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रविवार, 23 अप्रैल 2017

नव्य उदार आर्थिकयुगीन युवा की सच्चाईयां-


भूमंडलीकरण की केन्द्रीय विशेषता है आत्ममुग्धता ,आत्महनन और आत्म-व्यस्तता । सन् 1990-91 के बाद से युवाओं में यह प्रवृत्ति तेजी से पैदा हुई है। इसने उसे सामाजिक सरोकारों से काटा है। पहले यह प्रवृति उच्चवर्ग में थी लेकिन भूमंडलीकरण के बाद से इस प्रवृत्ति ने निचले वर्गों में पैर पसारने आरंभ कर दिए।
आत्ममुग्ध भाव की विशेषता है आप स्वयं को जानने की कोशिश नहीं करते। वे तमाम क्षमताएं त्याग देते हैं जिसके जरिए आत्म को जानने में मदद मिले। आत्म या खुद को न जानने के कारण व्यक्ति के अंदर अन्य को जानने की इच्छा भी खत्म हो जाती है।फलतः ये युवा अन्य की मदद नहीं कर पाते। वे निजी जीवन में व्यस्त रहते हैं। निज से परे कोई संसार है जिसे जानना चाहिए उसको ये युवा सम्बोधित ही नहीं करते। यह ऐसा युवा है जो अपने अलावा किसी में दिलचस्पी नहीं ले जाता। ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं यह सुनना बंद कर देता है, रुचि लेना बंद कर देता है।
नए युवा देखने में आकर्षक,नए भाव-भंगिमा वाले हैं वे देखने में सुंदर लगते हैं। आरंभ में ये अन्य को जल्दी प्रभावित भी कर लेते हैं लेकिन ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं ये अपने को समेटना आरंभ कर देते हैं। इन युवाओं में एक बड़ा अंश है जो अपने चारों ओर की दुनिया से एकदम बेखबर है।
अमेरिका में इस तरह के युवा की एक नागरिकता परीक्षा ली गयी। अमेरिका में अक्टूबर 2009 से अगस्त 2013 के दौरान ली गयी नागरिकता परीक्षा में 30लाख से ज्यादा आप्रवासी युवाओं ने हिस्सा लिया। इस परीक्षा को 92प्रतिशत युवाओं ने पास किया। इन उत्तीर्ण युवाओं में 29फीसदी को अमेरिका के उपराष्ट्रपति का नाम तक नहीं मालूम था। 43फीसदी नागरिक अधिकारों को परिभाषित करने में असमर्थ रहे,40 फीसदी नहीं जानते थे कि अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान और जर्मनी से युद्ध किया था। 73 फीसदी नहीं जानते थे कि शीतयुद्ध के दौरान साम्यवाद ही मुख्य समस्या थी। 67 प्रतिशत नहीं जानते थे कि वे जिस आर्थिक व्यवस्था में रहते हैं उसे पूंजीवाद कहते हैं।
एक अन्य सर्वे में पता चला कि चार में से एक अमेरिकन को संविधान प्रदत्त पांच स्वाधीनताओं का ज्ञान नहीं था। वे एक से अधिक स्वाधीनता का नाम नहीं जानते थे। जिन लोगों में सर्वे किया गया उनमें से आधे से अधिक लोग “सिम्पसन कार्टून फैमिली ” के दो चरित्रों के नाम तक नहीं जानते थे। इन सर्वेक्षणों पर विशेषज्ञों ने कहा कि बच्चों की इस दशा के लिए पब्लिक स्कूल सिस्टम जिम्मेदार है। क्योंकि वे ठीक से बच्चों को इतिहास,भूगोल और नागरिकशास्त्र नहीं पढ़ाते। इन लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि इंटरनेट ने ऐसी पीढ़ी पैदा की है जो आत्मलीन,एडिक्ट,चंचलमन और अचेत है। यह भी देखा गया अनेक लोग अमेरिका में निजी स्वार्थ को देखकर वोट देते हैं न कि देश के स्वार्थ को देखते हैं। अमेरिका के पतन का बड़ा कारण है कि अनेक अमेरिकन देश के बारे में नहीं सोचते ,सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं। एक अन्य विशेषज्ञ ने कहा कि जब युवा हमारे संविधान को ही नहीं जानते तो उसकी रक्षा में या संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए वे खड़े कैसे होंगे ?

