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रविवार, 31 जुलाई 2016

भारत को प्रेमचंद के नजरिए से देखो-


"हमारे नबी का हुक्म है कि शादी-ब्याह में अमीर-गरीब का विचार न होना चाहिए, पर उनके हुक्म को कौन मानता है नाम के मुसलमान, नाम के हिन्दू रह गए हैं। न कहीं सच्चा मुसलमान नजर आता है, न सच्चा हिन्दू।"

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"हमारे स्कूलों और कॉलेजों में जिस तत्परता से फीस वसूल की जाती है, शायद मालगुजारी भी उतनी सख्ती से नहीं वसूल की जाती। महीने में एक दिन नियत कर दिया जाता है। उस दिन फीस का दाखिला होना अनिवार्य है। या तो फीस दीजिए, या नाम कटवाइए, या जब तक फीस न दाखिल हो, रोज कुछ जुर्माना दीजिए। कहीं-कहीं ऐसा भी नियम है कि उसी दिन फीस दुगुनी कर दी जाती है, और किसी दूसरी तारीख को दुगुनी फीस न दी तो नाम कट जाता है। काशी के क्वीन्स कॉलेज में यही नियम था। सातवीं तारीख को फीस न दो, तो इक्कीसवीं तारीख को दुगुनी फीस देनी पड़ती थी, या नाम कट जाता था। ऐसे कठोर नियमों का उद्देश्य इसके सिवा और क्या हो सकता था, कि गरीबों के लड़के स्कूल छोड़कर भाग जाएं- वही हृदयहीन दफ्तरी शासन, जो अन्य विभागों में है, हमारे शिक्षालयों में भी है। वह किसी के साथ रियायत नहीं करता। चाहे जहां से लाओ, कर्ज लो, गहने गिरवी रखो, लोटा-थाली बेचो, चोरी करो, मगर फीस जरूर दो, नहीं दूनी फीस देनी पड़ेगी, या नाम कट जाएगा। जमीन और जायदाद के कर वसूल करने में भी कुछ रियायत की जाती है। हमारे शिक्षालयों में नर्मी को घुसने ही नहीं दिया जाता। वहां स्थायी रूप से मार्शल-लॉ का व्यवहार होता है। कचहरी में पैसे का राज है, हमारे स्कूलों में भी पैसे का राज है, उससे कहीं कठोर, कहीं निर्दय। देर में आइए तो जुर्माना न आइए तो जुर्माना सबक न याद हो तो जुर्माना किताबें न खरीद सकिए तो जुर्माना कोई अपराध हो जाए तो जुर्माना शिक्षालय क्या है, जुर्मानालय है। यही हमारी पश्चिमी शिक्षा का आदर्श है, जिसकी तारीफों के पुल बांधे जाते हैं। यदि ऐसे शिक्षालयों से पैसे पर जान देने वाले, पैसे के लिए गरीबों का गला काटने वाले, पैसे के लिए अपनी आत्मा बेच देने वाले छात्र निकलते हैं, तो आश्चर्य क्या है-"(कर्मभूमि)

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"हमारी स्वाधीनता लौकिक और इसलिए मिथ्या है। आपकी स्वाधीनता मानसिक और इसलिए सत्य है। असली स्वाधीनता वही है, जो विचार के प्रवाह में बाधक न हो।"(रंगभूमि)

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"खेती सबसे उत्तम है, बान उससे मद्धिम है; बस, इतना ही फरक है। बान को पाप क्यों कहते हैं, और क्यों पापी बनते हो? हाँ सेवा निरघिन है, और चाहो तो उसे पाप कहो। अब तक तो तुम्हारे ऊपर भगवान् की दया है, अपना-अपना काम करते हो; मगर ऐसे बुरे दिन आ रहे हैं, जब तुम्हें सेवा और टहल करके पेट पालना पड़ेगा, जब तुम अपने नौकर नहीं, पराए के नौकर हो जाओगे, तब तुममें नीतिधरम का निशान भी न रहेगा।" (रंगभूमि)

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"जिस देश में भीख माँगना लज्जा की बात न हो, यहाँ तक कि सर्वश्रेष्ठ जातियाँ भी जिसे अपनी जीवन-वृत्ति बना लें, जहाँ महात्माओं का एकमात्र यही आधार हो, उसके उद्धार में अभी शताब्दियों की देर है।"

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निंदा, क्रोध और घृणा ये सभी दुर्गुण हैं, लेकिन मानव जीवन में से अगर इन दुर्गुणों को निकल दीजिए, तो संसार नरक हो जायेगा। यह निंदा का ही भय है, जो दुराचारियों पर अंकुश का काम करता है। यह क्रोध ही है, जो न्याय और सत्य की रक्षा करता है और यह घृणा ही है जो पाखंड और धूर्तता का दमन करती है। निंदा का भय न हो, क्रोध का आतंक न हो, घृणा की धाक न हो तो जीवन विश्रृंखल हो जाय और समाज नष्ट हो जाय। इनका जब हम दुरुपयोग करते हैं, तभी ये दुर्गुण हो जाते हैं, लेकिन दुरुपयोग तो अगर दया, करुणा, प्रशंसा और भक्ति का भी किया जाय, तो वह दुर्गुण हो जायेंगे। अंधी दया अपने पात्र को पुरुषार्थ-हीन बना देती है, अंधी करुणा कायर, अंधी प्रशंसा घमंडी और अंधी भक्ति धूर्त। प्रकृति जो कुछ करती है, जीवन की रक्षा ही के लिए करती है। आत्म-रक्षा प्राणी का सबसे बड़ा धर्म है और हमारी सभी भावनाएँ और मनोवृत्तियाँ इसी उद्देश्य की पूर्ति करती हैं। कौन नहीं जानता कि वही विष, जो प्राणों का नाश कर सकता है, प्राणों का संकट भी दूर कर सकता है। अवसर और अवस्था का भेद है। मनुष्य को गंदगी से, दुर्गन्ध से, जघन्य वस्तुओं से क्यों स्वाभाविक घृणा होती है? केवल इसलिए कि गंदगी और दुर्गन्ध से बचे रहना उसकी आत्म-रक्षा के लिए आवश्यक है। जिन प्राणियों में घृणा का भाव विकसित नहीं हुआ, उनकी रक्षा के लिए प्रकृति ने उनमें दबकने, दम साथ लेने या छिप जाने की शक्ति डाल दी है। मनुष्य विकास-क्षेत्र में उन्नति करते-करते इस पद को पहुँच गया है कि उसे हानिकर वस्तुओं से आप ही आप घृणा हो जाती है। घृणा का ही उग्र रूप भय है और परिष्कृत रूप विवेक। ये तीनों एक ही वस्तु के नाम हैं, उनमें केवल मात्रा का अंतर है।

तो घृणा स्वाभाविक मनोवृति है और प्रकृति द्वारा आत्म-रक्षा के लिए सिरजी गयी है। या यों कहो कि वह आत्म-रक्षा का ही एक रूप है। अगर हम उससे वंचित हो जाएँ, तो हमारा अस्तित्व बहुत दिन न रहे। जिस वस्तु का जीवन में इतना मूल्य है, उसे शिथिल होने देना, अपने पाँव में कुल्हाड़ी मारना है। हममें अगर भय न हो तो साहस का उदय कहाँ से हो। बल्कि जिस तरह घृणा का उग्र रूप भय है, उसी तरह भय का प्रचंड रूप ही साहस है। जरूरत केवल इस बात की है कि घृणा का परित्याग करके उसे विवेक बना दें। इसका अर्थ यही है कि हम व्यक्तियों से घृणा न करके उनके बुरे आचरण से घृणा करें। धूर्त से हमें क्यों घृणा होती है? इसलिए कि उसमें धूर्तता है। अगर आज वह धूर्तता का परित्याग कर दे, तो हमारी घृणा भी जाती रहेगी। एक शराबी के मुँह से शराब की दुर्गन्ध आने के कारण हमें उससे घृणा होती है, लेकिन थोड़ी देर के बाद जब उसका नशा उतर जाता है और उसके मुँह से दुर्गन्ध आना बंद हो जाती है, तो हमारी घृणा भी गायब हो जाती है। एक पाखंडी पुजारी को सरल ग्रामीणों को ठगते देखकर हमें उससे घृणा होती है, लेकिन कल उसी पुजारी को हम ग्रामीणों की सेवा करते देखें, तो हमें उससे भक्ति होगी। घृणा का उद्देश्य ही यह है कि उससे बुराइयों का परिष्कार हो। पाखंड, धूर्तता, अन्याय, बलात्कार और ऐसी ही अन्य दुष्प्रवृत्तियों के प्रति हमारे अंदर जितनी ही प्रचंड घृणा हो उतनी ही कल्याणकारी होगी। घृणा के शिथिल होने से ही हम बहुधा स्वयं उन्हीं बुराइयों में पड़ जाते हैं और स्वयं वैसा ही घृणित व्यवहार करने लगते हैं। जिसमें प्रचंड घृणा है, वह जान पर खेलकर भी उनसे अपनी रक्षा करेगा और तभी उनकी जड़ खोदकर फेंक देने में वह अपने प्राणों की बाजी लगा देगा। महात्मा गाँधी इसलिए अछूतपन को मिटाने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर रहे हैं कि उन्हें अछूतपन से प्रचण्ड घृणा है।

जीवन में जब घृणा का इतना महत्व है, तो साहित्य कैसे उसकी उपेक्षा कर सकता है, जो जीवन का ही प्रतिबिंब है? मानव-हृदय आदि से ही सु और कु का रंगस्थल रहा है और साहित्य की सृष्टि ही इसलिए हुई कि संसार में जो सु या सुंदर है और इसलिए कल्याणकर है, उसके प्रति मनुष्य में प्रेम उत्पन्न हो और कु या असुंदर और इसलिए असत्य वस्तुओं से घृणा। साहित्य और कला का यही मुख्य उद्देश्य है। कु और सु का संग्राम ही साहित्य का इतिहास है। प्राचीन साहित्य धर्म और ईश्वर द्रोहियों के प्रति घृणा और उनके अनुयायियों के प्रति श्रद्धा और भक्ति के भावों की सृष्टि करता रहा।

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राष्ट्र का सेवक -प्रेमचंद

राष्ट्र के सेवक ने कहा - देश की मुक्ति का एक ही उपाय है और वह है नीचों के साथ भाईचारे का सलूक, पतितों के साथ बराबरी का बर्ताव। दुनिया में सभी भाई हैं, कोई नीच नहीं, कोई ऊँच नहीं।

दुनिया ने जय-जयकार की - कितनी विशाल दृष्टि है, कितना भावुक हृदय!

उसकी सुंदर लड़की इंदिरा ने सुना और चिंता के सागर में डूब गई।

राष्ट्र के सेवक ने नीची जाति के नौजवान को गले लगाया।

दुनिया ने कहा - यह फरिश्ता है, पैगंबर है, राष्ट्र की नैया का खेवैया है।

इंदिरा ने देखा और उसका चेहरा चमकने लगा।

राष्ट्र का सेवक नीची जाति के नौजवान को मंदिर में ले गया, देवता के दर्शन कराए और कहा - हमारा देवता गरीबी में है, जिल्लत में है, पस्ती में है।

दुनिया ने कहा - कैसे शुद्ध अंतःकरण का आदमी है! कैसा ज्ञानी!

इंदिरा ने देखा और मुसकराई।

इंदिरा राष्ट्र के सेवक के पास जाकर बोली - श्रद्धेय पिताजी, मैं मोहन से ब्याह करना चाहती हूँ।

राष्ट्र के सेवक ने प्यार की नजरों से देखकर पूछा - मोहन कौन है?

