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शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

गुमशुदा 39 के कवरेज से उठे सवाल


        एबीपी न्यूज ने इराक में आईएसआई के द्वारा अपहृत किए गए 40भारतीय मजदूरों पर कल (28जून 2014) एक बेहतरीन तथ्यपरक कार्यक्रम पेश किया। साथ में अपने चैनल की राय भी दी कि कार्यक्रम में प्रस्तुत तथ्यों की खासकर 39मजदूरों की हत्या की वह पुष्टि नहीं कर सकता। इसके बावजूद हमें इस कार्यक्रम से उठे सवालों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यह सच है कि आम आदमी पार्टी के सांसद ने लोकसभा के पिछले सत्र में यह मसला सबसे उठाया था, उस समय किसी ने इस मसले की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया,यहां तक कि विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने भी आश्वासन देकर सारे मसले को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया। लेकिन कल के टीवी कवरेज ने इस मसले को जिंदा कर दिया है। इस मसले पर विदेशमंत्रालय अभी तक बयान नहीं दे पाया है।
      स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इन मजदूरों के अपहरण के प्रसंग का सरकार और उसका तंत्र निगरानी  कर रहा था, आतंकियों के चंगुल से भागे एक मजदूर से भी इराक स्थित दूतावास ने संपर्क किया, लेकिन इस समय वह मजदूर कहां है,कोई नहीं जानता ,साथ ही 39मजदूर किस अवस्था में हैं कोई नहीं जानता।  सरकार ने अपने बयान में भी कहा था कि उसे मालूम है कि भारतीय मजदूरों को बंदी बनाकर कहां रखा गया है। इसके बाद क्या हुआ किसी को कुछ नहीं मालूम। कल हठात 2बंगलादेशी नागरिकों के बयान सुनाकर टीवी चैनल ने सारे देश का ध्यान इस समस्या की ओर खींचा है और पत्रकारिता के लिहाज से यह स्वस्थ बात है। सरकार का पूरा तंत्र जो अब तक सोया पड़ा था हठात हरकत में आ गया है और विदेशमंत्री कह रही हैं कि तथ्यों को जानकर ही वे बयान देंगी। सवाल यह है क्या इस घटना की दैनंदिन सूचनाएं-रिपोर्टिंग मंत्री महोदया को हमारा इराक दूतावास नहीं कर रहा था ? रीयलटाइम में ट्विट करने वाले पीएम और उनके मंत्री एक भी ट्विट क्यों नहीं कर पाए ? क्या मंत्रालय के पास इतनी भी जानकारी नहीं है कि तुरंत कुछ कहा जाय ? सूचनाएं बताती हैं कि 10जून2014 को इराक के मोसुल इलाके में 40 भारतीय मजदूरों का आतंकियों ने अपहरण किया था। इनमें से एक मजदूर किसी तरह भागने में सफल रहा। यह खबर सबसे पहले भारतीय मीडिया में आई। जबकि भारतीय मीडिया में बंगलादेश के मजदूरों के अपहरण की बात एकसिरे से गायब रही है ,लेकिन एबीपी न्यूज की रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है कि कुल91मजदूरों का आतंकियों ने अपहरण किया था जिनमें 51 बंगलादेशी मजदूरों को उन्होंने मुसलमान होने के कारण बाद में छोड़ दिया और 40 भारतीयों को उन्होंने झुंड से अलग करके गोलियों से भून दिया। 
     बंगलादेश के जिन दो चश्मदीद मजदूरों का टीवी कवरेज में चैनल ने इस्तेमाल किया है,उनके बयान के अलावा और किसी स्रोत से इस खबर की पुष्टि नहीं हुई है। उल्लेखनीय है कि आईएसआईएस का अब तक का रवैय्या रहा है कि वे जिनको गोलियों से भूनते हैं उनके बारे में खुद भी बयान जारी करते हैं, वीडियो जारी करते हैं,लेकिन अपहृत मजदूरों के बारे में उन्होंने कोई बयान जारी ही नहीं किया,न तो अपहरण का बयान जारी किया और न हत्या करनेवाली घटना पर बयान जारी किया। दूसरी समस्या यह है कि भारत सरकार यह कहती रही है कि वे जानते हैं इन मजदूरों को बंदी बनाकर रखा हुआ है और वे प्रयास कर रहे हैं रिहाई के। सवाल यह है कि उन प्रयासों में कोई प्रगति हुई या नहीं ? विदेशमंत्री ने विभिन्न स्तरों पर मजदूरों की रिहाई के लिए बातें की हैं लेकिन कोई परिणाम सामने नहीं आया। इसी प्रसंग में यह भी उल्लेखनीय है कई हजार भारतीयों और अपहृत नर्सों को छुड़ाने में सरकार को सफलता मिली है। लेकिन इस चक्कर में 39मजदूरों की रिहाई का मामला अभी तक अटका पड़ा है। कई स्रोतों से यह भी खबर आई थी कि आतंकियों ने 39मजदूरों की रिहाई के बदले मोटी रकम फिरौती के रुप में मांगी थी, जिसे भारत सरकार ने देने से मना कर दिया था। तीसरी मुश्किल यह है कि इराक के जिस इलाके में घटना हुई और जहां पर ले जाकर 39 मजदूरों का 'कत्ल' हुआ है,उसके बारे में इराक स्थित राजदूत या विदेश मंत्रालय या अन्य एजेन्सियों का कोई बयान अभी तक क्यों नहीं आया ? एबीपी न्यूज की खबर जब तक पुष्ट नहीं होती तब तक वह महज़ 'अघटित घटना' की खबर ही कही जाएगी। बेहतर यही होगा कि विदेश मंत्रालय विस्तार के साथ सभी तथ्यों का खुलासा करते हुए श्वेतपत्र के रुप में विस्तृत बयान जारी करे।  

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

इराक की जनता हमसे जबाब चाहती है ,क्या आप बोलेंगे ?



