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शनिवार, 5 मार्च 2011

यादों के साये - एलिस फ़ैज़


यह बात लगभग नामुमकिन है कि किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में औपचारिक आदर-भाव के साथ बात की जाये जो चौबीस साल तक रगे-जां की तरह साथ रहा हैएक ऐसा व्यक्ति जो मेरा पति है।
फ़ैज़ पर लिखते समय जाती बातें और साथ झेले हुए अनुभव विचित्र आकर्षण की तरह दामने-दिल को खींचते हैं। लेकिन जब यह चुनने का प्रश्न उठे कि क्या लिखूं तो वही बातें चुननी चाहिए, जो दूसरों के जीवन पर अपने प्रभाव की मुहर लगा सकें, दूसरों के दिलों को यूं छू लें कि उनका स्पर्श मुस्कान और मुक्त हंसी को जन्म दे सके,... यही नहीं, बल्कि जो बातें आंसुओं के सीमांचल तक पहुंचा दें।
मैं विगत दिनों की ओर देखती हूं... मेरी निगाहें अनिवार्यत: बंदीगृह के दरवाजे से होकर विगत तक पहुंचती हैं। जेल के ये साल हमारे सम्मिलित जीवन में एक अवरोधाक अंतराल की तरह नज़र आते हैं। मगर इन बरसों ने हम दोनों को वह कुछ दिया है जो किसी तरह भी हम हासिल नहीं कर सकते थे; चंद साल, जिनमें घुटनियों चलती हुई एक बच्ची छोटी-सी लड़की बन गयी; जिनमें एक लड़की धाीरे-धाीरे नौजवान महिला बन गयी; जिसमें जीवन के एक अचानक मोड़ की तरह 'किसी' के सर के बालों पर सफ़ेदी छाने लगी, और किसी चेहरे पर झुर्रियां आहिस्ता-आहिस्ता अपना जाल बुनती रहीं। जेल के दरवाज़े अवरोधस्वरूप हमारे बीच में थे; लेकिन उन दरवाज़ों में दाख़िल होते हुए, उनसे निकलते हुए जंज़ीरों की झनकार और तालों में कुंजियों के घूमने की आवाज़ के साथ जंज़ीरों-बेड़ियों से बंधे ये दिन अपने पीछे-पीछे हर्ष और आनंद से भरे-पूरे क्षण लेकर आये : अविश्वसनीय रूप से मानो आंचल में फूलों का उपहार लिये, ये क्षण। ... मैं उन दिनों के ग़म बल्कि ग़मों की बात नहीं करूंगी। क्योंकि मौत (और ग़म) ने अपनी इच्छाएं हम दोनों को सौंपी हैं।... मैं तो ख़ुशी के क्षणों की याद ताज़ा करना चाहती हूं, ताकि सूरज की रौशनी से ये बीते हुए क्षण जगमगा उठें... हालांकि मैं जानती हूं कि साये भी उतने ही प्यारे होते हैं।
जब मार्च की एक सुब्ह को फ़ैज़ ने मुझे और सोते हुए बच्चों को ख़ुदा हाफ़िज़ कहा तो मेरे सामने सबसे पहला और संगीन मस्अला यह था कि चार सौ रुपये मासिक की आमदनी से घर को कैसे चलाया जायेगा। न चाहते हुए भी उदास दिल से हमने शफ़ीउल्ला के अलावा दूसरे पुराने नौकरों को अलग कर दिया; शफ़ीउल्ला, जो अब भी हमारे साथ हैं। सहज-स्वभाव, अपनापे की मूर्ति, फ़ैज़ की सौतेली बहन हमारे साथ रहने के लिए आ गयी, ताकि वह बदले हुए हालात में ज़िंदगी बसर करने में मेरी मदद कर सके।


पहली चोट हमारे बच्चों पर पड़ी। क्वीन मेरी कॉलेज से उनका नाम कटवाकर केन्याज़ मिशन स्कूल में दाख़िल कराना पड़ा। मुझे तो इस बात का अंदाज़ा बाद में हुआ कि यह फैसला हमारी बच्चियों के लिए कितना लाभकर सिध्द हुआ। मुनीज़ा अक्सर मुझे बुरा-भला कहती : 'जब अब्बा यहां थे तो मेरे पास एक आया थी। स्कूल में झूले थे, चकरघिन्नी थी, तरह-तरह के खेल थे...!' अपनी नयी परिस्थिति में उसे फ़र्श पर बैठना पड़ता था। लेकिन प्रार्थना-पध्दति के नये रूपों ने उसमें एक अजीब-सा बौध्दिक मानसिक उत्साह पैदा कर दिया था...मेरी ननद की आपत्तिायों के बावजूद वह रात को सोने से पहले अपने घुटनों पर झुककर, सज्दे के लिए आधाी झुकी-सी भाव-मुद्रा में, 'आस्मानी बाप' (परमेश्वर) की स्तुति बिगड़ी हुई और किंचित हास्यास्पद-सी उर्दू में करती। एक रात जब वह अपने स्रष्टा से विनती करने में लीन थी और हम उसे सुलाने के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे, उसने कहा'अौर आस्मानी बाप..तुम जो हैदराबाद जेल में हो, जल्दी से वापस आ जाओ!' जब हमने अपनी घुटी हुई हंसी पर काबू पा लिया और मुनीज़ा की शेष प्रार्थना सुन ली, तो उसे बिस्तर में लिटा दिया। फिर उसे (अर्ध्दनिद्रा की दशा में) यह कहते हुए सुना : 'बाजी...बहुत जल्द सब कुछ ठीक हो जायेगा!'
जेल में मुलाक़ात की इजाज़त मुद्दतों की प्रतीक्षा के बाद मिलती है, और हर मुलाक़ात की याद (अगली मुलाक़ात तक) हम सीने में लगाये रहते। अगली मुलाक़ात तक हर पिछली मुलाक़ात की एक-एक निगाह, एक-एक शब्द, अंग-परिचालन की एक-एक गति को हृदय और मस्तिष्क में परम निधि के समान सुरक्षित रखते। ये मुलाक़ातें दो-तीन महीने में एक बार होतीं। ... हर मुलाक़ात के लिए हमें सिंधा मरुभूमि के विस्तारों को पार करना पड़ता। ये यात्राएं थका देने वाली थीं। और फिर उस थकन पर ख़र्चों का बोझ। जेलर हर मुलाक़ात की निगरानी करता। ख़ास तौर पर मेरी मुलाक़ात की निगरानी; क्योंकि मुझे 'संभावित' जानकारियों का माधयम समझा जाता था। हम मुलाक़ात के उन क्षणों को हलकी-फुलकी घटनाओं और मित्रों के संदेशों से मधुरतम बनाते; ताकि उनका बोझ सुखानुभूति के तले दब जाये।
मुझे अच्छी तरह याद है कि एक मुलाक़ात के मौक़े पर जब मैं एक कहानी सुना रही थी, हमारा जेलर उस कहानी की दिलचस्पियों में यों गुम हो गया कि जब संतरी और जेलर की डयूटी का वक्त पूरा हो गया, तो उसने दूसरे जेलर से कहा : 'भाई, थोड़ी देर ठहर जाओ। मैं इस कहानी का अंजाम तो सुन लूं!'
मित्रों ने मुझसे अक्सर पूछा कि भला किसी ग़ैर की मौजूदगी में बातें कैसे होती होंगी! दो दिलों की मुलाक़ात के दरमियान किसी तीसरे की मौजूदगी! हर बात सुनता हुआ आदमी! सच पूछिए तो हमें अक्सर किसी और की मौजूदगी का एहसास ही कब होता था! हां, कभी-कभी 'दरमियान का पर्दा' अपनी मौजूदगी से मुलाक़ात को तंग कर देता था, और जैसे, शुरू-शुरू में जेलर साहब मेरे और फ़ैज़ के दरमियान बैठने पर इसरार फ़र्माते थे।
फ़ैज़ की गिरफ्तारी और उनके अवैध एकांत कारावास (मैं अवैधा इसलिए कह रही हूं कि एक नियत अवधि से अधिक किसी व्यक्ति को एकांत कारावास की यातना में बांधा रखना अवैधा है) के तीन महीने बाद मैं अपनी दोनों बच्चियों के साथ उनसे मिलने लायलपुर जेल गयी। हमें सुपरिन्टेंडेंट के कमरे में पहुंचा दिया गया। उसने मेरा नाम पूछा। मैंने बता दिया। फिर उसने हम तीनों को देखा। मुझे अब यह महसूस होता है कि शायद उस क्षण हम बहुत अकेले, मायूस, चिंताकुल और बुझे-बुझे नज़र आ रहे थे,
मानो हमारे चेहरे हमारी मानसिक भावस्थिति के आईने बन गये हों। सुपरिन्टेंडेंट ने मुझसे पूछा'आपकी यही दो बच्चियां हैं?' मैंने उसे बताया कि 'यही बच्चियां हमारी पूंजी हैं हमारी ज़िंदगी का हासिलज़रब ।' उसने झिझकते हुए सवाल किया'क़ोई लड़का नहीं है?' मैंने नकार में गर्दन हिलायी।... उसने एक आह भरी...एक लंबी आह! फिर मेरी तरफ़ देखा और कहा'क़ैसे अफ़सोस की बात है! कैसी अफ़सोसनाक बात!...' उसके लहजे से मुझे यह एहसास हुआ जैसे अब किसी बेटे की मां बनना मेरे मुक़द्दर में नहीं, जैसे...मेरा सुहाग लुट चुका हो!
और जब फ़ैज़ कमरे में दाख़िल हुए तो दोनों बच्चियां दौड़ती हुई उनकी गोद में समा गयीं। मुनीज़ा ने जैसे बुड़बुड़ाते हुए कहा'अब्बू! 'वो' कहते थे कि आपके हाथ और पैर काट डाले जायेंगे!' 'वो' कौन थे, यह मुझे कभी नहीं मालूम हो सका। लेकिन उस क्षण जब हमारी (मेरी और फ़ैज़ की) निगाहें एक-दूसरे से मिलीं तो हमें मालूम हुआ कि बेयक़ीनी (भविष्य के प्रति निराशा) के अनुभव और भय के बीच हम ही अकेले नहीं गुज़र रहे थे।
हैदराबाद तक हमारे सफ़र का मतलब थाअधिाक मुलाक़ातें। उन मौक़ों पर हम (स्वर्गीय) सुहरवर्दी के साथ ठहरते, जो मुलज़िम की क़ानूनी पैरवी कर रहे थे। सलीमा और मुनीज़ा सुहरवर्दी साहब से जैसे बेसाख्ता प्यार करने लगीं, और उनसे निकट आती गयीं। सुहरवर्दी मरहूम बच्चियों के लिए नृत्य-संगीत की धुन पर 'वाल्ट्ज़' करतेग़ोल घेरे में नृत्य। एक दिन सलीमा ने अपने सर को झटकते हुए कहा'आज मैं नहीं नाचूंगी।' लेकिन मुनीज़ा फ़ौरन उछल कर खड़ी हो गयी। सुहरावर्दी साहब ने अपना हाथ आगे बढ़ाया, और पुरानी दुनिया के शिष्टाचार का मूर्त नमूना बनकर, जैसे नृत्य की फ़र्माइश करते हुए किंचित झुके। मुनीज़ा ने एक युवा महिला की तरह झुककर उस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। सुहरावर्दी साहब का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा और वह दोनों कमरे में एक आहिस्ता और मध्दम-से फ़्रांसीसी अंदाज़ के शाहाना नृत्य में तन्मय हो गये। बाद में सुहरवर्दी साहब ने गाड़ी में सिंधु नदी तक चलने का प्रस्ताव पेश किया। और फिर दरिया की मौजों पर कश्ती चलाते हुए उन्होंने हमें एक पंजाबी लोकगीत सुनाया, जो लड़कियों को पहले से याद था। यह सब कुछ कितना आनंदप्रद था! लेकिन जब हम यह सोचते कि यह कुशाग्रबुध्दि और प्रतिभाशाली व्यक्ति कल सुब्ह न्याय की प्राप्ति के लिए जेल की चारदीवारी के अंदर अपना संघर्ष शुरू कर देगा, तो हर बात अर्थहीन और अप्रासंगिक मालूम होने लगती।
'दरबारे-वतन में जब इक दिन...'
यह फ़ैज़ की अत्यधिक प्रिय और लोकप्रिय क़व्वालियों में से है। मुझे हैदराबाद की एक ईद याद है जब अधिकतर बंदियों के परिवार एक ही स्थान पर इकट्ठा हो गये थे। शोख़ रंगों के रंगारंग और भड़कीले कपड़े पहने हुए इतने बच्चे वहां जमा थे जिन्हें देखने वाला यह भी भूल जाता कि बिना किसी अपवाद के उन सबके बाप ऐसे अभियोगों में पकड़े गये थे जिनके आधार पर सरकारी वकील मृत्युदंड तक की मांग कर सकता था।
ईद की उस पार्टी में यह क़व्वाली जिस जोश, चाव और तेज़ धुन में गायी गयी, उसकी कल्पना भी एक मुश्किल काम है।... और जब क़व्वाली ख़त्म हुई तो उस वक्त तक तमाम बच्चे, बीवियां और माएं सभी इस क़व्वाली में शरीक हो चुकी थीं। सबके होंठों पर यही बोल थे :
'दरबारे-वतन में जब इक दिन सब जानेवाले जायेंगे'
हम सबने निहायत पुर-तक़ल्लुफ़ दावत का प्रबंध किया। और जब हम 'घर' यानी डाकबंगले वापस पहुंचे तो बच्चियों ने कहा'ऐसा खाना तो हमने बहुत दिनों से नहीं खाया था! है ना, अम्मी?'
खाने की बात पर मुझे एक दिलचस्प वाक़िआ याद आया। यह उन दिनों का वाक़िआ है जब फ़ैज़ को सज़ा दी जा चुकी थी, और वह अपनी कैद की मीआद मंटगोमरी जेल में पूरी कर रहे थे। मुनीज़ा और सलीमा ने अपने अब्बू को ख़त में लिखा 'हम आ रहे हैं। आप दोपहर के खाने के लिए कोई अच्छी चीज़ ज़रूर पकाइयेगा!' हमें एक साथ दोपहर का खाना खाने की इजाज़त दे दी गयी थी। जब हम लोग मंटगोमरी जेल पहुंचे तो नाइब सुपरिन्टेन्डेन्ट लोधी साहब ने मुनीज़ा से कहा 'तुम्हारे अब्बू ने यक़ीनन तुम्हारे लिए कोई ख़ास चीज़ पकायी होगी।'
'आपको कैसे मालूम हुआ?' मुनीज़ा ने पूछा।
'मैंने तुम्हारे ख़त में पढ़ा था।' लोधी साहब ने जवाब दिया।
जेल के अधिकारीगण निश्चय ही चिट्ठी-पत्री की जांच करते थे। मुनीज़ा उठकर खड़ी हो गयी और बोली'तो क्या तुम मेरे ख़त पढ़ते हो?'
'हां।' लोधी साहब बोले।
'उफ़! बदतमीज़ कहीं के!'
मैं नहीं कह सकती कि यह वाक्य सुनकर लोधी साहब पर क्या बीती। लेकिन मुझे यह अच्छी तरह याद है कि उनके चेहरे पर उस वक्त क़ैसे भाव छा गये थे। चेहरे का रंग उड़ गया था। बेचारे लोधी साहब!
जब 1959 के शुरू महीनों में मार्शल ला के अंतर्गत फ़ैज़ फिर जेल के मेहमान बने तो लाहौर जेल से वह लाहौर क़िले में भेज दिये गये। मैंने उनसे मुलाक़ात के लिए प्रार्थना-पत्र दिया। सी.आई.डी. के अधिकारियों ने जानबूझकर झूठ से काम लिया। उन्होंने इस बात से अपनी अनभिज्ञता प्रकट की कि फ़ैज़ लाहौर जेल से क़िले में ले आये गये हैं। चुनांचे (इस जानबूझकर बोले गये झूठ की वजह से) मैं लाहौर जेल गयी और वहां पता चला कि फ़ैज़ तो वहां से जा चुके हैं। और जब मैंने मुलाक़ात के लिए दोबारा प्रार्थना-पत्र दिया तो मैं गुस्से के मारे सचमुच उबल पड़ी थी। आख़िरकार मैं अपनी बूढ़ी सास के साथ लाहौर क़िले पहुंची। फ़ैज़ को उनकी कोठरी से बुलाया गया। उन्हें देखते ही मुझे अंदाज़ा हुआ कि या तो उन्हें शेव करने की इजाज़त नहीं दी गयी या उन्होंने ख़ुद ही दाढ़ी बनाने का कष्ट नहीं उठाया। उनके चेहरे से पता चलता था कि उनके पिछले चौबीस घंटे ख़ुशगवार हर्गिज़ न थे।
मैंने पूछा'तुमने नाश्ता किया है?'
फ़ैज़ ने मुस्कराते हुए जवाब दिया 'हां।'
'क्या?' यह था मेरा दूसरा सवाल।
'ओ..! एक बन, एक प्याली चाय!' फ़ैज़ ने जवाब दिया।
'बन्' का शब्द सुनते ही मैं जैसे बारूद बन गयी। जैसे किसी ने बंदूक की लबलबी पर हाथ रख दिया हो। मेरे स्वभाव में यह परिवर्तन क्योंकर हुआ? इसका जवाब मुझे भी कभी न मिल सका। लेकिन शायद उस वक्त 'बन्' एक अर्थपूर्ण चिन्ह बन गया था। एक संकेत उन तमाम अन्यायों, दुख-दर्द,अपमान, धोखा-फ़रेब और झूठ का था, जिनका मैं गत कई महीने से शिकार थी।
मैं क्रोध से उत्तेजित होकर जेलर की तरफ़ पलटी और चीख़ उठी : 'तुमने मेरे शौहर को बन् दिया!... सिर्फ़ बन्!' जेलर का मुंह खुला। मगर मैंने उसे एक शब्द भी कहने का मौक़ा न दिया। मैं फिर बरस पड़ी : 'तुम क्या जानो! उन्होंने अपनी ज़िदंगी में कभी बन् नहीं खाया। तुमने बन् ही तो कहा था? बन्! बन्!'
बेचारा ग़रीब आदमी कुछ न बोला। लेकिन अपने आवेशपूर्ण भाषण के बाद मैंने एक अजीब-सी शांति अनुभव की। ऐसा संतोष जिसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता। उस क्रोधावेश से भरे समय के एक घंटे बाद जब मैं घर गयी तो मैंने अंडों, मक्खन, डबल रोटी से एक टोकरी भरी और जेलर के नाम एक पुर्ज़ा लिखकर भेज दिया कि 'नाश्ता इस क़िस्म की चीज़ को कहा जाता है।'
बाद में 'बन्' के वाक़िए पर हम दोनों बेतहाश हंसा करते थे, ऐसी हंसी जो ख़त्म होने को ही न आती थी। क्योंकि, लाहौर के क़िले की-सी काल-कोठरी में कैद आदमी के लिए 'बन्' का महत्व ही क्या था!... लेकिन शायद उस समय उस 'बन्' का महत्व उस लंबे और थका देनेवाले एकाकीवास और खोखलेपन से जुड़ गया था जो भविष्य के पर्दे में छुपा हुआ था।
मेरी सास ने मुझे बाद में बताया कि मेरे पुरजोश भाषण को सुनकर वह यह समझी थीं कि फ़ैज़ को शायद क़िले में यातना दी गयी थी जिस पर मैं बिगड़ रही थी।
फ़ैज़ से (विभिन्न जेलों में) मिलने के लिए हमें अक्सर रेलगाड़ी में सफ़र करना पड़ता था। हम लोग तीसरे या दरमियाने दर्जे में सफ़र करते थे। इसलिए बच्चियों को साथ के यात्रियों से बात भी ज़रा ज़ियादा ही करनी पड़ती थी। (ऊंचे क्लासों के मुसाफ़िर-तौबा! कसे रा बा-कसे कारे न बाशद!1) सलीमा से जब कोई पूछता कि उसके माता-पिता कौन हैं और क्या करते हैं, तो वह झिझक जाती थी। एक ऐसे मौक़े पर मैंने उसे यह कहते सुना (उसका चेहरा सुर्ख़ हो गया था-क्योंकि उसे सफ़ेद झूठ से नफ़रत थी)'अब्बू हैदराबाद में काम करते हैं!' मुनीज़ा उसकी तरफ़ मुड़ी और गुस्से में उसके हाथ पर हाथ मारती हुई बोली-'चल! झूठी कहीं की! वह जेल में हैं!'
कुछ दिन हुए मुझे एक कापी मिली, जिसमें जेल से फ़ैज़ की वापसी के बाद तक के वाक़िआत हैं। इतने दिनों की ग़ैरहाज़िरी के बाद हमें एक बार फिर फ़ैज़ को अपनी घरेलू ज़िंदगी का हिस्सा बनाना था हमारी घरेलू ज़िंदगी, जो पितृसत्तात्मक व्यवस्था के स्थान पर एक विशुध्द और सुदृढ़ मातृसत्तात्मक व्यवस्था बन गयी थी! हम इस कापी को 'एकता-योजना' (वन यूनिट प्लैन) कहते थे और हममें से हरेक का नाम पाकिस्तान के किसी भूतपूर्व प्रांत के नाम पर था। इस 'एकता' में एक भानजा भी शामिल था। हमारा काम और ज़िम्मेदारी यह थी कि पुरानी और नयी आदतों में और घर के नये सदस्यों के साथ आपसी मतभेदों का फ़ैसला करें घरेलू ज़िदंगी को बेहतर और सुखद बनाने के लिए।
हम हर सप्ताह एक मीटिंग करते थे। शिकायतें पेश होती थीं, और उनके हल ढूंढे जाते थे।
अब मैं इस कापी पर नज़र डालती हूं तो ऐसे वाक्य और याद दिहानियां नज़र आती हैं :
'मैं कुछ सहेलियों को चाय पर बुलाना चाहती हूं। क्या इसकी गुंजाइश निकल सकती है?'
'हमें घर पर सालगिरह (बर्षगांठ) की पार्टी करनी चाहिए।'
'अब्बू को बालरूम डांसिंग सीखने की मश्क़ ज़रूर करनी चाहिए।'
'नसीर को अपनी अल्मारी के ख़ाने ख़ुद साफ़ करने चाहिए।'
'अब्बू को एक दिन में तीस से ज़ियादा सिगरेट नहीं फूंकने चाहिए। अगर वह नहीं मानेंगे तो मैं यह शिकायत कापी पर पांच मर्तबा लिखूंगी।'
'घर पर जब कोई दावत हो तो बड़ों के साथ बच्चों को भी बुलाया जाये।'
कभी-कभी 'सीमाप्रांत' की तरह मुनीज़ा आंदोलनकर्त्ता बन जाती और शोर मचाती। उसकी ज़िंदगी में यह नया अनुशासन शांति के साथ नहीं आया। फ़ैज़ 'सिंधा' थे, क्योंकि सलीमा कहती थी 'अब्बू तो सिंधा से ही तअल्लुक़ रखते हैं।' और मैं 'बलूचिस्तान' थी, शायद इसलिए कि कभी-कभी मैं दूसरों के लिए असुविधाा का कारण बन जाती। हमारे आर्थिक साधान सीमित थे, और मांगें बढ़ती जा रही थीं। और हमें बहुत-सी अच्छी चीज़ों की सीमा बांधानी पड़ती थी(अासान उर्दू में 'राशनबंदी') और यह सीमाबंदी उस वक्त तक आवश्यक थी जब तक फ़ैज़ जेल से लौटकर दोबारा काम शुरू न कर देते। लेकिन जल्द ही हमारा लोकतंत्रा सफल हो गया। और कुछ ही अर्से बाद हमारा घर ऐसे ढंग पर चल रहा था जैसे घर का सरपरस्त इस घर से बाहर कभी गया ही न हो।
उर्दू से अनुवाद : शमशेर बहादुर सिंह
(नयापथ के फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ विशेषांक से साभार,लेखिका फ़ैज़ की पत्नी हैं)







