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गुरुवार, 8 सितंबर 2016

´नवजागरण´ कहना एक फैशन है

           हमारे हिन्दी आलोचकों में ´´नवजागरण” या ´रैनेसां´ पदबंध और उसके आधार पर परिप्रेक्ष्य बनाकर आलोचना लिखने का जबर्दस्त आकर्षण है।भारत में ´रैनेसां´ हुआ है यह सभी हिन्दी आलोचक मानकर चलते हैं,अनेक हैं जो यह मानकर चलते हैं कि हिन्दी में बंगला की तरह नवजागरण हुआ है। मोटे तौर पर ´रैनेसां´ या ´नवजागरण´ का दौर 1814 से आरंभ होता है और 1919 प्रथम असहयोग आंदोलन तक रहता है। यानी राजा राममोहन राय के 1814 में कलकता में आकर रहने से लेकर महात्मा गांधी के राजनीतिक क्षितिज में छा जाने के दौर को नवजागरण कहते हैं। सवाल यह है क्या महान् विभूतियों के पदार्पण या राजनीतिक आंदोलन विशेष को ´नवजागरण´का आधार बनाकर देखना सही होगा ॽ क्या ´नवजागरण´ के चरित्र को इससे समझने में बुनियादी तौर पर मदद मिलेगी ॽ

´नवजागरण´के प्रसंग में सबसे सटीक सवाल तो सुशोभन सरकार ने ही उठाए हैं।उन्होंने ´रवीन्द्रनाथ टैगोर तथा बंगाल का नवजागरण´ निबंध में ये सवाल उठाए हैं,यह 1961 में लिखा निबंध है, उन्होंने लिखा है ´बंगाल की 19वीं शताब्दी की सचेतनता को नवजागरण कहना आजकल फैशन सा हो गया है जिसे पिछले दो दशकों में विशेष लोकप्रियता प्राप्त हुई है।अतः15वीं तथा 16वीं शताब्दियों के यूरोपीय नवजागरण से इसकी तुलना करना आवश्यक सा है।´ इस उद्धरण में ´फैशन´शब्द बहुत ही अर्थपूर्ण है। इसके बात वे लिखते हैं ´सचमुच दोनों में पर्याप्त भिन्नता है।सर्वप्रथम तो यह कि मूल नवजागरण से आया विचार-स्वातन्त्र्य उस युगान्तरकारी बहुमुखी पुनरूत्थान का एक पहलू था जिसमें यूरोप द्वारा दुनिया की खोज की गई,धर्म के क्षेत्र में भारी क्रांति आई,आधुनिक विज्ञान की नींव पड़ी,केन्द्रीकृत राज्यों का उदय हुआ,प्राचीन सामाजिक पद्धति विघटित हुई तथा व्यापार,उद्योग और कृषि पद्धतियों का पुनर्गठन हुआ।किंतु हमारे नवजागरण में उस प्रचंड प्रवाह या निहित शक्ति का दावा नहीं किया जा सकता।भारत में अंग्रेजी शासन ने प्राचीन व्यवस्था नष्ट करने का मार्ग प्रशस्त किया,किंतु न तो उसमें इतनी शक्ति थी और न उनका यह विचार ही था कि उस व्यवस्था के स्थान पर नए समाज की रचना हो।उदासीन एवं निष्क्रिय देशवासियों की तुलनात्मक दृष्टि से,इस प्रकार की पहल-शक्ति और उद्देश्य-दृढ़ता का सर्वथा अभाव था।´ इसके अलावा हमारे समाज में औपनिवेशिक गुलामी आई, निरूद्योगीकरण हुआ।यूरोप में आधुनिक पूंजीपतिवर्ग पैदा हुआ,वैसा आधुनिक पूंजीपतिवर्ग भारत में पैदा नहीं हुआ।यूरोप में औद्योगिक शहरों का जन्म हुआ,नई शहरी संरचनाओं का जन्म हुआ जिसमें पुराने किस्म की शहरी बसावट को नष्ट कर दिया गया।इसके विपरीत कोलकाता की पुरानी बसावट ज्यों की त्यों बनी रही।

सुशोभन सरकार ने यह भी लिखा ´अतः यह स्पष्ट है कि परिस्थितियों के कारण,यूरोपीय नवजागरण की तुलना में,बंगाल का नवजागरण सीमित,आंशिक तथा कुछ हद तक कृत्रिम है।किंतु इसका यह अभिप्राय नहीं कि हमारे जागरण का ऐतिहासिक महत्व नगण्य है।´ उन्होंने सही लिखा है ´बंगाल के जागरण की अनुचित प्रशंसा अथवा उसकी तिरस्कारपूर्ण अवहेलना दोनों ही ऐतिहासिक वस्तुपरकता के सिद्धांतों का उल्लंघन है।´

सुशोभन सरकार के नजरिए से यह बात साफ है ´नवजागरण´ पदबंध की किस तरह ´फैशन´की तरह 1940 के बाद भारतीय विमर्श में दाखिल होता है।यही वह दौर है जब पहलीबार हिन्दी में राहुल सांकृत्यायन ´नवजागरण´ पदबंध का इस्तेमाल करते हैं,बाद में रामविलास शर्मा आदि इस्तेमाल करते हैं । इनमें से अनेक ने 1857 को नवजागरण का प्रस्थान बिंदु माना।कुछ ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के आगमन को ´नवजागरण´ नाम दे दिया।सवाल यह है इस युग को ´नवजागरण´ कहें या ´जागरण´ या ´राष्ट्रीय जागरण कहें ॽ मेरे ख्याल से ´राष्ट्रीय जागरण´ या ´जागरण´ कहना समीचीन होगा।



दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह है कि क्या साहित्येतिहास के लिए ´नवजागरण´ नामकरण सही होगा ॽ इस युग की सामग्री के आधार पर कोई साहित्यिक नामकरण क्यों नहीं किया गया ॽ क्या सामाजिक इतिहास लेखन में प्रयुक्त नाम को साहित्येतिहास में आधार बनाना सही होगा ॽ ऐसा करना भी सही नहीं होगा। स्वयं शिशिर कुमार दास ने ´ए हिस्ट्री ऑफ इंडियन लिटरेचर´(1991)नामक दो खंडों में लिखे विशाल ग्रंथ में रैनेसां या नवजागरण नामकरण का कहीं पर भी उपयोग नहीं किया है,उलटे उन्होंने नवजागरण के नाम के उपयोग को लेकर सवाल उठाए हैं।18वीं सदी के बाद किस तरह के परिवर्तन हुए हैं उन परिवर्तनों को शिशिर कुमार दास ने विश्लेषित किया है। मूल बात यह कि ´नवजागरण´या ´रैनेसां´ पदबंध का प्रयोग लेखन की सुविधा के लिए होता रहा है।इसके साथ वे कारक कहीं पर भी नहीं दिखते जो यूरोप में थे।

