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शनिवार, 20 नवंबर 2010

18 नवम्बर 2010 दर्शन दिवस के मौके पर विशेष- साहित्य का अंत- समापन किश्त

       इन दिनों वास्तव और अवास्तव ,व्यक्ति और अव्यक्ति,जीवन और मृत्यु, उपस्थित और अनुपस्थित आदि के बारे में सवाल नहीं किए जाते। जो कुछ भी कहा जाता है वह खास सीमा में रहकर ही कहा जाता है। इसी प्रसंग में देरिदा की प्रसिद्ध किताब ‘स्पेक्टेटर ऑफ मार्क्स’ का जिक्र करना समीचीन होगा। इस किताब में देरिदा ने बड़े ही मार्के की बात कही है।
     देरिदा ने लिखा है ऐसे विद्वान अब नहीं रहे जो वास्तव अर्थ में विद्वान हों और विद्वान की तरह ही भूत के बारे में बता सकें। परंपरागत विद्वान् भूत में विश्वास नहीं करते थे और नहीं इसे वर्चुअल स्पेस का नजारा ही कह सकते हैं। अब ऐसे विद्वान नहीं रहे जो बता सकें कि यथार्थ और अयथार्थ में अंतर क्या है,वास्तव और अवास्तव में अंतर क्या है। जीवित और मृत में अंतर क्या है। व्यक्ति और अव्यक्ति में अंतर क्या है। उपस्थित और अनुपस्थित में अन्तर्विरोध बताने वाले विद्वान नहीं रहे।
      देरिदा इस किताब में वास्तव और अवास्तव के अलावा कोई तीसरा आयाम भी हो सकता है इसकी खोज करते हैं। यह मूलतः ‘है’ और ‘नहीं’ के बीच में किसी तीसरे की खोज का काम है। यह ‘और’ है। वे इसे भूत के रूपक के जरिए खोजने की कोशिश करते हैं।
   मसलन् अस्मिता की धारणा को ही लें। अस्मिता का आधार पिता है। फलां का पिता दलित था अतः बेटा भी दलित होगा। मजेदार बात यह है कि पिता मर गया है। मरे की पहचान को हम जिंदा की पहचान के रूप में देख रहे हैं। अतः जो अस्मिता जी रहे हैं वह जिंदा है लेकिन जो नाम अस्मिता को दिया गया है वह मृत है। यहां पर पिता का भूत पीछा कर रहा है। पिता रूपी भूत वास्तव बेटे से काल्पनिक दूरी बनाए रखता है।
    दिक्कत यह है कि अस्मिता भूत है और वर्तमान भी है। यह ऐसा शरीर है जो कभी था और आज भी है। यहां अन्य के संदर्भ से अस्मिता पहचान बनाती है और फिर अन्य में ही तब्दील हो जाती है। अन्य से अन्य का जन्म, अन्य के आधार पर स्व की पहचान, विषय और व्यक्ति  की पहचान, चेतना ,स्प्रिट आदि का निर्धारण करने लगते हैं। देरिदा के यहां पर जो ‘भूत’है वह परंपरागत किस्म के सोच को चुनौती देता है। वह जीवित और मृत के बीच के विरोध में आश्वासन का काम करता है। वह स्व की पहचान, समय और स्थान की धारणा को भी चुनौती देता है।
     आमतौर पर हम यही कहते हैं कि हमने कल भूत देखा था। या उस घर में भूत है। देरिदा ने सवाल किया है भूत के साथ बीता कल कैसे जुड़ गया ? जबकि भूत तो वह है जो समय और स्थान के परे है। समय के तीन रूप है भूत,भविष्य और वर्तमान। भूत इनमें से किसी के दायरे में नहीं आता। जब हम कहते हैं कि मैंने उस घर में भूत देखा तो हम भूल ही जाते हैं कि भूत घर में नहीं रहता। ज्योंही हम भूत को खोजने जाएंगे वह नहीं मिलेगा। ज्योंही भूत को खोजेंगे कि वह कहां है और कब देखा था ,उसका वास्तव में पता नहीं चलेगा। यही वह भूत है जो हमें अन्य के विमर्श में मिलता है और अन्य का विमर्श अंततः शून्य के विमर्श में विलीन हो जाता है। भूत हमेशा ‘कोई है’ और ‘कोई अन्य है।’ यहां इन दोनों में समानता है।
   हमारे बीच में उत्तर आधुनिकता ने  जितने भी विमर्श फेंके हैं वे सब भूत विमर्श हैं, ऐसे विमर्श हैं जो जीवन में हैं भी और नहीं भी।  इनमें कौन सा विमर्श कब आरंभ हो जाए कहना मुश्किल है। विमर्श की अनिश्चितता ही है तो किसी भी चीज को उत्तर आधुनिक चंचल अवस्था में रखती है। उत्तर आधुनिक विमर्श कब आरंभ होता है और किस तरह आरंभ होता है, और किससे बंधा या जुड़ा हैं ?ये तीनों चीजें ध्यान देने योग्य हैं। इन पर ही राजनीतिक और साहित्यिक निर्णय निर्भर करता है।
   उत्तर आधुनिकों ने वंचितों को केन्द्र में रखकर कोई गंभीर काम नहीं किया है। अथवा भूत ने कभी उत्पीडितों को सम्बोधित नहीं किया है। उत्तर आधुनिक सवालों पर हमेशा बहस बहुआयामी स्थितियों और अर्थों को जन्म देती है। प्रत्येक उत्तर आधुनिक साहित्य समस्या राजनीतिक अभिव्यक्ति से भरी होती है। चूंकि उत्तर आधुनिक का अर्थ अनिश्चित होता है अतः उसकी राजनीति भी निश्चित नहीं होती है। आलोचना जिस चीज को देखती है वह वास्तव और अवास्तव का अस्थिर रूप है। फलतः यथार्थ और अयथार्थ में जीवंत और मृत के बीच में अंतर करना मुश्किल है। इसके कारण राजनीतिक और साहित्यिक फैसले लेना असंभव हो जाता है। यानी उत्तर आधुनिकता का स्थायी भाव है दुविधा।
