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शनिवार, 14 मई 2016

कीर्तन ,संस्कृति और राजनीति


       
कीर्तन-भजन हमारा समाज कब से कर रहा है यह ठीक-ठीक बताना मुश्किल है।भजन के लिए पवित्र मंत्र चाहिए।जबकि कीर्तन के लिए संगीत और लय चाहिए।भजन अकेले की साधना है ,जबकि कीर्तन सामूहिक आनंद है।कीर्तन बुनियादी तौर पर शास्त्रीय संगीत का विकल्प है।शास्त्रीय संगीत में गायक प्रमुख है। जबकि कीर्तन एकल नहीं सामूहिक होता है।शास्त्रीय संगीत में गायक-श्रोता आमने-सामने होते हैं। उनमें विभाजन या अंतराल बना रहता है।जबकि कीर्तन में श्रोता की भिन्न स्थिति नहीं होती।बल्कि कीर्तन में वह शामिल होता है।गायक-श्रोता का वर्गीकरण कीर्तन के लिए बेमानी है।

शब्द का अपना इतिहास होता है,मंशा होती है और उससे जुड़ी राजनीति भी होती है।मजदूरों की बस्ती में जब कीर्तन होता है तो उसका लक्ष्य वही नहीं रहता जो मन्दिर में होने वाले कीर्तन का है।कईबार दंगों के पहले कीर्तन का आयोजन करके दंगों के लिए माहौलबनाया गया है।अपराधी लोग अपने को पुण्यात्मा के रूप में स्वीकृति दिलाने के लिए कीर्तन कराते हैं।इस नजरिए से देखें तो कीर्तन का अर्थ संदर्भ और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।फलतःकीर्तन भिन्न भिन्न परिस्थितियों में भिन्न अर्थ की सृष्टि करता है।नए विमर्शों को जन्म देता है।

हिन्दीभाषी क्षेत्रों से लेकर पश्चिम बंगाल और उत्तरपूर्व के राज्यों तक कीर्तन के अनेक रूप प्रचलन में हैं।कीर्तन की विशेषता है किसी मंत्र विशेष का संकीर्तन।जैसे-हरे राम हरे राम ,राम राम हरे हरे,हरे कृष्णा हरे कृष्णा,कृष्णा-कृष्णा हरे हरे।यह वैष्णव सम्प्रदाय का जनप्रिय कीर्तन है।इन दिनों इस कीर्तन में पश्चिम और पूर्व का सम्मिश्रण खूब हो रहा है।हरे राम हरे कृष्णा सम्प्रदाय से लेकर श्रीश्री रविशंकर आदि तमाम धार्मिक गुरूओं के यहां कीर्तन के सम्मिश्रित रूपों को आसानी से देखा जा सकता है। कीर्तन में मंत्र,शरीर, और संगीत लय इस कदर गुंथे होते हैं कि उनसे निकलकर सोचना असंभव होता है।



