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सोमवार, 3 जून 2013

फेसबुक मित्रों का हिप्पोक्रेटिक चरित्र

                 
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फेसबुक यूजर नई समस्याओं के समाधान रामायण,महाभारत, हनुमान चालीसा ,शिवचालीसा आदि में क्यों खोजता हैं ? अतीत के बोझ को त्यागे बिना आधुनिक नहीं बन सकते फेसबुक यूजर.
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फेसबुक यूजर अपनी वर्तमान इमेज के एक अंशमात्र को अभिव्यक्त करता है। वह अपना अतीत छिपाता है। सच बोलने से कतराता है ,फलतःजो मित्रता बनती है वह खोखली होती है। यह माउस मित्रता है या मूषक मित्रता है।
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फेसबुक में एनीमि यानी शत्रु की केटेगरी नहीं है, फलतः यही लगता है कि यह मीडियम शत्रुरहित है लेकिन अजातशत्रु युधिष्ठिर का हश्र हम देख चुके हैं उनका कोई शत्रु नहीं था लेकिन घर में 100 कौरव शत्रु निकले, क्या आप शत्रुओं से घिरे हैं ?
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फेसबुक में लाइक है ,डिसलाइक नहीं है। मित्रता के लिए मित्र की कठोर बात को भूलने की जरूरत होती है ,संभवतः इसी कारण डिसलाइक का विकल्प नहीं है।
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फेसबुक पर नकली उदारता के जरिए मित्रगण मित्रता का दावा करते हैं। इस मित्रता में कोई सामाजिक बंधन और जिम्मेदारी नहीं है।
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फेसबुक पर नकली उदारता का प्रदर्शन अंततः हिप्पोक्रेसी है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो नकली उदारता की बाढ़ का प्रत्येक वॉल पर सहज ही प्रदर्शन देख सकते हैं। नकली उदारता को बुद्धिमत्तापूर्ण अभिव्यक्ति समझनेकी भूल न करें।
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फेसबुक पर हिप्पोक्रेसी वही करते हैं जो आमजीवन में भी हिप्पोक्रेट हैं। हिप्पोक्रेट बड़े महत्वाकांक्षी होते हैं। लेकिन फेसबुक तो महत्वाकांक्षाओं का अन्त है।
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कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए हिप्पोक्रेसी का निषेध हर स्तर पर किया जाना चाहिए। जो कलात्मक अभिव्यक्ति में अक्षम हैं वे ही नकली अस्मिता का इस्तेमाल करते हैं। हमें इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि फेसबुक आने के बाद हिप्पोक्रेसी बढ़ी है या घटी है ? जो लोग सामने मिलने पर अच्छे से बात नहीं करते वे फेसबुक पर भद्रभाव से बातें करते हैं, यह नकली कम्युनिकेशन का आदर्श प्रमाण है।
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फेसबुक में जो नकली नाम से सक्रिय है वे मूलतःवे लोग हैं जिनका स्वयं के प्रति कोई श्रद्धा और सम्मान नहीं है। नकली लोग और नकली नाम अंततः हिप्पोक्रेसी का वातावरण बनाते हैं और यह कु-कम्युनिकेशन की कोटि में आता है।
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फेसबुक में नकली नामों का जमघट है यह फेसबुक यूजर की हिप्पोक्रेसी है और हिप्पोक्रेट समाज नहीं बदल सकते।
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हिप्पोक्रेसी के कारण शब्द और अर्थ व्यक्ति के विचार और कर्म के बीच फांक नजर आती है। इस दरार को फेसबुक ने और भी चौड़ा किया है।
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फेसबुक यूजर को कलाकार-लेखक की कोटि में नहीं रख सकते। इसका प्रधान कारण है लेखक-कलाकार को कम्युनिकेशन में अंततःसफलता मिलती है लेकिन फेसबुक में कम्युनिकेशन के कु-कम्युनिकेशन में रूपान्तरित होने का खतरा हमेशा बना रहता है।पता नहीं आपकी लिखी पंक्तियां किसे कष्ट दे रही हो ? या कौन गलत ढ़ंग से पढ़ रहा हो ?
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फेसबुक पर हिप्पोक्रेसी खूब दिखती है। हिप्पोक्रेसी के कारण ही मित्रगण कुछ भी वायदा करते हैं, क्योंकि वायदा करने में कोई क्षति नहीं है।
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नया कम्युनिकेशन युग मनुष्य की संप्रेषण क्षमताओं का विस्तार है। साथ ही कम्युनिकेशन तकनीकी मनुष्य की संवेदनशीलता का विस्तार है।
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इंटरनेट कम्युनिकेशन के विभिन्न रूपों के आने के साथ ही प्राइवेसी का नया पैराडाइम सामने आया है।
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फेसबुक में सवारी कोई नहीं सब ड्राइवर हैं।
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फेसबुक वस्तुतः ऑटोमेशन युग का कम्युनिकेशन है इसमें जब भी आप कम्युनिकेट करेंगे अपने आप कम्युनिकेट करना होगा। आप क्या हैं और किस तरह कम्युनिकेट करना चाहते हैं यह निजी तौर पर खोज करनी पड़ेगी।