बुधवार, 18 जून 2014

नए मतवाले

        एक जमाना था नारा लगता था 'जीना है तो मरना सीखो ,कदम-कदम पर लडना सीखो। 'लेकिन अब यह नारा कहीं गुम हो गया है। अब तो एक ही नारा है 'जीना है तो तिकड़म सीखो।'

तिकड़म की कला में जो लोग पलकर बड़े हुए हैं वे इन दिनों मतवालों की तरह घूम रहे हैं। वे सारी दुनिया से बेखबर हैं। उनकी चिंता में फेसबुक है ,चैटिंग है,फिल्मों की गॉसिप है,लुभावने रसीले किस्से हैं। वे मोदी के दीवाने हैं,कारपोरेट कल्चर के फेन हैं।उनको अन्ना अच्छा लगता है क्योंकि वो हर आंदोलन को टीवी इवेंट बनाता है।

वे संघर्ष को टीवी इवेंट के रुप में देखना पसंद करते हैं। लेकिन आश्चर्यजनक बात है कि इन दीवानों को अफगानिस्तान,श्रीलंका,इराक आदि के कत्लेआम प्रभावित नहीं करते। वह तो यही मानकर चल रहे हैं कि इस्लामिक देशों में तो हिंसाचार आम बात है। मुसलमानों को तो लड़ लड़कर मर जाना चाहिए। उसे इससे भी कोई लेना देना नहीं है कि आर्थिकमंदी से कौन कितना प्रभावित हो रहा है। वह तो अपने कैरियर और कम्पटीशन की तैयारी के अंग के रुप में मंदी और अन्य सामयिक खबरों पर नजर रखे हुए है। क्योंकि उसे अपडेट रखना है, कहीं पेपर खराब न हो जाय। यानी सामाजिक-राजनीतिक सचेतनता अब उसके संघर्ष का नहीं कैरियर का हिस्सा है।

नए मतवालों के लिए स्वाधीनता संग्राम का किस्सागोई से ज्यादा कोई महत्व नहीं है। वे उस दौर के स्कैंडल में रस लेते हैं।इन मतवालों को स्वाधीनता संग्राम के मूल्य प्रभावित नहीं करते बल्कि इनकी रुचि तो स्वाधीनता आंदोलन के इतर प्रसंगों में है। वह स्वाधीनता संग्राम का मतलब नेहरु-गांधी के किस्से मानता है और भगतसिंह आदि उसे भटके हुए युवक नजर आते हैं।

यह ऐसा मतवाला है जिसे मूल्य नहीं, सड़कें,चमकदार भवन,मीडिया की सुर्खियां,सत्ता की कुर्सियां, कंपनी के टर्नओवर और नए नए गजट अपील करते हैं। वह नई फैशन पर फिदा है। उनकी चाल निराली है। वह पढ़ता है लेकिन किताबें कम और कम्पटीशन मास्टर टाइप चीजें ज्यादा पढ़ता है।बेस्टसेलर उसकी पहली पसंद है।

वह शिक्षित है लेकिन अन्य केलिए अपनी शिक्षा का कोई इस्तेमाल नहीं करना चाहता। उसको नौकरी चाहिए लेकिन गांवों में नहीं। इनमें से अनेक को टीचिंग में नौकरी चाहिए लेकिन शहरों में।यह ऐसा दीवाना है जो शहरों के अलावा अन्यत्र नहीं रहना चाहता। फैशन और स्टायल का यह वर्ग दीवाना है। इसमें से कुछ लोग हिन्दी साहित्य में भी आ रहे हैं। जमकर कविता-कहानी-उपन्यास भी लिख रहे हैं। लेकिन छोटे छोटे दायरों में मित्रमंडली बनाकर जीना इसकी नई प्रथा है। वह साहित्यिक हो या मतवाला हो, सब अपने छोटे समूहों में मगन होकर रह रहे हैं। बड़े मित्र समूहों और संघर्षशील संगठनों की चौपालें और हरकतें म्यूजियम की चीजें हो गयी हैं।



नए मतवाले धर्म से मुक्त हैं लेकिन साम्प्रदायिकचेतना से लैस हैं। ये साम्प्रदायिक प्रचार की कॉमनसेंस बातों को सच्चे विचार मानकर विश्वास करते हैं। साम्प्रदायिक कॉमनसेंस में आस्थावान होने के कारण वह अब हर चीज को इस कॉमनसेंस के आधार पर छानने-फटकने लगे हैं। शादी करने से लेकर वोट देने तक साम्प्रदायिकचेतना उसके स्वभाव को निर्धारित करती है। यह ऐसा व्यक्ति है जो स्वभाव से सरल है और विचार से साम्प्रदायिक है।