   देरिदा ने ‘स्पेक्टर्स ऑफ मार्क्स’ में इतिहास की भिन्न धारणा का इस्तेमाल किया है। वैसे गौर से देखें तो इतिहास की परंपरागत धारणा का इस्तेमाल करने के कारण फुकुयामा और ल्योतार ‘इतिहास के अंत’ की थ्योरी पर  एकमत हो जाते हैं। जबकि देरिदा भिन्न तरीके से देखते हैं। वैसे इन दोनों में कोई भी साझा तत्व नहीं है। ऐतिहासिक घटनाओं को देखने की परंपरागत धारणा के अनुसार इतिहास मृत है। प्रत्येक चीज एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी है। कोई भी धड़ा अपनी समझ के बारे में,उसके परिणाम के बारे में पुनर्विचार करने को तैयार नहीं है।
   उत्तरआधुनिकतावाद हमेशा नीचे से आता है। यह राजनीति के दोनों ओर होता है। वह अपना नीचे के बरक्स बचाव करता है। उत्तर आधुनिकतावाद राजनीतिक सिक्के के दोनों ओर के अनुमानों को काटता है। राममंदिर आंदोलन के संदर्भ में भाजपा और कांग्रेस की भूमिका इस संदर्भ में आदर्श नमूना है। दलित साहित्य प्रसंग ,अस्मिता राजनीति, और बहुजन समाज पार्टी का बदला हुआ नारा और मुहावरा ,जनगणना में जाति की गणना का फैसला और पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा मुसलमानों को नौकरियों में दिया गया 10 प्रतिशत आरक्षण इसके आदर्श उदाहरण हैं।
  उत्तरआधुनिकतावाद ने प्रगतिशील या रेडीकल या क्रांतिकारी परिभाषा को भी बदला है। उत्तरआधुनिक जमाने में मीडिया और उत्तरआधुनिक विचारकों के रेडीकल उसे कहा जो फंडामेंटलिस्ट होता है। जबकि प्रगतिशील या क्रांतिकारी को कठमुल्ला कहा। इसके कारण राजनीतिक अवधारणाओं के अर्थ का बड़े पैमाने पर विपर्यय हुआ और उत्तर आधुनिकतावाद ने अराजनीतिकरण में बड़ी भूमिका अदा की। अराजनीतिक को महान प्रगतिशील घोषित किया गया। प्रगतिशील और कंजरवेटिव दोनों ही अपने-अपने कारणों से उत्तर आधुनिकतावाद का प्रतिवाद कर रहे हैं।
         उत्तरआधुनिकतावाद के संदर्भ में साहित्य में क्या घटा है इसके बारे में देरिदा ने बेहतर रोशनी डाली है। मार्क्स और हेमलेट का मूल्यांकन करते हुए लिखा है  इस युग में साहित्य के सवाल राजनीति के सवालों को खोल रहे हैं। यही स्थिति राजनीति की है आप राजनीति के सवाल उठाते हैं तो उससे साहित्य के सवाल खुलते है। यानी साहित्य और राजनीति में एक-दूसरे के बरक्श सवाल उठ रहे हैं।
      इसी तरह साहित्य में जो सवाल उठे हैं या उठाए जा रहे हैं वे निज या सेल्फ को उदघाटित करने वाले हैं। वे ही बातें लिखी जा रही हैं जो अस्मिता की संगति में आती हैं। निज की संगति में आती हैं। अपने से मिलते-जुलते विचारों को जब आप साहित्य में उठाते हैं तो आपको सैद्धांतिकी की कोई जरूरत नहीं होती।
    साहित्य में अब आप अपने विचारों के जरिए विचारों की यात्रा करते हैं। जब आप अपने जरिए या अस्मिता के जरिए विचारों की यात्रा करते हैं तो आप अस्मिता के जितने भी लक्षण हैं उन सब पर सवालिया निशान लगाते जाते हैं और इस प्रकार अस्मिता पर ही सवाल खड़े कर देते हैं। अस्मिता पर सवाल वे ही खड़े करते हैं जो अस्मिता की सबसे ज्यादा वकालत करते हैं। वे आत्म के बारे में सवाल खड़े करते हैं। राममंदिर आंदोलन,दलित साहित्य,स्त्री साहित्य,आरक्षण आदि उत्तर आधुनिक प्रसंगों में यह सब घटता रहा है ।
      उत्तर आधुनिकता के कारण साहित्य में अस्थिर करने वाले सवाल या नजारे के सवाल उठते रहे हैं। हाल ही में साहित्य में उठता ‘राय-कालिया’ विवाद नजारे का सवाल है। नजारे के सवालों का साहित्य से कोई संबंध नहीं होता। मौजूदा ‘राय-कालिया’ प्रकरण का साहित्य और साहित्यालोचना से कोई संबंध नहीं है।
    वी.एन राय के बयान को साहित्य मानकर चलना गलत होगा। चाहे वह बयान साहित्यिक पत्रिका में ही क्यों न छपा हो। बयान तो बयान है वह साहित्य या आलोचना कैसे हो सकता है ? मुँह से निकली प्रत्येक बात आलोचना नहीं होती। लेखक का प्रत्येक कथन साहित्य नहीं होता। ऐसी स्थिति में हमें बयान,विचार और साहित्य के बीच में अंतर करना चाहिए। इन दिनों यह गलतफहमी हमारे बड़े बुजुर्गों को भी हो गयी है। मसलन नामवर सिंह जैसे बड़े आलोचक भी यह मानकर चल रहे हैं कि उनका प्रत्येक वाक्य साहित्य होता है। उनके भक्त भी यही मानकर उनके बोले को साहित्य बनाने में लगे हैं। अरे भाई यदि ऐसा ही होगा तो डाक्टर का प्रत्येक कथन मर्ज का उपचार माना जाएगा। गीतकार का प्रत्येक वाक्य गीत,संगीतकार का प्रत्येक कदम संगीत और शिक्षक का प्रत्येक कथन तो अकादमिक धरोहर की कोटि में ऱखना पड़ेगा। यह मूलतःविभ्रम है। विभ्रम में ज्ञान,तमीज,तहजीब,साहित्य खोजना विभ्रम से विभ्रम की ओर जाना है। इसका सर्जनात्मकता से कोई संबंध नहीं है।    
       कुछ उत्तरआधुनिक मानते हैं साहित्य और साहित्य सिद्धांत में कोई भेद नहीं है। जबकि सच यह नहीं है। साहित्य का उदय ऐतिहासिक प्रक्रिया में होता है और पहले वह महज संयोग या दुर्घटनावश जन्म लेता है। यह कहना सही नहीं है कि साहित्य आता है तो उसके पीछे आलोचना भी चली आती है। भक्ति आंदोलन का महान साहित्य जब लिखा जा रहा था तो उस समय भक्ति आंदोलन की आलोचना पैदा नहीं हुई थी। इसी तरह रैनेसां के समय हमारे लेखक नहीं जानते थे कि यह रैनेसां काल है। यह तो 1940 के बाद नामकरण किया गया कि भारतेन्दु युग रैनेसां युग है। यही स्थिति अन्य काव्यांदोलनों की भी है।