फेसबुक ,डिजिटल मानवाधिकार और नार्सिज्म



मैकलुहान के शब्दों में कहें तो मनुष्य तो मशीनजगत का सेक्स ऑर्गन है। डिजिटल मानवाधिकार इससे आगे जाता है और गहराई में ले जाकर मानवीय शिरकत को बढ़ावा देता है। हिन्दी के जो साहित्यकार फेसबुक पर हंगामा मचाए हुए हैं वे गंभीरता से सोचें कि सैंकड़ों की तादाद में जो लाइक आ रहे हैं वे कम्युनिकेशन को गहरा बना रहे या उथला ?
कम्युनिकेशन गहरा बने इसके लिए जरूरी है डिजिटल रूढ़िवाद से बचें। डिजिटल रूढ़िवाद मशीन प्रेम पैदा करता है,तकनीक की खपत बढ़ाता है । लेकिन कम्युनिकेशन में गहराई नहीं पैदा करता। डिजिटलरूढ़िवाद की मुश्किल है कि उसके कान नहीं हैं। वह इकतरफा बोलता रहता है,वह सिर्फ अपनी कही बातें ही सुनता है अन्य की नहीं सुनता। मसलन्, मैंने यह कहा,मैंने यह किया,मैं ऐसा हूँ,मैं यहां हूँ,मैं यह कर रहा हूँ,वह कर रहा हूँ आदि।
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हिन्दी के फेसबुकरूढ़िवादी जब फोटो के जरिए अभिव्यक्ति का जश्न मनाते हैं तो वे भूल जाते हैं कि वे वैचारिक तौर पर क्या कर रहे हैं। फेसबुक या किसी भी डिजिटल मीडियम का गहरा संबंध मानवीय क्रियाकलापों और संचार से है। फेसबुक पर लाइक या फोटो लगाने के बहाने हम अपने भाव-भंगिमाओं और गतिविधियों का बतर्ज मैकलहान मशीनीकरण करते हैं,इस क्रम में पेश की गयी हर चीज अपना विलोम बनाती है। हमें मैकलुहान की यह बात याद रखनी चाहिए-
All media work us over completely. They are so persuasive in their personal, political, economic, aesthetic, psychological, moral, ethical, and social consequences that they leave no part of us untouched, unaffected, unaltered. The medium is the massage. Any understanding of social and cultural change is impossible without a knowledge of the way media work as environments .
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हिन्दी के बौद्धिकों में एक बड़ा वर्ग है जो अभी मानवाधिकारचेतना को महत्वहीन मानता है। उनमें संयोग से उन लेखकों की संख्या भी अच्छी खासी है जो साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हैं। नया दौर डिजिटल ह्यूमनिज्म का है। वे लोग जो मानवाधिकारों न समझे वे डिजिटल मानवाधिकार को समझेंगे इसमें संदेह है। मेरा इशारा उन लेखकों की ओर है जो हिन्दी में है और फेसबुक पर आएदिन फोटोबाजी करते रहते हैं। लेकिन मानवाधिकारों के प्रति कभी नहीं बोलते। डिजिटल मानवाधिकार विलासिता के लिए नहीं है। फेसबुक पर सिर्फ फोटो लगाना,आत्मगान करना विलासिता है,हिन्दी में इसे फेसबुक रूढ़िवाद कहते हैं।
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मार्शल मैकलुहान ने लिखा है हम ऐसे युग में हैं जहां व्यापार ही हमारी संस्कृति है । यह वह युग है जहां संस्कृति ही हमारा व्यापार है।
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फेकबुक कम्युनिकेशन के दौर में सामाजिक-सांस्कृतिक त्रासदियां सबसे ज्यादा घट रही हैं लेकिन हिन्दी फेसबुक में यह सब नदारत है। अति-कनेक्टविटी वालों का यथार्थजीवन से अलगाव है। दूरसंचार कम्युनिकेशन पर बढ़ती निर्भरता ने सामाजिक जीवन के अर्थपूर्ण संपर्क को तोड़ दिया है। इसके कारण टाइम और स्पेस का शासन भी खत्म हो गया है। अब हम बिना जाने तत्क्षण राय देने लगे हैं,लाइक करने लगे हैं।अनजान लोगों की लाइकलाइन पगलाती रहती है।
अनजान का लाइक अब पैमाना है लोकप्रियता का। अब लाइक करने वाला भी लेखक बन गया है ,उसे लेखक के बराबर दर्जा मिल गया है। फलतःलेखक और लाइककर्ता दोनों मित्र हो गए हैं। अब हम लेखक के आन्तरिक और निजी विवरणों में ज्यादा रूचि लेने लगे हैं।
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फेसबुक टाइमलाइन की खूबी है कि यूनीफॉर्म,कंटीनुअस और कनेक्टेड है। कथाकार उदयप्रकाश जैसे नार्सिस्ट लोग (फेसबुक पर लिखी उनकी पोस्टों के संदर्भ में) इस तत्व की जानते हुए अनदेखी करते रहे हैं।
एक सम्मानित लेखक के द्वारा किया गया नार्सिज्म बहुत खतरनाक होता है इसे हम हिटलर के प्रसंग में अनेक लेखकों में देख चुके हैं।
नार्सिज्म यानी आत्ममुग्धता और अहर्निश असत्य का प्रचार। हिन्दी लेखकों को इससे बचना चाहिए। फेसबुक पर इस बात को लिखना इसलिए जरूरी लगा कि क्योंकि फेसबुक पर यह नार्सिज्म खूब चल रहा है। किसी के भी बारे में अनाप-शनाप लिखने की बाढ़ आई हुई है। इसमें एक पहलू वह भी जिसमें व्यक्ति अपने बारे खूब काल्पनिक बातें लिखता है। इस तरह की काल्पनिक और बेसिपैर की बातें लिखना नार्सिज्म का वैचारिक धर्म है।
मसलन् किसी के फोटो का दुरूपयोग,विकृतिकरण,कैरीकेचर,पर्सनल हमला करना,किसी को गलत उद्धृत करना, विषयान्तर करके निजी जीवन पर हमला करना, किसी के नाम से असत्य बोलना आदि फेसबुक पर नार्सिज्म की सामान्य प्रवृत्तियां हैं और इसमें हमारे नामी और सुधीजन बाजी मारे हुए हैं। नार्सिज्म वैचारिक एड्स है।
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फेसबुक टाइमलाइन में आप मानवीय जीवन के अनंतरूपों को देख सकते हैं। यहां पर विभिन्न किस्म की घटनाओं जैसे निजी अनुभव,निजी राय,जन्मदिन,मृत्यु दिवस,शादी,ब्याह, तलाक, दलीय नीतियां आदि को देख सकते हैं।
फेसबुक में अर्थवान और अर्थहीन दोनों ही किस्म की चीजें देखते हैं। फेसबुक एक तरह से तयशुदा संभावित समय और स्थान है जहां पर कम्युनिकेट कर सकते हैं।यहां वातावरण अदृश्य है।इसकी संरचनाएं और बुनियादी नियम पर्वेसिव हैं।सतह पर यह सहज कम्युनिकेशन का मीडियम है। लेकिन यह सीधे व्यक्ति के अन्तर्मन और धमनियों या नसों को प्रभावित करता है। हमारे हिन्दी नार्सिस्ट इस बुनियादी तथ्य को नहीं समझते और अंट-शंट लिखते रहते हैं। अंटशंट लेखन,आत्मश्लाघा, आत्मप्रशंसा कम्युनिकेशन में पर्वर्जन है।नार्सिज्म है।
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फेसबुक संवाद का माध्यम है,संवाद के आरंभ होने का अर्थ है प्रौपेगैण्डा का अंत। फेसबुक पर किसी भी विचारधारात्मक सवाल पर विचार विमर्श कम्युनिकेशन में रूपान्तरित हो जाता है। वह प्रौपेगैण्डा नहीं रहता।
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हिन्दी का एक बड़ा लेखक फेसबुक पर नार्सिज्म के प्रचारक के रूप में काम कर रहा है,उसके वॉल पर जाएं तो आपको भारत के कम और निजी फोटो ज्यादा नजर आएंगे।बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार  विगत 12सालों में भारत में महिलाओं की संख्या में गिरावट आई है औरत आत्मनिर्भर होने की बजाय घरों में कैद हुई हैं लेकिन हिन्दी लेखकों को यह स्त्रीयथार्थ नजर ही नहीं आता।  12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान कृषि क्षेत्र के रोजगार में 1.4 करोड़ की कमी आई। पांच साल की इस अवधि में कुल रोजगार महज 30 लाख ही बढ़े।वर्ष 2004-05 से 2009-10 के दौरान विनिर्माण क्षेत्र में 50 लाख रोजगार गंवाए गए।
हिन्दी के लेखकों को पंचवर्षीय योजनाएं कभी ध्यान नहीं खींचतीं,वे पुरस्कार,किताब मार्केटिंग ,सरकारीपद,नेता की चमचागिरी,हिन्दी प्रोफेसर बन पाने और न बन पाने या प्रोफेसर से समीक्षा लिखवाने में ही सारी शक्ति खर्च करते हैं।
