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रविवार, 27 नवंबर 2016

फिदेल की औरतें और चंडूखाने के चंडूबाज


            हिन्दू फंडामेंटलिस्टों और समाजवाद विरोधियों का जनप्रिय धंधा है चरित्र-हनन अभियान चलाना। पहले ये लोग स्वायत्त ढ़ंग से यह काम करते थे, लोकल थे,लेकिन मोदी के उभार के बाद हिन्दू फंडामेंटलिस्टों ने भी तालिबानियों की तरह साइबर तरक्की की है, वे अब लोकल नहीं रहे,साइबर में आते ही ग्लोबल हो गए हैं। हिन्दू फंडामेंटलिस्टों का फेसबुक पर प्रिय धंधा है कम्युनिस्टों के खिलाफ मिथ्या प्रचार करना,समाजवाद के बारे में,समाजवादी नेताओं और विचारकों के बारे में कपोल-कल्पित कहानियां प्रचारित-प्रसारित करना।ये सल में चंडूबाज हैं।

फिदेल कास्त्रो की मौत के बाद सारी दुनिया में फिदेल के चरित्र-हनन की आंधी चल रही है।इस आंधी में अनेक रंगत के लोग शामिल हैं,इनमें जेएनयू के पुराने प्रतिक्रियावादी और मोदीभक्त भी शामिल हैं।ये लोग जब जेएनयू में पढ़ते थे,तब भी इनको समाजवाद और साम्यवाद से एलर्जी थी,आज भी है,कहने को ये शिक्षित हैं,लेकिन साम्यवाद को लेकर ये लोग किताब,विचार,विमर्श,तथ्य और सत्य किसी से संबंध नहीं रखते,सिर्फ चंडूबाजों की तरह फेसबुक पर लिख रहे हैं।इनके अलावा अनेक आरएसएस के सक्रिय कार्यकर्ता भी हैं जो आए दिन अपनी साम्यवाद विरोधी चंडू आवाजें सुनाते रहते हैं। हाल में इन लोगों ने फिदेल कास्त्रो के निजी जीवन को लेकर घटिया किस्म की चंडूखाने की खबरें प्रसारित की हैं।इनमें कोई सच्चाई नहीं है।

यह सच है फिदेल कास्त्रो की निजी जिंदगी के बारे में दुनिया बहुत कम जानती है।स्वयं जिन परिस्थितियों में कास्त्रो जैसे क्रांतिकारी काम करते रहे हैं उसमें सब कुछ सार्वजनिक करके रखकर सत्ता चलाना बहुत ही मुश्किल काम है,खासकर जब सामने सीआईए और बहुराष्ट्रीय मीडिया घराने जहर उगलने के लिए खड़े हों। इस स्थिति से निबटने का सबसे बेहतर तरीका यही होता कि स्वयं कास्त्रो अपने परिवार,पत्नी,बच्चे,माँ-बाप,भाई आदि के बारे में स्वयं ही कुछ लिखते,इससे विभ्रम पैदा नहीं होता।

मेरा मानना है क्रांतिकारियों को अपने परिवार और परिवारीजनों के बारे में स्वयं लिखना चाहिए,इससे तथ्य और सत्य के बीच किसी तरह के विभ्रम की संभावनाएं नहीं रहतीं।इसके बावजूद यह सच है कि फिदेल कास्त्रो अनुशासित क्रांतिकारी थे।निजी और सार्वजनिक जीवन में औरतों के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान था और समानता का भाव था।इस नजरिए को क्यूबा के सामाजिक यथार्थ की रोशनी में देखना चाहिए,न कि सीआईए के प्रचार अभियान के नजरिए से।

सवाल यह है क्यूबा में क्रांति के पहले औरतों का जीवन स्तर क्या था और आज क्या है ॽ अथवा फिदेल कास्त्रो के जमाने में क्या था ॽ जो फिदेल की 25हजार रखैलों का फेसबुक पर बार-बार जिक्र कर रहे हैं वे यह नहीं बताते कि उनकी सूचना का स्रोत क्या है ॽ उलेखनीय है सीआईए के फिदेल के खिलाफ जब सारे मिथ्या प्रचार अभियान धराशायी हो गए तब अंतिम अस्त्र के रूप में 25हजार रखैलों की खबर को चंडूबाजों ने मीडिया में प्रसारित किया।

क्यूबा और फिदेल पर बातें करते समय यह ध्यान रखें कि अमेरिका में एक बहुत बड़ा तंत्र है जिसको फिदेल और क्यूबा के खिलाफ मनगढ़ंत कहानियां गढ़ने के लिए ही अरबों रूपये दिए जाते हैं। इन मनगढ़ंत कहानियों को सबसे पहले सीआईए के चंडूबाज तैयार करते हैं और उसके बाद सारी दुनिया में मीडिया एक ही झटके में प्रचारित-प्रसारित कर देता है। फिदेल की 25 हजार रखैलों की कहानी इसी सीआईए के कारखाने की देन है।इस कहानी का जन्मस्थान है मियामी।

ध्यान रहे फिदेल की मौत के बाद फिदेल के किलाफ सबसे ज्यादा घृणाभरे जुलूस और नारे मियामी में लगे हैं।मियामी उन तमाम क्यूबाईयों का बसेरा है जो क्यूबा को छोड़कर चले आए या फिर जिनके क्यूबा के प्रशासन से मतैक्य नहीं था या फिर जिनको क्यूबा में मानवाधिकार हनन नजर आ रहा था,इस तरह के लोगों को अमेरिका ने क्रांति के बाद के समय से ही हर स्तर पर प्रलोभन देकर प्रोत्साहित किया और उनको फिदेल और क्यूबा की क्रांति के खिलाफ प्रचार के औजार की तरह इस्तेमाल किया। सीआईए किस मनगढ़ंत कहानियां बनाता रहा है इस पर फिर कभी चर्चा करेंगे।





रविवार, 20 नवंबर 2016

धिक्कार है ! नोटबंदी राष्ट्रीय अपराध है !

      जिन लोगों को बाजार नजर न आए,बैंक में लाइन नजर न आए,सूना एटीएम नजर न आए,पाकिस्तान से आए आतंकी नजर न आएं,जनता का क्रोध नजर न आए,औरतों और किसानों की पैसे की तंगी से पैदा हुई तकलीफें नजर न आएं,दैनिक मजदूरों-असंगठित मजदूरों-ठेके पर काम करने वाले मजदूरों-बैंक कर्मचारियों की परेशानियां और मौतें नजर न आएं, आश्चर्य है वे लोग बता रहे हैं वे देश जानते हैं और देश तरक्की कर रहा है !

