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शनिवार, 5 मार्च 2016

हमारे समय में जयशंकर प्रसाद



समय –

फ्रांसिस फुकुयामा ने ´इतिहास का अंत´की जब बात कही थी तो उन्होंने ´एंड ऑफ दि स्पेस´की बात कही थी,लेकिन हिंदी आलोचकों ने उसे गलत अर्थ में व्याख्यायित किया।सवाल यह है भूमंडलीकरण के कारण सारी दुनिया में ´स्पेस´का अंत हुआ या नहीं ॽ यही वह परिदृश्य है जिसमें आप भूमंडलीकरण को समझ सकते हैं। ´एंड ऑफ दि स्पेस´ का अर्थ यह भी है मुक्त बाजार ने सर्वसत्तावादी सामूहिकता को हटा दिया,इस प्रक्रिया में ´इंटरवल´या ´अंतराल´का भी अंत हो गया,अब निरंतर फीडबैक है,औद्योगिक या पोस्ट औद्योगिक गतिविधियों के टेलीस्कोपिंग मैसेज हैं।पहले हर चीज के साथ भू-राजनय और भौगोलिक अंतराल हुआ करते थे लेकिन अब यह सब नहीं हो रहा।आज हम पृथ्वी को जानते हैं लेकिन उसके अंतरालों को नहीं जानते।देशज भौगोलिक अंतरों को नहीं जानते।अब हम इतिहास के अंतरालों में प्रवेश ही नहीं करते सीधे यथार्थ में प्रवेश करते हैं। आज हम ´लोकल समय´में नहीं ´रीयल टाइम´में रह रहे हैं,इसने यलिटी´से हमारी दूरी खत्म कर दी है।अंतर खत्म कर दिया है।

पहले दूरी थी,इतिहास-भूगोल का अंतर था,लेकिन अब तो सिर्फ ´दूरी´ही रह गयी है,लेकिन इसको भी अतिक्रमित करके हम ´टेलीप्रिजेंश´में आ चुके हैं।यही भूमंडलीकरण की धुरी है।यही ग्लोबलाइजेशन का ´एक्सचेंज´है,इसके जरिए दूरी को देख सकते हैं।यह ´दूरी´वस्तुतः दूसरी ओर झुकी हुई है।आज हम कम्प्यूटरीकरण के वैचारिक दृष्टिकोण से बंधे हैं।आज हम जल्द ही विश्व के किसी भी अंश पर पहुँच सकते हैं,विश्व के किसी भी अंश पर पहले भी जाते थे लेकिन इस समय भिन्न तरीके से जाते हैं।पहले इतिहास और भूगोल के जरिए प्रवेश करते थे लेकिन अब सीधे यथार्थ के जरिए प्रवेश करते हैं।पहले समृद्ध होते थे अब नहीं।अब क्षण में ही यथार्थ में प्रवेश करने के कारण जल्द ही पहुँच जाते हैं,इसके कारण यथार्थ को पूरी तरह देख-समझ नहीं पाते।´दूरी´का अंतराल महसूस नहीं होता।आज टेली कम्युनिकेशन और स्वचालितीकरण ने ग्लोबल कम्युनिकेशन सिस्टम से जोड़ दिया है।सभी किस्म की प्रस्तुतियां वस्तुतःदूरी की प्रस्तुतियां हैं।टेलीकम्युनिकेशन ने कहने के लिए दूरी कम करने का वायदा किया है लेकिन दूरिया बढ़ी हैं।इस दूरी ने ´महा भौगोलिक यथार्थ´ का रूप ले लिया है जो ´वर्चुअल रियलिटी´ के जरिए नियमित हो रहा है।आज ´वर्चुअल रियलिटी´ ने ´टेली कंटेंट´ पर एकाधिकार जमा लिया है।यह राष्ट्रों का आर्थिक गतिविधि का बहुत बड़ा हिस्सा बन गया है।इसक कारण संस्कृति का क्षय हो रहा है।संस्कृति वस्तुतःभौगोलिक स्पेस में रहती है,लेकिन वर्चुअल रियलिटी उसे अपदस्थ कर रही है।फलतःआज हम ´इतिहास का अंत´नहीं ´भूगोल का अंत´देख रहे हैं।कल तक19वीं शताब्दी के ´ट्रांसपोर्ट रिवोल्यूशन´के दौर में जब अंतराल आता था तो विभिन्न समाजों के बीच की खाईयां या अंतराल नजर आते थे।लेकिन मौजूदा ´ट्रांसमीशन रिवोल्यूशन´में अहर्निश फीडबैक आ रही हैं और इसमें सामान्यीकृत इंटररेक्टिविटी हो रही है।इसके कारण हमें अंतर पता ही नहीं चलता।सिर्फ स्टॉक मार्केट में जब तबाही मचती है तो अंदाजा लगता है। भूमंडलीकरण के दौर में जो बाहरी था या ग्लोबल था वह आंतरिक हो गया और जो लोकल था वह बाहरी हो गया है।वह हाशिए पर चला गया है।भूमंडलीकरण के बारे में अनेक मिथ्या बातें कही जा रही हैं।भूमंडलीकरण ने सबको रूपान्तरित कर दिया है।अब वे ´व्यक्ति´ को स्थानांतरित नहीं करते,या जनता को स्थानांतरित नहीं करते बल्कि उन्होंने ´रहने´की जगह ही छीन ली है।फलतः ´स्थानीय´का भूमंडलीय अ-स्थानीकरण´किया है। इसने ´राष्ट्रीय´स्तर पर ही नहीं सामाजिक स्तर पर भी प्रभावित किया है।इसने राष्ट्र–राज्य के सवाल ही खड़े नहीं किए हैं बल्कि शहर एवं राष्ट्र एवं राजनय के सवाल भी खड़े किए हैं।विदेश नीति और गृहनीति में अंतर खत्म हो गया है।बाहर और भीतर अब कोई अंतर नहीं रह गया है। ´लाइव´एवं ´डायरेक्ट ट्रांसमीशन´के कारण ´बेव´के प्रभाव को कम कर दिया है।´पुराने टेली-विजन´से निकलकर ´भू-विजन´ में दाखिल हो गए हैं।सुरक्षा के नाम पर ’ टेली-निगरानी´में आ गए हैं।´ऑडियो विजुअल´निरंतरता ने ´क्षेत्रीय निरंतरता´पर बढ़त हासिल कर ली है।अब ´राष्ट्र´की क्षेत्रीय पहचान को ´रीयल टाइम´ इमेज और साउण्ड ने टेकओवर कर लिया है। ग्लोबलाइजेशन के दो प्रमुख पहलु हैं,पहला,एक तरफ इसने दूरी को एकसिरे से खत्म कर दिया है, इस क्रम में ट्रांसपोर्ट और ट्रांसमीशन दोनों को ´कम्प्रेस´करके रख दिया है।दूसरा है टेली-निगरानी।यह विश्व का नया विजन है।´टेली प्रजेंट´पर बार-बार जोर दिया जा रहा है।यानी टेली प्रजेंट के जरिए 24घंटा,पूरे सप्ताह सक्रियता।अब हर इमेज ´इनलार्ज´ होकर आ रही है। ´टेक्नो-साइंस´ ने ´इमेज´के भविष्य को अपने हाथ में ले लिया है।अतीत में उसने ´टेलीस्कोप´एवं माइक्रोस्कोप´के जरिए यह काम।भविष्य में यह ´टेवी निगरानी´के रूप में काम करेगी और यही इसका सैन्य आयाम है। ऑडियो-विजुअल दृश्य की निरंतरता ने राष्र की क्षेत्रीय निरंतरता के ऊपर बढ़त बना ली है।आज ´क्षेत्र´ का महत्वपूर्ण नहीं है।आज क्षेत्रीय राजनीति रीयल स्पेस से शिफ्ट होकर ´रीयल टाइम´में दाखिल हो गयी है.यह एक तरह से इमेज और साउण्ड की राजनीति है।यह भूमंडलीकरण की पूरक इमेज है।´ट्रांसपोर्ट´और ´ट्रांसमीशन´के सामयिक दबाव ने ´दूरी´ कम कर दी है।दूसरी ओर ´टेली-निगरानी´बढ़ी है।अब नया विज़न है ´टेली प्रिजेंट´,यानी 24घंटे उपस्थिति।अब ये स्थानान्तरित नयी आंखें हैं। प्रत्येक इमेज का भविष्य ´इनलार्जमेंट´पर टिका है।´इनलार्जमेंट´वस्तुतः ´टेक्नो साइंस´है,इसने साइंस को भी पीछे छोड़ दिया है।अब तो टेक्नोसाइंस के पास ही इमेज की जिम्मेदारी है।यह ´टेली निगरानी´का हिस्सा है।पहले किसी भी चीज को भू-राजनय परिप्रेक्ष्य या परिप्रेक्ष्य में देखते थे लेकिन अब कृत्रिम परिप्रेक्ष्य में स्क्रीन और मॉनीटर के जरिए देखते हैं।अब मीडिया परिप्रेक्ष्य में देखते हैं।मीडिया परिप्रेक्ष्य ने ´स्पेसके तात्कालिक परिप्रेक्ष्य´पर बढ़त बना ली है।यही वो परिप्रेक्ष्य है जिसमें हमारा मौजूदा ´समय´कैद है। जयशंकर प्रसाद के बारे में विचार करते समय कई और बातों पर गौर करने की जरूरत है।मसलन्,उनका दौर वही है जो महात्मा गांधी के युग के नाम से जानते हैं।इस प्रसंग में एक घटना का जिक्र करना समीचीन होगा। काशी में मैथिलीशरण गुप्तजी के अभिनंदन की तैयारी के अवसर पर इसका विरोध करने वालों की एक सभा हुई,इसमें जयशंकर प्रसाद भी शामिल हुए थे।इसमें प्रसाद ने कहा, ´इस युग के तीन व्यक्तियों को महापुरूष मानता हूँ,गांधीजी,रवीन्द्र बाहू और मालवीयजी।और मैं अपने को इन तीनों में से किसी एक का अनुयायी नहीं मानता।´ प्रसादजी के इस बयान के बाद यह सवाल नए सिरे से उठा है कि आखिरकार प्रसादजी किससे प्रभावित थे ॽ छायावादी कवियों में प्रसाद और निराला पर गांधी का कोई प्रभाव नहीं था ,लेकिन पंतजी पर 1934 के बाद प्रभाव देखा जा सकता है।रामविलास शर्मा के अनुसार प्रसाद पर समाजवादी विचारधारा का धुंधला सा प्रभाव जरूर है।इस धुंधले प्रभाव का अर्थ है-किसानों के संगठन और उनके सामन्तविरोधी संघर्ष का बोध।रामविलास शर्मा के अनुसार प्रसाद और गांधीजी के नजरिए में तीखा अंतर्विरोध देखना हो तो यह भी देखें कि गांधीवाद जहां प्राचीन भारतीयसमाज में वर्ग संघर्ष अस्वीकार करता है,वहीं प्रसादजी ने राजा-प्रजा के रक्तमय संघर्ष का चित्रण पेश करके उसे स्वीकार किया है।गांधीवाद निष्क्रिय प्रतिरोध की बात करता है स्वयं कष्ट सहकर अन्यायी के हृदय-परिवर्तन की बात करता है,वहीं प्रसादजी ने सक्रिय प्रतिरोध के आदर्श को पेश किया है।शस्त्र उठाकर आतततायियों का विरोध करने का चित्र खींचा है।प्रसाद के पात्र सामाजिक संघर्ष में तटस्थ नहीं रहते।वे देश और जनता के प्रति सहानुभूति ही नहीं रखते अपितु संघर्ष में हिस्ला लेते हैं। रामविलास शर्मा के अनुसार प्रसाद के ´ध्रुवस्वामिनी´नाटक में यह नीति सूत्र है कि क्रूर,नृशंस ,देश की रक्षा करने में असमर्थ राजा वध्य है।वहीं नंद दुलारे वाजपेयी के अनुसार प्रसादजी का मूल दृष्टिकोण है ´नारी पुरूष की उद्धारक है।´यदि इस बुनियादी नजरिए को ध्यान में रखें तो प्रसादजी का नया पाठ निर्मित होगा। सवाल यह है क्या नारी संबंधी यह दृष्टिकोण आज के समय में समाज में मददगार होगा ॽ हमारा मानना है कि नारी को समाज की धुरी मानना,उसके जरिए ही परिवर्तन के तमाम कार्य संपन्न करना,प्रसादजी के साहित्य स्त्री पात्र बदलाव और उत्प्रेरणा के कारक बनकर सामने आते हैं।प्रसादजी को मन्दिर,फुलवारी और अखाड़ा ये तीन चीजें निजी तौर पर बहुत प्रिय थीं।इसके अलावा उनकी रचनाओं में व्यक्ति और राष्ट्र के अंतर्विरोधों के कई रूप नजर आते हैं।हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार ´उनकी आरंभिक रचनाओं में अतीत के प्रति एक प्रकार की मोहकता और मादकता भरी आसक्ति मिलती है।उनके कई परवर्त्ती नाटकों में यह भाव स्पष्ट हुआ है।´ मुक्तिबोध का मानना है कि प्रसाद की खूबी है कि ´कवि कुछ कहना चाहता है,पर कह नहीं पाता´,´´अन्य कवियों ने अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों को स्वच्छन्दता के साथ प्रकट किया,जबकि प्रसाद ने उन पर अंकुश रखा।एक प्रकार की झिझक और संकोच का भाव उनकी आंसू तक की सभी कविताओं में मिलता है।ऐसा लगता है कि कवि को भय है कि उसके मन में जो भाव उमड़ रहे हैं,जो वेदना संचित है वह यदि एकाएक अपने अनावृत्त रूप में प्रकट हो जाएगी तो पाठक उसकी कद्र नहीं कर सकेंगे।कवि की धारणा है कि उसका पाठक अभी इस परिस्थिति में नहीं है कि उलके भावों को ठीक-ठीक समझ सके और सहानुभूति के साथ देख सके।´ मुक्तिबोध के अनुसार ´कामायनी में प्रधान हैं लेखक के जीवन निष्कर्ष और जीवन अनुभव, न कि कथावस्तु और पात्र।साधारणतः,कथावस्तु के भीतर पात्र अपने व्यक्तित्व-चरित्र का स्वतंत्र रूप से विकास किया करते हैं,किंतु कामायनी में पात्र और घटनाएँ लेखक की भावना के अधीन हैं।कथानक,घटनाएँ,पात्र आदि तो वे सुविधा रूप हैं,कि जो सुविधा रूप लेखक को अपने भाव प्रकट करने के लिए चाहिए।इसीलिए कामायनी में कथावस्तु फैण्टेसी के रूप में उपस्थित हुई है,और उस फैण्टेसी के माध्यम से लेखक आत्म-जीवन को और उस आत्म-जीवन में प्रतिबिम्बित जीवन-जगत् के बिम्बों को,और तत्संबंध में अपने चिन्तन को,अपने जीवन-निष्कर्षों को प्रकट कर रहा है।´मुक्तिबोध के अनुसार´यह सर्वसम्मत तथ्य है कि कामायनी में जीवन समस्या है।वह जीवन समस्या है व्यक्तिवाद की समस्या है।जो एक विशेष समाज एवं काल में विशेष प्रकार से उपस्थित हो सकती है।इसके साथ प्रसाद के व्यक्तित्व को मिलाकर देखना होगा।´मुक्तिबोध के अनुसार प्रसाद का दर्शन ´एक उदार पूंजीवादी-व्यक्तिवादी दर्शन है,जो यदि एक मुँह से वर्ग-विषमता की निन्दा करता है; तो दूसरे मुँह से वर्गातीत,समाजातीत व्यक्तिमूलक चेतना के आधार पर,समाज के वास्तविक द्वन्द्वों का वायवीय तथा काल्पनिक प्रत्याहार करते हुए ´अभेदानुभूति´के आनंद का ही संदेश देता है।´ मुक्तिबोध के अनुसार प्रसादजी की कामायनी में चित्रित सभ्यता समीक्षा के प्रधान तत्व हैं, ´(1) वर्ग-भेद का विरोध और उसकी भर्त्सना,अहंकार की निन्दा-यह प्रसादजी की प्रगतिशील प्रवृत्ति है।(2)शाससकवर्ग की जनविरोधी,आतंकवादी नीतियों की तीव्र भर्त्सना- यह भी प्रगतिशील प्रवृत्ति है।(3)वर्ग-भेद का विरोध करते हुए भी मेहनतकशों के वर्गसंघर्ष का तिरस्कार –यह एक प्रतिक्रियावादी तत्व है।(4)वर्गहीन सामंजस्य और सामरस्य का वायवीय अमूर्त्त आदरअसवादषयह तत्व अपने अन्तिम अर्थों में इसलिए प्रतिक्रियावादी है कि (क)वर्ग-वैषम्य से वर्गहीनता तक पहुँचने के लिए उसके पास कोई उपाय नहीं,इस उपायहीनता का आदर्शीकरण है आदर्शवादी-रहस्यवादी विचारधारा;(ख)इस उपायहीनता का एक अनिवार्य निष्कर्ष यह भी है कि वर्तमान वर्ग –वैषमयपूर्ण स्थिति चिरंजीवी है;(ग)अगर इस यथार्थ की भीषणता में कुछ कमी की जा सकती है तो वह शासक की अच्छाई और उसके उदार दृष्टिकोण द्वारा ही सम्पन्न हो सकती है-(घ)इस विचारदारा के कारण आदर्श और यथार्थ के बीच अनुल्लंघ्य,अवांछनीय खाई पड़ जाती है।´ ,´प्रसाजी की सभ्यता -समीक्षा के दो दोष रह गयेः(1) सभ्यता-समीक्षा एकांगी है,उसने केवल ह्रास को देका,जनता की विकासमान उन्मेषशाली शक्तियों को नहीं देखा।(2)उनकी आलोचना अवैज्ञानिक है,वह समाज के मूल द्वंद्वों को नहीं पहचानती,मूल विरोधों को नहीं देखती।वह उन मूल कारणों और उसकी प्रक्रिया से उत्पन्न लक्षणों को एक साथ ही रखती है।´