फेसबुक पर भी नामधारी लेखक देश की गंभीर समस्याओं पर बहस नहीं चलाते बल्कि नार्सिज्म का प्रचार कर रहे हैं। वे फेसबुक पर नार्सिज्म के नायक हैं और कहानी में यथार्थवादी -जादुई यथार्थवादी हैं । अब कल्पना कीजिए कि नार्सिज्म की सेवा करके फेसबुक पर ये नामधारी लेखक किस विचारधारा की सेवा कर रहे हैं? फेसबुक पर हिन्दीलेखकों और पाठकों में आत्मप्रशंसा और आत्ममुग्धता कम हो और देश की समस्याओं पर ज्यादा बातें हों तब ही फेसबुक को एक सार्थक मीडियम बना सकते हैं।
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भारत का मीडिया इस अर्थ में अ-मानवीय है कि वह रीजन,रेशनेलिटी और जीवन के सारवान सवालों को बुनियादी तौर पर नहीं उठाता। वह मनुष्य और पशु में भेद नहीं जानता। वह विश्वसनीय ज्ञान और सूचना का स्रोत अभी तक नहीं बन पाया है। वहां बार-बार नियंत्रण के विभिन्न रूपों का अभ्यास किया जाता है। वहां मोटे तौर पर विज्ञापनदाता,राजनीतिज्ञ और चोंचलबाजों की गणित और नियंत्रण का ख्याल रखा जाता है। अप्रत्यक्षतौर पर वे राज्य-कारपोरेट घरानों के भोंपू की तरह काम करते हैं। मानवीय और गैर-मानवीय जीवनशैली के पहलुओं में अंतर करने की तमीज अभी तक पैदा नहीं कर पाए हैं।
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भारत का मीडिया इस अर्थ में अ-मानवीय है कि वह रीजन,रेशनेलिटी और जीवन के सारवान सवालों को बुनियादी तौर पर नहीं उठाता। वह मनुष्य और पशु में भेद नहीं जानता। वह विश्वसनीय ज्ञान और सूचना का स्रोत अभी तक नहीं बन पाया है। वहां बार-बार नियंत्रण के विभिन्न रूपों का अभ्यास किया जाता है। वहां मोटे तौर पर विज्ञापनदाता,राजनीतिज्ञ और चोंचलबाजों की गणित और नियंत्रण का ख्याल रखा जाता है। अप्रत्यक्षतौर वे राज्य-कारपोरेट घरानों के भोंपू की तरह काम करते हैं। मानवीय और गैर-मानवीय जीवनशैली के पहलुओं में अंतर करने तमीज अभी तक पैदा नहीं कर पाए हैं।
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भारत और यूरोप के मीडिया में एक अंतर है। यूरोप में मानवोत्तर दौर की ओर मीडिया प्रयाण कर रहा है ,वहां सारवान मानवीय मसले उठाए जा रहे हैं।मानवीय त्रासदी और मानवाधिकारों के सवालों पर ध्यान दिया जा रहा है। भारत में इसके उलट अमानवीय ,बोगस,मृत विषयों को व्यापक कवरेज दिया जा रहा है।
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माओवादी हिंसा प्रभावित इलाके हमारे देश में कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य की असफलता के ध्रुवतारे हैं। इनइलाकों में माओवादियों-सरकार और कारपोरेट घरानों के द्वारा सार्वजनिक संपदा की इस -उस तरह खुली लूट हो रही है। जमकर हिंसाचार हो रहा है। एक तरह से ये इलाके कत्लघर बने हुए हैं।
सार्वजनिक संपदा की लूट को तमाशबीन की तरह देखना मध्यवर्ग की प्रवृत्ति रही है।वे इवेंट में मजा लेते हैं।फलतः मीडिया इस इलाके की घटनाओं को इवेंट बनाकर पेश करता रहा है।
आयरनी यह है कि माओवादीनेता आदिवासी संपदा संरक्षण के नाम पर अन्य किसी भी दल को वहां घुसने नहीं देते। अन्यदलों के नेताओं को इन इलाकों में जाने की फुर्सत नहीं है। यहां तककि मुख्यमंत्री को भी समय नहीं मिलता कि वो इन इलाकों में जाए और जनता की सुने। दलविहीन,संसाधन-सुविधाविहीन और तंत्रविहीन समाज के रूप में ये इलाके लूट और कत्ल के केन्द्र बन गए हैं। सैंकडों टीवी चैनलों और इंटरनेट क्रांति के बाबजूद इन इलाकों का निरंतर जमीनी कवरेज अभी अदृश्य बना हुआ है।
मुझे याद है विनायकसेन की रिहाई के समय एकमात्र कईदिन तक मीडिया ने प्रधान कवरेज दिया था। उसके बाद माओवादी हिंसा प्रभावित इलाकों का कवरेज हाशिए का कवरेज रहा है।
मीडिया की या जिम्मेदारी है कि वह सारवान और सारहीन खबर में अंतर को बार बार सामने लाए। माओवादी हिंसा से अनेक मौत,अनेक मसले,नीतियां,प्रशासन और राजनीतिकदलों का संबंध है और सबसे बड़ा संबंध आदिवासियों की जिन्दगी का है। उनके जीवन पर केन्द्रित होकर अहर्निश कवरेज जब तक नहीं आएगा केन्द्र-राज्य सरकारों के ऊपर दबाब पैदा नहीं होगा। सवाल यह है कि क्या मीडियावाले आदिवासी इलाकों में जाने को तैयार हैं ? क्या उनके पास जमीनी हकीकत को बताने वाले संवाददाता हैं ?जागो बंधु जागो।
राजनीतिकदलों, मीडिया और बुद्धिजीवियों में एक प्रवृत्ति नजर आई है कि वे छत्तीसगढ़ में माओवादियों और पुलिसबलों के हिंसाचार पर जमकर कईदिनों तक न तो बहस करते हैं और न उसे प्रधान एजेण्डा बनाकर रखते हैं। एक तरह से देखें तो दामिनीरेपकांड के बराबर भी कभी प्रधान एजेण्डा इस इलाके के हिंसाचार को नहीं बनाया गया। मैनस्ट्रीम राष्ट्रीय मीडिया जब तक इस हिंसाचार को प्रमुख एजेण्डा नहीं बनाता तब तक समस्या की ओर ध्यान नहीं जाने वाला। अभी भी क्रिकेटसट्टाकांड महान खबर है। बदलो मित्रो ,बदलो। छत्तीसगढ़ के सरकारी-माओवादी हिंसाचार को प्रधान एजेण्डा बनाओ।
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छत्तीसगढ़ में माओवादियों द्वारा कांग्रेसीनेताओं पर किया गया हमला लोकतंत्र पर हमला है। यह बात सोनिया गांधी ने सही कही है। लेकिन भाजपा ने इसे युद्ध की घोषणा कहा है। लगता है भाजपावाले युद्ध की परिभाषा भी नहीं जानते। युद्ध कहकर उन्माद पैदा किया जा सकता है लेकिन जनता का दिल नहीं जीता जा सकता। भाजपा आज तक बस्तर आदि इलाकों में आम जनता का दिल क्यों नहीं जीत पायी ,जबकि उनके पास पूर्ण बहुमत है।
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केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश का मानना है कि माओवादी आतंकवादी हैं। यदि ऐसा है तो कम से कम आतंकियों का समर्थन करने वाली बेवसाइट सरकार बंद करे। उन लोगों पर पाबंदी लगाए जो माओवादियों का समर्थन करते हैं।
मेरी नजर में माओवादी आतंक फैला रहे हैं ,हत्याएं कर रहे हैं,अन्य समाजविरोधी गतिविधियां कर रहे हैं,लेकिन आतंकी कहना सही नही नहीं है।
माओवादियों को यदि केन्द्र का एकमंत्री आतंकवादी मानता है तो केन्द्र सरकार को उनको आतंकवादी संगठन की केटेगरी में वर्गीकृत करके प्रतिबन्धित संगठन घोषित कर देना चाहिए।
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टीवी चैनलों ने माओवादी हिंसा में मारे गए लोगों के अंतिम संस्कार का लाइव प्रसारण क्यों नहीं किया ? क्या आपलोगों ने किसी चैनल पर अंतिम संस्कार का लाइव प्रसारण देखा ?
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माओवादियों और आतंकियों को कम करके आंकने और उनके द्वारा पैदा किए गए खतरे की अनदेखी करने का दुष्परिणाम है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का समूचा प्रमुख नेतृत्व माओवादियों के हाथों मारा गया। आतंकवादियों के प्रति तदर्थभावबोध मौत के मुँह में ले जा सकता है।
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भारतीय मीडिया में कु-सूचना तेजी से चलती है ,उनके लिए सत्य और तथ्य प्रासंगिक नहीं रह गए हैं।
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शीतयुद्ध ,सीआईए और साहित्य