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

माल के सौंदर्यशास्त्र में कामुकता और प्रेम

माल के सौंदर्यशास्त्र की वह विशेषता है कि वह दैनिक जीवन की आत्मीयता और भावुकता को रूपायित करता है। यह कार्य फैंटेसी के माध्यम से होता है। इस तरह वह दैनंदिन जीवन की आत्मीयता का प्रमाण बन जाता है। चित्र में व्यक्ति को जैसा दिखाया जाता है, दर्शक अब वैसा ही बनने लगता है। वे ऐसी स्थिति पैदा करते हैं कि जो व्यक्ति की इमेज विज्ञापन में है वही वास्तविक है। विज्ञापन में दर्शाई वस्तु हमेशा आकर्षक कामुक इमेज के साथ आती है। 'कामुक' इमेज और 'प्रेम निवेदन' विज्ञापन की आम रणनीति के प्रमुख तत्व हैं। इससे वस्तु की बिक्री बढ़ाने में मदद मिलती है। इन तत्वों का जिन विज्ञापनों में प्रयोग होता है वहां अनुकरण होता अथवा ग्राहक को अपने हूबहू भाव को भी पीछे छोड़ जानेवाले भावों को संप्रेषित किया जाता है। 'वस्तु' के साथ 'प्रेम निवेदन' का प्रदर्शन व्यक्ति को आकर्षित करता है और आकांक्षी बनाता है। इसीलिए कहा जाता है कि माल की सौंदर्यशास्त्रीय भाषा का जन्म प्रेम निवेदन या खुशामद की भाषा से होता है। परंतु जब व्यक्ति अपनी सौंदर्यपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए वस्तुओं की दुनिया से उधार लेने लगता है, उसकी नकल करने लगता है तो यह संबंध उलट जाता है। यह माल के उपयोग मूल्य की पूर्व-सूचना है। उसके प्रभाव का पूर्व संकेत भी है जो अपने आप में
मंशाओं और इच्छाओं को उत्तेजित करता है। वह मानवीय संवेदनाओं को उत्तेजित करता है। वह सिर्फ शक्तिशाली मानवीय सहज वृत्तियों पर बल देता है। इससे केंद्रीय बिंदु ही बदल जाता है। इस तरह कामेच्छा और विनिमय-मूल्य में संबंध स्थापित हो जाता है। इस क्रम में हमें ऐसे आभिजात्य से मिलाया जाता है जिसके पास व्यापक रूप में सुविधाएं हैं, जिनमें दूसरे शामिल हो सकते हैं और वह वस्तु के माध्यम से प्रेम निवेदन करता है। विलासितापूर्ण माल की प्रभावशाली प्रस्तुति से संवेदनाओं पर सीधे प्रहार किया जाता है। उन्हें प्रेरित किया जाता है। इससे संपत्ति के हस्तांतरण में मदद मिलती है। यही उसका (पूंजीपति) संपत्ति को हजम कर जाने का तरीका भी है। यह वह कृत्रिम ढंग से वस्तुओं के दाम बढ़ाकर करता है।
माल के सौंदर्यशास्त्र की आलोचना में यह कहा जा सकता है कि पूंजीपतिवर्ग किसी वस्तु के ब्रांड नाम के साथ शब्द का भी स्वामी बन जाता है। अभी तक शब्द
का वर्गीय स्वामित्व नहीं होता था पर अब ब्रांड के साथ शब्द का भी वर्गीय स्वामित्व स्थापित हो जाता है। वह ब्रांड के प्रचार पर धन खर्च करते-करते शब्द का भी निजीकरण कर लेता है। अब वह उसकी संपत्ति का एक टुकड़ा हो जाता है। वह शब्द को ब्रांड में और ब्रांड के प्रचार को संपत्ति में बदल देता है। अत: मार्क्सवादी चिंतक शब्द और भाषा के अवर्गीय स्वरूप की जो बातें करते रहे हैं, उस पर पुनर्विचार की जरूरत है।
किसी एक माल में दिखनेवाली प्रवृत्ति जो कि ब्रांड की सफलता के रूप में दिखाई देती है, उसे वह अन्य माल की बिक्री में भी फैला देता है। वस्तुत: माल की इमेज उत्पादन के क्षेत्रा में उसकी पूंजी की इमेज का ही रूपांतरण है। विज्ञापन के क्षेत्र में भी जब इमेज का प्रयोग किया जाता है तो उसे 'समग्रप्रभाव' कहा जाता है। सभी वस्तुओं का समग्र अनुभव, व्यापार की सेवा और सुविधाएं आदि को 'समग्रप्रभाव' की धारणा के दायरे में रखकर विचार करने की जरूरत है। इससे पहली बात निष्कर्ष रूप में यह निकलती है कि माल की दुनिया संकटग्रस्त है और अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। इस संकट को छिपाने और इससे उबरने के लिए माल का निर्माता माल की रूपसज्जा में परिवर्तन तेजी से करता है। ये परिवर्तन वह बार-बार करता है। माल के रूप में घटित परिवर्तन को नई 'जेनरेशन' के माल में प्रत्यक्षत: देखा जा सकता है। इसका प्रचार अभियान ग्राहक को 'जवानी' का भरोसा दिलाता है। अथवा यों कहें कि इसमें जवानी का रूपायन है। 