     अमरीका के राष्ट्रपति ने 20 सितंबर 2001 को कांग्रेस के सामने अपने भाषण में ये शब्द कहे :'हम अपने पास उपलब्ध हर संसाधन का प्रयोग करेंगे।'
'अमरीकियों को केवल एक लड़ाई की उम्मीद नहीं होनी चाहिए, यह अभूतपूर्व तथा लंबा अभियान होगा।' 'प्रत्येक क्षेत्र में प्रत्येक राष्ट्र को फैसला करना होगा कि आप हमारे साथ हैं या आतंकवादियों के साथ हैं।' 'मेरा अपनी सेना के लिए भी एक संदेश है : तैयार रहो। मैंने सशस्त्र सेनाओं को सतर्क कर दिया है और इसका एक कारण है। वह घड़ी आ गई है जब अमरीका को कार्रवाई करनी होगी और हम आप पर गर्व करेंगे।' 'यह सभ्यता की लड़ाई है।''मानव स्वतंत्रता की प्रगति, हमारे समय की महानतम उपलब्धि और हर समय की सबसे बड़ी आशा अब हम पर निर्भर है।' 'यह संघर्ष क्या दिशा लेगा, मालूम नहीं। लेकिन परिणाम निश्चित है...और हम जानते हैं कि ईश्वर तटस्थ नहीं है।'
वेस्ट प्वाइंट सैन्य एकेडेमी की 200वीं वर्षगांठ के अवसर पर दिए गए अपने भाषण में अमरीका के राष्ट्रपति ने अन्य बातों के अलावा यह कहा :'हम जिस दुनिया में प्रवेश कर गए हैं उसमें सुरक्षा का केवल एक ही रास्ता है और वह है कार्रवाई। हमारा राष्ट्र कार्रवाई करेगा।' 'अपनी सुरक्षा के लिए हमें आपके नेतृत्व वाली सेना का रूप बदलना होगाउसे ऐसी सेना बनाना होगा जो एक क्षण की सूचना पर दुनिया के किसी भी अंधेरे कोने पर हमला कर सके। हमारी सुरक्षा के लिए यह भी जरूरी होगा कि प्रत्येक अमरीकी आशावादी और संकल्पी हो तथा हमारी स्वतंत्रता और हमारे जीवन की रक्षा के लिए जब भी जरूरी हो हम रोकथाम की कार्रवाई कर सकें।' 'हमें 60 या उससे अधिक देशों में आतंक के ठिकानों का पर्दाफाश करना चाहिए।'
'हम जहां जरूरत है वहां अपने राजदूत भेजेंगे और जहां तुम्हारी, हमारे सिपाहियों की जरूरत है, वहां हम तुम्हें भेजेंगे।' 'हम अच्छाई और बुराई के संघर्ष में डूबे हैं। हम समस्या पैदा नहीं करते, समस्या उजागर करते हैं। इसका विरोध करने में हम दुनिया का नेतृत्व करेंगे।'               
          तत्कालीन राष्ट्रपति के उपरोक्त बयान के बाद इराक और अफगानिस्तान में बहुत कुछ ऐसा घटा है जिसकी हमें खबर तक नहीं है। बुश के बोलने के साथ ही बहुराष्ट्रीय मीडिया ने कु-सूचनाओं और झूठ की चौतरफा बमबारी आरंभ कर दी। नाइन इलेवन की घटना के पहले (1991-92 के पहले तक) इराक में यदि सद्दाम की पुलिस किसी एक व्यक्ति को भी सताती थी तो विश्व मीडिया उसे अपनी सुर्खियां बनाता था। सद्दाम और उसके साथियों की हत्या के साथ इराक पर अमेरिकी सेना जो कब्जा किया है और जुल्म ढ़ाए हैं उन्हें देखकर हिटलर भी शर्मिंदगी महसूस कर रहा होगा।
   बहुराष्ट्रीय मीडिया खोज-खोजकर हिटलर के जुल्मों की दास्तानों का सिलसिला अभी तक बनाए हुए है और कई चैनल तो नियमित हिटलर के अत्याचारों के बारे में नियमित कार्यक्रम दे रहे हैं, सवाल उठता है क्या वे चैनल कभी इराक और अफगानिस्तान में अमरीका और नाटो की सेनाओं के द्वारा जो जुल्म ढ़ाए जा रहे हैं उनका वर्णन करेंगे ? क्या इराक और अफगानिस्तान में नाइन इलेवन की घटना से कम तबाही हुई है ? इराक में सद्दाम के तथाकथित जुल्मो-सितम की नकली कहानियों को प्रचारित करके जो मीडिया यथार्थ रचा गया क्या उसका कभी पर्दाफाश होगा ?