रविवार, 14 अगस्त 2016

तर्कवाद और मंदिर की प्रतिस्पर्धा का केन्द्र है कोलकाता

         कोलकाता में रहते मुझे 27साल हो गए,इस दौरान कोलकाता में बहुत कुछ बदलते देखा है।कोलकाता में अनेक किस्म की विचारधारात्मक लड़ाईयां देखीं,नए किस्म के जनांदोलन देखे।लेकिन सबसे बड़ा परिवर्तन यह देखा कि हठात् मंदिर संस्कृति चारों ओर छा गयी।कोलकाता में पहले इतने मंदिर नहीं थे, लेकिन मेरे देखते ही देखते हर गली के मुहाने पर,हर पेड़ के आसपास कोई न कोई मंदिर आ गया,मंदिर बनाने वालों का यहां संगठित गिरोह है.ये मंदिर स्वतःस्फूर्त्त नहीं हैं।मैं जिस इलाके (काकुरगाछी) में रहता हूँ वहां देखते ही देखते कई छोटे-छोटे मंदिर जन्म ले चुके हैं।

कोलकाता सबसे जागृत राजनीतिक धर्मनिरपेक्ष शहर है,लेकिन हजारों छोटे-छोटे मंदिरों का शहर है। इस शहर में जिस तरह हर व्यक्ति ´तर्कवादी´,´विवेकवादी´है ,उसी तरह हर व्यक्ति के सामने मंदिरों का नए सिरे से हर मुहल्ले में उभरकर आना भी एक चुनौती है।´तर्कवाद´ और´मंदिर´का यह द्वंद्व इस शहर की जान है।इस शहर को जानना है तो इस द्वंद्व को समझना होगा,इस द्वंद्व में ही पश्चिम बंगाल की आत्मा नजर आएगी और भारत की आत्मा भी नजर आएगी।

कोलकाता ही अकेला शहर नहीं है जहां मंदिरों की बाढ़ आई हो,देश के विभिन्न शहरों में विगत 40 सालों में मंदिरों की बाढ़ को सहज ही देखा जा सकता है। कोलकाता तो इस देश के वैचारिक द्वंद्वों की आत्मा है। भारत के वैचारिक संघर्षों का अध्ययन करना है तो कोलकाता को गहराई के साथ जानना बहुत जरूरी है।कहने के लिए कोलकाता मुख्यधारा से दूर,कटा हुआ,अलग-थलग नजर आता है,लेकिन असल में ऐसा नहीं है।

कोलकाता पहला शहर है जिसमें आधुनिककाल में ´तर्कवाद´ और ´विवेकवाद´ ने ´ईश्वर´के खिलाफ वैचारिक जंग सुनियोजित ढ़ंग से लड़ी।जो लोग ´विवेकवाद´के लिए संघर्ष कर रहे थे वे अपने लिए कच्चा माल परंपरा से बटोरकर ला रहे थे।वे जाना चाहते थे भविष्य में लेकिन उनका कच्चा माल था अतीत का।यह ऐसा द्वंद्व था जो अभी भी बना हुआ है,हमारा समाज जाना चाहता है अंतरिक्ष युग में लेकिन हनुमान की पूजा करते हुए! पहले तमाम संस्थाओं,रीति-रिवाजों और मूल्यों को तर्क की कसौटी और सामाजिक प्रासंगिकता के आधार पर परखा गया फिर उसमें से बहुत कुछ को छोड़ दिया गया और उसके कारण जो अभाव पैदा हुआ उसके लिए पश्चिम से मूल्य,मान्यताएं और परंपराएं ग्रहण कर ली गयीं।यही वह प्रस्थान बिंदु था जिसने भारतीय जनमानस में नए सिरे से ´तर्कवाद´को पैदा किया,आज इसी ´तर्कवाद´को कोलकाता से लेकर पश्चिम बंगाल के सुदूरवर्ती इलाकों में पैर पसारे देख सकते हैं,आम जनता में कभी-कभी यह तर्कवाद सोने भी लगता है,लेकिन फिर अचानक किसी शॉक के झटके खाकर उठ बैठता है।

कोलकाता में पैदा हुए ´तर्कवाद´ बनाम ´मंदिर´ (ईश्वर भी कह सकते हैं )के द्वंद्व ने सबसे मूल्यवान चीज विकसित की वाद-विवाद में अहिंसा।कोलकाता में वैचारिक विवाद हिंसक,अपमानजनक, गाली-गलौज से भरा नहीं होता। कोलकाता के इसी सहिष्णु रूप ने आधुनिक भारत के सहिष्णु चरित्र को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । 19वीं सदी से लेकर आज तक जितने ज्यादा वैचारिक संघर्ष और परिवर्तन कोलकाता ने देखे हैं उतने संभवतः भारत के किसी शहर ने नहीं देखे ।

