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रविवार, 11 सितंबर 2016

भाषा सीखना और भाषा जीना एक-दूसरे से भिन्न है

           महादेवी वर्मा पर लिखते समय हमेशा यह संकट रहता है कहां से लिखूँ।उनके विभिन्न किस्म के विचार उद्वेलित करते हैं।इधर फेसबुक-ब्लॉगिंग-मोबाइल आदि ने हम सबके संप्रेषण का मूलाधार बदल दिया है।नए दौर की समस्याएं अनेक मायनों में नई हैं।मसलन्,लेखन को ही लें,हम इन दिनों इतना लिख रहे हैं,इतना पहले कभी नहीं लिखते थे।हर व्यक्ति के लेखन की क्षमता में,भाषायी कम्युनिकेशन में कई गुना इजाफा हुआ है। इस तरह का लेखन या कम्युनिकेशन पहले कभी नहीं देखा गया,मोबाइल से लेकर फेसबुक तक भाषा का इतना व्यापक और बड़ी मात्रा में प्रयोग मनुष्य ने पहले कभी नहीं किया।

सवाल उठता है इतनी बड़ी मात्रा में भाषायी कम्युनिकेशन अंततःहमें अलगाव में क्यों रखे हुए है ॽ ऐसी भाषा क्यों लिख रहे हैं जिसमें प्राण नहीं होते ॽ संवेदनात्मकता नहीं होती ॽ कहा गया था हम संप्रेषण करेंगे तो संवेदनशीलता बढ़ेगी ,लेकिन यथार्थ में उलटा नजर आ रहा है।दावा था संवेदनशीलता के आधिक्य का लेकिन घटित एकदम उलटा हो रहा है।

संभवतः महादेवी वर्मा पहली हिन्दी लेखिका हैं जिन्होंने पूंजीवादी समाज में सबसे पहले इस आने वाले संकट को पहचाना था और रेखांकित किया कि हमारी त्रासदी का कारण है संवेदनशीलता का अभाव और भाषा से संवेदनशीलता का गायब हो जाना।



हम ऐसी भाषा बोल,लिख,सुन रहे हैं जिसमें शब्द हैं,लेकिन प्राण नहीं हैं,संवेदनाएं नहीं हैं।हमने भाषा के सवालों पर विचार करते समय तेरी भाषा,मेरी भाषा,हिन्दी भाषा,राष्ट्रीय भाषा ,जातीय भाषा आदि पर विचार किया लेकिन भाषा के दार्शनिक और संवेदनात्मक आधार से जुड़े सवालों को तिलांजलि दे दी।भाषा को प्रयोजनमूलक बना दिया।हिन्दी को प्रयोजनमूलक हिन्दी बना दिया।इससे भाषा के प्रति हमारे गंभीर सरोकारों और विमर्श का अंत हो गया। महादेवी ने लिखा है ´भाषा सीखना और भाषा जीना एक-दूसरे से भिन्न हैं तो आश्चर्य की बात नहीं।प्रत्येक भाषा अपने ज्ञान और भाव की समृद्धि के कारण ग्रहण योग्य है,परन्तु अपनी समग्र बौद्धिक और रागात्मक सत्ता के साथ जीना अपनी सांस्कृतिक भाषा के संदर्भ में ही सत्य है।´

रविवार, 24 अप्रैल 2016

सोशलमीडिया और साहित्य

      इन दिनों अकादमिक जगत का एक वर्ग सोशलमीडिया से क्षुब्ध है।खासकर हिन्दी के प्रोफेसर और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग में सोशलमीडिया को लेकर हेयभाव है।वे इसमें लिखने-पढ़ने को थर्डग्रेड किस्म का काम समझते हैं।यदि सोशलमीडिया पर कोई मेरा जैसा प्रोफेसर सक्रिय है तो उसे एकदम अ-गंभीर और गैर-जिम्मेदार समझते हैं।मेरी फेसबुक वॉल पर आए दिन इस तरह के क्षुब्ध लोग लिखते रहते हैं कि सब समय तो फेसबुक पर रहते हो फिर पढ़ाने कब जाते हो ॽ सच्चाई यह है मैं कक्षा में कभी अनुपस्थित नहीं रहा।कभी कोर्स अधूरा नहीं छोड़ा।बल्कि हिन्दी के जितने भी प्रोफेसर हैं उनमें अब तक सबसे ज्यादा किताबें लिखी हैं।किताबों के पाठक भी हैं।कभी किताब लिखना नहीं छोड़ा।कभी किसी की चमचागिरी नहीं की,किताबें लिखने के लिए किसी से अनुदान नहीं लिया,यहां तक कि यूजीसी और अपने विश्वविद्यालय से भी कोई अनुदान नहीं लिया। इस तरह के लोग यह भी मानते हैं कि हल्के-फुल्के लेखन,फोटो लगाने,दैनंदिन गप्पबाजी करने आदि के लिए सोशलमीडिया ठीक है लेकिन कोई गंभीर साहित्यिक कार्य सोशलमीडिया के जरिए नहीं कर सकते।हम विनम्रता के साथ इस तरह का नजरिया रखने वालों से असहमत हैं।ये वे लोग हैं जो सोशलमीडिया के चरित्र से अंजान हैं या फिर जानबूझकर सोशलमीडिया विरोधी अभियान में लगे हैं।

सोशलमीडिया वस्तुतः भाषा का विस्तार है। यह भाषा का विकसित रूप है।भाषा मूलतः अभिव्यक्ति की तकनीक है। भाषा में दो तरह की अभिव्यक्ति नजर आती है।पहली अभिव्यक्ति वह है जो दैनंदिन जीवन से जुड़ी है।जिसका हम क्षणिक उपयोग करते हैं और वह उपयोग करते ही खत्म हो जाती है। दैनंदिन जीवन की क्षुद्र बातों और क्षुद्र कर्मों की सीमा में भाषा का एक रूप खत्म हो जाता है।लेकिन भाषा का एक रूप वह भी है जो वनस्पति की तरह है।जिस तरह वनस्पति की उम्र लंबी होती है,ठीक उसी तरह भाषा में रचे गए साहित्य की भी उम्र लंबी होती है।जिस तरह वनस्पति में शाखा-प्रशाखाएं होती हैं,उसी तरह साहित्य में भी विभिन्न किस्म की विधाएं होती हैं,विभिन्न माध्यमों की साहित्यिक विधाएं होती हैं।भाषा में हम तथ्य या सूचनाएं भी देते हैं उसी तरह मनोभावों को भी व्यक्त करते हैं।जिस तरह गालियां देते हैं उसी तरह कविता,कहानी आदि भी लिखते हैं।भाषा में गुस्सा,प्रेम,घृणा आदि को भी यथास्थान व्यक्त करते हैं।इसमें ध्वनि और भंगिमाएं भी होती हैं।सभ्यता के विकासक्रम में भाषा के इस रूप से हम बहुत आगे चले आए हैं।भाषा के रूपों के विकास में हमेशा ´मैं´केन्द्र में रहा है। माध्यमों में भी अभिव्यक्ति के विभिन्न विधा रूपों में ´मैं´केन्द्र में है।इसी तरह भाषा में दैनंदिन जीवन ही केन्द्र में नहीं है अपितु ज्ञान भी है।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे संचार के तकनीकी रूप वस्तुतः भाषा का विस्तार हैं।

सोशलमीडिया में लिखे को साहित्य कहें या न कहें यह सवाल बहस के केन्द्र लाने की जरूरत है। इससे साहित्य के मौजूदा स्वरूप और दायरे का विकास होगा।इस प्रसंग में मुझे रवीन्द्रनाथ टैगोर की साहित्य संबंधी परिभाषा याद पड़ रही है। टैगोर के अनुसार साहित्य का सहज अर्थ है ´नैकट्य अर्थात् सम्मिलन´।भाषा के क्षेत्र में साहित्य का काम है ´हृदय का योग कराना´।टैगोर ने लिखा है, ´मनुष्य को तरह-तरह के उद्देश्यों के लिए मिलना पड़ता है,इसके अलावा मनुष्य को मिलना पड़ता है केवल मिलने के लिए,अर्थात् साहित्य के उद्देश्य से।´नए मीडिया रूप,खासकर सोशलमीडिया की विशेषता है मिलाना। सम्मिलन की इच्छा को नए किस्म के संचार ने प्रमुख बनाया है।जिससे आप मिलना चाहते हैं उससे अब नए मीडियम के जरिए मिलते हैं।ये मीडियम हैं मोबाइल,इंटरनेट,सोशलमीडिया आदि।अब यह आपके ऊपर है कि संचार के दौरान क्या करना चाहते हैं।यह संचार व्यक्ति का व्यक्ति से भी हो सकता है और व्यक्ति का समाज से भी हो सकता है।यह दैनंदिन जीवन से जुड़ा भी हो सकता है और कलात्मक-साहित्यिक भी हो सकता है।यह मन की इच्छाओं पर निर्भर करता है।मनुष्य के पास दो तरह की इच्छाएं हैं,पहला ,सामान्य इच्छा और दूसरा है अद्भुत इच्छा।सामान्य इच्छा को हम दैनंदिन जीवन की भाषा में अभिव्यक्त करते हैं,जबकि अद्भुत इच्छा हमारे साहित्य सृजन का मूलाधार है।अद्भुत इच्छा के कारण ही मनुष्य अपने को संसार में प्रसारित करता है।साहित्य उसी का विराट रूप है।

जब भी कोई नया मीडियम समाज में जन्म लेता है पुराने मीडियम के प्रयोगकर्ता परेशानी महसूस करते हैं। उल्लेखनीय है मानव समाज ने भाषायी और कलात्मक अभिव्यक्ति के जितने भी रूप अब तक पैदा किए वे सभी आज तक बरकरार हैं और कला या साहित्य परंपरा के अंग भी हैं।इनमें वाचिक परंपरा के रूपों से लेकर भित्तिचित्र,भित्तिलेखन तक,विधाओं जैसे कविता से लेकर निजी चिट्ठी-पत्री तक शामिल है,पोथी से लेकर किताब तक,पत्र-पत्रिकाओं से लेकर सिनेमातक,रेडियो कम्युनिकेशन से लेकर इंटरनेट तक,सोशलमीडिया से लेकर ईमेल तक सब कुछ शामिल है।



साहित्य की परिधि वहां तक है जहां तक भाषा का आकाश फैला हुआ है।दिलचस्प बात यह है कि कम्प्यूटर में कोई काम भाषा के बिना संभव नहीं है।हर चीज पहले भाषा में लिखी जाती है,यहां तक कि रेडियो,टीवी,फिल्म आदि भी भाषा में लिखे जाते हैं,उसके बाद वे हम तक पहुँचते हैं।सभी किस्म के संचार का मुख्य द्वार है भाषा।इसी तरह भाषा का प्रयोग मनुष्य के बिना संभव नहीं है।इसी अर्थ में भाषा मानवीय कार्य-व्यापार की अभिव्यक्ति का मूलाधार है।यह भी कह सकते हैं मनुष्य के बिना भाषा नहीं,भाषा के बिना मनुष्य नहीं।उसी तरह मीडियम के बिना भाषा नहीं होती।भाषा जब रस की सृष्टि करती है तो मनुष्य में मिलने की इच्छा पैदा होती है।उससे मिलन की इच्छा करती है जो सभी कालों के सभी जनों में स्वीकृति पाए।भाषा में जब रस पैदा होता है तो उसे हम अनुभूति कहते हैं और इसी अनुभूति को मनुष्य विभिन्न माध्यमों के जरिए व्यक्त करने को आतुर हो उठता है।भाषा के विभिन्न माध्यमों में जो रूप हम देखते हैं वे मुनष्य ने तब बनाने आरंभ किए जब उसने नैपुण्य की सृष्टि की। नैपुण्य के कारण ही भाषा को अर्थ मिला।इन्द्रियबोध को विभिन्न उपादानों के जरिए व्यक्त करने की संभावनाएं पैदा हुईं।

शनिवार, 14 जून 2014

आँसू क्यों निकलते हैं ?