   

ओम थानवी और अर्चना वर्मा ने साहित्य और सीआईए के अन्तस्संबंध की बहस को नितांत व्यक्तिगत और आत्मगत रूप से देखा है। साहित्य और सीआईए के अन्तस्संबंध को अशोक पाण्डेय या अन्य लेखक की राय मात्र के रूप में न देखकर,उसके मर्म में छिपे बड़े सवाल के रूप में वस्तुगततौर पर देखा जाता तो बेहतर होता। 
सीआईए के साथ साहित्य या कला के संबंध के सवाल को कमलेशजी ने ही पहले उठाया था तो उसकी जड़ों में जाने की जरूरत थी, न कि आत्मगत ढ़ंग से रिएक्ट करने की।
ओमथानवी,अर्चना वर्मा,अशोक पाण्डेय आदि की प्रतिक्रियाओं में निजी राय में जल्द ही मूल्य निर्णय करने का जो भाव है वह चीजों को सही परिप्रेक्ष्य में समझने नहीं देता। 
मूल्य निर्णय से आलोचना यथासंभव बचे तो आलोचना में मजा आता है। ओमथानवी,अर्चना वर्मा,अशोक पाण्डेय आदि अपने मित्र हैं और लोकतांत्रिक लोग हैं। सवाल इन लोगों की पक्षधरता का भी नहीं है। 
सवाल है सीआईए और कला के अन्तस्संबंध का। इस सवाल पर क्या स्टैंड है ओम थानवी या अर्चना वर्मा का। इस प्रसंग में मैं यहां बहस का दायरा बड़ा करने की कोशिश कर रहा हूं जिससे हिन्दी की तू-तू-मैं-मैं से आलोचना को बचाया जाए। यह सर्वमान्य तथ्य है कि सीआईए ने आधुनिककलाओं को औजार की तरह इस्तेमाल किया था और इसके अकाट्य प्रमाण मौजूद हैं। वे इंटरनेट पर भी हैं।
हिन्दी में जाने-अनजाने सीआईए पर जब भी बहस होती रही है और यह आभास भी दिया गया है कि सीआईए का काम तो जासूसी करना है ,साहित्य ,कला, संस्कृति से उसे कोई लेना-देना नहीं है।सच इसके एकदम विपरीत है।
सीआईए ने कला,साहित्य,संस्कृति के क्षेत्र में महज पुस्तकों का प्रकाशन करके समाजवाद को नंगा करनेवाली सस्ती किताबें मुहैय्या कराने का काम ही नहीं किया बल्कि इससे आगे जाकर गंभीर काम किया है जिसकी हिन्दी के अधिकांश पत्रकार,लेखक और आलोचक उपेक्षा करते रहे हैं। सीआईए ने अमूर्त एक्सप्रेनिस्ट कला आंदोलन को पैसा दिया,संगठित किया और राजनीतिक समर्थन दिया। उसने Jackson Pollock, Sam Francis, Willem de Kooning, Barnett Newman, Robert Motherwell, Mark Rothko जैसे कलाकारों का सोवियत संघ के खिलाफ इस्तेमाल किया। Frances Stonor Saunders की लिखी किताब The Cultural Cold War – The CIA and the World of Arts and Letters.इस प्रसंग में उल्लेखनीय है। इस किताब में बताया गया है कि सीआईए ने किस तरह दुनिया के अनेक देशों में कलाकारों, साहित्यकारों आदि का अपनी सांस्कृतिक नीति के प्रचार-प्रसार के लिए इस्तेमाल किया।
हिन्दीलेखक सीआईए का सवाल आते ही लेखकों का एक वर्ग सीआईए के प्रति आत्मगत नजरिए का किसी न किसी रूप में शिकार होता रहा है। ऐसे ही आत्मगतता और अधूरी समझ हाल ही अर्चना वर्मा के कथादेश में प्रकाशित लेख और आज (2-6-13)के जनसत्ता में प्रकाशित ओम थानवी के लेख में नजर आती है। सीआईए को लेकर ये दोनों लेख तदर्थवादी नजरिए को व्यक्त करते हैं।
सीआईए जैसा विशाल नियोजित संगठन चलताऊ नजरिए से समझ में नहीं आएगा। हिन्दी में संभवतः सबसे पहले मुक्तिबोध ने शीतयुद्ध की अमेरिकी राजनीति को नईकविता के प्रसंग में रेखांकित किया था और उसी दौर में रामविलास शर्मा ने भी कई लेख लिखे थे।
इसी क्रम में सुधीश पचौरी ने अपनी पीएचडी में शीतयुद्धीय राजनीति की नई कविता के दौर में क्या भूमिका रही है उसका "नई कविता का वैचारिक आधार " किताब में जिक्र किया है। इसी सिलसिले में भारतभवन और अमेरिकी फंडिंग को लेकर जनवादियों और प्रगतिशीलों में बहस हुई है और उस बहस में भी कई महत्वपूर्ण लेख एक जमाने में सुधीश पचौरी ने उत्तरगाथा आदि में लिखे थे।
यह खुला सच है कि कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम नामक संगठन का जन्म सीआईए के सहयोगी संगठन के रूप में हुआ था और उसके भारत में भी सदस्य थे जिसमें बाबू जयप्रकाशनारायण, अज्ञेय,रामवृक्ष बेनीपुरी आदि के नाम प्रमुख हैं।

कुछ समय पहले टीवी पर When the CIA Infiltrated Culture नामक डाकूमेंटरी देखी थी। इसे तीन साल की कड़ी मेहनत और रिसर्च के बाद इसे तैयार किया गया था। इसमें बताया गया कि किस तरह संस्कृति के क्षेत्र में मार्शलप्लान के तहत सीआईए ने कला को सब्सडाइज को किया और कलाओं के जरिए व्यक्तिगत चयन की आजादी के सवाल को प्रचारित किया गया। इस काम Farfield Foundation और the Congress for Cultural Freedom का जमकर इस्तेमाल किया गया। सन् 50 और 60 के दशक में यूरोप के पचासों संगठनों को करोड़ों डॉलर की सालाना मदद दी गयी। इसी क्रम में सीआईए ने विचारधाराहीनता की विचारधारा का प्रचार किया। वे लेखक -कलाकार जो विचारधारा का निषेध करते थे वे जाने-अनजाने इस खेमे का हिस्सा बनते चले गए। इसमें वे लेखक भी शामिल हैं जो सभी किस्म की विचारधारा का निषेध करते थे और वे भी जो मार्क्सवाद विरोधी थे,समाजवाद विरोधी थे,सोवियत संघ विरोधी थे।" नो आइडियोल़ॉजी "उनकी विचारधारा थी। हमारे ओमथानवी टाइप लोग उसी कोटि में आते हैं।

सीआईए के सांस्कृतिक मार्शल प्लान में लेखकों से यह मांग की गयी कि वे कला से राजनीति को धो-पोंछकर साफ कर दें।राजनीतिरहित कलाओं के सृजन पर जोर दिया गया>
सीआईए के अनुसार लेखक हर विषय पर लिख सकता था लेकिन सीआईए स्पांसर "फ्रीडम "के प्रति आलोचनात्मक नजरिया व्यक्त करने आजादी इन लेखकों को नहीं थी। लेखक सामुदायिकता की आलोचना करे,व्यक्तिनिष्ठता की आलोचना करे,सरकार की आलोचना करे,बाजार की शक्तियों के पक्ष में लिखे।
इसी तरह एक्सप्रेसनिज्म,अमेरिकी अवांगार्द ,संगीत समारोह,कला प्रदर्शनियों आदि पर जोर दिया गया। गुंटर ग्रास ने When the CIA Infiltrated Culture नामक वृत्तचित्र में कहा-“The ideology of the CIA was that the West had to be the most modern of the modern,”

क्या इस बयान से कमलेश जैसे लेखक कहीं प्रभावित तो नहीं हैं ?