शहर की नई परिभाषा गढ़ने में कोलकाता सबसे आगे है,यह इच्छाओं का शहर है।यहां ´तर्कवादी´इच्छाओं को जितना मान-सम्मान मिलता है आम लोग उतना ही धार्मिक इच्छाओं को भी सम्मान देते हैं।इस शहर में भगवान जितना जरूरी है उतना ही जरूरी मनुष्य और विवेकवाद भी है।भगवान और विवेकवाद के द्वंद्व को इस शहर ने बड़े ही कौशल के साथ हल किया है।विभिन्न धर्म हैं, उनके मानने वाले हैं,लेकिन अधिकांश धर्मनिरपेक्ष हैं।धर्म को राजनीति और सरकार के साथ घालमेल करके जनता नहीं देखती और राजनीतिकदल भी इस घालमेल से बचते हैं।यहां साम्प्रदायिक संगठन हैं लेकिन लोग उनके प्रति भी अहिंसक भाव से पेश आते हैं।इस शहर में सभी किस्म की विचारधाराओं के लिए समान रूप से जगह है। ´तर्कवाद´बनाम ´मंदिर´के द्वंद्वं को सामंजस्य और सहिष्णुता के पैमाने देखने की परंपरा यहां इतनी पुख्ता है कि हर तरह के विचार के व्यक्ति को यहां सुरक्षा महसूस होगी।इस समूची प्रक्रिया में कोलकाता से लेकर समूचे पश्चिम बंगाल में मानवाधिकारों को लेकर देश के अन्य इलाकों से बेहतर सचेतनता है। यहां विज्ञान की जितनी मान्यता है परम्परा का भी उतना ही सम्मान है।यहां परंपरावादी भी तर्कवाद का सहारा लेकर परम्पराओं को तरासते रहे।यहां जाग्रत आधुनिक समाज है तो ऐसा समाज भी है जो हिन्दू होने में गौरव का अनुभव करता है।अ-हिन्दू और हिन्दू में यहां कटुता नहीं है,लेकिन सामाजिक विकास के क्रम में दूरी बढ़ी है।सामाजिक सद्भाव है लेकिन संशय बढ़ा है।बड़े पैमाने पर मुसलिम समाज है जो अपने जलसे-त्यौहार आदि बड़ी तैयारियों के साथ मनाता है और सारा शहर उसमें सहयोग करता है,उसके साथ सामंजस्य बिठाता है,कभी कटुता नजर नहीं आती,उसी तरह हिन्दुओं के बड़े त्यौहार बड़े शान से मनाए जाते हैं और मुसलमान उनमें सहयोग करते हैं।शहर की पूरी अर्थव्यवस्था मिश्रित संस्कृति, मिश्रित खान-पान,मिश्रित भावनाओं पर टिकी है।



कोलकाता में आज भी सघन हिन्दू इलाकों में मुसलमानों की दुकानें,सघन मुसलिम इलाकों में हिन्दुओं की दुकानें मिल जाएंगी।एक ही मार्केट में हिन्दू-मुसलमानों की एक साथ दुकानें मिल जाएंगी।इसने इस शहर में साम्प्रदायिक कटुता को कभी पैदा ही नहीं होने दिया,जबकि कोलकाता पर भारत-विभाजन से लेकर बंगलादेश से आए शरणार्थियों तक का बहुत दबाव रहा है,लेकिन ´तर्कवाद´के आधार पर उसने इस तरह के संकटों का समाधान अहिंसक ढ़ंग से खोज लिया है।इस शहर में एक करोड़ से ज्यादा लोग रहते है लेकिन इसकी चाल एकदम कस्बे जैसी है।इसमें कहीं पर भी महानगर जैसी बेचैनी और असंतोष नहीं है।

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

बिजली,किताब और आधुनिकता-

सामाजिक विकास के लिए बिजली महत्वपूर्ण है। बिजली नहीं तो आधुनिकता नहीं। जो लोग सोचते हैं बिजली के बिना रैनैसां कर लेंगे वे देखें देश में बिजली जहां पहुँची है वहीं पर रैनेसां हुआ है। बिजली महत्वपूर्ण तत्व है आधुनिकता को समझने के लिए। काश ,हमारे लेखकों-राजनेताओं और रेनैसां नायकों ने बिजली की सत्ता-महत्ता को समझा होता। आज बिन बिजली सब सून।

इसी तरह भारत की सबसे बड़ी बाधा है पुरानी मुर्दा आदतों में जीना। आधुनिक भारत के निर्माण के लिए हमें बाधामुक्त जीवनशैली को अपनाना चाहिए। हमारे विचार नए हैं, संविधान नया है, तनख्बाह नई है, नए माल खाते हैं, लेकिन आदतें और सोचने का ढ़ंग सदियों साल पुराना है और इसके कारण भारत के अंदर एक विलक्षण नस्ल तैयार हुई है जिसके कपड़े नए हैं,दिमाग पुराना है। जिसकी चाहतें नई हैं, उन्हें पाने के उपकरण और आदतें पुरानी हैं। पुरानेपन से भारत को मुक्त करने के लिए शॉक थैरेपी की सख्त जरूरत है।पुराने को पूरी तरह त्यागे आधुनिक नागरिक नहीं बन सकते।इस प्रसंग में किताबें हमारी मदद कर सकती हैं,समाज को बदल सकती है।इस संदर्भ में वाल्टर बेंजामिन की कुछ बातों से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।

वाल्टर बेंजामिन ने लिखा हैः "किताबों और रंडियों को देखकर कोई नहीं कह सकता कि समय उनके लिए मूल्यवान होगा। लेकिन उनके करीब जाने पर ही पता लग सकता है कि वे किस कदर जल्दबाजी में होती हैं।जैसे ही आपकी दिलचस्पी उनमें खत्म होती है,वे चलने की तैयारी करने लगती हैं। "

"किताबें और रंडिया बिस्तर पर ले जाई जा सकती हैं।"

" किताबें और रंडियां समय को बदल देती हैं।वे रात को दिन और दिन को रात में बदल देने की कूबत रखती हैं।"

वाल्टर बेंजामिन के अनुसार यह समाज ,जिसका हर सदस्य अपने निजी कल्याण में लगा है,पाशविक असंवेदनशीलता और जड़ पूर्वाभास का शिकार है।मशीनों द्वारा कलाकृति का पुनरूत्पादन कला के प्रति जनता के रूख को भी बदल देता है।पिकासो के चित्र के प्रति प्रतिक्रियावादी रूख चार्ली चैप्लिन के फिल्मों के प्रति प्रगतिशील होजाता है।प्रगतिशील रूख का मतलब है कि आस्वादन और आलोचना दोनों मिलकर एक हो जाते हैं।

वाल्टर बेंजामिन का मानना है -" यूं तो कच्ची चीजें पेट के लिए स्वास्थ्यप्रद होती हैं।उसी तरह कुछ कच्चा ,और खासकर , स्वयं का भोगा हुआ अनुभव लाभकारी होता है।"

बेंजामिन ने लिखा है - "प्रशंसा की बौछार सबसे अधिक रचनाकार को ही संदिग्ध बना देती है

शुक्रवार, 20 मई 2016

बंगाल और हिन्दी के बुद्धिजीवी-लेखक

      मुझे पश्चिम बंगाल में रहते हुए 27साल गुजर गए।इसबीच यहां बहुत कुछ बदला है लेकिन अफसोस यह है हिन्दी के बुद्धिजीवियों-लेखकों का संस्कार नहीं बदला।पश्चिम बंगाल में हिन्दी के बुद्धिजीवी देश के विभिन्न कोनों से आते रहे हैं।भाषण करते रहे हैं,सम्मान लेते रहे हैं।लेकिन कभी इन बुद्धिजीवियों ने आँखें खोलकर बंगाल के यथार्थ पर नहीं लिखा,जो कुछ लिखा वह किताबी विषयों पर लिखा,मसलन् रैनेसां पर लिखा,लेकिन उसकी जमीनी हकीकत को कभी जानने की कोशिश नहीं की।चूंकि अधिकांश बुद्धिजीवी प्रगतिशील थे अतःवे यहां के जमीनी यथार्थ से आँखें चुराकर भागते रहे हैं।यही हालत पश्चिम बंगाल के बंगाली बुद्धिजीवियों की है।वे नंदीग्राम के बहाने उठे और फिर सो गए।