   इराक और अफगानिस्तान में अमेरिका और नाटो की सेनाओं ने जो जुल्म ढ़ाए हैं उनका और बहुराष्ट्रीय मीडिया की उपेक्षा और झूठ का हमें व्यापक रूप में पर्दाफाश करना चाहिए।
    अमेरिका ने इराक में जो युद्ध लड़ा है उसमें सन् 2003 से 2008 तक पांच साल में चार हजार अमेरिकी सैनिक मारे गए। तीस हजार घायल हुए। कई हजार सैनिक अमेरिका में वापस लौटे हैं जो मानसिक बीमारियों के शिकार हैं या पूरी तरह दिमागी संतुलन खो चुके हैं। सद्दाम हुसैन ने  अपने शासन के दौरान इतने लोगों को मानसिक तौर पर विक्षिप्त नहीं किया था जितने अमेरिकी सैनिक हत्यारी मुहिम को अंजाम देकर इराक से विक्षिप्त होकर लौटे हैं। इराक में अमेरिका के डेढ़ लाख से ज्यादा सैनिक हैं और सबसे शानदान और प्रभावशाली अस्त्र-शस्त्र हैं। जिनके बलबूते पर अमेरिका ने इराक पर हमला किया है। इसके बाबजूद इराक के अधिकांश इलाके अमेरिकी सेना के दखल के बाहर हैं।  कहने को इराक पर अमेरिका का कब्जा है।  लेकिन अमेरिकी सेना सुरक्षित नहीं है। इराकी प्रतिवादियों ने अमेरिका और मित्र देशों की सेनाओं की नींद उड़ा रखी है। वे चैन से सो नहीं सकते। जाग नहीं सकते। अहर्निश असुरक्षा और हमले का खतरा उनकी नींद उडाए रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि बर्बर जुल्मोसितम के बाबजूद इराकी जनता ने समर्पण नहीं किया है। बहुराष्ट्रीय मीडिया ने झूठा प्रचार किया था कि इराक की जनता चाहती है कि सद्दाम हुसैन को हटाओ। यह भी प्रचारित किया गया कि इराक की जनता ने अमेरिका और मित्र देशों की सेना और हमले का स्वागत किया है। इराकी जनता पहले दिन से अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ थी। उसे साम्राज्यवाद का विरोध करने के कारण ही इतनी भयानक बर्बरता का सामना करना पड़ा है।     
     इराक में आज भी विभिन्न तरीकों से जनता का प्रतिवाद जारी है ,इस प्रतिवाद को कुचलने के लिए अमेरिका और मित्र देशों की सेनाओं ने सारे इराक को बारूद के ढ़ेर में तब्दील कर दिया है। अमरीका के सैनिक अहर्निश हमले कर रहे हैं और पहरेदारी कर रहे हैं और इससे उन्हें एक ही अवस्था में रिहाई मिलती  है जब हवाई जहाजों से बमबारी की जाती है। प्रति सप्ताह औसतन चार-पांच दिन बमबारी की जा रही है। इस बमबारी में एक बार में 500 से 2000 पॉण्ड बम गिराए जाते थे। इस बमबारी के कारण बस्तियां बर्बाद हो गयीं,पीने के पानी की व्यवस्था नष्ट हो गयी। अस्पताल से लेकर बिजली उत्पादन के केन्द्रों तक किसी को भी नहीं छोडा गया। समस्त जनसुविधाएं नष्ट कर दी गयीं हैं। दस लाख से ज्यादा इराकी मौत के घाट उतार जा चुके हैं। पचास लाख से ज्यादा इराकी देश के बाहर शरणार्थी की तरह नारकीय जीवन जी रहे हैं।
     उल्लेखनीय है कि अमेरिका ने सद्दाम हुसैन ने चंद इराकियों को देश से निकाला था या वे अपनी इच्छा से या राजनीतिक कारणों से देश छोड़कर गए थे, लेकिन आज तो पचास लाख से ज्यादा इराकी शरणार्थी की जिंदगी जी रहे हैं। उनकी कोई खबर मीडिया में नहीं है। सद्दाम के जमाने में कुर्दों के खिलाफ सद्दाम हुसैन और बाथ पार्टी ने जो तथाकथित अत्याचार किए थे उन्हें बहाना बनाकर सद्दाम को फासिस्ट घोषित किया गया। जरा गंभीरता के साथ विचार करें सद्दाम हुसैन के खिलाफ इराक की जनता थी और बतर्ज बहुराष्ट्रीय अमेरिकी मीडिया अमेरिकी सेनाओं का उसने जमकर स्वागत किया था तो सवाल उठता है अमेरिका का स्वागत करने वाली जनता को बर्बर हमलों का शिकार क्यों बनाया गया ? इराक की जो जनता स्वागत कर रही थी अथवा जो फंडामेंटलिस्ट या लोकतांत्रिक लोग स्वागत कर रहे थे, उन्हें अमेरिकी सेना ने गोला-बारूद से स्नान क्यों कराया ? मानव इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि स्वागत करने वाली जनता पर हमलावर राष्ट्र बर्बर हमले करे। इराक की जनता का कसूर क्या था जिसके कारण उस पर हमले किए गए ? पूरे देश की अर्थव्यवस्था नष्ट कर दी गयी।
