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गुरुवार, 12 मई 2016

भारतीय परिवार और लोकतंत्र


         
भारतीय परिवार स्वभाव से अ-राजनीतिक और पुंसवादी है।परिवार का यह ढाँचा बदले इसकी ओर स्वाधीनता संग्राम में ध्यान गया।जिन परिवारों में लोकतांत्रिक राजनीतिक माहौल था वहाँ से जो राजनीति में आया उसकी राजनीतिक भूमिका बेहतर रही है।बेहतर से मतलब लोकतंत्र की मान्यताओं और संस्थाओं के निर्माण में ऐसे लोगों की बेहतर भूमिका रही है । सवाल है कि लोकतंत्र के निर्माण में परिवार की भी कोई भूमिका होती है क्या ? क्या लोकतंत्र के लिए परिवार को बदलने की ज़रुरत है या नहीं ? संघ परिवार ने ऐसे नेता दिए जो परिवारविहीन हैं। परिवारविहीन नेता सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ कम निबाहते हैं। सामाजिक विध्वंस ज़्यादा करते हैं !

पूरा परिवार राजनीति करे, यह संस्कार हमारे देश में स्वाधीनता संग्राम ने पैदा किया था । नेहरु परिवार आज़ादी की लड़ाई में तपा और बदला। गांधी परिवार ने नेहरु परिवार की इस विरासत की यथाशक्ति रक्षा की । गांधी परिवार की तरह कोई परिवार संघ के नेता क्यों नहीं पैदा कर पाए ? लोकतांत्रिक परिवार हो और राजनीतिक परिवार हो, यह स्वाधीनता संग्राम की देन है,आज़ादी के बाद कम्युनिस्टों,सोशलिस्टों और कांग्रेसियों ने लोकतांत्रिक-राजनीतिक परिवार की परंपरा का काफ़ी हद तक निर्वाह किया है । लोकतांत्रिक- राजनीतिक परिवार लोकतंत्र का स्वस्थ मूल्य है।संघ परिवार के नेता आए दिन गांधी परिवार पर जो हमले करते हैं वह असल में लोकतांत्रिक -राजनीतिक परिवार की संरचना पर हमले हैं। संघ परिवार चाहता है हमारे देश में लोकतांत्रिक-राजनीतिक परिवार न हों बल्कि उपभोक्ता परिवार हों ,जिनका अ-राजनीति की राजनीति में विश्वास हो। इस तरह के परिवार फासिज्म का आसानी से जनाधार बनते हैं ।नरेन्द्र मोदी इस तरह के परिवारों के लाड़ले हैं।

गांधी परिवार राजनीतिक परिवार है और लोकतंत्र के प्रति वचनवद्ध है। वे परिवार अच्छे हैं जो लोकतांत्रिक राजनीति करते हैं । कम से कम गांधी परिवार ने राजनीति के अलावा कोई धंधा नहीं किया ।

"संघ परिवार "और "गांधी परिवार" में कौन देशभक्त है ?किस "परिवार" ने देश के लिए क़ुर्बानियाँ दी हैं ?

परिवार पर बातें करते समय मेरा-तेरा परिवार करके न देखें । परिवार को एक संस्थान की तरह देखें। यह कहना सही नहीं है कि मेरा परिवार तो ठीक है और आपकी बातें हम पर लागू नहीं होतीं।

महाशय,हमारे आपके भद्रजनों के परिवार अंदर से पूरी तरह सड़ चुके हैं ।कभी आपको अंदर से दुर्गंध महसूस क्यों नहीं होती ? कभी परिवार को बदलने की मांग को लेकर हमारे आजाद देश में कोई जुलूस क्यों नहीं निकला ?

समाज को बदलने के लिए हमें अपना एजेण्डा बदलना होगा ।सरकार,पुलिस,नेता,भ्रष्टाचार,मनमोहन सिंह,कांग्रेस,भाजपा आदि के खिलाफ बोलना आसान है,जुलूस निकालना आसान है, लेकिन अपने परिवार के सड़े तंत्र के खिलाफ बोलना और जुलूस निकालना बेहद कठिन है।

हमसब कायर हैं और हमने लोकतंत्र के विभिन्न तंत्रों के आवरण में अपनी कायरता को छिपा लिया है , रेशनलाइज कर लिया है । लोकतंत्र के आवरण के बाहर निकलकर परिवार को खोलें और सड़कों पर,मीडिया में ,लोकसभा से लेकर पंचायतों तक बहस करें और समाधान खोजें ।

भारत को अपराधमुक्त बनाना है तो परिवार को अपराधमुक्त बनाओ। देश में लोकतंत्र लाना है तो परिवार में पहले लोकतंत्र स्थापित करो।फलतः देश में बहुत बडी मात्रा में अपराधों में गिरावट स्वतःमहसूस करेंगे । समाज में होने वाले अपराध हमारे परिवार के अंदर होने वाले अपराधों का ही विस्तार हैं ।

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शनिवार, 27 दिसंबर 2014

मदनमोहन मालवीय और हिन्दू -मुस्लिम एकता की समस्या



 देश में साम्प्रदायिक माहौल बिगडा हुआ है ,संघ और उनके नायक मोदी द्वारा वोट की राजनीति को बहुसंख्यकवाद की राजनीति और धर्माधारित राजनीति की ओर मोड़ा जा चुका है। यह देश के लिए सबसे ख़तरनाक चीज है। देश में चारों ओर मुस्लिम विद्वेष की बर्षा हो रही है। साथ में मदनमोहन मालवीय जी को भारतरत्न देकर सम्मानित भी किया जा रहा है, दुर्भाग्य की बात है कि मालवीयजी के विचारों के साथ संघ और मोदी सरकार का तीन- तेरह का संबंध है । संघ और उसके संगठनों की विचारधारा की धुरी है हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष , जबकि मालवीयजी के विचारों की धुरी है हिन्दू-मुस्लिम सद्भाव। मोदी नारा विकास का दे रहे हैं लेकिन ज़मीनीस्तर पर बहुसंख्यकवाद की ओर जा रहे हैं। हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष को बढ़ावा दे रहे हैं,फ़ंडामेंटलिस्ट संगठनों की हिमायत कर रहे हैं।संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा  भारत को हिन्दुओं का देश कहकर दुष्प्रचार किया जा रहा है। जानें और पढें संघ वाले कि मालवीयजी ने क्या लिखा था।
     मदन मोहन मालवीय ने लिखा " हिन्दुस्तान में अब केवल हिन्दू ही नहीं बसते हैं - हिन्दुस्तान अब केवल उन्हीं का देश नहीं है। हिन्दुस्तान जैसे हिन्दुओं का प्यारा जन्म-स्थान है, वैसा ही मुसलमानों का भी है। ये दोनों जातियाँ अब यहाँ बसती हैं और सदा बसी रहेंगी। जितना इन दोनों में परस्पर मेल और एकता बढ़ेगी , उतनी ही देश की उन्नति करने में हमारी शक्ति बढ़ेगी और जितना ही बैर या विरोध या अनेकता रहेगी , उतने ही हम दुर्बल रहेंगे।" यह भी लिखा " जो हमारी उन्नति नहीं चाहते , वे हमको एक- दूसरे से लड़ाने के लिए यत्न करते हैं और करेंगे। लेकिन हमारे आपस में एक - दूसरे के विचार और भाव शुद्ध रहें तो हमारे किसी बैरी को हमको लड़ाने का यत्न सफल नहीं होगा। यह दु:ख की बात है कि हम लोगों में भी कुछ लोग ऐसे हैं जो एक जाति को दूसरे से लड़ाने का यत्न करते हैं। हमको इस बात के कहने में कोई संकोच नहीं कि जो हिन्दू या मुसलमान ऐसा करता है, वह देश का शत्रु है। इतना ही नहीं , बल्कि वह अपनी विशेष जाति का भी शत्रु है । हमको सबको उचित है कि सब एक- दूसरे के चित्त को संताप पहुँचाने वाली बीती बातों को भूल जावें,एक- दूसरे का हित और सुख यत्नों में सहायक हों।" 


गुरुवार, 27 नवंबर 2014

पाक अछूत नहीं है मोदीजी

       सार्क देशों के नेपाल सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में जो भाषण दिया उसमें उन्होंने एकबार भी पाकिस्तान का जिक्र नहीं किया। उन्हें श्रीलंका याद आया,नेपाल याद आया,बंगलादेश और मालदीव को उल्लेख योग्य समझा लेकिन पाकिस्तान का उन्होंने जिक्र तक नहीं किया। यहां तक कि 26/11की घटना का जिक्र किया, लेकिन न तो आतंकी संगठनों का कोई जिक्र किया और न पाकिस्तान का जिक्र किया। मोदी ने कहा ''आज जब हम 2008 में मुंबई में उस खौफनाक आतंकी घटना को याद करते हैं तो हमें अपने लोगों को खोने का कभी न खत्‍म होने वाला दर्द महसूस होता है। आतंकवाद और अंतर्राष्‍ट्रीय अपराधों से लड़ने के लिए हमने जो प्रतिज्ञा की है उसे पूरा करने के लिए हमें साथ मिलकर काम करना होगा।'' इन पंक्तियों के अलावा पूरे भाषण में आतंकवाद का कहीं कोई जिक्र नहीं है। 

मोदी जानते हैं कि दक्षिण एशिया के देशों में सबसे तनावपूर्ण संबंध भारत-पाक के बीच में हैं। इन तनावपूर्ण संबंधों को 'हठी राजनीति' के आधार पर सामान्य नहीं बनाया जा सकता। खासकर विदेशनीति के मामले में हठ नहीं चल सकता। विदेशनीति के तमाम चैनल और कोशिशें देशज दबावों और तनावों से मुक्त होकर ही सामान्य रुप में काम कर सकते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मनमोहन सरकार के जमाने में संघ का दबाव काम करता था और मोदी सरकार के जमाने में पाक के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के मामले में संघ का ही दबाव विदेशनीति पर असर डाल रहा है। मोदी सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे संघ के पाकविरोधी हठवाद से विदेशनीति को मुक्त रखे। संघ की मुश्किल है कि वह विदेशनीति के ऊपर दबाव बनाए रखने के चक्कर में देश-विदेश में पाकविरोधी मुहिम में तेजी बनाए रखता है।

यह सच है भारत को पाक प्रशिक्षित –संचालित आतंकी संगठनों से हमेशा खतरा बना रहता है और वे आए दिन जम्मू-कश्मीर में खासतौर पर हिंसक हरकतें करते रहते हैं। लेकिन इस बात को आधार बनाकर पाक से संबंध बिगाड़ना सही नहीं होगा। हमें पाक सरकार और पाक की जनता को आतंकियों से अलग करके देखना चाहिए। संघ की मुश्किल है कि वह पाक शासन,पाक जनता और आतंकी संगठनों एक साथ मिलाकर देखता है। सबके खिलाफ उन्मादी बयानबाजी करता रहता है, इससे भारत-पाक के बीच तनाव बना रहता है, मुसलमानों के प्रति घृणा बनी रहती है। मोदी सरकार ने अब तक पाक से बातचीत न करने का जो बहाना दिया है वह सही नहीं है,मोदी सरकार का कहना है पाक ने हुर्रियत कॉफ्रेस के नेताओं के मुलाकात करके सदभाव का माहौल तोड़ा है इसलिए बातचीत नहीं करेंगे। सच यह है जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनावों तक संघ, पाकविरोधी गरमी बनाए रखने के लिए विदेशनीति का दुरुपयोग कर रहा है, जिससे जम्मू-कश्मीर में वोटबैंक बनाया जा सके।

उल्लेखनीय है पाक स्थित आतंकी हाफिज सईद से वेदप्रताप वैदिक मिले तो संघ को कोई परेशानी नहीं हुई, पाक ने भी इस मुलाकात पर आपत्ति नहीं की,बल्कि उलटे सईद-वैदिक मुलाकात की पाक सरकार ने ही व्यवस्था करायी, सारा देश जानता है कि मोदी सरकार ने ही वैदिक सरकार को रहस्यमय मिशन के लिए पाक भेजा था। वैदिक के संघ के साथ मित्रतापूर्णसंबंध हैं,वे उनके जलसों में जाते रहे हैं। हम उम्मीद करते हैं जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव खत्म होते ही भारत-पाक बातचीत के लिए मोदीजी राजी होंगे।

पाकहठ के कारण संघ और उसका भोंपू मीडिया लगातार इस्लाम,पाक और मुसलमान इन तीनों के खिलाफ अहर्निश प्रौपेगैण्डा कर रहा है। इससे समूचा माहौल विषाक्त हो रहा है। विदेशनीति को घरेलू वोटबैंक के लिए और खासकर बहुसंख्यकवाद के आधार पर हिन्दुओं को गोलबंद करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। संघ को यदि सच में देशसेवा करनी है तो पाकहठ त्यागना होगा। पाक को स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र के रुप में सम्मान देकर बात करने की आदत डालनी होगी। पाक हठ से पाक को मदद मिल रही है भारत को नहीं। पाक को विश्व रंगमंच पर हम अलग-थलग नहीं कर पा रहे हैं।



दूसरी बात यह कि भारत के हित में है कि पाक में लोकतंत्र रहे और वहां काम करने वाली लोकतांत्रिक सरकार को हम समर्थन दें। पाक में लोकतंत्र का अभाव हमारे लिए और समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए खतरा है। पाक स्थित आतंकी संगठन लगातार पाक में लोकतंत्र के अभाव का दुरुपयोग करते रहे हैं। पाक में इस समय लोकतांत्रिक ढ़ंग से चुनी गयी सरकार है और पाक में लोकतंत्र के निर्माण की प्रक्रिया चल रही है जिसमें हमें लोकतांत्रिक शक्तियों का समर्थन करना चाहिए। मोदी सरकार ने पाकहठ के आधार पर पाक की लोकतांत्रिक सरकार से बातचीत बंद करके अप्रत्यक्षतौर पर पाक की अ-लोकतांत्रिक ताकतों का मनोबल ऊँचा उठाने का काम किया है। बेहतर यही होगा कि मोदी सरकार पाठ हठ छोड़े और पाक के प्रति अछूतभाव त्यागे।