सवाल यह है पश्चिम बंगाल के यथार्थ को जानने और समझने के लिए जिस जोखिम को उठाने की जरूरत है वह जोखिम लेखक उठाने से क्यों कतराते रहे हैं ॽ जो भी थोडा-बहुत लेखन है वह वाम के पक्ष और विपक्ष में है।वाम की आलोचना पर है। लेकिन वाम के अलावा बंगाल का सामाजिक यथार्थ भी है जिसकी ओर आलोचनात्मक नजरिए से देखने की जरूरत है।यह काम पहले नहीं हुआ अभी भी नहीं हो रहा।सारी समस्याएं यहीं पर हैं। हमारे सरोकार राजनीतिक हार -जीत तक आकर सिमटकर रह गए हैं, कुछ पद-पुरस्कार पाने तक सीमित रह गए हैं।इससे बंगाल के यथार्थ के साथ अलगाव और भी गहरा हुआ है।

मैं निजी तौर पर यथाशक्ति इस दिशा में लिखता रहा हूँ और इसकी मुझे राजनीतिक –सामाजिक कीमत भी चुकानी पड़ी है। एक लेखक के नाते मैंने बंगाल के यथार्थ को नहीं छोड़ा,पार्टी छूटी,पद छूटे,मित्र छूटे ,लेकिन मैंने निडर होकर लिखना नहीं छोड़ा। सवाल यह है बंगाल जब हिन्दीभाषियों को प्रभावित करता है तो यह भी तो देखें कि हिन्दीभाषी लोग और राज्य किस तरह बंगाल को प्रभावित कर रहे हैंॽ बंगाल में किन वर्गों का ह्रास हुआ ॽ किन क्षेत्रों में ह्रास हुआ ॽऔर इस ह्रास के कारण जो समाज पैदा हुआ वह कैसा है ॽ



आज का बंगाल पहले के बंगाल से भिन्न है।आज बंगाल में हिन्दीभाषी क्षेत्र की तमाम विकृतियां और अमानवीय मूल्य पैर पसार चुके हैं।बंगाली जाति पूरी तरह हिन्दीभाषियों की कु-सभ्यता के रूपों से सीख रही है,उनका अनुकरण कर रही है।यह बहुत बड़ा विपर्यय है।इसे बुद्धिजीवी देखना नहीं चाहते।

शुक्रवार, 27 जून 2014

कमाऊ चेतना के हिन्दीभाषी

        सन् 1989 से पहले कोलकाता दो बार आया था।एकबार एसएफआई के राष्ट्रीय अधिवेशन के समय और दूसरीबार अपनी शादी के समय।लेकिन कोलकता को समझने का मौका तब ही मिला जब 1989 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रवक्ता पद पर नौकरी मिली। उसके बाद ही कोलकाता के हिन्दीभाषी बुद्धिजीवियों और बंगाली बुद्धिजीवियों को करीब से देखने और जानने का मौका मिला।

पहले दो अनुभव बड़े ही शानदार रहे। मैंने एकदिन एक कार्यक्रम के सिलसिले में अभिनेता उत्पल दत्त को फोन किया, मैंने फोन पर उनसे लंबी बातचीत की।मैं बेहद खुश हुआ कि फोन उन्होंने ही उठाया था। मैं चाहता था कि कोलकाता के 300साल होने पर वे बोलें। मेरा प्रस्ताव सुनकर वे बेहद खुश हुए काफी बातें भी कीं,बोले, मैं इनदिनों अस्वस्थ चल रहा हूँ वरना मैं जरुर जाता। उसके बाद मैंने रंगमंच के बड़े अभिनेता अरुण मुखर्जी को फोन किया उनसे मिलने घर गया,लंबी बातचीत हुई,वे कार्यक्रम में आए भी। उनसे बातचीत में पता चला कि उत्पल दत्त और सत्यजित राय दोनों अपना फोन स्वयं उठाते हैं और घर पर आने वाले को दरवाजे तक छोड़ने भी जाते हैं। यह शिष्टाचार बहुत ही अच्छा लगा।

मजा तब आया जब कोलकाता के 300 के कार्यक्रम में विष्णुकांत शास्त्री को अभिनेता अरुण मुखर्जी की तीखी आलोचना का मंच से सामना करना पड़ा। मुझे याद पड़ रहा है शास्त्रीजी के पास अपनी कोई डिफेंस नहीं थी। हिन्दीभाषी और बंगलाभाषी बुद्धिजीवी भिडंत का यह मेरा पहला अनुभव था। अरुण मुखर्जी ने साफ कहा कि हिन्दीभाषी लोग कोलकाता की मुख्यधारा में रहकर भी बंगला संस्कृति और सभ्यता को न तो समझे हैं और और नहीं उनमें आत्मसात्करण की प्रक्रिया नजर आती है। इस क्रम में उन्होंने कहा मैंने बंगला नाटकों के दर्शकों में कभी हिन्दीभाषी नहीं देखे। कभी-कभार इक्का-दुक्का हिन्दीभाषी दर्शक नजर आते हैं।



पहली भिडंत में यह तथ्य सामने आया कि एक साथ रहते हुए भी बंगला रैनेसां का हिन्दीभाषियों पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। हिन्दीभाषी लोग यहां कमाने,खाने,मनीआर्डर करने से आगे चेतना विकसित नहीं कर पाए हैं। यह कार्यक्रम कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दीविभाग ने आयोजित किया था।

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

रामकृष्ण परमहंस और फेसबुक



-1- 

रामकृष्ण परमहंस ने प्रेम की जो परिभाषा दी है वो शानदार है। लिखा है- "पहला जो 'साधारण' प्रेम है उसमें प्रेमी केवल अपना ही सुख देखता है। वह इस बात की चिन्ता नहीं करता कि दूसरे व्यक्ति को भी उससे सुख है अथवा नहीं। इस प्रकार का प्रेम चन्द्रावली का श्रीकृष्ण के प्रति था।