आम जनता के जमाधन को अचल करना राष्ट्रीय अपराध है औंर यह राष्ट्रीय अपराध किया है आरएसएस-मोदी सरकार ने।
भक्त तो अंततःभक्त हैं पोंदू खोलकर महान नेता के सामने आँखें बंद करके खड़े हैं,कह रहे हैं मार ले ,जितनी चाहे मार ले,महान नेता जितनी मारता है उतने ही खुश होते हैं ,महान नेता जितना तबाह करता है खुश होते है ,महान नेता जितने ज्यादा करेंट के झटके देतां है,उतना ही जोर से कहते हैं "आई लाइक इट", लोकतंत्र में ठेठ भाषा में इसे बाट लगाना कहते हैं,लोकतंत्र की बाट लगी पड़ी है और ये लोग भविष्य की बातें कर रहे हैं,पहले कह रहे थे,परिणाम एक दो दिन में देख लेना,फिर बोले सात दिन में,ये दोनों ही समय निकल गए,परिणाम नहीं दिखा,हां,कुपरिणाम जरूर सामने आ गए हैं।
9नवम्बर से देश की अर्थ व्यवस्था में अकेला बाजार प्रतिदिन 30हजार करोड़ रूपये का नुकसान उठा रहा है, बैंकों ने कितना नुकसान उठाया है वह भी इसमें जोड़ लिया जाए तो जितना कालाधन यह सरकार पकड़ेगी उससे ज्यादा की अब तक क्षति हो चुकी है।सारे लोग कह रहे हैं 5-7लाख करोड़ रूपये से ज्यादा का कालाधन हाथ नहीं लगेगा,लेकिन इतने का तो देश का नुकसान अब तक हो चुका है।इसके बाद भी यदि आप कह रहे हैं कि नोटबंदी सही नीति है तो हम तो यही कहेंगे कि आपसे बड़ा बैसाखनंदन अब देश में दूसरा नहीं है।कम से कम मोटा गणित का हिसाब ही लगा लिया होता तो ,समझ जाते कि देश को किस दिशा में ले जा रहे हो।
मोदी सरकार की नोटबंदी की नीति मूलतः फंडामेंटलिस्ट आर्थिक नीति है,इसको उपभोग और उपभोक्तावाद से सख्त नफरत है,वे लगातार इस पर हमले करते रहते हैं,मोदीजी ने फंडामेंटलिस्टों की नीतियों के अनुरूप नोटबंदी लागू करके समूचे उपभोक्ता बाजार को ही तबाह कर दिया है ,जिस तरह बाजार और नागरिक को तबाह करके फंडामेंटलिस्ट आनंद मनाते हैं ठीक वैसा ही आनंद मोदीपंथी फंडामेंटलिस्ट मना रहे हैं।ये वे लोग हैं जो इस देश के हिन्दुत्ववादी अभियान और हमारी शिक्षा व्यवस्था के तंत्र से निकले हैं।
जनता को बिजली के करेंट के झटके देकर अर्थनीति लागू करने का फार्मूला फंडामेंटलिस्टों की देन है इसका हमारे देश के संविधान,संसद से स्वीकृत नीतियों और उदारतावादी मूल्यों से गहरा बैर है।
खतरा बड़ा है तुम तय करो किस ओर हो ,नई नोटबंदी की नीति फंडामेटलिस्ट समाज बनाने की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है,इसके कारण आज समूचा लोकतंत्र खतरे में है।आपलोगों ने यदि जल्द ही विवेक से काम नहीं लिया तो तय है आगे और भी तकलीफें आने वाली हैं।

सोमवार, 1 सितंबर 2014

सोशल मीडिया और बर्बरता

        सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक बर्बरता का महाख्यान चल रहा है। जिस तरह आईएसआईएस की पोस्ट अबाधित रुप में पेश की जा रही हैं, बर्बर संगठनों के पक्ष में निरंतर लिखा जा रहा है। उससे यह संकेत जा रहा है कि सोशल मीडिया के लिए बर्बरता सबसे बड़ी खबर है और राजनीतिक आंदोलन, प्रतिवाद और लोकतांत्रिक संघर्षों का कोई मूल्य नहीं है।अधिकांश मीडिया, बर्बरता की प्रस्तुतियों में इस कदर व्यस्त है कि उनको जनांदोलनों की किसी खबर या समस्या के कवरेज की कोई चिंता ही नहीं है। यह भी कह सकते हैं कि मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक बर्बरता का नाटक चल रहा है और हम सब उसके मूकदर्शक बन गए हैं।बर्बरता का जितने बड़े रुप में प्रसारण हो रहा है जनांदोलनों का उतने बड़े रुप में प्रसारण नहीं हो रहा। यानी मीडिया की नजर में बर्बरता प्रासंगिक है,मोहन भागवत के नॉनशेंस बयान,बत्रा पंडित का पोंगापंथ और भगवापंथ की इरेशनल खबरें प्रासंगिक हैं, लेकिन अन्य लोकतांत्रिक खबरें और लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष विचार प्रासंगिक नहीं हैं।

मीडिया और सोशल मीडिया का यह बर्बरता प्रेम , बर्बरता का मित्र बना रहा है और लोकतंत्र से दूसरी बढ़ा रहा है। बर्बरता प्रेम का ही परिणाम है कि अनंतमूर्ति से लेकर विपनचन्द्र तक की मौत पर बर्बरता प्रेमी खुशी का इजहार कर रहे हैं। इस तरह का बर्बरता प्रेम गुलाम युग में देखा गया था।सोशलमीडिया -मीडिया कवरेज ने नार्सीसिस्ट भावबोध की सृष्टि की है। इसके कारण मीडिया ने करोड़ों-अरबों का मुनाफा कमाया है। इसने जहां एक ओर परपीड़क आनंद और उसके भोक्ताओं का बर्बर समाज पैदा किया है वहीं दूसरी ओर मूल्याधारित राजनीति को पूरी तरह निम्नस्तर पर उतार दिया है। मुनाफेखोर मीडिया घराने खुश हैं कि उनकी रेटिंग और मुनाफों में उछाल आया है वहीं दूसरी ओर वे मीडिया -सोशलमीडिया के जरिए लोगों की वधलीला भी कर रहे हैं। आज सोशलमीडिया में किसी के हत्या की तस्वीर लगाइए और खूब कवरेज पाइए। नैतिकता,सभ्यता और भद्रता के जितने ज्यादा परखच्चे उड़ाएंगे उतना ही दावे के साथ ज्यादा मुनाफा कमाएंगे।

पी साईनाथ ने कहा-' मीडिया में 80 फीसदी स्‍टेनोग्राफर...हिरोशिमा-नगासाकी पर बम गिराए जाने के बाद The Times of India ने अपने 11 नंबर पेज पर शीर्षक लगाया था, "Excellent results in raid on Nagasaki" और इसके नीचे एक और ख़बर थी जिसका शीर्षक था, "Uranium shares go up 90 points after Hiroshima.'' इस घटना पर पूरी दुनिया में वाइट हाउस से जारी प्रेस रिलीज़ आधारित जो पत्रकारिता की गई, उसने पत्रकारिता में उसी वक्‍त दो स्‍कूल बना दिए- एक पत्रकारों का और दूसरा स्‍टेनोग्राफरों का। आज पत्रकारिता में 80 फीसदी स्‍टेनोग्राफर हैं जो धीरे-धीरे कॉरपोरेट स्‍टेनोग्राफर होते जा रहे हैं। ये कहना है जाने-माने पत्रकार पी. साईनाथ का।'

'दिल्ली के कॉन्‍सटिट्यूशन क्‍लब में आयोजित एक समारोह में अपने संबोधन के दौरान पी. साईनाथ ने पत्रकारिता को लेकर कई अन्य बातें भी बताईं, जिसमें से एक यूं हैं.... हिरोशिमा-नगासाकी पर अमेरिकी बमबारी का जश्‍न मनाते हुए जब न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स के (अमेरिकी सैन्‍य विभाग प्रायोजित) पत्रकार विलियम लॉरेन्‍स 'बम के सौंदर्य की तुलना बीथोवन की सिम्‍फनी के ग्रैंड फिनाले' से और बमबारी से पैदा हुए 'मशरूम की आकृति के धुएं के गुबार की तुलना स्‍टैच्‍यू ऑफ लिबर्टी' से कर रहे थे, ठीक उस वक्‍त सिर्फ एक फ्रीलांसर पत्रकार था जिसने इस घटना का सच सामने लाने के लिए अपने खर्च पर हिरोशिमा जाने का फैसला किया। ऑस्‍ट्रेलिया के इस पत्रकार का नाम था विल्‍फ्रेड बर्चेट। उसकी बेहतरीन रिपोर्टिंग 'द डेली एक्‍सप्रेस' में छपी।'