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

नरेन्द्र मोदी का झूठ और कंगारू छलांगें

      प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पारदर्शित में मजे ही मजे हैं। पारदर्शिता में आनंद की भरमार का प्रधान कारण है उनका सामंती मिज़ाज़ । सामंत या राजा जब भी कहीं जाते थे तो अपने मोरंजन के साधन भी साथ ले जाते थे ,अथवा उनके लिए स्थानीय स्तर पर मनोरंजन मुहैय्या कराया जाता था। आजाद भारत के इतिहास में किसी भी प्रधानमंत्री के साथ मनोरंजन करनेवाले दल नहीं गए और नहीं विदेशों में कूटनीतिक कामों के बाद भारत और भारतीयों की ओर से कोई मनोरंजन का कार्यक्रम ही रखा गया। मोदी इस अर्थ में पक्के सामंत हैं कि उन्होंने अपने हिन्दू राष्ट्रवादी होने का बार-बार विदेश के मंचों पर प्रदर्शन किया है, हिन्दू पंडे-पुजारियों-संतों आदि से किसी न किसी बहाने मिलने या आशीर्वाद लेने का मौका दिया , यह उनके हिन्दू-राष्ट्रवादी प्रकल्प का अंग है,वे संविधान के अनुसार धर्मनिरपेक्ष आचरण न करके विदेश में धर्म-सापेक्ष आचरण कर रहे हैं,यह हम सबके लिए चिन्ता की बात है। प्रधानमंत्री के नाते उनका धर्मविशेष के प्रति आग्रह खतरनाक है। वे निजी तौर पर किसी भी धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन प्रधानमंत्री के रुप में उनको धर्म के प्रति तटस्थ रुख अपनाना चाहिए।
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ''मेक इन इंडिया'' नामक प्रचार के जरिए देश-विदेश के भारतीय और गैर- भारतीय पूंजीपतियों को पूंजी निवेश के लिए आमंत्रित किया है, लेकिन वे आचरण एकदम उलटा कर रहे हैं। अदानी ग्रुप को 1 विलियन ड़लर का कर्ज देकर उन्होंने ''मेक इन इंडिया'' प्रचार को बधिया कर दिया है,अदानी के आस्ट्रेलिया में 1विलियन ड़लर निवेश से भारत मजबूत नहीं होगा, भारत में रोजगार नहीं बढ़ेंगे,बल्कि इससे तो आस्ट्रेलिया में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और अदानी को बिना कोई पैसा खर्च किए मुनाफा कमाने का मौका मिलेगा। भारत सरकार जब ''मेक इन इंडिया'' का प्रचार कर रही है तो उसे कम से कम अपने देश के पूंजीपतियों को तो समझाना चाहिए कि वे भारत में निवेश करें। साथ ही विदेशों में निवेश के लिए इस मंदी के दौर में 1 विलियन डॉलर का अदानी को कर्ज मुहैय्या कराना तो घाटे का सौदा है। कम से कम अदानी की परियोजना के बारे में विशेषज्ञों की राय को तो बैंक कर्ज देते समय ध्यान रखता।
    सामंतों की आदत होती है वे अपने सेवकों पर हमेशा खूब मेहरबान रहते हैं,सेवकों को हर तरह खुश रखते हैं,भाड़ों की जय हो,जय हो, सुनकर गदगद रहते हैं। लोकतंत्र में यह अदानी के आस्ट्रेलियाई निवेश के बरक्स रखकर यह भी तो सोचें कि मोदीजी जब से सत्ता में आए हैं विदेश से एक पैसे का औद्योगिक पूंजी निवेश लेकर नहीं आए हैं , विदेशों से सिर्फ सट्टाबाजार में पैसा आ  रहा है अथवा बैंकों में जमा करके ब्याजखोरी के लिए पैसा आ रहा है।
     इस पूरे प्रसंग में उल्लेखनीय है कि अदानी आदि की सेवा कररने वाले मोदी इकलौते नेता नहीं हैं बल्कि कांग्रेस का भी इस मामले में कलंकित रिकॉर्ड रहा है। मनमोहन सरकार के दौर में गुजरात के समुद्र किनारे के ग्रामीण इलाकों को मात्र 25करोड़ में अदानी ने बिना किसानों की रजामंदी के सीधे सरकार के जरिए खरीद लिया और 25करोड़ की संपत्तिवाले इन गांवों के विकास के लिए भारत की बैंकों से 400करोड़ रुपये का कर्ज भी मनमोहन सरकार ने जारी करवा दिया। जबकि अदानी के द्वारा अवैध ढ़ंग से गांवों का अधिग्रहण किया गया था।

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

गऊमांस का सवाल और चरक संहिता


फेसबुक पर सक्रिय ''हिन्दू परंपरा ज्ञानी''मित्रों के लिए हम सुश्रुत रचित चरक संहिता से एक कहानी दे रहे हैं और यह कहानी बहुत कुछ कहती है।कहानी इस प्रकार है-
     
चरक संहिता में अतिसार यानी दस्त की बीमारी के प्रसंग में यह कहानी आई है- (अतिसार विषयक अग्निवेश की जिज्ञासा का उत्तर देते हुए भगवान पुनर्वसु आत्रेय कहते हैं कि हे अग्निवेश! सुनोः) आदिकाल में यज्ञों में पशु समालभनीय(यज्ञ में पशु आमंत्रित और पूजित करके छोड़ दिए जाते थे) होते थे किंतु यज्ञ में पशुओं का वध नहीं किया जाता था।इसके बाद दक्ष प्रजापति के बाद के समय में मनु के पुत्रों ने यज्ञों में पशुओं की हत्या करने की प्रथा शुरु की तथा पशुओं को आमंत्रित कर वधकिया जाने लगा ।पशुओं के वध की यह क्रिया वेदाज्ञा के अनुसार ही होती थी।इसके बाद के समय में राजा पृषध्र ने एक बहुत दिन चलने वाले यज्ञ का समारंभ किया। यज्ञ में निरंतर अन्य पशुओं का वध होता रहा।जब यज्ञ में बहुत अधिक पशुओं की हत्या हो जाने के कारण पशु नहीं मिलने लगे तो गौओं का वध आरंभ किया। यह देखकर जगत के प्राणी मात्र अत्यंत दुखी हुए।जब इन वध की गई गौओं का मांस खाया गया तो लोगों को अतिसार यानी दस्त की बीमारी हो गयी ।

सुश्रुत की चरक -संहिता में आहार के रुप में खाए जाने वाले पशु-पक्षियों की एक वर्गीकृत सूची दी गयी है और इसमें शामिल पशु-पक्षियों के आहार को स्वास्थ्यप्रद बताया गया है उस सूची में गौ मांस भी शामिल है। संदर्भ से यह भी पता चलता है कि हमारे आज के शिक्षित मध्ययवर्ग के फेसबुक भगवा बटुकों से सुश्रुत ज्यादा समझदार विद्वान थे। चरक संहिता में वर्णित गौ मांस सेवन के दो रुप हैं एक है आहार के रुप में और दूसरा है औषधि के रुप में।

चरक-संहिता के 'सूत्र स्थान' के सत्ताइसवें अध्याय में प्रसह पशु-पक्षी गण की सूची दी गयी है इस सूची में गाय भी शामिल है।जो प्राणी अपने भोजन को दूसरों से जबर्दस्ती छीनकर या फाड़कर खाते हैं उन्हें प्रसह-गण पशु-पक्षी की संज्ञा दी गयी है। ये हैं- गाय,गधा,ऊंट,घोड़ा,चीता,सिंह,भालू,बंदर,भेड़िया,बाघ,लकड़बग्घा,बिल्ली,कुत्ता,कौवा,बाज,गिद्ध आदि। इसके अलावा अन्यवर्ग के पशु-पक्षियों का भी उल्लेख है।ये हैं बिल में रहने वाले-तेरह जीव,दलदल में रहने वाले9जीव,जल में निवास करने वाले 10जीव,जल में चलने वाले 29जीव, इसके अलावा 17 जांगल पशु ,चोंच या पैर से कुरेदकर खाने वाले 19जीव ,इसके अलावा जो जीव चोंच या पैर से आघात करके आहार खाते हैं उनकी संख्या 30 बतायी गयी है। कुल मिलाकर आठ वर्गों में 156 पशु-पक्षियों की सूची सुश्रुत ने पेश की है जिनका मांस आहार के लिए उपयुक्त पाया गया है और इनमें से प्रत्येक के मास के बीमारी सम्बन्धी लाभों का भी जिक्र किया गया है। पोषक मांस आहार में गाय शामिल है।

चरक संहिता के अनुसार गौ मांस के विशिष्ट गुण क्या हैं ? आत्रेय के शब्दों में '' गौ मांस केवल वातजन्य रोगों में ,विषम ज्वर में,पीनस रोग में, सूखी खाँसी में,परिश्रमजन्य थकावट में,भस्मक रोग में और मांसक्षयजन्य रोगों में हितकारी होता है।'' इसके अलावा भी गौ मांस खाने अनेक फायदे चरक संहिता में गिनाए गए हैं। ये बातें लिखने का मकसद है हिन्दुत्ववादियों द्वारा किए जा रहे अनर्गल प्रचार का खण्डन करना। इस बात को रखने का मकसद गौमांस भक्षण को बढ़ावा देना नहीं है। हम यही चाहते हैं खान-पान के मामलों में न तो राजसत्ता और न राजनीतिक दल और न अन्य कोई हस्तक्षेप करे।खान-पान का मामला निजी मामला है और इस प्रसंग में स्वास्थ्यप्रद खान-पान को बढ़ावा देना चाहिए।



