सेक्स उद्योग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सेक्स उद्योग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 25 जून 2010

अमेरिका का बलात्कार रिवोल्यूशन



     इन दिनों औरतों को पोर्न के बहाने बलात्कार का शिकार बनाने या सामूहिक सेक्स करने या जबरिया अप्राकृतिक मैथुन करने के लिए दबाब ड़ालने की खबरें भारत में भी आने लगी हैं। अमेरिका में बनाए गए ‘एटोर्नी जनरल कमीशन ऑन पोर्नोग्राफी’ (1986) की कार्रवाई को पढ़कर पोर्न समर्थकों को गहरी निराशा हाथ लगेगी। इस कमीशन की रिपोर्ट पोर्न के खिलाफ शानदार ऐतिहासिक कानूनी -सामाजिक-सांस्कृतिक दस्तावेज है।
     कमीशन के सामने अनेक औरतों ने आकर गवाही दी कि किस तरह उन्हें पोर्नोग्राफी तैयार करने के लिए कामक्रीडा करने के लिए मजबूर किया गया। जो लोग अमेरिका की पोर्न क्रांति में कोई नुकसानदेह बातें नहीं देखते उन्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि पोर्न के निर्माता छोटे-छोटे प्री-स्कूली बच्चों को अपने पोर्न उद्योग के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं और इस काम में प्री-स्कूल के शिक्षकों की पोर्न उद्योग के दलाल की भूमिका रही है।
      एक औरत ने कमीशन के सामने दिए बयान में बताया कि उसकी 3 साल का बेटी एक प्री-स्कूल में पढ़ती थी उस स्कूल के शिक्षक ने कई मर्तबा उसे सेक्सुअली उत्पीडि़त किया। स्कूल टीचर ने कई बार उसे स्कूल की चीजों की चोरी के इल्जाम के आधार पर सेक्सुअली उत्पीडि़त किया। उसके फोटो खींचे। उसे चुप रहने को कहा और बोलने पर जान से मारने की धमकी दी। उसे बंदूक और छुरा दिखाकर डराया-धमकाया और उसे जानवरों की कैसे हत्या की जाती है, इसकी फिल्में देखने को मजबूर किया।
            इसी कमीशन के सामने एक ऐसे व्यक्ति ने भी गवाही दी जो स्वयं सैंकड़ों पोर्न फिल्मों के निर्माण में ढ़ाई साल तक हिस्सा ले चुका था। उसने कहा -मैंने अपनी आंखों के सामने अनेकों की जिन्दगी बर्बाद होते हुए देखी है। इनमें ज्यादातर लड़कियां थीं। मैंने अनेक प्रोड्यूसर,निर्देशक और फोटोग्राफरों को देखा है जो येन-केन प्रकारेण अपना काम निकालने के चक्कर में लड़कियों के साथ जबर्दस्ती करते थे,उन्हें वह सब करने के लिए बाध्य करते हैं जो वह करना नहीं चाहतीं। उनके दिमाग में सिर्फ एक ही चीज होती है कि किसी भी तरह अपना माल तैयार किया जाए,चाहे इसके विए लड़की के साथ जबर्दस्ती करनी पड़े।
            मैंने सेट पर ऐसे भी युगलों को देखा है जिनमें औरत गुदामैथुन नहीं करना चाहती लेकिन उसे मजबूर किया गया कि वह करे। इससे उसे बेइंतहा कष्ट हुआ और इससे उसका समूचा व्यक्तित्व ही नष्ट कर हो गया।
            एक अन्य किस्म का बलात्कार यह भी हुआ जिसमें एक महिला अपने किसी काम से बाहर गयी और दो घंटे के लिए पड़ोस में अपनी 10 साल की बेटी छोड़ गयी। उस लड़की को पड़ोसी ने प्लेबॉय चैनल देखने के लिए कहा और मुखमैथुन में शामिल कर लिया।
               एक अन्य महिला ने कमीशन के सामने कहा कि उसके पडोस में एक महिला रहती थी ,उसके पति ने 18 सालों तक उसके साथ बलात्कार किया। वह 18 साल से लगातार बाजार से कामुक सामग्री,पोर्न फिल्म,कामुक पत्रिकाएं,किताबें आदि लाता था और उनमें जितनी गंदी क्रियाएं बतायी रहती थीं इन्हें करने के लिए मजबूर करता था। ऐसा न करने पर बुरी तरह मारता पीटता था। उसके मारने,कराहने की आवाजें मैं 18 सालों से सुनती रही हूँ।
           मैं उस घर में सफाई का काम करती थी और जब भी जाती थी तो पोर्न पत्रिकाएं और किताबें घर में बिखरी हुई मिलती थीं, मैं समझ जाती थी कि इस घर में क्या चल रहा है। इन पत्रिकाओं में पोर्न तस्वीरें हुआ करती थीं जिनमें औरत,बच्चे और मर्द की तस्वीर हुआ करती थी। एक दिन उस औरत ने स्वीकार किया कि उसका भू.पू.पति पोर्नोग्राफिक सामग्री का इस्तेमाल करके उसे आतंकित रखता था और बलात्कार करता था।
               कमीशन के सामने यह भी तथ्य सामने आया कि अमेरिकी की प्लेबॉय नामक मैगजीन का पोर्न के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान है। अनेक औरतों को मैथुन के नाम पर जिस तरह की अप्राकृतिक क्रियाओं और कामुक हरकतों को करना पड़ता था उसका मूल स्रोत यही पत्रिका रही है और इसके अंदर छिपे चित्रों के आधार पर औरतों को चित्रों में दरशायी बर्बर और आत्मघाती सेक्स क्रियाओं को करने के लिए मजबूर किया जाता था। अनेक औरतों ने कमीशन को बताया कि उन्हें पहले जमकर शराब पिलायी जाती थी, अन्य नशे की चीजें खिलायी जाती थीं और उसके बाद आक्रामक और हिंसक सेक्स करने के लिए बाध्य किया जाता था।
           कहने का तात्पर्य यह कि औरत को पोर्न सामग्री दिखाकर तदनुरूप सेक्स करने के लिए बाध्य करना जुर्म है,बलात्कार है। इसे कामुक सुख नहीं कह सकते यह पाशविक वृत्ति है। अपराध है।