'विल्‍फ्रेड बर्चेट की रिपोर्टिंग का वैश्विक मीडिया के समक्ष खण्‍डन करने के लिए टोक्‍यो में अमेरिकी मैनहैटन प्रोजेक्‍ट के ब्रिगेडियर जनरल थॉमस फैरेल ने एक प्रेस कॉन्‍फ्रेन्‍स रखी। बर्चेट को पता चला कि प्रेस कॉन्‍फ्रेन्‍स उसी के ऊपर है, तो वह वहां पहुंच गया। उसने ब्रिगेडियर से कुछ सवाल किए। सवालों से असहज होकर ब्रिगेडियर ने उससे कहा कि वह जापान के साम्राज्‍यवादी प्रोपेगेंडा का शिकार हो गया है। बाहर निकलते ही एलाइड ताकतों के प्रमुख के निर्देश पर उसका पासपोर्ट ज़ब्‍त कर लिया गया, उसे हिरासत में ले लिया गया और हिरोशिमा-नगासाकी बमबारी की रिपोर्टिंग पर प्री-सेंसरशिप लगा दी गई।छूटने के बाद दोबारा जब बर्चेट ने पासपोर्ट बनवाया तो फिर से गुप्‍तचर एजेंसियों ने उसे चुरा लिया। इसके बाद वह आजीवन बिना पासपोर्ट के रहा। बर्चेट ने अपनी आत्‍मकथा 'पासपोर्ट' के नाम से लिखी और हिरोशिमा में लगे विकिरण के असर से बेहद गरीबी में जीते हुए बगैर किसी नागरिकता के उसका निधन हुआ। उधर, अमेरिकी सैन्‍य विभाग द्वारा प्रायोजित न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स के पत्रकार को दुनिया के सामने बम का सौंदर्य बखान करने के लिए पुलित्‍ज़र पुरस्‍कार से नवाज़ा गया। तभी से दुनिया भर की पत्रकारिता में दो ध्रुव कायम हो गए- लॉरेन्‍स की और बर्चेट की पत्रकारिता। अब आपको तय करना है कि आप क्‍या बनना चाहेंगे- विलियम लॉरेन्‍स या विल्‍फ्रेड बर्चेट?'

(पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के वॉल से)







सोमवार, 29 नवंबर 2010

यूरोपीय लेखक संसद में कठमुल्लों की पराजय

यूरोपीय लेखक संसद का हाल ही में इस्ताम्बूल में सम्मेलन खत्म हुआ है। उसके समापन के बाद यूरोपीय लेखक संसद ने एक घोषणापत्र जारी किया है। यह घोषणापत्र बेहद महत्वपूर्ण है। यह घोषणापत्र ऐसे समय में संसद ने पास किया है तब तुर्की के कठमुल्लों के दबाब के चलते वी.एस.नायपाल जैसे बड़े लेखक को मतभिन्नता के कारण इस सम्मेलन का उदघाटन करने से रोका गया था। संसद पर काफी दबाब था कि वह कठमुल्लों के दबाब में आ जाए ,लेकिन अंत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रक्षकों की जीत हुई और कठमुल्लों को मुँह की खानी पड़ी। यहां हम यूरोपीय लेखक संसद का घोषणापत्र अविकल छाप रहे हैं।


27 November 2010

We have all, as writers, come to the European Writers' Parliament in Istanbul to focus on literature as a means of broadening our world. We share the belief that literature is a place where different viewpoints meet and clash in the most constructive way – within written texts and in dialogue between their authors. In the context of the rising tide of intolerance in the world, in Europe and in Turkey, we regret that the participation of V.S. Naipaul was made impossible.

ISTANBUL 2010 DECLARATION
• The freedom of all types of cultural and literary acts is vital. Every direct or indirect barrier preventing freedom of expression should be abolished. Powerful institutional and civil society support should be mobilized to prevent violence and threats to freedom of expression.
• All practices that hinder freedom of publishing should be eradicated; all methods of oppression against writers, translators and publishers should be opposed including the use of penal codes and laws to harass and intimidate writers, such as has happened in Turkey and elsewhere in Europe.
• Linguistic oppression is unacceptable. Everyone should be free to express themselves in the language of their choice. Methods should be devised to transgress the hierarchy between centre and periphery. Minority languages and "minor" languages must be supported and translation into and out of these languages must be funded. The role of translation is of the utmost importance in determining the literary landscape. Translation is essential for cross border literacy. New sources of funding must be sought and existing ones protected.
• Measures should be taken to produce and make accessible non-mainstream, independent works of literature. Literary genres at the risk of extinction should be protected. Policies should be generated to prevent the standardization of expression and promote biblio-diversity.
• Digital media is essential for freedom of thought and expression. The digital media is a potential sphere of democratization. We oppose government surveillance and censorship strategies aimed at limiting the free flow of information and ideas. New ways should be found to access high quality information and to preserve authors' rights.
• Political, ethnic, religious and national boundaries should not present an obstacle to the writer. We support cultural diversity and exchange.