इंदिरा ने उत्साह भरे स्वर में कहा - मोहन वही नौजवान है, जिसे आपने गले लगाया, जिसे आप मंदिर में ले गए, जो सच्चा, बहादुर और नेक है।

राष्ट्र के सेवक ने प्रलय की आँखों से उसकी ओर देखा और मुँह फेर लिया।

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प्रेमचंद का मानना है "ईश्वर की उपासना का केवल एक मार्ग है और वह है मन,वचन और कर्म की शुद्धता, अगर ईश्वर इस शुद्धता की प्राप्ति में सहायक है,तो शौक से उसका ध्यान कीजिए,लेकिन उसके नाम पर हरेक धर्म में जो स्वाँग हो रहा है,उसकी जड़ खोदना किसी तरह ईश्वर की सबसे बड़ी सेवा है। "

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प्रेमचंद ने लिखा है- " कामशास्त्र की बहुत-सी उपयोगी बातें ऐसी हैं,जिनका ज्ञान प्रत्येक गृहस्थ के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक है।उसी का ज्ञान न होने से समाज में आज दिन अधिकतर पशुता का प्रबल्य हो गया है।"

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प्रेमचंद का मानना है - "ऊँचा साहित्य तभी आयेगा,जब प्रतिभा-सम्पन्न लोग तपस्या की भावना लेकर साहित्य-क्षेत्र में आयेंगे,जब किसी अच्छी पुस्तक की रचना राष्ट्र के लिए गौरव की बात समझी जायगी,जब उसकी चाय की मेजों पर चर्चा होगी,जब उसके पात्रों के गुण-दोष पर शिक्षित मित्र-मण्डलियों में आलोचनाएँ होंगी,जब विद्वान् लोग साहित्य में रस लेंगे।"

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यह हिन्दू भारत नहीं प्रेमचंद का भारत है।हिन्दू भारत में -मौत का भय अधिक है,प्रेमचंद के भारत में आजादी का सुख है।हिन्दू भारत में धार्मिकता का शोरगुल है,प्रेमचन्द के भारत में प्रेम का साम्राज्य है।हिन्दू भारत हृदयशून्य लोगों का देश है,प्रेमचन्द का भारत कल्पना,संवेदना और हार्दिकता के लोगों का समाज है।हिन्दू भारत भोगी और बाबाओं का देश है,प्रेमचंद का भारत कमाऊ,श्रम और श्रमिक को प्यार करने वालों का देश है। हिन्दू भारत भिखारियों,खैरात पर जीने वालों,ढोंगी बाबाओं का भारत है जबकि प्रेमचंद का भारत आत्मनिर्भर,विवेकवान लोगों का देश है।हिन्दू भारत परलोक प्रेम और अंधविश्वासों पर टिका है,प्रेमचंद का भारत विज्ञान और इहलोक से प्रेम पर टिका है।तय करो कौन सा भारत बनाना चाहते हो।

सोमवार, 18 जुलाई 2016

मुझे भारत चाहिए-

          कश्मीर में तनाव इसलिए है क्योकि हम सबकी कश्मीर को लेकर समझ साफ नहीं है,पूरे देश में हिन्दू-मुसलमान संबंधों को लेकर तनाव इसलिए है क्योंकि हमारे देश में एक बहुत बड़ा अंश है जिसकी हिन्दू-मुसलमानो के संबंधों को लेकर सही और साफ समझ नहीं है।

मुसलमान भी भारतीय हैं,कश्मीरी भी भारतीय हैं,हम इस सामान्य किंतु बहुत महत्वपूर्ण बात को समझने से कन्नी क्यो काट रहे हैं ?मुसलमानो को कष्ट मिले या हिन्दुओं को कष्ट मिले,अंततःयह भारतीय समाज का कष्ट है।

हमने गलत किस्म का सामाजिक विभाजन मन में बिठा लिया है।हम भारतीय को भूल गए और अपने -अपने धर्म की पहचान में व्यस्त कर दिए गए हैं।आरएसएस और मुस्लिम तत्ववादी संगठन अपने-अपने तरीके से यह काम खुलकर कर रहे हैं और हम सब उनकी इन हरकतों की उपेक्षा करते रहे हैं,आज स्थिति यह है कि ये दोनों ही किस्म के संगठन आम जनता और मीडिया में हिन्दू-मुसलमान के जहर को सतह पर ले आए हैं।हम भारतीय समाज की बातें नहीं कर रहे हिन्दू समाज,मुस्लिम समाज आदि कोटियों में बांटकर बातें कर रहे हैं,एक-दूसरे को जलील करके तीसमार खाँ बनने की कोशिश करके अंततःदेश को बांट रहे हैं।

आज जो कश्मीर में सुलगता अंगारा दिखाई दे रहा है,वह कभी भी पूरे देश में सुलगता नजर आ सकता है।इसका प्रधान कारण है हमारे प्रमुख राजनीतिकदलों ने गंभीरता के साथ देश को धर्म के आधार पर हमारे दिलों में बांट दिया है।दिलचस्प बात यह है ये सभी दल खासकर कांग्रेस,भाजपा,आरएसएस आदि ऊपर से सद्भाव का नाटक करते रहे हैं लेकिन वैचारिक प्रचार में हिन्दू-मुसलमान की कोटियों में बांटकर अपने नजरिए को परोसते रहे हैं।कांग्रेस ने यह काम बारीकी से किया है,धर्मनिरपेक्षता की आड़ में किया है,आरएसएस के लोग बिना किसी आड़ के सीधे कर रहे हैं।एक कमरे में नंगा घूम रहा है,दूसरा सड़कों पर नंगा घूम रहा है,लेकिन हैं दोनों नंगे।इन दोनों के इस विभाजनकारी खेल से बचने की जरूरत है।

भारतवासी होने के नाते हमें धार्मिक पहचान के आधार पर सोचने से बचना चाहिए।धार्मिक पहचान के आधार पर सोचना अंततःभारत को सामाजिक तौर पर विभाजित करता है।



इस समय सारा मीडिया ,पुलिस, सरकारी तंत्र और सोशलमीडिया का बड़ा हिस्सा धार्मिक पहचान के आधार पर ही सोच रहा है और यह खतरनाक स्थिति है इससे बचने की जरूरत है।इन दिनों हिन्दू-मुसलमानों के भेद बताने पर जोर दिया जा रहा है,जबकि होना यह चाहिए कि हम समानताएं खोजें।हिन्दू-मुसलमानों के प्रति उन्मादी भाषण देने,बयान देने.फेसबुक पोस्ट लिखने से बचें।हमें भारत को बचाना है,हम यह हिन्दू-मुसलमान बचाने के नाम पर चल रही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से बाहर निकलकर सोचें,मनुष्य को पहचान का आधार बनाएं,मनुष्य के रूप में भारतवासियों के साझा सुख-दुख रेखांकित करें।

मंगलवार, 10 मई 2016

भारत का मर्म और पंडित नेहरू


      भारत की आत्मा को समझने में पंडित जवाहरलाल नेहरू से बढ़कर और कोई बुद्धिजीवी हमारी मदद नहीं कर सकता।पंडितजी की भारत को लेकर जो समझ रही है ,वह काबिलेगौर है।वे भारतीय समाज,धर्म, संस्कृति,
इतिहास आदि को जिस नजरिए से व्यापक फलक पर रखकर देखते हैं वह विरल चीज है।

       पंडित नेहरू ने लिखा है ''जो आदर्श और मकसद कल थे,वही आज भी हैं,लेकिन उन पर से मानो एक आब जाता रहा है और उनकी तरफ बढ़ते दिखाई देते हुए भी ऐसा जान पड़ता है कि वे अपनी चमकीली सुंदरता खो बैठे हैं,जिससे दिल में गरमी और जिस्म में ताकत पैदा होती थी।बदी की बहुत अकसर हमेशा जीत होती रही है लेकिन इससे भी अफसोस की बात यह है कि जो चीजें पहले इतनी ठीक जान पड़ती थीं,उनमें एक भद्दापन और कुरूपता आ गई है। '' चीजें क्रमशःभद्दी और कुरूप हुई हैं,सवाल यह है कि यह भद्दापन और कुरूपता आई कहां से ॽक्या इससे बचा जा सकता था ॽयदि हां तो उन पहलुओं की ओर पंडितजी ने जब ध्यान खींचा तो सारा देश उस देश में सक्रिय क्यों नहीं हुआ ॽ

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है" हिंदुस्तान में जिंदगी सस्ती है। इसके साथ ही यहां जिंदगी खोखली है,भद्दी है,उसमें पैबंद लगे हुए हैं और गरीबी का दर्दनाक खोल उसके चारों तरफ है।हिंदुस्तान का वातावरण बहुत कमजोर बनानेवाला हो गया है।उसकी वजहें कुछ बाहर से लादी हुई हैं,और कुछ अंदरूनी हैं,लेकिन वे सब बुनियादी तौर पर गरीबी का नतीजा हैं। हमारे यहां के रहन-सहन का दर्जा बहुत नीचा है और हमारे यहां मौत की रफ्तार बहुत तेज है।" पंडितजी और उनकी परंपरा ´मौत की रफ्तार´ को रोकने में सफल क्यों नहीं हो पायी ॽ पंडित जानते थे कि भारत में जहां गरीबी सबसे बड़ी चुनौती है वहीं दूसरी ओर धर्म और धार्मिकचेतना सबसे बड़ी चुनौती है।

पंडित नेहरू ने लिखा है- "अगर यह माना जाये कि ईश्वर है,तो भी यह वांछनीय हो सकता है कि न तो उसकी तरफ ध्यान दिया जाये और न उस पर निर्भर रहा जाये। दैवी शक्तियों में जरूरत से ज्यादा भरोसा करने से अकसर यह हुआ भी है और अब भी हो सकता है कि आदमी का आत्म-विश्वास घट जाए और उसकी सृजनात्मक योग्यता और सामर्थ्य कुचल जाये।"

धर्म के प्रसंग में नेहरूजी ने लिखा- "धर्म का ढ़ंग बिलकुल दूसरा है।प्रत्यक्ष छान-बीन की पहुंच के परे जो प्रदेश है,धर्म का मुख्यतःउसीसे संबंध है और वह भावना और अंतर्दृष्टि का सहारा लेता है। संगठित धर्म धर्म-शास्त्रों से मिलकर ज्यादातर निहित स्वार्थों से संबंधित रहता है और उसे प्रेरक भावना का ध्यान नहीं होता।वह एक ऐसे स्वभाव को बढ़ावा देता है,जो विज्ञान के स्वभाव से उलटा है। उससे संकीर्णता,गैर-रवादारी, भावुकता,अंधविश्वास,सहज-विश्वास और तर्क-हीनता का जन्म होता है। उसमें आदमी के दिमाग को बंद कर देने का सीमित कर देने का,रूझान है।वह ऐसा स्वभाव बनाता है,जो गुलाम आदमी का,दूसरों का सहारा टटोलनेवाले आदमी का, होता है।" आम आदमी के दिमाग को खोलने के लिए कौन सी चीज करने की जरूरत है ॽक्या तकनीकी वस्तुओं की बाढ़ पैदा करके आदमी के दिमाग को खोल सकते हैं या फिर समस्या की जड़ कहीं और है ॽ

पंडित नेहरू का मानना है - "हिन्दुस्तान को बहुत हद तक बीते हुए जमाने से नाता तोड़ना होगा और वर्तमान पर उसका जो आधिपत्य है,उसे रोकना होगा। इस गुजरे जमाने के बेजान बोझ से हमारी जिंदगी दबी हुई है। जो मुर्दा है और जिसने अपना काम पूरा कर लिया है,उसे जाना होता है।लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि गुजरे जमाने की उन चीजों से हम नाता तोड़ दें या उनको भूल जाएं ,जो जिंदगी देनेवाली हैं और जिनकी अहमियत है।" यह भी लिखा, "पिछली बातों के लिए अंधी भक्ति बुरी होती है।साथ ही उनके लिए नफ़रत भी उतनी ही बुरी होती है।उसकी वजह है कि इन दोनों में से किसी पर भविष्य की बुनियाद नहीं रखी जा सकती।"

"गुजरे हुए जमाने का -उसकी अच्छाई और बुराई दोनों का ही-बोझ एक दबा देने वाला और कभी-कभी दम घुटाने वाला बोझ है,खासकर हम लोगों में से उनके लिए ,जो ऐसी पुरानी सभ्यता में पले हैं,जैसी चीन या हिन्दुस्तान की है। जैसाकि नीत्शे ने कहा है- " न केवल सदियों का ज्ञान,बल्कि ,सदियों का पागलपन भी हममें फूट निकलता है।वारिस होना खतरनाक है।"इसमें सबसे महत्वपूर्ण है ´वारिस´वाला पहलू।इस पर हम सब सोचें।हमें वारिस बनने की मनोदशा से बाहर निकलना होगा।