कीर्तन में नाद का आनंद और उन्माद अंतर्ग्रथित है।अंतमें शिरकत करने वाले के पास कीर्तन की स्मृति मात्र रह जाती है।कीर्तन ने संगीत प्रस्तुति के प्रभुत्वशाली रूपों को चुनौती दी है और शिरकत के भावबोध को जन्म दिया है। कीर्तन में हर कोई शिरकत कर सकता है।इस अर्थ में कीर्तन सेकुलर है। प्रिफॉर्मर और श्रोता के बीच के भेद को कीर्तन खत्म कर देता है।कीर्तन में हर कोई अपनी लय,भाव,भाषा और भंगिमा के साथ शिरकत करता है।कीर्तन में कोई भी गीत या मंत्र बार-बार दोहराया जाता है और पुनरावृत्ति के क्रम में ही संगीत की लय में एकता और आनंद की सृष्टि होती है।पुनरावृत्ति समर्पण और धर्मनिरपेक्ष भावबोध निर्मित करती है।इस अर्थ में कीर्तन धर्मनिरपेक्षीकरण का महत्वपूर्ण औजार है। कीर्तन में शरीर,शब्द और गीतात्मक ये तीनों मिलकर नए परिवेश और अनुभूति की सृष्टि करते हैं।यह प्रक्रिया अशिक्षित-शिक्षित में अंतर्क्रियाओं को जन्म देती है,ध्वनि और शब्द की अंतर्क्रियाओं को जन्म देती है।इसमें अंतर्निहित द्वयार्थात्मकता भी अपना खतरनाक खेल खेलती है।अभी तक हम मानते रहे हैं कि शब्द सबसे ताकतवर होता है,हठात कीर्तन हमें यह बोध देता है लय और नाद ताकतवर होते हैं। वेद की ऋचाओं के पाठ के जरिए नाद की जो परंपरा आरंभ हुई वह सचेत रूप से कीर्तन में चली आई है,उसी तरह वैदिक ऋचाओं का पाठ जिस नाद की सृष्टि करता है वह ऋचाओं में निहित अर्थ को छिपाने का काम करता है।यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां पर हमें सोचना चाहिए और सवाल उठाना चाहिए कि कीर्तन की मंशा क्या है ॽ विचारधारा क्या है ॽविचारधारा का संबंध मंशा से है।आयोजक कौन है और किसलिए आयोजन किया जा रहा है ॽऔर किस स्थान पर आयोजन किया जा रहा हैॽ ये सवाल कीर्तन से गहरे जुड़े हैं,इनके आधार पर कीर्तन की विचारधारा को रेखांकित करने में मदद मिल सकती है।

बुधवार, 25 नवंबर 2015

गुरु नानकदेव और उनकी विश्वदृष्टि


संत गुरु नाननदेव मेरे सबसे प्रिय संत-कवि हैं। उनकी रचनाएं और जीवनशैली देखने के बाद नए किस्म के व्यक्ति और नए किस्म के मूल्यबोध की सृष्टि होती है। नानक उन संतों में हैं जिसने गाना गाकर सब कुछ पा लिया। गाना इतनी तल्लीनता के साथ गाया कि गान ही जीवन का सर्वस्व बन गया। पूरे मन-प्राण से गाने से उनको जो मिला वह अपने आपमें बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसलिए जो भी काम करें प्राण लगाकर करें तो सफलता जरुर मिलती है।प्राण लगाकर एक गीत गा दो सफलता मिलेगी।नाच लो सफलता मिलेगी,कक्षा पढाओ सफलता मिलेगी,भाषण दो तो लोग प्रशंसा करेंगे।

नानक की विश्वदृष्टि का मूलाधार है “जपुजी”,

आदि सचु जुगादि सचु

मंत्र:

इक ओंकार सतिनाम

करता पुरखु निरभउ निरवैर।

अकाल मूरित अजूनी सैभं गुरु प्रसाद।।

जपु:

आदि सचु जुगादि सचु।

है भी सचु नानक होसी भी सचु।।

पउड़ी: 1

सोचे सोचि न होवई जे सोची लख बार।

चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिवतार।

भु.खया भुख न उतरी जे बंना पुरीआं भार।

सहस सियाणपा लख होहि, त इक न चले नालि।

किव सचियारा होइए, किव कूड़ै तुटै पालि।

हुकिम रजाई चलणा 'नानक' लिखिआ नालि।

अर्थात् -आदि सचु जुगादि सचु।

है भी सचु नानक होसी भी सचु।।

'वह आदि में सत्य है, युगों के आरंभ में सत्य है, अभी सत्य है। नानक कहते हैं, वह सदा सत्य है।

भविष्य में भी सत्य है।'



'वह एक है, ओंकार स्वरुप है, सत नाम है, कर्ता पुरुष है, भय से रहित है, वैर से रहित है, कालातीत-

मूर्त्ति है, अयोनि है, स्वयंभू है, गुरु की कृपा से प्राप्त होता है।'

एक है--इक ओंकार सतिनाम।

जो भी हमें दिखाई पड़ता है वह अनेक है। जहां भी तुम देखते हो, भेद दिखाई पड़ता है। जहां तुम्हारी आंख

पड़ती है, अनेक दिखाई पड़ता है। सागर के किनारे जाते हो, लहरें दिखाई पड़ती हैं। सागर दिखाई नहीं पड़ता।