गुरुवार, 3 मार्च 2011

साहित्य का शार्टकट और बौनी राजनीति


               (पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य)        
     तेरह फरवरी को वाम मोर्चे की पहली विशाल चुनावी सभा थी और उसी दिन सन् 1911 में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का जन्म भी हुआ था। वाम मोर्चे की रैली में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के हाथों फै़ज़ के ऊपर बनी एक पेंटिंग का लोकार्पण किया। यह मेरी नजर में फ़ैज़ के जरिए सस्ती वोट राजनीति का सबसे घटिया उदाहरण है। उल्लेखनीय है वाम मोर्च ने पश्चिम बंगाल में पूरे एक साल फ़ैज़ पर कुछ नहीं किया। यहां तक कि नवगठित पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी के द्वारा फ़ैज़ पर प्रस्तावित कार्यक्रम के लिए सामान्य सा धन भी आवंटित नहीं किया। वे कार्यक्रम नहीं कर पाए। सारे देश में माकपा ने कोई कार्यक्रम नहीं किया। सिर्फ माकपा संचालित जनवादी लेखक संघ ने 'नयापथ' का एक शानदार अंक निकाला है। कम से कम माकपा के पश्चिम बंगाल के नेताओं को फ़ैज़ की विरासत का अपने को वारिस कहने का कोई हक नहीं है।
     अगर फ़ैज़ पश्चिम बंगाल में रहे होते तो सुभाष मुखोपाध्याय और महाश्वेता देवी की तरह माकपा के खिलाफ जनता के साथ खड़े होते। फ़ैज़ उन वामपंथी लेखकों में हैं जिन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा के कठमुल्लेपन और बौद्धिकता और बुद्धिजीवी विरोधी रूझानों के खिलाफ सारी दुनिया में बिगुल बजाया था। इसके लिए उन्होंने अलग से विश्व संगठन भी बनाया था। यह संगठन बुनियादी तौर पर वामदलों में बुद्धिजीवी विरोधी मानसिकता के खिलाफ प्रतिवादस्वरूप बनाया गया था। माकपा ने अपने अब तक के व्यवहार से यह साबित नहीं किया है कि उस दल के अंदर बुद्धिजीवियों को सम्मान का दर्जा हासिल है। माकपा आज तक पोलिट ब्यूरो-केन्द्रीय समिति में बुद्धिजीवियों को एक भी पद नहीं दे पायी है।
      पश्चिम बंगाल में पार्टीनेता आए दिन बुद्धिजीवियों का सरेआम उपहास उड़ाते हैं और उन्हें स्वतंत्र रूप से लिखने और बोलने नहीं देते। जो बुद्धिजीवी नौकरीपेशा हैं और माकपा से असहमत हैं उन्हें विभिन्न तरीकों से परेशान किया जाता है। जबकि फ़ैज़ ने अपनी सारी जिंदगी लेखक की अभिव्यक्ति की आजादी और राजनीतिक गरिमा के लिए कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर,बाहर और विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन में संघर्ष किया था।
     पश्चिम बंगाल के माकपा नेताओं को चुनाव सभा में फ़ैज़ इसलिए याद आए क्योंकि वे मुसलमान थे और माकपा के नेताओं को लगा होगा कि फ़ैज़ की पेंटिंग का विमोचन शायद मुसलमानों में पार्टी की साख दुरूस्त कर दे। लेकिन इस शार्टकट से मुसलमानों का दिल जीतना संभव नहीं है।
फ़ैज उन तमाम लेखकों के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं जो समाज को बदलना चाहते हैं, अमेरिकी साम्राज्यवाद की सांस्कृतिक-आर्थिक गुलामी और विश्व में वर्चस्व स्थापित करने की मुहिम का विरोध करना चाहते हैं, सत्ता और राजनीतिक गुलामी से मुक्त होकर जनता की मुक्ति के प्रयासों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहते हैं। फ़ैज़ इन दिनों पश्चिम बंगाल के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।   
    आज भारत में अनेक प्रगतिशील कवियों और लेखकों  ने भारत में सत्ता के सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया है। मजदूरों के पक्ष में बोलना बरसों से बंद कर दिया है। देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों की मलाई खाने और प्रतिष्ठानी कर्मकांड का अपने को हिस्सा बना लिया है। खासकर उर्दू की प्रगतिशील कविता का तो और भी बुरा हाल है। उसमें मजदूरों-किसानें की हिमायत करके रहना तो एकदम असंभव हो गया है। उर्दू के अधिकांश कवियों-साहित्यकारों ने मजलूमों के हकों के लिए जंग की बजाय सिनेमा उद्योग की जंग में सारी शक्ति लगानी बेहतर समझी है या आधुनिकतावादी चोगा पहन लिया है या फिर अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया है और खुल्लम-खुल्ला अमेरिकी नजरिए से उर्दू और मुसलमानों के मसलों को देख रहे हैं। हमें थोड़ा ईमानदारी के साथ एक बार हिन्दी-उर्दू के साहित्यकारों और लेखकों के साहित्यिक कर्मकांड के बाहर जाकर फ़ैज़ की जिन्दगी के तजुर्बों की रोशनी में ,उन मानकों की रोशनी में हिन्दी-उर्दू की प्रगतिशील साहित्य परंपरा और लेखकीय कर्म पर आलोचनात्मक नजरिए से विचार करना चाहिए कि आखिरकार ऐसा क्या हुआ जिसके कारण फ़ैज़ ने सारी जिन्दगी सत्ता के जुल्मो-सितम के सामने समर्पण नहीं किया लेकिन उर्दू-हिन्दी के अधिकांश कवियों और लेखकों ने समर्पण कर दिया।
        फ़ैज़ की कविता में जिन्दगी का यथार्थ ही व्यक्त नहीं हुआ है बल्कि उन्होंने अपने कर्म और कुर्बानी से पहले अविभाजित भारत और बाद में पाकिस्तान में एक आदर्श मिसाल कायम की है। सर्वहारा के लिए सोचना,उसके लिए जीना और उसके लिए किसी भी कुर्बानी के लिए तैयार रहना यही सबसे बड़ी विशेषता थी जिसके कारण फ़ैज़ सिर्फ फ़ैज़ थे। मजदूरों की जीवनदशा पर उनसे बेहतर पंक्तियां और कोई लिख ही नहीं पाया । उन्होंने लिखा-
‘‘जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है.’’
मजदूरों के अधिकारों का हनन,उनका उत्पीड़न और उन पर बढ़ रहे जुल्म ही थे जिनके कारण उनकी कविता महान कविता में तब्दील हो गयी। मजदूर की पीड़ा उन्हें बार-बार आंदोलित करती थी,बेचैन करती थी। मजदूरों के हकों का इतना बड़ा कवि भारतीय उपमहाद्वीप में दूसरा नहीं हुआ।
  फ़ैज़ की कविता में जाति,धर्म,साम्प्रदायिकता,राष्ट्र,राष्ट्रवाद,पार्टीलाइन आदि का अतिक्रमण दिखाई देता है । उन्होंने सचेत रूप में समूची मानवता और मानव जाति के सबसे ज्यादा वंचित वर्गों पर हो रहे जुल्मों के प्रतिवाद में अपना सारा जीवन लगा दिया।  वे मात्र उर्दू कवि नहीं थे। बल्कि मजदूरवर्ग के महाकवि थे। वे सारी जिंदगी सर्वहारावर्ग के बने रहे। वे अविभाजित भारत और बाद में पाकिस्तान सर्वहारा की जंग के महायोद्धा बने रहे। फ़ैज़ उन बड़े कवियों में हैं जिनकी चेतना ने राष्ट्र और राष्ट्रवाद का सही अर्थों में अतिक्रमण किया था और समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के मजदूरों-किसानों और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कविता लिखने से लेकर जमीनी स्तर तक की वास्तव लड़ाईयों का नेतृत्व किया था।  महाकवि  फ़ैज़ का सियालकोट (पंजाब,पाकिस्तान) में 13 फरवरी 1911 को जन्म हुआ था। फ़ैज़ ने उर्दू कविता को नई बुलंदियों तक पहुँचाया। फ़ैज़ एक ही साथ इस्लाम और मार्क्सवाद के धुरंधर विद्वान थे। उनके घर वालों ने बचपन में उनको कुरान की शिक्षा दी। उर्दू-फारसी-अरबी की प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने अंग्रेजी और अरबी में एम.ए. किया था लेकिन वे कविताएं उर्दू में करते थे। फ़ैज़ ने 1942 से 1947 तक सेना में काम किया।बाद में लियाकत अली खाँ की सरकार के तख्ता पलट करने की साजिश की जुर्म में 1951-1955 तक जेल की हवा खानी पड़ी।
  फ़ैज़ के व्यक्तित्व में जो बागीपन है उसका आधार है दुनिया की गुलामी, गरीबी, लोकतंत्र का अभाव और साम्राज्यवाद का वर्चस्वशाली चरित्र। आज हमें 1983 के एफ्रो-एशियाई लेखक संघ की रजत जयंती के मौके पर उनके द्वारा दिए गए  भाषण की याद आ रही है ,यह भाषण बहुत ही महत्वपूर्ण है। फ़ैज़ ने कहा था इस युग की दो प्रधान समस्याएं हैं उपनिवेशवाद और नस्लवाद। फ़ैज़ ने कहा , "हमारा इस बात में दृढ़ विश्वास है कि साहित्य बहुत गहराई से मानवीय नियति के साथ जुड़ा है,कि स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता के बिना साहित्य का विकास संभव नहीं है,कि उपनिवेशवाद और नस्लवाद का समूल नाश साहित्य को सृजनात्मकता के संपूर्ण विकास के लिए बेहद ज़रूरी है।"
    फ़ैज़ ने इन समस्याओं पर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रोशनी डालते हुए लिखा '' तमाम युद्धों के अंत की तरह,लड़े गए पहले महायुद्ध के बाद सामाजिक,नैतिक और साहित्यिक बूर्जुआ मान्यताओं और वर्जनाओं के टूटने और समृद्धि के एक संक्षिप्त दौर में विजेताओं के दिमाग़ में अहं का उन्माद उफनने लगा था। ख़ुदा आसमान पर था और धरती पर सब कुछ मज़े में चल रहा था। नतीजतन ज्यादातर पश्चिमी और कुछ उपनिवेशों के साहित्य ने उसे आदर्श के रूप में अपना लिया। बड़े पैमाने पर शुद्ध रूपवाद के आनंद का सम्मोहन,अहं केन्द्रित चेतना की रहस्यात्मकता से लगाव,रूमानी मिथकों और कल्पित आख्यानों के बहकावों के साथ 'कला के लिए कला' के उद्धबोधक सौंदर्यशास्त्रियों द्वारा अभिकल्पित गजदंती मीनारों का निर्माण होने लगा।"आज भी अनेक बुद्धिजीवी हैं जो परमाणु हथियारों की दौड़ के घातक परिणामों से अनभिज्ञ हैं। इस दौड़ ने सोवियत संघ के समाजवादी ढ़ांचे को तबाह किया और शांति के बारे में जो खयाल थे उन्हें नुकसान पहुँचाया । फ़ैज़ इस फिनोमिना की परिणतियों पर नजर टिकाए हुए थे।
    द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर के बारे में उन्होंने लिखा , " युद्ध के बाद का हमारा समय, विराट अंतर्विरोधों से ग्रस्त हमारा युग,विजयोल्लास और त्रासदियों से भरा युग,उत्सवों से भरा और हृदयविदारक युग,बड़े सपनों और उनसे बड़ी कुण्ठाओं का ज़माना। तीसरी दुनिया की जनता के लिए ,एशियाई ,अफ्रीकी और लातीनी अमेरिकी लोगों के लिए ,कम से कम इनकी एक बड़ी आबादी के लिए,किसी को तत्काल डिकेंस के शब्द याद आ जायेंगे-' वह बेहतरीन वक़्त था,वह बदतरीन वक़्त था।' परमाणु हथियारों की दौड़ पर लिखा- "आणविक हथियारों के जिन्न को बंद बोतल से आज़ाद करते हुए अमेरिका ने समाजवादी खेमे को भी ऐसा ही करने का आमंत्रण दे दिया। उस दिन से आज तक हमारी दुनिया की समूची सतह पर विनाश के डरावने साये की एक मोमी परत चढ़ी है और आज जितने खतरनाक तरीके से हमारे सामने झूल रही हैं .उतनी पहले कभी न थी।" राजनीति में इस जमाने को शीतयुद्ध के नाम से जानते हैं। इस जमाने में मुक्त विश्व का नारा दिया गया। मुक्त विश्व के साथ मुक्त बाजार और मुक्त सूचना प्रवाह को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। इसी के अगले चरण के रूप में नव्य उदारतावाद आया। मुक्त विश्व की धारणाओं का मीडिया से जमकर प्रचार किया गया। इसके पक्षधर हमारे बीच में अभी भी हैं और अहर्निश मुक्त विश्व और मुक्त बाजार की हिमायत करते रहते हैं। इसके बारे में फ़ैज़ ने लिखा- "स्वतंत्र विश्व के नाम पर संभवतः हमारे इतिहास के घोर अयथार्थ ढ़ोल नगाड़ों के शोर के साथ अमेरिकन शासन तंत्र ने यहां वहां ढ़ेर सारे निरंकुश राजाओं-सुल्तानों,ख़ून के प्यासे अधिनायक-तानाशाहों,बेदिमाग़ दुस्साहसी सेनापतियों और हवा-हवाई किस्म के राजनीतिज्ञों,जिस पर भी हाथ रख सकें,को सत्ता के सिंहासन पर बैठाने की कोशिशें की हैं और बैठाया भी है । यह कार्रवाई वियतनाम से बड़ी बदनामी के बाद हुई अमेरिकन विदाई के साथ कुछ वक़्त के लिए रुक सी गयी थी। फिर रोनाल्ड रीगन के ज़माने से हम अमेरिकनों और उनके नस्लवादी साथियों को यहां-वहां भौंकते शिकारी कुत्तों की तरह इन तीन महाद्वीपों में जैसे बिखरे बारूद के ढ़ेरों के आसपास देख रहे हैं।" अमेरिका द्वारा संचालित शीतयुद्ध ने संस्कृतिकर्मियों को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है। इस पर फ़ैज़ ने लिखा है, "नये शोषक वर्ग और निरंकुश तानाशाही के उदय और वैयक्तिक और सामाजिक मुक्ति के सपनों के ढ़ह जाने से युवापीढ़ी मोहभंग ,सनकीपन और अविश्वास की विषाक्त चपेट में आ गयी है। नतीजतन बहुत से युवा लेखक पश्चिमी विचारकों द्वारा प्रतिपादित किए जा रहे जीवित यथार्थ से रिश्ता तोड़ने,उसके मानवीय और शैक्षणिक पक्ष को अस्वीकार करने और लेखक को तमाम सामाजिक ज़िम्मेदारियों से मुक़्त होने जैसे प्रतिक्रियावादी विचारों और सिद्धान्तों के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। इन वैचारिक मठों और गढ़ों से रूपवाद,संरचनावाद,  अभिव्यक्तिवाद और अब 'लेखक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता' जैसे ऊपर से अत्यंत आकर्षक लगने वाले नारे की लगातार वकालत की जा रही है। इसका जाहिर उद्देश्य लेखक को अपनी सामाजिक, राजनीतिक,विचारधारात्मक प्रतिबद्धता से दूर करना है। इस सारे विभ्रम को विचारपूर्ण तरीक़ों से हटाने की जरूरत है।"

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

अविकसित देशों की सांस्कृतिक समस्याएं- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

(शीमा माजिद द्वारा संपादित फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के चुनिंदा अंग्रेज़ी लेखों का संग्रह 'कल्चर एंड आइडेंटिटी: सिलेक्टेड इंग्लिश राइटिंग्स ऑफ़ फ़ैज़ (ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, ) अपनी तरह का पहला संकलन है। इस संकलन में फ़ैज़ के संस्कृति, कला, साहित्य, सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लेख इसी शीर्षक से पांच खंडों में विभाजित हैं। इनके अलावा एक और 'आत्म-कथ्यात्मक' खंड है, जिसमें प्रमुख है फ़ैज़ द्वारा 7 मार्च (अपने इंतकाल से महज़ आठ महीने पहले) को इस्लामाबाद में एशिया स्टडी ग्रुप के सामने कही गयी बातों को ट्रांसक्रिप्ट करके संकलित किया गया है। इस महत्वपूर्ण पुस्तक की भूमिका पाकिस्तान में उर्दू साहित्य के मशहूर आलोचक मुहम्मद रज़ा काज़िमी ने लिखी है। शायरी के अलावा फ़ैज़ साहब ने उर्दू और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में साहित्यिक आलोचना और संस्कृति के बारे में विपुल लेखन किया है। साहित्य की प्रगतिशील धारा के प्रति उनका जगज़ाहिर झुकाव इस संकलन के कई लेखों में झलकता है। इस संकलन में शामिल अमीर ख़ुसरो, ग़ालिब, तोल्स्तोय, इक़बाल और सादिक़ैन जैसी हस्तियों पर केंद्रित उनके लेख उनकी 'व्यावहारिक आलोचना' (एप्लाइड क्रिटिसिज्म) की मिसाल हैं। यह संकलन केवल फ़ैज़ के साहित्यिक रुझानों पर ही रौशनी नहीं डालता बल्कि यह पाकिस्तान और समूचे दक्षिण एशिया की संस्कृति और विचार की बेहद साफ़दिल और मौलिक व्याख्या के तौर पर भी महत्वपूण है। इसी पुस्तक के एक लेख 'कल्चरल प्राब्लम्स इन इंडरडिवेलप्ड कंट्रीज़' का तर्जुमा हम पेश कर रहे हैं। )इनसानी समाजों में संस्कृति के दो मुख्य पहलू होते हैं; एक बाहरी, औपचारिक; और दूसरा आंतरिक वैचारिक संस्कृति के बाह्य स्वरूप, जैसे सामाजिक और कला-संबंधी, संस्कृति के आंतरिक वैचारिक पहलू की संगठित अभिव्यक्ति मात्र होते हैं और दोनों ही किसी भी सामाजिक संरचना के स्वाभाविक घटक होते हैं। जब यह संरचना परिवर्तित होती है या बदलती है तब वे भी परिवर्तित होते हैं या बदलते हैं और इस जैविक कड़ी के कारण वे अपने मूल जनक जीव में भी ऐसे बदलाव लाने में असर रखते हैं या उसमें सहायता कर सकते हैं। इसलिए सांस्कृतिक समस्याओं का अध्ययन या उन्हें समझना सामाजिक समस्याओं अर्थात राजनीतिक और आर्थिक संबंधों की समस्याओं से पृथक करके नहीं किया जा सकता। इसलिए अविकसित देशों की सांस्कृतिक समस्याओं को व्यापक परिप्रेक्ष्य में यानी सामाजिक समस्याओं के संदर्भ में रखकर समझना और सुलझाना होगा। फिर अविकसित देशों की मूलभूत सांस्कृतिक समस्याएं क्या हैं? उनके उद्गम क्या हैं और उनके समाधान के रास्ते में कौन से अवरोध हैं?

मोटे तौर पर तो ये समस्याएं मुख्यत: कुंठित विकास की समस्याएं हैं; वे मुख्यत: लंबे समय के साम्राज्यवादी-उपनिवेशवादी शासन और पिछड़ी, कालबाह्य सामाजिक संरचना के अवशेषों से उपजी हुई हैं। इस बात का और अधिक विस्तार से वर्णन करना ज़रूरी नहीं। सोलहवीं और उन्नीसवीं सदी के बीच एशिया,अफ़्रीका और लातिन अमरीका के देश यूरोपीय साम्राज्यवाद से ग्रस्त हुए। उनमें से कुछ अच्छे-ख़ासे विकसित सामंती समाज थे जिनमें विकसित सामंती संस्कृति की पुरातन परंपराएं प्रचलित थीं। औरों को अभी प्रारंभिक ग्रामीण क़बीलाईवाद से परे जाकर विकास करना था। राजनीतिक पराधीनता के दौरान उन देशों का सामाजिक और सांस्कृतिक विकास रुक सा गया और यह राजनीतिक स्वतंत्राता प्राप्त होने तक रुका ही रहा। तकनीकी और बौध्दिक श्रेष्ठता के बावजूद इन प्राचीन सामंतवादी समाजों की संस्कृति एक छोटे से सुविधासंपन्न वर्ग तक ही सीमित थी और उसका अंतर्मिश्रण जन साधारण की समानांतर सीधी सहज लोक संस्कृति से कदाचित ही होता। अपनी बालसुलभ सुंदरता के बावजूद आदिम क़बीलाई संस्कृति में बौध्दिक तत्व कम ही था। एक ही वतन में पास-पास रहने वाले क़बीलाई और सामंतवादी समाज दोनों ही अपने प्रतिद्वंद्वियों के साथ लगातार क़बीलाई, नस्ली और धार्मिक या दीगर झगड़ों में लगे रहते। अलग-अलग क़बीलाई या राष्ट्रीय समूहों के बीच का खड़ा विभाजन (vertical division)। और एक ही क़बीलाई या राष्ट्रीय समूह के अंतर्गत विविधा वर्गों के बीच का क्षैतिज विभाजन (horizontal division), इस दोहरे विखंडन को उपनिवेशवादी-साम्राज्यवादी प्रभुत्व से और बल मिला। यही वह सामाजिक औरसांस्कृतिक मूलभूत ज़मीनी संरचना है जो नवस्वाधीन देशों को अपने भूतपूर्व मालिकों से विरासत में मिली है।

