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रविवार, 16 अगस्त 2015

राहुल गांधी की नई इमेज और नई राजनीति

    

           राहुल गांधी की नई इमेज परिवर्तनकामी है,खुली है, यह कांग्रेस के मूल स्वभाव से भिन्न है। कांग्रेस का मूल स्वभाव सत्ता अनुगामी और छिपानेवाला रहा है,जबकि राहुलगांधी सत्ता से मुठभेड़ कर रहे हैं,पार्टी को खेल रहे हैं। वे इस क्रम में दो काम कर रहे हैं,पहला यह कि वे कांग्रेस की नीतियों में परिवर्तन कर रहे हैं, पुरानी नीतियों से अपने को अलगा रहे हैं, उन पर क्रिटिकली बोल रहे हैं। इससे नई राजनीतिक अनुभूति अभिव्यंजित हो रही है।
कांग्रेस के शिखर नेतृत्व में यह प्रवृत्ति रही है कि वह नीतियों पर हमले कम करता रहा है लेकिन राहुल इस मामले में अपवाद हैं वे मनमोहन सिंह के जमाने में भी नीतिगत मसलों पर निर्णायक हस्तक्षेप करते थे और इन दिनों तो वे भिन्न तेवर में नजर आ रहे हैं। इस क्रम में समूची कांग्रेस की मनोदशा में परिवर्तन घटित हो रहा है। आज राहुल गांधी पहल करके जनता के मसलों को उठा रहे हैं,जनांदोलनों के बीच में जा रहे हैं। हाल ही में पूना फिल्म एवं टीवी संस्थान और पूर्व सैनिकों के आंदोलन स्थल पर राहुल गांधी का जाना शुभलक्षण है। राहुल गांधी पूना संस्थान के छात्रों के जुलूस के साथ राष्ट्रपति से मिलने गए, यह सामान्य घटना नहीं है। कांग्रेस ने कभी इस तरह के जनांदोलनों में, अन्य के द्वारा संचालित आंदोलन में शिरकत नहीं की है। मेरी जानकारी में राहुल गांधी से पहले कभी किसी कांग्रेसी शिखर नेता ने जनांदोलन के साथ खड़े होकर राष्ट्रपति को मांगपत्र पेश नहीं किया। यह नया फिनोमिना है और इसका स्वागत होना चाहिए।

राहुल गांधी के एक्शनों ने भाजपा-संघ परिवार के मीडिया नियंत्रण और सरकार नियंत्रण की चूलें हिलाकर रख दी हैं। यह बात साफ नजर आ रही है कि राहुल गांधी जो कह रहे हैं वैसा ही वे आचरण कर रहे हैं और उसी दिशा में राजनीतिक चक्र घूम भी रहा है। भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर कांग्रेस ने जो कहा उसे तकरीबन करके दिखा दिया है, मोदी सरकार कई बार अध्यादेश निकालकर भी इस कानून को लागू नहीं कर पाई है। साथ ही भाजपा करप्ट है यह संदेश आम जनता में सम्प्रेषित करने में राहुल गांधी पूरी तरह सफल रहे हैं। इससे मोदी सरकार की साख में बट्टा लगा है,उनके भाषणों की लय टूटी है। चमक फीकी पड़ी है।

राहुल गांधी के नए रुप ने कांग्रेसी राजनीति को पारदर्शी, आक्रामक और सेल्फ क्रिटिकल बनाया है। बार बार हर कदम पर कांग्रेस को अपनी ही सरकार के नीतिगत फैसलों की आत्मालोचना भी करनी पड़ रही है। इससे कांग्रेस में नई संस्कृति बन रही है और इससे भाजपा-संघ बहुत परेशान हैं। यही वजह है कि वे हर मसले पर राहुल गांधी पर व्यक्तिगत हमले कर रहे हैं, अ-राजनीतिक कमेंटस कर रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि राहुल के एक्शनों पर मीडिया से लेकर राजनीतिक दलों तक सकारात्मक राय बन रही है और इससे नए किस्म की कांग्रेस के जन्म की संभावनाएं पैदा हो रही हैं।






शनिवार, 17 मई 2014

कांग्रेस की पराजय के प्रमुख कारण

इस बार के लोकसभा चुनाव में विकास के मुद्दे ने सभी मुद्दे अपहृत कर लिए इन अपहृत मुद्दों में बड़ा मुद्दा स्त्री के अधिकारों और सुरक्षा संबंधी मसलों से जुड़ा था। यह दुर्भाग्यजनक है कि स्त्री के सवाल जो विगत दो साल से मीडिया में सबसे ज्यादा स्थान घेरे रहे वे सवाल मीडिया में से ठेलकर बाहर कर दिए गए। यह प्रक्रिया क्यों और कैसे संपन्न हुई यह विचारणीय समस्या है। दूसरी बड़ी समस्या यह है कि नव्य उदार आर्थिक नीतियों के जनविरोधी पहलू की तो चर्चा हुई लेकिन विकल्प की नीतियों पर कोई बात नहीं हुई।

कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व ने इसबार के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी चूक यह की कि उसने मनमोहन सिंह को सामने रखकर चुनाव नहीं लड़ा। भारतीय समाज में बूढ़ा नेता साखदार होता है। मनमोहन सिंह को सामने रखकर चुनाव लड़ा जाता तो परिणाम भिन्न होते और राजनीतिक जबावदेही के नाते उन्हें जनता में भेजना चाहिए था लेकिन अफसोस यह कि जनता में मनमोहन कम से कम गए। मनमोहन सिंह देश की नीतियों के प्रतीक हैं वे चुनाव के समय चुप रहेंगे तो यह बात देश की जनता हजम नहीं कर सकती।

कांग्रेस के दोनों नेताओं सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने  कांग्रेस की पराजय तो मानी  लेकिन इस पराजय में कांग्रेस की जनविरोधी नीतियों और कांग्रेसी नेता और जनता के बीच में पैदा हुए अलगाव को नहीं देखा।
   कांग्रेस को रेखांकित करना चाहिए कि वे कौन सी नीतियां है जिनके कारण जनता से कांग्रेस का अलगाव बढ़ा। कांग्रेस यदि अपनी नीतियों के जनविरोधी चरित्र को नहीं देखेगी तो वह पराजय के सही कारणों को नहीं खोज पाएगी। वह यह भी नहीं देख पाएगी कि कांग्रेस का क्षय क्यों हो रहा है।
कांग्रेस को बताना होगा कि उसकी नीतियों के गर्भ से भाजपा जैसा अनुदार दल शक्तिशाली कैसे बना। भाजपा की शक्ति में इजाफा मनमोहन युग में हुआ है। कांग्रेस ने जिस ग़रीब विरोधी एजेण्डे को राजनीतिक बुलंदियाँ पर पहुँचाया है उसे चुनौती देना फ़िलहाल किसी भी दल का लक्ष्य नहीं है फलत:विकल्पहीनता पैदा हुई है और इस विकल्पहीनता को मोदी ने आक्रामक नव्य उदार एजेण्डे से भरा है और इस काम में जनता ने मोदी के हाथों सत्ता सौंपकर अपने लोकतांत्रिक दायित्व का पालन किया है।
अब देखना है कि मोदी अपने कार्यकाल में कांग्रेस की जनविरोधी नीतियों को ख़त्म करते हैं या उन पर ही चलते हैं ? यहाँ नेता बदला है, दल बदला है। नव्य उदार आर्थिक नीतियाँ नहीं बदली हैं। देखना होगा मोदी नव्य उदार नीतियों के प्रति संघ के स्वदेशी एजेण्डे के साथ आते हैं या मनमोहन नीतियों को जारी रखते हैं।






रविवार, 7 अप्रैल 2013

नरेन्द्र मोदी के मीडिया उन्माद और राहुल के समावेशी मॉडल में भिडंत


  