हालांकि सागर ही है। लहरें तो ऊपर-ऊपर हैं।

किसी भी बात को कहने के लिए कहानी में कहो तो बात बेहतर ढ़ंग से संप्रेषित होती है, कहानी सच है और कहानी कल्पना भी है।कहानी हमेशा प्रतीक के बहाने संप्रेषित होती है। नानक की कहानी में भी प्रतीक का बड़ा महत्व है।जब भी कोई गहरी बात कहनी हो प्रतीक के माध्यम से कहो तो बेहतर ढ़ंग से संप्रेषित होगी। प्रतीकात्मक कहानी यह है कि नानकदेव अपने मित्र मरदाना के साथ नदी किनारे बैठे हुए बातें कर रहे थे, अचानक उन्होंने अपने कपड़े उतारे और नदी में कूद गए,मरदाना ने काफी खोजबीन की लेकिन नानक का कोई पता नहीं चला। गांव लौटकर सब गांववालों को खबर दी कि नानक नदी में नहाने गए तो निकले ही नहीं। सारा गांव नदी किनारे एकत्रित हो गया,नानक की कहीं कोई खबर नहीं मिल रही थी, सब रो रहे थे,क्योंकि सारा गांव नानक को बहुत प्यार करता था।तीन दिन बीत गए लोगों ने मान लिया कि नानक डूब गए या फिर किसी जानवर ने उनको खा लिया। सब यही सोच रहे थे कि वे अब नहीं लौटेंगे। लेकिन तीसरे दिन अचानक नानक प्रकट हुए। गांववालों की खुशी का ठिकाना न रहा।प्रकट होने पर “जपुजी” नामक पहला अमृत वचन कहा। कहने को यह कहानी बहुत छोटी है लेकिन बेहद मारक है। इस कहानी के मर्म में प्रवेश करने की जरुरत है। यह कहानी इसलिए नहीं बता रहे हैं कि हम नानक के जरिए चमत्कार चर्चा करना चाहते हैं,बल्कि हम तो इसमें निहित संदेश को जानना चाहते हैं। इसका पहला संदेश है कि जब तक तुम खो न जाओ,मिट न जाओ तुमको परमात्मा नहीं मिलता। तुम्हारा खो जाना ही उसको पाना है। नानक को खो जाने में तीन दिन लगे,तीन दिन बाद परमात्मा को पाया। अजीब संयोग है कि जब भी कोई आदमी मरता है तो उसके सूतक से मुक्त होने में तीन दिन लगते हैं।मृतक का तीसरा मनाते हैं। तीसरा इसलिए मनाते हैं क्योंकि मरने की घटना को घटित होने में तीन दिन लगते हैं। कहने का आशय यह कि जब तुम किसी के सामने मरते हो तो सामने वाला ही परमात्मा होता है। नानक की भी यही दशा थी। मनुष्य के परमात्मा में लोप की पहली सीढ़ी है अहंकार का लोप।यह मनुष्यत्व को पाने की पहली सीढ़ी है।

सिक्ख वह है जो गृहस्थ भी है और सन्यासी भी है। सिक्ख वह है जो सीखने वाला है। सिक्ख का मतलब है गृहस्थ और सन्यासी का एक साथ होना। गृहस्थ होकर सन्यासी होना बड़ा टेढ़ा मामला है।लोग गृहस्थी से भागकर सन्यासी होते हैं। लेकिन नानक ने गृहस्थी से भागकर संत पद नहीं पाया,वे गृहस्थ रहकर सन्यासी बने।यानी रहना घर में लेकिन ऐसे रहना जैसे सन्यासी हो।यानी रहना घर में लेकिन ऐसे रहना जैसे नहीं रहते हो। हिमालय पर रहते हो। नानक ने सन्यासी की यह परिभाषा निर्मित की इसने समूचे भक्ति आंदोलन के चरित्र को प्रभावित किया।हमारे अनेक संत कवि सपरिवार रहते थे और संत थे। नानक इस संसार से भागने के शिक्षा नहीं देते बल्कि इस संसार से प्रेम करने की शिक्षा देते हैं।