'जवानी' का रूपायन आंशिक रूप में युवाओं की सब-कल्चर से ऊर्जा प्राप्त करता है। इससे माल की दुनिया में चल रहे संकट को कम करने में मदद मिलती है। अब युवा इमेज नई स्टैंडर्ड इमेज का अनिवार्य तत्व बन जाती है। परिणामत: जहां एक ओर वस्तु के पुराने रूप बेकार हो जाते हैं वहीं दूसरी ओर मनुष्यों की पूरी की पूरी पीढ़ी के चरित्रात्मक गुण भी पुराने लगते हैं। इसे 'युवा जड़पूजावाद' भी कहा जाता है। यह उत्पादन के संबंधों में आए ठहराव को दर्शाता है। इस तकनीक का प्रयोग करने से समाज में अविवेकपूर्णता का वर्चस्व स्थापित करने में मदद मिलती है। यहां तक कि दैनिक जीवन की छोटी-छोटी चीजों पर अविवेकपूर्ण दृष्टि अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफल हो जाती है।
माल का सौंदर्य तत्व वस्तु की मांग बढ़ाता है। वह सीधे-सीधे हमारी गति को, मानवीय शक्ति और प्रभाव को रूपांतरित करता है। वह मनुष्य की संवेदनाओं को परिवर्तित करता है। इससे व्यक्ति की वास्तविक प्रवृत्ति, भौतिक जीवन शैली, दृष्टिकोण, आवश्यकता और संतुष्टि की धारणा में भी परिर्वतन आता है। वस्तु की बिक्री बढ़ाने के लिए बार-बार नई सौंदर्यात्मक प्रस्तुति का माध्यमों से बार-बार प्रसारण वस्तुत: उपयोग-मूल्य की पुनरावृत्ति है इससे उपभोक्ता चक्कर में फंस जाता है, इससे ग्राहक की प्रतिरोध क्षमता खत्म हो जाती है। ऐसी परिस्थितियों का जन्म हो जाता है कि प्रतिरोध संभव ही नहीं होता। यह पूंजीवाद की अपरिहार्य और अनिवार्य प्रवृत्ति है।
माल का सौंदर्यशास्त्र मानवीय संवेदना को बदलता है, संवेदनाओं के परिवर्तन का संवेदना से तकनीकीवाद से गहरा संबंध है। संवेदना की तकनीकीवाद का अर्थ है मनुष्यों में कृत्रिम शैली के प्रति अत्याकर्षण पैदा करना। इसका वर्चस्व सौंदर्यपरक इमेजों के जरिए स्थापित किया जाता है। ये इमेज मनुष्य की संवदेना को पकड़ती हैं। संवेदनाओं पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए लुभावने चेहरों का इस्तेमाल किया जाता है। परिणामत: सामाजिक जीवन में 'आकर्षक लोग' संवेदनाओं पर प्रभुत्व जमाने लगते हैं।
माल के सौंदर्यशास्त्र की धुरी है उपयोग मूल्य और विनिमय-मूल्य का अंतर्विरोध और क्रेता-विक्रेता के बीच की टकराहट। इस अंतर्विरोध के कारण आर्थिक क्षेत्र में तकनीकी प्रोन्नति दिखाई देती है। वह उसके विकास में अग्रणी भूमिका अदा करती है। यह विकास उन सभी रूपों को नष्ट कर देता है जो उसके भावी विकास में बाधक होते हैं। यह प्रक्रिया माल के सौंदर्यपरक अनुभव को अमूर्तन में ले जाती है। यह कार्य वह उपयोग-मूल्य का वायदा करके करता है। वह ऐसा उपकरण पैदा करता है जो बिक्री में तेजी से वृध्दि करे। माल का सौंदर्यपरक अमूर्तन माल की संवेदना और अर्थ दोनों को पृथक कर देता है। यह विभाजन वह विनिमय-मूल्य के आधार पर करता है। पहले चरण में यह स्वत: ही उत्पादन की प्रक्रिया में सतही तौर पर अपने को पृथक कर लेता है। दूसरे चरण में पैकेजिंग की भूमिका होती है। माल की सौंदर्यपरक प्रस्तुति पहले से ज्यादा का वायदा करती है। इसी में भ्रमों का ज्यादा से ज्यादा सहयोग लिया जाता है। माल का सौंदर्यशास्त्रा इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति को किस दिशा में ले जाया जा रहा है। वह उसकी संतुष्टि, मनोरंजन और प्रसन्नता देने का प्रयास करता है। वह ग्राहकों को खुशामद करके पटाता है और उन्हें पतन की ओर ले जाता है। वह चाटुकारिता करता है, भविष्य से ध्यान हटाता है। यही उसका भ्रष्टाचरण है।
इस संदर्भ में यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या पूंजीवाद व्यक्ति की मदद करता है? हां, पूंजीवाद व्यक्ति की मदद करता है, वह अवस्था है विच्छेदन की। अगर व्यक्ति बैठ गया तो फिर कभी उठकर खड़ा नहीं हो पाता। मदद का अर्थ है पराधीन अवस्था की है। अब कामुक आनंद प्रत्येक माल का लोकप्रिय तत्व बन जाता है। आमतौर पर माल का सेक्सुलाइजेशन लोगों की हिस्सेदारी बढ़ाता है, दमित कामेच्छा को आधार प्रदान करता है। इससे मांग और सप्लाई बढ़ती है। माल के सौंदर्यशास्त्रा के चारित्रिाक गुणों का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि सौंदर्य प्रसाधन सामग्री उद्योग मूलत: 'स्टाइल' या 'शैली' को प्रस्तुत करता है। वह शृंगार रूपों को विस्तार देता है। जब कोई खुदरा ग्राहक प्रसाधन सामग्री खरीदता है तो वह वस्तु की 'स्टाइल', उसकी बिक्री योग्यता को खरीदता है। उल्लेखनीय है कि पूंजी शानदार विभ्रमों की सृष्टि किए बगैर सिर्फ सुकोमल चेहरे की प्रस्तुति के आधार पर माल के बाजार में टिक ही नहीं सकती।
