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मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

नवजागरण और शूद्रों की मुक्ति के सवाल


          भारतीय नवजागरण पर जब भी बहस होती है तो दलितों या शूद्रों की मुक्ति के सवालों पर बहस नहीं होती,यह मान लिया गया कि दलितों की मुक्ति का आरंभ बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर के आने के बाद होता है। ज्योतिबा फुले दलित मुक्ति के मिशन की नींव रखते हैं,लेकिन इस पर पूरा शास्त्र बाबासाहेब ने ही बनाया।
     दलित मुक्ति का सवाल जहां एक ओर दलितों की मुक्ति से जुड़ा है वहीं दूसरी ओर यह सवाल फुले-आम्बेडकर के सत्ता विमर्श से जुड़ा है। इन दोनों को अंग्रेजों के शासन से कोई गंभीर शिकायत नहीं है। ये दोनों ही तत्कालीन सत्ता से हमदर्दी रखते हैं। सवाल यह है क्या दलितों की मुक्ति पूंजीवाद में संभव हैॽ क्या पूंजीवादी सत्ता विमर्श में वैकल्पिक नजरिए से शामिल हुए बगैर दलित के लिए संघर्ष करना संभव हैॽ क्या पूंजीवादी सत्ता विमर्श दलितों को मुक्ति देता है ॽ
    नवजागरण बुर्जुआ संवृत्ति है।यह आधुनिकता के प्रकल्प का अंग है,इसे क्रांतिकारी प्रकल्प नहीं समझना चाहिए।यदि नवजागरण के परिप्रेक्ष्य में ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर के नजरिए को देखेंगे तो यह मूलतःआधुनिकतावादी आंदोलन है।इसी तरह बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर का समग्र नजरिया बुर्जुआ है और उसकी धुरी है आधुनिकता।पुराने किस्म के दलित की बजाय आधुनिक दलित की खोज और निर्माण उसका केन्द्रीय लक्ष्य है।यह नजरिया दलित को पुराने सामंती शोषण से मुक्त तो करता है लेकिन दलितों में शोषणमुक्त समाज का नजरिया नहीं बनाता।पूंजीवाद से मुक्ति का सपना पैदा नहीं करता।
यही वजह है 20वीं शताब्दी में बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर ही दलित मुक्ति के केन्द्र में है।इस धारणा ने कई स्टीरियोटाइप सरलीकरणों को जन्म दिया है।पहला,दलित मुक्ति का एकमात्र रास्ता वही है जिसको आम्बेडकर व्यक्त करते हैं।दूसरा,शिक्षा से जातिप्रथा नष्ट हो जाती है,तीसरा,दलितमुक्ति के लिए आरक्षण जरूरी है,चौथा,पूंजीवाद के विकास के साथ जातिप्रथा स्वतः नष्ट हो जाएगी,जाति शोषण नष्ट हो जाएगा।पांचवां,महानगरीय जीवन जातिप्रथा खत्म कर देता है। ये पांचों चीजें आधुनिकता के प्रकल्प का हिस्सा है। इन सरलीकरणों के पीछे आस्थाएं ही प्रमुख रूप से काम करती रही हैं।आस्था केन्द्रित होने के कारण नवजागरण और दलित पर बहुत कुछ ऐसा लिखा गया है जिसका यथार्थ से कम संबंध है,इसमें इच्छित लक्ष्यों और इच्छित तर्कों के आधार पर इच्छित सामाजिक यथार्थ की सृष्टि करने में भारत के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग सफल रहा है।
     नवजागरण और शूद्र के अन्तस्संबंध के प्रसंग में सबसे पहली बात यह कि नवजागरण वस्तुतःदलितमुक्ति का प्रकल्प नहीं है।बल्कि यों कहें तो सही होगा कि नवजागरण के दलित मुक्ति के बुनियादी लक्ष्यों से  गहरे अंतर्विरोध हैं।
   जाति कहां है -
        जाति के समान कोई चीज नहीं है जिसके साथ जाति का विनिमय नहीं हो सके। जाति का किसी भी चीज से विनिमय संभव नहीं है,यह व्यवस्था या सिस्टम है,इसको आप पूरा छोड़ें तब ही जाति से मुक्ति संभव है,जाति में से किसी अंश को रख लो,अथवा उस जाति का वह गुण ले लो या निचली जाति से ऊँची जाति में या अ-सवर्ण से सवर्ण जाति में चले जाने से जाति खत्म होने वाली नहीं है।अंशों में विनिमय के जरिए जाति खत्म नहीं होगी।जाति तो जाति है उसका विनिमय नहीं कर सकते।वह बेहद ठोस भौतिक शक्ति है, उसके साथ भेदभावभरी व्यवस्था के साथ विनिमय संभव नहीं है।जाति ठोस है,उसके विचार चंचल हैं,इसलिए जब भी जाति बदलती दिखती है तो असल में जाति नहीं बदलती उसके विचार बदलते हैं,जाति तो जस की तस बनी रहती है।विचारों के विनिमय से जाति नहीं बदलती।विचार बदलते हैं,जाति असल में शोषण का एक रूप है,जो बड़ी बारीकी से हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक-आर्थिक जीवन में व्याप्त हो गयी है।हम जब जाति सुधार की बातें करते हैं तो अधिक से अधिक जाति के बुरे विचार को निकाल फेंकने की बातें करते हैं।इससे जाति नष्ट नहीं होती।