     इराक पर हमले के लिए पहले बहाना बनाया कि उसके पास जनसंहारक अस्त्र हैं। बाद में जब अमेरिका और मित्र राष्ट्रों की सेना ने इराक पर कब्जा कर लिया और सारा देश छान मारा तो उन्हें एक भी जनसंहारक अस्त्र नहीं मिला। बाद में इराकी जनता पर हमला करने के लिए बहाना बनाया गया कि वहां अलकायदा घुसा है और सद्दाम की बाथ पार्टी से एलायंस करके वे हमले कर रहे हैं । देश में छिपे हुए हैं । उन्हें निकाल बाहर करना है और इसके लिए विभिन्न बस्तियों पर हमले किए ,वायुयानों से बम हरसाए गए। लेकिन न तो कोई अलकायदा वाला मिला और नहीं कोई बाथ पार्टी का बंदा ही हाथ आया। हां.चंद नेता जरूर हाथ लगे थे। लेकिन बाद में बाथ पार्टी और इराक सेना के सैंकड़ों पूर्व सैनिकों ने अमेरिकी सेना के नियंत्रण में तैयार की गई इराकी पुलिस और सेना में नौकरियां ले लीं। वे हिंसा और लूट का हिस्सा बन गए।  
      विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिए आंकडों के अनुसार हिंसा में मार्च 2003 से जनवरी 2008 के बीच में 151,000 इराकी मारे गए। सन् 2006 में यह संख्या बढ़कर 104,000 से 223,000 के बीच हो गयी।  
    जबकि अमेरिकी सेना के हमलों के कारण साढ़े छह लाख से ज्यादा लोग मारे गए हैं। ये वे लोग हैं जो किसी पंगे में शामिल नहीं थे और मारे गए। ये आंकड़े लेनसेट नामक संस्था ने घर-घर जाकर राष्ट्रीय सर्वे करके इकट्ठे किये हैं।
    सबसे बड़ी त्रासदी की बात यह है कि इराक में अमेरिका और मित्र देशों की सेना के हिंसाचार में दिन-दूनी रात चौगुनी वृद्धि हुई है। सन् 2007 और 2008 को सबसे भयानक हिंसाचार देखने में आया है। दूसरी तरफ प्रतिवाद भी बढ़ा है और आत्मघाती हमले भी बढ़े हैं। तकरीबन 1,100 आत्मघाती हमले हो चुके हैं। आत्मघाती हमलों के कारण 13,000 लोग मारे गए हैं। इससे भी ज्यादा संख्या में इराकी घायल हुए हैं। प्रतिमाह तकरीबन साठ हजार इराकियों को जबरिया घर छोड़कर जाने के लिए बाध्य किया गया है ,इसके कारण पचास लाख से ज्यादा इराकी शरणार्थी अपने घरों से हाथ धो बैठे हैं। इनमें तकरीबन 22 लाख इराक में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं। यह आंकड़ा संयुक्त राष्ट्र संघ शरणार्शी आयुक्त ने बताया है।
         सवाल यह है  नाइन इलेवन में जो क्षति हुई और लोग मारे गए। सद्दाम हुसैन ने जितने लोगों को मारा या सताया उसकी तुलना में क्या इराक की इतनी व्यापक बर्बादी का कोई मूल्य है ? हमारा मानना है इराक में किए गए युद्धापराधों के लिए अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बुश और उनकी हत्यारी मंडली, ब्रिटेन टोनी ब्लेयर और उनकी हत्यारी मंडली को विश्व अदालत में इराकी जनता के मानवाधिकारों का हनन करने, संप्रभु राष्ट्र के रूप में इराक को बर्बाद करने और लाखों निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतारने के लिए मुकदमा चलाया जाना चाहिए। इसके अलावा इराक में जो जन-धन और मानव संपदा की हानि हुई है उसके लिए इराकी जनता को अमेरिकी और ब्रिटिश खजाने से मुआवजा दिलवाने के लिए जनमत तैयार करना चाहिए।





























गुरुवार, 1 जुलाई 2010

पचास लाख इराकियों की हत्या ग्लोबल मीडिया शांत क्यों ?