         मोदी को लेकर इनदिनों जो मीडिया उन्माद चल रहा है वह भाजपा के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। 2014 के लोकसभा चुनाव अभी एक साल बाद होंगे लेकिन भाजपा और मोदी की प्रधानमंत्री पद को पाने की बेचैनी देखने लायक है।
   एक जमाने में “इंडिया साइनिंग” के नाम से जिस तरह का भाजपा ने मीडिया उन्माद पैदा किया था ठीक वैसा ही मीडिया उन्माद इन दिनों मोदी को लेकर पैदा किया जा रहा है। प्रतिस्पर्धा साफ दिख रही है। कांग्रेस ने भावी प्रधानमंत्री के रूप में राहुल गांधी के लिए मन बना लिया है। सीआईआई के अधिवेशन में काग्रेस उपाध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी पहलीबार सार्वजनिक तौर पर बोले। उनके भाषण में एक युवानेता के सपने,ख्याल,भारत की तस्वीर और भारत की लाइफलाइन की ध्वनि वायवीय रूप में उभरकर सामने आई।
   सीआईआई के सम्मेलन में देश 1500से ज्यादा उद्योगपति भाग रहे हैं और वे धैर्य के साथ सभी दलों के नेताओं को सुन रहे हैं उसमें राहुल गांधी का भाषण काल्पनिक ज्यादा था.व्यापारी जगत काल्पनिक दुनिया में जीने का आदी नहीं है। उसे ठोस बातें करने और सुनने की आदत है।
राहुल और उनके भक्तों को जानना चाहिए भारत कोई आख्यान नहीं है। यह एक जीता-जागता देश है और इसमें जिंदादिल लोग रहते हैं।उनकी धड़कनें हैं,कम से कम राहुल के भाषण में युवामन, दलितमन, स्त्रीमन, मुस्लिम मन की अभिव्यंजना कहीं पर भी दिखाई नहीं दे रही थी।राहुल गांधी के भाषण में न किसी की आलोचना न किसी की निंदा,न नीति की आलोचना न व्यक्ति की आलोचना।इसके विपरीत व्यापारियों को क्या करना चाहिए और उन्होंने क्या नहीं किया। इसी पैराडाइम पर पूरा भाषण केन्द्रित था। प्रच्छन्नतः कहा कि मनमोहन सरकार पर उंगली मत उठाओ ,यह देखो तुमने क्या नहीं किया।
मसलन् लोगों को ट्रेंड करने का काम तुम्हारा है, संरचना बनाने का काम तुम्हारा है,गांव के प्रधान को फैसलेकुन कमेटी में लाने का काम तुम्हारा है,तुम यह नहीं जानते ,तुम वह नहीं जानते,देश इसके कारण ऊर्जा के रहते पिछड़ रहा है, राजनीतिक व्यवस्था का समाज से अलगाव हो गया है। राहुल गांधी के भाषण में आत्मालोचन एकसिरे से गायब था।
राहुलगांधी के भाषण के कुछ घंटे बाद गुजरात के  मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का गुजरात से भाषण टीवी चैनलों के जरिए सीधे लाइव प्रसारित कराया गया। इससे यह तो साफ है कि भाजपा ने मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री के रुप में खड़ा करने का मन बना लिया है। मोदी ने अपने भाषण में एक मार्के की बात कही कि “मैंने गुजरात का कर्ज उतारा है, अब देश का कर्ज उतारना है।” प्रतीकात्मक तौर पर मोदी कहना चाहते हैं कि वे प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में मन बना चुके हैं। प्रधानमंत्री पद के लिए स्वयं को पेश करना यह अपने आप में भारत में विरल घटना है। भाजपा ने आधिकारिकतौर पर उनको अपना उम्मीदवार घोषित नहीं किया है और नहीं एनडीए ने। चूंकि मोदी बार-बार गुजरात मॉडल की बात कह रहे हैं अतःगुजरात के प्रसंग में कुछ तथ्य उल्लेखनीय हैं। गरीबी में आई कमी के आधार पर गुजरात 20 राज्यों की सूची में 10वें पायदान पर है। मजदूरी और इसमें बढ़ोतरी के मामले में 20 बड़े राज्यों में क्रमश: 14वें और 15वें स्थान पर आता है जो संपन्न और विपन्न लोगों के बीच बढ़ती दूरी को दर्शाता है।
मोदी के शासन में शिक्षा क्षेत्र में तबाही चल रही है।  एक गैर सरकारी संगठन के मुताबिक ग्रामीण गुजरात में करीब 95 फीसदी बच्चे विद्यालयों में पंजीकृत हैं लेकिन ज्ञान का स्तर काफी कम है। पांचवीं कक्षा में पढऩे वाले करीब 55 फीसदी बच्चे दूसरी कक्षा के पाठ्यक्रम नहीं पढ़ पाते हैं। लगभग 65 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जो गणित के सामान्य जोड़ घटाव भी नहीं कर पाते हैं।
बहुत सारे लोगों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक शराब पीकर आते हैं और ताश खेलते हैं। बारिया में बच्चों के लिए साल में 24 दिन का शिविर चलाने वाली हार्डीकर कहती हैं कि पांचवीं कक्षा के बच्चे अक्षर भी नहीं पहचान पाते हैं। उच्च शिक्षा की स्थिति के बारे में अर्थशास्त्री वाई .के .अलघ कहते हैं कि इसकी हालत भी खस्ता है। अहमदाबाद के समाज विज्ञानियों के मुताबिक ज्यादातर कॉलेज और विश्वविद्यालय ठगों और नाकाम प्रशासकों द्वारा चलाए जा रहे हैं। तकनीकी कॉलेजों में ही थोड़ी बहुत क्षमता है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में 96 गांवों को सेवाएं देने वाले राज्य द्वारा संचालित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पिछले सात साल से किसी बाल रोग विशेषज्ञ और स्त्री प्रसूति विशेषज्ञ चिकित्सक की तैनाती नहीं हुई है। गुजरात में 44.6 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। हालांकि शिशु मृत्यु दर में कमी जरूर आई है लेकिन इस दर में गिरावट राष्ट्रीय औसत की तुलना में काफी कम है। करीब 65 फीसदी ग्रामीण परिवारों और 40 फीसदी शहरी परिवारों के पास शौचालय की व्यवस्था नहीं है और उन्हें मजबूरी में खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। राज्य में पुरुष महिला अनुपात कम है यानी 1000 पुरुषों पर 918 स्त्रियों का औसत है। यह भी राष्ट्रीय औसत से कम है।मुसलमानों की वास्तव जिंदगी देखें तो भाजपा-मोदी की पोल खुल जाती है।मसलन् गरीबी की बात करें तो शहरी मुसलमान ऊंची जाति के हिंदुओं की तुलना में करीब 8 गुना ज्यादा गरीब हैं।
सामाजिक विकास के आड़ में मुसलमानों को मैनस्ट्रीम विकास से काटकर अलग कर दिया गया है। दूसरी बात यह कि मोदी समावेशी विकास की बात नहीं करते। मसलन् 2002 के दंगों में मारे गए लोगों को कोई आर्थिक सहायता राज्य ने नहीं दी। मुसलमानों की अरबों की संपत्ति देगों में नष्ट हुई थी लेकिन उनके पुनर्वास के लिए राज्य सरकार ने समुचित कदम नहीं उठाए। दंगों में शामिल दोषियों के खिलाफ कार्रवाई तब हुई जब सुप्रीमकोर्ट ने हस्तक्षेप किया और राज्य के बाहर दंगों से संबंधित मुकदमे चलाने का आदेश दिया। यही वह प्रसंग है जिसमें राहुल गांधी का समावेशी विकास का मॉडल मोदी के मॉडल पर भारी पड़ता है। राहुल गांधी ने समावेशी मॉडल को भविष्य का प्रधान एजेण्डा बनाकर पहल मोदी के हाथ से छीन ली है।




सोमवार, 21 जनवरी 2013

मीडिया उन्माद ,कांग्रेस और फेसबुक


-1- 

राजनीति में भावुकता कैंची है,वह इधर -उधर दोनों ओर काटती है। यह लाभ कम नुकसान ज्यादा करती है। भावुकता के आधार पर जुटाया समर्थन किस तरह रसातल में ले जा सकता है। इसे राजीवगांधी की इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद हुई जीत के बाद कांग्रेस के पराभव के साथ देख सकते हैं। यही हाल बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ भाजपा के ह्रास के रूप में भी देख सकते हैं।

भाजपा और कांग्रेस दोनों भावुकता का दुरूपयोग करती रही हैं और इसबार राहुल गांधी ने भावुक भाषण देकर कांग्रेस में प्राणसंचार करने की असफल कोशिश की है।

भावुक भाषण कभी संगठन में प्राण नहीं फूंकते, उनसे टीवी में जान आती है।

-2-

राहुल गांधी ने अपने भाषण में 'उम्मीद' पर जोर दिया 'पावर' यानी सत्ता को निशाना बनाया। उनके भाषण का यह फॉरमेट ओबामा के राष्ट्रपति चुनाव की पहली पारी में दिए गए भाषण की बुनियादी समझ से परिचालित है।

-3-

राहुल गांधी को नेताओं की तलाश है,राजकुमार भूल गए कि यह दौर नेता के अंत का दौर है। परवर्ती पूंजीवाद में नेता नहीं बचता,दलाल रह जाते हैं या औसतदर्जे के नेता रह जाते हैं। आज नेताओं का अभाव सभी दलों में है। राहुल ने कहा-

'' हमें ऐसे चालीस-पचास नेता तैयार करने हैं, जो देश और प्रदेश को चला सकें। हर प्रदेश में 5 से 10 ऐसे नेता हों जो सीएम बन सकें। हर जिले में यह बात हो। जब भी कोई पूछे कि कांग्रेस क्या करती है तो जवाब मिलना चाहिए कि भविष्य के लिए सेकुलर नेता तैयार करती है। जमीन से जुड़े नेता तैयार करती है। ऐसे नेता तैयार करती है, जिन्हें देखकर हिंदुस्तान के लोग उनके पीछे खड़े होने के लिए तैयार हो जाएं। इसके लिए संगठन की जरूरत हैं। ऐसा सिस्टम बन सकता है, जिसे आप बनाएंगे और चलाएंगे।''

-4-

राहुल गांधी के भाषण में आए सरलीकरण-

"मैं सबकुछ नहीं जानता। दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो सबकुछ जानता हो। "

''हमें इस पावर का इस्तेमाल लोगों के सशक्तिकरण के लिए करना चाहिए।''

"अगर आप पावरफुल होते हैं, तो आपको बहुत संभलकर रहने की जरूरत है। "

-5-

राहुल गांधी किस तरह की भूमिका में ले जाना चाहते हैं और किस तरह की तुलनाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं,इससे उनकी और कांग्रेस पार्टी की भूमिका का भावी कार्यक्रम समझ में आ जाएगा। वे जज बनना चाहते हैं। वे जनता नहीं बनना चाहते,जनसेवक नहीं बनना चाहते।



"कचहरी में दो लोग होते हैं जज और वकील। मैं जज का काम करूंगा। वकील का काम नहीं करूंगा।"

न्यायप्रियता और जज में अंतर होता है। यह सत्ता का अहंकार है।

-6-

सत्ता हर कोई हासिल करना चाहता है, वह 'जहर' की तरह है।(राहुल गांधी) के इस बयान के बाद टीवी पर भारी प्रौपेगैण्डा चल रहा है। यह मीडिया केन्द्रित नकली या प्रायोजित प्रशंसा है। प्रायोजित प्रशंसा लोकतंत्र में मीडिया जहर है।