दूसरा प्रेम जो 'सामंजस्य' रूप होता है उसमें दोनों एक-दूसरे के सुख के इच्छुक होते हैं।यह एक ऊँचे दर्जे का प्रेम है।

परन्तु तीसरा प्रेम सबसे उच्च है। इस समर्थ प्रेम में प्रेमी अपनी प्रेमिका से कहता है तुम सुखी रहो ,मुझे चाहे कुछ भी हो। राधा में यह प्रेम विद्यमान था। श्रीकृष्ण के सुख में उन्हें सुख था।गोपियों ने भी यह उच्चावस्था प्राप्त की थी।

-2-

भीष्मदेव देह छोड़ना चाहते हैं,शरों की शय्या पर लेटे हुए हैं ,सब पाण्डव श्रीकृष्ण के साथ खड़े हैं.सब ने देखा, भीष्म की आंखों में आंसू बह रहे हैं।अर्जुन

श्रीकृष्ण से बोले , भाई यह तो बड़े आश्चर्य की बात है कि पितामह -जो स्वयं भीष्मदेव ही हैं,सत्यवादी है,जितेन्द्रिय,ज्ञानी,आठों वसुओं में से एक हैं- वेभी देह छोड़ते समय माया में पड़े रो रहे हैं। यही बात भीष्मदेव से जब श्रीकृष्ण ने कही तो भीष्मदेव ने कहा ,कृष्ण ,तुम तो खूब जानते हो कि मैं इसलिए नहीं रो रहा हूँ। जब सोचता हूँ कि जब स्वयं भगवान पाण्डवों के सारथि हैं ,फिर भी उनके दुःख और विपत्तियों का अंत नहीं होता तब यही सोचकर आंसू बहाता हूँ कि परमात्मा के कार्यों का कुछ भी भेद न पाया।

-3-

रामकृष्ण परमहंस ने लिखा है," जिसका मन जिस पर रमता है वह उसी को चाहता है;कहां रहता है,उसकी कितनी कोठियां हैं, कितने बगीचे हैं,कितना धन है ,परिवार में कौन-कौन हैं,नौकर कितने हैं -इसकी खबर कौन लेता है ?"

-4-

फेसबुकप्रेम तो ईश्वरप्रेम की तरह है।इसके रास्ते में जितने बढोगे उतने ही कर्म छूटे चले जाएंगे।

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जैसे ब्रह्मभोज में पहले खूब शोरगुल मचता है ।जब सभी के आगे पत्तल पड़ जाती है तब गुलगपाड़ा कुछ घट जाता है।केवल 'पूड़ी लाओ,पूड़ी लाओ' की आवाज होती रहती है। फिर जब लोग पूड़ी-तरकारी खाना शुरू करते हैं तब बारह आना शब्द घट जाता है। जब दही आया तब सप्-सप् -शब्द मानो होता ही नहीं। और भोजन के बाद निद्रा।तब सब चुप !

-6-

रामकृष्ण परमहंस ने अपने भक्त शिवनाथ को देखकर कहा ,"क्या शिवनाथ तुम आए हो ,देखो तुम लोग भक्त हो,तुम लोगों को देखकर बड़ा आनंद होता है। गंजेड़ी का स्वभाव होता है कि दूसरे गंजेड़ी को देखते ही वह खुश हो जाता है,कभी तो उसे गले ही लगा लेता है।"

फेसबुकिए की दशा भी क्या गंजेडी जैसी है ?

-7-

रामकृष्ण परमहंस ने जातिप्रथा को समाप्त करने के लिए एक सुंदर सुझाव दिया है, उन्होंने कहा- "एक उपाय से जातिभेद उठ सकता है।वह उपाय है -भक्ति।भक्तों के जाति नहीं है।"

-8-

रामकृष्ण परमहंस ने एक जगह लिखा है ''कलकत्ते के लोग हुल्लड़बाज हैं। '' यह बात सौ फीसद आज भी सत्य है।