     (इराकी युद्ध के प्रतिवाद में बनायी कलाकृति)       
      इराक में इन दिनों युद्ध चल रहा है ,इस युद्ध को 18 साल से ज्यादा समय हो गया है। अमेरिका और उसके सहयोगी राष्ट्रों की ओर से इराकी जनता पर लगातार हमले किए जा रहे हैं। हमलावर सेनाओं ने अवैध रूप से पूरे इराक पर कब्जा किया हुआ है। आम जनता का जीवन पूरी तरह बर्बाद हो चुका है। इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को अपदस्थ करने और जनसंहारक अस्त्रों की खोज करने नाम पर निकली हमलावर सेनाएं सद्दाम और उसके परिवार के सफाए के बाद भी अभी तक वापस अपने देशों की ओर नहीं लौटी हैं। ग्लोबल मीडिया जो कल तक सद्दाम का भयावह चेहरा पेश कर रहा था उसने हमलावर सेनाओं के हाथों हुई भीषण तबाही की खबरें देनी बंद कर दी हैं।
      इराक में जो कुछ घट रहा है वह मानव सभ्यता के इतिहास की विरल अमानवीय घटना है। इराक के तेल के कुओं पर हमलावर सेनाओं का कब्जा है और आम राजनीतिक भाषा में कहें तो इराक की नागरिकों की गुलामों से भी बदतर अवस्था कर दी गयी है। मध्य-पूर्व में इराक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र था, जहां औरतों को व्यापक स्वतंत्रता प्राप्त थी। इराक की आम जनता खुशहाली की जिंदगी गुजार रही थी और सामान्य जीवन में पूर्ण शांति थी।
     (इराक युद्ध के विरोध में रचा चित्र)
सीनियर बुश के शासनकाल में सद्दाम हुसैन को नष्ट करने और कुवैत से इराक का कब्जा हटाने के बहाने से हमलावर सेनाओं के जो हमले आरंभ हुए थे वे अभी भी जारी हैं। सद्दाम हुसैन और इराकी प्रशासन के खिलाफ अमेरिका ने झूठे आरोप लगाए और विश्वभर के मीडिया से उसका अहर्निश प्रचार किया ।
    तरह-तरह के बहानों के जरिए इराक पर पहले आर्थिक पाबंदी लगायी गयी बाद में कुवैत पर इराक के अवैध कब्जे को हटाने के बहाने हमला किया गया और इस समूची प्रक्रिया ने इराक जैसे सम्पन्न संप्रभु राष्ट्र की संप्रभुता को सरेआम रौंदते हुए हमलावर सेनाओं ने अपने कब्जे में ले लिया।
   विगत 18 सालों में अमेरिकी पाबंदियों  और अमरीका और उसके मित्र देशों की सेना के अवैध कब्जे में इराक का समूचा चेहरा ही बदल गया है। हमलावर सेनाओं की कार्रवाईयों से 50 लाख से ज्यादा इराकी मौत के घाट उतारे जा चुके हैं,लाखों विस्थापित हुए हैं, हजारों को बगैर कारण बताए जेलों में बंद कर दिया गया है।
   (इराक युद्ध के प्रतिवाद में बनायी पेंटिंग)
     विचार करने की बात यह है कि ग्लोबल मीडिया और भारत का कारपोरेट मीडिया इराक की इतनी व्यापक तबाही देखकर भी चुप क्यों है ?       
    एक जमाना था जब सद्दाम के द्वारा मानवाधिकारों के हनन की खबरों को देने के लिए रूप में मीडिया के लोग खास करके टीवी चैनलों के लोग बगदाद में डेरा लगाए हुए थे लेकिन सद्दाम हुसैन के मारे जाने और हमलावर सेनाओं के कब्जे में इराक के आते ही ये सभी चैनल धीरेधीरे इराक को छोड़कर चले आए और यह मान लिया गया कि हमलावर सेनाओं के शासन में इराकी जनता के मानवाधिकार पूर्ण सुरक्षित हैं। सच यह नहीं है।
     ग्लोबल मीडिया और भारत के कारपोरेट मीडिया ने हमलावर सेनाओं के सहायक के रूप में अब तक काम किया है। हमलावर सेनाओं के मान-सम्मान की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। 50 लाख इराकियों के मारे जाने पर भी कारपोरेट मीडिया के तथाकथित सत्यप्रेमी समाचार संपादकों को इराक की तबाही को अभी तक प्रमुख एजेंडा बनाने की याद नहीं आयी है।
    इराक के संदर्भ में कारपोरेट मीडिया जनरक्षक नहीं जनभक्षक नजर आता है। अमेरिकी मीडिया और उनके भारतीय पिछलग्गू टीवी चैनलों में इराक का नियमित कवरेज क्यों गायब हो गया ? यह सवाल प्रत्येक चैनल वाले से पूछना चाहिए। बाजार में ऐसी किताबें प्रचलन में हैं जिनमें इराक युद्ध में अमेरिकियों की कैसे मदद की गई। अमेरिकी शासक कितने भले और सभ्य होते हैं। इसका खूब प्रचार किया जा रहा है। सद्दाम हुसैन को नष्ट करके जो लोग विजय दर्प में डूबे हुए हैं उन्हें यह जबाब देना होगा कि सद्दाम को सबक सिखाने कि इतनी बड़ी कीमत इराक की जनता क्यों दे रही है ?