एक बुनियादी सांस्कृतिक समस्या जो इनमें से बहुत से देशों के आगे मुंह बाये खड़ी है, वह है सांस्कृतिक एकीकरण की समस्या, नीचे से ऊपर तक एकीकरण जिसका अर्थ है विविधा राष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रतिरूपों को साझा वैचारिक और राष्ट्रीय आधार प्रदान करना और क्षैतिज एकीकरण जिसका अर्थ है अपने समूचे जन समूह को एक से सांस्कृतिक और बौध्दिक स्तर तक ऊपर उठाना और शिक्षित करना। इसका मतलब यह कि उपनिवेशवाद से आज़ादी तक के गुणात्मक राजनीतिक परिवर्तन के पीछे-पीछे वैसा ही गुणात्मक परिवर्तन उस सामाजिक संरचना में होना चाहिए जिसे उपनिवेशवाद अपने पीछे छोड़ गया है।एशियाई, अफ़्रीकी और लातिन अमरीकी देशों पर जमाया गया साम्राज्यवादी प्रभुत्व विशुध्द राजनीतिक आधिपत्य की निष्क्रिय प्रक्रिया मात्र नहीं था और वह ऐसा हो भी नहीं सकता था। इसे सामाजिक और सांस्कृतिक वंचना (deprivation) की क्रियाशील प्रक्रिया ही होना था और ऐसा था भी। पुराने सामंती या प्राक्-सामंती समाजों में कलाओं, कौशलों, प्रथाओं, रीतियों, प्रतिष्ठा, मानवीय मूल्यों और बौध्दिक प्रबोधान के माधयम से जो कुछ भी अच्छा, प्रगतिशील और अग्रगामी था उसे साम्राज्यवादी प्रभुत्व ने कमज़ोर करने और नष्ट करने की कोशिश की। और अज्ञान, अंधविश्वास, जीहुज़ूरी और वर्ग शोषण अर्थात जो कुछ भी उनमें बुरा, प्रतिक्रियावादी और प्रतिगामी था उसे बचाये और बनाये रखने की कोशिश की। इसलिए साम्राज्यवादी प्रभुत्व ने नवस्वाधीन देशों को वह सामाजिक संरचना नहीं लौटायी जो उसे शुरुआत में मिली थी बल्कि उस संरचना के विकृत और बर्बाद कर दिये गये अवशेष उन्हें प्राप्त हुए। और साम्राज्यवादी प्रभुत्व ने भाषा, प्रथा, रीतियों, कला की विधाओं और वैचारिक मूल्यों के माध्यम से इन अवशेषों पर अपने पूंजीवादी सांस्कृतिक प्रतिरूपों की घटिया, बनावटी, सेकंड-हैंड नक़लें अध्यारोपित कीं।

अविकसित देशों के सामने इस वजह से बहुत सी सांस्कृतिक समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। पहली समस्या है अपनी विध्वस्त राष्ट्रीय संस्कृतियों के मलबे से उन तत्वों को बचा कर निकालने की जो उनकी राष्ट्रीय पहचान का मूलाधार है, जिनका अधिक विकसित सामाजिक संरचनाओं की आवश्यकताओं के अनुसार समायोजन और अनुकूलन किया जा सके, और जो प्रगतिशील सामाजिक मूल्यों और प्रवृत्तियों को मज़बूत बनाने और उन्हें बढ़ावा देने में मदद करे। दूसरी समस्या है उन तत्वों को नकारने और तजने की

जो पिछड़ी और पुरातन सामाजिक संरचना का मूलाधार हैं, जो या तो सामाजिक संबंधों की और विकसित व्यवस्था से असंगत हैं या उसके विरुध्द हैं, और जो अधिक विवेकवान, बुध्दिपूर्ण और मानवीय मूल्यों और प्रवृत्तियों की प्रगति में बाधा बनते हैं। तीसरी समस्या है, आयातित विदेशी और पश्चिमी संस्कृतियों से उन तत्वों को स्वीकार और आत्मसात करने की जो राष्ट्रीय संस्कृति को उच्चतर तकनीकी, सौंदर्यशास्त्रीय और वैज्ञानिक मानकों तक ले जाने में सहायक हों, और चौथी समस्या है उन तत्वों का परित्याग करने की जो अध:पतन, अवनति और सामाजिक प्रतिक्रिया को सोद्देश्य बढ़ावा देने का काम करते हैं।

तो ये सभी समस्याएं नवीन सांस्कृतिक अनुकूलन, सम्मिलन और मुक्ति की हैं। और इन समस्याओं का समाधान आमूल सामाजिक (अर्थात राजनीतिक, आर्थिक और वैचारिक) पुनर्विन्यास के बिना केवल सांस्कृतिक माध्यम से नहीं हो सकता। इन सभी बातों के अलावा, अविकसित देशों में राजनीतिक स्वतंत्रता के आने से कुछ नयी समस्याएं भी आयी हैं। पहली समस्या है उग्र-राष्ट्रवादी पुनरुत्थानवाद, और दूसरी है नव-साम्राज्यवादी सांस्कृतिक पैठ की।

इन देशों के प्रतिक्रियावादी सामाजिक हिस्से; पूंजीवादी, सामंती, प्राक-सामंती और उनके अभिज्ञ और अनभिज्ञ मित्रागण ज़ोर देते हैं कि सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा के अच्छे और मूल्यवान तत्वों का ही पुन: प्रवर्तन और पुनरुज्जीवन नहीं किया जाना चाहिए बल्कि बुरे और बेकार मूल्यों का भी पुन: प्रवर्तन और स्थायीकरण किया जाना चाहिए। आधाुनिक पाश्चात्य संस्कृति के बुरे और बेकार तत्वों का ही नहीं बल्कि उपयोगी और प्रगतिशील तत्वों का भी अस्वीकार और परित्याग किया जाना चाहिए। इस प्रवृत्ति के कारण एशियाई और अफ़्रीकी देशों में कई आंदोलन उभरे हैं, इन सारे आंदोलनों के उद्देश्य मुख्यत: राजनीतिक हैं, अर्थात बुध्दि संपन्न सामाजिक जागरूकता के उभार में बाधा डालना और इस तरह शोषक वर्गों के हितों और विशेषाधिकारों की पुष्टि करना।

उसी समय नव-उपनिवेशवादी शक्तियां, मुख्यत: संयुक्त राज्य अमरीका, अपराध, हिंसा, सिनिसिज्म, विकार और लंपटता का महिमामंडन और गुणगान करने वाली दूषित फ़िल्मों, पुस्तकों, पत्रिकाओं, संगीत, नृत्यों, फ़ैशनों के रूप में सांस्कृतिक कचरे, या ठीक-ठीक कहें तो असांस्कृतिक कचरे के आप्लावन से प्रत्येक अविकसित देश के समक्ष खड़े सांस्कृतिक शून्य को भरने की कोशिश कर रही हैं। ये सभी निर्यात अनिवार्यत: अमरीकी सहायता के माधयम से होने वाले वित्तीय और माल के निर्यात के साथ साथ आते हैं और उनका उद्देश्य भी मुख्यत: राजनीतिक है अर्थात अविकसित देशों में राष्ट्रीय और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ने से रोकना और इस तरह उनके राजनीतिक और बौध्दिक परावलंबन का स्थायीकरण करना। इसलिए इन दोनों समस्याओं का समाधान भी मुख्यत: राजनीतिक है अर्थात् देशज और विदेशी प्रतिक्रियावादी प्रभावों की जगह प्रगतिशील प्रभावों को स्थानापन्न करना। और इस काम में समाज के अधिक प्रबुध्द और जागरूक हल्क़ों जैसे लेखकों, कलाकारों और बुध्दिजीवियों की प्रमुख भूमिका होगी। संक्षेप में, कुंठित विकास, आर्थिक विषमता, आंतरिक विसंगतियां, नक़लचीपन आदि अविकसित देशों की प्रमुख सांस्कृतिक समस्याएं मुख्यत: सामाजिक समस्याएं हैं। वे एक पिछड़ी हुई सामाजिक संरचना के संगठन, मूल्यों और प्रथाओं से जुड़ी हुई समस्याएं हैं। इन समस्याओं का कारगर समाधान तभी होगा जब राष्ट्रीय मुक्ति के लिए संपन्न हो चुकी राजनीतिक क्रांति के पश्चात राष्ट्रीय स्वाधाीनता को पूर्ण करने के लिए सामाजिक क्रांति भी होगी।

अंग्रेजी से अनुवाद : भारत भूषण तिवारी

(नयापथ के फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ विशेषांक से साभार)







शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

आपबीती दास्तान-2- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


हमारे शायरों को हमेशा यह शिकायत रही है कि ज़माने ने उनकी क़द्र नहीं की। ... हमें इससे उलट शिकायत यह है कि हम पे लुत्फ़ो-इनायात की इस क़दर बारिश रही है; अपने दोस्तों की तरफ़ से, अपने मिलनेवालों की तरफ़ से और उनकी जानिब से भी जिनको हम जानते भी नहीं क़ि अक्सर दिल में हिचक महसूस होती है कि इतनी तारीफ़ और वाहवाही पाने का हक़दार होने के लिए जो थोड़ा-बहुत काम हमने किया है, उससे बहुत ज़ियादा हमें करना चाहिए था।
यह कोई आज की बात नहीं है। बचपन ही से इस क़िस्म का असर औरों पर रहा है। जब हम बहुत छोटे थे, स्कूल में पढ़ते थे, तो स्कूल के लड़कों के साथ भी कुछ इसी क़िस्म के तअल्लुक़ात क़ायम हो गये थे। ख़ाहमख़ाह उन्होंने हमें अपना लीडर मान लिया था, हालांकि लीडरी के गुन हमें नहीं थे। या तो आदमी बहुत लट्ठबाज़ हो कि दूसरे उनका रौब मानें, या वह सबसे बड़ा विद्वान हो। हम पढ़ने-लिखने में ठीक थे, खेल भी लेते थे, लेकिन पढ़ाई में हमने कोई ऐसा कमाल पैदा नहीं किया था कि लोग हमारी तरफ़ ज़रूर ध्यान दें।
बचपन का मैं सोचता हूं तो एक यह बात ख़ास तौर से याद आती है कि हमारे घर में औरतों का एक हुजूम था। हम जो तीन भाई थे उनमें हमारे छोटे भाई (इनायत) और बड़े भाई (तुफ़ैल) घर की औरतों से बाग़ी होकर खेलकूद में जुटे रहते थे। हम अकेले उन ख़वातीन के हाथ आ गये। इसका कुछ नुक़सान भी हुआ और कुछ फ़ायदा भी। फ़ायदा तो यह हुआ कि उन महिलाओं ने हमको इंतिहाई शरीफ़ाना ज़िंदगी बसर करने पर मजबूर किया; जिसकी वजह से कोई असभ्य या उजड्ड क़िस्म की बात उस ज़माने में हमारे मुंह से नहीं निकलती थी। अब भी नहीं निकलती। नुक़सान यह हुआ, जिसका मुझे अक्सर अफ़सोस होता है,कि बचपन के खिलंदड़ेपन या एक तरह की मौजी ज़िंदगी गुज़ारने से हम कटे रहे। मसलन यह कि गली में कोई पतंग उड़ा रहा है, कोई गोलियां खेल रहा है, कोई लट्टू चला रहा है; हम सब खेलकूद देखते रहे थे, अकेले बैठकर। 'होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे' वाला मामला। हम उन तमाशों के सिर्फ़ तमाशाई बने रहते, और उनमें शरीक होने की हिम्मत इसलिए नहीं होती थी कि उसे शरीफ़ाना शग़ूल या शरीफ़ाना काम नहीं समझते थे।
उस्ताद भी हम पर मेहरबान रहे। आजकल की मैं नहीं जानता, हमारे ज़माने में तो स्कूल में सख्त पिटाई होती थी। हमारे वक्तों के उस्ताद तो निहायत ही जल्लाद क़िस्म के लोग थे। सिर्फ़ यही नहीं कि उनमें से किसी ने हमको हाथ नहीं लगाया बल्कि हर क्लास में मॉनिटर बनाते थे :बल्कि (साथी लड़कों को) सज़ा देने का मंसब भी हमारे हवाले करते थे, यानी-फ़लां को चांटा लगाओ, फ़लां को थप्पड़ मारो। इस काम से हमें बहुत-कोफ्त होती थी, और हम कोशिश करते थे कि जिस क़दर भी मुमकिन हो यों सज़ा दें कि हमारे शिकार को वह सज़ा महसूस न हो। तमाचे की बजाय गाल थपथपा दिया, या कान आहिस्ता से खींचा, वगैरह। कभी हम पकड़े जाते तो उस्ताद कहते 'यह क्या कर रहे हो! ज़ोर से चांटा मारो!'
इसके दो प्रभाव बहुत गहरे पड़े। एक तो यह कि बच्चों की जो दिलचस्पियां होती हैं उनसे वंचित रहे। दूसरे यह कि अपने दोस्तों,क्लासवालों और उस्तादों से हमें बेहद स्नेह आशीष, खुलापन और अपनाव मिला; जो बाद के ज़माने के दोस्तों और समकालीनों से मिला, और आज भी मिल रहा है।
सुबह हम अपने अब्बा के साथ फ़ज्र की नमाज़ पढ़ने मस्जिद जाया करते थे। मामूल (नियम) यह था कि अज़ान के साथ हम उठ बैठे, अब्बा के साथ मस्जिद गये,नमाज़ अदा की;और घंटा-डेढ़ घंटा मौलवी इब्राहीम मीर सियालकोटी से, जो अपने वक्त क़े बड़े फ़ाजिल (विद्वान) थे, क़ुरान-शरीफ़ का पाठ पढ़ा-समझा; अब्बा के साथ डेढ़-दो घंटों की सैर के लिये गये; फिर स्कूल। रात को अब्बा बुला लिया करते, ख़त लिखने के लिए। उस ज़माने में उन्हें ख़त लिखने में कुछ दिक्क़त होती थी। हम उनके सेक्रेटरी का काम अंजाम देते थे। उन्हें अख़बार भी पढ़कर सुनाते थे। इन कई कामों में लगे रहने की वजह से हमें बचपन में बहुत फ़ायदा हुआ। उर्दू-अंग्रेज़ी अख़बारात पढ़ने और ख़त लिखने की वजह से हमारी जानकारी काफ़ी बढ़ी।
एक और याद ताज़ा हुई। हमारे घर से मिली हुई एक दुकान थी, जहां किताबें किराये पर मिलती थीं। एक किताब का किराया दो पैसे होता। वहां एक साहब हुआ करते थे जिन्हें सब 'भाई साहब' कहते थे। भाई साहब की दुकान में उर्दू साहित्य का बहुत बड़ा भंडार था। हमारी छठी-सातवीं जमात के विद्यार्थी-युग में जिन किताबों का रिवाज था, वह आजकल क़रीब-क़रीब नापैद हो चुकी हैं, जैसे तिलिस्मे-होशरुबा, फ़सानए-आज़ाद, अब्दुल हलीम शरर के नॉवेल, वग़ैरह। ये सब किताबें पढ़ डालीं इसके बाद शायरों का कलाम पढ़ना शुरू किया। दाग़ का कलाम पढ़ा। मीर का कलाम पढ़ा। ग़ालिब तो उस वक्त बहुत ज़ियादा हमारी समझ में नहीं आया। दूसरों का कलाम भी आधा समझ में आता था, और आधा नहीं आता था। लेकिन उनका दिल पर असर कुछ अजब क़िस्म का होता था। यों, शेर से लगाव पैदा हुआ, और साहित्य में दिलचस्पी होने लगी।
हमारे अब्बा के मुंशी घर के एक तरह के मैनेजर भी थे। हमारा उनसे किसी बात पर मतभेद हो गया तो उन्होंने कहा'अच्छा, आज हम तुम्हारी शिकायत करेंगे कि तुम नॉवेल पढ़ते हो; स्कूल की किताबें पढ़ने की बजाय छुपकर अंट-शंट किताबें पढ़ते हो।' हमें इस बात से बहुत डर लगा, और हमने उनकी बहुत मिन्नत की कि शिकायत न करें; मगर वह न माने और अब्बा से शिकायत कर ही दी। अब्बा ने हमें बुलाया और कहा'मैंने सुना है, तुम नॉवेल पढ़ते हो।' मैंने कहा 'ज़ी हां।' कहने लगे 'नॉवेल ही पढ़ना है तो अंग्रेज़ी नॉवेल पढ़ो, उर्दू के नॉवेल अच्छे नहीं होते। शहर के क़िले में जो लायब्रेरी है, वहां से नॉवेल लाकर पढ़ा करो।'
हमने अंग्रेज़ी नॉवेल पढ़ना शुरू किये। डिकेंस, हार्डी, और न जाने क्या-क्या पढ़ डाला। वह भी आधा समझ में आता था और आधा पल्ले न पड़ता था। मगर इस पढ़ने की वजह से हमारी अंग्रेज़ी बेहतर हो गयी। दसवीं जमात में पहुंचने तक महसूस हुआ कि बाज़ उस्ताद पढ़ाने में ग़लतियां कर जाते हैं। हम उनकी अंग्रेज़ी दुरुस्त करने लगे। इस पर हमारी पिटाई तो न हुई; अलबत्ता वो उस्ताद कभी ख़फ़ा हो जाते और कहते 'अगर तुम्हें हमसे अच्छी अंग्रेज़ी आती है तो फिर तुम ही पढ़ाया करो, हमसे क्यों पढ़ते हो!'
उस ज़माने में कभी-कभी मुझ पर एक ख़ास क़िस्म का भाव छा जाता था। जैसे, यकायक आस्मान का रंग बदल गया है बाज़ चीज़ें क़हीं दूर चली गयी हैं.... धूप का रंग अचानक मेंहदी का-सा हो गया है... पहले जो देखने में आता था, उसकी सूरत बिल्कुल बदल गयी है। दुनिया एक तरह की पर्दए-तस्वीर के क़िस्म की चीज़ महसूस होने लगती थी। इस कैफ़ीयत (भावना) का बाद में भी कभी-कभी एहसास हुआ है, मगर अब नहीं होता। मुशायरे भी हुआ करते थे। हमारे घर से मिली हुई एक हवेली थी जहां सर्दियों के ज़माने में मुशायरे किये जाते थे। सियालकोट में पंडित राजनारायन 'अरमान' हुआ करते थे, जो इन मुशायरों के इंतिज़ामात किया करते थे। एक बुज़ुर्ग मुंशी सिराजदीन मरहूम थे अल्लामा इक़बाल के दोस्त, श्रीनगर में महाराजा कश्मीर के मीर मुंशी, वह सदारत किया करते थे। जब दसवीं जमात में पहुंचे तो हमने भी तुकबंदी शुरू कर दी, और एक-दो मुशायरों में शेर पढ़ दिये। मुंशी सिराजदीन ने हमसे कहा 'मियां, ठीक है, तुम बहुत तलाश से (परिश्रम से) शेर कहते हो, मगर यह काम छोड़ दो। अभी तो तुम पढ़ो-लिखो, और जब तुम्हारे दिलो-दिमाग़ में पुख्तगी आ जाये तब यह काम करना। इस वक्त यह महज़ वक्त क़ी बर्बादी है।' हमने शेर कहना बंद कर दिया।
अब हम मरे कालेज सियालकोट में दाख़िल हुए, और वहां प्रोफ़ेसर यूसुफ़ सलीम चिश्ती उर्दू पढ़ाने आये, जो इक़बाल के मुफ़स्सिर (भाष्यकार) भी हैं। तो उन्होंने मुशायरे की तरह डाली। और कहा 'तरह' पर शेर कहो! हमने कुछ शेर कहे, और हमें बहुत दाद मिली। चिश्ती साहब ने मुंशी सिराजदीन से बिल्कुल उलटा मशविरा दिया और कहा फ़ौरन इस तरफ़ तवज्जुह करो, शायद तुम किसी दिन शायर हो जाओ!
गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर चले गये। जहां बहुत ही फ़ाज़िल और मुश्फ़िक़ (विद्वान और स्नेही) उस्तादों से नियाज़मंदी हुई। पतरस बुख़ारी थे; इस्लामिया कालेज में डॉक्टर तासीर थे; बाद में सूफ़ी तबस्सुम साहब आ गये। इनके अलावा शहर के जो बड़े साहित्यकार थे इम्तियाज़ अली ताज थे; चिराग़हसन हसरत, हफ़ीज़ जालंधारी साहब थे; अख्तर शीरानी थे उन सबसे निजी राह-रस्म हो गयी। उन दिनों पढ़ानेवालों और लिखनेवालों का रिश्ता अदब (साहित्य) के साथ-साथ कुछ दोस्ती का-सा भी होता था। कॉलेज की क्लासों में तो शायद हमने कुछ ज़ियादा नहीं पढ़ा; लेकिन उन बुज़ुगों की सुह्बत और मुहब्बत से बहुत-कुछ सीखा। उनकी महफ़िलों में हम पर शफ़क़त होती थी, और हम वहां से बहुत-कुछ हासिल करके उठते थे।