पंडित नेहरू ने लिखा है- "मार्क्स और लेनिन की रचनाओं के अध्ययन का मुझ पर गहरा असर पड़ा और इसने इतिहास और मौजूदा जमाने के मामलों को नई रोशनी में देखने में मदद पहुँचाई। इतिहास और समाज के विकास के लंबे सिलसिले में एक मतलब और आपस का रिश्ता जान पड़ा और भविष्य का धुंधलापन कुछ कम हो गया।" भविष्य का धुंधलापन कम तब होता है जब भविष्य में दिलचस्पी हो,सामाजिक मर्म को पकड़ने, समझने और बदलने की आकांक्षा हो।इसी प्रसंग में पंडित नेहरू ने कहा "असल में मेरी दिलचस्पी इस दुनिया में और इस जिंदगी में है,किसी दूसरी दुनिया या आनेवाली जिंदगी में नहीं।आत्मा जैसी कोई चीज है भी या नहीं मैं नहीं जानता.और अगरचे ये सवाल महत्व के हैं,फिर भी इनकी मुझे कुछ भी चिंता नहीं।"पंडितजी जानते थे भारत में धर्म सबसे बड़ी वैचारिक चुनौती है।सवाल यह है धर्म को कैसे देखें ॽ



पंडितजी का मानना है " 'धर्म' शब्द का व्यापक अर्थ लेते हुए हम देखेंगे कि इसका संबंध मनुष्य के अनुभव के उन प्रदेशों से है,जिनकी ठीक-ठीक मांग नहीं हुई है,यानी जो विज्ञान की निश्चित जानकारी की हद में नहीं आए हैं।" फलश्रुति यह कि जीवन के सभी क्षेत्रों में विज्ञान को पहुँचाएं,विज्ञान को पहुँचाए वगैर धर्म की विदाई संभव नहीं है।









गुरुवार, 19 जून 2014

जनता के स्वाद का बादशाह हलवाई


       हलवाई के बिना बाजार और जीवन में मजा नहीं है। हलवाई हमारे बाजार की शोभा हुआ करते थे उनसे ही बाजार या इलाके पहचान थी। छोटे शहरों में हलवाई लोकल पहचान का संकेत था। हलवाई को मैं समानान्तर बाजार मानता हूँ। एक तरफ विभिन्न किस्म के दुकानदार और दूसरी ओर हलवाई की दुकान। हलवाई लंबे समय से बाजार के परंपरागत खाद्य उद्योग की धुरी रहा है। हलवाई कब दुकान पर आया ? कब घर तक चला आया और कब हलवाई का सामाजिक कायाकल्प हो गया हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया।

भारत में हलवाई परिवार की रसोई और मेहमाननबाजी का भागीदार होकर आया,जब भी पहला हलवाई आया होगा वह निश्चित तौर पर प्रगतिशील रहा होगा। घर के बाहर हलवाई की बनी चीजें खाना या उन चीजों को घर में लाकर खाने की परंपरा तब ही आई होगी जब हमारे समाज के कुछ अतिरिक्त धन बचता होगा। हलवाई की बनी चीजें पुराने वर्णसमाज के तंत्र,मूल्यबोध और तयशुदा आदतों को तोड़ने में मदद करती रही हैं।

हलवाई ने भोजन की निजता में एक नयी कोटि भोजन की सामाजिकता को शामिल किया। हमारे यहां भोजन निजी होता था और निजी व्यक्ति के विस्तारित संबंधों को ही हम दावतों में बुलाकर सामाजिकता निभाते थे। लेकिन हलवाई की बनी चीजों के आने के साथ सामाजिक जीवन और खासकर जीवनशैली में धीमी गति से परिवर्तनों की शुरुआत होती है।

हलवाई कहने को वैश्यजाति का अंग रहा है। लेकिन हलवाई का काम और तंत्र जिस तरह जीवनशैली ,खानपान और पापुलर कल्चर को प्रभावित करता रहा है उसकी कभी हमने विस्तार से मीमांसा ही नहीं की। हलवाई मतलब खाने की वस्तुओं का दुकानदार।

हलवाई का व्यापार सबसे पुख्ता व्यापार रहा है। यह विकेन्द्रित और छोटी पूंजी से आरंभ होने वाला कारोबार है। मसलन् कचौडी की दुकान खोलने के लिए बहुत बड़ी पूंजी की आज भी जरुरत नहीं पड़ती। विकेन्द्रीकृत ढ़ंग से इसने आम जनता के स्वाद को बदला और नवीकृत किया। हलवाई को जनता के स्वाद बादशाह कहना अतिशयोक्ति नहीं है।

एक हलवाई अपने माल के जरिए मुनाफा कमाने के साथ अभिरुचि और स्वाद का भी निर्माण करता है। सबसे अच्छा हलवाई वह माना जाता है जिसके माल के स्वाद को आप बार बार महसूस करें और लौटकर उसकी दुकान पर आएं। हलवाई की रिटर्न अपील बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। वह अपने अपभोक्ता को बाँधता है और उसकी रुचि को स्टीरियोटाइप होने से बचाता है।

हलवाई का काम पेसन का काम है। हलवाई के पकवान हमारी खाद्य अभिरुचि को सीधे प्रभावित करते हैं। हलवाई का सबसे बड़ा आनंद यह है कि यह अनौपचारिक खानपान को बढ़ावा देता है। खाने में हम जितना अनौपचारिक होंगे उतने ही बेहतर सामूहिक मनुष्य होगे। खानपान में हम जितने संगठित और औपचारिक रहेंगे उतने ही एकांतवासी होंगे।

हलवाई के खाने में बाजार की ध्वनियों और खुली हवा की गंध रहती है। वहां रेस्तराँ की तरह तयशुदा धुनें और गंध नहीं तैरती ।

हलवाई खुलेपन को लेकर आया। खानपान में खुलेपन को लेकर आया। रेस्तराँ ने खानपान को बंद रेस्तराँ का खाद्य बना दिया। हलवाई ने समाज में खुलेपन और लिबरल माहौल को पैदा किया।वह बाजार में जीवनशैली को प्रभावित करने वाले प्रमुख कर्ता के रुप में दाखिल हुआ।

हलवाई गतिशील है। वह जड़ नहीं है। गतिशील हलवाई हमेशा नए पर नजर रखता है। जड़ हलवाई यथास्थितिवादी होता है। वह दसियों साल एक जैसा सामान बेचता रहता है ।गतिशील हलवाई सामान की लिस्ट बढ़ाता जाता है,अपनी इमेज का नए युग के साथ रुपान्तरण करता जाता है। भारत के हलवाई आज से तीस साल पहले तक लोकल थे लेकिन विगत तीस सालों में इन्होंने अपने को बाजार निर्माण की नयी प्रक्रियाओं से जोड़ा है। अपने को लोकल से ऊपर उठाकर क्षेत्रीय-राष्ट्रीय और ग्लोबल बनाया है।

हलवाई कल तक लघु व्यापार था. लेकिन विगत चार दशकों में इसने उद्योग की शक्ल लेली है। एक-एक हलवाई के यहां सैंकड़ों –हजारों लोग काम कर रहे हैं। हल्दीराम से लेकर भीखाराम तक अनेक देशज हलवाई पूरे देश में मिल जाएंगे और इनकी ग्लोबल शाखाएं भी मिल जाएंगी। हलवाईयों का कारोबार खरबों रुपये का है। हलवाई उद्योग मूलतःराष्ट्रीय उद्योग है जिसका बहुराष्ट्रीय खाद्य कंपनियों से सीधा मुकाबला है।