सोमवार, 29 सितंबर 2014

मेडिसन स्क्वेयर के चाक्षुष आनंद की मोदीधुन


        मोदी के भाषणों की सबसे बड़ी विशेषता है मेनीपुलेशन। मेनीपुलेशन के बिना वे भाषण नहीं देते। उनके भाषण की दूसरी विशेषता है फुटपाथशैली। इन दोनों शैलियों का मेडिसन स्केवयर गार्डन में दिए गए भाषण में उन्होंने जमकर इस्तेमाल किया।मसलन् मोदी ने कहा गांधीजी को 'आज़ादी' और 'सफ़ाई' ये दो चीज़ें पसंद थीं। सच यह है गांधीजी को आजादी और साम्प्रदायिक सद्भाव पसंद था। स्वच्छता उनकी राजनीतिक जंग का अंग ही नहीं था। अस्पृश्यता निवारण उनके लक्ष्यों में से एक जरुर था। सवाल यह है मोदीजी यह सब बताना भूल गए अथवा उनकी संघ बुद्धि ने बताने नहीं दिया ?
    मोदी का अपने हर अभियान में महात्मा गांधी का इस्तेमाल बताता है कि आनेवाले दिनों में महात्मा गांधी के विचारों का वे जमकर दुरुपयोग करेंगे । इतिहासकारों की यह जिम्मेदारी है कि इस मामले में सजगता दिखाएं। मोदी जिस तरह विचारधाराहीन महात्मा गांधी पेश कर रहे हैं,इसका इस्तेमाल कर रहे हैं वह भारत के लिए चिंता की बात है। मसलन् महात्मा गांधी का भारत आना,किसी आप्रवासी का भारत आना मात्र नहीं था,जैसाकि मोदी ने पेश किया।वे देश को साम्राज्यवाद की दासता से मुक्त कराने के लक्ष्य के लिए आए थे। मोदी की इतिहासबुद्धि किस तरह कचड़े से भरी है इसका यह नमूनामात्र है। भारत के प्रधानमंत्री का राष्ट्रपिता के विचारों का इस तरह का दुरुपयोग और उनके विचारों को तोड़-मरोड़कर पेश करना भारत की विश्व में इमेज को गिराने वाला है। इससे यह भी संदेश गया है कि मोदी ने महात्मा गांधी को न तो पढ़ा है और न सही रुप में समझा है। मीडिया के उन्मादी प्रचार अभियान के आड़ में भारत के राजनीतिक विचारों और लक्ष्यों के साथ किस तरह का मेनीपुलेशन चल रहा है उसकी ओर नजर रखने की जरुरत है। इसी प्रसंग में एक और उदाहरण लें,मोदी ने कहा मैं बहुत खुश होऊँगा यदि रोज एक कानून खारिज करके निकाला जाय़ । नव्य आर्थिक उदारीकरण की यह मूल मांग है कानूनों को धता बताओ।कानूनहीन लूट की व्यवस्था स्थापित करो। मनमोहन सिंह ने अपने तरीके से इस दिशा में बहुत कुछ ऐसा किया है जिसको 'क्रोनी कैपीटलिज्म'' के नाम से हम सब जानते हैं। कानूनहीन सरकार के फैसले कैसे होते हैं उसका आदर्श नमूना है कोयलाकांड! मोदी कानून निकालो का नारा देकर अपने विलायती आकाओं को खुश करने के साथ देशी आकाओं को भी खुश करने की कोशिश कर रहे थे,लेकिन कोयला खान आवंटन ने कानूनहीन शासन की पोल खोलकर रख दी है।
    कहने का अर्थ है मोदी अपने उन्मादी भाव में जो कुछ बोलते हैं उसका लक्ष्य सिस्टम बनाना नहीं है बल्कि उसका लक्ष्य है सिस्टम को तोड़ना। सिस्टम बनाने में समय लगता है तोड़ने में समय नहीं लगता। नव्य आर्थिक उदारीकरण की जन्मभूमि अमेरिका में 'कानून निकालो' का नारा ओबामा और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को खुश कर सकता है लेकिन हिन्दुस्तान की संघर्षशील जनता इस मनमानी की कभी इजाजत नहीं दे सकती। कानूनहीन शासन की मांग बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पुरानी मांग है। लेकिन देशभक्त जनता कानून का शासन,कानूनी व्यापार,कानूनी उद्योग आदि चाहती है।
     मोदी को मेडिसन स्क्वेयर में जो लोग बैठकर सुन रहे थे, वे मूलतःअमेरिकी नागरिक हैं।ये वे लोग हैं जो भारत से लाभ लेना चाहते हैं लेकिन भारत को इनसे कोई बड़ा लाभ अभी तक नहीं मिला है। ये वे लोग हैं जो वहां जाकर बस गए हैं।जलसे,मेले,इवेंट आदि इनकी दैनंदिन जिंदगी का अंग है। इनमें से अधिकांश देश के प्रति उत्सवधर्मीभाव रखते हैं। इस आयोजन के दौरान वे आनंद-उन्माद और कैमराभाव में डूबे हुए थे। उनके लिए न तो अमेरिका राष्ट्रगान और न भारतीय राष्ट्रगान अर्थपूर्ण था क्योंकि ऑडिएंस में सब अपने आनंद भाव की बार बार अभिव्यक्ति कर रहे थे। वे यह तक नहीं जानते कि राष्ट्रीय गान के समय किस मुद्रा में अपने भावों को प्रदर्शित करें। दर्शकों की इस तरह की उदासीनता से यह संदेश भी गया है आप्रवासी भारतीय अपने को राष्ट्रीयगान की गरिमा के अनुकूल भी अभी शिक्षित नहीं कर पाए हैं।उनकी फूहड़ता का आलम यह था कि राष्ट्रगान के बाद वे तालियां बजा रहे थे। मोदी को इस तरह की जनता में मजा आता है और यही फूहड़ जनता हर हर मोदी में मगन है।  
     मोदी की फुटपाथी विक्रयशैली के लिए देश और उसके लोग माल हैं। देश बिकाऊ है। मोदी ने जिन तीन चीजों को भारत की शक्ति के रुप में पेश किया वह उनके फुटपाथी नजरिए को दरशाता है । मोदी के अनुसार भारत के पास ३ चीज़ें हैं ,ये हैं- १. लोकतंत्र, २. डेमोग्राफिक डिवीडेंट ३.डिमांड ,ये तीनों शक्तियाँ आज कहीं नहीं है। भारत को इस तरह माल में रुपान्तरित करके पेश करना भारत का अपमान है।भारत सप्लायर देश नहीं है। हमें भारत को सप्लायर देश की मानसिकता से बाहर निकालना होगा। सप्लायर देश की बजाय उत्पादक देश के रुप में इमेज पेश करनी चाहिए। मोदी भूल गए कि चीन की आबादी भारत से ज्यादा है और ये तीनों चीजें वहां पर भी हैं लेकिन वे अपने देश की छवि सप्लायर के रुप में पेश नहीं करते। श्रमिक सप्लायर की दृष्टि देशज दृष्टि नहीं है। मोदी यह ध्यान रखें  सस्ता श्रम और सस्ता श्रमिक लोकतंत्र को पुख्ता नहीं बनाते। लोकतंत्र पुख्ता तब बनता है जब श्रमिकों को बेहतर पगार मिले।सस्ता श्रम और सस्ता श्रमिक देश में तानाशाही को पुख्ता बनाते हैं। यह सच है  मेडिसन स्क्वेयर में अनेक सेनेटर आए और यह उनकी भारत के प्रति गहरी मित्रता की निशानी है।लेकिन इस कार्यक्रम के आयोजकों ने मंचपर प्रस्तुत विभिन्न कार्यक्रमों में सिर्फ भारत का ही झ़डा फहराया ,कायदे से दोनों देशों के झ़डे रहते तो अच्छा होता।इससे अंध राष्ट्रवादी भावों को अभिव्यक्ति मिली।इसी अंध राष्ट्रवादी भावबोध का परिणाम था कि आजतक टीवी चैनल के राजदीप सरदेसाई पर कुछ उन्मादियों के हमला करके उनकी जुबान बंद करने की कोशिश की।
     मोदी के मेडिसन स्क्वेयर इवेंट का अमेरिकी नीति पर कोई असर नहीं पड़ेगा।इसका प्रधान कारण है कि अमेरिकी प्रशासन नियोजित इवेंट,नियोजित मीडिया उन्माद और नियोजित भीड़ की राजनीति का अभ्यस्त है। वे जानते हैं कि इसमें स्वतःस्फूर्त कुछ भी नहीं है। भुगतान के आधार पर जुटायी जनता और राजनीति का क्षणिक चाक्षुष आनंद होता है।इससे ज्यादा उसकी अहमियत नहीं होती।





शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

मुसलमानों की हिमायत में

        आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने मुसलमानों के खिलाफ जिस तरह प्रचार आरंभ किया है उसे देखते हुए सामयिक तौर पर मुसलमानों की इमेज की रक्षा के लिए सभी भारतवासियों को सामने आना चाहिए। मुसलमानों को देशद्रोही और आतंकी करार देने में इन दिनों मीडिया का एक वर्ग भी सक्रिय हो उठा है,ऐसे में मुसलमानों की भूमिका को जोरदार ढ़ंग से सामने लाने की जरुरत है। सबसे पहली बात यह कि भारत के अधिकांश मुसलमान लोकतांत्रिक हैं और देशभक्त हैं। वे किसी भी किस्म की साम्प्रदायिक राजनीति का अंग नहीं रहे हैं। चाहे वह मुस्लिम साम्प्रदायिकता ही क्यों न हो। भारत के मुसलमानों ने आजादी के पहले और बाद में मिलकर देश के निर्माण में बड़ी भूमिका निभायी है और उनके योगदान की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।

भारतीय मुसलमानों के बारे में जिस तरह का स्टीरियोटाइप प्रचार अभियान मीडिया ने आरंभ किया है कि मुसलमान कट्टरपंथी होते हैं,अनुदार होते हैं,नवाजी होते हैं,गऊ का मांस खाते हैं,हिन्दुओं से नफरत करते हैं,चार शादी करते हैं,आतंकी या माफिया गतिविधियां करते हैं।इस तरह के स्टीरियोटाइप प्रचार जरिए मुसलमान को भारत मुख्यधारा से भिन्न दरशाने की कोशिशें की जाती हैं।जबकि सच यह है मुसलमानों या हिन्दुओं को स्टीरियोटाइप के आधार पर समझ ही नहीं सकते। हिन्दू का मतलब संघी नहीं होता।संघ की हिन्दुत्व की अवधारणा अधिकांश हिन्दू नहीं मानते।भारत के अधिकांश हिन्दू- मुसलमान कुल मिलाकर भारत के संविधान के द्वारा परिभाषित संस्कृति और सभ्यता के दायरे में रहते हैं और उसके आधार पर दैनंदिन आचरण करते हैं।अधिकांश मुसलमानों की सबसे बड़ी किताब भारत का संविधान है और उस संविधान में जो हक उनके लिए तय किए गए हैं उनका वे उपयोग करते हैं।हमारा संविधान किसी भी समुदाय को कट्टरपंथी होने की अनुमति नहीं देता। भारत का संविधान मानने के कारण सभी भारतवासियों को उदारतावादी मूल्यों,संस्कारों और आदतों का विकास करना पड़ता है।

समाज में हिन्दू का संसार गीता या मनुस्मृति से संचालित नहीं होता बल्कि भारत के संविधान से संचालित होता है। उसी तरह मुसलमानों के जीवन के निर्धारक तत्व के रुप में भारत के संविधान की निर्णायक भूमिका। भारत में किसी भी विचारधारा की सरकार आए या जाए उससे भारत की प्रकृति तय नहीं होती,भारत की प्रकृति तो संविधान तय करता है। यह धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक देश है और इसके सभी बाशिंदे धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक हैं।संविधान में धार्मिक पहचान गौण है, नागरिक की पहचान प्रमुख है।इस नजरिए से मुसलमान नागरिक पहले हैं ,धार्मिक बाद में ।आरएसएस देश का ऐसा एकमात्र बड़ा संगठन है जिसकी स्वाधीनता संग्राम में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रही,यह अकेला ऐसा संगठन है जिसके किसी बड़े नेता को साम्प्रदायिक-आतंकी-पृथकतावादी हमले का शिकार नहीं होना पड़ा। उलटे इसकी विचारधारा के भारत की धर्मनिरपेक्ष -लोकतांत्रिक संस्कृति और सभ्यता विमर्र्श पर गहरे नकारात्मक असर देखे गए हैं। इसके विपरीत भारत के मुसलमानों ने अनेक विपरीत परिस्थितियों में रहकर भी भारत के स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अनेक मुसलिम नेताओं ने कम्युनिस्ट आंदोलन और क्रांतिकारी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी । ब्रिटिशशासन के खिलाफ मुसलमानों की देशभक्तिपूर्ण भूमिका को हमें हमेशा याद रखना चाहिए। मसलन्, रौलट एक्ट विरोधी आंदोलन और जलियांवालाबाग कांड में 70 से अधिक देशभक्त मुसलमान शहीद हुए। इनकी शहादत को हम कैसे भूल सकते हैं।आरएसएस के प्रचार अभियान में मुसलमानों को जब भी निशाना बनाया जाता है तो उनकी देशभक्ति और कुर्बानी की बातें नहीं बतायी जाती हैं।हमारे अनेक सुधीजन फेसबुक पर उनके प्रचार के रोज शिकार हो रहे हैं। ऐसे लोगों को हम यही कहना चाहेंगे कि मुसलमानों के खिलाफ फेसबुक पर लिखने से पहले थोड़ा लाइब्रेरी जाकर इतिहास का ज्ञान भी प्राप्त कर लें तो शासद मुसलमानों के प्रति फैलायी जा रही नफरत से इस देश को बचा सकेंगे।

    आरएसएस के लोगों से सवाल किया जाना चाहिए कि उनको देश के लिए कुर्बानी देने से किसने रोका था ?स्वाधीनता संग्राम में उनके कितने सदस्य शहीद हुए ? इसकी तुलना में यह भी देखें कितने मुसलमान नेता-कार्यकर्ता शहीद हुए ? देशप्रेम का मतलब हिन्दू-हिन्दू करना नहीं है। हिन्दू इस देश में रहते हैं तो उनकी रक्षा और विकास के लिए अंग्रेजों से मुक्ति और उसके लिए कुर्बानी की भावना आरएसएस के लोगों में क्यों नहीं थी ?जबकि अन्य उदार-क्रांतिकारी लोग जो हिन्दू परिवारों से आते थे, बढ़-चढ़कर कुर्बानियां दे रहे थे, शहीद हो रहे थे।संघ उस दौर में क्या कर रहा था ? यही कहना चाहते हैं संघ कम से कम कुर्बानी नहीं दे रहा था। दूसरी ओर सन् 1930-32 के नागरिक अवज्ञा आंदोलन में कम से कम 43मुसलमान नेता-कार्यकर्ता विभिन्न इलाकों में संघर्ष के दौरान पुलिस की गोलियों से घायल हुए और बाद में शहीद हुए। सवाल यह है संघ इस दौर में कहां सोया हुआ था ?

     कायदे से भारत के शहीद और क्रांतिकारी मुसलमानों की भूमिका को व्यापक रुप में उभारा गया होता तो आज नौबत ही न आती कि आरएसएस अपने मुस्लिम विरोधी मकसद में सफल हो जाता। मुसलमानों के प्रति वैमनस्य और भेदभावपूर्ण रवैय्ये को बल इसलिए भी मिला कि आजादी के बाद सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने मुसलमानों की जमकर उपेक्षा की।इस उपेक्षा को सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में साफ देख सकते हैं। संघ के प्रचार का कांग्रेस पर दबाव रहा है और कांग्रेस ने कभी मुसलमानों को लेकर दो-टूक रवैय्या नहीं अपनाया। इसका ही यह परिणाम है कि मुसलमान हाशिए पर हैं। संघ ने मुस्लिम तुष्टीकरण का झूठा हल्ला मचाकर कांग्रेस को मुसलमानों के हितों की उपेक्षा करने के लिए मजबूर किया और कांग्रेस ने संघ को जबाव देने के चक्कर में नरम हिन्दुत्व की दिशा ग्रहण की और इसका सबसे ज्यादा खामियाजा मुसलमानों को उठाना पड़ा।

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

'गुरु' के नए 'कू-भाषी' कॉमेडियन


        बेवकूफियों से हास्य पैदा करना,ऊल-जलूल बातों से हास्य पैदा करना, कपिल के कॉमेडी शो की खूबी है। इस कार्यक्रम से बबूल संघ ,उसके साइबर बटुक और मोदी सरकार बहुत प्रभावित है। वे कपिल के कॉमेडी शो को भारत का राजनीतिक कंटेंट बना रहे हैं। देश के हर जलसे,दिवस,नायक,अच्छे नाम,अच्छे गुण आदि को राजनीतिक 'कू-भाषा' से अपदस्थ कर रहे हैं। वे हर अच्छे दिन और अच्छे त्यागी पुरुष को टीवी इवेंट बना रहे हैं ! 'कू' कर रहे हैं।। इस 'कू -कल्चर' के नए नायक इन दिनों टीवी टॉक शो पर आए दिन दिख जाएंगे। फेसबुक में दिख जाएंगे!   कपिल के कॉमेडी शो की खूबी है ' कू-भाषा' का हास्य के लिए दुरुपयोग ,वहां हास्य कम और 'कू-भाषा' का दुरुपयोग ज्यादा होता है और यही भाषिक दुरुपयोग सांस्कृतिक भ्रष्टाचार की नई खाद है और इससे आमलोगों में भाषायी कुरुपता पैदा होती। 'कू-भाषा' की संस्कृति का विस्तार होता है।नव्य-आर्थिक उदारीकरण ने सारी दुनिया में 'कू-भाषा' को नए-नए रुपों में प्रसारित किया है।इसके भाषिक प्रयोगों को हम आए दिन युवाओं से लेकर फेसबुक तक देख सकते हैं। 'कू-भाषा' का नया प्रयोग है 'शेल्फी'!