शनिवार, 27 नवंबर 2010

वी एस नायपॉल प्रसंगःफंडामेंटलिज्म के प्रतिवाद में

   वी एस नायपाल बड़े लेखक हैं । उन्हें बुकर पुरस्कार और नोबुल पुरस्कार भी मिल चुका है। उनके विचार अनेक धर्मनिरपेक्ष विचारकों और लेखकों को पसंद नहीं हैं। मैं भी उनके अनेक विचारों से असहमत हूँ। लेकिन हाल ही में यूरोपीय लेखक संसद से उनको बाहर कर दिए जाने के फैसले को स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ।यह सीधे लेकक की स्वतंत्रता का हनन है।  उल्लेखनीय है यूरोपीय लेखक संसद का लाजा अधिवेशन तुर्की की राजधानी इस्ताम्बुल में चल रहा है। संसद के आयोजकों ने नायपाल को उदघाटन के लिए बुलाया था। लेकिन स्थानीय तुर्की लेखकों और धार्मिक प्रेस ने नायपाल के बुलाए जाने का विरोध किया और कहा कि उनकी मौजूदगी इस्लाम का अपमान है।
    सारी दुनिया जानती है नॉयपाल के इस्लाम के बारे में  क्या विचार हैं। वे इस्लाम की जितनी तीखी आलोचना करते हैं उतनी गहराई के साथ भारत के हिन्दुत्ववादियों और भाजपा के प्रेमी भी हैं। नॉयपाल उन चंद लेखकों में हैं जिन्होंने बाबरी मसजिद गिराए जाने का स्वागत किया था। तुर्की के धार्मिक प्रेस ने नॉयपाल को बुलाए जाने के खिलाफ विगत कई दिनों से हंगामा खड़ा किया हुआ है। उसके दबाब में आकर ही आयोजकों को उन्हें आने के लिए मना करना पड़ा।
   इस प्रसंग में कई सवाल उठते हैं पहला सवाल यह है कि क्या लेखक को अपने धर्म संबंधी विचार रखने का हक है ? क्या धर्म संबंधी विचारों के आधार पर या राजनीतिक विचारधारा विशेष के विचारों को मानने के कारण हमें लेखक का बहिष्कार करना चाहिए ? क्या साहित्य में धर्ममीमांसा संभव है ? आदि सवालों पर हमें गंभीरता के साथ सोचना चाहिए। लोकतंत्र में यह संभव है कि लेखक धर्म को न माने,धर्म की आलोचना करे। नास्तिक हो। लेकिन लोकतंत्र का रखवाला हो। लोकतंत्र का सारा दारोमदार वैचारिक मतभेद और सामाजिक भिन्नता पर टिका है।
    यूरोपीय लेखक संसद ने नॉयपाल के कार्यक्रम को रद्द करके लोकतंत्र की मर्यादा नष्ट की है। लोकतंत्र में अन्य की भी जगह है। इसी तरह साहित्यकार को धर्म संबंधी स्वतंत्र विचार रखने का मानवाधिकार है,इसके आधार पर उसका बहिष्कार करना या उसे अपमानित करना ठीक नहीं है। यह फंडामेंटलिज्म है।
     दुर्भाग्य की बात यह है कि यह घटना यूरोप में घटी है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि इस्लामिक फंडामेंटलिज्म का किस तरह लोकतंत्र पर दबाब बढ़ रहा है। जाहिर है जब इस्लामिक फंडामेंटलिज्म के सामने लोकतंत्र के सिपहसालार सिर झुकाएंगे तो अन्य किस्म के फंडामेंटलिस्टों जैसे ईसाई फंडामेंटलिस्ट,हिन्दू फंडामेंटलिस्ट आदि के भी हौंसले बुलंद होंगे। वे भी लेखक या नेता की अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले बोलेंगे, बहिष्कार करेंगे। शारीरिक हमले करेंगे।
नॉयपाल की एवज में ब्रिटिश उपन्यासकार हरी कुंजरू को उदघाटन भाषण देने के लिए बुलाया गया और उन्होंने यूरोपीय लेखक संसद और तुर्की के फंडामेंटलिस्टों की अपने उदघाटन में जमकर आलोचना की और कहा कि नॉयपाल को आने से रोकना गलत है। उनकी अनुपस्थिति दुख की बात है। साथ ही उन्होंने कहा कि तुर्की के कानून से बदनाम धारा 301 को निकाल देना चाहिए। कुंजरू ने कहा कि नॉयपाल यहां होते तो हमारी साख बढ़ती,प्रामाणिकता भी बढ़ती। यह दुख की बात है कि आप किसी को इसलिए नहीं आने देगे क्योंकि उसके विचार आपको आक्रामक लगते हैं। इसके अलावा कुंजरू ने विस्तार के साथ तुर्की के अंदर अभिव्यक्ति की आजादी के हनन के अनेक प्रसंग भी उठाए और कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी के मामले में तुर्की क रिकॉर्ड खराब है। द गार्दियन ने लिखा है  ‘‘The writer also attacked Turkey's record on free speech, citing the cases brought against novelist Orhan Pamuk and editor Hrant Dink under article 301 of the country's penal code, which makes it illegal to insult Turkey, Turkish ethnicity or Turkish government institutions.
Kunzru told the assembled authors: "Pamuk faced trial for giving the following statement to a Swiss magazine: 'Thirty thousand Kurds have been killed here and a million Armenians. And almost nobody dares mention that. So I do.'" He added: "Dink, one of Turkey's most prominent Armenian voices was convicted under article 301 then murdered by a young nationalist, who was subsequently photographed in a police station surrounded by smiling officers, against the backdrop of the national flag. There are many other examples in Turkey of the weapons of offence and insult being used to silence dissent. Turkey is obviously not alone in this, but since we are here, it is important that we acknowledge it."
    बुनियादी समस्या यह है कि दुनिया के विभिन्न देशों में धार्मिक फंडामेंटलिस्ट ,पृथकतावादी ,साम्प्रदायिक आदि लोकतंत्र विरोधी संगठनों के द्वारा लेखकीय स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी पर आए दिन हमले बढ़ रहे हैं। इसके लिए ये संगठन बेसिर-पैर के बहानों को आधार बना रहे हैं। हमें लोकतंत्र के विकास और समृद्धि के लिए अभिव्यक्ति,विचार और लेखन की स्वतंत्रता पर बढ़ते हमलों के खिलाफ एकजुट होकर आवाज बुलंद करनी चाहिए। वरना लोकतंत्र विरोधी ताकतें लोकतंत्र को निगल जाएंगी।

बुधवार, 3 नवंबर 2010

एक फंड़ामेंटलिस्ट से कबीर की मुलाकात

    ‘‘ एक ऊँची इमारत पर लक्ष्मी का खूबसूरत बुत नस्ब (स्थापित) था।  
   चंद लोगों ने जब उस इमारत को अपना दफ़्तर बनाया तो उस बुत को टाट के टुकड़ों से ढ़ाँप दिया।
    कबीर ने यह देखा तो उसकी आंखों में आँसू उमड़ आए।
दफ़्तर के आदमियों ने ढारस दी और कहाः ‘‘ हमारे मज़हब में यह बुत जाइज़ नहीं।’’
  कबीर ने टाट के टुकड़ों की तरफ अपनी नमनाक आँखों से देखते हुए कहाः ‘‘खूबसूरत चीज़ को बदसूरत बना देना भी किसी मज़हब में जाइज़ नहीं ?’’
    दफ़्तर के आदमी हँसने लगे-कबीर धाड़ें मारकर रोने लगा। ’’ (सआदत हसन मंटो) 