शनिवार, 26 मार्च 2011

नव्य उदार भारत की सामाजिक हकीकत - डा.भरत सिंह


       आज हम विभ्रम के दौर से गुजर रहे हैं। समाजवादी दुनिया खत्म हो चुकी है। समाजवाद एवं साम्यवाद का नाम लेने वाले दल और संस्थाएं नवउपनिवेशवाद और भूमंडलीकरण की राजनीति के पैरोकार हो गए हैं। 'कोई विकल्प नहीं है भूमंडलीकरण का' कहकर रिरियाते-खीजते हुए कम्युनिस्ट असहाय दिखाई दे रहे हैं। चारों तरफ  विधवा विलाप का आर्त्तनाद है। ऐसे में क्रांतिकारी राजनीति का नाम लेने वाले उपहास के पात्र हैं। रही क्रांतिकारी स्वछंदतावाद की काव्य-धारा की चर्चा तो वह कहीं सुनाई तक नहीं देती है। किसान-मजदूर वर्ग की बातें करना गुनाह है। उत्तर-आधुनिक दौर में वर्ग एक गाली है। अब दलित, पिछडे, आदिवासी समुदायों के विमर्शों का बोलवाला है। विचारधारा, इतिहास, कविता आदि सब मर चुकने की घोषणाएं हो चुकी हैं। देशभक्ति और समतावादी समाज की बातें करने वाले शर्मिंदा और लाचार हैं।
      भारत का मध्यवर्ग अपनी पतनोन्मुखी भूमिका में आ गया है। यद्यपि भारतीय    मध्यवर्ग ब्रिटिश साम्राज्यवाद के बलात्कार से उत्पन्न दोगला औलाद है तथापि इसी    मध्यवर्ग ने भारतीय नवजागरण और स्वाधीनता संग्राम में प्रगतिशील तथा क्रांतिकारी भूमिका भी निभाई थी। भगत सिंह मध्यवर्ग के संपन्न तबके में पैदा हुए थे और दिनकर भी सर्वहारा वर्ग के नहीं थे। भूमंडलीकरण के दौर में भारतीय मध्यवर्ग सुर्खियों में आया। इसे 'द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास' कहकर सराहा गया। इसकी शक्ति और सामर्थ्य के बारे में यहां तक कहा गया कि यह अमरीका की कुल आबादी के बराबर है और विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार है। यह वर्ग अमरीका पर फिदा है और अमरीका इस पर कुर्बान। आज भारत के हर शहर में एक अमरीका है। अमरीका में भारत के हर शहर
की पॉश कॉलोनी का एक नुमाइंदा रह रहा है। अगर भारतीय मध्यवर्ग को छूट दे दी जाय तो चौबीस घंटे के भीतर शहरी भारत का मध्यवर्ग न्यूयार्क और वाशिंगटन में दिखाई देगा।
      भारत के रक्तपायी वर्ग के नौनिहाल अमरीका और यूरोप के कुछ देश में शिक्षा पा रहे हैं। इन नौनिहालों की पढ़ाई पर इस देश का 40,000 करोड़ रुपया प्रति वर्ष खर्च होता है। आज भारत में प्रतिष्ठित वर्ग का शायद ही कोई ऐसा परिवार हो जिसका कोई सगा संबंधी अमरीका में प्रवासी न हो। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक विदशों में बसे भारत वंशियों की कुल संख्या 2 करोड़ है। इनकी सालाना आय 27 लाख करोड़ है, जबकि भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) कुल 40 लाख करोड़ ही है। अमरीका में बसे एनआरआई'ज की औसत सालाना आय 60 हजार डालर है। मार्च 2007 में खत्म हुए वित्तीय वर्ष में भारतीय प्रवासियों द्वारा भारत में भेजी गई रकम का क्रमांक एशिया में प्रथम स्थान पर विराजमान है। भारत के मध्यवर्ग ने 2006-07 में 27 अरब डालर यानी 1080 अरब रुपए भारत भेजे।
      यह वर्ग 'करप्सन' को 'कर प्रसन्न' कहता है। घूस की रकम को 'स्पीड मनी' बताता है। सरकारी कर्मचारी प्रति वर्ष 21068 करोड़ रुपया घूस के रूप में डकार जाते हैं। न्याय के मंदिर में बैठे देवता प्रति वर्ष 2630 करोड़ रुपए पुजापे के रूप में पाते हैं। ये तो दस्तूरी भ्रष्टाचार है, जो न्यायिक कर्मचारियों की जेबों में जाता है। न्यायाधीशों का भ्रष्टाचार इसमें शामिल नहीं है।
      इस वर्ग के आराध्य त्रिदेव- नेता, अफसर और सेठ- कितने भ्रष्ट हैं, इसका अनुमान लगाना असंभव है। पानी में रहकर मछली कितना पानी पी जाती है, इसका आकलन करना तो संभव हो सकता है लेकिन इस त्रिमूर्ति के भ्रष्टाचार की थाह तो ब्रह्मा-विष्णु-महेश भी नहीं पा सकते।
    एक अनुमान के अनुसार इस देश के शीर्षस्थ लोगों के कालाधन की 5 लाख करोड़ रुपए की रकम विदेशी बैंकों में जमा है। ये धन कुबेर 2 लाख करोड़ रुपए की प्रतिवर्ष टैक्स चोरी करते हैं। यह काला धन बड़े-बड़े कृषि फार्मों को खरीदने पर खर्च होता है। ग्रामीण भारत की गरीबी को बढ़ाता है। समाज में लाचारी बढ़ती है और अपराध, नशा खोरी, वेश्यावृत्तिा की प्रवृत्तियां पनपकर समाज   अधोगति को प्राप्त करता है। इस देश में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं है। कांग्रेस ही नहीं लगभग सभी पार्टियों के नेता भ्रष्टाचार की गटर गंगा में रोज स्नान करते हैं। आम आदमी की असहायता को छोड़कर लगभग सारा भारत भ्रष्टाचार की त्रिावेणी में गोते लगा रहा है।
      भारत का मध्यवर्ग (पैटी बुर्जुआ) शासक-शोषक वर्ग से नाभि-नाल बध्द है। भारत की सिविल सोसाइटी पर इसकी अजगरी जकड़न है। पूंजीपति-सामंत वर्ग की पार्टियों के नेतृत्व की तो बात ही छोड़ दें, इस देश की साम्यवादी पार्टियों पर भी इसी वर्ग का  एकाधिकार है। जैसा कि कहा जा चुका है मध्यवर्ग के रक्त में अमेरिका बसा हुआ है।पंजाबी बड़ी ठनक और फक्र के साथ यह कहते सुनाई देते हैं -'साड्डा पुत्तर अमरीका विच है।' मुक्तिबोध ने कहा था 'साम्राज्यवादियों के / पैसों की संस्कृति भारतीय आकृति में बंधकर/ दिल्ली को वाशिंगटन व लंदन का उपनगर/ बनाने पर तुली है / भारत का धनतंत्री जनतंत्री, बुध्दिवादी स्वेच्छा से उसी का कुली है।'' इस मध्यवर्ग का कुलीकरण हो चुका है। इसकी कुलीनता में अमरीकी साहबों के पिट्ठू ढोने वाले कुलियों की दास्य मनोवृत्ति झलकती है। इस वर्ग के साम्यवादियों को भी साम्राज्यवाद रास आ गया है। सलीम ग्रुप के साम्राज्यवादी हितों की खातिर लाल झंडे के रणबांकुरे अपने किसानों की हत्या करने में वीरता का प्रदर्शन कर रहे हैं और गरीब किसानों की औरतों से बलात्कार कर रहे हैं।
      भारत में साम्राज्यवाद की सफलता मैकाले की विचारधारा एवं ब्रिटिश साम्राज्यवाद की सफलता की कहानी के विकास का नया अध्याय है। मैकाले और ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भारत में यूरोपीय दिमाग मध्यवर्ग पैदा किया। यही मध्यवर्ग नेहरू-इंदिरा के समाजवाद के कथित दौर में पनपा और समाजवादी बना तथा समाजवादी तब तक बना रहा जब तक 'समाजवाद' गाली के रूप में गली-गली में चर्चित नहीं हो गया। अब यही मध्यवर्ग नवउदार व्यवस्था में फल-फूल रहा है। अमरीकी साम्राज्यवाद का पिट्ठू , दलाल बन गया है और अपने ही देश के बाकी लोगों को उपनिवेश में बदल रहा है। इसी वर्ग ने साम्राज्यवादी दलाली का पट्टा अपने नाम लिखा लिया है। भारत की राजनीति अमरीकी दलालों के हाथ में वार वनिताओं की तरह थिरक रही है।
       अमरीकी साम्राज्यवाद की पूंछ पकड़कर भारतीय पूंजीपति वर्ग ने वैतरणी पार की। प्रथम दृष्टया अच्छे परिणाम आए जो देश के 10-15 करोड़ नौदौलतियों के हक में गए। 31 मार्च 2007 के सरकारी आंकडे गद-गद भाव में अमरीकी चरण चुंबन करते हुए दिखाई देते हैं। इनमें बताया गया कि भारत के पास 180 अरब डालर का विदेशी मुद्रा भंडार है। कभी भारत ने ऐसा समय भी देखा था कि विदेशी मुद्रा भंडार चुक गया था और उसकी प्राप्ति के लिए भारत के स्वर्ण भंडार गिरवी रख दिए गए थे। सचमुच यह इतराने वाली बात ही है। विदेशी मुद्रा भंडार और विदेशों से आने वाली आय ने भारत को स्वत: स्फूर्ति स्थिति में पहुंचा दिया। बचत दर 32 प्रतिशत की दर से और निवेश की दर 34 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ी। माल व सेवा क्षेत्रा में कुल व्यवसाय की वृध्दि दर भारत के सकल घरेलू उत्पाद के 17 प्रतिशत पर जा पहुंची। शेयर बाजार के सूचकांक में आई तेजी से भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेशकों का विश्वास बढ़ा।
      मध्यवर्ग भारत की बढ़ती हुई अमीरी को देख कर गद्-गद् है। दुनिया में सबसे तेज गति से अमीरी भारत में बढ़ रही है, 23 प्रतिशत की दर से। चीन का नंबर दूसरा है, 20 प्रतिशत की दर वाला। और उधर अमरीका तथा यूरोप में अमीरी दो-तीन प्रतिशत पर जाकर अटक गई है। भारत में पिछले चार साल (अप्रैल 2004 से मार्च 2008) में भारत में खरबपतियों की संख्या नौ से बढ़कर छप्पन हो गई है। भारत से ज्यादाखरबपति तो अब अमरीकी में ही हैं। भारत के खरबपतियों के हाथ में देश की 20 प्रतिशत सम्पदा है। आज देश में एक लाख करोड़पति हैं। दुनिया के सबसे रईस 20 लोगों में से 3 भारत के हैं।
       आज 10-15 प्रतिशत संख्या वाला भारत का मायावी मध्यवर्ग 85-90 प्रतिशत भारतीयों की कीमत पर भारत को 'अमेरिकन इंडिया' बनाने में लगा हुआ है।
      क्या इस मध्यवर्ग के युवाजन भगत सिंह के स्वप्नों को साकार करने के लिए गरीब भारत के नोजवानों का नेतृत्व करेंगे? शायद नहीं। कहीं यह कहना ज्यादा सरलीकरण तो नहीं है। आइए, तसवीर का दूसरा पहलू भी देखें।
       इस मध्यवर्ग के मायावी स्वर्गलोक के अलावा मरते-खपते श्रमजीवियों का मृत्युलोक भी है, जिसके बलबूते मध्यवर्ग के देवता ऐशोआराम का जीवन व्यतीत करते हैं। इस मृत्युलोक के नर-नारियों का जीवन देवलोक (शासक-शोषक वर्ग) की इन्द्रसभा ने नारकीय बना रखा है। यहां जम्बू द्वीपे, भरत खंडे, भारत देशे की चर्चा- विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सबसे ज्यादा दुर्गति भारत के किसानों की है, किसानों के कर्म स्थल गांवों की है। भारत के छह लाख गांव मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। दो लाख गांवों को शुध्द पेय जल तक उपलब्ध नहीं है। देश की 68 प्रतिशत ग्रामीण आबादी खेती पर आश्रित है, जिसमें 40 प्रतिशत आबादी खुद काश्त है, 25 प्रतिशत आबादी भूमिहीन मजदूरों की है। खुद काम करने वालों का सामाजिक आधार अन्य पिछड़ा वर्ग 61 प्रतिशत, अनुसूचित जाति 37 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति 49 प्रतिशत है। 80 प्रतिशत किसानों के पास एक हेक्टेयर से कम जमीन है। ग्रामीण भारत की 55 करोड़ आबादी किसान है और 20 करोड़ खेतहर मजदूर हैं। औसत कृषि भूमि 1.47 हैक्टेयर है। किसानों को भारत में पूंजीपतियों, कारखानेदारों और सरकारी संस्थानों द्वारा अप्रत्यक्ष सब्सिडी दी जाती है, जिसका लाभ किसान को कम किंतु बिचौलियों को अधिक मिलता है। अमरीका और यूरोप के देशों में किसानों को प्रत्यक्ष सब्सिडी दी जाती है। अमरीका में प्रति हेक्टेयर 35 हजार डालर की प्रत्यक्ष सब्सिडी दी जा रही है। खेती करना सम्मानजनक नहीं रहा। 40 प्रतिशत नौजवान खेती करने के पक्ष में नहीं हैं। पैदावार की दर घट रही है। पंजाब जैसे विकसित कृषि प्रधान राज्य में गेहूं का उत्पादन 15 प्रतिशत घटा है। खाद्यान्न पैदा करने वाला कृषि क्षेत्रा घटकर 12 करोड़ हेक्टेयर रह गया है। किसान की आय की वृध्दि दर मात्रा 28 प्रतिशत है, जबकि गैर किसान 4 प्रतिशत। सकल घरेलू उत्पादन में कृषि क्षेत्र का योगदान 1975 में 38 प्रतिशत था जो 2007 में घटकर आधा यानी 19 प्रतिशत रह गया। केंद्र सरकार के बजट का 2 प्रतिशत ही खेती पर खर्च होता है जबकि संचार पर 13 प्रतिशत। गांव की 60 प्रतिशत आबादी के पास महीने में खर्च करने के लिए 600 रुपए भी नहीं हैं। विवेकहीन शहरीकरण के नाम पर किसानों से औने-पौने दामों में जमीन लगभग छीनी जा रही है। अब तक 2 करोड़ किसानों से जमीन छीन ली गई है, जिनमें 40 प्रतिशत आदिवासी हैं। बेदखल लोगों मेंसे केवल 54 लाख लोगों का ही पुनर्वास हो पाया है, जिनमें 25 प्रतिशत आदिवासी हैं।