-7-

कांग्रेस चिन्तन शिविर में राजनीतिक-सांगठनिक कमजोरी को "स्ट्रक्चरल वीकनेस "कहा गया। यह भाषा का बदला हुआ रूप है जिसके जरिए कांग्रेस राजनीतिक दुर्बलता को कम करके पेश कर रही है। जिन इलाकों में कांग्रेस कमजोर है उसको सांगठनिक तौर पर कैसे दूर करेगी,इसके बारे में कोई दिशा निर्देश सामने नहीं आए हैं।

-8-

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी आज जयपुर के चिन्तन शिविर में भावुक और अन्तर्विरोधपूर्ण भाषण दिया। पहला अंतर्विरोध-

"मैं जब बच्चा था तो मुझे बैडमिंटन बहुत पसंद था। यह खेल इस जटिल दुनिया में मुझे बैलेंस देता था। मैं अपनी दादी के घर में दो पुलिस वालों के साथ बैडमिंटन खेलता था। वे मेरी दादी की सुरक्षा का जिम्मा संभालते थे। वे मेरे दोस्त हो गए थे। एक दिन उन्होंने मेरी दादी को मार दिया और मेरे जीवन का बैलेंस छीन लिया।"

यह पैराग्राफ क्या संदेश देता है ? दोस्त कभी भी दुश्मन हो सकता है ।

-9-

मीडियावाले कह रहे हैं कि राहुल गांधी को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने 2014 के अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का संकेत दे दिया है। उल्लेखनीय है कि मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने थे तब सोनिया अध्यक्ष थीं लेकिन प्रधानमंत्री नहीं बन पायीं,राहुल को यदि अध्यक्ष भी बना दिए जाए तो भी प्रधानमंत्री के पद पर कांग्रेसी उनको ही बिठाएंगे यह कहना मुश्किल है।

कांग्रेस अंततः संघ परिवार और अमेरिका के फैसले को मानता है,सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री न बन पाने और मनमोहन के बन जाने में इन दोनों की बड़ी भूमिका थी।

प्रधानमंत्री का पद उसको ही मिलेगा जिस पर अमेरिकी मोहर लगी होगी .।

-10-

कांग्रेस नेताओं की सोशलमीडिया पर सोनिया गांधी के भाषण पर आई प्रतिक्रियाएं देखकर भावी रणनीति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है ।आनेवाले समय में कांग्रेस सोशलमीडिया के नियमंन की दिशा में जा सकती है ?--11-

टीवी चैनलों की आरामतलबी का आलम यह है कि कांग्रेस के चिन्तनशिविर से कोई खबर लीक नहीं हो रही है। कांग्रेस को अपने चिन्तनशिविर को पारदर्शी बनाना चाहिए और उसकी लाइव प्रसारण व्यवस्था करनी चाहिए जिससे पता चले कि कांग्रेस के अंदर क्या चिन्तन हो रहा।

-12-

राहुल गांधी को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया।वे संगठन में दूसरे नम्बर पर आ गए हैं।

-13-

मीडिया चैनल और कांग्रेसी नेताओं की बेबकूफीभरी युगलबंदी देखें- दोनों कह रहे हैं कि राहुल को बड़ी भूमिका दी जाय,यह खबर विगत दो साल से समय समय पर टीवी में चलायी जा रही है। मीडिया राहुल के बारे में इस तरह की गप्प को बार बार क्यों उछालता है ?

राहुल बड़ी भूमिका में आएं तब ही खबर दें। अघटित घटना की खबर को खबर नहीं कहते।

-14-

कांग्रेसी नीतियों की असफलता का ताजा प्रमाण देखें- आधारभूत ढांचा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी जीएमआर और जीवीके पूंजी जुटाने की असमर्थता की वजह से बड़ी सड़क परियोजनाओं से बाहर निकल रही हैं। यह बात यह बात भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने आज कही।

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कांग्रेस आनेवाले चुनाव में खाद्य विधेयक को अपना सबसे बड़ा राजनीतिक अस्त्र बनाने जा रही है। लेकिन इस अस्त्र से कांग्रेस को कोई खास लाभ नहीं होगा। इस विधेयक को लाने के पीछे प्रधान कारण सब्सीडी को घटाना, लेकिन यह काम नहीं हो पाएगा। उलटे सबसे पहले खाद्य सब्सिडी का खर्च बढ़ेगा और मौजूदा सरकारी आकलन के मुताबिक पहले साल में यह 1.2 लाख करोड़ रुपये होगा, जो तीसरे साल 1.5 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच सकता है अगर एमएसपी में बढ़ोतरी होती रहे और इसे जारी करने की कीमत स्थिर रहे। अगर हम इस विधेयक में कुपोषण समाप्त करने, भंडारण व अनाज की ढुलाई के लिए बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्च को जोड़ें तो यह आसानी से सालाना 2 लाख करोड़ रुपये को पार कर जाएगा।

-16-

सरकार ने खाद्य तेलों के आयात पर शुल्क गणना के लिए निर्धारित शुल्क मूल्य व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। अब खाद्य तेलों के आयात पर उनके शुल्क मूल्य की गणना अंतरराष्ट्रीय कीमत के आधार पर होगी। इससे खाने के तेलों के दामों में उछाल आएगा। यानी सूखी रोटी खाओ कांग्रेस के गुन गाओ।

-17-

कांग्रेस गरीबी का समारोह कैसे करती है इसे देखें-कांग्रेस के 'चिंतन शिविर' से एक दिन पहले संसदीय स्थायी समिति ने आज खाद्य सुरक्षा विधेयक पर बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट पेश की। इस विधेयक में देश की 75 फीसदी ग्रामीण और 50 फीसदी शहरी आबादी को बिना किसी विभेद के एकसमान 5 किलोग्राम अनाज मुहैया कराने का कानूनी अधिकार देने का प्राïवधान किया गया है। यह अनाज फ्लैट रेट (अपरिवर्तित दर) पर वितरित किया जाएगा। इसमें चावल की दर 3 रुपये, गेहूं की 2 रुपये और मोटे अनाजों की 1 रुपये प्रति किलोग्राम होगी।

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कांग्रेस का तीन दिनों तक चलने वाला चिंतन शिविर आज यानी शुक्रवार से जयपुर में शुरू हो रहा है। यह चिंतन शिविर ऐसे समय हो रहा है जब कांग्रेस की नीतियों का खोखलापन तेजी से सामने आ रहा है। हर मोर्चे पर सरकार और उसकी नीतियां विफल रही हैं। नव्य आर्थिक उदारीकरण का पूरा प्रपंच चरमराने लगा है। क्या आत्मसमीक्षा भी होगी इस शिविर में ?

-19-

टीवी चैनलों ने सरकारी भांड़ का दायित्व अपने ऊपर ले लिया है वे पेट्रोल आदि के दामों में बढोत्तरी के संबंध में पहले से ही खबर लगाते हैं और लगातार इस तरह के लोगों के विचार पेश करते रहते हैं जो किसी न किसी रूप में दाम बढ़ाए जाने को वैधता प्रदान करते हैं। भांडों का काम है सरकार के भोंपू की तरह काम करना। इस तरह की टीवी पत्रकारिता वस्तुगत होने का दावा नहीं कर सकती।

-20-

एनडीटीवी इंटिया पर आज रवीशकुमार के टॉकशो पर सभी वक्ता कह रहे हैं कि 2014 में लोकसभा चुनाव के समय 20 करोड़ लोग वोटर इंटरनेट से जुड़े होंगे। ये 20करोड़ जागरूक वोटर होंगे।

हमारी राय में सोशलमीडिया की राजनीतिक भूमिका को यह अतिरंजित रूप में देखना होगा। वोटर अपनी राय जमीनी हकीकत और अपने पुराने विश्वासों के आधार पर बनाता और व्यक्त करता है।

-21-

रवीशकुमार कह रहे हैं कि सोशलमीडिया की भाषा भिड़ने की भाषा है। रवीशकुमार को यह बात समझनी होगी कि सोशलमीडिया की भाषा पर्सुशसन की भाषा है।

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एनडीटीवीइंडिया में अभी एक टॉकशो चल रहा है सोशलमीडिया की भूमिका पर। भाजपा के अरविंद गुप्ता ने कहा है कि सोसलमीडिया पर राइटविंग के मंच के रूप में उनके मीडियम को जाना जाता है।

असल में सोशलमीडिया पर मात्र कम्युनिकेशन होता है वहां कोई विचारधारात्मक कम्युनिकेशन नहीं होता।

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टीवी चैनलों में पाकविरोधी उन्माद इनदिनों चरमोत्कर्ष पर है । भाजपा और उसके सहजिया सम्प्रदाय के नेता और संगठन भारत के दो सैनिकों की पाक द्वारा हत्या किए जाने के बाद से आर-पार की जंग जारी रखो,पाक से कडाई से पेश आओ,का नारा लगाकर मीडिया में उन्मादी प्रचार कर रहे हैं।

इन उन्मादी नेताओं और मीडिया के दबाव में मनमोहन सरकार भी आ गयी है।

सवाल यह है कि यूरोप से हमने दोस्ती करना क्यों नहीं सीखा, जिनदेशों ने सारी दुनिया पर 2-2 विश्वयुद्ध थोपे,करोड़ों लोगों की हत्या की उन देशों के साथ सभी देशों के मित्रतापूर्ण संबंध हैं।

करोडों लोगों की हत्या करने वाले हिटलर के देश के साथ कभी किसी ने यह नहीं कहा कि हम जर्मनी की टीम के साथ नहीं खेलेंगे।जर्मनी के गायकों को नहीं सुनेंगे।