विमर्श- जयशंकर प्रसाद पर विचार करते समय बार-बार साहित्यिक रूढ़िवाद हमारे आड़े आता है। साहित्यिक रूढ़िवाद से आधुनिक आलोचना को कैसे मुक्त किया जाए यह आज की सबसे बड़ी चुनौती है। साहित्यकार और कृतियों के मूल्यंकन के क्रम में सबसे पहल समस्या है आलोचना को कृति की पुनरावृत्ति से मुक्त किया जाय।इन दिनों आलोचना के नाम पर वह बताया जा रहा है जो कृति में लिखाहोता है। कृति में व्यक्त भावबोध को बताना आलोचना नहीं है।कृतिकार ने जो लिखा है वही यदि बता दिया जाएगा तो यह आलोचना नहीं होगी,बल्कि कृतिकार के विचारों या कृति में व्यक्त विचारों की जीरोक्स कॉपी होगी।लेखक या कृति के विचारों की जीरोक्स कॉपी नहीं है आलोचना। यहां से हमें आलोचना के साथ मुठभेड़ करनी चाहिए। आलोचना में रूढ़िवाद का दूसरा रूप है अवधारणाहीन लेखन।इस तरह का लेखन आलोचना के नाम पर खूब आ रहा है।मसलन्, “विमर्श” पदबंध को ही लें, इस पदबंध के प्रयोग को लेकर नामवर सिंह से लेकर उनके अनेक अनुयायी आलोचकों ने इस पदबंध पर विगत दो दशकों में जमकर हमले किए हैं और इस पदबंध को उत्त-आधुनिकतावाद पर हमले के बहाने निशाना बनाया है।इस प्रसंग में उनके सभी तर्क शास्त्रहीन और अवधारणाहीन रूप में व्यक्त हुए हैं।सवाल यह है “डिसकोर्स” (विमर्श) किसे कहते हैं ?क्या विमर्श से इन दौर में बचा जा सकता है ? विमर्श के दो प्रमुख नजरिए प्रचलन में हैं।समग्रता में “विमर्श” के ढाँचे का विचारधारात्मक अवधारणा के विभिन्न आयामों से गहरा संबंध है।प्रसिद्ध मार्क्सवादी सिद्धांतकार सुदीप्त कविराज ने “दि इमेजरी इंस्टीट्यूशन ऑफ इण्डिया”(2010)में इस पहलू पर रोशनी डालते हुए इसके विभिन्न अंगों का खुलासा किया है।कविराज के अनुसार “विमर्श” में शब्द,विचार,अवधारणा,भाषण की प्रस्तुति, कार्यक्रम,रेहटोरिक, आधिकारिक कार्यक्रम आदि सभी आते हैं।ये सब “विमर्श” की आंतरिक व्यवस्था के अंग हैं।“विमर्श”इन सबको बांधने वाली संरचना है। कविराज ने “विमर्श” के दो स्कूलों की चर्चा की है,इनमें पहला वर्ग है संरचनावादियों का है।इसमें अनेक रंगत के संरचनावादी हैं। दूसरा ,बाख्तियन स्कूल है।संरचनावादियों की मुश्किल यह है कि वेभाषण,लेखन,चिंतन आदि को विमर्श में शामिल तो करते हैं लेकिन एक-दूसरे के बीच में विनिमय नहीं देखते। उनके यहां भाषा ही “विमर्श” का मूलाधार है।इस क्रम मे वे यह भूल जाते हैं कि भाषा के रूप इकसार नहीं होते,मृतभाषा और जीवंतभाषा में अंतर होता है।असरहीन भाषा और प्रभावशाली भाषा में अंतर होता है।वे यह भी नहीं देखते कि वक्तृता के समय वक्ता की भाषा भाषिक नियमों में बंधी नहीं होती बल्कि नेचुरल फ्लो में होती है।कईबार वक्तृता में निहित साइलेंस बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।बल्कि यों कहें कि जो छिपाया जा रहा है वह बताए जा रहे यथार्थ से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।प्रत्येक विधा और मीडियम की भाषा अलग होती है।सबको इकसार भाषिक रूप में नहीं देखना चाहिए।भाषा में नेचुरल या स्वाभाविक भाषा भी आती है और किताब भाषा या विधा विशेष की भाषा भी आती है। वह भाषा भी आती है जो अवधारणा में निहित होती है।यानी विमर्श का दायरा भाषा से शुरू तो होता है लेकिन भाषा तक सीमित नहीं है।वह अवधारणा और सैद्धांतिकी तक फैला है। दूसरी ओर बाख्तियन (वोलोशिनोव)आलोचकों ने सवाल उठाया है “विमर्श”में भाषा के उपयोग का मकसद क्या है ?यानी भाषा से हम क्या करना चाहते हैं?राजनेताओं के भाषण की भाषा में राजनीति प्रच्छन्न रूप में रहती है।राजनीति के बिना भाषा नहीं होती। “विमर्श” का मतलब है जीवित भाषा का अध्ययन करना। उसकी प्रस्तुतियों का अध्ययन करना।उन परिस्थितियों का अध्ययन करना जिसमें भाषा का संचार हो रहा है।साथ ही उन पहलुओं का भी अध्ययन करना जो भाषा के संदर्भ में निषेध में शामिल हैं।वोलोशिनोव कहते हैं भाषण में भाषायी फिनोमिना को पकड़ने की कोशिश करनी चाहिए।इसमें वक्तृता में निहित व्यक्तिवादिता,अनुभव की अभिव्यक्ति और जीवन की व्यापकता का अध्ययन किया जाना चाहिए।इसी क्रम में सुदीप्त कविराज ने “विमर्श” में विचार और उसके आंतरिक कोहरेंस,बाह्य और आंतरिक चीजों के भाषायी अर्थ और संबंध,खासकर राजनीतिक घटना के साथ संबंध को जोड़कर देखने पर जोर दिया।इससे वक्तृता के आंतरिक और बाह्य रूप को समझने में मदद मिलेगी।साथ ही ‘थीम’ और ‘अर्थ’के बीच अंतर किया।इसी क्रम में “यूज मीनिंग” और “एक्ट मीनिंग” को मिलाकर ऐतिहासिक विश्लेषणबनता है।यह विचारधारा का हिस्सा है। सवाल यह है “विमर्श” में “सेल्फ”(स्व) की क्या परिभाषा है ? किस तरह का स्व व्यक्त हो रहा है ?”स्व” को परिभाषित किए वगैर विमर्श नहीं बनता।“स्व” को स्थिर या जड़ तत्व नहीं है।खासकर राजनीतिक व्यक्ति जब विमर्श में दाखिल होता है तो वह महज व्यक्ति नहीं होता,उसकी राजनीतिक विचारधारा होती है,समस्या यह है कि वह उस राजनीतिक विचारधारा को कितना जानता है ?उस पर उसका कितना नियंत्रण है ?वह किस तरह के माध्यमों के जरिए संप्रेषित कर रहा है ? राष्ट्र ,राष्ट्रवाद और विचारधारा- आजकल ´राष्ट्रवाद´के सवाल पुनः केन्द्र में आ गए हैं। इस बहस के प्रसंग में पहली बात यह कि ´राष्ट्रवाद´का कोई एक रूप कभी प्रचलन में नहीं रहा।आम जनता में उसके कई रूप प्रचलन में रहे हैं। स्वाधीनता संग्राम के दौरान ´राष्ट्रवाद´के वैविध्यपूर्ण रूपों को समाज में सक्रिय देखते हैं।यही स्थिति स्वतंत्र भारत में भी रही है।लोकतंत्र के विकास की प्रक्रिया में राष्ट्रवाद सामान्यतौर पर एक समानान्तर विचारधारा के रूप में हमेशा सक्रिय रहा है।मुश्किल उनकी है जो राष्ट्रवाद को लोकतंत्र की स्थापना के साथ हाशिए की विचारधारा मानकर चल रहे थे। राष्ट्रवाद स्वभावतःनिजी अंतर्वस्तु पर निर्भर नहीं होता अपितु हमेशा अन्य विचारधारा के कंधों पर सवार रहता है।राष्ट्रवाद के अपने पैर नहीं होते।यह आत्मनिर्भर विचारधारा नहीं है। आधुनिककाल आने के साथ ही ´राष्ट्रवाद´के विभिन्न रूप दिखाई देते हैं,उनमें यह समाजवाद, उदारतावाद, अनुदारवाद यहां तक कि अराजकतावादी विचारधारा के कंधों पर सवार होकर आया है।राष्ट्रवाद के लिए कोई भी अछूत नहीं है,वह साम्प्रदायिक,पृथकतावादी ,आतंकी विचारधाराओं के साथ भी सामंजस्य बिठाकर चलता रहा है।इसलिए ´राष्ट्रवाद´पर विचार करते समय उसका ´संदर्भ´और ´सांगठनिक-वैचारिक आधार´जरूर देखा जाना चाहिए,क्योंकि वही उसकी भूमिका का निर्धारक तत्व है। मार्क्सवादी आलोचक ´राष्ट्रवाद´को ´छद्मचेतना´ कहकर खारिज करते रहे हैं,जो कि सही नहीं है।जैसाकि हम सब जानते हैं कि प्रत्येक विचारधारा में ´छद्म´या ´असत्य´भी होता है और ´संभावनाएं´ भी होती हैं। यही स्थिति ´राष्ट्रवाद´की भी है।हमें देखना चाहिए कि ´राष्ट्रवाद´की जब बातें हो रही हैं तो किस तरह के इतिहास और आख्यान के संदर्भ में हो रही हैं। क्योंकि ´राष्ट्रवाद´कोई ´तथ्य´या ´यथार्थ´का अंश नहीं है,वह तो विचारधारा है,उसका इतिहास और आख्यान भी है।जिस तरह प्रत्येक विचारधारा ´स्व´या सेल्फ के चित्रण या प्रस्तुति के जरिए अपना इतिहास बनाती है,वही काम ´राष्ट्रवाद´भी करता है।इसलिए ´राष्ट्रवाद´की कोई भी इकसार या एक परिभाषा संभव नहीं है। ´राष्ट्रवाद´पर विचार करते समय हम यह देखें कि देश को कैसे देखते हैं ॽ कहाँ से देखते हैंॽ और कौन देख रहा है ॽहिटलर के लिए ´राष्ट्रवाद´ का जो मतलब है वही गांधी के लिए नहीं है। समाजवाद में ´राष्ट्रवाद´का जो अर्थ है वही अर्थ पूंजीवाद के लिए नहीं है।´राष्ट्रवाद´ के नाम पर इन दिनों वैचारिक मतभेद मिटाने की कोशिश की जा रही है,´राष्ट्र´ की आड़ में व्यक्ति ,वर्ग और समुदाय के भेदों को नजरअंदाज करने की कोशिश की जा रही है।असल में ´राष्ट्रवाद´तो भेद की विचारधारा है।फिलहाल देश में जो चल रहा है उसमें इसका तात्कालिकता,विदेशनीति और खासकर पाककेन्द्रत विदेश नीति, मुस्लिम विद्वेष,हिन्दुत्ववादी श्रेष्ठत्व से गहरा संबंध है। ´राष्ट्रवाद´में तात्कालिकता इस कदर हावी रहती है कि आपकी सूचनाओं का वैचारिक उन्माद की आड़ में अपहरण कर लिया जाता है। सूचनाओं के अभाव को उन्माद से भरने की कोशिश की जाती है।स्वाधीनता संग्राम के दौरान राष्ट्रवाद की साम्राज्यवादविरोधी धारा आम जनता को सचेत करने,दिमाग खोलने का काम करती थी,लेकिन इन दिनों तो ´राष्ट्रवाद´आम जनता के दिमाग को बंद करने का काम कर रहा है,सूचना विपन्न बनाने का काम कर रहा है। पहले वाला ´राष्ट्रवाद´आम जनता की ´स्मृति´को जगाने ,समृद्ध करने का काम करता था,लेकिन सामयिक हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद ´स्मृति´ पर हमला करने का काम कर रहा है।बुद्धि और विवेक के अपहरण का काम कर रहा है। पहले ´राष्ट्रवाद´ने कुर्बानी और त्याग की भावना पैदा की लेकिन हिन्दुत्ववादी ´राष्ट्रवाद´तो पूरी तरह अवसरवादी और बर्बर है।इसकी सामाजिक धुरी है मुस्लिम विरोध और अंत्यज विरोध।इसका लक्ष्य है अबाध कारपोरेट लूट का शासन स्थापित करना। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान ´राष्ट्रवाद´के आंदोलन ´अन्य´को आलोकित करने,प्रकाशित करने का काम करता था,लेकिन मौजूदा हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद तो ´अन्य´का शत्रु है।यह सिर्फ ´तात्कालिक राजनीति´केन्द्रित है।जबकि पुराना राष्ट्रवाद अतीत,वर्तमान और भविष्य इन तीनों को सम्बोधित था। साम्राज्यवाद विरोध ´राष्ट्रवाद´ का आख्यान ´रीजन´यानी तर्क के साथ आया लेकिन नया राष्ट्रवाद सभी किस्म के ´रीजन´का निषेध करते हुए आया,इसका मानना है कि आरएसएस जो कह रहा है उसे मानो,वरना ´देशद्रोही´ कहलाओगे।पुराने ´राष्ट्रवाद´के पास साम्राज्यवाद विरोध का महाख्यान था,लेकिन नए राष्ट्रवाद के पास तो कोई आख्यान नहीं है,बिना आख्यान के,सिर्फ रद्दी किस्म के नारों और डिजिटल मेनीपुलेशन के आधार पर यह अपना विस्तार करना चाहता है।जो उससे असहमत हैं उनको कानूनी आतंक के जरिए नियंत्रित करना चाहता है या फिर मीडिया आतंकवाद के जरिए मुँह बंद करना चाहता है। पुराने वाले राष्ट्रवाद के सामने मुकाबले के लिए यूरोपीय राष्ट्रवाद था,लेकिन हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद के सामने तो आम जनता ही है।यह आम जनता के शत्रु के रूप में सामने आया है। राष्ट्र की पहचान क्षेत्र से जुड़ी है।इसके आधार पर अस्मिता बनती है।इसी तरह राष्ट्र की अस्मिता में क्षेत्र के अलावा भाषा का भी योगदान है ,यही कारण है कि आधुनिककाल आने के बाद भाषा के आधार पर जातीयता या नेशनेलिटी का जन्म होता है।पहले भारत में कई किस्म की सांस्कृतिक-भाषायी संरचनाएं मिलती हैं जो अस्मिता बनाती हैं,इनमें पहली संरचना है संस्कृत भाषा और साहित्य की,दूसरी संरचना है अरबी-परशियन भाषा और साहित्य की,तीसरी संरचना हैजनपदीय भाषाओं की और पांचवीं संरचना है बोलियों की।इसके अलावा ´जाति´या कास्ट की संरचना भी है जो राष्ट्र की पहचान से जुड़ी है।इसके अलावा ´राष्ट्र´ और ´क्षेत्रीय´का अंतर्विरोध भी है।ये सभी तत्व किसी न किसी रूप में ´राष्ट्र´ के साथ अंतर्क्रियाएं करते हैं।पुराने ´राष्ट्रवाद´को प्रभावित करते रहे हैं। ´राष्ट्रवाद´का आख्यान लिखते समय यह बात हमेशा ध्यान में रखें कि उसका बौद्धिक विमर्श ,देश निर्माण की प्रक्रिया और नीतियों और बौद्धिक प्रक्रियाओं से गहरा संबंध रहा है।इसलिए हमें उन पक्षों को खोलना चाहिए।राष्ट्र का विमर्श मूलतः रूपों का विमर्श है। सुदीप्त कविराज ने इस प्रसंग में बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही है।उनका मानना है कि राष्ट्रवाद अपने बारे में क्या कहता है उसकी उपेक्षा करें। आत्मकथा की उपेक्षा करें।इससे भिन्न उसके इर्द-गिर्द के सांस्कृतिक रूपों की व्याख्या करें।इनसे ´राष्ट्रवाद´के ऐतिहासिक विकास क्रम को सही रूप में देख सकेंगे। जयशंकर प्रसाद के नाटकों से लेकर कविता तक राष्ट्र बनाम व्यक्ति का द्वंद्व केन्द्र में है और इसमें वे राष्ट्र की शक्ति के सामने व्यक्ति की सत्ता,महत्ता और असीमित दायरे का विकास करते हैं। वे राष्ट्र की सीमाओं से व्यक्ति के अधिकारों के दायरे को तय नहीं करते बल्कि मानवाधिकार के दायरे से व्यक्ति के अधिकारों को देखते हैं।वेव्यक्ति के सहज-स्वाभाविक विकास को महत्वपूर्ण मानते हैं।समाज के हित में विद्रोह करना,व्यक्ति के अधिकारों का विकास करना,समाज की कैद से मुक्त करके नए व्यक्तिवाद के आलोक में वे मनुष्य के विकास को महत्वपूर्ण मानते हैं। वे व्यक्ति की पहचान का आधार धर्म को नहीं मानते।वे समाज की पहचान भी धर्म के आधार पर तय नहीं करते बल्कि उनकी रचनाओं के केन्द्र में मनुष्य है और उसके असीम व्यक्तिवाद के विकास को वे बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। आधुनिक समाज में व्यक्तिवाद के विकासके बिना नए आधुनिक भारत का निर्माण संभव नहीं है साथ ही व्यक्तिवाद के विभिन्न रूपों की जितनी सुंदर व्याख्या उन्होंने की है,वह बहुत ही महत्वपूर्ण सकारात्मक पक्ष है।