कपिल के कॉमेडी शो का मूलाधार है 'कू-भाषा'। यही वह बिंदु है जहां पर बबूल संघ का कपिल शो के साथ मेल बैठता है। संघ की दीर्घकालिक सांस्कृतिक रणनीति है भारत को सांस्कृतिक रुप से विद्रूप बनाओ। भाषा ,व्यवहार और राजनीति में अंतर पैदा करो। विलोम की सृष्टि करो। जिस भाषा को बोलो,जिस नायक की जय-जयकार करो उसके कंटेट को पूरी तरह बदलो ! यह काम वे पहले छोटे स्केल पर करते थे, अपनी गोष्ठियों-सभाओं-शाखाओं में करते थे लेकिन इधर के वर्षों में वे बृहत्तर तौर पर करने लगे हैं। राजनीतिक एजेण्डे के तौर पर,साइबर एजेण्डे के तौर पर,टीवी टॉकशो के तौर पर,मंत्रालय के कार्यक्रम के अंग के तौर पर कर रहे हैं,इसलिए संस्कृति में वे 'कू' कर रहे हैं और इसके लिए 'कू-भाषा' और केरीकेचर की शैली का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका नया 'कू' है 'गुरु दिवस' मनाओ का नारा। बबूल संघ की सांस्कृतिक हेकड़ी का आलम यह है कि वे अपनी 'कू-भाषा'की आलोचना सुनने को तैयार नहीं होते, जो आलोचना करता है उस पर निजी हमले आरंभ कर देते हैं।मसलन् आपने कहा कि शिक्षक दिवस को 'गुरु दिवस' कहना सही नहीं है तो पलटकर हमला शुरु ! क्या तुम्हारा कोई गुरु नहीं है ? क्या राहुल ने मनमोहन सिंह को 'गुरु' नहीं कहा! गांधीजी ने 'गुरु' नहीं कहा ! 'गुरु' कहना और 'गुरु' मानना और 'गुरु' के अनुरुप या बतायी दिशा में आचरण करना एकदम भिन्न चीजें हैं। जब आप किसी को गुरु कहते हैं तो यह आपका निजी मामला है। लेकिन ज्योंही इसे सार्वजनिक करते हैं तो 'गुरु' का मामला निजी नहीं रह जाता,'गुरु' निजी नहीं रह जाता। 'गुरु' सार्वजनिक मूल्यांकन के दायरे में आ जाता है।लेकिन बबूल संघ और मोदी सरकार की ज्ञानी 'गुरु' में नहीं ,फिल्मी 'गुरु' में दिलचस्पी है! आप सब जानते हैं फिल्मों में कई किस्म के 'गुरु' चित्रित हुए हैं। इनका गुरु ज्ञान का प्रतीक नहीं है बल्कि इनका 'गुरु' तो उन सभी लक्ष्यों को समर्पित है जिनको 'गुरु गोलवलकर' बता गए हैं। इनके नए गुरु तो 'जन-संपर्क विशेषज्ञ' हैं जो बता रहे हैं कि भाषा में उलझाओ,भाषिक पदबंधों में सांस्कृतिक उत्पाद मचाओ। भाषिक उपद्रव यानी 'कू-भाषा' से मीडिया कवरेज बनाने में मदद मिलती है,वाक्य को इवेंट बनाने में मदद मिलती है। इसलिए बबूल संघ को आदित्यनाथ से लेकर तोगड़िया,मोदी से लेकर साइबर बटुक जैसी मीडिया इवेंट या हेडलाइन बनाने वाली भाषा चाहिए। वे भाषिक प्रयोगों के जरिए सांस्कृतिक 'कू' करने में लगे हैं। उनकी दिलचस्पी संस्कृति को अपदस्थ करने में हैं।

शनिवार, 9 अगस्त 2014

यूपी में अफवाह का तूफान और फासिस्टों की नई रणनीति

     फेसबुक से लेकर राजनीति तक बेवकूफी का नया तूफान चल रहा है । शिक्षित मध्यवर्ग के लोगों का एक हिस्सा सरेआम बेवकूफियां कर रहा है और मीडिया उसे कवरेज भी दे रहा है । बेवकूफी के इस नए तूफान का केन्द्र इन दिनों पश्चिमी उत्तरप्रदेश है ।
यूपी में कुछ भी हो या घटे ,तुरंत अफवाहें आरंभ हो जाती हैं। अफवाहों के दबाव के कारण आमलोग विवेक-कानून की बात सुनने को तैयार नहीं हैं । घटना हुई कि बेवकूफों फौज अपने –अपने घरों से निकल पड़ती है और 'मार साला को' हल्ला बचाना शुरु कर देती है। अविवेकवाद की यूपी में जिस तरह की आंधी चल रही है ऐसी आंधी पहले कभी नहीं देखी गयी। कई महिने हो गए लेकिन आंधी थमने का नाम नहीं ले रही ।
मसलन् कोई अपराध हुआ है कि हल्ला शुरु हो जाता है, उसके बाद किसी भी तर्क को लोग सुनने को तैयार नहीं होते । वे सिर्फ अफवाह सुनना चाहते हैं। उनके पास हर घटना के अपने तर्क,निष्कर्ष और फैसले होते हैं, ये लोग अपने तर्कों के आधार पर मीडिया कवरेज चाहते हैं, फेसबुक लेखन कर रहे हैं,जनता को भड़का रहे हैं, पुलिस को गरिया रहे हैं । इसके आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण कर रहे हैं ।
पहले कभी- कभार कोई घटना होती थी और एक-दो दिन में शांत हो जाती थी। लेकिन नया फिनोमिना यह है कि अफवाहें शांत नहीं हो रहीं ,अफवाहों के कारखाने चल रहे हैं और बेवकूफों की फौज इसमें अहर्निश श्रम कर रही है । यह खतरनाक स्थिति है । हमें सावधान होना होगा वरना बाद में पछताएंगे ।
यदि कोई घटना घटे तो निजी आग्रहों और निष्कर्षों के आधार पर भड़काऊ बातें लिखना,अफवाह लिखना बंद करें । उससे सामाजिक घृणा बढ़ रही है । अफवाह असभ्य बनाती है,आदिम बनाती है ।
कलम और दिमाग में ताकत है तो कोई सकारात्मक काम करो, बुरा ही काम करना है तो अनेक बुरे अवैध -धंधे हैं वे चुन लो,लेकिन अफवाह फैलाना या घृणा का लेखन बंद होना चाहिए।
खासकर संघ परिवार से जुड़े लोग इस दिशा में गंभीरता से सोचें वरना जान लें जनता को भड़काकर लाभ तो उठा सकते हैं ।लेकिन विनाश तय है । हिटलर का पराभव याद करो और जितना जल्दी हो रास्ता बदलो वरना पराभव तय है । त्रासदी यह है कि तब तक समूचा भारत नरक कुंड में डूब जाएगा, और भारत की नई पीढ़ी घृणा और तिरस्कार में डूब चुकी होगी ।
हो सकता है मेरठ में बलात्कार पीड़िता जो कह रही है वह सही हो ,यह भी हो सकता है कि गलत हो, लेकिन यह तय कौन करेगा ? न्यायालय को जनोन्माद और मीडिया उन्माद पैदा करके दबाव में लाने की रणनीति बंद होनी चाहिए ।
संघ की रणनीति है कि वह पहले अफवाह पैदा करो, फिर अफवाह पर भरोसा करो.फिर उसे प्रचार अभियान में रुपान्तरित करो । कहीं पर भी कोई भी घटना घटे ,संघ के लोग तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। वे तथ्यों और सत्य के आने का इंतजार नहीं करते । उनके पास तयशुदा रणनीति है और लोग हैं ,जिनका काम ही है अफवाह बनाना ।
अफवाहें स्वतःस्फूर्त नहीं होतीं, वे निर्मित की जाती हैं और उन्हें संघ के संगठनों के जरिए वितरित किया जाता है । इसके बाद मीडिया दुरुपयोग के जरिए अफवाह को वैध बनाया जाता है । फलतःआमलोग और प्रशासन समझ ही नहीं पाता कि वह क्या करे, अफवाहों से लड़े या घटना पर काम करे ।
अफवाहें असल में पीड़ित को न्याय से वंचित करती हैं। अफवाहें न्यायबुद्धि और मीडियाबुद्धि को प्रभावित करती हैं । अफवाहें तो सभी माध्यमों की सरताज हैं,बस जरुरत इस बात की है कि आपके पास अफवाह को प्रचारित करने वाला सांगठनिक नेटवर्क हो।
मंदिर आंदोलन के समय से रणनीति रही है अफवाहों के आधार पर पहले जनता को इकट्ठा करो, मीडिया को इकट्ठा करो,फिर हिंसाचार करो या घृणा अभियान चलाओ,इसका परिणाम यह हुआ है कि आमलोगों में सच जानने की इच्छा ही खत्म हो गयी है। आमलोग सच से कोसों दूर कर दिए गए हैं ।
अब वही 'सत्य' है जो अफवाहों से पुष्ट है, उसमें ही हम मजा लेने लगे हैं,बदला लेने लगे हैं,न्याय करने लगे हैं,अफवाहों के आधार पर ही तर्क करने लगे हैं ।
भारत में नागरिकचेतना और नागरिक अधिकारों के लिए अफवाहें सबसे बड़ा खतरा है। अफवाह तो लोकतंत्र का विलोम है,लोकतंत्र में सत्य महत्वपूर्ण है,अफवाह के लिए सत्य अप्रासंगिक है,लोकतंत्र के लिए विवेकवाद महत्वपूर्ण है ,अफवाह के लिए विवेक की नहीं ,जो कहा-सुना जा रहा है उसे मानो,अनुकरण करो। अफवाह का आधार है सामाजिकभेद,लिंगभेद और सामाजिक घृणा , जबकि लोकतंत्र में सामाजिक घृणा के लिए कोई जगह नहीं है। समग्रता में देखें तो अफवाह तो लोकतंत्र के लिए जहर है। नागरिक बनें और अफवाहों का तुरंत जमीनी स्तर पर जबाव दें ।

रविवार, 8 जून 2014

मोदी सरकार के हिन्दीप्रेम के खतरे और सीमाएं

       लेखकों-बुद्धिजीवियों में एक बड़ा तबका है जो हिन्दी के नाम पर सरकारी मलाई खाता रहा है। इनमें वे लोग भी हैं जो कहने को वाम हैं,इनमें वे भी हैं जो सोशलिस्ट हैं,ये सब मोदी के हिन्दीप्रेम के बहाने सरकारी मलाई के आनंद-विनोद में' मोदी ही हिन्दी है और हिन्दी ही मोदी है' ,कहकर मोदी के हिन्दीराग में शामिल होने जा रहे हैं।

सब जानते हैं कि मोदी को हिन्दी से कोई लगाव नहीं है। संघ को भी हिन्दी से कोई खास लेना-देना नहीं है। अधिकांश समर्थ संघियों के बच्चे कान्वेंट स्कूलों में पढ़ने जाते हैं। संघ और उनके नेताओं के लिए हिन्दी का जनता के सामने प्रतीकात्मक महत्व है। हिन्दी उनके हिन्दू राष्ट्रवाद के पैकेज का हिस्सा है। अब इस राष्ट्रवाद को विकास के नाम से बेचा जारहा है। यहां सोवियत अनुभव को समझने की जरुरत है।

सोवियत संघ आज अनेक देशों में विभाजित हो चुका है। इस विभाजन के अनेक कारणों की चर्चा हुई है। लेकिन एक कारण की ओर कम ध्यान गया है। सोवियत संघ में स्टालिन के जमाने में समूचे देश में रुसी भाषा कोअन्य जातियों पर थोपा गया और अन्य जातीय भाषाओं की उपेक्षा की गयी। इसके कारण अंदर ही अंदर भाषायी तनाव बना रहा। हमारे बहुत सारे विचारक यह मान रहे थे कि सोवियत संघ में जातीय समस्या हल कर ली गयी है। लेकिन असल में रुसीभाषा को सभी जातीयताओं पर थोपकर जो क्षति अन्य भाषाओं की हुई उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया। भारत में आजादी मिलने के बाद यह समस्या सामने आई कि देश किस भाषा में काम करे और केन्द्र किस भाषा में काम करे। इसका समाधान त्रिभाषा फार्मूले के आधार पर निकाला गया। मोदी सरकार यदि त्रिभाषा फार्मूले को नहीं मानती है तो उसे पहले संसद में जाकर त्रिभाषा फार्मूले का विकल्प पेश करके पास कराके लाना चाहिए।

नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने दफ्तर के सभी काम हिन्दी में करने का फैसला लिया है। यह हिंदीप्रेमी के नाते स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन इसके राजनीतिक परिणामों पर भी हमें नजर रखनी होगी। रुसीभाषा के दुष्परिणामों को सोवियत संघ भोग चुका है और कई देशों में विभाजित हो चुका है। प्रधानमंत्री कार्यालय के कामकाज की हिन्दी यदि मुख्यभाषा होगी तो फिर देश की अन्यभाषाओं का क्या होगा ?उन गैर हिंदीभाषाओं का क्या होगा जिनके लोगों ने भाजपा और उनके सहयोगियों को वोट दिया है?