      खेती घाटे का सौदा है। गांव, गरीब, किसान की स्थिति अत्यंत दयनीय है। किसानों और गांव के गरीबों का रोम-रोम कर्ज से विंधा है। महाजनी पूंजीवाद का युग वापस हुआ है। 'गोदान' के रचना काल का भयावह, विनाशकारी समय लौटा है। वित्ताीय पूंजी की अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था ने चाराें तरफ कर्ज का हाहाकार मचा रखा है। किसानों के कर्ज की समस्या को लेकर गठित की गई राधाकृष्ण आयोग की रिपोर्ट आंख खोलने वाली है। वर्ष 2003 तक भारत के किसानों पर 1,12,000 करोड़ रुपए का कर्ज था। आंध्रप्रदेश के 82 प्रतिशत, पंजाब के 65.4 प्रतिशत, हरियाणा के 53 प्रतिशत किसान कर्ज में डूबे हुए थे। पंजाब के प्रत्येक किसान पर औसत 45000 रुपए का कर्ज है। 2007 में यह कर्ज की राशि 3,80,000 करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। संस्थाओं द्वारा 57.7 प्रतिशत कर्ज किसानों को दिया जाता है, जबकि महाजनों द्वारा 42.3 प्र्रतिशत कर्ज वितरित होता है। छोटे किसानों को तो बैंक भी कर्ज देने में आनाकानी करते हैं। एक हेक्टेयर से भी कम जमीन जोतने वाले 61 प्रतिशत किसान अत्यंत गरीबी का जीवन यापन करते हैं। महाजनों के कर्ज जाल में उलझकर अपनी जमीन गिरवी रख देते हैं। एक दिन ऐसा आता है कि जमीन महाजन की हो जाती है और ये किसान आत्महत्या कर लेते हैं। यह नया सामाजिक परिदृश्य है। 'गोदान' रचना-काल में किसान आत्महत्या नहीं करते थे। आज तो हालत यह है कि 1997 से 2007 के दशक में 1,50,000 किसानों ने आत्महत्या की। औसतन रोजाना 45 किसान भारत में आत्महत्या करते हैं।
      भारत में मजदूरों की संख्या, 2001 की जनगणना के अनुसार 40.2 करोड़ है। इनमें शुध्द श्रमिक 31.3 करोड़ और सीमांत श्रमिक 8.9 करोड़ हैं। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की संख्या 36.9 करोड़ यानी 93 प्रतिशत है और संगठित क्षेत्रा में इनकी तादाद 2.59 करोड़ यानी 7 प्रतिशत है। शहरों में ये मजदूर गंदी बस्तियों में रहते हैं। कुल शहरी आबादी का 25 प्रतिशत स्लम्स में रहता है। शहरी आबादी के 67 प्रतिशत निम्नवर्गीय जनों का 1100 रुपए का प्रतिमाह जुगाड़ करना मुश्किल होता है। 43 प्रतिशत हिस्से के पास ही नियमित आय का साधन यानी नौकरियां हैं। स्वरोजगार के क्षेत्रा में पिछड़े वर्ग की हिस्सेदारी 34 प्रतिशत, एस.सी. की 31 प्रतिशत और एस. टी. की 27 प्रतिशत है।
      आज भी देश में 30 करोड़ लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं। इस वर्ग की प्रतिव्यक्ति आय एक डालर प्रतिदिन से कम है। अगर इसमें दो डालर प्रतिदिन कमाने वालों को शामिल कर लें तो देश में इन लोगों की कुल संख्या 60 करोड़ के आसपास होगी।
      अर्जुन सेन गुप्ता आयोग के अनुसार 84 करोड़ लोगों को प्रतिदिन 20 रुपए भी नहीं मिलते। 34 करोड़ लोगों को दो दिन में एक बार खाना नसीब होता है।
      जगमोहन का कहना है कि ''आज भी देश में दुनिया के सबसे अधिक गरीब, अशिक्षित और कुपोषित लोग रहते हैं। कम क्रय-शक्ति के कारण 25 करोड़ लोग हरदिन भूखे पेट सोते हैं। हर तीसरी महिला शारीरिक रूप से कमजोर है। 5 वर्ष से कम आयु में कम वजन के बच्चों में 40 प्रतिशत भारतीय हैं। इस वर्ग के 5 करोड़ 70 लाख बच्चे कुपोषित हैं। यदि इसे प्रतिशत में (48) देखा जाए तो यह इथियोपिया (47) से भी अधिक है। विश्व में स्कूल न जाने वाले कुल 15 करोड़ बच्चों में से 13 करोड़ भारतीय हैं। 4.40 करोड़ बच्चे गुलामी का जीवन जीते हैं। सात भारतीय महिलाओं में से छह अशिक्षित हैं। 64 करोड़ भारतीयों के पास शौचालय की  सुविधा नहीं है। 17 करोड़ के लगभग भारतीय पीने के स्वच्छ पानी से वंचित हैं। 29.3 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य की सामान्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। बीमारियां और प्राकृतिक आपदाएं आज भी भारतीयों के लिए मौत का पैगाम लेकर आती हैं। दुनिया में टी.बी. के सबसे अधिक 4 करोड़ मामले भारत में हैं। एड्स का खतरा हर दिन बढ़ रहा है। तथ्य यह है कि प्रतिमिनट एक भारतीय इस जानलेवा बीमारी की चपेट में आ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक तनाव लोगों के प्राण ले रहा है। शहरों की स्थिति कोई अच्छी नहीं है। झुग्गी-झोपड़ियों और अवैध कब्जों पर बनाई गई बस्तियों की बढ़ती तादाद शहरों के नारकीय जीवन को प्रतिबिंबित करने के लिए काफी है। ऐसी बस्तियां समग्र आबादी की तुलना में 250 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही हैं। झुग्गी-झोपड़ी वालों से भी ज्यादा बदनसीव लोगों की संख्या 10 करोड़ है, इन्हें झुग्गी-झोंपड़ी भी नसीव नहीं है। ये बेघर लोग हैं। सड़क, फुटपाथ, स्टेशनों, पार्कों, पुलों के नीचे और रेलवे पटरियों के पास रहते हैं। मजेदार बात यह है कि ये सभी घर-गृहस्थी वाले बाल-बच्चेदार लोग हैं। विश्व में प्रतिहजार वाहनों के बीच होने वाली मार्ग दुर्घटनाओं में सबसे बड़ा हिस्सा भारत में होने वाली मार्ग दुर्घटनाओं का होता है। कोढ़ में खाज वाली बात यह है कि शहरों में मूलभूत सुविधाओं की स्थिति दुर्दशा ग्रस्त बनी हुई है। देश के खाद्यान्न और शाक-सब्जियों का 40 प्रतिशत भाग खेत से उपभोक्ता तक पहुंचने के दौरान बर्बाद हो जाता है।''
      असली भारत बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी से पीड़ित रहने वाला कुपोषण का शिकार बीमार भारत है। हमारे देश में संसार के एक चौथाई दूध देने वाले पालतू जानवर हैं, फिर भी संसार भर में जितना दूध होता है, उसका केवल 5 फीसद ही इस देश में होता है। दूध की प्रतिवर्ष खपत 110 ग्राम है। कुपोषण से 45 प्रतिशत बच्चे भयंकर रूप से पीड़ित हैं और 60 फीसद का वजन उनकी आयु के अनुपात से कम है। यही हाल महिलाओं का है। पर्याप्त पोषण के अभाव में प्रतिवर्ष लाखों गर्भवती महिलाएं रक्त की कमी के कारण मृत्यु का शिकार होती हैं।
      नौजवानों के स्वास्थ्य की स्थिति संतोष जनक नहीं है। उनके कद, सीने की चौड़ाई और वजन में बराबर गिरावट आती जा रही है। देश के 75 प्रतिशत बच्चों को छोटी-बड़ी बीमारियों के कारण अस्वस्थ की श्रेणी में रखा जा सकता है। विटामिन ए की कमी के कारण प्रतिवर्ष 14 से 15 हजार बच्चे अंधे हो जाते हैं। 1980 में अंधों की संख्या 90 लाख थी। आज वह बढ़ी ही होगी। आंख के रोगों से पीड़ित 3 करोड़ व्यक्ति इस देश में रहते हैं।
      देश में करोड़ों व्यक्ति निराश्रित हैं, जिनमें से 39.2 प्रतिशत शारीरिक रूप से विकलांग हैं। 29.9 प्रतिशत क्षय, दमा, कैंसर आदि से पीड़ित हैं। 11 प्रतिशत लोग मानसिक रोगों के शिकार हैं। इन निराश्रितों का पांचवां हिस्सा दान एवं भीख पर आश्रित है। बाकी लोग या तो रद्दी इकट्ठा करते हैं या मामूली चोरी-चकोरी, गिरहकटी, उठाई गीरी और वेश्यावृत्तिा से पेट पालते हैं।
      देश में प्रतिवर्ष जनसंख्या का 7 प्रतिशत भाग यानी लगभग दो करोड़ लोग हृदय रोग के शिकार हो जाते हैं। अमीवा-पेचिश के रोगियों की संख्या 21 करोड़ है। कृमि रोगियों की संख्या 26 करोड़ है। मधुमेह से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या 5 करोड़ है। डायरिया-अतिसार से 19 करोड़ लोग पीड़ित हैं। दमा और कैंसर के सटीक आंकडे उपलब्ध नहीं हैं। मलेरिया, जुकाम, खांसी तो हमारे स्थायी मेहमान हैं। चेचक कभी खत्म कर दी गई थी, आज उसकी ससम्मान वापसी हो रही है। पोलियो से मासूमों को बचाने के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास हो रहे हैं। अल्लाहो-अकबर के अनुयाई वैक्सीन को इस्लाम विरोधी मान रहे हैं। मुस्लिम बच्चों मेंे पोलियों आज भी विद्यमान है। दो करोड़ से अधिक बच्चे गलगंड (गोयटर नामक गले की बीमारी) से ग्रस्त हैं। तपेदिक से प्रति वर्ष 5 लाख लोग मरते हैं। भारत में कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या 1.30 करोड़ है।
      जब से एल.पी.जी. अर्थव्यवस्था का अमरीका के नेतृत्व में सूत्रापात हुआ, तब से लाखों छोटे-कारखाने बंद हो गए। करोड़ों कारीगर, मजदूर बेकार हो गए। स्वचालित दैत्याकार मशीनों ने आदमी को निगल लिया। बेकारों की फौज सड़कों पर घूम रही है। अब तो बेरोजगारों के आंकड़े भी सरकार तैयार नहीं करती। एक अनुमान के अनुसार 20 करोड़ नौजवान बेकार हैं।
      घटे डालर की पूंछ पकड़ कर रुपया चल रहा है। जब अमरीका छींकता है तो भारत में निमोनिया हो जाता है। अमरीका की मंदी से भारत की अर्थव्यवस्था डांवाडोल हो जाती है। मंहगाई वैश्विक परिघटना के रूप में नमूदार हो रही है। ऐसी अभूतपूर्व मंहगाई भारत की जनता ने कभी नहीं देखी थी। जनता त्रााहि-त्रााहि कर रही है। भारत की राजनीति में परमाणु डील के नाम पर नूरा कुश्ती हो रही है। वास्तविक समस्याओं से    ध्यान हटाने के लिए यह तमाशा शवोरोज हमारे आगे हो रहा है।
      इस भीषण गरीबी के कारण सामाजिक समस्याएं बढ़ी हैं। दहेज प्रथा शहरी ग्रामीण मध्यवर्ग में नासूर बन गई है। स्त्रिायों को दहेज की खातिर जिंदा जलाया जा रहा है। स्त्री स्त्री के गर्भ में भी सुरक्षित नहीं है। कन्या भ्रूण नष्ट किए जा रहे हैं। स्त्राी-पुरुष अनुपात में भयानक अंतर आ रहा है। बलात्कार बढ़ रहे हैं। स्त्रियों में आत्महत्या की दर बढ़ रही है। स्त्राी के पास जब कुछ नहीं होता तो वह जिस्म फरोशी करने लगती है।
      निर्धन गरीब लोग शराब के आदी होते जा रहे हैं। बंगाल, केरल में सबसे अधिकशराब नोशी होती है। यहां स्त्रिायां भी सर्वाधिक दर से आत्महत्या कर रही हैं।
      इस देश के शासक जनता को संगठित नहीं विघटित कर रहे हैं। सांप्रदायिकता और जातिवाद, क्षेत्रीयता, आंचलिकता को बढ़ावा दिया जा रहा है। पूरी राजनीति जातिवाद, क्षेत्राीयवाद और सांप्रदायिकता के सांचे में ढल गई है।  मुस्लिम सांप्रदायिकता आज इस्लामी आतंकवाद में बदल गई है। कश्मीर में हुर्रियत कांफ्रेस खुल्लम खुल्ला पाकिस्तान जिंदावाद का नारा बुलंद करती है। पिछले बीस वर्षों में कश्मीर घाटी से 5 लाख कश्मीरी पंडितों को खदेड़ दिया गया है। अपने ही देश में अपने ही नागरिक शरणार्थी बन गए हैं। हिंदी भाषी लोग महाराष्ट्र, पूर्वोत्तर में मारे जा रहे हैं। पूरा देश अराजकता के मुहाने पर बैठा है। असंतोष का ज्वालामुखी धीरे-धीरे सुलग रहा है।
 (डा.भरत सिंह,प्रोफेसर,हिन्दी विभाग,अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय,अलीगढ़)      