    जाति कोई सामाजिक समूह नहीं है,सामाजिक समूह के रूप में जाति को देखेंगे तो सही निष्कर्ष नहीं निकलेंगे।जाति को सामाजिक समूह के रूप में देखेंगे तो हमें अधिक से अधिक उसके ऊपरी ढाँचे को बदलने की इच्छा पैदा होगी,हम ऊपरी ढाँचे को बदल देंगे,लेकिन इससे जाति की आत्मा नहीं बदलेगी।छूआछूत,ऊँच-नीच,निचली जाति,ऊँची जाति, मनु व्यवस्था या अन्य व्यवस्थाएं या संवैधानिक व्यवस्थाएं अपने आपमें जाति को खत्म नहीं कर सकतीं,क्योंकि सभी किस्म के संवैधानिक उपाय जाति के ऊपरी कलेवर को बदलते हैं,उसकी आत्मा को स्पर्श नहीं करते।असल में जाति की आत्मा विनिमयरहित है।जाति के एक विचार को खत्म करेंगे,तो तुरंत दूसरा विचार उसकी हिमायत में उठ खड़ा होगा।हम करीब से उन जातियों को देखें जहां पर जाति का ऊपरी तौर पर खात्मा हो गया है लेकिन उससे समस्या खत्म नहीं हुई है। मसलन्,पश्चिम बंगाल में जातिप्रथा खत्म हो गयी है लेकिन उसकी जगह शोषित-शोषक के नए संबंधों ने जन्म ले लिया है,उन संबंधों को सहज ही घर-घर जाकर देख सकते हैं। कहने का आशय यह कि जाति तो शोषण का पुराना आदिम रूप है,वह हम सबकी आदतों,संस्कारों,चाल-चलन,रीति-रिवाज आदि में घुस आया है,वह सिर्फ समुदाय के रूप में ही मौजूद नहीं है बल्कि उसने दृष्टिकोण में जगह बना ली है।यही वजह है जाति के समान और कोई जगत नहीं है।
      जाति में रहने और जाति के मार्ग पर चलने का अर्थ है कि इसमें पैर जमाकर चल ही नहीं सकते, यह बेहद रपटन भरा मार्ग है।पुराने समाज में जाति के समान कोई चीज मौजूद नहीं है, आज भी जाति के समान कोई चीज नहीं है,जाति से किसी चीज की तुलना नहीं कर सकते,यह अतुलनीय है।इसने जीवन के हर क्षेत्र को अपने दायरे में शामिल कर लिया है।जाति के लिए समाज का हर आईना छोटा है,जाति हमारे विजन में इस कदर घर किए हुए है कि हम उसके बिना कोई चीज देख ही नहीं सकते।जाने-अनजाने जाति हमारे नजरिए  को प्रभावित करती है,वहां से हमारे ज़ेहन में शोषण के लक्षण व्यंजित होते रहते हैं।
    जाति को हमें सिस्टम की तरह देखना चाहिए।सिस्टम की तरह देखेंगे तो इसके आर्थिक आधार को भी देख पाएंगे।जाति कोई मानसिक अवस्था या विचार मात्र नहीं है।कहने के लिए जाति के ही आधार पर हर तरह का कार्य-व्यापार चलता रहा है।लेकिन जाति को आज इसके जरिए किसी चीज का विनिमय नहीं कर सकते।जाति के इस दौर में तीन और क्षेत्र सामने आए हैं वह है राजनीति,न्याय और साहित्य।इन तीनों क्षेत्रों में जाति के आधार पर देखने,विनिमय करने की बड़े पैमाने पर कोशिशें हो रही हैं लेकिन मुश्किल यह है जाति को आधार बनाकर ज्योंही संप्रेषण करेंगे,संप्रेषण खत्म हो जाएगा।इसका प्रधान कारण यही है कि जाति को आधार बनाकर कोई बात नहीं की जा सकती, जाति की किसी से तुलना संभव नहीं है, किसी से विनिमय संभव नहीं है। क्योंकि जाति का जाति के बाहर कोई अर्थ नहीं है,जाति तब तक ही अर्थवान या प्रासंगिक है जब तक जाति के दायरे में रहकर विचार करते हैं। जाति की राजनीति तब तक चमकदार नजर आती है जब तक वह जाति केन्द्रित रहे,उसी तरह दलित साहित्य की केटेगरी तब तक प्रासंगिक है जब तक दलित के लेखन को जाति के आधार पर देखा जाय,उसके बाहर इनकी प्रासंगिकता नहीं है।जाति की इस सीमा को हमेशा ध्यान में रखें।