     कहने का आशय यह है कि साहित्य और साहित्यालोचना या सैद्धांतिकी में साम्य मानना गलत है। साहित्य का संदर्भ और साहित्यालोचना के संदर्भ में हमेशा बड़ा अंतर रहा है। भारतेन्दुयुग में साहित्य के जो प्रश्न हैं वैसे सवाल आलोचना ने नहीं उठाए हैं। वहां तो भाषा के और सामान्य सवाल उठाए गए हैं। साहित्य समीक्षा वहां नहीं लिखी गयी है। भारतेन्दु युग के निबंध लेखक हैं आलोचक नहीं हैं। मसलन भारतेन्दु के नाटकों पर जितना आजादी के बाद काम हुआ है वैसा लेखन भारतेन्दु युग के आलोचकों के यहां नहीं मिलता। यही हाल छायावाद का है।
    साहित्य और साहित्यालोचना के विशेष संदर्भ में दो फार्मूले घटे हैं। पहला फार्मूला है जो साहित्य में ‘अंदर’ -बाहर’ का संबंध मानकर चलता है। दूसरा फार्मूला है जो साहित्य में सत्य और व्यवहार के अन्तस्संबंध पर जोर देता है। भारतेन्दु युग के आलोचक ‘अंदर- ‘बाहर’ के संबंध को नहीं मानते थे। इस संबंध पर ध्यान 1930-31 के बाद गया और यही वजह है छायावाद से छायावादियों का मोहभंग हुआ।
    भारतेंदु युग में साहित्य की पत्रिकाओं में छपने वाली प्रत्येक सामग्री साहित्य के रचनात्मक दायरे में शामिल नहीं की  गयी। उनके यहां सर्जनात्मक साहित्य और गैर सर्जनात्मक साहित्य का अंतर था। यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही। इससे साहित्य का दायरा सीमित हुआ। हमारी अस्मिता का सीमित रुप उजागर हुआ । उस समय सर्जनात्मक पाठ पर जोर था।
     लेकिन यह चीज ज्यादा दिनों तक चलने वाली नहीं थी। सन् 1960 के बाद से हिन्दी आलोचना में मूलगामी बदलाव आता है और खुले पाठ की धारणा का प्रवेश होता है। अब साहित्य के आगे-आगे आलोचना चलने लगी। रामविलास शर्मा,मुक्तिबोध, नामवर सिंह आदि की आलोचना में यह लक्षण साफ दिखते हैं। नई कहानी के प्रसंग में नामवर सिंह ने खासतौर पर आलोचना को साहित्य के आगे चलने वाली मशाल बना दिया,बाकी लेखक भी यह काम कर रहे थे।
    इस संदर्भ में देखें तो ये लोग साहित्य को खुले पाठ की तरह देख रहे थे। उसे एक क्रमबद्ध व्यवस्था की तरह देखने की बजाय मनमाने क्रम में रखकर देख रहे थे। नई कहानी आंदोलन का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उसने साहित्य के आगे आलोचना या साहित्य सैद्धांतिकी को रख दिया था। ऐसा करते हुए उन्होंने साहित्य की अस्मिता पर ही  प्रश्न चिह्न लगा दिया। अब तक साहित्य की अस्मिता प्रधान थी,लेकिन नईकहानी के समय आलोचना की अस्मिता प्रधान हो गयी। साहित्य की पहचान को,नई कहानी की पहचान पर ही सवाल खड़े किए गए। बाद में इसको साहित्य ने हजम कर लिया। अब साहित्यालोचना उन कृतियों की ओर चली गई जिन लेखकों के बारे में हम कम जानते थे,जिनको स्थापित करने की जरूरत थी, जो अपने को उपेक्षित महसूस करते थे। यह काम स्वयं नामवर सिंह ने किया, उन्होंने ‘कहानी-नई कहानी’ लिखने के बाद उन कवियों पर लिखा जो प्रगतिशील थे लेकिन आलोचना में स्थापित नहीं किए गए थे। इस तरह के लेख उनकी किताब ’कविता के नए प्रतिमान’ और ‘ कविता की जमीन और जमीन की कविता’ में देख सकते हैं। वे इस क्रम में ‘अंदर-बाहर’ की थ्योरी का इस्तेमाल करते हैं और कविता के जरिए साहित्य की अस्मिता को पुष्ट करते हैं।
   इस क्रम में एक और फिनोमिना सामने आया है जो ‘अंदर-बाहर’ की सैद्धांतिकी का अतिक्रमण करता है। वह है ‘बाहर से बाहर की ओर’ यात्रा । इस मॉडल के प्रसंग में नामवर सिंह की दो किताबें ‘प्रेमचन्द और भारतीय समाज’ और ‘जमाने से दो-दो हाथ’ को रखा जा सकता है। इन किताबों में शामिल निबंध ऐसे समय में लिखे गए जब साहित्य में ‘अंदर और अंदर’ जाने की बातें की जा रही थीं। उस समय साहित्य में ‘बाहर से बाहर’ का मॉडल लागू किया गया । इस मॉडल में पुनरावृत्ति के चांस ज्यादा होते हैं, अतः नामवरसिंह के विचारों में पुनरावृत्ति दिखाई देती है।
    ये किताबें ‘साहित्य’ और ‘राजनीति’ के बीच में गंभीर विभ्रम की सृष्टि करती हैं। खासकर ‘जमाने से दो-दो हाथ’ के बारे में यह तय करना मुस्किल है कि यह साहित्य की किताब है या राजनीति की। इस किताब के संपादक और प्रकाशक को भी यह तय करने में मुश्किल आयी है कि इस किताब को किस केटेगरी में रखे।
      नामवर सिंह की हाल में प्रकाशित चार किताबों ‘कविता की जमीन और जमीन की कविता’,‘प्रेमचन्द और भारतीय समाज’, ‘हिन्दी का गद्यपर्व’ और ‘जमाने से दो-दो हाथ’ में लेखक और संपादक यह मानकर चल रहे हैं कि प्रत्येक चीज साहित्य है। यही वह बुनियादी समझ है जिसके तहत इन किताबों को साहित्योलोचना के नाम पर प्रसारित किया जा रहा है। प्रत्येक चीज साहित्य है, का दावा असल में ‘हर चीज राजनीतिक है’, नारे की तर्ज पर गढ़ा गया है। प्रत्येक चीज साहित्य है के नाम पर ही बेबकूफियों,लफंगई और बेहयाई को भी साहित्य की कोटि में रखा जा रहा है। ‘प्रत्येक चीज साहित्य है’ के नारे का साहित्य के अंदर के संसार से कोई संबंध नहीं है।  