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

रायपुर साहित्यमेला में दिया गया भाषण- वर्चुअल रियलिटी की चुनौतियाँ


          आभासी संसार यानी वर्चुअल जगत,यह असल में वर्चुअल रियलिटी है। यह तकनीकी है,अवधारणा नहीं है,यह वातावरण है,एनवायरमेंट है। 7जून1989 को कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर तंपनी ऑटोडेक्स और कम्प्यूटर कंपनी बीपीएल ने इसकी घोषणा की। इसका जन्म 1984 में एक विज्ञानकथा के गर्भ के जरिए हुआ।विलियम गिब्सन के उपन्यास 'न्यूरोमेंसर' से इसका सिलसिला शुरु होता है। इसका राजनीतिक आयाम भी है,यह 'स्टारवार'कार्यक्रम के गर्भ से निकली तकनीक है।यह समाजवाद के पराभव के साथ आई तकनीक है। जो लोग पूंजीवाद के प्रति आलोचनात्मक रवैय्या रखते थे,समाज को बदलना चाहते थे,जिनमें युद्ध के खिलाफ और शांति के पक्ष में भावनाएं थी उन्हीं को वर्चुअल रियलिटी ने निशाना बनाया।नई जीवनशैली दी।वर्चुअल रियलिटी के सिद्धांतकार जेरोन लेनियर ने वर्चुअल रियलिटी को पेश करते हुए नारा दिया '' जनता को कल्पनाशीलता से मुक्त करो,लोगों को संप्रेषित करने में मदद करो।'' आरंभ में वर्चुअल रियलिटी में सामाजिक आलोचना का भाव था बाद में सिर्फ तकनीकी रह गई।जो आलोचक थे वे व्यवसायी हो गए। 