हमने अपने दोस्तों से भी बहुत सीखा। जब शेर कहते तो सबसे पहले ख़ास दोस्तों ही को सुनाते थे। उनसे दाद मिलती तो मुशायरों में पढ़ते। अगर कोई शेर ख़ुद पसंद न आया, या दोस्तों ने कहा, निकाल दो, तो उसे काट देते। एम.ए. में पहुंचने तक बाक़ायदा लिखना शुरू कर दिया था।
हमारे एक दोस्त हैं ख्वाजा ख़ुर्शीद अनवर। उनकी वजह से हमें संगीत में दिलचस्पी पैदा हुई। ख़ुर्शीद अनवर पहले तो दहशतपसंद (क्रांतिकारी) थे, भगतसिंह ग्रुप में शामिल। उन्हें सज़ा भी हुई, जो बाद में माफ़ कर दी गयी। दहशतपसंदी तर्क करके वह संगीत की तरफ़ आ गये। हम दिन में कॉलेज जाते और शाम को ख़ुर्शीद अनवर के वालिद ख्वाजा फ़िरोज़ुद्दीन मरहूम की बैठक में बड़े-बड़े उस्तादों का गाना सुनते। यहां उस ज़माने के सब ही उस्ताद आया करते थे; उस्ताद तवक्कुल हुसैन ख़ां, उस्ताद अब्दुल वहीद ख़ां, उस्ताद आशिक़ अली ख़ां, और छोटे गुलाम अली ख़ां, वग़ैरह। इन उस्तादों के साथ के और हमारे दोस्त रफ़ीक़ ग़ज़नवी मरहूम से भी सुह्बत होती थी। रफ़ीक़ ला-कॉलेज में पढ़ते थे। पढ़ते तो ख़ाक थे, बस रस्मी तौर पर कॉलेज में दाख़िला ले रक्खा था। कभी ख़ुर्शीद अनवर के कमरे में और कभी रफ़ीक़ के कमरे में बैठक हो जाती थी। ग़रज़ इस तरह हमें इस फ़न्ने-तलीफ़ (ललित-कला) से आनंद का काफ़ी मौक़ा मिला।
जब हमारे वालिद गुज़र गये तो पता चला कि घर में खाने तक को कुछ नहीं है। कई साल तक दर-ब-दर फिरे और फ़ाक़ामस्ती की। इसमें भी लुत्फ़ आया, इसलिए कि इसकी वजह से 'तमाशाए-अहले-करम' देखने का बहुत मौक़ा मिला, ख़ास तौर से अपने दोस्तों से। कॉलेज में एक छोटा-सा हल्क़ा (मंडली) बन गया था। कोयटा के हमारे दोस्त थे, एहतिशामुद्दीन और शेख़ अहमद हुसैन, डॉ. हमीदुद्दीन भी इस हल्क़े में शामिल थे। इनके साथ शाम को महफ़िल रहा करती। जवानी के दिनों में जो दूसरे वाक़िआत होते हैं वह भी हुए, और हर किसी के साथ होते हैं।
गर्मियों में कॉलेज बंद होते, तो हम कभी ख़ुर्शीद अनवर और भाई तुफ़ैल के साथ श्रीनगर चले जाया करते, और कभी अपनी बहन के पास लायलपुर पहुंच जाते। लायलपुर में बारी अलीग और उनके गिरोह के दूसरे लोगों से मुलाक़ात रहती। कभी अपनी सबसे बड़ी बहन के यहां धर्मशाला चले जाते, जहां पहाड़ की सीनरी देखने का मौक़ा मिलता, और दिल पर एक ख़ास क़िस्म का नक्श (गहरा प्रभाव) होता। हमें इन्सानों से जितना लगाव रहा, उतना कुदरत के मनाज़िर (सीन-सीनरी) और नेचर के हुस्न को देखने-परखने का नहीं रहा। फिर भी उन दिनों मैंने महसूस किया कि शहर के जो गली-मुहल्ले हैं, उनमें भी अपना एक हुस्न है जो दरिया और सहरा, कोहसार या सर्व-ओ-समन से कम नहीं। अलबत्ता उसको देखने के लिए बिल्कुल दूसरी तरह की नज़र चाहिए।
मुझे याद है, हम मस्ती दरवाज़े के अंदर रहते थे। हमारा घर ऊंची सतह पर था। नीचे नाला बहता था। छोटा-सा एक चमन भी था। चार-तरफ़ बाग़ात थे। एक रात चांद निकला हुआ था। चांदनी नाले और इर्द-गिर्द के कूड़े-करकट के ढेर पर पड़ रही थी। चांदनी और साये, ये सब मिलकर कुछ अजब भेद-भरा-सा मंज़र बन गये थे। चांद की इनायत से उस सीन पर भद्दा पहलू छुप गया था और कुछ अजीब ही क़िस्म का हुस्न पैदा हो गया था; जिसे मैंने लिखने की कोशिश भी की है। एकाध नज्म में यह मंज़र खेंचा है जब शहर की गलियों, मुहल्लों और कटरों में कभी दोपहर के वक्त क़ुछ इसी क़िस्म का रूप आ जाता है जैसे मालूम हो कोई परिस्तान है। 'नीम-शब', 'चांद', 'ख़ुदफ़रामोशी', 'बाम्-ओ-दर ख़ामुशी के बोझ से चूर', वगैरह उसी ज़माने से संबंध रखती हैं। एम.ए. में पहुंचे तो कभी क्लास में जाने की ज़रूरत महसूस हुई, कभी बिल्कुल जी न चाहा। दूसरी किताबें जो कोर्स में नहीं थीं, पढ़ते रहे। इसलिए इम्तिहान में कोई ख़ास पोज़ीशन हासिल नहीं की। लेकिन मुझे मालूम था कि जो लोग अव्वल-दोअम आते हैं, हम उनसे ज़ियादा जानते हैं, चाहे हमारे नंबर उनसे कम ही क्यों न हों। यह बात हमारे उस्ताद लोग भी जानते थे। जब किसी उस्ताद का, जैसे प्रोफ़ेसर डिकिन्सन या प्रोफ़्रेसर कटपालिया थे, लेक्चर देने को जी न चाहता तो हमसे कहते हमारी बजाय तुम लेक्चर दो; एक ही बात है! अलबत्ता प्रोफ़ेसर बुख़ारी बड़े क़ायदे के प्रोफ़ेसर थे। वह ऐसा नहीं करते थे। प्रोफ़ेसर डिकिन्सन के ज़िम्मे उन्नीसवीं सदी का नस्री अदब (गद्य साहित्य) था; मगर उन्हें उससे दरअस्ल कोई दिलचस्पी नहीं थी। इसलिए हमसे कहा दो-तीन लेक्चर तैयार कर लो! दूसरे जो दो-तीन लायक़ लड़के हमारे साथ थे, उनसे भी कहा दो-दो तीन-तीन लेक्चर तुम लोग भी तैयार कर दो! किताबों वग़ैरह के बारे में कुछ पूछना हो तो आके हमसे पूछ लेना। चुनांचे, नीमउस्ताद हम उसी ज़माने में हो गये थे।
 शुरू-शुरू में शायरी के दौरान में, या कॉलेज के ज़माने में हमें कोई ख़याल ही न गुज़रा कि हम शायर बनेंगे। सियासत वग़ैरह तो उस वक्त ज़ेहन में बिल्कुल ही न थी। अगरचे उस वक्त क़ी तहरीकों (आंदोलनों) मसल्न कांग्रेस तहरीक, ख़िलाफ़त तहरीक, या भगतसिंह की दहशतपसंद तहरीक के असर तो जेहन में थे, मगर हम ख़ुद इनमें से किसी क़िस्से में शरीक नहीं थे।
शुरू में ख़याल हुआ कि हम कोई बड़े क्रिकेटर बन जायें, क्योंकि लड़कपन से क्रिकेट का शौक़ था और बहुत खेल चुके थे। फिर जी चाहा, उस्ताद बनना चाहिए; रिसर्च करने का शौक़ था। इनमें से कोई बात भी न बनी। हम क्रिकेटर बने न आलोचक; और न रिसर्च किया, अलबत्ता उस्ताद (प्राध्यापक) होकर अमृतसर चले गये।
हमारी ज़िंदगी का शायद सबसे ख़ुशगवार ज़माना अमृतसर ही का था; और कई एतिबार से। एक तो कई इस वजह से, कि जब हमें पहली दफ़ा पढ़ाने का मौक़ा मिला तो बहुत लुत्फ़ आया। अपने विद्यार्थियों से दोस्ती का लुत्फ़; उनसे मिलने और रोज़मर्रा की रस्मो-राह का लुत्फ़; उनसे कुछ सीखने, और उन्हें पढ़ाने का लुत्फ़। उन लोगों से दोस्ती अब तक क़ायम है। दूसरे यह कि, उस ज़माने में कुछ संज़ीदगी से शेर लिखना शुरू किया। तीसरे यह कि, अमृतसर ही में पहली बार सियासत में थोड़ी-बहुत सूझ-बूझ अपने कुछ साथियों की वजह से पैदा हुई; जिनमें महमूदुज्ज़फ़र थे, डॉक्टर रशीद जहां थीं, बाद में डॉक्टर तासीर आ गये थे। यह एक नयी दुनिया साबित हुई। मज़दूरों में काम शुरू किया। सिविल लिबर्टीज़ की एक अंजुमन (संस्था) बनी, तो उसमें काम किया, तरक्क़ीपसंद तहरीक शुरू हुई तो उसके संगठन में काम किया। इन सबसे जेहनी तस्कीन (मानसिक-बौध्दिक संतोष) का एक बिल्कुल नया मैदान हाथ आया।
तरक्क़ीपसंद अदब के बारे में बहसें शुरू हुई, और उनमें हिस्सा लिया। 'अदबे-लतीफ़' के संपादन की पेशकश हुई तो दो-तीन बरस उसका काम किया। उस ज़माने में लिखनेवालों के दो बड़े गिरोह थे; एक अदब-बराय-अदब ('साहित्य साहित्य के लिए') वाले, दूसरे तरक्क़ी-पसंद थे। कई बरस तक इन दोनों के दरमियान बहसें चलती रहीं; जिसकी वजह से काफ़ी मसरूफ़ियत रही ज़ो, अपनी जगह ख़ुद एक बहुत ही दिलचस्प और तस्कीनदेह तजुर्बा था। पहली बार उपमहाद्वीप में रेडियो शुरू हुआ। रेडियो में हमारे दोस्त थे। एक सैयद रशीद अहमद थे, जो रेडियो पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल (महाधीक्षक) हुए। दूसरे, सोमनाथ चिब थे, जो आजकल हिंदुस्तान में पर्यटन विभाग के अध्यक्ष हैं। दोनों बारी-बारी से लाहौर के स्टेशन डायरेक्टर मुक़र्रर हुए। हम और हमारे साथ शहर के दो-चार और अदीब (साहित्यकार) डॉक्टर तासीर, हसरत, सूफ़ी साहब और हरिचंद 'अख्तर' वगैरह रेडियो आने-जाने लगे। उस ज़माने में रेडियो का प्रोग्राम डायरेक्टर ऑफ़ प्रोग्राम्ज़ नहीं बनाता था, हम लोग मिलकर बनाया करते थे। नयी-नयी बातें सोचते थे और उनसे प्रोग्राम का ख़ाका तैयार करते थे। उन दिनों हमने ड्रामे लिखे, फ़ीचर लिखे, दो-चार कहानियां लिखीं। यह सब एक बंधा हुआ काम था। रशीद जब दिल्ली चले गये, तो हम देहली जाने लगे। वहां नये-नये लोगों से मुलाक़ात हुईं। देहली और लखनऊ के लिखनेवाले गिरोहों से जान-पहचान हुई। मजाज़, सरदार जाफ़री, जॉनिसार अख्तर, जज्बी और मख़दूम मरहूम से रेडियो के वास्ते से राबिता (संपर्क) पैदा हुआ; जिससे दोस्ती के अलावा समझ और सूझ-बूझ में तरह-तरह के इज़ाफ़े हुए। वह सारा ज़माना मसरूफ़ियत (व्यस्तता) का भी था, और एक तरह से बेफ़िक्री का भी।
प्रस्तुति : मिर्जा ज़फ़रुल हसन
उर्दू से अनुवाद : शमशेर बहादुर सिंह
(     जनवादी लेखक संघ की पत्रिका नयापथ के फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ विशषांक से साभार)



शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

आपबीती दास्तान -एक- स्व. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


(हाल ही में फ़ैज़ का जन्मशती वर्ष खत्म हुआ है इस मौके पर हिन्दी में जनवादी लेखक संघ की पत्रिका नयापथ ने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पर विशेषांक निकाला है,यह अंश उससे साभार लिया है। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने 7 मार्च 1984 ई. को अपनी मृत्यु से आठ महीने पहले एशियन स्टडी ग्रुप के निमंत्रण पर इस्लामाबाद के एक सम्मेलन में बेबाक अंदाज़ में अपनी ज़िंदगी के लंबे सफ़र को जिस तरह बयान किया था, उसे पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है; ज़िंदगी के इस सफ़र को 'पाकिस्तान टाइम्स' ने दो किस्तों में फ़ैज़ की सालगिरह के अवसर पर 13, 14 जनवरी 1990 के संस्करण में पहली बार प्रकाशित किया था। फ़ैज़ की इस आपबीती को साभार पुन: प्रस्तुत किया जा रहा है।) 
मेरा जन्म उन्नीसवीं सदी के एक ऐसे फक्कड़ व्यक्ति के घर में हुआ था जिसकी ज़िंदगी मुझसे कहीं ज्यादा रंगीन अंदाज़ में गुज़री। मेरे पिता सियालकोट के एक छोटे से गांव में एक भूमिहीन किसान के घर पैदा हुए, यह बात मेरे पिता ने बतायी थी और इसकी तस्दीक गांव के दूसरे लोगों द्वारा भी हुई थी। मेरे दादा के पास चूंकि कोई ज़मीन नहीं थी इसलिए मेरे पिता गांव के उन किसानों के पशुओं को चराने का काम करते थे जिनकी अपनी ज़मीन थी। मेरे पिता कहा करते थे कि पशुओं को चराने गांव के बाहर ले जाते थे जहां एक स्कूल था। वह पशुओं को चरने के लिए छोड़ देते और स्कूल में जाकर शिक्षा प्राप्त करते, इस तरह उन्होंने प्राथमिक स्तर की शिक्षा पूरी की। चूंकि गांव में इससे आगे की शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी, वह गांव से भाग कर लाहौर पहुंच गये। उन्होंने लाहौर की एक मस्जिद में शरण ली। मेरे पिता कहते थे कि वह शाम को रेलवे स्टेशन चले जाया करते थे और वहां कुली के रूप में काम करते थे। उस ज़माने में ग़रीब और अक्षम छात्रा मस्जिदों में रहते थे और मस्जिद के इमाम से या आस-पास के मदरसों में नि:शुल्क शिक्षा प्राप्त करते थे। इलाक़े के लोग उन छात्रों को भोजन उपलब्ध कराते थे। जब मेरे पिता मस्जिद में रहा करते थे तो उस ज़माने में एक अफ़गानी नागरिक जो पंजाब सरकार का मेयर था, मस्जिद में नमाज़ पढ़ने आया करता था। उसने मेरे पिता से पूछा कि क्या वह अफ़ग़ानिस्तान में अंग्रेज़ी अनुवादक के तौर पर काम करना पसंद करेंगे, तो मेरे पिता ने अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए अफ़ग़ानिस्तान जाने का इरादा कर लिया। यह वह समय था जब अफ़ग़ानिस्तान के राजमहल में आये दिन परिवर्तन होता रहता था। अफ़ग़ानिस्तान और इंग्लैंड के बीच डूरंड संधि की आवश्यकता का अनुभव भी उसी समय में हुआ और इसीलिए अफ़ग़ानिस्तान के राजा ने मेरे पिता को अंग्रेज़ों के साथ बात-चीत करने में सहायता करने के उद्देश्य से दरबार से अनुबंधित कर लिया। इसके बाद वह मुख्य सचिव और फिर मंत्री भी नियुक्त हुए। उनके ज़माने में विभिन्न क़बीलों का दमन किया गया जिसके परिणामस्वरूप हारने वाले क़बाइल (क़बीला का बहुवचन) की ख़ास औरतों को राजमहल के कारिंदों में वितरित कर दिया जाता था। ये औरतें मेरे पिता के हिस्से में भी आयीं, नहीं मालूम उनकी संख्या तीन थी या चार। बहरहाल अफ़ग़ानिस्तान के राजमहल में पंद्रह साल सेवा देने के बाद वह तंग आ गये और उनका ऊब जाना स्वाभाविक भी था क्योंकि राजा के अफ़ग़ानी मूल के कर्मचारियों को एक विदेशी का दरबार में प्रभावी होना खटकता था। मेरे पिता को प्राय: ब्रितानी एजेंट घोषित किया जाता और जब उस अपराध के फलस्वरूप उन्हें मृत्युदंड दिये जाने की घोषणा होती तो नियत समय पर यह सिध्द हो जाता कि वह निर्दोष हैं और उन्हें आगे पदोन्नति दे दी जाती। लेकिन एक दिन उन्होंने फ़कीर का भेस बदला और अफ़गानिस्तान के राजमहल से फ़रार हो गये और लाहौर वापस आ गये लेकिन यहां वापस आते ही उन्हें अफ़ग़ानी जासूस होने के आरोप में पकड़ लिया गया।

        मेरे पिता की तरह फक्कड़ाना स्वभाव रखने वाली एक अंग्रेज़ महिला भी उस ज़माने में डाक्टर के रूप में दरबार से जुड़ी थी। उसका नाम हैमिल्टन था। उससे मेरे पिता की मित्रता हो गयी थी। अफ़ग़ानिस्तान के राजा से उसे जो भी पुरस्कार मिला था उसे उसने लंदन में सुरक्षित कर रखा था। इस प्रकार जब मेरे पिता अफ़ग़ानिस्तान से निकल भागे तो उसने उन्हें लिखा 'तुम लंदन आ जाओ'। इस आमंत्रण पर मेरे पिता लंदन पहुंच गये और जब ब्रिटेन की सरकार को उनके लंदन आगमन की सूचना मिली तो मेरे पिता को यह संदेश मिला कि चूंकि अब तुम लंदन में हो तो मेरे दूत क्यों नहीं बन जाते? मेरे पिता ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। और साथ ही उन्होंने कैंब्रिज में अपनी आगे की शिक्षा का क्रम भी जारी रखा। वहीं उन्होंने क़ानून की डिग्री भी प्राप्त की। मेरे पिता का नाम सुल्तान था इसलिए मैं फ़ारसी का यह मुहावरा तो अपने लिए दुहरा ही सकता हूं कि 'पिदरम सुल्तान बूद' (मेरे पिता राजा थे)।
क़ानून की डिग्री प्राप्त करने के बाद मेरे पिता सियालकोट लौट आये। मेरी आरंभिक शिक्षा मुहल्ले की एक मस्जिद में हुई। शहर में दो स्कूल थे एक स्कॉच मिशन की और दूसरा अमरीकी मिशन की निगरानी में चलता था। मैंने स्कॉच मिशन के स्कूल में प्रवेश ले लिया। यह हमारे घर से नज़दीक था। यह ज़माना ज़बरदस्त राजनीतिक उथल-पुथल का था। प्रथम विश्वयुध्द समाप्त हो चुका था और भारत में कई राष्ट्रीय आंदोलन आकर्षण का केंद्र बन रहे थे। कांग्रेस के आंदोलन में हिंदू और मुसलमान दोनों ही क़ौमें हिस्सा ले रही थीं लेकिन इस आंदोलन में हिंदुओं की बहुलता थी। दूसरी ओर मुसलमानों की तरफ़ से चलाया जाने वाला ख़िलाफ़त आंदोलन था।
प्रथम विश्वयुध्द की समाप्ति पर परिदृश्य यह था कि तुर्क क़ौम ब्रितानी और यूनानी आक्रांताओं के विरुध्द पंक्तिबध्द थी परंतु उस्मान वंशीय ख़िलाफ़त को बचाया नहीं जा सका और तुर्की अंतत: कमाल अतातुर्क के क्रांतिकारी विचारों के प्रभाव में आ गया जिन्हें आधुनिक तुर्की का निर्माता कहा जाता है। एक तीसरा आंदोलन सिक्खों का अकाली आंदोलन था जो सिक्खों के सभी गुरुद्वारों को अपने अधीन लेने के लिए आंदोलनरत था। इस प्रकार लगभग छ: सात साल तक हिंदू, मुस्लिम और सिक्ख तीनों ही अंग्रेज़ के विरुध्द एक साझे एजेंडे के तहत आंदोलन चलाते रहे।
हमारे छोटे से शहर सियालकोट में जब भी महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू और सिक्खों के नेता आते थे तो पूरा शहर सजाया जाता, बड़े-बड़े स्वागत द्वार फूलों से बनाये जाते थे और पूरा शहर उन नेताओं के स्वागत में उमड़ पड़ता था। राजनीतिक गहमागहमी का यह दौर हमारे मन पर अपने प्रभाव छोड़ने का कारण बना।
इसी दौरान रूस में अक्टूबर क्रांति घटित हो चुकी थी और उसका समाचार सियालकोट तक भी पहुंच रहा था। मैंने लोगों को कहते हुए सुना कि रूस में लेनिन नाम के एक व्यक्ति ने वहां के बादशाह का तख्ता उलट दिया है और सारी संपत्ति श्रमजीवियों में बांट दी है।स्कूल की पढ़ाई का यही वह ज़माना था जब शायरी में मेरी रुचि उत्पन्न हुई। इसके पीछे दो कारण थे। हमारे घर के पास एक नौजवान किताबें किराये पर पढ़ने के लिए दिया करता था। मैंने उससे किराये पर किताबें लेनी शुरू कर दीं और धीरे-धीरे मैंने उसकी ऐसी सभी किताबें पढ़ डालीं जो क्लासिक साहित्य से संबंधित थीं। मेरा सारा जेब ख़र्च भी किताबें किराये पर लेने में खर्च हो जाता था। उस ज़माने में सियालकोट का एक प्रसिध्द साहित्यिक व्यक्तित्व अल्लामा इक़बाल का था जिनकी नज्मों को बड़े शौक से सभाओं में गाया और पढ़ा जाता था। वहां एक प्राथमिक विद्यालय भी था जिसमें मैं पढ़ता था। वहां मुशायरे भी होते थे, यह मेरे स्कूल की शिक्षा के अंतिम दिन थे। हमारे हेडमास्टर ने हमसे एक दिन कहा कि मैं तुम्हें एक मिसरा देता हूं, तुम इस पर आधाारित पांच छ: शेर लिखो, हम तुम्हारे कलाम (ग़ज़ल) को शायर इक़बाल के उस्ताद के पास भेजेंगे और वह जिस कलाम को पुरस्कार का अधिकारी घोषित करेंगे उसे ही पुरस्कार मिलेगा। इस तरह मैंने शायरी के उस पहले मुक़ाबले में पुरस्कार के रूप में एक रुपया प्राप्त किया था, जो उस ज़माने में बहुत समझा जाता था। सियालकोट में दो साल गुज़ारने के बाद मैंने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में प्रवेश ले लिया। सियालकोट से लाहौर आना रोमांच से भरपूर था। यूं लगा जैसे कोई गांव छोड़ के किसी अजनबी शहर में आ गया हो। उसकी वजह यह भी थी कि उस ज़माने में सियालकोट में न बिजली थी और न पानी के नल थे। भिश्ती पानी भरते थे या फिर कुंओं से पानी भरा जाता था। कुछ बड़े घरों में पीने के पानी के कुंए उपलब्ध थे। हम सब ही उस ज़माने में मिट्टी के तेल से जलने वाली लालटेनों की रौशनी में पढ़ते थे। यह लालटेन बड़ी ख़ूबसरूत हुआ करती थी। सियालकोट में मोटर कभी नहीं देखी। वहां के सभी अधिकारी बग्घियों में आते जाते थे। मेरे