सौंदर्य प्रसाधन सामग्री के विज्ञापन आमजीवन में स्वास्थ्य और सुंदरता के नए मानदंड का निर्माण कर देते हैं। वह मूलत: व्यक्तिगत संवेदना केंद्रित होता है। इस तरह वह ग्राहक की स्वास्थ्य और सुंदरता के प्रति संवेदनाएं भी बदल देता है। यह कार्य वह असंपृक्त भाव से करता है।
माल के सौंदर्यशास्त्र के संदर्भ में प्रसाधन सामग्री निर्माताओं ने विज्ञापनों में किस रणनीति का प्रयोग किया? इसे संक्षेप में समझें।
 कुछ वर्ष पहले तक प्रसाधन सामग्री की मूल उपभोक्ता औरत थी। खासकर, प्रारंभ के दिनों में आभिजात्य वर्ग की औरत थी परंतु मास प्रोडक्शन, मास मार्केट के कारण आज आभिजात्य के बजाय आम औरत को केंद्र में रखा गया है। इसी तरह प्रसाधन सामग्री का गैर-आभिजात्य वर्ग में प्रयोग बढ़ा। प्रसाधन सामग्री की बिक्री का सुनिश्चित फॉर्मूला है 'स्वास्थ्य और सुंदरता' को बढ़ाना। यहां सुंदरता का अर्थ गोरे रंग से है तो वहीं पर गोरे को 'प्रसन्नतादायक' भी मान लिया गया है। यह फॉर्मूला औरत के विश्वबोध को सीमित करता है। इस फॉर्मूले का प्रथम चरण है घरेलू औरत की कुंठाएं। वह औरत की जिंदगी में प्रशंसा और रूप की उपलब्धि के अभाव को दर्शाता है। क्रीम और लोशन इस अभाव की पूर्ति का दावा पेश करते हैं। वे इस संदर्भ में भय और एकाकी असंतोष को उभारते हैं, शरीर की नई व्याख्या पेश करते हैं। वह व्याख्या 'देखने' और 'मुस्कराने' दोनों ही रूपों में संप्रेषित होती है। साथ ही, उसकी स्पर्शक्षम संवेदना आत्मनिरीक्षण को भी पेश करती है। यह उसकी रणनीति का मूल तत्व है। वह जवानी पर बल देता है। इसका प्रधान कारण यह है कि युवाओं में परिवर्तन की संभावनाएं ज्यादा होती हैं, उनके अंदर मेनीपुलेशन की स्थितियां ज्यादा होती हैं। अत: माल के सौंदर्यशास्त्र के प्रभावी मॉडल भी उन्हीं को बनाया जाता है। वे ही परिवर्तन के उपकरण बनते हैं, साथ ही, आम प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति के भी उपकरण वे ही होते हैं।
विज्ञापन के बारे में यह माना जाता है कि वह अपने अनुभव और गणित को लक्ष्यीभूत ग्रुप में रूपांतरित कर देता है क्योंकि यह मानवीय लक्ष्य को भी माल की तरह देखता है। उसी को समस्या का अनुभव करता है और सुलझाने की कोशिश करता है।माल के सौंदर्यीकरण की यह खूबी है कि वह आनंद देनेवाले अनुभव को खत्म करदेता है। अथवा जो अनुभव दिखाए जाते हैं उन्हें खत्म कर देता है। वह माल से अपने को पृथक कर लेता है। वह उसके उपयोग-मूल्य को स्वीकार ही नहीं करता।
माल के सौंदर्यशास्त्र की यह विशेषता है कि वह अपनी परपीड़क भाषा जनता से लेता है और वस्तु की भाषा और कामेच्छाओं के साथ वापस जनता को संप्रेषित कर देता है। कामेच्छाओं और कामुक इमेज का संप्रेषण करते समय वह जनता से सेवा का वायदा करता है। जनता की सेवा के नाम पर कभी खत्म न होनेवाली इच्छाओं के प्रत्यक्ष रूप में संप्रेषित करता है। इससे वह ग्राहक की काल्पनिक संतुष्टि बढ़ाता है। अंतर्विरोधों के छद्म समाधान देता है। इस तरह माल का सौंदर्यशास्त्र अंतर्विरोधों का पुनरुत्पादन करता रहता है, उसे विस्तार देता है। इसका समाज पर दूरगामी प्रभाव होता है।
मौजूदा दौर में माल का सौंदर्यशास्त्र तीन तत्वों का प्रयोग करता है। 1. पैकेजिंग, 2. प्रेम, 3. शारीरिक प्रदर्शन, इन तीनों के लक्ष्यीभूत ग्राहक हैं औरतें और युवक। युवापन पर बल देने का परिणाम यह भी हुआ कि जो युवा नहीं हैं वे युवा जैसे दिखाई दें, वे इसका प्रयास करते हैं।
युवा दिखाई देने के लिए प्रसाधन सामग्री के प्रयोग पर बल दिया जाता है। इससे 'प्रसाधन व्यवहार' में भी परिवर्तन आया है। 'प्रसाधन व्यवहार' के नए रूप के निर्माण में 'स्वस्थ' और 'स्वच्छ' की धारणा का जमकर प्रयोग किया गया है। इससे 'स्वास्थ्य' और 'स्वच्छता' की धारणा भी बदली है। साथ ही, 'छद्म स्वास्थ्य' की प्रवृत्ति को बल मिला है।