    जाति की दूसरी बड़ी विशेषता है कि वह अपने में हर चीज को समाहित करने की क्षमता रखती है।जो लोग जाति के आधार पर सोचते हैं वे हर चीज को जाति के आधार पर ही देखते हैं,चाहे राजनीति हो या न्याय हो या साहित्य या कला रूप हों,इन सब पर बातें करते समय हमेशा हर चीज को खींचकर जाति में समाहित कर लेते हैं।जब वे किसी चीज को जाति के आधार पर देखते हैं तो फिर उसमें से इच्छित अंतर्वस्तु भी निकाल लेते हैं। वे इस इच्छित अंतर्वस्तु को यथार्थ में रूपान्तरित नहीं कर पाते। उसके भिन्न अर्थ को देख नहीं पाते।
      जाति की तीसरी सबसे बड़ी विशेषता है उसके अंदर केटेगरी या कोटियों की अनिश्चितता है।मसलन्,जो जाति यूपी में आरक्षित केटेगरी में आती है,जरूरी नहीं है वह बंगाल या अन्य जगह आरक्षित केटेगरी में हो। यही वजह है जाति का भिन्न –भिन्न इलाकों या समुदायों में अलग ढ़ंग का विकास और चरित्र नजर आता है।इससे जाति की काल्पनिकता या विभ्रम सामने आते हैं।
     जाति को केन्द्र में रखकर जितना भी विमर्श निर्मित हुआ है उसके केन्द्र में प्रतीकों की भाषा है। इस भाषा ने जाति को वस्तुओं के संसार में एक वस्तु बना दिया है।फलतःवह अनुमान और अनुकरण पर चलती रही है,और आज भी चल रही है।उसके काल्पनिक और वास्तविक रूप में भेद करना असंभव है। मसलन्, एक ओर शूद्र अतिगरीब मिलेंगे तो दूसरी ओर आईएएस भी मिलेंगे,आप तय नहीं कर सकते कि यथार्थ में शूद्र क्या है ॽ सच यह है जाति पर अधिकांश बहस अनुमानाधारित है,जबकि दावे किए जाते हैं कि वह यथार्थ पर आधारित है।दिक्कत तब आती है  जब आप एक ही साथ अतिगरीब शूद्र और आईएएस शूद्र को सामने रखकर देखते हैं।इससे हमारे अनुमान में निहित अ-व्यवस्था का उद्घाटन होता है।
   ज्योंही यथार्थ और विवेकवाद इन दो तत्वों का जाति के मूल्यांकन के प्रसंग में इस्तेमाल करते हैं तो जाति हमें ठोस रूप में स्थिर नजर आने लगती है, इस तरह दिखने लगती है कि उसका किसी भी चीज से विनिमय संभव नहीं है। जाति के सिद्धांत के दायरे में तो जाति प्रासंगिक लगती है लेकिन ज्योंही जाति के सिद्धांतों के बाहर निकलोगे तो जाति अ-प्रासंगिक नजर आने लगेगी।