पिता के पास दो घोड़ों वाली बग्घी थी। जब मैं लाहौर आया तो हैरान रह गया। यहां मोटरें थीं, औरतें बिना बुर्क़े के नज़र आ रही थीं। और लोग अजनबी पहनावे अपने बदन पर पहने हुए थे। हमारे कॉलेज में आधs से अधिक शिक्षक अंग्रेज़ थे। हमारे अंग्रेज़ी के शिक्षक लैंघम (Langhom) थे, जो बहुत कड़े स्वभाव के थे, लेकिन शिक्षक बहुत अच्छे थे। मैंने अंग्रेज़ी के पर्चे में 150 में से 63 नंबर लिये तो सब दंग रह गये। कॉलेज में मेरा क़द बढ़ गया। और मुझे यह सलाह दी जाने लगी कि मैं इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा की तैयारी करूं। मैंने निश्चय कर लिया कि मैं परीक्षा में बैठूंगा लेकिन मैं इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा की तैयारी करने के बजाय धीरे-धीरे शायरी करने लगा। इस परिस्थिति के लिए कई कारण ज़िम्मेदार थे। एक यह कि डिग्री प्राप्त करने से पहले ही मेरे पिता का निधान हो गया और हमें यह पता चला कि वह जो कुछ संपत्ति छोड़ गये हैं उससे कहीं अधिक कर्ज़ चुकाने के लिए छोड़ गये थे और इस तरह शहर का एक खाता-पीता ख़ानदान हालात के झटके में ग़रीब और असहाय हो गया। दूसरा जो मेरे और मेरे ख़ानदान की परेशानियों का कारण बना वह व्यापक आर्थिक संकट और मंदी था जिसके प्रभाव से उस ज़माने में कोई भी व्यक्ति सुरक्षित न रह सका। मुसलमानों पर इसका प्रभाव अधिक पड़ा, चूंकि उनमें बहुतायत खेतिहर लोगों की थी। मंदी का प्रभाव कृषि पर अधिक पड़ा था। नतीजा यह हुआ कि गांव से शहर की ओर पलायन आरंभ हो गया क्योंकि छोटी जगहों में रोज़गार उपलब्धा कराने वाले संसाधान नहीं थे और ऐसे संसाधान पर प्राय: हिंदुओं का क़ब्जा था। सरकारी नौकरी भी एक रास्ताथा लेकिन चूंकि मुसलमान शिक्षा के क्षेत्रा में काफ़ी पिछडे हुए थे इसलिए यहां भी उनके लिए अधिाक अवसर नहीं थे। मेरे और मेरे ख़ानदान के लिए यह ज़माना राजनीतिक और वैयक्तिक कारणों से परीक्षा और परेशानियों का था। इस तनाव और सोच-विचार को अभिव्यक्ति के माधयम की आवश्यकता थी सो यह शायरी ने पूरी कर दी।
मेरी उम्र 17-18 साल के आस-पास थी और जैसा कि होता है मैं बचपन से ही साथ खेलने वाली एक अफ़ग़ान लड़की की मुहब्बत में गिरफ्तार हो गया। वह बचपन में तो सियालकोट में थी लेकिन बाद में उसका ख़ानदान आज के फैसलाबाद के समीप एक गांव में आबाद हो गया था। मेरी एक बहन की उसी गांव में शादी हुई थी। जब मैं अपनी बहन के पास गया तो उसके घर भी गया, वह लड़की तब पर्दा करने लगी थी। एक सुबह मैंने उसे तोते को कुछ खिलाते हुए देखा। वह बहुत ख़ूबसूरत लग रही थी। हम दोनों ने एक दूसरे को देखा और एक दूसरे की मुहब्बत में गिरफ्तार हो गये। हम छुप-छुप के मिलते रहे और एक दिन जैसा कि होता है उसकी कहीं शादी हो गयी और जुदाई का यह अनुभव छ:-सात बरस तक मुझे उदास करता रहा। इस अवधि में मेरी शिक्षा भी जारी रही और शायरी भी। स्थानीय मुशायरे में तीसरी बार जब मुझे भाग लेने का अवसर मिला तो मेरी शायरी को काफ़ी सराहा गया और इस तरह लाहौर जैसे शहर की बड़ी साहित्यिक हस्तियां मेरी शायरी से परिचित हुईं और सबने मुझे अपना आशीर्वाद देना चाहा। मैं अब अच्छा ख़ासा शायर बन चुका था।
यही वह दौर था जब उपमहाद्वीप में उग्रपंथ के पहले आंदोलन का आरंभ हुआ। उस आंदोलन के प्रभाव हमारे कॉलेज के अंदर भी पहुंच रहे थे और मेरा एक अभिन्न मित्र जिसे बाद में एक प्रसिध्द संगीतकार ख्वाजा ख़ुर्शीद अनवर के रूप में जाना गया, उस आंदोलन का सक्रिय कार्यकर्त्ता था। वह बम बनाने के लिए कॉलेज की प्रयोगशाला से तेज़ाब चुराने के अपराध में गिरफ्तार कर लिया गया। उसे तीन साल की सज़ा भी सुनायी गयी। वह कुछ समय तक ज़रूर जेल में रहा था लेकिन बाद में वह अपने प्रभावशाली पिता के रसूख के कारण छूट गया। मेरी बहुत सी जानकारियों का माध्यम वही था। वह अक्सर अपने आंदोलन का साहित्य मेरे कमरे में छोड़ जाता और जब कभी मैं उसे पढ़ता तो मेरे ऊपर जुनून सा छा जाता था, क्योंकि मेरे पिता अंग्रेज़ों के वफ़ादार और उपाधि प्राप्त थे लेकिन इतना ज़रूर हुआ कि मैं उग्रपंथियों के आंदोलन और उसके बहुत से राजनीतिक समूहों से परिचित हो गया। मेरे ऊपर उसका कोई गहरा प्रभाव नहीं पड़ा लेकिन वह सब कुछ मेर लिए महत्वहीन नहीं था।
तीन चार साल बाद मैंने पहले अंग्रेज़ी में और फिर अरबी में एम.ए. कर लिया और फिर मैंने शिक्षण का कार्य अपना लिया। उससे मुझे काफ़ी सहारा मिला और खानदान को आर्थिक संकटों से उबारने में सहायता भी। इस अवधि में मेरे कॉलेज के ज़माने के दो साथी आक्सफ़ोर्ड से मार्क्सिस्ट होकर लौटे थे। उनके अलावा उच्च घरानों के कुछ और लड़के भी इंग्लैंड की यूनीवर्सिर्टियों से कम्युनिस्ट विचार लेकर लौटे थे। उनमें से कुछ तो राजनीतिक दृष्टिकोण से व्यस्त हो गये, कुछ ने नौकरी के चक्कर में इस तरह के विचार को छोड़ दिया। लेकिन इसी टोली के नेतृत्व में साहित्य के प्रगतिशील आंदोलन का आंरभ हुआ। यह साहित्यिक आंदोलन, कम्युनिस्ट या मार्क्सिस्ट आंदोलन नहीं था। वैसे उसमें सक्रिय भाग लेने वालों में कुछ कम्युनिस्ट भी थे और मार्क्सिस्ट भी। असल में प्रगतिशील आंदोलन साहित्य में सामाजिक यथार्थ को बढ़ावा देने से संबंध रखता था और रूढ़िबध्द होकर कविता करने को बुरा समझता था। भाषा की कलाबाज़ी भी इस आंदोलन के लिए व्यर्थ थी। इस आंदोलन के प्रभावस्वरूप यथार्थवादी और राजनीतिक गीतों के चलन को बढ़ावा मिला। इस प्रकार का साहित्यिक चलन यूरोप और अमेरिका में भी फ़ासीवाद विरोधाी साहित्यिक प्रवृत्ति के रूप में उभरा, जिसके परिणामस्वरूप राजनीतिक सरोकार वाले साहित्य का जन्म हुआ।
1932-35 के मध्य का यही वह समय था जब उस साहित्यिक, राजनीतिक आंदोलन से मेरा जुड़ाव शुरू हुआ। मज़दूरों, श्रमजीवियों और किसानों के आंदोलनधार्मी गीत और राजनीतिक अभिव्यक्ति और नयी-पुरानी काव्य पध्दति के मिश्रण को लोगों ने सराहा और उन्हें पसंद भी किया। जब 1941 में मेरा पहला संग्रह प्रकाशित हुआ तो वह तेज़ी से बिक गया। फिर द्वितीय विश्वयुध्द की लहर आयी लेकिन हम लोगों ने उसका ज्यादा नोटिस नहीं लिया। हमारे विचार में उस युध्द से ब्रिटेन और जर्मनी का सरोकार था मगर 1941 में जापान भी उस युध्द में शामिल हो गया तो हमें कुछ आभास हुआ। क्योंकि उस समय अगर एक ओर जापानी भारत की सीमा तक आ गये थे तो दूसरी ओर नाज़ियों और फासिस्टों के क़दम मास्को और लेनिनग्राद तक पहुंच गये थे और तभी हमने महसूस किया कि युध्द से हमारा संबध्द होना आवश्यक है। इसलिए हम फ़ौज में शामिल हो गये। मुझे याद है पहले दिन जनसंपर्क विभाग के निरीक्षक एक ब्रिगेडियर के सामने मेरी पेशी हुई। वह औपचारिक रूप से फ़ौजी नहीं था, वह बहुत ज़िंदादिल आइरिश था और लंदन टाइम्स से संबंधा रखने वाला एक पत्राकार था। मुझे देखकर उसने कहा तुम्हारे बारे में पुलिस की खुफ़िया रिपोर्ट कहती है कि तुम एक पक्के कम्युनिस्ट हो, बताओ हो या नहीं। मैंने कहा मुझे नहीं पता कि पक्का कम्युनिस्ट कौन होता है। मेरा यह उत्तार सुनकर उसने कहा मुझे इससे कोई मतलब नहीं, चाहे तुम फ़ासीवादी विचार ही क्यों न रखते हो, जब तक तुम हमें कोई धोखा नहीं देते; मैं समझता हूं तुम धोखा नहीं दोगे। मैंने समर्थन में सिर हिला दिया।
यही वह ज़माना था जब ब्रिटेन और मित्र देशों के बीच संबंध बहुत अच्छे नहीं थे। उधर महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ कर दिया था, जो पूरे देश में आग की तरह फैल गया था। ब्रिटेन के सामने दो संकट थे। एक तो फ़ौज़ में लोगों की भर्ती और दूसरे सरकार के विरुध्द ज़ोर पकड़ता हुआ जन आंदोलन। ब्रिटेन की फ़ौज के ब्रिगेडियर ने मुझसे इस आंदोलन के विषय में विचार-विमर्श करते हुए पूछा तो मैंने कहा कि ब्रिटेन अपने अस्तित्व के लिए भाग ले रहा है, जापान ब्रिटेन के लिए एक बड़ा ख़तरा है और अगर जापान तथा जर्मनी विजयी होते हैं तो ब्रिटेन को सौ-दो सौ साल तक गुलाम रहने का दंश झेलना होगा, और इसका मतलब यह है कि हमें अपने देश को इस कष्ट से सुरक्षित रखने के लिए ब्रिटेन की फ़ौज का हिस्सा बनकर लड़ना चाहिए। अंग्रेज़ अपने लिए नहीं लड़ रहा है वह भारत के लिए लड़ रहा है। मेरे इस तर्क को सुनकर उसने कहा तुम जो कुछ कह रहे हो ये तो सब राजनीति है मगर इस तर्क को फ़ौज के लिए स्वीकार्य कैसे बनाया जाये? मैंने कहा कि इस विचार को फ़ौज के लिए स्वीकार्य बनाने का तरीक़ा वही होना चाहिए जो कम्युनिस्टों का है। उसने चौंककर पूछा क्या मतलब? मेरा जवाब था, हम कम्युनिस्ट एक छोटी टोली बनाते हैं। फ़ौज के हर यूनिट में इस तरह की एक विशेष टोली बनाने के बाद हम अफ़सरों को यह बताते हैं कि फ़ासिज्म क्या है और उन्हें यह भी समझाते हैं कि जापान और इटली वालों के इरादे क्या हैं। इसके बाद उन अफ़सरों से कहा जाता है कि वे उक्त टोली में बतायी जाने वाली बातों को अपने यूनिटों के सिपाहियों को जाकर समझायें और बतायें। इस तरह हम इस रणनीति के तहत पहले फ़ौजी अफ़सरों को मानसिक रूप से सुदृढ़ करते थे और फिर उनके माधयम से आशिक्षित सिपाहियों को भी एक दिशा देते थे। इस पध्दति का विरोध भी बहुत हुआ।