रविवार, 9 जनवरी 2011

असफल रैनेसां का प्रतीक हैं गालियां


        हिन्दी में रैनेसां का शोर मचाने वाले नहीं जानते कि हिन्दी में रैनेसां असफल क्यों हुआ ? रैनेसां सफल रहता तो हिन्दी समाज गालियों का धडल्ले से प्रयोग नहीं करता। बांग्ला ,मराठी ,तमिल,गुजराती में रैनेसां हुआ था और वहां जीवन और साहित्य से गालियां गायब हो गयीं। लेकिन हिन्दी में गालियां फलफूल रही हैं और यह हिन्दी जाति के पतन की निशानी है। गालियां असभ्यता की सूचक हैं। जिस साहित्य और समाज में अभिव्यक्ति का औजार गाली हों वह समाज पिछडा माना जाएगा। गालियां इस बात का संकेत हैं कि हमारे समाज में सभ्यता का विकास धीमी गति से हो रहा है। यथार्थ की भाषिक चमक यदि गाली के रास्ते होकर आती है तो यह सांस्कृतिक पतन की सूचना है। गालियां हमारे आदिम जीवन की निशानी हैं।
  हिन्दी में अनेक लेखक हैं जो साहित्य में गालियों का प्रयोग करते रहे हैं। अकविता से लेकर काशीनाथ सिंह तक साहित्य में गालियां सम्मान पा रही हैं। गाली अभिव्यक्ति नहीं है। यथार्थ कभी गालियों के जरिए व्यक्त नहीं होता। अधिकांश बड़े साहित्यकारों ने यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए कभी गालियों का प्रयोग नहीं किया। गालियां हमारे जीवन में असभ्यता की निशानी हैं। गालियों का किसी भी तर्क के आधार पर महिमामंडन करना गलत है। हिन्दी में कई लेखक हैं जो अपनी साहित्यिक अभिव्यक्ति के लिए गालियों का प्रयोग करना जरूरी समझते हैं। युवाओं में गालियों का सहज प्रयोग मिलता है। इन दिनों इलैक्ट्रोनिक मीडिया में भी गालियों का प्रयोग बढ़ गया है।खासकर फिल्मों, रियलिटी टीवी शो और टॉक शो में इसकी झलक मिलती है। हिन्दी में गालियों का बचे रहना इस बात का संकेत है कि हिन्दी अभी आदिम अभिव्यक्ति के रूपों से मुक्त होकर आधुनिक सभ्य भाषा नहीं बन पायी है। समाज में एक बड़ा हिस्सा है जो धडल्ले से गालियां देता है।
    सवाल उठता है हिन्दी समाज इतना गाली क्यों देता है ? क्या हम गालियों से मुक्त समाज नहीं बना सकते ? वे कौन सी सांस्कृतिक बाधाएं हैं जो हमें गालियों से मुक्त नहीं होने देतीं ? प्रेमचंद ने लिखा है ‘हर जाति का बोलचाल का ढ़ंग उसकी नैतिक स्थिति का पता देता है। अगर इस दृष्टि से देखा जाए तो हिन्दुस्तान सारी दुनिया की तमाम जातियों में सबसे नीचे नजर आएगा। बोलचाल की गंभीरता और सुथरापन जाति की महानता और उसकी नैतिक पवित्रता को व्यक्त करती है और बदजवानी नैतिक अंधकार और जाति के पतन का पक्का प्रमाण है। जितने गन्दे शब्द हमारी जबान से निकलते हैं शायद ही किसी सभ्य जाति की ज़बान से निकलते हों।’
  आम तौर पर हिन्दी में पढ़े लिखे लोगों से लेकर अनपढ़ लोगों तक गालियों का खूब चलन है। कुछ के लिए आदत है। कुछ के लिए धाक जमाने,रौब गांठने का औजार हैं गालियां। पुलिस वाले तो सरेआम गालियों में ही संप्रेषित करते हैं। गालियों के इस असभ्य संसार को हम तरह-तरह से वैध बनाने की कोशिश भी करते हैं। कायदे से हमें अश्लील भाषा के खिलाफ दृढ़ और अनवरत संघर्ष आरंभ करना चाहिए। यह काम सौंदर्यबोध के साथ -साथ शैक्षिक दृष्टि से भी जरूरी है। इससे हम भावी पीढ़ी को बचा सकेंगे।  गालियों के प्रयोग के खिलाफ हमें खुली निर्मम बहस चलानी चाहिए। बगैर बहस के गालियां पीछा छोड़ने वाली नहीं हैं। बहस से ही दिमागी परतों की धुलाई होती है।
गालियां मिथ्या साहस की अभिव्यक्ति हैं। गालियां एक सस्ती,घृणित और नीच अश्लीलता है। गालियां महज यांत्रिक आघात नहीं करतीं। इनसे न तो सेक्सी बिम्ब उभरते हैं और न कामुक अनुभूतियां ही पैदा होती हैं। सेक्सी गालियां हमारी अरूचिकर और अस्वास्थ्यकर संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति हैं। अश्लील गालियां और अश्लील मजाक के जरिए परपीड़न होता है। गंदे किस्से,चुटकुले,चालू अश्लील शब्द मानवीय सौंदर्य की गरिमा को कम करते हैं। मानव इतिहास आदिम शरीरक्रियात्मक मानकों को कूड़े के ढ़ेर पर फेंक चुका है। लेकिन अभी भी हमारे अनेक मित्र गालियों की हिमायत कर रहे हैं। इस प्रसंग में प्रसिद्ध रूसी शिक्षाशास्त्री अन्तोन माकारेंको याद आ रहे हैं उन्होंने लिखा है- ‘पुराने जमाने में शायद गाली-गलौज की गंदी भाषा कमजोर शब्दावली तथा मूक-निरक्षरता के लिए सहायक की तरह अपने ही ढ़ंग से काम आती थी। स्टैंडर्ड गाली की सहायता से आदिम- भावों को अभिव्यक्त किया जा सकता था, जैसे क्रोध,प्रसन्नता, आश्चर्य, निंदा और ईर्ष्या । लेकिन अधिकांशतः यह किसी भी भावना को व्यक्त नहीं करती थी, बल्कि असम्बद्ध ,मुहावरों और विचारों को जोड़ने के साधन का काम देती थी।’
  हमें इस सवाल पर भी सोचना चाहिए कि हिन्दी में गालियां कहां से आ रही हैं। गालियों के मामले में हम लोकल और ग्लोबल एक ही साथ होते जा रहे हैं। जाने-अनजाने असभ्यता का विनिमय कर रहे हैं। कुछ लोग भाषा को उग्र या आक्रामक बनाने के लिए गालियों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि हमारी जनता उग्र और आक्रामक भाषा पसंद नहीं करती। वह इसे असभ्यता मानती है। गालियों से अभिव्यक्ति में पैनापन नहीं आता बल्कि असभ्यता का संचार होता है। तीक्ष्णता और अभद्रता में हमें अंतर करना चाहिए। हमें बहस-मुबाहिसों में असभ्यता से बचना चाहिए। बहस मुबाहिसे में यदि असभ्यता आ जाती है तो फिर गालियां स्वतः ही चली आती हैं। हिन्दी में स्थिति इतनी बदतर है कि एक नामी साहित्यिक पत्रिका के संपादक आए दिन अपने संपादकीय तेवरों को आक्रामक बनाने के लिए असभ्य भाषा का प्रयोग करते हैं। वे भाषा में तीक्ष्णता पैदा करने के लिए ऐसा करते हैं लेकिन यह मूलतः असभ्यता है। हमें अभिव्यक्ति के लिए तीक्ष्णता का इस्तेमाल करना चाहिए ,असभ्य भाषिक प्रयोगों का नहीं। इन जनाब के संपादकीय अनेक मामलों में अधकचरी विद्वता और अक्षम तर्कपूर्ण शैली से भरे होते हैं।