गुरुवार, 18 मार्च 2010

सेक्स उद्योग के ग्लोबल-लोकल फंदे के आर-पार

       समाज में वेश्यावृत्ति स्थानीय है।किन्तु सेक्स ग्लोबल है।आज सेक्स ग्लोबल सेवा क्षेत्र में आता है। विश्व व्यापार की भाषा में सेक्स का भी आयात-निर्यात हो रहा है।यह वस्तुत: कामुक गुलामी है।इस संदर्भ में सबसे रोचक तर्क जेड मैगजीन में '' ट्रीटिंग पोर्न लाइक अदर मीडिया'' निबंध में व्यक्त किए गए हैं।इस लेख के लेखक का मानना है पोर्न अन्य फैंटेसी की तरह ही एक फैंटेसी है।चूंकि वामपंथी विचारक हमेशा फैंटेसी की आलोचना करते हैं,क्योंकि फैंटेसी वास्तव जगत को विद्रूप करती है।यही वजह है कि पुलिस और न्यायालय कभी कभी न्याय की गुहार भी लगाते हैं। लेखक के अनुसार पोर्न का अर्थ है ''आंशिक गर्भपात।'' यह मीडिया का वह रूप है जो अपने दर्शक को हस्तमैथुन का आनंद देता है।पोर्न वह है जो हिंसक नहीं है। किसी को घटिया,हेय या छोटा नहीं दिखाता।
      डोना एम हगीस ने ''दि करप्शन इन सिविल सोसायटी: मेन्टेनिंग दि फ्लो ऑफ वूमैन टु द सेक्स इण्डस्ट्रीज'' में लिखा है कि सरकारी नीतियों के कारण औरतों की तिजारत बढ़ रही है। उन्हें सेक्स उद्योग में भेजा जा रहा है। सवाल उठता है कि आखिरकार वेश्यावृत्ति क्यों बढ़ रही है ? इसमें औरत और बच्चे किन कारणों से आ रहे हैं ? वेश्यावृत्ति में वे ही औरतें और बच्चे आते हैं जिनका कामुक रूप से दुरूपयोग होता है। इसमें बलात्कार की शिकार, ,बाल्य कामुक शोषण के शिकार,शिक्षा से वंचित,गरीब,नस्लवादी या साम्प्रदायिक भेदभाव के शिकार,वर्गीय शोषण के शिकार ,युद्ध से प्रभावित लोग आते हैं। 
      सामान्य तौर पर औरत और बच्चों को खाना,कपड़ा घर,पैसा दवा,सुरक्षा,संगति और रोजगार का वायदा करके फुसलाया जाता है। औरतें और बच्चे वेश्यावृत्ति के क्षेत्र में नैतिक कारणों से नहीं अपनी जिन्दगी के बुरे हालत के कारण आते हैं।वेश्यावृत्ति से स्त्री या बच्चों का सशक्तिकरण नहीं होता।बल्कि सच्चाई यह है कि जब वे इस धंधे में आ जाते हैं तो उन्हें भयानक नरक में जीना होता है। पहले से भी बदतर अवस्था में रहना होता है।वे अनेक किस्म की भयानक शारीरिक,सांस्कृतिक बीमारियों और विपत्तियों में जीने के लिए अभिशप्त होते हैं।
      सच तो यह है कि वेश्यावृत्ति औरत और बच्चों के खिलाफ नियोजित बर्बर हमला और शोषण है।औरतों और बच्चों की बिक्री और स्थानान्तरण मूलत: उन्हें भयानक शोषण और नरक में धकेलता है।औरतों की बिक्री आज सबसे बड़ा कारोबार बन गया है। जिन औरतों को खरीदा जाता है उनमें से अधिकांश भयानक गरीबी और अभाव की मारी होती हैं। उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देकर फुसलाया जाता है।बल प्रयोग किया जाता है। शारीरिक और मानसिक यंत्रणाएं दी जाती हैं जिससे वे वेश्यावृत्ति के धंधे में जाने के लिए मजबूर होती हैं।     
        वेश्यावृत्ति में शामिल औरतें इस धंधे से मुक्त होना चाहती हैं। कोई भी औरत स्वेच्छा से इस पेशे में नहीं है।बल्कि मजबूरी और दबाव के कारण ही वे इस धंधे में हैं।वेश्यावृत्ति गुलामी है। बल प्रयोग के कारण किया गया श्रम है।यह मूलत: स्त्री के शोषण की बर्बर व्यवस्था है।इसके पीछे संगठित माफिया गिरोह और बहुराष्ट्रीय कारपोरेट हाउस सक्रिय हैं।जो लोग यह कहते हैं कि वेश्यावृत्ति को कानूनी वैधता प्रदान कर देने से यह समस्या कम हो जाएगी। वे झूठ बोलते हैं।सच यह है कि इससे वेश्यावृत्ति बढ़ जाएगी। नीदरलैंण्ड इसका आदर्श उदाहरण है। वहां वेश्यावृत्ति को वैध घोषित करने के बाद इस पेशे में औरतों की बाढ़ आ गयी है। 