सोचे सोचि न होवई जे सोची लख बार।

चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिवतार।

भुखिया भुख न उतररी जे बंना पुरीआं भार।

सहस सियाणपा लख होहि, त इक न चले नालि।

किव सचियारा होइए, किव कूड़ै तुटै पालि।

हुकिम रजाई चलणा नानक लिखिआ नालि।

यह बड़ा कीमती, बहुमूल्य सूत्र है। यह नानक के नजरिए का सार है। भगवान सोचने से या चिन्तन से नहीं मिलता, चिन्तन करोगे तो भटक जाओगे। सवाल सोचने का नहीं है देखने का है। देखने के लिए निर्मल आँखें चाहिए। विचारों से भरी आँखों से देखोगे तो चीजें समझ में नहीं आएंगी।भगवान को सोचकर पाया नहीं जा सकता। भगवान के पक्ष में बनाए गए विचारों की यह सबसे गंभीर आलोचना है। हम बार-बार भगवान की सत्ता सिद्द करने के लिए विचारों की मदद लेते हैं जो कि गलत है। नानक की अकाट्य पद्धति थी जिसके जरिए वे विवेकवाद की ओर मुड़ते थे,एक नमूना देखें-

नानक एक मुसलमान नवाब के घर मेहमान थे। नानक को क्या हिंदू क्या मुसलमान! जो ज्ञानी है, उसके लिए

कोई सम्प्रदाय की सीमा नहीं। उस नवाब ने नानक को कहा कि अगर तुम सच ही कहते हो कि न कोई हिंदू न

कोई मुसलमान, तो आज शुक्रवार का दिन है, हमारे साथ नमाज पढ़ने चलो। नानक राजी हो गए। पर उन्होंने

कहा कि अगर तुम नमाज पढ़ोगे तो हम भी पढ़ेंगे। नवाब ने कहा, यह भी कोई शर्त की बात हुई? हम पढ़ने

ही जा रहे हैं। पूरा गांव इकट्ठा हो गया। मुसलमान-हिंदू सब इकट्ठे हो गए। हिंदुओं में तहलका मच गया। नानक के घर के लोग भी पहुंच गए कि यह क्या कर रहे हो? लोगों को लगा कि नानक मुसलमान होने जा रहे हैं। लोग अपने भय से ही दूसरे के भय को भी तौलते हैं।नानक मस्जिद गए। नमाज पढ़ी गई। नवाब बहुत नाराज हुआ। बीच-बीच में लौट-लौट कर देखता था कि नानक न तो झुके, न नमाज पढ़ी। बस खड़े रहे । लोगों ने जल्दी-जल्दी नमाज पूरी की, लेकिन क्रोध में कहीं नमाज पूरी हो सकती है । किसी तरह नमाज पूरी करके लोग नानक पर टूट पड़े।और उन्होंने कहा कि तुम धोखेबाज हो।कैसे साधु ,कैसे संत हो ! तुमने वचन दिया नमाज पढ़ने का लेकिन तुमने नमाज की नहीं।

नानक ने कहा, वचन दिया था, शर्त आप भूल गए। कहा था कि आप नमाज पढोगे तो मैं भी पढूँगा। आपने नहीं पढ़ी तो मैं कैसे पढ़ता ? नवाब ने कहा, क्या कह रहे हो? होश में तो हो ? इतने लोग गवाह हैं कि हम नमाज पढ़ रहे थे।नानक ने कहा इनकी गवाही मैं नहीं मानता,क्योंकि मैं आपको देख रहा था कि भीतर क्या चल रहा है।आप काबुल में घोड़े खरीद रहे थे। नवाब थोड़ा हैरान हुआ;क्योंकि खरीद वह घोड़े ही रहा था।उसका सबसे अच्छा घोड़ा मर गया था उसी दिन सुबह।वह उसी की पीड़ा से भरा था।नमाज क्या खाक पढ़ता !वह नमाज पढ़ते हुए मन में यही सोच रहा था कि जल्दी से काबुल जाऊँ और बढिया घोड़ा खरीदकर लाऊँ।क्योंकि वही घोड़ा उसी शान था,इज्जत था।और नाननक ने कहा कि यह जो मौलवी है तुम्हारा,जो नमाज पढ़वा रहा था,यह खेत में अपनी फसल काट रहा था। और यह बात सच थी।मौलवी ने भी कहा कि बात तो सच है।फसल पक गयी है और काटने का दिन आ गया है।गांव में मजदूर नहीं मिल रहे हैं और मन पर चिंता सवार है। तो नानक ने कहा ,अब तुम बोलो,तुमने नमाज पढ़ी जो मैं साथ दूँ ? इस कहानी का आशय एकदम साफ है। तुम जबर्दस्ती नमाज पढ लो,पूजा-उपासना कर लो, इस सबका कोई मूल्य नहीं है।पहले सोचो तुम्हारे मन में क्या चल रहा है ? पत्थर की तरह मूर्ति के सामने बैठ जाने से ईश्वर या मन सधेगा ?







मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

संचार क्रांति और तुलसीदास

                     
       आज यह बात बार-बार उठायी जा रही है कि आम लोगों में पढ़ने की आदत घट रही है। सवाल उठता है क्या तुलसीदास आज कम पढ़े जा रहे हैं ? क्या 'रामचरितमानस' कम बिक रहा है ? तुलसीदास आज भी सबसे ज्यादा पढ़े,सुने और देखे जा रहे हैं। सवाल उठता है पढ़ने की आदत पहले कैसी थी ? क्या हम पहले ज्यादा पढ़ते थे ? पढ़ने के मामले में हम पहले कोई ज्यादा बेहतर अवस्था में नहीं थे। हमारे पूर्ववर्ती कम पढ़ते थे। औपचारिक शिक्षा का प्रसार पढ़ने की संभावनाएं पैदा करता है। पहले कुछ ही लोग थे जो पढ़ते थे। संचार क्रांति के परिप्रेक्ष्य में पढ़ने की आदत को देखने पर जटिलता का आभास होता है। पढ़ने की जटिलताओं की अनुभूति साक्षरतायुग में नहीं थी।
    हम अमूमन शिकायत सुनते हैं कि बच्चे टीवी के सामने बैठे रहते हैं या इंटरनेट में उलझे रहते हैं और कम पढ़ते हैं। सच क्या है ? जब भी संचार माध्यमों का विस्तार होता है तो उससे वर्तमान और भविष्य के बारे में जागरूकता पैदा होती है, वर्तमान और भविष्य सुंदर नजर आता है। अतीत को नए सिरे से सजाने का काम करते हैं। मीडिया के विस्तार के कारण जिस तरह वर्तमान के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारियां पाते हैं वैसे ही अतीत के बारे में भी जानकारियां पाते हैं। मीडिया का प्रसार वर्तमान और भविष्य को ही समृद्ध नहीं करता बल्कि अतीत के प्रति हमारी समझ को भी समृद्ध करता है। जो लोग वर्तमान के प्रति उपेक्षाभाव रखते हैं उनमें अतीत के प्रति भी अचेतनता होती है। सवाल उठता है क्या लेखन के विकसित होने के पहले मनुष्य के जीवन को जानना संभव था ? जी नहीं, अतीत का वास्तव रुप हम नहीं जानते थे। अतीत के बारे में दावे के साथ जो भी कहा जा रहा है वह लेखन के उदय के बाद ही सामने आया है। यह सारा का सारा निर्मित है। साक्षरता-पूर्व युग तुलसीदास का युग था। इस युग की वे ही बातें कमोबेश विश्वसनीय हैं जिन्हें किसी न किसी तरह लिपिबद्ध कर लिया गया था। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस तरह घोड़े के बिना ऑटोमोबाइल की कल्पना संभव नहीं है। उसी तरह लेखन के बिना संस्कृति की कल्पना संभव नहीं है।
      वाचिकयुग कान-मुँह की संस्कृति का युग है। वाचिक संस्कृति में मनुष्य क्रमश: अपने अतीत के साथ बौद्धिक संपर्क खोता चला जाता है। वाचिक संस्कृति इतिहास को वैसे नहीं जानती जैसे इतिहास को हम आज जानते हैं। किसी भी वास्तविक घटना के विवरण और ब्यौरे चश्मदीद लोग बताते हैं अथवा वे लोग बताते हैं जो चश्मदीद के करीबी हों। लेकिन जो घटना बहुत समय पहले घटी हो तो उसके बारे में ,जैसे तुलसीदास का जन्म और लेखन तो इसके बारे में किसी भी बात को दावे के साथ कहना संभव नहीं है। यही स्थिति अन्य मध्यकालीन लेखकों की है। उनके जीवन प्रसंगों के बारे में