 ‘सब कुछ राजनीति या साहित्य है’ के नाम पर जो विभ्रम चल रहा है उसने यह समस्या भी पैदा की है कि प्रत्येक पाठ की राजनीतिक रीडिंग की जा सकती है।  इस धारणा के पीछे यह समझ है कि साहित्य में राजनीतिक कल्पनाओं के अतिक्रमण की क्षमता होती है। इसके अलावा यह भी कह सकते हैं कि राजनीति से बच नहीं सकते। बल्कि साहित्य में राजनीति संभव है। ऐसे भी आलोचक हैं जो प्रत्येक साहित्यिक कृति को राजनीतिक नजरिए से नहीं पढ़ते। वे मानते हैं कि कुछ पाठ ऐसे हैं जो राजनीति के बाहर हैं। जैसे रामचरितमानस आदि।
  






शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

18 नवम्बर 2010 दर्शन दिवस के मौके पर विशेष- साहित्य का अंत-2-

   साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता में थीम का महत्वपूर्ण होना स्वयं में समस्यामूलक है।हिन्दी की अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं ने फासीवाद, प्रेम,बेबफाई , साम्प्रदायिकता, आतंकवाद,भूमंडलीकरण आदि पर विशेषांक निकाले हैं। इन सभी विशेषांकों का एक ही साझा संदेश है कि हम विषय के बारे में, अपने बारे में कितना जानते हैं। इससे थीम केन्द्र में आई है और व्यक्ति का स्थानान्तरण हुआ है। थीम के हिमायती भूल गए हैं कि साहित्य का थीम के आधार पर प्रसार नहीं होता। इससे अनुकरण,पैरोडी और साहित्यानुकरण होता है।
     एक पत्रिका ने युवा रचनाकार विशेषांक निकाला तो बाकी पत्रिकाएं अनुकरण करके युवा लेखन पर विशेषांक निकाल रही हैं। किसी ने स्त्री या दलित पर विशेषांक निकाला तो बाकी पत्रिकाएं उससे बेहतर विशेषांक निकाल रही हैं। इस विशेषांक संस्कृति ने थीम को प्रतिष्ठित किया है विषय और व्यक्ति को अपदस्थ किया है। साहित्य में इस बहाने व्यक्ति का बहिष्कार हुआ है। विषय का अंत हुआ है।
    पहले साहित्य और साहित्यिक पत्रिकाओं में लेखक के विज़डम और मासकल्चर के रूपों पर जोर था। इन दिनों साहित्य में आकर्षक,इकसार और रूढ़िबद्ध विषयों का महिमामंडन चल रहा है।
     मसलन् यदि किसी दलित ने एक खास अंदाज में अपनी आत्मकथा में कुछ खास पक्षों को उठाया है तो हठात् दलित आत्मकथाओं में मिलते -जुलते चित्रों की बाढ़ आ गयी है। दलित और स्त्री आत्मकथाओं में एक खास किस्म का अंधानुकरण साफतौर पर देख सकते हैं। एक जमाना था साहित्य में विषय की विशिष्टता थी। विशिष्टता की जगह इन दिनों अंधानुकरण  हो रहा है।
     विषय से लेकर समस्या के ट्रीटमेंट तक इकसारता के कारण साहित्य से व्यक्ति की विदाई और विशिष्टता का अंत हो गया है। पहले पाठ का संबंध ऑब्जेक्ट के साथ था इन दिनों ऑब्जेक्ट की जगह फैशन ने ले ली है। थीम ने ले ली है। इन दिनों साहित्य थीम से थीम की ओर बढ़ रहा है। थीम से पैदा होने वाला साहित्य स्टीरियोटाईप और बोगस होता है चाहे उसे कितने ही बड़े लेखक ने लिखा हो। साहित्य का आधार अब जीवन नहीं थीम है और यही वह बिंदु है जहां साहित्य का अंत हो जाता है। दूसरी प्रवृत्ति निर्धारणवाद की है। इसमें स्त्री,युवा,दलित आदि को निर्धारणवादी ढ़ंग से पेश किया जा रहा है। अब कोई भी रचना मर्दवाद के आतंक-उत्पीड़न, वर्णाश्रम व्यवस्था के उत्पीड़न ,भूमंडलीकरण के उत्पीड़न के बिना नहीं लिखी जा रही।
        साहित्य को ‘स्पेस’ के संदर्भ में देखें तो ऐसी रचनाएं ज्यादा आ रही हैं जिनमें ‘घर’ का चित्रण ज्यादा है। व्यक्तिगत ,करीबी बातों और लोगों का चित्रण ज्यादा हो रहा है। अब ऐसी रचनाएं कम लिखी जा रही हैं जिनमें सार्वजनिक स्पेस हो। साहित्य की स्टाईल की बजाय खास अंचल या भौगोलिक क्षेत्र पर बातें हो रही हैं।
    एक जमाना था हिन्दी में लेखकगण समय पर बातें करते थे,युग पर बातें करते थे, अब समय को स्थान ने अपदस्थ कर दिया है। स्पेस का विकृतिकरण हो रहा है। इसे घर,बाहर, शहर,कामकाजी स्थान आदि के संदर्भ में देख सकते हैं। 
     स्त्री और दलित पर लिखी रचनाओं में स्टाइल के रूपों में पुरानी पितृसत्तात्मक अभिव्यक्ति शैली को चुनौती दी जा रही है। पुरानी पितृसत्तात्मक शैली और नयी शैली में क्या अंतर है। इस पर बातें नहीं हो रही हैं।  इसी तरह दलित लेखन में कामुकता और वर्चस्व की स्मृतियों की व्यापक अभिव्यक्ति हुई है। उनके विभिन्न आख्यान या रूपक सामने आए हैं।
       कामुकता और वर्चस्व की स्मृतियों का आना इस बात का संकेत है कि हमारा लेखक मीडिया इमेजों से गहरे प्रभावित है। मीडिया इमेजों के प्रभाव के कारण ही स्मृतियों को साहित्य में अभिव्यक्ति के लिए प्रेरित करता है। स्मृतियों का साहित्य मीठा होता है और उसकी खपत आसानी से हो जाती है। साहित्य में चीजों को माल बनाकर पेश करने की प्रवृत्ति ने उसकी खपत बढ़ा दी है। इस क्रम में संस्कृति और यथार्थ का अंतर मिटा है। 
