरिए का प्रचार करते हैं। स्वतंत्रता का भाववादी नजरिया स्वतंत्रता को वाचिक सुख की वस्तु बना देता है। जबकि किसी मार्क्सवादी के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ वाचिक और भौतिक सुख से जुड़ा है। खासकर उन वर्गों के लिए जो वंचित ,असहाय,दरिद्र और सर्वहारा हैं। इन वर्गों के लिए स्वतंत्रता कोई किताबी ख्याल नहीं है । न्यायिक या कानूनी समस्या नहीं है। स्वतंत्रता का अर्थ है जीने की स्वतंत्रता। जीने के लिए अनुकूल भौतिक परिवेश की मौजूदगी।  बुर्जुआजी बड़ी ही चालाकी के साथ अभिव्यक्ति और जीने के अनुकूल परिवेश के बीच में अंतराल पैदा कर देता है। और इस समूचे सवाल को मात्र अभिव्यक्ति का सवाल बना देता है। वाचिक सवाल बना देता है।  
   लेनिन ने लिखा है कि हमें कार्ल मार्क्स की महान शिक्षा को इस प्रसंग में सब समय ध्यान में रखना चाहिए। मार्क्स ने लिखा है- " अगर आपको एक होना ही है तो आंदोलन के व्यावहारिक उद्देश्य को संतुष्ट करने के लिए समझौते कीजिए। लेकिन सिध्दांतों के सवाल पर मोल-तोल मत करिए। सैध्दांतिक 'छूट' या 'रियायतें' कभी मत दीजिए।"     
     मुश्किल यह है कि इन दिनों मार्क्सवादी विचारकों का एक बड़ा हिस्सा बुनियादी सिद्धांतों में हेरफेर करके और फिर उनकी असफलता को मार्क्सवाद की असफलता कहकर प्रचारित कर रहा है। कम्युनिस्ट आंदोलन के व्यावहारिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए समझौते किए जा सकते हैं । लेकिन मार्क्सवाद के बुनियादी सिद्धांतों को लेकर समझौतापरस्ती मार्क्सवाद के साथ गद्दारी है। कम्युनिस्ट आंदोलन के विकास में अवसरवाद सबसे बड़ी बाधा है। दुनिया के अनेक देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों ने जब भी अवसरवाद से काम लिया है उन्हें करारी पराजय का सामना करना पड़ा है। कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए अवसरवाद कैंसर की तरह है। अवसरवाद के रूप हैं राजनीतिक अर्थवाद ,जिसमें मजदूर संघ फंसे रहते हैं,राष्ट्रीयता,राष्ट्रवाद,अंध राष्ट्रवाद आदि।
  लेनिन ने एंगेल्स के जरिए इस दौर में त्रिस्तरीय संघर्षों की ओर ध्यान खींचा था और वे हैं ," एंगेल्स ने 1874 में सामाजिक लोकतंत्रवादी आंदोलन के सिलसिले में कहा है। हमारे बीच अभी दो संघर्ष चल रहे हैं सामाजिक और आर्थिक। लेकिन एंगेल्स सामाजिक लोकतंत्र के इन दो महान संघर्षों के बजाय तीन संघर्षों को मान्यता देते हैं। यह तीसरा संघर्ष है सैध्दांतिक संघर्ष जो अन्य दो संघर्षों के समकक्ष है। कहीं से भी उनसे कम महत्वपूर्ण नहीं है।"
     हमारे देश में इस उक्ति की बहुत ज्यादा प्रासंगिकता है। भारत के कम्युनिस्टों ने जहां उनका संगठन है वहां पर सामाजिक और आर्थिक संघर्षों पर ध्यान दिया लेकिन सैद्धान्तिक संघर्ष को तिलांजलि दे दी। अर्थवाद और राजनीतिक अवसरवार को ही मार्क्सवाद के नाम से प्रचारित किया। भारत में मार्क्सवादी सिद्धांतों पर कोई गंभीर काम नहीं हुआ। खासकर पश्चिम,केरल और त्रिपुरा में मार्क्सवादी सिद्धान्तों के निर्माण के संघर्ष को तिलांजलि दे दी गयी। आश्चर्य की बात है इन तीनों राज्यों में एक भी  मार्क्सवादी सिद्धांतकार पैदा  नहीं हुआ।  
  


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