   सवाल यह है जाति पुराना सिस्टम है,नया आधुनिक सिस्टम पूंजीवाद है।क्या जाति का पूंजीवाद के साथ विनिमय संभव है ॽक्या पूंजीवाद में जातियों का लोप हो जाएगा ॽ जी नहीं,पूंजीवाद में जातियों का लोप नहीं हो सकता।उल्टे जातियों के विकास की अनंत संभावनाओं के द्वार पूंजीवाद ने खोले हैं। नवजागरण आने के बाद जातियों की संख्या बढ़ी है, घटी नहीं है।जातियों के नाम पर सुख,सुविधा,कानून आदि सबमें इजाफा हुआ है,जातियों का विभिन्न नई जातियों में नाम परिवर्तन हुआ है लेकिन जाति का लोप नहीं हुआ है। जातियों के लिए नई परिधियां तय कर ली गयी हैं,नए आधार तय कर लिए गए हैं।इससे जाति के सिस्टम में अनिश्चितता और बढ़ी है।मसलन्, आज से सौ साल पहले व्यक्ति को जिस जाति के सदस्य के रूप में जानते थे वह आज उस जाति से निकलकर भिन्न जाति में शामिल हो चुका है।ऐतिहासिक तौर पर जाति के नाम का बदलना बताता है जाति में नाम बदलने,नियम बदलने,स्वयं ही अपने को नष्ट करके नए रूप में पेश करने की विलक्षण क्षमता है।इसके कारण जाति अपने को बार-बार प्रासंगिक और नए मूल्यबोध से जोड़ने में सफल हो जाती है।फलतः वह अपने को नष्ट करने में असफल रहती है।इस नजरिए से देखें तो पाएंगे कि जाति हर बार नया विभ्रम और अनिश्चितता  निर्मित करती है।इसका अर्थ यह भी है जाति खत्म होती नजर नहीं आती बल्कि आर्थिक तौर पर और भी ज्यादा ताकतवर नजर आती है। समग्रता में देखें तो जाति के लिए मूल्य और कानून अपवाद हैं ,विभ्रम यानी इल्युजन बुनियादी नियम है,फलतः जाति हमेशा समाज में बनी रहती है।मसलन्, आप जाति के नाम पर सब कुछ पा सकते हैं ,सब कुछ पाने के बाद भी जाति से आप मुक्त नहीं होते तो हम यही कहेंगे कि जाति के साथ किसी भी चीज का विनिमय संभव नहीं है। मसलन्, जाति के नाम पर शिक्षा,रोजगार,सामाजिक हैसियत आदि सब मिल जाता है,इसके बाद भी जाति नहीं छूटती।इसका अर्थ यह भी है कि जाति सबसे ज्यादा सुव्यवस्थित सिस्टम है जिसे आप नियम, कानून, रोजगार,शिक्षा आदि प्रदान करके भी खत्म नहीं कर सकते।बल्कि उलटे इनसे जाति के और भी पुख्ता हो जाने की संभावनाएं पैदा हो जाती हैं।
   जाति पर बहस के दौरान असमानता,कर्ज और उत्पीड़न इन तीन कोटियों में जाति विमर्श सामने आया है।इन तीनों तत्वों या कोटियों को यदि जाति के परिप्रेक्ष्य में पेश किया जाएगा तो यह तय है ये तीनों तत्व लौट-फिरकर वापस केन्द्र में आ जाएंगे।क्योंकि इन तीनों में अनुकरण पैदा करने की विलक्षण क्षमता है।ये अंतहीन चक्राकार रूप में घूमते रहते हैं।कुछ साल पहले केन्द्र सरकार ने किसानों के कर्ज माफ कर दिए,लग रहा था अब किसान कर्ज मुक्त हो गया है,लेकिन कुछ ही सालों में किसान फिर कर्जगीर हो गया।इन किसानों में दलित जातियों का बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है।इसी तरह दलित के उत्पीड़न को लेकर जितने भी सख्त कानून बना लो,उत्पीड़न पुनःलौटकर आ जाता है। तमाम कानून बनाने के बावजूद दलितों का उत्पीडन खत्म नहीं हुआ है,यही हाल औरतों के उत्पीड़न का है।असल में असमानता,कर्ज और उत्पीड़न ये तीन कोटियां ऐसी हैं जो तमाम कानून बनाए जाने के बाद भी बनी रहती हैं, इनके जरिए यथार्थ के साथ विनिमय नहीं कर सकते। इनके जरिए यथार्थ नहीं बदल सकते,इनके जरिए कोई नई चीज पैदा नहीं कर सकते।