      कुछ लोगों के लिए आँसू नाटक हैं तो कुछ लोगों के लिए परम सत्य हैं। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि आंसू पीड़ा की अभिव्यक्ति हैं। असल में आंसू बहुअर्थी होते हैं। वे अन्य चीजों के साथ स्नायविक कमजोरी की अभिव्यक्ति होते हैं। जो लोग स्नायविक तौर पर मजबूत होते हैं वे जल्दी नहीं रोते लेकिन जो स्नायविक दुर्बलता के लक्षणों से ग्रस्त होते हैं उनके जल्द ही किसी भी बात पर आंसू निकल पड़ते हैं। आम धारणा है पुरुष कम आंसू बहाते हैं लेकिन जो स्नायविक दुर्बलता के शिकार हैं वे खूब रोते हैं। लेकिन जिस औरत में स्नायविक नियंत्रण की क्षमता होती है उसका अपने आंसुओं पर भी नियंत्रण होता है। औरत जब आंसुओं से प्रतिवाद नहीं कर पाती तब वह असंगत हिंसा और उन्माद का सहारा लेती है।

औरत या मर्द के आंसू नकली हैं या असली हैं। यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आंसुओं का सागर सदियों से बहता चला आ रहा है,इस सागर में आत्मगतता कम हुई है या बढ़ी है ? औरत पहले की तुलना में आज ज्यादा आंसू बहाती है या पहले ज्यादा बहाती थी ? क्या आंसू सर्जनात्मक क्षमता का अपव्यय हैं ? आंसू जब निकलते हैं तो वे शीतलता देते हैं या और ज्यादा अशांत कर देते हैं ? आंसू औरत को विनम्र बनाते हैं या उग्र बनाते हैं ? आंसू उसके भावों को सीधे सम्प्रेषित करते हैं या उसके विषाद को गहरा बनाते हैं ? आंसुओं में डूब जाने के बाद औरत शिथिल हो जाती है लेकिन कुछसमय बाद फिर से ऊर्जस्वित होकर सहजभाव से सक्रिय हो उठती है। यह भी सोचें कि आंसू उसके सामाजिक अलगाव को कम करते हैं या बढ़ाते हैं ?

आंसुओं पर दयाभाव से नहीं वस्तुगत मानवीय भाव से विवेकवादी नजरिए से सोचना चाहिए। आंसुओं की खूबी है कि वे विवेक को धुंधला बनाते हैं। आत्मगत अनुभूतियों को सघन बनाते हैं। आंसुओं पर अविश्वास नहीं करना चाहिए और नहीं उनको नकारात्मक नजरिए से देखना चाहिए। बल्कि रेशनल या विवेकवादी नजरिए से देखना चाहिए।

कोई व्यक्ति जब विवेकवादी नजरिए से बोल नहीं पाता या सोच नहीं पाता तो आंसू निकलते हैं। आंसू गम ,खुशी,आनंद,अवसाद सबमें निकल पड़ते हैं, वे रोकने पर भी नहीं रुकते। मुश्किल यह भी है कि हमने आंसुओं को दुख का पर्याय़ बना दिया है।अमूमन आंसुओं का दुख से कम संबंध होता है।अधिकतर मामलों में अभिव्यक्ति की असमर्थता के कारण आंसू निकल पड़ते हैं। मैं निजी तौर पर यह परिस्थिति अनेकबार झेल चुका हूँ। आंसू कोई औरत की खास विशेषता नहीं है। वे पुरुषों के भी निकलते हैं और खूब निकलते हैं।

आंसुओं का नैतिकता,पाप-पुण्य आदि से कोई संबंध नहीं है। आंसू असल में मानवीय अभिव्यक्ति का एक आदिम प्रकार है। मनुष्य जिस तरह अपनी अभिव्यक्ति के लिए भाषा का इस्तेमाल करता है, भाव-भंगिमाओं का इस्तेमाल करता है। वैसे ही वह आंसुओं का भी इस्तेमाल करता है। आंसू वस्तुतः अभिव्यक्ति का एक रुप है। इसका लिंगविशेष से कोई संबंध नहीं है। यह प्राणीमात्र की विशेषता है। मैंने पशुओं को भी आंसू बहाते देखा है।



कहने का तात्पर्य यह है कि आंसू को स्त्री से जोड़कर नहीं देखना चाहिए यह तो सभी प्राणियों की अभिव्यक्ति का एक रुप है। आंसू के पीछे कौन सा भाव काम कर रहा है यह संदर्भ पर निर्भर करता है। अतः आंसुओं का अर्थ आंसू बहाने वाले के जीवन के बाहर सामाजिक संदर्भ पर निर्भर करता है। आंसू बाह्य सामाजिक आचरण या अन्य के आचरण के प्रति मानवीय भाव की अभिव्यक्ति है। इसी अर्थ में आंसू में निजी नहीं सामाजिक सत्य की भूमिका होती है, अन्य के सत्य की भूमिका होती है। आंसुओं में प्राणी की मनोदशा की द्वयर्थकता छिपी रहती है। अन्तर्विरोध छिपे रहते हैं। आंसू मन का ठंडा नमकीन पानी नहीं है बल्कि वह मानसिक द्वंद्व की अभिव्यंजना हैं।