बात वायसराय, कमांडर-इन-चीफ़ और फिर इंडिया आफ़िस तक पहुंची। मुझसे कहा गया कि मैं अपनी योजना को लिखित रूप में प्रस्तुत करूं। अंतत: इस योजना को मंज़ूरी मिल गयी और हमने फिर 'जोश ग्रुप' बनाये जो बहुत सफल रहा और इसके परिणामस्वरूप मैं ब्रिटेन द्वारा सम्मानित किया गया और तीन सालों में कर्नल बना दिया गया। उस ज़माने में ब्रितानी फ़ौज में एक भारतीय के लिए इससे ऊंचा फ़ौजी पद कोई और नहीं था। उस ज़माने में मुझे फ़ौज की कार्य पध्दति और ब्रितानी सरकार को जानने का अवसर मिला। मुझे पत्राकारिता का अनुभव भी उसी ज़माने में हुआ, क्योंकि सभी मोर्चे पर भारतीय फ़ौज के प्रचार का काम मेरे ही जिम्मे था और मैं बहुत हद तक भारतीय फ़ौज के लिए राजनीतिक अधिकारी (पॉलीटिकल कमिश्नर) का काम करने लगा। युध्द की समाप्ति पर मैं फ़ौज से अलग हो गया। उस समय मेरे सामने दो रास्ते थे या तो विदेश सेवा से संबंध्द हो जाता या फिर सिविल सेवा से। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया।
यह वह ज़माना था जब पाकिस्तान के लिए आंदोलन और भारतीय कांग्रेस का स्वाधाीनता आंदोलन अपने चरम पर था। मेरे एक पुराने मित्र जो एक बड़े ज़मींदार भी थे और जो पंजाब कांग्रेस पार्टी के अधयक्ष रहने के बाद मुस्लिम लीग में आ गये थे मुझसे कहने लगे कि मैं सिविल सेवा में जाने की इच्छा समाप्त कर दूं क्योंकि वह लाहौर से एक अंग्रेज़ी दैनिक निकालने की योजना बना रहे थे। उन्होंने उस अख़बार का संपादन करने का प्रस्ताव दिया जो मैंने स्वीकार कर लिया और मैंने जनवरी 1947 में लाहौर आकर पाकिस्तान टाइम्स का संपादन संभाल लिया। मैं चार साल पाकिस्तान टाइम्स का संपादक रहा। इसी अवधि में पाकिस्तान टे्रड यूनियन का उपाध्यक्ष भी मुझे बना दिया गया। 1948 में नागासाकी और हिरोशिमा पर होने वाली बमबारी के बाद कोरियाई युध्द भी छिड़ गया। इस बीच स्काटहोम से यह अपील आयी कि हम शांति-स्थापना के लिए आंदोलन चलायें। उस अपील के समर्थन में अमन कमेटी की स्थापना हुई और मुझे उसका संचालक बना दिया गया। अब मैं ट्रेड यूनियन, अमन कमेटी और पाकिस्तान टाइम्स तीनों मोर्चे पर सक्रिय था और सक्रियता तथा कार्यशैली के लिहाज़ से यह बहुत व्यस्त समय था। उसी ज़माने में आई.एल.ओ की एक मीटिंग में भाग लेने के लिए पहली बार देश से बाहर जाने का अवसर मिला। मैंने सन फ़्रांसिस्को के अतिरिक्त जेनेवा में भी दो अधिावेशनों में भाग लिया और इस तरह अमेरिका और यूरोप से मैं पहली बार परिचित हुआ।
1950 में मेरी मुलाक़ात अपने एक पुराने मित्र से हुई। यह जनरल अकबर ख़ान थे जो उस वक्त फ़ौज में चीफ़ आफ़ जनरल स्टाफ़ नियुक्त हुए थे। जनरल अकबर ने बर्मा और कश्मीर के मोर्चे पर होने वाले युध्दों में बड़ा नाम कमाया था। मैं इस साल मरी में छुट्टियां बिताने गया हुआ था। वहीं उनसे भेंट हुई। बातों के दौरान उन्होंने कहा कि हम लोग फ़ौज में हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जिन्होंने कश्मीर में हुई मोर्चेबंदी का सामना किया है वे देश की वर्तमान परिस्थिति से असंतुष्ट हैं और यह मानते हैं कि देश का नेतृत्व कायरों के हाथों में है। हम अभी तक अपना कोई संविधान नहीं बना पाये। चारों ओर अव्यवस्था और वंशवाद का चलन है। चुनाव की कोई संभावना नहीं, हम लोग कुछ करना चाहते हैं। मैंने पूछा क्या करना चाहते हो? उनका जवाब था हम सरकार का तख्ता पलटना चाहते हैं और एक विपक्षी सरकार बनाना चाहते हैं। मैंने कहा यह तो ठीक है लेकिन उन्होंने मेरी राय भी मांगी। मैंने कहा यह तो सब फ़ौजी क़दम है। इसमें मैं क्या राय दे सकता हूं। इस पर जनरल अकबर ख़ान ने मुझे अपनी गोष्ठियों में आने और उनकी योजनाओं के बारे में जानकारी लेने की बात कही। मैं अपने दो ग़ैर-फ़ौजी दोस्तों के साथ उनकी गोष्ठी में गया और उनकी योजनाओं से अवगत हुआ। उनकी योजना यह थी कि राष्ट्रपति भवन, रेडियो स्टेशन वगैरह पर क़ब्ज़ा कर लिया जाये और फिर राष्ट्रपति से यह घोषणा करवा दी जाये कि सरकार का तख्ता पलट दिया गया है और एक विपक्षी सरकार सत्ता में आ गयी है। छ: महीने के भीतर चुनाव कराये जायेंगे और देश का संविधान निर्मित किया जायेगा। इसके अतिरिक्त अनगिनत सुधार किये जायेंगे। इस पर पांच छ: घंटे तक बहस होती रही और अंतत: यह तय हुआ कि अभी कुछ न किया जाये क्योंकि अभी देश किसी भी ऐसी स्थिति से नहीं जूझ रहा है कि जिसके आधार पर जनता को आंदोलित किया जाये। दूसरे, इस तरह की योजनाओं के क्रियान्वयन में ख़तरों का सामना करना पड़ता है। उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान थे। किसी तरह इस योजना की ख़बर सरकार के कानों तक पहुंच गयी। मैं तो इस अवधि में उन सभी घटनाओं को भूल चुका था कि अचानक सुबह चार बजे मेरे घर को फ़ौजियों ने घेर लिया और मुझसे कहा गया कि मैं उनके साथ चलूं। मैंने कारण पूछा तो मुझे जवाब मिला कि मुझे गवर्नर जनरल के आदेश से गिरफ्तार किया जा रहा है। चार महीने तक मुझे कैद रखा गया और फिर मुझे मालूम हुआ कि मुझे क्यों क़ैद किया गया। संविधान सभा ने एक विशेष अधिनियम को पारित किया और उसे रावलपिंडी षडयंत्र अधिनियम का नाम दिया गया। उस अधिनियम के तहत हम पर गुप्त मुक़द्दमा चलाया गया। अंग्रेज़ों के ज़माने से ही षडयंत्र संबंधी क़ानून बड़े ख़राब थे। आप कुछ कर नहीं सकते थे। अगर यह सिध्द हो जाये कि दो व्यक्तियों ने मिलकर क़ानून तोड़ने की योजना बनायी है तो उसे षडयंत्र का नाम दे दिया जाता था और अगर कोई तीसरा व्यक्ति इसकी गवाही दे दे तो फिर अपराध सिध्द मान लिया जाता था। सरकार ने अधिनियम बनाकर बचाव करने की सभी संभावनाओं को समाप्त कर दिया था। बनाये जाने वाले अधिनियम के तहत तो केवल सज़ा ही मिल सकती थी, भागने का कोई रास्ता भी नहीं था। यह मुक़द्दमा डेढ़ साल तक चलता रहा और हममें से हर एक के लिए उसके पद के अनुसार भिन्न-भिन्न दंड निश्चित किये गये। जनरल को दस साल, ब्रिगेडियर को सात साल, कर्नल को छ: साल और हम सब असैनिकों को उससे कम यानी चार साल की क़ैद की सज़ा सुनायी गयी।
मेरी हिरासत का यही वह समय था जो रचनात्मक रूप से मेरे लिए बहुत उर्वर सिध्द हुआ। मेरे पास लिखने-पढ़ने के लिए वक्त ही वक्त था, फिर मुझमें शासकों के विरुध्द बहुत आक्रोश और क्रोध था, क्योंकि मैं निर्दोष था।
इसी अवधि में मेरी शायरी के दो संग्रह, काल कोठरी के उस दौर में तैयार हो गये। एक तो हिरासत के दिनों में ही प्रकाशित हो गया था और दूसरा मेरी रिहाई के बाद प्रकाशित हुआ। जब आप को चार साल के क़रीब जेल में रखा गया हो और बंदी होने का दुख भी आपके हिस्से में आया हो, तो निश्चित रूप से बाहर की दुनिया में आपका मूल्य बढ़ जाता है। जब मैं जेल से बाहर आया तो मुझे अनुभव हुआ कि मैं पहले की तुलना में अधिक प्रसिध्द और लोकप्रिय हो गया हूं। मैं दोबारा पाकिस्तान टाइम्स से जुड़ गया और मैंने अमन कमेटी तथा ट्रेड यूनियन से अपने संबंधा फिर से स्थापित कर लिये। यह तीन चार साल का समय ऐसी ही गहमागहमी में गुज़र गया। पाकिस्तान में वामपंथी आंदोलनों पर पाबंदी लगा दी गयी। यही स्थिति तीन चार साल तक जारी थी कि देश में पहला मार्शल लॉ लागू हो गया और पहली सैनिक सरकार स्थापित हो गयी, जिसका अर्थ था कि किसी भी व्यक्ति को बिना किसी अपराध के गिरफ्तार किया जा सकता है। उस समय के मार्शल लॉ ने एक अत्याचार यह भी किया कि हर उस व्यक्ति को पकड़ना शुरू कर दिया गया जिसका नाम 1920 के बाद की पुलिस रिपोर्टों में दर्ज़ मिला था। इस तरह जेल में हमें नब्बे साल और अस्सी साल के बूढ़े मिले, कुछ की तपेदिक तथा अन्य बीमारियों के कारण जेल में ही मृत्यु हो गयी। मैंने लाहौर क़िला में डेढ़ महीने गुज़ारा और फिर चार पांच महीने के बाद मुझे रिहा कर दिया गया। मैंने फिर पाकिस्तान टाइम्स के दफ्तर की ओर रुख़ किया और तब मैंने देखा कि उसका दफ्तर पुलिस के घेरे में था। मेरे पूछने पर पता चला कि पाकिस्तान टाइम्स पर फ़ौजी सरकार ने क़ब्जा कर लिया है और इस तरह मेरी पत्रकारिता का अंत हो गया। मैं ऊहापोह में था कि क्या करूं। उन दिनों एक अमीर वर्ग जो मेरी शायरी को पसंद करता था, मेरी चिंता से अवगत था। उन लोगों ने पूछा आप क्या करना चाहते हैं? मैंने कहा मुझे नहीं मालूम तो किसी ने सुझाव दिया, क्यों न संस्कृति से संबंधित कोई गतिविधि आरंभ की जाये। मैंने कहा यह अच्छा विचार है और इस प्रकार हमने लाहौर में 'आर्ट कौंसिल' की स्थापना की। कौंसिल एक पुराने और टूटे-फूटे घर में थी जो आज के आलीशान भवन जैसा आकर्षक नहीं था। कौंसिल का आरंभ हुआ और उसके भवन में प्रदर्शनियों, नाटकों और आयोजनों का तांता लगा रहता था। तीन चार साल तक यह गतिविधि चलती रही और मैं इसी अवधि में बीमार पड़ गया। पहली बार दिल का दौरा पड़ा। और इसी बीच मुझे लेनिन विश्व शांति पुरस्कार दिये जाने की घोषणा हुई। किसी ने मुझे फोन पर ख़बर सुनायी तो मुझे विश्वास नहीं हुआ, मैंने जवाब में कहा बकवास मत करो, मैं पहले ही बीमार हूं। मेरे साथ ऐसा मज़ाक न करो। उसने उत्तर में कहा, मैंने टेलीप्रिंटर पर यह ख़बर ख़ुद देखी है, तुम्हारे साथ पुरस्कार पाने वालों में पिकासो और दूसरे भी हैं।
जब मैं स्वस्थ हो गया तो मुझे पुरस्कार ग्रहण करने और मास्को आने के लिए आमंत्रित किया गया। मैं मास्को के बाद लंदन चला गया और लंदन में दो वर्ष तक रहा। मैं लंदन से लाहौर आने के बजाय कराची लौट आया। कराची में मैं मिस्टर महमूद हारून के निवास स्थान पर ठहरा। उनकी बहन जो डाक्टर थीं और मेरी मित्र थीं, उन्होंने मुझे लिखा कि श्रीमती हारून बीमार हैं और आपको देखना और मिलना चाहती हैं। मेरे आने पर श्रीमती हारून ने मुझे बताया कि उनका जो फ़लाही फ़ाउंडेशन है उसके अधीन स्कूल, अस्पताल और अनाथालय चल रहा है। उनके लड़के के पास फ़ाउंडेशन चलाने के लिए समय नहीं है क्योंकि वह व्यापार तथा राजनीतिक गतिविधियों में व्यस्त रहे हैं। अच्छा होगा कि फ़ाउंडेशन की व्यवस्था मैं संभाल लूं। मैंने फ़ाउंडेशन के स्थान पर उसकी गतिविधियों का निरीक्षण किया तो देखा कि वह गंदी बस्ती का इलाक़ा था, जहां मछुआरे, ऊंट वाले, नशीली दवाओं का व्यापार करने वाले और आपराधिक गतिविधियों में लिप्त व्यक्ति रहा करते थे। मुझे यह इलाक़ा अच्छा लगा, और हमने इस क्षेत्रा में अपनी गतिविधिा तेज़ कर दी। स्कूल को कॉलेज में परिवर्तित कर दिया, एक तकनीकी संस्थान भी स्थापित किया और अनाथालय की भी व्यवस्था की। इस प्रकार कोई आठ साल तक मैं शैक्षणिक और प्रशासनिक गतिविधियों से जुड़ा रहा। इस बीच 65 और 71 के युध्द भी हुए। इन दोनों युध्दों के दौरान मैं अत्यधिक मानसिक तनाव से प्रभावित रहा। उसका कारण यह था कि मुझसे बार-बार देशभक्ति के गीत लिखने की फ़रमाइश की जा रही थी। मेरे इनकार पर यह ज़ोर दिया जाता कि देशभक्ति और मातृभूमि की मांग यही है कि मैं युध्द के या देशभक्ति के गीत लिखूं। लेकिन मेरा तर्क यह था कि युध्द अनगिनत व्यक्तियों के लिए मृत्यु का कारण बनेगा और दूसरे पाकिस्तान को इस युध्द से कुछ नहीं मिलने वाला है। इसलिए मैं युध्द के लिए कोई गीत नहीं लिखूंगा। लेकिन मैंने 65 और 71 के युध्दों के विषय में नज्में लिखीं, 65 के युध्द से संबंधित मेरी दो नज्में हैं।...
बांग्लादेश युध्द के ज़माने में मैंने तीन-चार नज्में लिखीं। लेकिन उन नज्मों की रचना में युध्द गीतों का आग्रह करने वालों को मुझसे और भी निराशा हुई। परिणामस्वरूप मुझे सिंध में भूमिगत हो जाना पड़ा। युध्द समाप्त हुआ तो पाकिस्तान के दो टुकड़े हो चुके थे।
चुनाव के बाद फ़ौजी सरकार समाप्त हो गयी थी और भुट्टो के नेतृत्व में पीपुल्स पार्टी की सरकार स्थापित हो चुकी थी। उनसे मेरे अच्छे संबंध थे । उस ज़माने में जब वह विदेश मंत्री थे और उस समय भी जब वह विपक्षी पार्टी के नेता थे। उन्होंने मुझे अपने साथ काम करने के लिए आमंत्रित किया। मैंने पूछा मेरा काम क्या होगा, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि मैं पहले से ही सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदार रह चुका हूं। क्यों न उसी क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर कुछ काम करूं। मैंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और नेशनल कौंसिल ऑफ़ आर्ट्स (राष्ट्रीय कला परिषद्) की स्थापना की। इसके अतिरिक्त मैंने 'फ़ोक आर्ट्स' जो अब 'नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ़ फ़ोक हेरिटेज' है, की स्थापना की। मैं इन परिषदों की देख-रेख में चार साल तक व्यस्त रहा कि सरकार फिर से बदल गयी। इस अवधिा में मेरा गद्य और पद्य लिखने का क्रम लगातार जारी रहा। इसी अवधि में मेरी शायरी का अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी, रूसी तथा अन्य दूसरी भाषाओं में अनुवाद होता रहा। ज़ियाउल हक़ के शासन काल में मेरे प्रभाव को नकार दिया गया। वैसे भी इस सरकार में संस्कृति का महत्व पहले जैसा नहीं रहा था, मैंने सोचा मुझे कुछ और करना चाहिए।
मैं एशियाई और अफ़्रीकी साहित्यकार संगठन के लिए कुछ-न-कुछ करता ही रहता था। उनकी गोष्ठियों में भी भागीदारी होती रहती थी। उस संगठन का दफ्तर काहिरा में था जहां से उस संगठन की पत्रिाका लोटस (स्वजने) का प्रकाशन होता था।
कैंप डेविड समझौते के बाद अरब के लोगों का यह अनुरोधा था कि उसका दफ्तर काहिरा से कहीं और स्थानांतरित कर दिया जाये। लोटस का मुख्य संपादक जो संगठन का सचिव भी था, उसकी साइप्रस में गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी। अब लोटस का संपादन करने वाला कोई नहीं था। इस समय एफ़्रो-एशियाई साहित्यकार संगठन का दफ्तर कहीं नहीं था। इस पत्रिका के संपादन के लिए मुझे आमंत्रित किया गया और यह भी फैसला हुआ कि संगठन का दफ्तर बैरूत में स्थानांतरित कर दिया जाये। मैं अफ़्रीकी एशियाई साहित्यकारों के संगठन और उसकी पत्रिका लोटस से चार साल तक जुड़ा रहा और फिर हमें इससे फ़ुर्सत मिल गयी।
बैरूत पर आक्रमण के एक महीने बाद मैं किसी-न-किसी तरह वहां से निकलने में सफल हो गया और पाकिस्तान पहुंच गया। यहां आते ही मैं एक बार फिर बीमार हो गया।
अब जो यह एलिस के बारे में आप लोग पूछ रहे हैं तो मैं बताऊं। जब मैं कॉलेज में पढ़ाने लगा था तो जैसा मैंने बताया, मेरे कुछ साथी आक्सफ़ोर्ड से वापस लौटे तो वे मार्क्सवादी विचारधारा के समर्थक थे। उसी में एक साथी जो मार्क्सिस्ट था उसकी पत्नी जो अंग्रेज़ थी वह भी मार्क्सिस्ट थी। एक दिन उसने मुझसे पूछा, तुम उदास और निराश क्यों रहते हो, फिर स्वयं ही बोली, तुम्हें इश्क़ हो गया है क्या ? तुम बीमार लगते हो। उसने कुछ किताबें मुझे दीं और कहा कि उन्हें पढ़ूं उसने स्पष्ट किया, तुम्हारा दुख बहुत कुछ व्यक्तिगत ढंग का है। ज़रा पूरे हिंदुस्तान पर नज़र डालो, अनगिनत लोग भूख और बीमारी के शिकार हैं। तुम्हारा दुख तो उनकी तुलना में कुछ भी नहीं है। और तब प्रेम के विषय से मेरा ध्यान हट गया और मैंने व्यापक संदर्भों में सोचना आरंभ कर दिया। मेरी नज्म 'मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न मांग' इसी बदलते हुए सोच का परिणाम थी। मेरे मित्र जिनकी पत्नी का उल्लेख मैंने किया वह एक अच्छे साहित्यकार थे और एक कॉलेज के प्रिंसिपल भी थे। उनके साथ शिक्षण के कार्य में व्यस्त हो गया। कोई तीन चार साल बाद मेरे मित्र की अंग्रेज़ पत्नी की एक बहन उन लोगों से मिलने अमृतसर आयी, जहां मैं पढ़ा रहा था। मेरी उस महिला से जब मुलाक़ात हुई तो हम मित्र बन गये लेकिन उन्हीं दिनों युध्द छिड़ गया और वह महिला अपने देश वापस न लौट सकी। मैं भी कैंब्रिज जाने वाला था मगर न जा सका और इस तरह हमारी मित्रता गहरी होती गयी और एक दिन हमने शादी कर ली। वह महिला एलिस थी।
जहां तक बैरूत में मेरे प्रवास का संबंध है तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं फ़िलिस्तीनियों का समर्थक था जिन्हें एक षडयंत्र द्वारा अपने देश से निकाल दिया गया था। यह अजीब बात थी कि इज़राइली जिन्हें नाज़ियों के हाथों कठोर यातना झेलनी पड़ी थी, वे भी अब फ़िलिस्तीनियों को इसी प्रकार कष्ट देने के लिए उतारू थे, जबकि फ़िलिस्तीनियों ने इज़राइलियों का कुछ नहीं बिगाड़ा था। लेकिन शायद इज़राइलियों के अत्याचारी व्यवहार के पीछे हिंसक मनोग्रंथि काम कर रही थी। शक्तिशाली का साथ तो सब देते ही हैं क्योंकि उसमें कोई हानि नहीं होती। कमज़ोर का साथ देने वाले कम होते हैं और उसमें केवल हानि ही हिस्से में आती है। मैंने बैरूत प्रवास के दिनों में कमज़ोर का साथ देने को अपना रचनात्मक धर्म स्वीकार किया था।
उर्दू से अनुवाद : मो. ज़फ़र इक़बाल


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