सोमवार, 28 मई 2012

सांस्कृतिक मालों के अपहरण का मायावीतंत्र है यू-ट्यूब



सिनेमा ने दृश्यमाध्यम के रूप में नई आधुनिकता सामाजिकता को बुलंदियों तक पहुँचाया। नए मीडियम के रूप में कैमरे ने सभी शास्त्रों के शस्त्रों को अपदस्थ कर दिया। यही कैमरा जब डिजिटल और सैटेलाइट के सहमेल से नई भूमिका में बदला तो उसने एकदम नयी कम्युनिकेशन  संस्कृति को जन्म दिया।जिसका नाम है यू-ट्यूब । इसकी दुनिया विकसित पूंजीवादी संस्कारों के चरमोत्कर्ष की पारदर्शी और नियंत्रित दुनिया है। 

यू-ट्यूब का समूचा फॉरमेट देखने में स्वतंत्र अभिव्यक्ति के मंच जैसा है। लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं है। यह फॉरमेट बुनियादी तौर पर सांस्कृतिक इजारेदारी के डिजिटल फॉरमेट की आदर्श अभिव्यक्ति है। मसलन्, इस फॉरमेट के आधार पर समूचा संगीत और सिनेमा उद्योग अरबों रूपये के व्यावसायिक लाभ से वंचित कर दिया गया है।अन्य देशों और व्यक्तियों की सांस्कृतिक संपदा और बौद्धिक-संपदा को अपहृत करके इजारेदार कंपनी के मुनाफे की मशीन बना दिया गया है। यू-ट्यूब ने अनेक विश्व कन्वेंशनों को कागजी बना दिया है। लेखकों,कलाकारों, संगीतकारों, फिल्ममेकरों के कॉपीराइट का खुला उल्लंघन करते हुए उनके सांस्कृतिक मालों को यू-ट्यूब के मालिकों की सांस्कृतिक संपदा बना दिया है।

यू-ट्यूब के अनुसार 500 वर्ष के बराबर यू-ट्यूब वीडियो प्रति दिन फेसबुक पर देखे जाते हैं, और प्रति मिनट 700 से अधिक यू-ट्यूब वीडियो ट्विटर पर शेयर किए जाते हैं। प्रत्येक सप्ताह 100 मिलियन लोग यू-ट्यूब पर सामाजिक रूप से सक्रिय रहते हैं (पसंद करते हैं, शेयर करते हैं, टिप्‍पणियां करते हैं, आदि)।

स्वचालित रूप से शेयर किए गए एक ट्वीट के परिणामस्वरूप औसतन 6 नए यू-ट्यूब सत्र होते हैं, और हम प्रति मिनट यू-ट्यूब लिंक वाले 500 से अधिक ट्वीट देखते हैं।हर दिन कई मिलियन ग्राहक बनते हैं. ग्राहकी आपको उस व्‍यक्ति से कनेक्‍ट होने देती है, जिसमें आपकी रुचि है — चाहे वह मित्र हो, या NBA — और साइट पर उनकी गतिविधि बनाए रखने की सुविधा देती है। यू-ट्यूब पर 50% से अधिक वीडियो रेट किए गए हैं या उनमें समुदाय की टिप्‍पणियां शामिल हैं।हर दिन कई मिलियन वीडियो पसंदीदा बनाए जाते हैं। यू-ट्यूब पर 50% से अधिक वीडियो रेट किए गए हैं या उनमें समुदाय की टिप्‍पणियां शामिल हैं।हर दिन कई मिलियन वीडियो पसंदीदा बनाए जाते हैं।

यू ट्यूव दृश्यमीडिया में क्रांतिकारी छलांग है। इसका कन्‍टैंट आईडी हर दिन 100 से अधिक वर्षों का वीडियो स्‍कैन करता है।प्रत्येक प्रमुख यूएस नेटवर्क प्रसारणकर्ता, फिल्‍म स्‍टूडियो और रिकॉर्ड लेबल सहित, 3,000 से अधिक सहयोगी कन्टैंट आईडी का उपयोग करते हैं।इसके कन्टैंट आईडी डेटाबेस में आठ मिलियन (500,000 घंटों से अधिक समय की सामग्री) से अधिक संदर्भ फ़ाइलें हैं; यह दुनिया में सबसे समृद्ध है. पिछले वर्ष से संख्‍या दोगुनी हो गई है।यू-ट्यूब के कुल मुद्रीकृत दृश्‍यों का एक तिहाई से अधिक भाग कन्टैंट आईडी से आता है।कन्टैंट आईडी के द्वारा 120 मिलियन से अधिक वीडियो पर दावा किया गया।

यू-ट्यूब में एक माह के भीतर 60 वर्षों में बनाए गए 3 मुख्‍य यूएस नेटवर्क की अपेक्षा अधिक वीडियो अपलोड किए गए।यू-ट्यूब का 70% ट्रैफिक यूएस के बाहर से आता है।यू-ट्यूब 39 देशों और 54 भाषाओं में स्‍थानीयकृत किया जा चुका है।सन् 2011 में, यू-ट्यूब के पास 1 ट्रिलियन से भी अधिक देखे जाने की संख्‍या या धरती के प्रत्‍येक व्‍यक्ति के लिए लगभग 140 बार देखे जाने की संख्‍या थी।

प्रति मिनट 60 घंटे के बराबर वीडियो अपलोड किए जाते हैं, या यू-ट्यूब पर प्रति सेकंड एक घंटे के वीडियो अपलोड किए जाते हैं।एक दिन में 4 बिलियन से अधिक वीडियो देखे जाते हैं.हर माह 800 मिलियन अद्वितीय प्रयोक्ता YouTube पर विज़िट करते हैं। यू-ट्यूब पर हर माह 3 बिलियन घंटे के बराबर वीडियो देखे जाते हैं।