बुधवार, 1 सितंबर 2010

युवाओं की तबाही का महाख्यान -गिरीश मिश्रा


विगत 12 अगस्त को संयुक्त राष्ट्र ने द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय युवा वर्ष की शुरुआत की । उसी दिन अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपनी 86 पृष्ठों की रिपोर्ट 'ग्लोबल एंप्लायमेंट ट्रेंड्स फॉर यूथ' जारी की जिसमें रेखांकित किया कि आर्थिक अस्थिरता के वर्तमान संदर्भ में देखें तो युवक युवतियां सबसे अधिक अनिश्चितता का सामना कर रही हैं।
ये युवक युवतियां, मोटे तौर पर वे हैं जो 15 वर्ष से 24 वर्ष की आयु की हैं यानी ऊर्जा और ओज से भरपूर। वे जब दक्षता और कौशल प्राप्त कर वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन में भरपूर योगदान करने के लिए आर्थिक दुनिया में दाखिल होती हैं तब उनका मुख्य उद्देश्य अर्थव्यवस्था को समृद्ध बनाते हुए सम्मानजनक जीवनयापन के लिए समुचित आय प्राप्त करना होता है।
जब उन्हें कहा जाता है कि उनकी कार्य क्षमता के अनुकूल रोजगार के अवसर नहीं हैं तब उन्हें भारी निराशा होती है। वे न सिर्फ अपने परिवार और समाज बल्कि खुद आपनी नजरों में हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं। लगता है कि सारी पढाई लिखाई सारा शिक्षण-प्रशिक्षण निरर्थक गया। अपने परिवार और सगे संबंधियों के ऊपर भार बनना उनको कतई पसंद नहीं होता यही कारण है कि अनेक युवा मनोरोग ग्रस्त हो जाते हैं। कुछ खुदकुशी पर उतर आते हैं। कई अपराध की दुनिया में दाखिल हो जाते हैं, तो कई आंतकवादी बन जाते हैं। कहना न होगा कि जो विशुध्द अपराध  और आंतकवाद की दुनिया में चले जाते हैं, उनका नागरिक समाज में लौट पाना असंभव नहीं तो अत्यंत कठिन जरुर हो जाता है।
     अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट की विस्तार से चर्चा करने के पूर्व दो तथ्यों को ध्यान में रखना आवश्यक है। पहला बेरोगजगारी को जिन रूपों और आयामों में देख रहे हैं, वे आधुनिक औद्योगिक पूंजीवाद के उदय के साथ आए हैं। दूसरा अठारहवीं सदी के दौरान ही श्रम को माल बना यानी खरीद-फरोख्त की वस्तु में परिवर्तित कर बाजार में ला पटका गया। यह सवाल आज भी उत्तर की तलाश में है कि श्रम को माल बनाना कैसे जायज है जब कि वह मनुष्य के शरीर के साथ अभिन्न रूप से जुडा होता है और उसकी मृत्यु के बाद श्रम का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। श्रम का उत्पादन अन्य वस्तुओं की तरह बिक्री के लिए नहीं होता और न ही उसको श्रमिक से अलग कर संजोया जा सकता है।
 कार्ल पोलान्यी का मानना है कि श्रम को बाजार तंत्र के हवाले करने का मतलब है समाज के विनाश का मार्ग प्रशस्त करना। हम कच्चे माल या मशीन को बिना इस्तेमाल किए छोड सकते हैं या आंशिक तौर पर इस्तेमाल कर सकत हैं। इसके दूरगामी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक असर नहीं होंगे। मगर यह श्रम और उसको धारण करने वाले मनुष्य के ऊपर लागू नहीं होता।
    जिस व्यक्ति में श्रम निहित होता है वह अपनी आवाज और मताधिकार को तत्कालीन सत्ता के विरुध्द इस्तेमाल कर सकता है। वह अपने जैसे अन्य श्रमिकों के साथ आंशिक या पूर्णरूपेण रोजगार से वंचित करने वालों के खिलाफ संघर्ष कर सकता है। इनता ही नहीं, जैसा कि हम कह चुके हैं, किसी भी सक्षम व्यक्ति की श्रमशक्ति का उपयोग करने से मना करने से उसकी मनोदशा पर प्रतिकूल प्रभाव पड सकता है तथ उसके आत्मसम्मान को धक्का लग सकता है जिसके  परिणाम भयावह हो सकते हैं। अब आइए रिपोर्ट की ओर लौटें।