      मीडिया में 9/11 के पीडितों को लेकर जितना प्रचार किया गया उसकी तुलना में सहस्रांश भी इराकी जनता की पीड़ा और कष्टों के बारे में नहीं बताया गया। इराक की जनता के प्रति कारपोरेट मीडिया का यह उपेक्षा भाव सोची समझी योजना का हिस्सा है, इसका प्रधान लक्ष्य है विश्व जनमत के दिलोदिमाग से इराकी जनता के मानवाधिकार हनन की धो-पोंछकर सफाई करना।
     इराक के प्रसंग में मूल समस्या यह नहीं है कि कौन सही है या था। बल्कि बुनियादी समस्या है कि एक संप्रभु राष्ट्र पर अमेरिका का अवैध कब्जा कैसे हटाया जाए ? आज इराक में चारों ओर सेना है, प्रतिवादी जत्थे हैं और सिर्फ खून-खराबा है। शांति और मानवाधिकारों की स्थापना के नाम पर आयी अमेरिकी सेना ने समूचे इराक को बम और बारूद और खून के ढ़ेर में बदल दिया है।
     इराक में किसी के पास कोई अधिकार नहीं हैं। लोकतंत्र के नाम पर पाखंड चल रहा है। अमेरिका में रहने वाले आप्रवासी इराकियों की कठपुतली सरकार काम कर रही है और इस सरकार के पास में भी कोई अधिकार नहीं हैं ,इराकी प्रशासन का असल बागडोर सीआईए और युद्ध उद्योग के मालिकों के हाथों में है।
संयुक्त राष्ट्र संघ शरणार्थी कमिशनर के द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि युद्ध के कारण इराक के 24 मिलियन लोग शरणार्थी बना दिए गए हैं। यह आंकड़ा 30मई 2010 का है। 50 लाख लोगों को घरविहीन कर दिया गया है। ये लोग बेहद खराब अमानवीय श्थितियों में टेंट में रह रहे हैं। ये लोग जहां रह रहे हैं वहां पर पीने का साफ पानी नहीं है, शौचालय नहीं हैं। बिजली नहीं है। इनमें से ज्यादातर लोग रेल लाइनों और पुलों के किनारे पड़े हुए हैं।
     तकरीबन 2-3 मिलियन इराकी शरणार्थी सीरिया के शरणार्थी शिविरों में नारकीय अवस्था में रह रहे हैं। एक जमाना था इराक में शिक्षित मध्यवर्ग की मध्यपूर्व के देशों में सबसे बड़ी शिक्षित आबादी थी आज इराक का मध्यवर्ग पूरी नष्ट हो गया है। इराकी औरतों को अमेरिकियों की तरफ से जबर्दस्ती वेश्यावृत्ति के धंधे में ठेला जा रहा है। इराकी बच्चों को बाल मजदूरों के काम में ठेलकर भयानक शोषण किया जा रहा है। इराक में युद्ध से मरने  वालों की संख्या चौंकाने वाली है। इतनी बड़ी मात्रा में हिटलर ने भी जर्मनी में यहूदियों को नहीं मारा था। जिन लोगों का हिटलर के हत्याकांड और जनसंहार को देखकर खून खोलता  है उनका खून इराकियों की मौत पर ठंड़ा क्यों है ? वे इसका प्रतिवाद क्यों नहीं करते ?          