बुधवार, 16 मार्च 2011

भाषा, इतिहास और वर्गसंघर्ष- समापन किश्त- डेविड मेक्नेलि


भाषा और मुक्ति
भाषा के संबंध में कुछ मार्क्सवादी विवेचनाओं से होकर किए गए इस संक्षिप्त भ्रमण से हम क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं? सबसे पहले, हमने देखा कि मार्क्सवाद जीवन के अनुभवों की एकता पर बल देता है। चेतना के समान ही भाषा भी मानव अस्तित्व का कोई अलग तथा विलगित क्षेत्र नहीं; बल्कि यह उस अस्तित्व की अभिव्यक्ति का एक आयाम है। अत: इसका प्रसार द्वंद्वों, तनावों तथा वास्तविक जीवन के अंतर्विरोधों द्वारा होता है। नव आदर्शवाद इन सब चीजों को नहीं देखता। बाख्तिन के शब्दों में, आदर्शवाद भाषा को 'विचारधारात्मक रूप से संतृप्त, अंतर्विराधग्रस्त, तनावपूर्ण समझने के बजाए इसे अमूर्त व्याकरण की श्रेणियां' समझकर भाषा, जीवन, इतिहास तथा समाज के बीच के संबंधों के बारे में हमारी समझ को कमजोर करता है। नव आदर्शवाद विचारधारा, द्वंद्व, अंतर्विरोध तथा प्रतिरोध को समझने का दावा कर सकता है लेकिन न केवल भाषा को अमूर्त रूप देकर तथा बल्कि वास्तव में स्वयं समाज को एक भाषिक-तंत्र में परिवर्तित करके यह एक अर्थ में पुराने आदर्शवाद से एक कदम आगे निकल गया है।
बाख्तिन का तर्क है कि शब्द 'एक कथोपकथन की दृष्टि से उत्तेजित तथा अजनबी शब्दों, मूल्य निर्णयों तथा स्वराघातों के तनावग्रस्त वातावरण में प्रवेश करता है; जटिल अंतर्संबंधों को बुनता तथा उससे बाहर निकलता है, कुछ के साथ मिलता और अन्यों के साथ मिलने से झिझकता है...' शब्द और कथन कभी तटस्थ नहीं होते। वे हमेशा तनावों, संघर्षों, द्वंद्वों से पूर्ण संदर्भों में अवस्थित होते हैं। 'एक अमूर्त व्याकरणीय तंत्र' के रूप में भाषा एकांगी और अध्ययन का एक बंद विषय माना जा सकता है। लेकिन ऐसा करना इसे 'इतिहास निर्माण की अबाधित प्रक्रिया, जो कि सभी जीवित भाषा का लक्षण है, से अलग रखकर समझना होगा'।
अत: भाषा सामाजिक और ऐतिहासिक है। इसके अर्थ केवल अन्यों के साथ हमारे संबंध में मौजूद होते हैं; और ये अन्य ठोस संरचित सामाजिक संबंधों में उपस्थित होते हैं। ये सामाजिक संबंध स्वयं गतिशील होते हैं; इनमें वर्चस्व और प्रतिरोध संबंधी संघर्ष तथा शक्ति और सत्ता के बदलते संतुलन शामिल होते हैं। इसलिए अर्थ भी ऐतिहासिक हैं; वे 'इतिहास निर्माण' की प्रक्रिया में अंतर्निष्ठ होते हैं, जिसमें संबंध स्थायी नहीं होते और जिसमें अतीत और वर्तमान भविष्य की ओर हमारे पूर्वाभिमुखीकरण में अंतर्गुथित होते हैं।
मेरे लिए भाषा व्याकरणपरक संबंधों और अर्थों की एकल संरचना प्रस्तुत नहीं करता। इसके विपरीत इसमें मेरी भागीदारी विषय वस्तुओं, स्वराघातों और अर्थों, जो हमेशा प्रतिस्पध्र्दारत रहते हैं तथा कभी भी बंद नहीं होते, के एक सामाजिक और ऐतिहासिक क्षेत्र में मेरी तल्लीनता की मांग करती है। जो शब्द मैं चुनता हूं, जो कथन मैं संप्रेषित करता हूं, वह क्षेत्र विशेष में मेरी अवस्थिति दरशाता है। अपने अनुभवों, विचारों और आकांक्षाओं को व्यक्तकरने का मेरे पास हमेशा वैकल्पिक रूप होता है। जब बख्तिन लिखते हैं कि 'चेतना स्वयं ही अनिवार्यत: एक भाषा को चुनने की आवश्यकता को महसूस करती है,' तो उनका यही अभिप्राय होता है।12
मैं मेजर लीग बेसबॉल खिलाड़ियों द्वारा हड़ताल के संबंध में समाचारपत्र के हाल की एक खबर का उदाहरण लेता हूं। एक खेल संवाददाता लिखता है, 'स्थानापन्न खिलाड़ियों, जिन्हें आप यदि शिष्टोक्ति का इस्तेमाल नहीं करना पसंद करते तो गद्दार या हड़तालभंजक कह सकते हैं, ने अपने पहले स्प्रिंग ट्रेनिंग का लड़खड़ाता हुआ अभ्यास आरंभ कर दिया है।' संवाददाता यहां पाठकों को विकल्प दे रहा है। उसने जो हमें विकल्प दिए हैं वे हैं : स्थानापन्न खिलाड़ी, गद्दार, हड़तालभंजक। स्पष्ट है कि जो विकल्प हम चुनते हैं वह तटस्थ नहीं है, वह सामाजिक तथा राजनीतिक दृष्टि से आवेशित है। और मार्क्सवादी परंपरा, जिसकी हम चर्चा कर रहे हैं, में यह सभी कथनों, सभी सामान्य बोली (सजीव भाषा) के लिए लागू होता है।
इतना ही नहीं भाषा हमें उन अर्थों के निर्माण के लिए संसाधन प्रदान करती है जो भविष्य की ओर अग्रसर होते हैं। ये उन संभावनाओं की ओर इशारा करते हैं जो वर्तमान में हमारे अनुभव से परे होती है। और कई संसाधन जो भाषा हमें उपलब्ध कराती है, अतीत के उन अर्थों से व्युत्पन्न होते हैं जो हमारे लिए समाप्त हुए नहीं रहते, बल्कि वे हमारी भाषा में, हमारी संस्कृति में, हमारे अनुभव में जीवित रहते हैं। चूंकि भाषा के समान ही मनुष्य भी 'ऐतिहासिक संभवन' (हिस्टोरिकल बिकमिंग) की स्थिति में रहता है। इसीलिए भाषा हमें भविष्य की ओर उन्मुख रहते हुए अतीत में जाने में सक्षम बनाती है। अतीत के अनुभव लाभ-हानि, जय-पराजय, खुशी-गम, वर्तमान की परिस्थिति के बारे में कुछ कह सकते हैं; वे प्रेरणा, सबक तथा वर्तमान के लिए उम्मीद की किरण दे सकते हैं। भविष्य में पहुंचने के क्रम में हम अतीत में वापस आ सकते हैं, और ऐसा करने में भाषा हमारी मदद करती है। क्योंकि भाषा व्यक्तिगत तथा ऐतिहासिक स्मरण की वस्तु है। यह मुझे न केवल वर्षों के स्थायी आत्म-अनुभव को संजोने में सक्षम बनाती है बल्कि भविष्य में अपने आपको अवस्थित करने में, ऐतिहासिक स्मरण का उपयोग करने में सहायता करती है। मैं 'तुसेंट एल ओवर्चर' तथा दास सेना जिसने औपनिवेशिक शक्तियों के खिलाफ संघर्ष किया, 1871 के पारीसियन कम्युनाड्र्स, 1917 के सेंट पीटर्सबर्ग सोवियत आफ वर्कर्स डिपुटिज, 1937 के फ्लिंट डाऊन स्ट्राइकर्स, 1956 के हंगरी के आंदोलनकारियों, 1968 के फ्रांसीसी छात्र और मजदूर आंदोलनों...का स्मरण करने में सक्षम हूं।
अत: ऐतिहासिक भौतिकवाद की दृष्टि से भाषा के अंत:क्षेत्र में होने का अर्थ है इतिहास में या 'ऐतिहासिक संभवन' में निरूपित होना। वैकल्पिक संभावनाओं की समाप्ति के बजाए ऐतिहासिक जीव के रूप में हमारे अस्तित्व का अर्थ है कि हम अतीत का स्मरण करने तथा एक ऐसे भविष्य की कल्पना करने में सक्षम हैं जो वर्तमान से भिन्न है। भाषा महज प्रभुत्वशाली विचारों की धरोहर नहीं; यह एक आयाम भी है जिसमें वर्चस्व केखिलाफ संघर्षों  को संजोया और स्मरण किया जा सकता है; जिसमें प्रतिरोध की संकल्पना की जा सकती है और इसे संगठित किया जा सकता है।
भाषा को इस रूप में देखने का अर्थ है कि कोई इसे मुक्ति के सार्थक विचार के रूप में सिध्दांत बना सकता है, हालांकि नव आदर्शवादी ऐसा नहीं करते। इसका मतलब है कि परिस्थितियां कितनी भी खराब क्यों न हो, मुक्ति हमेशा संभव है। क्योंकि हमारी व्यावहारिक गतिविधि और हमारी भाषा उन विषयवस्तुओं, स्वराघातों, आकांक्षाओं का वहन करती है जो लोगों के बीच विभिन्न संबंधों को तथा जो कार्य वे करते हैं, उन्हें व्यक्त करती हैं। जब तक पदसोपान, वर्चस्व, शोषण आदि हैं तब तक प्रतिरोध और विध्वंस की क्रियाएं होती रहेंगी तथा ये अपने निशान भाषा में छोड़ती रहेंगी। भाषा कोई बंदीगृह नहीं, बल्कि यह एक संघर्षस्थल है। वास्तव में संघर्ष होते हैं और अंतत: बहुत वास्तविक भौतिक संरचनाओं जैसे कार्यस्थलों, बंदीगृहों, सेनाओं आदि के क्षेत्र में सैध्दांतिक रूप में इन्हें सुलझाया जाता है। लेकिन संघर्ष का स्थल कोई भी हो, भाषा वहां एक आयाम के रूप में मौजूद होगी, जिसमें सामाजिक अनुभव को जीया जाता है। और जो लोग दमन और शोषण से मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वे अकसर भाषा में ही एक बेहतर विश्व के लिए अपने संघर्ष को अभिव्यक्त करने, स्पष्ट करने तथा संगठित करने के लिए शब्द, अर्थ और थीम्स पाएंगे।