भारत में हाल की घटनाओं पर जिस तरह की घटिया उन्मादी प्रतिक्रिया टीवी चैनलों ने दी है वह निंदनीय है और मानवाधिकार के विश्व परिप्रेक्ष्य के खिलाफ है।

हमें सोवियत संघ से सीखना चाहिए जिसके द्वितीय विश्वयुद्ध में करोडों लोग मारे गए लेकिन कभी किसी नेता ने यह मांग नहीं की सोवियत संघ का जर्मनों के साथ मित्रतापूर्ण संबंध नहीं होगा।

हमें वियतनाम से सीखना चाहिए जिसको अमेरिका ने पूरी तरह कई दशक तक बमों से रौंदा लेकिन वियतनाम जब अमेरिकी प्रभुत्व से मुक्त हो गया तो अमेरिका के साथ गहरी मित्रता करके उसने नई मिसाल कायम की है और वियतनाम में आज सबसे ज्यादा अमेरिकी कंपनियां काम कर रही हैं। हमें पड़ोसी देशों के प्रति उन्माद पैदा करने की राजनीति को बंद करना चाहिए।

-24-

भारतीय चैनलों के द्वारा पाक-भारत संबंधों को बिगाड़ने के लिए सचेत कोशिशें हो रही हैं।

इस तरह के टॉकशो आयोजित किए जा रहे हैं जिनसे पाक के प्रति घृणा पैदा की जा सके। भारतीय सीमा पर पाक का बार बार उल्लंघन और हमारे दो सैनिकों का पाकसैनिकों द्वारा कत्ल निंदनीय कृत्य है। इसकी निंदा की जानी चाहिए। लेकिन इस घटना की आड़ में भारत-पाक संबंधों को बिगाडकर हमारे चैनल जनविरोधी हरकत कर रहे हैं। खासकर पाकविरोधी भावनाओं को व्यापक कवरेज दे रहे हैं। पाकविरोधी उन्मादी प्रचार टीवी चैनलों की मासकल्चर संस्कृति का वैचारिक खाद्य है। इससे सावधान रहने की जरूरत है।

-25-

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विपक्ष की नेत्री सुषमा स्वराज से पाक के साथ बढे हुए तनाव पर अभी बातें की हैं। लेकिन इससे क्या भाजपा के पाकविरोधी घृणा अभियान को वे शांत कर पाएंगे ?

-26-

हाल ही में कलकत्ता में विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब बोल रहे थे तो वे वैज्ञानिकों को सम्बोधित कम और कांग्रेसियों को सम्बोधित करते ज्यादा दिख रहे थे। वे कांग्रेस के प्रचारक के रूप में बोल रहे थे। प्रधानमंत्री का विज्ञान कांग्रेस में दिया गया भाषण राजनीतिक प्रचार से ज्यादा महत्व नहीं रखता। वे जो कहते हैं वह कपूर की तरह कुछ क्षण दिखता है फिर गायब हो जाता है। संभवतः वे अकेले प्रधानमंत्री हैं जिनके किसी भी भाषण की कोई भी बात आम आदमी से लेकर बुद्धिजीवियों तक किसी को भी याद नहीं है। प्रधानमंत्री का प्रचारक होना सामान्य बात है लेकिन मनमोहन सिंह इस मामले में विरल हैं क्योंकि वे नव्य उदारनीतियों के नीति निर्माता-प्रचारक के रूप में काम करते रहे हैं। वे मूलतः वर्चुअल हैं। आप उनको पकड सकते हैं लेकिन घेर नहीं सकते। गलती पकड सकते हैं लेकिन दोषी नहीं ठहरा सकते।



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को विपक्ष जब भी घेरने की कोशिश करता है वे हाथ से निकल जाते हैं। हाल ही में दामिनी दिल्ली बलात्कार कांड के प्रसंग में मीडिया उन्माद के जरिए मनमोहन सरकार को घेरने की असफल कोशिश की गई लेकिन वे साफ बच निकले। सवाल यह है कि मनमोहन सरकार को घेरने में विपक्ष आज तक सफल क्यों नहीं हुआ ?



मनमोहन सरकार और कांग्रेस पार्टी ने एक नयी रणनीति बनाई है जिसके तहत वे पापुलिज्म और लोकप्रिय जनदबाब का प्रत्युत्तर प्रशासनिक एक्शन के जरिए दे रहे हैं। मसलन् जब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आया तो उन्होंने सीधे एक्शन लिया। कॉमनवेल्थ कांड से लेकर दामिनी कांड तक जो भी समस्या आई उसके प्रशासनिक समाधान तलाशने की सक्रिय कोशिश की और इससे भी ज्यादा अपनी कोशिश का मीडिया में जमकर प्रचार किया।



मनमोहन सरकार का मानना है पापुलर को मानो,आलोचनात्मक राय दो । राजनीतिक दबाब को प्रशासनिक –न्यायिक समाधान दो। इस अर्थ में वे लगातार संरचनात्मक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। संरचनात्मक सुधार वस्तुतःनव्य आर्थिक उदारीकरण का हिस्सा हैं। नव्य उदारवादी दृष्टिकोण के अनुसार नयी समस्याएं पुराने कानूनी फ्रेमवर्क में हल नहीं हो सकतीं, मनमोहन सरकार ने इसे सभी मंत्रालयों की कार्यप्रणाली का अंग बना दिया है। इस पद्धति का अनुकरण करने के कारण उनकी जब आलोचना आरंभ होती है तब वे सामने होते हैं लेकिन प्रशानिक एक्शन जब आने लगते हैं तो मनमोहन सरकार के खिलाफ गुस्सा गायब हो जाता है और फिर आमलोगों से लेकर मीडिया तक समस्या और समाधान पर ही बहस आकर टिक जाती है। इसके कारण राजनीति में पैदा हुए उन्माद और भावुकता को हाशिए पर डालने में उनको सफलता मिली है।



मनमोहन सिंह जब से प्रधानमंत्री बने हैं। वे मीडिया और विशेषज्ञों की आलोचना के केन्द्र में नहीं आते। उन्हें प्रधानमंत्री बने 8 साल से ज्यादा समय हो गया है। मीडिया में ममता बनर्जी,शरद पवार ,प्रफुल्ल पटेल ,डी.राजा ,कांग्रेस के क्षेत्रीय नेताओं ,कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों आदि की आलोचना दिखेगी लेकिन मनमोहन सिंह की आलोचना नहीं मिलेगी। आकाश छूती मंहगाई है लेकिन प्रधानमंत्री पर न तो मीडिया हमला कर रहा है और न विपक्ष। असल में मनमोहन सिंह डिजिटल हो गए हैं। उनका डिजिटल इमेज में रूपान्तरण कर दिया गया है। डिजिटल इमेज और राजनीतिक व्यक्तित्व की इमेज में यही अंतर होता है। राजनीतिक इमेज को पकड़ सकते हैं लेकिन डिजिटल इमेज को पकड़ नहीं सकते।



मनमोहन सिंह का व्यक्तित्व अनेक गुणों से परिपूर्ण है। वे बेहद विनम्र हैं, सुसंस्कृत है, शिक्षित हैं। नव्य -उदार नीतियों के विशेषज्ञ हैं। मीडिया में उनके बारे में न्यूनतम बातें छपती हैं। संभवतः मीडिया में उन्हें सबसे कम कवरेज वाले प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाएगा।



नई डिजिटल इमेज एक ही साथ मिथकीय और ऐतिहासिक होती है। अतीतपंथी और भविष्योन्मुखी होती है। तकनीकीपरक और धार्मिक होती है। मनमोहन सिंह ने अपने प्रचार में बार-बार समृद्ध भारत और समर्थ भारत की बात करते हैं। बार-बार विकासदर को उछाला है। भारत को समृद्धि के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। खासकर पूंजीपति,ह्वाइट कॉलर और मध्यवर्ग के साथ जोड़ा है। इस क्रम में उन्होंने मजदूरों-किसानों की राजनीति को हाशिए पर ड़ालने में सफलता अर्जित की है।



मनमोहन कोड की विशेषता है कि उसने गरीबी के यथार्थ विमर्श को वायवीय बनाया है। गरीबी और अभाव को गैर-बुनियादी विमर्शों के जरिए अपदस्थ किया है। मनमोहन कोड ने गरीबी और अभाव को अप्रत्यक्ष दानव में रूपान्तरित किया है। जिसके बारे में आप सिर्फ कभी-कभार सुन सकते हैं। मनमोहनकोड के लिए गरीबी और अभाव कभी महान समस्या नहीं रहे। मनमोहन कोड ने देश की एकता और अखंडता के लिए सबसे खतरनाक शत्रु के रूप में माओवाद को प्रतिष्ठित किया है। जबकि माओवाद भारत विभाजन या सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा नहीं है।



मनमोहन कोड की काल्पनिक सृष्टि है माओवाद और आतंकी हिन्दू। यह जादुई-मिथकीय शत्रु है। मनमोहन कोड के अनुयायी और प्रचारक माओवाद के बारे में तरह-तरह की दंतकथाएं, किंवदन्तियां आदि प्रचारित कर रहे हैं। मीडिया में माओवाद एक मिथकीय महामानव है। इसी तर्ज पर आरएसएस के नाम पर बहुत सारे आतंकी हिन्दू महामानव पैदा कर दिए गए हैं। ये सारे मनमोहन कोड से सृजित वर्चुअल सामाजिक शत्रु हैं। ये आधे मानव और आधे दानव हैं।