         वेश्यावृत्ति,कामुकता,पोर्न या अवैध संबंधों की तरफ रूझान को वैधता प्रदान करने में में मीडिया प्रस्तुतियों की महत्वपूर्र्र्ण भूमिका है। मीडिया अध्ययन बताते हैं कि 66 फीसदी प्राइम टाइम कार्यक्रमों में कामुकता एक महत्वपूर्ण अंतर्वस्तु है।सन् 1999-2000 के साल में टेलीविजन के दो-तिहाई कार्यक्रमों में कामुकता पर जोर था।समग्रता में टेलीविजन में सन् 1999 में 56 फीसदी सेक्स कंटेंट था।जो सन् 2000 में बढकर 84 फीसदी हो गया है।सन् 2001 में केशर फेमिली फाउण्डेशन ने बताया कि अमेरिकी सॉप आपेरा का अस्सी फीसदी अंतर्वस्तु कामुक थी। 
      ग्रीनवर्ग एवं वुड ने बताया कि औसतन प्रतिघंटे सॉप ऑपेरा में 6.6 काम क्रियाएं दिखाई गयीं।यह भी पाया गया कि तरूणों में कामुक अंतर्वस्तु के कार्यक्रम बेहद जनप्रिय हैं। 23 फीसदी टीवी कार्यक्रमों में विभिन्न चरित्रों के बीच में कामक्रीडा के दृश्य 18- 24 साल के लोगों पर फिल्माए गए। जबकि 9 फीसदी चरित्र 18 साल से कम उम्र के थे। ज्यादातर काम-क्रीडा के दृश्य अविवाहित युगलों के बीच में दरशाए जाते हैं।अविवाहित चरित्रों में ही काम भाषा का प्रयोग मिलता है।
      एक अनुसंधान में पाया गया कि 24 चरित्रों में सिर्फ एक ही विवाहित युगल सॉप ऑपेरा में काम क्रीडा करते नजर आया बाकी चरित्र अविवाहित थे। टेलीविजन कार्यक्रमों में दरशाए गए सेक्स में सुरक्षित सेक्स का शायद ही रूपायन दिखाई देता हो। ज्यादा चरित्र कंडोम का इस्तेमाल नहीं करते। असुरक्षित कामुक व्यवहार में खतरा है,इसका शायद ही कभी जिक्र किया जाता हो। एक अनुमान के अनुसार सालाना 14000 कामुक संदर्भों की वर्षा होती है। जिनमें मात्र 165 दृश्यों में संतति निरोध,संयम, काम नियंत्रण,प्रजनन में खतरा,संक्रमित बीमारियों आदि का जिक्र रहता है।
         मीडिया के द्वारा सेक्स के व्यापक प्रसारण का असर यह होता है कि तरूणों में शारीरिक शुचिता और वर्जीनिटी के प्रति असंतोष पैदा होता है।जो तरूण यह सोचते हैं कि टीवी सेक्स उन्हें सेक्स की सही जानकारी देता है,इस बात पर विश्वास करने वालों का पहला संभोग असंतोषजनक होता है।वे कुण्ठा के शिकार होते हैं। 
       अध्ययन बताते हैं कि काली नस्ल की औरतें जिनकी उम्र 18-24 साल के बीच है, उनमें वगैर कंडोम के इस्तेमाल किए सेक्स के प्रति रूझान ज्यादा पाया गया है।तरुण लड़कियों में केजुअल सेक्स का रूझान बढा है। टीवी में कामुकता की प्रस्तुतियों पर किए गए सारे अनुसंधान यह तथ्य पुष्ट करते हैं कि किसी भी कार्यक्रम में यह नहीं बताया जाता कि टीवी का सेक्स कंटेंट नुकसानदेह है। अथवा असुरक्षित सेक्स न करें।अथवा अवैध सेक्स व्यवहार गैर जिम्मेदारी भरा होता है।बल्कि इसके विपरीत टीवी कार्यक्रमों की सेक्स प्रस्तुतियां बताती हैं कि तरूणों को गैर जिम्मेदार कामुक व्यवहार करना चाहिए।
     मीडिया को देखते समय निम्नलिखित सवालों पर गौर करेंगे तो टीवी कार्यक्रमों को आलोचनात्मक नजरिए से देख पाएंगे। सवाल हैं -
1.सेक्सुअल इमेजों का निर्माता कौन है ?

2.कामुक व्यवहार में कौन लोग शामिल हैं ?

3. किसकी बात या राय नहीं मानी जा रही है ?

4. किस परिप्रेक्ष्य से कैमरा घटनाओं को निर्मित कर रहा है ?

5.आपके अभिभावक,गर्ल फ्रेड ,बॉय फ्रेंड ने अभी जो स्टोरी देखी ,उसके बारे में किस तरह की बातें करते हैं ?
6.देखते समय आपकी क्या भूमिका थी ? आप अपने को कहानी,चरित्र ,घटना आदि में समाहित करके देख रहे थे या आलोचनात्मक नजरिए से देख रहे थे ?
7. मीडियम का मालिक कौन है ? कामुक सामग्री के प्रसारण से मालिक को कितना फायदा होता है ?
सवाल पैदा होता है मीडिया,विज्ञापन आदि में परोसी जा रही कामुक सामग्री के दुष्प्रभाव से बचने के क्या उपाय हैं ? उपाय निम्न प्रकार हैं-
    1.  मीडिया को साथ मिलकर देखें,इससे अंतर्वस्तु के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिलेगा,साथ ही यह भी पता चलेगा कि अन्य लोग क्या सोच रहे हैं।
2.   टीवी की कामुक सामग्री के बारे में अन्य क्या कहते हैं,उसे गंभीरता से सुना जाना चाहिए।कामुक सामग्री पर चर्चा की जानी चाहिए।
3.    कामुक विज्ञापनों का अध्ययन करने का गुर सीखना चाहिए,उसमें क्या संदेश दिया गया है ?विज्ञापन के निशाने पर कौन है ?विज्ञापन की अपील बनाने के लिए वे किन चीजों का इस्तेमाल करते हैं ?संबंधित वस्तु को खरीदने के लिए ऑडिएंस को संतुष्ट करने के लिए कितना समय खर्च करते हैं ?
4.      विज्ञापन की परीक्षा सर्जनात्मक आधार पर की जानी चाहिए। (मसलन् क्या परफ्यूम के विज्ञापन में सुन्दरता या कामुकता का वायदा किया गया है)
5.कामुक फिल्म और वीडियो चुनने के नियम बनाए जाने चाहिए।
6. फिल्म और वीडियो की कामुक इमेजों के बारे में अन्य क्या बोलते हैं ?
7. टीवी और फिल्म की रेटिंग व्यवस्था के बारे में सीखना चाहिए।











































शुक्रवार, 5 मार्च 2010

सांस्कृतिक हिंसाचार है पोर्न संस्कृति

    सेक्स उद्योग का अमेरिका धुरी है। सेक्स उद्योग बुनियादी तौर पर चाम का काम है। इसे चमड़ा उद्योग भी कहते हैं। यह सामान्य धारणा है कि पोर्न से समाज को खतरा है।जबकि कुछ ऐसे भी विचारक हैं जो यह मानते हैं कि पोर्न से समाज को कोई खतरा नहीं है। आज पोर्न के व्यापार में मीडिया और सूचना जगत की बहुराष्ट्रीय कंपनियां मोर्चा संभाले हुए हैं। प्रत्यक्षत: बड़ा पूंजीपति इस धंधे की कमान संभाले हुए है। इस स्थिति से यह बात साफ तौर पर समझी जा सकती है कि सेक्स बाजार की किसे जरूरत है।