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

मनुष्यत्व का अपमान है धार्मिक फंडामेंटलिज्म

    कोई हिन्दू बने या मुसलमान हमें इसमें आपत्ति नहीं है। हमारी आपत्ति इसमें है कि वे भारत को हिन्दूराष्ट्र क्यों कहते हैं। भारत संवैधानिक तौर पर हिन्दू राष्ट्र नहीं है। भारत का संविधान,हिन्दू राष्ट्र का संविधान नहीं है। भारत कभी भी हिन्दू राष्ट्र नहीं था। बात-बात में हिन्दू राष्ट्र की दुहाई देना,भाषणों से लेकर लेखन तक में उसका इस्तेमाल करना अवैज्ञानिक है,गलत है।
     हिन्दूराष्ट्र और हिन्दुत्व को भारतवासियों का पर्याय बताना सफेद झूठ है और यह भारतवासियों का अपमान है। भारत की बहुसांस्कृतिक विरासत और बहुसांस्कृतिक जनता का अपमान है। यदि राम को रावण के नाम से बुलाया जाएगा तो वह गलत होगा। राम को राम के  नाम से ही सम्बोधित किया जाना चाहिए। उसी तरह भारत को भारत के नाम से पुकारें।  ‘भारत एक हिन्दूराष्ट्र है’ यह कहकर न पुकारें ,यह भारत का अपमान है,भारतवासियों का अपमान है। मनुष्यता का अपमान है। यह हिन्दू फंडामेंटलिज्म है।    
     आज के हिन्दुस्तान की सच्चाई यह है कि यहां एक नहीं अनेक किस्म की पहचानें प्रत्येक व्यक्ति के पास हैं। लेकिन संघ परिवार एक ही अस्मिता का बारबार ढ़ोल पीटता रहता है। वे लोग संविधान में उपलब्ध अभिव्यक्ति की आजादी और विचारों के प्रसार की आजादी का दुरूपयोग कर रहे हैं और भारतीय समाज के बारे में गलत समझ पैदा कर रहे हैं । बहुजातीयता और बहुसांस्कृतिकता का अपमान कर रहे हैं।   
    संघ जब हिन्दू राष्ट्र के नाम पर इस्लाम और ईसाई धर्म की निंदा करता है और उन्हें पराए धर्म के रूप में चित्रित करता है तो बहुलतावाद को अस्वीकार करता है। संविधान की मूल स्प्रिट का उल्लंघन करता है।   
    हिन्दू से इतर अस्मिताओं और धर्मों का इतिहास भारत में सैंकड़ो-हजारों साल पुराना है। देश का समूचा तानाबाना बहुसांस्कृतिक-बहुधार्मिक-बहुजातीय मान्यताओं और विश्वासों पर टिका है। इसे रचने में हिन्दुओं,मुसलमानों, जैनियों, नाथों-सिद्धों,योगियों,शाक्तों,बौद्धों आदि का योगदान रहा है। संघ के लोग जब भारत को हिन्दूराष्ट्र के रूप में चित्रित करते हैं तो गैर हिन्दू धर्मों और संस्कृतियों की भारत के निर्माण में जो भूमिका रही है उसे अस्वीकार करते हैं।
   भारत आज एक तरह से खुले समाज के रूप में अपना विकास कर रहा है और इसमें सभी धर्मों-जातीयताओं और संस्कृतियों के लिए समानता का भाव है। इन सबको समान संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। भारत का संविधान खुले तौरपर बहुसांस्कृतिकता और बहुधार्मिकता की हिमायत करता है। इसके बावजूद संघ के नेताओं का भारत को बार-बार हिन्दू राष्ट्र कहना वस्तुतः बहुसांस्कृतिक जातीयताओं और धर्मों का अपमान ही कहा जाएगा।
      संघ परिवार के लोग हिन्दू राष्ट्र के नाम पर आम लोगों के हृदय में बहुसांस्कृतिवाद और बहुधार्मिकवाद के खिलाफ ज़हर भरना चाहते हैं। वे यह भी जानते हैं कि भारत कभी हिन्दू राष्ट्र नहीं था , न आज है और न भारत कभी भविष्य में हिन्दू राष्ट्र बनेगा।
   भारत की बहुसांस्कृतिक-बहुधार्मिक-बहुजातीय राष्ट्र-राज्य की पहचान है। भारत की पहचान का आधार हिन्दूधर्म नहीं है। कोई भी धर्म भारत की पहचान का आधार नहीं है। बहुजातीयता,बहुधार्मिकता और बहुसांस्कृतिकता राष्ट्रीय पहचान का आधार हैं।
     भारत आज खुले समाज का हिमायती है। हिन्दूसमाज जैसे बंद समाज की धारणा का पक्षधर नहीं है। आज भारत के खुले समाज के लिए सबसे बड़ी चुनौती हिन्दुत्व और इस्लामिक फंडामेंटलिस्टों की ओर से आ रही है। ये दोनों ही विचारधाराएं अपने-अपने तर्कों के आधार पर आम आदमी की जिंदगी और खासकर बहुसांस्कृतिक स्वतंत्रता पर हमले कर रहे हैं। इन दोनों ही फंडामेंटलिस्ट विचारधाराओं के भारत में अब तक के कारनामे भारत के खुले समाज के वातावरण को नष्ट करने वाले हैं।
    आज जनतंत्र के बुनियादी तानेबाने के लिए इन दोनों ही किस्म के संगठनों से गंभीर खतरा है। हिन्दू और मुस्लिम फंडामेटलिज्म के झंडाबरदार समाजवाद और पूंजीवाद के विकल्प के रूप में अपनी फंडामेंटलिस्ट विचारधारा को पेश कर रहे हैं। वे इसे सामाजिक विकास के तीसरे मार्ग के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें इन दोनों ही फंडामेंटलिस्ट विचारधाराओं की आलोचना करते समय सतर्कता से काम लेना चाहिए। इन दोनों को ही इस्लाम और हिन्दू धर्म से अलगाने की जरूरत है।
    मसलन आरएसएस के हिन्दुत्व का हिन्दूधर्म से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है। उसी तरह केरल में हाल के वर्षों में पैदा हुए मुस्लिम फंडामेंटलिस्ट संगठन पापुलर फ्रंट का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है। य़ह एक मुस्लिम फंडामेंटलिस्ट संगठन है और अनेक मायनों में यह संघ का अनुकरणकर्ता है।
     यूरोप के अनेक देशों में घटिया किस्म की हरकतें हो रही हैं। ये हरकतें उन देशों में हो रही हैं जिन्हें उदार पूंजीवादी मुल्क माना जाता है। मसलन इटली में मुसलमान औरतों के लिए अलग से समुद्रतट बनाए गए हैं जहां पर वे कपड़ों में निर्भय होकर समुद्रस्नान कर सकें और पतनशील पश्चिमी नग्नता से बची रह सकें।
    हॉलैण्ड में मुसलमानों के लिए अलग से अस्पताल बनाए जाने की बातें हो रही हैं जहां पर मुस्लिम औरतें अपने पिता,पति,भाई आदि के साथ गैर मुस्लिमों की मौजूदगी में मिल सकें। यह कोशिश की जा रही है कि कोई गैर मुस्लिम डाक्टर मुस्लिम बीबी,बहन और माताओं को हाथ भी न लगा सके। इन दिनों यूरोप की सड़कों पर बुर्का ज्यादा नजर आ रहा है। इतना बुर्का तीस साल पहले नहीं दिखता था।
   हिन्दू फंडामेंटलिस्टों ने उन तमाम सुधारों,मान्यताओं और मूल्यों को चुनौती दी है जिन्हें भारत ने रैनेसां के दौरान और बाद के वर्षों में अर्जित किया था। बहुलतावाद का प्रत्येक क्षेत्र में सम्मान करना रैनेसां की उपलब्धि थी। इसे हमें राजा राममोहन राय सौंप गए हैं।
        हिन्दू शुद्धता ,हिन्दू संस्कृति और हिन्दू राष्ट्र की धारणा पर विगत 30 सालों में जिस आक्रामक भाव से संघ परिवार ने जोर दिया है उससे भारत का बहुलतावादी सामाजिक-राजनीतिक ढ़ांचा हिल गया है। वे हिन्दुत्व -हिन्दुत्व करके भारत के बहुलतावादी तंत्र को बर्बाद करना चाहते हैं जिसे बड़ी तकलीफों के बाद रैनेसां में हमारे समाज ने अर्जित किया था। बहुलतावाद के लिए शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर जोर दिया गया।
   फंडामेंटलिस्टों का मानना है कि हम कानून का सम्मान करते हैं लेकिन धर्म के मामले में हम किसी की बात नहीं मानेंगे। हमारे लिए धर्म का मतलब क्या है यह हम तय करेंगे। शाहबानो केस के फैसले से लेकर रामजन्मभूमि विवाद पर आए फैसले तक एक ही रूझान है। दोनों ही रंगत के फंडामेंटलिस्ट मानते हैं कि धर्म एक ऐसी चीज है जिसे कानून या कोई स्पर्श नहीं सकता। वह परम पवित्र अपरिवर्तनीय है। शुद्ध है।
     ये लोग धार्मिक जीवनशैलियों को अपनाने पर जोर दे रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता दोनों को ही नापसंद हैं। धर्मनिरपेक्ष लोग काम बिगाड़ने शत्रु लगते हैं। फंडामेंटलिस्टों को कम्युनिस्ट ,उपभोक्तावादी ,व्यक्तिवादी इन तीनों से नफरत है। फंडामेंटलिस्टों का मानना है कि कम्युनिज्म और पूंजीवाद दोनों में ही करोड़ों लोग मारे गए हैं। वहां शांति,सुख और सुरक्षा संभव नहीं है। शांति ,सुख और सुरक्षा तो सिर्फ धार्मिक फंडामेंटलिज्म में ही दे सकता है। उनका दावा है कि हिन्दू और मुस्लिम फंडामेंटलिज्म ही उपभोक्तावाद और समाजवाद का एकमात्र सही विकल्प है । असल में धार्मिक फंडामेंटलिज्म विध्वंसक विकल्प है विकास का विकल्प नहीं है।  