माओवाद और हिन्दू आतंकवाद की रोचक डिजिटल कहानियां आए दिन सम्प्रेषित की जा रही हैं। इन्हें सामाजिक विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। आप जरा गौर से माओवादी नेता किशनजी की कपड़ा मुँह पर ढ़ंके इमेज और हिन्दू आतंकी के रूप में पकड़े गए संतों को ध्यान से देखें तो इनमें आप आधे मनुष्य और आधे प्राचीन मनुष्य की इमेज के दर्शन पाएंगे।



कारपोरेट मीडिया माओवादी और हिन्दू आतंकी की ऐसी इमेज पेश कर रहा है गोया कोई फोरेंसिक रिपोर्ट पेश कर रहा हो। वे इनके शरीर की ऐसी इमेज पेश कर रहे हैं जिससे ये आधे मनुष्य और आधे शैतान लगें। इससे वे खतरे और भय का विचारधारात्मक प्रभाव पैदा कर रहे हैं।



मनमोहन सिंह मीडिया में उतने नजर नहीं आते जितना इन दिनों डिजिटल दानवों (माओवाद और हिन्दू आतंकी) को पेश किया जा रहा है। हमें इस कोड को खोलना चाहिए। यह तकरीबन वैसे ही है जैसे अमेरिका ने तालिबान और विन लादेन की इमेजों के प्रचार-प्रसार के जरिए सारी दुनिया को तथाकथित आतंकवाद विरोधी मुहिम में झोंक दिया और तबाही पैदा की । सामाजिक अस्थिरता पैदा की । घृणा का वातावरण पैदा किया । ठीक यही काम मनमोहन कोड अपने डिजिटल शत्रुओं के प्रचार-प्रसार के नाम पर कर रहा है। हमें जागरूक रहने की जरूरत है।


रविवार, 20 जनवरी 2013

नए दोस्त और नए रास्ते की तलाश में माकपा और कांग्रेस



   जयपुर में कांग्रेस का तीन दिवसीय चिन्तन शिविर खत्म हो चुका है और  उसी समय कोलकाता में माकपा की केन्द्रीय कमेटी की मीटिंग भी खत्म हुई है। इन दोनों दलों की बैठक में एक समानता है दोनों ही पार्टियां अपने लिए नए रास्ते और नए मित्रों की तलाश में हैं। दोनों के निशाने पर युवावर्ग है। माकपा के सामने चुनौती है कि आगामी विधानसभा चुनाव में त्रिपुरा में वाममोर्चे की जीत और सत्ता को कैसे बरकरार रखा जाय और कांग्रेस के सामने चुनौती है कि सन् 2014 लोकसभा में कांग्रेस की जीत को कैसे बरकरार रखा जाय। दोनों को अन्य दलों के सहयोग की जरूरत है। दोनों दलों का साझा लक्ष्य है युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करना।
   त्रिपुरा के अलावा जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे वे हैं मणिपुर और नागालैण्ड। इनमें त्रिपुरा में कांग्रेस पूरी शक्ति लगाकर वाममोर्चे को हराने की कोशिश करेगी और राज्य के पिछड़ेपन को मुद्दा बना सकती है वहीं पर वाममोर्चे के पास शांतिपूर्ण विकास का अपना दावा रहेगा।मणिपुर और नागालैण्ड में कांग्रेस मजबूत है लेकिन त्रिपुरा में वाम को हराने में अभी तक उसे सफलता नहीं मिली है।
    माकपा अपनी राष्ट्रीय छवि सुधारने के क्रम में आगामी 19मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में राष्ट्रीय रैली करने जा रही है इसमें कोलकाता ,कन्याकुमारी और अमृतसर से तीन बड़े जत्थे कई हजार किलोमीटर का रास्ता तय करके शामिल होंगे। माकपा अपनी प्रतिष्ठा को पाने के लिए कांग्रेस पार्टी और खासकर यूपीए-2 सरकार की जनविरोधी नीतियों को अपने प्रचार अभियान में मुख्य हथियार बनाएगी। केन्द्र सरकार की आर्थिकमंदी से निबटने में असफलता, मूल्यवृद्धि ,भ्रष्टाचार और बेकारी को मुख्य मुद्दे के रूप में आम जनता के सामने रखने का माकपा की केन्द्रीय कमेटी ने फैसला किया है। माकपा की पश्चिम बंगाल में अपने संगठन को बचाने और आगामी पंचायत चुनावों में वामदलों की एकजुटता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है।
  माकपा केन्द्रीय कमेटी ने पश्चिम बंगाल राज्य कमेटी को आदेश दिया है कि सभी सदस्यों को सक्रिय करो ,दलीय निष्क्रियता को खत्म करो। केन्द्रीय कमेटी ने पश्चिम बंगाल में माकपा नेताओं और कार्यकर्ताओं पर बढ़ते हमलों पर गहरी चिन्ता व्यक्ति की है। साथ ही  ममतासरकार ,तृणमूल कांग्रेस और अपराधी गिरोहों के हमलों का एकजुट प्रतिवाद करने का आह्वान किया है।
     कांग्रेस के तीन दिवसीय जयपुर चिंतन शिविर में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने अपने उद्घाटन भाषण में आत्मालोचना करते हुए कहा कि हमें इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि किस तरह कांग्रेस के परंपरागत जनाधार में सेंधमारी करने में विपक्ष सफल हो गया।
    इसके अलावा सन् 2014 के लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस को अपने नए दोस्तों की भी तलाश करनी होगी। अधिकांश कांग्रेस नेताओं का मानना है कि आगामी लोकसभा चुनाव जीतने के लिए जरूरी है कि विभिन्न राज्यों में कांग्रेस को मजबूत मित्रदलों की तलाश की करनी चाहिए और मित्रदलों के साथ विनम्रता के साथ संबंध विकसित किया जाना चाहिए। इस क्रम में अनेक नेताओं ने वामदलों खासकर माकपा और भाकपा के प्रति नरम रूख अपनाने पर जोर दिया। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मतानुसार विगत चुनावों में कांग्रेस ने जो रणनीति अपनायी वह बुनियादी तौर पर पिट चुकी है। बिहार,यूपी और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस अभी तक अपने पैंरों पर खड़ी नहीं हो पायी है। उलटे यह खतरा है कि यदि स्थानीयस्तर पर पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा,बिहार में लालू यादव और यूपी में मुलायम सिंह यादव के साथ यदि नरम रवैय्या नहीं अपनाया जाता है तो भविष्य में यूपीए के सत्ता में लौटने की संभावनाएं कम हैं। इसलिए नई रणनीतियों और राजनीतिक कार्यक्रमों के साथ उन मसलों को ज्यादा उभारे जाने की संभावना है जिन पर कांग्रेस अपने साथ ज्यादा से ज्यादा मित्रदलों को जुटा सके। इसके लिए कांग्रेस ने महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण के प्रस्ताव को फिलहाल ठंड़े बस्ते में रखने का ही फैसला किया है लेकिन महिला सशक्तिकरण के अन्य साझा उपायों पर आगामी दिनों में काम किया जाएगा। यह भी संभावना है कि आगामी दिनों में कांग्रेस अपने प्रमुख प्रचार के मुद्दे के रूप में साम्प्रदायिकता और भ्रष्टाचार के मसले को प्रमुखता के साथ उठाए और महिलाओं की दुर्दशा के सवालों पर भाजपाशासित राज्यों में जो स्थिति है उस पर आमलोगों का ध्यान खींचे। खासकर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि में औरतों की बदहाली के सवाल को प्रमुखता के साथ उठाए जाने की संभावना है।   
कांग्रेस की मुख्य चिंता है कि मध्यवर्ग को किस तरह आकर्षित किया जाय। मध्यवर्ग के 20करोड़ लोग सन् 2014 तक इंटरनेट से जुड़ चुके होंगे और ये नेट से जुड़े नागरिक अन्य समूहों की तुलना में ज्यादा सजग हैं। इनके बीच में कांग्रेस अपना जनाधार बढ़ाने की पूरी कोशिश करेगी।
    उल्लेखनीय है कि विगत लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 11करोड़ वोट मिले थे और वह अन्यदलों के साथ मिलकर सरकार बनाने में सफल रही थी। लेकिन सन् 2014 में अकेले नेट से जुड़े 20 करोड़ लोग होंगे। इन लोगों में किस तरह पैठ बनायी जाय इसकी ओर कांग्रेस चिन्तनशिविर में खासतौर पर ध्यान दिया गया । सोशलमीडिया और इंटरनेट की भूमिका ओर सोनिया गांधी ने सभी का ध्यान भी आकर्षित किया है। इसका अर्थ यह भी है कि नए दौर के लायक नेट संरचनाओं के जरिए कांग्रेस पूरी तैयारी के साथ मैदान में कूदने जा रही है।  कांग्रेस की मूल चिन्ता यह है की  सरकार की जड़ता को तोड़ा जाय और निर्भीक ढ़ंग से नीतिगत फैसले लिए जाएं और उनके जल्दी से परिणाम भी हासिल किए जाएं जिससे केन्द्र सरकार की निष्क्रिय इमेज को खत्म किया जा सके। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पार्टी ने पहलकदमी करके फैसले लेने के सभी अधिकार सौंप दिए हैं। कांग्रेसियों में संपत्ति के प्रदर्शन की जो प्रवृत्ति बढ़ रही है उस पर भी लगाम लगाने की सोनिया गांधी ने अपील की है। 