     जेरोन लेनियर ने लिखा है ' वर्चुअल रियलिटी हमारे बाहरी जगत पर असर डालती है।हमारे आंतरिक जगत पर असर नहीं डालती।नया वस्तुगत यथार्थ पैदा करती है।तुम इसमें रमण कर सकते हो,यह संक्रमणशील है,तुम इसकी चीजों का दुरुपयोग नहीं कर सकते;यह कृत्रिम वातावरण की खुली तकनीकी है। इसने व्यक्ति,निजता, समुदाय, समय और आकार आदि के बारे में हमारी अब तक की समस्त धारणाओं को बदला है।' 

        वर्चुअल रियलिटी का काम है कार्रवाई,शिरकत और नियंत्रण स्थापित करना।यह दुनिया को वर्चस्ववादी दृष्टिकोण से देखने का विमर्श तैयार करती है।इसीलिए वर्चस्ववादी ताकतों को सबसे प्रिय है।इसका काम मुख्य काम है व्यस्त रखना।लक्ष्य है वर्चस्व स्थापित करना।इसका लक्ष्य सत्य या विवेक नहीं है, बल्कि निजी दृष्टिकोण है।यह समस्त विमर्शों को अपने मातहत बना लेना चाहती है।

         उल्लेखनीय है साँफ्टवेयर में संगीत क लय की तरह हर चीज को व्यक्त करने की क्षमता है । यहाँ संगीत से लेकर व्यक्ति तक हर चीज को व्यक्त कर सकते हैं । मौजूदा दौर में मनुष्य की हर गतिविधि सॉफ़्टवेयर से जुडी हैं या उसके जरिए संचालित हो रही हैं । कहने के लिए www के नाम पर तरह तरह के डिज़ायन और साफ्टवेयर इस्तेमाल किए जा रहे हैं इसे वेब 2.0 (web 2.0) की विचारधारा कहते हैं औ, सतह पर यह स्वतंत्रता का वायदा करती है लेकिन असलियत में यहाँ मनुष्य से ज़्यादा मशीनों को स्वतंत्रता है । वे इसे 'ओपेन कल्चरया खुली संस्कृति कहते हैं। ब्लागसोशलमीडियावीडियोयू -ट्यूब ,हल्की टिप्पणियाँ यहाँ नाटकीय और हार्मलेस नजर आती हैं ।लेकिन बृहत्तर स्तर पर यह विखंडित(फ्रेगमेंट) संस्कृति का लगावरहित संचार  है। इससे निजी मेल मुलाक़ात की परंपरा या आदत की क्षति होती है ।कम्युनिकेशन इन दिनों कभी -कभी अति-मानवीय फिनोमिना नजर आता है । मनुष्य से परे का फिनोमिना नजर आता है।

               मौजूदा दौर में व्यक्ति से हमारी आकांक्षाएँ बहुत कम हो गयी हैंन्यूनतम आकांक्षाओं के साथ जीना रहना सामान्य बात हो गयी है । तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह बताती है कि आदमी कितनी जल्दी बदलता है । डिजिटल डिज़ायन में छोटा सा परिवर्तन व्यापक स्तर पर समाज को प्रभावित करता है । ख़ासकर वे लोग जो इसका इस्तेमाल करते हैं वे तेज़ी से प्रभावित होते हैं । वर्चुअल रियलिटी की खूबी है कि निज की शक्ति और सामाजिक दृष्टि को रुपान्तरित करती है । इसी अर्थ में तकनीक को मनुष्य या निज का एक्सटेंशन कहा गया ।

     हमारी अस्मिता तुरंत गजटस बदलते ही रुपान्तरित हो जाती है । सूचना तकनीक के साथ सोशल इंजीनियरिंग के बिना काम करना संभव नहीं है। हमें सवाल करना चाहिए ब्लॉगिंगट्विटिंगफेसबुक आदि से व्यक्ति कितना बदलता है मैं क्या हूँ मेरी पहचान क्या है जिन लोगों ने इसके प्रोग्राम बनाए वे तो सिर्फ़ यही माँग करते हैं कि आप कम्प्यूटर से संपर्क-संबंध रखें यानी अपने दिमाग़ के किसी कोने के साथ कम्प्यूटर का संबंध बनाकर रखें। कम्प्यूटर में अनजान वैज्ञानिकों की भीड़ के बनाए प्रोग्राम हैं जिनके साथ हम संपर्क रखते हैं । यह एक तरह से अल्लम-गल्लम लोगों के समूह हैं ,जो मनुष्य कहलाते हैं। ये ही लोग हैं जो अंगागि-भाव से जुड़े हैं। इनकी राय ही वैध राय है । यहाँ रीयल व्यक्ति की नहीं कृत्रिम व्यक्ति की राय मिलती है । यह व्यक्ति भी फार्मूलाबद्ध ढंग से बोलता है । रुढिबद्ध भाषातयशुदा भाषा उसकी विशेषता है और यह सब काम मशीन करती है । यह कृत्रिम मनुष्य है जो कम्प्यूटर में बैठा हुआ है । लेकिन मनुष्य तो फ़ार्मूला नहीं है । मनुष्य फ्रेगमेंट नहीं है।लेनियर ने लिखा " फ्रेगमेंट आर नेट पीपुल्स"मनुष्य  तो परिवर्तनशील है। वह तो रहस्यमय विश्वासों में डूबा व्यक्ति है। लेनियर ने लिखा क्या कोई तकनीकीविद विश्वास करेगा कि अतीत से बेहतर भविष्य हो सकता है.तकनीकीविदों को आदर्शवादी होना चाहिए उनके पास आदर्श विचार होने चाहिए।

          तकनीकी विकास की प्रक्रिया निरंतर विभ्रम पैदा करती रही है। यह एक तरह का तकनीकी पागलपन भी है। इसके कारण वास्तव और आदर्श कम्प्यूटर में निरंतर विभ्रम बना रहता है । तकनीक यह मानकर चलती है कि प्रत्येक तकनीक नए के ब्राण्ड रुप में काम करे या  जानी जाय। समूची रणनीति यह है कि  हम कम्प्यूटर के बारे में यथार्थवादी ढंग से न सोचें। कम्प्यूटर के प्रोग्राम जिस गति से आ रहे हैं उसके कारण एकदिन हम बंद गली में जाकर क़ैद हो सकते हैं!

   नई तकनीक आने के साथ जो चीज़ें आई हैं वे मनुष्य के अंगों से जुड़ी हैं,मसलन् हमारे आँखों और कान से वेबकाम्स और मोबाइल फ़ोन जुड़े हैं ये हमारी स्मृति की विस्तारित मेमोरी या स्मृति का अंग हैं। ये वे स्ट्रक्चर हैं जो दुनिया और अन्य लोगों से  जोड़ सकता हैऔर ये संरचनाएँ पलटकर यह भी सोचने का मौक़ा देती हैं कि व्यक्ति चाहे तो स्वयं के बारे में सोच सकता है ।  

          लेनियर ने लिखा है कि तकनीक की नई उप-संस्कृति  आज सबसे ज्यादा प्रभावशाली है और असर पैदा करने वाली है। मजेदार बात यह है कि इस उप-संस्कृति का कोई नाम नहीं है। लेकिन साइबर वैज्ञानिक इसे डिजिटल माओवादी कहते हैं। इसमें आदिवासियों जैसा सांस्कृतिक खुलापन और साझा सर्जनात्मक तत्व हैं। यह कम्प्यूटर साइंस के कृत्रिम विवेक से जुड़ी है। इसकी विशेषता है संदर्भविरोध या एंटीकंटेस्ट,इसमें फाइलें एक-दूसरे के साथ बिना संदर्भ के साझा की जा सकती हैं,समाहित की जा सकती हैं। इसकी राजधानी सिलिकॉनवेली है। लेकिन इसकी शक्ति सारी दुनिया में फैली हुई है। इसने साइबर समग्रतावाद को जन्म दिया है। इस प्रसंग में लोग सबसे बड़ी गलती यह कर रहे हैं कि वे निजी नेटवर्क को ध्वस्त करने में लगे हैं। इससे अराजकता और बढ़ेगी। नेटवर्क में अराजकता न बढ़े इसके लिए जरुरी है कि ज्यादा से ज्यादा रियल लोग नेटवर्क में शिरकत करें। यदि नेटवर्क में अमूर्त लोग रहते हैं तो यह अर्थहीन हो जाएगा। नेटवर्क अर्थहीन न बने इसके लिए जरुरी है कि रीयल लोग नेटवर्क में सक्रिय हों। रीयल लोग रहेंगे तो नेटवर्क अर्थवान रहेगा। क्योंकि अर्थवत्ता नेटवर्क में नहीं रीयल लोगों में है।

     आभासी संसार में शब्द सर्जना का रीयल सुख तब ही संभव है जब हम इसके मसलों पर खुलकर बहस करें। हमें इसके मसलों को जानना होगा और उन पर बौद्धिकों के बीच में बहस चलानी होगी। हमारे वैज्ञानिकों से लेकर मीडिया तक,राजनेताओं से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक आभासी संसार का उपयोग बड़े पैमाने पर हो रहा है लेकिन उसके बुनियादी संरचना से जुड़े सवालों पर कोई गंभीर विचार विमर्श अभी नहीं हो रहा है। राजीव गांधी के कम्प्यूटर मिशन से लेकर नरेन्द्र मोदी के डिजिटल इंडिया के मिशन तक सूचना तकनीक के प्रचार-प्रसार का एक ही लक्ष्य है सूचना उपभोक्ता तैयार करना, सूचना तकनीक के उपभोक्ता तैयार करना, यहां तक कि हमारी तथाकथित बड़ी सूचना-संचार कंपनियां भी सेवाक्षेत्र में ही सीमित हैं और उन्हीं कामों पर जोर दे रही हैं जहां उपभोक्ता है और मुनाफा है। 

    आभासी संसार का सपना डिजिटल बुद्धिजीवी से जुड़ा है। आम जनता के दैनंदिन जीवन में डिजिटल कम्युनिकेशन का दखल बढ़ा है। हमें डिजिटल गुरु बनना है तो हमारे देश के बौद्धिकों को डिजिटल आदतों और संस्कारों को अपनाना होगा।  अभी अधिकांश बौद्धिक-लेखक आदि प्रिंटसंचार और तदजनित मसलों तक सीमित हैं। पूरा देश अभी भी 19वीं सदी के सवालों से जूझ रहा है। देश इन सवालों से मुक्त हो इसके लिए जरुरी है 'डिजिटल छलांग' लगाई जाय,'डिजिटल छलांग' बौद्धिकों को डिजिटली एक्टिव किए बिना संभव नहीं है। विश्व में बौद्धिक वर्चस्व की प्रक्रियाओं में दखल देने के लिए यह जरुरी है, वरना हमारे देश की डिजिटल प्रतिभाओं का अमेरिका-ब्रिटेन आदि देशों की ओर प्रतिभा पलायन होता रहेगा। आभासी संसार में शब्द सर्जना के लिए डिजिटल प्रतिभाओं को रोकना,उनके लिए यहां पर्याप्त संसाधन जुटाना और प्रभावशाली संरचनाओं का निर्माण करना बेहद जरुरी है। हम पहले से देश के प्रति बेगानेपन के शिकार थे,आभासी संसार ने हमारे बेगानेपन को और बढ़ाया है, कम्प्यूटर आने के बाद हमारे देश में प्रतिभा पलायन तेज हुआ है,इसे किसी भी कीमत पर रोकने की जरुरत है। 