गुरुवार, 6 मई 2010

सभ्यता का अंत है कश्मीरी पंडितों का विस्थापन

            कश्मीरी पंडितों का वैभव और सांस्कृतिक संपन्नता का इतिहास रहा है। भारत की श्रेष्ठतम बौद्धिक परंपराओं को कश्मीरी पंडितों ने पैदा किया। भारत का मान-सम्मान सारी दुनिया में ऊँचा किया। कश्मीरी पंडित भारत के सबसे सुंदर,मधुरभाषी , ज्ञानी-गुणी लोग रहे हैं। ये लोग हिंसा से कोसों दूर हैं। कश्मीरी पंडित कश्मीरियत की पहचान के आदर्श मानक भी हैं। उनका विस्थापन कश्मीरियत का अंत है। यह लेट कैपिटलिज्म की बड़ी त्रासद घटनाओं में से एक घटना है। कश्मीरी पंडितों की समस्या हिन्दू समस्या नहीं है। यह साम्प्रदायिक-आतंक की राष्ट्रीय समस्या है,यह स्थानीय समस्या नहीं है,यह कानून-व्यवस्था की समस्या भी नहीं है। यह साम्प्रदायिक-आतंक की राष्ट्रीय समस्या है।
     कश्मीरी पंडितों का समूचा समुदाय साम्प्रदायिक सहिष्णुता का आदर्श रहा है और आज भी है। ज्ञान,शांति और सभ्यता का विकास ये तीन इनके सामुदायिक लक्ष्य रहे हैं। अपने इन तीन लक्ष्यों को कश्मीरी पंडितों ने कभी छोड़ा नहीं। कश्मीरी पंडितों का भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के साथ चोली-दामन का साथ है। कश्मीरी पंडितों ने कभी किसी पर हमला नहीं किया। वे कभी साम्प्रदायिक नहीं बने। इसके बावजूद उन्हें निशाना बनाया गया है तो इसका प्रधान कारण उनका सभ्य और नरम स्वभाव।  
      कश्मीर में मुस्लिम साम्प्रदायिकता का लंबे समय से गहरा असर रहा है और समय-समय इलाके की स्थानीय राजनीतिक पार्टियां मुस्लिम साम्प्रदायिकता के सामने समर्पण और समझौते करती रही हैं। इसके जबाव में हिन्दू साम्प्रदायिकता भी प्रतिकार स्वरूप हिन्दुओं को एकजुट करती रही है। लेकिन इन दोनों ही किस्म की राजनीति से कश्मीरी पंडित अलग-थलग रहे अथवा दोनों ही किस्म की साम्प्रदायिकता की उन्होंने मुखालफत की।
    आज के ताजा प्रसंग में कश्मीरी पंडित शरणार्थी हैं और अपनी जमीन-जायदाद और मातृभूमि से बेदखल होकर दिल्ली और जम्मू में बदहाल, अशांत और संस्कृतिविहीन जिंदगी जी रहे हैं। भारत सरकार शरणार्थी कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास,घर वापसी और सुरक्षा को अभी तक सुनिश्चित नहीं कर पायी है।
       कश्मीरी पंडित कब घर लौटेंगे इसका कोई कार्यक्रम अभी तक क्यों नहीं बना ? कश्मीरी पंडित एकबार बेदखल होने के बाद दोबारा क्यों नहीं बस पाए ? इन सवालों का कोई संतोषजनक उत्तर नजर नहीं आ रहा। सरसरी तौर पर इसका प्रधान कारण है कश्मीर प्रशासन का साम्प्रदायिक चरित्र  और केन्द्र सरकार का साम्प्रदायिकता के प्रति नरम रुख।
      कश्मीर प्रशासन का साम्प्रदायिक चरित्र विगत 50 सालों में बना है। उसमें नेशनल काँफ्रेंस और काग्रेस की मिलीभगत रही है ,इस मिलीभगत में ये दोनों पार्टियां मुस्लिम साम्प्रदायिक ताकतों से बढ़त हासिल करने के चक्कर में अनेक ऐसे कदम उठा चुकी हैं जिससे साम्प्रदायिक भेदभाव में इजाफा हुआ है। इन दोनों दलों का मानना था कि साम्प्रदायिक रुख अख्तियार करके वे मुस्लिम साम्प्रदायिकता को आम जनता में अलग-थलग कर देंगी। लेकिन हुआ उलटा। 
    मुस्लिम साम्प्रदायिकता को जनता से काटने के चक्कर में ये दोनों दल जनता से कटते चले गए। आज हालात यह हैं कि कश्मीर में सेना न भेजी जाए तो कांग्रेस और नेशनल काँफ्रेंस का एक भी कार्यकर्ता वहां जिंदा न बचे। कई लाख सैन्य और अर्द्ध सैन्यबलों के भरोसे भारत का झंड़ा कश्मीर में फहरा रहा है। सेना को वहां से हटा दीजिए समूचा कश्मीर भारत विरोधी ताकतों की जय-जयकार से गूंज उठेगा।
    जो लोग मुस्लिम साम्प्रदायिकता का जहर फैला रहे थे और मुस्लिम लीग और दूसरे साम्प्रदायिक संगठनों के तहत गोलबंद थे वे ही संगठन नए नाम के साथ पृथकतावाद का प्रचारतंत्र लेकर मैदान में आए। इसकी शुरुआत 1968 से होती है। पाकिस्तान की मदद से ‘नेशनल लिबरेशन फ्रंट’ नामक संगठन बनाया गया और इसे ही कश्मीर में सीधे पृथकतावाद की नींव रखने का श्रेय जाता है।
      इसके बाद पृथकतावाद के कश्मीरी पंडितों पर हमले बढ़ने शुरु हुए। खासकर सोपोर,कुपवारा,अनंतनाग में पंडितों को निशाना बनाया गया। हिन्दुओं के पवित्र स्थानों पर हमले किए गए,हिन्दुओं के घर जलाए गए,सैंकड़ों हिन्दुओं पर कातिलाना हमले किए गए। इस समूची प्रक्रिया को साम्प्रदायिक-पृथकतावादी ताकतों ने पूरे कश्मीर में लागू किया। फलतः कई लाख कश्मीरी हिन्दुओं को मार-मारकर बेदखल किया गया और राज्य प्रशासन और केन्द्र सरकार इस बेदखली को रोक नहीं पायी।
    कश्मीरी पंडितों की बेदखली और उन पर अहर्निश हिंसक हमले भारत की सुरक्षा नीति की अब तक की सबसे बड़ी असफलता है। यह पृथकतावादी-साम्प्रदायिक ताकतों की सबसे बड़ी राजनीतिक विजय है। आश्चर्य की बात है कि केन्द्र में 6 साल तक भाजपा के नेतृत्ववाली एनडीए सरकार के जमाने में भी कश्मीरी पंडितों की घर वापसी नहीं हो पायी।
      उल्लेखनीय बात यह है कि संघ परिवार जिस समय सारे देश में हिन्दुत्व का राम-राम का बिगुल बजा रहा था और बाबरी मस्जिद गिराओ राममंदिर बनाओ का नारा लगाकर देश में मुसलमानों के खिलाफ जहर फैला रहा था ठीक उसी दौर में कश्मीरी पंडितों पर मुस्लिम पृथकतावादियों और आतंकियों के हमले तेज होते हैं। यही वह दौर है जब कश्मीरी हिन्दुओं के सामाजिक बहिष्कार से लेकर उन पर कातिलाना हमलों का सिलसिला शुरु होता है। सन् 1980 के बाद से यह सिलसिला शुरु होता है और 1984-85 तक आते-आते परवान चढ़ता है ,बाद में  कश्मीरी हिन्दुओं पर हमले तेज हुए, मंदिरों पर हमले हुए,मंदिरों को सुनियोजित ढ़ंग से नष्ट किया गया, अनंतनाग,कुपवारा और सोपोर में कश्मीरी पंडितों का सामाजिक बहिष्कार किया गया और अंत में सन् 1989 के मध्य तक आते-आते कश्मीरी पंडितों को अपने घर-द्वार छोड़कर अनंतनाग,कुपवारा,सोपोर आदि इलाकों से निकलना पड़ा।
     सन् 1989 के मध्य से आरंभ हुआ विस्थापन 1991 में जाकर चरमोत्कर्ष पर पहुँचा तब तक 90 प्रतिशत से ज्यादा कश्मीरी पंडितों की आबादी को आतंकी-मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठनों ने अपदस्थ करके शरणार्थी बना दिया।
     जिस समय कश्मीरी पंडित शरणार्थी बनाए जा रहे थे संघ परिवार राममंदिर आंदोलन के नाम पर सारे देश में मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैलाने का काम कर रहा था। देश के विभिन्न इलाकों में साम्प्रदायिक संगठन मुसलमानों को सबक सिखाने,दंगे करने, मुलमानों की हत्या करने का काम कर रहे थे।
     दूसरी ओर कश्मीर में मुस्लिम फंडामेंटलिस्ट -साम्प्रदायिक संगठनों के द्वारा कश्मीरी पंडितों का सुनियोजित कत्लेआम किया जा रहा था। यहां यह कहना मुश्किल है कि कौन किससे प्रेरणा ले रहा था। मोटे तौर पर मुस्लिम फंडामेंटलिस्टों और साम्प्रदायिकों से हिन्दुत्ववादी संगठनों ने घृणा और साम्प्रदायिक हिंसा का गुरुमंत्र लिया है। भारत में साम्प्रदायिक हिंसा के उस्ताद मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठन रहे हैं। स्वातंत्र्योत्तर भारत में साम्प्रदायिक हिंसा का मूल पाठ हिन्दुत्ववादी संगठनों ने उनसे ही सीखा है।
   कश्मीरी पंडितों की समूची जाति पर मुस्लिम साम्प्रदायिकता ने जिस तरह हमला किया और उन्हें बरबाद किया उसकी तुलना फासीवादी हिंसाचार से की जा सकती है।                    
    आरंभ में भारत सरकार कश्मीरी पंडितों के विस्थापन को त्रासदी मानने को तैयार नहीं थी, बाद काफी हील-हुज्जत के बाद कश्मीरी पंडितों की समस्या की ओर सरकार ने ध्यान दिया और शरणार्थी शिविरों में रहने वाले विस्थापित कश्मीरी पंडितों का सरकारी रजिस्ट्रेशन आरंभ हुआ। आज सरकार द्वारा संचालित 14 शरणार्थी शिविरों में हजारों कश्मीरी पंडित जम्मू में रह रहे हैं।
     जो सरकारी कर्मचारी विस्थापित हुए है उनकी पगार के लिए सन् 1990-93 के बीच 83 सरकारी आदेश जारी किए गए । जिसके कारण विस्थापित कर्मचारियों को कुछ राहत मिली।
     बुनियादी तौर पर केन्द्र और राज्य सरकार का कश्मीरी पंडितों की शरणार्थी समस्या के प्रति तदर्थ रवैय्या रहा है। शरणार्थियों के रहने,खाने आदि के समुचित बंदोबस्त करने में राहत अधिकारियों की असफलता के किस्से आए दिन मीडिया में आते रहे हैं।  
     ज्यों-ज्यों समय बीतता जा रहा है कश्मीरी पंडितों के प्रति उदासीनता बढ़ती जा रही है। विभिन्न राजनीतिक दलों ने कश्मीरी पंडितों की समस्या को स्थानीय समस्या में तब्दील करके रख दिया है। कश्मीरी पंडितों की शरणार्थी समस्या राष्ट्रीय समस्या है यह भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर लगा बदनुमा दाग है। यह दाग जितनी जल्दी मिटे भारत का उतनी ही जल्दी मंगल होगा। कश्मीरी पंडितों की घर वापसी सभ्यता की वापसी कहलाएगी। यह काम हमें सर्वोच्च प्राथमिकता देकर करना चाहिए।  





सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

अमेरि‍का में फंडामेंटलि‍ज्‍म का असली चेहरा

सा 

     जनमाध्यमों से अमेरिकी समाज की आम तौर पर जो तस्वीर पेश की जाती है उसमें ग्लैमर, चमकदमक,शानो-शौकत,खुशी,आनंद,मजा,सेक्स,सिनेमा,उपभोक्ता वस्तुओं की भरमार,सत्ता के खेल, अमीरी के सपने प्रमुख होते हैं।इस तरह की प्रस्तुतियों में कभी भी यह नहीं बताया जाता कि अमेरिकी समाज फंडामेंटलिज्म की ओर जा रहा है। अथवा अमेरिका में फंडामेंटलिस्टों का बोलवाला है। फंडामेंटलिज्म को अमेरिकी मीडिया ने हमेशा गैर अमेरिकी फिनोमिना या तीसरी दुनिया के फिनोमिना के रूप में पेश किया है।सच किंतु यह नहीं है। फंडामेंटलिज्म के मामले में भी अमेरिका विश्व का सिरमौर है। किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति को क्रिश्चियन फंडामेंटलिज्म की उपेक्षा करना संभव नहीं है। वैसे ही जैसे मुशर्रफ और अटलबिहारी बाजपेयी को अपने फंडामेंटलिस्ट बिरादराना संगठनों की उपेक्षा करनी संभव नहीं है। 11सितम्बर की घटना के बाद अमेरिकी प्रशासन का जो चेहरा सामने आया है उसका जनतंत्र से कम फंडामेंटलिज्म से ज्यादा करीबी संबंध है। अमेरिकी मीडिया का बड़ा हिस्सा किस तरह युध्दपंथी है और मुसलमान विरोधी है इसके बारे में 11सितम्बर के बाद के घटनाक्रम ने ऑँखें खोल दी हैं। शुरू में राष्ट्रपति बुश ने यह जरूर कहा कि 11सितम्बर की घटनाओं का मुसलमानों से कोई संबंध नहीं है। किंतु व्यवहार में अमेरिकी पुलिस ने अमेरिका में रहने वाले मुसलमानों को जिस तरह परेशान किया और उनके नागरिक अधिकारों का हनन किया वह अमेरिकी समाज के अभिजनों और मीडिया के एक बड़े हिस्से में व्याप्त मुस्लिम विरोधी मानसिकता को समझने का अच्छा पैमाना हो सकता है। सभ्यताओं के संघर्ष की सैध्दान्तिकी के तहत इस्लाम को कलंकित किया गया। इस्लाम को फंडामेंटलिज्म और आतंकवाद से जोड़ा गया। क्रिश्चियन फंडामेंटलिस्टों के नेताओं जेरी फेलवैल और पेट रॉबर्टसन ने इस्लाम विरोधी प्रचार अभियान को चरमोत्कर्ष तक ले जाते हुए मोहम्मद साहब को आतंकवादी तक घोषित कर दिया। यह भी कहा इस्लाम धर्म हिंसा और घृणा का धर्म है। गॉड पर भरोसा है खुदा पर नहीं। इस बयान की अमेरिकी प्रशासन के किसी मंत्री या अधिकारी ने निंदा तक नहीं की। क्रिश्चियन फंडामेंटलिस्टों ने प्रचार अभियान चलाया हुआ है कि अब प्रलय होने वाली इनका विश्वास है कि जब धर्म और अधर्म के बीच युध्द होगा तो धार्मिक लोग सीधे स्वर्ग जाएंगे। सभी यहूदी ईसाई हो जाएंगे या जला दिए जाएंगे। यही हाल मुसलमानों का होगा।सभी मुसलमान आग के हवाले कर दिए जाएंगे।
11सितम्बर की घटना के बाद मुसलमानों के खिलाफ मीडिया के माध्यम से भय,पूर्वाग्रह और उन्माद पैदा करने की कोशिशें जारी हैं। यह कार्य मुस्लिम और ईसाई फंडामेंटलिस्ट अपने- अपने तरीके से कर रहे हैं।इन दोनों किस्म के फंडामेंटलिस्टों के नेताओं को राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहज ही मीडिया की अग्रणी कतारों में देखा जा सकता है। इन दोनों के लिए जनतंत्र,संवाद, सहिष्णुता और मानवाधिकारों की कोई कीमत नहीं रह गई है। इंटरनेट पर गुगल डाटकॉम पर इस्लाम पर सामग्री खोजने वालों की संख्या में बेतहाशा वृध्दि हुई है। गुगल पर चालीस लाख से ज्यादा वेबसाइट हैं।इनमें 20 वेबसाइट मुसलमानों के द्वारा बनायी हुई हैं।इनमें आप संवाद नहीं कर सकते।अमेरिकी पुलिस और खुफिया विभाग इन वेबसाइट पर आने वाली प्रत्येक सामग्री का अध्ययन करती रहती हैं।
    क्रिश्चियन फंडामेंटलिस्टों का अमेरिका में व्यापक स्तर पर शिक्षा और मीडिया नेटवर्क है।इसमें बॉब जॉन यूनीवर्सिटी का नाम सबसे ऊपर है।यहूदी तत्ववादियों का अनुकरण करते हुए इस विश्वविद्यालय ने ईसाइयों को धार्मिक शुध्दता का पाठ पढ़ाया जाता है। ये लोग समाज में किसी भी किस्म के सम्मिश्रण को स्वीकार नहीं करते। रूढ़िवादी विचारों और संस्कारों में पूरी तरह आस्था रखते हैं। बाइबिल इनके लिए अंतिम और एकमात्र सत्य है। ये आक्रामक और रक्षात्मक दोनों ही किस्म की रणनीति का अपने सांगठनिक विकास के लिए इस्तेमाल करते हैं। बॉब जॉन यूनीवर्सिटी के छात्र सिर्फ विचारों और संस्कारों में ही तत्ववादी नहीं होते अपितु उग्रवादी भी होते हैं। ये किसी भी किस्म की विज्ञानसम्मत शिक्षा और विचारों का विरोध करते हैं। शिक्षा के पाठ्यक्रमों में किसी भी किस्म की उदारतावादी दृष्टि को स्वीकार नहीं करते। इस विश्वविद्यालय के द्वारा पृथकतावादी और तत्ववादी ताकतों का  खुलकर समर्थन किया जाता है। ये लोग नस्लवादी श्रेष्ठत्व पर जोर देते हैं। नस्लवादी श्रेष्ठत्व इनके धार्मिक उसूलों से जुड़ा हुआ है। आमतौर पर तत्ववादी या पृथकतापंथी संगठन अपने कार्यों को वैध ठहराने के लिए अंधविश्वास और अनहोनी या विलक्षण घटनाओं को चुनते हैं। इजराइली और क्रिश्चियन तत्ववादियों ने मध्य-पूर्व में ईराक पर अमरीका और उसके मित्र राष्ट्रों के हमले और तबाही को ईश्वर की कृपा से किए गए हमले और पाप के दण्ड के तौर पर व्याख्यायित किया।इसके लिए सैन्य पदावली का प्रयोग किया गया।