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सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

अविकसित देशों की सांस्कृतिक समस्याएं- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

(शीमा माजिद द्वारा संपादित फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के चुनिंदा अंग्रेज़ी लेखों का संग्रह 'कल्चर एंड आइडेंटिटी: सिलेक्टेड इंग्लिश राइटिंग्स ऑफ़ फ़ैज़ (ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, ) अपनी तरह का पहला संकलन है। इस संकलन में फ़ैज़ के संस्कृति, कला, साहित्य, सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लेख इसी शीर्षक से पांच खंडों में विभाजित हैं। इनके अलावा एक और 'आत्म-कथ्यात्मक' खंड है, जिसमें प्रमुख है फ़ैज़ द्वारा 7 मार्च (अपने इंतकाल से महज़ आठ महीने पहले) को इस्लामाबाद में एशिया स्टडी ग्रुप के सामने कही गयी बातों को ट्रांसक्रिप्ट करके संकलित किया गया है। इस महत्वपूर्ण पुस्तक की भूमिका पाकिस्तान में उर्दू साहित्य के मशहूर आलोचक मुहम्मद रज़ा काज़िमी ने लिखी है। शायरी के अलावा फ़ैज़ साहब ने उर्दू और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में साहित्यिक आलोचना और संस्कृति के बारे में विपुल लेखन किया है। साहित्य की प्रगतिशील धारा के प्रति उनका जगज़ाहिर झुकाव इस संकलन के कई लेखों में झलकता है। इस संकलन में शामिल अमीर ख़ुसरो, ग़ालिब, तोल्स्तोय, इक़बाल और सादिक़ैन जैसी हस्तियों पर केंद्रित उनके लेख उनकी 'व्यावहारिक आलोचना' (एप्लाइड क्रिटिसिज्म) की मिसाल हैं। यह संकलन केवल फ़ैज़ के साहित्यिक रुझानों पर ही रौशनी नहीं डालता बल्कि यह पाकिस्तान और समूचे दक्षिण एशिया की संस्कृति और विचार की बेहद साफ़दिल और मौलिक व्याख्या के तौर पर भी महत्वपूण है। इसी पुस्तक के एक लेख 'कल्चरल प्राब्लम्स इन इंडरडिवेलप्ड कंट्रीज़' का तर्जुमा हम पेश कर रहे हैं। )इनसानी समाजों में संस्कृति के दो मुख्य पहलू होते हैं; एक बाहरी, औपचारिक; और दूसरा आंतरिक वैचारिक संस्कृति के बाह्य स्वरूप, जैसे सामाजिक और कला-संबंधी, संस्कृति के आंतरिक वैचारिक पहलू की संगठित अभिव्यक्ति मात्र होते हैं और दोनों ही किसी भी सामाजिक संरचना के स्वाभाविक घटक होते हैं। जब यह संरचना परिवर्तित होती है या बदलती है तब वे भी परिवर्तित होते हैं या बदलते हैं और इस जैविक कड़ी के कारण वे अपने मूल जनक जीव में भी ऐसे बदलाव लाने में असर रखते हैं या उसमें सहायता कर सकते हैं। इसलिए सांस्कृतिक समस्याओं का अध्ययन या उन्हें समझना सामाजिक समस्याओं अर्थात राजनीतिक और आर्थिक संबंधों की समस्याओं से पृथक करके नहीं किया जा सकता। इसलिए अविकसित देशों की सांस्कृतिक समस्याओं को व्यापक परिप्रेक्ष्य में यानी सामाजिक समस्याओं के संदर्भ में रखकर समझना और सुलझाना होगा। फिर अविकसित देशों की मूलभूत सांस्कृतिक समस्याएं क्या हैं? उनके उद्गम क्या हैं और उनके समाधान के रास्ते में कौन से अवरोध हैं?

मोटे तौर पर तो ये समस्याएं मुख्यत: कुंठित विकास की समस्याएं हैं; वे मुख्यत: लंबे समय के साम्राज्यवादी-उपनिवेशवादी शासन और पिछड़ी, कालबाह्य सामाजिक संरचना के अवशेषों से उपजी हुई हैं। इस बात का और अधिक विस्तार से वर्णन करना ज़रूरी नहीं। सोलहवीं और उन्नीसवीं सदी के बीच एशिया,अफ़्रीका और लातिन अमरीका के देश यूरोपीय साम्राज्यवाद से ग्रस्त हुए। उनमें से कुछ अच्छे-ख़ासे विकसित सामंती समाज थे जिनमें विकसित सामंती संस्कृति की पुरातन परंपराएं प्रचलित थीं। औरों को अभी प्रारंभिक ग्रामीण क़बीलाईवाद से परे जाकर विकास करना था। राजनीतिक पराधीनता के दौरान उन देशों का सामाजिक और सांस्कृतिक विकास रुक सा गया और यह राजनीतिक स्वतंत्राता प्राप्त होने तक रुका ही रहा। तकनीकी और बौध्दिक श्रेष्ठता के बावजूद इन प्राचीन सामंतवादी समाजों की संस्कृति एक छोटे से सुविधासंपन्न वर्ग तक ही सीमित थी और उसका अंतर्मिश्रण जन साधारण की समानांतर सीधी सहज लोक संस्कृति से कदाचित ही होता। अपनी बालसुलभ सुंदरता के बावजूद आदिम क़बीलाई संस्कृति में बौध्दिक तत्व कम ही था। एक ही वतन में पास-पास रहने वाले क़बीलाई और सामंतवादी समाज दोनों ही अपने प्रतिद्वंद्वियों के साथ लगातार क़बीलाई, नस्ली और धार्मिक या दीगर झगड़ों में लगे रहते। अलग-अलग क़बीलाई या राष्ट्रीय समूहों के बीच का खड़ा विभाजन (vertical division)। और एक ही क़बीलाई या राष्ट्रीय समूह के अंतर्गत विविधा वर्गों के बीच का क्षैतिज विभाजन (horizontal division), इस दोहरे विखंडन को उपनिवेशवादी-साम्राज्यवादी प्रभुत्व से और बल मिला। यही वह सामाजिक औरसांस्कृतिक मूलभूत ज़मीनी संरचना है जो नवस्वाधीन देशों को अपने भूतपूर्व मालिकों से विरासत में मिली है।

एक बुनियादी सांस्कृतिक समस्या जो इनमें से बहुत से देशों के आगे मुंह बाये खड़ी है, वह है सांस्कृतिक एकीकरण की समस्या, नीचे से ऊपर तक एकीकरण जिसका अर्थ है विविधा राष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रतिरूपों को साझा वैचारिक और राष्ट्रीय आधार प्रदान करना और क्षैतिज एकीकरण जिसका अर्थ है अपने समूचे जन समूह को एक से सांस्कृतिक और बौध्दिक स्तर तक ऊपर उठाना और शिक्षित करना। इसका मतलब यह कि उपनिवेशवाद से आज़ादी तक के गुणात्मक राजनीतिक परिवर्तन के पीछे-पीछे वैसा ही गुणात्मक परिवर्तन उस सामाजिक संरचना में होना चाहिए जिसे उपनिवेशवाद अपने पीछे छोड़ गया है।एशियाई, अफ़्रीकी और लातिन अमरीकी देशों पर जमाया गया साम्राज्यवादी प्रभुत्व विशुध्द राजनीतिक आधिपत्य की निष्क्रिय प्रक्रिया मात्र नहीं था और वह ऐसा हो भी नहीं सकता था। इसे सामाजिक और सांस्कृतिक वंचना (deprivation) की क्रियाशील प्रक्रिया ही होना था और ऐसा था भी। पुराने सामंती या प्राक्-सामंती समाजों में कलाओं, कौशलों, प्रथाओं, रीतियों, प्रतिष्ठा, मानवीय मूल्यों और बौध्दिक प्रबोधान के माधयम से जो कुछ भी अच्छा, प्रगतिशील और अग्रगामी था उसे साम्राज्यवादी प्रभुत्व ने कमज़ोर करने और नष्ट करने की कोशिश की। और अज्ञान, अंधविश्वास, जीहुज़ूरी और वर्ग शोषण अर्थात जो कुछ भी उनमें बुरा, प्रतिक्रियावादी और प्रतिगामी था उसे बचाये और बनाये रखने की कोशिश की। इसलिए साम्राज्यवादी प्रभुत्व ने नवस्वाधीन देशों को वह सामाजिक संरचना नहीं लौटायी जो उसे शुरुआत में मिली थी बल्कि उस संरचना के विकृत और बर्बाद कर दिये गये अवशेष उन्हें प्राप्त हुए। और साम्राज्यवादी प्रभुत्व ने भाषा, प्रथा, रीतियों, कला की विधाओं और वैचारिक मूल्यों के माध्यम से इन अवशेषों पर अपने पूंजीवादी सांस्कृतिक प्रतिरूपों की घटिया, बनावटी, सेकंड-हैंड नक़लें अध्यारोपित कीं।

अविकसित देशों के सामने इस वजह से बहुत सी सांस्कृतिक समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। पहली समस्या है अपनी विध्वस्त राष्ट्रीय संस्कृतियों के मलबे से उन तत्वों को बचा कर निकालने की जो उनकी राष्ट्रीय पहचान का मूलाधार है, जिनका अधिक विकसित सामाजिक संरचनाओं की आवश्यकताओं के अनुसार समायोजन और अनुकूलन किया जा सके, और जो प्रगतिशील सामाजिक मूल्यों और प्रवृत्तियों को मज़बूत बनाने और उन्हें बढ़ावा देने में मदद करे। दूसरी समस्या है उन तत्वों को नकारने और तजने की

जो पिछड़ी और पुरातन सामाजिक संरचना का मूलाधार हैं, जो या तो सामाजिक संबंधों की और विकसित व्यवस्था से असंगत हैं या उसके विरुध्द हैं, और जो अधिक विवेकवान, बुध्दिपूर्ण और मानवीय मूल्यों और प्रवृत्तियों की प्रगति में बाधा बनते हैं। तीसरी समस्या है, आयातित विदेशी और पश्चिमी संस्कृतियों से उन तत्वों को स्वीकार और आत्मसात करने की जो राष्ट्रीय संस्कृति को उच्चतर तकनीकी, सौंदर्यशास्त्रीय और वैज्ञानिक मानकों तक ले जाने में सहायक हों, और चौथी समस्या है उन तत्वों का परित्याग करने की जो अध:पतन, अवनति और सामाजिक प्रतिक्रिया को सोद्देश्य बढ़ावा देने का काम करते हैं।

तो ये सभी समस्याएं नवीन सांस्कृतिक अनुकूलन, सम्मिलन और मुक्ति की हैं। और इन समस्याओं का समाधान आमूल सामाजिक (अर्थात राजनीतिक, आर्थिक और वैचारिक) पुनर्विन्यास के बिना केवल सांस्कृतिक माध्यम से नहीं हो सकता। इन सभी बातों के अलावा, अविकसित देशों में राजनीतिक स्वतंत्रता के आने से कुछ नयी समस्याएं भी आयी हैं। पहली समस्या है उग्र-राष्ट्रवादी पुनरुत्थानवाद, और दूसरी है नव-साम्राज्यवादी सांस्कृतिक पैठ की।

इन देशों के प्रतिक्रियावादी सामाजिक हिस्से; पूंजीवादी, सामंती, प्राक-सामंती और उनके अभिज्ञ और अनभिज्ञ मित्रागण ज़ोर देते हैं कि सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा के अच्छे और मूल्यवान तत्वों का ही पुन: प्रवर्तन और पुनरुज्जीवन नहीं किया जाना चाहिए बल्कि बुरे और बेकार मूल्यों का भी पुन: प्रवर्तन और स्थायीकरण किया जाना चाहिए। आधाुनिक पाश्चात्य संस्कृति के बुरे और बेकार तत्वों का ही नहीं बल्कि उपयोगी और प्रगतिशील तत्वों का भी अस्वीकार और परित्याग किया जाना चाहिए। इस प्रवृत्ति के कारण एशियाई और अफ़्रीकी देशों में कई आंदोलन उभरे हैं, इन सारे आंदोलनों के उद्देश्य मुख्यत: राजनीतिक हैं, अर्थात बुध्दि संपन्न सामाजिक जागरूकता के उभार में बाधा डालना और इस तरह शोषक वर्गों के हितों और विशेषाधिकारों की पुष्टि करना।