     असमानता,कर्ज और उत्पीड़न इन तीनों के आधार पर जब भी कोई परिप्रेक्ष्य खड़ा किया जाएगा वह अंततःअसफल होगा।मसलन्, यह माना गया कि भूमिहीनों को जमीन बांट देने से गांवों में असमानता घटेगी,भूमिहीन किसान ताकतवर बनेगा,पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर भूमि सुधार कार्यक्रम को लागू किया गया,लेकिन दो दशक के बाद पता चला कि भूमिहीन किसान जमीन के पाने के बावजूद असमानता,अभाव,कर्ज के जंजाल से मुक्त नहीं हो पाया,उसकी पामाली घटने की बजाय बढ़ गयी।उसे जिन चीजों से बचाने के लिए जमीन दी गयी थी उन चीजों से जमीन उसकी रक्षा नहीं कर पायी।

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

शूद्र सांस्कृतिक बंधुत्व से भागे हुए हिन्दू

    हम सबके अंदर जातिप्रेम और दलितघृणा कूट-कूट भरी हुई। किसी भी अवसर पर हमारी बुद्धि नंगे रूप में दलित विरोध की आग उगलने लगती है। दलितों से मेरा तात्पर्य शूद्रों से है। अछूतों से हैं।
      सवाल उठता है अछूतों से आजादी के 60 साल बाद भी हमारा समाज प्रेम क्यों नहीं कर पाया ? वे कौन से कारण हैं जिनकी वजह से हम आज भी दलितों से नफरत करते हैं। उन्हें पराया मानते हैं। मेरे कुछ हिन्दुत्ववादी पाठक हैं वे तो मुझपर बेहद नाराज हैं। मैं उनसे यही कह सकता हूँ कि अछूत समस्या,दलित समस्या मूलतः सामाजिक- आर्थिक -राजनीतिक समस्या ही नहीं है। बल्कि यह एक सांस्कृतिक समस्या भी है।
    दलित समस्या को हमने अभी तक राजनीतिक समस्या के रूप में ही देखा है। उसके हिसाब से ही संवैधानिक उपाय किए हैं। उन्हें नौकरी से लेकर शिक्षा तक सब चीजों में आरक्षण दिया है। आजादी के पहले और बाद में मौटे तौर पर वे राजनीतिक केटेगरी रहे हैं। उनकी सांस्कृतिक और आर्थिक नजरिए से हमने कभी सामूहिक मीमांसा नहीं की है। संस्कृति और आर्थिक जीवन के उन चोर दरवाजों को बंद करने का प्रयास ही नहीं किया जिनसे हमारे मन में और समाज में दलित विरोधी भावनाएं मजबूती से जड़ जमाए बैठी हैं।
     जाति को राजनीतिक केटेगरी मानने से जातिविद्वेष बढ़ता है। जाति व्यवस्था सांस्कृतिक-आर्थिक केटेगरी है। संस्कृति इसकी धुरी है आर्थिक अवस्था इसका आवरण है।  अंग्रेजों को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने आधुनिक भारत में जातिप्रथा को प्रधान एजेण्डा बनाया। सामाजिक व्यवस्था के रूप में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रयासों से ही जातिप्रथा का अध्ययन आरंभ हुआ।
    कंपनी शासन के लोग नहीं जानते थे कि जातिप्रथा क्या है ? वे यहां शासन करने के लिए आए थे और यहां के समाज को जानना चाहते थे।यही बुनियादी कारण है जिसके कारण अंग्रेज शासकों के अनुचर इतिहासकारों, मानवविज्ञानियों,प्राच्यविदों आदि ने जातिप्रथा का गंभीरता के साथ अध्ययन आरंभ किया।
     अति संक्षेप में इतिहासकार रामशरण शर्मा के ‘शूद्रों का प्राचीन इतिहास ’ ग्रंथ के आधार पर कह सकते हैं कि प्राचीनकाल में मवेशियों को लेकर जमकर संघर्ष हुए हैं और बाद में जमीन को लेकर संघर्ष हुए हैं। जिनसे ये वस्तुएं छीनी जाती थीं और जो अशक्त हो जाते थे,वे नए समाज में चतुर्थ वर्ण कहलाने लगते थे।फिर जिन परिवारों के पास इतने अधिक मवेशी हो गए और इतनी अधिक जमीन हो गयी कि वे स्वयं संभाल नहीं पाते थे,तो उन्हें मजदूरों की आवश्यकता हुई और वैदिककाल के अंत में वे शूद्र कहलाने लगे।
  हमारे बीच में शूद्रों के बारे में अनेक मिथ प्रचलन में हैं इनमें से एक मिथ है कि शूद्र वर्ण का निर्माण आर्य पूर्व लोगों से हुआ था। यह नजरिया एकांगी है और अतिरंजित है। इसी तरह यह भी गलत धारणा है कि आरंभ में सिर्फ आर्य ही थे।
    वास्तविकता यह है कि आर्थिक तथा सामाजिक विषमताओं के कारण आर्य  और आर्येतर ,दोनों के अंदर श्रमिक समुदाय का उदय हुआ और ये श्रमिक आगे जाकर शूद्र कहलाए। यह ऐतिहासिक सच है कि वैदिककाल के आरंभ में शूद्रों और दासों की संख्या कम थी। लेकिन उत्तरवर्ती वैदिककाल के अंत से लेकर आगे तक शूद्रों की संख्या बढ़ती गई, उत्तर वैदिक काल में वे जिन अशक्तताओं के शिकार रहे हैं,वे वैदिककाल में नहीं थीं।
       एक मिथ यह भी है कि शूद्र हमेशा से मैला उठाते थे,अछूत थे। यह तथ्य और सत्य दोनों ही दृष्टियों से गलत है। यदि हिन्दूशास्त्रों के आधार पर बातें की जाएं तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि त्रेता-युग का आरंभ होने के समय वर्णव्यवस्था का जन्म नहीं हुआ था। न कोई व्यक्ति लालची था और न लोगों में दूसरों की वस्तु चुराने की आदत थी।