विवाद हैं। वाचिकयुग में छात्र पढ़ते थे। शिक्षक पढ़ाते थे। किसी भी किस्म की परीक्षा नहीं होती थी। कोई लिखित अभ्यास नहीं करना पड़ता था। शिक्षक के सभी व्याख्यान मौखिक होते थे। शिक्षा की जितनी भी व्यवस्था थी वह मौखिक थी। छात्र को अपनी शैक्षणिक क्षमता का मौखिक ही प्रदर्शन करना पड़ता था। संगठित मौखिक बहस होती थीं। इसे हम शास्त्रार्थ के रूप में  जानते हैं। इसमें प्रभाव ही बड़ी शक्ति था। इसके कारण इस युग को ''वाचिक-प्रभावयुग' के नाम से जानते हैं।
   भारत में दो किस्म की परंपराएं थीं। यहां सीखने-पढ़ने की परंपरा थी साथ ही पाण्डुलिपि की भी परंपरा थी। पाठ का यहां पर बड़े ही कौशल के साथ इस्तेमाल किया जाता था। तुलसीदास ने जिस समय लिखना आरंभ किया था उस समय भारत में लेखन संस्कृति का व्यापक विकास हो चुका था। पाण्डुलिपि संस्कृति के कारण ही हम संस्कृति को जान पाए। संस्कृति का संरक्षण संभव हो पाया।मनुष्य के विचारों पर अक्षर के उदय का व्यापक असर हुआ किंतु सबसे ज्यादा गंभीर असर तब हुआ जब छापेखाने के अक्षर का निर्माण हुआ। यह काम 15वीं शताब्दी में ही आरंभ हो गया था। भारत में 16वीं शताब्दी में छापे की मशीन आ गयी थी। तुलसीदास की कविता पुराने किस्म की कविता से अनेक अर्थों में भिन्न है। कमोबेश यह फिनोमिना सभी भक्ति आंदोलन के कवियों में मिलता है। तुलसीदास की कविता में कविता से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसमें व्यक्त 'तर्क'। यह 'तर्क' द्वंद्वात्मक है। इसको हम सहज रूप में विमर्श के अर्थ में भी परिभाषित कर सकते हैं। तुलसीदास अपनी कविता के माध्यम से विमर्श तैयार करते हैं। विमर्श की कला का विकास करते हैं। यह ऐसा विमर्श है जो 'संप्रेषणीयता' और 'सामाजिकता' के गुण को अपने अंदर समेटे हुए है। तुलसीदास की कविता में 'तर्क' सीधे 'रेटोरिक' के रूप में आता है। यही वजह है कि तुलसी के मानस पर व्याख्यान ज्यादा अच्छे लगते हैं।
        रामकथा को काव्य के रूप में सुनने से ज्यादा रामचरित मानस पर व्याख्यान ज्यादा सुखद लगता है, ज्यादातर समय तुलसीदास की रामकथा का भाषण के जरिए अथवा कथा के रूप में आनंद तब ही मिलता है जब उस कविता को वार्ताकार 'रेटोरिक' में तब्दील कर देता है। निश्चित रूप से रामकथा तुलसीदास के जमाने में कविता के रूप में ही जनप्रिय रही होगी, आज भी समाज में रामचरितमानस के अखण्ड पाठ व्यापक जनप्रिय हैं। किंतु छापे की मशीन आने के बाद रामकथा का तार्किक तौर पर रेटोरिक अथवा प्रवचन के रूप में तेजी से प्रसार होता है। छापे की मशीन के आने के बाद तुलसीदास के 'तर्क' को ज्यादा से ज्यादा व्याख्यायित करने की परंपरा का विकास होता है। 'तर्क' के विकास का अर्थ है प्रवचन परंपरा का ज्यादा प्रसार । रामकथा के वाचिकयुगीन परिप्रेक्ष्य का ही यह प्रभाव है कि आज हमारे बीच में रामकथा के प्रवचन जितने जनप्रिय हैं, उतने किसी नेता के भाषण जनप्रिय नहीं हैं।