सवाल यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय में हिन्दी में कामकाज पर मुख्यबल देने के पीछे राजनीतिक मकसद क्या है ? प्रधानमंत्री कार्यालय कोई व्यक्तिगत दफ्तर नहीं है। यह मोदीजी का निजी दफ्तर भी नहीं है। यह प्रधानमंत्री कार्यालय है। किस भाषा में काम होगा या होना चाहिए यह प्रचार की नहीं व्यवहार की चीज है।नीति की चीज है। यदि हिन्दी में काम होता है तो यह जरुरी है कि गैर हिन्दीभाषी राज्यों के साथ प्रधानमंत्री का पत्राचार उनकी भाषा में ही हो। सिर्फ हिंदी में नहीं।

मसलन् प्रधानमंत्री की कोई चिट्ठी आंध्र या तमिलनाडु के मुख्यमंत्री को भेजी जानी है तो वह संबंधित मुख्यमंत्रियों की भाषा में जाए तब तो भाषाओं के बीच में समानता पैदा होगी। लेकिन यदि पत्र हिंदी में जाएगा तो तनाव पैदा होगा। देश में विभाजन के स्वर मुखर होंगे। फिलहाल मीडिया में जिस तरह प्रधानमंत्री कार्यालय की कामकाजी भाषा हिंदी किए जाने की खबरें जारी की गयी हैं उसमें बहुसंख्यकवाद के भाषायी मॉडल के लक्षण अभिव्यंजित हो रहे हैं। बहुसंख्यकवाद और हिंदी एक-दूसरे के सहज ही जुडवां भाई भी बन जाते हैं और वह सहज ही अपने आप में विभाजनकारी दिशा ग्रहण कर सकते हैं।हम चाहते हैं कि मोदी सरकार पहले यह तय करे कि वह त्रिभाषा फार्मूले को मानती है या नहीं,भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में इस बावत कुछ भी साफ नहीं है। मोदी सरकार यदि त्रिभाषानीति को नहीं मानती तो नया विकल्प सुझाए देश में आम राय बनाए।

मोदीभक्त प्रतीकों और उन्मादी तर्कों के जरिए हिन्दी भाषा को लेकर सतही बहसों को उछाल रहे हैं। हिन्दी पर बातें विद्वानों के आप्तवचनों के जरिए न करके व्यवहार में देखकर करें।मोदीभक्त नेट पर भाषा के सवाल को नेता की अभिव्यक्ति की भाषा का सवाल बनाकर पेश कर रहे हैं।

भाषा का सवाल नेता की अभिव्यक्ति का सवाल नहीं है। भाषा हमारे सामाजिक जीवन की प्राणवायु है।नेता किस भाषा में बोलते हैं, आईएएस किस भाषा में बोलते हैं, इससे भाषा समृद्ध नहीं होती। भाषा समृद्ध होती है तब जब उसकी शिक्षा लेते हैं। हिन्दी की दशा सबसे ज्यादा हिन्दीभाषी राज्यों में खराब है।सबसे खराब ढांचा है शिक्षा-दीक्षा का।

देश को कौन चला रहा है ? व्यापारी या बाजार की शक्तियां चला रही हैं या केन्द्र सरकार ? कमाल के तर्कशास्त्री हिंदी में ।वे मोदी से हिंदी के उत्थान की उम्मीद कर रहे हैं।

मित्रो !पहले देश के व्यापारियों को खासकर हिन्दी व्यापारियों को हिन्दी में व्यापार के खाते-बही लिखने के लिए राजी करलो। इन व्यापारियों में बहुत बड़ा हिस्सा भाजपा का लंबे समय से वोटर भी है।

हिन्दी राष्ट्रोन्माद पैदा करने की भाषा नहीं है। यह दैनंदिन जीवन की भाषा है। लेकिन हिन्दीभाषी व्यापारी लंबे समय से हिन्दी में काम करना बंद कर चुके हैं। कब से उन लोगों ने हिन्दी में काम करना बंद किया यह पता करें। क्यों बंद किया यह भी पता करें। हिंदी का सबसे पहले बाजार की शक्तियों के बीच में व्यवहार होना चाहिए। व्यापारी के कामकाज में व्यवहार होना चाहिए। पता करें जिस दुकान से सामान खरीद रहे हैं उसका बिल किस भाषा में है ?

सवाल यह है व्यापारियों ने अपनी भाषा में काम करना क्यों बंद कर दिया? कारपोरेट घराने नौकरी के लिए देशजभाषाओं की उपेक्षा क्यों करते हैं ? क्या यहां पर देशभक्ति की मांग करना नाजायज है?

ध्यान रहे पूंजीवाद भाषाओं का शत्रु है। पूंजीपतिवर्ग का देशज भाषाओं के साथ बैर है।ऐसे में कारपोरेट घरानों के नुमाइंदे चाहे मोदी हों या मनमोहन हों, इनसे देशजभाषाओं की रक्षा की उम्मीद करना बेमानी है। भाषा उनके लिए प्रतीकात्मक कम्युनिकेशन से ज्यादा महत्व नहीं रखती।

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

नरेन्द्र मोदी,विकास और फेसबुक

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गुजरात विधानसभा चुनाव के बारे में हाल ही में जो परिणाम पूर्व सर्वे आए हैं उनमें भाजपा फिर से सरकार बनाने जा रही है। लोकतंत्र में एकतंत्र का यह परिणाम है। इस तरह के परिणाम एक जमाने में पश्चिम बंगाल से वाम मोर्चे की जीत के छहबार आए हैं। मोदी ने सांगठनिक तौर पर गुजरात में माकपा के मॉडल को लागू किया है और विपक्ष को बेकार करके रख दिया है।

यही स्थिति एक जमाने में पश्चिम बंगाल में 1977से 2009 तक वाममोर्चे की भी रही है।

मोदीतंत्र मूलतःदलतंत्र है इसमें लोकतंत्र नहीं बिकता,दलीय वर्चस्व बिकता है। जो लोग सोच रहे हैं मोदी ठीक कर रहे हैं ,विकास कर रहे हैं वे मुगालते में हैं। यह भ्रम टूटेगा लेकिन कुछ समय लेगा।

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गरीबी में आई कमी के आधार पर गुजरात 20 राज्यों की सूची में 10वें पायदान पर है।

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सेंटर फॉर डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स के निदेशक और अर्थशास्त्र की प्राध्यापक इंदिरा हीरवे कहती हैं, 'गरीबी का स्तर कम हुआ है लेकिन शहरी क्षेत्रों में जहां 43 फीसदी आबादी रहती है, वहां गरीब उन्मूलन की रफ्तार सुस्त हुई है।' उनका कहना है कि गुजरात में गरीबी में आई कमी दूसरे प्रतिस्पर्धी राज्यों की तुलना में काफी कम है।

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मोदी प्रशंसक ध्यान दें- गुजरात मजदूरी और इसमें बढ़ोतरी के मामले में 20 बड़े राज्यों में क्रमश: 14वें और 15वें स्थान पर आता है जो संपन्न और विपन्न लोगों के बीच बढ़ती दूरी को दर्शाता है।

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मोदी के शासन में शिक्षा क्षेत्र में किस तरह की तबाही चल रही है इस पर बिजनेस स्टैंडर्ड ने एक गैर सरकारी संगठन के सर्वे के हवाले से चौंकाने वाली बातें कही हैं।

एक गैर सरकारी संगठन प्रथम के मुताबिक ग्रामीण गुजरात में करीब 95 फीसदी बच्चे विद्यालयों में पंजीकृत हैं लेकिन ज्ञान का स्तर काफी कम है। पांचवीं कक्षा में पढऩे वाले करीब 55 फीसदी बच्चे दूसरी कक्षा के पाठ्यक्रम नहीं पढ़ पाते हैं। लगभग 65 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जो गणित के सामान्य जोड़ घटाव भी नहीं कर पाते हैं।

बहुत सारे लोगों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक शराब पीकर आते हैं और ताश खेलते हैं। बारिया में बच्चों के लिए साल में 24 दिन का शिविर चलाने वाली हार्डीकर कहती हैं कि पांचवीं कक्षा के बच्चे अक्षर भी नहीं पहचान पाते हैं। उच्च शिक्षा की स्थिति के बारे में अर्थशास्त्री वाई के अलघ कहते हैं कि इसकी हालत भी खस्ता है। अहमदाबाद के समाज विज्ञानियों के मुताबिक ज्यादातर कॉलेज और विश्वविद्यालय ठगों और नाकाम प्रशासकों द्वारा चलाए जा रहे हैं। तकनीकी कॉलेजों में ही थोड़ी बहुत क्षमता है।

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मोदी के विकास के मॉडल की जो लोग प्रशंसा करते हैं वे जरा इस सत्य को भी देखें कि स्वास्थ्यसेवाओं का क्या हाल है। बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार स्वास्थ्य के क्षेत्र में 96 गांवों को सेवाएं देने वाले राज्य द्वारा संचालित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पिछले सात साल से किसी बाल रोग विशेषज्ञ और स्त्री प्रसूति विशेषज्ञ चिकित्सक की तैनाती नहीं हुई है। बारिया स्थित इस प्रसूति गृह में खून चढ़ाने और नवजात शिशुओं की देखभाल की कोई व्यवस्था नहीं है। इस अस्पताल में ऐनेस्थिसिया विशेषज्ञ भी नहीं है। सबसे नजदीकी कस्बा गोधरा है जो 40 किमी दूर है और जरूरत के वक्त लोगों के पास यही विकल्प बचता है। खास बात यह है कि राज्य अस्पताल में भी स्त्री प्रसूति विशेषज्ञ की व्यवस्था नहीं है। शिक्षा क्षेत्र में भी हालत इतनी ही खराब है।

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गुजरात का स्थान मानवविकास के मामले में भी काफी पीछे है। बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार असल में गुजरात की गिनती भी महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे विकसित राज्यों के साथ की जाती है जबकि मानव विकास के मामले में यह राज्य इन राज्यों की तुलना में काफी पीछे है। अभी तक आप गुजरात को उच्च विकास दर वाला राज्य मानते होंगे लेकिन शायद आप इन निराशाजनक आंकड़ों से अनजान होंगे। हमने देवगढ़ बारिया की पहाडिय़ों के बीच बसे खूबसूरत गांवों में नाइकों, भीलों और राठवों के बीच काम करने वाले आनंदी नाम के गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) की संस्थापक नीता हार्डीकर से बात की। यकीन मानिए इन जनजातियों के साफ सुथरे घरों और उनकी खूबसूरती को देखकर आप प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाएंगे। लेकिन इस ग्रामीण रमणीय जगह के पीछे भी एक सच्चाई छिपी है। हार्डीकर कहती हैं कि इन गांवों में पिछले दो महीनों के दौरान गर्भावस्था से जुड़ी करीब 10 मौतें हुई हैं। गांव वालों को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने की कोई सरकारी व्यवस्था नहीं है। वह पूछती हैं, 'ऐसा विकास मॉडल किस काम का जो हमें सुविधाएं दे पाने में नाकाम है।'

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भाजपा के अनुसार गुजरात में खूब तरक्की हुई है ,लेकिन बिजनेस स्टैंडर्ट अखबार के अनुसार इस राज्य में 44.6 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। हालांकि शिशु मृत्यु दर में कमी जरूर आई है लेकिन इस दर में गिरावट राष्ट्रीय औसत की तुलना में काफी कम है।

करीब 65 फीसदी ग्रामीण परिवारों और 40 फीसदी शहरी परिवारों के पास शौचालय की व्यवस्था नहीं है और उन्हें मजबूरी में खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। राज्य में पुरुष महिला अनुपात कम है यानी 1000 पुरुषों पर 918 स्त्रियों का औसत है। यह भी राष्ट्रीय औसत से कम है।

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मुसलमानों की वास्तन जिंदगी देखें तो भाजपा-मोदी की पोल खुल जाती है।मसलन् गरीबी की बात करें तो शहरी मुसलमान ऊंची जाति के हिंदुओं की तुलना में करीब 8 गुना ज्यादा गरीब हैं। सच कहा जाए तो इस राज्य को भी बिहार और मध्य प्रदेश जैसे अल्प विकसित राज्यों की कतार में शुमार किया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है।

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अमरीश मिश्रा ने टाइम्स ऑफ इण्डिया ब्लॉग में लिखा है- A lot has been made out about the roads of Gujarat, the 24 hour electricity supply, the availability of water and so on and forth. Now basics of the science of economics will tell you that good roads, power and water are essential to build an infrastructure and provide a minimum living standard to a civil society citizen. However, this is not growth. To ensure productivity, three major sectors of economy-manufacturing, services and agriculture-have to grow. What is the use of electricity if the agricultural sector-which provides employment to 60% of Gujarat's population-stagnates at 2%-lower than Bihar- annually; roads are vital to manufacture-but what good will they do if manufacturing is limited to automobiles, Gujarat's once famed cotton textile industry is dying, and new investments-including a measly $ 7 billion FDI-are concentrated in SEZs with no benefits like job creation for locals? The service sector has traditionally been weak in Gujarat. Its marginal growth helped mainly, people in the urban areas. Modi could not generate a co-operative movement in Gujarat-the land of the white revolution-that might have helped the small farmer of the state. His record in introducing welfare and distributive policies for the poor and the Adivasis remains dismal. He failed in raising the minimum price for the farmer or built new irrigation networks. The channelizing of the Narmada affects only 5-10 % of Gujarat's vast rural population.