रविवार, 29 अप्रैल 2012

अमेरिकी पूंजी ,अशोक वाजपेयी और आलोचना का अवमूल्यन



            भारत में जब से फोर्ड फाउंडेशन जैसी अमेरिकी संस्थाओं का कला,साहित्य,संस्कृति,सिक्षा आदि में पैसा आना आरंभ हुआ है उसके बाद तेजी से आलोचना और अकादमिक अवमूल्यन आरंभ हुआ है। हिन्दी आलोचना और साहित्य में अमेरिकी हस्तक्षेप कोई नयी चीज नहीं है। कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के हिन्दी में आगमन के साथ यह सिलसिला 1951-52 के आसपास से आरंभ होता है।भारत भवन में फोर्ड फाउंडेशन के सहयोग से अशोक वाजपेयी एंड कंपनी का वैभव नई बुलंदियों को प्राप्त करता है।
   कांग्रेस का और खासकर स्व.अर्जुनसिंह का अक्षम्य सांस्कृतिक अपराध यह है कि इन लोगों ने भारत के शिक्षा संस्थानों और संस्कृति केन्द्रों के द्वार अमेरिकी संस्थाओं और फाउण्डेशनों के लिए खोल दिए।आज संस्कृति और शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में अमेरिकी दानदाता संस्थाओं की पूंजी का कृषि से लेकर संस्कृति तक व्यापक नेटवर्क फैला हुआ है। खासकर कृषि विश्वविद्यालयों से लेकर स्पीकमैके जैसी संस्थाओं, अकादमिक फैलोशिप से लेकर लाइब्रेरी तक यह नेटवर्क काम कर रहा है। अमेरिकी दानदाता संस्थाओं की व्यापक भूमिका को विस्तार देने में स्वयंसेवी संस्थाओं की भी बड़ी भूमिका रही है। इन संस्थाओं में अमेरिकी दौलत का खेल कई हजार करोड़ रूपये सालाना तक फैला हुआ है।शोध संस्थानों से लेकर विश्वविद्यालयों तक इस पैसे की नेटवर्किंग काम करती रही है।
      अमेरिकी बहुराष्ट्रीय सांस्कृतिकनिगमों की दान राशि के आने के बाद से ज्ञान,विज्ञान, कृषि,साहित्य,संस्कृति आदि के क्षेत्र में अवमूल्यन की प्रक्रिया ने तेज गति पकड़ी है। संयोग की बात है कि कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के साथ जुड़ने में जयप्रकाश नारायण,अज्ञेय,रामवृक्ष बेनीपुरी,पीलू मोदी आदि की भूमिका के बारे में कभी बहस ही नहीं हुई। इसी तरह एक जमाने में भारत भवन और फोर्ड फाउंडेशन के अंन्तस्संबंधों को लेकर थोड़ी बहुत बहस भी हुई ,लेकिन इस संबंध का हिन्दी आलोचना और साहित्य पर क्या असर हो सकता है इसकी ओर कभी ध्यान ही नहीं गया। प्रगतिशील लेखकों को राजनीतिरहित लेखक ते रूप में पेश करने में अशोक वाजपेयी के जमाने में भारत भवन से छपने वाली पत्रिकाओं की बड़ी भूमिका रही है और इस काम को प्रोत्साहन देने में प्रगतिशील लेखक संघ की पूरी लेखकमंडली का सक्रिय सहयोग रहा है।नामवर सिंह जैसे बड़े आलोचक ने भी अमेरिकी पूंजी के सांस्कृतिक प्रभाव को लेकर कभी एक शब्द भी नहीं बोला। यह आश्चर्य की बात है कि वे भारतभवन के सभी कार्यक्रमों में पूरी टीम के साथ हमेशा उपलब्ध रहते थे।
    साहित्य में अमेरिकी प्रभाव का सबसे प्रभावशाली मंत्र है साहित्य और साहित्यकार को राजनीति से मुक्त करके विश्लेषित करो। साहित्य को ग्लैमर बनाओ। इवेंट बनाओ। इस परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर साक्षात्कार और पूर्वाग्रह पत्रिकाओं ने हिन्दी के तमाम प्रगतिशील लेखकों पर अमेरिकी साहित्यवादी नजरिए से मोटे-मोटे अंक निकाले और इन अंकों में लिखने वाले लेखकों में हिन्दी के जाने-माने लेखकों की बड़ी भूमिका थी और इस भूमिका को नियोजित करने में अशोक वाजपेयी का मूल्यवान योगदान रहा है।        
    यह तथ्य रेखांकित किया जाना चाहिए तकि फोर्ड फाउंडेशन ,कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम आदि संस्थाओं के फंड के जरिए और अमेरिकी लक्ष्यों के अनुरूप लेखकों-साहित्यकारों –चित्रकारों-संगीतकारों और बुद्धिजीवियों को गोलबंद करने में भारत भवन ,अशोक वाजपेयी,अज्ञेय आदि की बड़ी भूमिका रही है।
    भारत भवन ,अमेरिकी नजरिए, प्रगतिशीलता की जुगलबंदी का यह दुष्परिणाम निकला कि प्रगतिशील लेखकों का एक बड़ा धड़ा भारतभवन और उसके 'सुकार्यों' का खुशी खुशी हिस्सा बन गया।  ये 'भोले लेखक' यह भूल ही गए कि सत्ता और अमेरिकी कारपोरेट पूंजी के सहमेल से महान समीक्षा और महान साहित्य नहीं रचा जाता। इतिहास ने यह सच साबित किया है कि भारतभवन से न तो कोई साहित्य आंदोलन पैदा हुआ और न नया साहित्य ही सामने आया। बल्कि साहित्य के आयोजनों के जरिए लेखकों के वैचारिक पंख कतर दिए गए। इस काम को अशोक वाजपेयी ने बड़ी दक्षता के साथ अंजाम तक पहुँचाया।
     संक्षेप में कहें तो भारतभवन और उनके प्रकाशनों के जरिए प्रगतिशील लेखकों के राजनीतिविहीन-विचारधाराविहीन मूल्यांकन करते हुए जो विशेष अंक आए उन्होंने आलोचना के अवमूल्यन का मार्ग प्रशस्त किया। इस समूची प्रक्रिया के सूत्रधार बने अशोक वाजपेयी।इस अर्थ में आलोचना के अवमूल्यन के भी वे ही प्रमुख सूत्रधार हैं। हिन्दी आलोचना की यह त्रासदी है वह इस प्रवृत्ति को पहचानने से भागती रही है और तकरीबन सभी समर्थ आलोचक इन दिनों अशोक वाजपेयी की मित्रमंडली का हिस्सा हैं और अब वे लोग मित्र-संवाद करते हैं, आलोचना नहीं करते।अशोक वाजपेयी के नजरिए में निहित आलोचना के अवमूल्यन का ताजा नमूना है 'जनसत्ता'( 23अप्रैल 2012) में एंड्रीन रीच पर लिखी छोटी सी टिप्पणी। इस टिप्पणी में अनेक बातें हैं जो रीच के आलोचक व्यक्तित्व पर रोशनी डालती हैं। इस सामान्य सी टिप्पणी में भी अशोक वाजपेयी अपने विचारधारात्मक खेल को खेलने से बाज नहीं आए हैं। अशोक वाजपेयी ने लिखा है " रीच का मत था कि सच्ची कविता विचारधारात्मक आज्ञापालक वृत्ति से बिलकुल अलग होती है।वह अज्ञात, अपरिचित,अनचीन्हे के बोझ को सहती है। उसे मनुष्य का भविष्य याद रहता है।" रीच के समग्र नजरिए के संदर्भ में देखें तो मामला कुछ और ही है।