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

गरीबों का दिल नहीं है राहुल गांधी के पास

   इन दिनों कांग्रेस का युवा और बूढ़ा नेतृत्व राहुल गांधी के करिश्मे का इंतजार कर रहा है। बीच-बीच में राहुल गांधी की मीडिया इमेजों का प्रक्षेपण किया जाता है और यह संदेश दिया जाता है कि वे गरीबों के हितचिंतक हैं। वे बार-बार राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना का जिस तरह नाम लेते हैं उससे लगता है यह योजना समाज में दूध -घी की नदियाँ बहा देगी। मुझे हैरत होती है कि दुनिया के बेहतरीन लोगों से शिक्षा पाने वाला व्यक्ति किस तरह मीडियाई नजारों और मंचीय राजनीति में व्यस्त है और आदर्श का ढ़ोंग कर रहा है।
     राहुल गांधी के पास कांग्रेस की विरासत है। अपने परिवार की राजनीतिक विरासत है । लेकिन उनके पास हिन्दुस्तान की जनता का दिल नहीं है। बुर्जुआ दिल के साथ गरीब जनता से प्यार नहीं हो सकता।
     राहुल गांधी की विशेषता है उनके पास गरीबों का दिल नहीं है। गरीबों का मन नहीं है।  इससे भी बड़ी बात यह कि कांग्रेस और उसके नेताओं के पास गरीब का दिल नहीं है। अमीरों के दिल से गरीबों की सेवा नहीं हो सकती। गरीबों की सेवा के लिए गरीबों का दिल चाहिए और गरीबों का दिल हासिल करने के लिए गरीबों की सही समझ चाहिए। यह समझ गरीबों के प्रति आत्मीय लगाव से पैदा होती है। उसके लिए राहुल गांधी को अपना व्यक्तित्वान्तरण करना होगा,जिसके लिए वे तैयार नहीं हैं।
      राहुल गांधी देश की सत्ता में बने रहने के सपने देखते हैं। सपने के सौदागरों और सपने के आख्यान में ही व्यस्त रहते हैं। वे गरीबों के सपने नहीं देखते और नहीं उनके पास गरीबों का दिल है। वे अच्छी तरह जानते हैं कि कईबार उनकी नानी स्व.श्रीमती इंदिरा गांधी गरीबी हटाओ का नारा लगाकर लोगों को ठग चुकी हैं और ठगे हुए लोग अब ठगे जाने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्हें जानना चाहिए कि कांग्रेस जैसा विशाल दल आज दूसरे दलों की वैसाखी पर टिका हुआ है। लंबे समय से कांग्रेस ने केन्द्र में अपने दम पर सरकार नहीं बनायी है। कांग्रेस पहले विपक्ष में थी,बाद में अन्य का समर्थन किया और अब लंबे समय से अन्य दलों के समर्थन पर केन्द्र सरकार टिकी है। यह कांग्रेस के बिगड़ते स्वास्थ्य की सूचना है। कांग्रेस अपने बिगड़ते स्वास्थ्य को लेकर सही इलाज अभी तक नहीं करा पायी है और यह कांग्रेस के लिए अच्छी खबर नहीं है।
   राहुल गांधी आप नहीं जानते या जानबूझकर नादानों जैसा नाटक कर रहे हैं। अंततः कांग्रेस उसी मार्ग पर गई जिस पर उसे नहीं जाना चाहिए। कांग्रेस ने सॉफ्ट हिन्दुत्व के नारे के आधार पर बाबरी मसजिद प्रकरण पर आए इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंड पीठ के फैसले को मान लिया है। हाल ही में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने सीएनएन-आईबीएन को दिए साक्षात्कार में साफ कहा है कि कोर्ट का यह सबसे बेहतर फैसला है। पता नहीं राहुल गांधी आप इसके परिणामों से वाकिफ हैं या नहीं। लेकिन आप एक बात जान लें,अब यू.पी. में कांग्रेस को पुनर्जीवित नहीं कर सकते। मुसलमानों का थोड़ा सहारा आपको मिला था ,इसबार वह भी नहीं मिलेगा।
     मुसलमानों को हाशिए पर डालकर उनके अधिकारों का हनन करके आप यू.पी. में नहीं लौट सकते। यू.पी. की राजनीति के निर्णायक वोट मुसलमानों के पास हैं। आप अच्छी तरह जानते हैं राममंदिर के नाम पर भाजपा का राजनीतिक तूफान उसे यू.पी.में हाशिए पर ले जा चुका है और कांग्रेस रसातल में जा चुकी है। यू.पी. में ही क्यों देश के बाकी हिस्सों में मुसलमानों के वोट कांग्रेस को मिलना मुश्किल है। क्योंकि मुसलमानों को विगत 60 सालों में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर आपने और आपके दल ने गरीबी सौंपी है। विरासत में पिछड़ापन दिया है।
     राहुल गांधी आप कैसे नेता हैं जिन्हें उपभोक्तावाद के द्वारा पैदा हो रही तबाही दिखाई नहीं दे रही और आप और आपका दल लगातार ऐसे नीतिगत कदम उठा रहा है जिससे उपभोक्तावाद की गति तेज हो रही है और आम लोगों को भ्रमित करने लिए बढ़ी हुई विकासदर का झुंझना बजा रहे हैं। विकासदर बढ़ने के साथ गरीबी बढ़ रही है। विस्थापन बढ़ रहा है। अशिक्षा बढ़ रही है। उच्चशिक्षा का स्तर गिर रहा है। परिवार से लेकर संसद तक स्वस्थ मानवीय मूल्यों का पतन हो रहा है और आप है कि नरेगा-नरेगा का झुनझुना बजाते फिर रहे हैं। राहुल गांधी इस सच को जान लें कि समस्त विकास योजनाओं को उपभोक्तावाद निगल जाएगा। आप यदि सचमुच में देश की जनता से प्यार करते हैं तो उपभोक्तावाद से लड़ने का कोई कार्यक्रम बनाएं। वरना विकास के सारे फल गरीबों को नहीं अमीरों को मिलेंगे। गरीबों के लिए उपभोक्तावाद विषबेल है और अमीरों के लिए अमृतकलश। राहुल गांधी आप चाहें तो इस देश की जनता के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। लेकिन उसके लिए आपको अपना रास्ता बदलना होगा,नीतियां बदलनी होंगी,गरीबों के प्रति प्रतिबद्धता को व्यवहार में दिखाना होगा। आपकी पार्टीकी नीतियों के कारण 4 करोड़ से ज्यादा लोग सारे देश में अब तक विस्थापित हो चुके हैं और इनमें से अधिकांश को न तो मुआबजा मिला है और न इनका पुनर्वासन ही हुआ है। दूर क्यों जाते हैं पास में भाखड़ा नांगल बांध के बनाने के समय जो लोग विस्थापित हुए थे उनके बारे में ही जाकर खबर ले लें तो पता चल जाएगा कि आपकी पार्टी और उसके नेताओं के पास गरीबों का दिल नहीं है। विस्थापितों को बसाने की प्रतिबद्धता नहीं है। राहुल गांधी बार-बार हमारे बीच में आते हैं और गैर जरूरी बातों में उलझाकर चले जाते हैं। उनसे कोई पलटकर पूछना चाहिए कि आखिरकार आपके पास गरीब का दिल क्यों नहीं है ? गरीब के आंसुओं को देखकर भी आपको गहरी नींद कैसे आती है ? उपभोक्तावाद के विकास से खुशहाली आएगी या बदहाली ? क्या पृथ्वी का संतुलन बचेगा ?