     खासकर स्त्री और दलित केन्द्रित आत्मकथाओं में यथार्थ और संस्कृति का अंतर खत्म हो गया है। इन आत्मकथाओं के जरिए स्त्री के यथार्थ की बजाय संस्कृति पर ज्यादा बातें हो रही हैं। चित्रण में भी यथार्थ गौण है संस्कृति प्रमुख है। साहित्य के चित्रण में यथार्थ की जगह संस्कृति और विचार विशेष का आना और यथार्थ का गायब हो जाना साहित्य के वस्तुकरण की प्रक्रिया को सामने लाता है। इस तरह के साहित्य की रूपान्तरणकारी भूमिका नहीं होती। वह बिकता ज्यादा है,उसकी खपत ज्यादा होती है ,वह आलोचनात्मक नजरिए से रहित होता है। साहित्य का वस्तुकरण वस्तुतः परवर्ती पूंजीवाद के सास्कृतिक तर्कों की विजय है।
    फ्रेडरिक जेम्सन ने लिखा है कि नए युग की विशेषता है कि हमारे कानों में इतिहास का आवाजें आनी बंद हो जाती हैं। इतिहास के प्रति बहरापन एक सामान्य फिनोमिना है। नए युग का विचारशास्त्र संस्कृति में सत्य की खोज कर रहा है। संस्कृति के परे सत्य के किसी भी आयाम को ये लोग नोटिस ही नहीं लेते।
     सार्वजनिक इतिहास से हमारा संबंध कमजोर हुआ है और नए किस्म की निजी सामयिकता से उसे जोड़ दिया गया है। इसके कारण एक खास किस्म की उन्मादी भाषा का प्रयोग हो रहा है। साहित्य और मीडिया में शुद्ध भौतिक अनुभवों को उभारा जा रहा है। साहित्य में दैनन्दिन जीवन के सतही मनो अनुभवों और स्पेस केन्द्रित सांस्कृतिक भाषा के वैविध्यपूर्ण चित्रों की बाढ़ आयी हुई। बैचैनी के चित्र यथार्थ के बिना आ रहे हैं। नई संचार तकनीक का साहित्य पर गहरा असर हुआ है। नई तकनीक पुनर्रूत्पादन की तकनीक है। फलतः साहित्य सृजन कम और उसका पुनर्रूत्पादन ज्यादा हो रहा है।  
        उत्तर आधुनिक अवस्था में ‘साहित्य के अंत’ की भी घोषणा की गई है। इसका वास्तव में क्या अर्थ है इस ओर हमारे समीक्षकों ने कभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। लेकिन एक परिवर्तन आया है साहित्य को विधाओं में वर्गीकृत करके पढ़ने की परंपरा का अंत हुआ है। साहित्य के पुराने वर्गीकरण और मानक अप्रासंगिक हो गए हैं।
    मसलन् एक जमाना था साहित्य की कोटि में अखबार का लेखन नहीं आता था। लेकिन इधर यह नहीं कह सकते। सवाल उठता है स्व. प्रभाष जोशी का हिन्दी गद्य साहित्य का हिस्सा है या नहीं ? इसी तरह बड़े पैमाने पर साहित्येतर समस्याओं पर हिन्दी में लिखा जा रहा है वह साहित्य का हिस्सा है या नहीं ? विधाओं के दायरे भी टूट हैं, साहित्य में आए दिन नई विधाएं जन्म ले रही हैं। कल तक जिस लेखन को विधा नहीं मानते थे उसे अब विधा मानते हैं।
    मसलन ,निजी पत्र साहित्य का हिस्सा नहीं थे। लेकिन रामविलास शर्मा ने ‘निराला की साहित्य साधना’में पत्रों का इस्तेमाल किया और पत्रों का ही एक खण्ड बना दिया। अपनी आत्मकथा में भी उन्होंने यही पद्धति अपनायी। इसी तरह नवजागरण संबंधी बहस में भी उन्होंने ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण’नामक किताब लिखकर बड़े पैमाने पर साहित्येतर विषयों को साहित्य बना दिया। यही काम अपने से तरीके नामवर सिंह ने आलोचना पत्रिका के पुनर्प्रकाशन के साथ किया और उन्होंने आलोचना का फासीवाद विरोधी विशेषांक निकाला। कहने का तात्पर्य है कि साहित्य अब पुराने अर्थ को त्याग चुका है। नए रूप में साहित्य को लेखन के नाम से जाना जाता है। इसमें अब साहित्य और साहित्येतर का भेद नहीं रह गया है। विधाओं का वर्गीकरण नहीं रह गया है। विधाओं का भी लेखन की अवधारणा में विलय हो चुका है। अब सब कुछ लेखन है।
     पहले साहित्य की सीमाएं थीं आज साहित्य की कोई सीमा नहीं है।  अब साहित्य में सब कुछ शामिल है। साहित्य में यह परिवर्तन नयी संचार तकनीक आने के साथ आया है। कम्प्यूटर के आने साथ आया है। जिस तरह कम्प्यूटर में उससे पहले के सभी माध्यमों का विलय हो गया है, कनवर्जन हो गया। ठीक वैसे ही लेखन में सब विधाओं का विलय हो गया है। पहले रचना का एक ही अर्थ होता था ,यही कहा जाता था लेखक का काम है सत्य की खोज करना। लेकिन अब किसी भी रचना का एक अर्थ नहीं है। बल्कि अनेक अर्थों की चर्चा हो रही है। एक सत्य की नहीं एकाधिक सत्य की चर्चा हो रही है। एक व्याख्या नहीं व्याख्याओं का अनंत आकाश खुल गया है। इस पूरी प्रक्रिया में आलोचना, सत्य,व्याख्या आदि के संदर्भ में ‘सापेक्षतावाद’ घुस आया है। अब हम सापेक्ष रूप में विचार करते हैं। सत्य ,कथ्य और व्याख्या की एकाधिक अस्मिताओं पर जोर दिया जा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पुराने साहित्य की धारणा का अंत हो गया है।