रविवार, 29 अप्रैल 2012

बंगारू लक्ष्मण की सजा से उठे सवाल



        भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को सीबीआई की अदालत ने हथियार खरीद फेक सौदे में घूस लेने के आरोप में 4साल के सश्रम कारावास की 28 अप्रैल 2012 को सजा सुनाकर कई महत्वपूर्ण परिवर्तनों के संकेत दिए हैं। पहली बात यह कि इस मामले ने न्याय का आधार बदल दिया है। हथियारों की वास्तविक खरीद में घूसखोरी में आज तक कोई पकड़ा नहीं गया और न किसी को सजा हुई है ,लेकिन हथियार खरीद के फेक मामले में घूसखोरी पकड़ी गयी और सजा भी हो गई।
     बोफोर्स में दलाली और घूस दोनों दी गयीं,25साल से ज्यादा समय यह मुकदमा देश-विदेश के अनेक अदालतों में खाक छान चुका है ,और अंत में दोषी लोग अभी तक सीना फुलाए घूम रहे हैं। इसका अर्थ यह है न्यायालयों में सच के लिए न्याय की संभावनाएं घट गयी हैं।
     बोफोर्स के मामले में सभी प्रामाणिक सबूत होने के बावजूद दोषी व्यक्ति को सारी दुनिया की पुलिस नहीं पकड़ पायी। यहां तक कि सीबीआई स्वयं यह मामला हार गयी,आयरनी देखिए बंगारू के मामले में सीबीआई अदालत में जजमेंट आता है और बंगारू दोषी पाए जाते हैं।
       सवाल उठता है कि बंगारू लक्ष्मण ने यदि सच में किसी हथियार बनाने वाली कंपनी के लिए घूस ली होती और हथियारों की सप्लाई हुई होती तो क्या वे दोषी पाए जाते ? चूंकि बंगारू के मौजूदा मामले में कोई भी हथियार निर्माता कंपनी शामिल नहीं है तो न्याय अपना सीना फुलाए खड़ा है लेकिन यही भारत के न्यायालय बोफोर्स मामले में निकम्मे साबित हो चुके हैं। यूनियन कारबाइड के मामले में पीडितों को न्याय दिलाने में असफल साबित हुए हैं।
       न्याय भी वर्गीय होता है। बंगारू लक्ष्मण की निजी तौर पर कोई सामाजिक हैसियत नहीं है,वे एक मध्यवर्गीय नेता से ज्यादा हैसियत नहीं रखते।इसलिए आसानी से दोषी सिद्ध कर दिए गए। यदि वे भी किसी बहुराष्ट्रीय हथियार कंपनी के दलाल होते तो संभवतः कुछ नहीं होता। उल्लेखनीय है बिना अपराधी पकड़े बोफोर्स के मामले को सर्वोच्च न्यायालय ने हमेशा के लिए दफन कर दिया है। इसे कहते हैं असली और नकली हथियार निर्माता कंपनी की ताकत का अंतर।
    विचारणीय सवाल यह है कि वास्तव हथियार निर्माता कंपनी के अपराध के मामले में न्यायालय असहाय क्यों महसूस करते हैं ? कांग्रेस और सीबीआई जितना बंगारू लक्ष्मण को सजा मिलने पर हंगामा कर रहे हैं , ये दोनों ही बोफोर्स के मामले में दोषी को पकडवाने में सफल क्यों नहीं हुए ? इस असफलता के लिए उन्होंने देश की जनता से माफी क्यों नहीं मांगी ?
   ध्यान रहे बोफोर्स दलालीकांड सच्चाई है । और बंगारू घूसकांड निर्मित सच्चाई है। निर्मित सच को सच मानकर विभ्रम पैदा किया जा सकता है। लेकिन यथार्थ में नहीं बदला जा सकता। यथार्थ यह है कि बहुराष्ट्रीय हथियार निर्माता कंपनियों के सामने हमारे जज, वकील और तर्कशास्त्र बौने साबित हुए हैं।
      बंगारू लक्ष्मण को सजा मिली, वे ऊपरी अदालत में जाएंगे और होसकता है सजा बहाल रहे, हो सकता वे बरी हो जाएं,भविष्य के बारे में कोई कुछ नहीं कह सकता। लेकिन एक सवाल बार-बार मन में उठ रहा है कि तहलका की टीम आज तक किसी सच्ची हथियार निर्माता कंपनी की दलाली की पोल खोलने में सफल क्यों नहीं हो पायी ? किसी वास्तव घूसखोर को क्यों नहीं पकड़ पायी ?
    सारा देश जानता है कि भारत सरकार विगत 5 सालों में अब तक 60हजार करोड रूपये से ज्यादा के हथियार खरीद चुकी है। इनकी खरीद में 3 से 10 फीसदी कमीशन भी लोकल एजेंट को मिलता है। कौन किस कंपनी का एजेंट है यह भी सब जानते हैं। यह भी जानते हैं कि कमीशनखोरी भारत के कानून में अपराध है लेकिन विदेशी कंपनियों के विदेशी कानून में यह पारिश्रमिक है। कहने का अर्थ यह है कि हथियारों की खरीद के सौदों में तहलका आदि कोई भी संस्था या मीडिया  ग्रुप ने कभी स्टिंग ऑपरेशन क्यों नहीं किया ? क्यों वे आजतक असली हथियार कंपनी के सौदे में दी गयी घूसखोरी के किसी भी घूसखोर को नहीं पकड़ पाए ?
    दूसरा सवाल यह है कि कल्पित स्टोरी,कल्पित कंपनी, असली घूस और असली घूसघोर के आधार पर क्या हम हथियारों की खरीद-फरोख्त में चल रही व्यापक घूसखोरी को नंगा करके जागरण पैदा कर रहे हैं या घूसखोरी को वैध बनाने का काम कर रहे हैं ?  बंगारू टाइप ऑपरेशन वास्तव में घूसखोरी को वैधता प्रदान करते हैं, नॉर्मल बनाते हैं। बंगारू की सजा या अपराध को मीडिया जितना बताएगा,घूसखोरी-कमीशनखोरी को और भी वैधता प्राप्त होगी।
भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बंगारु लक्ष्मण को दोषी करार देते हुए सीबीआई अदालत ने कहा, हो सकता है कि न्यूज पोर्टेल का स्टिंग करने का तरीका गलत हो लेकिन उद्देश्य गलत नहीं था। ऐसे में स्टिंग की सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है। न्यायाधीश ने स्टिंग की सच्चाई को माना है। लेकिन क्या स्टिंग ऑपरेशन पत्रकारिता है ?एक वर्ग मानता है कि यह पत्रकारिता है,खोजी पत्रकारिता है। हम यह मानते हैं कि स्टिंग ऑपरेशन जासूसी है, इसे पत्रकारिता नहीं कह सकते। यह मूलतः पीत पत्रकारिता के उपकरणों से बना विधा रूप है। स्टिंग ऑपरेशन और जासूसी के आधार पर पत्रकारिता करने के कारण रूपक मडरॉक और उनके बेटे को ब्रिटेन और अमेरिका में तमाम किस्म के आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। पत्रकारिता में लक्ष्य जितना पवित्र और महत्वपूर्ण है उसके तरीके भी उतने ही पवित्र और महत्वपूर्ण माने गए हैं। कम से कम तहलका का स्टिंग ऑपरेशन इस आधार पर खरा नहीं उतरता। वह स्टिंग ऑपरेशन है पत्रकारिता नहीं है।
   इसके बावजूद कायदे से भाजपा को बंगारू लक्ष्मण को लेकर अभी तक व्यक्त नजरिए के लिए तहलका की खोजी टीम से सार्वजनिक तौर पर माफी मांगनी चाहिए,क्योंकि भाजपा समर्थित मीडियातंत्र और नेताओं ने तहलका टीम के चरित्र और उत्पीड़न में कोई कमी नहीं की ।
     बंगारू के खिलाफ आया फैसला मीडिया,खासकर खोजी पत्रकारों की बहुत बड़ी जीत है।आज तक मीडिया और स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर  किसी बड़े नेता को सजा नहीं हुई है ,यह पहली घटना है और यह खोजी पत्रकारों की बड़ी विजय है।यह जीत ऐसे समय में आई है जब पत्रकारों की साख पर बार बार अंगुली उठाई जा रही थी।इस फैसले से ईमानदार पत्रकारों को जोखिम उठाने की प्रेरणा मिलेगी।
चिंता की बात यह है कि भाजपा और संघ परिवार  अभी भी बंगारू लक्ष्मण की घूसखोरी को अपराध नहीं मान रहा है,यही वजह है कि उनकी भाजपा की सदस्यता अभी तक खत्म नहीं की गयी है। बंगारू ने अध्यक्ष के नाते घूस ली थी ,व्यक्तिगत रूप में नहीं । वे उस समय भाजपा अध्यक्ष थे।अतः यह उनका व्यक्तिगत मामला नहीं है।
उल्लेखनीय है यह मामला 2001 में तहलकाटीम ने उन्हें 1लाख रूपये घूस लेते हुए कैमरे में पकड़ा था।वे लंदन की एक फर्म से घूस लेते स्टिंग ऑपरेशन में पकड़े गए थे।इस पूरे प्रकरण में तहलका के अनुसार- "बंगारू लक्ष्मण अकेले नहीं हैं. समता पार्टी की तत्कालीन अध्यक्षा जया जेटली भी बिल्कुल उन्हीं परिस्थितियों में रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिज के सरकारी आवास में घूस लेते हुए कैमरे की जद में आईं, उनकी पार्टी के कोषाध्यक्ष आरके जैन भी पैसा लेते हुए पकड़े गए. घूस का दलदल सिर्फ राजनीति महकमे तक ही सीमित नहीं था. सेना और नौकरशाही के तमाम आला अधिकारी भी पैसे लेते हुए नजर आए. लेफ्टिनेंट जनरल मंजीत सिंह अहलूवालिया, मेजर जनरल पीएसके चौधरी, मेजर जनरल मुर्गई, ब्रिगेडियर अनिल सहगल उनमें से कुछेक नाम हैं. रक्षा मंत्रालय के दूसरे सबसे बड़े अधिकारी आईएएस एलएम मेहता भी उसी सूची में हैं।"
तहलका टीम के अनुसार- "स‌रकार ने हम पर सीधा हमला तो नहीं किया लेकिन हमें कानूनी कार्रवाई के एक ऎसे जाल में उलझा दिया जिससे हमारा सांस लेना मुश्किल हो जाए.तहलका में पैसा निवेश करने वाले शंकर शर्मा को बगैर कसूर जेल में डाल दिया गया और कानूनी कार्रवाई की आड़ में उनका धंधा चौपट करने की हर मुमकिन कोशिश की गई. हमने कई बार खुद से पूछा कि तहलका और उसके अंजाम को कौन सी चीज खास बनाती है. जवाब बहुत सीधा है- शायद इसका असाधारण साहस. भ्रष्टाचार को इस कदर निडरता से उजागर करने की कोशिश ने ही शायद तहलका को तहलका जैसा बना दिया.तहलका लोगों के जेहन में रच बस गया।"


बुधवार, 15 जून 2011

सबसे महंगे ब्रॉण्ड का राजनीतिक पराभव


      बाबा रामदेव का अनशन अंततः खत्म हो गया ,उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा ,उनकी शारीरिक अवस्था लगातार खराब होती गयी । इससे आयुर्वेदिक चिकित्सा की बजाय अंग्रेजी चिकित्सा के प्रति आम लोगों की आस्था गहरी होगी। धन्य हैं बाबा जो अनशन तोड़ने अपने अस्पताल नहीं ले जाए गए।उनका इलाज करने वाले डाक्टर एलोपैथी के हैं। क्या आयरनी है आयुर्वेद के महारथी के अनशन की ?
हम तो यही चाहते थे कि बाबा रामदेव और उनके भक्त तब तक क्रमिक अनशन करते जब तक सारा काला धन विदेश से वापस नहीं आ जाता। बाबा को बर्मा (म्यांमार) की नेत्री आंग शांग सू ची की तरह लंबा अनशन करना चाहिए और योग शिविर को अन्य लोगों को चलाना चाहिए था लेकिन अफसोस की बात है वे ऐसा नहीं कर पाए। बाबा सोच रहे थे वे अनशन करेंगे और तत्काल परिणाम सामने आ जाएगा। राजनीति में ऐसा नहीं होता। बाबा के अनशन के समर्थन में आरएसएस के लोग सबसे ज्यादा हल्ला कर रहे हैं। क्या संघ परिवार अपनी आय-व्यय का ब्यौरा सार्वजनिक करेगा ?
 एक सवाल यह भी उठा है कि जेपी आंदोलन की तरह लाखों की भीड़ कभी इन नेताओं (अन्ना-बाबारामदेव) पीछे क्यों नहीं देखी गयी? क्यों नहीं ये लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ उड़ीसा से लेकर महाराष्ट्र तक,बिहार से लेकर दिल्ली तक एक भी लाखों की जनरैली कर पाए?बाबा रामदेव योगशिविर के नाम पर लोग लाए थे।यह संघर्ष की लामबंदी नहीं थी।
इधर जो बाबा रामदेव नाटक चल रहा है उस पर चकबस्त का शेर है- "मिटेगा दीन भी और आबरू भी जाएगी। तुम्हारे नामसे दुनियाको शर्म आएगी।।"
बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के पीछे की जनता की भीड़ पर बहुत जोर दिया है मीडिया ने।असल में बाबा के यहां जनता नहीं योग शिविर वाले लोग आए थे। और अन्ना के साथ में वे लोग ज्यादा थे जो विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों में काम करते थे। इनमें सैंकड़ों वेतनभोगी स्वयंसेवी होलटाइमर काम करते हैं। जनता कम थी दोनों के यहां।
आयरनी यह है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री से लेकर भाजपा के आडवाणी तक ,मोहन भागवत से अन्ना हजारे तक किसी ने भी बाबा रामदेव का अनशन तुड़वाने की कोशिश नहीं की। केन्द्र सरकार ने भी पल्ला झाड़ लिया। आखिर बाबा रामदेव के प्रति इस तिरस्कार या उपेक्षा भावना का कारण क्या है ?क्या बाबा रामदेव के राजनीतिक अंत की सूचना है ?
दूसरी आयरनी यह है कि हमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर विश्वास नहीं है एक बाबा पर विश्वास है। इससे पता चलता है कि हम अभी मध्यकाल में हैं। मनमोहन सिह ने इसबार के शासन की बागडोर हाथ में लेते ही कालेधन को एजेण्डा बनाया है ,थोड़ा वेब पन्नों की सैर करें बाबा भक्त तो उसका अंदाजा लग जाएगा।
बाबा रामदेव का अनशन खत्म हो गया ,लेकिन अपनी निशानियां छोड़ गया।बाबा रामदेव वायदे के अनुसार अनशन तोड़ देते तो कम से कम राजबाला की जिंदगी को तबाही से बचाया जा सकता था। पुलिस-आंदोलनकारियों की भगदड़ में कोई चीज उसकी पीठ पर गिरी जिसने अपूरणीय क्षति की है। इसके लिए बाबा ,आंदोलनकारी और पुलिस तीनों जिम्मेदार हैं, सरकार को तुरंत बड़ी आर्थिक क्षतिपूर्ति की घोषणा करनी चाहिए और बाबा को भी। बाबा रामदेव के अनशन के दौरान ग्लूकोज का इस्तेमाल क्या आमरण अनशन के नियमों का पालन है ? बाबा ने कोई आयुर्वेदिक पेयपदार्थ क्यों नहीं लिया ? क्या ग्लूकोज आयुर्वेदिक है ?
बाबा रामदेव ने अपना अनशन तोड़ा।  श्रीश्री रविशंकर आदि संतों के कहने से तोड़ा। इस पर दाग़ का शेर है- "ख़ातिरसे या लिहाजसे मैं मान तो गया। झूठी कसमसे आपका ईमान तो गया।।''
केन्द्र सरकार ने कालेधन को देश में वापस लाने की मांग को लिखित रूप में मान लिया है। बाबा को उस आश्वासन के लागू किए जाने का इंतजार करना चाहिए। लाठीचार्ज में 32 लोग घायल हुए थे और वे सकुशल घर पर हैं,एक की हालत अभी भी गंभीर बनीहुई है। इसके बाबजूद बाबा रामदेव ने अनशन जारी क्यों कर रखा ? बाबा कौन सा सौदा पटाना चाहते हैं ?बाबा रामदेव और श्री श्रीरविशंकर में क्या बातें हुईं उनका विस्तृत ब्यौरा जारी किया जाना चाहिए। श्रीश्री रविशंकर ने केन्द्रीयमंत्री वीरप्पा मोइली से जो बातें की हैं उनके पूरे विवरण जारी किए जाएं,बाबा रामदेव से जो सरकारी प्रतिनिधि बात करे उसका लाइव टेलीकास्ट दिखाया जाना चाहिए। बाबा और सरकार की विश्वसनीयता की परीक्षा के लिए यह जरूरी है।
बाबा रामदेव पर मुझे दाग़ का एक शेर याद आ रहा है। शेर है-" इतनी ही तो बस कसर है तुममें,कहना नहीं मानते किसीका।।"
बाबा रामदेव और उनकी समृद्धियों का संसार जिस गति से बढ़ा है उस गति से मेहनत से इतना पैसा नहीं कमाया जा सकता। बाबा रामदेव ने जो अरबों-खरबों की संपत्ति अर्जित की है उसे क्या मेहनत की कमाई कहेंगे ?गोरखधंधे की आय कहेंगे ?हवाला का पैसा ?या कारपोरेट जगत की संघ परिवार को दी गई सौगात कहेंगे ? या पुण्य की लक्ष्मी ?इस पर साकिब का शेर है- "चमन न देख नशेमनको देख ए बुलबुल।बहार ही में कभी आग भी बरसती है।।"
बाबा रामदेव के बारे में यह जानते हुए कि वह संघ परिवार के एजेण्डे पर काम कर रहा है और उनका आदमी है,उसे जिस तरह सरकार ने अति सम्मान दिया वैसा यह सरकार किसी मजदूरनेता को नहीं देती। इससे ही पता चलता है कि केन्द्र सरकार का संघ से मोर्चा लेना नकली जंग है ।वह धर्मनिरपेक्षता की पक्षधर है तो उसे मजदूर-किसान नेताओं का सम्मान करना चाहिए,धर्मगुरूओं का नहीं।बाबा रामदेव टाइप लोगों पर जोश मलीहाबादी का शेर है- "जो डरकर नारेदोजख़से ख़ुदाका नाम लेते हैं। इबादत क्या वोह खाली बुजदिलाना एक खिदमत है।।"आगे एक अन्य शेर में जोश मलाहाबादी ने लिखा है- "इबादत करते हैं जो लोग जन्नतकी तमन्नामें। इबादत तो नहीं है,इक तरहकी वोह 'तिजारत' है।।"
बाबा रामदेव के बारे में टीवी कैम्पेन के अलावा प्रशानिक कदम उठाने की जरूरत है और सख्ती के साथ उन सभी आर्थिक दानदाताओं की भी पहचान की जाए जिन्होंने अपनी संपत्ति बाबा को दी है। वे कौन लोग हैं जो बाबा के व्यापार में पार्टनर हैं उनके नाम बताए जाएं ।कांग्रेस के मंत्रियों-सांसदों-विधायकों के नाम बताए जाएं जो बाबा रामदेव के शिविरों में जाते रहे हैं ।