   हमें विचारों की तीक्ष्णता और साहित्यिक अभिव्यंजना की अभद्रता के बीच अंतर करना चाहिए। लेखन में गाली का प्रयोग एक ही साथ गलत और सही दिखता है। एक जमाने में महान रूसी लेखक पुश्किन ने तीक्ष्णता और अभद्रता के अंतर का विवेचन करते हुए लिखा था, ‘ गाली कभी-कभी ,निश्चय ही,बिल्कुल अनुचित है। जैसे कि आपको नहीं लिखना चाहिएः ‘‘यह हांफता हुआ बूढ़ा,चश्मा लगाए हुए एक बकरा है,एक कमीना झूठा है,बदकार है,बदजात है।’’- ये व्यक्ति को दी गयी गालियां हैं। किन्तु अगर आप चाहें ,तो लिख और छाप सकते हैं कि ‘‘यह साहित्यिक पुराना उपासक(अपने लेखों में) एक निरर्थक बकवासी है,हमेशा दुर्बल,हमेशा उकताने वाला,कष्टकर और बिल्कुल अहमक़ तक है।’’क्योंकि यहां पर कोई व्यक्ति नहीं एक लेखक है।’
  इसी प्रसंग में अन्तोन माकारेंको ने लिखा है, ‘हमारे देश में गाली-गलौज के शब्दों का ‘‘तकनीकी’’ महत्व खत्म हो गया है, लेकिन भाषा में वे अभी भी मौजूद हैं। अब वे मिथ्या साहस को, ‘‘लौह चरित्र’’ को,निर्णायकत्व,सरलता ,सुरूचि के प्रति तिरस्कार को अभिव्यक्त करते हैं। अब वे एक किस्म के ऐसे नखरे हैं,जिनका मकसद सुनने को खुश करना ,उनको जीवन के प्रति सुनानेवाले के साहसिक रवैय्ये और पूर्वाग्रहहीनता को दर्शाना है।’
   साहित्य में गाली के पक्षधरों का मानना है पात्र यदि गाली देते हैं तो हमारे लिए उससे बचना संभव नहीं है। इस प्रसंग में यही कहना है कि गालियां साहित्य नहीं हैं। गालियां जीवन का यथार्थ भी नहीं हैं। गालियां महिलाओं का अपमान हैं और बच्चों के लिए हानिकारक हैं। गालियों के प्रति हमें लापरवाह नहीं होना चाहिए। गालियों को साहित्य में रखकर हम उन्हें दीर्घजीवी बना रहे हैं। उन्हें मूल्यबोध प्रदान कर रहे हैं। विरासत के रूप में गालियां हमारे समाज और संस्कृति की गंभीर क्षति कर रही हैं। प्रेमचंद ने लिखा है ‘ गाली हमारा जातीय स्वभाव हो गयी है।’ ‘गालियों का असर हमारे आचरण पर बहुत खराब पड़ता है। गालियाँ हमारी बुरी भावनाओं को उभारती है और स्वाभिमान व लाज-संकोच की चेतना को दिलों से कम करती हैं जो दूसरी क़ौमों की निगाहों में ऊँचा उठाने के लिए जरूरी है।’
  जब कोई व्यक्ति गालियों का इस्तेमाल करता है तो पढ़ने या सुनने वाला किसी सापेक्ष शब्द को नहीं सुनता बल्कि वह गाली के जरिए उसमें अन्तर्निहित सेक्स के अर्थ तक पहुँचता है। इस दुर्भाग्य का मूल सार यह नहीं है कि सेक्स का राज पाठक या श्रोता के सामने खुल जाता है, बल्कि यह कि वह राज अपने सबसे ज्यादा कुरूप,मानवद्वेषी तथा अनैतिक रूप में उदघाटित होता है। ऐसे शब्दों का बारम्बार होने वाला उच्चारण या लिखित प्रयोग पाठक या श्रोता को सेक्सी मामलों पर अत्यधिक ध्यान देने की,विरूपित दिवास्वप्न देखने की आदत पैदा करता है।  इससे लोगों में अस्वास्थ्यकर रूचियों का विकास होता है।
अधिकांश गालियां स्त्रीकेन्द्रित हैं और उनके गुप्तांगों को लेकर हैं या उसके विद्रूपों को लेकर हैं। इससे सामाजिक हिंसा में बढ़ोतरी होती है। साथ ही यह भावना पैदा होती है कि औरत इस्तेमाल की चीज है। अपमानित है। मादा है। आश्चर्यजनक बात है कि हमारे स्कूली पाठ्यक्रमों से लेकर बड़ी कक्षाओं तक गालियों के खिलाफ कोई पाठ नहीं है। सारे देश के बुद्धिजीवी आराम से आए दिन सिलेबस बनाते हैं और पढ़ाते हैं। लेकिन गालियों के बारे में कभी क्लास नहीं लेते। कभी बोलते नहीं हैं। उलटे यह देखा गया है कि जिस बच्चे को डांटना होता है उस पर गालियों की बौछार कर देते हैं।
   गालियों का प्रयोग सत्य को स्थगित कर देता है। हम जब गाली देते हैं या गाली लिखते हैं तो उस समय हमारी नजर गाली पर होती है सत्य पर नहीं,हम गाली में उलझे होते हैं। गालियों के प्रयोग से वर्तमान साफ नजर नहीं आता। गालियों का प्रयोग विचारों और यथार्थ को एक नई भंगिमा में तब्दील कर देता है। एक विलक्षण किस्म के पाठ की सृष्टि करता है। वह अवधारणाओं के अर्थ और यथार्थ के अर्थ को संकुचित करता है। अर्थ संकुचन गालियों की पूर्वशर्त है। यह य़थार्थ को उसके स्रोत से काट देता है । जबकि लेखक यही दावा करता है कि वह वास्तविकता दरशाने के लिए गालियों का प्रयोग कर रहा है। गालियों के साहित्यिक प्रयोग को स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में ही पेश किया जाता है। जबकि सच इसके एकदम विपरीत है।
गालियों का प्रयोग अर्थविस्तार नहीं करता उलटे अर्थसंकोच करता है। जब कोई लेखक यथार्थ को गालियों में खींच लाता है तो वह यथार्थ के साथ जुड़े बुनियादी तर्कों से उसे अलग कर देता है। यथार्थ के सत्य और असत्य विकल्पों की संभावनाएं खत्म कर देता है। गालियों का प्रयोग यथार्थ की बहस को वर्तमान काल में ले आता है। अब उसके लिए वर्तमान का जीवंत यथार्थ बेमानी होता है। गालियों का प्रयोग वर्तमान यथार्थ को शरणार्थी बना देता है।
वैसे अधिकांश रचनाओं में एकाधिक अर्थ की संभावनाएं होती हैं लेकिन गाली के प्रयोग वाले अंशों में एक ही अर्थ होता है। एकाधिक अर्थ या भिन्न अर्थ की संभावनाओं को गालियां नष्ट कर देती हैं। गालियों का प्रयोग सामाजिक गैर बराबरी को बनाए रखता है। सामाजिक हायरार्की को आप इसके प्रयोगों के जरिए अपदस्थ नहीं कर सकते। गालियों में परिवर्द्धन और सम्बर्द्धन संभव नहीं है वे जैसी बनी थीं वैसी ही चली आ रही हैं। यह सिलसिला सैंकड़ों सालों से चला आ रहा है। गालियों के जरिए युगीन विचारों को नहीं पकड़ सकते। हिन्दी में जिसे दिल्लगी कहते हैं वह भी गालियाँ है। प्रेमचंद ने दिल्लगी को गालियों से कुछ कम घृणित माना है। गालियों को उन्होंने ‘जातीय कमीनेपन’ और ‘नामर्दी’ का सबूत कहा है। साथ ही इसे ‘जातीय पतन की देन’ माना है। उनके ही शब्दों में ‘ जातीयपतन दिलों की इज़्ज़त और स्वाभिमान की चेतना को मिटाकर लोगों को बेग़ैरत और बेशर्म बना देती है।’ गालियां अनुभूति की शक्ति मिटा देती हैं। 