       सुसान रोज ने ''क्रिश्चियन फंडामेंटलिज्म एण्ड ऐजुकेशन इन दि यूनाइटेड स्टेट्स''(1993) में लिखा कैथोलिक स्कूलों की तुलना में प्रोटेस्टेण्ट या इवानगेलिकल्स स्कूलों में छात्रों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। इसके विपरीत कैथोलिक स्कूलों में छात्रों की संख्या में गिरावट आई है। निजी क्षेत्र में इन स्कूलों का बड़ी तेजी से विकास हुआ है। अनुमानत: दस लाख विद्यार्थी 18,000 हजार निजी धार्मिक स्कूलों में पढ़ते हैं। ये कुल निजी स्कूली छात्रों की संख्या का  20 फीसद हिस्सा हैं।
इवानगेलिक और तत्ववादी स्कूलों में विगत दो दशकों में छात्रों की भर्ती में तेजी से इजाफा हुआ है। इसी दौरान इन स्कूलों ने पृथकतावादी मार्ग की अपेक्षा ज्यादा से ज्यादा  कठमुल्लावादी मार्ग का अनुसरण किया है। इसके लिए इन संगठनों ने अदालती कार्रवाईयों तक का सहारा लिया है। अदालतों से इन्हें अपनी गतिविधियां जारी रखने का एक तरह से लाईसेंस  मिल गया है।इन समस्त घटनाओं से इस तथ्य पर रोशनी पड़ती है कि अमरीकी न्याय व्यवस्था और शिक्षा व्यवस्था किस हद तक तत्ववादी संगठनों के सामने असहाय साबित हुई है।साथ ही उनके शिक्षा संस्थान बगैर किसी बाधा के सुचारू रुप से चल रहे हैं।
       इवानगेलिक स्कूलों का पाठ्यक्रम,पध्दति और प्रभाव सार्वजनिक धर्मनिरपेक्ष स्कूलों से भिन्न है। धार्मिक तत्ववादी स्कूलों का अमरीका में लक्ष्य है धर्मनिरपेक्ष जीवन शैली का विरोध करना ,धार्मिक और पितृसत्ता की स्थापना करना,बच्चों को नशेबाजी,कामुकता,हिंसा और अनुशासनहीनता से बचाना। इसके अलावा तत्ववादी शिक्षा का मुख्य जोर बाइबिल, धार्मिक संस्कारों की शिक्षा और धर्मनिरपेक्ष सार्वजनिक स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले विषयों के खिलाफ रहा है। इन स्कूलों में दण्ड और अध्यापन की सार्वभौम पध्दति अपनायी जाती है। विद्यार्थियों के लिए महंगी से महंगी किताबें और पाठ्यक्रम सामग्री तुरंत प्रदान की जाती है। पाठ्यक्रम पढ़ाने के लिए किसी शिक्षक की मदद की जरूरत महसूस नहीं होती क्योंकि छात्र स्वयं ही पढ़ सकता है। पाठ्यक्रम पढ़कर शायद ही कोई सवाल किसी के मन में उठे क्योंकि समस्त सवालों के जबाव पाठ में ही होते हैं। इन स्कूलों के छात्र सार्वजनिक धर्मनिरपेक्ष स्कूलों की तुलना में ज्यादा संख्या में पास होते हैं। यहां तक कि स्टैण्डफोर्ड अचीवमेंट टेस्ट में इन स्कूलों के छात्रों को राष्ट्रीय नियम की तुलना में एक साल और सात माह ज्यादा की वरीयता मिलती है।सेना में इन तत्ववादी स्कूलों के छात्रों को बेहतरीन विद्यार्थी मानकर वरीयता के साथ भर्ती किया जाता है।क्योंकि इनमें अनुशासन, अनुकरण और अधिकारियों के प्रति सम्मान का भाव होता है।
         अमरीका में धार्मिक तत्ववादी स्कूलों में आमतौर पर गोरे मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चे दाखिले लेते हैं। इनके परिवारों की औसत आमदनी 25,000हजार डालर है।यह सम्मिश्रित किस्म का प्रभुत्वशाली समुदाय है। अत: इस समुदाय के छात्रों में धार्मिक तत्ववादी शिक्षा का आधार निर्मित होने से धार्मिक शिक्षा का प्रभाव कई गुना ज्यादा बढ़ जाता है। रीगन प्रशासन ने एक जमाने में तत्ववादी स्कूलों पर अंकुश लगाने की काफी कोशिश की किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके विपरीत तत्ववादी स्कूलों ने धर्मनिरपेक्ष स्कूलों को अपनी दिशा बदलने के लिए दबाव तेज कर दिया है। इस दिशा में उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली और बड़ी संख्या में ईसाई स्कूलों और धर्मनिरपेक्ष स्कूलों में विलय भी हुआ। आज स्थिति यह है कि अमरीका में तत्ववादियों के नियंत्रण वाली उच्च शिक्षा और टेलीविजन का मजबूत गठबंधन  है। खासकर लिबर्टी यूनीवर्सिटी और रीजेंट विश्वविद्यालय के माध्यम से यह काम बखूबी अंजाम दिया जा रहा है। ये विश्वविद्यालय धार्मिक कठमुल्लापन के साथ आधुनिक विज्ञान,प्रौद्योगिकी और शिक्षा का सामंजस्य बिठाने की कोशिश कर  रहे हैं।
        



              


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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...