भाषा, इतिहास और वर्गसंघर्ष- 2- डेविड मेक्नेलि


शोषण और प्रतिरोध की संस्कृति
कुछ लोगों द्वारा वोलोशिनोव की बहुस्वराघातीय संकेत की अवधारणा की गलत विवेचना की गई है। उनके अनुसार इसका आशय यह है कि अर्थ इतने अस्थिर होते हैं कि वे पूर्ण रूपेण यादृच्छिक और अनंत रूप से बहुलीकरण योग्य होते हैं। इस तरह की व्याख्या जीवन की स्थितियों के निर्माण और पुनर्निर्माण के दरम्यान लोगों के बीच हुए संबंधों के संकुल से भाषा और बोली के एक आदर्शवादी पृथक्करण की ओर प्रवृत्त होती है। इस तरह की व्याख्या की कमियों की ओर मैं पहले ही इशारा कर चुका हूं। मसलन, इस बात को समझने में इसकी विफलता कि अनाधिकारिक या वैकल्पिक विमर्श वास्तविक सामाजिक संबंधों, विशेषकर उत्पादन से संबंधित संबंधों से उत्पन्न होते हैं। इस संबंध
में वोलोशिनोव के विचार के पक्ष में सशक्त रूप से तर्क देने के लिए हम सामाजिक इतिहास में काफी महत्वपूर्ण सामग्री पा सकते हैं। क्योंकि बहुत सारे प्रमुख ऐतिहासिक अध्ययनों ने दरशाया है कि विरोधात्मक विमर्शों की उत्पत्ति विशेष रूप से शोषक वर्ग तथा इसके प्रतिनिधियों द्वारा अतिरिक्त उत्पादों के छीने जाने के विरुध्द विरोध की क्रियाओं से होती है।
लोककथाओं, गीतों, कर्मकांडों, कहावतों और इसी प्रकार की कलाओं में निहित प्रतिरोध के बिंबों की सबसे रोचक बात वह रूप होती है जिससे वे शोषण के अनुभवों को उलटा करती हैं। आखिर शोषण के केंद्र में ही यह अहसास होता है कि उसे लूटा गया है। उस संबंध को उलटा करना यानी लुटेरे को लूटना, वह चाहे किसी का मालिक हो, लॉर्ड हो या बॉस हो, यही लोक संस्कृति की स्थायी विषयवस्तु है।
दक्षिणी संयुक्त राज्य के कृषिदासों द्वारा सृजित चालबाजी की कथाओं के बारे में यहनिश्चित रूप से सच है। एक इतिहासकार कहता है, 'चालबाजों का सबसे बड़ा सुख अपने शक्तिशाली शत्रुओं से चुराए हुए भोजन को खाना था'।8 ये कहानियां, जिनमें मालिकों और दासों के स्थान पर पशुओं को पात्र के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, बार-बार कही जाती थीं। इसका उद्देश्य अवज्ञा की संस्कृति को वैध बनाना था, जिसमें अपने मालिक से कुछ चोरी करने को न केवल माफ किया जाता था वरन इसकी प्रशंसा भी की जाती थी। इसके अलावा ये कहानियां महज कपोल कल्पनाएं नहीं थीं। ये चोरी के वास्तविक कार्यों के अंग थीं, जिसे दास समुदाय बचाकर रखना चाहते थे।
अठारहवीं सदी के आरंभ में इंगलैंड में भी विस्थापित किसानों, निर्धन झोपड़ीवासियों तथा ग्रामीण मजदूर किसानों में इस प्रकार की परिघटनाएं देखी जाती हैं। जैसा कि ई.पी. थामसन ने अपनी रोचक पुस्तकों 'व्हिग्स एंड हंटर्स' तथा 'कस्टस्म इन कामन' में लोगों को विभिन्न उल्लंघनकारी कार्यों में लिप्त दरशाया जैसे जानवरों का चोरी-चोरी शिकार (हिरण, खरगोश, मछली तथा हाल में कब्जे में ली गई सार्वजनिक भूमियों से अन्य चीजाें की चोरी)। इसका उद्देश्य संपत्ति की नई परिभाषाओं तथा उनके पारंपरिक अधिकारों पर लगाए गए प्रतिबंधों को चुनौती देना था। एक समृध्द लोक संस्कृति द्वारा इन उल्लंघनों का समर्थन किया जाता था जो धनी लोगों के कार्यों को अवैध करार देती थी और कानून की सुस्पष्ट अवमानना को प्रोत्साहित करती थी। इस लोक संस्कृति की अपनी भाषा, अपने अलंकार तथा अपने संकेत होते थे तथा इसने दीवारनोटिसों, गीतों, धमकी भरे पत्रों आदि के रूप में एक दस्तावेजी रिकार्ड छोड़े हैं।
थामसन को ध्यान में रखते हुए हम यह भी नोट कर सकते हैं कि प्रतिरोध तथा वर्ग अभिव्यक्ति के रूपों की प्रकृति केवल आर्थिक नहीं है, न ही वे उत्पादन के क्षेत्र में संघर्षों तक सीमित हैं। थामसन ने अपनी पुस्तक 'दे मेकिंग ऑफ दि इंग्लिश वर्किंग क्लास' (1963) में आरंभ में ही वर्ग को एक गतिशील जीवंत अनुभव के रूप में दरशाना चाहा है, जो अपना ताना-बाना सामाजिक जीवन के तंतुओं से बुनता है। वर्ग अनुभव अपने आपको भाषा और साहित्य में व्यक्त करता है : काम पर, मयखाने में और घर में; गीतों और यौन संबंधों में; संघटन के बाहरी रूपों में तथा गुप्त कर्मकांडों में यह व्यक्त होता है। जब थामसन हमें वर्ग रूपों में लोगों को संघर्ष करते दरशाते हैं तो वह हमें उन स्थलों पर ले जाते हैं जहां कार्य, लिंग संबंध, लैंगिकता तथा प्रतिरोध की विविध रीतियां एक दूसरे
को काटती हैं। इन्हें दरकिनार करने के बजाए जीए हुए अनुभव के रूप में वर्ग संघर्ष की धारणा में यह अपेक्षा होती है कि हम ज्ञात करें कि कैसे कार्य, शोषण और शोषण का प्रतिरोध सामाजिक जीवन के अन्य आयामों को निर्धारित करते हैं। ठीक उसी प्रकार प्रकारांतर से सामाजिक जीवन के अन्य आयाम उन्हें कैसे निर्धारित करते हैं। फिर भी चूंकि हम उत्पादनकारी जीव हैं; जिस प्रकार से हम अपने आपको बनाते हैं और हम बनाए जाते हैं, उसमें कार्य की केंद्रीय भूमिका है, अत: कार्य पर केंद्रित सामाजिक संबंधों तथा संघर्षों का हमारे जीवन में निर्णायक रूप से उपस्थित होना लाजिमी है। और वर्ग समाज में इनसबसे गुजरना, लूटे जाने का तथा इस लूट को उलटा करने का या इसके विध्वंस का प्रयास करने का अनुभव है।
हालांकि इन आचरणों की संरचना कृषिदासों या अठारहवीं सदी के श्रमिकों के आचरणों की संरचना से भिन्न है। फिर भी हम आधुनिक फैक्टरी मजदूरों के मामले में भी यही पाते हैं। मैं यहां दो उदाहरण लेता हूं : पहला हंगरी से जो 1970 के दशक का है तथा दूसरा फ्लिंट, मिशिगन से जो इसके कुछ वर्षों बाद का है। अपनी पुस्तक 'ए वर्कर इन ए वर्कर्स स्टेट' में हंगरी के फैक्टरी जीवन का वर्णन करते हुए मिक्लोस हारास्टाय हमें 'हमारी' और 'उनकी' दुनिया में ले जाते हैं; एक ऐसी दुनिया जहां स्वयं अपने लिए किए गए कार्य पर दिया गया समय ही प्रतिरोध का अंतिम स्वरूप है। यह प्रतिरोध मजदूर की अपनी ही जुबान में यों है :
वे, उनको, उनका (दे, देम, देयर्स) : मुझे नहीं लगता कि जिसने किसी फैक्टरी में काम किया हो या मजदूरों के साथ अपेक्षाकृत सतही बातचीत भी की हो उसे इन शब्दों के अर्थ के बारे में कोई संदेह हो सकता है। 'देम' का अर्थ वही है यानी प्रबंधन; जो आदेश देता है और निर्णय करता है, वे लोग तथा उनके एजेंट्स जो प्रभारी हैं, जो हमारे दृष्टि क्षेत्र से गुजरकर भी हमारी पहुंच से बाहर है। (पृ. 71)
हारास्टाय कहते हैं, ये मजदूर उजरती काम करते हैं। अपना कोटा पूरा करते समय ये उन वस्तुओं के उत्पादन का समय निकाल लेते हैं जो उनके अपने उपयोग के लिए होते हैं तथा जिन्हें वे प्लांट से चोरी से बाहर निकाल लेते हैं और घर ले जाते हैं। इन मुफ्त के स्वतंत्र कामों के लिए उन्होंने एक शब्द का इजाद किया है, जिसे वे 'निशुल्क गृह-उत्पाद (होमर्स)' कहते हैं। यही उनके कार्य दिवस में सबसे अधिक खुशी का पल लगता है। 'यह साधारण छोटा सा 'होमर' ही स्वतंत्र तथा सृजनात्मक कार्य का एक मात्र संभव रूप है, जिसका निर्माण गुप्त रूप से और काफी त्याग के साथ किया जाता है। इसका कोई दूरगामी उद्देश्य नहीं होता।' (पृ. 142) 'होमर्स के निर्माण के द्वारा हम मशीन पर अपनी विजय तथा मशीन से अपनी आजादी हासिल करते हैं।' (पृ. 143) हालांकि 'होमर्स' का निर्माण अधिकांशत: व्यक्तिगत होता है लेकिन इसके लिए एक सहयोग संस्कृति की आवश्यकता होती है। मसलन किसी निश्चित प्रकार की 'कटिंग और शेपिंग' साथी मजदूरों द्वारा अपने मशीन पर किया जा सकता है। साथ ही, होमर्स को चोरी से प्लांट के बाहर भेजने में भी अन्य साथियों को शामिल करना आवश्यक होता है। 'होमर्स का निर्माण सहयोग, स्वैच्छिक सहयोग की मांग करता है।' सचमुच 'अधिकांश दोस्ती संयुक्त 'होमर' के निर्माण से ही आरंभ होती है।' (पृ. 143-144)
सहयोग, मित्रता, एकजुटता, स्वतंत्र सृजनात्मक कार्य : ये सारी चीजें होमर्स के निर्माण में शामिल होती हैं। यह विरोध का कोई विरलित विमर्श नहीं; होमर्स के निर्माण में प्रतिरोध की क्रियाएं शामिल होती हैं। 'होमर्स' विरोधात्मक मूल्यों तथा अभिवृत्तियों काभौतिक निरूपण है। यह सामाजिक सहयोग और उत्पादन पर मजदूरों के नियंत्रण की दृष्टि प्रस्तुत करता है। जैसा कि हारास्टाय ने कहा है, 'होमर्स सभी विरोध आंदोलनों के लिए माडल है।' (पृ. 143)
अंतिम दृष्टांत समूह 'बेन हैम्पर' की अद्भुत पुस्तक 'राइवेटहेड' से है। फ्लिंट में 'जी एम्स ट्रक' तथा 'बस प्लांट' में 'एसेंबली लाइन' के मजदूरों के अनुभवों को लिपिबध्द करते हुए हैम्पर भी दरशाते हैं कि समय संबंधी संघर्षों की अहम भूमिका है। 'जी एम' को दिए गए समय की अनुभूति जीवन से छीने गए समय के समान होती है। हैम्पर जिन विध्वंसात्मक क्रियाओं की चर्चा करते हैं उनमें से एक है 'डबलिंग अप', जिसमें दो मजदूर अपना कार्य करने तथा अपने साथी मजदूर की आधी शिफ्ट का कार्य करने के लिए आपस में करार करते हैं। बाकी समय का इस्तेमाल सोने, पढ़ने-लिखने या यहां तक कि अपनी पसंद का काम करने के लिए प्लांट से चुपके से भाग लेने के लिए किया जा सकता है। हैम्पर का यह स्पष्ट मानना है कि कंपनी जितना समय मजदूरों से लूटती है, उसमें से कुछ समय 'वापस चुरा लेने' की क्षमता में वह तथा उसके साथी मजदूर गौरवान्वित अनुभव करते हैं।
'रिवेट लाइन' में भेज दिए जाने के बाद उन्होंने किस प्रकार एक नए साथी मजदूर के साथ 'डबलिंग-अप' (दोहराने की क्रिया)  कार्य-सहयोग पुन: स्थापित किया, इसकी चर्चा करते हुए हैम्पर लिखते हैं :
एक बार फिर सब कुछ 1978 जैसा ही था। चार घंटे का काम, आठ घंटे का वेतन। एक बार फिर वही उल्लास था। यह जानकर कि आपका काम सक्षम हाथों द्वारा किया जा रहा है और आप मार्क्स लाऊंज में स्क्रीन पर नजरें गड़ाए हैं क्याेंकि लाओ व्हीटेकर ने ठीक ऊपरी डेक में हैंगिंग कर्व को उड़ा दिया है। इस तरह की चीजें शारीरिक श्रम से अधिक सार्थक लगती थीं।