हम अच्छे भले अपने कामों में व्यस्त थे कि बाबा रामदेव ने कारपोरेट मीडिया के जरिए हंगामा खड़ा कर दिया।बाबा के अनशन के कष्ट पर 'चकबस्त' का शेर है- " राहतसे भी अज़ीज़ है राहतकी आरजू। दिल ढूँढ़ता है सिलसिलये इन्तज़ारको।।"
( सिलसिलये यानी प्रायश्चित)
पण्डित ब्रजनारायण 'चकबस्त'बड़े शायर थे, हमारे फेसबुक के अनेक दोस्त और बाबा रामदेव हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवादी हैं,राष्ट्रवाद ज़हर है। 'चकबस्त' ने राष्ट्रवाद से देशप्रेम को अलगाते हुए लिखा- " फ़िदा वतनपै जो हो,आदमी दिलेर है वोह। जो यह नहीं तो फ़क़त हड्डियों का ढ़ेर है वोह।।
कांग्रेस का आरएसएस के खिलाफ खुलकर आना धर्मनिरपेक्ष राजनीति के लिए शुभलक्षण है।लेकिन कांग्रेस को पहले सफाई देनी होगी कि उसने बाबा रामदेव की अकूत संपत्ति के मामले पर आज तक कभी कोई एक्शन क्यों नहीं लिया ?
संघ परिवार से जुड़े लोग कुछ ऐसे संगठन भी चलाते हैं जो नियोजित हिंसा करते हैं। पेमेंट लेकर हिंसा करते हैं।इस तरह के लोग हमेशा के लिए जेल में बंद करके क्यों नहीं रखे जाते ? कारपोरेट मीडिया उन्हें सैलीब्रिटी की तरह क्यों पेश करता है ?ऐसे लोगों को राजनीतिक सम्मान क्यों दिया जाता है ?आरएसएस सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करता है लेकिन उसके द्वारा संचालित सभी संगठन हिन्दुत्ववादी फंडामेंटलिस्ट राजनीति करते हैं। शिक्षा से लेकर संस्कृति,आईएएस से लेकर क्लर्कों तक संघ परिवार का विशाल संगठन है। संघ का नया चेहरा हिन्दू आतंकी का है,क्या हिन्दू आतंकवाद से देश तरक्की कर सकता है ?



आरएसएस अपने सांस्कृतिक प्रचार के जरिए अबोध और छोटे बच्चों को निशाना बनाता है। उनमें राष्ट्रवाद,हिन्दुत्व और जाति अहंकार की विचारधारा का प्रचार करता है।गरीब, निम्नमध्यवर्ग और मध्यवर्ग के युवा हमेशा निशाने पर होते हैं।यह सांस्कृतिक टकराव का काम है। इस प्रसंग में हमें मीडिया की भूमिका और प्राथमिकताओं पर ध्यान देना चाहिए।
    मसलन् कारपोरेट मीडिया ने पोस्को आंदोलन को जिस तरह हाशिए पर रखा है और बाबा-अन्ना पर सारी शक्ति खर्च की है उससे मीडिया की जनविरोधी विचारधारा नंगी हुई है। कालाधन और भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम नव्य उदार नीतियों की कड़ी की हिस्सा है जबकि पोस्को का किसान आंदोलन सीधे नव्य आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के विरोध का प्रतीक है।केन्द्र सरकार का पर्यावरण मंत्रालय सीधे इस प्रकल्प के लिए क्लीयरेंस दे चुका है। एकतरफ कांग्रेस की केन्द्र सरकार पोस्को प्रकल्प की अनुमति दे रही है दूसरी ओर किसानों के साथ हमदर्दी का नाटक भी कर रही है।
केन्द्र सरकार ने इस प्रकल्प के लिए अनुमति क्यों दी ? कांग्रेस पार्टी सारे कलेश राज्य सरकार के मत्थे मड़कर चुपचाप तमाशा देख रही है ? कायदे से राहुल गांधी को इस इलाके में जाकर किसानों के साथ खड़ा होना चाहिए।इन दिनों विदेशी कंपनियों को बुलाने पर बड़ा जोर है इस पर मज़ाज़ का शेर है -" मुनासिब है अपना रास्ता ले।वोह कश्ती देख साहिलसे लगी है।।"
बाबा रामदेव के आमरण अनशन और उसके बाद के लाठीचार्ज को टीवी चैनलों ने रियलिटी टीवी शो के फॉरमेट में पेश करके बाबा रामदेव से सबसे ज्यादा लाभ उठाया और बाबा की सबसे ज्यादा क्षति की। बाबा की योगी की इमेज को व्यापारी की इमेज में तब्दील कर दिया।बाबा अंततः योग के ब्रॉड एम्बेसडर हैं और सबसे महंगे ब्रांड भी।                 










शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

मनुष्यत्व का अपमान है धार्मिक फंडामेंटलिज्म

    कोई हिन्दू बने या मुसलमान हमें इसमें आपत्ति नहीं है। हमारी आपत्ति इसमें है कि वे भारत को हिन्दूराष्ट्र क्यों कहते हैं। भारत संवैधानिक तौर पर हिन्दू राष्ट्र नहीं है। भारत का संविधान,हिन्दू राष्ट्र का संविधान नहीं है। भारत कभी भी हिन्दू राष्ट्र नहीं था। बात-बात में हिन्दू राष्ट्र की दुहाई देना,भाषणों से लेकर लेखन तक में उसका इस्तेमाल करना अवैज्ञानिक है,गलत है।
     हिन्दूराष्ट्र और हिन्दुत्व को भारतवासियों का पर्याय बताना सफेद झूठ है और यह भारतवासियों का अपमान है। भारत की बहुसांस्कृतिक विरासत और बहुसांस्कृतिक जनता का अपमान है। यदि राम को रावण के नाम से बुलाया जाएगा तो वह गलत होगा। राम को राम के  नाम से ही सम्बोधित किया जाना चाहिए। उसी तरह भारत को भारत के नाम से पुकारें।  ‘भारत एक हिन्दूराष्ट्र है’ यह कहकर न पुकारें ,यह भारत का अपमान है,भारतवासियों का अपमान है। मनुष्यता का अपमान है। यह हिन्दू फंडामेंटलिज्म है।    
     आज के हिन्दुस्तान की सच्चाई यह है कि यहां एक नहीं अनेक किस्म की पहचानें प्रत्येक व्यक्ति के पास हैं। लेकिन संघ परिवार एक ही अस्मिता का बारबार ढ़ोल पीटता रहता है। वे लोग संविधान में उपलब्ध अभिव्यक्ति की आजादी और विचारों के प्रसार की आजादी का दुरूपयोग कर रहे हैं और भारतीय समाज के बारे में गलत समझ पैदा कर रहे हैं । बहुजातीयता और बहुसांस्कृतिकता का अपमान कर रहे हैं।   
    संघ जब हिन्दू राष्ट्र के नाम पर इस्लाम और ईसाई धर्म की निंदा करता है और उन्हें पराए धर्म के रूप में चित्रित करता है तो बहुलतावाद को अस्वीकार करता है। संविधान की मूल स्प्रिट का उल्लंघन करता है।   
    हिन्दू से इतर अस्मिताओं और धर्मों का इतिहास भारत में सैंकड़ो-हजारों साल पुराना है। देश का समूचा तानाबाना बहुसांस्कृतिक-बहुधार्मिक-बहुजातीय मान्यताओं और विश्वासों पर टिका है। इसे रचने में हिन्दुओं,मुसलमानों, जैनियों, नाथों-सिद्धों,योगियों,शाक्तों,बौद्धों आदि का योगदान रहा है। संघ के लोग जब भारत को हिन्दूराष्ट्र के रूप में चित्रित करते हैं तो गैर हिन्दू धर्मों और संस्कृतियों की भारत के निर्माण में जो भूमिका रही है उसे अस्वीकार करते हैं।
   भारत आज एक तरह से खुले समाज के रूप में अपना विकास कर रहा है और इसमें सभी धर्मों-जातीयताओं और संस्कृतियों के लिए समानता का भाव है। इन सबको समान संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। भारत का संविधान खुले तौरपर बहुसांस्कृतिकता और बहुधार्मिकता की हिमायत करता है। इसके बावजूद संघ के नेताओं का भारत को बार-बार हिन्दू राष्ट्र कहना वस्तुतः बहुसांस्कृतिक जातीयताओं और धर्मों का अपमान ही कहा जाएगा।
      संघ परिवार के लोग हिन्दू राष्ट्र के नाम पर आम लोगों के हृदय में बहुसांस्कृतिवाद और बहुधार्मिकवाद के खिलाफ ज़हर भरना चाहते हैं। वे यह भी जानते हैं कि भारत कभी हिन्दू राष्ट्र नहीं था , न आज है और न भारत कभी भविष्य में हिन्दू राष्ट्र बनेगा।
   भारत की बहुसांस्कृतिक-बहुधार्मिक-बहुजातीय राष्ट्र-राज्य की पहचान है। भारत की पहचान का आधार हिन्दूधर्म नहीं है। कोई भी धर्म भारत की पहचान का आधार नहीं है। बहुजातीयता,बहुधार्मिकता और बहुसांस्कृतिकता राष्ट्रीय पहचान का आधार हैं।
     भारत आज खुले समाज का हिमायती है। हिन्दूसमाज जैसे बंद समाज की धारणा का पक्षधर नहीं है। आज भारत के खुले समाज के लिए सबसे बड़ी चुनौती हिन्दुत्व और इस्लामिक फंडामेंटलिस्टों की ओर से आ रही है। ये दोनों ही विचारधाराएं अपने-अपने तर्कों के आधार पर आम आदमी की जिंदगी और खासकर बहुसांस्कृतिक स्वतंत्रता पर हमले कर रहे हैं। इन दोनों ही फंडामेंटलिस्ट विचारधाराओं के भारत में अब तक के कारनामे भारत के खुले समाज के वातावरण को नष्ट करने वाले हैं।
    आज जनतंत्र के बुनियादी तानेबाने के लिए इन दोनों ही किस्म के संगठनों से गंभीर खतरा है। हिन्दू और मुस्लिम फंडामेटलिज्म के झंडाबरदार समाजवाद और पूंजीवाद के विकल्प के रूप में अपनी फंडामेंटलिस्ट विचारधारा को पेश कर रहे हैं। वे इसे सामाजिक विकास के तीसरे मार्ग के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें इन दोनों ही फंडामेंटलिस्ट विचारधाराओं की आलोचना करते समय सतर्कता से काम लेना चाहिए। इन दोनों को ही इस्लाम और हिन्दू धर्म से अलगाने की जरूरत है।
    मसलन आरएसएस के हिन्दुत्व का हिन्दूधर्म से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है। उसी तरह केरल में हाल के वर्षों में पैदा हुए मुस्लिम फंडामेंटलिस्ट संगठन पापुलर फ्रंट का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है। य़ह एक मुस्लिम फंडामेंटलिस्ट संगठन है और अनेक मायनों में यह संघ का अनुकरणकर्ता है।
     यूरोप के अनेक देशों में घटिया किस्म की हरकतें हो रही हैं। ये हरकतें उन देशों में हो रही हैं जिन्हें उदार पूंजीवादी मुल्क माना जाता है। मसलन इटली में मुसलमान औरतों के लिए अलग से समुद्रतट बनाए गए हैं जहां पर वे कपड़ों में निर्भय होकर समुद्रस्नान कर सकें और पतनशील पश्चिमी नग्नता से बची रह सकें।
    हॉलैण्ड में मुसलमानों के लिए अलग से अस्पताल बनाए जाने की बातें हो रही हैं जहां पर मुस्लिम औरतें अपने पिता,पति,भाई आदि के साथ गैर मुस्लिमों की मौजूदगी में मिल सकें। यह कोशिश की जा रही है कि कोई गैर मुस्लिम डाक्टर मुस्लिम बीबी,बहन और माताओं को हाथ भी न लगा सके। इन दिनों यूरोप की सड़कों पर बुर्का ज्यादा नजर आ रहा है। इतना बुर्का तीस साल पहले नहीं दिखता था।
   हिन्दू फंडामेंटलिस्टों ने उन तमाम सुधारों,मान्यताओं और मूल्यों को चुनौती दी है जिन्हें भारत ने रैनेसां के दौरान और बाद के वर्षों में अर्जित किया था। बहुलतावाद का प्रत्येक क्षेत्र में सम्मान करना रैनेसां की उपलब्धि थी। इसे हमें राजा राममोहन राय सौंप गए हैं।
        हिन्दू शुद्धता ,हिन्दू संस्कृति और हिन्दू राष्ट्र की धारणा पर विगत 30 सालों में जिस आक्रामक भाव से संघ परिवार ने जोर दिया है उससे भारत का बहुलतावादी सामाजिक-राजनीतिक ढ़ांचा हिल गया है। वे हिन्दुत्व -हिन्दुत्व करके भारत के बहुलतावादी तंत्र को बर्बाद करना चाहते हैं जिसे बड़ी तकलीफों के बाद रैनेसां में हमारे समाज ने अर्जित किया था। बहुलतावाद के लिए शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर जोर दिया गया।
   फंडामेंटलिस्टों का मानना है कि हम कानून का सम्मान करते हैं लेकिन धर्म के मामले में हम किसी की बात नहीं मानेंगे। हमारे लिए धर्म का मतलब क्या है यह हम तय करेंगे। शाहबानो केस के फैसले से लेकर रामजन्मभूमि विवाद पर आए फैसले तक एक ही रूझान है। दोनों ही रंगत के फंडामेंटलिस्ट मानते हैं कि धर्म एक ऐसी चीज है जिसे कानून या कोई स्पर्श नहीं सकता। वह परम पवित्र अपरिवर्तनीय है। शुद्ध है।
     ये लोग धार्मिक जीवनशैलियों को अपनाने पर जोर दे रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता दोनों को ही नापसंद हैं। धर्मनिरपेक्ष लोग काम बिगाड़ने शत्रु लगते हैं। फंडामेंटलिस्टों को कम्युनिस्ट ,उपभोक्तावादी ,व्यक्तिवादी इन तीनों से नफरत है। फंडामेंटलिस्टों का मानना है कि कम्युनिज्म और पूंजीवाद दोनों में ही करोड़ों लोग मारे गए हैं। वहां शांति,सुख और सुरक्षा संभव नहीं है। शांति ,सुख और सुरक्षा तो सिर्फ धार्मिक फंडामेंटलिज्म में ही दे सकता है। उनका दावा है कि हिन्दू और मुस्लिम फंडामेंटलिज्म ही उपभोक्तावाद और समाजवाद का एकमात्र सही विकल्प है । असल में धार्मिक फंडामेंटलिज्म विध्वंसक विकल्प है विकास का विकल्प नहीं है।  










शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

वे मार्क्सवाद से घृणा क्यों करते हैं ?

     संघ परिवार अपने समर्थकों ,सदस्यों और विभिन्न मीडिया रूपों में कम्युनिस्टों और मार्क्सवाद के खिलाफ अहर्निश घृणा फैलाता रहता है। इनके अलावा कारपोरेट मीडिया भी मार्क्सवाद से नफरत करता है। दोनों के तरीके अलग हैं। लेकिन लक्ष्य एक है। मुझे लगता है ये दोनों ही मनुष्य को सही ढ़ंग सेदेख ही नहीं पाते। 
हिन्दुत्ववादियों के लिए भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और इसमें रहने वाले सब हिन्दू हैं और जो हिन्दू नहीं हैं उन्हें हिन्दुत्व को मनवाने का उन्हें ‘भगवान’ ने अधिकार दिया है। वे हिन्दू अस्मिता और हिन्दू सम्मतियों के अलावा कुछ भी देख नहीं पाते हैं।
       दूसरी ओर बुर्जुआजी के लिए भारत उपभोक्ताओं का देश है। जिसमें नागरिक रहते हैं। लेकिन उनके पास नागरिकचेतना का अभाव है अतः उनके कुछ वैचारिक सिपहसालार आए दिन नागरिक समाज- नागरिक समाज का जयगान करते रहते हैं। नागरिक समाज और बुर्जुआजी में गहरा याराना है। एक के लिए व्यक्ति उपभोक्ता है तो दूसरे के लिए नागरिक है।
     हिन्दुत्ववादियों और बुर्जुआजी के बीच में सुंदर याराना है। ये एक ही सहजिया संप्रदाय के सदस्य हैं। इसके विपरीत कम्युनिस्ट है जो समाज को मानव समूह के रूप में देखते हैं और वे बार-बार मनुष्य,मनुष्यत्व,मानवता की मुक्ति आदि पर समग्रता में बातें करते हैं। मार्क्सवादियों के लिए व्यक्ति की धार्मिक और नागरिक दोनों ही पहचान के रूप उसे बुर्जुआ और धार्मिक फ्रेम में बांधे रखते हैं। जबकि मानव का फ्रेम व्यक्ति की सत्ता और महत्ता को व्यापक पर फलक पर रखकर देखता है।
     व्यक्ति को धार्मिक पहचान के आधार पर देखने से उसे हम धर्म के बाहर देखने में असमर्थ होते हैं। जबकि नागरिक पहचान व्यक्ति को बुर्जुआ कानूनी परिभाषाओं में बांधकर देखती है। बुर्जुआ कानून की आंखों से देखते है।
     व्यक्ति को उपभोक्ता की नजर से देखने का अर्थ है उसको महज एक पशु बना देना। खाना-पीना-कमाना-भोग करना और सोना यही उसके नित्यकर्म हो जाते हैं और ये सारी क्रियाएं पशु क्रियाएं हैं। व्यक्ति को मनुष्य के रूप में देखना और समस्त कर्मों,नीतियों और कार्य-व्यापारों को मनुष्य के उत्थान के मातहत कर देना ही मार्क्सवाद का बुनियादी लक्ष्य है।
     बुर्जुआजी चाहता है व्यक्ति के समस्त कार्य-कलापों को संपदा प्रेम से जोड़ दिया जाए। हिन्दुत्ववादी चाहते हैं कि हिन्दूप्रेम से जोड़ दिया जाए। नागरिक समाज वाले चाहते हैं कि व्यक्ति को नागरिक अधिकारों से जोड़ दिया जाए। मार्क्सवादी चाहते हैं कि व्यक्ति के समस्त कार्य-कलापों को मानवसभ्यता के विकास के साथ जोड़ दिया जाए। मार्क्सवाद का बुनियादी लक्ष्य मानव सभ्यता का निर्माण करना। वे चाहते हैं कि मनुष्य अपने दैनंदिन जीवन के संघर्ष में संपत्तिप्रेम,मुनाफा प्रेम, धर्मप्रेम,वस्तु या माल प्रेम के बाहर निकले और मानवप्रेम के बारे में सोचे। सभ्यता निर्माण के बुनियादी सवालों पर विचार करे। यही नह बुनियादी बिंदु है जहां पर मार्क्सवादियों का हिन्दुत्ववादियों और बुर्जुआजी के साथ बुनियादी मतभेद है।
    मसलन् स्वतंत्रता के सवाल को ही लें। हिन्दुत्ववादी,बुर्जुआजी,नागरिक समाज और मार्क्सवादियों का इस धारणा को लेकर एक जैसा नजरिया नहीं है। हिन्दुत्ववादी इसे हिन्दू धर्म के वर्चस्व की स्थापना के लिए इस्तेमाल करते हैं ।
    बुर्जुआजी मुनाफों के विस्तार और नागरिक समाज कागजी नागरिक अधिकारों के लिए इस्तेमाल करते हैं। वे चाहते हैं बुर्जुआजी का समाज में वर्चस्व बना रहे और नागरिक अधिकार भी बने रहें। बुर्जुआजी को कागज पर मानवाधिकार देने में कोई परेशानी नहीं है।लेकिन वास्तव अर्थ में इन्हें वह लागू करना नहीं चाहता।
     इसके विपरीत मार्क्सवादी चाहते हैं कि स्वतंत्रता का शोषण के खात्मे और बुर्जुआजी के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्व के खात्मे के लिए इस्तेमाल किया जाए। इसमें हिन्दुत्व,नागरिक समाज और बुर्जुआजी की कोई रूचि नहीं हैं। वे शोषण और बुर्जुआ वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं।
     स्वतंत्रता का फैसला मात्र संविधान में नागरिक अधिकारों के उल्लेख मात्र से नहीं हो सकता। संविधान में तो हमें नागरिक अधिकार मिले हुए हैं। धर्मनिरेक्षता भी मिली हुई है। लेकिन वास्तव अर्थ में ये दोनों गायब हैं। स्वतंत्रता कोई कागजी मंत्र नहीं है। धार्मिक मंत्र नहीं है बल्कि स्वतंत्रता का शोषणरहित आर्थिक अवस्था से गहरा संबंध है। मार्क्सवादियों ने स्वतंत्रता के आर्थिक आधार को ही चुनौती दी है। वे मानते हैं कि शोषणमय आर्थिक संबंधों के आधार पर निर्मित स्वतंत्रता विभ्रम है। इसी विभ्रम को गले उतारने का काम कारपोरेट मीडिया और नागरिक समाज के हिमायती करते रहते हैं। स्वतंत्रता संविधान के कागज में नहीं होती,धर्म में नहीं होती। फ्रेडरिक एंगेल्स के अनुसार ‘स्वतंत्रता लाजिमी तौर पर ऐतिहासिक विकास का फल होती है।’ एंगेल्स ने यह भी लिखा है ‘ स्वतंत्रता अपने ऊपर तथा बाह्य प्रकृति के ऊपर नियंत्रण में निहित होती है और यह नियंत्रण प्राकृतिक आवश्यकताओं के ज्ञान पर आधारित होता है।’
      हम उस क्षण की कल्पना करें जब मनुष्य ने पशु से पहलीबार अपने को अलग किया होगा तो वह क्षण मनुष्य के लिए महान था या भाप के इंजन का आविष्कार ?  वह क्षण मनुष्य के लिए महान था जब मनुष्य ने पहलीबार आग का आविष्कार किया या भाप के इंजन का ?
      मनुष्य का पशु योनि से मुक्ति का शिलान्यास उस दिन रखा गया जब उसने रगड़ से आग पैदा की थी । यांत्रिक गति को उसने ऊष्मा में रूपान्तरित किया था। भाप के इंजन की तुलना में रगड़ से आग पैदा करने वाली खोज महान खोज है।
   हिन्दुत्ववादियों ने धार्मिक नैतिकता और मान्यताओं के आधार पर इन दिनों बाबरी मसजिद और दूसरे सवालों पर हमला बोला हुआ है। वे संघ के फासीवादी धर्मादेशों के आधार पर चीजें थोपना चाहते हैं। उनका मानना है सारे मसलों का समाधान हिन्दुत्व के आधार पर होना चाहिए। वे भूल जाते हैं कि वस्तुएं,घटनाएं,विवाद,राजनीति आदि सभी कुछ धर्मादेशों पर निर्भर नहीं हैं बल्कि सामाजिक परिवेश और सामाजिक संबंधों पर निर्भर हैं। हिन्दुत्ववादी अपने पक्ष में तरह-तरह की सम्मतियों और उद्धरणों का भी इस्तेमाल करते हैं औऱ उनके आधार यह तर्क देते हैं कि वे सही सोचते हैं। वे भूल जाते हैं कि मनुष्य के विचार सम्मतियों से तय नहीं होते। सम्मतियां भी विचारों से पैदा नहीं होतीं बल्कि उनका सामाजिक परिवेश से गहरा संबंध होता है। इसलिए हमें सम्मतियों से आरंभ नहीं करना चाहिए बल्कि परिवेश के इतिहास से,सामाजिक संबंधों के इतिहास से आरंभ करना चाहिए। यह संसार सम्मतियों से शासित नहीं होता। बल्कि सम्मतियां लोगों के हितों द्वारा निर्धारित होती हैं। यदि सम्मतियां ही आमतौर से दुनिया का शासन करतीं ,तो गलत सम्मतियां ख़ून के प्यासे क्रूर शासकों की तरह हैं। 

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