   ‘साहित्य के अंत’ की प्रक्रिया में ‘साहित्य’ पर नहीं ,साहित्य के सवालों पर बहस हो रही है। ‘साहित्य’ पर जब बातें कर रहे थे तो साहित्य समीक्षा के आधार पर लगातार कृति का विवेचन कर रहे थे,समीक्षा या आलोचना का विकास कर रहे थे। साहित्य के नियमों को लागू करते हुए बता रहे थे कि साहित्य की सीमा क्या है और रचना में साहित्येतर क्या है ? साहित्य को साहित्येतर से दूर रखने में आलोचना मदद कर रही थी। लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा।
    हमारे साहित्यिक बंधु साहित्य के सवालों पर चर्चा करते हुए साहित्यालोचना के दायरे के बाहर चले गए हैं. अब साहित्य और साहित्येतर का विभाजन खत्म हो गया है। यह विभाजन और किसी ने नहीं साहित्य के दो महान आलोचकों रामविलास शर्मा और नामवर सिंह ने किया है। जब आप साहित्य की बजाय साहित्य के सवालों पर चर्चा रहे होते हैं तो साहित्य की सीमाओं को खत्म करते हैं। इस क्रम में साहित्य की अपनी कोई निजी पहचान नहीं रह जाती। अब तक यह कहा जाता था कि साहित्य की अपनी पहचान या अस्मिता होती है।  लेकिन यह पहचान अब खत्म हो गयी है। अब हम नहीं जानते कि साहित्य की अस्मिता क्या है ? पहचान क्या है ? यही वह जगह है जहां पर साहित्यालोचना की जगह साहित्य सैद्धांतिकी आ गयी है। अब ज्यादा से ज्यादा साहित्यालोचना नहीं साहित्य की थ्योरी के आधार पर चर्चाएं हो रही हैं।
    पहले ‘आलोचना’ लिखी जाती थी अब ‘परिप्रेक्ष्य’ की बातें हो रही हैं। आलोचना को परिप्रेक्ष्य ने अपदस्थ कर दिया है। इसका गहरा असर हुआ है। अब साहित्य में अनेक परिप्रेक्ष्यों के आधार पर मूल्यांकन किया जा रहा है। जैसे मार्क्सवाद,संरचनावाद,उत्तर आधुनिकतावाद, स्त्रीवाद आदि।
    मजेदार बात यह है कि हिन्दी में आलोचना के मसलों को पूरी तरह दुरूस्त भी नहीं कर पाए थे कि अचानक आलोचना को परिप्रेक्ष्य ने अपदस्थ कर दिया। अब परिप्रेक्ष्य के आधार पर साहित्य में व्यक्त सत्य को तय किया जा रहा है। परिप्रेक्ष्य अलग हैं तो सत्य भी भिन्न होगा। इसके कारण दुनिया भी अलग दिखाई देगी। दुनिया का अलग-अलग हिस्सा दिखाई देगा।
    मसलन् स्त्रीवादी और मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य को ही लें ,इसके मानने वाले ‘लिंग’ और ‘वर्ग’ के अलावा और किसी भी बात पर ध्यान नहीं देते। वे अन्य पक्षों की अनदेखी करते हैं। व्यवस्था में ‘लिंग’ और ‘वर्ग’ के अलावा भी चीजें हैं जिन्हें हमें देखना चाहिए। वे साहित्य को ‘लिंग’ और ‘वर्ग’ के सीमित दायरे में ऱखकर देखते हैं, साहित्य का दायरा बहुत बड़ा है,स्त्री साहित्य और मार्क्सवादी साहित्य या दलित साहित्य के दायरे की तुलना में। फलतः साहित्य में टुकड़ों या अंशों पर बातें हो रही हैं,समग्रता में साहित्य पर बातें नहीं हो रहीं। इसी अर्थ में साहित्य का अंत हुआ है।
    परिप्रेक्ष्य में देखने की यह खूबी काफी पहले से चली आ रही है इसमें उत्तर आधुनिकतावाद के आने से मामला दूसरी दिशा में चला गया है। जितने भी परिप्रेक्ष्य प्रचलन में हैं उनमें राजनीति गहरे समायी हुई है। राजनीति के बिना इन पर बातें करना संभव नहीं है।
      इस समूची प्रक्रिया का साहित्य के पठन-पाठन पर भी गहरा असर हुआ है। अब साहित्य के विभाग नहीं होते, बल्कि उनकी जगह साहित्यिक अध्ययन के विभाग होते हैं। साहित्यिक अध्ययन विभाग बनते ही अनुसंधान और अध्ययन के क्षेत्र में हिंसा,दमन, उत्पीडन, विभाजन आदि राजनीतिक केटेगरी का अध्ययन प्रमुख हो गया है।
     अब कोई शोध ऐसा नहीं होता जिसका ठोस आधार राजनीति न हो। अब प्रत्येक निर्णय राजनीतिक आधारों पर हो रहा है। राजनीतिक आधार पर सोचने का परिणाम निकला है कि अब कोई चीज निश्चित नहीं है। टिकाऊ नहीं है। राजनीति के अलावा अन्य पहलुओं को छिपाया जा रहा है।
      जब कोई चीज निश्चित नहीं है तो अब अनुमानाधारित दर्शन,काल्पनिक साहित्य और रेडिकल गणित पर जोर दिया जा रहा है और इसी क्रम में गेम या खेल की सैद्धांतिकी सामने आई है।
      गेम थ्योरी के आधार पर खास सीमा के बाद ज्ञान,विचार,अनुभव आदि को ठेल दिया जाता है। लेकिन राजनीतिक एक्शन को लक्ष्य से नहीं हटाया जा सकता। चूंकि चीजें राजनीति से जुड़ी हैं अतः संदर्भ को वास्तव होना चाहिए। बिना वास्तव संदर्भ के राजनीति की व्याख्या संभव नहीं होती। इस क्रम में वास्तव पर संदेह नहीं किया जा सकता। अथवा यह भी कह सकते हैं कि कुछ सवाल उठाए ही नहीं जा रहे। ऐसी स्थिति में जो भी मूल्यांकन करेंगे उसके लिए वास्तव के बाहर जाने की जरूरत पड़ेगी।
     हमें चलताऊ तुलनाओं ,प्रतिगामी उपेक्षाभाव ,अतार्किकता ,सांस्थानिकता, बौद्धिकता विरोध, अराजनीति आदि से बचना होगा। वास्तव पर निर्भर आलोचना लिखेंगे तो राजनीति और स्कॉलरशिप दोनों में संतुलन बना रहेगा।  इस संतुलन को डिस्टर्ब न किया जाए। (क्रमशः)



गुरुवार, 18 नवंबर 2010