             


शनिवार, 19 सितंबर 2009

जूते वाला क्रांति‍कारी

मुतादर अल जैदी आखि‍रकार जेल से बाहर आ ही गए। जेल से बाहर आते ही उन्‍होंने खुदा का शुक्रि‍या अदा कि‍या और दुख व्‍यक्‍त कि‍या कि‍ उनका देश अभी अमेरि‍की गुलामी और सेना के जूतों तले कराह रहा है। उल्‍लेखनीय है यह वही पत्रकार है जि‍सने तत्‍कालीन अमेरि‍की राष्‍ट्रपति‍ जॉर्ज बुश पर जूता फेंका था और उन्‍हें इराकी सेना ने गि‍रफ्तार कर लि‍या था और सजा भी दी थी,अब मुतादर जेल के बाहर है। जेल से बाहर आते ही उसने एक बयान में कहा है , मैं कैद से मुक्‍त हो गया हूँ किन्‍तु मेरा देश अभी भी युद्ध में कैद है। मेरे प्रति‍वाद के समय जि‍न लोगों ने मेरा साथ दि‍या था,चाहे वो देश अंदर या बाहर हों,मैं उन सबका धन्‍यवाद करता हूँ। मेरा वह प्रतीकात्‍मक प्रति‍वाद था।
मुतादर ने अपने देश की दुर्दशा देखकर दुस्‍साहसि‍क फैसला लि‍या और बुश के ऊपर अपना जूता फेंककर मारा था। अपने बयान में उसने कहा है मेरे देश की जनता के साथ जि‍स तरह का अन्‍याय हो रहा है,देश पर कब्‍जा जमाने वालों ने हमारी मातृभूमि‍ को जूतों तले रौंदकर जि‍स तरह अपमानि‍त कि‍या है,उसके कारण ही मैंने जूता फेंककर प्रति‍वाद करने का फैसला लि‍या था। वि‍गत चंद सालों में दस लाख से ज्‍यादा लोग कब्‍जा करने वालों की गोलि‍यों से मारे गए हैं।तकरीबन पचास लाख इराकी शरणार्थी हो गए हैं। लाखों औरतें वि‍धवा हो गयी हैं।लाखों बच्‍चे अनाथ हो गए हैं।देश के अंदर और बाहर वि‍स्‍थापन के कारण लाखों लोगों के घर-द्वार नष्‍ट हो गए हैं।
मुतादर ने कहा कि‍ हमारी एकता और धैर्य ने हमें दमन को भूलने नहीं दि‍या है। हमारे देश में वि‍देशी कब्‍जे के पहले मुक्‍ति‍ का वि‍भ्रम था,लेकि‍न देश पर वि‍देशि‍यों का कब्‍जा हो जाने के बाद भाई भाई का दुश्‍मन हो गया । पड़ोसी पड़ोसी का दुश्‍मन हो गया । बेटा अपने चाचा का शत्रु हो गया। हमारे घर अहर्निश जलने वाली चि‍ताओं के श्‍मशान बनकर रह गए हैं। पार्क और सड़कों पर कब्रगाह फैल गए हैं। यह प्‍लेग है। यह कब्‍जा है जो हमारी हत्‍या कर रहा है। हमारे घरों और मस्‍जि‍दों की पवि‍त्रता नष्‍ट कर दी गयी है और उन्‍हें जेलखानों में तब्‍दील कर दि‍या गया है।
मुतादर न लि‍खा है मैं हीरो नहीं हूँ लेकि‍न मेरे पास नजरि‍या है।मेरे पास उदाहरण है। यह मेरा और मेरे देश का अपमान है। मैं बगदाद को जलते हुए देख रहा हूँ। मेरे लोग मारे जा रहे हैं। हजारों त्रासद तस्‍वीरें मेरे दि‍माग में बसी हुई हैं। वे मुझे लगातार सही रास्‍ते की ओर ठेलती हैं। संघर्ष के रास्‍ते पर ठेलती हैं। अन्‍याय ,वंचना,दुरंगेपन को अस्‍वीकार करने के मार्ग पर ठेल रही हैं। ये मुझे चैन की नींद से वंचि‍त कर रही हैं।मैंने पि‍छले साल अपने जलते हुए देश का दौरा कि‍या था और अपनी आंखों से पीड़ि‍तों के दर्द,पीड़ा,कष्‍ट,आंसुओं को देखा था।मुझे अपनी शक्‍ति‍हीनता पर शर्म आ रही थी।यही वह क्षण था जब मैंने जार्ज बुश पर जूता फेंकने का फैसला कि‍या। मुतादर ने लि‍खा‍ जब सभी मूल्‍यों का उल्‍लंघन हो जाए तो जूता ही एकमात्र उपयुक्‍त अस्‍त्र है। मैंने जब अपराधी बुश के मुँह पर जब जूता फेंका था, तो मैं अपने देश पर कब्‍जा जमाने के बारे में व्‍यक्‍त कि‍ए गए असत्‍य का खंडन कर रहा था। यह मेरा अपने लोगों की हत्‍या का अस्‍वीकार था।यह इराकी संपदा को नष्‍ट करने और लूटने का अस्‍वीकार था। इराकी जनता को लूटने,हत्‍या करने,अपमानि‍त करने,इराकी समाज को बर्बाद करने वाला पीड़ि‍तों से बदले में वि‍दायी के फूल लेने आया था। कब्‍जा जमाने वाले के लि‍ए जूता ही मेरे हाथ में फूल था। उल्‍लेखनीय है मुतादर ने जब जूता फेंका था तो उसे टेलीवि‍जन चैनलों ने व्‍यापक कवरेज दि‍या।अति‍रंजि‍त प्रस्‍तुति‍ की हद तक ले जाकर उसे छोड़ा था।मुतादर की जूता फेंकने की घटना प्रति‍वाद की क्रांति‍कारी शैली का आदर्श इराकी उदाहरण बन गयी।