  सवाल यह है कि संचार क्रांति को ज्ञानक्रांति में कैसे बदलें ? सूचनासमाज को ज्ञानसमाज कैसे बनाएं ? हमारे यहां ज्ञान समाज और सूचना समाज की समस्याओं को लेकर कोई बहस नहीं है,बौद्धिकों से लेकर मीडिया तक इसके सवालों पर एकसिरे से चुप्पी छाई हुई है, यह चुप्पी क्यों है ? मजेदार बात है सूचना तकनीक और आभासी संसार के बारे में अधिकांश खबरे कानून-व्यवस्था की समस्या से जुड़ी हैं या फिर उपभोक्ता के नजरिए से आती हैं यानी प्रोडक्ट की बिक्री के प्रसंग में सूचना तकनीकी की खबरें आ रही हैं। 

     आभासी संसार में शब्द सर्जना के लिए आंतरिक प्रतिबंधों,पुराने संस्कारों,खासकर कम्युनिकेशन की पुरानी आदतों और झिझक से लड़ने की जरुरत है। लेखक के नाते हमारे अंदर अनेक किस्म के आंतरिक प्रतिबंधकाम करते रहते हैं,इनसे लड़ने की जरुरत है। आभासी संसार में दखल बढ़ाने के लिए विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के स्तर पर कम्प्यूटर और डिजिटल तकनीक के आविष्कार  और नए सॉफ्टवेयर निर्माण ध्यान देने की जरुरत है। अभी हमारे यहां सभी कम्पयूटर पाठ्यक्रम प्रयोजनमूलक हैं ,और सेवाक्षेत्र केन्द्रित हैं। उनमें रिसर्च और नए अनुसंधान के लिए कोई स्थान नहीं है। 

     आभासी संसार और भारतीय पूंजीवाद के रिश्ते को भी हमें खोलकर देखना चाहिए। हमारे देश का पूंजीपतिवर्ग तो कम्प्यूटर को सेवा और मुनाफे से अधिक मानकर नहीं चलता हमें विचार करना चाहिए कि हमारे देश के पूंजीपतिवर्ग की प्रकृति क्या है ? इससे तय होगा कि हमारे देश के आभासी संसार की प्रकृति क्या होगी ?

    हमारे देश के पूंजीपतिवर्ग की चारित्रिक विशेषता है मुनाफा-मुनाफा और सिर्फ मुनाफा कमाना। उसके पास मुनाफा कमाने का विवेक तो है लेकिन ज्ञान,खोज,अनुसंधान और नए के निर्माण की बुद्धि नहीं है। वह व्यापार में रिस्क लेता है लेकिन ज्ञान और खोज के क्षेत्र में उसने कभी कोई जोखिम नहीं उठाया। 'खोज' के बिना आधुनिकता का नजरिया नहीं बनता। यही वजह है भारत के पूंजीपति के पास दौलत है, मुनाफा कमाने की तकनीक है लेकिन खोज की संरचनाएं नहीं हैं। खोज के लिए वह निवेश नहीं करता। इससे भी भयानक स्थिति अकादमिक जगत में है वहां पर विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रम तो हैं ,लेकिन 'खोज ' का नजरिया गायब है। ये पाठ्यक्रम सिर्फ नौकरी पाने की कला सिखाते है। इसका दुष्परिणाम यह निकला है कि हमारे देश से प्रतिभा पलायन बड़े पैमाने पर हुआ। प्रतिभा पलायन से बचने का एक ही तरीका है प्रतिभा संरक्षण की संरचनाओं का निर्माण और संसाधनों का विकास। प्रतिभा को शत्रु या प्रतिस्पर्धी के रुप में देखने की बजाय मित्र-नागरिक के रुप में देखा जाय। प्रतिभाशाली व्यक्ति लोकतंत्र की शक्ति होता है। प्रतिभाशाली व्यक्ति को  डिजिटल  युग में दाखिल कर पाते हैं तो हमारे सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक विमर्श के बुनियादी आधार में परिवर्तन हो आएगा। हम देखेंगे कि हठात हम जिन मसलों पर उलझते थे वे एकसिरे से अप्रासंगिक हो गए है। डिजिटल इंडिया में जाने के लिए हम यह सोचे कि डिजिल संसार में डिजिटल उपभोक्तासमाज के साथ जाना चाहते हैं या फिर डिजिटल बौद्धिकों को भी साथ में लेकर जाना चाहते हैं। केन्द्रसरकार की संचारनीति का मुख्य जोर डिजिटल उपभोक्तावाद पर है। इन नीतियों के केन्द्र में सेवाक्षेत्र और सेवकक्षेत्र है,बौद्धिकों का क्षेत्र इसके लक्ष्य से बाहर है। 

         आभासी संसार का कोई भी परिप्रेक्ष्य स्थानीय संरचनाओं और तकनीकी सचेतनता पर आधारित है। भारत की लेखकीय दुनिया किस तरह की तकनीकीचेतना की अवस्था में है इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है कि आभासी संसार किस तरह की समस्याओं से मुखातिब है स्थिति यह है कि कम्युनिकेशन के कम्प्यूटरजनित रुपों के इस्तेमाल के मामले में लेखक-शिक्षक सबसे पीछे हैं, कायदे से इनको आगे होना चाहिए। हमारे यहां यह विलक्षण स्थिति है कि जो जितना ज्ञानी है,वह उतना ही कम्प्यूटर और डिजिटल सर्जना से दूर है। सचेतन लोगों का दूर रहना अपने आपमें बड़ी चुनौती है। वे दूर क्यों हैं ? इसके पीछे क्या कारण हैं ? सबसे पहले उसकी खोज करने की जरुरत है।भारतीय लेखक का मनोजगत और उसके दैनंदिन अभ्यास में पुरानी लेखकीय आदतें रुढ़िबद्ध हैं। इनके प्रति वह संरचना के स्तर पर संघर्ष नहीं करता। उसमें परिवर्तन की इच्छा का अभाव है। 

  आभासी संसार के आने के बाद भाषाओं के साथ सबसे बड़ी दुर्घटना घटी है। भाषा का पहले कोई मालिक नहीं होता था लेकिन अब भाषाओं के मालिक संगठन का उदय हो गया है। इसे 'यूनीकोड कंस्टोरियम' कहते हैं। इसमें Adobe Systems, Apple, Google, IBM, Microsoft, Oracle Corporation, Yahoo! and Oman's Ministry of Endowments and Religious Affairs सदस्य हैं। इसमें कोई भारतीय कंपनी नहीं है और नकोई भारतीय वैज्ञानिक इसके बोर्ड का सदस्य ै। लेकिन संस्था के रुप में भारत इसका सदस्य है। लेकिन भारत का कोई प्रतिनिधि उसकी सूची में नहीं है।  

   हिन्दी में वेबसाइट कल्चर का क्रमशःविकास हो रहा है,प्रयोजनमूलक कम्प्यूटर शिक्षा का भी विकास हो रहा है । लेकिन बाधाएं भी अनेक हैं,ब्लॉगिंग और वेबसाइट की मदद करने वाली संस्थाओं का अभाव है, हिन्दी वेबसाइट के प्रमोशन में व्यापार-जगत की कोई दिलचस्पी नहीं है। जबकि स्थानीय स्तर पर इस तरह के मददगार बनाए जा सकते,आर्थिक संसाधनों के अभाव में वेबसाइट को बनाए रखना अपने आप में बड़ी चुनौती है।  दूसरी बड़ी चुनौती है वैविध्यपूर्ण सामग्री के धारावाहिक फ्लो की। कायदे से भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों को,खा,कर छत्तीसगढ़ की सरकार को अपने सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में सभी के लिए वाई-फाई की सुविधा देनी चाहिए,साथ ही विभिन्न विषयों के विभागों के वेबसाइट निर्माण के लिए नियमित आर्थिक मदद देनी चाहिए।साथ ही वेबप्रकोष्ठ भी बनाया जाय। सभी विभागों की शोध पत्रिकाओं को नेट पर होना चाहिए। 

    विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के द्वारा पहल करके विभिन्न विषयों पर नई-पुरानी सामग्री के अपलोड करने की नियोजित स्कीम बनाकर लागू की जानी चाहिए। हम यदि डिजिटल इंडिया में जाना चाहते हैं तो यह अनिवार्य करें कि विभिन्न विश्वविद्यालयों की वेबसाइट पर विभिन्न विषयों की भारत के लेखकों,समाजविज्ञानियों,वैज्ञानिकों आदि की किताबें निबंध और पाठ्य सामग्री उपलब्ध हों। फिलहाल दशा यह है कि जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय की वेबसाइट तक दरिद्रतम रुप में है। कायदे से सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में वाई-फाई की सुविधा हो, प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालय तक के सभी शिक्षकों को मुफ्त नेट कनेक्शन दिया जाय। साथ ही प्रत्येक स्कूल-कॉलेज-विश्वविद्यालय की वेबसाइट हो, वहां शिक्षकों-छात्रों के मुफ्तलेखन के वॉल हों। 

       प्राचीन रचनाओं को नेटलूट से बचाने के लिए भारत सरकार,लेखक संगठन और प्रकाशक संगठन मिलकर प्रयास करें वरना हमारी समस्त रचनाएं अमेरिकी दूरसंचार कंपनियों खासकर गूगल के स्वामित्व में चली जाएंगी। यह दुर्भाग्यजनक है कि हमने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। इस प्रसंग में सबसे पहला कदम यही हो सकता है कि भारत अपना सर्चइंजन तैयार करके उपलब्ध कराए। साथ ही साइबर कानूनों का जनहित में पुनर्मूल्यांकन किया जाय। इसी प्रसंग में बौद्धिकसंपदा अधिकार कानून की नए सिरे से समीक्षा की जानी चाहिए। 

     गूगल ने 16दिसम्बर2014 से स्पेनिश गूगल न्यूजसेवा को स्थायी तौर पर बंद करने की घोषणा की है। यह घोषणा स्पेनिश बौद्धिक संपदा कानून में लाए गए परिवर्तन के कारण करनी पड़ी। स्पेन ने किसी लिंक और समाचारलेख से जुड़ी सामग्री के प्रकाशन को एकदम फ्री करने का फैसला किया है। जबकि गूगल इसके लिए पैसे लेता था। खासकर न्यूजलाइन एग्रीगेटर में मुफ्त इस्तेमाल करने का प्रावधान कर दिया है। उल्लेखनीय है गूगल लिंक शेयर करने और न्यूजलेख शेयर करने का चार्ज वसूल करता है। उल्लेखनीय है जर्मनी ने 2013 में इसी तरह का कानून बनाया था लेकिन गूगल के दबाव के कारण वे मुफ्त शेयर करने वाले प्रावधान को लागू नहीं कर पाए और गूगल को भुगतान करते रहे। हमें भारत के संदर्भ में इस पहलू की जांच करने की जरुरत है कि क्या न्यूजसेवा के जरिए लिंक और न्यूजलेख शेयर करने पर गूगल को भुगतान करना पड़ता है ?