रीच की चर्चित किताब है ," What is Found There: Notes on Poetry and Politics" , इसमें उन्होंने लिखा है कि 'कविता पढ़ना नजारे देखना नहीं है और कविता ठंड़ेपन के साथ ग्रहण भी नहीं की जाती। कविता का अस्तित्व तब है जब वो पढ़ी जाए। कविता का अस्तित्व पाठक से है और कविता में पाठक को होना चाहिए।'
 रीच असल में लेखक और पाठक दोनों की भूमिका को देखती हैं। उनका मानना है ' तुम जरूर लिखो और पढो, क्योंकि आपकी जिंदगी इस पर निर्भर है।... लिखो इसलिए क्योंकि जीवन निर्भर है अपने विश्वासों और पढ़ने पर।  लेखन में स्नप्निल संसार की तरंगे और सामान्य जीवन की कायिक संवेदनाएं व्यक्त होती हैं। '
     रीच ने सवाल उठाया है लेखक जो लिखता है क्या उस पर विश्वास किया जाय ? क्या लेखन भाषा का दुरूपयोग है ? होसकता है लेखक की कोई अप्रत्यक्ष मंशा हो ,जिसमें वह पाठक को कारण की तरह शामिल कर रहा हो, पाठक को गलियों में भेज रहा हो और आपकी संवेदनाओं की जानी-परखी प्राथमिकताओं की क्षमता को भाषा के जरिए अस्थिर करने की कोशिश कर रहा हो ?
    रीच की कविता की विशेषता है कि वे अपने ही लिखे पाठ के साथ निरंतर संवाद करती हैं , उनकी कोई अप्रत्यक्ष मंशा नहीं होती। अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि 'एड्रीन रिच कविता के महत्त्व को अतिरंजित करने से गुरेज करती रहीं, हालांकि वे मानती थीं कि हमारे कठिन समय में कविता की अनिवार्य भूमिका है। पर वे स्पष्ट थीं कि कविता राहत देने वाला कोई मरहम, कोई भावात्मक मालिश, एक तरह की भाषिक एरोमाथेरापी नहीं होती। न ही वह कोई ब्लूप्रिंट, कोई निर्देश-संहिता, न ही बिलबोर्ड होती है। कोई सार्वभौम कविता नहीं है- कई तरह की कविता और कई काव्यशास्त्र हैं।'
   'रिच यह लक्ष्य करने से नहीं चूकी थीं कि कविता के बारे में आलोचना-विमर्श में हमारे भौतिक अस्तित्व, वर्तमान और अतीत के बारे में बहुत कम कहा जाता है। वह इन छोटी सच्चाइयों को हिसाब में नहीं लेता कि कैसे हमारे भावात्मक जीवन पर यही छोटी चीजें अपनी छाप छोड़ती हैं: हम कैसे देखते हैं हवा में धुएं का एक धब्बा, दुकान की शो-विंडो में जूतों की एक जोड़ी, अपनी कार में सोई एक स्त्री, सड़क के मोड़ पर जमा लोगों का एक समूह, कैसे हम सुनते हैं एक हेलीकॉप्टर की मंडराती आवाज, छत पर बारिश, ऊपर की मंजिल पर रेडियो से आता संगीत, कैसे हम पड़ोसी की आंखों में या कि किसी अजनबी की आंखों में ताकते हैं या उन्हें बरकाते हैं। ये सभी दबाव हमारे देखने को प्रभावित करते हैं। अच्छी कविता इन्हें हिसाब में लेती है, इन्हीं से अपनी काया गढ़ती है।रिच का मत था कि सच्ची कविता विचारात्मक आज्ञापालक वृत्ति से बिलकुल अलग होती है। वह अज्ञात, अपरिचित, अनचीन्हे के बोझ को सहती है। उसे मनुष्य का भविष्य याद रहता है।'
सवाल यह है कि कविता की विचारधारा होती है या नहीं ? अशोक वाजपेयी अच्छी तरह जानते हैं कि एंड्रीन रीच की विचारधारा क्या है और वे कविता को किस रूप में देखती हैं और किस तरह अमेरिका के प्रगतिशील साहित्य,स्त्रीवादी आंदोलन,स्त्री साहित्य आदि के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वाजपेयी की रीच की आलोचना में जो चीज गायब है वह है अन्तर्विरोध का सवाल। एंड्रीनी रीच ने इस तथ्य की ओर ध्यान खींचा है कि कुछ लेखक  आत्म-सेंसरशिप का इस्तेमाल करते हैं,इसका गहरा संबंध उनके मूल्यबोध से है। इससे उनके सौंदर्यबोध का निर्माण भी होता है। खासकर राजनीतिक कविता के संदर्भ में रीच ने लिखा है कि राजनीतिक कविता के जल्द ही नारेबाजी में तब्दील हो जाने का खतरा रहता है। फलतः वह एकायामी,सरल,दैनंदिन आंदोलनवाली हो जाती है और उसे ही हम 'प्रतिवादी साहित्य' कहते हैं। इस तरह की कविता पुंस,गौरवर्ण,हैट्रोसेक्सुअल या मध्यवर्गीय परिप्रेक्ष्य की नहीं होती बल्कि हम उसमें सार्वभौम की कुर्बानी देते हैं। सिर्फ अन्याय पर कविताएं लिखकर हम कविता का दायरा सीमित करते हैं।
      अशोक वाजपेयी जानते हैं कि रीच की कविता राजनीतिक कविता है। रीच ने लिखा है राजनीतिक कविता में अन्तर्विरोध का केन्द्रीय महत्व है। राजनीतिक कविता को अनेक लोग बुरी कविता मानते हैं। उसमें सब-वर्सिब शक्ति मानते हैं। रीच ने इस तरह की आलोचना का खंडन करते हुए लिखा है कि "बुरे लेखन" में शक्ति कैसे आ सकती है ? इस प्रसंग में एंड्रीन रीच ने "सिएटल टाइम्स "(फरवरी,1999) को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि राजनीतिक कविता पदबंध का आलोचकों के द्वारा प्रयोग होस्टाइल मनोभाव से हुआ है।वे यह मानते हैं कि प्रौपेगैण्डा के लिए काव्य- सौंदर्य की बलि चढ़ा दी गयी है। लेकिन कविता की दुनिया बहुत बड़ी होती है। कविता में सार्वभौम क्षमता होती है,वह अपने अंदर विभिन्न विमर्श समेटे होती है ,फलतः सौंदर्य और राजनीति दोनों की अभिव्यक्ति करती है। रीच के अनुसार 'कविता को कवि के दैनंदिन जीवन से अलग नहीं किया जा सकता।सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन कवि के भावों को पुष्ट करते हैं।वह उनके साथ दीर्घकालिक तौर पर बंधा और व्यस्त होता है। फलतः कवि की कविता में ऐतिहासिक निरंतरता होती है इसके कारण वह न तो ऐतिहासिक निरंतरता से ऊपर होता है और न इतिहास के बाहर होता है।'