वह आगे कहते हैं, 'इन सबसे अधिक मैंने प्रबंधन से जुड़े उन तमाम लोगों को बेवकूफ बनाने के विचार को पसंद किया जिनके नाखून साफ-सुथरे थे लेकिन  बोनस बड़े गंदे।' (पृ. 191)
हैम्पर भी प्रतिरोध की एक समृध्द संस्कृति दरशाते हैं। वह आदर्श का निर्माण नहीं करते। विभाजन और पिछड़ापन उनकी व्याख्या में मौजूद हैं। लेकिन साथ ही सहयोग भी है। सहयोग समय को मात देने के लिए, सत्तावादी फोरमैन या पर्यवेक्षक को पराजित करने के लिए, अपनी सामान्य मानवता के एक छोटे से हिस्से को वापस लेने के लिए चाहे यह महज एसेंबली लाइन पर जीवन की एकरसता में हास्य का पुट डालकर ही क्यों न हो।
जिन उदाहरणों को मैंने चुना है वे प्रतिरोध के एक निश्चित तर्क की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। इनकी संख्या कई गुनी हो सकती है। ये उदाहरण उत्पादनकर्ता मजदूरों को शोषण के अनुभव को पलटने का प्रयास करते, उनके श्रम के उत्पादों को उनसे छीनने वालों सेकुछ अपने लिए चुराने की कोशिश करते हुए दरशाते हैं। ये उनकी स्वतंत्रता, स्वयं उनके जीवन की गतिविधि तथा प्रतीकात्मक रूप से एक ऐसी भाषा का अन्वेषण करते दरशाते हैं जो उनके विध्वंसक प्रयासों को व्यक्त करती है तथा उन्हें कार्यान्वित करती है। इस प्रकार प्रतिरोध के विमर्श किसी भी सूरत में यादृच्छिक या स्वेच्छाचारी नहीं हैं। कई सर्वाधिक शक्तिशाली तथा स्थायी विमर्श श्रम तथा शोषण की संरचनाओं के विरुध्द प्रतिक्रियाए हैं जो प्राय: अत्यधिक सृजनात्मक होती हैं। जैसे, यहां विरचनावादियों द्वारा 'प्ले' (नाटक) शब्द का उपयोग पसंद किया जाता है। फिर, बिडंवना, हास्य-व्यंग्य, महोत्सव विपर्यय जैसे पद हैं। लेकिन संघर्ष जैसे पद भी है; अति गंभीर संघर्ष, जो जीविका के लिए है, जीवन के लिए है। और स्वतंत्रता के लिए है।
भाषा और वर्चस्व पर ग्राम्शी के विचार
फिर भी, यदि दमित वर्ग आधिकारिक विमर्शों के आधिपत्य के पूरी तरह अधीन नहीं हैं, यदि वह अपने शासकों के विरुध्द प्रतिरोध के विमर्शों और समृध्द परंपराओं का सृजन करते हैं, तो उनके निरंतर दमन और शोषण की व्याख्या हम किस रूप में कर सकते हैं? यहां इतालवी क्रांतिकारी अंतोनियो ग्राम्शी के भाषा तथा वर्चस्व संबंधी विचार काफी सहायक सिध्द हो सकते हैं।
ग्राम्शी एक ऐसे परिप्रेक्ष्य का विकास करना चाहते थे जो प्रचलित विचारों; शासक वर्ग के विचारों को स्वीकार करता हो और उस सीमा तक विकास करना चाहते थे जहां ऐसा वर्चस्व कभी भी पूर्ण नहीं होता बल्कि 'वर्चस्व-विरोधी' विचारों तथा अभिवृत्तियों के साथ एक असहज संबंध में हमेशा उपस्थित रहता है। ये विचार और अभिवृत्तियां प्रबल मूल्यों और विचारों के विरुध्द खड़ी होती हैं।
बौध्दिक संभ्रांतवर्गवाद की अवज्ञा में ग्राम्शी यह तर्क देते हैं कि 'मनुष्य दार्शनिक होते हैं।'11 ऐसा इसलिए है क्योंकि हर व्यक्ति भाषा, जिसमें नियमित धारणाओं तथा विचारों की समग्रता शामिल होती है, के उपयोग द्वारा समाज की तथा जिस दुनिया में वह रहतारहती है, उसकी अवधारणाा का इस्तेमाल करता है। अधिकांश समय इस तरह की विश्वदृष्टि की सिलसिलेवार विवेचना इसके मूल सिध्दांतों के अनुसार नहीं की जाती है। लेकिन बोली के जरिए हम अवधारणाओं की एक ऐसी दुनिया में होते हैं जो चीजों की कुछ व्यापक दृष्टि की पूर्वकल्पना करती है।
लेकिन ऐसी विश्वदृष्टियों में शायद ही कोई तालमेल होता है; इनमें विचारों का अंतर्विरोधी सम्मिश्रण होता है। इस प्रकार अधिकांश मेहनतकश वर्ग ने प्रबल विचारधारा से निकले विभिन्न विचारों और अभिवृत्तियों को अपनाया है। साथ ही, उनके दैनिक जीवन की गतिविधि में ये विचार और अभिवृत्तियां शामिल होती हैं। जैसा कि हमने देखा है, ये उन आचरणों में भी शामिल होती हैं जो प्रबल विश्वदृष्टि के कम से कम कुछ पहलुओं काखंडन करते हैं। अत: मजदूर वर्ग के किसी सदस्य के बारे में विचार करते समय प्राय: ऐसा देखा जाता है कि उसकी सैध्दांतिक चेतना दरअसल ऐतिहासिक दृष्टि से उसकी गतिविधि के विरुध्द हो सकती है। कोई यह कह सकता है कि उसकी दो सैध्दांतिक चेतनाएं (या एक अंतर्विरोधी चेतना) है : एक जो उसकी गतिविधि में निहित है तथा वास्तव में उसे वास्तविक दुनिया के व्यावहारिक रूपांतरण में अपने सभी साथी मजूदरों के साथ जोड़ती है; और दूसरी वह जो सतही तौर पर बाह्य या मौखिक है, जिसे उसने अपने अतीत से प्राप्त किया है तथा बिना किसी मीनमेख के आत्मसात किया है। 
(पृ. 333)
मजदूर वर्ग की चेतना की अंतर्विरोधी प्रकृति अत्यधिक गतिशील परिघटना है। सबसे पहले तो, मजदूर वर्ग में कोई सदृश चेतना नहीं होती। मजदूरों के एक ही समूह में कुछ मजदूर मालिकों, पर्यवेक्षकों, राष्ट्राध्यक्षों आदि के विचारों को करीब-करीब पूर्णरूपेण स्वीकार करना चाहेंगे जबकि दूसरे मजदूर इनके विचारों का लगभग पूरी तरह विरोध करेंगे। इन दो वैचारिक खेमों के बीच अधिकांश मजदूर होंगे। लेकिन उनकी चेतना निश्चित नहीं होगी। बड़े आयोजन जैसे, व्यापक हड़ताल और प्रदर्शन, यूनियन के प्रयास आदि तथा विरोधपरक विचारों के संगठित प्रचार-प्रसार महत्वपूर्ण उग्र आंदोलन खड़ा करने में मदद कर सकते हैं; जबकि पराजय, गतिरोध तथा विरोधात्मक विमर्शों में कमी का काफी गहरा रूढ़िकारी प्रभाव हो सकता है।
लेकिन एक दिए हुए समय में वस्तुस्थिति चाहे जो भी हो, ग्राम्शी का स्पष्ट मानना है कि मजदूर वर्ग की चेतना की अंतर्विरोधी प्रकृति को समाप्त नहीं किया जा सकता। पूंजीवादी समाज का यह अंतर्निष्ठ लक्षण है कि शासक वर्ग अपने शासन के लिए विचारधारात्मक स्वीकृति प्राप्त करने का प्रयास करता है; (और इस प्रकार के प्रयास प्राय: काफी हद तक सफल भी हो जाते हैं) और मजदूरों के जीवन के अनुभव तथा शोषण और दमन के खिलाफ उनके प्रतिरोध उन आचरणों को जन्म देते हैं जो उस समय प्रभावशाली विचारों के साथ फिट नहीं बैठते। यह दरअसल एक अंतर्निष्ठ विश्वदृष्टि की अपेक्षा करता है जो इन प्रबल विचारों को चुनौती देता हो। सचमुच ग्राम्शी के अनुसार किसी क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी का एक महत्वपूर्ण कार्य एक ऐसी विश्वदृष्टि उत्पन्न करना है तथा सुव्यवस्थित करना है जो प्रतिरोध के इन आचरणों में अंतर्निहित हो। यह दृष्टिकोण ग्राम्शी को क्रांतिकारी राजनीति के प्रश्न को उन विरोधाभासों के रूप में समझने में सक्षम बनाता है जो समाज के दमित सदस्यों के अनुभव, गतिविधि तथा भाषा में व्याप्त हैं।
वह कहते हैं कि क्रांतिकारी राजनीति का आरंभ मेहनतकश वर्ग की सामान्य बुध्दि से होता है। इस सामान्य बुध्दि में वे सभी विरोधात्मक अभिवृत्तियां होती हैं जो काफी हद तक अंतर्निष्ठ होती हैं। और चूंकि समाजवाद, जैसा कि मार्क्स जोर देते थे, मजदूर वर्ग कीआत्ममुक्ति है, अत: क्रांतिकारी विचार मजदूर वर्ग के आंदोलन में अंत:क्षेपित कोई अन्यदेशिक विमर्श नहीं हो सकता। इसके विपरीत मजदूर वर्ग तथा क्रांतिकारी विचारों के बीच का संबंध सावयविक होना चाहिए। यह दरशाना मार्क्सवादियों का काम है कि समाजवाद मजदूर वर्ग के प्रतिरोध के आचरणों का तर्कसंगत तथा निरंतर विकास है। अत: क्रांतिकारी पार्टी के लिए मजदूर वर्ग के आंदोलन का जीवंत हिस्सा होना आवश्यक है। इसे उनके अनुभवों को बांटना और उनकी भाषा बोलना जरूरी है। साथ ही, इसके लिए वह शक्ति भी बनना आवश्यक है जो विरोध के अनुभवों को अधिकाधिक सुव्यवस्थित प्रोग्राम का सामान्य रूप दे सके; एक ऐसी शक्ति जो मजदूरों द्वारा विरासत के रूप में ढोए जा रहे पारंपरिक तथा प्रबल प्रत्ययों (देशभक्ति, लिंगवाद, नस्लवाद आदि) को यह दरशाकर चुनौती दे सके कि ये शोषण और दमन के प्रतिरोध में अंतर्निष्ठ हितों और आकांक्षाओं का कैसे खंडन करते हैं। ग्राम्शी अपने कुछ आदर्शवादी विवेचनाओं, जो हाल के बरसों में चर्चा में रही हैं, के विपरीत इस बात पर बल देते हैं कि इतना व्यापक वर्चस्व-विरोधी आंदोलन केवल सांस्कृतिक धरातल पर या किसी विचारधारात्मक विरोध की बौध्दिक प्रक्रिया के रूप में खड़ा नहीं होता। उनका तर्क है कि वर्चस्व-विरोधी आंदोलन राजनीतिक संघर्ष के माध्यम से खड़े होते हैं; उन आंदोलनों में खड़े होते हैं जिनमें आर्थिक प्रतिरोध तथा विचारधारात्मक लड़ाई दोनों साथ-साथ चलती हैं। दूसरे शब्दों में दमित व्यक्तियों के लिए 'आलोचनात्मक आत्म-अर्थग्रहण राजनीतिक 'वर्चस्वों' की लड़ाई के माध्यम से होता है।' (पृ. 333) वह इस बात पर बल देते हैं कि 'राजनीतिक पार्टियां' वर्चस्व-विरोधी विश्वदृष्टियों की 'ऐतिहासिक प्रयोगशाला' के रूप में कार्य करती हैं; वे इस तरह की 'घड़िया' (क्रूसिबल) हैं जिसमें सिध्दांत और आचरण का एकीकरण होता है जिसे वास्तविक ऐतिहासिक प्रक्रिया समझा जाता है। (पृ. 335)
ग्राम्शी की भाषा, वर्चस्व और राजनीतिक संघर्ष संबंधी विवेचना हमें वोलोशिनोव की बोली संबंधी विधाओं की अवधारणा को व्यावहारिक राजनीति के धरातल पर स्पष्ट रूप से समझने में मदद करती है। वोलोशिनोव की धारणा यह है कि शोषित वर्गों के सदस्य प्रभुत्वशाली बोली विधाओं में (अपनी अधीनस्थ स्थिति के अनुसार) तथा अपेक्षाकृत समतावादी विधाओं में भाग लेते हैं, जो उनके (अपने बराबर के) अन्य साथियों के साथ विभिन्न संबंधों, विभिन्न मूल्यों, विभिन्न आचरणों की व्याख्या करती हैं। ग्राम्शी की अंतर्विरोधी चेतना वोलोशिनोव की इस धारणा के केवल स्थान-परिवर्तन का एक तरीका है। ग्राम्शी यह सुझाव देते हैं कि क्रांतिकारी समाजवादी राजनीति के लिए इन विरोधी आचरणों को एकजुट करना महत्वपूर्ण है जो कि ठोस मुद्दों के इर्द-गिर्द वास्तविक संघर्षों तथा उन जनवादी विधाओं में अंतर्निष्ठ विश्वदृष्टि को व्यापक बनाने और सुव्यवस्थित करने का प्रश्न है, जिनमें एकजुटता, सहयोग तथा समतावाद शामिल है।(क्रमशः)