    विश्व भर में युवा बेरोजगारी एक नई ऊंचाई पर पहुंच गई है।  अगर स्थित नहीं बदली तो हो सकता है एक पूरी पीढी रोजगार के अवसर में वंचित हो जाए। दुनिया भर में वर्ष  2009 के दौरान 62 करोड क़ार्य सक्षम युवा थे जिनमें से लगभग 8 करोड 10 लाख बेरोजगार थे यानी युवा वर्ग में बेरोजगारी 13 प्रतिशत से कहीं अधिक थी जो आम बेरोजगारी दर से काफी ऊंची थी।
     याद रहे दो साल पहले यानी 2007 में यह दर 11.9 प्रतिशत थी। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन से जुडे अर्थशास्त्री स्टीवेन काप्सोस के अनुसार युवा बेरोजगारों का इतना बडा आकार और प्रतिशत पहले कभी नहीं दिखा। आगे आने वाले समय में युवा बेरोजगारी घटने की कोई संभावना नहीं दिख रही। वर्तमान वर्ष 2010 में युवा बेरोजगारी का प्रतिशत निश्चित रूप से 13.1 का आंकड़ा पार कर जाएगा। कहना न होगा कि वर्ष 2007 में शुरू हुई अतिमंदी की मार सबसे अधिक युवा लोगों पर पडी है। वयस्क बेरोजगारी में थोडी-बहुत कमी दिख रही है, मगर युवा बेरोजगारों को कोई राहत नहीं मिली है। जो युवा अपने रोजगार बचा पाए हैं उनसे पहले के मुकाबले अधिक घंटे काम कराया जाता और कम मजदूरी दी जाती है।
स्पेन और ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय देशों में युवा बेरोजगारों ने रोजगार के नए अवसर ढूंढने बंद कर दिए हैं। श्रम बाजार को अलविदा कह अपने आप को तकदीर के हवाले कर दिया है। इस स्थिति से उपजने वाले संभावित परिणामों की ओर हम संकेत कर चुके हैं।  रिपोर्ट के अनुसार सबसे खराब हालत विकासशील देशों के युवा बेरोजगारों की है।
    दक्षिण एशिया को लें यहां वर्ष 2000 में जितने युवा श्रमशक्ति में शामिल थे उतने 2010 में नही रहे। उनकी संख्या घटी। 1998-2008 के दौरान युवा बेरोजगारी में 27.5 प्रतिशत की वृध्दि हुई।   विश्व भर में करीब 15 करोड 20 लाख युवा लोगों को 2008 में रोजगार प्राप्त था यानी एक चौथाई युवा श्रमिक ही रोजगार पा सके थे। वे सब भयंकर गरीबी की जिंदगी बसर कर रहे थे। उनके परिवार में औसतन 1.25 डॉलर प्रतिदिन पर हर कोई गुजारा कर रहा था।
    युवा समुदाय में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की स्थिति कहीं अधिक खराब थी। युवतियां को रोजगार के अवसर ढूंढने में अधिक कठिनाई थी। वर्ष 2009 में जहां 13.2 प्रतिशत महिला श्रमिकों को बेरोजगारी का सामना करना पड रहा था वहीं पुरूष युवा बेरोजगार 12.9 प्रतिशत थे।  अतिमंदी के दौर में रोजगार की सुरक्षा में काफी ह्यास हुआ है। बेरोजगारों की मोलभाव की शक्ति क्षीण होने के कारण मालिक जब चाहते तब छंटनी का परवान थमा देते हैं। श्रमिकों की ओर से शायद ही जोरदार प्रतिरोध होता है क्योंकि एक ओर रोजगार के अवसर तेजी से घटे हैं वहीं दूसरी ओर श्रमिक संघों की स्थिति कमजोर हुई है। अधिकतर देशों में, जिनमें विकासशील देशों की बहुतायत है नौकरी छूट जाने पर सामाजिक सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। अमेरिका में भी अगर छह माह तक कोई काम नही मिल जाता तो बेरोजगारी भत्ता बंद हो जाता है।