     पचास साल पहले तक छोटी पूंजी के प्रकाशक ही इस धंधे में थे। किन्तु द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से स्थिति में धीरे-धीरे परिवर्तन आया है। खासकर 1970 के बाद पोर्न को अमेरिका के बड़े पूंजीपति ने अपने व्यापार का हिस्सा बनाना शुरू किया और आज इस धंधे पर उसका एकच्छत्र राज्य है। स्थिति यहां तक बदल चुकी है कि इंटरनेट जैसे शक्तिशाली माध्यम के जरिए पोर्न उद्योग का राज्य के प्रसारण तंत्र के साथ भी याराना हो गया है।

   कल तक पोर्न अवैध था। जिसे पाने के लिए गुपचुप प्रयास करने होते थे,आज किन्तु आज यह स्थिति नहीं है। आज पोर्न आपके घर में वैध रूप में बीएसएनएल के ब्रॉडबैण्ड के माध्यम से आधिकारिक प्रवेश पा चुका है। यानी कहने के लिए पोर्न 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे के लिए अभी भी प्रतिबंधित है। किन्तु घर में आ चुका है। आपकी गली-कूंचे के कैफे में आ चुका है। पोर्न का व्यवसाय इंटरनेट का सबसे बड़ा व्यवसाय है।
       
    यूरोप में 19वीं शताब्दी में पोर्न का मुद्रण की मासकल्चर  के रूप में उदय हुआ। औद्योगिक क्रांति के बाद पूंजीवादी राज्य आने के बाद पोर्न का सबसे ज्यादा उत्पादन हुआ। पोर्नोग्राफिक साहित्य के आने के बाद नए किस्म के राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक विचारों के निर्माण और प्रसार में मदद मिली।

    कहने का अर्थ यह है कि उस समय पोर्न का राजनीतिक पक्ष भी हुआ करता था। किन्तु आज स्थिति यह है कि पोर्न का राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष तो दूर की बात है कलात्मक पक्ष भी नजर नहीं आता। परवर्ती पूंजीवाद के दौर में जो पोर्न आ रहा है वह आनंद,मनोरंजन और मुनाफे के लिए तैयार किया जा रहा है। पोर्न के प्रसार ने पोर्न के प्रति रवैयया बदला है। पोर्न का एक जमाने में जो कलात्मक मूल्य था,आज वह मूल्य नहीं है।
    
     सन् 1960 के बाद से पोर्न के बारे में आलोचनात्मक नजरिया व्यक्त होना शुरू होता है। पोर्न को सांस्कृतिक हिंसाचार कहा गया। पोर्न को घरेलू हिंसा और बलात्कार के संदर्भ में विश्लेषित किया गया। स्त्रीवादी विचारकों का मानना है कि पोर्न में कामुक हमलों,कामुक उत्पीडन और स्त्री शोषण का व्यापक रूप में चित्रण किया जाता है ,इसके परिणामस्वरूप कामुक संस्कृति विस्तार पा रही है, औरतों पर हमले और जुल्म की वारदातें बढ़ी हैं। पोर्न ने स्त्री के सम्मान को नष्ट किया है। उसे अमानवीय बनाया है। प्रतिगामी हिंसाचार और कामुक हिंसाचार को वैधता प्रदान की है। उसके प्रति सहिष्णु माहौल बनाया है।
      
    हेलिनी लॉगिनी का मानना है कि पोर्नोग्राफी में स्त्री और पुरूष को आनंद लेते दिखाया जाता है। किन्तु इस तरह की प्रस्तुतियों में स्त्र कम मानवीय होती है। स्त्री के समस्त कार्य-व्यापार को अमानवीय रूप में पेश किया जाता है।

    पोर्न यह संदेश देता है कि स्त्री के साथ किसी भी किस्म के नैतिक मूल्यों को सम्मान दिए वगैर व्यवहार किया जा सकता है। हमें सवाल उठाना चाहिए कि पोर्न में गलत क्या है ? वे स्त्री को असम्मानित करते हैं।

   पोर्न अपनी प्रकृति के अनुसार यह बतात है कि स्त्री पुरूष के मातहत है। पुरूष की फैण्टेसी को संतुष्ट करने का साधन है। कैथरीन मेककीनन और ए.डोरिन का मानना है कि पोर्न स्त्री की प्रत्यक्ष गुलामी है। यह स्त्री के प्रति दिया गया असम्मानजनक बयान है जो सुचिन्तित रूप से स्त्री के प्रति भेदभाव को बढावा देता है। जब औरत पुरूष पर कामुक दुर्व्यवहार का आरोप लगाती है तो लोग उस पर विश्वास नहीं करते,ऐसे लोगों को पोर्न देखना चाहिए।   
     
    पोर्न एक तरह से स्त्री की उस क्षमता पर ही सवालिया निशान लगात है कि वह अपने साथ किए जा रहे भेदभावपूर्ण बर्ताव के खिलाफ न्याय पा सकती है। पोर्नोग्राफी का निर्माण एवं प्रसार लिंगभेद और स्त्री शोषण को वैधता प्रदान करता है। मैककिनोन का मानना है पोर्नोग्राफी स्त्री पर किया गया प्रत्यक्ष हमला है। मर्द के द्वारा पोर्न का इस्तेमाल उसे यह  शिक्षा देता है कि औरत समर्पण के लिए बनी है।
    

सेक्स उद्योग और सैन्य मिशन

     सारी दुनिया में सेक्स उद्योग में आई लंबी छलांग के दो सबसे प्रमुख कारण हैं पहला है युध्द और दूसरा है उन्नत सूचना एवं संचार तकनीकी। आज वेश्यावृत्ति और पोर्न दोनों का ही औद्योगिकीकरण हो चुका है। विश्व स्तर पर वेश्यालयों के कानूनी संरक्षण,वेश्यावृत्ति को कानूनी स्वीकृति दिलाने का आन्दोलन तेजी से चल रहा है इस मामले में सबसे आगे विकसित पूंजीवादी मुल्क हैं।