मंगलवार, 15 मार्च 2011

भाषा, इतिहास और वर्गसंघर्ष- 1- डेविड मेक्नेलि


भाषा और नव आदर्शवाद
भाषा विचार की तत्काल परिणति है। जिस प्रकार दार्शनिकों ने विचार को एक स्वतंत्र अस्तित्व दिया, भाषा को भी एक स्वतंत्र वजूद देना उनकी मजबूरी हो गई।
मार्क्स और एंगेल्स, 'दि जर्मन आइडियोलॉजी'
आज हम एक ऐसे नव आदर्शवाद का सामना कर रहे हैं जो वाम बुध्दिजीवियों के एक बड़े वर्ग को प्रभावित कर रहा है। जिसने भाषा को न केवल एक स्वतंत्र क्षेत्र में परिवर्तित कर दिया है वरन इसे सर्वव्यापी क्षेत्र भी बना दिया है। इतना अधिक सर्वव्यापी, इतना प्रभावशाली मानो इसने मानव एजेंसी को ही लगभग अस्तित्वहीन कर दिया हो। आप कह सकते हैं, सब कुछ विमर्श है और विमर्श ही सब कुछ है; क्योंकि मनुष्य एक भाषिक जीव है; वह जिस दुनिया में कार्य करता है उसे भाषा के माध्यम से जानता है और परिभाषित करता है। कथित रूप से निष्कर्ष यह हुआ कि भाषा के दायरे से बाहर कुछ भी नहीं। जो हम जानते हैं, जो कल्पना करते हैं, जो कर सकते हैं, इन सबको हमारी भाषा 'विमर्श' या पाठ परिभाषित तथा सीमित करते हैं; शब्दावली बदलती है संप्रेषण नहीं।
यहां एक राजनीतिक सिध्दांत भी है। ऐसा कहा जाता है कि दमन अंतत: उस रूप में बध्दमूल है जिसमें हम तथा दूसरे भाषिक दृष्टि से परिभाषित होते हैं; जिस रूप में हम शब्दों द्वारा अन्य शब्दों या कोड, जिसे 'भाषा के साथ संरचित' कहा जाता है, के सापेक्ष अवस्थित होते हैं। हमारा अस्तित्व, हमारी स्थायी अस्मिता और 'आत्मपरकता' भाषा के माध्यम से निर्मित होती हैं। जैसा कि एक नवाचारी साहित्यिक सिध्दांतवादी, 'डेविड लाज' के उपन्यास 'नाइस वर्क' में कहता है, आप केवल वही नहीं जो आप बोलते हैं; नहीं, बल्कि नव आदर्शवाद के अनुसार, 'आप वह हैं जो आपको बोलता है।' इस प्रकार भाषा ही अंतिम 'बंदीगृह' है। वहां हमारी कैद विरोध से परे है। जो हमारा निर्माण करती है उससे बच निकल पाना असंभव है।
यह नव आदर्शवाद राजनीतिक क्षितिजों के व्यापक विघटन से मेल खाता है। यह वामपंथियों के पश्चगमन की अवधि का छद्म आमूलपरिवर्तनवाद है। बिना कार्रवाई केशब्दों का मौखिक आमूलपरिवर्तनवाद, या यों कहें शब्द ही कार्रवाई है। दमन और शोषण की वास्तविक संरचनाओं तथा आचरणों के प्रत्युत्तर में यह केवल आलंकारिक भाव, या मुहावरों का व्यंग्यपूर्ण रूप प्रस्तुत करता है। इसीलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं होता जब नव आदर्शवाद के प्रमुख विचारक, जाक देरीदा कहते हैं 'उन्हें मुक्ति जैसे शब्दों का उपयोग करने में झिझक होगी।'1 भाषा के भीतर कैद हम शब्दों से खेल तो सकते हैं लेकिन स्वयं भाषा में बध्दमूल दमन की अपरिवर्तनीय संरचनाओं से अपने आपको मुक्त नहीं करा सकते।
नव आदर्शवाद तथा जिस तरह की राजनीति की यह मांग करता है, वे महज हानिरहित उत्सुकताएं नहीं हैं। वे राजनीतिक दायित्व का परित्याग हैं, विशेष रूप से ऐसे समय में जब उग्र पूंजीवादी पुनर्संरचना हो रही हो; जब अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही हो, जब सामाजिक प्रोग्रामों के विरुध्द शासक वर्ग की कार्रवाइयां बढ़ रही हों। वे विरोध तथा प्रतिरोध के जन आंदोलनों के पुनर्गठन में भी बाधक हैं। बहरहाल इस लेख का उद्देश्य भाषा संबंधी आदर्शवाद की एक और समालोचना प्रस्तुत करना नहीं है। इसे आप चाहे उत्तरसंरचनावाद, उत्तरआधुनिकतावाद या उत्तरमार्क्सवाद का नाम दें। बल्कि मैं बहस को दूसरी जमीन की ओर मुड़ना चाहूंगा, जहां मेरा ध्येय यह दरशाना होगा कि मार्क्सवाद इन बौध्दिक धाराओं की आलोचना करने से कहीं अधिक सार्थक कुछ कर सकता है। मैं यह दरशाना चाहूंगा कि मार्क्सवाद के पास भाषा के विवरण तथा मानवीय आचरण, जो कि इन आदर्शवादी विचारों से अधिक समृध्द और अधिक व्यापक है, के समूह के बीच इसके स्थान के बारे में वर्णन के लिए पर्याप्त संसाधन है। यह विवरण भाषा को अन्य बातों के साथ-साथ सामाजिक अन्योन्यक्रिया के एक स्थल के रूप में समझ सकता है जो कि कार्य तथा संघर्ष के संबंधों यानी वर्ग संघर्ष द्वारा निर्धारित होता है।
सामाजिक श्रम और 'वास्तविक जीवन की भाषा'
मार्क्स और एंगेल्स ने किसी भाषा के सिध्दांत का विकास नहीं किया। फिर भी उन्होंने जो कुछ भी थोड़ा-बहुत कहा खासकर ऐसे समय में इस विषय पर प्रकाश डालता है जब ऐतिहासिक भौतिकवाद के कुछ मूलभूत सिध्दांतों के संबंध में व्यापक भ्रम है।
सबसे पहले हमारे लिए यह स्मरण करना उपयोगी होगा कि 'दि जर्मन आइडियोलाजी' जैसी आरंभिक अवधारणा मानव जीवन में चेतना की भूमिका से इनकार नहीं करती। बल्कि भौतिकवादी अवधारणा, श्रमिक, सामाजिक उत्पादन तथा संपूर्ण मानवीय व्यावहारिक गतिविधियों से चेतना, विचार और वैचारिक क्षेत्र को अलग करने का विरोध करती है। आदर्शवाद विचार और भाषा को गंभीरता से लेता है। इसके लिए मार्क्स और एंगेल्स इसकी आलोचना नहीं करते, बल्कि इन्हें 'स्वतंत्र अस्तित्व' देने की वकालत करते हैं, जैसा कि इस लेख का आरंभिक उध्दरण दरशाता है। वे इस बात पर बल देते हैं कि मनुष्य अपनेजीवन की स्थितियों की समग्रता के निर्माण के एक भाग के रूप में विचारों को जन्म देता है। अत: विचारों तथा अवधारणाओं का निर्माण भौतिक गतिविधि तथा लोगों के बीच होने वाले भौतिक लेन-देन से प्रत्यक्षत: अंतर्ग्रथित है। उनका सुझाव है कि दरअसल यही 'वास्तविक जीवन की भाषा' है।
मानव जीवन को परिभाषित करने वाला एक गुण है सामाजिक श्रम। हम इसी के माध्यम से अलग-अलग व्यक्तियों के अंत:संबध्द उत्पादन संबंधी कार्यों को संगठित करते हैं ताकि हम भौतिक रूप से पुन: उत्पादन कर सकें। जिस प्रकार चेतना मानव कार्य की पूर्वशर्त है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के बीच संप्रेषण यानी विचारों के आदान-प्रदान की क्षमता आवश्यक है ताकि सामाजिक श्रम के बीच समन्वय स्थापित किया जा सके। और भाषा ही इस प्रकार के संप्रेषण का माध्यम है। यह मानव चेतना का मूल तत्व है। मनुष्य विलक्षण सामाजिक प्राणी है और भाषा उस विशिष्ट मानवीय चेतना का एक रूप है। यानी 'भाषा उतनी ही पुरानी है, जितनी चेतना; यह व्यावहारिक, वास्तविक चेतना है जो अन्य मनुष्यों के लिए भी होती है।'2 हालांकि यह विवरण अपूर्ण प्रतीत हो सकता है, लेकिन वैसी किसी भी धारणा के लिए अपरिहार्य है जो व्यावहारिक मानवीय क्रियाकलाप को समग्रता से अलग किए बिना भाषा को गंभीरता से लेना चाहती है। फिर भी मार्क्स और एंगेल्स भाषा को समझने के लिए एक चौखाने (फ्रेमवर्क) से ज्यादा कुछ भी उपलब्ध नहीं कराते। सौभाग्यवश मार्क्सवादी परंपरा के बाद के लेखकों ने इस विश्लेषण का विकास और विस्तार करने का प्रयास किया है। इससे भाषा का भौतिकवादी सिध्दांत और भी समृध्द
हुआ है।
संकेत, बोली और वर्ग संघर्ष
इन प्रयासों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य वी.एन. वोलोशिनोव की पथप्रदर्शक पुस्तक 'मार्क्सिज्म एंड दि फिलोसाफी ऑफ लैंग्वेज' (1929) है। वोलोशिनोव ने अपनी पुस्तक उस दरम्यान लिखी थी जब 1917 की अक्तूबर की क्रांति के परिणामस्वरूप साहित्य, कला, भाषा और संस्कृति के बारे में जोरदार बहस हो रही थी। स्तालिन की तानाशाही के बढ़ने के साथ ही वह बहस बंद हो गई। वोलोशिनोव स्वयं भी 1930 के दशक के दौरान किए गए शुध्दीकरण में विलुप्त हो गए। हालांकि हाल के बरसों में वोलोशिनोव तथा मिखाइल बख्तिन, एक ऐसे साहित्यकार जिन्होंने वोलोशिनोव की लेखनी को प्रभावित किया, के लेखों को पुनर्जागरण जैसा महत्व मिला है।3
वोलोशिनोव के भाषा संबंधी विचारों के लिए तीन आरंभिक प्रस्थापनाएं आवश्यक हैं। पहली, शब्दों से लेकर ट्रैफिक संकेतों तक सभी संकेत भौतिक हैं। वे किसी न किसी भौतिक रूप में अभिव्यक्त किए जाते हैं। दूसरी, संकेतों की प्रकृति सामाजिक होती है। वे व्यक्तियों के बीच परिसीमाओं पर स्थित होते हैं और उनके बीच संप्रेषणात्मक अन्योन्यक्रियाके बाहर इनका कोई अर्थ नहीं होता। तीसरी, चूंकि संकेत सामाजिक होते हैं इसलिए भाषा संबंधी कोई भी विशद दृष्टिकोण बोली पर केंद्रित होना चाहिए; उस माध्यम पर केंद्रित होनी चाहिए जिससे अधिकांश भाषाई अन्योन्यक्रियाएं होती हैं। बोली के बाहर भाषा निर्जीव है, यह स्वयं संप्रेषण क्रिया के बिना संप्रेषण के साधनों का संग्रह है यानी साररहित रूप। अत: भाषा का जीवन; इसकी गतिशीलता बोली में, लोगों की शाब्दिक अन्योन्यक्रिया में होती है।
लेकिन सामाजिक अन्योन्यक्रिया महज तर्कमूलक नहीं होती। बोली ऐसा क्षेत्र नहीं जिसका 'स्वतंत्र अस्तित्व' हो। यह सामाजिक संबंधों के बहुरूपीय अंतर्संबंधों का एक पहलू है। यानी संकेत उन संबंधों में निहित होते हैं जो विभिन्न मनुष्यों के बीच होते हैं। विशेष रूप से व्यक्तियों के बीच पदसोपानी संबंधों का भाषा और बोली पर गहरा प्रभाव होता है। वोलोशिनोव लिखते हैं, 'संकेतों के रूप सबसे अधिक इसमें भाग लेने वालों के सामाजिक संघटन द्वारा निर्धारित होते हैं।' (पृ. 21) अत: बोली का अनुकूलन पदसोपान तथा वर्चस्व द्वारा और इनके प्रतिरोध द्वारा होता है। विभिन्न समूह शब्दों का स्वराघात उन रूपों में करने का प्रयास करते हैं जो उनकी सामाजिक अन्योन्यक्रिया तथा सामाजिक आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करते हों। यह विशेष रूप से उन लोगों के साथ लागू होता है जिनमें स्पष्ट रूप से अलग वर्ग संबंध हों। लेकिन यह केवल उनके साथ ही लागू होता है, ऐसा भी नहीं है। परिणामस्वरूप, 'संकेत वर्ग संघर्ष का एक क्षेत्र बन जाता है।'
(पृ. 23)
यहां इस बात पर बल दिया जाना चाहिए कि यह तर्क उत्तर-संरचनावादी विवेचना से काफी अलग है जो कि कुछ मामलों में समान दिख सकता है। उदाहरण के लिए मिशेल के अनुसार भाषा शक्ति और वर्चस्व का क्षेत्र है जो विशेष रूप से अस्पतालों, अनाथालयों और बंदीगृहों जैसे सामाजिक संस्थाओं में निरूपित होती है। और विशेष रूप से अपने बाद के लेखनों में ंफूको वर्चस्व के आचरणों के विरुध्द प्रतिरोध की संभावना व्यक्त करते प्रतीत होते हैं। ंफूको का शक्ति पर जोर देना उन थ्योरीज की राजनीतिक शून्यता का विरोध करने का प्रयास था जो सामाजिक संबंधों को भाषा-विषयक रूपों में सीमित कर देती हैं। देरीदा को दिए एक जोरदार जवाब में उन्होंने विरचनावादियों पर यह आरोप लगाया कि वे सब कुछ पाठों में ढूंढ़ते हैं 'ताकि तर्कमूलक प्रयोग वापस उन परिवर्तन के क्षेत्रों में नहीं लाए जा सकें जहां ये किए जाते हैं।'4 उनका यह विचार काफी सशक्त है। फिर भी, पाठ के अंत:क्षेत्र को अस्वीकार करते समय ंफूको स्वयं इससे बाहर निकलने में विफल रहते हैं कि विमर्श खुद ही एक बंद क्षेत्र है। वास्तव में उनकी 'सत्ता-ज्ञान' (पावर-नॉलेज) की पूरी अवधारणा इस विचार को दरशाना चाहती है कि शक्ति संबंध मनुष्यों के 'जानने' के आचरणों के माध्यम से तथा इन आचरणों में बनते हैं। और लोगों के वर्गीकरण, मापन तथा सर्वेक्षण के ये प्रयोग विमर्श के उस क्षेत्र से उत्पन्न होते हैं जहां लोगों के विचार तथा वर्णन भिन्न-भिन्न श्रेणी के होते हैं। इसका निष्कर्ष यह निकलता है कि 'मानवता का विकासअधिनिरूपणों की एक शृंखला है।' अत: सामाजिक संस्थाओं तथा उनके वर्चस्व के आचरणों में अपनी तमाम अंतर्दृष्टियों के बावजूद ंफूको तर्कमूलक नियमनवाद के अपने पाठ की ओर लौट आते हैं; वह अपने विचार के तर्क से इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि 'कोई भी व्यक्ति अनिवार्यत: विमर्श के आयाम के भीतर ही रहता है।'5