18 नवम्बर 2010 दर्शन दिवस के मौके पर विशेष- साहित्य का अंत-1-

    (यूनेस्को के द्वारा प्रतिवर्ष नवम्बर के पहले तीसरे गुरूवार को दर्शन दिवस मनाया जाता है। इस दिन यह मौका 18 नवम्बर को पड़ रहा है। इस मौके पर दर्शन के गंभीर और महत्वपूर्ण सवालों पर सारी दुनिया में और खासकर यूनेस्को के पेरिस स्थित मुख्यालय में विचार विमर्श होने जा रहा है। यहां पर हम उत्तर आधुनिकतावाद के प्रसंग में उठी 'साहित्य का अंत' अवधारणा पर विचार करेंगे)                       
     साहित्य का वर्तमान बदला रूप अधिकतर लोगों की समझ में नहीं आ रहा । इन दिनों भाषिक प्रयोगों  और मध्यकालीन विषयवस्तुओं की प्रासंगिकता नजर आ रही है। कुछ हैं जो अभी प्रगतिशील आंदोलन के प्रयोगों के आगे नहीं बढ़े हैं। इसमें कुछ ऐसे हैं जो अभी भी छायावादी भावबोध में जी रहे हैं। यही हाल कथा साहित्य है। किसी को कथा सरितसागर की कहानियों का फारमेट अच्छा लगता है तो कुछ के लिए प्रेमचंद का कथा रूप अपील करता है। कुछ ऐसे हैं जो राजेन्द्र यादव के दीवाने हैं तो कुछ को उदयप्रकाश में कथा के जादुई यथार्थ के दर्शन होते हैं। तात्पर्य यह है कि हिन्दी में साहित्य के नाम पर प्राचीन से लेकर नवीन सब कुछ चल रहा है।
   हिन्दी में इन दिनों अतीत से लेकर अत्याधुनिक वर्तमान शिल्प के प्रयोगों का तांता लगा है। यही हाल पापुलरकल्चर का है। उसमें भजन से लेकर भांगड़ा तक,पॉप संगीत से लेकर शास्त्रीय संगीत तक सबमें फ्यूजन चल रहा है। वगैर किसी सिद्धांत और मकसद के पुरानी से लेकर नई शैलियों और देशी-विदेशी सिद्धांतों की खिचड़ी परोसी जा रही है। सिर्फ अंतर्वस्तु पर बहस कम से कम हो रही है। अतीत की शैलियों से लेकर अत्याधुनिक शैलियों का मनमाना प्रयोग इस बात का संकेत है कि कलाओं में नियमरहित अतीत का संगम हो रहा है। शैलियों को संतुलित कर देने, एक ही धागे में पिरो देने की इस प्रवृत्ति ने खास किस्म का सर्वसंग्रहवाद पैदा किया है।
     साहित्य पुनर्सृजन है। वह वास्तव की बजाय कल्पना का खेल है। लेकिन कथाकार उसे वास्तव के रूप में व्याख्यायित करने में लगे हैं। दूसरी ओर वास्तव घटनाओं का नकली रूप टीवी चैनलों से नाट्य रूपान्तरण के जरिए आ रहा है।  कुछ ऐसे विचारक भी हैं जो बता रहे हैं कि वेदों की ऋचाएं,लोकगीत, महाकाव्यों की कविताएं आदि सब कुछ सच था। वे उन्हें किसी न किसी वास्तव घटना से जोड़ रहे हैं और उनकी वैधता की तलाश कर रहे हैं।
    यानी साहित्य सच है ,सच के अलावा कुछ भी नहीं है। कलाओं में सच के पूजकों की ऐसी भीड़ पहले कभी नहीं देखी गयी। वे बता रहे हैं कि सब कुछ उपभोग के लायक है। सब कुछ आत्मसात किया जा सकता है। ‘सब कुछ कला और सब कुछ यथार्थ’ के नारे के नाम अतीत से लेकर वर्तमान तक की विलक्षण खिचडी पक रही है और उसे हम अनालोचनात्मक ढ़ंग से खा रहे हैं।
    ‘सब कुछ कला है’ के नारे के मानने वालों को साहित्य में कैसे प्रतिष्ठित किया जा रहा है और सब की रचनाओं को एक पदबंध में कैसे बांधा जा सकता है इसका साहित्यिक खेल ‘नया ज्ञानोदय’ के हाल ही में प्रकाशित ‘प्रेम’ और ‘बेबफाई’ विशेषांकों को देखकर लग सकता है। संपादक महादय ने उपरोक्त पदबंधों के आधार पर अतीत से लेकर वर्तमान तक की साहित्यिक रचनाओं को वर्गीकृत करके पेश किया है और अच्छे जनप्रिय अंक प्रकाशित किए हैं। इन विशेषांकों में शामिल रचनाओं को समझने के लिए किसी परिप्रेक्ष्य,ऐतिहासिक संदर्भ,कल्पना आदि के वैविध्य आदि को समझने की जरूरत नहीं है। यह तो ‘प्रेम’ और ‘बेबफाई’ का सर्वसंग्रह है।
    विचार विशेष  पर इस तरह के संग्रहों के प्रकाशन का  हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं में खूब चलन है। यह साहित्य में नए और पुराने का सर्वसंग्रहवाद है। इस तरह के सर्वसंग्रहवाद के पीछे इस तरह के संग्रहों को निकालने वालों की अपनी साहित्यिक समझ रही है जिसके आधार पर वे इस तरह के खिचडी साहित्य की साहित्यिक प्रासंगिकता पर रोशनी ड़ालते हैं। उनके पास अपने सर्वसंग्रहवाद के लिए सुंदर तर्क हैं।   
     पुराने और नए को एक ही साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का साहित्य सिद्धांत पिटा हुआ उत्तर आधुनिक सिद्धांत है। इसे अलावा ‘सब कुछ साहित्य है और यथार्थ है’ और  ‘प्रत्येक चीज प्रासंगिक है’,ये दोनों साहित्यिक नारे हमारे साहित्यिक क्षय को व्यंजित करते हैं। कलाबोध को नष्ट करते हैं। इन दो नारों के तहत प्रस्तुत सामग्री उपभोक्तावाद से संचालित है। इसका साहित्य से कम संबंध है।