   विकसित पूंजीवादी मुल्कों में वेश्यावृत्ति पेशा है। वेश्याएं सरकार को टैक्स अदा करती हैं। सन् 2001 में जर्मनी में वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता दे दी गयी। अब वेश्यावृत्ति वहां पर अनैतिक धंध नहीं रह गया है। बल्कि नैतिक और कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त धंधा है। वेश्याएं शरीर बेचने के बदले सरकार को टैक्स देती हैं। अब वेश्याओं को पुलिस परेशान नहीं करती।प्रति वेश्या प्रतिमाह 180 डॉलर टैक्स देना होता है।
    
     एक अनुमान के अनुसार वेश्यावृत्ति के धंधे में प्रतिवर्ष 40 लाख नयी लड़कियां और दस लाख बच्चे आ रहे हैं। वेश्यावृत्ति वस्तुत: गुलामी है। इसका लक्ष्य है शारीरिक और कामुक शोषण, इस शोषण का अर्थ है कामुक उत्तेजना,कामुक शांति और वित्तीय लाभ।नयी विश्व व्यवस्था ने कानूनों एवं नियमों में ढिलाई एवं परिवर्तन का जो दबाव पैदा किया है उसके कारण सेक्स और पोर्न संबंधी कानूनों में भी बदलावा आया है। सेक्स और पोर्न संबंधी कानून ज्यादा उदार बने हैं,इसके कारण सेक्स उद्योग और पोर्न उद्योग के प्रति अलगाव और अनैतिक भाव नष्ट हुआ है।

    अब पोर्न और सेक्स उद्योग सम्मानित उद्योग हैं। इस उद्योग में काम करने वाले समाज में आज सम्मानित हैं। पोर्न एवं सेक्स उद्योग की वैधता के कारण स्त्री और बच्चों का शारीरिक शोषण और भी बढ़ा है। हमारे समाज में जो लोग भूमंडलीकरण के अमानवीय चरित्र की उपेक्षा करके उसकी अंधी हिमायत में लगे हैं उन्हें फिलीपीन्स के अनुभवों से सबक हासिल करना चाहिए।

      फिलीपींस में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष,विश्व बैंक आदि के इशारों पर स्त्रीमुक्ति का जो रास्ता अख्तियार किया गया वह वह स्त्री को आत्मनिर्भर नागरिक नहीं बनाता ,बल्कि सेक्स बाजार में ठेलता है।लेबर एक्सपोर्ट के नाम पर साठ और सत्तर के दशक में बड़े पैमाने पर फिलीपीनी औरतों का निर्यात किया गया।सत्तर के दशक में मध्य-पूर्व में निर्माण उद्योग के लिए मर्दो का निर्यात किया गया। सत्तर और अस्सी के शक में फिलीपींस के बाहर काम करने वाली अधिकांश औरतें ही थीं। वियनाम युध्द के बाद वेश्यावृत्ति का विश्वबाजार तेजी से विकसित होता है।

    अमेरिका,ब्रिटेन,फ्रांस आदि देशों की सेनाओं ने जिन देशों में हस्तक्षेप किया,जिन इलाकों में अपने सैनिक अड़डे बनाए उनके आसपास के देशों में वेश्यावृत्ति तेजी से फैली। यही स्थिति संयुक्त राष्ट्र संघ के नेतृत्व में चलने वाले शांति मिशन अभियानों की है। शांति मिशन अभियानों में शामिल सैनिकों को औरतों और बच्चों की तस्करी करते रंगे हाथों पकड़ा गया है। सोमालिया,मोगादिसु,साइप्रस,कम्बोडिया, सर्बियाबोसनियाकोसोवो आदि इलाकों में शांति सैनिक औरतों की तस्करी करते पकड़े गए हैं।

    कम्बोडिया में 1992-93 के शांतिमिशन के समय वेश्यावृत्ति कई गुना बढ़ गयी।25 फीसदी से ज्यादा सैनिक एचआईवी पॉजिटिव होकर लौटे। सोमालिया में फ्रेंच सैनिकों ने वेश्यावृत्ति में कई गुना इजाफा कर दिया।

    सन् 2002 में संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा इटली के शहर तूरिन में '' प्रोस्टयूशन ,सेक्स ट्रेफिकिंग एण्ड पीसकीपिंग'' शीर्षक से अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार आयोजित किया गया। जिसमें यह तथ्य सामने आया कि शांति मिशन के कार्य जब चरम पर होते हैं तब ही वेश्यावृत्ति और अन्य देशों के लिए औरतों कह बिक्री अचानक बढ़ जाती है।यह स्थिति निकोशिया, फामुगुस्ता, बुडापेस्ट, कोसोवो, डिली-डारविन, नोमपेन्ह-बैंकाक, होंडुररास, अल-सल्वाडोर, ग्वाटेमाला,सोमालिया  आदि देशों में देखी गयी है।

   आज स्थिति यह है कि भूमंडलीय विचारकों के दबाव के कारण भूमंडलीय आतंकवाद,जनसंहारक अस्त्र, सर्वसत्तावादी या आततायी राज्य, शक्ति संतुलन, भूमंडलीकरण आदि विषयों पर चतरफा काम हो रहा है।ये विषय सर्वोच्च प्राथमिकता की कोटि में हैं। किन्तु ' सेक्स ट्रेफिकिंग ' सर्वोच्च वरीयता की सूची के बाहर है। उसे 'वूमेन्स स्टैडीज', 'थर्ड वर्ल्ड डवलपमेंट', 'एरिया स्टैडीज' आदि क्षेत्रों के हवाले करके हाशिए पर फेंक दिया गया है। जबकि इसे वरीयता क्रम में ऊपर रहना चाहिए। इस तरह से 'सेक्स ट्रेफिकिंग' से बौध्दिकों का अलगाव बढ़ा है। वे इसे एक विच्छिन्न विषय या घटना मात्र समझते हैं। विकासमूलक अर्थव्यवस्था की समस्या के रूप में देखते हैं।

     सवाल उठता है कि क्या इस तरह हाशिए पर रखकर इस समस्या का सही अध्ययन संभव है ? इस विषय पर जो मूल्यांकन मिलते हैं उनमें सेक्स ट्रेफिकिंग के विवरण ज्यादा होते हैं। इस तरह के मूल्यांकनों में मूलत: निम्न बातों पर जोर रहता है,जैसे, ग्राहक मनोरंजन के लिए औरतों का शोषण कर रहे हैं। दलाल मुनाफे के लिए शोषण कर रहे हैं। जो औरतें बेची जा रही हैं वे उत्पीडित हैं। इस तरह मूल्यांकन इस समस्या के समाधान की रणनीति बनाने में मदद नहीं करते।इनसे समाधान की कोई बुनियादी रणनीति नहीं निकलती।
         