उसी समय नव-उपनिवेशवादी शक्तियां, मुख्यत: संयुक्त राज्य अमरीका, अपराध, हिंसा, सिनिसिज्म, विकार और लंपटता का महिमामंडन और गुणगान करने वाली दूषित फ़िल्मों, पुस्तकों, पत्रिकाओं, संगीत, नृत्यों, फ़ैशनों के रूप में सांस्कृतिक कचरे, या ठीक-ठीक कहें तो असांस्कृतिक कचरे के आप्लावन से प्रत्येक अविकसित देश के समक्ष खड़े सांस्कृतिक शून्य को भरने की कोशिश कर रही हैं। ये सभी निर्यात अनिवार्यत: अमरीकी सहायता के माधयम से होने वाले वित्तीय और माल के निर्यात के साथ साथ आते हैं और उनका उद्देश्य भी मुख्यत: राजनीतिक है अर्थात अविकसित देशों में राष्ट्रीय और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ने से रोकना और इस तरह उनके राजनीतिक और बौध्दिक परावलंबन का स्थायीकरण करना। इसलिए इन दोनों समस्याओं का समाधान भी मुख्यत: राजनीतिक है अर्थात् देशज और विदेशी प्रतिक्रियावादी प्रभावों की जगह प्रगतिशील प्रभावों को स्थानापन्न करना। और इस काम में समाज के अधिक प्रबुध्द और जागरूक हल्क़ों जैसे लेखकों, कलाकारों और बुध्दिजीवियों की प्रमुख भूमिका होगी। संक्षेप में, कुंठित विकास, आर्थिक विषमता, आंतरिक विसंगतियां, नक़लचीपन आदि अविकसित देशों की प्रमुख सांस्कृतिक समस्याएं मुख्यत: सामाजिक समस्याएं हैं। वे एक पिछड़ी हुई सामाजिक संरचना के संगठन, मूल्यों और प्रथाओं से जुड़ी हुई समस्याएं हैं। इन समस्याओं का कारगर समाधान तभी होगा जब राष्ट्रीय मुक्ति के लिए संपन्न हो चुकी राजनीतिक क्रांति के पश्चात राष्ट्रीय स्वाधाीनता को पूर्ण करने के लिए सामाजिक क्रांति भी होगी।

अंग्रेजी से अनुवाद : भारत भूषण तिवारी

(नयापथ के फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ विशेषांक से साभार)







सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

जलेबी नहीं है क्रांति

    जी हां,क्रांति जलेबी नहीं है। जिसका कलेवा कर लिया जाए। क्रांति किसी पार्टी का ऑफिस नहीं है जिसे बना लिया जाए और क्रांति हो जाए। क्रांति दोस्ती का नाम नहीं है। क्रांति मजदूर का धंधा नहीं है।गाली नहीं है।मजाक नहीं है।क्रोध नहीं है।घृणा नहीं है जिस पर जब मन आया थूक दिया जाए।
    क्रांति किसी नारे में नहीं होती । उपासना में भी नहीं होती। क्रांति अंधविश्वास का नाम नहीं है। क्रांति कोई ट्रेडमार्क नहीं है। क्रांति लोगो नहीं है। क्रांति किसी की गुलाम नहीं है। क्रांति इच्छा का खेल नहीं है। कम्युनिस्ट संगठन की असीम क्षमता का नाम क्रांति नहीं है। क्रांति को आप बांध नहीं सकते। सिर्फ होते देख सकते हैं,चाहें तो भाग ले सकते हैं। 
     क्रांति तो सिर्फ क्रांति है। वह भगवान नहीं है,आस्था नहीं है,वह एक सामाजिक प्रक्रिया है जो व्यक्ति की चेतना से स्वतंत्र है और उसे सम्पन्न करने में व्यक्तियों, मजदूरवर्ग, जनता आदि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। क्रांति का मतलब है मूलगामी सामाजिक परिवर्तन। मूलगामी सामाजिक परिवर्तन सामाजिकचेतना की अवस्था पर निर्भर करते हैं।
     भारत में अब तक क्रांति नहीं हो पायी है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है ? क्या कम्युनिस्ट पार्टियां जिम्मेदार हैं ? क्या कम्युनिस्ट नेताओं के कलह को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है ? भारत में कम्युनिस्ट भूल नहीं करते, विचारधारात्मक विचलन नहीं दिखाते,कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन नहीं होता ,अनेक मेधावी कॉमरेड पार्टी से नहीं निकाले जाते और कम्युनिस्ट संगठित रहते,कभी गलती ही नहीं करते तो क्या भारत में क्रांति हो जाती ? जी नहीं,इसके बाद भी क्रांति नहीं होती।
   क्या पश्चिम बंगाल,केरल और त्रिपुरा में कम्युनिस्ट क्रांति कर पाए हैं ? जी नहीं,क्रांति एक सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया है। उसे दल,विचारधारात्मक विचलन,दलीय फूट, व्यक्तियों की भूमिका आदि में संकुचित करके नहीं देखना चाहिए।
   क्रांति की कुछ अनिवार्य वस्तुगत परिस्थितियां होती हैं और इन परिस्थितियों को राजनीतिक रूपान्तरण का जब कोई क्रांतिकारी संगठन रूप देता है तो बुनियादी परिवर्तन की प्रक्रिया तेज गति पकड़ लेती है।
  जो लोग सोचते हैं कि कम्युनिस्ट संगठन होने मात्र से क्रांति हो जाएगी वे गलत सोचते हैं। यह भी गलत है कि कम्युनिस्टों का कोई विरोध न करे और उनके लिए समूचे देश में एकच्छत्र शासन का मौका दे तो क्रांति हो जाएगी। ये सारे प्रयोग असफल साबित हुए हैं। क्रांति किसी कल्पना का नाम नहीं है बल्कि वह ठोस भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। विभिन्न सामाजिक वर्गों की राजनीतिक वफादारी पर निर्भर करती है।
       जिस समाज में क्रांति होती है वहां सामाजिक उथल-पुथल होती है। यह सामाजिक उथल-पुथल किसी सामाजिक आवश्यकता के कारण होती है। जब संस्थान पुराने पड़े जाते हैं।  तो वे सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ होते हैं। हमें सोचना चाहिए क्या आधुनिक भारत के संस्थान जीर्ण-शीर्ण हो गए हैं ? क्या जनता की सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के बारे में कानून बनाने,तदनुरूप संरचनाएं बनाने और कार्यप्रणाली बदलने में संस्थान असमर्थ हैं ? क्या संस्थान अपनी अपडेटिंग कर रहे हैं ? कानून,संसद,संविधान,बाजार,धर्म आदि में अपडेटिंग हो रही है?
    भारत की खूबी है कि यहां लगातार अपडेटिंग हो रही है। सामाजिक आवश्यकताओं को दमन के आधार पर कुचलने की बजाय पर्सुएशन ,कानून और नियमों के आधार पर नियमित किया जा रहा है। संस्थान यदि अपडेटिंग बंद कर दें तो क्रांति की संभावनाएं पैदा होती हैं।
    संस्थान यदि डंडे के बल पर कोई चीज लागू करने की कोशिश करते हैं तो क्रांति का मार्ग प्रशस्त होता है। संस्थान अन्य के लिए  स्थान नहीं दें तो क्रांति संभव है। संगठित मजदूरों की मांगों पर सरकार ध्यान नहीं दे तो क्रांति संभव है। पुराने मूल्यों और सामाजिक संबंधों के आधार पर जीना मुश्किल हो जाए और आम जनता उन्हें बदलने के  लिए किसी भी हद तक कुर्बानी देने को तैयार हो जाए। जान तक की कुर्बानी देने को तैयार हो जाए तो क्रांति संभव है। ऐसी अवस्था में एकजुट कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में क्रांति की संभावनाएं प्रबल होती हैं। भारत में ये परिस्थितियां ही नहीं हैं।
      भारत में क्रांति की संभावना इस लिए नहीं है क्योंकि यहां के आधुनिक संस्थानों ने क्रमशःसमयानुरूप अपने को बदला है। संगठित मजदूरवर्ग ने जब भी अपनी मांगे उठायी हैं उन पर मोटे तौर पर केन्द्र सरकार ने अनुकूल प्रतिक्रिया व्यक्त की है। हाल ही में भयानक आर्थिकमंदी के बावजूद संगठित मजदूरवर्ग को छठे वेतन आयोग के अनुसार नए वेतनमान और अन्य सुविधाएं प्रदान की गईं। इसका यह अर्थ नहीं है कि केन्द्र सरकार मजदूर समर्थक है ,जी नहीं,केन्द्र सरकार लगातार मजदूर विरोधी फैसले लेती रही है लेकिन ज्योंही वेतन और कैरियर से संबंधित मांगे रखी जाती हैं उसने सकारात्मक त्वरित प्रतिक्रिया व्यक्त की है। ऐसी स्थिति में मजदूरों को बुनियादी परिवर्तन के लिए हरकत में लाना संभव नहीं है।
      भारत में बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के मार्ग में उसी दिन सबसे बड़ी बाधा खड़ी हो गई जब स्वतंत्र भारत ने अपना संविधान स्वीकृत किया। इस संविधान के जरिए बुर्जुआ और सामन्ती वर्गों ने सत्ता के केन्द्रीकरण की प्रक्रिया आरंभ कर दी । भारत जैसे विशाल कृषिप्रधान देश में नेहरूयुग के दौरान बुर्जुआजी को शक्तिसंपन्न बनाया गया और सामंतों के अधिकारक्षेत्र में शामिल इलाकों को अनछुआ छोड़ दिया गया। सामंतों को अधिकारहीन बनाए बिना भारत के किसानों और खेतमजदूरों का मजदूरों को समर्थन मिलना असंभव था क्योंकि बड़ी तादाद में खेतमजदूर सामंतों के खेतों में काम करते थे। खेतमजदूरों की संख्या मजदूरों से कई गुना ज्यादा है। कांग्रेस ने गावों में सामंती ढ़ांचे को तोड़ा ही नहीं। राजाओं का प्रिवीपर्स नेहरू युग में जारी रहा। इसके कारण गांवों में सामंतवाद फलता-फूलता रहा। संसद में राजाओं और बड़े सामंतों की बहुत बड़ी तादाद लगातार चुनकर आती रही है।
      सामंती दबाव के कारण मजदूरवर्ग का खेतमजदूरों के साथ मोर्चा ही नहीं बन पाया। इसके अलावा क्रांति के लिए दुकानदारों और व्यापारियों में भी जनाधार बनाने की आवश्यकता थी जिसे कभी कम्युनिस्टों ने गंभीरता से नहीं लिया और दुकानदारों-व्यापारियों को संघ परिवार और कांग्रेस के ही कब्जे में छोड़ दिया। ऐसी स्थिति में जिस सशक्त सामाजिक शक्ति संतुलन के निर्माण की जरूरत थी वह हो ही नहीं पाया। कालांतर में मजदूरों में तेजी से एक नए वर्ग ने जन्म लिया जिसे हम साइबर मजदूर कहते हैं ,ये भी मजदूर संगठनों की पकड़ के बाहर हैं ऐसे में मजदूरवर्ग की सामाजिक शक्ति सीमित होकर रह गयी है।
    भारत में क्रांति न हो पाने का एक अन्य बड़ा कारण है बैंकिंग व्यवस्था। केन्द्र सरकार का राष्ट्रीयकृत बैंकों के जरिए विभिन्न क्षेत्रों में ऋण वितरण करना। इसके लिए कांग्रेस ने सबसे पहले बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और बाद में बैंकों को औजार की तरह सामाजिक-राजनीतिक संतुलन बुर्जुआजी के पक्ष में करने के लिए इस्तेमाल किया। प्रत्येक बैंक को यह तय किया कि उन्हें कितना पैसा किसानों को कर्ज देना है,कितना दुकानदार-व्यापारियों आदि को देना है और कितना मध्यवर्ग के लोगों के लिए घर वगैरह के लिए कर्ज देना है। सरकारी बैंकों से कर्ज की सुविधाएं मुहैय्या कराकर केन्द्र सरकार ने मध्यवर्ग और पेशेवर तबकों को क्रांति के दायरे से निकालकर बुर्जुआ विकास के दायरे में शामिल कर लिया।
    दूसरी ओर नौकरशाही को खुली छूट दी और उसके ऊपर किसी भी किस्म का अंकुश नहीं लगाया । इससे सामाजिक शक्ति संतुलन मजदूरों और कम्युनिस्टों के विपरीत चला गया। यह संभव नहीं है कि खेत मजदूर,किसान,दुकानदार-व्यापारी,मध्यवर्ग के बिना कोई बड़ा राजनीतिक मोर्चा वामपंथी बना लें।
     वामपंथियों ने पश्चिम बंगाल,केरल और त्रिपुरा में शक्ति संतुलन अपने पक्ष में किया है इसके कारण ही उन्हें वहां 40-48 प्रतिशत तक वोट मिलते रहे हैं। बाकी इलाकों में सिर्फ संगठित मजदूरों तक ही वामपंथियों की पहुँच हो पायी है। यह वास्तविकता है।
    हम यह क्यों भूल जाते हैं कि जिस तरह कम्युनिस्ट अपने पक्ष में सामाजिक शक्ति-संतुलन पैदा करना चाहते हैं,बुर्जुआजी भी अपने पक्ष में सामाजिक शक्ति संतुलन बनाए रखना चाहता है। बुर्जुआजी हमेशा संगठित मजदूरों के गुस्से का शमन करने की चेष्टा करता रहा है। बुर्जुआजी ने सचेत रूप से गैर-मजदूरवर्ग को अपने पक्ष में करने की कोशिश की है। किसानों की 90 हजार करोड़ रूपयों की कर्जमाफी का फैसला एक वर्गीय फैसला था जिसने बुर्जुआजी का किसानों में अलगाव कम किया है।
    भारत में मजदूर आंदोलन की मुश्किल यह भी है कि उसके नेताओं,सदस्यों और कार्यक्रमों में अर्थवाद हावी है । अधिकांश इलाकों में मजदूरवर्ग अभी तक सर्वहाराचेतना से लैस नहीं हो पाया है। मजदूरों में पुराने सड़-गले मूल्यों के प्रति प्रेम और आकर्षण अभी भी बचा हुआ है।
     कम्युनिस्टों में संसदीय लोकतंत्र के प्रति मोह बढ़ा है। संसदीय लोकतंत्र के प्रति मोह को बढ़ाने में पश्चिम बंगाल के दीर्घकालीन संसदीय वामशासन की भी बड़ी भूमिका है। कम्युनिस्टों में संसदीयमोह का बढ़ना इस बात का संकेत है कि निकट भविष्य में कम से कम कम्युनिस्ट पार्टियां किसी भी बड़ी राष्ट्रव्यापी जंग में शामिल होने नहीं जा रही हैं। संसदीयमोह का अर्थ है अब संघर्ष नहीं सांकेतिक प्रतिवाद करो।
  जनता के असंतोष को कम्युनिस्ट राजनीतिक पूंजी में तब्दील न कर लें इस ओर कांग्रेस ने बड़े ही सुनियोजित ढ़ंग से समय-समय पर ध्यान दिया और अपने वर्गीय दोस्तों के हितों की रक्षा की। इसके कारण उसे कम्युनिस्टों के राजनीतिक प्रसार को सीमित करने में मदद मिली।    
            