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

'भोले’ राहुल गांधी की मीठी-मीठी बातें

(कोलकाता में युवा कांग्रेस की रैली में भाषण देते राहुल गांधी)
    कल राहुल गांधी कोलकाता आए और उनका युवा कांग्रेस के लोगों ने जमकर स्वागत किया। वे इसके लायक भी हैं। राहुल गांधी की राजनीतिक शैली मजेदार है। वे जब भी बोलते हैं तो मासूमों की तरह बोलते हैं। राजनेता जब मासूमशैली में बोलता है तो बेहद खतरनाक होता है। राजनेता तो राजनेता होता है वह मासूम नहीं होता।
    राहुल गांधी में राजनेता के सभी गुण-अवगुण हैं। लेकिन इनमें से वे इन दिनों किसी का भी प्रदर्शन नहीं करते और सिर्फ एक ही गुण का बार-बार प्रदर्शन करते हैं मासूमियत का। मासूम जब बोलता है,औचकभाव से बोलता है।
     उनकी स्टीरियोटाईप कांवेंट के बच्चे की भाषण शैली में हम सभी मजा लेते हैं इसमें उनका बचपना झलकता है। युवा में बचपना गंभीरता को नष्ट करता है। पता नहीं किस बेबकूफ को राहुल गांधी की भाषण-कला की शिक्षा का जिम्मा दिया गया है जो उन्हें मासूमियत की कांवेंट शैली में बोलने के लिए कहता है। यह कांग्रेस की नई अधिनायकवादी भाषणशैली है ।
    राहुल गांधी बच्चों की ही तरह कम बोलते हैं,कोलकाता में भी 9-10 मिनट बोले। जाहिर है कम बोलने के फायदे और नुकसान दोनों हैं। उनके भाषण में आपात्काल की कांग्रेस के उनके चाचा संजय गांधी की ध्वनियां सुनाई दे रही हैं। जाने-अनजाने वे  संजय गांधी के रास्ते पर चल पड़े हैं ,संजय गांधी का नारा था ‘बातें कम और काम ज्यादा।’ राहुल गांधी भी बातें कम करते हैं,छोटा भाषण देते हैं। अपनी बात कम करते हैं विपक्ष पर हमले ज्यादा करते हैं। ‘छोटा भाषण और विपक्ष पर हमला’ यह संजय गांधी की शैली थी। यह कांग्रेस की अधिनायकवादी भाषणकला है।
      राहुल गांधी अभी बिहार में गए वहां पर उन्होंने नीतीश कुमार पर हमला किया, उसके पहले वे उत्तरप्रदेश के किसानों के आंदोलन के संदर्भ में मायावती पर हमले कर चुके हैं। राहुल गांधी के उत्तर प्रदेश दौरे की अखबारी कतरनें पढ़ जाइए आपको हमेशा एक ही चीज हाथ लगेगी विपक्ष पर हमला। सवाल उठता है राहुल गांधी कभी सकारात्मक और बिना हमलावर हुए भाषण क्यों नहीं देते ? वे अपनी मासूमियत के बहाने क्या कहना चाहते हैं ? वे बार-बार विपक्ष पर हमला करके क्या सिद्ध करना चाहते हैं ?
   राहुल गांधी के भाषणों में बार-बार पुनरावृत्ति हो रही है। वे एक ही बात को महीनों से दोहरा रहे हैं। उनके यू.पी,बिहार, पश्चिम बंगाल आदि में विगत 6-7 महीनों में जितने भी भाषण हुए हैं उनमें एक ही बात कह रहे हैं कि केन्द्र के द्वारा राज्यों को विकास के लिए जो पैसा दिया जा रहा है उसका राज्य सरकारें इस्तेमाल नहीं कर रही हैं। अथवा पैसा खा जाती हैं। ग्रामीण विकास रोजगार योजना के संदर्भ में राहुल गांधी बार-बार शिकायतें कर रहे हैं कि अतिगरीबों तक ये योजना अभी तक नहीं पहुँच पायी हैं।
     ठीक इसी तरह की बातें उन्होंने कल कोलकाता में कही है और बोला कि ग्रामीण विकास रोजगार योजना का पैसा केन्द्र से कोलकाता आया किंतु उसे बीपीएल कार्डधारकों तक माकपा ने नहीं पहुँचाया और सारा पैसा पार्टी सदस्यों में ही बांट दिया गया। इसमें तथ्य क्या है यह राहुल गांधी नहीं जानते। पहली बात यह कि ग्रामीण विकास रोजगार योजना के तहत 100 दिन काम देने वाली स्कीम इस राज्य में लागू ही नहीं हो पायी है। अधिकतर जिलों में यह स्कीम फाइलों में बंद पड़ी है। अधिकांश जिलों में जब स्कीम लागू ही नहीं हो पायी तो माकपा के लोग पैसा कैसे खा सकते हैं ।
     वाममोर्चा सरकार का इस प्रसंग में निकम्मापन रहा है लेकिन इसे भ्रष्टाचार नहीं कह सकते। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि बीपीएल कार्डधारकों के कार्ड बनाने के मामले मे अनेक गंभीर अनियमिताएं पायी गयी थीं जिसके कारण यह योजना लागू नहीं की गई।
  राहुल गांधी इतने भोले हैं कि उन्हें अब कोलकाता शहर सुंदर लगने लगा है और उनके पिता को यह ‘मृत शहर’ लगा था। राहुल गांधी की अज्ञानता का आलम यह है कि उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में 45 प्रतिशत लोगों के पास राशनकार्ड नहीं है। जनाब जानते ही नहीं है कि वास्तविकता क्या है ?  
      राहुल गांधी ने यह भी कहा कि केन्द्र ने किसानों का कर्जा माफ कर दिया था लेकिन राज्य में सारा पैसा सीपीएम के लोग खा गए। अब इस बेबकूफी का क्या जबाब हो सकता है कि किसानों की कर्जमाफी का पैसा सीपीएम कैसे खा सकती है ? यह बैंक और कर्जगीर किसान के बीच का मामला है,सीपीएम और बैंक के बीच का मामला नहीं है।
   राहुल गांधी के भाषणों में एक और गंभीर समस्या है वह है तथ्यों के मेनीपुलेशन की। वे तथ्यों को लेकर सही भाषा का प्रयोग करना नहीं जानते अथवा जानबूझकर तथ्यों का दुरूपयोग करते हैं। ग्रामीण विकास रोजगार योजना को लेकर राज्य सीपीएम के ऊपर पैसा खाने का आरोप लगाकर उन्होंने सफेद झूठ बोला है। सच है कि राज्य में यह योजना लागू ही नहीं हो पायी है। जब योजना लागू ही नहीं हुई तो कोई पैसे खाएगा कैसे ?
  राहुल गांधी के भाषणों से एक आभास यह भी मिलता है वे भ्रष्टाचार के खिलाफ कमर कसकर मैदान में आ चुके हैं। उनके भाषणों में भ्रष्टाचार एक प्रमुख विषय रहता है। सुनने में अछ्छा लगता है कि राहुल गांधी भ्रष्टाचार के खिलाफ बोल रहे हैं। लेकिन वास्तविकता क्या है ? राहुल गांधी ने भ्रष्टाचार के सवाल पर अपनी पार्टी के अंदरूनी मंचों पर,कमेटियों और सरकार के स्तर पर कभी कोई शिकायत तक नहीं की।
    गोया कांग्रेस पार्टी दूध की धुली है और भ्रष्टाचार की समस्या तो सिर्फ विपक्षी दलों की समस्या है यही वजह है कि वे भ्रष्टाचार को लेकर विपक्ष पर आए दिन हमले करते रहते हैं ।
     राहुल गांधी से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि स्पेक्ट्रम घोटाले में संचारमंत्री शामिल है या नहीं ? विपक्ष ने तथ्य दिए हैं। उनका प्रामाणिक खंडन अभी तक नहीं आया है। विपक्ष जांच चाहता है कांग्रेस जांच नहीं चाहती। दूसरा सवाल यह है कि स्पेक्ट्रम घोटाले में क्या सिर्फ संचारमंत्री शामिल हैं ? क्या प्रधानमंत्री कार्यालय या कांग्रेस का इससे कोई लेना-देना नहीं है ? जी नहीं, नई कार्यशैली के तहत नीतिगत मसलों पर प्रधानमंत्री कार्यालय और मंत्रीमंडलीय समिति का फैसला अंतिम होता है और स्पेक्ट्रम के मामले में भी यही हुआ है।
     इससे भी बड़ा सवाल यह है कि रेडियो तरंगे राष्ट्र की संपत्ति हैं। यूपीए सरकार उन्हें कारपोरेट घरानों को किस मुँह से बेच रही है। रेडियो तरंगें कैसे आवंटित होती हैं और कौन आवंटित करता है और किनके लिए आवंटित की जाती हैं,ये सारी बातें कांग्रेस के नेता अच्छी तरह जानते हैं वे रेडियो तरंगे बेच-बेचकर संचार जगत में बड़े-बड़े कारपोरेट घराने तैयार कर रहे हैं और बदले में इन घरानों से पूरा राजनीतिक खर्चा वसूल रहे हैं। आज संचार की कंपनियां और हथियार बनाने वाली कंपनियों के मौटे चंदे से कांग्रेस पार्टी चल रही है। ऐसे में राहुल गांधी का भ्रष्टाचार के खिलाफ बयानबाजी देना बचकानी हरकत लगता है और वे मासूम नजर आते हैं।
       देश की जनता को यह सवाल पूछने का हक है कि हथियारों की खरीद में कितना कमीशन दलाल को मिलता है ? 90हजार करोड़ के हथियार खरीदे जाने हैं और यह सिलसिला चल रहा है। नियम के अनुसार 3 प्रतिशत कमीशन दलाल का होता है,सवाल यह है कि कांग्रेस को इस प्रक्रिया में कितना पैसा मिलता है ? स्व.प्रधानमंत्री राजीव गांधी का संसद में बयान था कि हथियारों की बिक्री के मामले में हम दलाली खत्म कर देंगे। इस बयान के आधार पर ही विपक्ष ने बोफोर्स में दलाली दिए जाने का आरोप लगाया था बोफोर्स कंपनी ने दलाली दी थी यह तय हो चुका है। विवाद इस पर है कि किसे मिली ?
    सवाल यह है कि राहुल गांधी ,उनकी माँ सोनिया गांधी और उनके चहेते मनमोहन सिंह क्या राजीव गांधी के संसद में हथियारों की दलाली के संदर्भ में दिए बयान पर क्या आज भी कायम हैं ? राहुल गांधी की भ्रष्टाचार के विरोध में की गई सारी बातें सही मान ली जाएं यदि वे असम के उस युवा नेता को युवा कांग्रेस से बर्खास्त कर दें और पुलिस के हवाले करें जिसने असम में 11सौ करोड़ रूपये का विकास के मद में आवंटित फंड आतंकी संगठन उल्फा को दे दिया है और इस पाप में असम सरकार भी शामिल है क्या मुख्यमंत्री के हटाने की मुहिम राहुल गांधी चलाएंगे ? यदि वे इसके प्रमाण जानना चाहते हैं तो सीएनएन-आईबीएन के समाचार संपादक को घर बुलाकर जान सकते हैं अन्यथा सीएजी की रिपोर्ट मंगाकर देख सकते हैं।
     हमें मालूम है राहुल गांधी का भ्रष्टाचार विरोध एक ढ़ोंगी का विरोध है। एक ऐसे नेता का विरोध है जिसकी पार्टी भ्रष्ट नेताओं,ठेकेदारों और दलालों से भरी हुई है। हम बहुत खुश होंगे यदि कांग्रेस से भ्रष्टनेता,ठेकेदार और दलाल निकाल दिए जाएं। समस्या यह है कि उसके बाद कांग्रेस में बचेगा क्या ?
             