     जहां वेश्यावृत्ति वैध है वहां सरकार धन कमाती है,किन्तु जहां अवैध है वहां भ्रष्ट अधिकारी और अपराधी गिरोह चांदी काटते हैं।वेश्यावृत्ति के कारोबार में व्यापार का मुनाफा इस बात पर निर्भर करता है कि नयी औरतों का फ्लो कितना है। नयी औरतें कितनी आ रही हैं।विदेशी औरते कितनी आ रही हैं।दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के महिला संगठनों की 1991 में एक काँफ्रेंस हुई जिसमें अनुमान लगाया गया कि सत्तर के बाद से सारी दुनिया में तीन करोड़ औरतें बेची गयी हैं।जापान से सालाना एक लाख औरतें जहाजों में भरकर लाकर सेक्स उद्योग के हाथ बेची जाती हैं। ये औरतें 'वार' और वेश्यालयों में काम करती हैं।र्मा ,नेपाल,थाईलैण्ड, बांग्लादेश,भारत और पाकिस्तान से सालाना तीन लाख से ज्यादा औरतें बिक्री होती हैं।
           
   सन् 1960 और 1970 के दशक में आईएमएफ और विश्वबैंक ने पर्यटन पर ज्यादा जोर दिया। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर जोर दिया।होटल और रिसोर्ट बनाने को प्राथमिकता दी।जिससे विदेशी पूंजी को आकर्षित किया जा सके।इस पर्यटन का एक आकर्षक हिस्सा सेक्स पैकेज हुआ करता था।जिसमें हवाईभाड़ा,होटल का भाड़ा,औरत या मर्द जो भी चाहिए,उसका भाड़ा,कार आदि का खर्चा शामिल हुआ करता था।वियतनाम युद्ध के कारण अकेले सैगोन में पांच लाख वेश्याएं थीं।जबकि युद्ध के पहले सैगोन की कुल आबादी ही पांच लाख की थी।

    वियतनाम युद्ध के कारण फिलीपींस,कोरिया,कम्बोडिया,थाईलैण्ड आदि देशों में वेश्यावृत्ति कई गुना बढ़ गयी।इसी तरह ओकीनावा में अमेरिकी सैन्य अड्डा बनने के बाद नए किस्म के विश्राम और आनंद के केन्द्रों का व्यापक पैमाने पर आसपास के इलाकों में निर्माण कियागया। इन सभी देशों में वेश्यावृत्ति को वैध बनाने के लिए कानून पास किए गएंसत्तर के दशक में मनीला और बैंकाक वेश्यावृत्ति के दो बड़े केन्द्र बनकार उभरे।उसके बाद नेपाल का विकास हुआ।इन तीन केन्द्रों ने सेक्स पर्यटन को तेजी से बढ़ावा दिया।सिर्फ  सेक्स पर्यटन के कारण ही इन केन्द्रों  की अरबों डालर की सालाना आय थी।मसलन् थाईलैण्ड में प्रतिवर्ष 50 लाख पर्यटक आते हैं।इनमें 75 फीसदी पुरूष होते हैं। सेक्स उद्योग के नए क्षेत्रों में कर मुक्त इलाके,औद्योगिक क्षेत्र ,पूंजी विकास केन्द्र औरतों क बिक्री के बड़े केन्द्र के रूप में उभरकर सामने आए हैं।
     

सेक्स का औद्योगिकीकरण

मौजूदा दौर की विशेषता है सेक्स का औद्योगिकीकरण। आज सेक्स उद्योग है। पोर्न उसका एक महत्वपूर्ण तत्व है। पोर्न एवं उन्नत सूचना तकनीकी के अन्तस्संबंध ने   उसे सेक्स उद्योग बना दिया है।

    भूमंडलीकरण के कारण नव्य-उदारतावादी आर्थिक नीतियों के आधार पर नयी विश्व व्यवस्था का निर्माण किया गया है। इस व्यवस्था में निरंतर स्ट्रक्चरल एडजेस्टमेंट पर जोर है। उसी के आधार पर रीस्ट्रक्चरिंग हो रही है।  इस समूची प्रक्रिया का लक्ष्य है ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना। इसके लिए जरूरी है कि जनता की स्वीकृति हासिल की जाए।
   
   जनता की सहमति के बगैर यदि रीस्ट्रक्चरिंग की जाती है है तो तनाव पैदा होगा,झगड़े होंगे और अराजकता फैलेगी। इस सबसे निबटने के लिए बल प्रयोग करना होगा। यही व बिन्दु है जिसे केन्द्र में रखकर नव्य उदारतावादी नीतियों की सारी रणनीति काम कर रही है। अब जोर व्यक्तिवादी विचारधारा पर है।प्रतिस्पर्धी रूपों पर है।

   व्यवसायिकता और बाजारीकरण पर जोर दिया जा रहा है।ये सारी चीजें मिलकर संरचनात्मक असमानता पैदा कर रही हैं।निरंतर शोषण,गरीबी, हताशा, डेसपरेशन आदि पैदा कर रही हैं। इस स्थिति से ध्यान हटाने के लिए समूचा मनोरंजन उद्योग, इच्छा उद्योग और  सेक्स उद्योग सक्रिय है। वह असल मुद्दों या समस्या से ध्यान हटाने या गलत दिशा देने का काम कर रहा है।

       नव्य-उदारतावाद सामान्य लोगों को यह बताने में व्यस्त है कि नव्य विश्व व्यवस्था लोगों को संतुष्ट करने की कोशिश कर रही है। वह व्यक्ति के उपभोग, व्यक्तिगत चयन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है। यह धारणा भी प्रसारित की जा रही है कि माल और व्यक्ति का विनिमय हो सकता है। निजी उद्योग का लक्ष्य सार्वजनिक भलाई करना है। कारपोरेट सक्षमता विकसित करने के लिए वस्तुकरण जरूरी है।
    