     उपभोक्तावाद के लिए सब कुछ जरूरी है। सब कुछ बिक सकता है। वहां कचरा और कूड़ा भी प्रासंगिक है। जिस तरह बाजार में रीसाईकिलिंग की गई वस्तुओं और प्लास्टिक के मालों की बाढ़ आयी हुई है वैसे ही साहित्य में भी नए किस्म का रीतिवाद आ गया है। इसमें पुराने रीतिवाद के लक्षण भी शामिल हैं। रीतिवाद की विशेषता है सृजन के केन्द्र में नकली यथार्थ और निर्मित साहित्य का आना। कहानी,उपन्यास से लेकर आत्मकथाओं तक निर्मित साहित्य की बाढ़ आयी हुई है। साहित्य की बजाय निर्मित साहित्य ने अंधानुकरण को बढ़ावा दिया है। यह साहित्य का स्टीरियोटाईप है।
जिस तरह रीसाईकिल से बनी सामग्री का निजी जीवन छोटा होता है। वैसे ही स्टीरियोटाईप साहित्य की भी उम्र कम होती है। वह स्मृति में टिकता नहीं है।साहित्यिक विवादों के केन्द्र में जमा नहीं रहता।
       हमारे बीच में साहित्यिक प्रवृत्तियों की रीसाईकिलिंग हो रही है। साहित्यिक रीसाईकिलिंग में एक खास किस्म की मनोदशा या प्रवृत्ति या विचार को लेकर विशेषांक निकाले जा रहे हैं। इनका साहित्य के ऐतिहासिक अतीत और परिप्रेक्ष्य से कोई संबंध नहीं है। ‘नया ज्ञानोदय’के संपादक खुश हैं कि उन्होंने जो विशेषांक निकाले उनके कई संस्करण छापने पड़े हैं। एक जमाने में ‘आलोचना’ पत्रिका के फासीवाद विरोधी अंक के भी कई संस्करण निकले हैं। सर्वसंग्रह खूब बिकता है। वह वस्तु को उसके अतीत से विच्छिन्न कर देता है । उसे तात्कालिक खपत से जोड़ देता है। इसे साहित्य का उपयोगितावाद कहते हैं। यह ‘टाइम पास’ करने वाले साहित्य की प्रवृत्ति है।
     मीडिया मालों का आस्वाद लेते हुए हम आज कृत्रिम यथार्थ के अभ्यस्त हो गए हैं। यथार्थ और कृत्रिम यथार्थ का अंतर भूल गए हैं। साहित्य और गैर साहित्य का भेद भूल गए हैं। सामयिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का अंतर करना भूल गए हैं। अब हम चीजों को अनालोचनात्मक या संशयवादी की तरह देखते हैं। स्वाभाविक और आलोचनात्मक ढ़ंग से देखने और परखने की कला हमारे जीवन से चली गयी है। हमें वास्तव घटना से ज्यादा निर्मित घटना अपील करती है। वास्तव की तुलना में कृत्रिम सुंदर लगने लगा है। वास्तव खबर नकली और नकली खबर वास्तव लगने लगी है।
     ‘नया ज्ञानोदय’ ने ‘प्रेम’ और ‘बेहफाई’ पर जो विशेषांक निकाले हैं उनमें उत्तर आधुनिकतावादी साहित्य की ‘कट एंड पेस्ट’ पद्धति का कौशलपूर्ण इस्तेमाल किया गया है। जब कोई संपादक ‘कट एंड पेस्ट’ की पद्धति का इस्तेमाल करता है तो वह प्रवृति या विचार विशेष का अंधानुकरण करता है। उस विषय को पैरोडी बनाता है। या किसी शैली विशेष का अनुकरण करता है। वह अपने ऊपर विशेष विषय,शैली,भाषा, मनोभाव आदि का मुखौटा लगा लेता है। वह विषय के साथ खिलौने की तरह खेलता है। वह जिस भाषा में बोलता है वह मरी हुई भाषा है।
    किसी भी साहित्य पत्रिका के विषय विशेष पर प्रकाशित विशेषांक वस्तुतः व्यक्ति की एक विषय के रूप में अंत की घोषणा है। वे बताते हैं कि कुछ नया कर रहे हैं लेकिन वे असल में मृतभाषा में बयान कर रहे होते हैं। आप इन विशेषांकों में जीवंत व्यक्ति को नही देख सकते,उसके दुख-सुख को नहीं देख सकते। उनके लिए व्यक्ति की एक विषय के तौर पर उपस्थिति का अंत हो चुका है।
    अब मनोदशा,प्रवृत्ति या विचार विशेष पर केन्द्रित अधिकांश विशेषांक व्यक्तिरहित रूप में आए हैं। वास्तव व्यक्ति से रहित ‘प्रेम’ और ’बेबफाई’ कैसी हो सकती है इसका आदर्श उदाहरण हैं ‘नया ज्ञानोदय’ के ये दो विशेषांक। यह बात जितनी इस पत्रिका पर लागू होती है उतनी ही अन्य पत्रिकाओं के विशेषाकों पर भी लागू होती है।
    साहित्य में व्यक्ति के अवसान का जो पाठ उदीयमान बुर्जुआजी ने बनाया था उसकी ही चरम अभिव्यक्ति हैं ये विशेषांक। इन विशेषांकों में परवर्ती पूंजीवाद में पैदा हुए प्रतिस्पर्धी पूंजीवाद की कहीं पर भी छाया नजर नहीं आती। ‘प्रेम’ और ‘बेबफाई’ पर विभिन्न लेखकों एक ही धागे में पिरोने के चक्कर में संपादक ने जिस चीज की हत्या की है वह है व्यक्तिवाद। दूसरी जो चीज नदारत है वह है संपादकीय नजरिया। संपादक का काम क्या अतीत को पुनःप्रस्तुत कर देना है ?जो छपा है उसे दोबारा छाप देना है ? तो निश्चित तौर पर यह साहित्य में बुरे दिनों के आगमन की सूचना है। फ्रेडरिक जेम्सन के शब्दों में यह‘नए की असफलता और अतीत की कैद है।’
   थीम पर केन्द्रित अंक इस बात की सूचना है कि हिन्दी जगत गहरे अवसाद से गुजर रहा है। फ्रेडरिक जेम्सन के शब्दों में थीम पर केन्द्रित होकर बातें तब ही होती हैं जब बहुराष्ट्रीय कंपनियों अथवा परवर्ती पूंजीवाद के प्रति समाज अवसाद में डूबा हुआ हो। जो अवसाद में डूबे हैं उनके लिए ‘प्रेम’ और ’बेबफाई’ विशेषांक अपील कर रहे हैं। साथ ही दार्शनिक तौर पर यह व्यक्ति को चर्चा के केन्द्र से हटाने की कोशिश है। अब प्रेम और बेबफाई पर बातें हो रही हैं। व्यक्ति के सामयिक संसार पर बातें नहीं हो रही हैं। इसी अर्थ में यह उत्तर आधुनिक साहित्यिक प्रयास है जिसमें व्यक्ति के अंत की घोषणा कर दी गई है। (क्रमशः)
 





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