    चतुर्वर्ण की उत्पत्ति के संबंध में सबसे प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद के पुरूषसूक्त में मिलता है। अनुमान है कि इसे संहिता के दशम मण्डल में बाद में जोड़ा गया था। बाद में इसे वैदिक साहित्य,गाथाकाव्य,पुराण और धर्मशास्त्र में अनुश्रुतियों के आधार पर कुछ हेर-फेर के साथ पेश किया गया। इसमें कहा गया है कि ब्राह्मण की उत्पत्ति आदिमानव (ब्रहमा) के मुँह से,क्षत्रिय की उनकी भुजाओं से,वैश्य की उनकी जांघों से, और शूद्र की उनके पैरों से हुई थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि शूद्र और अन्य तीनों वर्ण एक ही वंश के थे और इसके फलस्वरूप वे आर्य समुदाय के अंग थे।
     शूद्रों के प्रति भेदभाव और घृणा सामाजिक विकास के क्रम में बहुत बाद पैदा हुई है। कायदे से हम सब एक हैं हममें और शूद्रों में बुनियादी तौर पर कोई अंतर नहीं है। कालांतर में श्रम और श्रम विभाजन की प्रक्रिया में हमने शूद्रों को अलग करने की आदत डाली,उनसे भेदभावपूर्ण व्यवहार आरंभ किया। उनके साथ उत्पीड़क का व्यवहार करने लगे और एक अवस्था ऐसी भी आयी कि हमने उनके सांस्कृतिक-सामाजिक उत्पीड़न को वैधता प्रदान करने वाला समूचा तर्कशास्त्र ही रच डाला।
    सवाल उठता है कि शूद्र पदबंध आया कहां से ? रामशरण शर्मा ने लिखा है कि जिस प्रकार सामान्य यूरोपीय शब्द ‘स्लेव’ और संस्कृत शब्द ‘दास’ विजित जनों के नाम पर बने थे, उसी प्रकार शूद्र शब्द उक्त नामधारी पराजित जनजाति के नाम पर बना था। ईसापूर्व चौथी शताब्दी में शूद्र नामक जनजाति थी। क्योंकि डियोडोरस ने लिखा है कि सिकंदर ने आधुनिक सिंध के कुछ इलाकों में रहने वाली सोद्रई नामक जनजाति पर चढ़ाई की थी। इतिहासकार टालमी ने लिखा है सिद्रोई आर्केसिया के मध्यभाग में रहते थे जिनके अंतर्गत पूर्वी अफगानिस्तान का बहुत बड़ा हिस्सा पड़ता है और इसकी पूर्वी सीमा पर सिन्धु है।
  सवाल यह है शूद्र हमारे आदिम बंधु हैं। क्या उन्हें हम आधुनिककाल में समस्त भेदभाव त्यागकर अपना मित्र नहीं बना सकते ? अपना पड़ोसी,अपना रिश्तेदार,अपना भाई, अपना जमाई,अपना बेटा नहीं बना सकते ?
     हमें गंभीरता के साथ उन कारणों की तलाश करनी चाहिए जिनके कारण शूद्र हमसे दूर चले गए और आज भी हमसे कोसों दूर हैं। हम सांस्कृतिक तौर पर पहले एक-दूसरे के साथ घुले मिले थे लेकिन अब एक-दूसरे के लिए पराए हैं,शत्रु हैं।
    पहले शूद्र एक ही शरीर और एक ही समाज का अनिवार्य अंग थे। आज एक-दूसरे से अलग हैं,एक-दूसरे के बारे में कम से कम जानते हैं,एक-दूसरे बीच में रोटी-बेटी-खान-पान-पूजा-अर्चना के संबंध टूट गए हैं। यह विभाजन हम जितनी जल्दी खत्म करेंगे उतना ही जल्दी सुंदर भारत बना लेंगे। भारत की कुरूपता का कारण है जातिभेद और शूद्रों के प्रति अकारण घृणा।
   भारत सत्ता,संपदा,तकनीक,इमारत,इंफ्रास्ट्रक्चर,उद्योग-धंधे,आरक्षण आदि में कितनी ही तरक्की कर ले, कितना ही बड़ा उपभोक्ता बाजार खड़ा कर ले हम जब तक शूद्रों के साथ सांस्कृतिक संबंध सामान्य नहीं बनाते सारी दुनिया में हमारा नाम पिछड़े देशों में बना रहेगा। समाज में  सामाजिक तनाव बना रहेगा।
    कुछ अमरीकीपंथी दलित विचारक हैं जो यह मानकर चल रहे हैं कि दलितों की आर्थिक स्थिति सुधर जाएगी तो दलितों की मुक्ति हो जाएगी। दलितों के पास दौलत आने ,उनके उपभोक्ता बनने से जातिभेद की दीवार नहीं गिरेगी बल्कि जातिभेद और बढ़ेगा। उपभोक्तावाद भेदभाव खत्म नहीं करता बल्कि भेदभाव बढ़ाता है।
    वस्तुओं के समान उपभोग से सांस्कृतिक भेदभाव की दीवारें गिरती नहीं हैं उलटे सांस्कृतिक भेदभाव की दीवारें मजबूत होती हैं। उपभोक्तावाद को भेदभाव से मदद मिलती है वह बुनियादी सामाजिक भेदभाव को बनाए रखता है।
उपभोक्तावाद में यदि भेदभाव की दीवार गिरा देने की ताकत होती तो अमेरिका और ब्रिटेन में नस्लीय भेदभाव की समाप्ति कभी की हो गयी होती। वस्तुओं का उपभोग भेद की दीवारें नहीं गिराता। वस्तुएं सांस्कृतिक मूल्यों को अपदस्थ नहीं करतीं। जातिभेद के सांस्कृतिक मूल्यों को अपदस्थ करने वाले नए मूल्यों को बनाने की पूंजीपति वर्ग में क्षमता ही नहीं है यदि ऐसा ही होता तो काले लोगों को विकसित पूंजीवादी मुल्कों में भयानक नस्लीय भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता।   