     तीसरी दुनिया के देशों में श्रम का नव औपनिवेशीकरण हो रहा है।नस्लवाद और सेक्सवाद को सहज,स्वाभाविक और सहनीय बनाया जा रहा है।नस्लवाद ,सेक्सवाद ,नव्य उपनिवेशवाद मूलत: नयी विश्व व्यवस्था के एजेण्ट के रूप में सक्रिय हैं। सामाजिक मुक्ति के नाम पर बहुराष्ट्रीय मीडिया एवं सूचना कंपनियों ने इच्छाओं और सहजजात वृत्तियों पर हमला बोला है।इच्छाओं के आधार पर ही राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक लाभ, कामुक शांति,,वेश्यावृत्ति , जिस्म फरोशी तार्किक परिणति के रूप में सामने आई है।
      
      ऐतिहासिक नजरिए से वेश्यावृत्ति के बारे में विचार करें तो यह पेशा संभवत: दुनिया के सबसे पुराने पेशों में से एक है।बेबीलोन के मंदिरों से लेकर भारत के मंदिरों में देवदासी प्रथा वेश्यावृत्ति का आदिम रूप है। सेक्स के सभी विचारधारा के इतिहासकार इस पर एकमत हैं कि वेश्यावृत्ति की शुरूआत मंदिरों अथवा मंदिर क्षेत्र से हुई।
    
    कालान्तर में रजवाडों की राजनीतिक हमलावर कार्रवाईयों ने इसे नयी ऊँचाईयों पर पहुँचाया। गुलाम व्यवस्था में गुलामों के मालिक गुलाम वेश्याएं पालते थे। अनेक गुलाम मालिकों ने वेश्यालय भी खोले। असल में जो औरतें गुलाम थीं उनसे वेश्यावृत्ति करायी जाती थी। वेश्याएं संपदा और शक्ति की प्रतीक मानी जाती थीं।  वेश्यावृत्ति के विस्तार ने अन्य व्यक्ति के लिए संपदा और सामाजिक हैसियत की सृष्टि की।इसी क्रम में बच्चों की बिक्री का मामला भी सामने आया।बच्चों को श्रम के लिए बेचा जाता था।

    सामाजिक विकास के क्रम में स्त्री के लिए कानून बनाए गए,उसे सम्मानित नजरिए से देखा जाने लगा। फलत: स्त्री शुचिता को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।खासकर बेटी की शुचिता को सम्मानित नजरिए से देखा गया।पवित्र बेटी परिवार की संपत्ति मानी गयी। कालान्तर में वेश्यावृत्ति ने अपना रूपान्तरण किया और मर्द की सामाजिक और शारीरिक जरूरतों की पूर्त्ति के रूप में अपना विकास किया। इसी क्रम में स्त्रियों के बीच में छोटे-बड़े के भेदभाव ,ऊँच-नीच आदि की केटेगरी का उदय हुआ। स्त्री को नैतिकता आधार पर वर्गीकृत किया गया। ये सारे अंतर स्त्री की कामुक उपलब्धता पर आधारित थे।इसमें सबसे ऊपर विवाहिता को दर्जा दिया गया,इसके बाद शादी लायक पवित्र कन्या ,इन दोनों के बीच उपपत्नी,सबसे नीचे अविवाहित देवदासी और गुलाम औरत को स्थान दिया गया।
      
वेश्यावृत्ति के पेशे में वे औरतें ठेली गयीं जो शोषित थीं। गुलाम थीं। कामुक संपत्ति थी जिनका सामाजिक उपहार के रूप में आदान-प्रदान होता था। जिन्हें तरह-तरह के काम दिलाने के बहानों से फुसलाया जाता था। सामन्ती दौर में स्त्री के विनिमय या उपहार स्वरूप देने की प्रथा ने स्त्री के शोषण को एक आकर्षक वैध व्यवस्था बनाया।
                 

गुरुवार, 4 मार्च 2010

सेक्स उद्योग के सामने सब बौने

     परवर्ती पूंजीवाद के दो प्रभावी अस्त्र हैं सेक्स उद्योग और शस्त्र उद्योग। जो शास्त्र से न मरे उसे सेक्स से मारो,और जब सेक्स से भी न मरे तो शस्त्र से मारो। इन दोनों ही किस्म के यथार्थ के बारे में सारे शास्त्रों के अनुमान और तर्क असमर्थ महसूस करते हैं।
    सामान्य तौर पर यह सोचा जा रहा था कि अस्सी के दशक में आयी आर्थिक मंदी से सेक्सबाजार कुछ ठंडा पड़ेगा। किन्तु हुआ इसके विपरीत। कानूनी पेचबंदियों के बाद अमेरिका में राष्ट्रपति रीगन और राष्ट्रपति सीनियर बुश ने सोचा था कि अमेरिका का पोर्न बाजार ठंडा पड़ गया है किन्तु कुछ ही अर्से बाद देखा गया कि कम्युनिकेशन की अत्याधुनिक तकनीकों को इजाद कर लिया गया और ठंड़ा सा दिखने वाला पोर्न बाजार नए सिरे से आक्रामक हो उठा।

डिजिटल तकनीक ओर उपग्रह प्रसारणों के गर्भ से पोर्न पहले से ज्यादा आक्रामक होकर सामने आया। वेश्यावृत्ति का धंधा कम होने की बजाय तेजी से फैला है। आखिरकार क्या बात है कि भू.पू.समाजवादी देशों में जहां सेक्स बाजार खत्म कर दिया गया था। स्त्रीशोषण के सभी रूपों को खत्म कर दिया गया था, समाज में स्वस्थ संस्कृति और स्वस्थ मीडिया संस्कृति थी। आर्थिक,राजनीतिक और सांस्कृतिक शोषण के सभी रूपों को खत्म कर दिया गया था। इतना कुछ करने के बावजूद भू.पू. समाजवादी राष्ट्रों में सेक्सबाजार का पुन: स्थापित हो जाना इस बात का संकेत है कि कामदेव के आगे सभी बौने हैं। कामशास्त्र के सामने सारे शास्त्र कुण्ठित हैं।