    

सोमवार, 6 सितंबर 2010

राहुल गांधी का माओवादी प्रेम

             (जगन्नाथपुर गांव में राहुल गांधी)
     राहुल गांधी इन दिनों राजनीति नहीं वर्चुअल राजनीति कर रहे हैं। वे ऐसे नेता हैं जो बीच-बीच में गांवों में जाते हैं,आदिवासियों में जाते हैं,किसानों के पास जाते हैं। उनके इस तरह के प्रयासों में ईमानदार राजनीतिज्ञ के दर्शन नहीं होते। उनमें अपने परिवार के सभी राजनीतिक गुण हैं। वे मिलनसार हैं,हमदर्द हैं और जनता के लिए कुछ करना भी चाहते हैं। वे जनता के साथ कामकाजी रिश्ता रखकर बड़े हुए हैं।
   राहुल गांधी ने हाल ही में दो एक्शन किए हैं। पहला एक्शन  पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए किया। दूसरा एक्शन वेदांत के प्रकल्प को केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा स्वीकृति न दिए जाने के बाद किया। इन दोनों एक्शनों की खूबी है कि इन दोनों ही जगहों पर कांग्रेस या युवा कांग्रेस वाले किसी भी किस्म का संघर्ष नहीं कर कर रहे थे। वे संघर्ष के दर्शक थे। लेकिन दोनों ही जगहों पर राहुल गांधी की सक्रियता देखने लायक थी वे तेजी से आंदोलनकारियों के बीच में गए और यह विभ्रम पैदा करने की कोशिश की कि वे किसानों और आदिवासियों के साथ हैं।
     राहुल गांधी स्वभाव से राजनीतिज्ञ नहीं है। वे पेशे से राजनेता हैं। उनकी स्वाभाविक प्रकृति में राजनीति अभी तक दाखिल नहीं हुई है। कहने को वे सांसद हैं, कांग्रेस के महासचिव हैं। राहुल गांधी ऐसे राजनेता हैं जो जनता के संघर्ष और अनुभवों में तपकर बड़ा नहीं हुआ है। बल्कि जनहित से इतर कारणों के कारण राजनीति में आया है।
     वे राजनीति नहीं करते बल्कि राजनीति का रेडीकल विभ्रम पैदा करते हैं। वे यह आभास देते हैं कि वे भिन्न हैं। लेकिन वे भिन्न नहीं हैं। बल्कि जनहित से इतर कारणों से प्रेरित होकर आयी नई राजनीतिज्ञों की पीढ़ी का हिस्सा हैं। वे अपने व्यवहार से बार-बार यह संकेत देने की कोशिश करते हैं कि वे कांग्रेस के मौजूदा नेताओं से भिन्न हैं।  वे अपने एक्शन से जिस ‘सत्य’ की ओर ध्यान खींचना चाहते हैं उसका वास्तविकता से बहुत दूर का संबंध है।
   वास्तविकता यह है कि राहुल गांधी जिस पार्टी के महासचिव हैं उस पार्टी ने नव्य-उदारतावादी आर्थिक नीतियों का मार्ग चुना है । जिसके कारण किसानों और आदिवासियों का बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ है । यह सिलसिला अभी भी चल रहा है। विस्थापन को रोकने की बजाय उसे ज्यादा प्रभावशाली ढ़ंग से लागू किए जाने की कोशिशों की ओर ध्यान दिया जा रहा है। दूसरी बात यह कि राहुल गांधी या कोई भी बड़ा कांग्रेस नेता कभी किसी आदिवासी आंदोलन या किसान आंदोलन में अपनी पहलकदमी करके शामिल नहीं हुआ ? कांग्रेस का आरंभ से मानना रहा है कि किसानों को संगठित मत करो। किसानों के लिए उन्होंने कभी संगठन नहीं बनाया। बल्कि कांग्रेस के नेताओं का अब तक का इतिहास बताता है कि वे किसान आंदोलनों का विरोध करते रहे हैं। महात्मा गांधी से लेकर राहुल गांधी की परंपरा किसानों के प्रति अवसरवादी संबंध-संपर्क की परंपरा रही है।
      सवाल  उठता है कि राहुल गांधी यदि नियमगिरी पर्वतमाला पर स्थित वेदांत प्रकल्प का विरोध कर रहे थे तो आंदोलन के दौरान कभी क्यों नहीं दिखाई दिए ?ध्यान रहे वेदांत का प्रकल्प वापस नहीं हुआ है। सिर्फ पर्यावरण मंत्रालय की उसे स्वीकृति नहीं मिली है। क्या बाद में यदि वेदांत के मालिक पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार सारा सिस्टम बनाते हैं ,जैसाकि वे करेंगे,क्योंकि उनके करोड़ों ऱूपये लग चुके हैं।  वे सारे नियमों को धता बताते हुए मौजूदा अवस्था तक प्रकल्प को ले आए हैं। वैसी स्थिति में राहुल गांधी क्या करेंगे ?
    उल्लेखनीय है उत्तरप्रदेश और उड़ीसा में कांग्रेस विपक्ष में है और किसानों और आदिवासियों के नाम पर अवसरवादी राजनीति का नाटक कर रही है और राहुल गांधी इस नाटक के सूत्रधार हैं।
    राहुल गांधी के व्यक्तित्व की विशेषता है नीतिविहीन अवसरवाद। इसके कारण ही वे जब जो इच्छा होती है एक्शन करते हैं। इसका एक ही उदाहरण देना समीचीन होगा। वेदांत प्रकल्प को पर्यावरण मंत्रालय द्वारा हरी झंड़ी न दिखाए जाने के बाद राहुल गांधी उडीसा के जगन्नाथपुर गांव में रैली करने पहुँचे। इस प्रसंग में पहली बात यह कि वेदांत आंदोलन में राज्य कांग्रेस अनुपस्थित थी,इस रैली के पहले कभी भी वेदांत प्रकल्प के खिलाफ चल रहे संघर्ष का राहुल गांधी ने समर्थन नहीं किया था,कोई सार्वजनिक बयान तक नहीं दिया था।
   जगन्नाथपुर में हुई रैली में राहुल गांधी के साथ सभा मंच पर स्थानीय प्रसिद्ध माओवादी नेता लाडो सिकोका भी मौजूद था। सिकोका लंबे समय से इस इलाके में काम कर रहा है और उसने राहुल गांधी के पहुँचने के पहले तक रैली में भाषण दिया था और राहुल गांधी के आने के बाद भी वह मंच पर ही था। सब जानते हैं कि सिकोका को स्थानीय पुलिस ने माओवादी होने के संदेह में 9 अगस्त 2010 को गिरफ्तार किया था लेकिन बड़ी रहस्यमय परिस्थितियों में वह पुलिस की कैद से बाहर आ गया और इलाके में वेदांत प्रकल्प के खिलाफ सक्रिय था। 
    मजेदार बात यह है कि राहुल गांधी ने 26 अगस्त 2010 को माओवादी नेता के साथ रैली को सम्बोधित किया और एक दिन पहले 25 अगस्त 2010 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दिल्ली में देश के पुलिस अफसरों को सम्बोधित करके माओवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बता रहे थे। यहां उल्लेखनीय है 9 अगस्त 2010 को तृणमूल कांग्रेस ने लालगढ़ (पश्चिम बंगाल) में माओवादियों के सहयोग से विशाल रैली की थी जिसकी कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व ने हिमायत की है। उस रैली में कई केन्द्रीय मंत्री भी मौजूद थे। कांग्रेस के नेताओं का माओवादियों के प्रति इस तरह का अवसरवादी संबंध चिन्ता की बात है।
    राहुल गांधी अकेले नेता नहीं हैं जिन्हें माओवादियों-आतंकवादियों से संपर्क-संबंध बनाए रखने पड़ रहे हैं। बल्कि कांग्रेस में उग्रवादियों-आतंकवादियों से संपर्क-संबंध बनाए रखने की लंबी परंपरा रही है और इस परंपरा का एक ही मकसद है राजनीतिक अवसरवाद और निहित स्वार्थी राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करना। इसके लिए कांग्रेस के नेता किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। त्रिपुरा से लेकर असम तक पंजाब से लेकर उड़ीसा तक कांग्रेस का उग्रवादियों-आतंकवादियों के प्रति सॉफ्ट नजरिया रहा है। स्थिति यहां तक खराब है कि वे हिन्दू और मुस्लिम तत्ववादियों के सामने भी नतमस्तक होते रहे हैं।
    सलमान रूशदी के उपन्यास सैटेनिक वर्शेज पर पाबंदी का सवाल हो या राममंदिर शिलान्यास का सवाल हो,इन सब पर कांग्रेस का शिखर नेतृत्व तत्ववादियों के सामने समर्पण करता रहा है। भिण्डरावाले से लेकर लिट्टे के नेता प्रभाकरन की मदद का सारा काम कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व करता रहा है। जाहिर है शैतानों को पालेंगे तो उसकी कीमत भी देनी होगी। लिट्टे को पालने की कीमत राजीव गांधी की हत्या के रूप में दी,भिण्डरावाले को पालने की कीमत इंदिरा गांधी की हत्या के रूप में देनी पड़ी।
    कहने का तात्पर्य यह है कि आतंकवाद-उग्रवाद-साम्प्रदायिकता या पृथकतावाद को अवसरवादी राजनीति का मोहरा बनाकर इस्तेमाल करने की कांग्रेस की परंपरा रही है। उसका खामियाजा आज सारा देश भुगत रहा है। कांग्रेस ने कभी भी उग्रवाद-आतंकवाद -साम्प्रदायिकता या पृथकतावाद के खिलाफ दो टूक रवैय्या नहीं अपनाया है। इन राजनीतिक प्रवृत्तियों के प्रति कांग्रेस का सॉफ्ट रूख देश में सामाजिक विभाजन का काम करता रहा है और इससे इन विभाजनकारी ताकतों को बल मिला है,वैधता मिली है।

        
                                



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