       आभासी संसार में शब्द सर्जना का नया दौर डिजिटल बुक के साथ आरंभ होगा। हमें देखना चाहिए कि इसका क्या असर होगा ? क्या इससे किताब पढ़ने की आदत कम होगी ? क्या इससे पाठक की रीडिंग आदत का सार्वजनिक उदघाटन हो जाएगा तो पाठक पर कोई बुरा असर पड़ेगा? क्या इससे पाठक को संकलित की गयी सूचना पर वर्चस्व स्थापित करने का मौका मिलता है ? डिजिटल बुक पढ़ने की सूचना सार्वजनिक होने से क्या रीडिंग आदत पर कोई बुरा असर होता है ? अभी तक विचार की प्राइवेसी हुआ करती थी लेकिन डिजिटल बुक आने के बाद उसकी प्राइवेसी खत्म हो गयी है,यह प्राइवेसी हमारी अभिव्यक्ति की आजादी,विचार और खोज का हिस्सा थी। विचार की यदि प्राइवेसी नहीं होगी तो विचारों का विकास संभव नहीं है। यह हम सब जानते हैं कि मार्क्स,लेनिन, माओ,स्टालिन आदि के विचारों को पढ़ने के कारण पाठक के घरों पर छापे पड़े हैं,सजाएं तक हुई हैं,खासकर अमेरिका से लेकर भारत तक यह स्थिति देखने में आती है। यदि किसी के घर माओवादी सामग्री मिल जाय या किसी प्रतिबंधित संगठन की सामग्री मिल जाय तो पुलिस परेशान करना आरंभ कर देती है। अमेरिका-ब्रिटेन आदि में तो हालात यहां तक खराब हैं कि लाइब्रेरी आने-जाने वालों का रिकॉर्ड मगाकर देखा जा रहा है कि लाइब्रेरी में कौन सा पाठक किस तरह की किताबें पढ़ता है या लेता है।इसके आधार पर उसके खिलाफ कार्रवाई हो रही हैं। पिछले दिनों एक भारतीय को बम से संबंधित किताबें पढ़ने,वेबसाइट देखने के कारण 25साल की सजा ब्रिटेन की अदालत ने सुना दी थी,जबकि उस लड़के का किसी आतंकी संगठन से कोई संबंध नहीं था। 

   अभी हालात यह  हैं कि आप दुकान पर जाइए चुपचाप किताब खरीदो और चलते बनो, लेकिन इंटरनेट पर यह मुसीबत है कि आपके पीछे लोग लगे रहते हैं, क्या पढ़ रहे हो,कहां से पढ़ रहे हो।फोलो करते रहते हैं। इसके कारण यूजर को अनेक मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है, अनेक देशों में प्रतिबंधित साहित्य को पढ़ने वालों पर सख्त कार्रवाई हुई है। डिजिटल बुक में पाठक की पढ़ने की आदत गुप्त नहीं रहती, आप किसी भी पाठक की रीड़िंग आदत का विश्लेषण कर सकते हैं,पता कर सकते हैं कि वह कहां क्या पढ़ रहा है।जबकि पुराने ढ़ांचे में पढ़ने की आदत गुप्त रहती थी।  आप एकबार डिजिटल बुक की दुनिया में दाखिल हुए तो फिर दूरसंचार कंपनियां आपका पीछा करती रहती हैं कि कहां और क्या पढ़ रहे हो ,कहां से किताब ले रहे हो आदि। 

     डिजिटल बुक खोजते समय अपनी पढ़ने की प्राइवेसी का ख्याल रखें ऐसी किसी भी वेबसाइट पर डिजिटल बुक न पढ़ें जो आपसे रजिस्ट्रेशन की मांग करती हो या आपकी कोई निजी जानकारी मांगती हो। ऐसी वबसाइट पर जाएं जो पाठक की पहचान को जानने की कोशिश न करे, गुमनाम ढ़ंग से किताब पढ़ना जरुरी है,इससे आपको अपनी प्राइवेसी बचाने में मदद मिल सकती है। आपकी निजी सूचनाएं सुरक्षित रह सकती हैं। अनेक वेबसाइट हैं जहां डिजिटल बुक के साथ अनेक फीचर जुड़े होते हैं जिनकी हम उपेक्षा करते हैं और नहीं जानते कि इन फीचर का मतलब क्या है । मसलन् किंडल के जरिए सन् 2009 में अमाजॉन की किताब डाउनलोड करते समय यह पाया गया कि वहां एक ऐसा ही फीचर था जिसके जरिए अमाज़ान ने यूजर की सूचनाएं एकत्रित कर ली थीं, यह हाल सोनी 2005 में सोनी ने किया था वह अपनी साइट से डाउनलोड करने वालों की सूचनाएं एकत्रित करता रहा और इसके जरिए उसने यूजर की संगीत सुनने की आदतों और संगीत की प्राथमिकताओं को पता कर लिया। डिजिटल असमानता




मुख्य बिंदु - अमेरिकी विदेशनीति के अंतर्ग्रथित अंश के तौर पर इंटरनेट स्वाधीनता की मांग अमेरिका कर रहा है । चीन -ईरान आदि देशों के संदर्भ में ।साथ ही सोशलमीडिया की आजादी की माँग की जा रही है ।आज फेसबुक और ट्विटर को अमेरिका राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल कर रहा है । 
       
      इंटरनेट पर एक खास किस्म का अधिनायकवाद चल रहा है । मसलन राज्य बनाम राज्यविरोधी , पश्चिमपरस्त बनाम पश्चिमविरोधी । इस तरह का ध्रुवीकरण आमजनता के वैविध्य और विभिन्न स्तरों की अनदेखी करता है । मसलन रुस,चीन और भारत में जनता का बहुत बड़ा वर्ग है जो नव्य उदारीकरण का विरोधी है । 

          इंटरनेट पर राष्ट्रवाद ,अतिवाद और धार्मिक फंडामेंटलिज्म की आंधी चल रही है। इंटरनेट पर हिजबुल्ला ,मुस्लिम ब्रदरहुड या संघ परिवार की अतिसक्रियता बताती है कि इंटरनेट सभी को इमपावर करता है । खासकर उन ताकतों को ज्यादा ताकतवर बनाता है जो राज्य को कमज़ोर करना चाहते हैं ।उनको शक्ति देता है जो लोकतांत्रिकीकरण के पक्ष में हैं । 
        इसीतरह फेसबुक और ट्विटर सबको शक्तिशाली बनाते हैं । यह भी नहीं कह सकते कि इंटरनेट का सारा उत्पादन अच्छा है यहाँ पर बुरी चीजें भी हैं । 
           
डिजिटल असमानता -
    डिजिटल समानता का आधार है डिजिटल तकनीक की उपलब्धता और अनुपलब्धता । जिनके पास डिजिटल तकनीक है , कम्प्यूटर है या मोबाइल है । इसमें भी यह देखना होगा कि ब्राडबैंड या इंटरनेट कनेक्शन है या नहीं  ? कितने के पास इनमें से क्या है और क्या नहीं है । खासकर इंटरनेट यूजर और इंटरनेट के बिना । जो इंटरनेट यूजर हैं वे संचार समृद्ध हैं और जो इंटरनेट यूजर नहीं हैं वे संचार दरिद्र हैं । अब इनमें भी देखें कि किस जाति के लोगों में इंटरनेट की खपत ज्यादा है ? पश्चिम में काले - गोरे का भेद इस प्रसंग में आया 
है । भारत में यह भेद नहीं है लेकिन जो सामाजिक - धार्मिक जनसंख्या है उसके आधार पर हमें देखना चाहिए । इससे डिजिटल के सामाजिक विभाजन को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं । गाँव और शहर, कस्बे या छोटे शहर और महानगर, महानगर के मध्यवर्गीय और कच्ची बस्तियों या स्लम में रहने वालों के बीच का डिजिटल भेद समझने में मदद मिलेगी । 

       जातियों में भी किन जातियों में इंटरनेट का उपयोग ज्यादा है और किनमें कम है यह भी देखने की ज़रुरत है । 

कहने का तात्पर्य यह है कि भेद के जितने मौजूदा रुप हैं उनको इंटरनेट के साथ जोड़ें तो डिजिटलभेद का संसार खुल जाएगा । यह संभव है सवर्ण हो और सामाजिक भेदभाव का शिकार न हो लेकिन इंटरनेट कनेक्शन न रखता हो । असवर्ण हो और इंटरनेट कनेक्शन रखता हो तो उसे डिजिटल समृद्ध ही कहेंगे । भले ही सामाजिक जीवन में विभिन्न किस्म के भेदभाव का शिकार हो लेकिन वैसे नेट कनेक्शन रखता हो तो उसे कनेक्टेड कहेंगे । यह कनेक्टिविटी सुपरफीशियल है । नेट की दौड़ में वे ही लोग शामिल हो सकते हैं जो पहले से आर्थिक समर्थ हैं और नये कम्युनिकेशन की जिनको ज़रुरत है । मसलन ऐसे करोड़ों लोग हैं जो निजी कम्युनिकेशन में विश्वास करते हैं  और जिनको लोकल कम्युनिकेशन में ही रहना है तो वे क्यों लें नेट कनेक्शन या मोबाइल फोन ? 

डिजिटल भेदभाव को कम करने का एक बडासाधन है सामुदायिक काॅलसेंटर और सामुदायिक कम्प्यूटर सेवा । इसके अलावा इंटरनेट पर मुफ्त और ओपन सोर्स साॅफ्टवेयर की उपलब्धता और नेट संसाधनों के रुप में मुफ्त ज्ञान सामग्री और लाइब्रेरी के ज़रिए डाउनलोड सुविधा । 

डिजिटल भेदभाव न हो इसके लिए जरुरी है कि ब्राडबैंड को आम जनता तक पहुँचाया जाय । कम्प्यूटर तकनीक मुफ्त में प्रदान की जाय। 

विकसित देशों का डिजिटल परिदृश्य और अनुभव - 

डिजिटल भेदभाव का आलम यह है कि पाँच में एक वयस्क अमेरिकी वयस्क इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करता ।' पेव इंटरनेट प्रोजेक्ट ' के अनुसार सन् 2011 में 94 फीसदी काॅलेज शिक्षित अमेरिकन इंटरनेट का इस्तेमाल करते  थे , किंतु इनमें 43 फीसदी हाईस्कूल तक पास नहीं थे । आॅनलाइन रहने वालों में 62फीसदी लोग ऐसे थे जिनकी सालाना आमदनी  30 हज़ार डालर सालाना थी जबकि आॅनलाइन रहने वालों में 97 फीसदी की आमदनी 70 हज़ार डालर सालाना थी । इसमें भी नस्ल ,वर्ग और जातीयता का भेद बहुत बड़ी भूमिका अदा करता है । 

'पेव' के सर्वे के अनुसार अमेरिका की 88 फीसदी आबादी के पास सेलफोन है, 57 फीसदी के पास लेपटाॅप है, 19फीसदी के पास ई बुक रीडर है और 19 फीसदी के पास टेबलेट कम्प्यूटर है ।  63 फीसदी अपने वायरलैस के जरिए आॅनलाइन रहते हैं । 
    जो नौजवान इंटरनेट पर नहीं जाते उनमें से आधे ने कहा है कि इंटरनेट उनके लिए प्रासंगिक नहीं है इसीलिए वे इंटरनेट पर नहीं जाते । इनमें से ज्यादातर ने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं किया । यहाँ तक कि इनमें से अधिकांश के घर में भी इंटरनेट नहीं है । औसतन पाँच में से एक युवक ने कहा कि वे नहीं जानते कि इंटरनेट तकनीक का प्रयोग कैसे करते हैं । दस में से एक युवक ने कहा कि वो भविष्य में ईमेल या इंटरनेट का प्रयोग करेगा । 

       अमेरिका में 27फीसदी युवा किसी न किसी रुप में अपाहिज हैं । जिन युवाओं में अपंगता  नहीं है उनमें से मात्र 54फीसदी ही इंटरनेट पर जाते हैं जबकि अपाहिज युवाओं 81 फीसदी जाते हैं । अपाहिज युवाओं में दो फीसदी युवा ऐसे हैं जो इंटरनेट का किसी भी तरह इस्तेमाल नहीं कर सकते । 

' पेव' के सर्वे के अनुसार सन् 1995 में अमेरिका में दस में से एक वयस्क आॅनलाइन था । जबकि अगस्त 2011 में कराए सर्वे के अनुसार 78 फीसदी वयस्क और 95 फीसदी तरुण या अवयस्क आॅनलाइन पाए गए । 

एक ज़माना था जब इंटरनेट यूजर के डाटा विश्लेषण में नस्ल , पैसा ,लिंग,  अल्पसंख्यक और उम्र या शिक्षा को बुनियादी पैमाना मानकर देखा जाता था । लेकिन 'पेव' के नए सर्वे से पता चलता है कि अब ये पैमाने बेमानी हो गए हैं । 

सर्वे में उन कारणों की जाँच की गयी जिनके कारण सन् 2000 में पाँच में से एक अमेरिकी  वयस्क इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करता था । तकरीबन 54 फीसदी मानते थे कि इंटरनेट ख़तरनाक है , खासकर उम्रदराज लोग यह मानते थे ।इनकी हाईस्कूल से भी कम शिक्षा थी । तकरीबन 39फीसदी मानते थे कि इंटरनेट बड़ा खर्चीला है । खासकर 30साल से कम उम्र के ,हिस्पेनिक वयस्क मानते थे । इनकी शिक्षा हाईस्कूल से कम थी । लेकिन हाल में 2011 में कराए सर्वे से पता चला कि जो लोग इंटरनेट पर नहीं जाते उनमें से 49 फीसदी मानते हैं कि इंटरनेट उनके लिए प्रासंगिक नहीं है । वे इंटरनेट का किसी भी रुप में इस्तेमाल नहीं करना चाहते । इसके अलावा इंटरनेट का इस्तेमाल न करने वाले 21फीसदी ने कहा कि इंटरनेट खर्चीला है अतः वे नहीं जाते । तकरीबन इतने ही लोगों ने कहा कि वेइस्तेमाल करना नहीं जानते इसलिए नहीं जाते । 