छापे की मशीन आने के बाद तुलसीदास के पाठ का पाठक के साथ निजी संबंध गहरा हुआ है। छपा पाठ व्यक्ति को निजी तौर पर पढ़ने और पाठ की प्राइवेसी की ओर ठेलता है। तुलसीदास के साथ इस मामले में उलटा हुआ है। छापे की मशीन और बाद में इलैक्ट्रोनिक मीडिया आने के बाद तुलसीदास का पाठ प्राइवेट पाठ नहीं बन पाया है। तुलसीदास का पाठ निजी पाठ क्यों नहीं बन पाया ? अन्य पुराने धार्मिक पाठ छापे की मशीन के आने बाद प्राइवेट पाठ बनकर रह गए हैं। पुराने पाठों में 'रामचरितमानस' और ''श्री मद्भागवत कथा'' ही ऐसे पाठ हैं जो निजी पाठ नहीं बन पाए हैं। ये दोनों पाठ रेटोरिक कला के आदर्श उदाहरण हैं। इन दोनों के प्रवचनों में जितने व्यापक संदर्भों का कथावाचक इस्तेमाल करते हैं उतना अन्यत्र नजर नहीं आता। प्रवचनों में व्यापक स्तर पर संदर्भों का आना इस बात का संकेत भी है कि अब हम वाचिक संदर्भ की बजाय मुद्रित संदर्भ में आ गए हैं। किताब के युग में आ गए हैं। प्रवचन,भाषण,व्याख्यान कला के विकास का गहरा संबंध रैनेसां के साथ है। रैनेसां के आने के बाद रेटोरिक का तेजी से विकास होता है। पुराने किस्म का रेटोरिक नयी ऊर्जा प्राप्त करता है। छापे के युग में पाठ का ज्यादा सुसंगत संचय होता है। तथ्यों को ज्यादा व्यवस्थित ढ़ंग से संचित कर सकते हैं। अब तथ्यों को याद करने की नहीं बल्कि खोजने अथवा देखने की जरूरत होती है। पाण्डुलिपि के युग में तथ्यों को स्मृति में रखते थे किंतु छापे की मशीन के आने के बाद तथ्यों के दृश्य पर जोर है। मध्यकाल में प्राचीनकाल की तुलना में ज्यादा साक्षर थे और मध्यकाल की तुलना में आधुनिककाल में ज्यादा साक्षर हैं। रैनेसां की तुलना में आज ज्यादा साक्षर हैं। यानी रैनेसां की तुलना में आज के साइबरदौर में रीडिंग की आदत में इजाफा हुआ है।आज किताबें ज्यादा बिकती हैं, किताबों का प्रकाशन ज्यादा हो रहा है। अखबार और पत्रिकाएं ज्यादा पढ़ी और खरीदी जा रही हैं। लिखित पेज ने स्मृति के विकल्प के तौर पर अपने को विकसित कर लिया है। लिखित पेज के आगे अब हम डिजिटल पेज में दाखिल हो चुके हैं। डिजिटल पेज लिखित पेज से भी ज्यादा सुंदर ,उदार,गतिशील और प्रभावोत्पादक है। जिस तरह मौखिक परंपरा को शब्द ने लिपिबध्द किया वैसा ही शब्द की परंपरा को छापे की मशीन और अब छापे की मशीन की परंपरा को डिजिटल किताब रूपान्तरित कर रही है फलत: आज हम प्राचीनकाल से भी ज्यादा मौखिक काम करने लगे हैं। डिजिटल में ज्यादा बातें करने लगे हैं। डिजिटल ने वाचिक परंपरा को नए सिरे से जीवित कर दिया है। पहले वाचिक आख्यान को संरक्षित नहीं कर सकते थे किंतु आज ऐसा नहीं है। आज वाचिक आख्यान संरक्षित किया जा सकजा है। इसका आप वार्ताकार की अनुपस्थिति में भी आनंद ले सकते हैं। यह ऑडियो-वीडियो संस्कृति के विकसित होने के बाद ही हो पाया है। उसकी असंख्य प्रतियां तैयार कर सकते हैं। तुलसीदास के जमाने में सब कुछ बोलता था,यहां तक कि