      अमेरिका में अफ्रीकी मूल के मजदूर बेरोजगारी से अधिक पीडित हैं। अश्वेत युवा लोगों की स्थिति गोरे युवकों से कहीं  अधिक खराब है। अमेरिका की सुप्रतिष्ठित पत्रिका 'द नेशन' के 19 जुलाई के अंक में छपे कैथरीन एस  न्यूमैन और डेविड पेडुल्ला के लेख 'ऐन अनइकुअल ऑपरचुनिटी रिसेशन' में बतलाया गया है कि अतिमंदी द्वारा लाई गई बरबादी का वितरण समान रूप से नहीं हुआ है। काले लोगों के बीच बेरोजगारी का प्रतिशत गोरे लोगों की तुलना में दुगुना है। मर्द और औरत के बीच भी काफी अंतर देखा जा सकता है। स्थिति में अब तक कोई टिकाऊ सुधार होता नजर नहीं आ रहा। तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी से बाहर नहीं आ सकी है। वहां सरकारी तौर पर बेरोजगारी की दर 9.6 प्रतिशत बतलाई जा रही है यद्यपि कई लोगों का मानना है कि वस्तुत: यह दर 17 प्रतिशत से ऊपर है क्योंकि जिन लोगों को रोजगार ढूंढते छह महीने से ऊपर हो गए हैं उनको बेरोजगारी भत्ता मिलना बंद हो गया है और उन्हें बेरोजगारों की सूची से निकाल दिया गया है जिससे बेरोजगारों की संख्या घटी है। इन बेरोजगारों में युवाओं की अच्छी खासी तादाद है। इधर यूरोपीय संघ के कई देशों में संकट गहराने से बेरोजगारों की फौज का आकार बढा है।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का मानना है कि नि:संदेह युवा लोग सम्मानजनक और उत्पादक रोजगार की तलाश में हैं जिससे वे अपना भविष्य संवार सके। इस आशा को छीन लीजिए तब आपको एक निराश युवक मिलेगा जो किसी तरह गुजर बसर कर रहा है या श्रम बाजार से पूरी तरह छिटकने वाला है। इस प्रकार उसकी आर्थिक संभाव्यता का भारी विनाश प्रकट होता है।
 आंकडों से बढती युवा बेरोजगारी और आर्थिक संकट के बीच तगडा जुडाव उजागर होता है। वर्ष 2007 और वर्ष 2009 के बीच युवा बेरोजगारी में 78 लाख की वृध्दि हुई। इसमें से 11 लाख बढाेतरी 2007 -08 और 67 लाख वृध्दि 2008-09 में हुई। अतिमंदी के पहले  दशक के दौरान बेरोजगार नौजवानों की संख्या में औसतन एक लाख 91 हजार प्रतिवर्ष वृध्दि हुई। रोजगार के शालीन अवसरों के अभाव में पढे-लिखे लोग अधिक बेरोजगार हुए हैं। कम पढे- लिखे और अप्रशिक्षित युवा कोई न कोई काम ढूंढ कर अपना पेट पाल लेते हैं मगर शिक्षित प्रशिक्षित युवा ऐसा नहीं कर पाते।
       हम अपने देश में नजर दौडाकर स्थिति का काफी कुछ अनुमान लगा सकते हैं।  वर्ष 2007 से ही कॉल सेंटरों पर ग्रहण लगना शुरू हो गया। इनमें भारी संख्या में नवयुवक-नवयुवतियां कार्यरत थीं या रोजगार की संभावनाएं तलाशी जा रही थीं।  दुबई से लेकर अमेरिका तक युवा वर्ग रोजगार के लिए जा रहा था। इस पर काफी कुछ विराम लग गया। इतना ही नहीं, इन देशों से अनेक लोग बेरोजगार होकर स्वदेश लौटने लगे। केरल में खाडी देशों से लौटने वाले बेरोजगारों के कारण अर्थव्यवस्था कुप्रभावित हुई और सामाजिक माहौल बिगडा। कई युवक युवतियों की शादियां रुकीं। आस्ट्रेलिया जैसे देशों में बाहर से आकर पढाई कर नौकरी पाने की कोशिश करने वाले युवा लोगों के विरुध्द नस्ली भेदभाव भी उभरा। मार पीट की घटनाएं भी हुईं।
 ( लेखक जाने माने अर्थशास्त्री हैं) 




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