जहां तक 'जॉक लकां' और उसके मनोविश्लेषण के उत्तर-संरचनावादी अध्ययन का संबंध है, इस संबंध में शायद और अधिक प्रेक्षण की आवश्यकता है। प्राय: अवचेतन मस्तिष्क तथा इसके नियामकों पर 'लकां' द्वारा बल दिए जाने को भाषा-विषयक नियमनवाद की अस्वीकृति के रूप में देखा जाता है। फिर भी, चीजें इतनी स्पष्ट और सीधी नहीं हैं क्योंकि लकां अवचेतन की एक भाषिक व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। ऐसा करने में वह भौतिकवादी आवेग से बिलकुल अलग विचार व्यक्त करते हैं। भौतिकवादी आवेग कई रूपों में फ्रायड के सर्वाधिक उग्र और विध्वंसक पहलू, उसकी शारीरिक सहज प्रेरणा और मनस्तत्व के सिध्दांत को दरशाता है जो आनंद की मांग करता है। सचमुच फ्रायड इन मनस्तत्वों को सामाजिक रूप से माध्यमीकृत, लचीला तथा अभिव्यक्ति के विभिन्न रूप लेने में सक्षम मानते हैं। फ्रायड इस बात पर जोर देते हैं कि मानव मस्तिष्क एक ऐसा स्थल है जहां शारीरिक सजह प्रेरणा अपने को व्यक्त करती है तथा सामाजिक नियमों और परंपराओं से टकराती है। उनकी यह धारणा उन परंपराओं से बिलकुल अलग है जो मस्तिष्क क्षेत्र, भाषा तथा विचार को आवश्यक रूप से आत्म परिपूर्ण मानती हैं। फ्रायड के अनुसार अवेचतन अन्य बातों के साथ-साथ वह स्थल है जहां दबी हुई शारीरिक इच्छाएं अपने को व्यक्त करती रहती हैं। इस धारणा का अधिकांश यदि पूरा नहीं तो, लकां के इस दावे में गुम हो जाता है कि 'अवचेतन की संरचना भाषा के समान है।'6 उन्होंने फ्रायड के सिध्दांत को काफी हद तक अमूर्त बना दिया है। मानव शरीर पर इसकी पकड़ को ढीला किया है तथा भाषागत आधार पर इसकी पुनर्संरचना की है। जब वह मानव प्रकृति का वर्णन 'उन प्रभावों द्वारा बुनी हुई आकृति के रूप में करते हैं जिनमें भाषा की संरचना होती है, तो वह फ्रायड के सिध्दांत को भाषाविज्ञान के मॉडल में ढाल रहे होते हैं। परिणामस्वरूप, भाषा मानव शरीर तथा सामाजिक-भौतिक आचरणों से अलग हो जाती है। लकां का उद्देश्य जो भी हो, वह हमें उसी बंदीगृह में वापस डाल देते हैं जहां भाषा 'मनुष्य के माध्यम' से बोलती है।'7
अब हम वोलोशिनोव की ओर यह देखने के लिए लौटते हैं कि उनका सामाजिक संघर्ष के स्थल के रूप में भाषा पर जोर देना किस प्रकार भाषिक घेरेबंदी में हमें लेने से परहेज करता है। यदि 'संकेत' वर्ग संघर्ष का एक युध्दक्षेत्र है तो इसका यह अर्थ नहीं है कि विभिन्न सामाजिक वर्गों के सदस्यों के लिए शब्दों (या आम तौर पर संकेतों) का बिलकुल अलग-अलग अर्थ होता है। वोलोशिनोव एक सरल सापेक्षवाद का विरोध करते हैं। साथ ही वह उनकी आलोचना करते हैं जो शब्दों और अर्थों को मूर्त रूप देते हैं; जो सामाजिक अन्योन्यक्रिया तथा संघर्ष के सजीव क्षेत्र को उनसे अलग करते हैं। वह जोर देकर कहते हैंकि शब्दों के अर्थ वैसे ही स्थिर और अमूर्त होते हैं जैसा कि हम शब्दकोश में पाते हैं। लेकिन बोली में अर्थ और विषयवस्तु दोनों शामिल होते हैं। विषयवस्तु का सरोकार उन स्वराघातों और अवधारणाओं से है जो विशिष्ट सामाजिक समूहों द्वारा शब्दों को दी जाती हैं ताकि वे अपने अनुभवों का संप्रेषण कर सकें। दरअसल वे भिन्न-भिन्न संदर्भों में अलग-अलग 'बोली-विधाओं' में भाग लेते हैं जिनके अपने स्वराघात, मानक शब्दावली, स्थानीय भाषा आदि होती है। अत: एक बड़े ऑफिस में एक सेक्रेटरी अपने पर्यवेक्षक से बात करते समय एकदम अलग विधा इस्तेमाल करेगी, जबकि अपने सहकर्मियों के साथ लंच में या काम के बाद यूनियन की बैठक में अन्य विधा का। पहली विधा में प्रतीयमानत: सम्मान और अधीनस्थता के लक्षण होंगे। दूसरी विधा में अपेक्षाकृत समतावादी बोली तथा मालिकों और पर्यवेक्षकों पर विनोदपूर्ण कटाक्ष होंगे। अंतत: तीसरे संदर्भ में अपेक्षाकृत संहिताबध्द विरोधात्मक विमर्श होगा जिसमें एकजुटता दरशाने वाले शब्द (भाइयों और बहनों) तथा मालिकों के विरुध्द प्रतिरोध दरशाने वाले शब्द होंगे।
भाषा और बोली के प्रति यह दृष्टिकोण लोगों को विभिन्न प्रकार के संबंधों तथा गतिविधियों में व्यस्त पाता है जिनमें अलग-अलग विधाएं उन्हें अपने अनुभवों को व्यक्त करने तथा चीजों को समझने में अनेक संसाधन मुहैया कराती हैं। कोई एक सर्वमान्य विमर्श नहीं है जो सभी संदर्भों के लिए हो। हालांकि जो सत्ता का उपयोग करते हैं वे अपने अधीनस्थों पर एक ही विमर्श लादने का प्रयास कर सकते हैं। हालांकि वे आपस में मिलते-जुलते हैं इसलिए दमित और शोषित लोग अपनी अलग विधा का सृजन कर लेते हैं जो सामाजिक अनुभव, विरोधपरक अभिवृत्तियों तथा इस प्रकार के पहलुओं को व्यक्त करती हैं, जिन्हें आधिकारिक विमर्श अस्वीकार करने का प्रयास करते हैं। अत: वोलोशिनोव के अनुसार संकेत बहुस्वराघातीय होते हैं। उनके स्वराघात विभिन्न तरीकों से किए जा सकते हैं जो विभिन्न सामाजिक समूहों के अनुभवों को व्यक्त करते हैं। लेकिन आधिकारिक विमर्श और शासक वर्गों के आलंकारिक तंत्र संकेत के बहुस्वराघाती प्रकृति को अस्वीकार करने का प्रयास करते हैं। शासक वर्ग विमर्श के माध्यम से एक ही प्रकार का विश्वदर्शन प्रस्तुत करना चाहता है। फलस्वरूप वह अर्थों तथा विषयवस्तुओं के एकीकृत समूह को चीजों के वर्णन करने के एक मात्र संभव तरीके के रूप में जबरन प्रस्तुत करता है। वोलोशिनोव लिखते हैं, 'शासक वर्ग विचारधारात्मक संकेत को अधिवर्गीय और शाश्वत चरित्र प्रदान करने का प्रयास करता है।' (पृ. 23) दूसरे शब्दों में यह संकेतों को मूर्त रूप देने का प्रयास करता है ताकि उनका स्थायी और अपरिवर्तनीय रूप में इस्तेमाल किया जा सके। शासक वर्ग उन्हें असामान्य, ऐकिक तथा शाश्वत अर्थ में सक्षम बनाने का भी प्रयास करता है।
लेकिन वे चाहे जितना प्रयास कर लें, शासक वर्ग संकेतों के उन रूपों में स्वराघात के प्रयासों को रोक नहीं सकते जिनके अर्थ आधिकारिक विमर्श के बाहर होते हैं। वोलोशिनोव इस बारे में पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं कि ऐसा क्यों है। लेकिन उनका उत्तर सीधा लगता है।मानव श्रम की सारी पध्दतियां एक सीमा या अन्य सीमा तक सामाजिक होती हैं। इतिहास में ऐसी कोई उत्पादन की पध्दति नहीं देखी गई जो अकेले व्यक्ति द्वारा चलाई जाती हो। प्रत्यक्ष उत्पादक वो चाहे किसाने हों, कृषि दास हों या वैज्ञानिक मजदूर, सभी श्रम प्रकिया में तथा काम के बाहर अपने अन्योन्यक्रियाओं में एक दूसरे की सहायता और सहयोग करते हैं। और इन संदर्भों में वे जिन तरीकों से आपस में बातें करते हैं, उन पर उनके शासकों का प्रत्यक्ष नियंत्रण और पर्यवेक्षण नहीं होता। दूसरे शब्दों में, वैकल्पिक विमर्शों का विकास होता है क्योंकि आधिकारिक विमर्श दमित मजदूरों के जीवन के सभी अनुभवों को समाहित नहीं कर पाते। दमित मजदूरों की कई सामाजिक अन्योन्यक्रियाएं हैं जो अपने मालिकों के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से आंशिक रूप में या पूर्णरूपेण मुक्त होती हैं। इन्हीं मुक्त 'स्थानों' में वे उन विमर्शों या विधाओं का विकास करते हैं जो उनकी भावनाओं, उनके मनोवेगों, प्रत्ययों, विचारों तथा आकांक्षाओं को व्यक्त करते हैं, जो अन्यथा आधिकारिक विमर्शों द्वारा स्वीकार नहीं किए जाते।
संकेत एकाश्मिक होने के बजाए अंतर्विरोधी स्वराघातों से पूर्ण होते हैं। हालांकि अधिकांश समय में यह प्रतीयमान नहीं होता। वोलोशिनोव तर्क देते हैं कि 'जीवन की सामान्य स्थितियों में विचारधारात्मक संकेत में अंतर्निहित विरोधाभास पूरी तरह उभर कर सामने नहीं आ सकते।' (पृ. 23) लेकिन सामाजिक संकट या क्रांतिकारी उथल-पुथल के समयों में जब शासक वर्ग की वैधता पर आक्रमण किया जाता है, ये विरोधाभास उभर कर सामने आ जाते हैं क्योंकि प्रबल विमर्शों को क्रांतिकारियों द्वारा चुनौती दी जाती है। ये क्रांतिकारी वैकल्पिक तथा विरोधपरक विमर्शों के लिए अधिक से अधिक सार्वजनिक स्थान की मांग करते हैं। यही कारण है कि जन आंदोलनों की प्रकृति, लेनिन के शब्दों में, 'दमित लोगों के त्योहार' की होती है। कभी-कभी जब नियंत्रण और प्रतिबंध की संरचनाएं टूटने लगती हैं, प्रतिरोध और विरोध के विचारों तथा विमर्शों को व्यक्त करने के क्षेत्र अत्यधिक बढ़ जाते हैं। फिर भी, विद्रोह के जश्न के दौरान जो दुनिया के उलट-पुलट होने के बिंब उभर कर सामने आते हैं वे तात्क्षणिक सर्जना नहीं होते। वे उन विधाओं से उत्पन्न होते हैं जिनकी रचना दमित तथा शोषित समूहों ने पूरे इतिहास के दौरान की है ताकि वे अपने अनुभवों को व्यक्त कर सकें और विरोध के आचरणों को, असमान रूप से ही, एक कर सकें।
अत: वोलोशिनोव का भाषा का सिध्दांत सर्वाधिक ऐतिहासिक है। यह नव आदर्शवाद में मौजूद स्थैतिक तथा अनैतिहासिक धारणाओं का एक शक्तिशाली दोषनिवारक है। यह आश्चर्यजनक है कि भाषा के आदर्शवादी निरूपण उस समय भी अत्यधिक अनैतिहासिक होते हैं, जब वे विमर्शों की ऐतिहासिकता पर बल दे रहे होते हैं, जैसा करने के लिए फूको जाने जाते हैं। उनके लिए इतिहास तर्कमूलक 'विभेदों' की एक शृंखला प्रतीत होता है; भाषिक प्रतिमानों का एक असंबध्द अनुक्रम, न कि एक गतिशील प्रक्रिया जिसका सृजन ठोस सामाजिक संबंधों में रह रहे लोगों के बीच अन्योन्यक्रियाओं तथा संघर्षों द्वारा होता है।वोलोशिनोव हम लोगों को संप्रेषण के जीवंत क्षेत्र में ले जाते हैं, सामाजिक जीवन के तनावों और अंतर्विरोधों में जी रहे लोगों की मौखिक अन्योन्यक्रियाओं के बीच। ऐसा करके वह इतिहास, सामाजिक अन्योन्यक्रिया और वर्ग संघर्ष को भाषा के अध्ययन क्षेत्र में पुन: स्थापित करते हैं। फिर भी उनका विश्लेषण काफी सामान्य स्तर पर है और इसे अपेक्षाकृत अधिक ठोस आधार देने की आवश्यकता है। ऐसा करना दो प्रमुख क्षेत्रों के संबंध में आवश्यक है। पहला, सामाजिक व्यवहारों की प्रकृति के संबंध में, जिससे दमित और शोषित अपनी बोली की विधाओं का विकास करते हैं। और दूसरा राजनीतिक आचरण के लिए उनके विश्लेषण के निहितार्थों के संबंध में। पहले विषय के संदर्भ में मैं यह दरशाना चाहूंगा कि कैसे एक समृध्द ऐतिहासिक लेखन व्यवहार में तथा विमर्श में प्रतिरोध की द्वंद्वात्मकता को समझने में हमारी मदद कर सकते हैं। दूसरे प्रश्न के लिए मैं अंतोनियो ग्राम्शी द्वारा अपनी पुस्तक 'प्रिजन नोटबुक्स' में भाषा संचेतना, राजनीतिक संघटन के बारे में विकसित कुछ प्रमुख तर्कों का सहारा लेना चाहूंगा।(क्रमशः)