'पेव' के सन् 2011 के सर्वे में खोज की गयी कि इंटरनेट का इस्तेमाल न करने के पीछे क्या कारण हैं ? पता चला 31फीसदी की कोई दिलचस्पी नहीं है, 12फीसदी ने कहा कम्प्यूटर नहीं है , 10 फीसदी ने कहा बहुत खर्चीला है , 9फीसद ने कहा मुश्किल है , 7फीसदी मानते हैं कि यह समय की बर्बादी है , 6फीसदी मानते हैं इंटरनेट उनके पास नहीं है , 6फीसदी ने कहा कि उनके पास सीखने का समय नहीं है ।4फीसद ने कहा कि वे सीखने के लिहाज अब काफ़ी बूढे हो गए हैं, 4फीसदी ने कहा कोई ज़रुरत नहीं है ।2फीसदी ने कहा कि नहीं जानते कैसे सीखें, 2 फीसदी अपंगता के कारण इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं ,1 फीसदी वायरस आदि के डर के  कारण इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते हैं । 
     
अमेरिका के बारे में यह मिथ है कि वहाँ पर सबके पास फोन है ,इंटरनेट है या मोबाइल है । सच यह नहीं है । यह सच है कि अमेरिका में आम लोगों में फोन कनेक्टिविटी बेहतर है लेकिन गाँवों या छोटे शहरों में रहने वाले कम आयवर्ग के सभी लोगों में अभी तक फोन नहीं पहुँचा है । सैंट्रल सिटी और ग्रामीण इलाकों में फोन अभी तक 79.8 फीसदी लोगों तक पहुँचा है । गाँवों में 81.6फीसदी और शहरों में 81.7 फीसदी लोगों तक पहुँचा है । गाँव के लोगों में मात्र 4.5 आबादी तक कम्प्यूटर पहुंचा है । इनमें मात्र 23.6फीसदी घरों में कम्प्यूटर है । जबकि सैंट्रल सिटी में मात्र 7.6फीसदी आबादी तक पहुँच है और इनमें मात्र 43.9फीसदी के पास कम्प्यूटर है । जबकि शहरी इलाकों में मात्र 8.1जनता के पास कम्प्यूटर पहुँचा है और इसमें भी 44.1 फीसदी के पास निजी कम्प्यूटर है । 

ग्रामीण अमेरिकी घरों में (जिनमें अमेरिकन इण्डियन आदि आते हैं ) मात्र 75.5 फीसदी के पास फोन है । ग्रामीण काले लोगों में मात्र 6.4 फीसदी के पास कम्प्यूटर है । सैंट्रल सिटी के मात्र 10.4 काले लोगों के पास कम्प्यूटर है । सैंट्रल सिटीवासी हिस्पैनिकों में मात्र 10.5 के पास कम्प्यूटर है । शहरी काले लोगों में मात्र 11.8फीसदी के पास कम्प्यूटर है । एशियाई और पेसीफिक बाशिंदों में मात्र 26.7 फीसदी के पास कम्प्यूटर है । ग्रामीण नेटिव अमेरिकन के पास सबसे कम निजी कम्प्यूटर हैं । 

       सर्वोच्च 10 इंटरनेट पहुँच वाले देशों में अमेरिका सबसे ऊपर है और उसके बाद स्वीडन, डेनमार्क, स्विटजरलैंड, नाॅर्वे ,नीदरलैंड ,कनाडा ,आस्ट्रेलिया , सिंगापुर ,दक्षिण कोरिया का नाम आता है ।ये सभी समृद्ध देश हैं , कोरिया को छोड़कर । 

इसी तरह ब्रिटेन में चार में से एक वयस्क कभी भी इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करता ।एक तिहाई घरों में इंटरनेट कनेक्शन नहीं है । ब्रिटेन में 65साल उम्र से ऊपर के 39फीसदी लोगों के पास इंटरनेट नहीं है । सामाजिक- आर्थिक तौर पर कमज़ोर तबके के 49फीसदी लोगों के पास इंटरनेट नहीं है । सोशल हाउसिंग में रहने वाले 70 फीसदी लोगों के पास इंटरनेट नहीं या वे आॅनलाइन नहीं हैं । निचले स्तर पर रहने वाले मात्र 25 फीसदी को ही सरकारी तंत्र संपर्क कर पाता है यदि सबके साथ नेट संपर्क करे तो आर्थिकबोझ ही नहीं उठा सकती सरकार ? फलत: 75फीसदी से ज्यादा ग़रीब लोग आॅनलाइन सरकारी संपर्क के बाहर हैं । ब्रिटेन के जो लोग आॅनलाइन नहीं हैं उनमें 38 फीसदी लोग हैं जो बेरोजगार हैं । 

एक ज़माना था भारत और चीन में 50 -50मिलियन टेलीफोन उपभोक्ता थे । देखते ही देखते चीन का आंकड़ा बदल गया और भारत का आंकड़ा जस का तस बना रहा । चीन ने सालाना 25मिलियन का इजाफा किया है लेकिन उस गति से भारत अपना विकास नहीं कर पाया है । इस प्रसंग में बार बार अमेरिका का उदाहरण दिया जाता है लेकिन अभी भी वहाँ पर मात्र  65 फीसद जनता ही इंटरनेट की यूजर है वहाँ पर शत प्रतिशत का लक्ष्य सन् 2020 तक पाने का लक्ष्य रखा गया है । दूसरी बात यह कि अमेरिका में 35डालर प्रति माह इंटरनेट भाड़ा खर्च करने की स्थिति में ग्रामीण जन हैं । हमारे यहाँ तो महानगरीय मध्यवर्ग भी इतना पैसा खर्च करने की स्थिति में नहीं है । 

सारी दुनिया में कम्प्यूटर - इंटरनेट का विकास तेज़ी से हुआ है और यह देखा गया है कि सन् 1990 में विश्व के 100 में से 2.5 के पास पर्सनल कम्प्यूटर था ,सन् 2001में 100 में 9 के पास कम्प्यूटर आ गया । जबकि इंटरनेट का उपयोग करने वालों की संख्या 1990 में शून्य थी जो 2001 में बढ़कर 8.1 जनसंख्या हो गयी । 

आंकडे बताते हैं कि सन् 2001 में उत्तरी अमेरिका में 100 में 61.1कम्प्यूटर था । जबकि उस समय दक्षिण एशियाई देशों में 100 में 0.5 के पास कम्प्यूटर था । इसी तरह कम्प्यूटर की पहुँच अफ्रीकी देशों में 100 में से 1 एक के पास कम्प्यूटर था । 
यूरोप और सेंट्रल एशियाई देशों में 100 में 18.1 के पास कम्प्यूटर था । 

नेट लाइब्रेरी और ओपनसोर्स -

पहले इंटरनेट सामग्री के संरक्षण को लेकर अनेक असुविधाएं थीं लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं है ।  Wayback Machine आने के बाद से एक बड़ा परिवर्तन आया है कि इंटरनेट पर जो भी चीज़ इंटरनेट लाइब्रेरी में लिखी जाती है वह स्वत: संरक्षित हो जाती है । ब्रेवस्टार ने इंटरनेट आर्काइव नामक संस्था का गठन किया और इस पर वेबक मशीन का प्रयोग आरंभ किया । इस पर लाइब्रेरी है जिसमें हज़ारों किताबें हैं । इंटरनेट आर्काइव में इस समय 150 विलियम आइटम हैं । यह गुटेनवर्ग प्रकल्प से भिन्न लाइब्रेरी है । प्रोजेक्ट गुटेनवर्ग में चालीस हज़ार ई बुक हैं । इनको मुफ्त में डाउनलोड किया जा सकता है  और किसी भी पापुलर ई बुक रुप में पढ़ा जा सकता है । 
        ओपन लाइब्रेरी की खूबी है कि यह दुनिया की अनेक लाइब्रेरी के साथ काम कर रही है और उनके केटेलाॅग को इंटरनेट पर लाए हैं । अभी तक ये 20मिलियन टाइटिल्स को स्कैन करके इंटरनेट पर दे चुके हैं । इसके अलावा 1.7 मिलियन किताबों को सार्वजनिक कर चुके हैं । यहाँ से मुफ्त में किताबें डाउनलोड की जा सकती हैं । 

       इंटरनेट प्रकाशन के तीन तत्व हैं । ये हैं स्पीड,काॅस्ट और एक्सिस । स्पीड में नकारात्मक ध्वनि भी निकलती है फास्ट फूड जैसी । यहाँ'फास्ट 'नकारात्मक है । इसी तरह 'फ्री' का अर्थ है अगंभीर या चीप । इसी प्रकार एक्सिस का मतलब है जनता का सहज पहुँच के दायरे में । अकादमिक ज्ञानदाता मानते रहे हैं कि ज्ञान को जनता में नहीं समझदारी या बुद्धिमान लोगों को ही देना चाहिए। जो ज्ञान सामान्य जनता को दिया जाता है वह सस्ता और ग़ैर अकादमिक होता है । 

भारत का अनुभव -

भारत में इनदिनों लेपटाॅप बाँटकर डिजिटल भेद को कम करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इससे डिजिटल भेद कम नहीं होगा । डिजिटल भेदभाव कम करने के लिए जरुरी है कि युवा इंटरनेट का नियमित इस्तेमाल करें । नियमित इस्तेमाल ही है जो उनको भेद ख़त्म करने में मदद करेगा । डिजिटल भेद को ख़त्म करने के लिए आॅनलाइन रहें और कंटेंट पैदा करें । उनकी डिजिटल सार्वजनिक मंचों पर आवाज सुनाई दे । 

डिजिटल स्पेस में दो तरह के लोग हैं एक वे हैं जो आॅनलाइन हैं और दूसरे वे हैं जो आॅफलाइन हैं । जो आॅलाइन हैं वे डिजिटल असमान हैं । डिजिटल समानता के लिए आॅनलाइन होना जरुरी है । नीति निर्माताओं औरपत्रकारों के लिए आ़नलाइन कंटेंट महत्वपूर्ण और जरुरी है । किसी के पास डिजिटल गैजेट्स हैं लेकिन वो आॅनलाइन नहीं रहता तो ऐसे व्यक्ति को डिजिटल असमान की कोटि में ही रखेंगे । 

डिजिटल विभाजन अमेरिका से लेकर भारत तक वैसे ही फैला है जैसे अभाव और बेकार फैली हुई है । मसलन यूरोपीय देशों में 77फीसदी लोग नेट से जुड़े हैं जबकि अफ्रीका में मात्र 7 फीसदी लोग ही नेट से जुड़े हैं । यही हाल भारत का है । अमेरिका का सारी दुनिया में ब्राॅडबैंड की प्रति व्यक्ति में चौदहवां स्थान है । यह डिजिटल अंतराल अविकसित मुल्कों में और भी ज्यादा है । 

       भारत में डिजिटल असमानता को देखने का तरीका यह भी हो सकता है कि कितने फीसदी एसीएसटी हैं जिनके पास डिजिटल गजैट्स हैं और नेट का नियमित प्रयोग करते हैं ? इसी तरह अल्पसंख्यकों और औरतों में कितने हैं जो नियमित नेट पर लिखते हैं । एक बड़ा हिस्सा है जो आॅनलाइन तो रहता है लेकिन कंटेंट निर्माण में उसकी कोई भूमिका नहीं है । हाशिए के जागरुक लोगों का कंटेंट निर्माण न करना उनको डिजिटल असमान में बनाए रखता है । 
     स्मार्ट फोन की हाल मेंखपत बढ़ी है लेकिन स्मार्ट फोन से आप १०पेज का लेख नहीं लिख सकते । डिजिटल असमानता को ख़त्म करने के लिए डिजिटल कंटेंट बनाएँ और डिजिटल उत्पादन पर नियंत्रण रखें और डिजिटल सक्रियता बनाए रखें । 

      भारत में दो तरह के डिजिटल लोग हैं एक वे हैं जो स्पीडवाले नेट का इस्तेमाल करते हैं और एक वे हैं जो धीमी गति के नेट का इस्तेमाल करते हैं या जिनके शहरों में नेट बेहद धीमी गति से चलता है । जो डिजिटल समर्थ  हैं वे राकेट की गति में रहते हैं और डिजिटल असमर्थ हैं वे चींटी की गति से चलते हैं । हमें देखना चाहिए कि हाइस्पीड नेट के कितने यूजर हैं ? 
     