                       
                                             


बुधवार, 7 जुलाई 2010

फासीवाद के फलसफ़े में ‘भारत ’ बनाम ‘हिन्दू राष्ट्र '

हिन्दू साम्प्रदायिकता को हिन्दी में फासीवाद के नाम से भी पुकारा जाता है। इसका लक्ष्य है पूंजीवादी उदार लोकतंत्र की जगह हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को लागू करना। ‘भारत’ को लोकतांत्रिक देश की बजाय ‘हिन्दू राष्ट्र’ बनाना। वे यह भी मिथ फैलाते हैं कि भारत की बहुसंख्यक आबादी हिन्दू है अतः भारत प्राकृतिक तौर पर हिन्दू राष्ट्र है। वे धर्म के आधार पर सिरों की गिनती करके राष्ट्र का बुनियादी चरित्र बदलना चाहते हैं।
    मजेदार बात यह है कि भारत में किसी राजा ने हिन्दू राष्ट्र का सपना नहीं देखा था। प्राचीनकाल और मध्यकाल में जब ‘भारत’ में मुगल नहीं आए थे उस समय भी किसी ने ‘हिन्दू राष्ट्र’ की धारणा के आधार पर राज्य की प्रकृति निर्धारित करने की कोशिश नहीं की। उस समय हमारे देश को ‘भारत’ कहते थे ‘हिन्दू राष्ट्र’ नहीं कहते थे। आज भी इस देश का नाम ‘भारत’ है ‘हिन्दू भारत’ नहीं। ‘भारत’ ने कभी बहुमत और अल्पमत की बात नहीं की। ‘हिन्दू’ पदबंध को किसी भी राज्य के नाम के साथ नत्थी नहीं किया।
    भारत एक बहुलतावादी राष्ट्र है। इसमें एकाधिक जातियों,धर्मों और संस्कृतियों के मानने वाले सैंकड़ों सालों से निवास कर रहे हैं। इनके बीच सांस्कृतिक ,आर्थिक और सामाजिक आदान-प्रदान की परंपरा रही है।
   ‘भारत’ पदबंध बहुलतावाद और एकता में अनेकता का प्रतीक है। सामुदायिक,धार्मिक और निजी स्वायत्तता और स्वतंत्रता को प्रत्येक स्तर पर इसने संरक्षित किया है। ‘भारत’ के आधार पर राज्य की धारणा नागरिकों को एकसूत्र में बांधती है। उनका भावनात्मक एकीकरण करती है। नागरिक को राज्य को नैतिकता से अलग करके देखने के लिए बाध्य करती है।
   ‘भारत’ में किसी एक की आत्मा निवास नहीं करती बल्कि फासीवादियों के तर्कजाल को तोड़ते हुए देखें तो पाएंगे कि ‘भारत’ की आत्मा के साथ फासीवादी जिस हिन्दू को जोड़ते हैं वैसा ‘भारत’ में कभी नहीं हुआ। ‘भारत’ की धारणा में फासीवादियों की हिन्दू आत्मा नहीं आती। किसी भी किस्म का जातीय,नैतिक,धार्मिक श्रेष्ठत्व भी नहीं आता। ‘भारत’ की धारणा बुनियादी तौर पर राष्ट्रवाद और रक्त आधारित अहं से मुक्त है। इसमें देश का बोध है। देश के प्रति प्रेम है। लेकिन देशप्रेम का मतलब किसी धर्म विशेष या जाति विशेष के लोगों से प्रेम नहीं है। बल्कि भारत में रहने वाले प्रत्येक नागरिक,प्रकृति, पशु- पक्षी,शहर-जंगल,गांव-देहात,बच्चे-बूढ़े,नर-नारी सभी के प्रति इसमें प्रेम है और इन सबके प्रति समान भाव है।
    हिन्दू फासीवादी कुछ चीजों को ज्यादा पवित्र मानते हैं और कुछ को अपवित्र मानते हैं। ‘भारत’ की धारणा पवित्रता-अपवित्रता के मानदंड को नहीं मानती। मसलन् हिन्दू फासीवादियों को गऊ से बेहद प्रेम है। वास्तव में उनका गऊ प्रेम नकली है। वे गऊ की महानता को प्रदर्शित नहीं करते बल्कि गऊ के बहाने घृणा के एजेण्डे का प्रचार करते हैं।
     ‘भारत’ की धारणा में सभी पशु बराबर हैं और पशुओं के प्रति हम नैतिक नहीं मानवीय सरोकार व्यक्त करते रहे हैं। मानवीय सरोकारों को किसी समुदाय या व्यक्ति को नीचा दिखाने,  उसके प्रति हेयभाव पैदा करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया है। पशुओं और प्रकृति को हमने मानवीय जरूरतों और सामाजिक हितों को केन्द्र में रखकर परिभाषित किया है। उसे नैतिक-अनैतिक, पवित्र-अपवित्र,पाप-पुण्य आदि के आधार पर व्याख्यायित नहीं किया है। मानवीय जरूरतों के आधार पर पशु संपदा और प्राकृतिक संपदा को समय-समय पर परिभाषित किया गया है।
    ‘भारत’ वन संरक्षण और पशु संरक्षण के मामले में मनुष्य सैंकड़ों सालों से प्राकृतिक नियमों का पालन करता रहा है। अतः उसके लिए गाय सिर्फ गाय है। अन्य पशुओं की तरह ही एक पशु है। गाय या किसी भी पशु-पक्षी के प्रति क्या रूख अपनाया जाए यह मनुष्य के निजी विवेक पर छोड़ दिया गया है। मनुष्य के निजी विवेक को सामाजिक विवेक के बरक्स रखकर देखने की कोशिश ‘भारत’ नहीं करता।
    हमें यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए ‘भारत’ का विवेक नैतिक-अनैतिक,पाप-पुण्य,म्लेच्छ और हिन्दू आदि भेदमूलक अवधारणाओं को नहीं मानता। ‘भारत’ की धारणा में इस देश में जो कुछ पैदा हुआ है वह हमारा है और हम उसके हैं। चाहे मनुष्य हों,पशु हों, पक्षी हों,पेड़ हों,देवी हों देनता हों,नदी हों,नाले हों सभी हमारे हैं और हम उनके हैं, इनमें कोई छोटा है न बड़ा है।
    समानता और बहुलता,निजी और सार्वजनिक का सम्मिश्रण ही ‘भारत’ की धारणा को बनाता है। ‘भारत’ का आधार भेद नहीं अभेद है। ‘भारत’ की अवधारणा में देशी-विदेशी का भेद नहीं है। इसमें घृणा को कोई जगह नहीं है। ‘भारत’ घृणा और भेद से मुक्त होने के कारण अनेकों जातियों और धर्मों का हृदय से स्वागत करता रहा है।
        इसके विपरीत ‘हिन्दू राष्ट्र’ का फासीवादी सिद्धान्त भेद और घृणा पर आधारित है। यह मनुष्यों में श्रेष्ठ और निकृष्ट का भेद करता है, जातिभेद करता है,सवर्ण -असवर्ण का भेद करता है, देशी- विदेशी का भेद करता है। पशुओं में भी भेददृष्टि लागू करता है। गऊ रक्षा के नाम पर चलने वाले तमाम आंदोलन उसकी पशु भेद दृष्टि के आदर्श उदाहरण हैं।
    ‘हिन्दू राष्ट्र’ और ‘भारत’ में बुनियादी अंतर ही नहीं है बल्कि इन दोनों के सामाजिक हितों में बुनियादी अंतर्विरोध है। ‘हिन्दू राष्ट्र’ के मानने वाले फासीवादियों के लिए राष्ट्र मनवाने की चीज है। इसके विपरीत ‘भारत’ में राष्ट्र को मनवाने का भाव नहीं है। ‘भारत’ के लिए देश महसूस करने की चीज है। जीने की चीज है। देश नागरिकों की प्राणवायु है। लाइफ लाइन है। इसके लिए किसी प्रचार और दबाब की जरूरत नहीं है।
    ‘भारत’ में डंडे के बल पर मनवाने का भाव नहीं है। इसके विपरीत ‘हिन्दू राष्ट्र’ के पक्षधर राष्ट्र की शक्ति को आम नागरिकों से मनवाना चाहते हैं वे चाहते हैं कि नागरिक ‘हिन्दू राष्ट्र’ की शक्ति मानें। उसके बताए रास्ते पर चलें। उसके बताए नैतिक नियमों का पालन करें।
    राष्ट्र की शक्ति को मनवाने के लिए फासीवादी शिक्षा के डंडे का सहारा लेते हैं । उन्होंने राज्य को नैतिक शिक्षक में बदल में दिया है। ‘भारत’ के लिए राज्य नैतिक शिक्षक कभी नहीं रहा। हिन्दू की नैतिक शक्ति को उन्होंने राज्य की नैतिक शक्ति में तब्दील किया और अंत में वे सबको मजबूर कर रहे हैं कि उनकी बात मानो,उनके विचार मानो,उनकी नैतिकता मानो,उनकी राजनीति मानो और इसके लिए वे डंडे का सहारा ले रहे हैं। वे डंडे के जरिए ‘हिन्दू राष्ट्र’ की धारणा,मान्यता और मूल्यों को आम जनता पर थोपने का काम कर रहे हैं। वे डंडे के आधार पर सहमति तैयार करना चाहते हैं। ये चीजें ‘भारत’ के लिए परायी हैं। इनका ‘भारत’ की परंपरा और सभ्यता से कोई संबंध नहीं है। डंडे के बल पर सहमति की राजनीति भारत की मूल प्रकृति से मेल नहीं खाती।    
             




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