भगवान भी बोलता था। किंतु छापे की मशीन के आने के बाद से 'चुप्पी' या साइलेंस का युग शुरू होता है। अब कोई नहीं बोलता। चुप्पी के युग में मनुष्य सबसे बड़े संप्रेषक के रूप में सामने आता है। अब प्रत्येक चीज उस रूप में ही दिखाई देती है जिस रूप में मनुष्य उसे पैदा करता है। वाचिक परंपरा ने महान रचनाएं दीं हैं ,इनमें वेद हैं, महाकाव्य हैं,गीता है,रामचरितमानस है वहीं आधुनिकयुग में वाचिक परंपरा के जरिए नयी महान चीजें आयी हैं। भगवान के बारे में जितनी बेहतरीन रचनाएं मनुष्य ने वाचिकयुग में दीं वैसी रचनाएं आज दुर्लभ हैं। वाचिक संस्कृति बहुत ही समृद्ध संस्कृति है। हमारी समस्त कथाएं वाचिक परंपरा की ही देन हैं। प्राचीन दर्शन का समस्त श्रेष्ठतम रूप वाचिक की देन है। इसको ही कालान्तर में हमने उपदेश,प्रवचन,भाष्य, संवाद, विमर्श आदि में रूपान्तरित करके वर्गीकृत किया गया। हम जितना आगे जाना चाहते हैं उतनी ही तेज गति से अतीत भी अपनी ओर खींचता है। फलतःअतीत को खोले बिना भविष्य में जाना संभव ही नहीं है। आप ज्यों ही नए मीडिया को जन्म देते हैं पुराना मीडिया और भी चुस्त-दुरूस्त और सुंदर रूप में सामने आ जाता है। पुराना हमारा पीछा ही नहीं छोड़ता। यही वजह है वाचिक भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा है। हम अपने भविष्य का जितना विस्तार करते जाते हैं अतीत का भी उतना ही विस्तार होता है। भविष्य में जाते समय आपका अतीत से संबंध नहीं कटता।  वाचिक परंपरा के जो निर्माता थे,जो मौखिक परंपरा में जीते थे उन लोगों ने ही अक्षर परंपरा को जन्म दिया। जो ज्यादा बोलते थे उन्होंने ही लिखने की परंपरा को जन्म दिया। सड़कों पर काम करने वाले बातें करना बंद नहीं करते। यह सच है कि लेखन ने संप्रेषण को नयी दिशा दी। किंतु इससे बोलना कम नहीं हुआ। आज संदेश पहले की तुलना में ज्यादा आते हैं, आज पहले के किसी भी युग की तुलना में ज्यादा बातें करते हैं। आप जितना पढ़ते हैं उससे ज्यादा बातें करते हैं। वाचिकयुग का साहित्य आधुनिक किताबयुग आने के बाद और भी ज्यादा समृद्ध होता है,अर्थविस्तार पाता है। इलैक्ट्रोनिक मीडिया के जमाने में अब सब कुछ संचित करके रख सकते हैं। ज्ञान का सार्वभौम की बजाय स्थानीय उत्पादन कर सकते हैं। अपने कम्प्यूटर में  छापें और मुद्रित करें। छापे की मशीन ने ज्ञान की स्थानीयता पैदा की थी। इसे नयी ऊँचाई पर कम्प्यूटर ने पहुँचाया। आज हम बिजली की तेज गति से आगे जा रहे हैं।  आज हमें लेखन और मुद्रण से भी परे जाने की जरूरत है। आज जरूरी हो गया है कि प्रत्येक व्यक्ति लिखना सीख ले। जिससे हम तेजी से इलैक्ट्रोनिक मीडिया के परे जा सकें। आज प्रत्येक को प्रिंट करना आना चाहिए, टाइप करना आना चाहिए। इलैक्ट्रोनिक मीडिया ने मुद्रण और लेखन दोनों को ही बदल दिया है। साथ ही मीडियम को भी बदल दिया है। 
    













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