गुरुवार, 13 मई 2010

जेएनयू में जातिवाद की धुरी हैं अभिजन संरचनाएं

(जेएनयू की जातिवादी संरचनाओं के विरोधी छात्र नेता बाएं से देवीप्रसाद त्रिपाठी,चन्द्रशेखर टिवरीवाल,रमेश दीक्षित) 
        हम लोग जब पढ़ते थे तब भी जेएनयू में जातिवाद था लेकिन सुसंस्कृतभाव से जातिवादी ऑपरेशन चलता था,छात्रों में जातिवाद नहीं था। प्रशासन में जातिवाद था। प्रशासन में जो लोग बैठे थे उनकी दिलचस्पी अभिजन समुदाय को तैयार करने में थी। जेएनयू में 1979-1986 के बीच पढ़ने का मौका मिला । इस दौर में जमकर छात्र राजनीति भी की।
      इस दौर में सामान्य से तथ्य से प्रशासन में व्याप्त जातिवादी मनोदशा को सहज ही समझा जा सकता है कि उस समय सारे जेएनयू में 3-4 एससीएसटी शिक्षक थे। जबकि एससीएसटी के लिए आरक्षित पद थे 27 प्रतिशत। संवैधानिक तौर पर ये पद निर्धारित तक नहीं किए गए थे।
     उदाहरण के लिए हिंदी-उर्दू विभाग को ही लें वहां एक भी रिजर्व केटेगरी के तहत शिक्षक नहीं था। समूचे लैंग्वेज स्कूल में किसी भी विभाग में एक भी शिक्षक रिजर्व केटेगरी से नहीं था। बाकी स्कूलों की भी यही दशा थी। मुश्किल से 3-7 प्रतिशत रिजर्व सीटें छात्रों की भर पाती थीं। बड़ी ही चालाकी से हमारे ‘प्रगतिशील’ प्रशासकों ने जेएनयू में जातिवाद के खेल को चलाया हुआ था। उस समय छात्रसंघ की प्रमुख मांग थी शिक्षकों और छात्रों में एससीएसटी कोटे की सीटें हर हालत में भरी जाएं।
   विचारणीय समस्या यह है कि प्रशासनिक संरचनाएं अभिजनमुखी होंगी तो क्या जातिवादी मनोदशा के पनपने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं ? कृपया बताएं अभिजनोन्मुख संरचनाओं से मुक्ति का रास्ता या विकल्प क्या ?  


हमारी पहली टिप्पणी पर फेसबुक पर कुछ पुराने जेएनयू के दोस्तों ने लिखा है। कुछ टिप्पणियां और आयी हैं ,देखें-  

      चन्द्रप्रकाश झा-  aapke sawalon ke jawab dene ke main kabil nahin - lekin yeh bahas honi hi chahiye ki hum madhyayugin yug mein kyon laut rahe hain - Rajendra Sharma ( LokLahar ) ke putra Kabir ( Mattu ) ki ek baat mujhe yaad aati hai - jab KABIR jati mein yakin nahin karte the toh mere naam ke saath SHARMA surname jod kar KABIR ka naam kyon bigad diya gaya


जगदीश्वर-  सवाल नाम का नहीं रवैय्ये का है। आप अपनी तरफ से संक्षेप में ही सही कह गए।

चन्द्रप्रकाश झा-   aapko sahi laga - dhanyawad , ek baat aur SAMPRADAYIKTA se ladna jaatiwad se ladne ke mukable shayad jyada aasan hai - shahar mein curfew ke lekhak - Vibhuti Narain Rai ko dekh lijiye Vardha mein Namwar Singh ki sangat mein

 Kandarpa Das :

"As far I understand, it is an iminent effect of the post Mandal era. The whole north India have been effected during the last two decades and JNU is cannot be an isolation. Politics of North Indian always effected JNU. Remember, during the anti Mandal movement in Delhi, JNU was also effected (during Amit Sengupta's Presidency). The left forces were sidelined. I remember the evening when Atul Aneja and othes were attacked at Purvanchal. 
There has been a polarisation in JNU on caste line since than. Winning elections by SFI-AISF in between does not mean anything different. Another important factor, according to me is the caste politics played by our so called Ultra left. "

Kandarpa Das :

"I think it is the effect of the post Mandal North-Indian politics. Though JNU is supposed to be an all India University, North Indian politics always effected JNU student politics.(SYS during 1970s, NSUI during 1980s, ABVP during 1990s and AISA now)  Remember the days of Anti Mandal movements in Delhi. JNU was also effected . When Amit Sengupta was theJNUSU president, a whole gang of anti-Mandal castiest created big problem in JNU campus. I still remember the evening in 1990, when Atul Aneja and others were attacked by these forces in Purvanchal.  
During the last two decades castiest forces did consolidate their position. Many students Union elections were also fought in these lines. SFI-AISF alliance winning elections doesnot say anything. Moreover, many of our friends in the ultra left in JNU also play lower caste politics. All these have contributed to this. According to me only khate-pite parivar ke bande hi jati me ulazhte hei. ...........One thing I must add, since there is no castiesm in North-east like the north India,NE students in JNU are free from this.  "

बुधवार, 12 मई 2010

जेएनयू में जातिवाद का जहर आखिर आया कहां से

जेएनयू में जातिवाद का बढ़ता दानव कैसे परेशानियां पैदा कर रहा है और आम तौर पर जेएनयू के पुराने छात्र इस मसले पर क्या सोचते हैं यह बेहद जरुरी है। कई पुराने जेएनयू के लोगों ने इस मसले पर अपनी प्रतिक्रिया दी है जो इस बहस को आगे ले जाने का काम कर सकती है।
स्लोवानिया से प्रोफेसर अरुणप्रकाश मिश्रा ने लिखा है -

            Arun Prakash Mishra:

"Yahi detoriation hai aur yeh dushit admission policy kaa nateeza hai. isiliye 70 ke dashak kaa JNU aur 21 shatabdi kaa JNU lagbhag ulta hai - pahale pade-likhe students jyada the ab bina pade-likhe jyada hain - jati ki rajneeti hona swabhavik hai."