शोषण के सबसे प्रभावी अस्त्र के रूप में आज भी सेक्सबाजार दुनिया का सबसे ताकतवर बाजार है। सारे कानून और सत्ता के दबाव उसके सामने असमर्थ महसूस कर रहे हैं। आधुनिक आधुनिक काल आने के बाद और औद्योगिक क्रांति के सन् अस्सी के पहले तक सेक्स बाजार का हिस्सा था,आज किन्तु वह सेक्स उद्योग है। सेक्स शरीर था,बाजार बना ओर अब उद्योग बन गया है। पहले सेक्स वर्कर क कोठे पर देख सकते थे। कभी-कभार बाजार या जलसों में भी देख सकते थे। सिनेमा के आने के बाद कोठे के दृश्य आने लगे। पोर्न साहित्य ने शारीरिक क्रियाओं और शारीरिक अंगों के दृश्यों की बाढ़ पैदा कर दी। पोर्न फिल्मों ने कामुकता के कलात्मक और राजनीतिक नजरिए की विदाई कर दी। और इंटरनेट और डिजिटल तकनीक ने पोर्न और सेक्स को उद्योग बना दिया।
      इण्टरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट में बताया गया है कि एशियाई आर्थिक संकट के बावजूद सेक्स उद्योग थमा नहीं। सामाजिक और आर्थिक शक्तियां सेक्स उद्योग को तेजी से आगे ले जा रही हैं। वेश्यावृत्ति का दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में इस गति से विकास हुआ है कि उसने आज व्यवसायिक क्षेत्र का दर्जा हासिल कर लिया है। आज वह इस क्षेत्र के देशों की रोजगार और राष्ट्रीय आय में अच्छा-खासा अवदान कर रहा है। इस क्षेत्र के देशों में व्यक्तिगत आय में अस्सी के बाद के वर्षो में तेजी से गिरावट आयी है। मैन्यूफेक्चरिंग क्षेत्र में औरतों को अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा है।
        प्रावदा ( 5 दिसम्बर 2005) अखबार लिखता है कि आज सारी दुनिया में अनुमानत: 12.3 मिलियन लोग हैं जो गुलामी में जी रहे हैं। निजी कंपनियों में 9.8 मिलियन कर्मचारी हैं। 2.5 मिलियन से ज्यादा लोग ऐसे हैं जो किसी न किसी दबाव के कारण गुलामी में जी रहे हैं। के जरिए विश्व स्तर पर  सालाना आमदनी 30 विलियन डालर क आंकड़ा पार गयी है। इसके बावजद दोषी लोगों को अभी तक दण्डित नहीं कर पाए हैं।
    आईएलओ की रिपोर्ट के आधार पर प्रावदा लिखता है कि इन गुलामों में से बीस फीसदी के करीब लोगों का राज्य और सैन्यबल इस्तेमाल करते हैं। 11 फीसदी आधुनिक गुलामों का वेश्यावृत्ति और अन्य सेक्सउद्योग में इस्तेमाल किया जाता है। 64 फीसदी गुलाम परंपरागत और वैध उद्योगों  के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। बाकी पांच फीसदी के बारे में बताना मुश्किल है कि वे किस तरह के कामों में लगे हैं।

गुलामी और जोर-जबर्दस्ती काम कराने की प्रक्रिया आज भी समाज में जारी है। सारी दुनिया में किसी न किसी रूप में ये प्रक्रिया चल रही है। एशिया ,अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में गुलामी का सबसे कारण है कर्ज। भूमंडलीकरण ओर माइग्रेशन समसामयिक गुलामी के रूप हैं। ये मूलत: नियोजित अपराधी गतिविधियों , कर्ज में डूबो देने वाले कारोबार जैसे कृषि,भवननिर्माण ,सिलाई और खाद्य उपस्करण उद्योग। अपराधी गिरोह बच्चों की खरीद-फरोख्त केकाम को सुनियोजित ढ़ंग से अंजाम दे रहे हैं।

सेक्स गुलामी के बड़े पैमाने पर लोग शिकार हो रहे हैं। अपराधी गिरोह औरतों को ज्यादा पैसा दिलाने के लालच में औरतों का विदेशों के लिए निर्यात कर रहे हैं। पर्यटन उद्योग में औरतों का देह-व्यापार के क्षेत्र में इस्तेमाल हो रहा है।युवा लडकियों और तरूणियों की ज्यादा मांग है।क्योंकि उनमें समर्पणभाव ज्यादा होता है। थाईलैण्ड में पडोसी देशों की औरतें देह-व्यापार के धंधे में ज्यादा हैं।खासकर बर्मा,लाओस,कम्बोडिया की लड़कियां वेश्यावृत्ति के पेशे में हैं।

इसी तरह वियतनाम की औरतें और बच्चे कम्बोडिया में देह-व्यापार में ज्यादा हैं।इसी तरह जबरिया शादी और जबरिया काम के नाम पर चीन, आस्ट्रेलिया, हांगकांग, जापान,दक्षिण कोरिया आदि देशों में इण्डोनेशिया और फिलीपीन्स की लड़कियां सबसे ज्यादा सेक्स उद्योग में हैं।

जापान भी अपराधी कारोबार  का बड़ा केन्द्र है। जापान में दक्षिण-पूर्व एशिया,लैटिन अमेरिका और पूर्वी यूरोपीय देशों की लड़किया देह-व्यापार के धंधे में सबसे ज्यादा हैं। जापान में सेक्स उद्योग व्यावसायिक उद्योग के दायरे में आता है। इसका काम है सेक्स सेवाएं प्रदान करना। इस पूरे उद्योग को ताकतवर अपराधी गिरोह चलाते हैं। समाजवादी सोवियत संघ के पतन और विघटन के बाद वहां के देशों में भी देह-व्यापार तेजी से फैला है।

भू.पू. समाजवादी देशों से अब तक पांच लाख से ज्यादा लड़कियां दुनियाभर के देशों में सेक्स उद्योग में सप्लाई की गई हैं। इन तथ्यों को रखने का प्रधान कारण यह है कि देह-व्यापार में स्थानान्तरित करके लायी गयी लड़कियां बड़ी संख्या में हैं।

भारत में देह-व्यापार में सक्रिय लड़कियों में सबसे बड़ी तादाद बंगलादेश और नेपाल से आई लड़कियों की है। यानी देह-व्यापार का धंधा माइग्रेशन पर टिका है। माइग्रेशन के कई कारण हैं । इनमें सबसे बड़ा कारण है गरीबी, स्थानीय स्तर पर आजीविका का अभाव,कम परिश्रम से ज्यादा धन कमाने की लालसा,जबरिया श्रम और विकास के नाम पर हो रहा विस्थापन। 
       


विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...