टीवी प्रस्तुतियां तकनीकी कौशल की देन हैं। इनमें बेचैनी, प्रेरणा और परिवर्तन की क्षमता नहीं होती। ये महज प्रस्तुतियां हैं। जितना जल्दी संप्रेषित होती हैं उतनी ही जल्दी गायब हो जाती हैं। प्रस्तुतियां आनंद देती हैं,मनोरंजन करती हैं और खाली समय भरती हैं। इनके जरिए राजनीतिक यथार्थ समझ में नहीं आता। राजनीतिक यथार्थ तो टीवी प्रस्तुतियों के बाहर होता है।टीवी जि‍न्‍हें 'महानायक' बनाता है उनकी इमेज का वि‍लोम भी वह स्‍वयं तैयार करता है, जि‍स मीडि‍या ने बुश को 'महानायक' बनाया था वही बुश एक ही झटके में अपना वि‍लोम बनते हुए मीडि‍या में देख रहा था। टीवी की यह वैचारि‍क वि‍शेषता है कि‍ वह जि‍से आइकॉन बनाता है फि‍र उसकी इमेज का वि‍लोम भी तैयार करता है।
यथार्थ की कठोर वास्तविकता ने बुश की 'महानायक' वाली फैण्टेसीमय इमेज को जूते फेंकने वाली घटना ने एक ही झटके में खत्‍म कर दि‍या। अपने आखिरी इराकी दौरे के समय एक प्रेस कॉफ्रेस में एक पत्रकार ने जब बुश के ऊपर प्रतिवाद स्वरूप जूता फेंककर मारा तो सारी दुनिया में जूते फेंकने वाले के पक्ष में हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया। अमरीकी मीडिया में भी इस घटना का प्रभावशाली रूपायन हुआ और अमरीकी राजनीतिक सर्किल में बुश के पक्ष में कोई बोलने के लिए तैयार नहीं हुआ।
एक पत्रकार के जूते के सामने बुश बौने लग रहे थे,जूते की मार से बचने के लिए सिर झुका रहे थे। डिजिटल फोटो में इराकी जूता ऊपर था जॉर्ज बुश का सिर नीचे था। यह बुश की प्रतीकात्मक पराजय थी। महायथार्थ के फैंटेसीमय महाख्यान का शानदार ग्लोबल अंत था। अब बुश महान नहीं थे । बुश सद्दाम से जीत गए किंतु इराकी जूते से हार गए। जूते का सच इराकी सच है। यह उन तमाम तर्कों का अंत है जो बुश को वैध बनाते हैं,महान् बनाते हैं। यह उस सेंसरशिप का भी अंत है जो अमरीकी मीडिया में इराक को लेकर जारी है। संदेश यह है कि इराकी जूता सच है अमरीकी प्रशासन गलत है। इराक को लेकर अमरीकी नीतियां गलत हैं। इराक विजय से आरंभ हुआ बुश आख्यान इराकी जूते के आगमन से खत्म हुआ। एक जूता अमरीका की विशाल सेना पर भारी पड़ा, यह साधारण इराकी का जूता था और इसे भी ओबामा की जीत के बाद ही पड़ना था। तात्पर्य यह कि मीडिया निर्मित फैंटेसी नकली होती है, उसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। एक स्थिति के बाद यह गायब हो जाती है।
महायथार्थ ( वर्चुअल रि‍सलि‍टी) की धुरी है विवरण,ब्यौरे और सुनियोजित फैंटेसीमय प्रस्तुति । इस तरह की प्रस्तुतियां संवाद नहीं करती बल्कि इकतरफा प्रचार करती हैं। दर्शक के पास ग्रहण करने के अलावा कोई चारा नहीं होता। वह इसमें हस्तक्षेप नहीं कर पाता। महायथार्थ की आंतरिक संरचना में नागरिक की आकांक्षाओं को समाहित कर लिया जाता है। आकांक्षाओं को समाहित कर लेने के कारण नागरिक को बोलने,हस्तक्षेप, प्रतिवाद और सवाल पूछने की जरूरत नहीं होती। नागरिक को निष्क्रिय बनाकर महायथार्थ के फ्रेम में प्रचार चलता है । चर्चा का नकली वातावरण बनता है । सामाजिक जीवन में बहस एकसिरे से गायब हो जाती है। मुतादर अल जैदी की कहानी भी महायथार्थ के फ्रेम में आई और व्‍यापक प्रभाव छोड़कर चली गयी। उसका प्रतीकात्‍मक प्रति‍वाद क्रांति‍कारी कार्रवाई है। वह साधारण जूता फेंकने वाली कार्रवाई नहीं है। इराकी जनता का प्रत्‍येक प्रति‍वाद हमें साम्राज्‍यवाद के खि‍लाफ जंग की प्रेरणा देता है। जबकि‍ टीवी के लि‍ए यह महज घटनामात्र है।

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