प्रोफेसर महेन्द्रपाल शर्मा ने दक्षिण कोरिया की राजधानी से लिखा है-
Mahendra Sharma - 

"JNU pahle desh mein vyapt anek buraiyon se door tha lekin buniyaadi samasyaon se bavasta. Desh mein badalti fiza se to sabhi parichit hone chahiye. Mandalikaran ke baad to vatavaran bahut teji se badla aur us samay bhi JNU men reaction hua tha. Bahut dinon tak Desh ke vatavaran se JNU ko door naheen rakha ja sakta. Ab meri drishti men vah desh ke aam vishvavidyalayon se drastically alag naheen hai. Bahut paani bah gaya hai."


राजीव लोचन -False consciousness का इस से बडा उदाहरण और क्या हो सकता है?
57 minutes ago

Rajiv Lochan -    जे एन यू में जाति का कीडा तो पहले भी मौजूद था। इतना प्रखर ज़रूर न था। ऐसा नहीं कि अभी भी जाति का बोलबाला हो पर हां जातिवादी बातों की प्रशन्सा से अब काफ़ी लोग हिचकते नहीं। थोडी समस्या तो यह है कि दलितों के नाम पर, समाजिक न्याय के चक्कर में, काफ़ी असानी से जतिवाद को बढावा मिल जाता है। पुराने ज़माने में एक विचार था: फ़ाल्स कान्शसनेस। बेहतर समझ न होने पर, कुछ बेहतर न कर पाने पर अपनी समस्याओं के कुछ भी गलत-सलत समाधान का पल्ला पकड लेना। विचारहीनता के दौर में शायद यही जे एन यू में हो रहा हो।

(मध्य में सुहेल हाशमी)
सुहेल हाशमी - 
   "Sa'adat hasan manto ne kahin kaha tha ke AKHLAQ ( NAITIKTA) wo zang hai jo samaaj ke ustray par bad ehtiyaati ke wajah se lag jaata hai

Jaatigat raajneeti bhi naitikta ki tarah hamarey samaaj ke ustray par lagi hui hai, meray khyaal hai ke isi itna samay ho chuka hai ke ab to is ne hi  dhaar ki jagaah le li hai

jahan tak khaate peeton ka zikr hai, to main samajhta hoon ke tum madhyam vargiye chhatron ki baat kar rahe ho, to mere bhai is mein itney achraj ki kya baat hai, hamaare samaaj mein ateet ke jitne bhi avshesh hain unhen dhoney ka zimma to hamesha se hi isi varg ki bapauti rahi hai.

darasl ghareeb log to is parampara ko afford nahin kar sakte
aur dhanwaanon ko iski zaroorat nahin hai
tab bacha kaun?
apni pracheen sanskriti aur sabhyata ki dharohar ko bachaaye rakhne ka kaam to hammaare he varg ki zimmedaari hai"

सुहेल हाशमी-   apkey lag bhag sabhi sawaalon ka sahi jawaab haan main hi diya jaa sakta hai.
chhetrawaad to hamaare samay main bhi aa gaya tha, jab se admission policy ke saath chhed chhaad ki gayi tab se dwijon ki sankhya badhne lagi, saath hi, hostel ke kamron ki kami ne JNU ke rashtriye charitr ko kamzor kiya, JNU mein dilli ke chaatron ki sankhya badhi aur phir dilli ki dominant politics Hindutva soft aur hard donon, bhaajpa aur congress donon avtarit huey, ab yeh sab aa gaye to jaati vaad kyon na aata wo bhi aaya. darasl tha to hamesha se magar mukhrit honey se darta tha, ab haalaat badal gaye uskey anuroop ho gaye to khula khel khelne maidan main aa gaya.

अरुण प्रकाश मिश्रा -  Aapane jo mudde udhaye hain, vo bilkul sahi hain. Main bhi bilkul yahi sichataa hun - yahi kaaran aur yahi sthithhiyan. yahi mere vichaar hain.


 बावला बसंत- jnu me jo chal raha hai uske lag bhag sare karan aapne is lekh me bata diye hain,me iska sab se bada karan dakhila niti me badlaav aur nav-udaarwadi parivesh ko manta hun is daur me jahaan par har taraf rajnaitk chetna ka dhwans kiya jaa raha hai aise me vaampanth ki rajniti karna bahut hi jyada mushkil kaam ho gaya hai.aapne ati-vampanth ka ulekh bhi kara hai jo ki campus me NGOchaap rajniti kiya karte hain inme AISA ka naam sabse upar hai,badi badi bate karna aur vaam rajniti ke mool sidhanto ko taak par rakh JNUSU ko administration ke hatho bech aana yeh inka tareeka hai.

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