बुधवार, 6 जनवरी 2010

ई लेखक " असली वारिस हैं भारतेन्दु के

                                        
         भारतेन्दु हरिश्चन्द्र                  
(जन्म 9सितम्बर 1850 - मृत्यु 6 जनवरी 1885)
       
 'ई लेखकोंऔर 'हिन्दी लेखकों ' में एक दूसरे के प्रति बेगाना भाव है। हमारे यहां कलम और कम्प्यूटर के बीच महा-अंतराल है। आज अधिकांश 'हिन्दी लेखक' 'ई लेखक' को जानते तक नहीं हैं। यह बेगानापन जितना जल्दी टूटेगा नेट की दुनिया और भी सुंदर लगेगी।
    ' ई लेखकों '  के साथ भारतेन्दु का एक बिन्दु पर मिलन होता है, दोनों में देश -दुनिया को जानने की ललक है। जबकि हिन्दी लेखकों में इसका अभाव है। आज का हिन्दी ब्लागर हिंदी का भावी संरक्षक है। उसमें हिन्दी के प्रति जो आग्रह है वह भारतेन्दु के भाषायी प्रेम का स्वाभाविक विकास है।
   भारतेन्दु जिंदादिल इंसान थे। हिन्दी रैनेसां के नहानायक थे। जिंदादिल इंसान की बेचैनी उनके नजरिए का मूलाधार है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र अंतिम समय में जब बीमार थे तब लोग उनसे हालचाल पूछने आ रहे थे 6 जनवरी 1850 को सुबह बोले , " हमारे जीवन के नाटक का प्रोग्राम नित्य नया नया छप रहा है -पहले दिन ज्वर की, दूसरे दिन दर्द की तीसरे दिन खांसी की सीन हो चुकी है,देखें लास्ट नाइट कब होती है।" अपने जीवन के अंतिम समय में भी इस तरह की जिंदादिली बनाए रखना बड़ी बात है। भारतेन्दु की माँ का नाम पार्वती देवी था और पिता का नाम गोपालचन्द्र था। 1857 के संग्राम में गोपालचन्द्र अंग्रेजों के साथ थे।
      हिन्दी में भारतेन्दु के बारे में सही नजरिए से बातें करने वाले कम हैं और उनके दृष्टिकोण का अनुसरण करने वाले और भी कम हैं। मसलन भारतेन्दु को देशाटन का शौक था, घूम घूमकर देश को जानने का शौक था, हिंदी के लेखक -शिक्षक देशाटन कम से कम करते हैं। देशाटन करके देश को जानना और फिर उसके अनुभवों से साहित्य को समृध्द करना ,देश की जनता के वैविध्य को सामने लाना। हिन्दी में यह फिनोमिना दुर्लभ होता जा रहा है।
     भारतेन्दु का दूसरा गुण था लेखकों के प्रति वफादारी और विश्वास। आज का लेखक देरिदियन बायनरी अपोजीशन में है। बेवफाई और अविश्वास में जीता है। अपनी भाषा की समृध्दि के लिए जिस निष्ठा,त्याग और कुर्बानी के भाव का भारतेन्दु ने परिचय दिया वैसी निष्ठा का रामविलास शर्मा के जाने के साथ अवसान हो चुका है। आजकल लेखकों-आलोचकों- प्रोफेसरों में लालच,धूर्तता और जोड़तोड़ का व्यापक पैमाने पर प्रसार देख सकते हैं।
      भारतेन्दु की तीसरी विशेषता थी पेशेवर लेखकीय भाव। पेशेवर का अर्थ धन कमाना नहीं है। पेशेवर का अर्थ है लेखन के प्रति निष्ठा,पूर्व तैयारी, लेखकों को संगठित करना़, ज्ञान की अपडेटिंग रखना, सत्य का आग्रह और ईमानदारी। रामविलास शर्मा ने लिखा है , " भारतेन्दु साहित्यिक होने साथ -साथ अच्छे संगठनकर्ता भी थे।  "
      भारतेन्दु की चौथी विशेषता है गरीबों और मुफलिसों के प्रति उदारभाव। रामविलास शर्मा ने लिखा है धनहीन होने पर उन्हें सबसे ज्यादा अफसोस इसी बात का था कि वह निर्धनों की सहायता न कर सकते थे। "
     भारतेन्दु की पांचवीं विशेषता थी सामाजिक सक्रियता। सार्वजनिक हित के कार्यों में हिस्सा लेना। भारतेन्दु के लेखन पर काशी की संस्कृति की गहरी छाप थी। रैनेसां में तर्क और विज्ञानसम्मत दृष्टिकोण का चलन आरंभ हुआ था,भारतेन्दु के अंदर इन दोनों के प्रति आग्रह था। भारतेन्दु तेज,बेधडक और तीखा लिखते थे। ठीक यही चीज 'ई लेखन' की धुरी है।
   भारतेन्दु ने ऐसे परिवार में जन्म लिया था जिसका अंग्रेजों के साथ गहरा संबंध था। इस संबंध को भारतेन्दु आलोचनात्मक नजरिए से देखते थे। उनका मानना था "इस धन ने मेरे पूर्वजों को खाया है, अब मैं इसे खाऊँगा।"
  
भारतेन्दु के बारे में आज हमें नए दृष्टिकोण से सोचना होगा। सामाजिक सुधार ,सामंजस्य और सामाजिक परिवर्तन को नए के आग्रह के साथ जोड़ना होगा। नए को लाए बिना पुराना जाएगा नहीं। चीजों,वस्तुओं और घटनाओं के बारे में आलोचनात्मक नजरिया अपनाना होगा।

भारतेन्दु की परंपरा के विकास के लिए अंधविश्वास,मध्ययुगीनता और रुढ़िवाद के साथ प्रत्येक स्तर पर संघर्ष चलाने की जरुरत है। स्वयं भारतेन्दु ने अपने लेखन के जरिए यही काम किया था।   
          












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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...