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

सांस्कृतिक गुलामी की हसीन रातें

   हाल ही में राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस के अवसर पर प्रसिध्द वैज्ञानिक और इसरो के भू.पू, अध्यक्ष जी.माधवन नायर ने कहा विज्ञान की खोजों को भारतीय भाषाओं में लाने का प्रयास किया जाना चाहिए। भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी के समानार्थी शब्द बनाए जाएं। जिससे विज्ञान को साधारण जनता तक पहुँचाया जा सके।
 माधवन नायर जी विज्ञान के पठन-पाठन और लेखन का सिस्टम अवैज्ञानिक आधार पर टिका है। भारतीय भाषाओं के माध्यम से न तो विज्ञान पढाया जाता है और नहीं हमारे आज के वैज्ञानिक किसी भारतीय भाषा में लिखते और सोचते हैं। जब तक वैज्ञानिक अपनी मातृभाषा में नहीं लिखेंगे तब तक भारतीय भाषाओं में साधारण जनता तक विज्ञान का जाना संभव नहीं है।देशजभाषा में शब्द भी नहीं बनेंगे। भाषा के शब्द प्रयोग और व्यवहार से बनते हैं। भाषा का निर्माण कोरे खयालों से नहीं होता।    
     हमें इस सवाल पर गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए कि आखिरकार हमारा वैज्ञानिक अथवा शिक्षित मध्यवर्ग अपनी भाषा से क्यों कट गया ? अभिव्यक्ति के लिए अपनी भाषा से वंचित होने का अर्थ है सांस्कृतिक गुलामी में हसीन रातें गुजारना। हमारे शिक्षित मध्यवर्ग को सांस्कृतिक गुलामी से प्यार है। वह अपनी भाषा ,अपनी संस्कृति और अपने देशज गौरव और परंपरा से प्यार ही नहीं करता। हम तलाश करें कि आखिरकार अमर्त्य सेन, प्रभात पटनायक, मनमोहन सिंह आदि विद्वान अपनी भाषा में क्यों नहीं लिख पाते ? अपनी भाषा से हमारे बौध्दिकों का अलगाव सबसे बड़ी त्रासदी है। यह सांस्कृतिक गुलामी है। यह देशप्रेम नहीं राष्ट्र के प्रति दगाबाजी है।       

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...