        यह भी देखें  भारत में नेट कनेक्टेड सक्रिय मध्यवर्गीय कितना है ? 

अमेरिका और भारत में कम्प्यूटर के उपयोग को लेकर जो अंतर है उसे भी देखें , मसलन् , भारत में 1000 में 6 लोगों के पास निजी कम्प्यूटर है जबकि अमेरिका में 10 में से 6 के पास निजी कम्प्यूटर है । इस अंतराल का सूचना ,ज्ञान ,शिक्षा और विकास पर व्यापक असर देखा जा सकता है । 

डिजिटल भेदभाव का सीधा संबंध व्यक्ति की आय और बिजली की उपलब्धता से है । हमें देखना चाहिए प्रति व्यक्ति आमदनी क्या और वो किस किस मद में खर्च कितना पैसा खर्च करता है । इस नजरिए से देखने पर पाएंगे कि भारत में डिजिटल असमानता सभी असमानताओं से बड़ी असमानता है । मसलन प्रति व्यक्ति आय और उस आय का नियमित खर्चा किन किन मदों में होता है इसे देखना चाहिए । शहर और गाँव में किस रुप में विभिन्न मदों में खर्चा होता है और किस तरह उसका पूरे आर्थिकतंत्र पर असर हो रहाहै इसे देखने की ज़रुरत है । 

    डिजिटल असमानता को आय,व्यय,बिजली,शहर,गाँव, जाति,शिक्षा और भाषा के आधार पर देखा जाना चाहिए । 
यह भी देखें कि कम्प्यूटर है तो उसकी मेंटीनेंस भी है या नहीं । दफ्तरों में एक बड़ा हिस्सा मेंटीनेंस के बिना सड़ रहा है । दूसरा यह कि कम्प्यूटर है तो इंटरनेट है या नहीं ? एक कम्प्यूटर या एक इंटरनेट कनेक्शन को कितने लोग इस्तेमाल करते हैं  ? 
     भारत में स्थिति एकदम विलक्षण है । यहाँ पर टेलीफोन कनेक्शन का कुछ खास महानगरों या राज्यों में ही सबसे ज्यादा विकास हुआ है। यूएनडीपी रिपोर्ट 2001 के अनुसार 1.4 मिलियन टेलीफोन कनेक्शन में से 1.3 मिलियन कनेक्शन दिल्ली ,बंगलौर, तमिलनाडु ,दक्षिण कर्नाटक और महाराष्ट्र में ही हैं । 
      ताज़ा आंकडे बताते हैं कि दिसम्बर 2012 तक इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 15 करोड हो जाने का अनुमान है । शहरी भारत में 10.5करोड तथा ग्रामीण भारत में साढें चार करोड इंटरनेट यूजर हैं । वर्तमान यूजरों में 9.7 करोड एक्टिव यूजर हैं । यूजरों में 48 फीसदी यूजर इंटरनेट का हर हफ्ते कम से कम 5 या 6 बार इस्तेमाल करते हैं । जबकि 28फीसदी रोज़ इस्तेमाल करते हैं । 
     ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट यूजरों की संख्या में तेज़ी से इजाफा हुआ है । सन् 2010 में गांवों में 50लाख इंटरनेट यूजर थे वहीं जून 2012 में यह संख्या बढ़कर 3.8करोड हो गयी है । आई क्यूब की रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत में रहने वाले 83.3 करोड लोगों में  7करोड लोग कम्प्यूटर साक्षर हैं । इसमें से 3.8करोड यूजर हैं और  3.1 करोड सक्रिय यूजर हैं । 
   ग्रामीण भारत में 32.3करोड मोबाइल धारकों में 36लाख ग्रामीण इंटरनेट का मोबाइल पर इस्तेमाल करते हैं । 
     इसके अलावा भारतीय भाषाओं का प्रयोग बढ रहा है । अभी79 फीसदी लोग अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल करते हैं । 
जबकि हिंदी इस्तेमाल करने वालों की संख्या 32 फीसद हो गयी है ।
आज भी लोग इंटरनेट सेवाओं को हासिल करने के लिए अपने घर से दस किलोमीटर दूर जाकर ही साइबर कैसे आदि की सेवाओं का उपयोग कर पाते हैं । 

इंटरनेट और विकास- 
  
      इंटरनेट का हमारी अर्थव्यवस्था के विकास में बहुत बड़ा योगदान है । भारत के सकल घरेलू उत्पाद में इंटरनेट का 30विलियम डालर का योगदान है । आगामी तीन सालों में यह बढ़कर 100 विलियन डालर हो जाएगा । यानी कुल जीडीपी का 1.6फीसद है जो सन् 2015 तक विकसित होकर 3.3 फीसद हो जाएगा । इसके कारण इंटरनेटजनित अर्थव्यवस्था शिक्षा और स्वास्थ्य से भी बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाएगी । 
      सन् 2015 तक इंटरनेटजनित उद्योग में 22मिलियन लोगों को नौकरी मिलेगी । मैंकेजीकी रिपोर्ट के अनुसार भारत में पीसी की पहुँच अभी 1000 लोगों में मात्र 48 के बीच है । यह अर्जेंटीना,मैक्सिको और वियतनाम से भी नीचे है । यानी सारी दुनिया में 57वें नम्बर पर हैं । 



डिजिटल असमानता को परखने के पैमाने - 

डिजिटल असमानता के तीन बड़े रुप हैं पहला, विकसित और अविकसित देशों के बीच डिजिटल असमानता , दूसरा एक ही देश में असमानता और तीसरा डिजिटल यूजरों के बीच असमानता । 
डिजिटल असमानता को देखने के लिए हम देखें कि प्रथम, क्या यूजर आर्थिक तौर सक्षम है और इंटरनेट आदि का खर्चा उठा सकता है ? दूसरा ,क्या  यूजर ज्ञानात्मकतौर पर सक्षम है ? क्या कम्प्यूटर और इंटरनेट के उपयोग के तरीकों को बेहतर ढंग से जानता है ? तीसरा ,क्या यूजर के इस्तेमाल के लिए इंटरनेट पर पर्याप्त सामग्री है ? चौथा , क्या यूजर जानता है कि उसके पास राजनीतिक संरचनाओं और सत्ता की संरचनाओं का वह इंटरनेट पर किस तरह इस्तेमाल करे ? किस तरह कम्युनिकेट करे ? पाँचवा , यूजर की शिक्षा और ज्ञान का स्तर किस तरह का है और वह इसका सही उपयोग जानता है कि नहीं ? छठा , किसी समुदाय विशेष के ईज्ञान को जानने के लिए उसकी भाषा ,शिक्षा , साक्षरता और संस्थान संरचनाओं और सूचना और तकनीक के इस्तेमाल के स्तर का ज्ञान होना चाहिए । यानी डिजिटल असमानता को समझने के लिए समग्र नजरिए की ज़रुरत है । किसी एक पहलू पर केन्द्रित होकर देखने से डिजिटल असमानता को देख ही नहीं सकते । 
      इसके अलावा यूजर की तकनीकी क्षमता या कौशल की भी बडी भूमिका होती है । मसलन् जो तकनीक उपयोग में लायी जा रही है उसका तकनीकी स्तर क्या है ? तकनीक के उपयोग की कितनी स्वतंत्रता और स्वायत्तता है ? सामाजिकतौर पर किस तरह की मदद मिल सकती है और किस तरह के नेटवर्क मदद के लिए उपलब्ध हैं ? तकनीक के इस्तेमाल का स्तर क्या ? ये चार बड़े कारक हैं जिनके आधार पर तकनीकी क्षमता का अनुमान किया जा सकता है । 

औरतों के संदर्भ में - 
  
 यह सच है  कि बाज़ार में सबसे बड़ी क्रेता औरतें हैं लेकिन कम्प्यूटर की सबसे बड़ी यूजर अभी औरतें नहीं हैं । अधिकांश औरतें अभी भी इंटरनेट और कम्प्यूटर के दायरे के बाहर हैं । तीन-चौथाई औरतों ने तो अभी बटन तक नहीं पकड़ी है । हाल ही में अमेरिका में पहलीबार ऐसा हुआ है कि पुरुषों की तुलना में औरतों की संख्या में औसतन इजाफा हुआ है। एशिया में भी पुरुष समुदाय बड़ा यूजर है इंटरनेट का । मसलन औरतें बहुत कम ईमेल रखती हैं । औरतें जितनी मोबाइल फोन और इंटरनेट सेवाओं को जानेंगी या इनका उपयोग करेंगी उतना ही वे अभिव्यक्ति और गतिशीलता के मामले में सक्रिय होंगी । औरत की सक्रियता और पहचान को निर्मित करने और उसे सूचना संपन्न बनाने में यह माध्यम बहुत बड़ी भूमिका अदा कर सकता है । यहाँ तक कि उसकी बाज़ार संबंधी समझ बनाने और अच्छा क्रेता बनाने में भी मददगार हो सकता है । स्त्री के सबलीकरण में संचार की बड़ी भूमिका रही है। स्त्री को अपनी बात संप्रेषित करने के अत्याधुनिक उपकरण और परिवेश मुहैय्या कराना समाज का दायित्व है और इसमें सरकारों की बड़ी भूमिका हो सकती है । 

ब्लाग के फ़ायदे -

ब्लाॅग  ने सहभागिता और सामाजिक लेखन को बढ़ावा दिया है और एक नए किस्म की संस्कृति पैदा की है । कम्युनिकेशन के रुप में लेखक और पाठक का नया संबंध बना है जो पाठक है वह लेखक भी है और अपने विचार रीयलटाइम में दे सकता है । ब्लाॅग लेखन में गद्य या पद्य के अलावा या यों कहें शब्दों के अलावा अनेक मीडिया रुपों का भी उपयोग किया जा सकता है । कृति के इस्तेमाल के प्रति पुराना नज़रिया बदला है । आप मेरे लेखन का इस्तेमाल करें मैं आपके लेखन का इस्तेमाल करूँ । यह लेखन में खुले,पारदर्शी और सहभागी लेखनयुग के आगमन की सूचना है । 

ब्लाॅग में शोध कार्यों के लिए भी इस्तेमाल की अनंत संभावनाएं हैं । शोधार्थी अपना ब्लाॅग बनाएँ और इसमें सहपाठी मित्रों को शामिल करें। साहित्य का शिक्षक होने के नाते मैं नए मीडिया की उपेक्षा नहीं कर सकता। नया मीडिया नई संवेदनशीलता और नए दृष्टिकोण की माँग करता है। पुराने नज़रिए से नया मीडिया बहुत कम समझ में आएगा। यह मीडिया शेयरिंग पर निर्भर है। शेयरिंग और अनौपचारिकता के बिना नया मीडिया अर्जित करना संभव नहीं है। पुरानी लेखकीय आदतें इस माध्यम में मदद नहीं करतीं। 
 
 डिजिटल युग में आलोचना- 

नए युग में निजी अनुभव और व्यक्तित्वकेन्द्रित लेखन आ रहा है। सवाल यह है कि इसे आलोचना में रुपान्तरित कैसे करें ? यह एक तरह का अनौपचारिक लेखन भी है, निजी अनुभव और निजी नज़रिए को  महान बताया जा रहा है, जबकि बेहतर लेखन वह है जो अन्य के नज़रिए की कसौटी पर खरा उतरे ।इंटरनेट के आने के बाद लेखक-पाठक का नया संबंध पैदा हुआ है।नए संबंध की रीयलटाइम कम्युनिकेशन ने प्रकृति तय की है। पहले लेखक का पाठक से लिखने के बाद संबंध ख़त्म हो जाता था । लेकिन नए दौर में पाठक कभी भी लेखक से संपर्क कर सकता है,और अपनी राय कह सकता है। (रायपुर साहित्यमेला में 14दिसम्बर 2014 को दिया गया भाषण)
   











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