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सोमवार, 8 नवंबर 2010

राजनीतिक सम्मोहन है ओबामा का नाच

(मुंबई में होली स्कूल के बच्चों के साथ नाचते राष्ट्रपति बराक ओबामा)
      बराक ओबामा भारत आए हैं तो उन्होंने आम लोगों में उम्मीदें जगा दी हैं। बराक ओबामा की जो चीज सबसे ज्यादा अपील कर रही है वह है उनका और उनकी पत्नी का उन्मुक्त भाव से नाचना। ये दोनों अपनी मस्ती,अनौपचारिकता और सामान्यत्व में असाधारण होने का छद्म एहसास पैदा कर रहे हैं। मैं मुम्बई के बच्चों के साथ ओबामा के कार्यक्रम की इमेजों को देख रहा था और सोच रहा था हमारे नेता ओबामा की तरह नाच क्यों नहीं पाते ? ऐसा क्या है कि गाने बजते ही ओबामा और उनकी पत्नी के पैर थिरकने लगते हैं। सोनिया-राहुल आडवाणी-मनमोहन सिंह-मायावती आदि के पैर नहीं थिरकते।  
     (बच्चों के साथ नाचती मिशेल ओबामा)
ओबामा के पैरों की थिरकन में मुझे असामान्य भाव दिखता है। वे नाचते सामान्य हैं लेकिन उसके पीछे जो भाव है वह असामान्य है। वे नाचने के लिए नहीं नाचते। वे दिल जीतने के लिए नाचते हैं। वे मनोरंजन के लिए नहीं नाचते वे राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने के लिए नाचते हैं। उसमें मुझे अफ्रीकी मनुष्य की थिरकन की लय के साथ  एक खास किस्म की ऊर्जा  और राजनीतिक सम्मोहन भी नजर आता है।
     वे नाचते हैं और संदेश भी देते हैं। सवाल उठता है ओबामा का नाच अभी तक चर्चा के केन्द्र में क्यों नहीं आया ? ओबामा की नृत्यकला से अनेक किस्म के अर्थों का संचार होता है। भारत में हमने किसी नेता को आमसभा में नाचते नहीं देखा है। उलटे वे अपने भाषणों से जनता को नचाने का काम करते हैं। ओबामा का नाचना अमेरिकी राजनीति का सामान्य फिनोमिना है। इसमें विशिष्ट है ओबामा की उन्मुक्तता और यौवन।
सवाल उठता है ओबामा और उनकी पत्नी नाचते क्यों हैं ? उनकी पत्नी जब मुंबई में स्कूली बच्चों के साथ नाच रहे थे तो बच्चे भावविभोर थे। हमारे देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति या मुख्यमंत्री तो आमलोगों से कोसों दूर रहते हैं,कमांडो के बीच में रहते हैं,अपनी अस्वाभाविक जीवनदशा में रहते हैं। 
    इसके विपरीत राष्ट्रपति ओबामा और उनकी पत्नी मिशेल ओबामा एकदम स्वाभाविक मानवीय दशा में रहते हैं। स्वाभाविक दशा का ही परिणाम है कि मिशेल ओबामा नाच रही थीं तो बराक ओबामा अपने को रोक नहीं पाए और मंच पर आकर स्वयं भी उनके साथ नाचने लगे। उनका नाचना इस बात का प्रतीक है कि वे अपनी स्वाभाविक मानवीय अनुभूतियों को बचाए हुए हैं। अमेरिका के राष्ट्रपतियों में ओबामा सबसे ज्यादा नाचते हैं।     
     इस प्रसंग में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि बराक ओबामा और उनकी पत्नी का नाचना क्या स्वाभाविक प्रतिक्रिया है या इसकी पहले से जनसंपंर्क अधिकारियों ने योजना बनायी थी ? वे दोनों नाचने में स्वाभाविक हैं लेकिन नाचते हैं योजना के अनुसार। ओबामा के नाचने पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं। लेकिन ओबामा जब महाराष्ट्रियन ‘कोली’ नृत्य पर नाच रहे थे तो वे महाराष्ट्र के मछुआरों की अस्मिता के साथ घुलने मिलने की कोशिश कर रहे थे। उनका कुछ मिनटों का नृत्य इस बात का संकेत भी था कि वे भारत की स्थानीयता में आनंद लेना चाहते हैं। उसका मन जीतना चाहते हैं। वे मुंबई में जितने भी कार्यक्रमों में गए वे सतह पर सब गैर कूटनीतिक कार्यक्रम थे , लेकिन इनमें प्रच्छन्न रूप से कूटनीतिक विचारधारा काम कर रही है। वे गैर-कूटनीतिक कार्यक्रमों के जरिए भारत में कूटनीति करने की योजना बनाकर आए हैं और वे जानते हैं कि इस तरह के कार्यक्रमों का राजनीतिक विचारधारात्मक प्रभाव बहुत ज्यादा होता है।
     राष्ट्रपति बराक ओबामा का दिल्ली में पहला कार्यक्रम गैर कूटनीतिक था,लोकल था,इसके तहत वे हुमायूँ का मकबरा देखने गए। वीडियो क्राँफ्रेंसिंग के जरिए अजमेर के गांव के किसानों के साथ उन्होंने बातचीत की, मुम्बई में सेंट जेवियर के बच्चों के साथ प्रश्नोत्तर सत्र में भाग लिया और वहां गंभीर सवालों के हल्के -फुल्के जबाब दिए।
    ओबामा जब मुंबई में नाच रहे थे तो वह दीपावली का मौका था और उस पर उन्होंने नाचकर भारत के लोगों के साथ अपनी आत्मीयता को बांटने की कोशिश की है। दीपावली के मौके पर ओबामा का दौरा जानबूझकर रखा गया है जिससे आम लोगों के आनंद में ओबामा को स्वाभाविक तौर पर हिस्सेदार बनाया जा सके।
    अमेरिका के फंडामेंटलिस्ट ईसाईयों में उनके दीपावली मनाने को लेकर तेज प्रतिक्रिया हुई है। उल्लेखनीय है कि ओबामा राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद से अमेरिका में ईसाई फंडामेंटलिस्टों से बराबर दूरी बनाए हुए हैं और ज्यादातर ऐसे काम कर रहे हैं जो फंडामेंटलिस्टों को पसंद नहीं हैं। इसका खामियाजा उन्हें हाल के चुनावों में भुगतना पड़ा है। अमेरिकी समाज में ईसाई तत्ववादी रिपब्लिकन पार्टी का बुनियादी आधार हैं,वे एक ही साथ सैन्य उद्योग के पैरोकार भी हैं। फलतःसैन्य उद्योग और ईसाई फंडामेंटलिज्म का अमेरिका में गहरा याराना है।
     ओबामा ने अपने चुनाव जीतने के बाद सचेत रूप से वे सारे काम किए हैं जो ईसाई फंडामेंटलिस्टों को स्वीकार्य नहीं हैं। वे चुनाव हारकर भी अपने बहुसांस्कृतिकतावादी परिप्रेक्ष्य से हटने को तैयार नहीं है । उन्होंने दीपावली के पर्व पर भारत यात्रा रखी जिससे वे अपनी बहुसांस्कृतिक और बहुलतावादी राजनीतिक इमेज को बल पहुँचा सकें। उल्लेखनीय है सांस्कृतिक बहुलतावाद ओबामा का राजनीतिक आधार है। वे भारत में दीपावली मनाकर,हुमायूँ के मकबरे पर जाकर इस आधार को पुख्ता बनाने की कोशिश कर रहे हैं।  
    बराक ओबामा और मिशेल ओबामा का नाचना एक स्वतःस्पूर्त्त फैसला नहीं था बल्कि यह सुचिंतित राजनीतिक फैसला था। वे नाच यहां रहे थे और सुदूर अमेरिका में अपनी बहुलतावादी राजनीतिक विचारधारा को खाद-पानी दे रहे थे। इसी परिप्रेक्ष्य में हमें उनका हुमायूँ का मकबरा देखना का फैसला समझ में आ सकता है। उनके द्वारा की गई पाकिस्तान और इस्लाम की प्रशंसा समझ सही ढ़ंग से समझ में आ सकती है।
    हमारे देश में कारपोरेट मीडिया का एक हिस्सा निरंतर दबाब पैदा कर रहा है कि ओबामा पाक की हिमायत क्यों कर रहे हैं ? उसकी तीखी आलोचना क्यों नहीं करते ? ओबामा के नाचने पर ‘इंडिपेंडेंट‘ अखबार ने लिखा है  ''It was greeted with wild applause by his delighted hosts, who are celebrating Diwali, the Hindu festival of light. One of the exotically attired children told reporters his moves were "graceful, nice, and beautiful." But to others, particularly in the right-wing US circles where the President's every move is now subject to ridicule and outrage, the spectacle was like a red rag to a bull. Critics carped about the alleged disloyalty of a US leader celebrating Diwali, and compared his cheerful demeanour to that of the Roman Emperor Nero."
   
               (पूर्व राष्ट्रपति बुश)
अमेरिका के इतिहास में ओबामा पहले राष्ट्रपति नहीं हैं जो नाच रहे हैं उनके पहले कई राष्ट्रपति अपने नाच का जलवा दिखा चुके हैं,मसलन रोनाल्ड रीगन को नाचने में कभी संकोच नहीं हुआ। सन् 1984 में वे मार्ग्रेट थैचर के साथ नाचे थे, रिचर्ड निक्सन अपनी बेटी की शादी के मौके पर जून 1971 में नाचे थे।ओबामा के पहले वाले राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश कई बार सार्वजनिक तौर पर नाच चुके हैं और उनका विश्वप्रसिद्ध नाच 2008 में हुआ जब वे लाईबेरिया के बदनाम राष्ट्रपति जॉनसन सेरलेफ के साथ अपनी सूट की जैकेट उतारकर नाचे थे।
    (पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन)
कहने का तात्पर्य यह है कि ओबामा का नाचना सिर्फ नाचना नहीं है बल्कि कूटनीति का हिस्सा है। नाच सिर्फ नाच नहीं है, उसकी विचारधारा भी होती है। उसके पीछे राजनीतिक मंशा भी होती है। मंशा है दिलों पर शासन करने की।  
    अपने देश और भारत की बहुसांस्कृतिक जनता के दिलों पर अमेरिकी वर्चस्व स्थापित करना उनके नाच का मुख्य उद्देश्य है। वे नाच नहीं रहे हैं ,वे दिलों पर शासन करने की कोशिश रहे हैं। नाचकर वे दिलों पर चढ़ाई कर रहे हैं।
    जिस आनंद और उल्लास के साथ वे नाच रहे हैं और जिस शानदार ढ़ंग से उनका कवरेज आ रहा है उसमें वे विजयी नजर आ रहे हैं। यह विजेता नायक का नाच है। काश हमारे यहां भी कोई ऐसा विजेता होता !






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